संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अक्लेशतः प्राप्यमिदं विसृज्य | ''जो बिना कष्टके ही प्राप्त होनेयोग्य इस महान् सुख महासुखं योऽन्यसुखानि वाञ्छेत्। | (परमेश्वर)-को त्यागकर अन्य तुच्छ सुखोंकी इच्छा राज्यं करस्थं स्वमसौ विसृज्य | करता है, वह दीनहृदय मूर्ख पुरुष मानो हाथमें आये हुए भिक्षामटेद्दीनमनाः सुमूढः॥ ११ | अपने राज्यको त्यागकर भीख माँगता है। भगवान् लक्ष्मीपतिके तच्चार्च्यते श्रीपतिपादपद्म- | युगल-चरणारविन्दोंका यथार्थ पूजन वस्त्र, धन और परिश्रमसे द्वन्द्वं न वस्त्रैर्न धनैः श्रमैर्न। | नहीं होता; किंतु मनुष्य यदि अनन्यचित्त होकर 'केशव', अनन्यचित्तेन नरेण किंतु | 'माधव' आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करे तो वही उनकी उच्चार्यते केशव माधवेति॥ १२ | वास्तविक पूजा है। दैत्यकुमारो! इस प्रकार संसारको एवं भवं दुःखमयं विदित्वा | दुःखमय जानकर भगवान्का ही भलीभाँति भजन करो। दैत्यात्मजाः साधु हरिं भजध्वम्। | इस प्रकार करनेसे ही मनुष्यका जन्म सफल हो सकता एवं जनो जन्मफलं लभेत | है; नहीं तो (भगवद्भजन न करनेके कारण) अज्ञानी पुरुष नो चेद्भवब्धौ प्रपतेदधोऽधः॥ १३ | भवसागरमें ही नीचेसे और नीचे स्तरमें ही गिरता रहता तस्माद्भवेऽस्मिन् हृदि शङ्खचक्र- | है। इसलिये इस संसारमें समस्त कामनाओंसे रहित हो गदाधरं देवमनन्तमीड्यम्। | तुम सभी लोग अपने हृदयके भीतर विराजमान शङ्ख- स्मरन्तु नित्यं वरदं मुकुन्दं | चक्र-गदाधारी, वरदाता, अविनाशी स्तवनीय भगवान् सद्भक्तियोगेन निवृत्तकामाः॥ १४ | मुकुन्दका सच्चे भक्तिभावसे सदा चिन्तन करो। भवसागरमें अनास्तिकत्वात् कृपया भवद्द्व्यो | पड़े हुए दैत्यपुत्रो! तुम लोग नास्तिक नहीं हो, इसलिये वदामि गुह्यं भवसिन्धुसंस्थाः। | दयावश मैं तुमसे यह गोपनीय बात बतलाता हूँ-समस्त सर्वेषु भूतेषु च मित्रभावं | प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखो; क्योंकि सबके भीतर भजन्वयं सर्वगतो हि विष्णुः॥ १५ | भगवान् विष्णु ही विराजमान हैं''॥ ११-१५॥ दैत्यपुत्रा ऊचुः | दैत्यपुत्र बोले-महाबुद्धिमान् प्रह्लादजी! बचपनसे प्रह्लाद त्वं वयं चापि बालभावान्महामते। | लेकर आजतक आप और हम भी षण्डामर्कके सिवा षण्डामर्कात्परं मित्रं गुरुं चान्यं न विद्महे॥ १६ | दूसरे किसी गुरु तथा मित्रको नहीं जान सके। फिर त्वयैतच्छिक्षितं कुत्र तथ्यं नो वद निस्तुषम्। | आपने यह ज्ञान कहाँ सीखा? हमसे पर्दा न रखकर | सच्ची बात बताइये॥ १६ १/२॥ प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले-कहते हैं, जिस समय मेरे पिताजी यदा तातः प्रयातो मे तपोऽर्थं काननं महत्॥ १७ | तपस्या करनेके लिये महान् वनमें चले गये, उसी समय तदा चेन्द्रः समागत्य पुरं तस्य रुरोध ह। | इन्द्रने यहाँ आकर पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मरा मृतं विज्ञाय दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं तदा॥ १८ | हुआ समझकर उनके इस नगरको घेर लिया। इन्द्र इन्द्रो मे जननीं गृह्य प्रयातो मन्मथाग्निना। | कामाग्निसे पीड़ित हो मेरी महाभागा माताजीको पकड़कर दह्यमानो महाभागां मार्गे गच्छति सत्वरम्॥ १९ | यहाँसे चल दिये। वे मार्गमें बड़ी तेजीसे पैर बढ़ाते तदा मां गर्भंगं ज्ञात्वा नारदो देवदर्शनः। | हुए चले जा रहे थे। इसी समय देवदर्शन नारदजी मुझे आगत्येन्द्रं जगादोच्चैर्मूढ मुञ्च पतिव्रताम्॥ २० | माताके गर्भमें स्थित जान सहसा वहाँ पहुँचे और | चिल्लाकर इन्द्रसे बोले-'मूर्ख! इस पतिव्रताको छोड़ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५५
अस्या गर्भे स्थितो योऽसौ स वै भागवतोत्तमः । तच्छ्रुत्वा नारदवचो मातरं प्रणिपत्य मे ॥ २१ विष्णुभक्त्या प्रमुच्याथ गतः स्वं भुवनं हरिः । नारदस्तां समानीय आश्रमं स्वं शुभव्रतः ॥ २२ मामुद्दिश्य महाभागामेतद्वै कथितं तदा । तथा मे विस्मृतं नैव बालाभ्यासाद्हनोः सुताः ॥ २३ विष्णोश्चानुग्रहेणैव नारदस्योपदेशतः । मार्कण्डेय उवाच एकदा गुप्तचर्यायां गतोऽसौ राक्षसाधिपः ॥ २४ शृणोति रात्रौ नगरे जय रामेति कीर्तनम् । अवैत्पुत्रकृतं सर्वं बलवान् दानवेश्वरः ॥ २५ अथाहूयाह दैत्येन्द्रः क्रोधान्धः स पुरोहितान् । रे रे क्षुद्रद्विजा यूयमतिमुमूर्षतां गताः ॥ २६ प्रह्लादोऽयं मृषालापान् वक्तव्यान्यान् पाठयत्यपि । इति निर्भर्त्स्य तान् विप्रान् श्वसन राजाविशद् गृहम् ॥ २७ न च पुत्रवधे चिन्तां जहौ स्ववधकारिणीम् । आसन्नमरणोऽमर्षात्कृत्यमेकं विमृश्य सः ॥ २८ अकृत्यमेव दैत्यादीनाहूयोपादिशद्रहः । अद्य क्षपायां प्रह्लादं प्रसुप्तं दुष्टमुल्बणैः ॥ २९ नागपाशैर्दृढं बद्ध्वा मध्ये निक्षिपताम्बुधेः । तदाज्ञां शिरसाऽऽदाय ददृशुस्तमुपेत्य ते ॥ ३० रात्रिप्रियं समाधिस्थं प्रबुद्धं सुप्तवत् स्थितम् । संछिन्नरागलोभादिमहाबन्धं क्षपाचराः ॥ ३१ बबन्धुस्तं महात्मानं फल्गुभिः सर्परज्जुभिः । गरुडध्वजभक्तं तं बद्ध्वाहिभिरबुद्धयः ॥ ३२ जलशायिप्रियं नीत्वा जलराशौ निचिक्षिपुः । बलिनस्तेऽचलान् दैत्या तस्योपरि निधाय च ॥ ३३ शशंसुस्तं प्रियं राज्ञे द्रुतं तान् सोऽप्यमानयत् ।
दो। इसके गर्भमें जो बालक है, वह भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ है।' नारदजीका कथन सुनकर इन्द्रने विष्णुभक्तिके कारण मेरी माताको प्रणाम करके छोड़ दिया और वे अपने लोकको चले गये। फिर शुभ सङ्कल्पवाले नारदजी मेरी माताको अपने आश्रममें ले आये और मेरे उद्देश्यसे मेरी महाभागा माताके प्रति इस पूर्वोक्त ज्ञानका वर्णन किया। दानवो! बाल्यकालके अभ्यास, भगवान्की कृपा तथा नारदजीका उपदेश होनेसे वह ज्ञान मुझे भूला नहीं है॥ १७-२३१/२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले-एक दिन राक्षसराज हिरण्य- कशिपु रात्रिके समय गुप्तरूपसे नगरमें घूम रहा था। उस समय उसे 'जय राम' का कीर्तन सुनायी देने लगा। तब बलवान् दानवराजने यह सब अपने पुत्रकी ही करतूत समझी। तब उस दैत्यराजने क्रोधान्ध होकर पुरोहितोंको बुलाया और कहा-'नीच ब्राह्मणो! जान पड़ता है, तुमलोग मरनेके लिये अत्यधिक उत्सुक हो गये हो। तुम्हारे देखते-देखते यह प्रह्लाद स्वयं तो व्यर्थकी बातें बकता ही है, दूसरोंको भी यही सिखाता है।' इस प्रकार उन ब्राह्मणोंको फटकारकर राजा हिरण्यकशिपु लम्बी साँसें खींचता हुआ घरमें आया। उस समय भी वह पुत्रवधके विषयमें होनेवाली चिन्ताको, जो उसका ही नाश करनेवाली थी, नहीं छोड़ सका। उसकी मृत्यु निकट थी; अतः उसने अमर्षवश एक ऐसा काम सोचा, जो वास्तवमें न करने योग्य ही था। हिरण्यकशिपुने दैत्यादिकोंको बुलाया और उनसे एकान्तमें कहा-'देखो, आज रातमें प्रह्लाद जब गाढी नींदमें सो जाय, उस समय उस दुष्टको भयंकर नागपाशोंद्वारा खूब कसकर बाँध दो और बीच समुद्रमें फेंक आओ'॥ २४-२९१/२ ॥ उसकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन दैत्योंने प्रह्लादजीके पास जाकर उन्हें देखा। वे रात्रिके ही प्रेमी थे (क्योंकि रातमें ही उन्हें ध्यान लगानेकी सुविधा रहती थी)। प्रह्लादजी समाधिमें स्थित होकर जाग रहे थे, फिर भी खूब सोये हुएके समान स्थित थे। उन्होंने राग और लोभ आदिके महान् बन्धनोंको काट डाला था, तो भी उन महात्मा प्रह्लादको निशाचरोंने तुच्छ नागपाशोंसे बाँध दिया। जिनकी ध्वजामें साक्षात् गरुडजी विराजमान हैं, उन भगवान्के भक्त प्रह्लादको उन मूर्खोंने सर्पोंद्वारा बाँधा और जलशायीके प्रियजनको ले जाकर जलराशि समुद्रमें डाला। तदनन्तर उन बली दैत्योंने प्रह्लादके ऊपर पर्वतकी चट्टानें रख दीं और तुरंत ही जाकर राजा हिरण्यकशिपुको यह प्रिय संवाद कह सुनाया। उसे सुनकर उस दैत्यराजने भी उन सबका सम्मान किया॥ ३०-३३१/२ ॥
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१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३ प्रह्लादं चाब्धिमध्यस्थं तमौर्वाग्निमिवापरम् ॥ ३४ बीच समुद्रमें पड़े हुए प्रह्लादको भगवान्के तेजसे दूसरे वडवानलकी भाँति प्रज्वलित देख अत्यन्त भयके ज्वलन्तं तेजसा विष्णोर्ग्राह्या भूरिभियात्यजन्। कारण ग्राहोंने उन्हें दूरसे ही त्याग दिया। प्रह्लाद भी स चाभिन्नचिदानन्दसिन्धुमध्ये समाहितः ॥ ३५ अपनेसे अभिन्न चिदानन्दमय समुद्र (परमेश्वर)-में समाहित होनेके कारण यह न जान सके कि 'मैं बाँधकर खारे न वेद बद्धमात्मानं लवणाम्बुधिमध्यगम्। पानीके सागरमें डाल दिया गया हूँ।' मुनि (प्रह्लाद) जब अथ ब्रह्मामृताम्भोधिमये स्वस्मिन् स्थिते मुनौ ॥ ३६ ब्रह्मानन्दामृतके समुद्ररूप अपने आत्मामें स्थित हो गये, ययौ क्षोभं द्वितीयाब्धिप्रवेशादिव सागरः । उस समय समुद्र इस प्रकार क्षुब्ध हो उठा, मानो उसमें क्लेशात् क्लेशानि वोद्धूय प्रह्लादमथ वीचयः ॥ ३७ दूसरे महासागरका प्रवेश हो गया हो। फिर समुद्रकी लहरें प्रह्लादको धीरे-धीरे कठिनाईसे ठेलकर उस नौकारहित निन्युस्तीरेऽप्लवाम्भोधेः गुरूक्तय इवाम्बुधेः । सागरके तटकी ओर ले गयीं—ठीक उसी प्रकार, जैसे ध्यानेन विष्णुभूतं तं भगवान् वरुणालयः ॥ ३८ ज्ञानी गुरुके वचन क्लेशोंका उन्मूलन करके शिष्यको भवसागरसे पार पहुँचा देते हैं। ध्यानके द्वारा विष्णुरूप विन्यस्य तीरे रत्नानि गृहीत्वा द्रष्टुमाययौ । हुए उन प्रह्लादजीको तीरपर पहुँचाकर भगवान् वरुणालय तावद् भगवताऽऽदिष्टः प्रहृष्टः पन्नगाशनः ॥ ३९ (समुद्र) बहुत-से रत्न ले उनका दर्शन करनेके लिये आये। इतनेमें ही भगवान्की आज्ञा पाकर सर्पभक्षी बन्धनाहीन् समभ्येत्य भक्षयित्वा पुनर्ययौ । गरुडजी वहाँ आ पहुँचे और बन्धनभूत सर्पोंको अत्यन्त अथाबभाषे प्रह्लादं गम्भीरध्वनिरर्णवः ॥ ४० हर्षपूर्वक खाकर चले गये ॥ ३४—३९१/२ ॥ प्रणम्य दिव्यरूपः सन् समाधिस्थं हरेः प्रियम् । तत्पश्चात् गम्भीर घोषवाला दिव्यरूपधारी समुद्र प्रह्लाद भगवद्भक्त पुण्यात्मन्नर्णवोऽस्म्यहम् ॥ ४१ समाधिनिष्ठ भगवद्भक्त प्रह्लादको प्रणाम करके यों बोला— 'भगवद्भक्त प्रह्लाद! पुण्यात्मन् ! मैं समुद्र हूँ। अपने पास चक्षुर्भ्यामथ मां दृष्ट्वा पावयार्थिनमागतम् । आये हुए मुझ प्रार्थीको अपने नेत्रोंद्वारा देखकर पवित्र इत्यम्बुधिगिरः श्रुत्वा स महात्मा हरेः प्रियः ॥ ४२ कीजिये।' समुद्रके ये वचन सुनकर भगवान्के प्रिय भक्त महात्मा असुर-नन्दन प्रह्लादने सहसा उनकी ओर उद्वीक्ष्य सहसा देवं तं नत्वाऽऽहासुरात्मजः । देखकर प्रणाम किया और कहा—'श्रीमन् कब पधारे?' कदाऽऽगतं भगवता तमथाम्बुधिरब्रवीत् ॥ ४३ तब उनसे समुद्रने कहा— ॥ ४०—४३ ॥ योगिन्नज्ञातवृत्तस्त्वमपराध्दं तवासुरैः । 'योगिन्! आपको यह बात ज्ञात नहीं है, असुरोंने बद्धस्त्वमहिभिर्दैत्यैर्मयि क्षिप्तोऽद्य वैष्णव ॥ ४४ आपका बड़ा अपराध किया है। वैष्णव! आपको साँपोंसे बाँधकर दैत्योंने आज मेरे भीतर फेंक दिया; तब मैंने ततस्तूर्णं मया तीरे न्यस्तस्त्वं फणिनश्च तान् । तुरंत ही आपको किनारे लगाया और उन साँपोंको इदानीमेव गरुडो भक्षयित्वा गतो महान् ॥ ४५ अभी-अभी महात्मा गरुडजी भक्षण करके गये हैं। महात्मन् ! मैं सत्सङ्गका अभिलाषी हूँ, आप मुझपर महात्मन्ननुगृहीष्व त्वं मां सत्संगमार्थिनम् । अनुग्रह करें और इन रत्नोंको भेंटरूपमें स्वीकार गृहाणेमानि रत्नानि पूज्यस्त्वं मे हरैर्यथा ॥ ४६ करें। मेरे लिये आप भगवान् विष्णुके समान ही पूज्य हैं। यद्यपि आपको इन रत्नोंकी कोई आवश्यकता यद्यप्येतैर्न ते कृत्यं रत्नैर्दास्याम्यथाप्यहम् । नहीं है, तथापि मैं तो इन्हें आपको दूँगा ही; क्योंकि दीपान्निवेदयत्येव भास्करस्यापि भक्तिमान् ॥ ४७ भगवान् सूर्यका भक्त उन्हें दीप निवेदन करता ही है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५७ त्वमापत्स्वपि घोरासु विष्णुनेव हि रक्षितः। घोर आपत्तियोंमें भी भगवान् विष्णुने ही आपकी रक्षा त्वादृशा निर्मलात्मानो न सन्ति बहवोऽर्कवत्॥ ४८ की है। सूर्यकी भाँति आप-जैसे शुद्धचित्त महात्मा बहुना किं कृतार्थोऽस्मि यत्तिष्ठामि त्वया सह। संसारमें अधिक नहीं हैं। बहुत क्या कहूँ? आज मैं आलपामि क्षणमपि नेक्षे ह्येतत्फलोपमाम्॥ ४९ कृतार्थ हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके साथ स्थित इत्यब्धिना स्तुतः श्रीशमाहात्म्यवचनैः स्वयम्। होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस समय क्षणभर भी जो ययौ लज्जां प्रहर्षं च प्रह्लादो भगवत्प्रियः॥ ५० आपके साथ बातचीत कर रहा हूँ, इससे प्राप्त होनेवाले प्रतिगृह्य स रत्नानि वत्सलः प्राह वारिधिम्। फलकी उपमा मैं कहीं नहीं देखता'॥४४–४९॥ महात्मन् सुतरां धन्यः शेते त्वयि हि स प्रभुः॥५१ इस प्रकार समुद्रने साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिके कल्पान्तेऽपि जगत्कृत्स्नं ग्रसित्वा स जगन्मयः। माहात्म्यसूचक वचनोंद्वारा जब उनकी स्तुति की, तब त्वय्येवैकार्णवीभूते शेते किल महात्मनि॥५२ भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजीको बड़ी लज्जा हुई और हर्ष लोचनाभ्यां जगन्नाथं द्रष्टुमिच्छामि वारिधे। भी। स्नेही प्रह्लादने समुद्रके दिये हुए रत्न ग्रहणकर उनसे त्वं पश्यसि सदा धन्यस्तत्रोपायं प्रयच्छ मे॥५३ कहा—'महात्मन्! आप विशेष धन्यवादके पात्र हैं; क्योंकि उक्तेति पादावनतं तूर्णमुत्थाप्य सागरः। भगवान् आपके ही भीतर शयन करते हैं। यह प्रसिद्ध है प्रह्लादं प्राह योगीन्द्र त्वं पश्यसि सदा हृदि॥५४ कि जगन्मय प्रभु प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें द्रष्टुमिच्छस्यथाक्षिभ्यां स्तुहि तं भक्तवत्सलम्। लीन करके एकार्णवरूपमें स्थित आप महात्मा महासागरमें उक्तेति सिन्धुः प्रह्लादमात्मनः स जलेऽविशत्॥५५ ही शयन करते हैं। समुद्र! मैं इन स्थूल नेत्रोंसे भगवान् गते नदीन्द्रे स्थित्वैको हरिं रात्रौ स दैत्यजः। जगन्नाथका दर्शन करना चाहता हूँ। आप धन्य हैं; क्योंकि भक्त्यास्तौदिति मन्वानस्तद्दर्शनमसम्भवम्॥ ५६ सदा भगवान्का दर्शन करते रहते हैं। कृपया मुझे भी प्रह्लाद उवाच उनके दर्शनका उपाय बताइये'॥ ५०-५३॥ वेदान्तवाक्यशतमारुतसम्पवृद्ध- यों कहकर प्रह्लादजी समुद्रके चरणोंपर गिर पड़े। वैराग्यवह्निशिखया परिताप्य चित्तम्। तब समुद्रने उनको शीघ्र ही उठाकर कहा—'योगीन्द्र! संशोधयन्ति यदवेक्षणयोग्यतायै आप तो सदा ही अपने हृदयमें भगवान्का दर्शन करते धीराः सदैव स कथं मम गोचरः स्यात्॥ ५७ हैं; तथापि यदि इन नेत्रोंसे भी देखना चाहते हैं तो उन मात्सर्यरोषस्मरलोभमोह- भक्तवत्सल भगवान्का स्तवन कीजिये।' यों कहकर मदादिभिर्वा सुदृढैः सुषड्भिः। समुद्रदेव अपने जलमें प्रविष्ट हो गये॥५४-५५॥ उपर्युपर्यावरणैः सुबद्ध- समुद्रके चले जानेपर दैत्यनन्दन प्रह्लादजी रात्रिमें वहाँ मन्धं मनो मे क्व हरिः क्व वाहम्॥ ५८ अकेले ही रहकर भगवान्के दर्शनको एक असम्भव यं धातृमुख्या विबुधा भयेषु कार्य मानते हुए भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥ शान्त्यर्थिनः क्षीरनिधेरुपान्तम्। प्रह्लादजी बोले—धीर पुरुष जिनके दर्शनकी योग्यता गत्वोत्तमस्तोत्रकृतः कथंचित् प्राप्त करनेके लिये सदा ही सैकड़ों वेदान्त-वाक्यरूप पश्यन्ति तं द्रष्टुमहो ममाशा॥ ५९ वायुद्वारा अत्यन्त बढ़ी हुई वैराग्यरूप अग्निकी ज्वालासे अपने चित्तको तपाकर भलीभाँति शुद्ध किया करते हैं, वे भगवान् विष्णु, भला, मेरे दृष्टिपथमें कैसे आ सकते हैं। एकके ऊपर एकके क्रमसे ऊपर-ऊपर जिनका आवरण पड़ा हुआ है—ऐसे मात्सर्य, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद आदि छः सुदृढ़ बन्धनोंसे भलीभाँति बँधा हुआ मेरा मन अंधा (विवेकशून्य) हो रहा है। कहाँ भगवान् श्रीहरि और कहाँ मैं! भय उपस्थित होनेपर उसकी शान्तिके लिये क्षीरसागरके तटपर जाकर ब्रह्मादि देवता उत्तम रीतिसे स्तवन करते हुए किसी प्रकार जिनका दर्शन कर पाते हैं, उन्हीं भगवान्के दर्शनकी मुझ-जैसा दैत्य आशा करे— यह कैसा आश्चर्य है!॥ ५७-५९॥
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१५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अयोग्यमात्मानमितीशदर्शने राजन्! इस प्रकार अपनेको भगवान्का दर्शन पानेके स मन्यमानस्तदनासिकातरः । योग्य न मानते हुए प्रह्लादजी उनकी अप्राप्तिके दुःखसे उद्वेगदुःखार्णवमग्नमानसः कातर हो उठे। उनका चित्त उद्वेग और अनुतापके समुद्रमें स्रुताश्रुधारो नृप मूर्च्छितोऽपतत् ॥ ६० डूब गया। वे नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़े। भूप! फिर तो क्षणभरमें ही भक्तजनोंके अथ क्षणात्सर्वगतश्चतुर्भुजः एकमात्र प्रियतम सर्वव्यापी कृपानिधान भगवान् विष्णु शुभाकृतिर्भक्तजनैकवल्लभः । सुन्दर चतुर्भुज रूप धारणकर दुःखी प्रह्लादको अमृतके दुःस्थं तमाश्लिष्य सुधामयैर्भुजै- समान सुखद स्पर्शवाली अपनी भुजाओंसे उठाकर गोदमें स्तत्रैव भूपाविरभूद्दयानिधिः ॥ ६१ लगाते हुए वहाँ प्रकट हो गये ॥ ६०-६१ ॥ स लब्धसंज्ञोऽथ तदङ्गसङ्गा- उनके अङ्गस्पर्शसे होशमें आनेपर प्रह्लादने सहसा नेत्र दुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श । खोलकर भगवान्को देखा। उनका मुख प्रसन्न था। नेत्र प्रसन्नवक्त्रं कमलायताक्षं कमलके समान सुन्दर और विशाल थे। भुजाएँ बड़ी- सुदीर्घबाहुं यमुनासवर्णम् ॥ ६२ बड़ी थीं और शरीर यमुनाजलके समान श्याम था। वे उदारतेजोमयमप्रमेयं परम तेजस्वी और अपरिमित ऐश्वर्यशाली थे। गदा, शङ्ख, गदारिशङ्खाम्बुजचारुचिह्नितम् । चक्र और पद्म आदि सुन्दर चिह्नोंसे पहचाने जा रहे थे। स्थितं समालिङ्ग्य विभुं स दृष्ट्वा इस प्रकार अपनेको अङ्कमें लगाये हुए भगवान्को खड़ा प्रकम्पितो विस्मयभीतिहर्षैः ॥ ६३ देख प्रह्लाद भय, विस्मय और हर्षसे काँप उठे, वे इस तत् स्वप्नमेवाथ स मन्यमानः घटनाको स्वप्न ही समझते हुए सोचने लगे—'अहा! स्वप्नेऽपि पश्यामि हरिं कृतार्थम् । स्वप्नमें भी मुझे पूर्णकाम भगवान्का दर्शन तो मिल गया!' इति प्रहर्षार्णवमग्नचेताः यह सोचकर उनका चित्त हर्षके महासागरमें गोता लगाने स्वानन्दमूर्च्छां स पुनश्च भेजे ॥ ६४ लगा और वे पुनः स्वरूपानन्दमयी मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। ततः क्षितावेव निविश्य नाथः तब अपने भक्तोंके एकमात्र बन्धु भगवान् पृथ्वीपर ही कृत्वा तमङ्के स्वजनैकबन्धुः । बैठ गये और पाणिपल्लवसे धीरे-धीरे उन्हें हिलाने लगे। शनैर्विधुन्वन् करपल्लवेन स्नेहमयी माताकी भाँति प्रह्लादके गात्रका स्पर्श करते हुए स्पृशन् मुहुर्मातृवदालिलिङ्ग ॥ ६५ उन्हें बार-बार छातीसे लगाने लगे ॥ ६२-६५ ॥ ततश्चिरेण प्रह्लादः सम्मुखोन्मीलितेक्षणः । कुछ देरके बाद प्रह्लादने भगवान्के सामने आँखें खोलकर आलुलोके जगन्नाथं विस्मयाविष्टचेतसा ॥ ६६ विस्मितचित्तसे उन जगदीश्वरको देखा। फिर बहुत देरके ततश्चिरात्तं सम्भाव्य धीरः श्रीशाङ्कशायिनम् । बाद अपनेको भगवान् लक्ष्मीपतिकी गोदमें सोया हुआ आत्मानं सहसोत्तस्थौ सद्यः सभयसम्भ्रमः ॥ ६७ अनुभवकर वे भय और आवेगसे युक्त हो सहसा उठ गये प्रणामायापतद्भूम्यां प्रसीदेति वदन्मुहुः । तथा 'भगवन्! प्रसन्न होइये' यों बार-बार कहते हुए उन्हें सम्भ्रमात् स बहुज्ञोऽपि नान्यां पूजोक्तिमस्मरत् ॥ ६८ साष्टाङ्ग प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर गिर पड़े। बहुज्ञ तमथाभयहस्तेन गदाशङ्खारिधृक् प्रभुः । होनेपर भी उन्हें उस समय घबराहटके कारण अन्य गृहीत्वा स्थापयामास प्रह्लादं स दयानिधिः ॥ ६९ स्तुतिवाक्योंका स्मरण न हुआ। तब गदा, शङ्ख और चक्र कराब्जस्पर्शनाह्लादगलदश्रुं सवेपथुम् । धारण करनेवाले दयानिधि भगवान्ने प्रह्लादको अपने भूयोऽथाह्लादयन् स्वामी तं जगादेति सान्त्वयन् ॥ ७० भक्तभयहारी हाथसे पकड़कर खड़ा किया। भगवान्के कर- कमलोंका स्पर्श होनेसे अत्यन्त आनन्दके आँसू बहाते और काँपते हुए प्रह्लादको और अधिक आनन्द देनेके लिये प्रभुने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ६६-७० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५९
अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५९ सभयं सम्भ्रमं वत्स मद्गौरवकृतं त्यज। 'वत्स! मेरे प्रति गौरव-बुद्धिसे होनेवाले इस भय नैवं प्रियो मे भक्तेषु स्वाधीनप्रणयी भव ॥ ७१ और घबराहटको त्याग दो। मेरे भक्तोंमें तुम्हारे समान कोई भी मुझे प्रिय नहीं है, तुम स्वाधीनप्रणयी हो जाओ नित्यं सम्पूर्णकामस्य जन्मानि विविधानि मे। [अर्थात् यह समझो कि तुम्हारा प्रेमी मैं तुम्हारे वशमें भक्तसर्वेष्टदानाय तस्मात् किं ते प्रियं वद ॥ ७२ हूँ]। मैं नित्य पूर्णकाम हूँ, तथापि भक्तोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेके लिये मेरे अनेक अवतार हुआ करते हैं; अतः तुम भी बताओ, तुम्हें कौन-सी अथ व्यजिज्ञपद्विष्णुं प्रह्लादः प्राञ्जलिर्नमन्। सलौल्यमुत्फुल्लदृशा पश्यन्नेवं च तन्मुखम् ॥ ७३ वस्तु प्रिय है?'॥ ७१-७२॥ तदनन्तर खिले हुए नेत्रोंसे भगवान्के मुखको सतृष्णभावसे देखते हुए प्रह्लादने हाथ जोड़ नमस्कारपूर्वक उनसे यों नाप्ययं वरदानाय कालो नैष प्रसीद मे। निवेदन किया—'भगवन्! यह वरदानका समय नहीं है, त्वद्दर्शनामृतास्वादादन्तरात्मा न तृप्यति ॥ ७४ केवल मुझपर प्रसन्न होइये। इस समय मेरा मन आपके दर्शनरूपी अमृतका आस्वादन करनेसे तृप्त नहीं हो रहा ब्रह्मादिदेवैर्दुर्लक्ष्यं त्वामेव पश्यतः प्रभो। है। प्रभो! ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी जिनका दर्शन पाना तृप्तिं नेष्यति मे चित्तं कल्पायुतशतैरपि ॥ ७५ कठिन है, ऐसे आपका दर्शन करते हुए मेरा मन दस लाख वर्षोंमें भी तृप्त न होगा। इस प्रकार आपके दर्शनसे अतृप्त रहनेवाले मुझ सेवकका चित्त आपके दर्शनके बाद नैवमेतद्ध्यतृप्तस्य त्वां दृष्ट्वाऽन्यद् वृणोति किम्। और क्या माँग सकता है?'॥ ७३-७५ १/२ ॥ ततः स्मितसुधापूरैः पूरयन् स प्रियं प्रियात् ॥ ७६ तब मुस्कानमयी सुधाका स्रोत बहाते हुए उन जगदीशने अपने परम प्रिय भक्त प्रह्लादको मोक्ष- योजयन् मोक्षलक्ष्म्यैव तं जगाद जगत्पतिः। लक्ष्मीसे संयुक्त-सा करते हुए उससे कहा—'वत्स! यह सत्यं मद्दर्शनादन्यद् वत्स नैवास्ति ते प्रियम् ॥ ७७ सत्य है कि तुम्हें मेरे दर्शनसे बढ़कर दूसरा कुछ भी प्रिय नहीं है; किंतु मेरी इच्छा तुम्हें कुछ देनेकी है। किंचित्ते दातुमिष्टं मे मत्प्रीयार्थं वृणीष्व तत्। अतः तुम मेरा प्रिय करनेके लिये ही मुझसे कुछ माँग प्रह्लादोऽथाब्रवीद्धीमान् देव जन्मान्तरेष्वपि ॥ ७८ लो'॥७६-७७१/२॥ तब बुद्धिमान् प्रह्लादने कहा—'देव! मैं जन्मान्तरोंमें भी गरुडजीकी भाँति आपमें ही भक्ति रखनेवाला आपका दासस्तवाहं भूयासं गरुत्मानिव भक्तिमान्। अथाह नाथः प्रह्लादं संकटं खल्विदं कृतम् ॥ ७९ दास होऊँ!' यह सुनकर भगवान्ने कहा—'यह तो तुमने मेरे लिये कठिन समस्या रख दी-मैं तो तुम्हें स्वयं अपने-आपको दे देना चाहता हूँ और तुम मेरी अहं त्वात्मदानेच्छुस्त्वं तु भृत्यत्वमिच्छसि। दासता चाहते हो! बुद्धिमान् दैत्यराजकुमार! दूसरे-दूसरे वरानन्यांश्च वरय धीमन् दैत्येश्वरात्मज ॥ ८० वर माँगो'॥ ७८-८०॥ तब प्रह्लादने भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवान् प्रह्लादोऽपि पुनः प्राह भक्तकामप्रदं हरिम्। विष्णुसे पुनः कहा—'नाथ! आप प्रसन्न हों; मुझे तो यही प्रसीद सास्तु मे नाथ त्वद्भक्तिः सात्त्विकी स्थिरा ॥ ८१ चाहिये कि आपमें मेरी सात्त्विक भक्ति सदा स्थिर रहे।
१६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४
१६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४
[श्लोक ८२ – ८९ एवं हिन्दी अनुवाद]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनयाथ च त्वां नौमि नृत्यामि तत्परः सदा।<br>अथाभितुष्टो भगवान् प्रियमाह प्रियंवदम् ॥ ८२<br><br>वत्स यद्यदभीष्टं ते तत्तदस्तु सुखी भव।<br>अन्तर्हिते च मय्यत्र मा खिद त्वं महामते ॥ ८३<br><br>त्वच्चित्तान्नापयास्यामि क्षीराब्धेरिव सुप्रियात्।<br>पुनर्द्वित्रिदिनैस्त्वं मां द्रष्टा दुष्टवधोद्यतम् ॥ ८४<br><br>अपूर्वाविष्कृताकारं नृसिंहं पापभीषणम्।<br>उक्त्वेत्यतः प्रणमतः पश्यतश्चातिलालसम् ॥ ८५<br><br>अतृप्तस्यैव तस्येशो माययान्तर्दधे हरिः।<br>ततो हताददृष्ट्वा तं सर्वतो भक्तवत्सलम् ॥ ८६<br><br>हाहेत्यश्रुप्लुतः प्रोच्य ववन्दे स चिरादिति।<br>श्रूयमाणेऽथ परितः प्रतिबुद्धजनस्वने ॥ ८७<br><br>उत्थायाब्धितटाद्धीमान् प्रह्लादः स्वपुरं ययौ ॥ ८८<br><br>अथ दितिजसुतश्चिरं प्रहृष्टः<br> स्मृतिबलतः परितस्तमेव पश्यन्।<br>हरिमनुजगत्तिं त्वलं च पश्यन्<br> गुरुगृहमृतपुलकः शनैरवाप ॥ ८९ | यही नहीं, इस भक्तिसे युक्त होकर मैं आपका स्तवन किया करूँ और आपके ही परायण रहकर सदा नाचा करूँ'॥ ८११/२॥<br><br>भगवान्ने संतुष्ट होकर प्रिय भाषण करनेवाले प्रिय भक्त प्रह्लादसे तब कहा—'वत्स! तुम्हें जो-जो अभीष्ट हो, वह सब प्राप्त हो; तुम सुखी रहो। एक बात और है—महामते! यहाँसे मेरे अन्तर्धान हो जानेपर भी तुम खेद न करना। मैं अपने परमप्रिय स्थान क्षीरसागरकी भाँति तुम्हारे शुद्धचित्तसे कभी अलग न होऊँगा। तुम दो-ही-तीन दिनोंके बाद मुझे दुष्ट हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये उद्यत अपूर्व शरीर धारण किये नृसंहरूपमें, जो पापियोंके लिये भयानक है, पुनः प्रकट देखोगे।' यों कहकर भगवान् हरि, अपनेको प्रणाम करके अत्यन्त ललचायी हुई दृष्टिसे देखते रहनेपर भी तृप्त न होनेवाले उस भक्त प्रह्लादके सामने ही मायासे अन्तर्धान हो गये॥ ८२-८५१/२॥<br><br>तत्पश्चात् वे सहसा सब ओर दृष्टि डालनेपर भी जब भक्तवत्सल भगवान्को न देख सके, तब आँसू बहाते हुए उच्चस्वरसे हाहाकार करके बड़ी देरतक भगवान्की वन्दना करते रहे। फिर जब प्रातःकाल जगे हुए जन्तुओंकी वाणी सब ओर सुनायी देने लगी, तब बुद्धिमान् प्रह्लाद समुद्र-तटसे उठकर अपने नगरको चले गये। इसके बाद दैत्यनन्दन प्रह्लादजी परम प्रसन्न होकर अपने स्मरणबलसे संसारमें सब ओर भगवान्का ही दर्शन करते हुए तथा भगवान् एवं मनुष्यकी गतिको भलीभाँति समझते हुए रोमाञ्चित होकर धीरे-धीरे गुरुके घर गये॥ ८६-८९॥ |
इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतारविषयक' तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>अथागतं ते प्रह्लादं दृष्ट्वा दैत्याः सुविस्मिताः।<br>शशंसुर्दैत्यपतये यैः क्षिप्तः स महार्णवे ॥ १<br>स्वस्थं तमागतं श्रुत्वा दैत्यराड्विस्मयाकुलः। | **मार्कण्डेयजी बोले—**तदनन्तर प्रह्लादको [कुशलपूर्वक समुद्रसे] लौटा देखकर, जिन्होंने उन्हें महासागरमें डाला था, वे दैत्य बड़े विस्मित हुए और उन्होंने तुरंत यह समाचार दैत्यराज हिरण्यकशिपुको दिया। उन्हें स्वस्थ |
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अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६१
अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६१
आहूयतां च इत्याह क्रोधान्मृत्युवशे स्थितः ॥ २ तथासुरैर्दुरा नीतः समासीनं स दिव्यदृक् । आसन्नमृत्युं दैत्येन्द्रं ददर्शात्यूर्जितश्रियम् ॥ ३
नीलांशुमिश्रमाणिक्यद्युतिच्छन्नविभूषणम् । सधूमाग्निमिव व्यासमुच्चासनचितिस्थितम् ॥ ४
दंष्ट्रोत्कटैर्घोरतरैर्घनच्छविभिरुद्धतैः । कुमार्गदर्शिभिर्दैत्यैर्यमदूतैरिवावृतम् ॥ ५
दूरात् प्रणम्य पितरं प्राञ्जलिस्तु व्यवस्थितः । अथाहाकारणक्रोधः स खलो भर्त्सयन् सुतम् ॥ ६
भगवत्प्रियमत्युच्चैर्मृत्युमेवाश्रयन्निव । मूढ रे शृणु मद्वाक्यमेतदेवान्तिमं ध्रुवम् ॥ ७
इतो न त्वां प्रवक्ष्यामि श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् । उक्तेवेति द्रुतमाकृष्य चन्द्रहासासिमद्भुतम् ॥ ८
सम्भ्रमाद्वीक्षितः सर्वैश्चालयन्नाह तं पुनः । क्व चास्ति मूढ ते विष्णुः स त्वामद्य परक्षतु ॥ ९
त्वयोक्तं स हि सर्वत्र कस्मात्स्तम्भे न दृश्यते । यदि पश्यामि तं विष्णुमधुना स्तम्भमध्यगम् ॥ १०
तर्हि त्वां न वधिष्यामि भविष्यसि द्विधान्यथा । प्रह्लादोऽपि तथा दृष्ट्वा दध्यौ तं परमेश्वरम् ॥ ११
पुरोक्तं तद्वचः स्मृत्वा प्रणनाम कृताञ्जलिः । तावत्प्रस्फुटितस्तम्भो वीक्षितो दैत्यसूनुना ॥ १२
आदर्शरूपो दैत्यस्य खड्गतो यः प्रतिष्ठितः । तन्मध्ये दृश्यते रूपं बहुयोजनमायतम् ॥ १३
अतिरौद्रं महाकायं दानवानां भयंकरम् । महानेत्रं महावक्त्रं महादंष्ट्रं महाभुजम् ॥ १४
महानखं महापादं कालाग्निसदृशाननम् । कर्णान्तकृतविस्तारवदनं चातिभीषणम् ॥ १५
लौटा सुन दैत्यराज विस्मयसे व्याकुल हो उठा और क्रोधवश मृत्युके अधीन होकर बोला-'उसे यहाँ बुला लाओ।' असुरोंके द्वारा बुरी तरहसे पकड़कर लाये जानेपर दिव्यदृष्टिवाले प्रह्लादने सिंहासनपर बैठे हुए दैत्यराज हिरण्यकशिपुको देखा। उसकी मृत्यु निकट थी, उसका तेज बहुत बढ़ा हुआ था। उसके आभूषण नीलप्रभायुक्त माणिक्योंकी कान्तिसे आच्छन्न थे, अतएव वह धूमयुक्त फैली हुई अग्निके समान शोभित हो रहा था। वह ऊँचे सिंहासन-मञ्चपर विराजमान था और उसे मेघके समान काले दाढ़ोंके कारण विकराल, अत्यन्त भयानक, कुमार्गदर्शी एवं यमदूतोंके समान क्रूर दैत्य घेरे हुए थे॥ १-५॥
प्रह्लादजीने दूरसे ही हाथ जोड़कर पिताको प्रणाम किया और खड़े हो गये। तब मृत्युके निकट पहुँचनेवालेकी भाँति अकारण ही क्रोध करनेवाले उस दुष्टने भगवद्भक्त पुत्रको उच्चस्वरसे डाँटते हुए कहा-'अरे मूर्ख ! तू मेरा यह अन्तिम और अटल वचन सुन; इसके बाद मैं तुझसे कुछ न कहूँगा; इसे सुनकर तेरी जैसी इच्छा हो, वही करना।' यह कहकर उसने शीघ्र ही चन्द्रहास नामक अपनी अद्भुत तलवार खींच ली। उस समय सब लोग उसकी ओर आश्चर्यपूर्वक देखने लगे। उसने तलवार चलाते हुए पुनः प्रह्लादसे कहा-'रे मूढ़! तेरा विष्णु कहाँ है ? आज वह तेरी रक्षा करे ! तूने कहा था कि वह सर्वत्र है। फिर इस खंभेमें क्यों नहीं दिखायी देता ? यदि तेरे विष्णुको इस खंभेके भीतर देख लूँगा, तब तो तुझे नहीं मारूँगा; यदि ऐसा न हुआ तो इस तलवारसे तेरे दो टुकड़े कर दिये जायँगे' ॥ ६-१० १/२ ॥
प्रह्लादने भी ऐसी बात देखकर उन परमेश्वरका ध्यान किया और पहले कहे हुए उनके वचनको याद करके हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम किया। इतनेमें ही दैत्यनन्दन प्रह्लादने देखा कि वह दर्पणके समान स्वच्छ खंभा, जो अभीतक खड़ा था, दैत्यराजकी तलवारके आघातसे फट पड़ा तथा उसके भीतर अनेक योजन विस्तारवाला, अत्यन्त रौद्र एवं महाकाय नरसिंहरूप दिखायी दिया, जो दानवोंको भयभीत करनेवाला था। उसके बड़े-बड़े नेत्र, विशाल मुख, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और लंबी-लंबी भुजाएँ थीं। उसके नख बहुत बड़े और पैर विशाल थे। उसका मुख कालाग्निके समान देदीप्यमान था, जबड़े कानतक फैले हुए थे और वह बहुत भयानक दिखायी देता था ॥ ११-१५ ॥
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१६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४
१६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४ कृत्वेत्थं नारसिंहं तु ययौ विष्णुस्त्रिविक्रमः । नरसिंहः स्तम्भमध्यान्निर्गत्य प्रणनाद च ॥ १६ निनादश्रवणाद्दैत्या नरसिंहमवेष्टयन् । तान् हत्वा सकलांस्तत्र स्वपौरुषपराक्रमात् ॥ १७ बभञ्ज च सभां दिव्यां हिरण्यकशिपोर्नृप । वारयामासुरभ्येत्य नरसिंहं महाभटाः ॥ १८ ते तु राजन् क्षणादेव नरसिंहेन वै हताः । ततः शस्त्राणि वर्षन्ति नरसिंहे प्रतापिणि ॥ १९ स तु क्षणेन भगवान् हत्वा तद्बलमोजसा । ननाद च महानादं दिशः शब्देन पूरयन् ॥ २० तान्मृतानपि विज्ञाय पुनरन्यान्महासुरः । अष्टाशीतिसहस्राणि हेतिहस्तान् समादिशत् ॥ २१ तेऽप्यागत्य च तं देवं रुरुधुः सर्वतोदिशम् । हत्वा तानखिलान् युद्धे युध्यमानो ननाद सः ॥ २२ पुनः सभां बभञ्जासौ हिरण्यकशिपोः शुभाम् । तान् हतानपि विज्ञाय क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २३ ततो हिरण्यकशिपुर्निष्चक्राम महाबलः । उवाच च महीपाल दानवान् बलदर्पितान् ॥ २४ हन्यतां हन्यतामेष गृह्यतां गृह्यतामयम् । इत्येवं वदतस्तस्य प्रमुखे तु महासुरान् ॥ २५ युध्यमानान् रणे हत्वा नरसिंहो ननाद च । ततोऽतिदुद्रुवुर्दैत्या हतशेषा दिशो दश ॥ २६ तावद्धता युध्यमाना दैत्याः कोटिसहस्रशः । नरसिंहेन यावच्च नभोभागं गतो रविः ॥ २७ शस्त्रास्त्रवर्षचतुरं हिरण्यकशिपुं जवात् । प्रगृह्य तु बलाद्राजन् नरसिंहो महाबलः ॥ २८ संध्याकाले गृहद्वारि स्थित्वोरौ स्थाप्य तं रिपुम् । वज्रतुल्यमहोरस्कं हिरण्यकशिपुं रुषा । नखैः किसलयमिव दारयत्याह सोऽसुरः ॥ २९ इस प्रकार नरसिंहरूप धारणकर त्रिविक्रम भगवान् विष्णु खंभेके भीतरसे निकल पड़े और लगे बड़े जोर-जोरसे दहाड़ने। नरेश्वर! यह गर्जना सुनकर दैत्योंने भगवान् नरसिंहको घेर लिया। तब उन्होंने अपने पौरुष एवं पराक्रमसे उन सबको मौतके घाट उतारकर हिरण्यकशिपुका दिव्य सभाभवन नष्ट कर दिया। राजन्! उस समय जिन महाभटोंने निकट आकर नृसिंहजीको रोका, उन सबको उन्होंने क्षणभरमें मार डाला। तत्पश्चात् प्रतापी नरसिंहभगवान्पर असुर सैनिक अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ १६-१९ ॥ भगवान् नृसिंहने क्षणभरमें ही अपने तेजसे समस्त दैत्यसेनाका संहार कर दिया और दिशाओंको अपनी गर्जनासे गुँजाते हुए वे भयंकर सिंहनाद करने लगे। उपर्युक्त दैत्योंको मरा जान महासुर हिरण्यकशिपुने पुनः हाथमें शस्त्र लिये हुए अट्ठासी हजार असुर सैनिकोंको नृसिंहदेवसे लड़नेकी आज्ञा दी। उन असुरोंने भी आकर भगवान्को सब ओरसे घेर लिया। तब युद्धमें लड़ते हुए भगवान् उन सभीका वध करके पुनः सिंहनाद करने लगे। उन्होंने हिरण्यकशिपुके दूसरे सुन्दर सभाभवनको भी पुनः नष्ट कर दिया। राजन्! अपने भेजे हुए इन असुरोंको भी मारा गया जान क्रोधसे लाल-लाल आँखें करके महाबली हिरण्यकशिपु स्वयं बाहर निकला और बलाभिमानी दानवोंसे बोला—'अरे, इसे पकड़ो-पकड़ो; मार डालो, मार डालो। इस प्रकार कहते हुए हिरण्यकशिपुके सामने ही युद्ध करनेवाले उन सभी महान् असुरोंका रणमें संहार करके भगवान् नृसिंह गर्जने लगे। तब मरनेसे बचे हुए दैत्य दसों दिशाओंमें वेगपूर्वक भाग चले ॥ २०-२६ ॥ जबतक सूर्यदेव अस्ताचलको नहीं चले गये, तबतक भगवान् नृसिंह अपने साथ युद्ध करनेवाले हजारों करोड़ दैत्योंका संहार करते रहे। राजन्! किंतु जब सूर्य डूबने लगे, तब महाबली भगवान् नृसिंहने अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करनेमें कुशल हिरण्यकशिपुको बड़े वेगसे बलपूर्वक पकड़ लिया। फिर संध्याके समय घरके दरवाजेपर बैठकर, उस वज्रके समान कठोर विशाल वक्षवाले शत्रु हिरण्यकशिपुको अपनी जाँघोंपर गिराकर जब भगवान् नृसिंह रोषपूर्वक नखोंसे पत्तेकी भाँति उसे विदीर्ण करने लगे, तब उस महान् असुरने जीवनसे निराश होकर कहा— ॥ २७-२९ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth 113 Narsingpuran_Section_7_1_Back
अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६३
अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६३ यत्राखण्डलदन्तिदन्तमुसला- 'हाय! युद्धके समय देवराज इन्द्रके वाहन गजराज न्याखण्डितान्याहवे ऐरावतके मूसल-जैसे दाँत जहाँ टकराकर टुकड़े-टुकड़े धारा यत्र पिनाकपाणिपरशो- हो गये थे, जहाँ पिनाकपाणि महादेवके फरसेकी तीखी राकुण्ठतामागमत् । धार भी कुण्ठित हो गयी थी, वहीं मेरा वक्षःस्थल इस तन्मे तावदुरो नृसिंहकरजै- समय नृसिंहके नखोंद्वारा फाड़ा जा रहा है। सच है, जब र्व्यादीर्यते साम्प्रतं भाग्य खोटा हो जाता है, तब तिनका भी प्रायः अनादर दैवे दुर्जनतां गते तृणमपि करने लगता है' ॥ ३० ॥ प्रायोऽप्यवज्ञायते ॥ ३० दैत्यराज हिरण्यकशिपु इस प्रकार कह ही रहा एवं वदति दैत्येन्द्रे ददार नरकेसरी। था कि भगवान् नृसिंहने उसका हृदयदेश विदीर्ण कर हृदयं दैत्यराजस्य पद्मपत्रमिव द्विपः ॥ ३१ दिया-ठीक उसी तरह, जैसे हाथी कमलके पत्तेको शकले द्वे तिरोभूते नखरन्ध्रे महात्मनः। अनायास ही छिन्न-भिन्न कर देता है। उसके शरीरके दोनों टुकड़े महात्मा नृसिंहके नखोंके छेदमें घुसकर ततः क्व यातो दुष्टोऽसाविति देवोऽतिविस्मितः ॥ ३२ छिप गये। राजन्! तब भगवान् सब ओर देखकर अत्यन्त विस्मित हो सोचने लगे-'अहो! वह दुष्ट कहाँ निरीक्ष्य सर्वतो राजन् वृथैतत्कर्म मेऽभवत् । चला गया? जान पड़ता है, मेरा यह सारा उद्योग ही इति संचिन्त्य राजेन्द्र नरसिंहो महाबलः ॥ ३३ व्यर्थ हो गया' ॥ ३१-३२१/२ ॥ व्यधुनत्करावुच्चैस्ततस्ते शकले नृप। राजेन्द्र! महाबली नृसिंह इस प्रकार चिन्तामें पड़कर नखरन्धान्निपतिते भूमौ रेणुसमे हरेः ॥ ३४ अपने दोनों हाथोंको बड़े जोरसे झाड़ने लगे। राजन्! फिर तो वे दोनों टुकड़े उन भगवान्के नख-छिद्रसे दृष्ट्वा व्यतीतसंरम्भो जहास परमेश्वरः। निकलकर भूमिपर गिर पड़े, वे कुचलकर धूलिकणके पुष्पवर्षं च वर्षन्तो नरसिंहस्य मूर्धनि ॥ ३५ समान हो गये थे। यह देख रोषहीन हो वे परमेश्वर हँसने लगे। इसी समय ब्रह्मादि सभी देवता अत्यन्त देवाः सब्रह्मकाः सर्वे आगताः प्रीतिसंयुताः। प्रसन्न हो वहाँ आये और भगवान् नरसिंहके मस्तकपर आगत्य पूजयामासुर्नरसिंहं परं प्रभुम् ॥ ३६ फूलोंकी वर्षा करने लगे। पास आकर उन सबने उन परम प्रभु नरसिंहदेवका पूजन किया ॥ ३३-३६ ॥ ब्रह्मा च दैत्यराजानं प्रह्लादमभिषेचयत् । तदनन्तर ब्रह्माजीने प्रह्लादको दैत्योंके राजाके पदपर धर्मे रतिः समस्तानां जनानामभवत्तदा ॥ ३७ अभिषिक्त किया। उस समय समस्त प्राणियोंका धर्ममें अनुराग हो गया। सम्पूर्ण देवताओंसहित भगवान् विष्णुने इन्द्रोऽपि सर्वदेवैस्तु हरिणा स्थापितो दिवि । इन्द्रको स्वर्गके राज्यपर स्थापित किया। भगवान् नृसिंह नरसिंहोऽपि भगवान् सर्वलोकहिताय वै ॥ ३८ भी सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये श्रीशैलके शिखरपर जा पहुँचे। वहाँ देवताओंसे पूजित हो वे श्रीशैलशिखरं प्राप्य विश्रुतः सुरपूजितः । प्रसिद्धिको प्राप्त हुए। वे भक्तोंका हित और अभक्तोंका स्थितो भक्तहितार्थाय अभक्तानां क्षयाय च ॥ ३९ नाश करनेके लिये वहीं रहने लगे ॥ ३७-३९ ॥ इत्येतन्नरसिंहस्य माहात्म्यं यः पठेन्नरः । नृपश्रेष्ठ! जो मनुष्य भगवान् नरसिंहके इस माहात्म्यको शृणोति वा नृपश्रेष्ठ मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ४० पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता 1113 Narsingpuran_Section_7_2_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४५
१६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४५ नरो वा यदि वा नारी शृणोत्याख्यानमुत्तमम्। | है। नर हो या नारी—जो भी इस उत्तम आख्यानको सुनता वैधव्याद्दुःखशोकाच्च दुष्टसङ्गात्प्रमुच्यते॥ ४१ | है, वह दुष्टोंका सङ्ग करनेके दोषसे, दुःखसे, शोकसे एवं वैधव्यके कष्टसे छुटकारा पा जाता है। जो दुष्ट स्वभाववाला, दुःशीलोऽपि दुराचारो दुष्प्रजो दोषकर्मकृत्। | दुराचारी, दुष्ट संतानवाला, दूषित कर्मोंका आचरण करनेवाला, अधर्मिष्ठोऽनभोगी च शृण्वन् शुद्धो भवेन्नरः॥ ४२ | अधर्मात्मा और विषयभोगी हो, वह मनुष्य भी इसका श्रवण करनेसे शुद्ध हो जाता है॥ ४०—४२॥ हरिः सुरेशो नरलोकपूजितो | मनुष्यलोकपूजित देवेश्वर भगवान् हरिने पूर्वकालमें हिताय लोकस्य चराचरस्य। | चराचर जगत्के हितके लिये अपनी मायासे भयानक कृत्वा विरूपं च पुराऽऽत्ममायया | आकारवाला नरसिंहरूप धारण करके दुःखदायी दैत्य हिरण्यकं दुःखकरं नखैश्छिनत्॥ ४३ | हिरण्यकशिपुको नखोंद्वारा नष्ट कर दिया था॥ ४३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहका प्रादुर्भाव' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४॥ पैंतालीसवाँ अध्याय वामन-अवतारकी कथा मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! जिन्होंने पूर्वकालमें शृणु राजन् समासेन वामनस्य पराक्रमम्। | राजा बलिके यज्ञमें सहस्रों दैत्योंका संहार किया था, बलियागे हता येन पुरा दैत्याः सहस्रशः॥ १ | उन भगवान् वामनका चरित्र संक्षेपसे सुनो॥ १॥ विरोचनसुतः पूर्वं महाबलपराक्रमः। | पहलेकी बात है, विरोचनका पुत्र बलि महान् बल त्रैलोक्यं बुभुजे जित्वा देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ २ | और पराक्रमसे सम्पन्न हो इन्द्र आदि समस्त देवताओंको जीतकर त्रिभुवनका राज्य भोग रहा था। नृपवर! उसके ततः कृशतरा देवा बभूवुस्तेन खण्डिताः। | द्वारा खण्डित हुए देवतालोग बहुत दुबले हो गये थे। इन्द्रं कृशतरं दृष्ट्वा नष्टराज्यं नृपोत्तम॥ ३ | राज्य नष्ट हो जानेसे इन्द्र और अधिक कृश हो गये थे। अदितिर्देवमाता या सातप्यत्परमं तपः। | उन्हें इस दशामें देखकर देवमाता अदितिने बहुत बड़ी तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ ४ | तपस्या की। उन्होंने भगवान् जनार्दनको प्रणाम करके अभीष्ट वाणीद्वारा उनका स्तवन किया। अदितिकी स्तुतिसे प्रसन्न हो ततः स्तुत्याभिसंतुष्टो देवदेवो जनार्दनः। | देवाधिदेव मधुसूदन जनार्दन उनके सम्मुख उपस्थित हो स्थित्वा तत्पुरतो वाचमुवाच मधुसूदनः॥ ५ | बोले—'सौभाग्यशालिनि! मैं बलिको बाँधनेके लिये तुम्हारा तव पुत्रो भविष्यामि सुभगे बलिबन्धनः। | पुत्र होऊँगा।' उनसे यों कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान इत्युक्त्वा तां गतो विष्णुः स्वगृहं सा समाययौ॥ ६ | हो गये और अदिति भी अपने घर चली गयीं॥ २—६॥ ततः कालेन सा गर्भमवाप नृप कश्यपात्। | राजन्! तदनन्तर समय आनेपर अदितिने कश्यपजीसे अजायत स विश्वेशो भगवान् वामनाकृतिः॥ ७ | गर्भ धारण किया। उस गर्भसे वामनरूपमें साक्षात् भगवान् In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_7_2_Back
अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६५
अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६५ तस्मिञ्जाते समागत्य ब्रह्मा लोकपितामहः। जगन्नाथ ही प्रकट हुए। वामनजीका अवतार होनेपर जातकमीदिकाः सर्वाः क्रियास्तत्र चकार वै॥ ८ लोकपितामह ब्रह्माजी वहाँ आये। उन्होंने उनके जातकर्मादि कृतोपनयनो देवो ब्रह्मचारी सनातनः। सम्पूर्ण समयोचित संस्कार सम्पन्न किये। उपनयन-संस्कारके अदितिं चाप्यनुज्ञाप्य यज्ञशालां बलेर्ययौ ॥ ९ बाद वे सनातन भगवान् ब्रह्मचारी होकर अदितिकी आज्ञा ले राजा बलिकी यज्ञशालामें गये। चलते समय उनके गच्छतः पादविक्षेपाच्चचाल सकला मही। चरणोंके आघातसे पृथ्वी काँप उठती थी। दानवगण बलिके यज्ञभागान्न गृह्णन्ति दानवाश्च बलेर्मखात् ॥ १० यज्ञसे हविष्य ग्रहण करनेमें असमर्थ हो गये। वहाँकी प्रशान्ताश्चाग्नयस्तत्र ऋत्विजो मन्त्रतश्च्युताः। आग बुझ गयी। ऋत्विकगण मन्त्रोच्चारणमें त्रुटि करने विपरीतमिदं दृष्ट्वा शुक्रमह महाबलः ॥ ११ लगे। यह विपरीत कार्य देखकर महाबली बलिने शुक्राचार्यसे कहा— 'मुने ! ये महान् असुरगण यज्ञका भाग क्यों नहीं न गृह्णन्ति मुने कस्माद्धविर्भागं महासुराः। ग्रहण कर रहे हैं? अग्नि क्यों शान्त हो रही है ? विप्रवर ! कस्माच्च वह्नयः शान्ताः कस्माद्विक्ष्वलति द्विज ॥ १२ यह पृथ्वी क्यों डगमगा रही है तथा ये सम्पूर्ण ऋत्विज् कस्माच्च मन्त्रतो भ्रष्टा ऋत्विजः सकला अमी। मन्त्रभ्रष्ट क्यों हो रहे हैं?' बलिके इस प्रकार पूछनेपर इत्युक्तो बलिना शुक्नो दानवेन्द्रं वचोऽब्रवीत् ॥ १३ शुक्राचार्यने उस दानवराजसे कहा— ॥ ७-१३॥ शुक्र उवाच शुक्र बोले- असुरराज बलि ! तुम मेरी बात सुनो। हे बले शृणु मे वाक्यं त्वया देवा निराकृताः। तुमने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे निकाल दिया है; तेषां राज्यप्रदानाय अदित्यामच्युतोऽसुर ॥ १४ उन्हें पुनः उनका राज्य देनेके लिये जगत्के उत्पत्तिस्थान देवदेव भगवान् विष्णु अदितिके गर्भसे वामनरूपमें देवदेवो जगद्योनिः संजातो वामनाकृतिः। प्रकट हुए हैं। असुरराज ! वे ही तुम्हारे यज्ञमें आ रहे स त्वागच्छति ते यज्ञं तत्पादव्यासकम्पिता ॥ १५ हैं, अतः उन्हींके पादविन्यास (पाँव रखने)-से कम्पित चलतीयं मही सर्वा तेनाद्यासुरभूपते। हो यह सारी पृथ्वी आज हिलने लगी है तथा उन्हींके तत्संनिधानादसुरा न गृह्णन्ति हविर्मखे ॥ १६ निकट आ जानेके कारण असुरगण आज यज्ञमें हविष्य ग्रहण नहीं कर रहे हैं। बले ! वामनके आगमनसे ही तवाग्नयोऽपि वै शान्ता वामनागमनाद्वि भोः। तुम्हारे यज्ञकी आग भी बुझ गयी है और ऋत्विज् भी ऋत्विजश्च न भासन्ते होममन्त्रो बलेऽधुना ॥ १७ श्रीहीन हो गये हैं। इस समयका होममन्त्र असुरोंकी असुराणां श्रियो हन्ति सुराणां भूतिरुत्तमा। सम्पत्तिको नष्ट कर रहा है और देवताओंका उत्तम इत्युक्तः स बलिः प्राह शुक्रं नीतिमतां वरम् ॥ १८ वैभव बढ़ रहा है ॥ १४-१७ १/२ ॥ शृणु ब्रह्मन् वचो मे त्वमागते वामने मखे। उनके इस प्रकार कहनेपर बलिने नीतिज्ञोंमें श्रेष्ठ यन्मया चाद्य कर्तव्यं वामनस्यास्य धीमतः ॥ १९ शुक्राचार्यजीसे कहा- 'ब्रह्मन् ! महाभाग ! आप मेरी बात तन्मे वद महाभाग त्वं हि नः परमो गुरुः। सुनें। यज्ञमें वामनजीके पधारनेपर उन बुद्धिमान् वामनजीके लिये मुझे क्या करना चाहिये, वह हमें बताइये; क्योंकि आप मेरे परम गुरु हैं' ॥ १८-१९ १/२ ॥ मार्कण्डेय उवाच इति संचोदितः शुक्रः स राज्ञा बलिना नृप ॥ २० मार्कण्डेयजी बोले- नरेश्वर ! राजा बलिके इस तमुवाच बलिं वाक्यं ममापि शृणु साम्प्रतम्। प्रकार पूछनेपर शुक्राचार्यजीने उनसे कहा- "राजन् ! देवानामुपकाराय भवतां संक्षयाय च ॥ २१ अब मेरी भी राय सुनो। बले! वे देवताओंका हित करने और तुम लोगोंके विनाशके लिये ही तुम्हारे स नूनमायाति बले तव यज्ञे न संशयः। यज्ञमें पधार रहे हैं, इसमें संदेह नहीं है। अतः जब आगते वामने देवे त्वया तस्य महात्मनः ॥ २२ भगवान् वामन यहाँ आ जायँ, तब उन महात्माके लिये In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय, ४५
१६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय, ४५ प्रतिज्ञा नैव कर्तव्या ददाम्येतत्तवेति वै। 'मैं आपको यह वस्तु देता हूँ' यों कहकर कुछ इति श्रुत्वा वचस्तस्य बलिर्बलवतां वरः॥ २३ देनेकी प्रतिज्ञा न करना' ॥ २०-२२१/२॥ उनकी यह बात सुनकर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिने उवाच तां शुभां वाणीं शुक्रमात्मपुरोहितम्। अपने पुरोहित शुक्राचार्यजीसे यह सुन्दर बात कही— आगते वामने शुक्र यज्ञे मे मधुसूदने ॥ २४ 'गुरुदेव शुक्र! यज्ञमें मधुसूदन भगवान् वामनके पधारनेपर मैं उन्हें कुछ भी देनेसे इनकार नहीं कर सकता। अभी- न शक्यते प्रतिख्यातुं दानं प्रति मया गुरो। अभी मैं आपसे कह चुका हूँ कि दूसरे प्राणी भी यदि अन्येषामपि जन्तूनामित्युक्तं ते मयाधुना ॥ २५ मुझसे कुछ याचना करेंगे तो मैं उन्हें वह वस्तु देनेसे इनकार नहीं कर सकता; फिर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु (वासुदेव) मेरे यज्ञमें पधारें और किं पुनर्वासुदेवस्य आगतस्य तु शार्ङ्गिणः। त्वया विघ्नो न कर्तव्यो वामनेऽत्रागते द्विज ॥ २६ मैं उनकी मुँहमाँगी वस्तु उन्हें देनेसे इनकार कर दूँ, यह कैसे सम्भव होगा? ब्राह्मणदेव! यहाँ भगवान् वामनके पदार्पण करनेपर आप उनके कार्यमें विघ्न न डालियेगा। यद्यद्द्रव्यं प्रार्थयते तत्तद्द्रव्यं ददाम्यहम्। वे जो-जो द्रव्य माँगेंगे, वही-वही मैं उन्हें दूँगा। मुनिश्रेष्ठ! कृतार्थोऽहं मुनिश्रेष्ठ यद्यागच्छति वामनः ॥ २७ यदि सचमुच ही यहाँ भगवान् वामन पधार रहे हैं तो मैं कृतार्थ हो गया' ॥ २३-२७॥ इत्येवं वदतस्तस्य यज्ञशालां स वामनः । राजा बलि जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय आगत्य प्रविवेशाथ प्रशंसंस बलेर्मखम् ॥ २८ वामनजीने आकर यज्ञशालामें प्रवेश किया और वे उनके उस यज्ञकी प्रशंसा करने लगे। राजन् ! उन्हें देखते तं दृष्ट्वा सहसा राजन् राजा दैत्याधिपो बलिः । ही दैत्याधिपति राजा बलिने सहसा उठकर पूजन- उपचारेण सम्पूज्य वाक्यमेतदुवाच ह॥ २९ सामग्रियोंसे उनकी पूजा की, फिर इस प्रकार कहा— 'देवदेव! आप धन आदि जो-जो वस्तु माँगेंगे, वह सब यद्यत्प्रार्थयसे मां त्वं देवदेव धनादिकम्। तत्सर्वं तव दास्यामि मां याचस्वाद्य वामन ॥ ३० मैं आपको दूँगा; इसलिये वामनजी! आज आप मुझसे याचना कीजिये' ॥ २८-३०॥ इत्युक्तो वामनस्तत्र नृपेन्द्र बलिना तदा । 'नृपेन्द्र! बलिके यों कहनेपर उस समय देवेश्वर भगवान् वामनने उनसे यही याचना की कि मुझे याचयामास देवेशो भूमेर्देहि पदत्रयम् ॥ ३१ अग्निशालाके लिये केवल तीन पग भूमि दीजिये, मुझे धनकी आवश्यकता नहीं है' ॥ ३११/२॥ ममाग्निशरणार्थाय न मेऽर्थेऽस्ति प्रयोजनम्। इत्युक्तो वामनेनाथ बलिः प्राह च वामनम् ॥ ३२ भगवान् वामनके यों कहनेपर बलिने उनसे कहा— 'यदि तीन पग भूमिसे ही आपको संतोष है तो तीन पदत्रयेण चेत्तृप्तिर्मया दत्तं पदत्रयम्। पग भूमि मैंने आपको दे दी' ॥ ३२१/२॥ एवमुक्ते तु बलिना वामनो बलिमब्रवीत् ॥ ३३ बलिके द्वारा यों कहे जानेपर भगवान् वामन उनसे बोले—'यदि आपने मुझे तीन पग भूमि दे दी तो मेरे दीयतां मे करे तोयं यदि दत्तं पदत्रयम्। हाथमें संकल्पका जल दीजिये' ॥ ३३१/२॥ इत्युक्तो देवदेवेन तदा तत्र स्वयं बलिः ॥ ३४ कहते हैं, उस समय वहाँ देवदेव भगवान् वामनजीके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६७
अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६७ सजलं हेमकलशं गृहीत्वोत्थाय भक्तितः। | इस प्रकार आज्ञा देनेपर स्वयं राजा बलि जलसे भरे हुए यावत्स वामनकरे तोयं दातुमुपस्थितः॥ ३५ | सुवर्णकलशको लेकर भक्तिपूर्वक खड़े हो गये और | ज्यों ही वामनजीके हाथमें जल देनेको उद्यत हुए, त्यों तावच्छुक्रः कलशगो जलधारां रुरोध ह। | ही शुक्राचार्यने [योगबलसे] कलशमें घुसकर गिरती ततश्च वामनः क्रुद्धः पवित्राग्रेण सत्तम॥ ३६ | हुई जलधारा रोक दी। सत्तम! तब वामनजीने क्रुद्ध | होकर पवित्र (कुश)-के अग्रभागसे कलशके छेदमें उदके कलशद्वारि तच्छुक्राक्षिमवेधयत्। | जल निकलनेके मार्गपर स्थित हुए शुक्राचार्यकी एक ततो व्यपगतः शुक्नो विद्धैकाक्षो नरोत्तम॥ ३७ | आँख छेद डाली। नरोत्तम! एक आँख छिद जानेपर | शुक्राचार्य उसमेंसे निकल भागे॥ ३४-३७॥ तोयधारा निपतिता वामनस्य करे पुनः। | करे निपतिते तोये वामनो ववृधे क्षणात्॥ ३८ | तत्पश्चात् वामनजीके हाथमें जलकी धारा गिरी। | हाथपर जल पड़ते ही वामनजी क्षणभरमें ही बहुत बड़े पादेनैकेन विक्रान्ता तेनैव सकला मही। | हो गये। सत्तम! उन्होंने एक पगसे यह सम्पूर्ण पृथ्वी नाप अन्तरिक्षं द्वितीयेन द्यौस्तृतीयेन सत्तम॥ ३९ | ली, द्वितीय पगसे अन्तरिक्षलोक तथा तृतीय पगसे | स्वर्गलोकको आक्रान्त कर लिया। फिर अनेक दानवोंका अनेकान् दानवान् हत्वा हृत्वा त्रिभुवनं बलेः। | संहार करके बलिसे त्रिभुवनका राज्य छीन लिया और पुरंदराय त्रैलोक्यं दत्त्वा बलिमुवाच ह॥ ४० | यह त्रिलोकी इन्द्रको अर्पितकर पुनः बलिसे कहा— यस्मात्ते भक्तितो दत्तं तोयमद्य करे मम॥ | 'तुमने भक्तिपूर्वक आज मेरे हाथमें संकल्पका जल अर्पित तस्मात्ते साम्प्रतं दत्तं पातालतलमुत्तमम्॥ ४१ | किया है, इसलिये इस समय मैंने तुम्हें उत्तम पाताललोकका | राज्य दिया। महाभाग! वहाँ जाकर तुम मेरे प्रसादसे राज्य तत्र गत्वा महाभाग भुङ्क्ष्व त्वं मत्प्रसादतः। | भोगो; वैवस्वत मन्वन्तर व्यतीत हो जानेपर तुम पुनः वैवस्वतेऽन्तरेऽतीते पुनरिन्द्रो भविष्यसि॥ ४२ | इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होओगे'॥ ३८-४२॥ प्रणाम्य च ततो गत्वा तलं भोगमवाप्तवान्॥ ४३ | | तब बलिने भगवान्को प्रणाम करके पातालतलमें शुक्रोऽपि स्वर्गमारुह्य प्रसादाद्वामनस्य वै। | जाकर वहाँ उत्तम भोगोंको प्राप्त किया। राजन्! शुक्राचार्य समागतस्त्रिभुवनं राजन् देवसमन्वितः॥ ४४ | भी भगवान् वामनकी कृपासे त्रिभुवनकी राजधानी स्वर्गमें | आकर सब देवताओंके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। जो यः स्मरेत्प्रातरुत्थाय वामनस्य कथामिमाम्। | मनुष्य प्रातःकाल उठकर भगवान् वामनकी इस कथाका सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ४५ | स्मरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें इत्थं पुरा वामनरूपमास्थितो | प्रतिष्ठित होता है। नृप! इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान् हरिर्बलेर्हृत्य जगत्त्रयं नृप। | विष्णुने वामनरूप धारणकर त्रिभुवनका राज्य बलिसे ले कृत्वा प्रसादं च दिवौकसाम्पते- | लिया और उसे कृपापूर्वक देवराज इन्द्रको अर्पित कर र्दत्त्वा त्रिलोकं स ययौ महोदधिम्॥ ४६ | दिया। तत्पश्चात् वे क्षीरसागरको चले गये॥ ४३-४६॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे वामनप्रादुर्भावे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वामनावतार' विषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६
१६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६ छियालीसवाँ अध्याय परशुरामावतारकी कथा
मार्कण्डेय उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावं हरेः शुभम्। जामदग्न्यं पुरा येन क्षत्रमुत्सादिंतं शृणु॥ १ पुरा देवगणैर्विष्णुः स्तुतः क्षीरोदधौ नृप। ऋषिभिश्च महाभागैर्जमदग्नेः सुतोऽभवत्॥ २ परशुराम इति ख्यातः सर्वलोकेषु स प्रभुः। दुष्टानां निग्रहं कर्तुमवतीर्णो महीतले॥ ३ कृतवीर्यसुतः श्रीमान् कार्तवीर्योऽभवत् पुरा। दत्तात्रेयं समाराध्य चक्रवर्त्तित्वमाप्तवान्॥ ४ स कदाचिन्महाभागो जमदग्न्याश्रमं ययौ। जमदग्निस्तु तं दृष्ट्वा चतुरङ्गबलान्वितम्॥ ५ उवाच मधुरं वाक्यं कार्तवीर्यं नृपोत्तमम्। मुच्यतामत्र ते सेना अतिथित्वं समागतः। वन्यादिकं मया दत्तं भुक्त्वा गच्छ महामते॥ ६ प्रमुच्य सेनां मुनिवाक्यगौरवात् स्थितो नृपस्तत्र महानुभावः। आमन्त्र्य राजानमलङ्घ्यकीर्ति- र्मुनिः स धेनुं च दुदोह दोग्ध्रीम्॥ ७ हस्त्यश्वशाला विविधा नराणां गृहाणि चित्राणि च तोरणानि। सामन्तयोग्यानि शुभानि राजन् समिच्छतां यानि सुकाननानि॥ ८ गृहं वरिष्ठं बहुभूमिकं पुनः समन्वितं साधुगुणैरुपस्करैः। दुग्ध्वा प्रकल्पन् मुनिराह पार्थिवं गृहं कृतं ते प्रविशेह राजन्॥ ९ इमे च मन्त्रिप्रवरा जनास्ते गृहेषु दिव्येषु विशन्तु शीघ्रम्। हस्त्यश्वजात्यश्च विशन्तु शालां भृत्याश्च नीचेषु गृहेषु सन्तु॥ १०
मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! अब मैं भगवान् विष्णुके जामदग्न्य (परशुराम) नामक शुभ अवतारका वर्णन करता हूँ, जिसने पूर्वकालमें क्षत्रियवंशका उच्छेद किया था; उस प्रसङ्गको सुनो॥ १॥ नरेश्वर! पहलेकी बात है, क्षीरसागरके तटपर देवताओं और महाभाग ऋषियोंने भगवान् विष्णुकी स्तुति की; इससे वे जमदग्नि मुनिके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुए। वे भगवान् सम्पूर्ण लोकोंमें 'परशुराम' नामसे विख्यात थे और दुष्ट राजाओंका नाश करनेके लिये ही इस भूतलपर अवतीर्ण हुए थे। उनके अवतारसे पूर्व राजा कृतवीर्यका पुत्र 'कार्तवीर्य' हुआ था, जिसने दत्तात्रेयजीकी आराधना करके सार्वभौम राज्य प्राप्त कर लिया था। एक समय वह महाभाग नरेश जमदग्नि ऋषिके आश्रमपर गया। उसके साथ चतुरङ्गिणी सेना थी। उस राजाको चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आश्रमपर आया देख जमदग्निने नृपवर कार्तवीर्यसे मधुर वाणीमें कहा—'महामते! आप मेरे अतिथि होकर यहाँ पधारे हैं; अतः आज अपनी सेनाका पड़ाव यहीं डालिये और मेरे दिये हुए वन्य फल आदिका भोजन करके कल यहाँसे जाइयेगा' ॥ २–६॥ महानुभाव राजा कार्तवीर्य मुनिके वाक्यका गौरव मानकर अपनी सेनाको वहीं ठहरनेका आदेश दे वहाँ रह गया। इधर अलङ्घ्य यशवाले मुनिने राजाको आमन्त्रित करके अपनी कामधेनु गौका दोहन किया। राजन्! उन्होंने अनेकानेक गजशाला, अश्वशाला, मनुष्योंके रहनेयोग्य विचित्र गृह और तोरण (द्वार) आदिका दोहन किया। सामन्त नरेशोंके रहनेयोग्य सुन्दर भवन, जिनमें बगीचे आदिकी इच्छा रखनेवालोंके लिये सुन्दर उद्यान थे, दोहनद्वारा प्रस्तुत किये। फिर अनेक मंजिलोंका श्रेष्ठ महल, जिसमें सुन्दर एवं उपयोगी सामान संचित थे, गोदोहनके द्वारा उपलब्ध करके मुनिने भूपालसे कहा—'राजन्! आपके लिये महल तैयार है। आप इसमें प्रवेश कीजिये। आपके ये श्रेष्ठ मन्त्री तथा और लोग भी शीघ्र ही इन दिव्य गृहोंमें प्रवेश करें। विभिन्न जातियोंके हाथी और घोड़े आदि भी गजशाला और अश्वशालामें रहें तथा भृत्यगण भी इन छोटे घरोंमें निवास करें' ॥ ७–१०॥
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अध्याय ४६ ] परशुरामावतारकी कथा १६९
इत्युक्तमात्रे मुनिना नृपोऽसौ मुनिके इस प्रकार कहते ही राजा कार्तवीर्यने उस गृहं वरिष्ठं प्रविवेश राजा। उत्तम गृहमें प्रवेश किया। फिर दूसरे लोग दूसरे-दूसरे अन्येषु चान्येषु गृहेषु सत्सु गृहोंमें प्रविष्ट हुए। इस प्रकार सबके यथास्थान स्थित मुनिः पुनः पार्थिवमाबभाषे॥ ११ हो जानेपर मुनिने पुनः राजा कार्तवीर्यसे कहा—'नरेश्वर! आपको स्नान करानेके लिये मैंने इन सौ उत्तम स्त्रियोंको स्नानप्रदानार्थमिदं मया ते नियत किया है। जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्र अप्सराओंके प्रकल्पितं स्त्रीशतमुत्तमं नृप। नृत्य-गीत सुनते हुए स्नान करते हैं, उसी प्रकार आप स्नाहि त्वमद्यात्र यथाप्रकामं भी इन स्त्रियोंके नृत्य-गीतसे आनन्दित हो इच्छानुसार यथा सुरेन्द्रो दिवि नृत्यगीतैः॥ १२ स्नान कीजिये'॥ ११-१२॥ स स्नातवांस्तत्र सुरेन्द्रवन्नृपो भूप! (मुनिकी आज्ञासे) वहाँ राजा कार्तवीर्यने गीत्यादिशब्दैर्मधुरैश्च वाद्यैः। इन्द्रकी भाँति मधुर वाद्यों और गीत आदिके शब्दोंसे स्नातस्य तस्याशु शुभे च वस्त्रे आनन्दित होते हुए स्नान किया। स्नान कर लेनेपर मुनिने ददौ मुनिर्भूप विभूषिते द्वे॥ १३ उन्हें दो सुन्दर सुशोभित वस्त्र दिये। धौतवस्त्र पहन और ऊपरसे चादर ओढ़कर राजाने नित्य-नियम करनेके परिधाय वस्त्रं च कृतोत्तरीयः बाद भगवान् विष्णुकी पूजा की। फिर उन मुनिवरने कृतक्रियो विष्णुपूजां चकार। गौसे अन्नमय महान् पर्वतका दोहन करके राजा तथा मुनिश्च दुग्ध्वान्नमयं महागिरिं राजसेवकवृन्दको अर्पित किया। नृप! राजा तथा उनके नृपाय भृत्याय च दत्तवानसौ॥ १४ भृत्यगणोंने जबतक भोजनका कार्य सम्पन्न किया, तबतक सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। तब उन्होंने रातको भी यावत्स राजा बुभुजे सभृत्य- मुनिके बनाये हुए उस भवनमें गीत आदि विनोदोंसे स्तावच्च सूर्यो गतवान् नृपास्तम्। आनन्दित हो शयन किया॥ १३-१५॥ रात्रौ च गीतादिविनोदयुक्तः शेते स राजा मुनिनिर्मिते गृहे॥ १५ तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल होते ही स्वप्नमें मिली ततः प्रभाते विमले स्वप्नलब्धमिवाभवत्। हुई सम्पत्तिके समान सब कुछ लुप्त हो गया। फिर वहाँ भूमिभागं ततः कंचिद् दृष्ट्वासौ चिन्तयन्नृपः॥ १६ केवल कोई भूभागमात्र ही अवशिष्ट देख राजाने मन- ही-मन विचार किया और अपने पुरोहितसे पूछा— किमियं तपसः शक्तिर्मुनेरस्य महात्मनः। 'महाभाग पुरोहितजी! यह महात्मा जमदग्नि मुनिके सुरभ्या वा महाभाग ब्रूहि मे त्वं पुरोहित॥ १७ तपकी शक्ति थी या कामधेनु गौकी? इसे आप मुझे बताइये।' कार्तवीर्यके इस प्रकार पूछनेपर पुरोहितने इत्युक्तः कार्तवीर्येण तमुवाच पुरोहितः। उससे कहा—'राजन्! मुनिमें भी सामर्थ्य है, परंतु यह मुनेः सामर्थ्यमप्यस्ति सिद्धिश्चेयं हि गोर्नृप॥ १८ सिद्धि तो गौकी ही थी। तो भी नरेश्वर! आप लोभवश उस गौका अपहरण न करें; क्योंकि जो उसे हर लेनेकी तथापि सा न हर्तव्या त्वया लोभान्नराधिप। इच्छा करता है, उसका निश्चय ही विनाश हो जाता यस्त्वेतां हर्तुमिच्छेद वै तस्य नाशो ध्रुवं भवेत्॥ १९ है'॥ १६-१९॥
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१७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६
१७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६ अथ मन्त्रिवरः प्राह ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः। | यह सुनकर राजाके प्रधान मन्त्रीने कहा—'महाराज! राजकार्यं न पश्येद् वै स्वपक्षस्यैव पोषणात्॥ २० | ब्राह्मण ब्राह्मणका ही प्रेमी होता है, वह अपने पक्षका | पोषण करनेके कारण राजाके कार्यकी कोई परवाह नहीं हे राजंस्त्वयि तिष्ठन्ति गृहाणि विविधानि च। | करता। राजन् ! उस गौको पाकर आपके पास तत्काल तथा सुवर्णपात्राणि शयनादीनि च स्त्रियः॥ २१ | गुप्त हो जानेवाले नाना प्रकारके घर, सोनेके पात्र, | शय्यादि तथा सुन्दरी स्त्रियाँ—ये सब सामान प्रस्तुत तां धेनुं प्राप्य राजेन्द्र लीयमानानि तत्क्षणात्। | रहेंगे, जिन्हें हम लोगोंने वहाँ प्रत्यक्ष देखा है। इस उत्तम अस्माभिस्तत्र दृष्टानि नीयतां धेनुरुत्तमा॥ २२ | धेनुको आप अवश्य ले चलें। महामते राजेन्द्र! यह गौ | आपके ही योग्य है। भूपाल! यदि आपकी इच्छा हो तवेयं योग्या राजेन्द्र यदीच्छसि महामते। | तो मैं स्वयं जाकर इसे ले आऊँगा। आप केवल मुझे गत्वाहमानयिष्यामि आज्ञां मे देहि भूभुज॥ २३ | आज्ञा दीजिये'॥ २०—२३॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा राजा तथेत्याह नृपोत्तम। | नृपवर! मन्त्रीके इस प्रकार कहनेपर राजाने 'बहुत सचिवस्तत्र गत्वाथ सुरभिं हर्तुमारभत्॥ २४ | अच्छा' कहकर अनुमति दे दी। फिर राजमन्त्री आश्रमपर | जाकर गौका अपहरण करने लगा। तब जमदग्नि मुनिने वारयामास सचिवं जमदग्निः समन्ततः। | उसे सब ओरसे मना किया, किंतु उसने उनकी बात न राजयोग्यामिमां ब्रह्मन् देहि राज्ञे महामते॥ २५ | मानते हुए कहा—'महाबुद्धिमान् ब्राह्मण! यह गौ राजाके | योग्य है; अतः इसे राजाको ही दे दीजिये। आप तो साग त्वं तु शाकफलाहारी किं धेन्वा ते प्रयोजनम्। | और फल खानेवाले हैं; आपको इस गायसे क्या काम इत्युक्त्वा तां बलाद्धृत्वा नेतुं मन्त्री प्रचक्रमे॥ २६ | है?' यों कहकर मन्त्री उस गौको बलपूर्वक ले जाने | लगा। राजन्! तब उस मुनिने स्त्रीसहित आकर उसे पुनः पुनः सभार्यः स मुनिर्वारयामास तं नृपम्। | रोका। इसपर उस दुष्टात्मा और ब्रह्महत्यारे मन्त्रीने उस ततो मन्त्री सुदुष्टात्मा मुनिं हत्वा तु तं नृप॥ २७ | मुनिका वध करके गौको ज्यों ही ले जाना चाहा, त्यों | ही वह दिव्य गौ आकाशमार्गसे चली गयी और राजा ब्रह्महा नेतुमारेभे वायुमार्गेण सा गता। | मन-ही-मन क्षुब्ध होकर माहिष्मती नगरीको लौट राजा च क्षुब्धहृदयो ययौ माहिष्मतीं पुरीम्॥ २८ | आया॥ २४—२८॥ मुनिपत्नी सुदुःखार्ता रोदयन्ती भृशं तदा। | राजन्! उस समय मुनिकी पत्नी दुःखसे पीडित त्रिस्सप्तकृत्वः स्वां कुक्षिं ताडयामास पार्थिव॥ २९ | होकर अत्यन्त विलाप करने लगी और प्राण त्याग देनेकी | इच्छासे अपनी कुक्षि (उदर) में उसने इक्कीस बार तच्छृण्वन्नागतो रामो गृहीतपरशुस्तदा। | मुक्का मारा। माताका विलाप सुनकर परशुरामजी वनसे पुष्पादीनि गृहीत्वा तु वनान्मातरमब्रवीत्॥ ३० | फूल आदि लेकर हाथमें कुल्हाड़ी लिये उसी समय आये | और मातासे बोले—'मा! इस प्रकार छाती पीटनेकी अलमम्ब प्रहारेण निमित्ताद् विदितं मया। | आवश्यकता नहीं है। मैं सब कुछ शकुनसे जान गया हूँ। हनिष्यामि दुराचारमर्जुनं दुष्टमन्त्रिणम्॥ ३१ | उस दुष्ट मन्त्रीवाले दुराचारी राजा अर्जुनका मैं अवश्य वध | करूँगा। मातः! चूँकि तुमने अपनी कुक्षिमें इक्कीस बार त्वयैकविंशवारेण यस्मात्कुक्षिश्च ताडिता। | प्रहार किया है, इसलिये मैं इस भूमण्डलके क्षत्रियोंका त्रिस्सप्तकृत्वस्तस्मात्तु हनिष्ये भुवि पार्थिवान्॥ ३२ | इक्कीस बार संहार करूँगा'॥ २९—३२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ४७ ] श्रीरामवावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७१ इति कृत्वा प्रतिज्ञां स गृहीत्वा परशुं ययौ । | इस प्रकार प्रतिज्ञा करके फरसा लेकर वे वहाँसे माहिष्मतीं पुरीं प्राप्य कार्तवीर्यमथाह्वयत् ॥ ३३ | चल दिये और माहिष्मती पुरीमें जाकर उन्होंने राजा युद्धार्थमागतः सोऽथ अनेकाक्षौहिणीयुतः । | कार्तवीर्य अर्जुनको ललकारा। तब वह अनेक अक्षौहिणी तयोर्युद्धमभूत्तत्र भैरवं लोमहर्षणम् ॥ ३४ | सेनाके साथ युद्धके लिये आया। वहाँ उन दोनोंमें पिशिताशिजनानन्दं शस्त्रास्त्रशतसंकुलम् । | महाभयानक रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ, जो सैकड़ों अस्त्र- ततः परशुरामोऽभून्महाबलपराक्रमः ॥ ३५ | शस्त्रोंके प्रहारसे व्याप्त तथा मांस खानेवाले प्राणियोंको परं ज्योतिरचिन्त्यात्मा विष्णुः कारणमूर्तिमान् । | आनन्द देनेवाला था। उस समय परशुरामजी अपनेमें कार्तवीर्यबलं सर्वमनेकैकः क्षत्रियैः सह ॥ ३६ | अचिन्त्यस्वरूप, परम ज्योतिर्मय, कारणमूर्ति भगवान् हत्वा निपात्य भूमौ तु परमाद्भुतविक्रमः । | विष्णुकी भावना करके महान् बल और पराक्रमसे कार्तवीर्यस्य बाहूनां वनं चिच्छेद रोषवान् । | सम्पन्न हो गये। उन्होंने परम आश्चर्यमय पौरुष प्रकट छिन्ने बाहुवने तस्य शिरश्चिच्छेद भार्गवः ॥ ३७ | करते हुए कार्तवीर्यकी असंख्य क्षत्रियोंसे युक्त सम्पूर्ण विष्णुहस्ताद्वधं प्राप्य चक्रवर्ती स पार्थिवः । | सेनाको मारकर भूमिपर गिरा दिया और रोषसे भरकर दिव्यरूपधरः श्रीमान् दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ ३८ | कार्तवीर्यकी समस्त भुजाएँ काट डालीं। उसके बाहुवनका दिव्यं विमानमारुह्य विष्णुलोकमवासवान् । | उच्छेद हो जानेपर भृगुनन्दन परशुरामने उसका मस्तक क्रोधात्परशुरामोऽपि महाबलपराक्रमः ॥ ३९ | भी धड़से अलग कर दिया ॥ ३३-३७॥ त्रिसप्तकृत्वो भूम्यां वै पार्थिवान्निजघान सः । | इस प्रकार वह चक्रवर्ती राजा कार्तवीर्य श्रीभगवान् क्षत्रियाणां वधात्तेन भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ ४० | विष्णुके हाथसे वधको प्राप्त होकर दिव्यरूप धारण करके, भूमिश्च सकला दत्ता कश्यपाय महात्मने । | श्रीसम्पन्न एवं दिव्य चन्दनोंसे अनुलिप्त होकर, दिव्य इत्येष जामदग्न्याख्यः प्रादुर्भावो मयोदितः ॥ ४१ | विमानपर आरूढ़ हो, विष्णुधामको प्राप्त हुआ। फिर यश्च तच्छृणुयाद्भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४२ | महान् बल और पराक्रमवाले परशुरामजीने भी इस पृथ्वीके अवतीर्य भूमौ हरिरेष साक्षात् | क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार किया। इस प्रकार क्षत्रियोंका त्रिसप्तकृत्वः क्षितिपान्निहत्य सः । | वध करके उन्होंने भूमिक भार उतारा और सम्पूर्ण पृथ्वी क्षात्रं च तेजो प्रविभज्य राजन् | महात्मा कश्यपजीको दान कर दी ॥ ३८-४० १/२ ॥ रामः स्थितोऽद्यापि गिरौ महेन्द्रे ॥ ४३ | इस प्रकार मैंने तुमसे यह 'जामदग्न्य' (परशुराम) नामक अवतारका वर्णन किया। जो भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजन्! इस तरह पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके बाद ये साक्षात् भगवान् विष्णुस्वरूप परशुरामजी इक्कीस बार क्षत्रियोंको मारकर, क्षत्रियतेजको छिन्न-भिन्न करके आज भी महेन्द्र पर्वतपर विराजमान हैं ॥ ४१-४३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे परशुरामप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'परशुरामावतार' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━━ सैंतालीसवाँ अध्याय श्रीरामावतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र श्रीमार्कण्डेय उवाच | श्रीमार्कण्डेयजी बोले - राजन् ! अब मैं भगवान् शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावं हरेः शुभम् । | विष्णुके उस शुभ अवतारका वर्णन करूँगा, जिसके द्वारा निहतो रावणो येन सगणो देवकण्टकः ॥ १ | देवताओंके लिये कण्टकस्वरूप रावण अपने गणोंसहित मारा गया। तुम [ध्यान देकर] सुनो ॥ १ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
१७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७
१७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ ब्रह्मणो मानसः पुत्रः पुलस्त्योऽभून्महामुनिः । तस्य वै विश्रवा नाम पुत्रोऽभूत्तस्य राक्षसः ॥ २ तस्माज्जातो महावीरो रावणो लोकरावणः । तपसा महता युक्तः स तु लोकानुपाद्रवत् ॥ ३ सेन्द्रा देवा जितास्तेन गन्धर्वाः किंनरास्तथा । यक्षाश्च दानवाश्चैव तेन राजन् विनिर्जिताः ॥ ४ स्त्रियश्चैव सुरूपिण्यो हृतास्तेन दुरात्मना । देवादीनां नृपश्रेष्ठ रत्नानि विविधानि च ॥ ५ रणे कुबेरं निर्जित्य रावणो बलदर्पितः । तत्पुरीं जगृहे लङ्कां विमानं चापि पुष्पकम् ॥ ६ तस्यां पुर्यां दशग्रीवो रक्षसामधिपोऽभवत् । पुत्राश्च बहवस्तस्य बभूवुरमितौजसः ॥ ७ राक्षसाश्च तमाश्रित्य महाबलपराक्रमाः । अनेककोटयो राजन् लङ्कायां निवसन्ति ये ॥ ८ देवान् पितॄन् मनुष्यांश्च विद्याधरगणानपि । यक्षांश्चैव ततः सर्वे घातयन्ति दिवानिशम् ॥ ९ संत्रस्तं तद्भयादेव जगदासीच्चराचरम् । दुःखाभिभूतमत्यर्थं सम्बभूव नराधिप ॥ १० एतस्मिन्नेव काले तु देवाः सेन्द्रा महर्षयः । सिद्धा विद्याधराश्चैव गन्धर्वाः किंनरास्तथा ॥ ११ गुह्यका भुजगा यक्षा ये चान्ये स्वर्गवासिनः । ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा शङ्करं च नराधिप ॥ १२ ते ययुर्हतविक्रान्ताः क्षीराब्धेस्तटमुत्तमम् । तत्राराध्य हरिं देवास्तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ १३ ब्रह्मा च विष्णुमाराध्य गन्धपुष्पादिभिः शुभैः । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वासुदेवमथास्तुवत् ॥ १४ ब्रह्मोवाच नमः क्षीराब्धिवासाय नागपर्यङ्कशायिने । नमः श्रीकरसंस्पृष्टदिव्यपादाय विष्णवे ॥ १५ नमस्ते योगनिद्राय योगान्तर्भाविताय च । तार्क्ष्यासनाय देवाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ १६
[हिन्दी अनुवाद]
ब्रह्माजीके मानस पुत्र जो महामुनि पुलस्त्यजी हैं, उनके 'विश्रवा' नामक पुत्र हुआ। विश्रवाका पुत्र राक्षस रावण हुआ। समस्त लोकोंको रुलानेवाला महावीर रावण विश्रवासे ही उत्पन्न हुआ था। वह महान् तपसे युक्त होकर समस्त लोकोंपर धावा करने लगा। राजन्! उसने इन्द्रसहित समस्त देवताओं, गन्धर्वों और किंनरोंको जीत लिया तथा यक्षों और दानवोंको भी अपने वशीभूत कर लिया। नृपश्रेष्ठ! उस दुरात्माने देवता आदिकी सुन्दरी स्त्रियाँ और नाना प्रकारके रत्न भी हर लिये। बलाभिमानी रावणने युद्धमें कुबेरको जीतकर उनकी पुरी लङ्का और पुष्पक-विमानपर भी अधिकार जमा लिया॥ २—६॥
उस लङ्कापुरीमें दशमुख रावण राक्षसोंका राजा हुआ। उसके अनेक पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपरिमित बलसे सम्पन्न थे। राजन्! लङ्कामें जो कई करोड़ महाबली और पराक्रमी राक्षस निवास करते थे, वे सभी रावणका सहारा लेकर देवता, पितर, मनुष्य, विद्याधर और यक्षोंका दिन-रात संहार किया करते थे। नराधिप! समस्त चराचर जगत् उसके भयसे भीत और अत्यन्त दुःखी हो गया था॥ ७—१०॥
नरेश! इसी समय जिनका पुरुषार्थ प्रतिहत हो गया था, वे इन्द्रसहित समस्त देवता, महर्षि, सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व, किंनर, गुह्यक, सर्प, यक्ष तथा जो अन्य स्वर्गवासी थे, वे ब्रह्मा और शङ्करजीको आगे करके क्षीरसागरके उत्तम तटपर गये। वहाँ उस समय देवतालोग भगवान्की आराधना करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर ब्रह्माजीने गन्ध-पुष्प आदि सुन्दर उपचारोंद्वारा भगवान् वासुदेव विष्णुकी आराधना की और हाथ जोड़, प्रणाम करके वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ११—१४॥
ब्रह्माजी बोले— जो क्षीरसागरमें निवास करते हैं, सर्पकी शय्यापर सोते हैं, जिनके दिव्य चरण भगवती श्रीलक्ष्मीजीके कर-कमलोंद्वारा सहलाये जाते हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। योग ही जिनकी निद्रा है, योगके द्वारा अन्तःकरणमें जिनका ध्यान किया जाता है और जो गरुड़जीके ऊपर आसीन होते हैं, उन आप भगवान् गोविन्दको नमस्कार है।
अध्याय ४७ ] श्रीरामावतारकी कथा—श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७३ नमः क्षीराब्धिकल्लोलस्पृष्टमात्राय शार्ङ्गिणे । क्षीरसागरकी लहरें जिनके शरीरका स्पर्श करती हैं, जो नमोऽरविन्दपादाय पद्मनाभाय विष्णवे ॥ १७ 'शार्ङ्ग' नामक धनुष धारण करते हैं, जिनके चरण कमलके समान हैं तथा जिनकी नाभिसे कमल प्रकट भक्तार्चितसुपादाय नमो योगप्रियाय वै । हुआ है, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जिनके सुन्दर शुभाङ्गाय सुनेत्राय माधवाय नमो नमः ॥ १८ चरण भक्तोंद्वारा पूजित हैं, जिन्हें योग प्रिय है तथा जिनके अङ्ग और नेत्र सुन्दर हैं, उन भगवान् लक्ष्मीपतिको सुकेशाय सुनेत्राय सुललाटाय चक्रिणे । बारंबार नमस्कार है। जिनके केश, नेत्र, ललाट, मुख और सुवक्त्राय सुकर्णाय श्रीधराय नमो नमः ॥ १९ कान बहुत ही सुन्दर हैं, उन चक्रपाणि भगवान् श्रीधरको सुवक्षसे सुनाभाय पद्मनाभाय वै नमः । प्रणाम है। जिनके वक्षःस्थल और नाभि मनोहर हैं, उन सुभ्रुवे चारुदेहाय चारुदन्ताय शार्ङ्गिणे ॥ २० भगवान् पद्मनाभको नमस्कार है। जिनकी भौंहें सुन्दर, शरीर मनोहर और दाँत उज्ज्वल हैं, उन भगवान् शार्ङ्गधन्वाको चारुजङ्घाय दिव्याय केशवाय नमो नमः । प्रणाम है। रुचिर पिंडलियोंवाले दिव्यरूपधारी भगवान् सुनखाय सुशान्ताय सुविद्याय गदाभृते ॥ २१ केशवको नमस्कार है। जो सुन्दर नखोंवाले, परमशान्त और सद्धिद्याओंके आश्रय हैं, उन भगवान् गदाधरको धर्मप्रियाय देवाय वामनाय नमो नमः । नमस्कार है। धर्मप्रिय भगवान् वामनको बारंबार प्रणाम है। असुरघ्नाय चोग्राय रक्षोघ्नाय नमो नमः ॥ २२ असुर और राक्षसोंके हन्ता उग्र (नृसिंह)-रूपधारी भगवान्को देवानामार्त्तिनाशाय भीमकर्मकृते नमः । नमस्कार है। देवताओंकी पीड़ा हरनेके लिये भयंकर कर्म नमस्ते लोकनाथाय रावणान्तकृते नमः ॥ २३ करनेवाले तथा रावणके संहारक आप भगवान् जगन्नाथको प्रणाम है॥ १५–२३॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं—ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार इति स्तुतो हृषीकेशस्तुतोष परमेष्ठिना । स्तुति की जानेपर भगवान् हृषीकेश प्रसन्न हो गये और स्वरूपं दर्शयित्वा तु पितामहमुवाच ह ॥ २४ अपना स्वरूप प्रत्यक्ष दिखाकर वे भगवान् ब्रह्माजीसे किमर्थं तु सुरैः सार्धमागतस्त्वं पितामह । बोले—'पितामह ! तुम देवताओंके साथ किसलिये यहाँ यत्कार्यं ब्रूहि मे ब्रह्मन् यदर्थं संस्तुतस्त्वया ॥ २५ आये हो ? ब्रह्मन् ! जो कार्य आ पड़ा हो और जिसके लिये तुमने मेरी स्तुति की है, वह बताओ।' समस्त इत्युक्तो देवदेवेन विष्णुना प्रभविष्णुना । लोकोंको उत्पन्न करनेवाले भगवान् विष्णुके द्वारा इस सर्वदेवगणैः सार्धं ब्रह्मा प्राह जनार्दनम् ॥ २६ प्रकार प्रश्न किये जानेपर सम्पूर्ण देवगणोंके साथ विराजमान ब्रह्माजीने उन जनार्दनसे कहा ॥ २४-२६ ॥ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले—विभो! दुरात्मा रावणने समस्त नाशितं तु जगत्सर्वं रावणेन दुरात्मना । जगत्में भीषण संहार मचा रखा है। उस राक्षसने इन्द्रसहित सेन्द्राः पराजितास्तेन बहुशो राक्षसा विभो ॥ २७ देवताओंको कई बार परास्त किया है। रावणके पार्श्ववर्ती राक्षसैर्भक्षिता मर्त्या यज्ञाश्चापि विदूषिताः । राक्षसोंने असंख्य मनुष्योंको खा लिया और उनके देवकन्या हृतास्तेन बलाच्छतसहस्रशः ॥ २८ यज्ञोंको दूषित कर दिया है। स्वयं रावणने सैकड़ों-हजारों देवकन्याओंका अपहरण किया है। कमलनयन ! चूँकि त्वामृते पुण्डरीकाक्ष रावणस्य वधं प्रति । आपको छोड़कर दूसरे देवता रावणका वध करनेमें समर्थ न समर्था यतो देवास्त्वमतस्तद्वधं कुरु ॥ २९ नहीं हैं, अतः आप ही उसका वध करें ॥ २७–२९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth