श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
| ६६२ | आनन्दरामायणे | [सर्गः ७ |
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राममुद्रा धारणीया गोपीचन्दनमिश्रिता। राममुद्रा महाश्रेष्ठा सर्वदोषनिकृन्तनी ॥१११॥
सदा देहे संधार्या गोपीचन्दनमिश्रिता। राममुद्राऽस्ति यद्देहे न पापं स्पृशते न हि ॥११२॥
स्तुतिः सर्वै रामस्य स्नातैः कार्या न्वहर्निशम्। प्राचीनैश्च नवीनैश्च स्वबुद्ध्या रचितैरपि ॥११३॥
स वाग्विसर्गो जनताऽघविप्लवो यस्मिन्प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि।
नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यच्छृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥११४॥
कवित्वमन्यच्छुद्धं च रामनाम्नाऽङ्कितं च यत्। तज्ज्ञेयमतिशुद्धं च श्रवणात्पातकपहम् ॥११५॥
यस्मिन् रामस्य कृष्णस्य चरित्राणि महान्ति च। कवित्वे तच्छ्रवणधर्मं सदा गेयं महत्तमैः ॥११६॥
शृणु शिष्य तवाग्रेऽद्य वद्म्यहं किंचिदद्भुतम्। कवित्वविषयं यच्च सर्वसंदेहनाशकम् ॥११७॥
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सर्वेते चिरजीविनः ॥११८॥
एवं यद्वचनं शिष्य प्रोच्यते सर्वदा बुधैः। तदग्रे सर्वदा मत्यं ज्ञेयं कलियुगेऽपि च ॥११९॥
येषु मन्त्रबलं भव्यं वर्ततेऽत्र नरेषु हि। अश्वत्थाम्नोंऽशभूतास्ते ज्ञेयाश्च पुरुषा भुवि ॥१२०॥
न्यायोपार्जितद्रव्येण राज्यं कुर्वन्ति धर्मतः। बल्यंशास्तेऽत्र तथा ज्ञेया जना जगतितले ॥१२१॥
रामस्तुतिं कवित्वे ये चरित्रं वर्णयन्ति च। व्यासांशभूतास्ते ज्ञेया मानवा जगतितले ॥१२२॥
ये ये वीरास्त्वथ भूम्यां वायुपुत्रांशजास्त्विह। नैते ज्ञेया मरणधर्मा चिरजीवित्वसूचकाः ॥१२३॥
ये ये शांता रामभक्ताः मन्यत्र मानवा भुवि। विभीषणांशभूतास्ते ज्ञेयाश्च सकलैर्जनैः ॥१२४॥
ये धैर्यवन्तो योद्धारः मन्यत्र मानवा भुवि। कृपाचार्यांशभूतास्ते ज्ञेयाः सर्व बुधैः सदा ॥१२५॥
ये वीराः क्रोधयुक्तास्तेऽत्र सर्वऽवनीतले। जामदग्न्यांशभूताश्च सदा ज्ञेया नरोत्तमैः ॥१२६॥
दोषोंको नष्ट करती है। अतएव ललाट, गुह्यस्थान, दोनों कुक्षि, उदर, हृदय, दोनों भुजाओं और मस्तक इन स्थानोंमें भी राममुद्राओंको धारण करना चाहिए । ११० । १११ । ये मुद्रा धारण करना परमावश्यक है। क्योंकि जिसक शरीरमें राममुद्रा विद्यमान रहती है उस किसी प्रकारका पातक नहीं लगता । ११२ ॥ उपासकोंको यह भी उचित है कि विविध प्रकारके पदों द्वारा रामचन्द्रजीके स्तुतगान करें। वे श्लोक प्राचीन हों, नवीन हों या अपनी बुद्धिसे बनाये गये हों ॥ ११३ ॥ रामके यशसे अङ्कित शास्त्रोक्त गुणानुवादसम्बन्धी वचनोंका प्रवाह प्राणियोंके महान् पातकोंका भी वहन करता है। अतः उस ग्रन्थको मन, गाय और मनन करें । रामके नामसे अङ्कित कविता चाहे अतिशय अशुद्ध हो, फिर भी उसे अतिशुद्ध समझना चाहिये। उसके सुननेसे सब तरहके पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ११४ । ११५ ॥ जिस कवितामें राम और कृष्णके महान् चरित्रोंका वर्णन किया गया हो, वह अत्यन्त पवित्र होती है। बड़े लोगोंको चाहिये कि सदा ऐसी कविताका गान करें ॥ ११६ ॥ श्री रामदासजी विष्णुदाससे कहते हैं-हे शिष्य ! अब मैं तुम्हारे आगे सब प्रकारके सन्देहोंको निवृत्त करनेवाला एक गुप्त कविताका विषय कह रहा हूँ । ११७ ॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सात चिरञ्जीवी हैं ॥ ११८ ॥ प्रायः पण्डित लोग इस बातको कहा करते हैं। इसे इस कलियुगमें भी सत्य ही मानना चाहिए । ११९ ॥ इस पृथ्वीपर जिन लोगोंके पास मन्त्रबल विद्यमान है, उनको अश्वत्थामाका अंश समझना चाहिए ॥ १२० ॥ जो राजे न्यायोपार्जित द्रव्यसे धर्मपूर्वक राज्य करते हैं, उनको इस संसारमें बलिके अंशसे उत्पन्न समझना चाहिये ॥ १२१ ॥ जो लोग कविता करते हुए रामकी स्तुति करते या उनके चरित्रोंका वर्णन करते हैं, जगतीतलमं उन मनुष्योंके व्यासके अंशसे उत्पन्न मानना चाहिये ॥ १२२ ॥ इस भूमण्डलपर जो जो वीर हैं वे सब हनुमान्जीके अंशज हैं। ओर केवल यही हुए तुम ही इस प्रकारके समुदायोक चिरञ्जीवित्वकी सूचना देते रहते हैं ॥ १२३ ॥ इस पृथ्वीमें जितने शान्त रामभक्त हैं उन्हें सब लोग विभीषणके अंशसे उत्पन्न समझें । १२४ ॥ इस संसारमें जो धैर्यके साथ युद्ध करनेवाले लोग हैं, उन्हें कृपाचार्यके अंशसे उत्पन्न समझना चाहिये ॥ १२५ ॥ इस पृथ्वीमण्डलमें जितने क्रोधी वीर हैं, उन सब लोगोंको
सर्गः ८] मनोहरकाण्डम् ६६३
चिरंजीवीति व्यासः कः कथं ज्ञेयो जनैर्भुवि । तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि सावधानमनाः शृणु ॥ १२७॥
ये गीर्वाण्या कवित्वानि करिष्यन्त्यवनीतले । व्यासांशभूतास्ते ज्ञेयाः पंडिता मानवास्त्विह ॥१२८॥
ये रामचंद्रं कृष्णं च शिवं स्तुत्या स्तुवंति हि । वर्णयंति चरित्राणि ते ज्ञेया व्यासमूर्तयः ॥१२९॥
ये राजानं च गणिकां नारीं राज्ञः सभां तथा । नरं स्तुवंति स्तुत्या ते न ज्ञेया व्यासमूर्तयः ॥१३०॥
यावद्भूत्यां तु रामस्य चरित्राणि स्तुवीत हि । तावत्स स्यन्नरो व्यासमन्ते मुक्तिं गमिष्यति ॥१३१॥
किं फलं कस्य पाठस्य पङ्क्तेरपि तदधुना । शृणु स्वस्थमना शिष्य विस्तरेणोच्यते च यत् ॥१३२॥
इति श्रीमदानंदरामायणे मनोहरकांडे रामदासवरबोधनादिदर्शनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अष्टमः सर्गः
(वेदादिकोंकी फलश्रुति)
श्रीरामदास उवाच
शिरोध्वाहूतिसंयुक्ता गायत्री परिकीर्तिता वेदाक्षराणां तुल्या सा भवेत्सुविधि पङ्गता ॥ १ ॥
चतुःशतेन गायत्र्याः समिह परिकीर्तितम् । पावमानं महासूक्तं षट्सहस्रं समुच्यते ॥ २ ॥
तथोपनिषदः पुण्या गायत्र्यक्षरसंख्यया प्रोच्यते पुण्यदं लोके पुण्यं फलानि यान्तः ॥ ३ ॥
सहितापाठतः प्रोक्तं द्विगुणं पदपाठतः । त्रिगुणं क्रमपाठे स्याज्जटापाठे तु षड्गुणम् ॥ ४ ॥
महाभारतपाठस्तु वेदतुल्यः प्रकीर्तितः । पुराणानां तदर्धेन स्मृतीनां च तथोच्यते ॥ ५ ॥
भारते भगवद्गीता तथा नामसहस्रकम् । गायत्र्याश्च समं प्रोक्तं पुण्ये पापक्षयेऽपि च ॥ ६ ॥
पाठेन यत्फलं प्रोक्तमर्थज्ञानाच्चतुर्गुणम् । सद्भक्तेभ्यः श्रवणाच्च पुण्यं दशगुणं स्मृतम् ॥ ७ ॥
परशुरामके समान उत्पन्न समझना चाहिए ॥ १२६॥ चिरञ्जीवी व्यासको इस संसारमें कैसे पहचानना चाहिए। इसके लिए उसका स्वरूप बतलाते हैं, तुम सावधान होकर सुनो ॥ १२७॥ जो-जो लोग संस्कृत वाणीमें कविता करेंगे, वे पण्डित पुरुष व्यासके अंशसे उत्पन्न माने जायेंगे ॥ १२८॥ जो लोग रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र तथा शिवजीकी स्तुतिपूर्वक या उनके चरित्रका वर्णन कर उनको व्यासकी साक्षात् मूर्ति समझना चाहिये ॥ १२९॥ जो लोग राजा, गणिका, स्त्री, राजसभा तथा किसी व्यक्ति-विशेषकी स्तुति करते हैं, वे व्यासका मूर्ति नहीं माने जा सकते ॥ १३०॥ इस पृथ्वीपर प्राणी जबतक रामकी स्तुति करता है, तबतक वह व्यास कहा रहता है और अन्तमें मुक्तिपद प्राप्त करता है ॥ १३१ ॥ किसी ग्रन्थका पाठ करनेसे क्या फल होता है, अब मैं इस बातको बतलाऊँगा। हे शिष्य ! तुम स्वस्थ मन होकर सुनो, मैं विस्तारपूर्वक बतलाता हूँ ॥ १३२ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
श्रीरामदास कहने लगे—वेदको शिरोवाहूतिसे युक्त सौ अक्षरोंवाली गायत्री कही गयी है ॥ १ ॥ चार सौ गायत्रीके बराबर पावमान नामक महासूक्त है, जिसमें छः सौ ऋचाओंका समावेश किया गया है ॥ २॥ गायत्रीकी अक्षरसंख्याके अनुसार उपनिषदोंके पाठसे पुण्य प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ सहितापाठकी अपेक्षा दुगुना पुण्य पदपाठ करनेमें है। क्रमके पाठ करनेमें तिगुना पुण्य है और जटाके पाठसे छगुना पुण्य होता है ॥ ४ ॥ महाभारतका पाठ वेदपाठ सदृश होता है । पुराणोंका पाठ आधे वेदपाठका पुण्य देनेवाला है और उससे भी आधा पुण्य स्मृतियोंके पाठसे होता है ॥ ५॥ महाभारतके अन्तर्गत भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम, ये दोनों गायत्रीके समान पुण्यदायक एवं पापनाशकारी माने गये हैं ॥ ६ ॥ पाठसे जितना पुण्य होता है, उससे चौगुना पुण्य उसका अर्थ समझनेसे होता है और अच्छे-अच्छे भक्तोंको सुनानेसे दसगुना पुण्य प्राप्त होता
६५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
भूमिदानं यथा लोके महादानप्रकीर्तितम् । अन्नदानं बहुगुणं ततोऽपि स्यात्फलप्रदम् ॥ ८ ॥ ऋषय ऊचुः कथं दानं प्रकर्तव्यं सुवर्णस्य परस्य च । कथं वा पात्रपात्रेति प्राप्तव्यश्वेत्यरोचथाः ॥ ९ ॥ श्रीरामदास उवाच वसन् गुरुकुले यस्तु विद्यामभ्यास्यो धीमतः । अधीत्य शाखां पूर्णां स गयायां लभते फलम् ॥१०॥ शिष्यस्याध्यापकश्चैव संहितां पाठयेत्ततः । यदक्षरं तु गायत्रीमहापाठफलं लभेत् ॥११॥ पदपाठे कृते स्यात्तद्वृद्धं रूपद्वयात् । संहितायां द्वितीयेन गयापाठफलं स्मृतम् ॥१२॥ ततोऽप्युपरिवन्पाटीत्रिगुणं फलमाप्नुयात् । पदं च पठतस्तूर्णं फलं वै सुमहद्भवेत् ॥१३॥ अथाष्टाविंशद्गुणयुक्तं फलं वै गयापाठतः । परे लेख्यप्रदानेन फलमुक्तं मनीषिभिः ॥१४॥ अधीत्याऽपि न यः स्वयं कल्पद्रुमं ... । कल्पद्रुमाह्वयं क्षेत्रं स पश्येत्पाठतः परम् ॥१५॥ प्रहायान्यं विनाऽनुचिन्तादप्रज्ञामबुद्धिमान् । अनभ्यासवशात्प्राज्ञः शूकराकारतां व्रजेत् ॥१६॥ यावद्वेदेष्वथ प्रोक्ता चरणा विप्रपुंगवैः । तावद्दिनानि स्वर्गे च निवसेद्ब्राह्मणोत्तमः ॥१७॥ पाठयत्यक्षरमेकं त्वन्यस्मै यो द्विजोत्तमः । तावद्वर्षसहस्राणि वैकुण्ठे निवसेद्ध्रुवम् ॥१८॥ प्रत्यक्षरं न जानीते पाठ्यमानेऽनुशिक्षितः । यद्विद्यावेत्तृसंसर्गात्पापहन्ता भवेद्ध्रुवम् ॥१९॥ शिक्षयत्यनुगो विप्रस्तद्विद्वन्कण्ठगं मुहुः । विनाऽनुभावतो राजन् रामभक्तिविना तथा ॥२०॥ क्रमेणैव समं तस्मात्पाठयेत्प्रत्यहं मुहुः । ज्ञानं विनाऽध्यापनं नाम तत्फलं निष्फलं स्मृतम् ॥२१॥ पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या वेताश्वबुद्धयः । अनुगता विना भक्तिं तेऽपि व्यर्था भवन्ति हि ॥२२॥
है, जिस तरह कि संसारमें भूमिदान एक महान् दान माना जाता है, किन्तु अन्नदानका बहुत फल ... ब्राह्मणोंने पूछा हे मुने ! सुवर्ण दान किस तरह करना और किसको देना चाहिये ... ! इसका उत्तर जानिए ... ... जो शिष्य ... और वेदका अध्ययन करता ... लभ्य कर लेता है ... फल मिलता है ॥१०॥ संहिताका अध्ययन कराता है उस मन्त्रके जितने अक्षर हैं ... गायत्रीके महापाठके बराबर फल पाता है ॥११॥ पदपाठमें उसका फल दूना ... और संहिताके द्विवचन में दुगुना मिलता है ॥१२॥ गयापाठसे भी ... फल प्राप्त होता है। और वारंवार ... फल मिलता है ॥१३॥ गयापाठसे अठ्ठाईस ... फल प्राप्त होता है। इससे भी आधा फल उसे प्राप्त होता है, जो किसी वृद्ध पुस्तकको लिखता है। ऐसा प्राचीन मुनियोंने कहा है ॥१४॥ जो ब्राह्मण विद्याका अध्ययन करके भी उपयोग करके अध्ययन नहीं करता उसे केवल पातकलेपारोपण प्राप्त होता है और वह नरकको जाता है ॥१५॥ जो मनुष्य बुद्धि रहता हुआ भी पढ़ी हुई श्रुतियोंको अनभ्यासके कारण भुला देता है वह मरनेके बाद सूअरका जन्म पाता है ॥१६॥ पढ़कर भी वेदोंके जितने चरण वह ब्राह्मण सुनता है उतने दिन तक वह स्वर्गमें रहेगा इसमें पुण्यवान् अजित लोकमें जाकर निवास करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। अपने घरकी चरन का अध्ययन करके जो ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मणोंको सुनाता है वह मन्त्रके प्रत्येक अक्षरसे अर्जित फलको पाकर निवास करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है। अपने ब्राह्मणका अध्ययन करके भी जो यह नहीं जानता कि इसका कितना महत्त्व है वह रामका पूजन करता हुआ भी पूजनके आधे फलको पाता है। जो प्राणी रामकी भक्तिसे रहित केवल अध्यापनशील है वह उस पाठनके बहुव्यथा फलका भागी होता है जो अध्यापक गम्से दंभ रखता है, उसका अध्यापन कार्य भी व्यर्थ ही होता है। चारों वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, पुराण तथा
सर्गः ८ ] मनोहराकाण्डम् ३५५
उपविद्यास्ततः स्युश्चेत्यष्टादश स्मृताः। शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषम् २१।।
इत्यंगानि तु वेदस्य योऽधीते तत्फलं शृणु । महिनापाठपाठेऽर्धं लभते पाठकः फलम् ।। २२ ।।
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य कल्पः पाणी प्रकीर्तितौ । मुखं व्याकरणं प्रोक्तं निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।। २३ ।।
ज्योतिषं नयनं प्रोक्तं छन्दः पादाविति स्मृतौ । शिक्षा ... ... ... ।।
सहस्रेण प्रकुर्वन्ति फलं तेषां चतुर्गुणम् । ... ... ।। २७ ।।
सहिनापाठतः पुण्यं संहितज्ञो लभेत् फलम्। ज्योतिष्के चापि निष्णातः ... २८।।
जातकप्रश्नमात्रेण न किञ्चत्पुण्यमीयते। वेदान्तरं गतो यो ... २९।।
न वेत्ति गणितं यस्तु ज्ञेयो नक्षत्रसूचकः। दानं नार्हति विप्रस्तु स ... ३०।।
हस्तमात्रमपि ह्यङ्गानां साङ्गां योऽधीत्य हि द्विजः। श्रोत्रियस्त्वन्यशाखासु न स ... ३१।।
किञ्चिदध्यापयन्धीरो यथोक्तितपसः पठेत्। ज्ञानाधिक्यात्पुण्यं वदन्त्यतः ... ।।३२।।
अधीत्य ज्ञानतः साङ्गमपुण्यं लभते महत् । ज्ञानतो ... पुण्यवान् जनाः ।। ३३ ।।
ज्ञानाधिक्येषु ननु स्थानपात्रताया विचारणा । पुनः कायेन च पाठनौ न भविष्यतः । ३४ ।
न निष्पाठात् श्रियं याति पुण्याधिको न संशयः। उपलभ्येत ज्ञानं ताच्छ्रुतिमत्त्वेऽपि सम्भवेत् ॥ ३५ ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । ज्ञानवान् राघवेन्द्रस्य प्रीतिपात्रं त्वयम्तः ॥ ३६ ॥
परं वादिनये शक्तिर्यस्य पराभवेत् पुनः। ... पाठकानां शतं वरम् ।। ३७ ।।
वेदादिविद्याविद्यानामर्थज्ञानाय यः पठेत् । स तु व्याकरणं च स लभेद्देदसम् फलं ।। ३८ ।।
ज्ञानाधिक्येन लभते वेदाध्ययनजं फलम् । समाया द्विविधा प्रोक्ता कर्मणो ब्रह्मबोधता ।। ३९ ।।
... चौदह विद्याएं हैं - आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्व और अर्थशास्त्र ॥ १६-२१॥ ये चार उपविद्याएं हैं-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छःवेदके अंग हैं। इनके अध्ययनका जो फल होता है, उसे सुनो। इसका पाठ करनेसे संहितापाठका आधा फल मिलता है ॥ २१ ॥ २२ ॥ वेदकी नासिका शिक्षा, कल्प दोनों हाथ, मुख व्याकरण, निरुक्त कान, ज्योतिष नेत्र और छन्द, वेदके पैर हैं। जो शिक्षा, कल्प, निरुक्त तथा छन्द इनका अर्थ समझके लिए उद्योग करते हैं, उन्हें वेदपाठका चतुर्गुण फल प्राप्त होता है। वेदका पाठ करनेपर संहिताज्ञ इसके पूर्वोक्तनका श्रो फल मिल जाता है ॥ २५ ॥ । २६ । २७ ।। पण्डितका ज्ञानवान् विद्वान् मदि उसका पुण्य पाता है। संहिताकी ज्ञान फलम् आदिव- शास्त्रके अध्ययनका आधा पुण्य मिलता है ।। २८ ।। किन्तु ज्योतिषम भी जो विद्वान् केवल जातकका प्रश्न-मात्र जानता है और वेदाध्ययनविहीन है, उस पद का पुण्य नहीं होता। अनुष्ठान जातक प्रश्नका ज्ञाता ही कहा जायगा ॥ २९ । जो ब्राह्मण गणित नहि जानता, नक्षत्रमात्र निमित्त वह विप्र किसी प्रकारका दान लेनेका अधिकारी नहीं कहा जा सकता ।। ३० ।। जो ब्राह्मण अपनी वेदशाखाको अध्ययन करके केवल व्याकरण-ज्योतिष आदि वेदाङ्गोंम ही लगा रहता है, वह विद्याध्यम भी निन्दित हुआ है ॥ ३१ ॥ जो ब्राह्मण थोडा भी अपनी शाखाका अध्ययन करके मदना ज्ञान ब्राह्मण फिर उपनिषद् तथा शास्त्राको पढ़ता है, वह वास्तविक ज्ञानपात्र बनकर बोधकस अधिक पुण्यका भागी होता है। क्योंकि ज्ञानयोगके प्रभाव या पुण्यत्व ये दोनों गुण ज्ञानसे ही आते हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ज्ञानकी मात्राका अधिकतासे ही उस लोगोम पात्र और अपात्रका विचार करना चाहिए। पाठकके भी पुण्यका अधिकता तथा न्यूनतासे ही पात्रापात्रका विचार किया जा सकता है ॥ ३४ ॥ ज्ञाना ओर पाठक इन दोनोंमें ज्ञानी विशेष पुण्यवाला समझा जाता है। इसलिये मेरे मतसे तो पाठककी अपेक्षा ज्ञानी अधिक पुण्य है ।। ३५ ।। इस संसारमे ज्ञानसे बढ़कर कोई वस्तु पवित्र नहीं है। ज्ञानवान् रामचन्द्रजीके अतिप्रिय है और रामको ज्ञानी प्रिय है ॥ ३६ ॥ किन्तु पाठकाम तो यह प्रथा है कि सैकड़ों पाठकोमसे भी वही श्रेष्ठ माना जाता है, जो वादीको अपनी चतुराईसे परास्त कर सके ॥ ३७ ॥ जो मनुष्य वेद आदिके ज्ञानके लिये व्याकरण आदि शास्त्रोंका अध्ययन करता है, उसे वेदाध्ययनका ही
| १८६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८ |
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वेदार्थज्ञानतुल्याया द्वितीयायाः फलं शृणु । प्रत्यक्षरं तु लभते गायत्रीशतजं फलम् ॥४०॥
ये तूपयोगिनः शास्त्रादुत्पन्थेस्तेऽपि भवति हि । नेष्यत्यर्कफलदा ज्ञेया व्यवधानाच्च पादशः ॥४१॥
वेदोपनिषदामर्थं ज्ञानाधिक्याय येऽपठन् । प्रदीपं सर्वविद्यानां यो विद्वान्न्यायविस्तरम् ॥४२॥
वेदार्थज्ञानतुल्यं तु फलं तस्य प्रकीर्तितम् केवलं हेतुविद्यार्थं तु यः पठेन्न्यायविस्तरम् ॥४३॥
हेतुवादादतो भ्रष्टान्नज्ञार्था नैव यः पठेत् । स शृगालो भवेदेव षष्टितः शतसंख्यया ॥४४॥
वर्षाणि नात्र सन्देहः वृथाभाषणतत्परः । ब्राह्मं वैष्णवं मात्स्यं कौर्मं भागवतं तथा ॥४५॥
आदित्यं गरुडं स्कान्दं मार्कण्डेयमथाष्टमम् । अग्न्यग्न्याण्डलैङ्गानि ब्रह्मवैवर्तमेव च ॥४६॥
भविष्योत्तरमाग्नेयं पाद्मं वामनमेव च । वाराहं चैव वायव्यमष्टादशानि वै त्विति ॥४७॥
महापुराणान्येतानि रामायणभवानि हि । रामायणात्पुराणानि व्यासेन खण्डितानि हि ॥४८॥
अतः पुराण नामाभूदेतेषां जगतीतले । आदौ कृतानि यान्यत्र तेषां ज्येष्ठत्वसूचकः ॥४९॥
महाशब्दः प्रोच्यते हि वैष्णवादिषु षट्त्रिषु । पुराणानां तु सर्वेषां फल शिष्य ब्रवीम्यहम् ॥५०॥
वेदतुल्यफलं पाठे श्रवणे च तदधिकम् । अर्थश्रवणतश्चास्य पुण्यं दशगुणं स्मृतम् ॥५१॥
वक्तुः स्याद् द्विगुणं पुण्यं व्याख्यातुश्च शताधिकम् । अन्यान्युपपुराणानि मन्ति तेषां फलं शृणु ॥५२॥
विष्णुधर्मोत्तरं शैवं बृहन्नारदमेव च । भगवतीपुराणं च लघुनारदमथ च ॥५३॥
भविष्यत्पर्वषष्ठं म्यात्तन्त्रं भागवतं तथा । अष्टमं नारसिंहं स्यात्पुराणं रेणुकाभिधम् ॥५४॥
दशमं तत्समाप्तं स्याद्वायुप्रोक्तं तथैव च । नन्दिरोक्तं द्वादशं स्यानंथा पाशुपताभिधम् ॥५५॥
यमनाग्दसंवादस्तथा हंसपुराणकम् । विनायकरूपुराणं च बृहद्ब्रह्मांडरमेव च ॥५६॥
पुण्यं विष्णुरहस्यं स्यादिति ह्यष्टादशानि वै । एतान्युपपुराणानि पुराणार्थफलानि च ॥५७॥
फल मिलता है ॥ ३९ ॥ जब ज्ञान बढ़ जाता है तो देने आप से आप वेद का अर्थ ज्ञात हो जाना है, मीमांसा-शास्त्रके दो प्रकार हैं, एक कर्मपरक दूसरा ब्रह्मपरक ॥३६॥ इन दोनोंमें पहला अर्थात् कर्मका मार्ग बतलानेवाले मीमांसाका अध्ययन करनेसे वेदार्थज्ञानका पुण्य प्राप्त होता है और दूसरे ब्रह्मपरक मीमांसाको पढ़नेसे जो पुण्य होता है, उसे सुनो। उत्तर मीमांसाका अध्ययन करनेवाला, प्र पा जितने अक्षरोंको पढ़ता है, प्रत्येक अक्षरसे उसे सौ गायत्रीके जपका पुण्य प्राप्त होता है, ४०॥ ऐसे लोग बड़े ही उपयोगी विद्वान् होते हैं और ग्रन्थोंकी उत्पत्ति उन्ही लोगोंसे होती है ॥४१॥ जो मनुष्य वेदों और उपनिषदोंके अर्थक न्याय विद्याओ के प्रदीपस्वरूप न्याय-शास्त्र पढ़ते हैं, उन्हें वेदार्थज्ञ नके तुल्य फल मिलता है। किन्तु जो केवल जीविकाके लिये न्यायशास्त्रका अध्ययन करता है और केवल हेतुवादमे मग्न रहकर ब्रह्मज्ञान साके निमित्त नहीं पढ़ता। वह वृथा मनुष्य न्यायके जितने अक्षर पढ़े रहता है, उतने ही वर्षों तक शृगाल हो-होकर जन्म लेता है। इसमें कोई संशय नही है। अब पुराणोंका विधान है वैष्णव मात्स्य, कूर्म, भागवत, । ४२-४५ । आदित्य, गरुड़ स्कन्द, मार्कण्डेय, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, लिङ्ग, ब्रह्मवैवर्त, भविष्योत्तर, अ ग्न्य, पद्म वामन, वाराह और वायु ये अष्टादश महापुराण हैं ॥ ४६ ॥ ४७ । ये सभी महापुराण रामायणसे ही उत्पन्न हुए हैं। किन्तु व्यासजीने रामायण ओ पुराण इन दोनोंमेंसे बहुतसे अंग काट दिये हैं ॥ ४८॥ इसी कारण इनका पुराण यह नाम पड़ा है। सबसे पहिले जो पुराण बनाये गये, उनका ज्येष्ठसूचक महाशब्द है। हे शिष्य । अब मै तुम्हे पुराणोंके पाठका फल सुना रहा हूँ ॥ ४६ ॥ ५० । पुराणोंका पाठ करनेसे वेदपाठका फल मिलता है और उन्हें सुननेमे उससे आधा फल मिला करता है। किन्तु पुराणोंके अर्थका श्रवण करनेमें उससे दसगुना अधिक फल होता है ॥५१॥ वक्ताको दुगुना और व्याख्या करनेवालेको सौगुना पुण्य होता है। इनके अतिरिक्त अठारह उपपुराण भी हैं। अब सबका नाम सुनो— ॥ ५२ ॥ विष्णुधर्मोत्तर, शैव, बृहन्नारद, भगवतीपुराण लघुनारद भविष्यत्का छठाँ पर्व, भागवत, नरसिंह, रेणुका ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ दसवाँ तत्त्वसार वायु द्वारा कहा हुआ ग्यारहवाँ, नन्दी द्वारा कहा हुआ बारहवाँ पाशुपत, यम और नारदका सम्वाद, हंसपुराण, विनायकपुराण, बृहद्ब्रह्माण्ड और पवित्र
सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५७
सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५७
भारतं वेदतुल्यं स्यादर्थादौऽधिकमुच्यते । तत्रापि भगवद्गीता विष्णोर्नामसहस्रकम् ॥५८॥ दशाधिकफलं प्रोक्तं भारतादपि नरैः । श्रोताऽर्द्धं फलंमाप्नोति भक्तितः शृणुयात्तु यः ॥५९॥ भारतं त्वितिहासञ्च रामायणसमुद्भवम् । यद्वेदात्पुण्यं तज्ज्ञेयं रामायणस्य च ॥६०॥ पाठात्तदर्द्धं श्रवणे व्याख्यानात्तु दशाधिकम् । वाल्मीकिना कृतं यच्च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥६१॥ तत्सर्वेषामादिभूतं महामंगलकारकम् । रामायणादेव नाना सन्ति रामायणानि हि ॥६२॥ शेषभूतं चतुर्विंशत्सहस्रं प्रथमं स्मृतम् । तथा च योग वासिष्ठमध्यात्मञ्च तथामृतम् ॥६३॥ वायुपुत्रकृतं वापि नारदोक्तं तथा पुनः । लघुरामायणं चैव बृहद्रामायणं तथा ॥६४॥ अगस्त्योक्तं महाश्रेष्ठं साररामायणं तथा । देहरामायणं वापि वृत्तरामायणं पुनः ॥६५॥ मङ्गल रामायणं रम्यं भारद्वाजं तथैव च । शिवरामायणं कौञ्चं भारतस्य च जैमिनेः ॥६६॥ आत्मधर्मं श्वेतकेतुऋषेस्तथैव जटायुषः ॥६७॥ रवेः पुलस्तेर्देव्याश्च गुहस्य मङ्गलं तथा । गाधिनः सुतीक्ष्णस्य च सुग्रीव च विभीषणम् ॥६८॥ तथ ऽऽनन्दरामायणमेतन्मङ्गलदायकम् । एवं सहस्रशः सन्ति श्रीरामचरितानि हि ॥६९॥ कः समर्थोऽस्ति तेषां हि संख्यां वक्तुं सविस्तराम् वाल्मीकिनिर्मितेभ्यः विभक्तानि पृथक् पृथक् ॥७०॥ सर्वेष्वप्यानंदसंज्ञं वरिष्ठं प्रोच्यते त्विदम् अस्य पाठेन यत्पुण्यं तन्ते शिष्य वदाम्यहम् ॥७१॥ शतकोटिमितं श्रुत्वा यत्फलं लभ्यते नरैः । तस्यार्धं तद्वदं हि ज्ञेयं शिष्य शुभप्रदम् ॥७२॥ श्रवणाद्द्विगुणं पाठे व्याख्यानात्तु दशाधिकम् । तस्मादेतन्महाऽऽनंदमत श्रव्यं नरोत्तमैः ॥७३॥ नानेन सदृशं किञ्चित्पूतं नान्ये भविष्यति सर्वेष्वपि च शास्त्रेषु पाञ्चरात्रागमोऽधिकः ॥७४॥
विष्णुपुराणस्य से अष्टादश उपपुराण हुए ! इनका पाठ करनेस पुराणपाठका आधा फल मिलता है ॥ ५४ ॥ ॥ ५५ ॥ ५७ ॥ महाभारत तो साक्षात् वेदके समान है। उसमें कही हुई भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम ये दोनों महाभारतसे भी दशगुना अधिक फलद हैं। जो श्रोता भक्तिपूर्वक उन्हें सुनता है, वह आधा फल पाता है। महाभारत रामायण ही निकला हुआ इतिहास है। वेदके पाठसे जो पुण्य होता है, वही फल रामायणके पाठसे है । ५८-६० । सुननेसे आधा फल और व्याख्या करनेसे दसगुना अधिक फल प्राप्त होता है। श्री करांग विनिर्मित शतकोटि प्रविस्तर जिस रामायणकी रचना की है, वह सब रामायणोंका मूल और महा मङ्गलदायक है। उसी रामायण से ही विविध प्रकारकी रामायणोंकी रचना हुई है ॥ ६१ ॥ उसीरा परिशिष्ट अङ्गरूप बना और शेषके समान रूप कहेतो हुई चौबीस हजार श्लोकोंवाली वाल्मीकिरामायण, योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण, वायुपुत्र (हनुमान्जी) की रामायण, नारदरामायण, लघुरामायण, बृहद्रामायण, अगस्त्यजीका बनाये महाश्रेष्ठ साररामायण, देहरामायण, वृत्तरामायण, भारद्वाजरामायण, शिवरामायण, क्रौञ्चरामायण, भरतरामायण, जैमिनिरामायण आदि बहुतसी रामायणें हैं ॥ ६२-६६ ॥ इनके अतिरिक्त आत्मधर्मी, जटायुकी, श्वेतकेतु ऋषिकी, पुलस्त्यकी, देवीजीकी, विश्वामित्रकी, सुतीक्ष्णकी, सुग्रीवकी, विभीषणकी और यह मङ्गलमय आनन्दरामायण, इस तरह रामचरित्रका वर्णन करनेवाली हजारों रामायणें बनी हैं ॥ ६७-६९ ॥ उन सबकी सविस्तार संख्या बतलानेमें कोई भी समर्थ नहीं हो सकता । वाल्मीकिजीके सौ करोड़ श्लोकात्मक रामायणसे ही इन सबका निर्माण हुआ है ॥ ७० ॥ किन्तु ऊपर गिनाई हुई सब रामायणोंमें यह आनन्दरामायण ही श्रेष्ठ है। ऐसा लोगोंने कहा है। इसके पढ़नेसे क्या पुण्य होता है, सो हे शिष्य ! मैं तुमको इसका माहात्म्य बतला रहा हूँ ॥ ७१ ॥ पूर्वोक्त शतकोटिमहात्मक वाल्मीकिरामायणके सुननेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसका आधा पुण्य इस आनन्दरामायणके पाठसे होता है। इसको सुननेसे दुगुना और व्याख्या करनेसे दसगुना पुण्य होता है। इस कारण लोगोंको चाहिए कि इस आनन्दरामायणका श्रवण करें ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ इसके सदृश पावन कोई अन्य न अबतक हुआ है और न
६५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
भगवद्गीतया तुल्यं फलं तस्याखिलस्य च । मद्धर्मकथकश्रेष्ठैर्मद्भक्तैश्च विनिर्मितम् ॥७५॥
तत्काव्यं यः पठेत्प्राज्ञो दशांशं फलमाप्नुयात् । मद्भक्तैर्निर्मितं तच्च शतशःफलदं स्मृतम् ॥७६॥
यः करोति स्वयं काव्यं कल्पयित्वा स्वयंकथाम् तच्छ्रमो व्यर्थतामेति तच्छ्रोता च दोषभाक् ॥७७॥
पौराणीं भारतीं वापि तथा रामायणस्थिताम् । तथा पद्मपुराणस्थां कथां ग्रथति यः स्वयम् ॥७८॥
रामभक्तोऽपि लभते शक्रलोकाधिवासताम् । प्रत्यक्षरं वर्षमेकं वासस्तस्य भवेद्ध्रुवम् ॥७९॥
रामभक्तः पुराणेभ्यः कथां ग्रथति यः पुनः व्यासमूर्तिः स लभते बृहस्पतिसलोकताम् ॥८०॥
दौहित्रपोषितः शिष्यः शतग्रन्थः जलाशयः मद्धर्मप्रवणः पुत्रः षट् पुत्रा वै प्रकीर्तिताः ॥८१॥
एवं भूयामंशभूतैस्तैस्ते विचरन्ति हि अश्वत्थामादयः सप्त ते चिरञ्जीवितः सदा ॥८२॥
अतः श्रीरामभक्तैश्च कवित्वेऽस्मत्स्तुतिः कृता । मयि भक्त्या सदा श्रव्याऽहर्निशं बुधैर्मुदा ॥८३॥
भारताच्च शतांशेन फलदात्री स्मृताऽत्र हि । निन्दन्ति ये भक्तकृतां वाणीं ते खराः स्मृताः ॥८४॥
तत्तद्प्राकृतं काव्यं रामवर्णनसंयुतम् । भारतस्य सहस्रांशं श्रोतुः फलं स्मृतम् ॥८५॥
निर्मातुस्तु भवेन्न्यूनं मद्युच्छब्दशतांशतः । गौडीयादिप्रान्तेषु संस्तुतो व्याससन्निभाः ॥८६॥
स्वस्वभाषाकवित्वानां कर्तारस्ते कवीश्वराः । नैवाभिनन्दितं क्वापि पदान्वयसमन्वितम् ॥८७॥
अर्थप्रमाणसहिता सैव मान्या न चेतरा । स्तवन्ति तु ये मूर्खा वा कुर्युर्वा वित्तार्थं काः कश्चित् ॥८८॥
निष्फलान्तत्क्रमः प्रोक्तस्तदध्येता च दोषभाक् । उन्मादेन तु यः कुर्यात्स्त्रीकामानां तु वर्णनम् ॥८९॥
स हि श्वयोनिं प्राप्नोति वर्षाण्यक्षरसंख्यया । वेदोक्तधर्मानुसारेण पन्थानः स्मारकाः स्मृताः ॥९०॥
भविष्यम् होगा। सब शास्त्रोंमें पाञ्चरात्रके आगमका विशेष महत्त्व गिना गया है। उसका पाठ करनेसे भगवद्गीता-पाठके तुल्य फल प्राप्त होता है। मदाधारस्थ कथाप्रवक्ता और जिनका अच्छे-अच्छे भगवद्भक्तोंने बनाया है॥७४॥७५॥ उन काव्योंको जो मनुष्य पढ़ता है, उसे महाभारत पाठका दशांश पुण्य प्राप्त होता है। अन्य जनोंके बनाये काव्योंका अध्ययन करनेसे शतांश फल मिलता है॥७६॥ जो मनुष्य कथाकी कल्पना करके स्वयं काव्य बनाता है, उसका परिश्रम व्यर्थ जाता है और उसका पाठ करनेवाला भी दोषका भागी बनता है॥७७॥ जो कवि पुराणोंमें, महाभारतमें रामायणमें तथा पद्मपुराणमें लिखी हुई कथाओंका संग्रह करता है। वह रामभक्त होकर इन्द्रधाममें निवास करता है। वह प्राणी जितने अक्षरोंको लिखे रहता है, उतने ही वर्षांतक इन्द्रलोकमें रहता है॥७८, ७९॥ जो रामभक्त पुराणोंसे कथाओंका संग्रह करता है, वह साक्षात् व्यासदेवके समान पूज्य होता हुआ बृहस्पतिलोकमें निवास करता है ॥८०॥ अपनी लड़कीका लड़का, पोष्य पुत्र, शिष्य, बगीचा, तालाब तथा सद्धर्मग्रन्थका रचना, अपना निजी पुत्र, इतने सद्पुत्र मान गये हैं॥८१॥ वे लोग अनुभूत मनुष्यो अर्थात् अश्वत्थामा आदि जो सात चिरंजीवी बतलाये गये हैं, उनके साथ पृथ्वीमण्डलपर विचरते हैं॥८२॥ अतएव बहुतसे रामभक्तोंने अपनी कवितामें श्रीरामकी स्तुति की है। इसलिए लोग उनकी भी कविताओंका आदर कर, बारम्बार सुनो और पढ़ो॥८३॥ रामभक्तोंकी कविता महाभारतका शतांश फल देनेवाली होती है। जो लोग किसी रामभक्तकी बनायी कविताका निरादर करते हैं वे एक प्रकारके गधे हैं॥८४॥ संस्कृतप्राकृत अनभिज्ञ इतर-और भाषाओंमें रामके चरित्रवर्णन युक्त कवितायें श्रोताजनोंको महाभारतके सहस्र अंशका फल देनेवाले होती हैं॥८५॥ अच्छे शब्दोंमें की हुई कविता कविको शतशः फल देती है। संस्कृतमें कविता करनेवाला प्राणी व्यास-का वंश होता है॥८६॥ अपनी-अपनी भाषा में कविता करनेवाले कवीश्वर अथवा संस्कृतमे रचना करने-वाले कवियोंगोंसे जिनकी कविता पद और अन्वय संयुक्त हो, जिसमे अर्थ तथा प्रमाण दोनो विद्यमान हों, व ही मान्य हैं, और नहीं। जो कवि अपने स्वार्थके लिए किसी मनुष्यकी स्तुतिमयी कविता करता है, उसका परिश्रम व्यर्थ जाता है अन्य उसका अध्ययन करनेवाला प्राणी भी दोषका भागी बनता है। जो कवि उन्मादवश स्त्रियोंका वर्णन करता है, वह कवितामे लिखे हुए जितन अक्षर हैं, उतने वर्षंतक श्वानकी योनिमें
सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५९
सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५९
तेषां वै स्मृतयो नाम ... केचिद्वैदिकेषु कर्मस्वधिकृताः पराः ॥९१॥
अवैदिकेषु मन्त्रेषु केचिद्यज्ञरता भुवि। अवैदिकेण मन्त्रेण नाधिकारो भवेत्क्वचित् ॥९२॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा। यथोक्तं कर्म कुर्वीत विप्राणां यच्च यद्विशेषतः ॥९३॥
कदा कुत्र कथं कर्म केन कार्यमिति स्फुटम्। यच्छास्त्रं न विजानात्यथा दोषभाग्भवेत् ॥९४॥
अदेशे यत्कृतं व्यङ्गकालवेलाविहितं च यत्। प्रत्येकं बहुवक्तव्यं प्रमादेनोदितं भवेत् ॥९५॥
तस्मादावश्यकं तत्र विप्राणां च विशेषतः। स्मृत्यर्थं ज्ञानतो वापि वेदार्थज्ञानतोऽधिकम् ॥९६॥
ऋग्वेदस्योपवेदः स्यादायुर्वेदश्च हि वैदिकः। परोपकारार्थमथ स्वस्यारोग्यार्थमेव वा ॥९७॥
जीविकार्थमप्यसौ हि पठितव्यो द्विजातिभिः। श्रह्मणं रोगिणं संप्रमुपचारेण जीवयेत् ॥९८॥
अद्यान्यभावं पापं तस्य नश्यति वै ध्रुवम्। परस्य च कृतो पुण्यं चरःकृच्छ्रमनुत्तमम् ॥९९॥
एवं पुण्यं भवेत्तस्य ... यत्नं कृतेऽपि रोगार्तः प्रायश्चापुनः शयात् ॥१००॥
सोऽप्यर्धफलभाग्नेति नात्र संशयो भवेत्। जीविकार्थे ... कथं दृष्टं विद्याचतुष्टयम् ॥१०१॥
इह लोके फलं तस्य परलोके न विद्यते। ... मानवः ॥१०२॥
कस्मात्त्वं कुरुते धर्मः का वा पूजा न मानिता। ... ॥१०३॥
गतश्रीश्च गतायुश्च ब्रह्मणाश्च द्विजो मृषाः। गान्धर्वशास्त्रमधीयानो रामग्रे यश्च गायति ॥१०४॥
तद्धन्तिकुलको लभते गांधर्वं सम्मुखे हरेः। चतुर्विधा जना... तु जीविका ॥१०५॥
क्षत्रियाणां तु सा प्रोक्ता दृष्टमुभयतः। ब्राह्मणेषु परेषु पुण्यं श्रुतानुगमनः ॥१०६॥
रहता है। वह ... । जिनमें तांत्रिक प्रकारके कर्मोंका आविष्कार हुआ है। उनमेंसे कुछ लोग वैदिक कर्मोंके अधिकृत हैं। कुछ तांत्रिकपद्धतिसे सब कर्म करते हैं और कुछ बिल्कुल पशुओंकी तरह ... भी अधिकार नहीं दिया गया है ततः ... मिश्रित धर्म माने गये हैं ॥ ९३ ॥ कब कहां और कर्म करना चाहिए वे सब बात यथार्थशास्त्र के निर्णय से जानी जा सकती हैं। यदि उनसे निर्णय किये बिना कोई कर्म किया जाय तो उसका भागी बनना पड़ता है ॥ ९४ ॥ जो कर्म अदेशार्थ, अङ्गरहित, बिना समयके अथवा ... जाता है, वह सब व्यर्थ होता है और पुण्यके स्थानमें पाप ही होता ... निर्णय कर लेना आवश्यक है। तिसमें भी ब्राह्मणको तो ... आज्ञा और स्मृतिसे भी वेदकी आज्ञा विशेष मानना है ॥ ९६ ॥ ... आयुर्वेद है। उसे परोपकारके लिए अथवा अपनी आरोग्यताके लिए या ... द्विजातियोंको अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण रोगी होनेके कारण दरिद्र हो तो उसका कष्ट बढ़ाकर देना चाहिए ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ ऐसा करनेसे दवा देनेवालेके ... हो जाता है। यही उसे चार कृच्छ्रव्रतप्रायश्चित्त करनेके पुण्यकी प्राप्ति होती है ॥ ९९ ॥ इस ... पुण्य होता है। यदि यत्न करने पर भी कोई रोगी आयु पूर्ण हो जानेके कारण बच न सके तो भी दवा देनेवालेको आधा पुण्य होता ही है। इसमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो मनुष्य अपनी जीविका चलानेके लिए चारों उपविद्याओंका उपयोग करता है उसे इस लोकमें अवश्य फल मिलता है, किन्तु परलोकमें कुछ भी नहीं मिलता। जो मनुष्य रोगरूपी समुद्रमें डूबे हुए निर्धनी मनुष्यका उद्धार करता है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ उसने कौन-सा धर्म नहीं कर लिया और कौन-सी पूजा नहीं की। अर्थात् उसने सब कुछ कर लिया। जिस प्राणीकी श्री नष्ट हो जाती है, वह ज्योतिर्विदोंसे द्वेष करता है। जिसकी आयु क्षीण हो जाती है वह वैद्योंसे द्वेष करता है। गतश्री एवं गतायु ये दोनों प्राणी बहुतसा द्वेष किया करते हैं। जो मनुष्य गान्धर्वविद्या (संगीत) का अध्ययन करके रामचन्द्रजीके सम्मुख गाता है, उसे उत्तम गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है,
| ६६० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८ |
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विवेकस्तस्य कर्तव्यो द्रव्यदाने विशेषतः । यस्त्वन्नस्य क्षुधितः पात्रं पानीयस्य पिपासितः ॥१०७॥
द्रव्यदाने तु कर्तव्यं विशेषात्पात्रपरीक्षणम् । गवां गतं पयो दुग्धं नागानां पयसो विषम् ॥१०८॥
पात्रापात्रविचारण मन्वाग्रे दानमुत्तमम् । यत्तु युक्तं तथा पात्रं तथा दानं फलाधिकम् ॥१०९॥
ज्ञानाधिक्यात्तपोध्याधिक्यात्पात्रं श्रेष्ठं हि जायते । रामभक्त्य... सर्वैः संमान्यो न सर्वथा ॥११०॥
रामद्वेषी वर्जनीयो दर्शनालापनादिषु । सोऽद्य चेत्पुण्डरीकाक्षं मान्यो नान्यथा ॥१११॥
पञ्चांशेनाधिकं द्रव्याद्दानं तद्विशिष्यते । वित्तादर्थेन यद्दानं न तद्दानं स्मृतं बुधैः ॥११२॥
देशकालविशेषेण पात्रपात्रविशेषतः । दानस्य फलमृद्धिश्चाधिकं न्यूनमेव च ॥११३॥
विप्रशुल्कं तु यो मूढो न दद्याच्छक्तिसंभवम् । विष्ठाकृमिर्भवत्येव मुनीनां च संमत्या ॥११४॥
दिव्यवर्षाणि नैवात्र त्वया कार्यस्तु संशयः । यत्तु ज्ञानवता कर्म क्रियते पुण्यदायकम् ॥११५॥
अधिकं तत्फलं प्रोक्तमज्ञानिकृतकर्मणः । यथा यथाधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा ॥११६॥
यत्तु ज्ञानरतः कर्म क्रियते पापकारकम् । तन्न्यूनफलदं ज्ञेयमज्ञानीकृतपातकात् ॥११७॥
यथा यथाऽधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा । यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते क्षणात् ॥११८॥
ज्ञानाग्निर्दग्धकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा । यथाधिक्यं यथा हेम्नो वह्निसंगेन जायते ॥११९॥
पुण्याधिक्यं तथा शिष्य ह्यग्निसंगेन जायते । पुण्ये न वर्द्धते पुण्यं पापं न्यूनं च जायते ॥१२०॥
पापेन पापवृद्धिस्तु पुण्यं स्वल्पं च जायते । अयं सूक्ष्मो विचारोऽयं दुर्ज्ञेयः स्थूलदृष्टिभिः ॥१२१॥
तथाप्येष विचार्यो स्यात्तज्ज्ञानानुसारतः । यस्तु सन्त्यधिकारेऽपि ज्ञाने वा पठनेऽपि वा ॥१२२॥
धनुर्वेद और दण्डनीति, ये दोनों ब्राह्मणको अविहित हैं ॥१०३-१०५॥ किन्तु क्षत्रियोंको वे वेदके उक्त फल देते हैं। ऊपर बतलायी हुई सब बातोंमें ज्ञानके अनुसार ही पुण्य होता है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि विशेष करके द्रव्यदानके विषयमें विचार करें, भूखको अन्नदान और प्यासेको पानी पिलाना श्रेष्ठ धर्म है ॥१०६। १०७। द्रव्यदान देते समय पात्रका विचार करना आवश्यक है क्योंकि दुष्ट गोमें भी दूध होता है और सर्पके पेटमें दूध जानकर दूध का विष बन जाता है ॥१०८॥ इस तरह पात्र और अपात्रका विचार करके सन्यासम दान देना अच्छा है। दानका पात्र जितना ही अच्छा होगा, उतना ही अधिक पुण्य होगा ॥१०९॥ इस पात्र और अपात्रका विचार ज्ञानकी अधिकता, पुण्यकी अधिकता तथा परिश्रमकी अधिकता देखकर किया जाता है। जो मनुष्य रामका भक्त है, वही पात्र है और जो रामभक्तिसे रहित है, उसीको अपात्र जानना चाहिए। जो मनुष्य रामसे द्वेष रखता हो, उसका दर्शन और उससे सम्भाषण आदि कदापि न करें। जो मनुष्य भक्तिका मार्ग करता है, वह अपवित्र मनुष्य भी पवित्र हो जाता है ॥११०। १११॥ अपनी शक्तिसे अधिक जो दान दिया जाता है वही दान दान है और कंजूसीके साथ जो दान दिया जाता है, वह दान दान नहीं है ॥११२॥ देश, काल एवं पात्र अपात्रका विशेषताके अनुसार अधिक या न्यून फल कहा गया है ॥११३॥ जो मनुष्य ब्राह्मणको पारिश्रमिक नहीं देता, वह उन पैसोंकी संख्याके अनुसार दिव्य वर्षों तक विष्टाका क्रिमि बना रहता है। इसमे किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिये। ज्ञानवान् मनुष्य जिन पवित्र कर्मोंको करता है अज्ञानियों की अपेक्षा उसे अधिक फल मिलता है जैसे-जैसे ज्ञानकी मात्रा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उसके पाप नष्ट होने लगते है ॥११४-११६॥ ज्ञानी मनुष्य यदि कोई पाप करता है तो अज्ञानियों द्वारा किये पातकोंकी अपेक्षा उस पापका भी न्यून ही कुफल मिलता है ॥११७॥ जैसे जैसे ज्ञान होता जाता है वैसे-वैसे पाप अपने आप नष्ट होते जाते हैं। जिस तरह जलती हुई अग्नि लकड़ियोंको जलाती है, उसी तरह ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोको भस्म कर डालती है। जिस तरह अग्निके संयोगसे कंचनकी कान्ति अधिक हो जाती है, उसी तरह अनियोंका भस्म करनेसे पुण्यकी मात्रा बढ़ती जाती है। पुण्यसे पुण्य बढ़ता है और पाप कम होता जाता है ॥११८-१२०॥ पापसे पापकी वृद्धि होती है और पुण्य कम होता जाता है यह बड़ा ही सूक्ष्म विचार है और स्थूलदृष्टिवालोंके लिए तो और
सर्गः ९] मनोहरकाण्डम् ६६१
प्रयत्नं नैव कुर्वीत न नरो जायते पशुः । ज्ञातव्यमर्थं मतिमान् स्वयमेव विचारयेत् ॥ १२३॥
इति संक्षेपतः प्रोक्तमेतत्ते पृष्टमेव यत् । मया तदर्थं चावधार्य स्वयं निश्चयमाप्नुयात् ॥ १२४॥
धर्मास्तु बहवः सन्ति तथा पापानि भूरिशः । विविधानि च पापानि प्रायश्चित्तानि यानि वै ॥ १२५॥
कर्तव्यानि जनैस्तानि सम्यग्बुद्ध्या विचार्य च । सर्वधर्माणां सारश्च रहस्यं तु मयोदितम् ॥ १२६॥
ग्रहणीयं प्रयत्नेन न ह्यभक्ताय दीयताम् । शुश्रूषवे साधवे च रामभक्ताय दीयताम् ॥ १२७॥
इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतायां श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥८॥
सर्वदा दर्शनात्फलश्रुतिर्नाम नवमः सर्गः ।
नवमः सर्गः
रामकाण्डस्य पूजाविधिः
गुरोऽन्यद्रामचन्द्रस्य विशेषेण च पूजनम् । कस्मिन्काले प्रकर्तव्यं तं कालं वदस्व माम् ॥ १ ॥
श्रीरामदास उवाच -
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि कालं पुण्यतमं शुभम् । रामचन्द्रस्य पूजार्थं विशेषतः ॥ २ ॥
माघस्य शुक्लपक्षस्य या तु पञ्चमी तिथिः । श्रीपञ्चमीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ३ ॥
तदारभ्य साधनामादयं रामं महोत्सवैः । पूजयेत्सर्वदा यावद्वैशाखे कृष्णपञ्चमीम् ॥ ४ ॥
माघकृष्णचतुर्थ्याश्च नवमीं मधुशुक्लजाम् । यावत्केवलफलाहारैः चतुरशीति दिनानि हि ॥ ५ ॥
सीतारामस्य नित्यं हि केचित्कुर्वन्ति पूजनम् । पूर्णिमान्ताः स्मृताश्चात्र मासाः सर्वत्र भो द्विज ॥ ६ ॥
प्रत्यहं वाहना रूढं कृत्वा रामं महोत्सवैः । भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्महावाद्यपुरःसरैः ॥ ७ ॥
नां कठिन है ॥ १२१ ॥ यह सब होते हुए भी तत्वज्ञानके अनुसार इसका विचार करना ही चाहिए। जो मनुष्य अधिकारी होता हुआ भी ज्ञानके लिए प्रयत्न नहीं करता, वह पशुयोनिमें जन्म पाता है। ज्ञान अथवा अध्ययनका विप्रका पुण्य कहना हुआ ॥ १२२, १२३ ॥ हे अनघ ! तुमने जो कुछ पूछा, मैंने उसे संक्षेपमें कह सुनाया; लोगोंको चाहिए कि इसका भलीभाँति विचारपूर्वक निश्चय कर लिया करे । १२४ ॥ पुण्य और पाप ये दोनों बहुत प्रकारके हैं । पाण्डवोंको यदुपतिने पापके प्रायश्चित्त बतलाये हैं । १२५ ॥ लोगोंको चाहिए, कि उनका अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह विचार करें । सब धर्मोंका सार एवं रहस्य मैंने तुम्हारे आगे कह सुनाया । इसे यत्नके साथ ग्रहण करना चाहिए। इस भक्तिविहीन प्राणीको न देकर उसे देना चाहिए, जो शुश्रूषु, साधु एवं रामभक्त हो । १२६, १२७ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्द-रामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिराभाटीकासहित मनोहरकाण्डे अष्टम सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीविष्णुदासने कहा—हे गुरो ! रामचन्द्रजीका विशेष पूजन किस समय करना चाहिए । वह समय आप मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! सुनो, मैं तुम्हें रामकी पूजाका परम पुनीत समय बतलाता हूँ। रामचन्द्रजीका पूजन करनेके लिय वह समय बहुत ही उपयोगी होता है । माघमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथि बड़ी ही पवित्र तिथि है । श्रीपञ्चमी उसका नाम है । इसी नामसे वह तीनों लोकमें विख्यात है ॥ २ ॥ ३ ॥ तबसे लेकर जबतक वैशाखके कृष्णपक्षकी पञ्चमी न आ जाय अर्थात् ढाई महीनेतक महान् उत्सवोंके साथ रामचन्द्रजीका पूजन करे ॥ ४ ॥ माघके कृष्णपक्षकी चतुर्थीसे चैत्रके शुक्लपक्षकी नवमी तक अर्थात् इक्यासी दिन केवल फलाहार करके रहे ॥ ५ ॥ जो लोग नित्य सीतारामका पूजन करते हैं, उनके लिए पूर्णिमान्त ही मास माना जाता है ॥ ६ ॥ प्रतिदिन वाहनपर बैठे हुए रामको भेरी-दुन्दुभी आदि बाजे-गाजे, वेश्याओंके नृत्य, छत्र, चमर, तोरण, विविध प्रकारकी पुष्पवर्षा, नाना प्रकारके स्तोत्रपाठ, तरह-तरहके सुगन्धित
| ६६२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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वारस्त्रीणां नृत्यगीतैश्छत्रचामरदर्पणैः । नानाकुसुमवर्षाद्यैर्नानास्तोत्रादिपाठतः ॥८॥
नानापरिमलद्रव्याञ्जलीनां मोचनादिभिः । नानामांगल्यवस्तूनामञ्जलीभिः सुशोभनैः ॥९॥
नानाकुसुमगन्धानां तैलानां च परस्परम् । सेचनैश्च वारनार्यश्च जलयन्त्रैः करे धृतैः ॥१०॥
मुहुर्मुहुः सिञ्चनाद्यैस्तथा वाजां सुगायनैः । द्विजानां वेदघोषैश्च धूपैर्नीराजनदिभिः ॥११॥
सहकाराराममध्ये नीत्वैवं परमोत्सवः । सहकारवृक्षबद्धदोलके तं निवेशयेत् ॥१२॥
नागेन वा पुष्पकेण शेषयानेन दन्तिना । रथेन गरुडेनापि तथा सिंहासनेन च ॥१३॥
तथा शिविकया वापि वायुपुत्रेण वा तथा । रामं सर्वोत्सवैर्नित्यं सदा नेयो रघूत्तमः ॥१४॥
आम्रवृक्षाराममध्ये वल्लीपुष्पवनाश्रिते । अवनिं चन्दनैर्लिप्त्वा विकीर्य कुसुमानि च ॥१५॥
आच्छाद्य नानावस्त्रैश्च शोभनायाऽऽलिभिः शुभां । हेमसिंहासनंश्चैव कृत्वा दोलकमुत्तमम् ॥१६॥
चूतवृक्षस्य शाखायां तं बद्ध्वा शृङ्खलादिभिः । तत्र श्रीरामतो भद्रे रामचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥१७॥
नानाविधैर्भिः पुष्पैः षोडशोपचारकैः । भार्यया भ्रातृभिः पश्चात्सुग्रीवाद्यैः समान्वितम् ॥१८॥
आंदोलयेद्दोलकं तं शिशुबालकवच्छनैः । नर्त्तयित्वा वारयोषित्सदाऽग्रे शनकैर्मुदा ॥१९॥
गायनीया गायकांश्च नर्त्तयित्वा नटांस्तथा । वादनीयानि वाद्यानि ज्वालनीयाः सुधूपकाः ॥२०॥
वीजनीयाश्चामराद्यैः सीतया रघुनन्दनः । नटैश्च कीर्तनांश्चैव कारयित्वा महोत्सवैः ॥२१॥
पुनः पूज्य पूर्ववच्च समानीतो गृहं प्रति । मङ्गलनीयः श्रीरामः कुमदारार्णिकदादिभिः ॥२२॥
एवं नित्यं सार्धमासद्वयं रामं प्रपूजयन् । चूतवृक्षतले नीत्वा पूजयेच्च सविस्तरम् ॥२३॥
यदा रामश्च सीता च वहिर्नेया निजगृहात् । तदा तयार्नयनाधः कस्तूर्यांगुलिनाऽसिताः ॥२४॥
देयाश्च बिंदवो यस्मात्पग्दुर्दृष्टिनोभनाः । एवं दोलापूजनं च शिष्य ते कथितं मया ॥२५॥
विशेषं शृणु तत्रापि कथ्यते यो मयाऽधुना । वसंतपूजनात्पूर्वदिवसे गणनायकम् ॥२६॥
माघशुक्लचतुर्थ्या हि पूजयेद्विघ्ननाशनम् । माघशुक्लचतुर्थ्यां तु नक्तव्रतपरायणः ॥२७॥
द्रव्योंका अंजलीदान, विविध प्रकारक पुष्पोंकी वर्षा, रंग से परस्पर वेश्याओंके पिचकारी छोड़ने, स्त्रियोंके सुन्दर गायन, ब्राह्मणोंके वेदघोष, धूप नीराजन आदि करता हुआ आम्रके बगीचाम ले जाय और वहां भगवान्को आम्रवृक्षमें पड़े हिंडोलेपर बिठावे ॥ ८-१२ ॥ हाथी से, पुष्पकसे, शेषकी सवारीसे, घोड़ेसे, रथसे, गरुडसे, सिंहासनसे, शिविका द्वारा तथा वायुपुत्र द्वारा इन सब सवारियोंपर रामको ले जाना चाहिए ॥ १३ ॥ १४ ॥ आम्रवृक्षके बगीचे जिसमें कि वल्लरियों तथा पुष्पोंके वृक्ष लग हों, पृथ्वीको चन्दनसे लीपकर फूल बिखरे । १५ ॥ नाना प्रकारके वस्त्रोंसे ढंककर उस पृथ्वाको श्रृंगार करे । सुवर्णका सिंहासन बनाकर श्रृंखला आदि-के द्वारा आमके वृक्षमें झूला डालकर रामको बिठावे और सर्वतोभद्र बनाकर उनकी पूजा करे ॥ १६ ॥ १७ ॥ तदनन्तर विविध तथा नौ प्रकारके फूलों एवं षोडश उपचारोंसे सीता, बन्धु तथा सुग्रीव आदि मित्रोंके साथ भगवान्का पूजन करके बच्चोंकी तरह उस झूलेको धीरे-धीरे रस्सी खींचकर झुलाये । उनके आगे सैकड़ों वेश्यायें नचायें, गायकोंसे गाने गवाये, नटोंसे नृत्य करायें, विविध प्रकारके बाजे बजवाये और नाना प्रकारके धूपदीप आदि जलाये ॥ १८-२० ॥ सीता तथा रामपर चमर आदि ढाँके और रामभक्तोंको बुलाकर कीर्तन आदि कराये ॥ २१ ॥ इसके बाद पूर्वोक्त विधिके अनुसार फिर पूजन करके रामचन्द्रजीको घरपर ले आये । घर पहुंचनेके बाद भी कलश, दीप तथा आरती आदिसे रामकी पूजा करे ॥ २२ ॥ इस तरह प्रतिदिन ढाई महीने तक आम्रवृक्षके नीचे भगवान् रामका पूजन करे ॥ २३ ॥ जब राम और सीताको घरसे बाहर जाना हो तो उनकी आंखोके नीचे कस्तूरीकी काली बिन्दी लगा दे ॥ २४ ॥ इसको लगानेसे लोगोंकी दुर्दृष्टि उनपर नहीं पड़ेगी । हे शिष्य ! इस प्रकार मैंने तुम्हें दोलापूजनका प्रकार बतलाया । २५ ॥ इसमें भी जो
सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् १६१
ये ढुंढिं पूजयिष्यन्ति तेऽर्च्याः स्युःसुरपुंगवन्। माधवाग्रे चतुर्थी तु तस्मिन्काल उपोषितः ॥२८॥
अर्चयित्वा विघ्नराजं यात्रां तत्र कारयेत्। चतुर्थी कुन्दनाम्नीयं कुन्दपुष्पैः प्रपूजयेत् ॥२९॥
माघशुक्लपंचमी सा ज्ञेया धीवरैर्परा शुभा । तस्यां तीर्थं रघुनाथमर्चयेद् गंधचंदनैः ॥३०॥
माघशुक्लचतुर्थ्यां तु वरमागत्य च श्रिया । पञ्चम्यां कुन्दकुसुमैः पूजां कुर्यात्ससृद्धये ॥३१॥
नीत्वा रामं चूतवृक्षमूले दोलस्थमीश्वरम्। सीतारामं पूजये च गेहे चाऽथ प्रपूजयेत् ॥३२॥
प्रवृत्ते मधुमासे तु प्रतिपद्दिने रवौ। कृत्वा चावश्यकार्याणि संतर्प्य पितृदेवताः ॥३३॥
वंदयेद्दोलिकाभूमिं... भूरिद्रुतोपशांतये यदिच्छसि सुखेंद्रेण बहुधा सुकृतेन च ॥३४॥
अतस्त्वं पाहि मां देवि भूते भूतिप्रदा भव। चैत्र मसि महापुण्य पुण्ये तु प्रतिपद्दिने ॥३५॥
यस्तत्र श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानं कुर्यान्नरोत्तमः। न तस्य दुरितं किंचिन्नाधयोव्याधयो नृप ॥३६॥
वृत्ते तुषारसमये सितपञ्चदश्याः प्रातर्वसन्तसमये मधुप्रारंभने च ।
प्राश्याय चूतकुसुमं सह चंदनेन नित्यं हि विप्रपुरुषोऽथ समाः सुखी स्यात् ॥३७॥
चूतमग्रं वसंतस्य माकरं कुसुमं नवं मन्मदनं विवृण्वन् सर्वकामार्थसिद्धये ॥३८॥
पञ्चम्यां माधवस्यापि चूतपुष्पं सचन्दनम् प्राशयेन्नरोऽपि वा गलकंठो भविष्यति ॥३९॥
चूतपुष्पप्राशनेन कोकिलास्वादवन्म्रुदुः भविष्यति मानवानां कलकंठो मनोरमः ॥४०॥
सीताराम मधूपूवैस्तथा कोमलपल्लवैः पूजयेत्त्वन्वहं भक्त्या दोलोत्सव महोत्सवैः ॥४१॥
चैत्रकृष्णप्रतिपदि चूतपुष्पं सचन्दनम् पीत्वा मनोरमं ज्ञेयं सीतारामं प्रपूजयन् ॥४२॥
विशेष बात है, उन्हें बतला रहा हूं। वसन्तऋतु में एक दिन आकर गणेशजीका पूजन करे ॥२५॥२६॥ माघशुक्ल चतुर्थीको गणपति का पूजन तथा उपवास करना चाहिये। ... ... ... अन्न और गणपतिको पूजन करता है, वह प्राणी देवताओं तथा असुरोंका भी पूज्य होता है ॥२७॥२८॥ शास्त्रोंका विधि है कि माघशुक्ल की चतुर्थीको उपवास करके गणेशजी का पूजन और ... ... करना चाहिये। इसका नाम 'कुन्द चतुर्थी' है। इसलिये इस दिन कुन्दके पुष्पसे गणेशजीका पूजन करना चाहिये ॥२९॥ माघशुक्लकी पञ्चमीको 'श्रीयञ्चमी' समझकर उस रोज रामचन्द्रजीका श्वेत चन्दन करना चाहिए। इससे यह मतलब निकला कि माघ शुक्ल चतुर्थीको श्रीसे पूजन करके पञ्चमीको कुन्दके फूलसे अपनी समृद्धिके लिये पूजन करे ॥३०॥३१॥ विशेष अच्छा तो यह हो कि रामचन्द्रजीको आम्रवृक्षके नीचे ले जाय और झूलेमें बिठाकर पूजन करे। यदि ऐसा न कर सके तो घर ही में पूजन कर ले ॥३२॥ चैत्रमास लगते ही प्रतिपदाको सूर्योदयके समय आवश्यक कामोसे निपटकर पितरोंका तर्पण करे और सब प्रकारके दुःखोंकी शान्तिके निमित्त होलिकाभूमिकी वन्दना करना चाहिये। हे देवि ! ब्रह्मा तथा विष्णुजीने आपकी वन्दना की है॥३३॥३४॥ अतएव हे देवि ! तुम मेरे लिये भी विभूतिदात्री बन जाओ। परम पवित्र चैत्रके महीने में पुण्य नक्षत्र और प्रतिपदाको जो मनुष्य श्वपच (चाण्डाल) को छूकर स्नान करता है, उसे न किसी प्रकारका पातक लगता है और न किसी प्रकारके आधि व्याधि ही सताती है ॥३५॥३६॥ जाड़ेके दिन बीत जाने और बसन्त ऋतुके अन्दर वसन्तपञ्चमीके पूर्णिमाको प्रातःकाल चन्दनके साथ आमका बौर चटे तो हे विप्र ! वह प्राणी साल भर बहुत सुखमें रहता है ॥३७॥ बौरको चाटते समय 'चूतमग्रं वसन्तस्य' यह मन्त्र पढ़ना जाय, जिसका मतलब होता है कि हे सहकार वृक्ष ! मैं वसन्तऋतुके अग्रिम भागमें तुम्हारा फूल चन्दनके साथ इस वास्ते चाट रहा हूं कि मेरी सब अभिलषित कामनायें पूर्ण हो जायें ॥३८॥ माधवमासकी बसन्ती पञ्चमीको भी चन्दनके साथ बौर चाटना चाहिये। ऐसा करनेसे उसका स्वर कोकिलके समान मीठा हो जाता है ॥३९॥ उस दिन आम्रपुष्पका प्राशन करनेसे प्रत्येक मनुष्यका स्वर कोयलके स्वरकी तरह मीठा हो सकता है ॥४०॥ प्रतिदिन नूतन म्रुग अथवा वस्त्रको झूलेमें बिछाकर बादामके बौर तथा कोमल पल्लवोंसे सीतासह पूजन करे ॥४१॥ चैत्रकृष्णाकी प्रतिपदाको चन्दनके साथ आम्रका
६६४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ९
एवं त्रयश्च दिनं नीत्वा ततश्चैवोपरिष्टात् । ततोऽप्यायुर्विवृद्ध्यर्थं दीनानां चैव दत्तः परम् ॥४३॥ पञ्चम्यन्तं चोपरिष्टादपि श्रीराघवार्चनम् । स्नात्वा केशालवालैस्तु कस्तूर्याद्यैः सुभावितैः ॥४४॥ विचित्रवस्त्रं च परिधाय गन्धादिना सुशोभनम् । ततोऽप्यायुर्विवृद्ध्यर्थं नृपतिर्वस्त्राणि ॥४५॥ जनस्यै रामचन्द्राय दत्त्वा परिधाय पुनः । केव दत्त्वा गजैश्च वासांसि विचित्रानि हि ॥४६॥ दत्त्वा राजाय सीतायै ततो गच्छन् नृपोटजे । सर्वमङ्गलपूर्वेण नानामङ्गलपूर्वकम् ॥४७॥ नानादानानि देयानि स्वशक्त्या च प्रयत्नतः । नानारङ्गाणि संहृत्य गृहीत्वा च परस्परम् ॥४८॥ एकोऽपि विचित्राणि भक्ष्यपेयानि खादयेत् । मित्रादिभिर्युतोऽद्यान् स्वयं वापि मुहुर्मुहुः ॥४९॥ आक्रव्य तु वसन्तौ पञ्चम्यां मानवैरित्थं मुदान् । वसन्तपञ्चमी नाम्नी महापुण्यात्मिका स्मृता ॥५०॥ पक्षे पक्षे तु पञ्चम्यामर्चयेत् माधवमन्दिरे । एवं गमं पञ्चमेव यावद्वैशाखपञ्चमी ॥५१॥ विशेषेण नावर्च्चां के पक्षे दक्षे प्रपूजयेत् । अथवा पादशुक्लायां कृष्णायां चैत्रमासि वै ॥५२॥ कृष्णायां माधवे चापि पञ्चम्यन्तं प्रपूजयेत् । महोत्सवेन श्रीरामं दोलास्थोऽपि स्थितस्ततः ॥५३॥ ततश्चैव शुक्लपक्षे प्रतिपदि मधोर्नराः । तैलाभ्यङ्गं स्वयं कृत्वा रामस्याप्युद्वर्तनं चरेत् ॥५४॥ पञ्चम्यन्तमेतच्च न यावत्स्यान्नवमी तिथिः । उत्तमाङ्गं न तैलेन मर्दयेन्नरो नरकं व्रजेत् ॥५५॥ तैनाभ्यङ्गमकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते । अथ नैऋतकोणे नामि प्रदे चैत्रे महोत्सवे ॥५६॥ पुण्येऽह्नि विप्रकथिते प्रपादानं समारभेत् । ततस्तु सर्वप्राण्यर्थं प्रपादानं समाचरेत् ॥५७॥ अरण्ये निर्जले देशे पथि ग्रामेऽथवा गृहात् । ततस्तैर्नामान्याहूतैः प्रपादानं समाचरेत् ॥५८॥ अस्याः प्रदानात्पितरस्तृप्यन्तु हि पितृभिः सह । ततो मासद्वयं देयं जलं मासचतुष्टयम् ॥५९॥ देवालयेषु विप्रार्थं देयं स्याच्छयनासनेति । पङ्के दानुशक्तेन विशेषान्मधर्ममीप्सुता ॥६०॥
और फांकर सीताजीका पूजा करना चाहिये। ... ३ दिन तथा आगेवाले तीन दिन बिताकर आगेवाले तीन दिन विविध प्रकारके दान-पुण्य करना चाहिये। तदनन्तर केशक्षालन वस्तुओंको मांगलिक सौभाग्याद्रव्योंके साथ स्नान करके कस्तूरी चन्दन लगाकर तरह-तरहके कपडे पहने और नाना प्रकारके बाजोंके साथ सुगन्धि रस अभिलाषापूर्वक भगवान् का विधिवत्पूर्वक सर्वस्नान कराके चित्र-विचित्र वस्त्र पहनाये। इसके अनन्तर वसन्तके फूलोंसे विधिवत् पूजन करे और अपने कल्याणके निमित्त नाना प्रकारके दान दे। इसके अनन्तर नाना प्रकारके गन्धित द्रव्योंसहित जलोंको लेकर लोग परस्पर एक दूसरेपर छोड़े। अच्छे-अच्छे पदार्थ खाए और भोजन करावे तथा अपने मित्रोंके साथ भोजन करें ॥ ४३-४९ ॥ यह वसन्त पञ्चमी बड़ी पवित्र तिथि कही है। इसलिये सबको चाहिए कि इस रोज अच्छे-अच्छे पदार्थ बनाकर स्वयं खायँ और अपने सगे-सम्बन्धियों को भी खिलावें ॥ ५० ॥ इस तरह माघ मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमीसे लेकर सितपञ्चमी पर्यन्त पूजा करनी चाहिये ॥ ५१ ॥ विशेषकर प्रत्येक पक्षकी नवमीको पूजन करे अथवा माघके शुक्लपक्षसे लेकर कृष्णपक्ष और वैशाखकी भी कृष्णपक्षकी रामचन्द्रजीको पालनेमें बैठाकर भक्तिपूर्वक और उत्साहके साथ पूजन करे ॥ ५२ । ५३ । इसके बाद चैत्र शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको स्वयं अपने शरीरमें उबटन लगाये ॥ ५४ ॥ इस तरह नौ रात्रि पर्यन्त अर्थात् जबतक नवमी तिथि न आये, तबतक संवत्सरके अष्टम दिन भी कभी तैल-उबटन नहीं लगाना, वह नरकगामी होता है। फाल्गुनमासकी समाप्ति और चैत्रमासके प्रारम्भके किसी पवित्र दिन अथवा ब्राह्मण जो दिन बतला दे उस रोजसे पौशालह बैठाकर जलदान प्रारम्भ करे। विद्वान् मनुष्योंको चाहिए कि प्रपादानके प्रारम्भमें 'अरण्ये प्रान्तर' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण कर लिया करे ॥ ५५-५७ ॥ अरण्य, निर्जल प्रदेश, रास्ता अथवा ग्राममें सर्वसाधारणके लिए इस पौसलेकी स्थापना कर रहा हूँ। इसके दानसे मेरे पिता-पितामह आदि पितर तृप्त हों। इस प्रकार उसकी स्थापना करके चार महीने तक निरन्तर जलदान करे ॥ ५८ । ५९ । यदि कोई प्राणी प्रपादानका पुण्य प्राप्त करना चाहता हो और उसमें दान करनेकी सामर्थ्य न हो तो उसे चाहिए वह शिवालयमें जिनसिलापर
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६१५
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६१५
प्रत्यहं धर्मघटको वस्त्रसंवेष्टिताननः । ब्राह्मणस्य गृहे देयः शीतलामलजलः शुचिः ॥६१॥ ताम्बूलफलवान्द्रव्यैश्च दक्षिणाभिः समन्वितः । एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ॥६२॥ अस्य प्रदानात्सफलाः सर्वे सन्तु मनोरथाः । अनेन विधिना यस्तु धर्मकुम्भं प्रयच्छति ॥६३॥ गयादानफलं सोऽपि प्राप्नोर्नाह न संशयः । तृतीयायां चैत्रशुक्ले सीतारामौ प्रपूजयेत् ॥६४॥ कुंकुमागुरुकर्पूरमणिवस्त्रसुगन्धकैः । स्रग्गंधैर्धूपदीपैश्च दमनेन विशेषतः ॥६५॥ आदोलयेत्ततः सीतारामौ च दोलकस्थितौ । वसन्तमभ्यासाद्य तृतीयायां द्विजोत्तम ॥६६॥ सौभाग्याय तथा स्त्रीभिः सौभाग्यशयनव्रतम् । कार्यं महोत्सवेनैव सुख पुत्रसुखेप्सुभिः ॥६७॥ विशेष चात्र वक्ष्यामि तृतीयायां द्विजोत्तम । तृतीयायां तु नारीभिः शुक्लपक्षे मधौ शुभे ॥६८॥ स्नात्वा मृण्मयदुर्गं हि कार्यं चित्रविचित्रितम् । तत्राष्टादश धान्यानि वापयेत्तदनन्तरम् ॥६९॥ पुष्पवृक्षांस्तृभांश्चैव वापयेत्सर्वतस्ततः । जयन्त्राणि ह्यपाराणि चित्राण्यपि विलेखयेत् । ७०॥ तूर्वद्द्वाराणि कार्याणि पूर्ववन्मण्डपादिकम् । यथा श्रागमपूजायामुक्तं तद्वत्प्रकारयेत् ॥७१॥ दुर्गोपरि घटं स्थाप्य सजलं पुष्पगन्धितम् । दोलकं च ततो न्यस्य घटपृष्ठे महच्छुभम् ।७२॥ कार्या राजती मूर्तिः सीतायाः परिकल्प्य च । रामस्यापि शुभां मूर्तिं कृत्वा तौ पूजयेत्ततः । ७३॥ दोलकोपरि संस्थाप्य मासमेकं प्रपूजयेत् । केचिच्छिवस्य पार्वत्या शिवेन च प्रपूजनम् ॥७४॥ वदन्ति ह्यत्रयस्तत्र निर्णयं शृणु वक्ष्यते । रामस्य हृदयं शंभुः श्रीरामो हृदयं स्मृतः ॥७५॥ शंकरस्य तथा गौरीहृदयं जानकी स्मृता । जानक्या हृदयं गौरी द्विधा नैवास्ति कर्हिचित् ।७६॥ रामस्य च शिवस्यापि सीतागिरिजयोस्तथा । ये मानयति वै भेदं तेषां वासस्तु रौरवे ॥७७॥ अतश्चैत्रतृतीयायां सीतारामौ प्रपूजयेत् । अशक्तौ ताम्रजे मूर्ती कार्ये वा काष्ठनिर्मिते । ७८॥
घड़ा बाँधकर जलधारा देनेका प्रबन्ध करे ॥ ६० ॥ उन दिनों प्रतिदिन एक घड़ेमे ठण्डा और निर्मल जल भरके उसका मुंह कपड़ेके बाँधकर ताम्बूल, फल, द्रव्य तथा दक्षिणा आदिके साथ किसी सुपात्र ब्राह्मणके घर दे आया करे। यह कहा। 'विष्णुशिवमयं घटदान करमम मेद सब मनोरथ सफल हो जायें। दान करते समय यह कहना नाय । जा प्राणी इस रीतिम धर्मकुम्भका दान करता है, उस गयादानका फल प्राप्त होता है। इसमे कुछ संशय नहीं है ॥ ६१-६४ ॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीयाको कुमकुम, अगरु, कर्पूर, मणि, वस्त्र तथा सुगन्धित मालाश्री विशेषकर दमनकक फूलसे सातरामका पूजन करे ॥ ६५.। इसके बाद झूलेपर बिठाल-कर झूला झुलावे। जिनका पुत्रसुख आदि पाना हो, व स्त्रियां वसन्तमासमे लेकर तृतीया तक एक महात् उत्सवके साथ सौभाग्यशयन व्रत करे ॥ ६६ ॥ तृतीयाम कुछ विशेषतायें है, सो तुम्हे बतलाता हूँ। उस चंतशुक्लकी तृतीयाको स्नान करक मिट्टीका एक चित्र-विचित्र दुर्ग बनावे । उसम अट्ठारह प्रकारके धान्य बोये। वहींपर अच्छे-अच्छे फूलोंके वृक्ष लगाय और उसम नाना प्रकारके उपयन्त्रोंकी रचना करे । ६७-७० ॥ उस दुर्गमें पहलेकी तरह मण्डप आदि बनाये। जैसा कि पहले श्रीरामपूजाके प्रकरणम बतला आये हैं ॥ ७१ । उस दुर्गके ऊपर जलसे पूर्ण और पुष्पसे गुम्फित घटका स्थापन करे। घटके पाछे झूला रखकर सुवर्ण या चांदो-की सीताजीको मूर्ति बनवाये और रामचन्द्रजीकी भी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर दोनोंकी पूजा करे। इस प्रकार झूलेपर बिठालकर एक मास तक पूजन करे । हे शिष्य पार्वताजीके साथ शिवजीकी पूजा करे, कुछ लोग ऐसा कहते हैं। अब इस विषयका निर्णय मुझसे सुनता हूँ। रामचन्द्रजी शिवजीके हृदय है और शिवजी राम-के हृदय है ॥ ७२-७५ ॥ उसी तरह गौरी सीताजीका हृदय है और सीताजी गौरीका हृदय हैं। इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ७६ ॥ राम, शिव और सीता तथा गिरिजामे जो लोग किसी प्रकारका भेदभाव मानते हैं, वे रौरव नरकमें बास करते हैं ॥ ७७ ॥ इसीलिये चैत्रकी तृतीयाको सीतारामका पूजन करना चाहिए । यदि सामर्थ्य न हो तो सुवर्ण या चाँदीकी प्रतिमा न बनवाकर ताम्र अथवा काष्ठकी बनवाये ॥ ७८ ॥
| ३६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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पाषाणनिर्मिते चापि मूर्तौ कार्यं यथामुखम् । प्रत्यहं मङ्गलद्रव्यैः सर्वैस्त्रीभिः प्रपूजनम् ॥७९॥
मासमेकं तु नारीभिः स्नानं वै शीतलाभिधम् । अवश्यमेव कर्तव्यं सीतातीर्थे विशेषतः ॥८०॥
यत्र यत्र रामतीर्थं तस्य वामेऽवनिस्तले सीतातीर्थं तत्र तत्र ज्ञेयं सीताकृतं शुभम् ॥८१॥
चैत्रशुक्लतृतीयायामारभ्य सम्यगङ्गना । यावत्तृतीया वैशाखशुक्ला तावन्निरन्तरम् ॥८२॥
शीतलामन्त्रक स्नानं स्त्रीभिः सीताप्रेमचरेत् चैत्रशुक्लतृतीयायामक्षयायां तथापि च ।८३।
तृतीयायां तु नारीभिस्स्नानस्य प्रशस्तस्तत् अन्यत्र दिवसे स्त्रीभिस्स्नानौघं न शस्यते ।८४।
प्रत्यहं चोत्सवाः कार्याः सीतातार्थे पुनः शुभैः सुवासिनीपूजनं च कार्यं भक्त्या दिने दिने । ८५ ।
सुवासिनीनां देयानि वायनानि शुभानि च । निरन्तर पूजनाथै यदि शक्तिर्न विद्यते ८६
तदा कार्यं चैकदिने सुभगार्ना प्रपूजनम् । सुवासिनीनां देयं हि प्रत्यहं भोजनं परम् ॥८७
नानापक्वान्नसंयुक्तं घृतपायससंयुतम् अलङ्कारश्च वस्त्राणि रुच्यर्थादि च यत्सुखम् ॥८८
भर्तुरायुरभिवृद्ध्यर्थं नारीभिर्देयमुत्तमम् । एवं मासन्तु यान्यास्ते शीतलास्नानमुत्तमम् ॥८९
अक्षयायां तृतीयायां पूजयित्वा विशेषतः त्रिंशत्सुवासिनीभ्यश्च दद्याद्भोजनादिकम् ९०॥
सुरुपन्नि निजां पूज्य दत्त्वे वस्त्रं विमर्जनम् एष मासो वरः प्रोक्तः प्रशस्तश्च द्विजोत्तम । ९१।
अन्वीदृक्षं च तत्सर्वं मयाग्रे शृणु चेतसम् । अथातः कुल कामिस्तु चैत्रशुक्लष्टमीदिने ९२।
सीतारामा प्रजार्यन्त्वा महासंतपतारकम् अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबंति पुनर्वभौ ॥९३।
चैत्रे मासि सिताष्टम्यां न ते शोकमवाप्नुयुः । त्वामशोककराभीष्टं मधुमाससमुद्भवम् ९४।
पिबामि शोकमंदमो मामशोकं सदा कुरु। पुनर्वसुयुधोपेता चैत्र मासि मिताष्टमीम् ॥९५॥
आवश्यकता पड़नेपर पत्थरकी प्रतिमा बनवाया जा सकता है । उस तरह मूर्ति बनाकर गुप्तपूर्वक विचित्र मङ्गलमय द्रव्योंसे स्त्रियोंके साथ पूजन करे ॥७९॥ एक महीना स्त्रियोंके साथ शीतला नामक स्नान करे । और माहात्म्यीय जानकर स्नान करे तो विशेष अच्छा है ॥८०॥ जहाँ जहाँ रामतीर्थ है वहाँ-वहाँके रामके वामभागमें सीताका स्थान सनातन से ही विद्यमान रहता है ॥८१॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया-से लेकर जबतक वैशाखका अक्षय तृतीया न आये, तबतक निरन्तर सीतातीर्थमें जाकर शीतलास्नान करे ॥८२॥ स्त्रियोंको चाहिये कि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिए स्नान करे । चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया तथा अक्षय तृतीयाको स्त्रियोंको नाके स्नानका नेमधारण करना चाहिए । इसके सिवाय और किसी रोज स्त्रियोंके साथ बैठके स्नानका विधान नहीं है ॥८३ ॥८४॥ प्रतिदिन स्नानके साथ-साथ सीताके स्तुति तरह-तरहके उत्सव करना चाहिए । नित्य भक्तिपूर्वक स्त्रियोंका पूजन करना भी श्रेयस्कर है ॥८५॥ सुहागिन स्त्रियोंको इन दिनोंमें वायना देना भी उचित है । यदि निरन्तर पूजन करनेकी सामर्थ्य न हो तो केवल एक ही दिन सोहागिन स्त्रियोंका पूजन करे और बहु विविध पक्वान्न युक्त अच्छा-अच्छा भोजन कराये ॥८६॥८७॥ नाना प्रकारके वस्त्र आभूषण आदि भी वे स्त्रियाँ अवश्य दिना करें, जो अपने पतिकी आयुवृद्धि करना चाहती हों । इस तरह एक महीना शीतलास्नान करनेके बाद अक्षय तृतीयाको विशेष रीतिसे पूजन करके तीस सुहागिन स्त्रियोंको नाना प्रकारके भोजन अन्य आदि दे ॥८८-९०॥ इसके बाद अपने गुरुकी पत्नीका पूजन करके उसे भी वस्त्र-आभूषण आदि प्रदान करे । हे द्विजोत्तम ! इस तरह मैंने तुम्ह स्त्रियोंके लिए एक मासका व्रत बतलाया । ९१॥ अब मैं कुछ विशेष बातें बतलाता हूँ, सो सुनो। चैत्रशुक्ल अष्टमीको अशोककी कलियोंसे सीता और रामका पूजन करके जो लोग आठ अशोककी कली पीसकर पुनर्वसु नामक नक्षत्रमें पीते हैं, उन्हें कभी किसी प्रकारका शोक नहीं करना पड़ता । उस कलीका पान करते समय "त्वामशोककराभीष्ट" इस मन्त्रका पाठ करते रहना चाहिए । मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है- हे अशोक ! तुम्हारा जैसा नाम है, उसी प्रकार तुम लोगोंको शोकरहित भी करते हो । इसी कारण चैत्रमासमें उत्पन्न तुम्हारी कलिकाका मैं पी रहा हूँ। तुम मुझे सदा शोकरहित किये रहना । जो लोग पुनर्वसु नक्षत्र तथा
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६६७
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६६७
प्रातस्तु विधिवन्स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् । चैत्रे नवम्यां प्राक्पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ ॥९६॥ उद्गते गुरुगौरांशोः स्वोच्चस्थे ग्रहपंचके । मेषे पूषणि संप्राप्ते लग्ने कर्कटकाह्वये ॥९७॥ आविरासीन्महाविष्णुः कौसल्यायां परः पुमान् । तस्मिन्दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतं नरैः ॥९८॥ तत्र जागरणं कुर्याद्रघुनाथपुरे जनैः । चैत्रशुद्धा तु नवमी पुनर्वसुयुता यदि ॥९९॥ सैवं मध्याह्नयोगेन महापुण्यतमा भवेत् । केवलापि प्रदोष्टव्या नवमीशब्दसंग्रहात् ॥१००॥ तस्मान्मध्याह्नयुक्ता सर्वैः कार्ये वै नवमीव्रतम् । श्रीरामनवमी प्रोक्ता कोटिसूर्यग्रहाधिका ॥१०१॥ उपोषशं जागरणं पितृनुद्दिश्य तर्पणम् । तस्मिन् दिने तु कर्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः ॥१०२॥ सर्वेषामप्ययं धर्मो भुक्तिमुक्तिफैकसाधनः । अपुत्रोऽपि पवित्रः कुन्वेदं व्रतमुत्तमम् ॥१०३॥ पूज्यः स्यात्सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः । यस्तु रामनवम्यां वै भुंक्ते मोहान् मूढधीः ॥१०४॥ कुंभीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः । अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वव्रतोत्तमम् ॥१०५॥ अन्यान्यव्रतानि कुरुते न तेषां फलभाग्भवेत् । आचार्यं चैव संपूज्य शृणुयात्प्रार्थयेन्निशि ॥१०६॥ श्रीरामप्रतिमादानं करिष्येऽहं द्विजोत्तम भक्त्या सर्वथा प्रीतो श्रीरामोऽस्तित्वमेव च ॥१०७॥ स्वगृहे चोत्तमे देशे दारुग्योऽज्ज्वलमंडपम् शंखचक्रहनुमद्भिः प्राग्द्वारे समलंकृतम् ॥१०८॥ गरुत्मच्छ ङ्गशार्ङ्गश्च दक्षिणे समलंकृतम् । गदाखड्गाद्यदंश्च पश्चिमे सुविभूषितम् ॥१०९॥ पद्मस्वस्तिकैर्लिंगैश्च कौवेरे समलंकृतम् मध्यमे ह्यनन्तपुष्पाणां वेदिकामुक्तमायतम् ॥११०॥ अष्टोत्तरसहस्रैश्च शालिग्रामक गुस्तैर् । अष्टपत्रं समालिख्य वेदिकायोगनुत्तमम् ॥१११॥ ततः संकल्पयेद्वै राममेव स्मरन् द्विज । अद्य रामनवम्यां च रामाराधनतत्परः ॥११२॥
युतप्रातः युक्त चैत्रशुक्लकी अष्टमीका व्रत करनेसे वाजपेय यज्ञका फल प्राप्त होता है। चैत्रशुक्लकी नवमीका जब कि पुनर्वसु नक्षत्र था उदित बृहस्पति तथा चन्द्रमाके साथ-साथ पाँच ग्रह उच्च स्थानमें बैठे थे, सूर्य मेष पर स्थित थे, कर्क लग्न थी, उस समय महाविष्णु भगवान् राम कौशल्यासे उत्पन्न हुए थे। इसलिए लोगोंको उस रोज उपवास करना चाहिए ॥९२-९०॥ अर्थात् उचित है कि इस तिथिको अयोध्यापुरमें जाकर रात्रिभर जागरण करे। चैत्रशुक्ला नवमी यदि पुनर्वसु नक्षत्रसे युक्त हो तो वह महापुण्यवती मानी जाती है । यदि मध्याह्न नक्षत्रीयुक्त नवमी न हो तो भी व्रत करना ही चाहिए क्योंकि सर्वत्र नवमी इस शब्दका ही संग्रह किया गया है, ९९ ॥ १००॥ इसलिए सब लोगोंको अच्छी तरह नवमीका व्रत करना चाहिए। यह रामनवमी कोटि सूर्यग्रहणसे भी अधिक पुण्यप्रद मानी जाती है ॥ १०१ ॥ जिन लोगोंको ब्रह्मप्राप्तिकी इच्छा हो, उन्हें चाहिए कि उस दिन उपवास, जागरण तथा पितरोंको तृप्त करनेके लिए तर्पण अवश्य करे ॥ १०२ ॥ क्योंकि सब लोगोंके लिए यह धर्म मुक्ति और मुक्तिका साधक है। यदि कोई मनुष्य अपवित्र या पापी हो तो इस व्रतको करनेसे वह उसी प्रकार सब प्राणियोंका पूज्य हो जाता है, जैसे रामचन्द्रजी स्वयं सबके आराध्यदेव हैं। जो मूढ़ रामनवमीको भोजन करता है ॥ १०३ ॥ १०४ ॥ वह बहुत समय तक कुम्भीपाक आदि घोर नरकोंमें पड़कर सड़ता है। सब उत्तम व्रत इस रामनवमीका व्रत न करके जो प्राणी और और व्रतोंको करता है, उस व्रतको करनेका फल नहीं मिलता। व्रतके दिन रात्रिको ब्राह्मणकी पूजा करके प्रार्थना करे — हे द्विजोत्तम ! आज मैं भक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीकी प्रतिमाका दान करूँगा। हे आचार्य ! आप मुझ ऊपर प्रसन्न हों ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ १०७ ॥ तदनन्तर अपने घरके किसी उत्तम स्थानपर बढ़िया मण्डप बनावे । उसके पूर्वद्वारपर शंख चक्र एवं हनुमज्जीको स्थापना करे । १०८ ॥ दक्षिण द्वारपर गरुड़ धनुष तथा बाणको स्थापित करे । उत्तर दिशामें कमल तथा स्वस्तिककी स्थापना करके उस अलंकृत करे । बीचमें चार हाथकी लम्बी-चौड़ी वेदी बनावे । वेदीपर अष्टोत्तरसहस्र शालिग्रामक रामचन्द्रकी रचना करे ॥ १०९-१११॥ इसके अनन्तर हे द्विज ! श्रीरामचन्द्रका स्मरण करता हुआ संकल्प करे कि इस रामनवमीको श्रीरामचन्द्रजीकी आराधनामें तत्पर
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उपोष्याष्टसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि । इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां च प्रयत्नतः ॥११३॥
श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते । प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुवहूनि मे ॥११४॥
अनेकजन्मसम्विद्धान्यभ्यस्तानि मदोर्जितैः च ततः स्वर्णमयीं रामप्रतिमां पलमानतः ॥११५॥
निर्मितां द्विभुजां दिव्यां वामांकस्थितजानकीम् बिभ्रतीं दक्षिणकरे ज्ञानमुद्रां मनोरमाम् ॥११६॥
वामेनाधःकरेणाप्यर्हदेवीमालिङ्ग्य संस्थिताम् सिंहासने राजते च पलद्वयविनिर्मिते ॥११७॥
अशक्तो यो महानत्र स तु वित्तानुसारतः । पलेन वा तदर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः ॥११८॥
सौवर्णं राजतं वापि कारयेद्रघुनन्दनम् पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ धृतच्छत्रकराङ्कितौ ॥११९॥
चापद्वयसमायुक्तं लक्ष्मणं चापि कारयेत् मातुरङ्गगतं राममिन्द्रनीलसमप्रभम् ॥१२०॥
पञ्चामृतस्नानपूर्वं सम्पूज्य विधिवत्ततः अथांककुसुमैर्युक्तमर्घ्यं दद्याद्विचक्षणः ॥१२१॥
दशाननवधार्थाय धर्मसंस्थापनाय च । राक्षसानां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च ॥१२२॥
परित्राणाय साधूना जातो रामः स्वयं हरिः । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥१२३॥
इत्येवं विधिवत्कृत्वा रात्रौ जागरणं चरेत् ततः प्रातः समुत्थाय स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः ॥१२४॥
समाप्य विधिवद्रामं पूजयेद्विधिवत्सुने ततो होमं प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥१२५॥
पूर्वोक्तमण्डपे कुण्डे स्थण्डिले वा समाहितः लौकिकाग्नौ विधानेन शतमष्टात्तरं हुनेः ॥१२६॥
साज्येन पायसेनेव स्मरन् राममनन्यधीः । ततो भक्त्या सुसन्तोष्य ह्याचार्यं पूजयेद्द्विजः ॥१२७॥
ततो रामं स्मरन् दद्याद्देवं मन्त्रमुदीरयन् । इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलंकृताम् ॥१२८॥
चित्रवस्त्रयुगच्छन्नां रामोऽहं राघवाय ते श्रीरामप्रीतये दास्ये तुष्टो भवतु राघवः ॥१२९॥
इति दत्त्वा विधानेन दद्याद्वै दक्षिणां शुभाम् । ब्रह्महत्यादियापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥१३०॥
होकर मैं आठ पहरत क उपवास करके यह स्वर्णमयी प्रतिमा रामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये किसी बुद्धिमान् रामभक्तको दूंगा जिससे श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्न हों और मेरे उन महान् पापोंको हर लें, जो मैंने अनेक जन्मोंके अभ्यासवश किये हों । तदनन्तर एक पल सुवर्णकी बनी रामकी प्रतिमा, जिसमें दो भुजायें बनी हों, वाम-भागमें सीताजी और दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा विराजमान हो । ११३-११६ ॥ वे बायें हाथसे देवीका आलिङ्गन किये हों। पल चांदीकी बनी चौकीपर बैठे हों । ११७॥ जो प्राणी सर्वथा असमर्थ हों वह अपने वित्तानुसार एक पल, आधा पल अथवा आधेका भी आधा पल सुवर्ण या चाँदीकी प्रतिमा बनवाये । रामके पास ही छत्र और चमर लिये भरत तथा शत्रुघ्न खड़े हों और दो धनुष धारण किये लक्ष्मणजीकी प्रतिमा बनाये । मातुलुंग गोदीमें विराजमान इन्द्रनीलमणिकी प्रभाके समान प्रभावशाली रामको पंचामृतसे स्नान कराकर विधिवत् पूजन करे और बर्णांक पुष्पयुक्त अर्घ्य प्रदान करें । अर्घ्य देते समय 'दशाननवधार्थाय' आदि मंत्र पढ़ना जाय । जिसका अर्थ इस प्रकार है ॥ ११८-१२१ ॥ रावणको मारने, धर्मका स्थापन, राक्षसोंका विनाश और साधुओंकी रक्षाके लिए स्वयं विष्णु भगवान्ने अवतार लिया था । सब भ्राताओंके साथ आप मेरे इस अर्घ्यको स्वीकार करिए ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ यह सब विधि दिवाके दिनको करके रात्रिभर जागरण करे । सबेरे उठकर स्नान संध्या आदि क्रियायें करके विधिवत् पूजन करें। फिर मन्त्रको जाननेवाला यजमान हवनरूपी होम करे ॥ १२४, १२५ ॥ यह हवनविधि पूर्वोक्त मण्डपमें अथवा स्थण्डिल में किया जाय और लौकिक अग्निमे विधानपूर्वक एक सौ आठ आहुतियां खीर-घीसे दी जायें। इसका सामग्रीम घृत और खीरका रहना आवश्यक है । हवन करते समय अपने चित्तको इधर उधर न दौड़ाकर रामका स्मरण करना रहना चाहिए । १२६ ॥ १२७ ॥ तदनन्तर 'इमां स्वर्णमयी' इस मन्त्रका उच्चारण करता हुआ प्रतिज्ञा करे कि सब तरहसे अलंकृत यह सुवर्णमयी रामकी प्रतिमा श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्न करनेके हेतु मैं दान करूंगा । इससे श्रीरामजी प्रसन्न हों ॥ १२८ ॥ १२९ ॥ इस
सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् ६६९
एवं दत्त्वा चैत्रमासे नवम्यां भूसुराय हि । दानं देयं प्रयत्नेन रामसंतुष्टिहेतवे ॥१३१॥
अन्यद्विशेषं वक्ष्यामि चैत्रे मासि शृणुष्व तत् । चैत्रस्य शुक्लपक्षेऽथ दोलकर्म शृणूत्तमम् ॥१३२॥
पूजयेन्मारुतीं भक्त्या आम्रवृक्षतले स्थितम् । चैत्रमप्युभयशुक्लपामपेकादश्यां तु वैष्णवैः ॥१३३॥
आंदोलनीयो देवेशः सलक्ष्मीको महोत्सवैः । द्वाभ्यां चैत्रमासस्य शुक्लाभ्यां दमनोत्सवः ॥१३४॥
बोधायनादिभि प्रोक्तः कर्तव्यः प्रतिवत्सरम् ।
ऊर्जे व्रतं मधौ दोला श्रावणे तंतुसूत्रकम्, चैत्रे च दमनाख्यमङ्कुरार्पणं विवर्जयेत् ॥१३५॥
वह्निविरिंचो गिरिजा गणेशाः फणी विशाखो दिनकृन्महेशः ।
दुर्गाऽन्तको विधहरिः स्मरश्च शर्वः शशी वै तिथिषु प्रपूज्याः ॥१३६॥
अथ चैत्रपौर्णिमायां भक्त्या रामं प्रपूजयेत्
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निशायां च प्रकर्तव्यमधिरामनमुत्तमम् । शुचौ देशे मण्डपादि कृत्वा पूर्वोक्तवस्तुभिः ॥ १४५ ॥
रामलिंगान्तके भद्रे धान्यराशीं महत्तमम् । सजलं कलशं स्थाप्य ताम्रपात्रं तु तन्मुखे ॥ १४६ ॥
स्थाप्य वस्त्रं दोलक्स्थं रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । हैमी वाराजतो वापि दोलकाधिपतेः स्मृताः ॥ १४७ ॥
हैमीं पलमितां राममूर्तिः कार्या मनोरमा । तावन्मिता रौप्यमयीः सीतायाश्चापि कारयेत् ॥ १४८ ॥
नानोपचारैः संपूज्य रात्रौ जागरणं चरेत् । नृत्यगीतमंगलाद्यैः पुराणश्रवणादिभिः । १४९ ।
प्रभाते चं पुनः पूज्य रामं सीताराममन्त्रितम् । मष्टम हवनं कार्यं तिलाज्यपायसादिभिः । १५० ॥
तर्पणं राममंत्रेण क्षीरेणैव प्रकारयेत् । ततो गुरुं सपत्नीक संपूज्य वसनादिभिः ॥ १५१ ॥
रामाय प्रार्थयेद्भक्त्या प्रबद्धकरसम्पुटः । सार्द्धमामद्वयं राम वसन्ते तव पूजनम् ॥ १५२ ॥
दोलकस्थस्य जानक्या यथाशक्त्या मया कृतम् । प्रसादात्तेन श्रीराम मामुद्धर भवार्णवात् ॥ १५३ ॥
एवं संप्रार्थ्य श्रीराम ताम्रवीं मूर्त्तिमुत्तमाम् । दद्यान्नत्वागुरवे भक्त्या तं प्रणम्य पुनः पुनः ॥ १५४ ॥
पंचसप्तवियुग्मानि ह्यष्टविंशन्नितानि वा । तदर्द्धांन्यथवा भक्त्या भोजयेद्गुरुणा सुधीः ॥ १५५ ॥
हतः स्वञ्च सुतृन्मित्रैः कार्यं च भोजनं सुताम् । आंडोऽपि यथाशक्त्या वसंतेऽतु सदा ॥ १५६ ॥
करोतु रामतुष्ट्यर्थं वसंतपूजन वरम् । इदं शिष्य त्वया पृष्टं विशेषं च पूजनम् १५७ ॥
सीतारामस्य तत्सर्वं द आख्यातय ते मया ।
विष्णु उवाच
गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि यत्त्वं वद मतिमान् । १५८ ।
कया कामनया कस्य कार्यं पूजनमुत्तमम् । तन्मयं कथयस्तद्य मयि कृत्वा परां कृपाम् । १५९॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । ब्रह्मवर्चसकामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् । १६० ॥
इंद्रमिंद्रियकामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् । देवीं मार्ग तु श्रीकामस्तेजस्कामो विभावसुम् ॥ १६१ ॥
अथ एक द १ भारी धान्यराशिका स्थापन करके उसपर सजल कलश रक्खे और उसके मुखपर एक ताम्बेका पात्र धरें । फिर झूलपर कपड़ा बिछाकर रामजीको बैठावे और उनका पूजा करे वह झूला चाहे सोनेका अथवा चाँदी का हो सकता था । कमसे कम पलभर परिमाण प्रमाणवाली सोने की रामजीकी और उतनेही वजनके सोने अथवा चाँदीकी प्रतिमा भी बनाना चाहिये । १४५–१४८ ॥ इसके अनन्तर नानाप्रकारके उपचारोंसे पूजन करके रातभर जागरण और उस समय नाच गान आदि मंगलकार्य करे । १४९ । सबेरे फिर रामकी पूजा करके तिल, घृत तथा खीर मात्रसे विधिवत् हवन और राममन्त्रसे क्षीरद्वारा तर्पण करता हुआ पूजन समाप्त करे । तत्पश्चात् सपत्नीक गुरुको वस्त्रभूषण आदि देवे ॥ १५०-१५१ ॥ इसके बाद हाथ जोड़कर रामकी प्रार्थना करता हुआ कहे–हे राम ! मैंने बड़े सद्भावसे वसन्त ऋतुमें जानकीके साथ आपकी पूजा की है। मेरे इस कार्यसे आप प्रसन्न हों और भवसागरसे मेरा उद्धार करें ॥ १५२–१५३ ॥ इस तरह प्रार्थना करनेके अनन्तर प्रतिमा समेत वह पूजायोग्य अपने गुरुको दे दे और उन्हें बार बार प्रणाम करे ॥ १५४ ॥ इसके बाद डेढ़ सौ, अड़तालीस अथवा छब्बीस धार्मिक ब्राह्मणोंको इसमें अर्धसंख्यक ब्राह्मणोंको भोजन करावे । १५५ । इसके पश्चात् अपने सम्बन्धीवर्ग और मित्रोंके साथ-साथ स्वयं भी भोजन करे । कोई प्राणी यदि अशक्त हो तो उन अपनी शक्तिके अनुसार ही यह व्रत और वसन्तऋतुमें रामचन्द्रजीका पूजन करना चाहिए । हे शिष्य ! तुमने मुझसे रामकी पूजाके विषयमें जो प्रश्न किया था । सो मैंने दोलस्थ राम तथा साङ्ग पूजनके विषयकी सब बात कह सुनायी । विष्णुशर्मने कहा—हे गुरो ! मैं आपसे कुछ और पूछना चाहता हूँ । वह आप विस्तारपूर्वक हमें बतलाइए । यदि आप ऐसा करेंगे तो बड़ी कृपा होगी । दया करके आप हमें यह बतलाइए कि किस कामनासे किस देवताका पूजन करना चाहिए ?–१५९ ॥ श्रीरामदासने कहा–हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । सावधान मनसे सुनो । ही अपना ब्रह्मतेज बढ़ाना हो, उसे ब्रह्मणस्पतिका पूजन करना चाहिए ॥ १६० ॥ इन्द्रियकी कोई
सर्गः ९ ]
सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् ६७१
वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्यकामोऽथ वीर्यवान् । अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान् ॥१६२॥
विद्वान् वेदान् राज्यकामः साध्यान्मंत्रांश्च विश्रुतम् ।
आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम इलां यजेत् ॥१६३॥
प्रतिष्ठाकामः पुरुषो रोदसी लोकमातरौ । रूपाभिकामो गंधर्वांस्त्रीं कामोऽप्सर उद्भिताम् ॥१६४॥
आधिपत्यकामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् । यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् ॥१६५॥
विद्याकामस्तु गिरिशं दांपत्यार्थमुमां सतीम् । धर्मार्थं उत्तमश्लोकं तंतुं तन्वन पितॄन् यजेत् ॥१६६॥
रक्षार्थामः पुण्यजनांस्तेजस्कामो मरुद्गणान् राज्यकामो मनून्देवान् निर्ऋतिं त्वभिचर्यजेत् ॥१६७॥
कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् । अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ॥१६८॥
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत रघुनन्दनम् । रामेण सदृशो देवो न भूतो न भविष्यति ॥१६९॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । तस्याद्यवर्णसामर्थ्याद्यद्वस्तुचव रादिकम् ॥१७०॥
परं श्रेष्ठतमञ्चात्र विस्तारेण वदाम्यहम् । रुक्मं रत्नं रथो रामा रक्षसो रजतं रजः ॥१७१॥
रक्षा रणो रमा रक्तं रजको रागरामठौ, राजं रोगो रवि रात्री राज्यं रजस्वला तथा । १७२।
एवमादीन्यनेकानि श्रेष्ठान्येवात्र भो द्विज । रुक्मं पीतं महार्हं च रत्नं रम्यं सुदुर्लभम् ॥१७३॥
रथो यानं श्रेष्ठेषु च रामा यस्या इदं जगत् । राक्षसो देवत्रस्तो रजतं तन्मुदुर्लभम् ॥१७४॥
रजः साक्षात्परमाणुर्नित्यः सोऽत्र प्रकीर्त्यते । रक्षा रक्षाकरी ज्ञेया रणो जयकरः स्मृतः ॥१७५॥
कामना पूर्ण करनेकी अभिलाषा हो तो इन्द्रकी, सन्तानकी इच्छा हो तो प्रजापतिकी, श्रीवृद्धिकी इच्छा हो तो मायादेवीकी तेजवृद्धिकी अभिलाषा हो तो सूर्याभगवतीकी, धनवृद्धिकी इच्छा हो तो आठो वसुओकी, पराक्रमकी अभिलाषा हो तो रुद्रभगवान्की, अन्न आदिकी इच्छा हो तो अदितिकी, स्वर्गकी इच्छा हो तो अदितिके पुत्रों अर्थात् देवताओंका ॥ १६१ । १६२ ॥ राज्यकी इच्छा हो तो इलाको, प्रतिष्ठा चाहनेवालेको लोकमताओको, सौन्दर्यकी अभिलाषा हो तो गन्धर्वोको, स्त्रीकी कामना हा तो उर्वशी आदि अप्सराओंकी और आधिपत्यकी इच्छा हो तो सब देवताओंका पूजा करे । जिसे यश पानेकी इच्छा हो उसे यज्ञ करना चाहिये । कोषकी इच्छा हो तो वरुणकी, विद्याकी इच्छा हो तो शिवका दम्पत्यसुखकी इच्छा हो तो पार्वती जीकी, धर्मकी अभिलाषा हो तो उत्तमश्लोक (विष्णु भगवान्) की और वंशविस्तारकी इच्छा हो तो पितरोंकी पूजा करनी चाहिए १६३-१६६। आत्मरक्षाकी इच्छा हो तो पुण्यजनोंकी तेजोट्रद्धिकी अभिलाषा हो तो मरुद्गणोंकी राज्यकी इच्छा हो तो चौदह मनुओका आभिचारिककी दिश करनी हा तो राक्षसों-की, अभीष्टविषयिउ काम पूर्तिरी इच्छा हो तो चन्द्रमाका, निष्काम होनेकी अभिलाषा हो तो परम पुरुष परमेश्वरकी, अकाम या सकामभावसे मोक्षकी कामना रखता हो तो उसे चाहिए कि तीव्र भक्तियोगसे रघुनन्दन रामचन्द्रकी पूजा करे । रामचन्द्रजीके समान न कोई देवता हुआ है और न होना ॥ १६७-१६९ ॥ अतएव हर तरह प्रयत्न करके रामचन्द्रर्ज पूजा करे । उनके नामके आदिम वर्ण 'र' की सामर्थ्यसे संसारमें जितनी वस्तुएं रकारादि हैं, वे सब अतिशय श्रेष्ठ मानी गया हैं। उन वस्तुओंको अब मै विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। जैसे-रुक्म (सुवर्ण), रत्न, रथ, रामा (स्त्री), राक्षस (विद्याधर आदि), रजत (चाँदी), रज (धूलि), रक्षा, रण, रमा (लक्ष्मी), रक्त, रजक (धोबी), राग, रामठ (हींग), राजा, रोग, रवि (सूर्य), रात्रि, राज्य, रजस्वला आदि अनेक नाम श्रेष्ठ मान गये हैं। ऊपर बताया हुआ रुक्म (सुवर्ण) पीतवर्णको बहुमूल्य धातु है। रत्न देखनेमें सुन्दर लगता है और कठिनाईसे प्राप्त होता है। रथ एक श्रेष्ठ सवारी है! रामा (स्त्री) वह वस्तु है, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ है। राक्षस ऐसे भयानक होते हैं, जिनसे देवता भी भयभीत रहा करते हैं। रजत (चाँदी) भी एक दुर्लभ वस्तु है। रज (धूलि) साक्षात् परमाणु और नित्य है, रक्षा रक्षाकारी है। रण (संग्राम) विजयदायक होता है ॥ १७०-१७५ ॥