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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

द्वादशरात्रं चरित्वा निर्विशेत तां चैवोपयच्छेत् ॥ ८ ॥ अथ

८२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

द्वादशरात्रं चरित्वा निर्विशेत तां चैवोपयच्छेत् ॥ ८ ॥ अथ परिविविदानः कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चरित्वा तस्मै दत्त्वा पुनर्नि- विशेत तामेवोपयच्छेत् ॥९॥ अग्रेदिधिषूपतिः कृच्छ्रं द्वादश रात्रं चरित्वा निर्विशेत तां चैवोपयच्छेत् ॥१०॥ दिधिषूपतिः कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चरित्वा तस्मै दत्त्वा पुनर्निर्विशेत ॥ ११ ॥ वीरहणं परस्ताद्वक्ष्यामः ॥ १२ ॥ ब्रह्मोञ्झः कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरित्वा पुनरुपयुञ्जीत वेदमाचार्यात् ॥ १३ ॥ गुरुतल्पगः सतृषणं शिश्नमुत्कृत्याञ्जलावाधाय दक्षिणामुखो गच्छेत् ॥१४॥ यत्रैव प्रतिहन्यात्तत्र तिष्ठेदाप्रलयम् ॥ १५ ॥ निष्कालको वा घृताभ्यक्तस्तप्तां सूर्मिं परिष्वजेन्मरणात्पूतो भवतीति विज्ञा-

से विवाह कर लेवे ॥८॥ और उस का छोटा भाई परिवेत्ता कृच्छ्र अतिकृच्छ्र दोनों व्रत बारह २ दिन करके अपनी स्त्री को बड़े भाई को समर्पण करके ठ- हर जावे पश्चात् बड़े भाई की आज्ञा होने पर उसी स्त्री को स्वीकार करलेवे ॥ ९ ॥ ज्येष्ठ भगिनी का विवाह होने से पहिले छोटी भगिनी से विवाह करने वाला पुरुष दिधिषूपति कहाता है और ज्येष्ठ भगिनी के साथ पीछे से विवाह करने वाला अग्रेदिधिषूपति कहाता वह बारह दिन तक कृच्छ्र व्रत करके ठहर जावे फिर उसी स्त्री को स्वीकार करे ॥ १० ॥ और छोटी के साथ विवाह करने वाला बारह २ दिन तक कृच्छ्र अतिकृच्छ्र दोनों व्रत करके उस ज्येष्ठ भगिनी के पति को अपनी स्त्री समर्पित करके ठहर जावे पीछे उसकी आज्ञा से स्वीकार करे॥ ११॥ विधि से स्थापित किये अग्नि को त्यागने वाले के विषय में आगे प्रायश्चित्त कहेंगे ॥१२॥ पढ़ेहुए वेद को भुला देने वाला पुरुष बारह दिन तक कृच्छ्र व्रत करके भूलेहुए वेद को फिर गुरुमुख से पढ़ लेवे ॥१३॥ गुरुपत्नी से संग करने वाला पुरुष अण्डकोषों सहित लिङ्गेन्द्रिय को काटकर दोनों हाथों की अञ्जली में धरके दक्षिण दिशा को बराबर चला जावे ॥१४॥ जब कुछ भी न चला जाय अर्थात् अत्यन्त थक जावे तब वहीं प्राणान्त होने तक खड़ा रहे ॥१५॥ अथवा उक्तरीति से प्राणान्त न हो तो लोहे की प्रतिमा को अत्यन्त तपाकर अपने शरीर में घृत लगाके उस लोह की प्रतिमा से लिपट जावे ऐसे जल कर मरजाने से शुद्ध निष्पाप हो जाता है यह श्रुति से जाना

पादं चरेत् ॥ १८ ॥ एतदेव च चाण्डालपतितान्नभोजनेषु,त-

. भाषार्थसहिता ॥ ८३

यते ॥१६॥ आचार्य्यपुत्रशिष्यभार्य्यासु चैवम्॥ १७ ॥ योनिषु च गुर्वी सखीं गुरुसखीमपपात्रां पतितां च गत्वा कृच्छ्राब्द- पादं चरेत् ॥ १८ ॥ एतदेव च चाण्डालपतितान्नभोजनेषु,त- तः पुनरुपनयनं, वपनादीनां तु निवृत्तिः ॥ १९ ॥ मानवंचा- त्र श्लोकमुदाहरन्ति ॥ २० ॥ वपनंमेखलादण्डो भैक्षचर्याव्रतानिच । निवर्त्तन्तेद्विजातीनां पुनःसंस्कारकर्मणि, इति ॥ २१ ॥ मत्या मद्यपाने त्वसुरायाऽज्ञाने कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ घृतं प्राश्य पुनःसंस्कारश्च ॥२२॥ मूत्रशकृच्छुक्राभ्यवहारेषु चैवम्॥२३॥ मद्यभाण्डेस्थिताआपो यदि कश्चिद्विजःपिबेत् । पद्मोदुम्बरबिल्वपलाशानामुदकं पीत्वा त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति ॥ २४ ॥ अभ्यासेतु सुराया अग्निवर्णां तां द्विजः


गया है ॥१६॥ आचार्य की, पुत्र की, और शिष्य की पत्नी से गमन करने पर भी यही प्रायश्चित्त है ॥१७॥ मित्र की पत्नी, गुरु के मित्र की पत्नी, अन्त्यज नीच की, और पतित स्त्री से संग करके तीन मास तक कृच्छ्र व्रत करे ॥१८॥ चाण्डाल और पतितों के अन्न के भोजनों में भी यही प्रायश्चित्त है उस प्रायश्चित्त के बाद मुण्डन कराये बिना ही फिर से उपनयन संस्कार करावे ॥ १९ ॥ इस विषय में मनु जी के श्लोक का प्रमाण भी कहते हैं कि ॥ २० ॥ शिर मुंड़ाना, मेखला, दण्ड, भिक्षा मांगना, और रस त्यागादि नियम, ये सब काम द्विजों का पुनः संस्कार होने के समय निवृत्त हो जाते हैं अर्थात फिर से उपनयन करने में मुण्डनादि की आवश्यकता नहीं है ॥ २१ ॥ पदार्थों को सड़ाकर बनाया मादक (नशाकारी) वस्तु अनेक प्रकार का मद्य कहाता है । गुड़, आटा और महुआ से बनी सुरा कहाती है । उसमें सुरा वा असुरा को नजानकर मद्य के पीने पर कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र दोनों व्रत कर तथा घी का प्राशन करके फिर से उपनयन संस्कार करके शुद्ध होता है ॥ २२ ॥ विष्ठा, मूत्र और वीर्य के खालेने पर भी यही उक्त प्रायश्चित्त जानो ॥ २३ ॥ मद्य के पात्र में रक्खे हुए जल को यदि कोई द्विज पीले तो कमल, गूलर, बेल (बिल्व) और ढांक के पत्तों को उबाल के निकाले जलमात्र को पीकर तीन दिन रात व्रत करने से शुद्ध हो जाता है ॥ २४ ॥ बहुत दिनों तक नित्य के अभ्यास से सुरा पीवे तो द्विज

११

८४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

पिबेन्मरणात्पूतो भवतीति ॥२५॥ भ्रूणहनं वक्ष्यामो ब्राह्मणं हत्वा भ्रूणहा भवत्यविज्ञातं च गर्भमविज्ञाता हि गर्भाः पुमांसो भवन्ति॥२६॥तस्मात् पुंकृत्याऽऽजुहुतीति, भ्रूणहाग्निमुपसमाधाय जुहुयादेताः ॥ २७ ॥ लोमानि मृत्योर्जुहोमि लोमभिर्मृत्युं वासय, इति प्रथमाम् ॥२८॥ त्वचं मृत्योर्जुहोमि त्वचा मृत्युं वासय,इति द्वितीयाम् ॥२९॥ लोहितं मृत्योर्जुहोमि लोहितेन मृत्युं वासय, इति तृतीयाम् ॥३०॥ मांसं मृत्योर्जुहोमि मांसेन मृत्युं वासय, इति चतुर्थीम् ॥ ३१ ॥ स्नावानि मृत्योर्जुहोमि स्नावभिर्मृत्युं वासय, इति पञ्चमीम् ॥ ३२ ॥ मेदो मृत्योर्जुहोमि मेदसा मृत्युं वासय, इति षष्ठीम् । ३३। अस्थीनि मृत्योर्जुहोमि अस्थिभिर्मृत्युं वासय, इति सप्तमीम् ॥ ३४ ॥ मज्जानं मृत्योर्जुहोमि मज्जभिर्मृत्युं वासय, इत्यष्टमीमिति॥३५॥


पुरुष अग्निवर्ण सुरा पीकर मरजाने पर शुद्ध होता है ॥२५॥ अब भ्रूण हत्यारे का विचार कहते हैं । ब्राह्मण को तथा अविज्ञात (कि पुत्र है वा पुत्री ऐसा चिन्ह न बन पाने से नहीं जाना गया ऐसे) ब्राह्मणी के गर्भ को गिरा के मनुष्य भ्रूण हत्यारा होता है । क्योंकि अविज्ञात गर्भ-पुरुष माने जाते हैं यह धर्मशास्त्रकारों की माननीय राय है ॥ २६ ॥ तिससे "पुरुष सम्बन्धी क्रिया से भ्रूणहत्या के प्रायश्चित्त में होम करते हैं,, ऐसा श्रुति में कहा है । भ्रूणहत्यारा अग्नि को सामने स्थापित करके आधानादि सामान्य विधिपूर्वक निम्नलिखित आहुति करे ॥ २७ ॥ (लोमानि०-वासय-स्वाहा) इस प्रकार ३५ सूत्र तक कही आठो आहुति स्वाहान्त मन्त्र बोल कर घी से करे । अर्थ--मृत्यु के लिये लोमों को होमना हूं । हे अग्ने देव ! लोमों के साथ मृत्यु को वसाओ ! यह मेरी वाणी सत्य हो ॥ २८ ॥ इसी प्रकार त्वचा, रुधिर, मांस, स्नावा (नाड़ी नसें) मेद, अस्थि (हड्डी) और मज्जा इन सब का मृत्यु के लिये होम और इन के साथ मृत्यु का निवास दिखाना होम के मन्त्रों का आशय है । अर्थात होम करनेवाला कहे कि मेरे शरीर के लोमादि भाग (बह्य-साक्षा) मरण समय में मृत्यु के साथी बनें, और मृत्यु का निवास उन्हीं के साथ रहे किन्तु मृत्यु मुझ पर कृपा कर मेरे साथ आगे को सम्बन्ध तोड़ देवे तो मैं अमृत मोक्ष का अधिकारी बनूं ॥ ३०-३५ ॥ राजा की वा ब्राह्मण की रक्षा के

भाषार्थसहिता ॥ ८५

राजार्थे ब्राह्मणार्थे वा संग्रामेऽभिमुखमात्मानं घातयेत्त्रिर्- जितो वाऽनपराङ्ङः पूतो भवतीति ॥३६॥ विज्ञायते हि ॥३७॥ निरुक्तं ह्येनः कनीया भवतीति ॥३८॥ तथाऽप्युदाहरन्ति॥३९॥ पतितंपतितेत्युक्त्वा चौरंचौरेतिवापुनः । वचसातुत्यदोषःस्यान् मिथ्याद्विर्दोषतांत्र जेत्, इति ॥४०॥ एवं राजन्यं हत्वाऽष्टौ वर्षाणि चरेत्, षड्वैश्यं, त्रीणि शूद्रं, ब्राह्मणीं चात्रेयीं हत्वा, सवनगतौ च राजन्यवैश्यौ ॥ ४१ ॥ आत्रेयीं वक्ष्यामा-रजस्वलामृतुस्नातामात्रेयीमाहुः ॥ ४२ ॥ अत्र ह्येष्यदपत्यं भवतीति ॥ ४३ ॥ अनात्रेयीं राज- न्याहिंसायां राजन्यां वैश्यहिंसायां वैश्यां शूद्रहिंसायां शूद्रां हत्वा संवत्सरम् ॥ ४४ ॥ ब्राह्मणसुवर्णहरणं प्रकीर्य्य केशान् राजानमभिधावेत् स्तेनोऽस्मि भोः शास्तु मां भवानिति तस्मै

लिये संमुख युद्ध करना अपना घात करा देवे । ऐसा तीन वार युद्ध करने पर भी शत्रुओं से न जीता जाय ( न मरे ) तो भी निरपराध हुआ शुद्ध होजाता है ॥ ३६ ॥ श्रुति में भी कहने से जाना जाता है कि ॥ ३७ ॥ प्रकाशित प्रसिद्ध किया अपराध घटजाता है ॥ ३८ ॥ वैसा भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ३९ ॥ पतित को पतित और चोर को चोर ऐसा कहकर निकृष्ट शब्द के बोलने से वाणीमात्र का दोष लगता है। परन्तु जो चोरादि नहीं उसको चोरादि मिथ्या कहे तो वक्ता को द्विगुणा दोष लगता है ॥ ४० ॥ इसी प्रकार क्षत्रिय को मारके आठ वर्ष, वैश्य को मारके छः वर्ष, यज्ञ प्राप्त-क्षत्रिय, वैश्य, रजस्वला हो के शुद्ध हुई ब्राह्मणी और शूद्र को मारकर तीन वर्षतक कृच्छ्रव्रत प्रायश्चित्त करे ॥ ४१ ॥ रजस्वला होकर ऋतुकाल में स्नान की ब्राह्मणी को आत्रेयी कहते हैं ॥ ४२ ॥ क्योंकि इस ब्राह्मणी में अभीष्ट सन्तान उत्पन्न होता है ॥४३॥ जो तत्काल रजस्वला न हो चुकी हो ऐसी क्षत्रिय कन्या को मारकर क्षत्रिय हिंसा में, वैश्य स्त्री को मारने पर वैश्यहिंसा में और वैसी शूद्रा स्त्री को मार कर शूद्रहत्या मध्ये एक वर्ष तक कृच्छ्र व्रत प्रायश्चित्त करे ॥४४॥ ब्राह्मण का सुवर्ण चुराने पर द्विज मनुष्य केशों को बिखेरे हुए बलपूर्वक दौड़ता हुआ राजा के पास जावे और राजा से कहे कि "स्तेनोऽस्मि भोः शास्तु मां भवान्,, मैं चोर

८६ वसिष्ठस्मृतिः ॥

राजीदुम्बरं शस्त्रं दद्यात्तेनात्मानं प्रमापयेन्मरणात् पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ ४५ ॥ निष्कालको वा घृताक्तो गोम- याग्निना पादप्रभृत्यात्मानमभिदाहयेन्मरणात्पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ ४६ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ४७ ॥ पुराकालात्प्रमीतानां पापाद्विविधकर्मणाम् । पुनरापन्नदेहानामङ्गंभवतितच्छृणु ॥ ४८ ॥ स्तेनःकुनखीभवति श्वित्रीभवतिब्रह्महा । सुरापःश्यावदन्तस्तु दुश्चर्मागुरुतल्पगः, इति ॥ ४९ ॥ पतितसंप्रयोगं च ब्राह्मेण वा यौनेन वा यास्तेभ्यः स- काशान्मात्रा उपलब्धास्तासां परित्यागस्तैश्च न संवसेदुदी- चीं दिशं गत्वानश्नन् संहिताध्ययनमधीयानः पूतो भवती- ति विज्ञायते ॥ ५० ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५१ ॥

हूं आप मुझ को दण्ड दीजिये । तब राजा उसके हाथ में गूलर वृक्ष का मोटा लट्ठ देवे उससे अपने को मारडाले मरजाने से पवित्र होता ऐसा श्रुति से जाना जाता है ॥ ४५ ॥ यदि उक्तरीति से न मरे तो शरीर में घी लगा कर कण्डों के अतिप्रज्वलित अग्निमें अपने शरीर को जलाकर भस्म करे । इस प्रकार मर जाने से प्राने को पवित्र हो जाते हैं ऐसा श्रुति से जाना जाता है ॥ ४६ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ४७ ॥ नाना प्रकार के प्रबल दुष्कर्मी सम्बन्धी पापों से क्षीणायु होकर मृत्यु के समय से पहिले ही मरे मनुष्यों का जन्मान्तर में जैसा शरीर होता है सो सुनो ॥ ४८ ॥ ब्राह्मण के सुवर्ण को चुरानेवाले के नख बिगड़े हुए होते, ब्रह्म हत्यारा श्वेत कुष्ठी होता, मद्य पीनेवाले के काले दांत होते और गुरुस्त्रीगामी की त्वचा बिगड़ी होती है ॥ ४९ ॥ ऐसे पतितों के साथ वेदादि शास्त्रों के पठन पाठन रूप से वा विवाहरूपसे जो कोई मेल मिलाप सम्बन्ध करे उसने जो कुछ धनादि पदार्थ का अंश पतितों से लिया हो उसका प्रथम त्याग करे और फिर उनके साथ न बसे। फिर उत्तर दिशा में एकान्त शुद्ध स्थल में जाकर उपवास पूर्वक वेद की संहिता को पारायण रूप से पढ़ता हुआ पवित्र होता है यह श्रुति से जाना जाता है ॥ ५० ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ५१ ॥ शरीर को

भाषार्थसहिता ॥ ८९

शरीरपरितापेन तपसाध्ययनेन च ।
मुच्यतेपापकृत्पापाद्दानाच्चापिप्रमुच्यते, इति
विज्ञायते, इति विज्ञायते ॥ ५२ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे विंशतितमोऽध्यायः ॥२०॥

शूद्रश्चेद् ब्राह्मणीमभिगच्छेद्वीरणैर्वेष्टयित्वा शूद्रमग्नौ प्रास्येत् ॥ १॥ ब्राह्मण्याः शिरसि वपनं कारयित्वा सर्पिषा समभ्यज्य नग्नां कृष्णं खरमारोप्य महापथमनुसंव्राजयेत्पूता भवतीति विज्ञायते ॥ २ ॥ वैश्यश्चेद् ब्राह्मणीमभिगच्छेल्लोहितदर्भैर्वेष्टयित्वा वैश्यमग्नौ प्रास्येत् ॥ ३॥ ब्राह्मण्याः शिरसि वपनं कारयित्वा सर्पिषाभ्यज्य नग्नां गौरखरमारोप्य महापथमनुसंव्राजयेत् पूता भवतीति विज्ञायते ॥ ४ ॥ राजन्यश्चेद्ब्राह्मणीमभिगच्छेच्छरपत्रैर्वेष्टयित्वा राजन्यमग्नौ प्रास्येत्, ब्राह्मण्याः शिरोवपनं कारयित्वा सर्पिषासमभ्यज्य नग्नां रक्तं खरमारोप्य महापथमनुसंव्राजयेत् पूता भवतीति


तपाने कष्ट देने रूप तपसे, वेदाध्ययन से और सुपात्रों को दिये दान से पाप करनेवाला पुरुष पाप से छूट जाता है। यह बात श्रुति से जानी जाती है ॥५२॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में बीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

यदि शूद्र ब्राह्मणी से व्यभिचार करे तो राजा उसको गांडर से लपेटकर प्रज्वलित अग्नि में डलवादेवे ॥ १ ॥ और ब्राह्मणी का शिर मुंडा के सब शरीर में घी लगाकर नंगी करके काले गधेपर चढ़वा के बड़ी चौड़ी सड़क से निकाले जिस दशा को सब कोई देखे तो शुद्ध होजाती यह श्रुति से जाना जाता है ॥ २ ॥ यदि वैश्य पुरुष ब्राह्मणी से संग करे तो लाल दाभों से लपेटकर उस वैश्य को प्रज्वलित अग्नि में फेंक देवे ॥ ३ ॥ और ब्राह्मणी का शिर मुंडवा के शरीर में घी लगाकर सफेद गधे पर नंगी चढ़ा के बड़ी सड़क से निकाले तो पवित्र होजाती ऐसा जाना जाता है ॥ ४ ॥ यदि क्षत्रिय पुरुष ब्राह्मणी से व्यभिचार करे तो शरपत्ते से लपेटकर प्रज्वलित अग्नि में डलवा देवे और ब्राह्मणी का शिर मंडवा के शरीर में घी लगाकर नंगी कर लाल गधे पर च-

८८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

विज्ञायते ॥ ५॥ एवं वैश्यो राजन्यायां शूद्रश्च राजन्यावैश्य- याः ॥ ६ ॥ मनसा भर्तुरतिचारे त्रिरात्रं यावकं क्षीरौदनं वा भुञ्जानाऽधःशयितोऽर्ध्वं त्रिरात्रादप्सु निम्नगायाः सावित्र्या अष्टशतेन शिरोभिर्जुहुयात्, पूता भवतीति विज्ञायते ॥ ७ ॥ वाक्सम्बन्धे एतदेव मासं चरित्वोर्ध्वं मासादप्सु नि- म्नगायाः सावित्र्याश्चतुर्भिरष्टशतैः शिरोभिर्जुहुयात्पूता भ- वतीति विज्ञायते ॥८॥ व्यवाये तु संवत्सरं घृतपटं धारयेत् ॥ ९ ॥ गोमयगत्र्त्ते कुशप्रस्तरे वा शयीतोर्ध्वं संवत्सरादप्सु निम्नगायाः सावित्र्यास्त्र्यष्टशतेन शिरोभिर्जुहुयात्पूता भ- वतीति विज्ञायते ॥ १० ॥ व्यवायेतीर्थगमने धर्मेभ्यस्तुनिवर्तंते ।


द्वा के बड़ी सड़क से निकाले तो पवित्र होजाती है यह माना जाता है ॥५॥ इसी प्रकार वैश्य पुरुष क्षत्रिया स्त्री से तथा शूद्र पुरुष क्षत्रिया और वैश्या स्त्री से व्यभिचार करे तो पूर्वोक्त प्रकार से ही दोनों का प्रायश्चित्त जानो ॥ ६ ॥ यदि द्विज स्त्री मन से दूसरे पुरुष की चाहना द्वारा पति का उल्लंघन वा ति- रस्कार करे तो तीन दिन तक दूध भात और कुलत्थ खाती हुई भूमि पर सोवे । तीन दिन के उपरान्त नदी के जल में सावित्री के शिरोमन्त्र ( आ- पोज्योती० ) एक सौ आठ मन्त्रों से घी की आहुति करे तो पवित्र हो जाती है ऐसा श्रुति से जाना जाता है ॥७॥ यदि वाणी द्वारा अन्य पुरुष से संयोग की बात करे वा पति का अनादर वा आज्ञा का उल्लंघन करे वा गाली आदि कठोर बोले तो पूर्वोक्त ७ वें सूत्र में कहा व्रत एक मास तक करके नदी के जल में सा- वित्री (तत्स॑वितुः०) मन्त्र के शिरो मन्त्र ( ओम्-आपोज्योती०) से ४३२ आ- हुति घी की छोड़े तो शुद्ध हो जाती है यह श्रुति से जाना जाता है ॥ ८ ॥ यदि द्विज स्त्री पर पुरुष से संग करे तो एक वर्ष तक घी लगाये वस्त्र धारण करे ( अथवा केवल घी लगा कर नंगी रहे अथवा घृत नाम जल से भीगे वस्त्र धारण करे ) ॥९॥ गोबर के गढ़े में वा कुशों के बिछौना पर सोया करे । एक वर्ष के पश्चात् सावित्री के शिरो मन्त्र ( आपोज्योती० ) से नदी के जल में ३२४ आहुति घी की छोड़े तो पवित्र होती ऐसा जाना जाता है ॥ १० ॥ मैथुन में विशेष कर प्रवृत्त होने तथा तीर्थयात्रा करने वाला अन्य सब

भाषार्थसहिता ॥ ८९

चतस्रस्तु परित्याज्याः शिष्यगागुरुगाचया ॥ ११ ॥
पतिघ्नी च विशेषेण जुङ्गितोपगता च या ॥ १२ ॥
याब्राह्मणीसुरापी नतांदेवाःपतिलोकंनयन्ति ।
इहैवसाचरतिक्षीणपुण्याऽप्सुलुग्भवतिशुक्तिकावा ॥१३॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां स्त्रियःशूद्रेणसंगताः ।
अप्रजाताविशुध्यन्ति प्रायश्चित्तेननेतराः ॥
प्रतिलोमंचरेयुस्ताः कृच्छ्रं चान्द्रायणोत्तरम् ॥ १४ ॥
पतिव्रतानांगृहमेधिनीनां सत्यव्रतानांचशुचिव्रतानाम् ।
तासांतुलोकाःपतिभिःसमाना, गोमायुलोकाव्यभिचारिणीनाम् १५
पतत्यर्धंशरीरस्य यस्यभार्यासुरांपिवेत् ।
पतिताधं शरीरस्य निष्कृतिर्नविधीयते ॥ १६ ॥
ब्राह्मणश्चेदप्रेक्षापूर्वं ब्राह्मणदारानभिगच्छेदन्निवृत्तध-


नियम धर्मों से रहित हो जाता है। तथापि मनुष्य को पुत्र शिष्यों की स्त्री, पितादि गुरुओं की पत्नी, पतिको घात करने वाली और वर्जित नीच के साथ संग करने वाली इन चार प्रकार की स्त्रियों को विशेष कर त्यागना चाहिये परन्तु पाप सब के साथ व्यभिचार करने में है॥ ११ । १२ ॥ जो ब्राह्मणी सुरा (मद्य) पीने वाली होती है उस को देवता लोग पति के साथ स्वर्ग में नहीं घूमने देते। वह पुण्य का नाश हो जाने से इसी मर्त्यलोक में विचरती है। जल में डुबकी लगाने वाली पनिहां वा सीपी होती है ॥ १३ ॥ जिन के कोई सन्तान न हुआ हो ऐसी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, की स्त्रियां शूद्र से संग करें तो प्रायश्चित्त से शुद्ध हो सकती हैं किन्तु जिन के सन्तान हो चुके वे शुद्ध नहीं हो सकतीं। वे स्त्रियां उलटा कृच्छ्र व्रत करके चान्द्रायण व्रत करें ॥ १४ ॥ शुद्ध पवित्रता से रहने वालीं, सत्य बोलने वालीं, और पतिव्रता होने से घर को पवित्र करने वालीं स्त्रियों को अपने पतियों के सहित स्वर्ग प्राप्त होता, और व्यभिचारिणी स्त्रियों को शृगाल योनि मिलती है ॥ १५ ॥ जिस द्विज की स्त्री मद्य पीती है उस का आधा शरीर पतित हो जाता है और जिस के शरीर का आधा भाग पतित हो गया उस के शुद्ध होने का प्रायश्चित्त नहीं है ॥ १६ ॥ ब्राह्मण पुरुष यदि बिना विचारे किसी ब्राह्मण की स्त्री से

९० वसिष्ठस्मृतिः ॥

र्मकर्मणः कृच्छ्रो निवृत्तधर्मकर्मणोऽतिकृच्छ्रः ॥ १७ ॥ एवं राजन्यवैश्ययोः ॥१८॥ गां चेद्दुहन्यात्तस्याश्चर्मणाऽऽर्द्रेण परि- वेष्टितः षण्मासान् कृच्छ्रं तप्तकृच्छ्रं वा तिष्ठेत् ॥१९॥ तयो- र्विधिः ॥ २० ॥ त्र्यहं दिवा भुङ्क्ते नक्तमश्नाति वैत्र्यहम् । त्र्यहमयाचितव्रतस्त्र्यहं न भुङ्क्त इति कृच्छ्रः ॥२१॥ त्र्यहमुष्णं पिबेदापस्त्र्यहमुष्णंपयः पिबेत् । त्र्यहमुष्णंघृतं पीत्वा वायुभक्षःपरंत्र्यहम् ॥२२॥ इति तप्तकृच्छ्रः ॥ २३ ॥ ऋषभवेहतौ च दद्यात् ॥ २४ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ २५ ॥ त्रयएव पुरारोगाईर्ष्या अनशनंजरा । पृषद्धुस्तनयंहत्वा अष्टानवतिमाहरेत्, इति ॥ २६ ॥ श्वमार्जारनकुलसर्पदर्दुरमूषकान् हत्वा कृच्छ्रं द्वादश


संग करे और अपने धर्म कर्म में भी तत्पर रहे तो एक कृच्छ्र व्रत करे । और धर्म का नियम छोड़के वैसा किया हो तो अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥ १७ ॥ इसी प्रकार क्षत्रिय तथा वैश्य पुरुष अपने २ वर्ण की स्त्रियों से गमन करें तो भी पूर्वोक्तरीति से ही प्रायश्चित्त जानो ॥१८॥ यदि कोई पुरुष गौ को मारडाले तो उस के गीले चर्म को ओढ़के छः मास तक कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥ १९ ॥ उन दो व्रतों का विधान यह है कि ॥ २० ॥ तीन दिन तक दिन में, तीन दिन तक रात में, परिमित एकवार भोजन करे । तीन दिन बिना मांगे जो मिले वही एकवार खावै और तीन दिन निराहार उपवास करे यह एक कृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ २१ ॥ तीन दिन गर्म जल, तीन दिन गर्म दूध, तीन दिन गर्म घी और तीन दिन वायु मात्र भक्षण करे ॥ २२ ॥ इस बारह दिन के व्रत को तप्तकृच्छ्र कहते हैं ॥ २३ ॥ गर्भवती होने के समय वदाने से जिस का गर्भ गिर जाता हो ऐसी गर्भ को गिराने वाली वेहत् गौ और एक बैल व्रत के अन्त में दक्षिणा देवे ॥ २४ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ २५ ॥ तीन रोग पहिले या मुख्य हैं एक ईर्ष्या, २-उपवास, ३-बुढ़ापा । बूंदों का मारने वाला सन्तान को मार कर अट्टानवे लेलेवे ( ? ) ॥ ॥ २६ ॥ कुत्ता, बिल्ली, न्योला, सांप, मेंडक, मूषा, इन को मारकर बारह दिन

भाषार्थसहिता ॥ ९१

रात्रं चरेत्किंचिद्दद्यात् ॥ २७ ॥ अनस्थिमतां तु सत्त्वानां गोचर्ममात्रं राशिं हत्वा कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरेत्किंचिद्द- द्यात् ॥ २८ ॥ अस्थिमतां त्वेकैकम् ॥ २९ ॥ योऽग्नीनपवि- ध्येत्कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरित्वा पुनराधानं कारयेत् ॥ ३० ॥ गुरोश्चालीकनिर्वन्धः सचैलं स्नातो गुरुं प्रसादयेत्प्रसादा- त्पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ ३१ ॥ नास्तिकः कृच्छ्रं द्वादश- रात्रं चरित्वा विरमेन्नास्तिक्यात् ॥३२॥ नास्तिकवृत्तिस्त्व- तिकृच्छ्रम् ॥ ३३ ॥ एतेन सोमविक्रयी व्याख्यातः ॥ ३४ ॥ वानप्रस्थो दीक्षाभेदे कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरित्वा महाकक्षे वर्धयेत् ॥ ३५ ॥ भिक्षुकैर्वानप्रस्थवल्लोभवृद्धिवर्जं स्वशा- स्त्रसंस्कारश्च स्वशास्त्रसंस्कारश्चेति ॥ ३६ ॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥


कृच्छ्रव्रत करे और कुछ दान भी देवे ॥ २७ ॥ बिना हड्डी वाले जीवों को एक बैल के चाम में जितने भरे जावें उतने मारकर बारह दिन कृच्छ्रव्रत करे और कुछ थोड़ा दान भी करे ॥ २८ ॥ तथा हड्डी वाले एक २ के मारने में भी उतना ही प्रायश्चित्त करे ॥ २९॥ जो पुरुष स्थापित किये अग्नियों (गार्हपत्यादि) को नष्ट करे अर्थात् त्यागे वह बारह दिन कृच्छ्रव्रत करके फिर से अग्नियों को विधिपूर्वक स्थापित करे ॥ ३० ॥ गुरु के साथ मिथ्या भाषण वा छल कपट का व्यवहार करनेवाला सचैल स्नान करके गुरुको प्रसन्न करे तो पवित्र होता यह श्रुति से जाना जाता है ॥ ३१ ॥ नास्तिकपन का कोई काम करे तो बारह दिन का कृच्छ्रव्रत करके नास्तिकता से उपराम (चित्तनिवृत्ति) कर लेवे ॥३२॥ नास्तिकी जीविका करे तो अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥३३॥ सोम बेचनेवाले के लिये भी यही प्रायश्चित्त जानो ॥ ३४ ॥ वानप्रस्थ अपने आश्रम के नियमों को तोड़े तो किसी बड़े कछार में बारह दिन कृच्छ्रव्रत कर के फिर अपने नियम धर्म को बढ़ावे ॥ ३५ ॥ संन्यासियों को लोभ और धर्मादि की वृद्धि का विचार छोड़ के अपना नियम तोड़ने पर वानप्रस्थ के तुल्य प्रायश्चित्त और अपने मोक्ष शास्त्र के संस्कारों को बढ़ाना चाहिये ॥ ३६ ॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में इक्कीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥

१२

९२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

अथ खल्वयं पुरुषो मिथ्या व्याकरोत्ययाज्यं वा याजयति,अप्रतिग्राह्यं वा प्रतिगृह्णाति, अनन्नं वाऽश्नाति, अनाचरणीयमेवाऽऽचरति,तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति मीमांसन्ते,न कुर्यादित्याहुर्नहि कर्म क्षीयतइति, कुर्यादित्येव तस्मात्-श्रुतिनिदर्शनात्तरति सर्वं पाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजतइति ॥ १ ॥ वाचाऽभिशस्तो गोसवेनाग्निष्टुता यजेत ॥२॥ तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवासो दानमुपनिषदो वेदादयो वेदान्ताः सर्वच्छन्दः संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजनिरौहिणे सा-मनो कूष्माण्डानि पावमान्यः सावित्री चेति पावनानि ॥ ३ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ४ ॥

वैश्वानरीव्रतपतीं पवित्रेष्टिंतथैवच ।
सकृदृतौप्रयुञ्जानः पुनातिदशपूरुषम्, इति ॥ ५ ॥


इसके बाद यह विचार करते हैं कि यह मनुष्य मिथ्या बोलता, अनधिकारी नीचों को यज्ञ कराता, अनुचित निषिद्ध दान को लेता,अभक्ष्य पदार्थों को खाता और प्रायः निन्दित शास्त्र विरुद्ध आचरण करता है । उन सब अंशों में प्रायश्चित्त करे ? वा न करे ऐसी मीमांसा करते हैं । पूर्वपक्षी कहते हैं कि प्रायश्चित्त न करे क्योंकि बिना भोगे किया कर्म क्षीण नहीं होता । उत्तर पक्षवाले कहते हैं कि प्रायश्चित्त अवश्य करे क्योंकि श्रुति में लिखा है कि "जो पुरुष अश्वमेध यज्ञ करता है उसके सब पाप छूट जाते हैं । और ब्रह्म हत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है,, ॥१॥ वाणी से निन्दित अर्थात् अति कठोर आदि आचरण करने से निन्दित पुरुष गोसव अग्निष्टुत् यज्ञ करे ॥२॥ उन यज्ञों के प्रत्याम्नाय वा प्रतिनिधि-जप, तप, होम , उपवास , दान, उपनिषद्-वेदादि-वेदान्त, सब छन्द, संहिता, मधुऋचा, अघमर्षण, अथर्वशिरः, रुद्राध्याय, वा रुद्रसूक्त, पुरुष सूक्त, राजन्-रौहिण दोनों साम, कूष्माण्ड सूक्त, पवमान सूक्त, और सावित्री मन्त्र ये सब पावन हैं । इन का जप पाठ शुद्ध होके एकान्त में श्रद्धा से करे ॥ ३ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ४ ॥ वैश्वानरी, व्रतपती, और पवित्रा इष्टि को प्रत्येक ऋतु में एक बार करे तो दश पीढ़ी को पवित्र करता है ॥ ५ ॥

भाषार्थसंहिता ॥ ८३

उपवासन्यायेन पयोव्रतता फलभक्षता प्रसृतयावको हिरण्यप्राशनं सोमपानमिति मेध्यानि ॥ ६ ॥ सर्वे शिलोच्चयाः सर्वाः स्रवन्त्यः पुण्या हृदास्तीर्थान्यृषिनिवासगोष्ठपरिष्कन्धा इति देशाः ॥ ७ ॥ संवत्सरो मासश्चतुविंशत्यहो द्वादशाहः षडहस्त्र्यहोऽहोरात्रञ्चेति कालाः ॥८॥ एतान्येवानादेशे विकल्पेन क्रियेरन्, एनःसु गुरुषु गुरूणि लघुषु लघूनि ॥६॥ कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्वप्रायश्चित्तिः सर्वप्रायश्चित्तिरिति ॥ १० ॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

ब्रह्मचारी चेत्स्त्रियमुपेयादरण्ये चतुष्पथे लौकिकेऽग्नौ रक्षोदैवतं गर्दभं पशुमालभेत, नैऋर्तं वा चरुं निर्वपेत्, तस्य जुहुयात्कामाय स्वाहा, कामकामाय स्वाहा, निर्ऋत्यै स्वाहा, रक्षोदेवताभ्यः स्वाहेति ॥ १ ॥ एनदेव रेतसः प्रयत्नोत्सर्गे


उपवास की रीति से दूध का व्रत, केवल फल खाना, मुट्ठी भर कुलत्थ, सुवर्ण, सोमपान, इनमें से किसी एक को कुछ नियत काल तक सेवन करते हुए व्रत करना बुद्धि को शुद्ध करता है ॥ ६ ॥ सब पर्वत, सब नदियां, तालाब, तीर्थ, ऋषियों के निवास स्थान, गोशाला, बड़े २ प्राचीन नामी वृक्ष वटपीपलादि ये सब पवित्र देश हैं ॥७॥ एक वर्ष, एक महिना, २४ दिन, बारह दिन, छः दिन, तीन दिन, और एक दिन ये प्रायश्चित्त के काल हैं ॥ ८ ॥ इन्हीं में से किसी नियत काल तक विकल्प से अर्थात् किसी अपराध में किसी काल तक प्रायश्चित्त वहां करें कि जहां काल का नियम न किया हो । बड़े पापोंमें बड़ा प्रायश्चित्त और छोटे पापों में छोटा प्रायश्चित्त करे ॥ ९ ॥ कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र, और चान्द्रायण ये सभी अपराधों पर प्रायश्चित्त हैं ॥ १० ॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में बायीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२२॥

यदि ब्रह्मचारी पुरुष किसी स्त्री से वन में संग करे तो चौराहे पर लौकिक अग्नि में राक्षस देवता वाले गर्दभ पशु का आलम्भन करे । अथवा निर्ऋति देवता का विधि पूर्वक चरु बना कर आघारादि पूर्वक (कामाय स्वाहा) इत्यादि चार आहुति देवे ॥ १ ॥ प्रयत्न के साथ वीर्य के निकाल देने, दिन को सोने अथवा अन्य नियमों के टूटने पर भी समावर्त्तन के समय तक

९१ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

दिवा स्वप्ने व्रतान्तरेषु वा ऽऽसमावर्त्तनात्तिर्यग्योनिव्यवाये ॥२॥ शुक्रमृषभं दद्यात् ॥ ३ ॥ गां गत्वा शूद्रावधेन दोषो व्याख्यातः ॥४॥ ब्रह्मचारिणः शवकर्मणो व्रतान्निवृत्तिरन्यत्र मातापित्रोः ॥५॥ स चेद् व्याधीयीत कामं गुरोरुच्छिष्टं भेषजार्थं सर्वं प्राश्नीयात् ॥६॥ गुरुप्रयुक्तश्चेन्म्रियेत त्रीन्कृच्छ्रांश्चरेद् गुरुः ॥ ७ ॥ ब्रह्मचारी चेन्मांसमश्नीयादुच्छिष्टभोजनीयं कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरित्वा व्रतशेषं समापयेत् ॥८॥ श्राद्धसूतकभोजनेषु चैवम् ॥ ९ ॥ अकामतोपनतं मधु वाजसनेयके न दुष्यतीति विज्ञायते ॥१०॥ यआत्मत्याग्यभिशस्तो भवति सपिण्डानां प्रेतकर्मच्छेदः ॥ ११ ॥ काष्ठलोष्टजलपाषाणशस्त्रविषरज्जुभिर्यआत्मानमवसादयति, स आत्महा भवति ॥१२॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १३ ॥


यही प्रायश्चित्त करे। यदि पशुस्त्री गौ आदि से मैथुन करे तो ॥२॥ उक्त होम के पश्चात् श्वेत बैल दक्षिणा में देवे ॥ ३ ॥ गौ के साथ मैथुन करे तो पूर्व कहे शूद्रा स्त्री के वध का प्रायश्चित्त करे ॥४॥ माता पिता के मरण को छोड़ के अन्य के मरने पर ब्रह्मचारी को सूतक का दोष नहीं लगता है ॥ ५ ॥ यदि ब्रह्मचारी रोगी हो जाय तो दवाई के विचार से केवल गुरु का उच्छिष्ट मात्र भोजन करे ॥ ६ ॥ गुरु की प्रेरणा से यदि ब्रह्मचारी मर जावे तो गुरु तीन कृच्छ्रव्रत करके प्रायश्चित्त करे ॥ ७ ॥ ब्रह्मचारी यदि मांस खा लेवे तो उच्छिष्ट भोजनांश द्वारा बारह दिन तक कृच्छ्रव्रत करके प्रायश्चित्त को समाप्त करे ॥ ८ ॥ किसों के श्राद्ध और सूतक में ब्रह्मचारी भोजन करे तो भी यही उक्त प्रायश्चित्त करे ॥ ९ ॥ बिना कामना के ब्रह्मचारी का वीर्य निकल जाय तो मधु वाजसनेय श्रुति से जाना जाता है कि दोष नहीं लगता ॥१०॥ जो निन्दित पुरुष स्वयं आत्मघात करके मरे उस का सपिण्डों को प्रेतनिर्वपणं पिण्डदानादि कर्म नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥ काष्ठ से दब के, मट्टी से दब के, जल में डूब के, पत्थरों से पिच कर वा दब के, शस्त्र से शिर काट कर, विष खाके, और फांसी लगा के जो पुरुष अपनी हत्या करता है वह आत्मघाती होता है ॥१२॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ १३ ॥

भाषार्थसंहिता ॥ ८५

यआत्मत्यागिनःकुर्यात्स्नेहात्प्रेतक्रियां द्विजः । सतप्तकृच्छ्रसहितं चरेच्चान्द्रायणव्रतम्,इति ॥१४॥ चान्द्रायणं परस्ताद्वक्ष्यामः ॥१५ ॥ आत्महननाध्यवसा- ये त्रिरात्रम् ॥ १६ ॥ जीवन्नात्मत्यागी कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरेत्,त्रिरात्रं ह्युपवसेन्नित्यं स्निग्धेन वाससा प्राणानात्म- नि चाऽऽयम्य त्रिः पठेद्घमर्पणमिति ॥ १७ ॥ अपि वैतेन कल्पेन गायत्रीं परिवर्त्तयेत् । अपित्राऽग्निमुपसमाधाय कू- ष्माण्डैर्जुहुया द्धृतम् ॥१८॥ यच्चान्यन्महापातकेभ्यः सर्वमे- तेन पूयत इत्यथाप्याचामेत् ॥१९॥ अग्निश्चमाममन्युश्चेति प्रातर्मनसापापं ध्यात्वोंपूर्वाः सत्यान्ता व्याहृतीर्जपेदघमर्षणं वा पठेत् ॥२०॥ मानुषास्थिस्निग्धं स्पृष्ट्वा त्रिरात्रमाशौच- मस्निग्धे त्वहोरात्रम् ॥ २१ ॥ शवानुगमने चैवम् ॥ २२ ॥


जो पुत्रादि द्विज पुरुष आत्महत्या करने वाले का स्नेह प्रीति मान के प्रेत कर्म करे वह तप्त कृच्छ्र सहित चान्द्रायण व्रत करे ॥ १४ ॥ चान्द्रायण व्रत आगे कहेंगे ॥ १५ ॥ आत्महत्या करने का निश्चय मात्र किया हो तो तीन दिन व्रत करे ॥१६॥ आत्महत्या के लिये विष खाकर वा फांसी आदि लगा कर भी किसी कारण मृत्यु न हो जीवित ही रहे तो बारह दिन कृच्छ्रव्रत करे पश्चात तीन दिन पृथक् उपवास करे, नित्य गीले वस्त्र पहन कर प्राणायाम करता हुआ तीन बार अघमर्षण सूक्त पढ़े ॥१७॥ अथवा उक्त पन्द्रह १५ दिन व्रत के समय गायत्री का निरन्तर जप करे । अथवा विधि पूर्वक अग्नि को सामने रख के प्रति दिन कूष्माण्ड मन्त्रों द्वारा घी से होम के ॥ १८ ॥ महापातकों से भिन्न जो कुछ अपराध किये हों वे सभी इस (१७। १८ सूत्रों में कहे १५ दिन के ) प्रायश्चित्त से दूर हो जाते हैं। निम्न रीति से प्रति दिन आचमन करे ॥ १९ ॥ मन से पाप का ध्यान करके ( अग्निश्चमा० ) मन्त्र से आचमन करे फिर ओं पूर्वक सात व्याहृतियों को अथवा अघमर्षण सूक्त को पढ़े ॥ २० ॥ मनुष्य की गीली हड्डी का स्पर्श करके तीन दिन अशुद्धि और सूखी हड्डी का स्पर्श करे तो एक दिन रात सूतक के तुल्य अशुद्धि मान कर रहे पीछे सूतक के तुल्य शुद्धि करे ॥ २१ ॥ मुर्दा के साथ मरघट तक जावे तो मुर्दा का स्पर्श करने पर तीन दिन तथा स्पर्श न करने पर एक दिन सूतक माने ॥ २२ ॥

९६ वसिष्ठस्मृतिः ॥

अधीयानानामन्तरागमने त्वहोरात्रमभोजनम्, त्रिरात्रमभिषे- को विवासश्चान्योन्येन ॥ २३ ॥ श्वमार्जारनकुलशौघ्रगाणा- महोरात्रम् ॥ २४ ॥ श्वकुक्कुटग्राम्यसूकरकङ्कगृध्रभासपारावत- मानुषकाकोलूकमांसादने सप्तरात्रमुपवासो निष्पुरीषभावो घृतप्राशः पुनःसंस्कारश्च ॥ २५ ॥ ब्राह्मणस्तुशुनादष्टो नदींगत्वा समुद्रगाम् । प्राणायामशतंकृत्वा घृतंप्राश्यततः शुचिः । इति ॥ २६ ॥ कालोऽग्निर्मनसः शुद्धि रुदकार्कावलोकनम् । अविज्ञानंचभूतानां षड्विधाशुद्धिरिष्यते, इति ॥ २७॥ श्वचाण्डालपतितोपस्पर्शने सचैलं स्नातः सद्यः पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ २८ ॥ पतितचाण्डालशववहने त्रिरात्रं वाग्यता अनश्नन्त आसीरन्, सहस्रपरमं वा तदभ्यसन्तः पूता भवन्तीति विज्ञायते ॥ २९ ॥


वेदशास्त्र पढ़ते पढ़ाते हुए गुरु शिष्य के बीच से कोई निकले तो एक दिन रात उपवास करें । तीन दिन अभिषेक करें तथा गुरु शिष्य दोनों तीन दिन दूर २ रहें ॥ २३ ॥ कुत्ता, विलाव, न्योला, वा कोई दौड़ता हुआ वेदाध्यापन के समय गुरु शिष्य के बीच से निकल जावे तो दोनों गुरु शिष्य एक दिन रात उपवास करें ॥ २४ ॥ कुत्ता, मुर्गा, गांव का सुअर, चील्ह, गीध, भास, परेवा, गांव का कौवा, उल्लू, इनका मांस खा लेने पर सात दिन उपवास करे, उदर से मल की शुद्धि, और घी खावे तथा फिर से उपनयन संस्कार करे ॥ २५ ॥ यदि ब्राह्मण को कुत्ते ने काटा हो तो गंगा जी वा समुद्र तक गयी अन्य नदी पर जाके स्नान के पश्चात् सौ प्राणायाम कर घी खाके शुद्ध होता है ॥ २६ ॥ काल बीतना, अग्नि, मन की शुद्धि, जलाशय का दर्शन, सूर्यनारायण का दर्शन, और प्राणियों को न जानना देखना निर्जन एकान्त का वास ये छः प्रकार शुद्धि के साधारण हैं ॥ २७ ॥ कुत्ता, चाण्डाल और पतित का स्पर्श करे तो सचैल स्नान करने से तत्काल शुद्ध हो जाता है यह श्रुति से जाना गया है ॥ २८ ॥ पतित, चाण्डाल और मुर्दा को उठा के ले जाने पर मौन हुए तीन दिन विना कुछ खाते हुए बैठे रहें । और ( सहस्र परमं० ) मन्त्र का जप करें तो शुद्ध होते यह श्रुति से जाना जाता है ॥ २९ ॥ निन्दित निषिद्ध पुरुषों को

भाषार्थसहिता ॥ ९७

एतेनैव गर्हिताध्यापकयाजका व्याख्याताः, दक्षिणात्या- गाच्च पूता भवन्तीति विज्ञायते ॥ ३० ॥ एतेनैवाभिश- स्तो व्याख्यातः ॥ ३१ ॥ अथापरं भ्रूणहत्यायां द्वादशरात्रम- ब्भक्षो द्वादशरात्रमुपवसेत् ॥ ३२ ॥ ब्राह्मणमनृतेनाभिशंस्य पतनीयेनोपपतनीयेन वा मासम्बभक्षः शुद्धवतीरावर्तयेत् ॥ ३३ ॥ अश्वमेघाऽवभृथे वा गच्छेत् ॥ ३४ ॥ एतेनैव चा- ण्डालोव्यवायो व्याख्यातः ॥ ३५ ॥ अथापरः कृच्छ्रविधिः साधारणो व्यूढः ॥ ३६ ॥

अहःप्रातरहर्नक्तमहरेकमयाचितम् ।
अहःपराक्तंन्त्रैकमेवंचतुरहौपरी ॥ ३७ ॥

अनुग्रहार्थंविप्राणां मनुर्धर्मभृतांवरः ।
बालवृद्धातुरेष्वेवं शिशुकृच्छ्रमुवाचह ॥ ३८ ॥

अथ चान्द्रायणविधिः ॥ ३९ ॥

वेद पढ़ाने तथा यज्ञ कराने वालों को भी यही प्रायश्चित्त है। और नीचों से दक्षिणा का त्याग करें तो पवित्र हो जाते हैं ऐसा जाना गया है ॥ ३० ॥ इसी के तुल्य निन्दित का प्रायश्चित्त जानो ॥ ३१ ॥ और भ्रूण हत्या करने पर बारह दिन जल मात्र पी कर रहे तथा बारह दिन सर्वथा उपवास करे इस चौबीश दिन के व्रत से भी शुद्ध होता है ॥३२॥ ब्राह्मण की झूठी निन्दा करे तो महापातक वा उपपातक के तुल्य दोष लगता है उस के लिये एक मास तक जलमात्र पीकर व्रत करता हुआ शुद्धवती ( एतोन्विन्द्रं स्तवाम० । सामसं० उत्तरार्चिके प्र० १२ खं० ३ ) इत्यादि तीन ऋचाओं का वार २ जप करे ॥३३॥ अथवा अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान में विद्वानों की आज्ञा लेकर सम्मिलित हो ॥३४॥ इसी के तुल्य चाण्डाली स्त्री के साथ संग करने पर भी प्रायश्चित्त करे ॥३५॥ अब असमर्थ वृद्ध बालकादि के लिये कृच्छ्र व्रत का छोटा साधारण विधान दिखाते हैं ॥३६॥ एक दिन प्रातःकाल, एक दिन सायंकाल, और एक दिन अयाचित भोजन करे तथा एक दिन सर्वथा उपवास करे । ऐसे चार दिन का यह कृच्छ्र व्रत कहाता है इसी के अनुसार तप्त कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र भी चार २ दिन के जानो ॥३७॥ धर्म को धारण कर ने वालों में श्रेष्ठ मनु जी ने बालक, वृद्ध, रोगी, और साधारण निर्बल ब्राह्मणों पर कृपा दृष्टि करके यह शिशु कृच्छ्र व्रत कहा है ॥ ३८ ॥ अब चान्द्रायण व्रत का विधान दिखाते हैं ॥३९॥

६८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

मासस्यकृष्णपक्षादौ ग्रासानद्याच्चतुर्दश । ग्रासाऽपचयभोजीस्यात्पक्षशेषंसमापयेत् ॥ ४० ॥ एवंहिशुक्लपक्षादौ ग्रासमेकंतुभक्षयेत् । ग्रासोपचयभोजीस्यात्पक्षशेषंसमापयेत् ॥ ४१ ॥ अत्रैवगायेत्सामानि अपिवाव्याहृतीर्जपेत् । एषचान्द्रायणोमासः पवित्रमृषिसंस्तुतः ॥ ४२ ॥ अनादिष्टेषुसर्वेषु प्रायश्चित्तंविधीयतेविधीयत, इति ॥४३॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ अथातिकृच्छ्रः ॥ १ ॥ त्र्यहं प्रातस्तथासायमयाचितं पराकइति कृच्छ्रः ॥ २ ॥ यावत्सकृदाददीत तावदश्नीयात्पूर्ववत्सोऽतिकृच्छ्रः ॥ ३ ॥ अब्भक्षः स कृच्छ्रातिकृच्छ्रः ॥ ४ ॥

महीने के प्रारम्भ में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को चौदह ग्रास खावे फिर द्वितीयादि तिथियों में एक २ ग्रास घटाता जावे । अमावास्या को निराहार उपवास करे ॥४०॥ इसी प्रकार शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास खावे फिर द्वितीयादि तिथियों में एक २ ग्रास बढ़ाता जाय पौर्णमासी को १५ ग्रास खाकर व्रत समाप्त करे ॥ ४१ ॥ चन्द्रमा की कलाओं के घटने बढ़ने के साथ ग्रासों को घटाना बढ़ाना कहा है । इस व्रत में सामवेद का गान अथवा व्याहृतियों का जप अवश्य करे । यह चान्द्रायण महीने भर का व्रत ऋषियों ने पवित्र कहा है ॥४२॥ जिन पापों का कोई प्रायश्चित्त न कहा हो उन सब में चान्द्रायण का ही विधान जानो ॥ ४३ ॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२३॥

अब अतिकृच्छ्र व्रत का विधान दिखाते हैं ॥ १ ॥ तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल, तीन दिन बिन मांगे जो मिले सो खावे और अन्त में तीन दिन उपवास करे यह तो १२ दिन का पूर्वोक्त कृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ २ ॥ इसी क्रम से नौ दिन तक जितना अन्न एक बार में मुख में आसके उतना ही खावे अन्त में तीन दिन उपवास करे वह बारह दिन का अतिकृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ ३ ॥ नौ दिन केवल जल पी के रहे और अन्त में तीन दिन निर्जल निराहार रहे यह कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत कहाता है ॥४॥ कृच्छ्र व्रतों

॥ भाषार्थसंहिता ॥ ९९

कृच्छ्राणां व्रतरूपाणि ॥ ५ ॥ श्मश्रुकेशान्वापयेद्भ्रुवोऽक्षिलोमशिखावर्जं नखान्निक्कृत्यैकवासा अनिन्दितभोजी सकृद्भैक्षमनिन्दितं त्रिषवणमुदकोपस्पर्शी दण्डी सकमण्डलुः स्त्रीशूद्रसंभाषणवर्जी स्थानाऽऽसनशीलोऽहस्तिष्ठेद्रात्रावासीतेत्याह भगवान् वसिष्ठः ॥ ६ ॥ स त्वद्यदेतद्धर्मशास्त्रं नापुत्राय नाशिष्याय नासंवत्सरोपिताय दद्यात् ॥७॥ सहस्रं दक्षिणा ऋषभैकादश गुरुप्रसादो वा गुरुप्रसादो वेति ॥ ८ ॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

अविख्यापितदोषाणां पापानांमहतांतथा । सर्वेषांचोपपापानां शुद्धिंवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १ ॥ आहिताग्नेर्विनीतस्य वृद्धस्यविदुषोऽपिवा । रहस्योक्तंप्रायश्चित्तं पूर्वोक्तमितरैर्जनाः ॥ २ ॥


के नियम दिखाते हैं ॥ ५ ॥ भौंह, आंखें, उदर-भुजादि के लोम तथा चोटी को छोड़ कर प्रथम दाढ़ी मूंछें और शिर के बालों को मुंडावे । फिर नख कटवाके समान कर एक धोती मात्र पहिने हुए, दिनरात में एकबार शुद्ध अनिन्दित भोजन करे, शुद्ध एकान्त में निवास करे, सायं, प्रातः और मध्यान्ह में तीनों बार स्नान करे, दण्ड कमण्डलु आदि ब्रह्मचारी के चिन्ह रक्खे, स्त्री तथा शूद्रादि नीचों से संभाषण न करे, रहने के स्थान और आसन से दूर कहीं न जावे । दिन में खड़ा होके तथा रात्रि में बैठ कर प्रायः जप करता रहे । यह भगवान् वसिष्ठ महर्षि ने कहा है ॥ ६ ॥ वह अध्यापक ब्राह्मण इस महर्षि वसिष्ठ प्रोक्त धर्मशास्त्र को जो विधिपूर्वक शिष्य नहीं हुआ, वा जो एक वर्ष तक निकट में न रहे वा जो पुत्र न हो, ऐसों को यह शास्त्र न पढ़ावे वा न उपदेश करे ॥ ७ ॥ सहस्र स्वर्ण मुद्रा वा सहस्र गौ अथवा दश गौ एक बैल गुरु को शिष्य दक्षिणा देवे अथवा गुरु वैसे ही सन्तुष्ट हों तो भले ही दक्षिणा न लेवें और अधिकारी शिष्य को शास्त्रों का विद्वान् करें ॥८॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौबीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२४॥

जिन के दोष प्रकट नहीं हुए ऐसे छिपे हुए पापों की, तथ बड़े प्रबल महापापों की, और सब उपपातकों की पूरी २ शुद्धि आगे कहते हैं ॥ १ ॥

नम्रभाव से वर्तने वाला आहिताग्नि (अग्निहोत्री,) वृद्ध, तथा, विद्वान् इन के लिये एकान्त में करने योग्य प्रायश्चित्त पूर्व कहा गया । अन्य लोग ॥२॥

१३

१०० 'वसिष्ठस्मृतिः ॥

प्राणायामैःपवित्रैश्च दानैर्होमैर्जपैस्तथा । नित्ययुक्ताःप्रमुच्यन्ते पातकेभ्योनसंशयः ॥ ३ ॥

प्राणायामाःपवित्राणि व्याहृतीःप्रणवंतथा । पवित्रपाणिरासीनो ब्रह्मैनैत्यकमभ्यसेत् ॥ ४ ॥

आवर्तयेत्सदायुक्तः प्राणायामान्पुनःपुनः । आलोमाग्रान्नखाग्राच्च तपस्तप्यतुउत्तमम् ॥ ५ ॥

निरोधाज्जायतेवायु र्वायोरग्निर्हिजायते । तापेनाऽऽपोऽथजायन्ते ततोऽन्तःशुध्यतेत्रिभिः ॥ ६॥

नतांतीव्रेणतपसा नस्वाऽध्यायैर्नचेज्यया । गतिंगन्तुंद्विजाःशक्ता योगात्संप्राप्नुवन्तियाम् ॥ ७ ॥

योगात्संप्राप्यतेज्ञानं योगोधर्मस्यलक्षणम् । यागःपरंतपोनित्यं तस्माद्युक्तःसदाभवेत् ॥ ८ ॥

प्रणवेनिस्ययुक्तःस्याद् व्याहतीषुचसप्तसु । त्रिपदायांचगायत्र्यां नभयंवैविद्यतेक्वचित् ॥९ ॥


प्राणायाम, पवमान सूक्तादि के अभ्यास, सुपात्रों को दान, होम,गायत्र्यादि के जप, इन कामों में नित्य ही श्रद्धा भक्ति से तत्पर रहते हुए पातकों से छूट जाते हैं इस में सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ हाथ में पवित्री वा कुश ले कर पूर्वाभिमुख बैठा हुआ प्राणायाम करके प्रणव और व्याहृतियों के उच्चारण पूर्वक पवमान सूक्तादि रूप वेद का श्रद्धा से नित्य २ अभ्यास करे ॥ ४ ॥ सदा ही तत्पर रहता हुआ श्रद्धा से प्राणायामों की वार २ नित्य आवृत्ति करे । लोमों के अग्रभाग और नखों के अग्रभाग तक सब शरीर से उत्तम तप करे ॥ ५ ॥ प्राण की गति के रोकने से शरीर में वायु बढ़ता, वायु से अग्नि प्रकट होता वा बढ़ता, और अग्नि के ताप से जल बढ़ता है तिस से तीनों तत्त्वों से अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ तीव्र तप से, नियत वेदाध्ययन रूप स्वाध्याय से, और यज्ञों के करने से ब्राह्मण लोग उस उत्तम गति को प्राप्त नहीं होते कि जिस गति को प्राणायामादि योगाभ्यास से प्राप्त हो सकते हैं ॥७॥ योग से ज्ञान प्राप्त होता, योग धर्म का चिन्ह है, योग नित्य ही परम तप है, तिस कारण अपना हित चाहने वाला प्राणायामादि योग में नित्य तत्पर हो ॥८॥ प्रणव, सात व्याहृति, और तीन पाद की गायत्री, इन के जप में जो ब्राह्मण श्रद्धा भक्ति से निरन्तर नित्य तत्पर रहे उस के लिये कहीं भय नहीं है ॥९॥

भाषार्थसहिता ॥ १०९

प्रणवाद्यास्तथावेदाः प्रणवेपर्यवस्थिताः ।
वाङ्मयं प्रणवः सर्वं तस्मात्प्रणवमभ्यसेत् ॥ १० ॥
एकाक्षरंपरंब्रह्म पावनंपरमंस्मृतम् ।
सर्वेषामेवपापानां संकरेसमुपस्थिते ॥ ११ ॥
अभ्यासोदशसाहस्रः सावित्र्याःशोधनंमहत् ॥ १२ ॥
सव्याहृतिंसप्रणवां गायत्रींशिरसासहा ।
त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यतेसउच्यतइति ॥ १३ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
प्राणायामान्धारयेत्त्रीन्यथाविध्यतन्द्रितः ।
अहोरात्रकृतंपापं तत्क्षणादेवनश्यति ॥ १ ॥
कर्मणामनसावाचा यदन्हाकृतमैनसम् ।
आसीनःपश्चिमां सन्ध्यां प्राणायामैर्व्यपोहति ॥ २ ॥
कर्मणामनसावाचा यद्रात्र्याकृतमैनसम् ।
उत्तिष्ठन्पूर्वसन्ध्यान्तु प्राणायामैर्व्यपोहति ॥ ३ ॥
प्राणायामैर्यआत्मानं संयम्याऽऽस्तेपुनःपुनः ।


प्रणव को आदि ले कर वेद चलते हैं अर्थात् प्रणव से वेदों की उत्पत्ति हुई, प्रणव में ही वेदों की स्थिति है। और वाणी का विषय शब्दमात्र सब प्रणव स्वरूप ही है तिस से प्रणव का निरन्तर अभ्यास करे ॥ १० ॥ सब प्रकार के पापों का घाल मेल होकर बड़ा संघट्ट हो जाने पर, पर ब्रह्मस्वरूप एकाक्षर प्रणव का अभ्यास करना परम पवित्र माना गया है ॥ ११ ॥ दश हजार गायत्री का एकान्त में शुद्धि के साथ श्रद्धा पूर्वक जप करना परम शुद्धि करने वाला है अर्थात् इस से अधिकांश पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १२ ॥ प्रणव, व्याहृति और शिरोमन्त्र इन सब के सहित गायत्री को प्राणगति रोक कर तीन वार पढ़े इसी को प्राणायाम कहते हैं ॥ १३ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पच्चीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥

निरालस हो के विधि पूर्वक तीन प्राणायाम नित्य करे तो दिन रात में किया पाप तत्क्षण नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ मन, वाणी तथा शरीर से जो कुछ अपराध दिन भर में किया उस को सायंकाल की सन्ध्या में बैठ कर प्राणायाम करता हुआ नष्ट कर देता है ॥ २ ॥ इसी प्रकार मन, वाणी तथा शरीर से रात्रि में किये दोषों को प्रातःकाल की सन्ध्या में खड़ा हुआ प्राणायामों से नष्ट कर देता है ॥ ३ ॥ जो पुरुष अपने शरीरेन्द्रियों को प्राणायामों की