श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२९- षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि
अध्याय २९ ] षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि ७१५
| विष्णुना कथितैर्वापि तण्डिना कथितैस्तु वा।<br>दक्षेण मुनिमुख्येन कीर्तितैरथ वा पुनः॥ ९३<br><br>महापूजा प्रकर्तव्या महादेवस्य भक्तितः।<br>शिवार्चकाय दातव्या दक्षिणा स्वगुरोः सदा॥ ९४<br><br>देहार्णवं च सर्वेषां दक्षिणा च यथाक्रमम्।<br>दीनान्धकृपणानां च बालवृद्धकृशातुरान्॥ ९५<br><br>भोजयेच्च विधानेन दक्षिणामपि दापयेत्॥ ९६ | कहे गये¹ अथवा [शिवभक्त] तण्डीके द्वारा कहे गये² अथवा मुनिश्रेष्ठ दक्षके द्वारा कहे गये³ शिवके हजार नामोंसे हजार कलशोंके जलसे शिवका अभिषेक करे॥ ८०-९३॥<br><br>भक्तिपूर्वक अपने गुरु महादेवकी सदा महापूजा करनी चाहिये और शिवपूजकको दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये। तुलाद्रव्य और दक्षिणा यथाक्रम ऋत्विज् आदि तथा दीनों, अन्धों, दरिद्रोंको देनी चाहिये; साथ ही बालकों, वृद्धों, निर्बलों तथा रोगियोंको विधान-पूर्वक भोजन कराना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये॥ ९४-९६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तुलापुरुषदानविधिर्नामाष्टाविंशत्तमोऽध्यायः॥ २८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तुलापुरुषदानविधि' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८॥
उनतीसवाँ अध्याय
षोडशमहादानान्तर्गत हिरण्यगर्भदानकी विधि
| सनत्कुमार उवाच | |
|---|---|
| तुला ते कथिता ह्येषा आद्या सामान्यरूपिणी।<br>हिरण्यगर्भं वक्ष्यामि द्वितीयं सर्वसिद्धिदम्॥ १ | सनत्कुमार बोले— मैंने आपसे प्रथमतः सामान्यरूपसे तुलादानका वर्णन कर दिया; अब समस्त सिद्धियोंको देनेवाले हिरण्यगर्भदानके विषयमें बताऊँगा॥ १॥ |
| अधःपात्रं सहस्रेण हिरण्येन विधीयते।<br>ऊर्ध्वपात्रं तदर्धेन मुखं संवेशमात्रकम्॥ २ | इसके लिये हजार स्वर्ण-मुद्राओंसे एक नीचेका पात्र बनाना चाहिये और उसके आधे अर्थात् पाँच सौ स्वर्ण-मुद्राओंसे उसके प्रवेश-प्रमाण मुखवाला ऊर्ध्वपात्र (ढक्कन) निर्मित कराना चाहिये। उस शुभ स्वर्णपात्रको सभी अलंकारोंसे विभूषित करना चाहिये॥ २½॥ |
| हैममेवं शुभं कुर्यात्सर्वालङ्कारसंयुतम्।<br>अधःपात्रे स्मरेद्देवीं गुणत्रयसमन्विताम्॥ ३<br><br>चतुर्विंशतिकां देवीं ब्रह्मविष्णुग्निरूपिणीम्।<br>ऊर्ध्वपात्रे गुणातीतं षड्विंशकमुमापतिम्॥ ४ | तत्पश्चात् नीचेके मुख्य पात्रमें त्रिगुणात्मिका, चतुर्विंशति-तत्त्वस्वरूपिणी तथा ब्रह्मा-विष्णु-अग्निस्वरूपा भगवतीका ध्यान करे और ऊपरके पात्रमें छब्बीसवें तत्त्वरूप गुणातीत उमापति सदाशिवका और पचीसवें तत्त्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषका ध्यान करे॥ ३-४½॥ |
| आत्मानं पुरुषं ध्यायेत्पञ्चविंशकमग्रजम्।<br>पूर्वोक्तस्थानमध्येऽथ वेदिकोपरि मण्डले॥ ५ | तदनन्तर पूर्वकी भाँति बताये गये स्थानमें वेदी तथा मण्डल बनाकर पात्रको लेकर शालि (धान)-के ऊपर |
१. भगवान् विष्णुद्वारा कथित यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ९८वें अध्यायमें है।
२. शिवभक्त तण्डीप्रोक्त यह शिवसहस्रनाम श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके ६५वें अध्यायमें वर्णित है।
३. मुनिश्रेष्ठ दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनाम 'शिवरहस्य' नामक ग्रन्थमें वर्णित है।
३०- तिलपर्वतदानविधि
| ७१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| शालिमध्ये क्षिपेन्नीत्वा नववस्त्रैश्च वेष्टयेत्।<br>माषकल्केन चालिप्य पञ्चद्रव्येण पूजयेत्॥ ६<br>ईशानाद्यैैर्यथान्यायं पञ्चभिः परिपूजयेत्।<br>पूर्ववच्छिवपूजा च होमश्चैव यथाक्रमम्॥ ७<br>देवीं गायत्रीकां जप्त्वा प्रविशेत्प्राङ्मुखः स्वयम्।<br>विधिनैव तु सम्पाद्य गर्भाधानादिकां क्रियाम्॥ ८<br>कृत्वा षोडशमार्गेण विधिना ब्राह्मणोत्तमः।<br>दूर्वाङ्कुरैस्तु कर्तव्या सेचना दक्षिणे पुटे॥ ९<br>औदुम्बरफलैः सार्धमेकविंशत्कुशोदकम्।<br>ईशान्यां तावदेवात्र कुर्यात् सीमन्तकर्मणि॥ १०<br>उद्वहेत्कन्यकां कृत्वा त्रिंशन्निष्केण शोभनाम्।<br>अलङ्कृत्य तथा हुत्वा शिवाय विनिवेदयेत्॥ ११<br>अन्नप्राशनके विद्वान् भोजयेत्पायसादिभिः।<br>एवं विश्वजितान्ता वै गर्भाधानादिकाः क्रियाः॥ १२<br>शक्तिबीजेन कर्तव्या ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।<br>शेषं सर्वं च विधिवत्तुलाहेमवदाचरेत्॥ १३ | स्थापित कर देना चाहिये और उसे नवीन वस्त्रोंसे ढँक देना चाहिये। पुनः माष (उड़द)-के उबटनसे आलेप करके पंचोपचारोंसे ईशान आदि पाँच मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक उस पात्रकी पूजा करनी चाहिये। शिवपूजा तथा होम भी पूर्वकी भाँति क्रमानुसार करना चाहिये॥ ५—७॥<br>भगवती गायत्रीका जप करके पूर्वाभिमुख बैठ जाय और स्वयं श्रेष्ठ आचार्य गर्भाधान आदि सोलह संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न करके दूर्वाके अंकुरोंसे दक्षिण पुटमें सेचन करे। गूलरके फलोंसहित इक्कीस कुशाके जलसे ईशान दिशामें सीमन्तकर्म करे। तीस निष्क परिमाणकी सुवर्णकी सुन्दर कन्या बनाकर उसे [भूषण-वस्त्र आदिसे] अलंकृत करके हवनकर भगवान् शिवको अर्पित करे। विद्वान्को चाहिये कि अन्नप्राशन-संस्कारमें पायस (खीर) आदिका भोजन कराये। इस प्रकार वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको गर्भाधानसे लेकर विश्वजित्पर्यन्त उन सभी संस्कारोंको शक्तिबीजके साथ करना चाहिये। शेष सभी कृत्य स्वर्ण-तुलादानकी भाँति विधिवत् करना चाहिये॥ ८—१३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हिरण्यगर्भदानविधिर्नामौकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हिरण्यगर्भदानविधि' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २९॥
तीसवाँ अध्याय
तिलपर्वतदानविधि
| सनत्कुमार उवाच | |
|---|---|
| अधुना सम्प्रवक्ष्यामि तिलपर्वतमुत्तमम्।<br>पूर्वोक्तस्थानकाले तु कृत्वा सम्पूज्य यत्नतः॥ १<br>सुसमे भूतले रम्ये वेदिना च विवर्जिते।<br>दशतालप्रमाणेण दण्डं संस्थाप्य वै मुने॥ २<br>अद्भिः सम्प्रोक्ष्य पश्चाद्विद्वांस्तिलांस्त्वस्मिन् विनिक्षिपेत्।<br>पञ्चगव्येन तं देशं प्रोक्षयेद् ब्राह्मणोत्तमः॥ ३<br>मण्डलं कल्पयेद्विद्वान् पूर्ववत्सुसमन्ततः।<br>नववस्त्रैश्च संस्थाप्य रम्यपुष्पैर्विकीर्य च॥ ४<br>तस्मिन् सञ्चयनं कार्यं तिलभारैर्विशेषतः।<br>दण्डप्रादेशमुत्सेधमुत्तमं परिकीर्तितम्॥ ५ | सनत्कुमार बोले— हे मुने! अब मैं उत्तम तिलपर्वतदानका विधिवत् वर्णन करूँगा। पूर्वमें बताये गये स्थान तथा कालमें प्रयत्नपूर्वक पूजन करके तिलपर्वतका दान करे। वेदीरहित सुन्दर समतल भूमिपर दस ताल* प्रमाणका दण्ड स्थापित करके जल छिड़ककर उसपर तिलराशि रखे; श्रेष्ठ ब्राह्मणको चाहिये कि पंचगव्यसे उस स्थानका प्रोक्षण करे॥ १—३॥<br>तदनन्तर विद्वान् पूर्ववत् चारों ओर गोल मण्डल बनाये। नये वस्त्रोंको रखकर उसपर सुन्दर पुष्प बिखेरकर वहाँ तिलके बीजोंके भारोंका ढेर लगाये। तिलराशि स्थापित किये गये दण्डसे प्रादेशमात्र ऊपर |
* अंगुष्ठसे मध्यमाके बीचकी दूरीको एक ताल कहा जाता है। (वायुपुराण ८।१०३)
३१- सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि
अध्याय ३१] सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि ७१७
| चतुरङ्गुलहीनं तु मध्यमं मुनिपुङ्गवाः।<br>दण्डतुल्यं कनिष्ठं स्याद्दण्डहीनं न कारयेत्॥ ६<br><br>वेष्टयित्वा नवैर्वस्त्रैः परितः पूजयेत्क्रमात्।<br>सद्यादीनि प्रविन्यस्य पूजयेद्विधिपूर्वकम्॥ ७<br><br>अष्टदिक्षु च कर्तव्याः पूर्वोक्ता मूर्तयः क्रमात्।<br>त्रिनिष्केन सुवर्णेन प्रत्येकं कारयेत्क्रमात्॥ ८ | हो, तो उसे उत्तम कहा गया है। हे श्रेष्ठ मुनियो! दण्डसे चार अंगुल कम रहनेपर मध्यम तथा दण्डके बराबर होनेपर कनिष्ठ श्रेणीका होता है। तिलके ढेरको दण्डसे नीचे नहीं करना चाहिये। इस तिलपर्वतको नवीन वस्त्रोंसे चारों ओरसे लपेटकर क्रमसे पूजन करना चाहिये। वहाँ 'सद्योजात' आदि पंचब्रह्मोंको क्रमसे स्थापित करके विधिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वमें कही गयी मूर्तियोंको आठों दिशाओंमें क्रमसे स्थापित करना चाहिये; प्रत्येक मूर्तिको तीन निष्क सुवर्णसे निर्मित कराना चाहिये॥ ४–८॥ | | दक्षिणा विधिना कार्या तुलाभारवदेव तु।<br>होमश्च पूर्ववत्प्रोक्तो यथावन्मुनिसत्तमाः॥ ९<br><br>अर्चयेद्देवदेवेशं लोकपालसमावृतम्।<br>तिलपर्वतमध्यस्थं तिलपर्वतरूपिणम्॥ १०<br><br>शिवार्चना च कर्तव्या सहस्रकलशादिभिः।<br>दर्शयेत्तिलमध्यस्थं देवदेवमुमापतिम्॥ ११<br><br>पूजयित्वा विधानेन क्रमेण च विसर्जयेत्।<br>श्रोत्रियाय दरिद्राय दापयेत्तिलपर्वतम्॥ १२<br><br>एवं तिलनगः प्रोक्तः सर्वस्मादधिकः परः॥ १३ | तुलाभारके कृत्यकी भाँति इसमें दक्षिणा देनी चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! इस दानमें पूर्वकी भाँति यथावत् होम करना भी बताया गया है। लोकपालोंसे आवृत, तिल पर्वतके मध्यमें विराजमान तथा तिलपर्वतरूपी देवदेवेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये। हजार कलशोंसे शिवकी अर्चना करनी चाहिये। अपने इष्टजनोंको तिलके मध्यमें स्थित देवाधिदेव उमापतिका दर्शन कराना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक उनका पूजन करके विसर्जन करना चाहिये। तत्पश्चात् उस तिलपर्वतको धनहीन श्रोत्रिय [ब्राह्मण]–को दिला देना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपसे तिलपर्वतके दानका वर्णन कर दिया; यह सभी दानोंसे श्रेष्ठ है॥ ९–१३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलपर्वतदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तिलपर्वतदान' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३०॥
इकतीसवाँ अध्याय
सूक्ष्म तिलपर्वतदानकी विधि
| सनत्कुमार उवाच<br>अथान्यं पर्वतं सूक्ष्ममल्पद्रव्यं महाफलम्।<br>द्रव्यमात्रोपसंयुक्ते काले मध्यं विधीयते॥ १ | सनत्कुमार बोले—अब एक अन्य सूक्ष्म तिलपर्वतके दानके विषयमें बताता हूँ, जो व्ययमें अल्प द्रव्यवाला, किंतु महान् फल प्रदान करनेवाला है। जब भी व्यक्ति द्रव्यसे सम्पन्न हो जाय, तब इस पवित्र कृत्यको करे॥ १॥ | | गोमयालिप्तभूमौ तु ह्याम्बराणि प्रकीर्य च।<br>तन्मध्ये निक्षिपेद्धीमांस्तिलभारत्रयं शुभम्॥ २ | बुद्धिमान् पुरुषको गोमयसे विधिवत् लीपी गयी भूमिपर वस्त्र बिछाकर उसके मध्यमें तीन भार विशुद्ध तिल स्थापित करना चाहिये॥ २॥ |
३२- सुवर्णपृथ्वीमहादानविधि
| ७१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| पद्ममष्टदलं कुर्यात्कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>दशनिष्केण तत्कार्यं तदर्धार्धेन वा पुनः॥ ३<br><br>तिलमध्ये न्यसेत्पद्मं पद्ममध्ये महेश्वरम्।<br>आराध्य विधिवद्देवं वामादीनि प्रपूजयेत्॥ ४<br><br>शक्तिरूपं सुवर्णेन त्रिनिष्केण तु कारयेत्।<br>न्यासं तु परितः कुर्याद्विघ्नेशान् परिभागतः॥ ५<br><br>पूर्वोक्तहेममानेन विघ्नेशानपि कारयेत्।<br>तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ६ | तदनन्तर कर्णिका तथा केसरसे युक्त सुवर्णका अष्टदल कमल बनाना चाहिये। इसे दस निष्क अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे प्रमाणवाले सुवर्णसे निर्मित करना चाहिये। इस [अष्टदल] कमलको तिलके मध्य रखना चाहिये और कमलके बीच शिवजीकी विधिवत् आराधना करके उनकी वामदेव आदि मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। तीन निष्क सुवर्णके द्वारा शक्तिकी प्रतिमा बनानी चाहिये। इसी प्रकार आठों दिशाओंमें अष्ट विनायकोंकी स्थापना करनी चाहिये। पूर्वमें कहे गये तीन निष्क सुवर्णसे विघ्नेश्वरोंकी भी प्रतिमा बनानी चाहिये। विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा क्रमसे उनकी पूजा करके दानादि शेष क्रियाएँ पूर्वोक्त क्रमसे करें॥ ३-६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥
बत्तीसवाँ अध्याय
सुवर्णपृथ्वीमहादानविधि
| सनत्कुमार उवाच<br>जपहोमार्चनादानाभिषेकाद्यं च पूर्ववत्।<br>सुवर्णमेदिनीदानं प्रवक्ष्यामि समासतः॥ १<br><br>पूर्वोक्तदेशकाले तु कारयेन्मुनिभिः सह।<br>लक्षणेन यथापूर्वं कुण्डे वा मण्डलेऽथ वा॥ २ | सनत्कुमार बोले—अब मैं सुवर्णमेदिनीदानका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। जप, होम, पूजा, दान, अभिषेक आदि कृत्य पूर्वोक्त देशकालमें पूर्वकी भाँति मुनियोंके द्वारा सम्पन्न कराये जाने चाहिये। यह कार्य पूर्वकथित लक्षणकी भाँति कुण्डमें या मण्डलमें किया जाना चाहिये॥ १-२॥ | | मेदिनीं कारयेद्दिव्यां सहस्रेणापि वा पुनः।<br>एकहस्ता प्रकर्तव्या चतुरस्त्रा सुशोभना॥ ३<br><br>सप्तद्वीपसमुद्राद्यैः पर्वतैरभिसंवृता।<br>सर्वतीर्थसमोपेता मध्ये मेरुसमन्विता॥ ४<br><br>अथवा मध्यतो द्वीपं नवखण्डं प्रकल्पयेत्।<br>पूर्ववन्निखिलं कृत्वा मण्डले वेदिमध्यतः॥ ५<br><br>सप्तभागैकभागेन सहस्राद्विधिपूर्वकम्।<br>शिवभक्ते प्रदातव्या दक्षिणा पूर्वचोदिता॥ ६ | एक हजार सुवर्णमुद्राओंसे अथवा उसके आधे अथवा उसके आधेसे दिव्य पृथ्वीका आकार बनाना चाहिये। उसे चौकोर, अत्यन्त सुन्दर तथा एक हाथ लम्बी-चौड़ी बनाये। वह सात द्वीपों, समुद्रों तथा पर्वतोंसे घिरी हुई हो; सभी तीर्थोंसे युक्त हो तथा मध्यमें मेरुसे सुशोभित हो। मध्य भागमें नौखण्डोंके साथ जम्बूद्वीपका निर्माण करे। मण्डलमें वेदीके मध्य पूर्वकी भाँति सम्पूर्ण कृत्य करके सहस्र स्वर्णमुद्राओंके सातवें भागको शिवभक्तको विधिपूर्वक देना चाहिये; इसमें |
३३- कल्पपादपदानविधि
अध्याय ३३ ] कल्पपादपदानविधि ७१९
| सहस्रकलशाद्यैश्च शङ्करं पूजयेच्छिवम्। <br><br> सुवर्णमेदिनीप्रोक्तं लिङ्गेऽस्मिन् दानमुत्तमम्॥ ७ | दक्षिणा पूर्वकी भाँति बतायी गयी है। हजार कलश आदिके द्वारा कल्याणकारी भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। इस लिङ्गपुराणमें कहा गया सुवर्णमेदिनीदान अत्यन्त श्रेष्ठ है॥ ३-७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सुवर्णमेदिनीदानं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सुवर्णमेदिनीदान' नामक बत्तीसावाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥
तैंतीसवाँ अध्याय
कल्पपादपदानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि कल्पपादपमुत्तमम्।<br>शतनिष्केण कृत्वैवं सर्वशाखासमन्वितम्॥ १<br><br>शाखानां विविधं कृत्वा मुक्तादामाद्यलम्बनम्।<br>दिव्यैर्मारकतैश्चैव चाङ्कुराग्रं प्रविन्यसेत्॥ २<br><br>प्रवालं कारयेद्विद्वान् प्रवालेन द्रुमस्य तु।<br>फलानि पद्मरागैश्च परितोऽस्य सुशोभयेत्॥ ३<br><br>मूलं च नीलरत्नेन वज्रेण स्कन्धमुत्तमम्।<br>वैडूर्येण द्रुमाग्रं च पुष्परागेण मस्तकम्॥ ४<br><br>गोमेदकेन वै कन्दं सूर्यकान्तेन सुव्रत।<br>चन्द्रकान्तेन वा वेदिं द्रुमस्य स्फटिकेन वा॥ ५ | अब मैं उत्तम कल्पवृक्षदानका वर्णन करूँगा। सौ निष्क सुवर्णसे सभी शाखाओंसे युक्त एक कल्पवृक्ष बनाकर उसकी समस्त शाखाओंमें मोतियोंकी माला लटकाकर दिव्य मरकत मणिसे अंकुरका अग्रभाग बनाये। विद्वान्को चाहिये कि प्रवाल (मूँगे)-से वृक्षका किसलय बनाये और उसमें चारों ओर पद्मराग मणियोंसे फल बनाये। नीलमणिसे उस वृक्षका मूल, हीरेसे सुन्दर स्कन्ध (तना), वैदूर्य मणिसे वृक्षका अग्रभाग और पुष्पराग (पुखराज)-से मस्तक बनाये। हे सुव्रत! गोमेदसे वृक्षका कन्द और सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त अथवा स्फटिक मणिसे वृक्षके चारों ओर वेदी बनाये॥ १—५॥ |
| वितस्तिमात्रमायामं वृक्षस्य परिकीर्तितम्।<br>शाखाष्टकस्य मानं च विस्तारं चोर्ध्वतस्तथा॥ ६<br><br>तन्मूले स्थापयेल्लिङ्गं लोकपालैः समावृतम्।<br>पूर्वोक्तवेदिमध्ये तु मण्डले स्थाप्य पादपम्॥ ७<br><br>पूजयेद्देवमीशानं लोकपालांश्च यत्नतः।<br>पूर्ववज्जपहोमाद्यं तुलाभारवदाचरेत्॥ ८<br><br>निवेदयेद्द्रुमं शाम्भोयोगिनां वाथ वा नृप।<br>भस्माङ्गिभ्योऽथ वा राजा सार्वभौमो भविष्यति॥ ९ | कल्पवृक्षकी ऊँचाई एक वितस्ति (बारह अंगुल) कही गयी है। उसकी आठ शाखाओंका विस्तार इतने ही प्रमाणवाला होना चाहिये। उस वृक्षके मूलमें लोकपालोंसहित शिवलिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। मण्डलमें पूर्वोक्त वेदीके मध्यमें कल्पवृक्षको स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक भगवान् शिव तथा लोकपालोंकी पूजा करनी चाहिये। जप, होम आदि पूर्वकी भाँति तुलादानके समान ही करना चाहिये। हे राजन्! अन्तमें इस वृक्षको शिवजीको अर्पण कर देना चाहिये अथवा भस्मधारी योगियोंको दान कर देना चाहिये। इसे करनेवाला मनुष्य अगले जन्ममें सार्वभौम (चक्रवर्ती) राजा होगा॥ ६—९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कल्पपादपदानविधिर्नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'कल्पपादपदानविधि' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३३॥
३४- गणेशेशदानविधि
७२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
चौंतीसवाँ अध्याय
गणेशेशदानविधि
| सनत्कुमार उवाच<br>गणेशेशं प्रवक्ष्यामि दानं पूर्वोक्तमण्डपे।<br>सम्पूज्य देवदेवेशं लोकपालसमावृतम्॥ १॥<br><br>विश्वेश्वरान् यथाशास्त्रं सर्वाभरणसंयुतान्।<br>दशनिष्केण वै कृत्वा सम्पूज्य च विधानतः॥ २॥<br><br>अष्टदिक्ष्वष्टकुण्डेषु पूर्ववद्धोममाचरेत्।<br>पञ्चावरणमार्गेण पारम्पर्यक्रमेण च॥ ३॥<br><br>सप्तविप्रान् समभ्यर्च्य कन्यामेकां तथोत्तरे।<br>दापयेत्सर्वमन्त्राणि स्वैःस्वैर्मन्त्रैरनुक्रमात्॥ ४॥<br><br>दत्त्वैवं सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ ५॥ | सनत्कुमार बोले—अब मैं गणेशेशदानका वर्णन करूँगा। पूर्वमें बतायी गयी रीतिसे निर्मित किये गये मण्डपमें लोकपालोंसहित देवदेवेश्वर सदाशिवका पूजन करके दस निष्क सुवर्णसे आठों दिक्पालोंकी प्रतिमा बनाकर उन्हें यथाशास्त्र सभी आभरणोंसे विभूषित करके विधिपूर्वक उनका पूजनकर आठों दिशाओंमें आठ कुण्डोंमें पंचावरण मार्गसे तथा परम्पराक्रमसे पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये॥ १–३॥<br><br>तत्पश्चात् सात विप्रोंकी तथा उत्तर दिशामें एक कन्याकी विधिपूर्वक पूजा करके अनुक्रमसे अपने-अपने देवतामन्त्रोंसे सभी देवप्रतिमाओंका दान कर देना चाहिये। इस प्रकार दान करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४-५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गणेशेशदानविधिनिरूपणं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'गणेशेशदानविधिनिरूपण' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
सुवर्णधेनुदानविधि
| सनत्कुमार उवाच<br>अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि हेमधेनुविधिक्रमम्।<br>सर्वपापप्रशमनं ग्रहदुर्भिक्षनाशनम्॥ १॥<br><br>उपसर्गप्रशमनं सर्वव्याधिनिवारणम्।<br>निष्काणां च सहस्रेण सुवर्णेन तु कारयेत्॥ २॥<br><br>तदर्धेनापि वा सम्यक् तदर्धार्धेन वा पुनः।<br>शतेन वा प्रकर्तव्या सर्वरूपगुणान्विता॥ ३॥<br><br>गोरूपं सुखुरं दिव्यं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>खुराग्रे विन्यसेद्वज्रं शृङ्गे वै पद्मरागकम्॥ ४॥<br><br>भ्रुवोर्मध्ये न्यसेद्दिव्यं मौक्तिकं मुनिसत्तमाः।<br>वैडूर्येण स्तनाः कार्या लाङ्गूलं नीलतः शुभम्॥ ५॥ | सनत्कुमार बोले—अब मैं आपसे हेमधेनुके दानकी विधिका वर्णन करूँगा; यह सभी पापोंका नाश करनेवाला, ग्रह तथा दुर्भिक्षका शमन करनेवाला, उपद्रवोंको शान्त करनेवाला और समस्त व्याधियोंको दूर करनेवाला है॥ १ १/२॥<br><br>हजार सुवर्णमुद्राओंसे एक गौ बनानी चाहिये; अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे अथवा एक सौ स्वर्णमुद्राओंसे सभी लक्षणों तथा गुणोंसे समन्वित धेनुका निर्माण कराना चाहिये। वह गोप्रतिमा सुन्दर खुरोंवाली, दिव्य तथा सभी लक्षणोंसे युक्त होनी चाहिये॥ २-३ १/२॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! खुरोंके अग्र भागमें हीरा तथा सींगोंमें पद्मराग लगाना चाहिये और दोनों भौंहोंके |
३६- ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि
अध्याय ३६ ] ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि ७२१
| दन्तस्थाने प्रकर्तव्यः पुष्परागः सुशोभनः।<br>पशुवत्कारयित्वा तु वत्सं कुर्यात्सुशोभनम्॥ ६<br><br>सुवर्णदशनिष्केण सर्वरत्नसुशोभितम्।<br>पूर्वोक्तवेदिकामध्ये मण्डलं परिकल्प्य तु॥ ७<br><br>तन्मध्ये सुरभिं स्थाप्य सवत्सां सर्वतत्त्ववित्।<br>सवत्सां सुरभिं तत्र वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत्॥ ८<br><br>सम्पूजयेद्गां गायत्र्या सवत्सां सुरभिं पुनः।<br>अथैकाग्निविधानेन होमं कुर्याद्यथाविधि॥ ९<br><br>समिदाज्यविधानेन पूर्ववच्छेषमाचरेत्।<br>शिवपूजा प्रकर्तव्या लिङ्गं स्नाप्य घृतादिभिः॥ १०<br><br>गामालभ्य च गायत्र्या शिवायादापयेच्छुभाम्।<br>दक्षिणा च प्रकर्तव्या त्रिंशन्निष्का महामते॥ ११ | मध्यमें दिव्य मोती लगाना चाहिये। वैदूर्य मणिसे स्तनोंको तथा नीलरत्नसे शुभ पुच्छको भूषित करना चाहिये। दाँतोंमें परम सुन्दर पुष्पराज लगाना चाहिये। साथ ही दस निष्क सुवर्णसे गायकी भाँति एक सुन्दर बछड़ा बनवाकर उसे सभी रत्नोंसे विभूषित करना चाहिये॥ ४-६ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् सर्वतत्त्वविद् पुरुषको चाहिये कि पूर्वमें बतायी गयी विधिसे निर्मित वेदिकाके मध्य मण्डल बनाकर उसके मध्यमें बछड़ेसहित धेनुको रखकर बछड़ेसहित उस गौको दो वस्त्रोंसे वेष्टित कर दे और गायत्रीमन्त्रसे बछड़ेसहित उस सुरभि गौकी पूजा करे॥ ७-८ १/२॥<br><br>इसके बाद अग्निविधानसे समिधा तथा घृतसे विधिपूर्वक होम करना चाहिये; शेष कार्य पूर्वकी भाँति करना चाहिये। तत्पश्चात् शिवलिङ्गको घृत आदिसे स्नान कराकर शिव-पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर गौका स्पर्श करके गायत्रीमन्त्रका उच्चारणकर उस मंगलमयी धेनुको शिवको अर्पण कर देना चाहिये। हे महामते! तीस निष्क सुवर्णकी दक्षिणा भी देनी चाहिये॥ ९-११॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हेमधेनुदानविधिनिरूपणं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हेमधेनुदानविधिनिरूपण' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥
छत्तीसवाँ अध्याय
ऐश्वर्यप्रद महालक्ष्मीदानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| लक्ष्मीदानं प्रवक्ष्यामि महदैश्वर्यवर्धनम्।<br>पूर्वोक्तमण्डपे कार्यं वेदिकोपरिमण्डले॥ १<br><br>श्रीदेवीमतुलां कृत्वा हिरण्येन यथाविधि।<br>सहस्रेण तदर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः॥ २<br><br>अष्टोत्तरशतेनापि सर्वलक्षणसंयुताम्।<br>मण्डले विन्यसेल्लक्ष्मीं सर्वालङ्कारसंयुताम्॥ ३ | अब मैं महान् ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मीदानका वर्णन करूँगा। पूर्वकी भाँति बताये गये विधानसे निर्मित मण्डपमें बनायी गयी वेदीके ऊपर यह दानकर्म करना चाहिये। हजार स्वर्णमुद्राओं अथवा उसके आधे अथवा उसके आधे अथवा एक सौ आठ स्वर्णमुद्राओंसे विधिपूर्वक अनुपम तथा सभी लक्षणोंसे युक्त श्रीदेवीप्रतिमा बनाकर उन लक्ष्मीजीको सभी अलंकारोंसे विभूषित करके मण्डलमें स्थापित करना चाहिये॥ १-३॥ |
३७- तिलधेनुदानविधिनिरूपण
| ७२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| तस्यास्तु दक्षिणे भागे स्थण्डिले विष्णुमर्चयेत्।<br>अर्चयित्वा विधानेन श्रीसूक्तेन सुरेश्वरीम्॥ ४<br><br>अर्चयेद्विष्णुगायत्र्या विष्णुं विश्वगुरुं हरिम्।<br>आराध्य विधिना देवीं पूर्ववद्धोममाचरेत्॥ ५<br><br>समिद्धुत्वा विधानेन आज्याहुतिमथाचरेत्।<br>पृथगष्टोत्तरशतं होमयेद्ब्राह्मणोत्तमैः॥ ६ | उनके दक्षिण भागमें स्थण्डिलके ऊपर श्रीविष्णुका पूजन करना चाहिये। श्रीसूक्तसे विधानपूर्वक सुरेश्वरीकी पूजा करके विष्णुगायत्रीसे विश्वगुरु भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। देवीकी विधिपूर्वक आराधना करके पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये। सर्वप्रथम विधिपूर्वक समिधासे हवन करके बादमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको घृतकी पृथक् एक सौ आठ आहुति प्रदान करनी चाहिये॥ ४–६॥ | | आहूय यजमानं तु तस्याः पूर्वदिशि स्थले।<br>तस्मै तां दर्शयेद्देवीं दण्डवत्प्रणमेत्क्षितौ॥ ७<br><br>प्रणम्य विष्णुं तत्रस्थं शिवं पूर्ववदर्चयेत्।<br>तस्या विंशतिभागं तु दक्षिणा परिकीर्तिता॥ ८<br><br>तदर्द्धांशं तु दातव्यमितरेषां यथार्हतः।<br>ततस्तु होमयेच्छम्भुं भक्तो योगी विशेषतः॥ ९ | तत्पश्चात् यजमानको बुलाकर उन देवीके पूर्वदिशाभागमें उसे बिठाकर उन देवीका दर्शन कराना चाहिये। वह यजमान भी पृथ्वीपर देवीको दण्डवत् प्रणाम करे। इसके बाद वहाँ प्रतिष्ठित विष्णुको प्रणाम करके पूर्वकी भाँति शिवकी पूजा करनी चाहिये। आचार्यके लिये उस मूर्तिके बीसवें भागके तुल्य दक्षिणा बतायी गयी है। उसका आधा अर्थात् बीसवें भागका आधा यथायोग्य अन्य [शिवभक्तों]-को दान करना चाहिये। तदनन्तर भक्त-योगी आचार्यको विशेष-रूपसे भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये होम कराना चाहिये॥ ७–९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लक्ष्मीदानविधिनिरूपणं नाम षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥ ३६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लक्ष्मीदानविधिनिरूपण' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ अध्याय
तिलधेनुदानविधिनिरूपण
| सनत्कुमार उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि तिलधेनुविधिक्रमम्।<br>पूर्वोक्तमण्डपे कुर्याच्छिवपूजां तु पश्चिमे॥ १ | सनत्कुमार बोले— अब मैं तिलधेनुदानके विधिक्रमका वर्णन करूँगा। पूर्वमें बताये गये नियमसे निर्मित मण्डपमें पश्चिम भागमें शिवपूजा करनी चाहिये। | | तस्याग्रे मध्यतो भूमौ पद्ममालिख्य शोभनम्।<br>वस्त्रैराच्छादितं पद्मं तन्मध्ये विन्यसेच्छुभम्॥ २ | उसके आगे मध्यमें भूमिपर सुन्दर कमल बनाकर उसे वस्त्रोंसे आच्छादित कर देना चाहिये। उसके मध्यमें उत्तम तिलपुष्प स्थापित करना चाहिये। | | तिलपुष्पं तु कृत्वाथ हेमपद्मं विनिक्षिपेत्।<br>त्रिंशन्निष्केण कर्तव्यं तदर्धार्धेन वा पुनः॥ ३ | हेमपद्म (सुवर्णकमल) बनाकर उसे मध्यमें रख देना चाहिये। यह हेमपद्म तीस निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे अर्थात् पन्द्रह निष्क अथवा उसके भी आधे अर्थात् |
अध्याय ३७] तिलधेनुदानविधिनिरूपण ७२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पञ्चनिष्केण कर्तव्यं तदर्द्धार्धेन वा पुनः।<br>तमाराध्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ४<br><br>पद्मस्योत्तरदिग्भागे विप्रानेकादश न्यसेत्।<br>तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ५<br><br>आच्छादनोत्तरासङ्गं विप्रेभ्यो दापयेत्क्रमात्।<br>उष्णीषं च प्रदातव्यं कुण्डले च विभूषिते॥ ६<br><br>हेमाङ्गुलीयकं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो विधानतः।<br>एकं दश च वस्त्राणि तेषामग्रे प्रकीर्य च॥ ७<br><br>तेषु वस्त्रेषु निःक्षिप्य तिलाद्यानि पृथक्पृथक्।<br>कांस्यपात्रं शतपलं विभिद्यैकादशांशकम्॥ ८<br><br>इक्षुदण्डं च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः।<br>गोशृङ्गे तु हिरण्येन द्विनिष्केण तु कारयेत्॥ ९<br><br>रजतेन तु कर्तव्याः खुरा निष्कद्वयेन तु।<br>एवं पृथक्पृथक् दत्त्वा तत्तिलेषु विनिक्षिपेत्॥ १०<br><br>रुद्रैकादशमन्त्रैस्तु रुद्रेभ्यो दापयेत्तदा।<br>पद्मस्य पूर्वदिग्भागे विप्रान् द्वादश पूजितान्॥ ११<br><br>एतेनैव तु मार्गेण तेषु श्रद्धासमन्वितः।<br>द्वादशादित्यमन्त्रैश्च दापयेदेवमेव च॥ १२<br><br>पूर्ववद्दक्षिणे भागे विप्रान् षोडश संस्थितान्।<br>मूर्तिं विघ्नेशमन्त्रैश्च दापयेत्पूर्ववत्पुनः॥ १३<br><br>यजमानेन कर्तव्यं सर्वमेतद्यथाक्रमम्।<br>केवलं रुद्रदानं वा आदित्येभ्योऽथ वा पुनः॥ १४<br><br>मूर्त्यादीनां च वा देयं यथाविभवविस्तरम्।<br>पद्मं विन्यस्य राजासौ शेषं वा कारयेन्नृपः॥ १५<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या पञ्चनिष्केण भूषणम्॥ १६ | साढ़े सात निष्क सुवर्णसे बनाना चाहिये, अथवा पाँच निष्क सुवर्णसे अथवा उसके आधे भागसे अथवा उसके भी आधे भागसे उस कमलका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् उस हेमपद्मके विग्रहका ध्यान करके गन्ध, पुष्प आदिसे क्रमपूर्वक उसकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥१-४॥<br><br>उस पद्मके उत्तर दिग्भागमें ग्यारह ब्राह्मणोंको बैठाना चाहिये और क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे विधिपूर्वक उनका पूजन करके उन विप्रोंको क्रमसे वस्त्र तथा उत्तरीय प्रदान करना चाहिये; उन्हें पगड़ी भी देनी चाहिये। तत्पश्चात् दो रत्नमय कुण्डल और सुवर्णकी अँगूठी ब्राह्मणोंको विधानपूर्वक प्रदान करके उनके आगे ग्यारह वस्त्र फैलाकर उन वस्त्रोंपर अलग-अलग तिल आदि, सौ पलके बनाये हुए ग्यारह कांस्यपात्र और इक्षुदण्ड रखकर ब्राह्मणोंको प्रदान करना चाहिये॥५-८ १/२॥<br><br>दो निष्क सुवर्णसे गायकी दो सींगें बनाये तथा दो निष्क परिमाणकी चाँदीसे उसके खुर बनाये और सबको पृथक्-पृथक् उन तिलोंपर रख दे। इसके बाद रुद्रके ग्यारह मन्त्रोंसे ग्यारह रुद्रोंको तिलधेनु अर्पण कर दे। इसी प्रकार उस पद्मकी पूर्व दिशामें बारह विप्रोंकी पूजा करके श्रद्धायुक्त होकर द्वादश आदित्यके मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु अर्पण करे। दक्षिण दिशामें स्थित सोलह विप्रोंकी पूजा करके पूर्वकी भाँति विघ्नेश-मन्त्रोंसे उन्हें तिलधेनु प्रदान करे। यह समस्त कार्य यजमानके द्वारा यथाक्रम सम्पन्न किया जाना चाहिये। रुद्रोंको अथवा आदित्योंको दानकर अपने सामर्थ्यके अनुसार मूर्ति आदिकी दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार राजाको चाहिये कि पद्म-स्थापन करके शेष कार्य आचार्यद्वारा करवाये। अन्तमें पाँच निष्क सुवर्णका भूषण अर्पण करके आचार्यको दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये॥ ९-१६॥ |
॥ इति श्रीमल्लिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तिलधेनुदानविधिनिरूपणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीमल्लिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तिलधेनुदानविधिनिरूपण' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥
३८- महादानोंमें परिगणित गोसहस्रदानकी विधि
| ७२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
अड़तीसवाँ अध्याय
महादानोंमें परिगणित गोसहस्रदानकी विधि
| सनत्कुमार उवाच | |
|---|---|
| गोसहस्रप्रदानं च वदामि शृणु सुव्रत।<br>गवां सहस्रमादाय सवत्सं सगुणं शुभम्॥ १<br><br>तास्त्वभ्यर्च्य यथाशास्त्रमष्टौ सम्यक्प्रयत्नतः।<br>तासां शृङ्गाणि हेम्नाथ प्रतिनिष्केण बन्धयेत्॥ २<br><br>खुरांश्च रजतेनैव बन्धयेत्कण्ठदेशतः।<br>प्रतिनिष्केण कर्तव्यं कर्णे वज्रं च शोभनम्॥ ३ | **सनत्कुमार बोले—**हे सुव्रत! अब मैं गोसहस्रदानकी विधि बताता हूँ; इसे सुनिये। उत्तम लक्षणोंसे युक्त, मंगलमयी तथा बछड़ोंसहित एक हजार गायें लाकर उनकी पूजा करके उनमेंसे आठ गायोंकी शास्त्रविधिसे प्रयत्नपूर्वक सम्यक् पूजा करे। तत्पश्चात् उनकी सींगोंमें एक निष्क सुवर्ण बाँध दे और खुरोंमें भी एक-एक निष्क सुवर्ण बाँध दे। उनके कण्ठमें एक निष्क सुवर्णका कण्ठाभूषण पहनाये तथा कानोंको सुन्दर हीरेसे अलंकृत करे॥ १—३॥ |
| शिवाय दद्याद्विप्रेभ्यो दक्षिणां च पृथक्पृथक्।<br>दशनिष्कं तदर्धं वा तस्यार्धार्धमथापि वा॥ ४<br><br>यथाविभवविस्तारं निष्कमात्रमथापि वा।<br>वस्त्रयुग्मं च दातव्यं पृथग्विप्रेषु शोभनम्॥ ५ | तत्पश्चात् इन्हें शिवको अर्पण कर दे। ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् दस निष्क अथवा उसका आधा अथवा उसके आधेका आधा अथवा एक निष्क सुवर्ण अपने सामर्थ्यके अनुसार दक्षिणा देनी चाहिये और प्रत्येक ब्राह्मणको एक जोड़ा सुन्दर वस्त्र प्रदान करना चाहिये। दत्तचित्त होकर आराधना करके उन्हें उत्तम गौएँ प्रदान करनी चाहिये॥ ४-५ १/२॥ |
| गावश्चाराध्य यत्नेन दातव्याः सुमनोरमाः।<br>एवं दत्त्वा विधानेन शिवमभ्यर्च्य शङ्करम्॥ ६<br><br>जपेदग्रे यथान्यायं गवां स्तवमनुत्तमम्।<br>गावो ममाग्रतो नित्यं गावो नः पृष्ठतस्तथा॥ ७<br><br>हृदये मे सदा गावो गवां मध्ये वसाम्यहम्।<br>इति कृत्वा द्विजाग्र्येभ्यो दत्त्वा गत्वा प्रदक्षिणम्॥ ८<br><br>तद्रोमवर्षसंख्यानि स्वर्गलोके महीयते॥ ९ | इस प्रकार विधानपूर्वक दान करके कल्याणकारी भगवान् शिवका अर्चनकर गौओंके आगे इस उत्तम स्तवनका सम्यक् प्रकारसे पाठ करना चाहिये—'गावो ममाग्रतो नित्यं गावो नः पृष्ठतस्तथा। हृदये मे सदा गावो गवां मध्ये वसाम्यहम्।।' अर्थात् गायें नित्य मेरे आगे रहें, गायें हमारे पीछेकी ओर रहें, गायें सदा मेरे हृदयमें रहें और मैं गायोंके मध्य निवास करूँ—ऐसा पाठ करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको गायें प्रदानकर उनकी प्रदक्षिणा करे। इस प्रकारसे दान करनेवाला मनुष्य उन गायोंके शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ६—९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गोसहस्रप्रदानं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'गोसहस्रप्रदान' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३८॥
३९- हिरण्याश्वदानविधि
अध्याय ३९] हिरण्याश्वदानविधि ७२५
उनतालीसवाँ अध्याय
हिरण्याश्वदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br><br>हिरण्याश्वप्रदानं च वदामि विजयावहम्।<br>अश्वमेधात्पुनः श्रेष्ठं वदामि शृणु सुव्रत॥ १ | सनत्कुमार बोले— अब मैं विजयकी प्राप्ति करानेवाले हिरण्याश्वदानकी विधि बताता हूँ; हे सुव्रत! अश्वमेधयज्ञसे भी श्रेष्ठ इस दानका वर्णन कर रहा हूँ; आप सुनें॥ १॥ |
| अष्टोत्तरसहस्रेण अष्टोत्तरशतेन वा।<br>कृत्वाश्वं लक्षणैर्युक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम्॥ २<br><br>पञ्चकल्याणसम्पन्नं दिव्याकारं तु कारयेत्।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वाङ्गैश्च समन्वितम्॥ ३<br><br>सर्वायुधसमोपेतमिन्द्रवाहनमुत्तमम् ।<br>तन्मध्यदेशे संस्थाप्य तुरङ्गं स्वगुणान्वितम्॥ ४<br><br>उच्चैःश्रवसकं मत्वा भक्त्या चैव समर्चयेत्।<br>तस्य पूर्वदिशाभागे ब्राह्मणं वेदपारगम्॥ ५ | एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ निष्क सुवर्णसे एक अश्वका निर्माण करके उसे सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त अलंकारोंसे सुशोभित, पंचकल्याणसम्पन्न (श्वेतवर्णके चारों पाद तथा श्वेतवर्णके मुखवाला) और दिव्य आकृतिवाला बनाना चाहिये। साथ ही सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त, समस्त अंगोंवाला तथा सभी प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित एक उत्तम इन्द्ररथ बनाकर उसके अग्रभागके मध्यस्थानमें सुन्दर गुणोंवाले उस अश्वको स्थापित करके उसे 'उच्चैःश्रवा' अश्व मानकर भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये॥ २-४ १/२॥ |
| सुरेन्द्रबुद्ध्या सम्पूज्य पञ्चनिष्कं प्रदापयेत्।<br>स चाश्वः शिवभक्ताय दातव्यो विधिनैव तु॥ ६<br><br>सुवर्णाश्वं प्रदत्त्वा तु आचार्यमपि पूजयेत्।<br>यथाविभवविस्तारं पञ्चनिष्कमथापि वा॥ ७<br><br>दीनान्धकृपणानाथबालवृद्धकृशातुरान् ।<br>तोषयेदन्नदानेन ब्राह्मणांश्च विशेषतः॥ ८ | उसके पूर्व दिशा भागमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको आसीन करके उन्हें इन्द्र मानकर उनकी पूजाकर पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे और वह सुवर्ण-अश्व विधिपूर्वक शिवभक्त विप्रको दे दे। अपने सामर्थ्यके अनुसार सुवर्ण-अश्व प्रदान करके आचार्यकी पूजा करे अथवा पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे। तत्पश्चात् दीनों, अन्धों, असहायों, बालकों, वृद्धों, दुर्बलों तथा रोगियों और विशेषकर ब्राह्मणोंको अन्नदानके द्वारा सन्तुष्ट करे॥ ५-८॥ |
| एतद्यः कुरुते भक्त्या दानमश्वस्य मानवः।<br>ऐन्द्रान् भोगांश्चिरं भुक्त्वा रुचिरैश्वर्यवान् भवेत्॥ ९ | जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस सुवर्ण-अश्वका दान करता है, वह दीर्घकालतक इन्द्रतुल्य सुखोंका भोग करके महान् ऐश्वर्यशाली हो जाता है॥ ९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे हिरण्याश्वदानं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हिरण्याश्वदान' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
४०- कन्यादानविधि
| ७२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
चालीसवाँ अध्याय
कन्यादानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| कन्यादानं प्रवक्ष्यामि सर्वदानोत्तमोत्तमम्।<br>कन्यां लक्षणसम्पन्नां सर्वदोषविवर्जिताम्॥ १<br><br>मातापित्रोस्तु संवादं कृत्वा दत्त्वा धनं महत्।<br>आत्मीकृत्याथ संस्नाप्य वस्त्रं दत्त्वा शुभं नवम्॥ २<br><br>भूषणैर्भूषयित्वाथ गन्धमाल्यैरथार्चयेत्।<br>निमित्तानि समीक्ष्याथ गोत्रनक्षत्रकादिकान्॥ ३ | अब मैं सभी दानोंमें अतिश्रेष्ठ कन्यादानका वर्णन करूँगा। किसी कन्याके माता-पितासे बात-चीत करके उन्हें अत्यधिक धन देकर समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सभी दोषोंसे रहित उस कन्याको अपनी पुत्री बना ले। इसके बाद उसे स्नान कराकर सुन्दर तथा नवीन वस्त्र प्रदान करके आभूषणोंसे अलंकृतकर गन्ध, पुष्प आदिसे उसकी पूजा करे॥ १-२ १/२॥ |
| उभयोश्चित्तमालोक्य उभौ सम्पूज्य यत्नतः।<br>दातव्या श्रोत्रियायैव ब्राह्मणाय तपस्विने॥ ४<br><br>साक्षादधीतवेदाय विधिना ब्रह्मचारिणे।<br>दासदासीधनाढ्यं च भूषणानि विशेषतः॥ ५<br><br>क्षेत्राणि च धनं धान्यं वासांसि च प्रदापयेत्।<br>यावन्ति देहे रोमाणि कन्यायाः सन्ततौ पुनः॥ ६<br><br>तावद्वर्षसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ७ | तत्पश्चात् शकुन, गोत्र, नक्षत्र आदिका सम्यक् विचार करके कन्या तथा वरके अन्तःकरणकी अनुकूलता देखकर उन दोनोंकी प्रयत्नपूर्वक विधिवत् पूजाकर उस श्रोत्रिय, तपस्वी, वेदपारंगत तथा ब्रह्मचारी ब्राह्मणको विधानपूर्वक वह कन्या अर्पित कर दे। साथ ही दास, दासी, आभूषण, भूमि, धन, धान्य तथा वस्त्र भी प्रदान करे। इस दानको करनेवाला मनुष्य उस कन्याके तथा उसकी संतानोंके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३-७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कन्यादानविधिर्नाम चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'कन्यादानविधि' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
इकतालीसवाँ अध्याय
हिरण्यवृषमहादानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| हिरण्यवृषदानं च कथयामि समासतः।<br>वृषरूपं हिरण्येन सहस्रेणाथ कारयेत्॥ १<br><br>तदर्धार्धेन वा धीमांस्तदर्धार्धेन वा पुनः।<br>अष्टोत्तरशतेनापि वृषभं धर्मरूपिणम्॥ २ | अब मैं हिरण्यवृषके दानका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ। एक हजार सुवर्णमुद्रासे वृषभकी एक प्रतिमा बनानी चाहिये अथवा बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उसके आधेके आधे भागसे अथवा उसके भी आधेके आधे भागसे अथवा एक सौ आठ सुवर्णमुद्रासे धर्मरूपी वृषभका निर्माण करे॥ १-२॥ |
| ललाटे कारयेत्पुण्ड्रमर्धचन्द्रकलाकृतिम्।<br>स्फटिकेन तु कर्त्तव्यं खुरं तु रजतेन वै॥ ३<br><br>ग्रीवां तु पद्मरागेण ककुद्गोमेदकेन च।<br>ग्रीवायां घण्टवलयं रत्नचित्रं तु कारयेत्॥ ४ | उसके ललाटपर स्फटिकमणिका अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र सुशोभित करे। उसका खुर चाँदीसे, ग्रीवा पद्मरागमणिसे और ककुद् गोमेदसे बनाये। तदनन्तर |
४२- सुवर्णगजदानविधि
अध्याय ४१ ] सुवर्णगजदानविधि [ ७२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वृषाङ्कं कारयेत्तत्र किङ्किणीवलयावृतम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले तु वेदिकोपरिमण्डले॥ ५<br><br>वृषेन्द्रं स्थापयेत्तत्र पश्चिमामुखमग्रतः।<br>ईश्वरं पूजयेद्भक्त्या वृषारूढं वृषध्वजम्॥ ६ | उसकी ग्रीवामें रत्नजटित घण्टियोंकी माला पहनाये। इसके बाद छोटी-छोटी घण्टियोंकी मालासे आवृत करके शिवकी एक मूर्ति बनाये। तत्पश्चात् पूर्वमें कही गयी रीतिसे स्थान तथा कालमें वेदिकाके ऊपर मण्डलमें उस वृषेन्द्रको पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करे॥ ३-५ १/२॥ |
| वृषेन्द्रं पूज्य गायत्र्या नमस्कृत्य समाहितः।<br>तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि।<br>तन्नो वृषः प्रचोदयात्॥ ७<br><br>मन्त्रेणानेन सम्पूज्य वृषं धर्मविवृद्धये।<br>होमयेच्च घृचान्नाद्यैर्यथाविभवविस्तरम्॥ ८<br><br>वृषभः पूज्य दातव्यो ब्राह्मणेभ्यः शिवाय वा।<br>दक्षिणा चैव दातव्या यथावित्तानुसारतः॥ ९<br><br>एतद्यः कुरुते भक्त्या वृषदानमनुत्तमम्।<br>शिवस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते॥ १० | तदनन्तर उस वृषभपर आरूढ़ उन वृषध्वज शिवजीकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः नमस्कार करके समाहितचित्त होकर वृषगायत्रीमन्त्रसे वृषेन्द्रकी पूजा करे। 'तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि। तन्नो वृषः प्रचोदयात्'—इस मन्त्रसे वृषभकी विधिपूर्वक पूजा करके धर्मकी अभिवृद्धिके लिये अपने सामर्थ्यके अनुसार घृत-अन्न आदिसे हवन करे। इस प्रकार सम्यक् पूजन करके उस वृषभको शिवजीको अथवा ब्राह्मणोंको अर्पित कर दे। अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अत्युत्तम वृषदानको करता है, वह शिवका अनुचर होकर उन्हींके साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ६-१०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सुवर्णवृषदानं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सुवर्णवृषदान' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय
सुवर्णगजदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>गजदानं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः।<br>द्विजाय वा शिवायाथ दातव्यः पूज्य पूर्ववत्॥ १ | सनत्कुमार बोले—अब मैं क्रमके अनुसार सुवर्णगजदानका यथावत् वर्णन करूँगा। पूर्वकी भाँति उसका विधिवत् पूजन करके उसे शिवजीको अथवा ब्राह्मणको अर्पित कर देना चाहिये॥ १॥ |
| गजं सुलक्षणोपेतं हैमं वा रजतं तु वा।<br>सहस्रनिष्कमाश्रेण तदर्धेनापि कारयेत्॥ २<br><br>तदर्धार्धेन वा कुर्यात्सर्वलक्षणभूषितम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले च देवाय विनिवेदयेत्॥ ३ | शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सुवर्ण अथवा चाँदीका गज एक हजार निष्क परिमाणसे अथवा उसके आधे अर्थात् पाँच सौ निष्कसे बनवाना चाहिये; अथवा उसके आधेके भी आधे परिमाणसे सभी लक्षणोंसे युक्त गजका निर्माण कराना चाहिये और पूर्वोक्त देश तथा कालमें उसे महादेवको अर्पित करना चाहिये। |
| अष्टम्यां वा प्रदातव्यं शिवाय परमेष्ठिने।<br>ब्राह्मणाय दरिद्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये॥ ४ | [पूर्वोक्त देशकालके अभावमें] उसे परमेष्ठी शिवको अष्टमी तिथिमें अर्पण |
४३- लोकपालाष्टकमहादानविधि
| ७२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| शिवमुद्दिश्य दातव्यं शिवं सम्पूज्य पूर्ववत्।<br>एतद्यः कुरुते दानं शिवभक्तिसमाहितम्॥ ५<br><br>स्थित्वा स्वर्गे चिरं कालं राजा गजपतिर्भवेत्॥ ६ | करना चाहिये अथवा शिवको उद्देश्य करके किसी धनहीन श्रोत्रिय अग्निहोत्री ब्राह्मणको इसे प्रदान करना चाहिये; पूर्वकी भाँति भगवान् शिवका सम्यक् पूजन करके इसे प्रदान करना चाहिये। जो मनुष्य शिवभक्तिसे युक्त होकर इस गजदानको करता है, वह स्वर्गमें दीर्घकालतक निवास करके [अगले जन्ममें] गजपति (सार्वभौम) राजा होता है॥ २-६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गजदानविधानवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'गजदानविधानवर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४२॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
लोकपालाष्टकमहादानविधि
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमार बोले— |
|---|---|
| लोकपालाष्टकं दिव्यं साक्षात्परमदुर्लभम्।<br>सर्वसम्पत्करं गुह्यं परचक्रविनाशनम्॥ १<br><br>स्वदेशरक्षणं दिव्यं गजवाजिविवर्धनम्।<br>पुत्रवृद्धिकरं पुण्यं गोब्राह्मणहितावहम॥ २ | अब मैं लोकपालाष्टकदानका वर्णन करता हूँ; जो दिव्य, परम दुर्लभ, समस्त सम्पदाओंको प्रदान करनेवाला, गोपनीय, शत्रुके राज्यका विनाश करनेवाला, अपने देशकी रक्षा करनेवाला, प्रशस्त, हाथी-घोड़े आदिकी वृद्धि करनेवाला, पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाला, पुण्यदायक तथा गो-ब्राह्मणका कल्याण करनेवाला है॥ १-२॥ |
| पूर्वोक्तदेशकाले तु वेदिकोपरिमण्डले।<br>मध्ये शिवं समभ्यर्च्य यथान्यायं यथाक्रमम्॥ ३<br><br>दिग्वि दिक्षु प्रकर्तव्यं स्थण्डिलं वालुकामयम्।<br>अष्टौ विप्रान् समभ्यर्च्य वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ४<br><br>जितेन्द्रियान् कुलोद्भूतान् सर्वलक्षणसंयुतान्।<br>शिवाभिमुखमासीनानाहतेष्वम्बरेषु च॥ ५<br><br>वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैर्लोकपालकमन्त्रकैः ।<br>गन्धपुष्पैः सुधूपैश्च ब्राह्मणानर्चयेत्क्रमात्॥ ६ | पूर्वोक्त देशकालमें वेदीके ऊपर मण्डलका निर्माण करके उसके मध्यमें शिवको स्थापित करके उनकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनेके अनन्तर आठों दिशाओंमें बालुकामय स्थण्डिल बनाना चाहिये। तत्पश्चात् उन आठों वेदियोंपर नवीन वस्त्रके आसनोंपर वेदवेदांगमें पारंगत, जितेन्द्रिय, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न आठ विप्रोंको शिवाभिमुख आसीन करके उनका पूजन करे। दिव्य वस्त्रों तथा आभूषणोंसे अलंकृत करके गन्ध, पुष्प एवं उत्तम धूप—इन उपचारोंसे लोकपाल-मन्त्रोंके द्वारा उन ब्राह्मणोंकी क्रमसे पूजा करनी चाहिये॥ ३—६॥ |
| पूर्वतो होमयेदग्नौ लोकपालकमन्त्रकैः।<br>समिद्धृताभ्यां होतव्यमग्निकार्यं क्रमेण वा॥ ७<br><br>एवं हुत्वा विधानेन आचार्यः शिववत्सलः।<br>यजमानं समाहूय सर्वाभरणभूषितान्॥ ८ | तदनन्तर पूर्वकी भाँति अग्निमें होम करना चाहिये; लोकपालमन्त्रोंके द्वारा घृत तथा समिधासे क्रमपूर्वक अग्निकार्य (हवन) करना चाहिये। इस प्रकार विधानपूर्वक हवन करके शिवभक्त आचार्यको चाहिये कि यजमानको बुलाकर उसके द्वारा सभी आभरणोंसे भूषित विप्रोंकी |
४४- त्रिमूर्तिदानविधि
| अध्याय ४४ ] | त्रिमूर्तिदानविधि | ७२१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेन तान् पूजयित्वा द्विजेभ्यो दापयेद्धनम्।<br>पृथक्पृथक् तन्मन्त्रैश्च दशनिष्कं च भूषणम्॥ ९<br><br>दशनिष्केण कर्तव्यमासनं केवलं पृथक्।<br>स्नपनं तत्र कर्तव्यं शिवस्य विधिपूर्वकम्॥ १०<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या यथाविभवविस्तरम्।<br>एवं यः कुरुते दानं लोकेशानां तु भक्तितः।<br>लोकेशानां चिरं स्थित्वा सार्वभौमो भवेद्बुधः॥ ११ | पूजा करवाकर उन लोकपालमन्त्रोंके द्वारा उन्हें पृथक्-पृथक् द्रव्य तथा दस निष्क सुवर्णका आभूषण दिलाये। साथ ही दस निष्क परिमाणका आसन भी प्रदान करे। वहाँ विधिपूर्वक शिवजीको स्नान कराये। तत्पश्चात् अपने सामर्थ्यके अनुसार आचार्यको दक्षिणा प्रदान करे। जो मनुष्य इस विधिसे भक्ति-पूर्वक लोकपालोंका दान करता है, वह दीर्घकालतक लोकपालोंके समीप निवास करके बुद्धिमान् तथा चक्रवर्ती राजा होता है॥ ७–११॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लोकपालाष्टकदानविधानवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लोकपालाष्टकदानविधानवर्णन' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
त्रिमूर्तिदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि सर्वदानोत्तमोत्तमम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले च मण्डपे च विधानतः॥ १<br><br>प्रणयात्कुण्डमध्ये च स्थण्डिले शिवसन्निधौ।<br>पूर्वं विष्णुं समासाद्य पद्मयोनिमतः परम्॥ २<br><br>मन्त्राभ्यां विधिनोक्ताभ्यां प्रणवादिसमन्त्रकम्।<br>नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।<br>तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ ३<br><br>ब्रह्मब्राह्मणवृद्धाय ब्रह्मणे विश्ववेधसे।<br>शिवाय हरये स्वाहा स्वधा वौषट् वषट् तथा॥ ४<br><br>पूजयित्वा विधानेन पश्चाद्धोमं समाचरेत्।<br>सर्वद्रव्यं हि होतव्यं द्वाभ्यां कुण्डविधानतः॥ ५<br><br>ऋत्विजौ द्वौ प्रकर्तव्यौ गुरुणा वेदपारगौ।<br>तानुद्दिश्य यथान्यायं विप्रेभ्यो दापयेद्धनम्॥ ६<br><br>शतमष्टोत्तरं तेभ्यः पृथक्पृथगनुत्तमम्।<br>वस्त्राभरणसंयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम्॥ ७ | सनत्कुमार बोले—अब मैं समस्त दानोंमें अत्युत्तम अन्य [त्रिमूर्ति] दानका वर्णन करूँगा। पूर्वोक्त काल और स्थानमें भलीभाँति मण्डप तथा वेदिका निर्माण करे। इसके बाद भक्तिपूर्वक शिवकुण्डके समीप स्थण्डिलपर शिवजीको स्थापित करके उनके पार्श्वभागमें पहले विष्णुको, बादमें पद्मयोनि ब्रह्माको स्थापित करके सप्रणव शिवमन्त्रसहित विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। वे मन्त्र इस प्रकार हैं—नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ ब्रह्मब्राह्मणवृद्धाय ब्रह्मणे विश्ववेधसे। शिवाय हरये स्वाहा स्वधा वौषट् वषट् तथा॥ १–४॥<br><br>इस प्रकार विधानपूर्वक पूजन करके बादमें होम करना चाहिये। ब्रह्मा तथा विष्णु—इन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् कुण्डकी व्यवस्था करके सम्पूर्ण होम-द्रव्यका हवन करना चाहिये। आचार्यको चाहिये कि वेदके पारगामी दो ऋत्विजोंको नियुक्त करे। उन ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवको उद्देश्य करके ब्राह्मणोंको समुचित दक्षिणा-द्रव्य दिलाना चाहिये। वस्त्राभूषण और सभी अलंकारोंके साथ एक सौ आठ उत्तम स्वर्ण-मुद्राएँ पृथक्-पृथक् उन विप्रोंको प्रदान करनी |
४५- जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान
| ७३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| गुरुरेको हि वै श्रीमान् ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः।<br>तेषां पृथक्पृथग्देयं भोजयेद्ब्राह्मणानपि॥ ८<br><br>शिवार्चना च कर्तव्या स्नपनादि यथाक्रमम्॥ ९ | चाहिये। श्रीमान् गुरु (आचार्य) एक हैं, फिर भी उन्हें साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव मानकर पृथक्-पृथक् तीनों मूर्तियोंका दान करना चाहिये और अन्य ब्राह्मणों एवं दीन-दुःखियोंको भोजन कराना चाहिये। इसके अनन्तर अभिषेक आदि शिवार्चन यथाक्रम करना चाहिये॥ ५-९॥ |
|---|
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे विष्णुदानविधानवर्णनं नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'विष्णुदानविधानवर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४४॥
पैंतालीसवाँ अध्याय
जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान *
| ऋषय ऊचुः<br>एवं षोडश दानानि कथितानि शुभानि च।<br>जीवच्छ्राद्धक्रमोऽस्माकं वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] इस प्रकार आपने कल्याणकारी सोलह दानोंके विषयमें बता दिया, अब आप हमें जीवच्छ्राद्धकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>जीवच्छ्राद्धविधिं वक्ष्ये समासात्सर्वसम्मतम्।<br>मनवे देवदेवेन कथितं ब्रह्मणा पुरा॥ २<br>वसिष्ठाय च शिष्टाय भृगवे भार्गवाय च।<br>शृण्वन्तु सर्वभावेन सर्वसिद्धिकरं परम्॥ ३<br>श्राद्धमार्गक्रमं साक्षाच्छ्राद्धार्हाणामपि क्रमम्।<br>विशेषमपि वक्ष्यामि जीवच्छ्राद्धस्य सुव्रताः॥ ४ | **सूतजी बोले—**मैं सर्वसम्मत जीवच्छ्राद्ध-विधिका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। इसे पूर्वकालमें देवदेव ब्रह्माने स्वायम्भुव मनु, पूज्य वसिष्ठ, भृगु तथा भार्गवको बताया था। आपलोग पूर्ण मनोयोगसे समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उस श्राद्धके विषयमें सुनें। हे सुव्रतो! मैं अतिश्रेष्ठ श्राद्धमार्गकी विधि, साक्षात् श्राद्धके योग्य पुरुषोंका क्रम और जीवच्छ्राद्धकी विशेष विधिका भी वर्णन कर रहा हूँ॥ २–४॥ |
| पर्वते वा नदीतीरे वने वायतनेऽपि वा।<br>जीवच्छ्राद्धं प्रकर्तव्यं मृतकाले प्रयत्नतः॥ ५<br>जीवच्छ्राद्धे कृते जीवो जीवन्नेव विमुच्यते।<br>कर्म कुर्वन्नकुर्वन् वा ज्ञानी वाज्ञानवानपि॥ ६<br>श्रोत्रियोऽश्रोत्रियो वापि ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा।<br>वैश्यो वा नात्र सन्देहो योगमार्गगतो यथा॥ ७ | मनुष्यको वृद्धावस्थामें पर्वतपर, नदीके तटपर, वनमें अथवा देवालयमें प्रयत्नपूर्वक जीवच्छ्राद्ध करना चाहिये। जीवच्छ्राद्ध कर लेनेपर प्राणी जीवित रहते ही मुक्त हो जाता है; वह कर्म करे अथवा न करे, ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी, श्रोत्रिय हो अथवा अश्रोत्रिय, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य कोई भी हो—वह योगमार्गको प्राप्त योगीकी भाँति मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५—७॥ |
| परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गन्धवर्णरसादिभिः।<br>शल्यमुद्धृत्य यत्नेन स्थण्डिलं सैकतं भुवि॥ ८ | [जीवच्छ्राद्धकी विधि बतायी जाती है—] गन्ध, वर्ण, रस आदिके द्वारा भूमिकी विधिवत् परीक्षा करके यत्नपूर्वक शल्य (दोष) निकालकर उस भूमिपर |
* इस अध्यायमें जीवच्छ्राद्धका माहात्म्य एवं संक्षेपमें श्राद्धकी विधि आयी है, किंतु वर्तमानमें जीवच्छ्राद्धकी जो प्रक्रिया उपलब्ध होती है, वह इससे भिन्न है। गीताप्रेससे 'जीवच्छ्राद्धपद्धति' नामसे एक पुस्तक प्रकाशित है, जिसमें जीवच्छ्राद्ध-सम्बन्धी समस्त प्रक्रिया पूर्णरूपसे उपलब्ध है, जिज्ञासुजनोंको उसका अवलोकन करना चाहिये।
अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३१
| मूल संस्कृत (श्लोक एवं मन्त्र) | हिन्दी अनुवाद एवं मन्त्र-निर्देश |
|---|---|
| मध्यतो हस्तमात्रेण कुण्डं चैवायतं शुभम्।<br>स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यमिषुमात्रं पुनः पुनः॥ ९<br>उपलिप्य विधानेन चालिप्याग्निं विधाय च।<br>अन्वाधाय यथाशास्त्रं परिगृह्य च सर्वतः॥ १०<br>परिस्तीर्य स्वशाखोक्तं पारम्पर्यक्रमागतम्।<br>समाप्याग्निमुखं सर्वं मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्॥ ११<br>सम्पूज्य स्थण्डिले वह्नौ होमयेत्समिदादिभिः।<br>आदौ कृत्वा समिद्धोमं चरुणा च पृथक्पृथक्॥ १२<br>घृतेन च पृथक्पात्रे शोधितेन पृथक्पृथक्।<br>जुहुयादात्मनोद्धृत्य तत्त्वभूतानि सर्वतः॥ १३<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः॥ १४॥ ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा॥ १५॥ ॐ भुवः विष्णवे नमः॥ १६॥ ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा॥ १७॥ ॐ स्वः रुद्राय नमः॥ १८॥ ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा॥ १९॥ ॐ महः ईश्वराय नमः॥ २०॥ ॐ महः ईश्वराय स्वाहा॥ २१॥ ॐ जनः प्रकृतये नमः॥ २२॥ ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा॥ २३॥ ॐ तपः मुद्गलाय नमः॥ २४॥ ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा॥ २५॥ ॐ ऋतं पुरुषाय नमः॥ २६॥ ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा॥ २७॥ ॐ सत्यं शिवाय नमः॥ २८॥ ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा॥ २९॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः॥ ३०॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा॥ ३१॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः॥ ३२॥ ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा॥ ३३॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः॥ ३४॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा॥ ३५॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः॥ ३६॥ ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा॥ ३७॥ ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः॥ ३८॥ | बालूकी वेदी बनाये और उस वेदीके मध्य एक हाथ-प्रमाणका लम्बा-चौड़ा सुन्दर कुण्ड अथवा अरत्नि (कुहनीसे कनिष्ठिका अँगुलीतककी दूरी)-प्रमाणवाला स्थण्डिल बनाये। उसे बार-बार अत्यन्त स्निग्ध (चिकना) करके गोमयसे लीपकर अपने-अपने वेदोंकी शाखाओंके परम्परागत मन्त्रोंसे अग्निस्थापन करके तीन समिधाएँ लेकर हूयमान सभी देवताओंका आवाहनकर पुनः कुशास्तरण करे। विधिवत् पूजन करके स्थण्डिलपर अग्निमें यज्ञकी समिधाओंके द्वारा होम करे; पहले समिधासे हवन करके बादमें चरुसे तथा घृतसे पृथक्-पृथक् हवन करे। आज्यस्थालीमें शुद्ध किये हुए घृतसे तत्त्वभूतोंको मनसे विचार करके चारों ओर अलग-अलग हवन करना चाहिये॥ ८–१३॥<br><br>[पूजन-हवनमन्त्रोंको क्रमशः बताया जाता है—]<br>ॐ भूः ब्रह्मणे नमः। ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ भुवः विष्णवे नमः। ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा। ॐ स्वः रुद्राय नमः। ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा। ॐ महः ईश्वराय नमः। ॐ महः ईश्वराय स्वाहा। ॐ जनः प्रकृतये नमः। ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा। ॐ तपः मुद्गलाय नमः। ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा। ॐ ऋतं पुरुषाय नमः। ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा। ॐ सत्यं शिवाय नमः। ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः। ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय |
| ७३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा॥ ३९॥ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः॥ ४०॥ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यै स्वः स्वाहा॥ ४१॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महर्नमः॥ ४२॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा॥ ४३॥ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः॥ ४४॥ ॐ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महः स्वाहा॥ ४५॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः॥ ४६॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा॥ ४७॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः॥ ४८॥ भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा॥ ४९॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः॥ ५०॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपः स्वाहा॥ ५१॥ रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः॥ ५२॥ ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा॥ ५३॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः॥ ५४॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा॥ ५५॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं नमः॥ ५६॥ महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा॥ ५७॥ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः॥ ५८॥ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवस्य सत्यं स्वाहा॥ ५९॥ ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः॥ ६०॥ ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा॥ ६१॥ ॐ शिवाय नमः॥ ६२॥ ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा॥ ६३॥ | नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यै स्वः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महर्नमः। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः। ॐ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपः स्वाहा। रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवस्य सत्यं स्वाहा। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा। ॐ शिवाय नमः। ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा॥ १४–६३॥ | | एवं शिवाय होतव्यं विरिञ्च्याद्यं च पूर्ववत्।<br>विरिञ्चाद्यं च पूर्वोक्तं सृष्टिमार्गेषु सुव्रताः॥ ६४<br>पुनः पशुपतेः पत्नीं तथा पशुपतिं क्रमात्।<br>सम्पूज्य पूर्ववन्मन्त्रैर्होतव्यं च क्रमेण वै॥ ६५ | इस प्रकार सर्वप्रथम विरिंचि (ब्रह्मा) आदि [पचीस] देवताओंका पूजन करके पूर्वोक्त क्रमसे मोक्षके लिये हवन करना चाहिये। हे सुव्रतो! विरिंचि आदिका पूजन-हवन सृष्टिक्रमसे करनेके अनन्तर क्रमसे पूर्वकी भाँति पशुपतिकी पत्नी तथा पशुपतिका सम्यक् पूजन |
अध्याय ४५ ] जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छ्राद्धका विधान ७३३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चर्वन्तमाज्यपूर्वं च समिदन्तं समाहितः॥ ६६ | करके समाहितचित्त होकर मन्त्रोंके द्वारा चरु, आज्य और समिधासे हवन करना चाहिये॥ ६४—६६॥ |
| ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि<br>भूः स्वाहा॥ ६७॥ भुवः स्वाहा॥ ६८<br>स्वः स्वाहा॥ ६९॥ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७०<br>एवं पृथक्पृथग्हुत्वा केवलेन घृतेन वा।<br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा॥ ७१<br>विरजा च घृतेनैव शतमष्टोत्तरं पृथक्।<br>प्राणादिभिश्च जुहुयाद्घृतेनैव तु केवलम्॥ ७२<br>ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा<br>विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा॥ ७३<br>प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा॥ ७४<br>ॐ भूः स्वाहा॥ ७५॥ ॐ भुवः स्वाहा॥ ७६<br>ॐ स्वः स्वाहा॥ ७७॥ ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ७८ | [हवनके मन्त्र इस प्रकार हैं—] ॐ शर्व धरां मे छिन्धि घ्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि भूः स्वाहा। भुवः स्वाहा। स्वः स्वाहा। भूर्भुवः स्वः स्वाहा—इन मन्त्रोंके द्वारा समिधा आदिसे अथवा केवल घृतसे एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ पृथक्-पृथक् आहुतियाँ प्रदान करके विरजासंज्ञक दीक्षामन्त्रोंके द्वारा घृतसे आहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् प्राणादि मन्त्रोंके द्वारा केवल घृतसे एक सौ आठ आहुति डालनी चाहिये। [प्राणादि मन्त्र ये हैं—] ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा। प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा। ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः स्वाहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा॥ ६७—७८॥ |
| एवं क्रमेण जुहुयाच्छाद्धोक्तं च यथाक्रमम्।<br>सप्तमेऽहनि योगीन्द्राञ्छ्राद्धार्हानपि भोजयेत्॥ ७९<br>शर्वादीनां च विप्राणां वस्त्राभरणकम्बलान्।<br>वाहनं शयनं यानं कांस्यताम्रादिभाजनम्॥ ८०<br>हैमं च रजतं धेनुं तिलान् क्षेत्रं च वैभवम्।<br>दासीदासगणश्चैव दातव्यो दक्षिणामपि॥ ८१<br>पिण्डं च पूर्ववद्दद्यात्पृथगष्टप्रकारतः।<br>ब्राह्मणानां सहस्रं च भोजयेच्च सदक्षिणम्॥ ८२<br>एकं वा योगनिरतं भस्मनिष्ठं जितेन्द्रियम्।<br>त्र्यहं चैव तु रुद्रस्य महाचरुनिवेदनम्॥ ८३<br>विशेष एवं कथित अशेषश्राद्धचोदितः। | इस प्रकार श्राद्धोक्त रीतिसे यथाक्रम हवन करे। तदनन्तर सातवें दिन योगियों तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराये। शर्व आदि अष्ट देवताओंके नामोंसे आठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें वस्त्र, आभूषण, कम्बल, वाहन, शय्या, यान, कांस्य-ताम्र आदिके पात्र, सोना, चाँदी, गो, तिल, भूमि, धन और दासीदाससमूह—यह सब प्रदान करना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये। शर्व आदि अष्टमूर्तियोंके प्रकारसे आठ पिण्ड भी प्रदान करे। हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे अथवा एक ही योगपरायण, भस्मनिष्ठ तथा जितेन्द्रिय [शिवभक्त]-को ही भोजन कराये। तीन दिनतक भगवान् रुद्रको महाचरु निवेदित करे। जीवच्छ्राद्धके विषयमें शास्त्रवर्णित विशेष बातें मैंने बता दीं—॥ ७९—८३ १/२॥ |
| मृते कुर्यान्न कुर्याद्वा जीवन्मुक्तो यतः स्वयम्॥ ८४<br>नित्यनैमित्तिकादीनि कुर्याद्वा सन्त्यजेत्तु वा।<br>बान्धवेऽपि मृते तस्य शौचाशौचं न विद्यते॥ ८५<br>सूतकं च न सन्देहः स्नानमात्रेण शुद्ध्यति।<br>पश्चाज्जाते कुमारे च स्वे क्षेत्रे चात्मनो यदि॥ ८६ | जीवच्छ्राद्ध करनेवाला व्यक्ति नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करे अथवा त्याग दे और उसके मृत हो जानेपर कोई उसका श्राद्ध करे अथवा न करे; क्योंकि वह तो स्वयं जीवन्मुक्त है। बन्धु-बान्धवके मर जानेपर उसे शौचाशौच तथा सूतक नहीं लगता, वह स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाता है; |
४६- लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण
| ७३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| तस्य सर्वं प्रकर्तव्यं पुत्रोऽपि ब्रह्मविद्भवेत् ।<br>कन्यका यदि सञ्जाता पश्चात्त्तस्य महात्मनः ॥ ८७<br><br>एकपर्णा इव ज्ञेया अपर्णा इव सुव्रता ।<br>भवत्येव न सन्देहस्तस्याश्चान्वयजा अपि ॥ ८८<br><br>मुच्यन्ते नात्र सन्देहः पितरो नरकादपि ।<br>मुच्यन्ते कर्मणानेन मातृतः पितृतस्तथा ॥ ८९<br><br>कालं गते द्विजे भूमौ खनेच्चापि दहेत्तु वा ।<br>पुत्रकृत्यमशेषं च कृत्वा दोषो न विद्यते ॥ ९०<br><br>कर्मणा चोत्तरेणैव गतिरस्य न विद्यते ।<br>ब्रह्मणा कथितं सर्वं मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ९१<br><br>पुनः सनत्कुमाराय कथितं तेन धीमता ।<br>कृष्णद्वैपायनायैव कथितं ब्रह्मसूनुना ॥ ९२<br><br>प्रसादात्तस्य देवस्य वेदव्यासस्य धीमतः ।<br>ज्ञातं मया कृतं चैव नियोगादेव तस्य तु ॥ ९३<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं रहस्यं ब्रह्मसिद्धिदम् ।<br>मुनिपुत्राय दातव्यं न चाभक्ताय सुव्रताः ॥ ९४ । | इसमें सन्देह नहीं है। अपनी पत्नीसे बादमें यदि अपना पुत्र उत्पन्न हो जाय, तो उसका सम्पूर्ण संस्कार करना चाहिये; वह पुत्र भी ब्रह्मवेत्ता होता है। हे सुव्रतो! यदि बादमें उस महात्माके कन्या उत्पन्न हुई, तो उस कन्याको एकपर्णा अथवा अपर्णा (पार्वती)-के समान जानना चाहिये। उस कन्याके वंशमें उत्पन्न होनेवाले भी मुक्त हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। उस व्यक्तिके इस [जीवच्छ्राद्ध] कर्मके द्वारा उसके मातृपक्ष तथा पितृपक्षके पितर भी नरकसे मुक्त हो जाते हैं। [जीवच्छ्राद्ध कर चुके] ऐसे द्विजके मर जानेपर उसे भूमिमें गाड़ दिया जाय अथवा उसका दाह-संस्कार कर दिया जाय; पुत्रके द्वारा उसका सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कृत्य करनेसे उसे कोई दोष नहीं लगता है। मृत्युके अनन्तर उसके लिये कोई क्रिया आवश्यक नहीं है॥ ८४—९० १/२ ॥<br><br>[ सूतजीने कहा—हे ऋषियो! ] ब्रह्माजीने पुण्यात्मा मुनियोंसे यह सब कहा था; फिर उन बुद्धिमान् ब्रह्माने इसे सनत्कुमारको बताया। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र उन सनत्कुमारने कृष्णद्वैपायन व्यासजीसे इसका कथन किया। इसके अनन्तर उन बुद्धिसम्पन्न भगवान् वेदव्यासकी कृपासे मैंने इसे जाना और उन्हींके आदेशसे ब्रह्मसिद्धि प्रदान करनेवाला यह सम्पूर्ण रहस्य मैंने आप लोगोंको बताया। हे सुव्रतो! इसे किसी मुनिपुत्रको ही प्रदान करना चाहिये, अभक्तको नहीं॥ ९१—९४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे जीवच्छ्राद्धविधिर्नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'जीवच्छ्राद्धविधि' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥
छियालीसवाँ अध्याय
लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>जीवच्छ्राद्धविधिः प्रोक्तस्त्वया सूत महामते ।<br>मूर्खाणामपि मोक्षार्थमस्माकं रोमहर्षण ॥ १<br><br>रुद्रादित्यवसूनां च शक्रादीनां च सुव्रत ।<br>प्रतिष्ठा कीदृशी शम्भोलिङ्गमूर्तेश्च शोभना ॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे विशाल बुद्धिवाले सूतजी, हे रोमहर्षण! आपने अज्ञानियोंके भी मोक्षके लिये हमलोगोंसे जीवच्छ्राद्धकी विधिका वर्णन किया। हे सुव्रत! रुद्र, आदित्य, वसु, इन्द्र आदि देवता तथा शिवजीकी लिङ्गमूर्तिकी सुन्दर प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है; |