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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर इति प्रवीरे सुभग च सल्पतौ विवेकिनीनामपि दैव योषिताम् । चलं मनो धावति यत्र कुत्रचिद्विदुश्चसत्त्वा विरला पुनः स्त्रियः ॥१४०॥ इति मरुभूतिनिगदितामाकर्ण्य कथां स वत्सराजसुतः । नरवाहनदत्तस्तां सुखसुप्तो नीतवान् रजनीम् ॥१४१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः । तृतीयस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः प्रातः कृतावश्यकरायं स सचिवैः सह । नरवाहनदत्त स्वमुद्यानं विहरन्ययौ ॥१॥ तत्रस्थश्च प्रभापुञ्जमादौ व्योम्नोऽप्यनन्तरम् । ततो विद्याधरीवल्लीरवत्तीर्णा ददर्श सः ॥२॥ तासां मध्य च दीप्तानां ददर्शेकां स कन्यकाम् । ताराणामिव शीतांशुलेखां लोचनहारिणीम् ॥३॥ विकसत्पद्मवदनां लोललोचनषट्पदाम् । सलीरुहसगमनां बह्दुत्पलसौरभाम् ॥४॥ तरङ्गहारित्रिवलीस्त्रासन्नतमध्यमाम् । साक्षादिव स्मरोद्यानवापीशोभाभिदेवताम् ॥५॥ स्मरसञ्जीवनीं तां च दृष्ट्वा सोत्कलिकामतः । चान्द्रीं मूर्तिमिवाम्भोधिश्शुशुभे स नृपात्मजः ॥६॥ अहो सुन्दरनिर्माणवैचित्री वाप्यसौ विधेः । इति शंसन् स सचिवः सहितस्तामुपाययौ ॥७॥ तिर्यक्प्रमार्द्या दृष्ट्या पश्यन्ती सा च स क्रमात् । पप्रच्छ का त्वं कल्याणि किमिहागमनं च ते ॥८॥ तच्छ्रुत्वा साऽब्रवीत्कन्या शृणुतेतद्वदामि यः । अशितघनाख्यः कौशाम्ब्याभागमनम् अस्ति काञ्चनशृङ्गाख्यं पुरं हैमं हिमाचले ॥९॥ तत्रास्ति नाम्ना स्फटिकयशा विद्याधरेश्वरः । धार्मिक कृपनानाधशरण्यामृतबरसम् ॥१०॥

षष्ठम लम्बक ७५१

षष्ठम लम्बक ७५१ हे स्वामी इस प्रकार वीर, सदाचारी और सुन्दर पति के रहने पर भी विचारशील युवतियों का भी मन चंचल होकर यहाँ-वहाँ दौड़ता है। विशुद्ध मनवाली स्त्रियाँ विरल ही होती हैं ॥१४॥ मरुभूति द्वारा इस प्रकार कही गई कथा को सुनकर वत्सराज-पुत्र नरवाहनदत्त ने सुखपूर्वक सोकर रात बिताई ॥१४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त

तृतीय तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)

सुबह में सोकर उठने के बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उद्यान में विहार करने के लिए गया ॥१॥ उद्यान में भ्रमण करते हुए उसने आकाश में पहले तेज का पुंज और उसके पश्चात् ही आकाश से उतरती हुई बहुत-सी विद्याधरियों को देखा ॥२॥ उन चमकती हुई विद्याधरियों के मध्य उसने एक कन्या को इस प्रकार देखा मानों तारिका-मंडल के मध्य चमकती हुई नयनहारिणी चन्द्रमा की रेखा हो ॥३॥ उसका मुख-कमल खिला हुआ था और उसके चंचल नयन भ्रमरों के समान घूम रहे थे। हंस के समान लीलायुक्त गमन करती हुई उसके शरीर से कमल के समान सुगन्धि निकल रही थी ॥४॥ तरंग युक्त त्रिवली-लता से उसकी कमर अलंकृत थी मानों काम-रूपी बावली की छाया की वह मूर्तिमती अधिदेवता थी ॥५॥ कामदेव की संजीवनी-विद्या के समान और उत्कंठित चन्द्रमा की मूर्ति के समान उसे देखकर समुद्र के समान वत्सराज का पुत्र वह नरवाहनदत्त क्षुब्ध हो उठा ॥६॥ 'अहो ! यह तो ब्रह्मा के सौन्दर्य-सृष्टि की विचित्र रचना है' इस प्रकार कहता हुआ वह युवराज मन्त्रियों के साथ उसके पास आ गया ॥७॥ वह भी स्नेह से स्निग्ध और तिरछी आँखों से उसे देखती थी। क्रमशः समीप जाकर उसने उस सुन्दरी से पूछा कि तू कौन है और यहाँ कैसे आई ? ॥८॥

शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन

यह सुनकर वह कन्या बोली 'सुनो मैं तुम्हें बताती हूँ। हिमाचल पर्वत पर कांचन शृंग नाम का सुवर्ण-निर्मित नगर है ॥९॥ वहाँ स्फटिकयश नाम का विद्याधरों का राजा है। वह बहुत धर्मात्मा है और दीन अनाथों एवं शरणागतों का पालन रक्षण करनेवाला है ॥१०॥

४४२ कथासरित्सागर

४४२ कथासरित्सागर तस्य हेमप्रभादेव्यां जातां गौरीवरोद्भवाम्। मां शक्तियशसं नाम जानीहि तनयामिमाम् ॥११॥ पितुः प्राणप्रिया साहं पञ्चभ्रातृकनीयसी। अतोषयं तवादेशाद् व्रतं स्तोत्रैश्च पार्वतीम् ॥१२॥ तुष्टा सा सकला विद्या दत्त्वा मामेवमादिशत्। पितुर्वंशगुणैः पुत्रि भावि विद्याबलं तव ॥१३॥ नरवाहनदत्तश्च भर्त्ता तव भविष्यति। वत्सराजसुतो भाविचक्रवर्ती द्युचारिणाम् ॥१४॥ इत्युक्त्वा शर्वपत्नी मे तिरोऽभूत्तत्प्रसादतः। सद्योविद्याबला साहं सम्प्राप्ता यौवनं क्रमात् ॥१५॥ अद्यादिशच्च सा रात्रौ देवी मां दत्तदर्शना। प्रातः पुत्रि त्वया गत्वा द्रष्टव्यः स निजः पतिः ॥१६॥ आगन्तव्यमिहैवाद्य मासेन हि पिता तव। चित्तस्थितैस्तत्सङ्कल्पो विवाहं संविधास्यति ॥१७॥ इत्यादिश्य तिरोऽभूत् सा देवी याता च यामिनी। ततोऽहमार्यपुत्रैषा त्वमिह द्रष्टुमागता ॥१८॥ तत्सम्प्रति व्रजामीति गदित्वा ससखीजना। उत्पत्य च शक्तियशाः सा जगाम पुरं पितुः ॥१९॥ नरवाहनदत्तश्च तद्विवाहोत्सुकस्ततः। दिवसाभ्यन्तरं खिन्नः पश्यन् मासं युगॊपमम् ॥२०॥ तत्र दृष्ट्वा विमनसं सोऽथ तं गोमुखोऽब्रवीत्। शृणु देव कथामेकां तवाख्यामि विनोदिनीम् ॥२१॥ विद्याधर्याः कथा बभूव काञ्चनपुरीत्याख्यया नगरी पुरा। तस्यां च सुमना नाम महानासीन्महीपतिः ॥२२॥ आक्रान्तदुर्गकान्तारभूमिना येन चक्रिरे। चित्रं विराजमानेन तादृशा अपि शत्रवः ॥२३॥ तमेकदास्थानगतं प्रतीहारो व्यजिज्ञपत्। देव मुक्ताक्षिता नाम निषादाधिपकन्यका ॥२४॥ पञ्जरस्थितमादाय शुकं द्वारि बहिः स्थिता। वीरसेनेनानुगता भ्रात्रा तव दिदृक्षते ॥२५॥ १ इयमेव कथा कादम्बरीमूलभूता।

षष्ठ लम्बक ७४३

षष्ठ लम्बक ७४३ उस राजा की हेमप्रभा नाम की रानी में पार्वती की कृपा से उत्पन्न हुई शक्तियशा नाम की कन्या मुझे जानो ॥११॥ पाँच भाइयों में सबसे छोटी और अपने पिता की प्राणों से भी प्यारी कन्या मैने अपने पिता की आज्ञा से व्रतों और स्तोत्रों से पार्वती को सन्तुष्ट किया ॥१२॥ उस प्रसन्न पार्वती ने मुझे सभी विद्याएँ देकर आज्ञा दी कि 'बेटी तुझे पिता से दसगुना विद्याओं का बल प्राप्त होगा और वत्सराज का पुत्र तथा विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नरवाहनदत्त तेरा पति होगा' ॥१३-१४॥ इस प्रकार कहकर पार्वती अन्तर्धान हो गई और विद्याबल को प्राप्त कर मैं समस्त गुणवती हो गई ॥१५॥ आज रात मुझे स्वप्न में दर्शन देकर पार्वती देवी ने आज्ञा दी कि 'बेटी प्रातःकाल ही तुम अपने पति को देखना ॥१६॥ और, एक मास के पश्चात् आज के ही दिन यहाँ फिर आना। तब चित्त में इस निश्चय को ठाने हुए तुम्हारा पिता तुम्हारा विवाह-संस्कार सम्पन्न करेगा' ॥१७॥ इस प्रकार की आज्ञा देकर देवी चली गईं और रात भी बीत गई। इसलिए, 'हे आर्यपुत्र मैं तुम्हें देखने के लिए यहाँ आई हूँ ॥१८॥ तुम्हारा दर्शन हुआ अतः अब मैं जाती हूँ।" यह कहकर शक्तियशा अपनी सहेलियों के साथ आकाश में उड़कर पिता के नगर को चली गई ॥१९॥ तब उसके विवाह के लिए व्याकुल नरवाहनदत्त एक मास को एक युग के समान समझता हुआ अपने भवन को गया ॥२०॥ घर आकर उसे उदास देखकर गोमुख ने कहा-हे स्वामी तुम्हारे मन को बहलाने के लिए मैं एक कथा कहता हूँ सुनो- ॥२१॥ दो विद्याधरियों की कथा प्राचीन समय में कांचनपुरी नाम की एक नगरी थी। उसमें सुशर्मा नाम का महान् राजा था ॥२२॥ दुर्गम भूमियों को आक्रान्त करके उस राजा ने शत्रुओं को भी ऐसा ही कर दिया (अर्थात्, उसके शत्रु भी दुर्गम भूमि की शरण में चले गए) ॥२३॥ एक बार सभा (आम दरबार) में बैठे हुए राजा से द्वारपाल ने आकर निवेदन किया- 'महाराज निषादों की राजकन्या मुक्ताफला पिंजरे में रखे हुए शुक (तोते) को लेकर बाहर द्वार पर खड़ी है। उसीके साथ उसका बड़ा भाई वीरध्वज है। वह आपको देखना चाहती है' ॥२४-२५॥

७४४ कथासरित्सागर

७४४ कथासरित्सागर प्रविशत्विति राज्ञोक्ते प्रतीहारनिवेशन । भिल्लकन्या नृपास्थानप्राङ्गणं प्रविवेश सा ॥२६॥ न मानुषीयं दिव्यस्त्री कापि नूनमसाविति । सर्वैरप्यचिन्त्यस्तत्र दृष्ट्वा तद्रूपमद्भुतम् ॥२७॥ सा च प्रणम्य राजानमेवं व्यज्ञापयत्तदा । देवाय सर्व्वशास्त्रज्ञोऽस्येनतुर्वेदघरः शुकः ॥२८॥ कविः कृत्स्नासु विद्यासु कलासु च विचक्षणः । भयैश्वरोपयोगित्वादहानीतोऽय गृह्यताम् ॥२९॥ इत्यर्पितस्तमादाय प्रतीहारेण कौतुकात् । नीतोऽग्रे नृपतेरेनं शुकः श्लोकं पपाठ सः ॥३०॥ राजन्युक्तमिदं सदैव यदयं दवस्य समुद्द्यते । धूमश्याममुखो द्विषद्विरहिणीनिःश्वासवातोद्गमैः । एतत्त्वद्भुतमेव यत्परिमषाद्वाष्पाम्बुपूरप्लवै- र्गाढं प्रज्वलतीह दिक्षु वणसु प्राप्य प्रतापानलः ॥३१॥ एवं पठित्वा व्याख्याय शुकोऽवादीत् पुनश्च सः । किं प्रमेयं कुत शास्त्राद्ब्रवीम्याविश्यतामिति ॥३२॥ ततोऽतिविस्मितं राज्ञि मन्त्री तस्याब्रवीन्निदम् । शङ्के शापाच्छुकीभूतः पूर्व्वर्षि कोऽप्ययं प्रभो ॥३३॥ जातिस्मरो धर्मवशात् पुरासीत स्मरत्यतः । इत्युक्ते मन्त्रिणा राजा स शुकं पृच्छति स्म तम् ॥३४॥ कौतुक भद्र मे ब्रूहि स्ववृत्तान्त क्व जन्म ते । शुकत्वे शास्त्रविज्ञानं कुत को वा भवानिति ॥३५॥ शुकस्यात्मकथा तत स बाष्पमुत्सृज्य ववति स्म शुकः शनै । अवाच्यमपि वैवंत्तच्छृणु वच्मि त्वाज्ञया ॥३६॥ हिमवन्निकटे राजंस्तस्येको रोहिणीतरुः । आम्नाय इव दिव्यापिभूरिशाखाश्रितद्विजः ॥३७॥ १ आम्नायपक्षे—भूरिशाखाश्रिता द्विजाः यस्य तरुपक्षे—भूरिशाखासु आश्रिता, द्विजाः=पक्षिणो यस्य ।

दशम लम्बक ७४५

दशम लम्बक ७४५ 'ले आयें राजा के इस प्रकार कहने पर, द्वारपाल के बताये मार्ग से वह म्लेच्छकन्या राजसभा भवन के आँगन में आई। उसके आश्चर्यजनक रूप को देखकर सभी सभासद सोचने लगे कि क्या यह मानुषी है अथवा कोई दिव्य स्त्री ॥२६-२७॥ वह कन्या राजा को प्रणाम करके बोली-'महाराज शास्त्रगज नाम का चारों वेदों का ज्ञाता यह शुक है। यह कवि है। सम्पूर्ण विद्याओं और कलाओं में यह कुशल है। मैं इसे महाराज के उपयुक्त समझकर यहाँ ले आई हूँ। आप इसे स्वीकार करें' ॥२८ २९॥ इस प्रकार, म्लेच्छकन्या द्वारा समर्पित शुक को द्वारपाल ने कौतूहलवश राजा के सामने प्रस्तुत कर दिया। तब उस शुक ने एक श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ है—॥३०॥ 'राजन् यह तो उचित ही है कि आपके शत्रुओं की विरहिणी स्त्रियों के लम्बे श्वासों के साथ निकलते हुए वायु से धुएँ से श्याम मुखवाली प्रताप-अग्नि सदा चमकती रहती है किन्तु यह आश्चर्य की बात है कि शत्रु-स्त्रियों के दुःख के कारण निकले हुए आँसुओं की बाढ़ से वह प्रताप अग्नि दसों दिशाओं में और भी प्रचंड रूप से जलती रहती है ॥३१॥ यह श्लोक पढ़कर और उसकी व्याख्या करके वह सुग्गा बोला-महाराज किस शास्त्र से किस विषय का वर्णन करूँ आज्ञा दीजिए' ॥३२॥ तब राजा के आश्चर्य में निमग्न हो जाने पर उसका मन्त्री बोला-'प्रभो यह पूर्वजन्म का कोई ऋषि शापवश सुग्गा बन गया है। इसे पूर्वजन्म की स्मृति है और उस जन्म के पढ़े हुए विषयों का भी यह स्मरण करता है ॥३३-३४॥ 'हे भद्र मुझे यही कौतूहल है कि तुम अपना ही वृत्तान्त बताओ तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ और शुक होने पर भी तुम्हारा शास्त्रों का ज्ञान कैसा ? साथ ही तुम कौन हो? ॥३५॥ शुक की आत्मकथा तब वह शुक¹ आँसू गिराकर धीरे से बोला-'यह बात यद्यपि कहने योग्य नहीं है, फिर भी आपकी आज्ञा से कहता हूँ सुनिए' ॥३६॥ हे राजन् ! हिमालय के समीप रोहिणी का एक वृक्ष है। वेदों के समान जिसकी अनेक शाखाओं² में द्विज³ गण (पक्षी और ब्राह्मण) आश्रय लेते हैं ॥३७॥ १ यही कादम्बरी का वैशम्पायन शुक है। २ वृक्ष के पक्ष में शाखा = डालें। वेद के पक्ष में शाखा = भाग। ३ द्विज के पक्ष में = पक्षी। वेद के पक्ष में = त्रिवर्ण (ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य)। ९४

७४६ कथासरित्सागर

७४६ कथासरित्सागर तन्मिन्नहं समं शुक्या शुकस्तस्यां कृतालयः । तस्मादपोढमुत्पन्नस्तस्यां दुष्कर्मयोगतः ॥४३८॥ जातस्य च मे माता शुकी सा पञ्चतां गता । तातस्तु वृद्धः पक्षांस्तः क्षिप्त्वा वर्धयति स्म माम् ॥४३९॥ निग्म्यशुकानीतमुक्तशेषफलानि च । मन्नन् मह्यं च वितरन्नथ तत्रास्त मन्पिता ॥४४०॥ एकदा तत्र सूयाग्निष्मातपोग्रार्जुननादिनी । आग्नेत्वाय समगाद् भिल्लसेना भयङ्करी ॥४४१॥ विद्रस्तकृष्णमागक्षी धूलिव्यालोसितांशुका । सम्भ्रमोद्वल्लचमरीविभ्रमत्कवरीभग ॥४४२॥ विद्रुतव्याघ्नुतवाभूत्सहसा सा महाटवी । पुल्लिन्वले विविधप्राणिपाताय धावति ॥४४३॥ वृत्तान्वटीदित शूरया दिनमागत्वभूमिपु । आगाच्छद्वरमम्यं सत्रास्त पिशितभारवं ॥४४४॥ एवस्तु वृद्धगयरन्तद्रामामान्त्यामिप । अद्वाशीत् स त गाधं सुधिवस्तमुपागतम् ॥४४५॥ आगत्य च स तत्राणू शुक्तानन्यांश्च पक्षिणः । आरूढ्यारूह्य नीडेभ्यो हत्वा हत्या भुवि क्ष्यपात् ॥४४६॥ मपायान्तं च निकटं यमविस्फुरदन्निभम् । मं दृष्ट्वा भयाल्लीनो हन पक्षांन्तरं पितुः ॥४४७॥ तावत्नाम्मरतुमाय स प्राप्यारूह्यथ पातरौ । तान्तं म पीडितग्रीवं हत्या तन्मन्वधिक्षिपत् ॥४४८॥ अयं च तातेन समं पतित्वा तस्य कण्ठने । निगल्प शष्पन्तंग भयं प्राविन शनैः ॥४४९॥ अपार्याथ भित्नात्रावमो भग्नतमाश्रयन् । श्वानन्पाग्गमानाय पातं पत्तौ निशामगात् ॥४५०॥ तत्र तातमया दृष्ट्वाऽथ नीत्वा निशामयम् । शाभूदिन्यमुनि रन्त्येष्वति भागणः ॥४५१॥ अनन्तं फालगण्डूषप प्रवृन्तमन्तम् । तृप्तं पदगम्भीरंरमग्प्रदर्शना ॥४५२॥

दशम स्तबक ४२७ उस वृक्ष में एक सुग्गा सुग्गी के साथ घोंसला बनाकर रहता था। उसी सुग्गी के गर्भ से, अपने दुष्कर्मों के कारण मैं उत्पन्न हुआ ॥३८॥ मेरे उत्पन्न होते ही वह माता सुग्गी मर गई। पिता वृद्ध थे वे अपने पक्षों के भीतर मुझे रखकर मेरा पालन-पोषण करते थे ॥३९॥ आसपास सुग्गों के खाकर बचे (फेंके हुए) फलों को खाते हुए और मुझे देते हुए मेरे पिता मेरा पालन करने लगे ॥४०॥ एक बार शिकार करने के लिए तूणी गोमुख आदि वाद्यों से भीषण शब्द करती हुई भीलों की भयंकर सेना शिकार करने के लिए उस वन में आई ॥४१॥ उस सेना के भील जब जंगली प्राणियों के विनाश के लिए चारों ओर दौड़-धूप कर रहे थे तब नाचते हुए कृष्णसार मृग-रूपी आँखोंवाली धूल से भरे हुए पत्तोंवाली भाग्य से घबराकर इधर-उधर भागते हुए चमरी मृगों के पूँछ-रूपी केशोंवाली वह वनभूमि सहसा व्याकुल हो उठी ॥४२-४३॥ सारे दिन उस शिकार की भूमि में विनाश-लीला करके मारे हुए पशुओं के मांस को लादे हुए वह भील-सेना सायंकाल के समय उस वृक्ष के नीचे आ गई ॥४४॥ उसमें एक वृद्ध भील था जिसे मांस नहीं मिला था। उस भूखे भील ने सायंकाल के समय उस वृक्ष पर दृष्टि डाली और वृक्ष के समीप आ गया ॥४५॥ आकर, तुरन्त ही वृक्ष पर चढ़कर उसने सुग्गा तथा अन्यान्य पक्षियों को घोंसलों से निकाल-निकालकर और मार-मारकर वृक्ष के नीचे फेंकना प्रारम्भ किया ॥४६॥ उसे यम के किंकर की तरह निकट आया देख मैं भय से अपने पिता के पंखों के बीच चुपके-से छुपक गया ॥४७॥ जब उस पापी ने क्रमशः मेरे घोंसले को देखकर मेरे पिता को घोंसले से बाहर खींचकर, गला दबाकर मार डाला और फेंक दिया ॥४८॥ मैं भी अपने पिता के साथ भूमि पर गिरकर और उनके पंख से निकलकर घास और पत्तों के भीतर धीरे-धीरे घुस गया ॥४९॥ तब वह भील नीचे उतरकर और मारे हुए पक्षियों को आग में भून-भूनकर खाने लगा। शेष कुछ सुग्गों को लेकर वह पापी अपने गांव को चला गया ॥५०॥

४४८ कथासरित्सागर

४४८ कथासरित्सागर तत्रापश्यं कृतस्नानमहं सरत्सैकतस्थितम् । मुनिं मरीचिनामानं पूर्वपुण्यमिवात्मनः ॥५३॥ स मां दृष्ट्वा समाश्वास्य मुखक्षिप्तोदबिन्दुभिः । कृत्वा पत्रपुटेऽनैषीदाश्रमं कृपया मुनिः ॥५४॥ तत्र दृष्ट्वा कुलपतिर्मां पुलस्त्यः किलाहसत् । तेनान्यमुनिभिः पृष्टो दिव्यदृष्टिरुवाच सः ॥५५॥ इमं शापशुकं दृष्ट्वा दुःखेने हसितं मया । वक्ष्यामि चैतत्सम्बद्धां कथां वो विहिताह्निकः ॥५६॥ जातिं यच्छ्रवणादेष प्राग्वृत्तं च स्मरिष्यति । इत्युक्त्वा स पुलस्त्यश्चिराह्निकाद्योत्थितोऽभवत् ॥५७॥ कृताह्निकश्च मुनिभिः पुनरभ्यर्थितोऽत्र सः । मत्सम्वद्धां कथामेतां महामुनिरवर्णयत् ॥५८॥ सोमप्रभमकरन्दिकाभर्त्तूरत्नप्रभायाः कथा आसीज्ज्योतिष्प्रभो नाम राजा रत्नाकर पुरे । आरत्नाकरमुर्वी यः शशासोजितशासनः ॥५९॥ तस्य तीव्रतपस्तुष्टगौरीपतिवरोद्भवः । हर्षवत्यभिधानायां पुत्रो दम्यामजायत ॥६०॥ स्वप्ने मुखप्रविष्टं यत्सोमं वक्री ददर्श सा । तेन सोमप्रभं नाम्ना तं चक्रे स्वसुतं नृपः ॥६१॥ ववृधे च स तन्वानः प्रजानां नयनोत्सवम् । राजपुत्रोऽमृतमयैर्गुणैः सोमप्रभः क्रमात् ॥६२॥ दृष्ट्वा भरक्षमं शूरं युवानं प्रकृतिप्रियम् । यौवराज्येऽभ्यषिञ्चत्तं प्रीतो ज्योतिष्प्रभः पिता ॥६३॥ प्रभाकराभिधानस्य तनयं निजमन्त्रिणः । ददौ प्रियङ्करं नाम मन्त्रित्वे चास्य सद्गुणम् ॥६४॥ तत्कालमम्बरादद्य दिव्यमादाय मातलिः । अवतीर्णस्तमभ्येत्य सोमप्रभमभाषत ॥६५॥ विद्याधरः सखा शक्रस्यावतीर्णो भवानिह । तेन बान्धवा मानं शकेणाञ्चैषवत्सुत ॥६६॥ पूर्वस्नेहेन तं राजन् प्रहितस्तुरगोत्तमः । अमानुषश्च शत्रूणामजय्यत्वं भविष्यसि ॥६७॥

दशम लम्बक ७४९

दशम लम्बक ७४९ उस सरोवर में स्नान करके तट की बालू पर बैठे हुए मैंने अपने पूर्वजन्मों के पुण्यों के समान मरीचि नाम के मुनि को देखा ॥५३॥ वह मुनि मुझे देखकर और जल की बूंदों को मेरे मुंह पर डालकर, मुझे धीरज बँधाकर और पत्तों के दोनों में मुझे रखकर कृपापूर्वक अपने आश्रम में ले गये ॥५४॥ वहाँ मुझे देखकर आश्रम के कुलपति पुलस्त्य ऋषि ने हंस दिया। तब अन्य ऋषियों द्वारा उनके हँसने का कारण पूछने पर पुलस्त्य ने कहा-'मैं अपना दैनिक कृत्य समाप्त करके इसकी कथा आप लोगों से कहूँगा। इस कथा को सुनने से यह सुग्गा अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगा और अपना पिछला वृत्तान्त भी स्मरण करेगा'। ऐसा कहकर पुलस्त्य मुनि नित्य-कर्म में लग गए ॥५५-५७॥ नित्यकर्म करने के उपरान्त अन्य मुनियों द्वारा पुनः पूछे गये पुलस्त्य महामुनि ने मेरे सम्बन्ध की कथा का वर्णन किया ॥५८॥

सोमप्रभ मकरन्दिका और मनोरथप्रभा की कथा रत्नाकर नगर में ज्योतिष्प्रभ नाम का राजा था। वह प्रचण्डशासन राजा समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का शासन करता था ॥५९॥ उस राजा की तीव्र तपस्या से प्रसन्न शिवजी के वर से उसकी रानी हर्षवती के पुत्र उत्पन्न हुआ ॥६०॥ रानी ने स्वप्न में चन्द्रमा को अपने मुंह में प्रवेश करते देखा था इसलिए राजा ने उस पुत्र का नाम सोमप्रभ रखा ॥६१॥ प्रजाजन के नेत्रों के आनन्द को बढ़ाता हुआ वह बालक सोमप्रभ अपने अमृतमय गुणों के साथ क्रमशः बढ़ने लगा ॥६२॥ कुछ दिनों के पश्चात् पुत्र सोमप्रभ को गुण, युवा और प्रजा का प्रिय देखकर पिता ज्योतिष्प्रभ ने उसे युवराज के पद पर बैठा दिया ॥६३॥ और प्रभाकर नाम के अपने मन्त्री के सदगुण पुत्र प्रियंकर को उसका मन्त्री बना दिया ॥६४॥ उसी समय मातलि दिव्य घोड़े को लेकर आकाश से उतरा और सोमप्रभ के समीप आकर बोला- ॥६५॥ 'तुम इन्द्र के मित्र विद्याधर भूमि पर अवतरे हो इसलिए इन्द्र ने तुम्हें धषा नामक अपने घोड़े के पुत्र आशुश्रवा को तुम्हारे लिए भेजा है॥६६॥ यह घोड़ा तुम्हें प्राचीन स्नेह के कारण भेजा गया है। इस पर चढ़कर तुम शत्रुओं के लिए अजेय हो जाओगे ॥६७॥

१. यही कादम्बरी का कथाबीज है। २. कादम्बरी का शूद्रकराज। ३. यही कादम्बरी का इन्द्रायुध है।

७२० कथासरित्सागर

७२० कथासरित्सागर

इत्युक्त्वा वाजिरत्नं तद्दत्त्वा सोमप्रभाय स। आप्तपूजः समुत्पत्य ययौ वासवसारथिः ॥६८॥ ततो नीत्वैव दिवस तमुत्सवमनोरमम्। सोमप्रभस्तमन्येद्युरुवाच पितरं नृपम् ॥६९॥ तात न क्षत्रियस्यैष धर्मो यदजिगीषुता। तदाज्ञां देहि मे यावद्दिग्जयाय व्रजाम्यहम् ॥७०॥ तच्छ्रुत्वा स पिता तुष्टस्तथेति प्रत्यभाषत। चक्रे ज्योतिष्प्रभस्तस्य यात्रासविदमथ च ॥७१॥ ततःप्रणम्य पितरं दिग्जयाय बलैः सह। प्रायाच्छत्रुन्व्यपास्तङ्कः शुभे सोमप्रभोऽहनि ॥७२॥ जिगाय सोऽश्वरत्नेन तेन दिक्षु महीपतीन्। आजहार च रत्नानि तेभ्यो दुर्वारविक्रमः ॥७३॥ नामितं स्वधनुस्तेन विद्धिषां च शिरः समम्। उन्नतिं तद्धनुः प्राप न तु तद्विषतां शिरः ॥७४॥ आगच्छन् कृतकार्योऽथ हिमाद्रिनिकटे पथि। सन्निविष्टबलश्चक्रे मृगयां स वनान्तरे ॥७५॥ दैवात् सद्रत्नखचितं तत्रापश्यत्स किन्नरम्। अभ्यधावच्च स प्राप्तुं तेन शाक्रेण वाजिना ॥७६॥ स किन्नरो गिरिगुहां प्रविश्यादर्शनं ययौ। सोमप्रभस्तु तेनाश्वेनातिदूरममीमत् ॥७७॥ तावत्प्रकीर्णं काष्ठासु प्रकाशं तिग्मतेजसि। प्राप्ते प्रतीचीं ककुभं सन्ध्यासङ्गमकारिणीम् ॥७८॥ श्रान्तं कथञ्चिदावृत्य स ददर्श महत्सरः। तत्तीरे तां निशां नेतुकामश्चाश्वादवातरत् ॥७९॥ दत्त्वा तृणोदकं तस्मायाहृताम्बुफलोदकः। विश्रान्तश्चैकतोऽकस्मादशृणोत् गीतनिःस्वनम् ॥८०॥ गत्वा तदनुसारेण कौतुकात्रातिदूरतः। सोऽपश्यच्छिवलिङ्गाग्रे गायन्तीं दिव्यकन्यकाम् ॥८१॥ केयमद्भूतरूपा स्यादिति तं च सविस्मयम्। साप्युदाराकृतिं दृष्ट्वा कृतातिथ्यमवोचत ॥८२॥

दशम लम्बक ७५१

दशम लम्बक ७५१ इस प्रकार कहकर और उस अश्वरत्न को सोमप्रभ के लिए देकर तथा सोमप्रभ से सत्कृत होकर इन्द्र का सारथी वह मातलि आकाश में उड़कर चला गया ॥६८॥ तब युवराज सोमप्रभ ने उत्सव से मनाकर उस दिन को व्यतीत कर दूसरे दिन अपने पिता से कहा—॥६९॥ 'पिता क्षत्रिय का यह धर्म नहीं है कि वह विजय की इच्छा न करे। इसलिए मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं दिग्विजय करने जाऊँ' ॥७०॥ यह सुनकर प्रसन्न उसके पिता ने 'अच्छा' कहकर उसके दिग्विजय की तैयारी की ॥७१॥ तब युवराज सोमप्रभ माता-पिता को प्रणाम कर, सेनाओं के साथ इन्द्र के उस घोड़े पर चढ़कर शुभ दिन में दिग्विजय के लिए निकल पड़ा ॥७२॥ उस अश्वरत्न से सभी दिशाओं के राजाओं को जीतकर, उस अनन्त शक्तिवाले सोमप्रभ ने उनसे अनेक रत्न प्राप्त किये ॥७३॥ उसने अपने धनुष के साथ शत्रुओं के सिर भी झुका दिये। वह धनुष तो फिर तन गया किन्तु शत्रुओं के सिर फिर न उठ सके ॥७४॥ दिग्विजय करके लौटते हुए युवराज ने मार्ग में हिमालय के समीप सेना का शिविर लगाया और वन में आखेट करना प्रारम्भ किया ॥७५॥ दैवयोग से उसने सुन्दर गन्ध से आकृष्ट एक किन्नर को देखा और उसे पकड़ने के लिए इन्द्र के घोड़े से उसका पीछा किया किन्तु वह किन्नर पर्वत की हिमगुहा में घुसकर अदृश्य हो गया। सोमप्रभ को यह पीछा बहुत दूर ले गया ॥७६-७७॥ सभी दिशाओं को प्रकाशित करके जब प्रचण्डरश्मि भगवान् भास्कर सन्ध्या से संगम करानेवाली पश्चिमा दिशा में पहुँचे तब थके हुए सोमप्रभ ने एक सरोवर को देखा और उसी के किनारे रात बिताने की इच्छा से वह घोड़े से उतर पड़ा ॥७८-७९॥ घोड़े को घास-पानी देकर और स्वयं फल तथा जल ग्रहण कर एक ओर विश्राम करने पर उसने गान का रव सुना ॥८०॥ कौतुकवश गान-ध्वनि के अनुसार कुछ ही दूर जाकर उसने शिवलिंग के आगे गाती हुई एक दिव्य कन्या को देखा ॥८१॥ 'यह आश्चर्यजनक रूपवाली कन्या कौन है? विस्मय के साथ वह यह सोच ही रहा था कि उस कन्या ने भी सोमप्रभ का असाधारण सौन्दर्य देखकर और उसका यथायोग्य सत्कार करके उससे कहा—॥८२॥

७५२ कथासरित्सागर

७५२ कथासरित्सागर

कस्त्वं कथमियां भूमिमेकः प्राप्तोऽसि दुर्गमाम्। एतच्छ्रुत्वा स्ववृत्तान्तमुक्त्वा पप्रच्छ सोऽपि ताम् ॥८३॥ त्वं मे कथय कासि त्वं वनेऽस्मिन् का च ते स्थितिः। इति सं पृष्टवन्तं च दिव्यकन्या जगाद सा ॥८४॥ कौतुकं चेन्महाभाग तद्ब्रवीमि शृणु मत्कथाम्। इत्युक्त्वा सा स्रवद्बाष्पपूरा वक्तुं प्रचक्रमे ॥८५॥

मनोरथप्रभाकथा

अस्तीह काञ्चनामाख्यं हिमाद्रिकटके पुरम्। पद्मकूटाभिधानोऽस्ति तत्र विद्याधरेश्वरः ॥८६॥ तस्य हेमप्रभाख्यां राज्ञः पुत्राधिकप्रियाम्। मनोरथप्रभां नाम विद्धि मां तनयामिमाम् ॥८७॥ साहं विद्याप्रभावेण सखीभ्यः सममाश्रमान्। द्वीपानि कुरुवंशांश्च वनान्युपवनानि च ॥८८॥ क्रीडित्वा प्रत्यहं चैवमाहारसमये पितुः। आगच्छामि स्वभवनं वासरप्रहरैस्त्रिभिः ॥८९॥ एकदाहमिह प्राप्ता विहरन्ती सरस्तटे। मुनिपुत्रकमद्राक्षं सवयस्यमिह स्थितम् ॥९०॥ तद्रूपशोभयाकृष्टा हूतेवाहं समभ्यगाम्। सोऽपि साकृतया दृष्ट्यैवाकरोत् स्वागतं मम ॥९१॥ ततो ममोपविष्टायाः सखी ज्ञातोभयाशया। कस्त्वं ब्रूहि महाभागेत्यपृच्छत्तद्वयस्यकम् ॥९२॥ स चाब्रवीत्तद्वयस्यो नातिदूरमितः सखि। निवसत्याश्रमपदे मुनिर्दीधितिमानिति ॥९३॥ स ब्रह्मचारी सरसि स्नातुमत्र कदाचन। आगतो ददृशे देव्या सस्काशागतया धिया ॥९४॥ सा तं शरीरेणाप्राप्यं प्रशान्तं मनसैव यत्। सकामा चकमे तेन पुत्रं सम्प्राप मानसम् ॥९५॥ त्वद्दर्शनान्ममोत्पन्नः पुत्रोऽयं प्रतिगृह्यताम्। इति नीत्वैव तज्जातं सा दीधितिमते सुतम् ॥९६॥ बालं मुदये तस्य समर्प्य द्यौस्तिरोदधे। सोऽप्यनायासलब्धं तं पुत्रं दृष्ट्वोऽग्रहीन्मुनिः ॥९७॥

मनोरथप्रभा की कथा

दृष्टान्त सङ्ग्रह ७५१ 'तुम कौन हो और अस्वस्थ हो इस दुर्गम भूमि में कैसे पहुंचे ?' यह सुनकर स मयप्रभ ने अपना परिचय देकर उससे भी पूछा-॥८३॥ 'तू मुझे बता कि तू कौन है और इस वन में तेरी क्या स्थिति है?' ऐसा पूछते हुए राजकुमार से वह दिव्य कन्या बोली-'हे महापुरुष यदितुम्हें मेरे सम्बन्ध में जिज्ञासा है तो कहती हूँ सुनो। ऐसा कहकर आंसुओं की निरन्तर धारा बहाती हुई वह कहने लगी-॥८४-८५॥ मनोरथप्रभा की कथा हिमालय के मध्यभाग में कांचनधाम नाम का नगर है। वहाँ पद्मकूट नाम का विद्याधरों का राजा है। उस राजा की प्रभा नाम की रानी से उत्पन्न हुई मैं मनोरथप्रभा नाम की कन्या हूँ ॥८६-८७॥ मैं विद्याओं के प्रभाव से अपनी सहेलियों के साथ प्रतिदिन आश्रमों और कुलगर्वता वनों और उपवनों में दिन के तीन पहरों तक मनोविनोद करके चौथे पहर (सायंकाल) पिता के भोजन के समय घर आ जाती थी। एक बार मैं विहार करती हुई यहाँ सरोवर के तीर पर आई और मैंने उस तीर पर अपने मित्र के साथ बैठे हुए एक मुनिकुमार को देखा ॥८८ ९०॥ उसकी शोभा से आकृष्ट मैं दूती के समान उसके समीप गई। उसने भी साद भरे नेत्रों से मेरा स्वागत किया ॥९१॥ तब मेरे बैठ जाने पर दोनों के मनोभाव को समझती हुई मेरी सहेली ने उसके मित्र से उसके सम्बन्ध में पूछा ॥ ॥ तब उसका वह मित्र बोला-'हे गौरि यह समीप ही आश्रम में दीर्घतपस् नाम का मुनि रहता है ॥ ९३॥ सरोवर में स्नान करने के लिए आय हुए उस तपस्वी मुनि को उसी समय आई हुई लक्ष्मी ने देखा और वह उस पर आसक्त (अनुरक्त) हो गई ॥ ९४॥ लक्ष्मी ने उस जितेन्द्रिय मुनि को शरीर से असन्तुष्ट समझकर मन से ही जो उसकी कामना की उससे उस मानस-पुत्र उत्पन्न हुआ। तब लक्ष्मी उस मानस पुत्र को मुनि को समर्पित करके अन्तर्धान हो गई। उस मुनि ने भी बिना प्रयत्न और प्रयास के प्राप्त हुए उस पुत्र का "मकरन्दकन्दर्प" स्वीकार कर लिया ॥९५- ९६॥

१. यही कादम्बरी की महाश्वेता है। ५

७५४ कथासरित्सागर

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति पाठ प्रस्तुत है:

७५४ कथासरित्सागर रश्मिमानिति नाम्ना च कृत्वा सवयसं च क्रमात्। उपनीय समं सर्वा विद्या स्नेहादशिक्षयत् ॥९८॥ तं रश्मिमन्तं जानीतमेतं मुनिकुमारकम्। मित्रं भूतं मया सार्धं विहरन्तमिहागतम् ॥९९॥ इत्युक्त्वोतद्वयस्येन पृष्टा तेनापि मत्सखी। सा समानान्वयं सब्र मद्युक्तं तं त्वदब्रवीत् ॥१००॥ ततोऽन्योऽन्यव्यञ्जिताभिनितरामितरानुरागीणौ । मुनिपुत्रः स चाहं च यावत्तत्र स्थितावुभौ ॥१०१॥ तावदस्य द्वितीया मां स्वगृहावदत्सखी। उत्तिष्ठाहारभूमौ त्वां पिता मुग्धे प्रतीक्षते ॥१०२॥ तच्छ्रुत्वा शीघ्रमेष्यामीत्युक्त्वावस्थाप्य चात्र तम्। मुनिपुत्रं गताभूवं भीर्याहं पितुरन्तिकम् ॥१०३॥ तत्र किञ्चित्कृताहारा यावच्चाहं विनिर्गता। तावदाद्या सखी सा मामागत्य स्वैरमब्रवीत् ॥१०४॥ आगतो मुनिपुत्रस्य तस्येह स सखा सखि। स्थितश्च प्राङ्गणद्वारि सत्वरञ्च ममावदत् ॥१०५॥ मनोरथप्रभापार्श्वमहं रश्मिमताधुना। प्रेषितो व्योमगमनीं विद्यां दत्त्वैव पैतृकीम् ॥१०६॥ प्राणेश्वरीं विना तां हि मदनेन स दारुणाम्। दशां नीतो न शक्नोति प्राणान् धारयितुं क्षणम् ॥१०७॥ तच्छ्रुत्वास्यि निर्गत्य तेन युक्ताप्रयायिना। मुनिपुत्रकमित्रेण सख्या चाहमिहागता ॥१०८॥ प्राप्ता च समिहाद्राक्षं मुनिपुत्रं विना मम। चन्द्रोदयमनेनैव समं वृत्तप्राणोद्गमनं मतम् ॥१०९॥ ततोऽहं तद्वियोगात्तां निन्दन्ती तनुमात्मनः। प्रवेष्टुमच्छमनलं गृहीत्वा तत्कलेबरम् ॥११०॥ तावद्दिबोऽवतीर्यैव तेजपुञ्जाकृतिः पुमान्। आदाय तच्छरीरं स घोलयन् गगनं ययौ ॥१११॥ अथाहं केवलैवाग्नौ पतितुं यावदुद्यता। तावदुच्चरति स्मैव गगनादिह भारती ॥११२॥

द्वादश लम्बक ४५५

द्वादश लम्बक ४५५ और, उसका नाम रश्मिमान्¹ रखकर, उसका पालन-पोषण करके स्नेहपूर्वक उसे सभी विद्याएँ सिखाईं ॥९८॥ इसलिए, यह वही मुनिकुमार रश्मिमान् है, जो लक्ष्मी का पुत्र है और मेरे साथ भ्रमण करते हुए यहाँ आ गया है ॥९९॥ ऐसा कहकर उसके साथी ने मेरी सखी से मेरा परिचय पूछा। उसने मेरा नाम और कुल का परिचय देकर मुझसे कही गई सभी बातें उससे कह दीं ॥१००॥ इस प्रकार परस्पर नाम कुल आदि जानने के पश्चात्, अधिक बढ़े हुए मुनिकुमार और मैं दोनों परस्पर एक-दूसरे को देखते हुए बैठे रहे ॥१०१॥ इतने में ही दूसरी सहेली मेरे घर से आकर बोली-‘चलो उठो भोजनालय में तुम्हारे पिता तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं' ॥१०२॥ यह सुनकर तुरन्त जाऊँगी' ऐसा कहकर और मुनिपुत्र को वहीं बैठाकर मैं डरती हुई पिता के पास गई ॥१०३॥ वहाँ भोजन करके मैं जैसे ही जाने को तैयार हुई, वैसे ही मेरी पहली सखी ने आकर एकान्त में मुझसे कहा—॥१०४॥ ‘सखि इस मुनिपुत्र का मित्र यहाँ आया है और आँगन के द्वार पर खड़ा है। वह शीघ्रता- पूर्वक मुझसे बोला—॥१०५॥ ‘मुझे रश्मिमान् ने अभी ही मनोरथप्रभा के पास पिता से प्राप्त आकाशगामिनी विद्या देकर भेजा है और कहा है कि मैं उस प्राणेश्वरी के बिना कामदेव के द्वारा भीषण स्थिति में पहुँचा दिया गया हूँ। अब क्षण-भर भी मैं अपने प्राणों का धारण नहीं कर सकता' ॥१०६-१०७॥ ऐसा सुनकर मैं तुरन्त आये हुए उस मुनिपुत्र और सखी के साथ मैं यहाँ आई ॥१०८॥ आने पर मैंने देखा कि वह मुनिपुत्र रश्मिमान् चन्द्रमा के उदय के साथ ही मेरे बिना प्राणों के निकल जाने से मर चुका है ॥१०९॥ तब मैं उसके वियोग से पीड़ित होकर अपने शरीर की निन्दा करती हुई, उसके शरीर को लेकर चिता में जलने (सती होने) की इच्छा करने लगी ॥११०॥ इतने में तेज के पुंज के समान देदीप्यमान कोई पुरुष आकाश से उतरकर और उसके शरीर को उठाकर आकाश में उड़ गया ॥१११॥ फिर भी जब मैं अकेली ही आग में जलने के लिए उद्यत हुई तब मुझे आकाशवाणी सुन पड़ी—॥११२॥ १ कादम्बरी का पुण्डरीक।

७५६ कथासरित्सागर

७५६ कथासरित्सागर मनोरथप्रभे मैवं कृथा भूयो भविष्यति । एतेन मुनिपुत्रेण तव कालेन सङ्गम ॥११३॥ एतच्छ्रुत्वा परावृत्य मरणात्सप्रतीक्षिणी । स्थितास्मीहैव बद्धाशा शङ्करार्चनतत्परा ॥११४॥ मुनिपुत्रसुहृत्सोऽपि गतो मे क्वाप्यदर्शनम् । इति तां वादिनीं विद्याधरीं सोमप्रभोऽभ्यधात् ॥११५॥ स्थितास्येकाकिनी तर्हि क्व सापि सखी क्व ते । एतच्छ्रुत्वा तमाह स्म सा विद्याधरकन्यका ॥११६॥ सिंहविक्रम इत्यस्ति नाम्ना विद्याधरेश्वरः । तस्यानन्यसमा चास्ति तनया मकरन्दिका ॥११७॥ सा मे सखी प्राणसमा तया सह सुस्थिता । तया सखी प्रेषितामद्वार्तां ज्ञातुमिहाद्य मे ॥११८॥ ततो मयापि तत्सख्या समं सा प्रहिता निजा । सखी तदन्तिकं तेन स्थितास्म्येकैव सम्प्रति ॥११९॥ एवं वदन्ती गगनादवतीर्णां तदैव ताम् । स्वसखीं दर्शयामास तस्मै सोमप्रभाय सा ॥१२०॥ तामथोक्तसखीवार्त्तां पर्णशय्यामकारयत् । सोमप्रभस्य तद्बाह्वोरपि वासमदापयत् ॥१२१॥ ततो नीत्वा निशां सर्वे तत्र ते प्रातरुत्थिता । व्योम्नोऽवतीर्णं ददृशुर्विद्याधरमुपागतम् ॥१२२॥ स च विद्याधरो देवजयो नाम कृतानतिः । मनोरथप्रभामेवमुपविश्य जगाद ताम् ॥१२३॥ मनोरथप्रभे राजा वक्ति त्वां सिंहविक्रमः । यावत्तव न निष्पन्नो वरस्तावन्न मत्सुता ॥१२४॥ विवाहमिच्छति स्नेहात्त्वत्सखी मकरन्दिका । तदेतां बोधयागत्य येनोद्वाहे प्रवर्त्तते ॥१२५॥ एतच्छ्रुत्वा सखीस्नेहात् विद्याधरकन्यकाम् । गन्तुं प्रवृत्तां वक्ति स्म राजा सोमप्रभोऽथ सः ॥१२६॥ द्रष्टुं विद्याधरं लोकमनघे कौतुकं मम । तत्तत्र नय मामद्यो त्सवोऽसावथ तिष्ठतु ॥१२७॥

'हे मनोरथप्रभे ऐसा न करो। इस मुनिकुमार के साथ तेरा यथासमय पुनः संगम होगा' ॥११३॥ यह सुनकर, मरने से लौटकर और उसकी प्रतीक्षा में आशा बाँधकर शिवजी की आराधना करती हुई बैठी हूँ ॥११४॥ मुनिकुमार का वह मित्र भी न जाने कहाँ अदृश्य हो गया। इस प्रकार कहती हुई विद्याधरी से सोमप्रभ ने कहा— 'तो तू अकेली क्यों है? तेरी वह सखी कहाँ है? इस प्रकार कहते हुए सोमप्रभ से वह विद्याधरी मनोरथप्रभा बोली—॥११५-११६॥ सिंहविक्रम नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी असाधारण सुन्दरी मकरन्दिका नाम की कन्या है ॥११७॥ वह मेरी प्राणों के समान प्यारी और मेरे दुःख से दुःखिता उस कुमारी मकरन्दिका ने मेरा समाचार जानने के लिए आज एक सहेली को भेजा था। मैंने उसकी सखी के साथ अपनी सखी को भी भेज दिया है। इसलिए, इसी समय मैं यहाँ अकेली हूँ ॥११८-११९॥ इस प्रकार कहती हुई मनोरथप्रभा ने उसी समय आकाश से उतरी हुई अपनी सहेली को सोमप्रभा के लिए दिखाकर उसका परिचय कराया ॥१२०॥ और, मकरन्दिका का वृत्तान्त सुनानेवाली उस सखी द्वारा सोमप्रभ के लिए पत्तों का बिछावन बनवाया और उसके घोड़े को घास खिलवाई ॥१२१॥ तब वही सरोवर के तट पर रात्रि व्यतीत कर, प्रातःकाल वे सब उठे और उन लोगों ने आकाश से उतरे हुए एक विद्याधर को देखा ॥१२२॥ वह देवजय नाम का विद्याधर, प्रणाम करके और पास में बैठकर मनोरथप्रभा से इस प्रकार बोला—॥१२३॥ 'हे मनोरथप्रभे तुमसे राजा सिंहविक्रम यह कहता है कि जबतक तुम्हारे पति का निश्चय नहीं होता तबतक मेरी कन्या मकरन्दिका भी विवाह नहीं करना चाहती। इसलिए, जाकर इसे समझ ओ कि यह विवाह के लिए तैयार हो ॥१२४ १२५॥ यह सुनकर मनोरथप्रभा सखी के स्नेह के कारण जब उसके पास जाने को उद्यत हुई, तब सोमप्रभ ने उससे कहा—॥१२६॥ 'हे पवित्र चरित्रवाली मुझे भी विद्याधरों का लोक देखने का कुतूहल है। इसलिए, मुझे भी ले चलो। घास दिया हुआ घोड़ा यहीं रहे ॥१२७॥


१ यही बाणभट्ट की कादम्बरी है।-अनु

७५८ कथासरित्सागर

७५८ कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वा सा तथेत्युक्त्वा व्योम्ना सद्यः सखीयुता। तेन देवजयोत्सङ्गारोपितेन समं ययौ॥१२८॥ प्राप्ता तत्र कृतातिथ्या मकरन्दिकया तया। दृष्ट्वा सोमप्रभं कोऽयमिति स्वैरमपृच्छ्यत॥१२९॥ तयोक्ततद्वृत्ता च ततः सा मकरन्दिका। सोमप्रभेण तेनाभूत् सद्योऽपहृतमानसा॥१३०॥ सोऽपि तां मनसा प्राप्य रुक्मीं रूपवतीमिव। स तु कः सुकृती योऽस्या वरः स्यादित्यचिन्तयत्॥१३१॥ ततः स्वैरं कथासङ्गात् तामाह मकरन्दिकाम्। मनोरथप्रभा चण्डि कस्मान्नोद्वाहमिच्छसि॥१३२॥ तच्छ्रुत्वा साऽप्यवोचत्तां त्वयानङ्गीकृते वरे। कथं विवाहमिच्छेयं त्वं शरीराधिका हि मे॥१३३॥ एवं तया सप्रणयं मकरन्दिकयोदिते। मनोरथप्रभावादीद्वृतो मुग्धे मया वरः॥१३४॥ तत्सङ्गमप्रतीक्षा हि तिष्ठामीत्युदिते तया। करोमि तर्हि त्वद्वाक्यमित्याह मकरन्दिका॥१३५॥ मनोरथप्रभा साधु ज्ञातमित्य जगाद ताम्। सखि सोमप्रभः पृथ्वीं भ्रान्त्वा प्राप्तोऽतिथिस्तव॥१३६॥ तदस्यातिथिसत्कारः कर्त्तव्यः सुन्दरि त्वया। इत्याकर्ण्यैव जगदे मकरन्दिकया तया॥१३७॥ आ शरीरान्मया सर्वमिदमेतस्य साम्प्रतम्। अर्घपात्रीकृतं कामं स्वीकरोतु यदीच्छति॥१३८॥ एवं तयोक्ते तत्प्रीतिं ज्ञात्वाथ स्वपितुः। मनोरथप्रभा चक्रे तयोरुद्वाहमिष्टदम्॥१३९॥ ततः सोमप्रभो लब्धधृतिस्तुष्टो जगाद ताम्। त्वदाश्रममहं यामि साम्प्रतं स्वं जातु न॥१४०॥ हित्वा न पदवीं सैन्यमागच्छेन्मदधिष्ठितम्। मामप्राप्याहिताशङ्कि तच्च गच्छेत् पराङ्मुखम्॥१४१॥ तद्गत्वा सैन्यवृत्तान्तं बुद्ध्वागम्य ततः पुनः। निर्विशङ्कः परिणेष्यामि शुभेऽह्नि मकरन्दिकाम्॥१४२॥

द्वयष्टम लम्बक ७५९

द्वयष्टम लम्बक ७५९ यह सुनकर और 'ऐसा ही होगा' इस प्रकार कहकर देवजय की गोद में बैठे हुए सोमप्रभ और सखी के साथ मनोरथप्रभा मकरन्दिका के घर गई ॥१२८॥ और, मकरन्दिका द्वारा आतिथ्य-सत्कार किये जाने पर एकान्त में सोमप्रभ के सम्बन्ध में 'यह कौन हैं' इस प्रकार पूछी गई मनोरथप्रभा ने जब मकरन्दिका से सोमप्रभ का समाचार कहा तब मकरन्दिका सोमप्रभ पर हृदय से आसक्त हो गई ॥१२९ १३०॥ सोमप्रभ भी मूर्तिमती लक्ष्मी के समान उस मकरन्दिका पर मन से आसक्त होकर सोचने लगा कि 'वह कौन पुण्यात्मा (धन्य) होगा जो इसका पति होगा ॥१३१॥ तदनन्तर, हास्यहास्य वार्ता के प्रसंग में मनोरथप्रभा ने मकरन्दिका से पूछा- 'हे चंडि तू विवाह करना क्यों नहीं चाहती ? ॥१३२॥ यह सुनकर मकरन्दिका मनोरथप्रभा से बोली—'मैं कैसे विवाह करूँ क्योंकि तू मुझे अपने शरीर से भी अधिक प्यारी है। जबतक तू वर को स्वीकार नहीं करती तबतक मैं कैसे विवाह कर लूँ ? ॥१३३॥ मकरन्दिका के प्रेम के साथ ऐसा कहने पर, मनोरथप्रभा उससे बोली-'अरी पगली मैंने तो वर का वरण कर लिया है ॥१३४॥ अब केवल उसके समागम की प्रतीक्षा कर रही हूँ। मनोरथप्रभा के इस प्रकार कहने पर मकरन्दिका ने कहा-'तब ठीक है मैं तेरी बात मानूँगी' ॥१३५॥ तब मनोरथप्रभा मकरन्दिका के मनोभाव को जानकर बोली- 'सखि देखो यह सोम प्रभ सारी पृथ्वी का भ्रमण (विजय) करके तुम्हारे अतिथि के रूप में यहाँ आया है ॥१३६॥ सो हे सुन्दरि, तुझे इसका आतिथ्य-सत्कार करना चाहिए। ऐसा सुनते ही मकरन्दिका ने मनोरथप्रभा से कहा- शरीर से लेकर मेरा सब कुछ इसी का है। मैंने सब कुछ देने के लिए इस अर्थ का पात्र बना दिया है। यदि यह चाहे तो स्वीकार करें ॥१३७-१३८॥ इस प्रकार मकरन्दिका के कहने पर, मनोरथप्रभा ने क्रमशः उसके पिता सिंहविक्रम से सब कहकर उन दोनों के विवाह की बात पक्की कर दी ॥१३९ ॥ तब सोमप्रभ भी धैर्य धारण करके मनोरथप्रभा से प्रसन्नतापूर्वक बोला- मैं अब तुम्हारे आश्रम को जाता हूँ जहाँ पर कदाचित् मुझे ढूँढ़ती हुई मेरी सेना और मन्त्री आ गये होंग वे मुझे वहाँ न पाकर अहित की आशंका से उलटे लौट जावेंगे ॥१४०-१४१॥ इसलिए वहाँ जाकर और सेना का समाचार जानकर तथा उधर से निश्चिन्त होकर मकरन्दिका से विवाह करूँगा' ॥१४२॥