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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

६२८ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

'आयंगौः०' भूतगणेभ्यो नमः भूतानागानावाहयामि ॥ १६ । वरुणवायुमध्ये भद्रे नदीभ्यः पौञ्जिष्टं गन्धर्वाप्सरोभ्यो नमः गन्धर्वाप्सरस आवाहयामि ॥ १७ ॥ ब्रह्मसोममध्ये वाप्यां 'यदक्रंदः प्रथमं०' स्कन्दाय नमः स्कन्दमावाहयामि ॥ १८ । 'नमः शंभवे०' नंदीश्वराय नमः नंदीश्वरमावाहयामि ॥१९। 'भद्रं कर्णेभिः०' शूलाय नमः शूलमावाहयामि ॥ २० । 'विश्वकर्मा- ह्यज०' महाकालाय नमः महाकालमावाहयामि ॥ २१ ॥ ब्रह्मैशानमध्ये वल्लीषु 'आदितिद्यौँ०' ऋक्षादिभ्यो नमः ऋक्षादीनावाहयामि ॥२२। ब्रह्मंद्रमध्ये वाप्यां 'श्रियस्ते०' दुर्गायै नमः दुर्गामा- वाहयामि ॥ २३ ॥ 'इदं विष्णु०' विष्णवे नमः विष्णुमावाहयामि । २४॥ ब्रह्माग्निमध्ये वल्लीषु 'उदीरिता०' स्वधायै नमः स्वधामावाहयामि । २५ । ब्रह्मयममध्ये वाप्यां 'अरन्मयो०' मृत्यवे नमः मृत्युमावाहयामि ॥ २६ ॥ ब्रह्मवरुणमध्ये वाप्यां 'गणानांत्वा०' गणपतये नमः गणपति- मावाहयामि ॥२७॥ ब्रह्मवरुणमध्ये वाप्यां 'शन्नोदेवी०' अद्भ्यो नमः अप आवाहयामि । २८ ॥ ब्रह्मवायुमध्ये वल्लीषु 'मरुतोयस्य०' मरुते नमः मरुतमावाहयामि ॥ २९ ॥ ब्रह्मणः पादमूले कर्णिकाधः 'स्योनापृथिवि०' पृथ्व्यै नमः पृथिवीमावाहयामि ॥३०॥ तत्रैव 'पञ्च नद्यः सरस्वती०' गंगादिसर्वनदीरावाहयामि ॥ ३१। तत्रैव धाम्नोद्याम्नोजगंस्ततोवरुण०' सप्तसागरेभ्यो नमः सप्त- सागरान्वावाहयामि ॥३२॥ ततः कर्णिकोपरि नाममंत्रेण मेरवे नमः गदामावाहयामि । ३३ । ततः पीतपरिधौ सोमादिसन्निधौ क्रमेण आयुधानि सोमसमीपे गदायै नमः गदामावाहयामि ॥ ३४ ॥ ईशानसमीपे शूलाय नमः शूलमावाहयामि ॥३५॥ इन्द्रसमीपे वज्राय नमः वज्रमावाहयामि ॥३६॥ अग्निसमीपे शक्तये नम शक्तिमावाहयामि ॥३७॥ यमसमीपे दंडाय नमः दंडमावाहयामि । ३८॥ निर्ऋतिसमीपे खङ्गाय नमः खड्गमावाहयामि ॥ ३९ । वरुणसमीपे पाशाय नमः पाशमावाह- यामि ॥४०॥ वायुसमीपे अंकुशाय नमः अंकुशमावाहयामि ॥४१॥ पुनः सोमस्योत्तरे सदा समीपे


इस मन्त्रसे सर्वरूप विश्वेदेवका आवाहन करे। १४॥ यम और निर्ऋतिके बीचवाले भद्रमे 'अग्नियं देव' इस मन्त्रसे यक्षोंका आवाहन करे ॥ १५ ॥ निर्ऋति और वरुणके बीचवाले भद्रमे 'आयंगौ' इस मन्त्रसे भूतों और नागोंका आवाहन करे ॥ १६ ॥ वरुण और वायुके मध्यमें नदीभ्यः' इस मन्त्रसे गन्धर्वों और अप्सराओं- का आवाहन करे ।। १७ ।। ब्रह्मा और सोमके मध्यवाली वापामे 'यदक्रन्दः' इस मन्त्रसे स्कन्दका आवाहन करे ! १८ ।। 'नमः शंभवे' से नन्दीश्वर, 'भद्रं कर्णेभिः' से शूल और 'विश्वकर्मा' इस मन्त्रसे महाकालका आवाहन करे । १९ ॥ २० ॥ २१ ॥ ब्रह्मा और ईशानके मध्यवाली वल्लियोंमे 'आदितिद्यौ' इस मन्त्रसे नक्षत्र आदिका आवाहन करे ।। २२ ।। ब्रह्मा और इन्द्रके मध्यवाली वापीमे 'श्रियस्ते' इस मन्त्रसे दुर्गाका आवाहन करे ॥ २३ ॥ 'इदं विष्णुः' इस मन्त्रसे विष्णुका आवाहन करे ॥ २४॥ ब्रह्मा और अग्निके मध्यवाली वल्लीमे 'उदीरिता' इस मन्त्रसे स्वधाका आवाहन करे ॥ २५ ॥ ब्रह्मा और यमके मध्यवाली वापीमें 'अरं मृत्यो' इस मन्त्रसे मृत्युका आवाहन करे । २६ ॥ ब्रह्मा और निर्ऋतिके मध्यवाली वल्लियोंमे 'गणानां त्वा' इस मन्त्रसे गणपतिक। आवाहन करे । २७। ब्रह्मा और वरुणके मध्यवाली वापीमे 'शन्नो देवी' इस मन्त्रसे जलका आवाहन करे ॥ २८ ॥ ब्रह्मा और वायुके मध्यवाली वल्लियोंमें 'मरुतो यस्य' इस मन्त्रसे मरुत्का आवाहन करे ॥ २९ ॥ ब्रह्माके पाँवके पासवाला कर्णिकाके नीचे 'स्योना पृथिवि' इस मन्त्रसे पृथ्वीका आवाहन करे ॥ ३० ॥ वहीं ही पञ्चनद्यः' इस मन्त्रसे गंगा आदि सब नदियोंका आवाहन करे ॥ ३१ । वहीं ही 'धाम्नो धाम्नो' इस मन्त्रसे सप्त सागरोंका आवाहन करे ॥ ३२ ॥ इसके बाद कर्णिकाके ऊपर नाममन्त्रस मेरका आवाहन करे ॥ ३३ ॥ पीत परिधिमे सोम आदिके पास क्रमशः आयुधोंका आवाहन करे । गदाके नाम- मन्त्रसे गदाका, ईशानके समीप शूलके नाममन्त्रसे शूलका, इन्द्रके समीप वज्रका, अग्निके पास शक्तिका यमके समीप दण्डका, निर्ऋतिके पास खड्गका और वरुणके पास पाशका आवाहन करे ॥३४-४०॥ फिर वायुके

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२९

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२९


गौतमाय नमः गौतममावाहयामि ॥४२॥ ईशान्यां भरद्वाजाय नमः भरद्वाजमावाहयामि ॥४३॥ पूर्वे विश्वामित्राय नमः विश्वामित्रमावाहयामि ॥४४॥ आग्नेय्यां कश्यपाय नमः कश्यपमावाहयामि ॥४५॥ दक्षिणे जमदग्नयेनमः जमदग्निमावाहयामि ॥४६॥ नैर्ऋत्यां वसिष्ठाय नमः वसिष्ठमावाह- यामि ॥४७ पश्चिमे अत्रये नमः अत्रिमावाहयामि ॥४८। वायव्यां अरुन्धत्यै नम अरुन्धतीमावा- हयामि ॥४९॥ पुनः पूर्वादििक्रमेण पूर्वे विश्वामित्रसमीपे ऐन्द्यैनमः ऐन्द्रीमावाहयामि ॥५०॥ आग्नेय्यां कौमार्यै नमः कौमारीमावाहयामि ॥५१। दक्षिणे ब्राह्मयै नमः ब्राह्मीमावाहयामि ॥५२॥ नैर्ऋत्यां वाराह्यै नमः वाराहीम० ॥५३। पश्चिमे चामुंडायै नमः चामुंडाम० ॥५४ वायव्ये वैष्णव्यै नमः वैष्णवीमा ॥५५॥ उत्तरे माहेश्वर्यै नमः माहेश्वरीमा० ॥५६। ईशान्य विनायक्यै नमः वैनाय- कीमा० ॥५७॥ अष्टदलमध्ये सूर्याय नमः सूर्यमा० ॥ ५८ ॥ बाह्यपूर्वाद्यष्टदिक्षु यथास्थानेषु पूर्वे सोमाय नमः सोममा० ॥५९॥ आग्नेय्यां भौमाय नमः भौममा० । ६०॥ दक्षिणे बुधाय नमः बुधमा० ॥ ६१ नैर्ऋत्यां बृहस्पतये नमः बृहस्पतिमा० ॥ ६२ ॥ पश्चिमे शुक्राय नमः शुक्रमा० ॥६३। वायव्यां शनैश्चराय नमः शनैश्चरमा० । ६४। उत्तरे राहवे नमः राहुमा० ॥६५॥ ईशान्यां केतवे नमः केतुमा० ॥ ६६। एता देवताः सर्वतोभद्रे प्रतिष्ठाप्य ततः परिधिभूतपंक्तौ सुषेणाय नमः सुषेणमा० ॥६७॥ सर्वेषु लिंगेषु रुद्राय नमः रुद्रमा०। ६८। सर्वासु वापीषु नलाय नमः नलमा० ॥६९॥ सर्वसु भद्रेषु सुग्रीवाय नमः सुग्रीवमा० ॥७०॥ सर्वेषु तिर्यग्भद्रेषु गवयाय नमः गवयमा० ॥७१॥ सर्वासु पीतश्रृंखलासु अंगदाय नमः अंगदमावा० ॥ ७२ ॥ सर्वासु कृष्णश्रृंखलासु विभीषणाय नमः विभीषणमा० ॥७३। सर्वासु वल्लीषु जाम्बवते नमः जाम्बवन्तमा० ।७४॥ सर्वेषु खण्डेषु मैंदाय नमः मैंदमा० ॥ ७५॥ सर्वासु परिधिषु द्विविदाय नमः द्विविदमा० ॥७६॥ मुद्रायां रामजानकीभ्यां नमः रामजानकीमा० ॥७७। मुद्रायाः पश्चिमे पीतपरिधौ लक्ष्मणाय नमः लक्ष्मणमा० ॥७८। मुद्राया उत्तरे भरताय नमः भरतमा० ॥७९॥ मुद्राया दक्षिणे शत्रुघ्नाय नमः शत्रुघ्नमा० ॥८०। मुद्रायाः पुरत वायुपुत्राय नमः वायुपुत्रमा० ॥८१॥ बहिश्चिपरिधिषु श्वेतपरिधौ


समीप अंगुष्ठका आवाहन करे ॥४१॥ तदनन्तर सोमके उत्तर ओर रुद्र के पास गौतमका आवाहन करे ॥४२॥ ईशान कोणमे भरद्वाजका, पूर्वमें विश्वामित्रका, आग्नेयमे कश्यपका, दक्षिणमे जमदग्निका, नैर्ऋत्यमे वसिष्ठका, पश्चिममे अत्रिका और वायव्यकोणमे अरुन्धतीका आवाहन करे ॥४३-४६। फिर पूर्व आदि दिशाओके क्रमसे पूर्वमें विश्वामित्रके समीप ऐन्द्रीका आवाहन करे ॥५०। आग्नेय कोणमें कौमारीका, दक्षिणमे ब्राह्मीका, नैर्ऋत्यमे वाराहीका पश्चिममे चामुण्डाका, वायव्यमे वैष्णवीका, उत्तरमें माहेश्वरीका और ईशान कोणमे वैनायकीका आवाहन करे ॥५१-५७॥ अष्टदलके मध्यमे सूर्यका आवाहन करे, बाहरके पूर्व आदि आठो दिशाओमे यथास्थान निम्नलिखित देवताओका आवाहन करे पूर्वमे सोमका आग्नेय कोणमे भौमका, दक्षिणमे बुधका, नैर्ऋत्यमे बृहस्पतिका, पश्चिममे शुक्रका वायव्यमें शनैश्चरका, उत्तरमें राहुका और ईशान कोणमे केतुका आवाहन करे ॥५८-६६॥ सर्वतोभद्रमें इन देवताओंकी स्थापना करके परिधिभूत पंक्तियामे सुषेणका आवाहन करे ॥ ६७॥ सब लिंगोंमे रुद्रका सब वापियोंमे नलका, सब भद्रोंमे सुग्रीवका, सब तियं भद्रोमें गवयका, सब पीत श्रृंखलाओमें अङ्गदका और सब कृष्ण श्रृंखलाओमें विभीषणका आवाहन करना चाहिए ॥ ६८-७३॥ सब वल्लियोंमें जाम्बवन्तसे जाम्बवान्का आवाहन करे ॥७४॥ उसी प्रकार सब खण्डोंम मैंदका, सब परिधियोंमे द्विविदका, मुद्रामें राम और जानकीका आवाहन करे ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ मुद्राकी पश्चिमवाली पीत परिधिमें लक्ष्मणका आवाहन करे ॥७८॥ मुद्राके उत्तर ओर भरतका आवाहन करे ॥ ७९ ॥ मुद्राके दक्षिण ओर शत्रुघ्नका आवाहन करे ॥ ८० ॥ मुद्राके आगे

६३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

भागीरथ्यै नमः भागीरथीमा० ॥ ८२ ॥ रक्तपरिधौ सरस्वत्यै नमः सरस्वत्तीमा० ॥८३ । कृष्णपरिधौ यमुनायै नमः यमुनामा० ॥ ८४ । एवमेव रमारामाभद्रदेवतावाहन कार्यम् । रमारामाभद्रे मुद्रायमेव विशेषः । आदौ रमामावाह्य राममावाहयेत् । एवमावाहनं कृत्वा षोडशोपचारैः पूजयेत् । शेषा- न्नेन दिग्बलिः कार्यः ॥ इति आनन्दरामायणान्तर्गतरामोभद्रदेवतास्थापनविधिः ।

अथ रामनवमीकथा

श्रीरामदास उवाच

शिष्य यद्यत्प्रियं तस्मै रामाय तद्वदाम्यहम् । मासेषु चैत्रमासस्तु राघवस्यातिवल्लभः ॥ १ ॥ पक्षयोः सितपक्षस्तु प्रियोऽस्ति राघवस्य हि सर्वासु तिथिषु श्रेष्ठा नवमी राघवप्रिया ॥ २ ॥ सूर्यवंशसमुद्भूतस्तत्सम्बन्ध भानुवासरः । प्रियोऽतिराघवस्यैव नक्षत्रेषु पुनर्वसुः ॥ ३ ॥ चंपकः पुष्पजातौ हि तुलसी वै तथैव च । अथवा नवकं चापि पुष्पाणां राघवप्रियम् । ४ ॥ जातिश्चंपकमन्दारौ तुलसी मुनिमालती । दमनः केतकी सिह्ली पुष्पाणां नवकं स्मृतम् ॥ ५ ॥ तथा नवविधं चान्नं राघवस्यातिवल्लभम् । मोदको लड्डुको मडो पूणंगर्भश्च फेणिका ॥ ६ ॥ घटकः पर्पटः खाद्यं घृतपक्वं नवं त्विति । एतानि नव भक्ष्याणि राघवस्य प्रियाणि हि ॥ ७ ॥ अथवाऽन्यत्प्रवक्ष्यामि दिव्यान्ननवकं शुभम् । मोदको लड्डुको मडो वटकः फेणिका तथा ॥ ८ ॥ दरान्नमोदनः शाकं पायसं नवकं शुभम् । अन्यच्छृणुष्व भो शिष्य मन्नान्नं राघवप्रियम् ॥ ९ ॥ एकाशीतिकुडवं च गोक्षीरं तण्डुलास्तथा । सपादद्विकुडवांश्च मुद्राय सितुषांस्तथा ॥ १० ॥ कुडवस्त्वेक एवाथ मुक्तेग कुडवा नव । त्रिकुडवं मधु प्रोक्तं घृतं च कुडवद्वयम् ॥ ११ ॥ मरीचं कुडवाष्टांशमितं नारीफलं तथा । कुडवस्त्वेक एवाथ जातीपत्रिमथैत च ॥ १२ ।


यमुनाजीका आवाहन कर ॥ ८१ ॥ बाहरकी लाल परिधिमेंमसे श्वेत परिधिम भागीरथी गंगाजीका आवाहन करे ॥ ८२ ॥ रक्त परिधिम सरस्वतीजीका आवाहन करे ॥ ८३ ॥ काला परिधिमें यमुनाका आवाहन कर ॥ ८४ ॥ रमा और रामक अभय भी इसी तरह आवाहन करना चाहिए । रमारामक भद्रकी मुद्रामे ही विशेषता है । पहले रमाका आवाहन करके रामका आवाहन करना चाहिए । इस तरह आवाहन करके षोडशोपचारसे पूजन कर और बाकी बचे अन्नसे दिग्बलि दे ॥
इति रामतोभद्रदेवतास्थापनविधिः ।

श्रीरामदासने कहा - हे शिष्य ! रामचन्द्रजीका जो जो वस्तुयें प्रिय हैं, अब उन्हें बतलाता हूँ । सब महीनोंमें चैत्रका महीना रामको प्रिय है ॥ १ ॥ शुक्ल कृष्ण इन दोनों पक्षोंमें रामको शुक्लपक्ष प्रिय है। सब तिथियोंमें नवमी तिथि प्रिय है ॥ २ ॥ सूर्यवंशमें रामका जन्म हुआ था । इसलिये उन्हें रविवार विशेष प्रिय है । सब नक्षत्रोंमें उन्हें पुनर्वसु नक्षत्र प्रिय है । ३ । फूलोंमें चम्पक तथा तुलसी प्रिय हैं । नौ पुष्प रामको विशेष प्रिय हैं ॥४॥ जैसे जूही, चम्पा, मन्दार, तुलसी, वैजयन्ती, मालती, दमनक, केतकी और सिह्ली इन्ही फूलोंको एकत्र करके रामचन्द्रको अर्पित करना चाहिये । ५। उसी तरह नौ प्रकारका अन्न भी भगवान्‌को प्रिय है। वे नवों ये हैं-मोदक, लडडूुक, मण्ड, पूरनपूड़ी, बटुक, बताशापेड़ी, पापड़, खाजा घीमें बना हुआ पकवान, ये नौ भी भक्ष्य पदार्थ रामचन्द्रजीको प्रिय हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ अब दूसरे नौ प्रकारके खाद्य पदार्थ बतलाते हैं-मोदक, लड्डुक, मड, बटुक, फेणिका, भात, शाक, पर्पट और पायस ये ही नौ वस्तु हैं । हे शिष्य ! अब रामको दूसरे प्रिय अन्न बतलाते हैं ॥ ८ । ९ ॥ एकाशी कुडव गौका दूध, उतना ही चावल, सवा दो कुडव छिलका उतारी हुई मूंग ॥ १० ॥ एक कुडव चीनी तीन कुडव मधु, दो कुडव घी, एक कुडवका अष्टमांश काली मिर्च, एक कुडव नारियलकी गरी, एक कडवका अष्टमांश जावित्री, इनको मिलाकर बनाया हुआ पाक रामचन्द्रजीको प्रिय है । इसलिये लोगोंको चाहिये कि ये पदार्थ बनाकर भगवान्‌को अर्पण करें ॥ ११ ॥ १२ ॥

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६३१

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६३१

ग्राह्या मरिचमानेन नवार्थं नवभिस्त्विदम् । तोषदं रामचन्द्रस्य भक्त्या कार्यं सदा नरैः ॥१३॥
लघु नवान्नं वक्ष्यामि नैवेद्यार्थं निरंतरम् । कुडवा नव गोक्षीरं तंदुलाः कुडवस्य च ॥१४॥
चतुर्थांशमिता ग्राह्याः कुडवाष्टांशसंमिताः । ग्राह्या विनुषमुद्गाश्च कुडवार्धं सिता स्मृता ॥१५॥
घृतं मुद्रसमं ग्राह्य तावन्मानं मधु स्मृतम् । तावन्मानं श्रीफलं च मरिचं टंकसंमितम् ॥ १६॥
टंकार्धा जातिपत्रीच नवान्नं लघु कीर्तितम् । कुडवोऽर्कटकैर्मितस्टंको माषचतुष्टयम् ॥ १७॥
लघु नवान्नमेतच्च राघवाय निवेदयेत् । निरंतरं हि पूजायां राघवस्यातिहर्षदम् ॥१८॥
पनसम्बूकपिन्याश बीजपूरं च दाडिमम् । खर्जूरी नारिकेलं च कदलीफलमेव च ॥१९॥
पनसं चेति रामाय फलानि नव सर्वदा । एतान्यतिप्रियाण्यत्र पूजायां ह्यभिनिवेदयेत् ॥२०॥
कूष्मांडकं च जंबीरं नारंगं स्निग्धमञ्जकम् । जातीफलं मातुलुंगं तथा द्राक्षाफलं शुभम् ॥२१॥
उर्वारुकं तथा धात्रीफलं चैतानि वै नव । फलानि रामपूजायामुक्तानि मुनिभिः सदा ॥२२॥
नरोपचारैस्तांबूलं राघवाय निवेदयेत् । नागवल्लीः कत्तुकं च खदिरः संघ एव च ॥२३॥
जातीपत्री लवणं च जातीफलवरागके । एला चेति नवविधम्नांबूलः कीर्त्यते बुधैः ॥२४॥
नवरानोपचारॉश्च राघवाय निवेदयेत् । छत्रं सिंहासनं यान चामरं व्यजनं तथा ॥२५॥
पानतांबूलयंत्रं च पात्रं निष्ठीवनस्य च । वस्त्रकोशश्चेति राजोपचारा नव स्मृताः ॥२६॥
नवाय भोग्यवस्तूनि राघवाय निवेदयेत् । चंदनं पुष्पमालां च द्रव्यं परिमलं तथा ॥२७॥
अवतंसः फलं चापि सुगन्धं तैलमुत्तमम् । ताम्बूलं कस्तूरी चापि तथा रक्ताक्षताः शुभाः ॥२८॥
एतानि भोग्यवस्तूनि राघवाय निवेदयेत् । नवोपचाराः शय्याऽपि राघवाय समर्पयेत् ॥२९॥
पर्यङ्कस्तूलिका रम्या वितानं चोषवर्हणम् । आदर्शो दीपिको तोयपात्रं प्रावरणं शुभम् ॥३०॥
व्यजनञ्चेति शय्यायाश्चोपचारा नव स्मृताः । नव वस्त्राणि रामाय देयान्यतिमहान्ति च ॥३१॥
पीतांबरमुत्तरीय चोष्णीषं कञ्चुकं तथा । उर्णापोर्ध्वस्थितं दिव्यं तथा च कटिबंधनम् ॥३२॥

॥ १३॥ अब मैं अर्पण करने योग्य लघु नवान्न बतलाता हूँ— नौ कुडव गायका दूध, एक कुडवका चतुर्थांश चावल, कुडवका अष्टमांश बिना छिलकेकी धुली मूंग, आधा कुडव चीनी, मूंगके बराबर ही घी, उतना ही मधु, उतना ही श्रीफल, एक टंक काली मिर्च, आधा टंक जातिपत्री, ये लघु नवान्न कहलाते हैं। बारह टंकका एक कुडव होता है और चार माशेके बराबर एक टंक होता है। यह लघु नवान्न रामचन्द्रजीको अर्पण करना चाहिए। यदि निरन्तर यह नवान्न रामचन्द्रजीको अर्पण किया जाय तो भगवान् अतिशय प्रसन्न होते हैं ॥ १४-१८॥ आम, जामुन, केंथा, बीजपूर, अनार, खजूर नारियल, केला और कटहल ये नौ फल रामचन्द्रजीको अतिशय प्रिय हैं। पूजामें इन्हें भी अर्पण करना चाहिये। कूष्मंडा, नींबु, नारङ्गी, कसेरू, जायफल, बिजौरा, अंगूर ककड़ी तथा आँवला ये नौ फल रामकी पूजामें आना आवश्यक है ॥ १९-२२॥ उसी तरह नौ उपचारोंके साथ ताम्बूल भी रामचन्द्रजीको अर्पण करना चाहिये। ताम्बूलके नौ उपचार ये हैं-पान, सुपारी, खैर, चूना, जावित्री, जायफल, कपूर, केसर और इलायची। नौ राजोपचार भी रामचन्द्रजीको अर्पण करने चाहिए। जैसे-छत्र, सिंहासन, रथ, चमर, पंखा, गिलास, पानदान, मोगासदान और कपड़ेकी पिटारी, ये ही राजाओंके नौ उपचार बतलाये गये हैं। उसी प्रकार नौ भोग्य वस्तु भी रामचन्द्रजीको अर्पण करना चाहिए। ये वस्तुयें इस प्रकार जाननी चाहिये-चन्दन, फूलोंकी मालाएँ, इत्र आदि सुगन्धित द्रव्य, तरह-तरहके फल, उत्तम सुगन्धित तेल ताम्बूल, कस्तूरी और लाल अक्षत, इन भोग्य वस्तुओंको रामचन्द्रजीको अर्पण करे। इसी तरह नौ उपचारयुक्त शय्या भी देनी चाहिये ॥ २३-२९॥ पलङ्ग, गद्दा, बढ़िया चाँदनी, तकिया, शीशा, दीपक, जलपात्र, चदरा और व्यजन, ये शय्याके नौ उपचार हैं। इसी तरह अत्यन्त सुन्दर नौ कपड़े भी रामचन्द्रजीको अर्पण करे। ३० ॥ ३१ ॥ जैसे-पीताम्बर, उपरना, पगड़ी, कंचुकी, परदाके ऊपर बांधनेवाला

६३२आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

मुखशुद्ध्यनुकूलं च त्रिपुण्ड्रं हस्तयोग्यकम् । तथा प्रावरणं दिव्यं नव वस्त्राणि भो द्विज ॥३३॥ नव दिव्यालङ्कारा देयाः श्रीराघवाय हि । कुण्डले कङ्कणे माला केयूरे नूपुरे तथा ॥३४॥ पदकं कटिसूत्रं च शृङ्खला मुद्रिकेति च । एते नव त्वलङ्कारा देया रामाय भक्तितः ॥३५॥ एवं शिष्य मया प्रोक्तं नेदानि महान्ति च । मरकतान्यान्यनेकानि तदाग्रे दर्शितानि हि ॥३६॥ मुख्यान्येव पदानि हि नवकेषु मया स्मृताः । एभ्यस्त्वन्य पदान्यर्थ ये ये सन्ति महस्रशः ॥३७॥ ते सर्वे राघवाशानिभक्त्या देयास्तु पूजने । प्रत्यहं रामचन्द्रस्य त्रिकालं पूजनं नरैः ।३८। कार्यं वित्तानुसारेण न कदा कार्पण्यमाचरेत् । प्रतिपद्दिनमारभ्य यावच्च नवमीतिथिः ॥३९॥ तत्तद्विशेषतः कार्यं प्रत्यहं रामपूजनम् । विविधैर्मण्डपाद्यैश्च संपूज्य रघुनन्दनम् ॥४०॥ पारायणं तदग्रे हि कर्त्तव्यं नवभिर्दिनैः । आनन्द रामायणितं पठनीयं तु सर्वदा ॥४१॥ नवम्यां राघवं रामतीर्थे वाहनसंस्थितम् । नीत्वा मङ्गलतूर्य्याद्यैर्वाद्यैश्चेन्दुभिस्तैः ॥४२॥ अभिषेकस्तत्र कार्यो रुद्रसूक्तैः सुपुण्यदैः । तथा पुरुषसूक्तेन श्रीसूक्तं तथैव च ॥४३॥ विष्णुसूक्तादिभिः सूक्तैरभिषिच्य रघूत्तमम् । पूजनं विस्तरेणाथ कृत्वा गेहं समानयेत् । ४४। ततो हरे कीर्त्तनानि स्वयं कार्याणि वा परैः । गायकैः कर्त्तव्यानि श्रेष्ठशान्तिर्वचनान्यपि । ४५॥ ततः स्वयंप्रबोध्यैव भक्त्या विप्रप्रपूजनम् । कार्यं वै गायकानां च पूजनं विस्तरेण हि ॥४६॥ रात्रौ जागरणं कार्यं कथाभिर्गीतनृत्यकैः । दशम्यां प्रातरुत्थाय स्नात्वा संपूज्य राघवम् । ४७। मध्याह्ने रामचन्द्रस्य पूजनं ब्राह्मणेषु हि । कार्य तस्य विधानं ते वदाम्यद्य शृणुष्व तत् ॥४८॥ एकं युग्मं तु विप्रस्य विप्राष्टौ च निमन्त्रयेत् । भूमिं गृहे विलिप्योथ गोमयेनातिविस्तृताम् ॥४९॥ रङ्गवल्याश्च पद्मानि नीलपीतादिवर्णकैः । तत्र सर्वततः कृत्वा मध्ये सिंहासनं शुभम् ॥५०॥ स्थाप्य तत्र महावस्त्रांस्तन परिकल्पयेत् । अष्टोत्तरसहस्रं च रामलिङ्गात्मकं शुभम् ॥५१॥

दिव्य वस्त्र कचोरूमाल, रूमाल, अङ्गी तथा दुपट्टा ये नौ दिव्य वस्त्र श्रीरामचन्द्रजीको देना चाहिए ॥३२॥३३॥ इसी तरह नौ प्रकारके दिव्य अलङ्कार भी समर्पण करे। कुण्डल, कंकण, माला, केयूर, नूपुर, पदक, कटिसूत्र (करधन), शृङ्खला और मुंदरी, ये नौ अलङ्कार रामचन्द्रजीको भक्तिपूर्वक देने चाहिये ।३४॥ ॥३५॥ हे शिष्य ! इस तरह मैंने रामको प्रसन्न करनेवाले मणिरत्न नमक (नौ वस्तुओंका संग्रह) बतलाया । इनमें मैंने केवल मुख्य चीजोंका ही दिग्दर्शन कराया है। इनके अतिरिक्त भी हजारों पदार्थ हैं, पूजन उन्हें भी भक्तिपूर्वक अर्पण करना चाहिये। भक्तका उचित है कि प्रतिदिन रामचन्द्रजीकी त्रिकाल पूजन करे ॥ ३६-३८॥ अपनी जैसी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार खर्च भी करे। रामचन्द्रजीकी पूजामें कभी कार्पण्य तो करना ही नहीं चाहिए। प्रतिपदासे लेकर नवमी पर्यन्त प्रतिदिन विशेष पूजन करनेका विधान है। वह इस प्रकार है चित्र विचित्र मंडप बनाकर उसमें रामचन्द्रजीकी पूजा करके उनके आगे नौ दिनोंमें इस आनन्दरामायणका पारायण करे ॥ ३९-४१ ॥ नवमीको भगवान्‌को सवारीपर बिठाकर मंगलमय मुदही नगाडे आदि बाजे तथा शंख्या आदिके साथ परम पवित्र रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, श्रीसूक्त तथा विष्णुसूक्त आदिसे रामतीर्थमें रामचन्द्रजीका अभिषेक करे। इसके अनन्तर विस्तारपूर्वक पूजन करके उन्हें घरपर ले आय ॥४२-४४॥ रातको स्वयं हरिकीर्त्तन करे या और लोगोंसे करावे। तदनन्तर भक्तिपूर्वक विप्रो तथा गायकोंका पूजन करे ॥४५। ४६॥ कथा गीत तथा नृत्य आदि करता हुआ रात्रिभर जागरण करे। दशमीको सवेरे उठकर स्नान कर और रामचन्द्रजीका पूजन करके मध्याह्नके समय ब्राह्मणोंके बीचमें उनका पूजन करे। हे शिष्य ! मैं उसका विधान बतलाता हूँ सुने ॥४७॥४८॥ एक ब्राह्मणदम्पती तथा आठ अन्य ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। घरकी भूमिको गोबरसे खूब फैलावम लिपावे। फिर नील पीत आदि वर्णोंसे चारों ओर चौक पुरवाकर बीचमें शुभ सिंहासन रक्खे ॥४९॥५०॥ तदनन्तर बड़े-बड़े वस्त्रोंसे सिंहासनको

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२१

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६२१

अथवाऽष्टोत्तरशतं रामलिङ्गात्मकं शुभम् । अष्टोत्तरसहस्रं वा रामतोभद्रमुत्तमम् ॥ ५२ ॥
अयवाऽष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमुत्तमम् । सिंहासने निधायाथ रामस्यामलमुज्ज्वलम् ॥ ५३ ॥
भद्रोपरि सपत्नीकं तत्र विप्रं निवेशयेत् । पश्चिमाभिमुखे वामभागे पत्नीं निवेशयेत् ॥ ५४ ॥
सीतारामौ तु दम्पत्योरावाद्य तदनन्तरम् । तत्पृष्ठे लक्ष्मणं विप्रं चिंतयेच्च ततः परम् ॥ ५५ ॥
भरतं राममग्रे तु आवाह्य भूसुरे तथा ॥ ५६ ॥
विप्रेऽञ्जनिसुतं वापि रामस्याग्रे विचितयेत् । रामस्य वायुदिग्भागान्मुग्रीवादीन् विचितयेत् ॥ ५७ ॥
चतुष्कोणेषु विप्रेषु तत रचतमाचरेत् । नव यत्रनपूजेयं ज्ञेया श्रीराघवस्य हि । ५८ ॥
अयवा पञ्चायतनं पञ्चविप्रेषु चिंतयेत् । मर्मात् शक्तिहीनेन नरेण सर्वदा भुवि ॥ ५९ ॥
अथवा यतिनं रामस्थाने भक्त्या निवेशयेत् । पूगं कृत्वाथयीं सीतां पतिवामे निवेश्य च ॥ ६० ।
कार्यं सम्यक्पूजन च ततो गेहे सुतासिनीम् सीतां मन्वा पुनः पूज्य भोजनीया सविस्तरम् ॥ ६१ ॥
आदौ सीतारामयोः कृत्वा पूजनमुत्तमम् । ततः पूजा तु सर्वेषां कार्या नानोपचारकैः । ६२ ॥
क्रमेण लक्ष्मणादीनामुपचारैस्तु षोडशै । अथवा मह मन्त्रेण रामपूजनमाचरेत् ॥ ६३ ॥
आदाय वाह्न विप्रेषु देयमासनमुत्तमम् । ततः प्रक्षाल्य पादौ न मूर्ध्ना च पृथक् पृथक् ॥ ६४ ॥
यतिपादोदकं भिन्नं स्थापनीयं नगृत्तम । ततः पृथक् पृथगर्घ्यान् दत्त्वा मुखेन्दनादिकम् ॥ ६५ ।
ततश्चाचमनं दत्त्वा स्नानार्थं जलमुत्सृजेत् । ततो वस्त्र समर्प्याथ देयान्य भरणानि हि ॥ ६६ ॥
समर्प्य यज्ञसूत्राणि गन्धं देयं मनोहरम् । ततो रक्ताक्षता देयाः पुष्पमालास्तथाऽपराः ॥ ६७ ॥
ततो माङ्गल्यवस्तूनि ततश्छत्रं च चामरम् । व्यजनं च ततो देयं देयस्तूणीरदस्तथा ॥ ६८ ॥
देया बाणाश्च चापानि देय नि हि पृथक् पृथक् । दत्त्वा परिमलादीनि भोज्यवस्तूनि विस्तरात् ॥ ६९ ॥
धूपो देयस्तथा दीपो नैवेद्यो दीयतां ततः । अथवाऽन्यच्छर्करादि नैवेद्यार्थं समर्पयेत् ॥ ७० ॥


बैठारे। उसपर अष्टात्तरशत अथवा अष्टोत्तरसहस्र लिंगात्मक भद्र अथवा रामतोभद्र बनाकर भद्रके ऊपर विप्रदम्पतीको बिठाये, विप्रके वामभागमें पश्चिमाभिमुख उसकी स्त्री बैठे ॥ ५१-५४ ॥ तदनन्तर उसो विप्रदम्पतीमं सीतारामका आवाहन करके ब्राह्मणके पीछे लक्ष्मणका आवाहन करे ॥ ५५ ॥ ब्राह्मणके दाहिनी ओर भरतका ध्यान करे। रामचन्द्रजीके आगे उस ब्राह्मणमे ही अञ्जनीपुत्रका ध्यान करे। रामके वायव्य कोणमे सुग्रीव आदिका ध्यान करे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ फिर चारों कोनोंमें ब्राह्मणोंका पूजन कर। यह श्रीरामचन्द्रजीका नवाग्रतन पूजन है। ५८। अथवा पांच ब्राह्मणोम रामका पञ्चायतन पूजन करे। लेकिन यह विधान उसीके लिए है कि जो सामर्थ्यरहित हो ॥ ५९ ॥ अथवा रामचन्द्रजीके स्थानम यतिकी स्थापना करे। सुपारी में सीताकी कल्पना करके उसे यतिके वामभागमें रख दे। ६० ॥ तदनन्तर अच्छी तरह रामका पूजन कर। इसक बाद सोहागिन विप्रपत्नीको सीता मानकर विस्तारपूर्वक पूजन करे और भोजन करावे ॥ ६१ ॥ पहले सीता और रामचन्द्रजीका पूजन करके अन्य लोगोंका भी नाना प्रकारके उपचारोंसे पूजन करे। क्रमश लक्ष्मण आदिका षोडश उपचारोंसे पूजन करे। अथवा मन्त्रानुसार रामका पूजन करे ॥ ६२-६३ । पहले विप्रोंका आवाहन करके उत्तम आसन दे। फिर अलग-अलग उन लोगोंके पैर धोकर उनका पादोदक अलग रख दे। तदनन्तर अच्छे सुगन्ध आदिस पृथक्पृथक् अर्घ्यं आदि दे ॥ ६४-६५ । तदनन्तर आचमनके लिए जल देकर स्नानक लिए जल छोड़े। तत्पश्चात् वस्त्र प्रदान करके आभरण समर्पित करे ॥ ६६ ॥ फिर यज्ञोपवीत देकर मनोहर चन्दन दे इसके बाद लाल अक्षत एवं पुष्पमाला दे ॥ ६७ ॥ इसके पश्चात् माङ्गल्य वस्तुवें, फिर छत्र, चमर, व्यजन तथा तूणीर दे। तदनन्तर धनुष-बाण आदि देकर इत्र आदि भोग्य वस्तुओको विस्तारपूर्वक प्रदान करे ॥ ६८ । ६६ ॥ तदनन्तर धूप, दीप, नैवेद्य दे । यदि नैवेद्यके लिए कोई पक्वान्न आदि न बना सके तो उसके निमित्त शर्करा आदि प्रदान करे ॥ ७० ॥

६३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

मानाफलानि देयानि देयस्तांबूल उत्तमः दक्षिणा च ततो दत्त्वा देयो मुकुर उज्ज्वलः ॥७१॥
नीराजनं ततः कृत्वा मंत्रपुष्पाणि दीयताम् । प्रदक्षिणानमस्कारांश्च कृत्वा ततः परम् ॥७२॥
नृत्यगीतादिकं कृत्वा प्रार्थयेद्रघुनायकम् । विनियोग्य करौ पादौ राघवो संस्थितैर्नरैः ॥७३॥
वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वायव्यकोणादिषु ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥७४॥
रामो हन्त्वा दशास्यं द्विजवचनगुरुत्वेन यात्राऽश्वमेधान्
कृत्वा भुक्त्वानिभोगानवनितलगतांश्चा गृहीत्वाऽथ सीताम् ।
लब्ध्वा नानास्तुरूपांस्तास्तववनितलगतान्पार्थिवादींश्च जित्वा
कृत्वा नानोपदेशान् गनपुरनिकटे स्त्रीयलोकं जगाम ॥७५॥
नवकाण्डमयः श्लोकः पठित्वाऽयं हरेः पुरः । ततः क्षमाप्य श्रीरमं पूजां तस्मै समर्पयेत् ॥७६॥
मया साव्रते रामनवम्यां यत्प्रपूजनम् । पारायणादिकं सर्वं नवरात्रऽपि यत्कृतम् ॥७७॥
तन्मवं नेऽर्पितं त्वद्य प्रसन्नो भव मे प्रभोः नवाप्तनपूजेयं या कृता नवमीदिने ॥७८॥
नवविप्रेषु साऽप्यद्य तेऽर्पिता राम वै मया । स्वं गृहाण यथाशक्त्या कृतां तां त्वं प्रसीद मे ॥७९॥
एवं समर्प्य रामाय सकलं पूजनादिकम् । ततो भोजनयोग्यान्तान् संनिवेदयाथ भोजयेत् ॥८०॥
पुनर्दत्त्वा तु तांबूलं दक्षिणां तु विसर्जयेत् । ततः स्वयं विप्रतीर्थं गृहीत्वा वै ततः परम् ॥८१॥
यतिपादोदकं प्राश्य देवतीर्थं ततः परम् । गृहीत्वा भोजनं कार्यं सुहृन्मित्रजनैः सह ॥८२॥
समर्पितं यद्यतये तत्तथ ब्राह्मणाय हि । देय स्वगुरवे सर्वं ब्रह्मसूत्रादिकं शुभम् ॥८३॥
एवं व्रतं राघवस्य पक्षे पक्षे प्रकारयेत् । अथवा शुक्लपक्षे हि कार्यं व्रतमिदं शुभम् ॥८४॥

इसके बाद नाना प्रकारके फल, ताम्बूल, दक्षिणा, सुन्दर दर्पण, नीराजन, मन्त्रपुष्प, प्रदक्षिणा, नमस्कार आदि क्रमशः समर्पण करे । तदनन्तर नृत्य-गीत आदि करके सब लोग सामने खड़े होकर रामचन्द्रजीसे प्रार्थना करें ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ वामभागमें सीता, सामने हनुमान्जी, पीछे लक्ष्मणजी, दोनों बगल भरत और शत्रुघ्न, वायव्य आदि कोणोंमें सुग्रीव, विभीषण, युवराज अङ्गद, जाम्बवान् आदि खड़े हैं और उनके बीचमें बैठे हुए नील कमलके समान कोमल दीप्तिसम्पन्न श्याम स्वरूपधारी रामका मैं भजन करता हूँ ॥ ७४ ॥ रामने रावणको मारकर ब्राह्मणके वाक्यरूपी गौरवसे प्रेरित हो यात्रा तथा अश्वमेध आदि किये और विविध प्रकारके भोग भोगे । फिर पाताललोक जाती हुई सीताको उन्होंने पृथ्वी से वापस लिया । इसके बाद पृथ्वो-मण्डलके बड़े-बड़े राजाओंको परास्त करके हस्तिनापुरके आस-पासवाले बहुतसे देशोंको जीता । उन राजाओंकी कुमारियोंके साथ अपने पुत्रोंके ब्याह किये और अन्तमें अपने परम धामको चले गये ॥ ७५ ॥ इस नौ काण्डात्मक श्लोकको रामके सामने पढ़कर क्षमा माँगे और की हुई पूजा भगवान्को अर्पण करे ॥ ७६ ॥ साथ ही यह कहता जाय कि हे प्रभो ! मैंने इस साव्रतमें रामनवमी तथा नवरात्रमे जो पूजन पारायण आदि किया है, वह सब आपको अर्पण है । हे प्रभो ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों । रामनवमीका जो नौ विप्रामें मैने आपको नवायतन पूजा की है, वह भी आपको अर्पित है । यथाशक्ति की हुई इस पूजा को स्वीकार करके आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ७७-७९ ॥ इस तरह रामका सब पूजन आदि समर्पण करके विधिवत् उन विप्रोंको आसनपर बिठालाकर भोजन कराये ॥ ८० ॥ फिर ताम्बूल और दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे । तदनन्तर स्वयं ब्राह्मणोंके चरणोदक, यतियोंके पादोदक एवं देवताओंके चरणोंके पुनीत चरणजलसे आचमन करके नातेदारों, मित्रों तथा बान्धवोंके साथ स्वयं भोजन करे ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ तदनन्तर

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६३५


मासे मासे सर्वदैव रामोपासकमानवैः। एवं मासव्रतं प्रोक्तं राघवस्यातितोषदम् ॥८५॥
संति व्रतान्यनेकानि जगन्त्यां पुण्यदानि हि। तथाप्यनेन सदृशं न भूतं न भविष्यति ॥८६॥
व्रतानामुत्तमं चैतद्भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । अवश्यमेव कर्तव्यं रामोपासकमानवैः ।८७॥
एवं शिष्य मया प्रोक्तं व्रतानामुत्तमं व्रतम् । सविस्तारं तवाग्रे हि राघवस्यातितोषदम् ॥८८॥

विष्णुदास उवाच
श्रीरामनवमीमासव्रतस्योद्यापनं वद । कदा कार्यं कथं कार्यं गुरो कृत्वा कृपां मयि ।८९।

श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स मन्नावधानमनाः शृणु। तद्धर्मवन्मम मासनवमीव्रतमुत्तमम् । ९०।
कृत्वा चोद्यापनं कार्यं चैत्रे श्रीरामजन्मनि । नवम्यां समुपोष्यथ कर्त्तव्यमधिरामनम् ॥९१॥
गृहे वृन्दावने वापि गोष्ठे देवगृहादिषु । सम्मार्जनं गोमयेन कार्यं वा चन्दनादिभिः ॥९२॥
ततः पाषाणचूर्णैश्च नानारङ्गादिकानि हि । भुवि संलेखनीयानि नीलपीतादिवर्णकैः । ९३।
रञ्जनीयानि रम्याणि ततः पत्रादिमध्यके। पूत्राक्तरामभद्राणां मध्ये त्वेकं वरासनम् । ९४॥
लिखित्वा चित्रवर्णैश्च प्रोक्तरूपं सुगन्धेषु । तस्योपरि महान् रम्यश्चित्रवर्णश्च मंडपः । ९५॥
देयो द्वाराणि चत्वारि कार्याणि तोरणानि च । कदलीस्तम्भयुक्तानि चेक्षुदण्डयुतानि च ॥९६॥
नानाघटाकिंकिणीभिर्ध्वनितान्युज्ज्वलानि च । रम्भादर्शमंडितानि विचित्राणि शुभानि च ॥९७॥
चित्रध्वजैर्वितानैश्च मुक्ताहारैर्युतान्यपि । अथ तद्रामभद्रस्य कलशे वारिपूरिते ॥९८।
ताम्रपात्रे रामचन्द्रं नवायतनचिह्नितम्। सीतया पूजयेद्रात्रौ महोत्साहपुरःसरम् ॥९९।
नवपलामितां मूर्तिं हैमीं कृत्वा प्रपूजयेत्। सीता हैमी प्रकर्त्तव्या शुभाऽष्टपलमिता ।१००॥
राजभ्रास्ते लक्ष्मणाद्याः पृथक् पञ्चपलैः स्मृताः । अशक्तौ च तदर्धेन तदधार्धेन वै पुनः ।१०१।


यतियों तथा ब्राह्मणोंको जो कुछ दिया हो, वही अपने गुरुको भी दे ॥ ८३ ॥ इस तरह हर पक्षमें रामचन्द्र-जीका व्रत करे । अथवा दान, पक्षी मत कर सके तो केवल गुरुपूजनसे वह रामव्रत करे ॥ ८४ ॥ रामकी उपासना करनेवालोके लिए रामको प्रसन्न करनेवाला यह मासव्रत मैने बतलाया ॥ ८५ ॥ यद्यपि संसारमें बहुतसे पुण्यदायक व्रत है किन्तु भी इस व्रतके बराबर न कोई व्रत हुआ है और न होगा ॥ ८६ ॥ यह सब व्रतोमें उत्तम और भुक्ति-मुक्ति देनेवाला व्रत है। रामके उपासकोको यह व्रत अवश्य करना चाहिए ॥ ८७ ॥ हे शिष्य ! इस प्रकार रामको अत्यन्त प्रसन्न करनेवाला सब व्रतोम उत्तम व्रत मैने विस्तारपूर्वक तुम्हे कह सुनाया । ८८ ॥ विष्णुदास कहा—अब आप मुझपर कृपा करक यह बताइए कि श्रीरामनवमीके व्रतका उद्यापन कब और कैसे करना चाहिए ८९ ॥ श्रीरामदास संत कहा -हे वत्स ! तुमने बहुत ही अच्छी बात पूछी है इसे सावधान मन होकर सुनो। दो वर्ष पर्यन्त साधक। मासनवमी व्रत करना चाहिए। इसके बाद चैत्र मासमे श्रीरामजन्मके दिन इसका उद्यापन करना चाहिए ! यह कार्य नवमीको उपवास करके किया जाना चाहिए ।९०॥ ९१॥ घरम, वृन्दावन (तुलसीकी बगीची) में, गोशालामे अथवा किसी मन्दिरमें चन्दन या गोबरसे चौका दिलाकर पाषाणके चूर्ण आदिस अनेक प्रकारके नील-पीत कमल आदि बनावे ॥ ९२॥ ९३। इसके बाद पत्र आदिवर पूर्वोक्त रामभद्रांमसे किसी एक भद्रको बनवे। उसके बीचमे एक सुन्दर आसन रक्खे ॥ ९४ ॥ आसन को अनेक प्रकारके रङ्ग-बिरङ्गे रङ्गोमे रखे और उसके ऊपर अतिशय सुन्दर और चित्रवर्णांका मण्डप बनावे ॥ ९५ ॥ उसमे चार द्वार बनाकर केलेके खंभे तथा इक्षुदण्डके साथ-साथ तोरण लगावे ॥ ९६ । उसमे अनेक प्रकारके घंटा किंकिणी आदि बाज बाँधकर उसका शृंगार करे । उसे चित्र-विचित्र ध्वजा, वितान, शोभनाके द्वार आदिसं सुसज्जित करे। इसके अनन्तर रामतोभद्रके बीचमे जलपूर्ण कलशपर ताम्रका पात्र रखकर नवायतनके चिह्नसे चिह्नित सीता समेत रामका पूजन करे ॥ ९७-९९ ॥ श्री वत्स्की सुवर्णमयी ९.पन्मूर्ति बनवाना चाहिए । आठ पलकी सीतामूर्ति बनेगी ॥ १०० ॥ लक्ष्मण आदि-

६३६ | आनन्दरामायणे | [सर्ग ६

तस्याप्यर्धं तदधार्थं वित्तशाठ्यं न कारयेत् । षोडशैश्चोपचारैश्च पूजोक्ता निशि जागरः ॥१०२॥ दशम्यां प्रातरुत्थाय स्नात्वा सम्पूज्य राघवम् । राममंत्रेण हवनं कार्यं नवसहस्रकम् ॥१०३॥ तिलाद्यैः पायसाद्यैश्च नवांशेनाथ तत्स्मृतम् । तद्दशांशेन क्षीरेण तर्पणं हि प्रकामयेत् ॥१०४॥ तस्यापि च दशांशेन मार्जनं द्विजभोजनम् । कर्णमुद्रां हस्तमुद्रां वसने नवसू्त्रकम् ॥१०५॥ चित्राम्रमनुपमंगेय मुकुटं झर्झरीं तथा । कांस्यपात्रं भोजनस्य नवांशेन प्रपूरितम् ॥१०६॥ घृतपात्रं कांस्यमयं नवांशोपरि संस्थितम् । पादुके पुस्तकं दिव्यं यत्किंचिद्राघवस्य च ॥१०७॥ तांबूलं दक्षिणां चापि प्रत्येकं भूसुराय हि । अर्पयेत्सकलं चैवमेव सर्वान् समर्पयेत् ॥१०८॥ ततो गुरुं समभ्यर्च्य प्रणम्य च पुनः पुनः । तामर्चासपर्पयेन्मन्त्री गुरवे दक्षिणाम्बिताम् ॥१०९॥ ततो गुरुं प्रार्थयेच्च प्रणम्य च पुनः पुनः । मासे मासे नवम्यां तु सोद्यापनव्रतं मया ॥११०॥ यत्कृतं नव वर्षाणि तेन तुष्यतु राघवः । अग्रेऽपि यावज्जीवामि तावत्कालं करोम्यहम् ॥१११॥ व्रतानामुत्तमं चेदं तुष्ट्यर्थं राघवस्य च । गुरो त्वत्कृपया रामो मां प्रसीदतु सीतया ॥११२॥ एवं सम्प्रार्थ्य स्वीयं तं गुरुं नत्वा विसर्जयेत् । ततः स्वयं हि भुञ्जीत सुहृन्मित्रसुतादिभिः ॥११३॥ एवमुद्यापनं कृत्वा कार्यमग्रे व्रतं पुनः । मासे मासे राघवस्य न त्याज्यं सर्वथानरैः ॥११४॥ एकादशीव्रतं नित्यं यथा सङ्क्रियते नरैः । तथा मासवतं चेदं नित्यमेव स्मृतं बुधैः ॥११५॥ अशक्तेन यथाशक्त्या कार्यमुद्यापनं व्रतम् । उपोष्या नवमी शुक्ला सर्वदैव नृभिर्भुवि ॥११६॥ नवम्यां शुक्लपक्षे यो भुंक्तेऽन्नं मूढधीर्नरः । रौरवे कल्पपर्यन्तं तस्य वासः स्मृतो बुधैः ॥११७॥ एवं शिष्य त्वया यच्च पृष्टं तन्मे निवेदितम् । का नेच्छा श्रोतुमिच्छामि भो वदस्व वदामि ते ॥११८॥


की मूर्तियाँ पाँच-पाँच पल चाँदीकी बनवावे। यदि ऐसा करनेका सामर्थ्य न हो तो उसमें आधे वजनकी मूर्ति बनवाये और यदि वह भी न कर सके तो आधेके आधे वजनकी मूर्तियाँ बनवाना चाहिये, वह भी न हो सके तो उसके भी आधे वजनकी बनवाये, किन्तु कंजूसी न करे। षोडश उपचारोंसे पूजन तथा रात्रिको जागरण अवश्य करना चाहिए ॥१०१-१०२॥ दशमीको सवेरे उठकर स्नान और रामका पूजन करके नौ हजार हवन करे ॥१०३॥ हवन तिलसे, खीरसे अथवा नवांशसे करना उचित है। तदनन्तर हवनके दशांश दूधसे तर्पण करे, उसका भी दशांश मार्जन करे और मार्जनका भी दशांश ब्राह्मणोंको भोजन करावे। इसके अनन्तर हस्तमुद्रा तथा कर्णमुद्राके साथ वस्त्र, यज्ञोपवीत, चित्र सन, उत्तरीय वस्त्र, मुकुट, झारी, भोजन-के लिए नवांशसे पूर्ण कांस्यपात्र, घृतपात्र, इन सबोंके मध्य कांस्यमय पात्रमें नवांशप्रपर रखकर चरणपादुका, दिव्य आनन्दरामायणकी पुस्तक, ताम्बूल, दक्षिणा व मन्त्र बहुमूल्य प्रत्येक ब्राह्मणोंको दे ॥१०४-१०७॥ तदनन्तर गुरुका पूजन करके उसे एक गौ दे और दक्षिणा समेत वह पूजनसामग्री गुरुको अर्पण करे। १०८॥१०९॥ इसके बाद गुरुको बारम्बार प्रणाम करके कहे- हे गुरो ! महिने महिने उद्यापनके साथ मैंने जो नौ वर्षपर्य्यन्त रामव्रत किया है। उससे श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्न हों। आगे भी जब तक जीवित रहूँगा, बराबर यह उत्तम व्रत भगवान्‌को प्रसन्न करनेके लिए करता रहूँगा। हे गुरो ! आपकी कृपासे मुझपर सीता और राम प्रसन्न हों ॥११०-११२॥ इस प्रकार प्रार्थना करके बाद अपने गुरुजीको प्रणाम करके उनका विदा करे। इसके बाद सम्बन्धियों, मित्रों और पुत्रादिकोंके साथ स्वयं भी भोजन करे॥ ११३॥ इस तरह उद्यापन करके महिने-महीने यह व्रत करता रहे, त्यागे नहीं ॥११४॥ जिस तरह लोग एकादशीका व्रत करते हैं। उसी तरह यह मासव्रत भी सदा करते रहना चाहिए ॥११५॥ यदि विशेष सामर्थ्य न हो तो अपनी शक्तिके अनुसार ही इसका उद्यापन करे। संसारके लोगोंको चाहिए कि सदा शुक्लपक्षकी नवमीको अवश्य उपवास किया करें ॥११६॥ जो मूर्ख मनुष्य शुक्लपक्षकी नवमीको अन्न खाता है, उसे एक कल्पतक रौरव नरकमें निवास करना पड़ता है। यह बात कितने ही विद्वानोंकी कही हुई है। ११७। फिर मंद्रभनें कहा-हे शिष्य ! तुमने जो पूछा, वह मैंने तुमसे कहा । अब और क्या सुनना चाहते हो, यह बतलाओ तो मैं कहूँ ॥११८॥

सर्गः ६] मनोहरकाण्डम् १३७

विष्णुदास उवाच गुरो त्वया राघवस्य श्रीरामनवमीव्रतम् । मये मासे प्रकर्तव्यमिति प्रोक्तं ममाग्रतः ॥११९॥
केनाचरितं पूर्वं सिद्धिलब्धाऽथ केन हि । तन्ममं विस्तरेणैव वद कृत्वा कृपां मयि ॥१२०।
अन्यच्च प्रष्टुमिच्छामि तन्मे मां वक्तुमर्हसि । अशक्तेन नरेणेदं व्रतं कार्यं कथं महत् ॥१२१।

श्रीरामदास उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । आसीत्पुरा द्विजः कश्चित्केशाले राहव-परः ॥१२२॥
नाभूत्तस्य विवाहोऽत्र निर्धनस्य जनस्य च । नासीद्गृहं गद्हमपि न माता न पिताऽपि चः ॥१२३॥
हस्त्यैको नियमश्चासीद्दरिद्रस्य च तं शृणु । नित्यं प्रातः समुत्थाय कृतमालोनदीजले ॥१२४॥
स्नात्वा नदीसिकतायां सिकतावेदिका नव । कृत्वा तत्र जनकजासहितं रघुनन्दनम् ॥१२५॥
पत्रनिर्मित श्रीरामलिंगाम्रककरणमने । मध्यमयां वेदिकाया संस्थाप्य धातुनिर्मितम् ॥१२६॥
अष्टदिक्षु वेदिकासु मरुत्वदासने पृथक् । सजननी राघवस्य लक्ष्मणादीन्म्यवेशयत् ॥१२७।
ततः स राघवं प्राह राम राजीवलोचनम् । कर्तुमाशौचकं कम गन्तुमर्हसि सत्वरम् ॥१२८।
इत्युक्त्वा तं स्वयं पृष्ठे निवेश्य रघुनन्दनम् । कियद्दूरं रहा वृक्षखण्डे गत्वा द्विजोत्तमः ॥१२९॥
शर्वं तृणभुवि स्थाप्य तदग्रे पात्रमुत्तमम् । सजलमृत्तिकां चापि संस्थाप्य व जवन हि ॥१३०॥
किंचिद्दूरं स्वयं गत्वा स्थितवान् स कियत्क्षणम् गत्वाऽन्तिकं पुनर्हस्तौ पादमक्षालनादिकम् ॥१३१॥
मत्तोन्मृत्तिकाशौचं च तस्य स्वकरेण हि । दत्त्वाऽन्यपत्रतोयेन रामस्याचमनं ततः ॥१३२॥
दन्तकाष्ठेन तद्वान्मर्शोध्य भक्तिपूर्वकम् । गण्डूषार्थं जलं दत्त्वा कवोष्णं शीतलं पुनः ॥१३३॥
समप्र्यौचमनार्थं स वस्त्रेणास्यं प्रमाष्ट्जयन् । संमार्ज्य हस्तौ पादौ च गात्रस्य वामया द्विजः ॥१३४॥
त विगृह्य पुनः पृष्ठे महीसूनुः शनैः शनैः । सिकतावेदिकायां च पूर्वस्थाने न्यवेशयत् ॥१३५॥
एवं सीतां लक्ष्मणं च भरतं लक्षणातजम् । सुग्रीवादीन् पृथक् नीत्वाऽवश्यकार्यान्यकारयत् ॥१३६॥

विष्णुदासने कहा-हे गुरो अभी आपने मुझसे कहा है कि चैत्रमास में श्रीरामनवमी व्रत करना चाहिए ॥११९॥ इस व्रतको किसने किया था और इसके प्रभावसे किसको सिद्धि प्राप्त हुई थी कृपा करके यह विस्तारपूर्वक हमे बतलाइये ॥१२०॥ हाँ, एक बात मैं आपसे और पूछना चाहता हूँ। वह यह कि जो प्राणी अशक्त है वह यह व्रत कैसे करे ? ॥१२१॥ श्रीरामदासने कहा हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान मनसे सुनो । एक समय रत्न (केरळ) देशमे राघका भक्तिमे तत्पर एक ब्राह्मण रहा करता था ॥ १२२ ॥ दीनताके कारण न उसका ब्याह हुआ था, न घर द्वार था और न माता-पिता ही थे । १२३ । किन्तु उस दरिद्रका एक नियम था, उसे सुनो। वह प्रतिदिन सवेरे उठकर तो एक सुन्दर माला बनाता। फिर नदीमें स्नान करके बालूमें ही वेदियां बनाकर उसपर पत्र निर्माण करके श्रीरामलिंगाम्रके सम्दर मध्यवेदमें धातु-निर्मित रामकी प्रतिमा बैठाकर रघुवंगके मसननीके आगे और राम लक्ष्मण आदिको बिठलाता था ॥१२४। १२५॥ ।। १२६ ।। १२७ । इसके बाद राजीवलोचन रामसे कहता- हे राम ! मैं आपका पूजन करूंगा, इसलिए कृपा करके पधारिए ॥ १२८ ॥ ऐसा कहकर रामको अपनी पीठपर लादता और कुछ दूर एकान्तकी झाड़ियों-में ले जाकर किसी घास उगी हुई जगहपर बिठलाता । उनके आगे जलसे भरा हुआ उत्तम पात्र और मृत्तिका रखकर स्वयं वहांसे कुछ दूरीपर जाकर बैठता और थोड़ी देर बाद लौटकर आता तो अपने हाथोंसे उनका पादप्रक्षालन और मृत्तिकाशुद्धि आदिकराता । फिर एक दूसरे पत्रके द्वारा जल देकर रामको कुल्ले कराता था ॥ १२९-१३२ ॥ तदनन्तर काष्ठकी दातूनसे उनके दाँत माँजकर पहले कुछ गरम और बादमें शीतल जलसे कुल्ले करवाता था । इसके बाद तौलियेसे उनके मुंह आदि पोंछकर हाथपैर आदि पोंछता और फिर अपनी पीठपर लेकर धीरे-धीरे सिकताकी बनी हुई वेदिकापर बिठाल दिया करता था ॥ १३३-१३५ ॥ इसी तरह सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सुग्रीव आदिको पृथक्-पृथक्

६३८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

ततः पृथक्चोद्वर्त्तनं तैलादङ्गान्निधाय सः। नीरेणस्नापयत् सर्वान् कृत्वा चोष्णंतान्यपि ॥१३७॥ दत्तौ भुजादित्रणे वस्त्रार्थं च पृथग्ददौ। ततः पत्रैः फलैः पुष्पैर्लब्धैःस्नानार्च्चनक्रमात् ॥१३८॥ पचः स स्थूलव्रीहीणां कुर्वोदनमनुत्तमम्। स्नात्वा माध्याह्निकं कृत्वा पुनःसम्पूज्य राघवम् ॥१३९॥ दत्त्वौदनस्य नैवेद्यं वैश्वदेवं विधाय च। किञ्चिद्भिक्षामतिथये दत्त्वान्नाण्डजडिकाम्॥१४०॥ दत्त्वा पृथक्पृथक् विप्रश्चक्रे रामाज्ञयाऽशनम्। ततो रामं पुनः पृष्ठे समारोहयददरात् ॥१४१॥ ततः सीतां ततः सर्वान् लक्ष्मणादीन्क्रमेण हि। पूजोपकरणं सर्वं पेटिकायां विधाय सः ॥१४२॥ कृत्वा तां पेटिकां पृष्ठे जगामाथ शनैःशनैः। स वनागमोपवनं गत्वा रामं वचोऽब्रवीत् ॥१४३॥ राम राजीवपत्राक्ष वनागस्रादिकौतुकम्। जानकीसहितः पश्य नानांडजम्गादिकान् ॥१४४॥ ततो ययौ ग्रामहट्टे दर्शयन्कौतुकं विभुम्। संमर्दं ताडयामास मार्गार्थं यान् स यष्टिना॥१४५॥ तेऽपि तत्कौतुकाविष्टा जनाः कोपं न मेनिरे। एवं नाना कौतुकानि दर्शयामास राघवम् ॥१४६॥ ततः शून्ये तृणगृहे रामं तानवतार्य च। काष्ठनिर्मितपर्यङ्के कारयामास निद्रितान् ॥१४७॥ ततो देशाड्ढमध्ये गत्वा स ब्राह्मणोत्तमः। याचया तण्डुलान् तैलं घृतं शाकं फलानि च ॥१४८॥ नागवल्लीदलादीनि कस्तूरीं कुङ्कुमादिकम्। लब्ध्वा तामग्रय किञ्चिद्द्रव्यं समानिकं ययौ ॥१४९॥ तदुग्रमरामिन् सर्व ये ये हट्टे स्थिता जनाः। स्वस्नानान्न्यवमत्वत्तस्तस्मै द्विजोत्तमम् ॥१५०॥ भारामनिष्ठं च दृष्ट्वा ददुस्तद्याचितं मुदा। विप्रः शून्यगृहे रामं रामप्रयं दीपमुत्तमम् ॥१५१॥ प्रज्वाल्योगारतिकं कृत्वा गन्धाद्यैः परिपूज्य च। वीजयामास रामादीन् पल्लवेन मुदान्वितः ॥१५२। ततः स्तुत्वा मुहुर्जप्त्वा कृत्वा चापि प्रदक्षिणाः। चकार कीर्त्तनं वश्यमार्थः सन्मनुभिर्द्विजः ॥१५३॥

से जाकर शौचाविधि पूर्ण किया करता था । १३६॥ तदनन्तर राम सीता आदिक शरीरमे तेल लगाकर वोट गरम जलसे स्नान करवाता । तदनन्तर भाजपत्र आदिके पत्ते कपड़ेके लिए प्रदान करता और पत्र, फल, पुष्प आदि जो कुछ मिल जाता, उससे क्रमशः उनका पूजन किया करता था ॥ १३७॥ १३८ ॥ फिर मोटे चावलका उत्तम भात बनाता और स्नान तथा मध्याह्नकालका संध्या आदि क्रियायें कर लेनेके बाद रघुनाथजीकी पूजा करता और बलिवैश्वदेव करके वह भातका भाग उनके सामने रखता था । तदनन्तर उसमेंसे कुछ भक्तिदायक भिक्षार्थ, कुछ मछलियां और पक्षियोंके लिए कुछ शौचो तथा चींटी आदिके लिए निकालकर रामकी आज्ञा पा मानकर स्वयं भोजन किया करता था । तदनन्तर फिर रामको आदरपूर्वक पीठपर लादकर क्रमशः सीता-लक्ष्मण आदिको तथा पूजनकी सामग्री पेटामें भरकर पटा बगलमे दबाता और सबको पीठपर बैठाकर यहाँसे चलता था । इसके बाद किसी सुन्दर बगीचामें पहुंचकर रामसे कहता -हे राजीवलोचन राम ! सीताके साथ आप इस बगीचेका तथा बगीचेमें रहनेवाले पशु-पक्षियोंका अवलोकन करिए ॥ १३९-१४४॥ इसके बाद वह गाँववाले बाजारमें जाता और मदन भगवान्को वहांके कौतुक दिखाता था। उस समय भीड़मे आवानके लिए रास्ता बनाते समय वह कियाका डण्डेसे मार भी देता तो कोई बुरा नहीं मानता था इस तरह वह नित्य रामचन्द्रजीको नाना प्रकारके कौतुक दिखाया करता था ॥ १४५ ॥ १४६ ॥ इसके बाद वह सूनी तृणशालामें ले जाकर उन लोगोको उतारता और काठकी खटाईपर सुला दिया करता था ॥ १४७ ॥ तदनन्तर तुरन्त वह बाजारमें जाता और चावल, तेल, घी, साग, फल, फूल, पान, सुपारी, कुमकूम तथा कुछ पैसे माँगकर अपन रामके पास लौट आया करता था ॥ १४८ ॥ १४९॥ उस ग्राममें रहनेवाले अनेक प्रकारके व्यवसायोप लगे हुए लोग उसे अद्वितीय रामभक्त समझकर वह जो कुछ माँगता, सो दे दिया करते थे । विप्र सूने घरमें पहुंचकर रामके आगे उत्तम दीपक जलाता, फिर आरती उतारता और धूप, दीप, गन्ध आदिस उनकी पूजा करके किसी पल्लव आदिकी पंखा हिला करता था ।। १५०-१५२ ।। तत्पश्चात वह रामको स्तुति, जप तथा प्रदक्षिणा करके आग कह आनवाले मंत्रा द्वारा हरिकीर्त्तन किया करता था।

सर्गः ३] मनोहरकाण्डम् ६३९


ततस्तु याचितत्वेनैव वस्तूनि मिश्रितानि हि । पृथक्कृत्वा तु सर्वेषां त्रीन् भागांश्च चकार सः ॥१५४॥
द्वौ भागौ स स्वनिकटे स्थाप्यैकं भागमुत्तमम् । मित्रगेहे न्यासभूतं नवम्यर्थं चकार सः ॥१५५॥
ततः स्वयं द्वारमध्ये चकार शयनं द्विजः । पुनः प्रभाते चोत्थायाचम्य गीतादिभिः प्रभुम् ॥१५६॥
तालशब्दैः प्रबोध्यैाथ तान्पृष्ठे स्थाप्य पूर्ववत् । नदीतीरं ययौ विप्रः पूजयामास पूर्ववत् ॥१५७॥
एवं नित्यपूजनं च चकारादृतमानसः । नवम्यां च विशेषेण पूजयित्वाऽथ राघवम् ॥१५८॥
स्वयं चापोषणं कृत्वा स्वयं चक्रे सुकीर्तनम् । रात्रौ जागरण चापि राघवं पूज्य वै पुनः ॥१५९॥
चकार कीर्तनेनाथ नर्तनाद्यैः स्वयं कृतैः । ततः प्रभाते श्रीरामं दशम्यां परिपूज्य च ॥१६०॥
प्रतिपद्दिनमारभ्य नवरात्रेऽप्यथंकृतम् । आनन्दरामचरितपारायणमनुत्तमम् ॥१६१॥
तत्सम्माप्य पूजयित्वा पुस्तकं ब्राह्मणांस्त्वथ । निमंत्रितवान् समाहूय तेष्वेवैकं सपत्नीकम् ॥१६२॥
द्विजमाकारयामास ततः संचिततंदुलाः । मित्रगेहे न्यासभूतांस्तेषां कुर्वोदनं शुभम् ॥१६३॥
यथा संचितशाकादि तथा लब्धानि यानि सः । तानि सर्वाणि संस्कृत्य वराम्लीदीनि चाकरोत् ॥१६४॥
बालुकावेदिकायां वै मध्ये पत्नीयुतं द्विजम् । अष्टकोणेषु विप्रांस्तान्ष्ट अद्देश्य वै क्रमात् । १६५॥
षोडशैरुपचारैस्तान पूजयामास भक्तितः । रम्भादलेषु च ततो विस्तीर्णेषु द्विजोत्तमः ॥१६६॥
चकार तैः कृतैरन्नैः स मुदा परिवेषणम् । तदन्ने भोजने चक्रुस्तद्भक्त्याऽतिमुदान्विताः ॥१६७॥
ततो दत्त्वा सुताम्बूलं दक्षिणां तान् प्रणम्य च । विसर्जयामास विप्रांस्तांश्चक्रेऽशने द्विजः ॥१६८॥
एवं विप्रो मसि मासि नवायतनपूजनम् । नवम्याः पारणायाश्च दिवसे दशमीदिने ॥१६९॥
चकार नवनिप्रैस्तु यात्रो कृत्वाऽपि भक्तितः । एवं गतानि वर्षाणि नव तस्य द्विजन्मनः ॥१७०॥
एकदा श्रावणे मासि तद्ग्रामे सेनया नृपः । कार्थदद्यौ तदा विप्रः स्वस्थले निशि निद्रितः ॥१७१॥


था । कुछ देर बाद उन माँगकर लायी हुई वस्तुओंका तीन भाग करके दो भाग तो अपने पास रख लेता, बाकी एक भाग अपने निकटवर्ती मित्रके यहाँ नवमीके उत्सवके लिय धरोहरके तौरपर रख आया करता था । १५३-१५५ ॥ इन सब नित्य नियमोंसे निवटकर वह द्वारपर शयन करता और फिर सबेरे उठकर गीतापाठ आदिसे भगवान्‌की स्तुति करता हुआ ताली बजाकर राम आदिको जगाता और नित्य-नियमके अनुसार फिर उनकी अपना कंठपर लादकर नदीके तटपर पहुँच जाया करता और पूर्वोक्त विधिसे पूजन करता था ॥ १५६ ॥ १५७ ॥ इस तरह आदर भरे मनसे वह नित्य पूजन किया करता था किन्तु नवमीको उपवास करके विशेष उपकरणोंके साथ पूजन करके भली प्रकार कीर्तन और रात्रिके समय जागरण करता था ॥ १५८ ॥ १५९ ॥ फिर दशमीके दिन रामका पूजन करके प्रतिपदासे लेकर नवरात्र पर्यन्त आनन्दरामायणका पारायण करता था ॥ १६० ॥ उसे समाप्त करके नौ ब्राह्मणोंका पूजन करता था । तदनन्तर एक ब्राह्मणदम्पती को बुलाकर मित्रके घरमें इकट्ठा किये हुए तण्डुलसे बढ़िया भात बनाकर जो कुछ शाक आदि एकत्र हुआ उस भी भली भांति बना करके अच्छी तरह बालुकाकी बना हुई वेदीपर बीचमें उस सपत्नीक ब्राह्मणको बिठलाता और कोनोंमें उन आठ विप्रोंको बिठालकर षोडश उपचारोंसे भक्तिपूर्वक उनका पूजन करता था । तदनन्तर केलेके पत्तोंको उनके आगे बिछाकर उन बने हुए अन्नोंको बड़ी प्रसन्नताके साथ परोसता था और वे ब्राह्मण उसकी भक्तिसे गद्गद होकर बड़े प्रेमसे भोजन करते थे ॥ १६१-१६७ ॥ इसके बाद बढ़िया पान तथा दक्षिणा देकर उन ब्राह्मणोंको बिदा करता । तब स्वयं भी भोजन करता था । १६८ ॥ इस तरह वह ब्राह्मण प्रतिमासकी नवमी तथा दूसरे पारणवान दिन नौ ब्राह्मणोंमें नवायतनका पूजन किया करता था ॥ १६९ ॥ इस तरह उस ब्राह्मणके नौ वर्ष बीत गये ॥ १७० ॥ एक बार श्रावणके महीनेमें उसके यहाँ एक बड़ी सेना अपने साथ लिये एक राजा आ पहुँचा, किन्तु ब्राह्मण रात्रिके समय अपने घरमें पड़ा सो रहा था ॥ १७१ ॥

४१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

एतस्मिन्नन्तरे वृष्टिर्पीडिता नृपसेवकाः। ग्रामे गेहानि विविशुः सुन्योगेद्ययुर्दश ॥१७२॥
अश्वारूढाः सद्यआस्ते द्वारमध्ये द्विजोत्तमम्। दृष्ट्वा विनिद्रितं प्रोचुर्द्विजोत्तिष्ठ जवेन हि ॥१७३॥
मार्गं देहि वयं दृष्ट्या पीडिताः स्मश्चिरं बहिः। गुल्मभेदैऽत्रस्यास्याम सुसुखाश्वाः ससेवकाः ॥१७४॥
तत्तेषां वचनं श्रुत्वा सभ्रयेण द्विजोऽब्रवीत्। रामचन्द्रः सीतयात्र निद्रितोऽस्ति स्ववंगुभिः ॥१७५॥
न वर्तेतेऽत्र युष्माकं स्थलं मन्यं वचो मम। गच्छध्वं नगरे नानास्थलान्यन्यानि मन्ति हि ॥१७६॥
तस्यस्य वचनं श्रुत्वा राजदूताः पुनद्विजम्। प्रोचुस्ते यद्यस्ति श्रीरामः सोऽपि निर्यातु वै बहिः ॥१७७॥
सीतया बंधुभिर्युक्तैः स्थलं नो देहि भो द्विज। पुनराह द्विजस्तान् स कथं रामं विनिद्रितम् ॥१७८॥
प्रबुद्धं वै करोम्यद्य निशायं राजसेवकाः। युष्म कं प्रार्थना त्वद्य क्रियते वै मया मुहुः ॥१७९॥
प्रणम्य विधिरूय गच्छध्वं वै स्थलांतरम्। ततस्तन्निग्रहं दृष्ट्वा तेऽतिवृष्ट्या प्रपीडिताः ॥१८०॥
तं विप्रं ताडयांबभूवुस्तदा प्राह द्विजोत्तमः। रामं बहिः करोग्यद्य तिष्ठध्वं राजसेवकाः ॥१८१॥
इत्युक्त्वाऽऽश्रम्य श्रीरामं भूसुरो वाक्यमब्रवीत्। रामोत्तिष्ठ बर्हिर्दृष्टाः स्थिताः सन्त्यश्वसंस्थिताः ॥१८२॥
तेषां दस्तु स्थलं देहि वय पाभो बर्हिनिशि। इत्युक्त्वा निजपृष्ठे गानारोहयन्म पूर्ववत् ॥१८३॥
सतः कृत्वा महाराशं वस्त्राटीनां द्विजोत्तमः। घृत्वा कक्षे तोयकुंभं ध्रुत्वा वामकरेण सः ॥१८४॥
यष्टिं धृत्वा सव्यहस्ते शनैर्द्वाराद्बहिर्ययौ। ते द्विजं तादृशं दृष्ट्वा भ्रांतं त मेनिर खलाः ॥१८५॥
ततो दृष्ट्वाऽतिवृष्टिं स गेहाप्राधा बहिर्दिनः। नश्रीमूस्तदा सथ्र्यो गेहे मविविशुः खलाः ॥१८६॥
ततोऽर्धनथमितो विप्रश्चिंतयामास चेतसि। पुराणे वायुपुत्रस्य मया सारं श्रुतं बहु ॥१८७॥
सन्सं तु मृषा तद्य किमन्पत्र प्रयोजनम्। इनि निश्चित्य विप्रः म क्रोधेन महता युतः ॥१८८॥
शीघ्रं घटं भुवि स्थाप्य वामहस्तेन मारुतेः। पुच्छं ध्रुत्वा क्षिपिपक्षमाकाशे वेगवत्तरः ॥१८९॥

इसी समय बरसातसे सताय हुए कुछ राजसेवक ब्राह्मणका घरको खाली समझकर द्वारपर पहुंचे ॥ १७२ ॥ वे समस्त सेवक घोड़पर सवार थे। द्वारपर पहुंचत ही ब्राह्मणको जगाते हुए उन्होंने कहा-हे ब्राह्मण ! जल्दी उठो, मुझ जगह दो। मैं बड़ी देरसे भींग रहा हूँ। इस धूप मग्न में अपने सेवकरे मौर घाड़ोके सत्य रहूंगा ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ इस प्रकार उनका बात सुनकर भयदास्रैहक सच ब्राह्मणने कहा कि इस घरमें रामचन्द्रजी अपने बन्धुओंके साथ सो रहे हैं। यहाँ आप लोगक लिए जगह खाली नहीं है। मेरी इस बातको सच मानिएगा। नगरम चले जाइए। वहाँ आप लोगांको बहुत जगहें मिल जायेंगी ॥ १७५ ॥ इस प्रकार ब्राह्मणके वचन सुनकर मिपदूतोंने कहा कि यदि इस वक्त राम हैं तो उन्हे भी बाहर निकाल दो मौर हम लगाको ठहरनेके लिये जगह खाली कर दी। ब्राह्मणन कहा-हे राजसेवक सच कि राम सो रहे हैं तो उन्हें कैसे जगाऊं। मैं आप लोगंसि प्राथना करता हूँ कि दूसरी जगह चले जाइए। इस प्रकार ब्राह्मणका हठ देखकर उन वृष्टिपीडित राजसेवकोंने उसे मारा। ब्राह्मणने कहा-अच्छा, हे राजसेवको। ठहरिए, मैं अभी रामचन्द्रजीको बाहर किये देता हूँ । १७६-१८१ ॥ ऐसा कहकर उसने भाचमन किया और रामके पास जाकर कहा-हे राम ! उठिए। बाहर वे दुष्ट घुड़सवार आए हैं। आप उनको रहनेक लिए यह जगह खाली कर दीजिए, हमलोग रात्रोसत कहा दूसरे स्थानपर चले चले। ऐसा कहकर ब्राह्मणने रोजकी तरह उनको अपनी पीठपर लादा । १८२ ॥ १८३ ॥ इसके बाद उसने वस्त्रोंकी एक बड़ी गठरी बनाकर कांखमे दवाई, पानीका घड़ा बायें हाथमें लिया और दाहिने हाथमे छड़ी लेकर धीरे धीरे बाहर निकला। इस तरह संभागे करके जाते हुए ब्राह्मणको देखकर उन सिपाहियोंने समझा कि यह कोई पागल है ॥ १८४ ॥ १८५ ॥ विप्र बाहर निकला त देखा कि बड़े जोरोंमें दृष्टि हो रही है। ऐसी अवम्याम वह ब्राह्मण झुककर बारजके नीचे खड़ा हो गया और सिपाही घरमें घुस गये । १८६ ॥ अरे-गये जब वह गया होगय ही मन सोचने लगा कि मैंने तो पुराणोंमे सुना था कि हनुमान्जीमें बड़ा बल है ॥ १८७॥ लेकिन वे सब बातें झूठी हैं। ऐसा सोरकर उसने छड़ी दीवारसे सँटाकर खड़ी कर दी, बायें हाथके घड़ेका

सर्गः ६ ]

सर्गः ६ ] मनोहराकाण्डम् ६४१


तदा सा मारुतेर्धातुमयी मूर्तिः शुभावहा। गत्वाऽऽकाशे गर्जनां वै चकारातिभयंकराम्॥१९०॥ तां गर्जनां महावीरा ग्रामस्याथ बहिः स्थिताः। श्रुत्वाऽतिभयसन्त्रस्ता मृताः सर्वे क्षणेन हि॥१९१॥ अश्वा नागा वृषाश्चाथ मृताः सर्वे तदा क्षणात्। सर्वद्रव्यमये वह्नेवाऽपि परं पुरुषसञ्चितम् ॥१९२॥ पुत्रगर्भाश्च नारीणां सर्वे प्रापुः क्षयं तदा। तदा स पुरुषस्त्वेको न मृतो ब्राह्मणोत्तमः॥१९३॥ कृपया रामचन्द्रस्य मारुतेः कृपयाऽपि च। ततः प्रभाते ता नार्यः सर्वास्त्वपुरुषान्वितान्॥१९४॥ दृष्ट्वाऽतिविस्मयं प्रापुर्नाशनं स्वप्रभो बहिः। तदा विप्रं जीवितं तं दृष्ट्वाऽङ्केऽपि मारुतिम् ॥१९५॥ इतितं विस्मयाविष्टाः पप्रच्छुस्तं द्विजोत्तमम्। ततः स सकलं वृत्तं नारीः सभाषयतदा ॥१९६॥ ततस्ताः प्रार्थयित्वा तं चक्रुः स्त्रीयुगपाधिपम्। सोऽपि रामानुज्ञाया राज्यं चकार तन्पुरस्य च ॥१९७॥ पुरस्थितानां नारीणां स एवामान्यतितदा। तन्मारुतेर्गर्जनं हि काले काले तु पूर्ववत् ॥१९८॥ अद्यापि श्रूयते तस्मिन्नगरे घनशन्दवत्। तच्छ्रुत्वा पुत्रगर्भाश्च स्रवन्तीति हि योषिताम्॥१९९॥ स्त्रियः सहस्रशश्चासन् पुरुषस्त्वेक एव सः। तद्राज्यं तन्महीराड्यं कथ्यते मानवोत्तमैः॥२००॥ ततः कालान्तरेणैव स विप्रश्च मृतो यदा। तदा स्वपूर्वपुण्येन विष्णोः सायुज्यमाप सः॥२०१॥ ततस्ताभिस्तु नारीभिः कश्चित्पार्थः समागतः। स एव क्रियते भर्ता न न ता मोचयति हि॥२०२॥ ज्ञात्वा तं गर्जनाकालं पुरुषान्नित्ररेषु हि। गोपयित्वा दुन्दुभीनां शंखानां निःस्वनादिभिः॥२०३॥ न श्रावयति तेषां तं ध्वनिं मारुतसम्भवाम्। अतिक्रान्तेऽथ तत्काले तान्पुनर्जीवितान्विति॥२०४॥ मत्वा नानोन्मदैः हृद्य तंर्भास ता भर्जति हि। नातः तद्यप्रभ्यते राज्यं सदैव द्विजसत्तम ॥२०५॥ स्त्रीणामेव महोत्पत्तिर्जायते पुरुषस्य न। तद्राज्यनिकटस्था ये देशास्तेष्वपि भो द्विज॥२०६॥


बगीचेमें रख दिया और बायें हाथसे हनुमानजीकी पूंछ पकड़कर बड़े क्रोध और बैरके साथ आकाशमें उछालकर फेंका ॥ १८८ ॥ १८९ ॥ हनुमान्जीकी वह धातुमयी मूर्ति आकाशमे पहुंचकर बड़े जोरसे गरजी ॥ १९० ॥ वह भीषण गर्जना उन सिपाहियों, दीवानों तथा बाह्रवालोंको भी सुनाई दी। उसे सुनते ही सब घबड़ा-घबड़ाकर मर गए । उस गर्जनसे ही हाथी और बैल आदि पुरुषनामधारी जितने जीव थे उनमेंसे उस ब्राह्मणके सिवाय और कोई नहीं बचा। यहाँ तक कि स्त्रियोंके गर्भमें जो बच्चे थे, वे भी मर गये। किन्तु श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और हनुमानजीकी दयासे वह ब्राह्मण ज्योंका त्यों खड़ा रह गया । सबेरा हुआ तो उन नारियोंने, जिनके पति गतका मर गए व अपने स्वामीको मृत देखा ता बड़ी चक-शायीं। तदनन्तर जब उन्होंने उस ब्राह्मणकें जीवित तथा हनुमान्जीकी मूर्ति कीअङ्कमे पड़ी देखी तो उस ब्राह्मणसे वे सब पूछने लगीं। ब्राह्मणने उन स्त्रियोंको रात्रिका सारा हाल कह सुनाया । १९१ १९६ ॥ इसके अनन्तर उन स्त्रियोंने प्रार्थना करके ब्राह्मणका उस नगरीका राजा बना दिया। रामचन्द्रजीकी आज्ञासे वह विप्र वहाँका राज करने लगा ॥ १९७॥ उस समय उस नगरीकी सब स्त्रियोंका वही पति था। हनुमान्जीकी वह गर्जना कभी-कभी त्रिशशूल अशनिजनके समान अब भी सुनाई पड़ जाया करती है। उस सुनकर जिन स्त्रियोंके उदरमें पुत्र रहता है, उनका गर्भ गिर जाया करता है ॥ १९८। १९९॥ इस विप्रके राम हजारों स्त्रियां थी और उनके बीचमे वह अकेला पुरुष था। तर्षीस लोगोने उसे स्त्रीराज्य कहना आरम्भ कर दिया। कुछ दिनो बाद जब उस विप्रक मृत्यु हुई तो अपने पूर्वार्जित पुण्यके प्रभावसे उसे विष्णुके सायुज्य मुक्ति मिली ॥२००॥॥२०१॥ इसके बाद जो कोई रही पुरुष मिल जाता, उस ही वे स्त्रियां अपना रति बन लिया करती थी और उसे किसी तरह नही छोडता थी ॥२०३॥ यदि कभी हनुमान्जीका गर्जनका समय आ जाता तो वे स्त्रियां उस पुरुषको बिरमे लिखादिया करतीं जिसमें उसे वह गर्जना न सुन पड़े इसलिए नखारे शंख आदि बाजे बजाने लगती थीं । जब वह समय कुशलपूर्वक बीत जाता तो नारियां अपने पतिमीको पुनर्जीवन जानकर बड़ी खुशियांको मनातीं और उसीके बाद भोग करती हुई अपना समय बिताया करता थी। हे द्विजो-त्तम ! तबसे सदा वहाँपर स्त्रियोंका ही राज्य रहता है। स्त्रियों ही वहाँकी प्रजापर शासन करती हैं

६७२ आनन्दरामायणे [सर्गः ६

मारुतेः शब्दसंस्पर्शश्रवणात् व्यंघ्रिणा नराः । षण्ढका एव जायन्ते न तेभ्योऽन्यत्सुपौरुषम् ॥२०७॥ अतस्तेषामशक्तानां वीर्यं हीणंतदा द्विज । भवन्ति दुहितर एवं कश्चित्पुत्रः प्रजायते ॥२०८॥ आधिक्ये रजसः कन्या शुक्राधिक्ये सुतो भवेत् । नपुंसकः समत्वेन यथेच्छा वाऽथेश्वरेशे ॥२०९॥ अन्यत्ते कारणं वच्मि न भवन्ति सुता यतः । कारणं शृणु तस्येदं विष्णुदास द्विजोत्तम ॥२१०॥ तेषु देशेषु नार्यश्च निजराज्यमदेन हि । रतिकालोऽधः पुरुषं कृत्वा क्रीडां भजन्ति ताः ॥२११॥ न स्त्रीणां रतिकाल ताः पृष्ठं भूमिसपृशन्ति हि अतएव रतिकाल शुक्रं तु स्रवते वहिः ॥२१२॥ सूक्ष्मच्छिद्रं तथा गर्भस्थाने तन्नैव गच्छति । नासानायनकर्णानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्त्तिते ॥२१३॥ मेहनपादचवक्त्राणामेकैकं रन्ध्रमुच्यते । दशमं मस्तक प्रोक्तं रंध्राणीति नृणां विदुः ॥२१४॥ स्त्रीणां त्रीण्यधिकानि स्युः स्तनयोर्गर्भवर्त्मनः । मुचिक अग्रमान्येव तानि छिद्राणि सन्ति हि ॥२१५॥ गर्भच्छिद्रं रतिकाल किंचिद्विकसितं द्विज । भुन्त्रा मार्ग तु वीर्यस्य ददाति पुरुषस्य च ॥२१६॥ तन्मार्गेण गतं वीर्यं चेत् सम्यक् पुरुषस्य च । गर्भस्थाने तदा पुत्रो जायते नात्र संशयः ॥२१७। स्तन्यं प्रविष्टं वीर्यं च तदा कन्या प्रजायते । रजमधिक्येन जानीह्येवं विनिश्चयम् ॥२१८। तस्माद्यदाऽधः शेते वै तद्देशेषु नरोत्तमः । रतिकाल तस्य वीर्यमूर्ध्वं गच्छति नैव तत् ॥२१९॥ यदि दैववशात्किंचिद्रनं सोर्ध्वमार्गगः । तदा दैववशात्पुत्रो जायते सोऽपि पङ्गवत् ॥२२०॥ अतएव हि तद्देशे बहूकन्या भवन्ति हि । एवं ते कारणं प्रोक्तं कन्योत्पत्तेर्द्विजोत्तम ॥२२१॥ एवं सर्वेषु देशेषु चेन्नार्या अधिकं बलम् । अस्ति तर्हि भवेत्कन्या पुत्रः पुरुषसारतः ॥२२२।

॥ २०३-२०५॥ वहाँपर विशेष करके अपाहिजोकी ही उत्पत्ति होती है, पुरुष तो बहुत ही कम होते हैं। हनुमान्जीकी गर्जनासे मिली वायुके संस्पर्शसे उस गन्धर्व आश्रमवाले राज्यके लोग भी प्रायः षंढक (नपुंसक होते हैं। इसलिए वहाँके पुरुषांका वार्य कमज़ोर होता है और अधिकांश कन्याय ही उत्पन्न होती हैं, पुत्र तो शायद ही कभी कहीं हो जाता हो ॥ २०६॥ ०॥ २०७ ॥ जब कि स्त्रीके रजकी अधिकता होती है तो कन्या और पुरुषके वीर्यकी अधिकता होती है, तब पुत्र होता है। यदि पुरुषका वीर्य और स्त्रीका रज ये दोनों बराबर हो जाते हैं, तब नपुंसक उत्पन्न होता है । रज वार्याके सिवाय सबसे मुख्य बात तो यह है कि परमेश्वरकी जैसी इच्छा होती है, वही होता है ॥ २०६॥ हे द्विजोत्तम विष्णदास ! यहाँ विशेष करके कन्याओकि उत्पन्न होनेका एक कारण और भी है उसे सुनो ॥ २१० ॥ उस देशकी स्त्रियाँ अपने राज्यमदसे मत्तवाली हो पुरुषको नीचे सुला तथा स्वयं ऊपर लटकर रति करती हैं रतिकालके समय वे अपनी पीठको जमीनमें नहीं लगाने देतीं। इसीलिए पुरुषका वीर्य बाहर ही रह जाता है। गर्भाके सूक्ष्म छिद्रतक वह नहीं पहुंच पाता। पुरुषके नाक, नेत्र और कान इनमें दो-दो छिद्र रहते हैं ॥ २११-२१३ । लिंग, गुदा तथा मुखम एक-एक छिद्र रहता है ये सब मिलाकर नौ हुए और दसवाँ छिद्र ब्रह्मारन्ध्र होता है। ऐसा लोगोंने बतलाया है ॥ २१४। किन्तु स्त्रियोंके तीन छिद्र अधिक होते हैं। दो छिद्र दोनों स्तनोंमें और एक गर्भके रास्तेमें। गर्भके मार्गवाला छिद्र सूईकी नोकके समान बारीक होता है ॥ २१५ ॥ किन्तु रतिकालमे गर्भवाला छिद्र कुछ चौड़ा होकर पुरुषके वीर्यको भीतर जानेके लिये रास्ता दे देता है ॥ २१६ ॥ उस मार्गसे गया हुआ वीर्य यदि अच्छी तरह अपने स्थान तक पहुंच जाता है, तब पुत्रकी उत्पत्ति होती है। इसमें कोई संशय नहीं है। यदि उस समय गर्भाशयमे कम वीर्य जाता है तो कन्याकी उत्पत्ति हुआ करती है। क्योंकि ऐसी दशामे स्त्रीका रज अधिक और पुरुषका वार्य कम पड़ जाता है ॥ २१७ ॥ २१८ ॥ इसास जब वहावाले पुरुष नीचे लेटते हैं, तब उनका वीर्य गर्भाशयके छिद्र तक नहीं पहुंच पाता। यदि दैववश कभी थोड़ा-सा वीर्य उछलकर ऊपर स्त्रीके गर्भाशय तक पहुंच भी जाता है तब नपुंसक उत्पन्न होता है । २१९। २२०॥ इसी कारण उस देशमे अधिकांश कन्याय ही होती हैं। हे द्विजोत्तम ! मैंने इस प्रकार तुम्हें वहाँ विशेष कन्याओके उत्पन्न होनेका कारण बतलाया ॥ २२१ ॥ यह प्राय सब देशोमे देखा जाता है कि जिस जगह स्त्री बलवती होती है तो कन्या

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६१३

सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् ६१३

तस्मात्पुत्रार्थिना नारी शोषणीया कदापि न । पोषयेच्च सदाऽऽत्मानं नानाखाद्यरसायनैः ॥२२३॥ अतएव हि वैद्याश्च पालनीयाः सदा नरैः । बलाबलबोधैर्वा शास्त्रज्ञैः स्वस्वसत्त्वबलम् ॥२२४॥ पुष्टदेहं निरीक्ष्याथ न ज्ञेयं त्वधिकं बलम् । वातेनापि पुमान्पुष्टो जायतेऽत्र सदैव हि ॥२२५॥ अतो वैद्यं विना तच्च न ज्ञास्यसि बलाबलम् । अतो वैद्यास्ते प्रष्टव्याः सदा भक्तिपुरःसराः ॥२२६॥ मंत्रे तीर्थे द्विजे देवे वैद्येऽथ गणके गुरौ । यादृशी भावना स्त्रीया सिद्धिर्भवति तादृशी ॥२२७॥ अतो वैद्योक्तमार्गेण सदा गच्छेन्मृगेक्षणः । बलाबलाद्विचारेण पुत्रा एव भवंति हि ॥२२८॥ एक एव वरः पुत्रः किं जाता दश कन्यकाः । पुन्नाम्नो नरकान्पुत्रस्त्रायतेऽत्रह्वलं क्षणात् ॥२२९॥ कन्या स्वांयदुराचारालक्षणाद्रिजपितुः कुलम् । तथा भर्तुः कुलं चापि नरके पातयेच्च सा ॥२३०॥ तस्मान्नरैश्च पुत्रार्थं यत्नः कार्यस्त्वहर्निशम् । एष्टव्या बहव पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् । यजेत वाऽश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥२३१॥ जीवतो वाक्यकरणात्प्रत्यब्दं भूरि भोजनात् । गयायां पिंडदानेन त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता ॥२३२॥ एवं शिष्य त्वया पृष्टमशक्तेन कथं यतम् । कार्यं तच्च मया सर्वं शृणुष्व कथानकम् ॥२३३॥ तवाग्रे कथितं रम्यं रम्यं त्वचोवर्थमनुत्तमम् । तस्य व्रतस्य सामर्थ्यात्स दरिद्रो द्विजोत्तमः ॥२३४॥ लब्ध्वा तद्विपुलं राज्यं भुक्त्वा भोगान् मनोरमान् । सायुज्यं प्राप विष्णोश्च स्वायुषश्च क्षये द्विज ॥२३५॥ एव तद्व्रामचन्द्रस्य व्रत कोऽथ तु नाचरेत् । सुखेन भुक्तिदं चात्र परलोके विमुक्तिदम् ॥२३६॥ मुनिभिश्च सुरैर्नागैर्गंधर्वैः किन्नरैर्नृपैः । सदाऽनुभावितं चेदं व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥२३७॥

ही जन्मती हैं और पुरुष बल हो तो पुत्रकी उत्पत्ति अधिक होता है ॥ २२२ ॥ इसलिए जिन लोगोंको पुत्रकी अभिलाषा हो उन्हें चाहिए कि स्त्रियानको ज्यादा काम लिखाकर तबाह न करें। बल्कि रस्मों बढ़िया चीजें तथा रसायन खाकर बलवान् बनें ॥ २२३ ॥ लोगोंको यह भी उचित है कि बलाबल जाननेवाले अच्छे वैद्योंको अपने नगरमें रक्खें और समय-समयपर उनसे परामर्श करा लिया करें ॥ २२४ ॥ शरीर-को मोटा देखकर ही यह न समझे कि इसमें अधिक बल है। सदा ऐसा देखा गया है कि लोग वायुसे भी मोटे हो जाया करते हैं । २२५ । इसीसे वैद्यके बिना बलाबल ठीक तौरसे नहीं जाना जा सकता। अतएव लोगोंको चाहिए कि सदा वैद्योंसे आदरपूर्वक अपने स्वास्थ्यके विषयमें पूछताछ करते रहें । २२६ । मंत्रमें, तीर्थमें, ब्राह्मणमें, वैद्यमें, देवता और ज्योतिषीमें, जैसी जिसको भावना रहती है, वैसा ही उसे फल मिलता है । २२७ ।। अतएव वैद्य जिस तरह बतलाये, उसी तरह रात चलें यदि अच्छी तरह बलाबलका विचार करके पुरुष स्त्रीके साथ रति करे तो पुत्र ही होगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ २२८ ।। केवल एक पुत्रका होना अच्छा, किन्तु दस कन्याओंका होना ठीक नहीं है। यदि पुत्र होता है तो वह क्षणमात्रमें अपने कुलको 'पु' नामक नरकसे तार देता है ॥ २२९ ।। इसके विपरीत कन्या दुराचार करके अपने पिता तथा पति दोनों कुलोंको क्षणभरमें नरकमें गिरा देती है ॥ २३० ॥ इसीलिए लोगोंको चाहिए कि सदा पुत्रके लिये यत्न करें । एक ही पुत्रसे सन्तोष न कर लें, बल्कि कइयोंकी इच्छा रक्खें । न मालूम उनमेंसे कौन गयामें जाकर पिण्डदान कर आये या अश्वमेध यज्ञ करे अथवा नील वृषभ (काला साँड़) छोड़ ॥ २३१ ॥ जबतक पिता रहे तबतक उसका कहना माने । मर जानेपर प्रतिवर्ष बहुतसे ब्राह्मणोंको भोजन कराये और गयामें आकर पिण्डदान करे । इन्हीं तीन कामोंसे पुत्रकी पुत्रता सार्थक होती है ॥ २३२ ॥ इस प्रकार हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो पूछा था कि अशक्त प्राणी किस प्रकार व्रत करें। सो मैंने एक ब्राह्मणकी कथा सुनाकर समझा दिया । इस व्रतकी सामर्थ्यसे वह दरिद्र ब्राह्मण विपुल राज्यलक्ष्मी तथा तरह-तरहके मनोरम भोगोंको भोगकर आयु समाप्त होने-पर विष्णुभगवान्‌का सायुज्य मुक्तिको प्राप्त हुआ ॥ २३३-२३५ ॥ इस प्रकार उन रामचंद्रजीके व्रतको कौन नहीं करेगा, जो इस लोकमें आनन्दके साथ भुक्ति और परलोकमें मुक्ति प्रदान करनेवाला है ॥ २३६ ॥ अनेक

६४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७


श्रीपुत्रधनदं चैतत्सर्वसौख्यप्रदं नृणाम्। इहलोके परे चापि विष्णोः सायुज्यदायकम् ॥२३८॥
संति व्रतान्यनेकानि स्वर्गे मर्त्ये रसातले। तथापि रामनवमीसमानं व्रतमुत्तमम् ॥२३९॥
विष्णुदास द्विजश्रेष्ठ न भूतं न भविष्यति। तस्मात्सदा नरैः कार्यं व्रतं चेदं महत्तमम् ॥२४०॥
एवं त्वया यथा पृष्टं तथा ते विनिवेदितम्। किमन्वच्छ्रोतुमिच्छास्ति तद्वदस्व वदामि ते ॥२४१॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे
आदिकाव्ये नवमीकथावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

( लक्षरामानामोद्यापनविधि )

विष्णुदास उवाच
अन्यद्गुरो राघवस्य तुष्टिदं किं वदस्व तत्।

श्रीरामदास उवाच
शृणुष्व विष्णुदास त्वं यत्तेऽहं प्रवदामि च। तुष्ट्यर्थं रामचन्द्रस्य नित्यं पत्रे तु मानवैः ॥ १ ॥
लेखनीयं रामनामशतानि नव प्रत्यहम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं पूजनीयं सविस्तरम् ॥ २ ।
एवं कोटिमितं लेख्यं लक्षं वा तु ततः परम्। हवनं हि दशांशेन कर्तव्यं विधिपूर्वकम् । ३ ।
इदं विष्णुरिति ऋचा तिलाज्यैः पायसेन वा। नवीनैर्नान्नवाद्या कार्यं राघवं परिपूज्य च ॥ ४ ॥
हवनांगे राघवादिदेवानां पूजने नरैः। आम्रनाथे तु भद्रं च स्थापनीयं प्रयत्नतः ॥ ५ ।
अष्टोत्तरसहस्रं च रामलिंगात्मकं शुभम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं रामलिंगात्मकं शुभम् ॥ ६ ॥
अष्टोत्तरसहस्रं वा रामतोभद्रमुत्तमम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमुत्तमम् ॥ ७ ॥
एवं होमं लेखनं च पूजनाद् च यत्कृतम्। अर्पयेद्रघुनाथाय तत्सर्वं त्वतिभक्तितः ॥ ८ ।


मुनियों, देवताओं, नागों, गन्धर्वों, किन्नरों और राजाओंने कितने ही बार इस व्रतका अनुष्ठान किया है ॥ २३७ । यह व्रत इस लोकमें स्त्री-पुत्र धन तथा सब सुख देनेवाला है और परलोकमें विष्णुभगवान्‌का सायुज्य-मुक्ति प्रदान करता है ॥ २३८ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास ! वैसे तो स्वर्ग, मर्त्य और रसातलमे बहुतसे व्रत हैं। किन्तु उनमेंसे रामनवमी व्रतके बराबर न कोई व्रत है और न होगा। इसी कारण लोगोको चाहिए कि सदा इस रामनवमीके महान् व्रतको करें ॥ २३९ ॥ २४० । इस तरह तुमने जो कुछ हमसे पूछा, सो कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते, हो सो कहो. २४१ । इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाली कोई और युक्ति बतलाइए। रामदास कहने लगे—हे विष्णुदास ! मैं तुम्हे जो बतला रहा हूँ, उसे सुनो। रामकी प्रीतिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको चाहिए कि कागजपर प्रतिदिन नौ सौ वा एक सौ आठ रामनाम लिखकर विस्तारके साथ उनका पूजन करें १॥ १ ॥ २॥ इस तरह लिखते हुए जब एक करोड़ अथवा एक लाख नामोंको लिख लें तो उनका दशांश विधिवत् हवन करे ॥ ३ ॥ हवन 'इदं विष्णुः ०' इस मन्त्रसे करे। तिल, घी और खीरसे हवन करना चाहिए। यदि ये वस्तुएँ न इकट्ठी हो सकें तो नवीन अन्नसे रामका पूजन करके हवन करना चाहिए । ४ ॥ हवन-के अंगोंमें भद्रादि बनाकर राघवादि देवताओंका पूजन करके अष्टोत्तरसहस्रात्मक रामलिंगतोभद्र अथवा अष्टोत्तरशत रामलिंगात्मक भद्र बनावे । अथवा अष्टोत्तरसहस्र रामतोभद्र वा अष्टोत्तरशत रामतोभद्रकी रचना करे ॥ ५-७ ॥ इस तरह होम-लेखन-पूजन आदि जो कुछ करे, सब भक्तिपूर्वक रामचन्द्रजीको अर्पण कर दे ॥८॥

सर्गः ७ ] मनोहरकाण्डम् ६४५

सर्गः ७ ] मनोहरकाण्डम् ६४५


विष्णुदास उवाच

त्वया गुरो शुभं प्रोक्तं रामनामप्रलेखनम् । न तस्योद्यापनं प्रोक्तं तद्वदस्व ममाधुना ॥ ९ ॥

श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य भविष्यंति कथां वक्ष्यामि भूतवत् । रामनामोद्यापनस्य विस्तरेण मनोरमाम् ॥ १०॥ पाण्डुपुत्रो महावीरो बंधुभिथ युधिष्ठिरः । स्त्रिया मात्रा अष्टराज्यो वने वासं करिष्यति ॥ ११ ॥ तं द्रष्टुं द्वापरे कृष्णः कदा गच्छति वै वने । तं कृष्णं पूजयित्वा स तस्मै प्रश्नं करिष्यति ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

देवदेव जगन्नाथ भक्तानां वरदायक । किंचिच्चां प्रष्टुमिच्छामि मयि तुष्टोऽसि चेत्प्रभो ॥ १३॥ लक्ष्मीप्राप्तिकरं पुण्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् । व्रतमाख्याहि देवेश राज्यभ्रष्टस्य मेऽधुना ॥ १४॥

श्रीकृष्ण उवाच

गुह्याद्गुह्यतमं श्रोतुं यदि वाञ्छसि भूपते । तदा निगदतो मत्तः सकाशाच्छृणु सादरम् ॥ १५॥ रामनाम्नः परं नास्ति मोक्षलक्ष्मीप्रदायकम् । तेजोरूपं यदव्यक्तं रामनामाभिधीयते ॥ १६॥ तस्मात्तन्नाम जप्त्वा वै रामरूपो भवन्नरः । एतदेव हि रामेण मारुतिं प्रति भाषितम् ॥ १७॥

युधिष्ठिर उवाच

कस्मिन्काले हनुमते रामेणैवोपदिशितम् । एतद्विस्तरतो ब्रूहि सुमते रुक्मिणीपते ॥ १८॥

श्रीकृष्ण उवाच

पुरा रामावतारे च सीतां नीत्वा सुरारिणा । हनूमंतं समाहूय रामचंद्रोऽब्रवीद्वचः ॥ १९॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

वायुसूनो महावीर सीतान्वेषणहेतवे । समस्तां दक्षिणांदिशं गत्वा शुद्धिं समानय ॥ २०॥

श्रीहनुमान् उवाच

रघुनाथ जगन्नाथ दक्षिणास्यां हि सागरः । बहवो राक्षसाः संति तत्र शक्तिः कथं मम ॥ २१॥


विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! आपने रामनाम लिखनेकी जो युक्ति बतलायी वह बहुत ही उत्तम है । लेकिन उसका उद्यापन नहीं बतलाया उसे भी मुझे अभी बतला दीजिए ॥ ९ ॥ श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! मैं तुम्हें भविष्यकी एक कथा भूतकालमें समन्वित करके बतला रहा हूँ ॥ १० ॥ पांडुके पुत्र युधिष्ठिर जब राज्यसे वञ्चित हो गये, तब अपनी माता तथा बन्धुओंको साथ लेकर वनमें निवास करने लगे ॥ ११ ॥ उनको देखनेके लिए कृष्णचन्द्रजी वनमें गये । तब उन लोगोंने बड़े आदरसे श्रीकृष्णकी पूजा की और युधिष्ठिरने कहा-हे देवदेव ! हे जगन्नाथ ! हे भक्तोंको वर देनेवाले ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ ॥ १२ ॥ १३ ॥ हे देवेश - यह तो आप जानते ही हैं कि इस समय मैं राज्यसे भ्रष्ट हो चुका हूँ । अतएव आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतलाइए । जो लक्ष्मीको देनेवाला, पवित्र और पुत्र पौत्रको बढ़ाने-वाला हो ॥ १४ ॥ श्रीकृष्णचन्द्रजीने कहा-हे भूपते ! यदि आप हमसे गुप्त व्रत सुनना चाहते हैं तो मैं कहता हूँ, आप सुनिये ॥ १५ ॥ रामनामके ऊपर बढ़कर मोक्ष और लक्ष्मीको देनेवाला और कोई उपाय नहीं है । यह तेजोरूप और अव्यक्त है ॥ १६ ॥ इसी कारण रामनामका जप करके लोग रामरूप हो जाते हैं। यही बात स्वयं रामचन्द्रजीने हनुमान्जीसे कही थी ॥ १७ ॥ युधिष्ठिरने कहा-हे मतिमन्पते ! रामचन्द्रने हनु-मान्जीसे कब इस बातकी चर्चा की थी ? श्रीकृष्णजीने कहा-रामावतारमें जब कि रावण सीताको हर ले गया, तब रामने हनुमान्जीको बुलाकर कहा-॥ १८ ॥ १९ ॥ हे महावीर ! हे वायुसूनो ! तुम सीताजीको खोजनेके लिए सारी दक्षिण दिशामें भ्रमण करो और शीघ्र उनका समाचार लाओ ॥ २० ॥ श्रीहनुमान् बोले-हे जगन्नाथ !

६४६आनन्दरामायणे[ सर्ग ७

श्रीरामचन्द्र उवाच

मारुते रावणादीनां राक्षसानां निवारकम्। मंत्रं ददामि सुगमं येन सर्वजयी भवेत् ॥२२॥

श्रीहनूमानुवाच

महाराज कृपासिंधो दीनानां त्वं सुतारकः। उपदेशोऽधुना कार्यस्तस्य मंत्रस्य तत्त्वतः ॥२३॥

श्रीरामदास उवाच

इति श्रुत्वा च तद्वाक्यं रहस्याहूय सत्वरम्। मारुतेर्दक्षिणे कर्णे श्रीरामेण्युपदेशितः ॥२४॥ तस्य मन्त्रस्य सकलं पुरश्चरणमुत्तमम्। लक्षसंख्यं विधायाशु प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् ॥२५॥ तन्मंत्रस्य प्रभावेण नानाजलचराचरम्। दुर्गमं सागरं तीर्त्वा लंकामध्ये समाययौ ॥२६॥ न स लेभे तत्र शुद्धिमाशोकाख्यवनं गतः। वृक्षमूले स्थितां सीतां दूरतोऽग्रे ददर्श सः ॥२७॥ तां दृष्ट्वा शीघ्रमागत्य हर्षनिर्भरमानसः। सीतायाश्चरणौ नत्वा दंडवत्पतितो भुवि ॥२८॥ अत्यन्तं सूक्ष्मवपुषं बालकाकारसंयुतम्। तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा सीता वचनमब्रवीत् ॥२९॥ आगतोऽसि कुतो बाल कुत्रत्यः कस्य बालकः।

श्रीहनूमानुवाच

सीता माता पिता रामो रामचन्द्रसमीपतः ॥३०॥ समागतोऽस्मि हनुमान्प्रत्यैकां मुद्रिका त्वया। रामनामांकितां शुद्धां शुद्धकांचननिर्मिताम् ॥३१॥ ज्ञात्वा रामस्य सा सीता परं तोषमवापयौ। तां ज्ञात्वा तोषसहितामांजनेयोऽब्रवीद्वचः ॥३२॥ मातः क्षुधाऽस्त्यति मम त्वयाविश्लेषकारिणी। अस्मिन्वनेऽतिमधुरः फलसङ्घोऽतिदुर्लभः ॥३३॥ तवाज्ञयाऽहं सीतेऽद्य करिष्ये भक्षणं ध्रुवम्।

सीतोवाच

भो बालक महाबीर रावणोऽस्ति वनाधिपः ॥३४॥


हे रघुनाथ ! दक्षिण दिशामें तो विशाल सागर है और बहुतसे राक्षस हैं, फिर वहांपर मेरी शक्ति कैसे काम देगी ? ॥ २१ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा हे मारुते ! रावण आदि राक्षसोंका निवारण करनेवाला मैं एक बहुत ही सरल मंत्र बताता हूँ जिसकी सहायतास सर्वत्र तुम्हारी विजय होगी ॥ २२ । हनुमान्जीने कहा— हे महाराज ! हे कृपासिन्धो ! आप दीनोंका उद्धार करते हैं । हे प्रभो ! हमें उस मन्त्रका अच्छी तरह उपदेश दीजिए । २३ ॥ श्रीरामदास कहते हैं हनुमान्जीके इस प्रकार विनय करनेपर रामने उन्हें एकान्तमें ले जाकर उनके कानमें 'श्रीराम' इस नामका उपदेश दिया । २४ ॥ हनुमान्जीने उस मन्त्रका उत्तम रीतिसे एक लाख जप करके दक्षिण दिशाको प्रस्थान किया ॥ २५ ॥ उसी मंत्रके प्रभावसे विविध प्रकारके जलजन्तुओंसे भरे दुगम सागरको पार करके वे लङ्का पहुंच गये । २६ । वहां बहुत खोज करनेपर भी सीताका पता न पाकर अशोक वनमें गये, तब वहां एक वृक्षके नीचे बैठी हुई सीताको दूरसे देखा । २७ ॥ सीताको देखकर उनका हृदय हर्षसे भर आया और तुरन्त उनके पास पहुंचकर प्रणाम किया । फिर दण्डकी तरह पृथ्वीमं लोट गये ॥ २८ ॥ उस समय हनुमान्जीने बच्चेके समान अपना एक छोटा सा रूप धारण कर रक्खा था । उनको पृथ्वीमें पड़े देखकर सीताने कहा--॥ २९ ॥ बच्चे ! तुम कहांसे आये हो ? कहां तुम्हारा घर है और तुम किसके बेटे हो ? हनुमान्जीने कहा कि सीता मेरी माता है और पिता श्रीरामचन्द्र हैं । इस समय मैं उन्हींके पाससे आ रहा हूँ ॥ ३० ॥ मेरा नाम हनुमान् है । आप इस अंगूठीको लीजिये । यह शुद्ध सुवर्णकी बनी हुई है और इसमें श्रीरामचन्द्रजीका नाम लिखा हुआ है ॥ ३१ ॥ जब सीताको यह ज्ञात हुआ कि यह मुद्रिका रामजीकी है तो वे बहुत प्रसन्न हुईं । सीता माताको प्रसन्न देखकर हनुमान्जीने कहा-माँ ! मुझे बड़ी भूख लगी है। इससे मेरा कष्ट हो रहा है । इस बगीचेमें मैं बहुत मीठे और दुर्लभ फल देख रहा हूँ॥ ३२ ॥ ३३। यदि

सर्गः ७ ] मनोहरकाण्डम् ६४७


न शक्तिर्न च शक्यं ते कथं त्वं भक्षयिष्यसि ।

हनूमानुवाच
श्रीरामेति परो मन्त्रः शस्त्रं मे हृदयांतरे ॥ ३५॥
तेन सर्वाणि रक्षांसि तृणरूपाणि सांप्रतम् । इत्युक्त्वाऽथ तदीयाज्ञां गृहीत्वा वनभूरुहान् ॥ ३६॥
उन्मूलन चकराय श्रुत्वा रक्षांसि चाययुः । युद्धं च तुमुल जातं पश्चान्मन्त्रप्रभावतः ॥ ३७॥
दलितं राक्षसबलं दग्धा लंका हनूमता । पुनर्गेत्वाऽशोकवन सीतां नत्वा च मारुतिः ॥ ३८॥
तदलंकारमादाय रामचन्द्रं समाययौ । रामायालंकृतिं दत्त्वा तस्थौ तत्पादसन्निधौ ॥ ३९॥
रामोऽलंकृतिमादाय तच्छ्रुत्वा मुदितोऽभवत् । रामनामप्रभावोऽयं महाराज युधिष्ठिर ॥ ४०॥
तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र रामनामजपं कुरु ।

युधिष्ठिर उवाच
कथं जपो विधेयोऽस्य पुरश्चरणकं फलम् ॥४१॥
कथमूद्यापनं चैव सर्वमाख्याहि यत्नतः ॥४२॥

श्रीकृष्ण उवाच
अथवा पुस्तके लेख्यं स्मरणं हृदयेऽथवा । कोटिसंख्यापरिमितमथवा लक्षसंमितम् ॥४३॥
मंत्रा नानाविधाः सन्ति शतशो राघवस्य च । तेभ्यस्त्वेकं वदाम्यद्य तव मंत्रं युधिष्ठिर ॥४४॥
श्रीशब्दमाद्यं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनामजपो निहन्याद्द्विजकोटिहत्याः ॥४५॥
अनेनैव च मन्त्रेण जपः कार्यः सुमेधसा । लक्षसंख्य कृते तस्मिन्नुद्यापनविधिं चरेत् ॥४६॥


आप आज्ञा दें तो मैं थोड़ेसे फल तोड़कर खा लूँ । सीताने कहा— हे महावीर बालक ! इस बगीचेका मालिक रावण है ॥ ३४ ॥ तुममें कुछ भी शक्ति नहीं मालूम पड़ रही है । तब तुम किस तरह फल खाओगे ? हनुमान्‌जीने कहा कि मेरे हृदयमें 'श्रीराम'के नामका एक प्रबल शस्त्र है। उसके प्रभावसे लङ्काके सब राक्षस मेरे सामने तिनकेके बराबर हैं। ऐसा कह और सीताजीकी आज्ञा पाकर हनुमान्‌जी बगीचेमें घुस पड़े और पेड़ोंको उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगे । यह समाचार सुनकर बहुतसे राक्षस आ गये और उनके साथ तुमुल युद्ध हुआ। किन्तु अन्तमें श्रीरामनाममन्त्रके प्रभावसे हनुमान्‌जीने उन सब राक्षसोंको मार डाला और लङ्का नगरीको भी जलाकर राख कर दिया । फिर लौटकर अशोकवनमें गये। वहाँ सीताको प्रणाम किया ॥ ३५-३८ ॥ फिर उनका अलंकार लेकर रामचन्द्रजीकी ओर लौट पड़े । रामके पास पहुँचकर उन्होंने वह अलंकार रामको दिया और उनके चरणोंके पास बैठ गये ॥ ३६ ॥ रामने वह अलंकार हाथमें ले लिया और सीताका समाचार सुना तो बहुत प्रसन्न हुए । हे युधिष्ठिर ! यह सब रामनामका माहात्म्य है ॥ ४० ॥ इसलिए हे राजन् ! तुम भी रामनामका जप करो । युधिष्ठिरने कहा हे कृष्ण ! इस रामनामके जप करनेका क्या विधान है ? इसका पुरश्चरण कैसे किया जाता है और उद्यापनकी क्या विधि है ? यह सब आप हमें अच्छी तरह समझाइए । श्रीकृष्णचन्द्रजीने कहा हे राजेन्द्र ! साधकको चाहिए कि स्नान करके किसी पवित्र स्थानपर बैठे और तुलसीकी मालपर रामनामका जप करे । अथवा किसी पुस्तकपर लिखे या हृदयमें स्मरण करे। जपकी संख्या एक करोड़ अथवा एक लाख होनी चाहिए । ४१-४३ ॥ वैसे तो रामचन्द्रजीके अनेक मन्त्र हैं, किन्तु उनमेंसे एक उत्तम मन्त्र मैं तुमको बतलाता हूँ ॥ ४४ ॥ पूर्वमें श्रीराम शब्द, मध्यमें जय शब्द और अन्तमें दो जय शब्दोंसे मिला हुआ ( श्रीराम जय राम जय जय राम ) राममन्त्र यदि इक्कीस बार जपा जाय तो वह करोड़ों ब्रह्महत्याओंके पापोंको नष्ट कर देता है ॥ ४५ ॥ बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि