महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२३८-
अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना
वैशम्पायन उवाच
कर्णस्य वचनं श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्ततः ।
हृष्टो भूत्वा पुनर्दीन इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर राजा दुर्योधनको पहले तो बड़ी प्रसन्नता हुई; फिर वह दीन होकर इस प्रकार बोला— ॥ १ ॥
ब्रवीषि यदिदं कर्ण सर्वं मनसि मे स्थितम् ।
न त्वभ्यनुज्ञां लप्स्यामि गमने यत्र पाण्डवाः ॥ २ ॥
‘कर्ण! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह सब मेरे मनमें भी है। परंतु जहाँ पाण्डव रहते हैं, वहाँ जानेके लिये मैं पिताजीकी आज्ञा नहीं पा सकूँगा ॥ २ ॥
परिदेवति तान् वीरान् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
मन्यतेऽभ्यधिकांश्चापि तपयोगेन पाण्डवान् ॥ ३ ॥
‘महाराज धृतराष्ट्र उन वीर पाण्डवोंके लिये सदा विलाप करते रहते हैं। वे तपःशक्तिके संयोगसे पाण्डवोंको हमसे अधिक बलशाली भी मानते हैं ॥ ३ ॥
अथवाप्यनुबुध्येत नृपोऽस्माकं चिकीर्षितम् ।
एवमप्यायतिं रक्षन् नाभ्यनुज्ञातुमर्हति ॥ ४ ॥
‘अथवा यदि उन्हें इस बातका पता लग जाय कि हमलोग वहाँ जाकर क्या करना चाहते हैं, तब वे भावी संकटसे हमारी रक्षाके लिये ही हमें वहाँ जानेकी अनुमति नहीं देंगे ॥ ४ ॥
न हि द्वैतवने किंचिद् विद्यतेऽन्यत् प्रयोजनम् ।
उत्सादनमृते तेषां वनस्थानां महाद्युते ॥ ५ ॥
‘महातेजस्वी कर्ण! (पिताजीको यह समझते देर नहीं लगेगी कि) वनमें रहनेवाले पाण्डवोंको उखाड़ फेंकनेके अतिरिक्त हमलोगोंके द्वैतवनमें जानेका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ ५ ॥
जानासि हि यथा क्षत्ता द्यूतकाल उपस्थिते ।
अब्रवीद् यच्च मां त्वां च सौबलं वचनं तदा ॥ ६ ॥
‘जुएका अवसर उपस्थित होनेपर विदुरजीने मुझसे, तुमसे तथा (मामा) शकुनिसे जैसी बातें कही थीं, उन्हें तो तुम जानते ही हो ।। ६ ।। तानि सर्वाणि वाक्यानि यच्चान्यत् परिदेवितम् । विचिन्त्य नाधिगच्छामि गमनायेतराय वा ।। ७ ।। ‘उन सब बातोंपर तथा और भी पाण्डवोंके लिये जो विलाप किया गया है, उसपर विचार करके मैं किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाता कि द्वैतवनमें चलूँ या न चलूँ ।। ममापि हि महान् हर्षो यदहं भीमफाल्गुनौ । क्लिश्यावरण्ये पश्येयं कृष्णया सहिताविति ।। ८ ।। ‘यदि मैं भीमसेन तथा अर्जुनको द्रौपदीके साथ वनमें क्लेश उठाते देख सकूँ, तो मुझे भी बड़ी प्रसन्नता होगी ।। ८ ।। न तथा ह्याप्नुयां प्रीतिमवाप्य वसुधामिमाम् । दृष्ट्वा यथा पाण्डुसुतान् वल्कलाजिनवाससः ।। ९ ।। ‘पाण्डवोंको वल्कल वस्त्र पहने और मृगचर्म ओढ़े देखकर मुझे जितनी खुशी होगी, उतनी इस समूची पृथ्वीका राज्य पाकर भी नहीं होगी’ ।। ९ ।। किं नु स्यादधिकं तस्माद् यदहं द्रुपदात्मजाम् । द्रौपदीं कर्ण पश्येयं काषायवसनां वने ।। १० ।। ‘कर्ण! मैं द्रुपदकुमारी कृष्णाको वनमें गेरुए कपड़े पहने देखूँ, इससे बढ़कर प्रसन्नताकी बात मेरे लिये और क्या हो सकती है? ।। १० ।। यदि मां धर्मराजश्च भीमसेनश्च पाण्डवः । युक्तं परमया लक्ष्म्या पश्येतां जीवितं भवेत् ।। ११ ।। ‘यदि धर्मराज युधिष्ठिर तथा पाण्डुनन्दन भीमसेन मुझे परमोत्कृष्ट राजलक्ष्मीसे सम्पन्न देख लें तो मेरा जीवन सफल हो जाय ।। ११ ।। उपायं न तु पश्यामि येन गच्छेम तद् वनम् । यथा चाभ्यनुजानीयाद् गच्छन्तं मां महीपतिः ।। १२ ।। ‘परन्तु मुझे कोई ऐसा उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे हमलोग द्वैतवनमें जा सकें; अथवा महाराज मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दे दें’ ।। १२ ।। स सौबलेन सहितस्तथा दुःशासनेन च । उपायं पश्य निपुणं येन गच्छेम तद् वनम् ।। १३ ।। ‘अतः तुम मामा शकुनि तथा भाई दुःशासनके साथ सलाह करके कोई अच्छा-सा उपाय ढूँढ़ निकालो, जिससे हमलोग द्वैतवनमें चल सकें ।। १३ ।। अहमप्यद्य निश्चित्य गमनायेतराय च । कल्यमेव गमिष्यामि समीपं पार्थिवस्य ह ।। १४ ।।
‘मैं भी आज ही जाने या न जानेके विषयमें कोई निश्चय करके कल सबेरा होते ही महाराजके पास जाऊँगा।। मयि तत्रोपविष्टे तु भीष्मे च कुरुसत्तमे। उपायो यो भवेद् दृष्टस्तं ब्रूयाः सहसौबलः।। १५ ।। ‘जब मैं वहाँ बैठ जाऊँ और कुरुश्रेष्ठ भीष्मजी भी उपस्थित रहें, उस समय जो उपाय दिखायी दे, उसे तुम और शकुनि—दोनों बतलाना।। १५ ।। वचो भीष्मस्य राज्ञश्च निशम्य गमनं प्रति। व्यवसायं करिष्येऽहमनुनीय पितामहम्।। १६ ।। ‘पितामह भीष्मजीकी तथा महाराजकी वहाँ जानेके विषयमें क्या सम्मति है; यह सुन लेनेपर पितामहको अनुनय-विनयसे राजी करके (उनकी आज्ञा लेकर ही) द्वैतवनमें चलनेका निश्चय करूँगा’।। १६ ।। तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे जग्मुरावसथान् प्रति। व्युषितायां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् ।। १७ ।। ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही हो’ यह कहकर सब अपने-अपने विश्रामगृहमें चले गये। जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब कर्ण राजा दुर्योधनके पास गया।। १७ ।। ततो दुर्योधनं कर्णः प्रहसन्निदमब्रवीत्। उपायः परिदृष्टोऽयं तं निबोध जनेश्वर।। १८ ।। वहाँ कर्णने हँसकर दुर्योधनसे कहा—‘जनेश्वर! मुझे जो उपाय सूझा है, उसे बताता हूँ, सुनो।। १८ ।। घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप। घोषयात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशयः ।। १९ ।। ‘नरेश्वर! गौओंके रहनेके सभी स्थान इस समय द्वैतवनमें ही हैं और वहाँ आपके पधारनेकी सदा प्रतीक्षा की जाती है, अतः घोषयात्रा (उन स्थानोंको देखने)-के बहाने हम वहाँ निःसन्देह चल सकेंगे।। १९ ।। उचितं हि सदा गन्तुं घोषयात्रां विशाम्पते। एवं च त्वां पिता राजन् समनुज्ञातुमर्हति ।। २० ।। ‘राजन्! अपनी गौओंको देखनेके लिये यात्रा करना सदा उचित ही है; ऐसा बहाना लेनेपर पिताजी तुम्हें अवश्य वहाँ जानेकी आज्ञा दे सकते हैं’।। २० ।। तथा कथयमानौ तौ घोषयात्राविनिश्चयम्। गान्धारराजः शकुनिः प्रत्युवाच हसन्निव ।। २१ ।। घोषयात्राका निश्चय करनेके लिये इस प्रकारकी बातें करते हुए उन दोनों सुहृदोंसे गान्धारराज शकुनिने हँसते हुए-से कहा—।। २१ ।। उपायोऽयं मया दृष्टो गमनाय निरामयः।
अनुज्ञास्यति नो राजा बोधयिष्यति चाप्युत ॥ २२ ॥ ‘द्वैतवनमें जानेका यह उपाय मुझे सर्वथा निर्दोष दिखायी दिया है। इसके लिये राजा धृतराष्ट्र हमें अवश्य आज्ञा दे देंगे और वहाँ जाकर हमें क्या-क्या करना चाहिये—इसके विषयमें कुछ समझायेंगे भी ॥ २२ ॥
घोषा द्वैतवने सर्वे त्वत्प्रतीक्षा नराधिप ।
घोषयात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशयः ॥ २३ ॥
‘नरेश्वर! गौओंके रहनेके सभी स्थान इस समय द्वैतवनमें ही हैं और वहाँ तुम्हारे पधारनेकी सदा प्रतीक्षा की जाती है; अतः घोषयात्राके बहाने हम वहाँ निःसंदेह चल सकेंगे’ ॥ २३ ॥
ततः प्रहसिताः सर्वे तेऽन्योन्यस्य तलान् ददुः ।
तदेव च विनिश्चित्य ददृशुः कुरुसत्तमम् ॥ २४ ॥
तदनन्तर वे सब-के-सब अपनी योजनाको सफल होती देख हँसने और एक-दूसरेके हाथपर प्रसन्नतासे ताली देने लगे। फिर यही निश्चय करके वे तीनों कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रसे मिले ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि घोषयात्रामन्त्रणे
अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें घोषयात्राके सम्बन्धमें परामर्शविषयक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३८ ॥
२३९-
एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रं ततः सर्वे ददृशुर्जनमेजय ।
पृष्ट्वा सुखमथो राज्ञः पृष्टा राज्ञा च भारत ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन जनमेजय! तदनन्तर वे सब लोग राजा धृतराष्ट्रसे मिले। उन्होंने राजाकी कुशल पूछी तथा राजाने उनकी ।। १ ।।
ततस्तैर्विहितः पूर्वं समङ्गो नाम बल्लवः ।
समीपस्थास्तदा गावो धृतराष्ट्रे न्यवेदयत् ।। २ ।।
उन लोगोंने समंग नामक एक ग्वालेको पहलेसे ही सिखा-पढ़ाकर ठीक कर लिया था। उसने राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें निवेदन किया कि 'महाराज! आजकल आपकी गौएँ समीप ही आयी हुई हैं' ।। २ ।।
अनन्तरं च राधेयः शकुनिश्च विशाम्पते ।
आहतुः पार्थिवश्रेष्ठं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ।। ३ ।।
जनमेजय! इसके बाद कर्ण और शकुनिने राजाओंमें श्रेष्ठ जननायक धृतराष्ट्रसे कहा— ।। ३ ।।
रमणीयेषु देशेषु घोषाः सम्प्रति कौरव ।
स्मारणे समयः प्राप्तो वत्सानामपि चाङ्कनम् ॥ ४ ॥
‘कुरुराज! इस समय हमारी गौओंके स्थान रमणीय प्रदेशोंमें हैं। यह समय गौओं और बछड़ोंकी गणना करने तथा उनकी आयु, रंग, जाति एवं नामका ब्यौरा लिखनेके लिये भी अत्यन्त उपयोगी है ॥ ४ ॥
मृगया चोचिता राजन्नस्मिन् काले सुतस्य ते ।
दुर्योधनस्य गमनं समनुज्ञातुमर्हसि ॥ ५ ॥
‘राजन्! इस समय आपके पुत्र दुर्योधनके लिये हिंसक पशुओंके शिकार करनेका भी उपयुक्त अवसर है। अतः आप इन्हें द्वैतवनमें जानेकी आज्ञा दीजिये’ ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
मृगया शोभना तात गवां हि समवेक्षणम् ।
विश्रम्भस्तु न गन्तव्यो बल्लवानामिति स्मरे ॥ ६ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**तात! हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेका प्रस्ताव सुन्दर है। गौओंकी देख-भालका काम भी अच्छा ही है; परंतु ग्वालोंकी बातोंपर विश्वास नहीं करना चाहिये, यह नीतिका वचन है, जिसका मुझे स्मरण हो आया है ॥ ६ ॥
ते तु तत्र नरव्याघ्राः समीप इति नः श्रुतम् ।
अतो नाभ्यनुजानामि गमनं तत्र वः स्वयम् ।। ७ ।। मैंने सुना है कि नरश्रेष्ठ पाण्डव भी इन दिनों वहीं कहीं आस-पास ठहरे हुए हैं; अतः तुमलोगोंको मैं स्वयं वहाँ जानेकी आज्ञा नहीं दे सकता ।। ७ ।।
छद्मना निर्जितास्ते तु कर्शिताश्च महावने । तपोनित्याश्च राधेय समर्थाश्च महारथाः ।। ८ ।। राधानन्दन! पाण्डव छलपूर्वक हराये गये हैं। महान् वनमें रहकर उन्हें बड़ा कष्ट भोगना पड़ा है। वे निरन्तर तपस्या करते रहे हैं और अब विशेष शक्तिसम्पन्न हो गये हैं। महारथी तो वे हैं ही ।। ८ ।।
धर्मराजो न संक्रुद्ध्येद् भीमसेनस्त्वमर्षणः । यज्ञसेनस्य दुहिता तेज एव तु केवलम् ।। ९ ।। माना कि धर्मराज युधिष्ठिर क्रोध नहीं करेंगे, परंतु भीमसेन तो सदा ही अमर्षमें भरे रहते हैं और राजा द्रुपदकी पुत्री कृष्णा भी साक्षात् अग्निकी ही मूर्ति है ।। ९ ।।
यूयं चाप्यपराध्येयुर्दर्पमोहसमन्विताः । ततो विनिर्दहेयुस्ते तपसा हि समन्विताः ।। १० ।। तुमलोग तो अहंकार और मोहमें चूर रहते ही हो; अतः उनका अपराध अवश्य करोगे। उस दशामें वे तुम्हें भस्म किये बिना नहीं छोड़ेंगे; क्योंकि उनमें तपःशक्ति विद्यमान है ।। १० ।।
अथवा सायुधा वीरा मन्युनाभिपरिप्लुताः । सहिता बद्धनिस्त्रिंशा दहेयुः शस्त्रतेजसा ।। ११ ।। अथवा, उन वीरोंके पास अस्त्र-शस्त्रोंकी भी कमी नहीं है। तुम्हारे प्रति उनका क्रोध सदा ही बना रहता है। वे तलवार बाँधे सदा एक साथ रहते हैं; अतः वे अपने शस्त्रोंके तेजसे भी तुम्हें दग्ध कर सकते हैं ।।
अथ यूयं बहुत्वात् तानभियात कथंचन । अनार्यं परमं तत् स्यादशक्यं तच्च वै मतम् ।। १२ ।। यदि संख्यासे अधिक होनेके कारण तुमने ही किसी प्रकार उनपर चढ़ाई कर दी तो यह भी तुम्हारी बड़ी भारी नीचता ही समझी जायगी। मेरी समझमें तो तुमलोगोंका पाण्डवोंपर विजय पाना असम्भव ही है ।। १२ ।।
उषितो हि महाबाहुरिन्द्रलोके धनंजयः । दिव्यान्यस्त्राण्यवाप्याथ ततः प्रत्यागतो वनम् ।। १३ ।। महाबाहु धनंजय इन्द्रलोकमें रह चुके हैं और वहाँसे दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा लेकर वनमें लौटे हैं ।। १३ ।।
अकृतास्त्रेण पृथिवी जिता बीभत्सुना पुरा । किं पुनः स कृतास्त्रोऽद्य न हन्याद् वो महारथः ।। १४ ।।
पहले जब अर्जुनको दिव्यास्त्र नहीं प्राप्त हुए थे, तभी उन्होंने सारी पृथ्वीको जीत लिया था। अब तो महारथी अर्जुन दिव्यास्त्रोंके विद्वान् हैं, ऐसी दशामें वे तुम्हें मार डालें, यह कौन बड़ी बात है? ।। १४ ।।
अथवा मद्वचः श्रुत्वा तत्र यत्ता भविष्यथ । उद्विग्नवासो विश्रम्भाद् दुःखं तत्र भविष्यति ।। १५ ।। अथवा मेरी बात सुनकर तुमलोग वहाँ यदि अपनेको काबूमें रखते हुए सावधानीके साथ रह सको, तो भी यह विश्वास करके कि ये लोग सत्यवादी होनेके कारण हमें कष्ट नहीं देंगे, वनवाससे उद्विग्न हुए पाण्डवोंके बीचमें निवास करना तुम्हारे लिये दुःखदायी ही होगा ।। १५ ।।
अथवा सैनिकाः केचिदपकुर्युर्युधिष्ठिरम् । तदबुद्धिकृतं कर्म दोषमुत्पादयेच्च वः ।। १६ ।। अथवा यह भी सम्भव है कि तुमलोगोंके कुछ सैनिक युधिष्ठिरका अपमान कर बैठें और तुम्हारे अनजानमें किया गया यह अपराध तुमलोगोंके लिये हानिकारक हो जाय ।। १६ ।।
तस्माद् गच्छन्तु पुरुषाः स्मारणायाप्तकारिणः । न स्वयं तत्र गमनं रोचये तव भारत ।। १७ ।। अतः भरतनन्दन! दूसरे विश्वसनीय पुरुष गौओंकी गणना करनेके लिये वहाँ चले जायँगे। स्वयं तुम्हारा वहाँ जाना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता ।। १७ ।।
शकुनिरुवाच
धर्मज्ञः पाण्डवो ज्येष्ठः प्रतिज्ञातं च संसदि । तेन द्वादश वर्षाणि वस्तव्यानीति भारत ।। १८ ।। शकुनि बोला— भारत! ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं। उन्होंने भरी सभामें यह प्रतिज्ञा की है कि 'हमें बारह वर्षोंतक वनमें रहना है' ।। १८ ।।
अनुवृत्ताश्च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो न नः कोपं करिष्यति ।। १९ ।। अन्य पाण्डव भी धर्मपर ही चलनेवाले हैं; अतः वे सब-के-सब युधिष्ठिरका ही अनुसरण करते हैं। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर हमलोगोंपर कदापि क्रोध नहीं करेंगे ।।
मृगयां चैव नो गन्तुमिच्छा संवर्तते भृशम् । स्मारणं तु चिकीर्षामो न तु पाण्डवदर्शनम् ।। २० ।। हमारी विशेष इच्छा केवल हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेकी है। हमलोग वहाँ स्मरणके लिये केवल गौओंकी गणना करना चाहते हैं। पाण्डवोंसे मिलनेकी हमारी इच्छा बिलकुल नहीं है ।। २० ।।
न चानार्यसमाचारः कश्चित् तत्र भविष्यति । न च तत्र गमिष्यामो यत्र तेषां प्रतिश्रयः ॥ २१ ॥ हमारी ओरसे वहाँ कोई भी नीचतापूर्ण व्यवहार नहीं होगा। जहाँ पाण्डवोंका निवास होगा, उधर हमलोग जायँगे ही नहीं ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । दुर्योधनं सहामात्यमनुजज्ञे न कामतः ॥ २२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शकुनिके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्रने इच्छा न होते हुए भी मन्त्रियों-सहित दुर्योधनको वहाँ जानेकी आज्ञा दे दी ॥ २२ ॥
अनुज्ञातस्तु गान्धारिः कर्णेन सहितस्तदा । निर्ययौ भरतश्रेष्ठो बलेन महता वृतः ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाकर गान्धारीपुत्र भरतश्रेष्ठ दुर्योधन कर्ण और विशाल सेनाके साथ नगरसे बाहर निकला ॥ २३ ॥
दुःशासनेन च तथा सौबलेन च धीमता । संवृतो भ्रातृभिश्चान्यैः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ॥ २४ ॥ दुःशासन, बुद्धिमान् शकुनि, अन्यान्य भाइयों तथा सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए दुर्योधनने वहाँसे प्रस्थान किया ॥ २४ ॥
तं निर्यान्तं महाबाहुं द्रष्टुं द्वैतवनं सरः । पौराश्चानुययुः सर्वे सहदारा वनं च तत् ॥ २५ ॥ द्वैतवन नामक सरोवर तथा वनको देखनेके लिये यात्रा करनेवाले महाबाहु दुर्योधनके पीछे समस्त पुरवासी भी अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर गये ॥ २५ ॥
अष्टौ रथसहस्राणि त्रीणि नागायुतानि च । पत्तयो बहुसाहस्रा हयाश्च नवतिः शताः ॥ २६ ॥ दुर्योधनके साथ आठ हजार रथ, तीस हजार हाथी, कई हजार पैदल और नौ हजार घोड़े गये ॥ २६ ॥
शकटापणवेषाश्च वणिजो वन्दिनस्तथा । नराश्च मृगयाशीलाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७ ॥ बोझ ढोनेके लिये सैकड़ों छकड़े, दुकानें तथा वेष-भूषाकी सामग्रियाँ भी साथ चलीं। वणिक्, वंदीजन तथा आखेटप्रिय मनुष्य सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें साथ गये ॥ २७ ॥
ततः प्रयाणे नृपतेः सुमहानभवत् स्वनः । प्रावृषीव महावायोरुद्धतस्य विशाम्पते ॥ २८ ॥
राजन्! राजा दुर्योधनके प्रस्थानकालमें बड़े जोरका कोलाहल हुआ, मानो वर्षाकालमें प्रचण्ड वायुका भयंकर शब्द सुनायी दे रहा हो ॥ २८ ॥
गव्यूतिमात्रे न्यवसद् राजा दुर्योधनस्तदा ।
प्रयातो वाहनैः सर्वैस्ततो द्वैतवनं सरः ॥ २९ ॥
नगरसे दो कोस दूर जाकर राजा दुर्योधनने पड़ाव डाल दिया। फिर वहाँसे समस्त वाहनोंके साथ द्वैतवन एवं सरोवरकी ओर प्रस्थान किया ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रस्थाने
एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रस्थानविषयक दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३९ ॥
दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद
चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद
वैशम्पायन उवाच
अथ दुर्योधनो राजा तत्र तत्र वने वसन् ।
जगाम घोषानभितस्तत्र चक्रे निवेशनम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन जहाँ-तहाँ वनमें पड़ाव डालता हुआ उन घोषों (गोशालाओं)-के पास पहुँच गया और वहाँ उसने अपनी छावनी डाली ॥ १ ॥
रमणीये समाज्ञाते सोदके समहीरहे ।
देशे सर्वगुणोपेते चक्रुरावसथान् पराः ॥ २ ॥
उसके साथ गये हुए लोगोंने भी उस सर्वगुणसम्पन्न, रमणीय, सुपरिचित, सजल तथा सघन वृक्षावलियोंसे युक्त प्रदेशमें अपने डेरे डाल दिये ॥ २ ॥
तथैव तत्समीपस्थान् पृथगावसथान् बहून् ।
कर्णस्य शकुनेश्चैव भ्रातॄणां चैव सर्वशः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार दुर्योधनके डेरेके पास ही कर्ण, शकुनि तथा दुःशासन आदि सब भाइयोंके लिये पृथक्-पृथक् बहुत-से खेमे पड़ गये ॥ ३ ॥
ददर्श स तदा गावः शतशोऽथ सहस्रशः ।
अङ्कैलैक्षैश्च ताः सर्वा लक्षयामास पार्थिवः ॥ ४ ॥
(रहनेकी व्यवस्था ठीक हो जानेपर) राजा दुर्योधनने अपनी सैकड़ों एवं हजारों गौओंका निरीक्षण करना आरम्भ किया। उन सबपर संख्या और निशानी डलवा दी ॥ ४ ॥
अङ्कयामास वत्सांश्च जज्ञे चोपसृतांस्त्वपि ।
बालवत्साश्च या गावः कालयामास ता अपि ॥ ५ ॥
फिर बछड़ोंपर भी संख्या और निशानी डलवायी और उनमेंसे जो नाथनेयोग्य थे, उन सबकी गणना कराकर उनपर पहचान डाल दी। जिन गौओंके बछड़े बहुत छोटे थे, उनकी भी अलग गणना करवायी ॥ ५ ॥
अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान् ।
वृतो गोपालकैः प्रीतो व्यहरत् कुरुनन्दनः ॥ ६ ॥
इस प्रकार जाँच-पड़तालका काम पूरा करके कुरुनन्दन दुर्योधनने तीन सालके बछड़ोंकी पृथक् गणना करवायी और स्मरणके लिये सब कुछ लिखकर वह बड़ी
प्रसन्नताके साथ ग्वालोंसे घिरकर उस वनमें विहार करने लगा ॥ ६ ॥ स च पौरजनः सर्वः सैनिकाश्च सहस्रशः । यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन् यथामराः ॥ ७ ॥ वे समस्त पुरवासी और सहस्रोंकी संख्यामें आये हुए सैनिक उस वनमें अपनी-अपनी रुचिके अनुसार देवताओंके समान क्रीड़ा करने लगे ॥ ७ ॥ ततो गोपाः प्रगातारः कुशला नृत्यवादने । धार्तराष्ट्रमुपातिष्ठन् कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥ ८ ॥ तदनन्तर नृत्य और वादनकी कलामें कुशल कुछ गवैये गोप तथा गहने-कपड़ोंसे सजी हुई उनकी कन्याएँ दुर्योधनके समीप आयीं ॥ ८ ॥ स स्त्रीगणावृतो राजा प्रहृष्टः प्रददौ वसु । तेभ्यो यथार्हमन्नानि पानानि विविधानि च ॥ ९ ॥ अपनी स्त्रियोंके साथ राजा दुर्योधन उनको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें बहुत-सा धन दिया तथा यथायोग्य नाना प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित कीं ॥ ९ ॥ ततस्ते सहिताः सर्वे तरक्षून् महिषान् मृगान् । गवयर्क्षवराहांश्च समन्तात् पर्यकालयन् ॥ १० ॥ तदनन्तर वे सब लोग तरक्षुओं (जरखों), जंगली भैंसों, गवयों, रीछों और शूकरों एवं अन्य जंगली हिंसक पशुओंका सब ओरसे शिकार करने लगे ॥ १० ॥ स ताञ्छरैर्विनिर्भिद्य गजांश्च सुबहून् वने । रमणीयेषु देशेषु ग्राहयामास वै मृगान् ॥ ११ ॥ उन्होंने वनके रमणीय प्रदेशोंमें बहुत-से हाथियोंको अपने बाणोंसे विदीर्ण करके अनेकानेक हिंस्र पशुओंको पकड़ लिया ॥ ११ ॥ गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्च भारत । पश्यन् स रमणीयानि वनान्युपवनानि च ॥ १२ ॥ मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च । अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैतवननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा ॥ १२-१३ ॥ मत्तभ्रमरसंजुष्टं नीलकण्ठरवाकुलम् । सप्तच्छदसमाकीर्णं पुन्नागबकुलैर्युतम् ॥ १४ ॥
वहाँ मधुमत्त भ्रमर कमलपुष्पोंका रस ले रहे थे। मयूरोंकी मधुर वाणीसे वह सारा प्रदेश व्याप्त हो रहा था। सप्तच्छद (छितवन)-के वृक्षोंसे वह सरोवर आच्छादित-सा जान पड़ता था। उसके तटोंपर मौलसिरी और नागकेसरके वृक्ष शोभा पा रहे थे ॥ १४ ॥
ऋद्ध्या परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥ ईजे राजर्षियज्ञेन साद्यस्केन विशाम्पते । दिव्येन विधिना चैव वन्येन कुरुसत्तम ॥ १६ ॥ (विद्वद्भिः सहितो धीमान् ब्राह्मणैर्वनवासिभिः ।) कृत्वा निवेशमभितः सरसस्तस्य कौरव । द्रौपद्या सहितो धीमान् धर्मपत्न्या नराधिपः ॥ १७ ॥ उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान् धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी विद्वान् ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे ॥ १५—१७ ॥
ततो दुर्योधनः प्रेष्यानादिदेश सहस्रशः । आक्रीडावसथाः क्षिप्रं क्रियन्तामिति भारत ॥ १८ ॥ भारत! तदनन्तर दुर्योधनने अपने सहस्रों सेवकोंको आज्ञा दी—'तुमलोग बहुत-से क्रीडामण्डप तैयार करो' ॥
ते तथेत्येव कौरव्यमुक्त्वा वचनकारिणः । चिकीर्षन्तस्तदाऽऽक्रीडाञ्जग्मुर्द्वैतवनं सरः ॥ १९ ॥ आज्ञाकारी सेवक दुर्योधनसे 'तथास्तु' कहकर क्रीडाभवन बनानेकी इच्छासे द्वैतवनके सरोवरके निकट गये ॥ १९ ॥
प्रविशन्तं वनद्वारि गन्धर्वाः समवारयन् । सेनाग्रयं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सरः ॥ २० ॥ दुर्योधनका सेनानायक द्वैतवन सरोवरके अत्यन्त निकटतक पहुँच गया था, उस वनके द्वारपर पैर रखते ही उसको गन्धर्वोंने रोक दिया ॥ २० ॥
तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशाम्पते । कुबेरभवनाद् राजन्नाजगाम गणावृतः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ गन्धर्वराज चित्रसेन पहलेसे ही अपने सेवकगणोंके साथ कुबेरभवनसे आये हुए थे ॥ २१ ॥
गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथाऽऽत्मजैः । विहारशीलः क्रीडार्थं तेन तत् संवृतं सरः ॥ २२ ॥
वे उन दिनों अप्सराओं तथा देवकुमारोंके साथ विभिन्न स्थानोंमें भ्रमण करते थे। उन्होंने स्वयं ही क्रीड़ाविहारके लिये उस सरोवरको सब ओरसे घेर लिया था॥ २२॥ तेन तत् संवृतं दृष्ट्वा ते राजपरिचारकाः। प्रतिजग्मुस्ततो राजन् यत्र दुर्योधनो नृपः॥ २३॥ स तु तेषां वचः श्रुत्वा सैनिकान् युद्धदुर्मदान्। प्रेषयामास कौरव्य उत्सारयत तानिति॥ २४॥ राजन्! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि ‘गन्धर्वोंको वहाँसे मार भगाओ’॥ २३-२४॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राज्ञः सेनाग्रयायिनः। सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमब्रुवन्॥ २५॥ राजाका यह आदेश सुनकर उसकी सेनाके नायक द्वैतवन सरोवरके समीप जाकर गन्धर्वोंसे इस प्रकार बोले—॥ २५॥ राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो बली। विजिहीर्षुरिहायाति तदर्थमपसर्पत॥ २६॥ ‘गन्धर्वो! महाराज धृतराष्ट्रके बलवान् पुत्र राजा दुर्योधन यहाँ विहार करनेकी इच्छासे पधार रहे हैं। तुमलोग उनके लिये यह स्थान खाली करके दूर चले जाओ’॥ २६॥ एवमुक्तास्तु गन्धर्वाः प्रहसन्तो विशाम्पते। प्रत्यब्रुवंस्तान् पुरुषानिदं हि परुषं वचः॥ २७॥ राजन्! उनके ऐसा कहनेपर गन्धर्व जोर-जोरसे हँसने लगे; और उन राजसेवकोंको उत्तर देते हुए उनसे इस प्रकार कठोर वाणीमें बोले—॥ २७॥ न चेतयति वो राजा मन्दबुद्धिः सुयोधनः। योऽस्मानाज्ञापयत्येवं वैश्यानिव दिवौकसः॥ २८॥ ‘तुम्हारा राजा दुर्योधन मूर्ख है। उसे तनिक भी चेत नहीं है; क्योंकि वह हम देवलोकवासी गन्धर्वको भी बनियोंके समान समझकर इस प्रकार आज्ञा दे रहा है॥ यूयं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशयः। ये तस्य वचनादेवमस्मान् ब्रूत विचेतसः॥ २९॥ ‘तुमलोगोंकी भी बुद्धि मारी गयी है। इसमें संदेह नहीं कि तुम सब-के-सब मरना चाहते हो। तभी तो उस दुर्योधनके कहनेसे तुम इस प्रकार हमसे विचारहीन होकर बातें कर रहे हो॥ २९॥ गच्छध्वं त्वरिताः सर्वे यत्र राजा स कौरवः। न चेदद्यैव गच्छध्वं धर्मराजनिवेशनम्॥ ३०॥
'या तो तुम सब लोग तुरन्त वहीं लौट जाओ, जहाँ तुम्हारा राजा दुर्योधन रहता है। या यदि ऐसा नहीं करना है, तो अभी धर्मराजके नगर (यमलोक) की राह लो' ॥ ३० ॥
एवमुक्तास्तु गन्धर्वै राज्ञः सेनाग्रयायिनः ।
सम्प्राद्रवन् यतो राजा धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् ॥ ३१ ॥
गन्धर्वोंके ऐसा कहनेपर राजाके सेनानायक योद्धा वहीं भाग गये, जहाँ धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन स्वयं विराजमान था ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादे
चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादविषयक दो सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३१ १/३ श्लोक हैं)
२४१-
एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
कौरवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध और कर्णकी पराजय
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते सहिताः सर्वे दुर्योधनमुपागमन् ।
अब्रुवंश्च महाराज यदूचुः कौरवं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! तदनन्तर वे सब लोग एक साथ कुरुराज दुर्योधनके पास गये और गन्धर्वोंने राजासे कहनेके लिये जो-जो बातें कही थीं, उन्हें कह सुनाया ॥ १ ॥
गन्धर्वैर्वारिते सैन्ये धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् ।
अमर्षपूर्णः सैन्यानि प्रत्यभाषत भारत ॥ २ ॥
भारत! गन्धर्वोंद्वारा अपनी सेनाके रोक दिये जानेपर प्रतापी राजा दुर्योधनने अमर्षमें भरकर समस्त सैनिकोंसे कहा— ॥ २ ॥
शास्तैनानधर्मज्ञान् मम विप्रियकारिणः ।
यदि प्रक्रीडते सर्वैर्देवैः सह शतक्रतुः ॥ ३ ॥
'अरे! यदि समस्त देवताओंके साथ इन्द्र भी यहाँ आकर क्रीडा करते हों, तो वे भी मेरा अप्रिय करनेवाले हैं। तुमलोग इन सब पापात्माओंको दण्ड दो' ॥ ३ ॥
दुर्योधनवचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रा महाबलाः ।
सर्व एवाभिसंनद्धा योधाश्चापि सहस्रशः ॥ ४ ॥
दुर्योधनकी यह बात सुनकर महाबली कौरव और उनके सहस्रों योद्धा सब-के-सब युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गये ॥ ४ ॥
ततः प्रमथ्य सर्वांस्तांस्तद् वनं विविशुर्बलात् ।
सिंहनादेन महता पूरयन्तो दिशो दश ॥ ५ ॥
तदनन्तर वे अपने महान् सिंहनादसे दसों दिशाओंको गुँजाते हुए उन समस्त गन्धर्वोंको रौंदकर बलपूर्वक द्वैतवनमें घुस गये ॥ ५ ॥
ततोऽपरैरवार्यन्त गन्धर्वैः कुरुसैनिकाः ।
ते वार्यमाणा गन्धर्वैः साम्नैव वसुधाधिप ॥ ६ ॥
ताननादृत्य गन्धर्वांस्तद् वनं विविशुर्महत् ।
यदा वाचा न तिष्ठन्ति धार्तराष्ट्राः सराजकाः ॥ ७ ॥
ततस्ते खेचराः सर्वे चित्रसेने न्यवेदयन् ।
राजन्! उस समय दूसरे-दूसरे गन्धर्वोंने शान्तिपूर्ण वचनोंद्वारा ही कौरव सैनिकोंको रोका। रोकनेपर भी उन गन्धर्वोंकी अवहेलना करके वे समस्त सैनिक उस महान् वनके भीतर प्रविष्ट हो गये। जब राजा दुर्योधनसहित समस्त कौरव वाणीद्वारा मना करनेपर न रुके, तब आकाशमें विचरनेवाले उन सभी गन्धर्वोंने राजा चित्रसेनसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ६-७ १/२ ॥
गन्धर्वराजस्तान् सर्वानब्रवीत् कौरवान् प्रति ॥ ८ ॥
अनार्याञ्छासतेत्येतांश्चित्रसेनोऽत्यमर्षतः ।
यह सुनकर गन्धर्वराज चित्रसेनको बड़ा अमर्ष हुआ। उन्होंने कौरवोंको लक्ष्य करके समस्त गन्धर्वोंको आज्ञा दी, 'अरे! इन दुष्टोंका दमन करो' ॥ ८ १/२ ॥
अनुज्ञाताश्च गन्धर्वाश्चित्रसेनेन भारत ॥ ९ ॥
प्रगृहीतायुधाः सर्वे धार्तराष्ट्रानभिद्रवन् ।
भारत! चित्रसेनकी आज्ञा पाते ही सब गन्धर्व अस्त्र-शस्त्र लेकर कौरवोंकी ओर दौड़े ॥ ९ १/२ ॥
तान् दृष्ट्वा पततः शीघ्रान् गन्धर्वानुद्यतायुधान् ॥ १० ॥
प्राद्रवंस्ते दिशः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ।
गन्धर्वोंको अस्त्र-शस्त्र लिये तीव्र वेगसे अपनी ओर आते देख वे सभी कौरव सैनिक दुर्योधनके देखते-देखते चारों ओर भागने लगे ॥ १० १/२ ॥
तान् दृष्ट्वा द्रवतःसर्वान् धार्तराष्ट्रान् पराङ्मुखान् ॥ ११ ॥
राधेयस्तु तदा वीरो नासीत् तत्र पराङ्मुखः ।
धृतराष्ट्रके सब पुत्रोंको युद्धसे विमुख हो भागते देखकर भी राधानन्दन वीर कर्णने वहाँ पीठ नहीं दिखायी ॥
आपतन्तीं तु सम्प्रेक्ष्य गन्धर्वाणां महाचमूम् ॥ १२ ॥
महता शरवर्षेण राधेयः प्रत्यवारयत् ।
गन्धर्वोंकी उस विशाल सेनाको अपनी ओर आती देख कर्णने भारी बाणवर्षा करके उसे आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १२ १/२ ॥
क्षुरप्रैर्विशिखैर्भल्लैर्वत्सदन्तैस्तथाऽयसैः ॥ १३ ॥
गन्धर्वाञ्छतशोऽभ्यघ्नँल्लघुत्वात् सूतनन्दनः ।
सूतपुत्र कर्णने अपने हाथोंकी फुर्तीके कारण लोहेके क्षुरप्र, विशिख, भल्ल और वत्सदन्त नामक बाणोंकी वर्षा करके सैकड़ों गन्धर्वोंको घायल कर दिया ॥ १३ १/२ ॥
पातयन्नुत्तमाङ्गानि गन्धर्वाणां महारथः ॥ १४ ॥
क्षणेन व्यधमत् सर्वां चित्रसेनस्य वाहिनीम् ।
गन्धर्वोंके मस्तक काटकर गिराते हुए महारथी कर्णने चित्रसेनकी सारी सेनाको क्षणभरमें छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ १४१/२ ॥
ते वध्यमाना गन्धर्वाः सूतपुत्रेण धीमता ॥ १५ ॥
भूय एवाभ्यवर्तन्त शतशोऽथ सहस्रशः ।
गन्धर्वभूता पृथिवी क्षणेन समपद्यत ॥ १६ ॥
आपतद्भिर्महावेगैश्चित्रसेनस्य सैनिकैः ।
परम बुद्धिमान् सूतपुत्र कर्णके द्वारा ज्यों-ज्यों गन्धर्वोंपर मार पड़ने लगी, त्यों-ही-त्यों वे सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें वहाँ आ-आकर एकत्र होने लगे। इस प्रकार चित्रसेनके अत्यन्त वेगशाली सैनिकोंके आनेसे क्षणभरमें वहाँकी सारी पृथ्वी गन्धर्वमयी हो गयी ॥ १५-१६१/२ ॥
अथ दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबलः ॥ १७ ॥
दुःशासनो विकर्णश्च ये चान्ये धृतराष्ट्रजाः ।
न्यहनंस्तत् तदा सैन्यं रथैर्गरुडनिःस्वनैः ॥ १८ ॥
तदनन्तर राजा दुर्योधन, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, विकर्ण तथा अन्य जो धृतराष्ट्रपुत्र वहाँ आये थे, उन सबने गरुड़के समान भयंकर शब्द करनेवाले रथोंपर आरूढ़ हो गन्धर्वोंकी उस सेनाका संहार आरम्भ किया ॥
भूयश्च योधयामासुः कृत्वा कर्णमथाग्रतः ।
महता रथसङ्घेन रथचारेण चाप्युत ॥ १९ ॥
वैकर्तनं परीप्सन्तो गन्धर्वान् समवाकिरन् ।
उन्होंने कर्णको आगे करके पुनः बड़े वेगसे गन्धर्वोंका सामना किया। उनके साथ रथोंका विशाल समूह था। वे रथोंको विचित्र गतियोंसे चलाते हुए कर्णकी रक्षा करने और गन्धर्वोंपर बाण बरसाने लगे ॥ १९१/२ ॥
ततः संन्यपतन् सर्वे गन्धर्वाः कौरवैः सह ॥ २० ॥
तदा सुतुमुलं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
ततस्ते मृदवोऽभूवन् गन्धर्वाः शरपीडिताः ॥ २१ ॥
उच्चक्रुशुश्च कौरव्या गन्धर्वान् प्रेक्ष्य पीडितान् ।
तत्पश्चात् सारे गन्धर्व संगठित हो कौरवोंके साथ भिड़ गये। उस समय उनमें घमासान युद्ध होने लगा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। तदनन्तर कौरवोंके बाणोंसे पीड़ित हो गन्धर्व कुछ ढीले पड़ने लगे और उन्हें कष्ट पाते देख कौरव-योद्धा जोर-जोरसे गरजने लगे ॥ २०-२११/२ ॥
गन्धर्वांस्त्रासितान् दृष्ट्वा चित्रसेनो ह्यमर्षणः ॥ २२ ॥
उत्पपातासनात् क्रुद्धो वधे तेषां समाहितः ।
गन्धर्वोंको भयभीत देखकर गन्धर्वराज चित्रसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वे शत्रुओंके वधका दृढ़ संकल्प लेकर अपने आसनसे उछल पड़े ॥ २२ १/२ ॥
ततो मायास्त्रमास्थाय युयुधे चित्रमार्गवित् ।
तयामुह्यन्त कौरव्याश्चित्रसेनस्य मायया ॥ २३ ॥
वे युद्धकी विचित्र पद्धतियोंके ज्ञाता थे। उन्होंने मायामय अस्त्रका आश्रय लेकर युद्ध आरम्भ किया। चित्रसेनकी उस मायासे समस्त कौरवोंपर मोह छा गया ॥
एकैको हि तदा योधो धार्तराष्ट्रस्य भारत ।
पर्यवर्तत गन्धर्वैर्दशभिर्दशभिः सह ॥ २४ ॥
भारत! उस समय दुर्योधनका एक-एक सैनिक दस-दस गन्धर्वोंके साथ लोहा ले रहा था ॥ २४ ॥
ततः सम्पीड्यमानास्ते बलेन महता तदा ।
प्राद्रवन्त रणे भीता ये च राजञ्जिगीषवः ॥ २५ ॥
राजन्! तदनन्तर गन्धर्वोंकी विशाल सेनासे पीड़ित हो वे सभी योद्धा, जो पहले जीतनेका हौसला रखते थे, भयभीत हो युद्धसे भाग चले ॥ २५ ॥
भज्यमानेष्वनीकेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वशः ।
कर्णो वैकर्तनो राजंस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ २६ ॥
जनमेजय! जब कौरवोंके सभी सैनिक युद्ध छोड़कर भागने लगे, उस समय भी सूर्यपुत्र कर्ण पर्वतकी भाँति अविचलभावसे उस युद्धभूमिमें डटा रहा ॥ २६ ॥
दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः ।
गन्धर्वान् योधयामासुः समरे भृशविक्षताः ॥ २७ ॥
दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि—ये उस समरांगणमें यद्यपि बहुत घायल हो गये थे, तथापि गन्धर्वोंसे युद्ध करते रहे ॥ २७ ॥
सर्व एव तु गन्धर्वाः शतशोऽथ सहस्रशः ।
जिघांसमानाः सहिताः कर्णमभ्यद्रवन् रणे ॥ २८ ॥
इसपर सभी गन्धर्व एक साथ संगठित हो कर्णको मार डालनेकी इच्छासे सौ-सौ तथा हजार-हजारका दल बाँधकर रणभूमिमें कर्णके ऊपर टूट पड़े ॥ २८ ॥
असिभिः पट्टिशैः शूलैर्गदाभिश्च महाबलाः ।
सूतपुत्रं जिघांसन्तः समन्तात् पर्यवाकिरन् ॥ २९ ॥
उन महाबली वीरोंने सूतपुत्र कर्णके वधकी इच्छा रखकर उसके ऊपर चारों ओरसे तलवार, पट्टिश, शूल और गदाओंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ २९ ॥
अन्येऽस्य युगमच्छिन्दन् ध्वजमन्ये न्यपातयन् ।
ईषामन्ये हयानन्ये सूतमन्ये न्यपातयन् ॥ ३० ॥
किन्हींने उसके रथका जुआ काट दिया, दूसरोंने ध्वजा काटकर गिरा दी। कुछ लोगोंने ईषादण्डके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। कुछ गन्धर्वोंने कर्णके घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया तथा दूसरोंने सारथिको मार गिराया ।। ३० ।।
अन्ये छत्रं वरूथं च बन्धुरं च तथापरे ।
गन्धर्वा बहुसाहस्रास्तिलशो व्यधमन् रथम् ।। ३१ ।।
किसी एकने छत्र, दूसरोंने वरूथ* और अन्य सैनिकोंने रथके बन्धन काट डाले। गन्धर्वोंकी संख्या कई हजार थी। उन्होंने कर्णके रथको तिल-तिल करके काट दिया ।। ३१ ।।
ततो रथादवप्लुत्य सूतपुत्रोऽसिचर्मभृत् ।
विकर्णरथमास्थाय मोक्षायाश्वानचोदयत् ।। ३२ ।।
तब सूतपुत्र कर्ण हाथमें तलवार और ढाल लिये अपने रथसे कूद पड़ा और विकर्णके रथपर बैठकर अपने प्राण बचानेके लिये उसके घोड़ोंको जोर-जोरसे हाँकने लगा ।। ३२ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णपराभवे
एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णपराजयविषयक दो सौ इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४१ ।।
* लोहेकी चद्दर या सीकड़ोंका बना हुआ आवरण वरूथ कहलाता है। पहले यह शत्रुके आघातसे रथको रक्षित रखनेके लिये उसके ऊपर डाला जाता था।