भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मानुषी भाषापर तीरीत हदीस मुहम्मदी खुदाका शाप आदमका दश दण्ड होवाको पंद्रह दण्ड, निष्कर्ष विरोध

बारह कोठरियां प्रस्तुत हो चुकनेके बाद बेगम अण्डा देने लगती है। बेगमोंके बच्चा देनेकी विचित्र युक्ति है। वे सब घरोंमें सुस्त नर मक्खियोंसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखतीं। पर जब बाहर फिरती हैं तो नर मक्खीसे मिलती हैं।

हिउबर - बहुत बड़ा विद्वान् था उसने इस विषयको बहुत जांचकर लिखा है। वह कहता है कि, वे छत्तेके बाहर संयुक्त होते हैं एक बारके सम्भोगसे मक्खियां दो मौसम तक बच्चा देती रहती हैं। एकही मौसममें लाख बच्चे देती हैं जिन अण्डोंसे परिश्रमी मक्खियां उत्पन्न होती हैं उनकी बहुत रक्षा की जाती है उन बच्चोंका लालन पालन फूलोंके रस तथा मधुसे होता है, दाई मक्खी उनको पालती है। दाई मक्खीका यही काम है कि, सदैव बच्चोंकी रक्षा तथा सेवा किया करे, बराबर ग्यारह मास भी परिश्रमी मक्खियोंके अण्डे देते नहीं बीतते कि, रानी मक्खियां फिर राजकुमारियोंका अण्डा देने लगती हैं इसी सेवामें संलग्न रहती हैं। शाहजादी मक्खियां फूलके रस अथवा खराब मधुको अच्छा नहीं समझतीं उनके लिये अवश्यही उत्तम मधुका प्रयोजन होता है। मधुमक्खियां बहुत नमक-हलाल होती हैं। अण्डेकी अवस्थासे लेकर जबतक रानी मक्खीका पूरा स्वरूप होता है उसमें कुल सोलह दिन लगते हैं। सोलह दिनोंके बाद मक्खीका पूरा स्वरूप बन जाता है। इनको एक समयमें एक रानीका प्रयोजन होता है। वस्तुतः बादशाह होनेमें एकसे अधिक अधिकारी होनेसे बहुत कष्ट होता है। इस कारण जब तक सिंहासन खाली न हो तबतक रानी मक्खी एक घरमें बन्द रहती है। इसमें बहुत बड़ा कारण यह है कि, जिसके लिये एकसे अधिक रानी निकाली नहीं जाती क्योंकि, एकही समयमें दो रानी बाहर निकाली जाने पर एककी मृत्यु निश्चित है। मक्खियोंकी सैन्य चलती है तो अगवानीके लिये केवल एक मलका होती है। मक्खियोंकी मुखिया वह आगे होती है। प्रायः अनेक रानी मक्खी होती हैं जब दो रानी मक्खियोंमें साक्षात् होता है तो भयंकर युद्ध उपस्थित होता है। उनकी गिनती पहचानी जाती है। मक्खियोंके नियत होनेमें एक विचित्र कौतुक होता है। यदि कभी उनका बादशाह खो जाय कोई दूसरा वारिस न बचे तो बहुत आयोजन होता है। इस कारण एक मजदूरको चुनकर शाही महलमें प्रवेश कर देते हैं इसको राजसी भोजन कराते हैं। अन्तमें वही उनकी मलका होती है। इस प्रकार लिखा है कि, अच्छे भोजनके कारण वह मक्खी मोटी ताजी और तेजस्वी हो जाती है। केवल इस भोजनमेंही यह गुण है उसीकी यह प्रशंसा है कि, मजदूरको रानीके स्वरूपका बना देती है। अगस्तके आरम्भमें यह अधिक अण्डे देती है, जब अण्डोंका आधिक्य हो जाता है तो निकम्मी मक्ख-

हीरा पुत्र होनेका आशीर्वाद विषैला सांप, बिच्छू मरानेवाला अजगर

याँकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। परिश्रमी मक्खियोंके लिये जाड़ेका कड़ाका असाध्य है। वे सब मिलकर सुस्त मक्खियोंसे यह सलूक करती हैं कि, वह मेहनती मक्खियां निकम्मी मक्खियोंको मार डालती हैं। मधु गूह भन-भनाहटके शब्दसे भर जाता है। सुस्त भरी मक्खियां और चालाक मक्खियां आपसमें लड़ाई करती हैं। परिश्रमी मक्खियां सुस्त मक्खियोंको मार डालती हैं, सुस्त मक्खियोंका उद्योग व्यर्थ होता है। परिश्रमी मक्खियोंके डंक उनके शरीरसे छिदकर पार हो जाते हैं मरे हुओंके पृथिवीपर ढेर हो जाते हैं। बेलकटन साहबके कथनानुसार यह क्रीड़ा स्वभावतः बनैला है।

यह सारा हाल बीटन साहबकी नेचरल डिक्शनरी और दूसरी अङ्गरेजी पुस्तकोंमें पूर्ण रूपसे लिखा हुआ है, यहाँ तो संक्षेपसे लिखा गया है।

जलचर ।

मैं जलके जीवोंकी बुद्धिका वर्णन क्या करूँ, इनकी बुद्धिमानोकी बहु-तेरी बातें लिखी हैं परमेश्वरने इनका खाना पीना पानीही बनाया है यद्यपि वे आखेट भी करते हैं तो भी पानीके भोजनसे पानीही होकर रहते हैं। इनकी बुद्धि स्थलके जीवोंसे कम नहीं है।

घड़ियाल बिल्ली और लोमड़ी—ली साहबने लिखा है कि, एक मनुष्यने अमेरिका देशका भ्रमण करते हुये घड़ियालके बच्चेको पकड़ लिया उसने उसको भली प्रकार पाला। यहाँतक कि, घड़ियाल कुत्तेकी तरह उसके पीछे २ फ़िरा करता था। एक बिल्लीके बच्चेसे उसकी दोस्ती हो गई। न्यूयार्क नगरमें बिल्ली आगके सामने तापनेको बैठती तो घड़ियाल भी उसके समीप जाता उसपर अपना शिर धर कर सो जाता। इस बिल्लीकी जुदाईसे घड़ियाल बहुत बेचैन हो जाता आपसमें साथ रहनेसे प्रसन्न रहते। एक लोमड़ी थी उससे घड़ियाल अप्रसन्न रहा करता था। क्योंकि, लोमड़ी कुछ ऐसे खेल किया करती थी जो घड़ियालको नापसन्द थे इसी कारण उससे रुष्ट रहता था रुष्ट होकर लोमड़ीको दण्ड दिया करता था। पर दण्डदेनेमें अपने मुँहको काममें नहीं लाता था केवल अपनी पूछद्दारा उसको थोड़ा सा दण्ड दे देता था क्योंकि, यदि जोरसे लगाता तो लोमड़ी उसी समय मर जाती।

घरेला घड़ियाल—आक्सफोर्डकी सड़कके पास एक स्त्री रहती थी। उसने एक घड़ियाल पाला था मुँह खोलकर उसको खिलाया करती थी। उस घड़ियालको वह बहुत प्यार किया करती थी उसको वह आगके सामने ठोंकती वह भी घरैला होकर उसके साथ उसके घरमें रहा करता था।

भैंसके यनको पीनेवाला

मानुषी भोगी—मैंने सुना था कि, किसी स्त्रीको एक घड़ियाल नहानेके समय पकड़ ले गया। उसका बस्त्र खुलकर जलमें बह गया वह नङ्गी रह गई। उस घड़ियालने लेजाकर एक जगह किनारे रख दिया। वह स्थान परदे में था वहाँ नदीका किनारा ऊँचा था। दिखाई नहीं दे सकता था घड़ियालने उस स्त्रीके साथ सम्भोग किया। उसको खाया नहीं, वह ऐसा ही किया करता। ऐसा करनेके पीछे वह नदीमें सँर करनेको जाया करता मछली लाकर उसको दिया करता, स्त्री बहुत विवश थी एक सप्ताहके पीछे कई मनुष्योंका शब्द नदी किनारे आने लगा स्त्रीने चिल्लाकर कहा कि, मैं इस दुःखावस्थामें फँसी हूँ, यहाँ आकर मुझको निकालो। उन मनुष्योंने ऊपरसे नीचेको रस्सीके छोरसे इसको कपड़ा दिया वह अपनी जान लेकर अपने घर पहुँची। जिस समय स्त्रीको निकाला गया उस समय मगर नदीकी सँर कर रहा था वहाँ नहीं था।

अगस्तका मछलियोंसे शकुन—प्राचीन कालमें मछलियोंसे शकुन जाना जाता था और यह अनुमान किया जाता था कि, मछलियाँ त्रिकालज्ञ होती हैं। जिस समय सिसली टापूके लोगोंसे लड़ाई होरही थी, उस समय अगस्तस बादशाह समुद्रके किनारे टहल रहा था। उसी समय समुद्रसे एक मछली निकलकर उसके पैर पर गिर पड़ी। उस समय सेकैसे प्राम्पीस बादशाह समुद्री विजयोंसे बहुत घमण्डी हो रहा था अपनेको पेंचिओन देवताका पुत्र मानता था। अगस्तसने ज्योतिषियोंसे पूछा कि, पैरपर मछली गिरनेका क्या मतलब हो सकता है। तो उन्होंने उत्तर दिया कि, समुद्रोंका राजा आपके चरणोंपर गिर पड़ेगा ठीक वैसाही हुआ इस राजाने सेकैसे प्राम्पीस पर विजय पाई।

भूचर मछली—कितने प्रकारकी मछलियाँ घोंसलें बनाती और वृक्षपर चढ़ जाती हैं नदीसे निलककर इतनी दूर २ तक यात्रा करती हैं कि, लोग समझते हैं कि वह आकाशसे गिर पड़ी हैं। इतना हिल मिल जाती हैं कि, लोग अपने हाथसे चारा देते हैं वह भी मनुष्यके हाथमें आजाती हैं। अपने रहनेके लिये अच्छी जगह ढूँढ़ती हैं। उनमें कितनीही बातें बुद्धिमानोंकी पाई जाती हैं।

तूरा—एक प्रकारकी मछली है, लोग जिसको अन्तर््यामिनी समझते हैं। क्योंकि आंधी आती है। जहाज डूबता है तो वह जहाजके पास होती है। डूबते हुये मनुष्यको अपनी पीठपर लादकर स्थलमें बैठकर चली आती है। यह बहुत भली मछली है। मनुष्योंका प्राण बचाती है। मछलियाँ रातको दूर २ की यात्रा करती हैं कभी २ कण्टके समय दिनमेंभी सफर किया करती हैं।

कटल फिश या ईङ्गुफिश—डीवर्डसके टापूमें एक प्रकारकी मछली

होती है । जिसको कटलफिश तथा ईङ्कफिश (स्याही मछली) भी कहते हैं । ईङ्कफिश अथवा स्याही मछली इस कारण कहते हैं कि, उसके गलेके नीचे स्याहीकी एक थैली होती है । उसमें एक मसाला स्याह स्याहीसे भी बहुत काला भरा रहता है । जब मछुये इस मछलीको मारनेके लिये पीछा करते हैं, वह जान लेती है कि, अब मेरा बचना किसी भी प्रकार नहीं हो सकता तो थैलीसे स्याही निकालकर पानीमें फेंक देती है, जिससे सारा जल काला हो जाता है । पानीके काले होनेके कारण मछुओंको नहीं सूझता कि, मछली किधर गई । इस युक्तिसे मछली मछुओंके हाथसे बचकर अपने घर पहुँच जाती है । इसमें चेमेलियन सोंपकी तरह एक और भी गुण है कि, अपना स्वरूप बदल लेती है । क्योंकि, उस स्याहीमें यह छिप जाती है । स्थिर हो जाती है । कुछ कालके बाद जैसे चूहेके पीछे बिल्ली दौड़ती है । इसी प्रकार शिर निकालकर अपनी राह लेती है । वह अपने पीछे स्याही छोड़ती जाती है जिसमें पानी काला होनेसे उसको कोई देख नहीं सकता । उनमें कोई २ तो इतनी बलिष्ठ होती हैं कि, मनुष्यकी बाँह तोड़ देती हैं ।

परवाली शैलानी—एक प्रकारकी परवाली मछली है । वह सोंझको नदीसे निकलकर सारी रात स्थलकी सेंर किया करती है । सबेरा होनेके पहलेही नदीमें घुस जाती है ।

एक और मछली है जिसकी उड़ान इतनी नहीं है । वह थोड़ी देरतकही स्थलकी सेंर कर सकती है ।

ऐङ्गलरफिश या सीडे बिल—एक प्रकारकी मछली है ऐङ्गलर नाम मछुवा और फिश नाम मछली । यह इङ्गलिस्तान और योरोपके समुद्रोंमें होती है । तीन फीटसे भी अधिक लम्बी होती है उसका शिर बहुत बड़ा होता है । उसके मुंहपर दो शाखें होती हैं जिसको वह इच्छानुसार हिलाती है । यह खाती अधिक है पर परिश्रम नहीं कर सकती सुस्त है, खाना तो बहुत है पर परिश्रम किया नहीं चाहती, फिर पेट कैसे भरे । इस कारण कपटको काममें लाती है । ऐसी युक्ति करती है कि, जहाँ वह रहती है वहाँसे कुछ मिट्टी निकालकर पानीमें घोल देती है, जो मिट्टी पानीको गँदला कर देती है । इस गँदले तथा अन्धकार-मय पानीके भीतर वह छिपकर बैठती है कि, किसी मछलीको दिखाई नहीं देती । उसको कोई देख नहीं सकता, पानीके ऊपर उसके पाखोंका नोक थोड़ा थोड़ा २ दिखाई देता है जलपर ऐसा जान पड़ता है कि, मानों छोटी २ मछलियाँ फिरती हों । धूर्तताके इस जालको फँलाकर बैठती है प्रतीक्षा किया करती है कि,

सांपसे खेल चेमर लेन चमर लेन रंगपर मत, विच्छू

कोई मछली उसकी चालमें आवे । कोई दूसरी मछली आई । देखा कि, पानी-पर छोटे २ कीड़े फिरते हैं, वह उनको खाने दौड़ती है बस । उसी समय यह ऐंझलर मछली पानीके नीचेसे निकलकर उस मछलीको चट कर जाती है । इस छलसे अनेक मछलियोंको फँसाया करती है । इस युक्तिसे उसका पेट नहीं भरता तो वीरताको काममें लाती है । मछलियोंको बलपूर्वक पकड़ती है । उसकी पकड़का छूटना कठिन हो जाता है । इसको शरीरका आधा शिर होता है।

धोखेसे बचानेवाली—हनुमानजी सञ्जीवन बूटी लेने गये थे कालनेमि राक्षस रावणकी ओरसे हनुमानजीको धोखा देने मुनि वन मार्गमें बैठ गया हनुमानजीने कालनेमिसे पानी मांगा उसने तालाब बता दिया वहाँ उनका पेर एक मछलीसे छू गया वो अप्सरा होकर स्वर्ग चली गई । उसने हनुमानजीसे कहा कि, महाराज ! मुझे ऋषिने मछली होनेका शाप दिया था, मेरी नम्रता देखकर निवृत्ति भी बतला दी थी कि, राम दूतका चरण स्पर्श होतेही मुक्त हो जायगी । आपके चरण लगजानेसे मेरा शाप चला गया । जिसे आप मुनि मान रहे हैं । यह कालनेमि है आपको धोखा दिया चाहता है । आप इससे सावधान हो जाइये । इतना कहकर अप्सरा चली गई, हनुमानजीने कालनेमिको मार डाला ।

पशु पक्षीके रूपमें ऋषि गण ।

अनेकों सन्त महात्मा ऋषि मुनि पशु पक्षीका रूप धरकर भूमण्डल पर विचरा करते हैं । उनका पशु पक्षीका शरीर इच्छाकृत होता है वो किसीका किया हुआ नहीं होता न ऐसाही है कि, पूर्वके देहको त्यागकर उक्त देह ग्रहण किया हो किन्तु वही देह पशु पक्षीके देहके रूपमें परिणत हो जाता है जब इच्छा नहीं रहती । बहुतसे उच्च कोटिके व्यक्ति भी कर्म वश पशु पक्षियोंकी योनिमें गमन करते रहते हैं पर पूर्वके अभ्यासके बलसे उन्हें स्मरण बना रहता है हृदय प्रकाशित रहता है पर बाहिर नहीं दीखता । इन बातोंके देखनेसे यही विदित होता है कि, “साईके सब जीव हैं कीरी कुंजर होय” सभी भगवानके हैं उसके लिये सब एक समान प्यारे हैं । राजर्षि भरतजीके आवागमनको लेकर कबीर साहिबने भी कहा है कि,

एक मोहके कारणे, भरत धरे दो देह ।

सो नर कैसे छूटि हैं, जिनके बहुत सनेह ॥

यानी एक मोहके कारण भरत दो देह धारण करता है तो वे मनुष्य कैसे छूटेंगे जिनके अनेकों मोहें मौजूद हैं अर्थात् अनेकों मोहँवाले मनुष्य अवश्यही

बादशाह का जहर रेशमका कीड़ा

अनेकों देह धरेंगे । ऋषिही क्यों ? देवगण भी पशुपक्षी तथा जलचर आदिके रूपमें मृत्युलोकमें विचरते हैं तथा कर्म वश आवागमन करते रहते हैं जो जाने सो । दूसरे अज्ञानियोंको क्या पता हो सकता है । ऋषिमुनि ही क्यों, अनेकों मनुष्य देहधारी प्राणियोंके स्वभाव पशुओं जैसे हैं । गोल्डस्मिथ साहिबने लिखा है कि, एक कुटुम्बके सब मनुष्य उगाल किया करते थे । बिना इसके खाना भी हजम न होता था ।

पशु पक्षी आदि जीव धारियोंका भजन ।

सहस्रों ऐसे जीव हैं कि, पशुका रूप पाया है उनकी श्रेष्ठताका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है । सहीह बुखारी व मुसल्लभमें रवायत अबूरीरासे है कि—

चींटियोंका भजन—एक बार हजरत मूसाने खुदासे अर्ज की कि—“ऐ परव रदिगार ! तू गुनहगारोंके गॉवको नष्ट करता है पर उसके साथ कितने अच्छे भी होते हैं, वह भी बिना अपराध उसके साथ नष्ट हों जाते हैं ।” उस समय खुदाके पाससे कुछ उत्तर नहीं आया । एक दिन मूसाको गर्मी मालूम हुई जिसको सहन न कर सके, एक हवादार वृक्षके नीचे जाकर बैठ गये । वहाँ एक चींटीने काट लिया मूसाने क्रोधमें आकर सब चींटियोंको आग लगाकर जला दिया उस समय खुदाने कहा कि हे मूसा ! तू अपनी ओर नहीं देखता कि, एक चींटीके अपराधके कारण सब चींटियोंको जला दिया । यद्यपि ये सब चींटियाँ भजनमें निमग्न हो रही थीं ।

मूसा और पक्षी—किसी दूसरी किताबमें देखा था कि, मूसाको अपने भजनका बड़ा अहंकार था, एक साँसमें चारसौ नाम जपता था । एक दिन जंगलने वृक्षके नीचे बैठा था झरना बह रहा था । मूसाकी दृष्टि वृक्ष पर गई । देखा कि, एक पक्षी बैठा है, वह एक स्वासमें चार हजार नाम लेता है, उसको देखतेही मूसाका अभिमान जाता रहा उस पक्षीसे कहा कि, कुछ सेवा बतलाओ ? पक्षीने कहा कि पानी पिलाओ मूसाने नीचे चशममें पानी दिखा दिया । पक्षीने पानीके ऊपर दृष्टि डाली पर भजनसे निवृत्त हुए बिना पानी पीनेको न उतरा । सामवेद सम्बन्धी किसी पुस्तकमें पशुओंके भजनके विषयमें जो सुना था । वो यहाँ लिखे देता हूँ—

बकरी—भजन करती है कि, हे प्रभु ! मुझको मेरे शत्रुओंसे बचा, मेरा कल्याण कर । वारम्बार उसका यही भजन और आशीर्वाद है ।

तोता—वह भजन करता हुआ कहता है कि, हे प्रभु ! मैं तेरा कृतज्ञ

हूँ, क्योंकि तूने मेरा रंग हरा और चौंचे लाल बनायी है, माधव २ कहके मैं तेरा भजन करता हूँ।

भेड़—वीर २ कहकर पुकारती हैं कि, हे परमेश्वर ! मैंने क्या अपराध किया है कि, मैं विष्ठा खाती हूँ, हे प्रभु ! मुझको बचा ।

बैल—भजन करता है कि, ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले ! ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर !! मुझको इस योनिसे मुक्त कर ।

चील्ह—भजन करती है कि, परमेश्वर ! न तेरा जन्म है न मरण, न तू कभी जाता है न आता है, तू सबका कल्याण कर्ता है । यह निरङ्कार निरङ्कार करके भजन करता है ।

पशुओंके भजनका वर्णन कौनकर सकता है ? सब गुप्तमें ईश्वरके भजनमें लगे रहते हैं, प्रगट भी उन लोगोंकी बोलीसे जान पड़ता है कि, सब भजन कर रहे हैं । जैसे तोता बोलता है तूही तुही तुही । पण्डुक बोलती है तू तू तू । मोर बोलता है या कयूम । सारस बोलती है या अजीज ।

कलगीदार छोटी चिड़या —जो गौरयेंसे भी छोटी होती है, उसके शिर-पर कलगी होती है और जहाँ आदमी कम आते जाते हैं, उजाड़ होती है वहाँ रहा करती है । उसका मुख्य भोजन सूखी और नरम मिट्टी है । कभी कभी खरबूजा आदिकका बीज मिलजाय तो उसे भी खाती है । यह पक्षी ऐसी निर्भय होती है कि, मनुष्य उसके निकट फिरा करे तो भी नहीं डरती, यह रात-भर भजन किया करती है । उसका शब्द है—तुही तुही निरङ्कार-तुही तुही निरङ्कार, पहर रात शेष रह जाती है ब्रह्म मूहूर्तका समय होता है । तो पृथ्वी और वृक्षको छोड़कर आकाशमें उड़ा करती है और “तुही निरङ्कार तुही निरङ्कार” ऐसा शब्द सूर्य निकलने तक किया करती है । दिन निकल आता है, थककर पृथ्वीपर गिर पड़ती है बहुत देर तक अचेत पड़ी रहती है, मुर्दोंके समान शरीरका कुछ भी चेत नहीं रहता, यहाँ तक कि, यदि किसी मनुष्य अथवा पशुके पगके तरे दब जाय अथवा कोई हिंसक पशु खा जाय तो भी कुछ चेत नहीं करती । कहते हैं कि, यदि कुत्ता उसको खाजाय तो पागल हो जाता है । वह अचेतसे सचेत होती है तब फिर अपने नित्यके भजनमें लग जाती है । ऐसे भजनानन्दीके समक्ष मनुष्योंका तपस्या कुछ नहीं है । यह पक्षी उजाड़में छोटे २ जलके डबरोंके किनारे रहती है उसका जल सूख जाता है तो उसकी नरम २ मिट्टी खाती है ऐसे समयमें भजन करती है कि, जिस समय तपस्वी और ताधु लोग नींदके वशमें पड़के अचेत सोये होते हैं । यह सत्य पुरुषकी ओरसे भजना-

गिरगिट, मकड़ी चींटी, परवालियोंमें बादशाह और बेगम

नन्दियोंके भजनके अभिमानका नष्ट करनेके लियेही उत्पन्न की गई है । कबीर साहिबने नींदको यमकी दासी बताया है कि—

साखी— निन्द कहे मैं यमकी दासी ।

एक हाथ मुँगरा एक हाथ फाँसी ॥

भजनानन्दी बछड़ा—मैंने सुना था कि, पञ्जाब जिला रोहतक बाँगर देशमें संवत् १९३६ में गायका बच्चा पैदा हुआ वह । उगाल भी करता था । राम राम भी कहता था, उसके राम रामके कहनेको सुनकर लोग बहुत भेंट चढ़ाते थे ।

समय—जब एक पहर रात रह जाती है, तब सब जीवधारी परमात्माके भजनमें लग जाते हैं । कोई आधी रात कोई कोई सारी रात भजनमें लगे रहते हैं, परमेश्वरके अनन्त नाम हैं, उनमेंसे कोई न कोई नाम जपते रहते हैं ।

सोप—कभी २ देखा गया है कि, सोप सूर्य निकलने पर छतरीको फैलाकर हिलाता है ।

शिवका जपी—एक पक्षी गौरैयाके बराबर होता है वह दिनरात उच्च शब्दसे शिव २ कहा करता है ।

चिनगीबटेर—एक दूसरा पक्षी बटेरसेभी छोटा होता है वह भी शिव २ कहता अनुमान किया गया है इसको चिन्गीबटेर कहते हैं, यह उत्तर पहाड़में हुआ करती है । एक समय पहाड़से उसको कोई फिरोजपुरमें लाया पिंजड़ेमें रक्खा, उसकी बोलीपर बहुत लोग मोहित हो गये, उसको सब लोग प्यार करने लगे, जिसके पास वह पक्षी था उसको बड़े विनयके साथ अपने घरको ले जाया करते पक्षीकी मीठी २ बोली सुना करते । यह भजन करनेवाला पक्षी सबको प्यारा लगता था । मैं सर्वदा इस पक्षीकी बोली सुना करता था । दिनमें तो उसकी बोली सुनाई नहीं देती । शर्दीके दिनोंमें भी यह विशेष नहीं बोलती, शेष दिनोंमें जोर २ से शिवजी शिवजी पुकारा करती थी । यह पक्षी मेरे निवास स्थानसे पचास कदम की दूरी पर रहती है उसका नाम जपनेका सुनकर मुझे बड़ा आनन्द प्राप्त होता था । इस पक्षीको परमात्माने जैसा अनुराग भजनका प्रदान किया है वैसे बहुत कम भजनीक मिलेंगे ।

ऐसी एक दूसरी पक्षीको सुना कि, वह शिव शब्दको बड़े लम्बे और ऊँचे शब्दसे कहा करती थी ।

बोलियोंके अर्थ—एक पक्षी बोलती है—या बटूह ! या बटूह ! एक बोलती है, पिता पिता । एक पक्षी कहती है अजीज ! अजीज ! बाढ़ बुला

सहवास, सहवासके बाद मौत

बोलता है बाप बाप । पपीहा पुकारता है पी कहां । पी कहें ! ! ! ! काक बोलता है क-क क अर्थात् क-ब्रह्म क अर्थात् विष्णु । एक पक्षी बोलता है मौजूद अल्लाह । एक कहती है या हबीब तू अर्थात् एक तुही है दूसरा नहीं । सतलज नदीके किनारे एक पक्षी कहा करता है “हक्क सुरंह ! हक्क सुरंह” अर्थात् हे ईश्वर ! तुम्हारा भेद किसीने नहीं पाया । एक पक्षी सत्य ! सत्य बोलता है । कागके समान चील भी सुरंह २ बोलता है । इन पक्षियोंकी नाना प्रकारकी बोलीसे उनमें भी मजहब पाया जाता है पुण्यात्मा पापी सब मालूम पड़ते हैं । त्रिखान पक्षी बोलती है या पाकजात, मुर्ग बोलता है सतगुरु तू एक । चिड़ियाको मैंने साफ बोलते सुना है वह काश्मीरके पहाड़में बोलती है, “हे साचे सतगुरु” । पंडुक बोलती हैं हक्क है । कबूतर साँस २ में हक्क २ कहता है ॥

पशु इसी प्रकार भजनमें लीन रहते हैं । पशु और मनुष्यमें कुछ भेद नहीं जिसने पारखके साथ भजन किया वही मनुष्य पदको प्राप्त हुआ । नहीं तो मनुष्यका स्वांग बन जानेसे मनुष्य नहीं हो सकता, मनुष्यता सत्य ज्ञान और पारखका ही नाम मनुष्यता है, जिसमें ये नहीं हों वह कदापि मनुष्य नहीं हो सकता ।

पशु और मनुष्योंमें बराबर ही गुण हैं, केवल तत्त्वोंकी तारतम्यतासे मनुष्य उन्नतिशील बनाया गया है, पशु किसी प्रकारसे उन्नति नहीं कर सकता । महात्माओंने विशेषकर कबीरसाहबने कहा है कि, केवल मनुष्य शरीरमेंही सत्पुरुषकी भक्ति द्वारा मुक्ति पारख प्राप्त हो सकती है । जब तक मनुष्य सत्य पदको प्राप्त कर सत्पुरुषकी भक्ति द्वारा पारख गुरुको पायकर अपने स्वरूपको नहीं पाता, तबतक कीड़े मकोड़े पशु पक्षी और मनुष्यमें कुछ भी भेद नहीं हैं एक आकृति मात्र का भेद है ।

स्थायर और जड़मोंकी एकता—सब जड़ स्थायर जंगम अपने २ परमे-श्वरके भजनमें लगे हुये हैं । यद्यपि स्थावरोंमें भजनका प्रमाण बहुत कम मिलता है । परन्तु सर्वथा ही नहीं मिलता यह नहीं कभी २ पता मिल भी जाता है । जैसा कि, कर्मोंके चिह्नका वर्णन लिखते हुये मैंने चुनार गढ़के रामनामी वृक्षका हाल लिखा है ।

प्रगट हो कि, सर्व स्थायर जंगम जीवधारी अपने ईश्वरका भजन करते हैं सबकी ओर परमात्माकी दृष्टि है । यदि कोई किसी पर अत्याचार करेगा, जिस पर अत्याचार हो वह चाहे वृक्ष हो चाहे मनुष्य, चाहे पशु हो, चाहे पक्षी, चाहे कीड़ा, मकोड़ा हो यहाँ तक कि, यदि जड़ पदार्थोंको भी व्यर्थ नष्ट करेगा

चींटियोंके पर, बच्चे बच्चोंका भोजन

आवश्यकतासे अधिक उनको बरबाद करेगा तो उस पर परमात्माका कोप होगा उसका बदला देना पड़ेगा ।

जब सब जीवधारियोंकी आत्मा समान हो है इस कारण सब एकही सिद्ध हुये । केवल तत्त्व और गुणोंकी तारतम्यता एवं उलट फेरसे विभिन्नता दिखाई पड़ती है । अपने २ कर्मोंने भिन्न २ रूप रङ्ग कर दिये हैं इससे किसीका क्या अपराध है ? यह सब कर्मोंका दोष है ।

जो भजन करेगा वह बच जायगा नहीं तो काल बली न जाने क्या कौतुक दिखायेगा इस कारण सबको भजन करना चाहिये यही बात इस मुसद्दममें भी कहते हैं ।

अरे तोता भजन बिन खाया गोता । फँसे कपेमें नाहक प्राण खोता ॥
अरे मैना पकड़ जो बाज डैना । न आवे काम तेरी मीठी बैना ॥
अरे तूती पड़ेगी शिरपै जूती । तू सारी रात गाफिल होके सूती ॥
फिरे यम दूत तेरे शर पै लुरका । भजनकरले सजनकबीर गुरुका ॥१॥
अरे बकरा तू क्या अकरा फिरे रे । कभी तलवार गरदन पर फिरेरे ॥
अरे मुर्गा तू क्या बाँगको उठावे । तेरे गल पर छुरी काजी चलावे ॥
अरे मच्छी रसातल घर बनाये । वहाँ भी जालमें धीवर फँसाये ॥
जहां जाल तहांले संगका टरका । भजन करले सजन कबीर गुरुका ॥२॥
अरे चण्डूल कीन्हा घर खजूरी । वहां भी सांप जाके पड़ तूरी ॥
अरे बन मोर क्या भूला तू सोभा । गड़े एक दिन तेरे दिलका खोबा ॥
अरे बुलबुल तू क्या भूला संगयारी । रहेगा चार दिन मौसम बहारी ॥
न जाना भेद तु उस धाम धुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥३॥
फँसेगा फन्दमें फन्दक फसावे । तुझे पिंजरेमें कैदी सो बनावे ॥
न तू रहेगा न यह पिंजरा रहेगा । कहो तू लालसे जा क्या कहेगा ॥
हुये सुमिरन बिना तेलीके बैला । फिरा दिन रात घरही बीच सैला ॥
महाराजा लखो नर नाग सुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥४॥
अरे मूसा तू क्या बिलमें है घूसा । न पावे ठौर जो हैं राम रूसा ॥
पकड़ एक दिन तुझे नोचेगी बिल्ली । करेगी सो तेरी रग सारी दिल्ली ॥
अरे गदहा हुआ बदहा जगतमें । दीन्हा चितको हरिके भगतिमें ॥
परम पुरुष बसैया सन्त उरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥५॥
तू हाथी मांस लादे बेस पाथी । पड़े कुवेंमें भागे सड़ साथी ॥
अरे घोडा पड़ेगा लाख कोडा । जिधर चाहे उधर घर बाग मोडा ॥

चींटियोंका भोजन, भोजनपर युद्ध चींटियोंके घर जंगी लड़ाई

अरे ऊँटा लदे और नाक नाथा । न छोड़ेगा अब धुनो अपना माथा ॥
शरणले हैं जो साहब तीन पुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥६॥
न विद्या वेद वाणी काम आवे । जवां शिरीं जियादातर फँसावे ॥
हुए बदमस्त विद्या रूप धनके । फिरे हंकारमें मगरूर मनके ॥
नहीं दिलपर जो धीरज रहेगा । तो हजरत वारगहमें क्या कहेगा ॥
हुई पहचान हरसे कालमुरका । भजन करले सजनकबीर गुरुका ॥७॥
तुही गुरु जगतका बन्धन कटैया । तुही सब द्वन्द फन्दाको हरैया ॥
नहीं तुझसा कोई दाया करैया । तु है वैरीको पीरी पै डरैया ॥
जो आजिज अपने पियाको भावकीजै । सो सारे अङ्गमें सो घाव कीजै ॥
उपरसे पीस करदे लोन बुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥८॥

सप्राण स्थावरादि ।

जड़मोंकी तरह स्थावर और जड़ोंमें भी जीव है वे भी जीव विनाके नहीं है, यदि विचारके साथ देखा जाय तो संसारके सभी पदार्थोंमें जीव सत्ता मौजूद है । यदि यह कह दिया जाय की, सारी सृष्टिही जैव है तो कोई अत्युक्ति न होगी । पौर्वत्य, पाश्चात्य, प्राचीन और अधुनिक सभी वैज्ञानिकोंने इस बातको मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया है एकही जीव संसारसे स्वावर जड़म जड़ और चैतन्य सब कुछ बन जाता है । यद्यपि यह बात विशेषज्ञोंसे छिपी हुई नहीं है परन्तु आज भी उन व्यक्तियोंकी संख्या अधिक है जिन्हें कि, इन बातोंमें घोर सन्देह है, इसी कारण हम यहाँ यह सिद्ध करना चाहते हैं कि, कोई भी निर्जीव नहीं है । जड़ चेतन ये सभी जीवोंके ही भेद हैं कर्म विपाकोंके अनुसार जीवही सब कुछ बनता चलता है । अब हम कुछ उनको दिखाते हैं जिनमें जीवसत्ता प्रत्यक्ष दीखती हैं ।

तारा और पालपी ।

पालपी मछलीमें प्रत्यक्षरूपसे किसी प्रकारकी जीवित शक्ति जान नहीं पड़ती, न उसके शिर तथा ओखे हैं, न श्वास लेतीही जान पड़ती है, न उसमें रक्त संचालन जान पड़ता है । केवल एक स्वच्छ डला जान पड़ता है, जिसमें थोड़ा प्राण धीरे धीरे चलता जाना जाता है, इसकी अनोखी कहानी है । यदि उसमेंसे एक टुकड़ा तोड़ा अथवा टूट जाय वह उसी जगह पानीमें पड़ा रहे तो वह भी उसी पालपीके स्वरूपका हो जाता है । इस मछलीके शरीरमें अनेक चिन्ह

चुराने और चुरानेवालोंका रंग हृष्यकी चींटियाँ

होते हैं । यदि कोई उसको काटे अथवा टुकड़ा २ करे तो जितने दाग उसकी देहमें होते हैं सब पालपीके स्वरूपकेही हो जाते हैं । इस जानवरमें यह विचित्र गुण है । उसको पेड़ पल्लवसे पृथक करना कठिन है, पालपीके अण्डेसे वृक्षकी शाखायें निकलती हैं जैसे बीजसे वृक्ष उगता है उसकी जड़ भी प्रतीत होती है ।

विद्वानोंका मत—इसमें नलके समान शाखायें होती हैं जिसके द्वारा उसको भोजन पहुँचता है, लोग इसे बहुत कालसे जीवधारी वृक्ष समझते थे । पर सन् १६९९ ई० और १७१७ ई० तक बहुत बड़े विज्ञानिकोंने निश्चय कर लिया कि, इसमें जीवनशक्ति है । प्लेटेनी और अर्संता तालीस नामक विद्वानोंने भी इसे जीवधारी ही कहा है । वह जो जीवधारी वृक्ष कर कहलाता था अब पालपी मछलीके नामसे प्रसिद्ध है । तारा नामक मछली भी इसी प्रकारकी होती है ।

एनीमोन ।

एक प्रकारका जीवधारी है, प्रायः समुद्रके किनारे पहाड़ोंके चट्टानोंके नीचे जहाँ कि, ज्वार भाटा आया करता है वहाँ पाया जाता है । यह पश्चिमी समुद्रोंके किनारे सुनहरी फूलोंके खिले हुये गुच्छोंके समान दीख पड़ता है, वहाँ वाले उसको जीवधारी फूल बोलते हैं । वह भी खिला हुआ दीख पड़ता है मानो मूरब्बाका डला जमा हुआ हो । उनमेंसे गायके दुमके समान चढाव उत्तराव बने हुये होते हैं जो उनके मुखके समान मालूम होता है प्रत्यक्षमें तो वह जड़के समान शक्तिहीन जान पड़ता है पर ऐसा खाऊ होता है कि, नदीके लहरके हटतेही मुंहको पसारकर सन्मुख आये हुये सभी कीड़े मकोड़ोंको खाकर, ज्योंका त्यों स्थिर हो जाता है । दूरबीन यन्त्रसे देखा गया है कि, उनके मुंहके निकट किसी प्रकारकी खटखटाहट होवे तो, उनके मुखसे एक प्रकारका शब्द होने लगता है मुंहके तार हिलते देख पड़ते हैं यद्यपि इस जीवधारीमें देखनेकी कोई इन्द्री नहीं जान पड़ती तो भी प्रकाशकी अधिक्यतासे बहुत घबराता है । इसमें अपनी जातिकी उन्नति करनेकी एक आश्चर्यमय शक्ति जान पड़ती है । यदि उसके शरीरको ऊपर नीचे आड़े ठाड़े किसी प्रकारसे काटा जावे तो उसके सब अंश वैसेही जानवर हो जावेंगे । उसके मुखसे जीवित बच्चे भी उत्पन्न होते हैं मुखसे निकल पासके चट्टानपर जाकर जम जाते हैं उनसे फूलकी कलियोंके समान अनगिन्ती बच्चे उत्पन्न होते हैं इसी प्रकार इस प्राणीकी उन्नति होती रहती है । इसका रङ्ग फीका, लाल तथा हरा होता है, इसका मुख किनारे पर

चींटियोंका बादशाह और मुलेमान दीमक राजा भोज और चेंटी (काशीके बकरियाकुण्डका इतिहास) पक्षी गिद्ध

जान पड़ता है। जब पूर्ण बुद्धिको प्राप्त हो जाती है तो गुलाबके फूलके समान खिला देख पड़ने लगता है।

प्राणधारी फूल।

इसी प्रकारके होते हैं इन्हींका यह भी एक प्रकार है उनमें सींग निकला होता है। इस प्रकारके फूल प्रायः पश्चिमी समुद्रोंके तटपर होते हैं।

एनथो जुआ—एक फूलका वृक्ष है, उसे भी प्राणधारी फूल कहते हैं। वह एनथो जुआ फूल भी है, जीवित स्वभाव भी रखता है। उसमें स्पर्श शक्ति जान पड़ती है। चलनशक्ति भी थोड़ी होती है, भोजन भी करता है। जो चूसता अथवा निगल जाता है उसको पचा भी लेता है। इस प्रकारसे यह फूल प्राणधारियोंकासा स्वभाव रखता है।

एनटेनिया—एक फूल होता है, प्रायः समुद्रोंके किनारे पत्थरोंके चट्टान पर पड़ा रहता है, उसकी उत्पत्ति भी चट्टानोंपर ही होती है। उसका रूप गाव-दुमाकार नलके समान होता है, जड़ गोल होती है, नलके नीचे जो पौला दीख पड़ता है वही उसका पेट है। यह प्राणधारी फूल उत्पन्न होकर अलग होता है, यह चिकना लचकदार शुद्ध साफ और प्रकाशित रहता है।

जो फिस्टस—एक जान दार फूल है यह जलमें होता है इसे प्राणधारी और फूल दोनों माना गया है, ये अनेक प्रकारके होते हैं, यह अंधेरी रातमें अपने मुखसे गंधका पदार्थ और प्रकाश प्रकट करता है जिसका प्रकाश चारों ओर फैल जाता है, उससे मल्लाहोंकी डोंगे रत्न जटित दीख पड़ती हैं। यह प्रकाश इन्हीं जानवरोंका है इनमें कितने ही छोटे तथा कितनेक बहुत बड़े होते हैं। ये पानीपर तैरते फिरते हैं कोई २ तो ऐसा जान पड़ता है कि, मानों अग्निका गोला जीवितहोकर पानीपर तैर रहा हो ये झुंडके झुंड एकही साथ तैरते फिरते हैं।

बेलिमेन्स।

एक प्रकारकी धातु अथवा पत्थरके टुकड़े होते हैं। ये प्रायः समुद्रके किनारे पेड़ रहते हैं, उनके देखनेसे बड़ा आश्चर्य होता है उनकी उत्पत्ति के विषयमें कुछ भी अनुमान नहीं हो सकता। विज्ञानिकोंकी बुद्धि भी चकमेमें पड़ी हुई है कि, उसको पत्थर धातु अथवा जानवर क्या कहा जावे। इसके विषयमें अनेक मतवाद हो रहा है, कोई पत्थर कहता है, कोई पथरीली चुम्बक बोलता है, कोई बिल्लोर सुनाता है, कोई धातु ठहराता है, कोई हड्डी बतलाता है। प्रत्यक्षमें तो एक हड्डीका टुकड़ा देख पड़ता है पर प्राणधारिये इसमें बहुत गुण जान पड़ते हैं यह जीवधारी पत्थर पानीपर तैरता है, इधरसे उधर जाकर अपना

मिश्ठी कयरु, गिद्धोंका बादशाह

आखेट खोजता है, डूबता है निकलता है अनेक प्रकारसे अपना काय्य सिद्ध करता है । सब रूप रङ्ग उसमें देख पड़ते हैं जीवित शक्ति भी जान पड़ती है ।

ऐनकेरेनेटे ।

एक धातुका टुकड़ा है देखनेमें नीलक नलकासा होता है । शाखायें फूटती हैं, उँगलियोंके समान गिरह होती है । सब शाखायें जीवित होती हैं, तारा मछली तथा मूंगा आदिकी तरह यह भी प्राण रखता है ।

मुंगिया या कोरल ।

मुंगिया पत्थर जिसे कि, अंगरेजीमें कोरल भी कहते हैं, समुद्रके तट पर टुकड़ा मिलता है समुद्रमें जीवित होता है, पानीसे मिला हुआ कठिन चट्टानोंकी तरह होता है । हिन्द महासागरको छोड़कर दूसरे गहरे समुद्रोंमें पाया जाता है । कोसोंतक लम्बी २ चट्टानके ऊपर कहीं पानी पर तैरता हुआ और कहीं पानीके अन्दर एवं कितने जीवित और कितने एक मुँदे पाये जाते हैं, पानीके अन्दरके मूंगे जीवित होते हैं, उनका रंग सफेद होता है पर जब वह बाहर निकाले जाते हैं तो लाल हो जाते हैं । टगरू जावाके मूंगे बड़ेही गुणवान् होते ।

स्पंज ।

दरियाई पदार्थ है । बहुत दिनोंसे इस बातपर वाद बिवाद हो रहा है कि, यह स्थावर जंगमोंसे कौन है ? सन् १८४८ ई० में यह सिद्ध किया गया था कि, यह स्थावर है पर कितनोंने यह निश्चय किया है कि, यह प्राणधारी है । बहुत छिद्रोंवाला लचकदार होता है । बहुतसा पानी सोखकर फिर छोड़ देता है । इसलिये वह बहुत कार्योंमें काम आता है ।

स्पंजकी पहचान—यह है कि, जितनाही हलका हो उतनाही अच्छा होता है । जिन टापुओंमें जिवकिया लोग इसको निकालते हैं वहाँ उसका रूप कुछ और ही होता है । उसके पंजे दूढ़ होते हैं वे क्रमशः बढ़ते हैं । जो यहाँ काममें लाया जाता है ये सब उसकी हड्डियाँ होती हैं ।

लाजवन्ती ।

लाजवन्ती एक पौधा है, यह भारतवर्षमें अधिकता के साथ पाया जाता है, इसमें भी प्राणधारियोंकेसे गुण पाये जाते हैं । पर स्पर्शसे यह जीवधारियोंके समान लजा जाती है इसी कारण यह लाजवन्ती कहलाता है ।

सूर्यमुखी ।

जिसको सभी भारतवासी जानते हैं । यह सूर्यके साथही साथ घूमा करता है जिधर सूर्य जाता है उधरही उसका भी मुख हो जाता है । इसी तरह

जटायु तथा सम्पाति, उकाब लगलग, व्यर्थका द्वेष

कमल और कुमोदिनी भी क्रमशः सूर्य चन्द्रमाके ऐसे प्रेमी हैं कि, उनके प्रकाशसे विकसित होते और किरण रूपी किरन मिलनेसे सिकुच जाते हैं। जैसे कोई प्रेमी अपने प्रियको देखकर आनन्द मानता है न देखने से खिन्न होता है उसी प्रकार इन दोनोंकी भी दशा है।

वृक्षके बतक ।

विटन साहिबने नेचरल डिविशनरीमें लिखा है कि, एक प्रकारके बतख होते हैं, जिन्हें अंग्रेजीमें ब्रिड्जलकूस कहा जाता है ये घास आदि चरा करते हैं ये बतकें मेरे मूलकमें सरदीके दिनोंमें आती हैं और गरमीके दिनोंमें उत्तर दिशाकी चली जाती हैं ये एक वृक्षके फल हैं। मलका एलिजेबेथेके शासन कालमें ज़रार्ड साहिब थे वे कहते हैं कि, लंकासायरमें फिल आफफोल्डर्स नामका एक छोटा सा टापू है उस जगह पुराने जहाजोंके टुकड़े एवं वृक्षके गले चूर पाये जाते हैं। वहाँ समुद्रका फेन कड़ा होकर सीपीके समान जम जाता है। रेशमी फीते जैसी कोई वस्तु एक ओरसे सीपीसे लगकर बाकी पानीमें बहती रहती है उसी फीतेसे एक पक्षी उत्पन्न होता है सीपी अपना मुह खोल देती है पहिले रेशमी तार बाहिर निकलता है पीछे पक्षी निकल आता है। पहिले पक्षीके पैर बाहिर निकलते हैं ज्यों २ पक्षी बढ़ता जाता है सीपीका मुंह चौड़ा होता जाता है क्रमशः सारे शरीरके बाहिर आजाने पर भी उसकी चोंच सीपीके भीतर रह जाती है। युवा होनेपर चोंच भी छूट जाती है यह पानीमें गिर पड़ता है पर भी निकल आते हैं इसको लंका सायरके लोग हंकल वृक्षका राजहंस कहते हैं। यह उस दरियामें बहुतायतसे होता है ऐसा सस्ता बिकता है कि, तीन २ पैसे मोल बिका करता है।

कोहड़ा ।

कोहड़ाकी छोटी २ बतियाको जो कोई उंगली दिखाता है तो वह सूख जाता है। रामायण बालकाण्डमें धनुषयज्ञके समय लक्ष्मण जीने परशुरामजीसे दृष्टान्तमें कहा था किः—“यहाँ कोहड़ बतिया कोउ नाहीं। जो तर्जनी देखत गलि जाहीं।”

पहाड़ोंकी लड़ाई ।

डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखा है कि, दो पहाड़ दूर २ अपने स्थानपर खड़े थे, ईर्षाके कारण दोनों कुपित हुए। भयंकर गर्जके साथ अपने २ स्थान छोड़कर दौड़े, महान् वेगके साथ लड़ाई करने लगे, अन्तमें जय विजय कर अपने २ स्थानको गये। जितने जीवधारी उस पहाड़ पर रहते थे सभी नष्ट हो गये।

घरेले और बनेलेकी ईर्षा

उपरोक्त वर्णन गोल्ड स्मिथ साहबकी किताब, एनीमेटेड नेचरके जिल्द (वोलूम) ६० में मैंने देखा है, जिसका जी चाहे देखले ।

सुमेरु और विन्ध्याचलकी लड़ाई ।

देवीभागवतके दशवें स्कन्धके तृतीय अध्यायसे सुमेरु विन्ध्याचल पर्वतकी कथा लिखी है । उसको देवीभागवतसे उद्धृत करके यहाँ लिखता हूँ । देवीभागवत स्कन्ध १०, अध्याय ३ में लिखा है ऋषि बोले कि, हे सूतजी ! यह विन्ध्याचल क्या है ? किस प्रकार आकाश स्पर्श करने लगा था क्यों सूर्य्यका मार्ग रोका था । किस प्रकार अगस्त्यजीने इसे जैसेका तैसा किया, यह विस्तारके साथ कहो । सूतजी बोले कि, सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचल पर्वत है यह अत्यन्त शोभायमान है ।

एक समय नारदजी सुमेरु पर्वतसे विचरते हुये विन्ध्याचलके निकट आये । विन्ध्याचलने बड़े सत्कारके साथ उठकर अर्घ्य दे आसन पर बैठाकर पूछा कि, हे ऋषिराज ! इस समय आप कहाँसे आये हो । आपके आनेसे मेरा मन्दिर पवित्र हो गया, आपकी जो मनोवृत्ति हो सो कहिये । इतना सुनकर नारदजीने कहा कि, मैं सुमेरुसे आता हूँ इस सर्वभोगोंके देनेवाले इन्द्र, अग्नि, वरुण यम आदि लोकपालोंके भवन हूँ । इतना कहकर नारदजीने निःश्वास लिया । इसको देख विन्ध्यने पूछा कि, महाराज ! आपके निःश्वास लेनेका क्या कारण है ? नारदजीने उत्तरमें सुमेरुकी सब शिखरोंके सहित अन्य पर्वतोंका वर्णन करते हुये अन्तमें कहा कि, जिसकी विश्वात्मा सहस्र किरण ग्रह नक्षत्रोंके साथ परिक्रमा करते हैं, यह वह सुमेरु पर्वत है । अपनेको पृथ्वीके सर्व पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिनता है । उसके मनमें अभिमान है कि, मैं सर्वमें अग्रणी हूँ, मेरे समान कोई भी नहीं है । हे विन्ध्याचल ! अभिमानियोंके ऐसे अभिमानको देखकर निःश्वास हूँ । महान् तपोबलवालों का भी ऐसा कृत्य नहीं होता जैसा कि, इसका है इतना कहकर नारदजी ब्रह्मलोक चले गये ।

नारदजीके मुखसे सुमेरुकी प्रशंसा सुनकर विन्ध्याचलके मनमें ईर्षाकी अग्नि भड़क उठी । उसको दिनरात इस बातकी चिन्ता रहने लगी कि, क्या करूँ किस प्रकार मेरुको जयकरूँ, जबतक मेरुको जय न करूँ, तबतक मेरी कृति बल, पौरुष, कुल सबको धिक्कार है । इसी चिन्तामें रहकर अन्तमें यह विचार निश्चय किया कि, सूर्य्य नित्य मेरुकी प्रदक्षिणा करते हुये उदय होते हैं, ग्रह नक्षत्र सहित सूर्य्यकी परिक्रमा करनेसेही मेरुको अभिमान होता है । मैं अपने शृंगोंसे सूर्य्यका मार्ग रोक दूंगा, सूर्य्य रुककर मेरुकी परिक्रमा बन्द कर देंगे

लगलगोंका न्याय लगलगके राजाका न्याय

जिससे मेरुका गर्व टूट जावेगा। यह विचार कर अपने शृंगोंको यहाँतक बढ़ाया कि, सबेरा होते होते सूर्यके मार्गतक पहुँच गया।

सूर्य निकले तो मार्गको रुका हुआ देखा। रथ ठहर गया, जगतके सब व्यवहार, यज्ञ, हव्य, कव्य आदि बन्द हो गये। नर, दानव, देवता सबके सब अत्यन्त व्याकुल हो सोचने लगे कि, क्या हुआ? क्या करना चाहिये। अन्तमें सब देवता लोग ब्रह्माजीको आगेकर शिवजीके शरणमें जा अत्यन्त नम्रतापूर्वक स्तुतिकर; महेश्वरके प्रसन्न होनेपर बोले कि, विन्ध्याचल मेरुसे द्रैषकर ऊँचा हो गया है, जिससे सूर्यका मार्ग रुक गया है, सब देवता दानव मनुष्य आदि प्राणी महान दुःखी हो रहे हैं। सब प्रकारके यज्ञ आदि बन्द हैं, कालज्ञानके रुक-जानेसे सृष्टि कैसे चल सकेगी, महादेवजी देवताओंकी बात सुनकर भयभीत हो कौपते हुये, इन्द्रको आगेकर शीघ्रतासे विष्णु भगवान्के पास वैकुण्ठ पहुँचे।

वैकुण्ठमें शिव ब्रह्मा सहित सब देवते विष्णु भगवान्की स्तुति करने लगे। नाना प्रकारकी स्तुति करनेपर भगवान् प्रसन्न होकर बोले हे देवताओ! आपकी अभिलाषा पूरी होगी।

देवता बोले कि, हे देव देव! हे विष्णु महाराज! विन्ध्यपर्वत सूर्यका मार्ग रोकता है। सूर्यके प्रकाश बिना जगत्का सब कार्यबन्द है, हम लोगोंको भाग नहीं मिलता क्या करें कहो जायें? विष्णुने कहा कि, हे देवताओ! मुनि-क्षेष्ठ अगस्त्यजी वाराणसी में हैं, आप लोग उन्हींके निकट जावें, वे ही विन्ध्याचल की उद्भूतताको शांत करेंगे। उन्हींसे नम्रतापूर्वक विनयकर आप अभयदान माँगो। विष्णुके इस प्रकार कहने पर सब देवता काशीजीमें अगस्त्यमुनिके आश्रम आये। सबके सब दण्डवत् प्रणाम करके स्तुति करने लगे महान् कातर हो विनय करने लगे कि, हे स्वामी! आप प्रसन्न होजिये, हम आपकी शरण हुये हैं क्योंकि कान्तिमान दुस्तर विन्ध्यसे हम बहुत दुःखित हुये हैं। देवताओंकी नाना प्रकारकी स्तुति विनयको सुनकर, अगस्त्यजी हँसते हुये बोले कि, हे देवताओ! आप लोग सब लोकपाल महात्मा, त्रिभुवनमें सबसे क्षेष्ठ एवं निग्रह अनुग्रह करनेमें सर्व प्रकार से समर्थ हो, आप लोगोंको कोई भी कार्य कठिन नहीं है तो भी आप को जिस कार्यकी इच्छा हो वह कह डालिये।

मुनिकी ऐसी वाणी सुनकर देवता कहने लगे कि, हे मुनिराज! विन्ध्याचलने सूर्यका मार्ग रोक लिया है, जिससे त्रिलोकी नष्ट होनेको आई है। हे मुनि! अपने तपके बलसे उसकी इस उद्भूतताको शांतकर त्रिलोकीको अभयदान दीजिये, यही हमारा कार्य है।

अनुमान, राजहंस राजहंसिनीकी सावधानी

अगस्त्यब्रह्मिणे देवताओंकी प्रार्थनाको स्वीकार किया । देवता बड़े प्रसन्न हुये । अपने २ स्थानको गये । पीछे मुनि अपनी स्त्रीसे कहने लगे कि, प्रिये ! यह महान् अनर्थकारक विघ्न उपस्थित हुआ है, पुरातन मुनियोंने कहा है कि, मुमुक्षुओंको काशीवासमें विघ्न भी बहुत होते हैं । काशीमें निवास करते वही विघ्न मुझे भी उपस्थित हुआ है । इस प्रकार अपनी पत्नीसे कह गंगामें स्नान कर, सब देवताओंका दर्शन कर, स्त्रीसहित काशीसे बिदा हुये । काशीके विरहसे सन्तप्त हो बारंबार काशीका स्मरण करते, तपके बलसे अल्प कालमेंही भृंगोंको उठाये हुये विध्या पर्वतके पास पहुँच गये । अपने पास खड़े हुये मुनिको देख पर्वत कंपायमान होगया सूक्ष्म हो दण्डवत करने नीचे झुकर पृथ्वीका स्पर्श करने लगा । अगस्त्यजी भक्तिभावसे पृथ्वीमें दण्डवत करते हुए विन्ध्य पर्वतको देखकर, अति प्रसन्न हो कहने लगे कि, हे वत्स ! मैं तुम्हारे उच्च शिखरों को नहीं उलंघ सकता, इस कारण जबतक मैं न आऊँ तबतक तुम योंही स्थित रहो । पीछे उसके शिखरोंको लांघते हुवे दक्षिण दिशाको चले गये । विन्ध्याचल उसी प्रकार पड़ाही रह गया ।

गंगाजीकी कथा ।

इसी प्रकार देवीभागवतके ९ स्कन्धमें नदियोंकी बहुतसी कथा हैं । प्रथम गंगाजी गोलोकमें कृष्ण भगवान् के पास थी, एक समय राधाजी भगवान् कृष्णको गंगाजीसे बात करते देखकर क्रोधित हुई उसीके भयसे गंगाजी कृष्णजीके चरणोंमें लुप्त हो गई ।

गंगाजीके लुप्त होते ही जल सूख गया, सर्व प्राणी जलके अभावसे दुःखी होने लगे, देवताओंसहित त्रिदेवतोंने कृष्णजीके निकट जाय बहुत विनय करके कृष्णजीके चरणोंसे गंगाको प्रगट कराया, पीछे विष्णु भगवानसे विवाह हुआ । किसी कालमें ब्रह्मलोकमें किसी राजापर मोहित होनेके कारण ब्रह्माजीके शापसे पृथ्वीपर स्त्रीरूपसे जन्मले शन्तनु महाराजकी भार्या बनी ।

शन्तनु महाराजसे विवाह होनेके समय गंगाजीने वचन लिया था कि, मेरे गर्भसे जो संतान उत्पन्न होगी उसे मैं लेलूँगी । राजा भी बाचाबन्ध हो गये । पीछे सात पुत्रोंको जन्म लेतेही गंगाने गंगामें डाल दिया पर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ तो महाराजने पुत्रके लोभसे मोहमें आकर कहा कि, यह पुत्र मैं तुम्हें न दूँगा । गंगाजी पूर्व वचनके अनुसार गंगामें प्रवेश कर गई । वेही गंगाजीके आठवें पुत्र महान् प्रतापी भौमविजयी भीष्मपितामहके नामसे प्रसिद्ध हुये, जिनकी कथासे महाभारतादि इतिहास पुराण भरे पड़े हैं ।

इस प्रकारसे गंगाजी नदीरूपसे देवी करके जगत् प्रसिद्ध हैं। गंगाजीके दर्शनोंकी कथा भी प्रायः प्रख्यात है।

इसी प्रकारसे देवी भागवतके उसी अध्यायमें गंडकी, सरस्वती, लक्ष्मी यमुना आदि नदियोंकी भी कथाएँ विस्तारपूर्वक लिखी हैं। जिसको देखना हो देखले।

तात्पर्य—ऐसे २ सहस्रों उदाहरण हैं जो कि, जड़ चैतन्यके आत्माकी एकता सिद्ध करते हैं। चैतन्य जड़स्वरूपमें जाता है और जड़ चैतन्य हो जाता है।

इसलामी पुस्तकें और हदीसें।

मुसलमानी पुस्तकोंमेंभी इस प्रकारका बहुत वर्णन आता है। जिनसे यह बात सुतरां सिद्ध हो जाती है।

जमीनोंकी आपसकी बातें—सफर सआदत नामक किताबमें लिखा है कि, रसूल खुदाने फरमाया कि, जमीने आपसमें बात करती हैं कि, आज मुझपर कोई मुसल्ला बिछा किसीने निमाज पढ़ा कि, नहीं।

प्यालेका आशीर्वाद—हदीस तरमजी और अविनमाजःमें लिखा है कि, मुहम्मद साहब कहते हैं कि, कोई प्यालेमें खावें उसको चाट कर साफ करे तो प्याला उसके हकमें इस्तगफार करता है। मसकात शरीफमें लिखा है कि, प्याला उसके लिये कहता है कि, अल्लाह तुझे दोजखकी आँचसे मुक्त करे जैसे कि, तूने मुझको आजाद किया है।

इन्द्रियोंकी गवाँइयाँ—लिखा है कि, कयामतके दिन सब आदमियोंको उनके फेल नामे दिये जावेंगे। पढ़े अन पढ़े सब अपने २ आमाल नामे पढ़ लेवेंगे जब गुनहगार अपना अमाल नामा पढ़ेगा तो पुकारेगा कि, यह झूठ लिखा है, मैंने इनमेंसे एक भी गुनाह नहीं किया है। खुदा उनको समझावे कि, तुमने अवश्य किया है। रोज मुनिकिर नकीर तुम्हारे गुनाहोंके लिखते थे। इस पर भी जब न मानेगा उनके शरीरके सब अंग गवाही देंगे, सब इन्द्रियाँ बोलेंगी अपने कर्मोंको प्रगट करेंगी। गुणहगार लाचारीसे मान लेवेगा, उनके गुनाहोंके अनुसार उनके माथेपर चिन्ह किया जावेगा।

सजीवमूर्तियाँ।

लात १ मनात २ गुरों नामक तीन देवियाँ बड़ी प्रतिष्ठित थीं, जिन्होंको रैश जातिवाले—अरबदेशमें (पूजते थे। मुहम्मद साहबने उनके मन्दिर और मूर्तियोंको तोड़ा तो मन्दिरमेंसे कालीर मूर्तियाँ स्त्रियोंका रूप धारण कर जीवित

मयूर, पेरू, गिनीफाउल बतख

होकर रोती हुई बाहर निकलीं जिनको २ मुहम्मद साहबने कत्ल कर डाला, मौलवी अमाउद्दीन कृत किताब तालीम मुहम्मदी देखो ।

जमीनकी जिबराईलसे बातें—अजाय बुलकिस में लिखा है कि, जब खुदाने जिबराईलको हुकुम दिया कि, जमीन परसे मिट्टी ले आओ, जिससे आदमका पुतला बनाया जावे । खुदाकी आज्ञानुसार जब जिबराईल पृथ्वीपर आकर मिट्टी लेने लगे उस समय पृथ्वी रोई कहा कि, मुझसे मिट्टी मत लो ।

बड़ी मूर्तिकी बातें—तारीख मुहम्मदी और दूसरे हदीसोंमें लिखा है कि, मुहम्मद साहबका जन्म हुआ तो पृथ्वीकी सभी मूर्तियाँ गिर पड़ीं । कुरैश जातिकी सबसे बड़ी मूर्ति तीन बार मुँहके बल गिरी लोगोंने प्रत्येक बार खड़ा किया वह बोली कि, मुहम्मदसे मैं खड़ी नहीं रह सकती ।

जिस समय मुहम्मदसाहबका जन्म हुआ उस समय कंसरा बादशाहका महल कौषा उसके चौदह कँगूरे गिर गये ।

वृक्षोंकी सलाम—मुसलमानी किताबोंमें लिखा है कि, वृक्ष दीवार स्थावर आदि सब मुहम्मद साहब को सलाम करते थे पर उसको मुहम्मद साहबके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं जानता था ।

पशुबल—नशकातमें कब्रकी कठिनताके बारेमें लिखा कि, जब कब्र गुनहगारोंको दबाती है तो पशु उनकी चिल्लाहटको सुनते हैं । खुदाने पशुओंमें मनुष्यसे भी बढ़कर ताकत दी है वेही सुन सकते हैं दूसरे नहीं सुन सकते ।

गदहावों फिरस्ते—तौरैतमें लिखा है कि, जब बलःआम गदहेपर सवार हो बनी इसराईलको शाप देने चला तो पहले गदहेनेही तलवार लिये फिरिस्तोंको देखा पीछे वे बल आमकी दृष्टिमें आये ।

पत्थर और दाऊदकी बातें—तारीख मुहम्मदी और हदीसोंमें लिखा है कि, साहिल नाम बादशाहने शर्त की थी कि, जो कोई जालूतको मारेगा उसको अपनी बेटी और आधा राज्य दूंगा ।

बनी इसराईलको खुदाने आज्ञा दी कि, दाऊदके हाथसे जालूत मारा जावेगा । दाऊद जालूतको मारने जा रहा था, रास्तेमें तीन पत्थर मिले, तीनोंने मनुष्यकी भाषामें दाऊदसे कहा कि, हे दाऊद ! हमसे जालूतको मार, तब जालूत मरेगा, दाऊदने वैसाही किया बादशाहकी बेटी तथा आधा राज्य पागया ।

कूआंका रोना—बहुरलअभवाजने लिखा है कि, यूसुफके भाइयोंने उन्हें कूयेमें डाल दिया, अरबके सौदागरने उन्हें निकाला तो कूआं यूसुफकी जुदाईमें बहुत रोया ।