कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
५८४ कथासरित्सागर
५८४ कथासरित्सागर तीर्णाब्धिश्च ततो गत्वा सार्थेन सह स क्रमात्। अटवीं प्रापदेकस्मिन्वासरे दिवसात्यये ॥१२३॥ तस्यामावसिते सार्थे रात्रौ तस्मिंश्च जाग्रति। समुद्रशूरे ऽयपतञ्चौरसेनाऽथ द्रुतया ॥१२४॥ हन्यमाने तथा सार्थे भाण्डांस्त्यक्त्वा पलाय्य सः। समुद्रशूरो ऽथप्रोषमास्कन्दोऽभूदमक्षितः ॥१२५॥ हृताशेषधने याते चौरसैन्ये भयाकुलः। तत्रैव तां तरौ रात्रिं दुःखात्तंश्च निनाय सः ॥१२६॥ प्रातस्तस्य तरोः पृष्ठे गतदृष्टिः स ददर्श । दीपप्रभामिवापश्यत्स्फुरन्तीं पत्रमध्यगाम् ॥१२७॥ विस्मयात्तत्र चारूढो गृध्रनीडमवैक्षत। अन्तस्थभास्वरानर्घ्यरत्नलाभरणसञ्चयम् ॥१२८॥ जग्राह तस्मात्सर्वं तत्तन्मध्ये प्राप कण्ठकम्। तं च यं प्राप्तवान् स्वर्णद्वीपे गृध्रोद्धरञ्च यम् ॥१२९॥ ततः प्राप्तामितधनो ऽथप्रोषादवरुह्य सः। हृष्टो गच्छन् क्रमात् प्राप निजं हर्षपुरं पुरम् ॥१३०॥ तत्र तस्थौ वणिक्सोऽथ वीताम्यद्रविणस्पृहः। समुद्रशूरः स्वजनैः सह नन्दन्यथेच्छया ॥१३१॥ अवधौ तत्पतनं सोऽर्थेनाशस्तत्तरेण ततः। सा कण्ठकस्य च प्राप्तिस्तस्यैवापगमः स च ॥१३२॥ सा निष्कारणनिग्राहदृढावाप्तिः स सत्सखम्। तुष्टात्कटाहेस्वराल्लाभस्तदम्भोस्तरणं पुनः ॥१३३॥ सोऽथ सर्वोपहारश्च पथि चौरैः समागमात्। पश्यन्त तस्य वणिजस्तत्पुष्टाद्धनागमः ॥१३४॥ तदव्यमीदृग् एव विचित्रं चेष्टितं विधेः। सुकृती जानुभूयैव दुःखमप्यश्नुते सुखम् ॥१३५॥ इति गोमुखतः श्रुत्वा श्रद्धाभोत्थाय च व्यधात्। नरवाहनदत्तोऽत्र स्नानादिविधिसत्क्रियाम् ॥१३६॥ १ दैवयोगादित्यर्थः ।
नवम लम्बक ५८५
नवम लम्बक ५८५ उस किनारे पहुँचकर और नाव से उतरकर वैश्य व्यापारियों के झुंड के साथ क्रमशः स्वदेश जाते हुए एक दिन सायंकाल के समय एक भीषण जंगल में जा पहुँचा ॥१२३॥ उस जंगल में झुंड के डेरा डालने पर और समुद्रशूर के जागते रहने पर वहाँ डाकुओं की बलवती सेना ने आक्रमण कर दिया॥१२४॥ उस सेना द्वारा व्यापारियों के मारे जाने पर, वह समुद्रशूर अपना सामान छोड़कर चुपचाप एक बड़े बरगद के वृक्ष पर चढ़कर छिप गया ॥१२५॥ समस्त व्यापारियों का माल लूटकर चले जाने के कारण भय से व्याकुल और दुःख से पीड़ित समुद्रशूर ने वह सारी रात उसी वृक्ष पर बिताई ॥१२६॥ प्रातःकाल वैश्रवण वृक्ष के ऊपरी भाग में दृष्टि डालते हुए समुद्रशूर ने पत्तों के झुरमुट में चमकती हुई दीपक की लौ-सी देखी ॥१२७॥ आश्चर्य चकित वैश्य उसे देखकर, जब ऊपर चढ़ा तब उसने वहाँ चील का घोंसला देखा जिसके भीतर से अमूल्य रत्नों का प्रकाश बाहर छिटक रहा था ॥१२८॥ उस वैश्य ने घोंसले में हाथ डालकर उसे उठा लिया और वही कंठहार उसे वहाँ दीख पड़ा जिसे उसने सुवर्ण-द्वीप में पाया था और जिसे राजसभा से चील झपट ले गया था ॥१२९॥ तब उस अनन्त धन को प्राप्त करके बनिया उस वटवृक्ष से नीचे उतरा और प्रसन्न होकर जाता हुआ क्रमशः अपने हर्षपुर नगर में पहुँच गया। वहाँ जाकर धन कमाने की चाह छोड़कर वैश्य समुद्रशूर, अपने परिवार के पास सानन्दपूर्वक रहने लगा। समुद्र में गिरना, धन का डूबकर नाश हो जाना, गले का हार पाना, मुर्दे पर बैठकर समुद्र पार करना, फिर उसका छिप जाना, निष्कारण मृत्युदंड मिलना, उसी क्षण प्रसन्न द्वीप के राजा से धन की प्राप्ति होना, मार्ग में फिर डाकुओं द्वारा उसका भी अपहरण हो जाना और अन्त में उस वृक्ष में फिर धन (हार) की प्राप्ति होना—आदि देखकर मानता रहता है महाराज कि दैव की गति विचित्र है। किन्तु पुण्यवान् व्यक्ति पहले दुःख का अनुभव करके अन्त में सुख पाता है ॥१३०—१३५॥ गोमुख से यह कथा सुनकर और उस पर विश्वास करके नरवाहनदत्त स्नान आदि नित्यकर्म के लिए सभा से उठ गया ॥१३६॥ ७४
५८६ कथासरित्सागर
[Header] ५८६ कथासरित्सागर
अन्यद्युरेत्य चास्थानगतं तं वात्सवकः। शूरः समरतुङ्गाख्यो राजपुत्रो व्यजिज्ञपत् ॥१३७॥ देव सङ्ग्रामवर्षेण नाशितो गोत्रजेन मे। दशदक्षतुभिर्युक्तेन पुत्रैर्वीरजितादिभिः ॥१३८॥ तदद्य गत्वा पञ्चापि यद्ध्वा तानानयाम्यहम्। प्रभोर्विदितमस्त्वेतदित्युक्त्वा सन्न सोऽगमत् ॥१३९॥ तमल्पसैन्यं तानन्यान् भूरिसैन्यानवेत्य सः। वत्सेश्वरसुतस्तस्य विदेशानुबलं निजम् ॥१४०॥ सोऽगृहीत्वैव तन्मानी गत्वा पञ्चापि तान् रिपून्। स्वबाहुभ्यां रणे जित्वा संयम्यानीतवान्समम् ॥१४१॥ तथा जयिनमायान्तं वीरं सम्भाव्य स प्रभुः। नरवाहनदत्तस्तं प्रशशंस स्वसेवकम् ॥१४२॥ चित्तमाक्रान्तविषयान्सबलानिन्द्रियोपमान् । जित्वानन रिपून् पञ्च पुरुषार्थः प्रसाधितः ॥१४३॥ तच्छ्रुत्वा गोमुखाद्वादीच्छृणुता चम्र तद्विधौ। राज्ञश्चमरबालस्य कथां तच्छृणु वच्मि ताम् ॥१४४॥
राज्ञः चमरबालस्य कथा
हस्तिनापुरमिरथस्ति नगरं तत्र चाभवत्। राजा चामरबालाख्यः कोषदुर्गाब्धिसान्वितः ॥१४५॥ बभूवुस्तस्य समरबलाद्या भूम्यनन्तराः। राजानो गोत्रजास्ते च सम्भूयवमचिन्तयन् ॥१४६॥ अयं चमरबालोऽस्मानेकैकं बाधते सदा। तदेते मिलिताः सर्वे विदध्मोऽस्य पराभवम् ॥१४७॥ इति सम्मन्त्र्य पञ्चत तज्जयाय यियासवः। प्रस्थानलग्नं क्षितिपाः पप्रच्छुर्गणकं रहः ॥१४८॥ अपश्यन् स शुभं लग्नं पश्यंश्चशकुनानि च। जगाद गणको नास्ति लग्नं संवत्सरेऽत्र वः ॥१४९॥ यथा तथा च यातानां न युष्माकं भवेज्जयः। किं चात्र वोऽनुबन्धेन समृद्धिं तस्य पश्यताम् ॥१५०॥
नवम लम्बक ५८७
नवम लम्बक ५८७ दूसरे दिन सभा में बैठे हुए उसके पास उसका बाल-मित्र और शूर राजपूत समरतुंग आकर बोला- महाराज मेरे कुटुम्बी दायाद संग्रामदर्प ने वीरजित आदि चार पुत्रों की सहायता से मेरे देश जीत लिये हैं ॥१३७-१३८॥ तो मैं जाकर उन पाँचों को बाँधकर लाता हूँ आपका यह विदित हो-ऐसा कहकर वह चला गया ॥१३९॥ नरवाहनदत्त ने समरतुंग की सेना को न्यून (कम) और संग्रामदर्प की सेना को अधिक जानकर समरतुंग की सहायता के लिए अपनी सेना भेज दी ॥१४० ॥ वह मानी समरतुंग उस सेना की सहायता लिये बिना ही वहाँ जाकर उन पाँचों शत्रुओं को अपने बाहुबल से जीतकर और एक साथ ही बाँधकर ले आया ॥१४१॥ इस प्रकार आये हुए उस विजयी वीर का सम्मान करके नरवाहनदत्त ने अपने उस सेवक की प्रशंसा की ॥१४२॥ आश्चर्य है कि विषय (देश) का आक्रमण किए हुए पाँच इन्द्रियों के समान इन पाँच शत्रुओं को जीतकर इसने पुरुषार्थ की साधना की है ॥१४३॥ यह सुनकर गोमुख ने कहा-'स्वामिन् यदि तुमने इसी प्रकार की राजा अमरदत्त की कथा न सुनी हो तो कहता हूँ सुनो - ॥१४४॥ राजा अमरदत्त की कथा हस्तिनापुर नाम का एक नगर है। वहाँ कोष (खजाना) दुर्ग (किला) और बल (सेना) से युक्त अमरदत्त नाम का राजा था। उसके साथ ही समरबल आदि उसके पास में उत्पन्न दायादों के राज्य थे। उन लोगों ने एकत्र होकर सोचा- ॥१४५-१४६॥ यह अमरदत्त हम लोगों में से एक-एक को सदा डराता रहता है अतः हम सब मिलकर इसका अपमान करें ॥१४७॥ ऐसी सहमति करके उस पर चढ़ाई करने के लिए उद्यत उन पाँचों राजाओं ने एकान्त में ज्योतिषी से चढ़ाई का मुहूर्त पूछा ॥१४८॥ वे लोग अगूढ़ संशय को दूर करके चढ़ाई करने के शुभ लग्न पूछना चाहते थे। तब ज्योतिषी ने कहा- इस वर्ष भर चढ़ाई का लग्न नहीं है ॥१४९ ॥ यदि किसी प्रकार तुमने चढ़ाई की भी तो उसमें तुम लोगों की विजय न होगी और उस अमरदत्त की मर्यादा न रखकर तुम लोगों का इससे अपहरण क्या है ? ॥१५० ॥
५८८ कथासरित्सागर
५८८ कथासरित्सागर भोगो नाम फलं लक्ष्म्याः स तस्मादधिकोऽस्ति वः। न चेच्छ्रुता श्रूयतां तत्कथात्र वणिजोर्द्वयोः ॥१५१॥ राज्ञो बहुसुवर्णस्य कथा बभूव कौतुकपुरं नामह नगरं पुरा। तस्मिन्नन्वर्थनामाभूद्राजा बहुसुवर्णकः ॥१५२॥ यशोवर्मेति तस्यासीत्सेवकः क्षत्रियो युवा। सस्म दातापि स नृपो नादात्किञ्चित्कदाचन ॥१५३॥ यदा यदा च नृपतिस्तेनार्थ्या याच्यते स्म सः। भावित्य दर्शयन्नव समुवाच तदा तदा ॥१५४॥ अहमिच्छामि तं दातुं किं पुनर्भगवानयम्। तुभ्यं नेच्छति मे दातुं किं करोम्युच्यतामिति ॥१५५॥ तत सोऽवसरं चिन्वन् यावत्तिष्ठति दुःखितः। सूर्योपरागसमयस्तावदत्रागतोऽभवत् ॥१५६॥ तत्कालं स यशोवर्मा गत्वा सततसेवकः। नृपं भूरिमहादानप्रवृत्तं तं व्यजिज्ञपत् ॥१५७॥ यो ददाति न तं तुभ्यं धातुं सैष रविः प्रभो। ग्रस्तोऽद्य वैरिणा यावत्सावत्किञ्चित्प्रयच्छ मे ॥१५८॥ तच्छ्रुत्वा स हसित्वा च दत्तवानो महीपतिः। गवीं वस्त्रं हिरण्यादि तस्मै बहुसुवर्णकम् ॥१५९॥ क्रमात्तस्मिन्धने मुक्ते क्षिप्रं साऽर्द्धवति प्रभो। मृतजानि यशोवर्मा प्रययौ विन्ध्यवासिनीम् ॥१६ ०॥ किं निरर्थेन देहेन जीवतापि मृतेन मे। त्यक्ष्याम्यत पुरा देव्या वरं प्राप्स्यामि चेप्सितम् ॥१६१॥ इत्यग्रे विन्ध्यवासिन्या प्रविश्या दर्भसस्तरे। तन्मनाः स निराहारस्तपा महत्तपायत ॥१६२॥ प्राविशत् च सा स्वप्ने देवी तुष्टास्मि पुत्र ते। वदाम्यर्थंधियं किं ते किं वा भोगश्रियं वद ॥१६३॥ १ मृता जाया यस्यासौ मृतजानिः मृतभार्य इत्यर्थः।
राजा शत्रुसुवर्ण की कथा
नवम स्तबक ५८९ ... काम का ... श्मशान की भूमि ... इस प्रकार यह सब चरित्र सुनकर कहा ॥१५५॥ राजा शत्रुसुवर्ण की कथा श्यामावद नाम नगरका राजा शत्रुसुवर्ण नामका राजा था। उस नगर में दयाल नाम का ब्राह्मणधर्मी नाम का राजा था ॥१५६॥ उस स्त्री नाम का बड़ा सौख्य उसका गन्धर्व था। गजानन के ध्यान पर भी उस राजा का कभी पुत्र नहीं दिया ॥१५७॥ के निदान यह नगर इस प्रकार राज्य करते न रहा था जब एक बार राजा युगल का दिन आया तब उस पर चिन्ता करता कि इस कायायुक्त के कारण पुत्र नहीं प्राप्त हुआ ॥१५८॥ तब दोनों परस्पर कहने लगे कि जब बलि पुत्रादिकों का सुख संसार का सुख नहीं पाता तब दयार्थी कपटपूर्वक सन्तानहीन घर में रहता कि इस कारण दोनों का दैव भली देवे जब इस प्रकार दृढ़ चित्त से चिन्ता दे महर्षि व्यास मुनि दयालु ॥१५९॥ तब राजा एक बार नगरबहार जा कर मुनिराज का दर्शन करने गया और देखा कि मुनि ... ... ... ... ... ... ... ... ...
५९ कथासरित्सागर
५९ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा स यशोवर्मा देवीं तां प्रत्यभाषत। एतयोर्निपुणं वत्से नाहं भेदं धियोरिति ॥१६४॥ सततस्तमवदद्देवी स्वदेशे तर्हि यौ सख। भोगवर्माऽर्थवर्माणौ विद्येते वणिजावुभौ ॥१६५॥ तयोर्गत्वा धियं पश्य ततो यत्सदृशी च ते। रोचिष्यत तत्सदृशी त्वयागत्याभ्यतामिति ॥१६६॥ एतच्छ्रुत्वा प्रबुध्यैव स प्रातः कृतपारणः। स्वंऽशा कौतुकपुरं यशोवर्मा ततो ययौ ॥१६७॥ भोगवर्माऽर्थवर्मणोः वणिजोः कथा तत्रागात् प्रथमं तावत् स गृहानर्थवर्मणः। असङ्ख्यहेमरत्नादिम्यवहाराजितश्रियः ॥१६८॥ पश्यन्तां सम्पदं तस्य यथावृत्तमपाययौ। कृतातिथ्यश्च तेनासौ भोजनाय न्यमन्त्र्यत ॥१६९॥ ततोऽत्राभुङ्क्त मधृतं समांसम्यञ्जनं च सः। प्राघूर्णोचितमाहारं पार्श्वे तस्यार्थवर्मणः ॥१७० ॥ अर्थवर्मा तु भुङ्क्ते स्म घृतार्धपलसंयुतान्। सक्तून् भक्तमपि स्तोकं मांसव्यञ्जनमल्पकम् ॥१७१॥ सार्थवाह किमेतावदश्नासीति सकौतुकम्। स यशोवर्मणा पृष्टो वणिगेवमभाषत ॥१७२॥ अद्य त्वदुपरोधेन समांसव्यञ्जनं मया। भुक्तं स्तोकं घृतस्यार्धपलं भुक्तं च सक्तवः ॥१७३॥ सदा तु घृतकपं च सक्तून्धाश्नामि केवलान्। अतोऽधिकं मे मन्दानलरुदरे नैव जीर्यते ॥१७४॥ तच्छ्रुत्वा स यशोवर्मा विचिकित्सन्निनिन्द ताम्। हृत्स्येन श्रियं तस्य निष्फलामर्थवर्मणः ॥१७५॥ ततो निशागमे भक्तं क्षीरं चानाययत्पुनः। अर्थवर्मा वणिज्सस्य स यशोवर्मणः कृते ॥१७६॥ यशोवर्मा च भूयस्तद्यथाकाममभुङ्क्त सः। अर्थवर्मापि स तदा क्षीरस्यर्धं पलं पपौ ॥१७७॥ तत्रैव चवरस्थाने तावास्तीर्णशयनायुभौ। यशोवर्मार्थवर्माणौ शनैर्निद्रामुपेयतुः ॥१७८॥
नवम लम्बक ५९१
नवम लम्बक ५९१ यह सुनकर यशोधर्मा ने देवी से कहा—'मैं इन दोनों लक्ष्मियों का भेद भली भाँति नहीं जानता' ॥१६४॥ तब देवी ने उससे कहा—'तेरे देश में जो दो बनिये भोगवर्मा और अर्थवर्मा हैं जाकर उनकी लक्ष्मी को देखो और बताओ कि तुम्हें किसके समान लक्ष्मी चाहिए। उसे मेरे पास आकर माँगो' ॥१६५-१६६॥ यह सुनकर और जागकर प्रातःकाल पारण करके यशोधर्मा अपने देश कौतुकपुर को गया ॥१६७॥ अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा पहले वह अर्थवर्मा के घर पर गया जिसने असंख्य सोना और रत्नों का ढेर प्राप्त किया था। उसकी इस सम्पत्ति को देखता हुआ यशोधर्मा उसके पास गया। अर्थवर्मा ने उसका आतिथ्य-सत्कार करके उसे भोजन के लिए निमन्त्रण दिया ॥१६८-१६९॥ तब यशोधर्मा ने अर्थवर्मा के यहाँ भी भात, व्यञ्जन आदिका अतिथिके भोजन के लिए उचित न पाये ॥१७० ॥ अर्थवर्मा ने दो तोला घी में सने हुए सत्तू, थोड़ा-सा भात और अत्यल्प मांस का व्यंजन खाया ॥१७१॥ यह देखकर यशोधर्मा ने अर्थवर्मा से आश्चर्यपूर्वक पूछा—'हे व्यापारी, क्या तुम इतना ही भोजन करते हो'? तब बनिया ने कहा—'आज मैंने तुम्हारे कारण थोड़ा-सा मांस का व्यंजन खा लिया और दो तोला घी भी सत्तू के साथ खा लिया ॥१७२-१७३॥ सदा तो मैं एक कर्ष-मात्र घी सत्तू के साथ खाया करता हूँ। इससे अधिक मुझ मन्द निवाले को पचता नहीं ॥१७४॥ यह सुनकर अर्थवर्मा से सम्बद्ध करता हुआ उसकी निन्दा की और उसकी लक्ष्मी को व्यर्थ समझा ॥१७५॥ तदनन्तर, रात्रि के समय अर्थवर्मा ने यशोधर्मा के लिए दूध और भात मँगवाया। यशोधर्मा ने डटकर भोजन किया किन्तु अर्थवर्मा ने तब छटाँक भर दूध पिया ॥१७६-१७७॥ भोजन के पश्चात् वे दोनों (अर्थवर्मा और यशोधर्मा) बिस्तर बिछाकर पास ही पास सो गये ॥१७८॥
५९२ कथासरित्सागर
५९२ कथासरित्सागर निशीथे च यशोवर्मा स्वप्नेऽपश्यदशङ्कितम्। प्रविष्टानत्र पुरुषान् दण्डहस्तान् भयङ्करान्॥१७९॥ धिगल्पाम्यधिकः कर्षो घृतस्य किमिति त्वया। मांसौदनश्च भुक्तोऽद्य पीतं च पयसः पलम्॥१८०॥ इति क्रोधाद् ब्रुवाणैस्तैराकृष्यैवाथ पात्यतः। पृष्ठपैरर्थवर्मा स सगूढे पर्यताड्यत॥१८१॥ घृतकर्षपयोमांसभक्तमम्यधिकं च यत्। भुक्तं तत्सर्वमुद्दरादाजकर्षुश्च तस्य ते॥१८२॥ तद्दृष्ट्वा स यशोवर्मा प्रबुद्धो यावदीक्षते। तावत्तस्याययौ शूलं विद्युत्स्पर्धमयोमयम्॥१८३॥ तत्र क्रन्दन् परिजनैर्मर्द्यमानोदरश्च सः। वमति स्मार्थवर्मा तदधिकं यत्स भुक्तवान्॥१८४॥ शान्तशूले ततस्तस्मिन्यशोवर्मा व्यचिन्तयत्। धिग्धिगर्थधियमिमां यस्या भोगोऽप्यमीदृशः॥१८५॥ भस्त्रीकृतयमीदृश्या भूमादमवनिःधियः। इत्यन्तश्चिन्तयन्सोऽत्र रात्रिं तामत्यवाहयत्॥१८६॥ प्रातस्तमर्थवर्माणमामन्त्र्य स ययौ ततः। यशोवर्मा गृहं तस्य वणिजो भोगवर्मणः॥१८७॥ सत्राभ्यागादधावत्स तेनापि च कृतादरः। निमन्त्रितोऽभूद्वणिजा सवहुर्भोजनाय सः॥१८८॥ न चास्य वणिजोऽपश्यत् स कञ्चिद्धनसञ्चयम्। अपश्यत्तु शुभं वेश्म वासांस्याभरणानि च॥१८९॥ ततः स्थिते यशोवर्म्मण्यस्मिन्प्रावर्त्ततात्र सः। भोगवर्मा वणिक्कर्त्तुं व्यवहारं निजोचितम्॥१९०॥ अमस्माद् भाण्डमादाय दशवन्धस्य तत्क्षणम्। विनेय स्वधनं मध्याहीनानुबपाणयत्॥१९१॥ त्वरितं तान् च दीनारान्भृत्यहस्तं विसृष्टवान्। स्वभार्याय विचित्रात्नपानसम्पादनाय च॥१९२॥
नवम लम्बक ५९३
नवम लम्बक ५९३ तब यशोवर्मा ने स्वप्न में देखा कि हाथों में डंडे लिए हुए कुछ भयंकर पुरुष बिना भय और शंका के वहाँ घुस आये ॥१७९॥ 'तूने आज एक तोला घी अधिक क्यों खाया मांस-रस के साथ भात अधिक क्यों खाया और दूध भी एक कटोरा अधिक क्यों पिया ?' क्रोध से ऐसा कहते हुए उन पुरुषों ने अर्थवर्मा को डंडों से खूब पीटा ॥१८०-१८१॥ और, उसने जो मांसरस भात और दूध अधिक खा लिया था उसे उन्होंने उसके पेट से निकाल लिया ॥१८२॥ स्वप्न में यह देखकर जगे हुए यशोवर्मा ने देखा कि अर्थवर्मा पेट के शूल से व्याकुल है ॥१८३॥ वेदना से चिल्लाता हुआ और सेवकों द्वारा पेट दबाया जाता हुआ अर्थवर्मा अपने अधिक खाये हुए को वमन करने लगा। उसका शूल शान्त होने पर, यशोवर्मा सोचने लगा कि इस अर्थलक्ष्मी को धिक्कार है जिसका इस प्रकार का भोग है ॥१८४-१८५॥ यदि वैश्य लक्ष्मी से ऐसे तंग किया जाता है, तो ऐसी लक्ष्मी से दरिद्र रहना ही अच्छा है, मन में इस प्रकार सोचते हुए उसने वह रात्रि व्यतीत की ॥१८६॥ प्रातःकाल यशोवर्मा अर्थवर्मा से मिलकर वहाँ से भोगवर्मा के घर पर गया ॥१८७॥ वहाँ भी भोगवर्मा द्वारा समुचित सत्कार किया गया यशोवर्मा भोगवर्मा से भोजन के लिए निमन्त्रित हुआ ॥१८८॥ उसने उस वैश्य के यहाँ किसी प्रकार की सम्पत्ति का आडम्बर नहीं देखा। केवल सुन्दर स्वच्छ भवन अच्छे वस्त्र और आभूषण मात्र देखे ॥१८९॥ तदनन्तर, यशोवर्मा की उपस्थिति में ही भोगवर्मा ने अपना दैनिक व्यापार¹ प्रारम्भ किया ॥१९०॥ एक से माल खरीदकर उसी समय उसने दूसरे को बेचिया और अपना धन बिना लगाये ही बीच में (दलाली से) दीनार कमा लिया ॥१९१॥ और, शीघ्र ही उन स्वर्ण-मुद्राओं को नौकर के हाथ अपनी स्त्री के पास भेजकर अच्छा भोजन बनाने के लिए निर्देश दिया ॥१९२॥ १ आढ़त का काम। ७५
५९४ कथासरित्सागर
५९४ कथासरित्सागर क्षणान्न्र सुहृदेकस्तमिच्छामरणनामकः । उपागत्यैव रभसाद् भोगवर्माणमभ्यधात् ॥१९३॥ मित्र भोजनमस्माकमुत्तिष्ठागच्छ भुञ्ज्महे । सुहृदो मिलिता ह्यन्ये त्वत्प्रतीक्षा स्थिता इति ॥१९४॥ अद्याहं नांगमिष्यामि प्राघुणोऽद्य स्थितो हि मे । इति ब्रुवाणं पुनरप्येनं स सुहृदब्रवीत् ॥१९५॥ भवता सममायातु तर्हि प्राघुणिकोऽप्ययम् । एषोऽपि न किमस्माकं मित्रमुत्तिष्ठ सत्वरम् ॥१९६॥ इत्याग्रहाद् भोगवर्मा नीतो मित्रेण तेन सः । यशोवर्मयुतो गत्वा भुङ्क्ते स्माहारमुत्समम् ॥१९७॥ पीत्वा च पानमागत्य सायं स स्वगृहे पुनः । सयशोवर्मको भेजे विचित्रं पानभोजनम् ॥१९८॥ प्राप्तायां निशि पप्रच्छ निजं परिजनं च सः । किमद्य रात्रिपर्याप्तमस्ति न सरकं न वा ॥१९९॥ स्वामिन्नास्तीति तेनोक्तं स भेजे शयनं वणिक् । पास्यामोऽपररात्रेश्च कथं जलमिति ब्रुवन् ॥२००॥ यशोवर्माथ तत्पार्श्वे सुप्तः स्वप्नेऽथ दृष्टवान् । प्रविष्टान् पुरुषान् क्षिप्रानन्यांस्तर्षा च पृच्छतः ॥२०१॥ कस्मादपररात्रार्थं सरकं भोगवर्मणः । चिन्तितं नाद्य युष्माभिः श्वभ्रभाङ्ग् स्थितः शठाः ॥२०२॥ इति पश्चात्प्रविष्टास्ते पुरुषा दण्डपाणयः । पूर्वप्रविष्टान् क्रोधात्तान् दण्डाघातैरताडयन् ॥२०३॥ अपराधोऽयमेको नः क्षम्यतामिति वादिनः । दण्डाहतास्ते पुरुषास्ते चाम्ये निरगुंस्ततः ॥२०४॥ यशोवर्माथ तद्द्दृष्ट्वा प्रबुद्ध्य समचिन्तयत् । अचिन्त्योपमतिः क्ष्माप्या भोगश्रीर्भोगवर्मणः ॥२०५॥ भोगहीना समुद्धापि नार्थ्यधीर्यशोवर्मणः । इति चिन्तयतस्तस्य सातिचक्रम यामिनी ॥२०६॥ प्रातश्च स यशोवर्मा तमामन्त्र्य वणिग्वरम् । जगाम विन्ध्यवासिन्याः पादमूलं पुनस्ततः ॥२०७॥
नवम लम्बक ५९५
नवम लम्बक ५९५ इतने में ही भोगवर्मा का डण्डामरण नाम का एक मित्र आकर शीघ्रता से उससे बोला— हृद्यान्न भोजन तैयार है उठो आओ। घर में और भी अनेक मित्र तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठे हैं ।।१९२-१९४।। 'मैं आज नहीं आऊँगा क्योंकि मेरा यह मित्र पाहुना बैठा है। ऐसा कहते हुए भोगवर्मा से उसके मित्र ने कहा—‘तुम्हारे साथ तुम्हारा पाहुना भी आवे। क्या यह हमारा मित्र नहीं है ? अतः शीघ्र उठो ।।१९५ १९६।। वह मित्र इस प्रकार भोगवर्मा को आग्रह के साथ ले गया और उसने यशोवर्मा के साथ जाकर उत्तम भोजन किया ।।१९७।। तदनन्तर, उधर से ताम्बूल आदि पान करके सायंकाल भोगवर्मा अपने घर आया। घर आकर यशोवर्मा के साथ सायंकालीन भोजन किया ।।१९८।। रात होने पर उसने अपने सेवकों से पूछा कि 'आज रात्रि के लिए पूरा जल है या नहीं। 'हाँ प्रभु है'—सेवकों के इस प्रकार कहने पर वह वैश्य भोगवर्मा चारपाई पर यह कहते हुए सो गया कि देख आज पिछली रात में कैसा पानी मिलता है' ।।१९९-२००।। उसी के समीप सोये हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में देखा कि दो-तीन पुरुष शयनागार में प्रविष्ट हुए और उन के पीछे 'हे दुष्टो आज तुम लोगों ने भोगवर्मा के लिए पिछली रात में पीने के जल का ध्यान क्यों नहीं रखा' इस प्रकार कहते हुए बहुत से दंडधारी पुरुष घुसे और उन्होंने क्रोध करके डंडों से उन सेवकों को मारा ।।२०१—२०३।। 'यह हमारा पहला अपराध है क्षमा करो'—ऐसा कहते हुए उन सेवकों को छोड़कर वे चले गये ।।२०४।। तदनन्तर, यह देखकर और जागकर यशोवर्मा ने सोचा कि बिना चिन्ता किये ही आनेवाली भोगवर्मा की भोगश्री प्रशंसनीय है ।।२०५।। अर्थ से पूर्ण होने पर भी भोग-रहित कर्मवर्मा की अर्थलक्ष्मी ठीक नहीं ऐसा सोचते-सोचते उसकी वह रात्रि व्यतीत हो गई ।।२०६।। प्रातःकाल ही यशोवर्मा वैश्य भोगवर्मा से आज्ञा लेकर वहाँ से फिर विन्ध्यवासिनी के चरणों में गया ।।२०७।।
५९६ कथासरित्सागर
५९६ कथासरित्सागर
तपस्य स्वप्नदृष्टायास्तस्याः पूर्वोक्तयोर्द्वयोः। विभोर्भोगाधियं तत्र वव्रे सास्मै ददौ च ताम् ॥२०८॥ अथागत्य यशोवर्मा गृहं देवीप्रसादतः । अचिन्तितोपगामिन्या तस्थौ भोगधिया सुखम् ॥२०९॥ तदेव भोगसम्पन्ना धीरप्यल्पतरा वरम्। न पुनर्भोगरहिता सुविस्तीर्णाप्यपार्थका ॥२१०॥ तत्किं समरखारस्य राज्ञः कार्पण्यसम्भवा। तप्यध्वे दानभोगाभ्यां वीक्ष्य स्वां श्रियं न किम् ॥२११॥ अतस्तं प्रति युष्माकमवस्कन्दो न भद्रकः । यात्राछन्नश्च नास्त्येव नापि वा दृश्यते जयः ॥२१२॥ इत्युक्ता अपि ते तेन पृच्छ ज्योतिर्विदा नृपाः । ययुस्समरखारुं तं नृपं प्रत्यसहिष्णवः ॥२१३॥ सीमाप्राप्तांश्च तान् बुद्ध्वा निर्यास्यन्समराय सः। राजा समरखारुः प्राक्स्नात्वा हरमपूजयत् ॥२१४॥ अष्टषष्ट्युत्तमस्थाननियतर्नामभिः शुभैः । यथावत्त च तुष्टाव पापघ्नैः सर्वकामदैः ॥२१५॥ राजन्युध्यस्व निश्शङ्कु शत्रूञ्जेष्यसि सङ्करे । इत्युद्गतां च गगनात्सोऽथ शुश्राव भारतीम् ॥२१६॥ ततः प्रहृष्टः सन्नह्य तेषां निजबलान्वितः । राजा समरखालोऽग्रे युद्धाय निरगाद्विषाम् ॥२१७॥ त्रिंशद् गजसहस्राणि त्रीणि लक्षाणि वाजिनाम् । कोटिः पादातटानां च तस्यासीद्वैरिणो बले ॥२१८॥ स्वबले च पदातीनां तस्य लक्षाणि विंशतिः । दश दन्तिसहस्राणि हयानां लक्षमप्यभूत् ॥२१९॥ प्रवृत्तं तु महायुद्धं तयोरुभयसेनयोः । यथार्थनाम्नि वीराख्ये प्रतीहारश्रियामयिनि ॥२२०॥ स्वयं समरवालोऽसौ राजा वहन्मराङ्गजम् ॥ महावगाहो भगवा महानद्यमिवाविशत् ॥२२१॥ मग्नः क्षात्र्यर्मन्मार्गेऽपि परसैन्यं महत्क्षणात् । यघाश्वगजपत्तीनां हयानां राजन्नोऽभवत् ॥२२२॥
नवम लम्बक ५९७
[header] नवम लम्बक ५९७ [/header] वहाँ तपस्या में बैठे हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में आई हुई विन्ध्यवासिनी से भोग-श्री की प्राप्ति के लिए वर माँगा और उसने वही दिया ॥२८८॥ तदनन्तर, यशोवर्मा देवी की कृपा से घर में जाकर बिना मोक्ष ही प्राप्त होनेवाली भोग-श्री से सुखपूर्वक रहने लगा ॥२८९॥ इस प्रकार, भोग से सम्पन्न थोड़ी भी श्री अच्छी है और भोगरहित अनन्त ऋद्धि भी व्यर्थ है ॥२९०॥ इसलिए, तुम लोग राजा समरबल की कृपणता से युक्त लक्ष्मी से क्यों ईर्ष्या करते हो? दान और भोग में लगती हुई अपनी सम्पत्ति को ही क्यों नहीं देखते? ॥२९१॥ इसलिए, उसके प्रति तुम्हारा आक्रमण ठीक नहीं। यात्रा का लग्न भी ठीक नहीं है और तुम्हारी विजय भी नहीं दीखती ॥२९२॥ उस ज्योतिषी से इस प्रकार कहे जाने पर भी वे पाँचों ईर्ष्यालु राजाओं ने नहीं माना और उन्होंने समरबल पर चढ़ाई कर दी ॥२९३॥ शत्रुओं को सीमा पर गये हुए जानकर युद्ध के लिए निकलते हुए समरबल ने स्नान करके शिव की पूजा की ॥२९४॥ अनन्तर उसने स्वाता के प्रसिद्ध मार्ग से उसने विधिपूर्वक पापहरूप करनेवाले शिव की स्तुति की ॥२९५॥ तब उसने 'हे राजन् बिना शंका के जाकर युद्ध करो शत्रुओं पर अवश्य विजयी होगे'— 'इस प्रकार आकाशवाणी सुनी ॥२९६॥ तब प्रसन्न होकर और अपनी सेना का साथ लेकर राजा समरबल उन शत्रुओं के साथ भिड़ा ॥२९७॥ उसके शत्रुओं की सेना में तीन हजार हाथी तीन लाख घोड़े और एक करोड़ पैदल सैनिक थे ॥२९८॥ उसकी अपनी सेना में बीस लाख पैदल सैनिक दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े थे ॥२९९॥ दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध प्रारम्भ होने पर राजा का वीर नाम का अंगरक्षक आगे बढ़ा। तदनन्तर राजा समरबल भी समुद्र में महावराह के समान स्वयं भी उस सेना में धँस पड़ा ॥३००-३०१॥ थोड़ी सेनावाला होने पर भी समरबल ने शत्रुओं की सेना का खूब संहार किया जिससे हाथियों, घोड़ों और सैनिकों की लाशों के ढेर लग गये ॥३०२॥
५१८ कथासरित्सागर
५१८ कथासरित्सागर
धावित्वा चात्र समरबलं तं सम्मुखागतम्। आहत्य शक्त्या राजानं पाशेनाकृष्य बद्धवान्॥२२३॥ ततं समरशूरं च भुवि बाणाहतं नृपम्। द्वितीयं तद्वदाकृष्य पाशेनैव बबन्ध सः॥२२४॥ तृतीयं चात्र समरक्षितं नाम महीपतिम्। वीराख्यस्तत्प्रतीहारो बद्ध्वा तत्पार्श्वमानयत्॥२२५॥ सेनापतिर्देवबलस्तस्यान्यं समर्पयत्। नृपं प्रतापचन्द्राख्यं चतुर्थ सायकाहतम्॥२२६॥ ततः प्रतापसेनाख्यस्तद्दृष्ट्वा पञ्चमो नृपः। क्रोधाच्चमरवालं तं भूपमभ्यपतद्रणे॥२२७॥ स तु निर्धूय तद् बाणान् स्वशरीरेण विद्धवान्। राजा चमरवालस्तं ललाटे त्रिभिराशुगैः॥२२८॥ कण्ठक्षिप्तन पाशेन तं च काल इवाथ सः। आकृष्य स्ववशे चक्रे शराघातविमूर्च्छितम्॥२२९॥ एवं राजसु बद्धेषु तेषु पञ्चस्वपि क्रमात्। हतशेषाणि सैन्यानि दिक्ष्वस्तेषां प्रदुद्रुवुः॥२३०॥ अमितं हेमरत्नादि बहून्यन्तःपुराणि च। राज्ञा चमरबालेन प्राप्तान्येषां महीभुजाम्॥२३१॥ तन्मध्ये च महादेवी यशोल्लेखेति विश्रुता। राज्ञः प्रतापसेनस्य प्राप्ता तेनाङ्गनोत्तमा॥२३२॥ ततः प्रविश्य नगरं वीरब्देवबलौ च सः। क्षत्त्रसेनापती पट्टं बद्ध्वा रत्नैर्पूरयत्॥२३३॥ प्रतापसेनमहिषीं दाशभ्रमजितेति ताम्। यशोल्लेखां स भूपतिः स्वावरोधवधूं व्यधात्॥२३४॥ भुजार्जिताहमस्येति मोहे मां न्यपत्तापि यम्। काममोहप्रवृत्तानां शबला धर्मबासना॥२३५॥ दिनेश्चाभ्यर्थितो राज्ञ्या स यशोलेखया तया। राजा चमरवालस्तान् बद्धान् पञ्चापि भूपतीन्॥२३६॥ प्रतापसेनप्रभृतीन्गृहीतविनयादृतान् । मुमोच निजराज्येषु सस्कृत्य विससर्ज च॥२३७॥
नवम लम्बक ५९९
नवम लम्बक ५९९ तब राजा ने आगे दौड़कर सामने आये हुए समरबल को शक्ति से आहत करके पाश से खींचकर बाँध लिया ॥२२३॥ उसी प्रकार दूसरे समरशूर राजा के हृदय को बाण से बींधकर वैसे ही बाँध लिया ॥२२४॥ तीसरे राजा समरजित को उसके अंगरक्षक वीर ने बाँधकर उसके पास लाकर सौंप दिया ॥२२५॥ समरबाल के सेनापति देवबल ने इसी प्रकार बाणों से आहत चौथे राजा प्रतापचन्द्र को बाँधकर अपने राजा को भेंट कर दिया ॥२२६॥ यह देखकर प्रतापसेन नाम का पाँचवाँ राजा क्रोध से भरकर रणभूमि में समरबाल से भिड़ गया ॥२२७॥ समरबाल ने उसके बाणों को काटकर तीन बाणों से उसके ललाट का भेदन कर दिया ॥२२८॥ और फिर, गले में डाले हुए पाश से काल के समान समरबाल ने उसे खींचकर अपने वश में कर लिया ॥२२९॥ इस प्रकार, क्रम से उन पाँचों राजाओं के बँध जाने पर मरण से बची हुई उसकी सेना इधर-उधर भाग गई ॥ २३० ॥ तदनन्तर, इन राजाओं के अनन्त धन, रत्न और सोना के अतिरिक्त बहुत-सी रानियाँ समरबाल को मिलीं। उन सब रानियों में राजा प्रतापसेन की महारानी यशोधेखा सबसे बड़ी और सुन्दरी थी ॥२३१-२३२॥ तदनन्तर, अंगरक्षक वीर, सेनापति देवबल और राजा समरबाल विजय करके अपने नगर में पहुँचे। वहाँ जाकर राजा ने अपने सेनापति और अंगरक्षक को पट्ट बाँध करके उन्हें रत्नों से भर दिया ॥२३३॥ राजा समरबाल ने प्रतापसेन की महारानी यशोधेखा को क्षात्र धर्म से जीत लेने के कारण अपने अन्तःपुर की एक रानी बना लिया ॥२३४॥ 'मैं इसके बाहुबल से जीती गई हूँ'—ऐसा समझकर वह रानी यशोधेखा चंचल होकर भी राजा समरबाल के पास स्थिर हो गई। काम और मोह से प्रवृत्त स्त्रियों की सर्व भावना विचित्र होती है ॥२३५॥ कुछ दिनों के बाद रानी यशोलेखा की प्रार्थना पर समरबाल ने प्रतापसेन आदि विनय से विनम्र उन पाँचों राजाओं को छोड़ दिया और उनका सत्कार करके उन्हें अपने-अपने राज्य में भेज दिया ॥२३६-२३७॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर ततः स तदकण्टक विजितशत्रु राज्यं निजं समृद्धमशिषच्चिरं समरवालपृथ्वीपतिः। अरंस्त च वराप्सरोम्यधिकरूपलावण्यया द्विपञ्जयपताकया सह समा यशोलेख्या ॥२३८॥ एवं बहूनपि रिपून् रभसप्रवृत्तान्द्राक्कुलानगणितस्वपरस्वरूपान्। एकोऽप्यनन्तमपौरुषभग्नसारदर्पम्वराञ्जयति सयुगमूर्ध्नि वीरः ॥२३९॥ इति गोमुखेन कथितामथ्यां श्रुत्वा कथां कृतश्लाघः। अकरोदथ नरवाहनदत्तः स्नानादि दिनकार्यम् ॥२४०॥ निनाय सङ्गीतरसाञ्च तां तथा निशां स गायन्स्वयमङ्गनासखः। सरस्वती तस्य नभःस्थिता यथा ददौ प्रियाभिश्चिरसंस्तवं वरम् ॥२४१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीकम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।
पञ्चमस्तरङ्गः मरुभूति कथा
ततोऽन्येद्युरलङ्कारवतीवासगृहे स्थितम्। नरवाहनदत्तं तं सन्निधौ सर्वमन्त्रिणाम् ॥१॥ एत्य विज्ञापयामास मरुभूतिस्तसेवकः। सोऽयं सौबिदलस्य सदन्तःपुररक्षिणः ॥२॥ मरुभूतेर्मया देव ! सेवा वर्षद्वयं कृता। भोजनाच्छादनं दत्तं समायेस्यामुना मम ॥३॥ भाषापितास्तु तत्पृष्ठे दीनाराः प्रतिवत्सरम्। पञ्चाशद्य ममानेन तानेष न ददाति मे ॥४॥ मुच्यमाणं चतन्नरत्वमाहूमाहूतं। तनोऽविष्टः प्रायद्धू सिंहद्वारेऽस्य तावकः ॥५॥ विचार्यति यत्रात्र देवो मे तत्करोम्यहम्। अग्निप्रवेशमधिकं विकल्प्यप हि मे प्रभुः ॥६॥
नवम लम्बक ६१
नवम लम्बक ६१ तदनन्तर शत्रुओं पर विजयी हुए राजा समरबल अपनी उस कंटक-रहित और समृद्धि- सम्पन्न राज्य का चिरकाल तक शासन करता रहा और अप्सराओं से भी अधिक रूप-लावण्यवाली विजय-पताका के समान यशोलेखा के साथ आनन्द भी उठाया ॥२३८॥ इस प्रकार, आवेग से प्रवृत्त द्वेष से व्याकुल और अपने-पराये स्वरूप को न जाननेवालों और असाधारण पुरुषार्थ के आगे चूर-चूर घमंडवालों को नीचक और पुंश्चल जीत लेता है ॥२३९॥ इस प्रकार गोमुख से कही गई यथार्थता से भरी कथा को सुनकर उसकी प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त अपने स्नान आदि दैनिक कृत्यों में लग गया ॥२४०॥ नरवाहनदत्त ने अपनी सभी पत्नियों के साथ संगीत-रस का पान करते हुए उस रात को भी बिताया। आकाश में गूँजती हुई उनकी स्वर-सरस्वती 'चिरजीवी हों' मानों ऐसा आशीर्वाद देती थी ॥२४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का चौथा तरंग समाप्त पञ्चम तरंग मरुभूति की कथा किसी एक दिन अलंकारवती के निवास-भवन में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास सभी मन्त्रियों की उपस्थिति में आकर मरुभूति के सेवक ने निवेदन किया। वह सेवक राजा के रनिवास के रक्षक कंचुकी का सहोदर भाई था ॥१-२॥ उसने कहा- महाराज मैंने दो वर्षों तक मरुभूति की सेवा की और इसने उन दो वर्षों तक तात्त्विक मुझे भोजन-वस्त्र दिया ॥३॥ इसने कहा था कि प्रतिवर्ष तुम पचास दीनार (सोने की मुहरें) दिया करूँगा किन्तु इसने वे मुझे नहीं दिये ॥४॥ मेरे माँगने पर इसने मुझे पैरों से ठोकर मारी इसलिए मैं आपके सिंहद्वार पर अनशन करने के लिए बैठा हूँ। यदि आप मेरा विचार न करेंगे तो मैं अग्नि प्रवेश करूँगा क्योंकि यह मेरा स्वामी है ॥५-६॥ ७६
६२ कथासरित्सागर
६२ कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा विरतं तस्मिन् मरुभूतिरभाषत । देया ममास्मै दीनाराः साम्प्रतं तु न सन्ति मे ॥७॥ इत्युक्तवन्तं सर्वेषु प्रहसत्सु स्वमन्त्रिणम् । नरवाहनदत्तस्तं मरुभूतिमभाषत ॥८॥ किमेवं मूर्खमाधत्से नाधिकेयं मतिस्तव । उत्तिष्ठ दीनारशतं दद्यास्मा अविशङ्कितम् ॥९॥ एतत्प्रभोर्वचः श्रुत्वा मरुभूतिर्विलज्जितः । तदैवानीय दत्तस्मै स दीनारशतं ददौ ॥१०॥ ततोऽत्र गोमुखोऽवादीन्न वाच्या मरुभूतिवत् । विचित्रचित्तवृत्तिर्यत् सर्गो देव प्रजापतेः ॥११॥ युष्माभिरेषा किञ्चात्र चिरदातुर्महीपतेः । तत्सेवकस्य च कथा प्रसङ्गाख्यस्य न श्रुता ॥१२॥
चिरदातुर्नृपस्य तद्भृत्यस्य प्रसङ्गाख्यस्य च कथा
चिरदातेत्यभूत् पूर्वं राजा चिरपुरेश्वरः । सुजनस्यापि तस्यासीत् परिवारोऽतिदुर्जनः ॥१३॥ देशान्तरागतस्तस्य प्रसङ्गो नाम भूपतेः । मित्राभ्यां सहितो द्वाभ्यां बभूव किल सेवकः ॥१४॥ सेवां च कुर्वतस्तस्य व्यतीतं वर्षपञ्चकम् । न स राजा ददौ किञ्चिन्निमित्तेऽप्युत्सवादिके ॥१५॥ स च तस्य न सम्प्राप विज्ञप्त्यवसरं प्रभोः । परिवारस्य दौरात्म्यात् सख्योः प्रेरयतोः सदा ॥१६॥ एकदा तस्य राज्ञश्च बालः पुत्रो व्यपद्यत । दुःखितं यस्य सर्वेऽपि भृत्यास्तं पर्यवारयन् ॥१७॥ तन्मध्यं च प्रसङ्गाख्यः शोकादेव स सेवकः । शस्त्रिभ्यां वार्यमाणोऽपि राजानं तं व्यजिज्ञपत् ॥१८॥ बहुकालं वय देव सेवका न च नस्त्वया । दत्तं किञ्चित्तथापीह स्थिता स्मस्त्वत्सुताशया ॥१९॥ त्वया यदि न दत्तं तत्स्वपुत्रोऽस्मासु दास्यति । सोऽपि दैवेन नीतश्चेत् तन्न किञ्चिदिह साम्प्रतम् ॥२०॥
नवम लम्बक ६३
नवम लम्बक ६३ इतना कहकर उसके चुप हो जाने पर मरुभूति ने कहा—'महाराज मुझे इसे दीनार देने हैं, किन्तु इस समय मेरे पास नहीं हैं। मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और अन्य सभी मन्त्रियों के हँसने पर नरवाहनदत्त ने मरुभूति से कहा—'यह क्या तुम्हारी मूर्खता है? तुम्हारी ऐसी बुद्धि अच्छी नहीं है। जाओ इसे तुरन्त दीनार दो' ॥७-९॥ स्वामी की यह बात सुनकर मरुभूति लज्जित हुआ और उसने उसी समय लाकर सौ दीनार उसे दिये ॥१०॥ तब गोमुख ने कहा— इस सम्बन्ध में मरुभूति निन्दनीय नहीं हो सकता क्योंकि यह ब्रह्मा की सृष्टि ही विचित्र चित्तवृत्तियों की है ॥११॥ आप लोगों ने विलम्ब से वेतन देनेवाले राजा और उसके सेवक के प्रसंग की कथा नहीं सुनी? ॥१२॥ राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नामक भृत्य की कथा पूर्वकाल में चिरपुर नगर का राजा विलम्ब से वेतन देनेवाला था। उसके स्वयं सज्जन होने पर भी उसका परिवार अत्यन्त दुष्ट था ॥१३॥ किसी दूसरे देश से आकर प्रसंग नाम का सेवक अपने दो मित्रों के साथ उस राजा के यहाँ आकर सेवा करने लगा ॥१४॥ सेवा करते हुए उसके पाँच वर्ष व्यतीत हो गये किन्तु राजा ने उत्सव त्यौहार आदि के समय भी उसे कुछ नहीं दिया। उस सेवक का दोनों साथियों के प्रेरित करने पर भी अन्य अधिकारियों की दुष्टता के कारण अपने स्वामी से निवेदन करने का अवसर नहीं मिला ॥१५-१६॥ एकबार उस राजा का छोटा-सा पुत्र मर गया। उस समय दुःखित राजा का सभी नौकरों ने आकर घेर लिया ॥१७॥ उसी समय वह प्रसंग नामक सेवक साथियों के रोक जाने पर भी शोक के आवेश में राजा से बोला—॥१८॥ 'स्वामिन् ! हमलोग बहुत समय से सेवक हैं किन्तु आपने कभी हम कुछ नहीं दिया। फिर भी हमलोग आपके इस पुत्र की आशा से आश्वासित रहते थे कि यदि आपने हम कभी कुछ नहीं दिया तो यह हम लोगों को देगा पर उसे भी इस दैव ने ले लिया तब यहाँ अब हमारा क्या रह गया ? ॥१९-२०॥