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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषार्थसहिता ॥ १५

अजाभिघातनेचैव अधिकाङ्गःप्रजायते । अजातेनप्रदातव्या विचित्रवस्त्रसंयुता ॥ ६१ ॥ उरभ्रेनिहतेचैव पाण्डुरोगःप्रजायते । कस्तूरिकापलंदद्याद् ब्राह्मणायविशुद्धये ॥ ६२ ॥ मार्जारैनिहतेचैव जायतेपिङ्गलोचनः । तेनवैदूर्यरत्नानि दातव्यानिस्वशक्तितः ॥ ६३ ॥ जायतेचक्रपादस्तु निहतेशुनिमानवः । निष्कद्वयमितंदद्यान्नकुलंसविशुद्धये ॥ ६४ ॥ शशकेनिहतेचैव कुब्जकर्णस्तुजायते । निष्कत्रयमितंदद्यात्ससुवर्णंविशुद्धये ॥ ६५ ॥ नकुलस्याभिहनने जायतेवक्रमण्डलम् । शय्यांदद्यात्सविप्राय सोपधानांतूलिकाम् ॥ ६६ ॥ शयालुःसर्पहाद्याल्लोहदण्डंसदक्षिणम् । कुब्जोमूषकहाद्यात्सप्तधान्यंसकाञ्चनम् ॥ ६७ ॥


बकरी की हत्या करने पर अङ्गुष्ठा आदि अधिक अङ्गवाला वह जन्मता है इ- लिये वह कई रंगवाले वस्त्र सहित बकरी का दान करे ॥ ६१ ॥ मेढ़ा की ह- त्या करने पर जन्मान्तर में पाण्डुरोग होता है उस पाप की शुद्धि के लिये चार तोला कस्तूरी ब्राह्मण को दान करे ॥ ६२ ॥ बिलाव के मारडालने पर पीली आँखोंवाला जन्मान्तर में होता है। उस को अपनी शक्ति अनुसार वैडूर्य रत्नों का दान करना चाहिये ॥ ६३ ॥ कुत्ते की हत्या करने पर मनुष्य चक्र (पहिये जैसे) पगवाला होता है वह दो तोला सुवर्ण का न्योला बना कर अपनी शुद्धि के लिये दान करे ॥ ६४ ॥ शश (खरहा) के मारने पर कुबड़े कान वाला जन्मान्तर में होता है, वह अपनी शुद्धि के लिये तीन तोला सुवर्ण का दान करे ॥ ६५ ॥ न्योला के मारने पर जन्मान्तर में वक्रमण्डल रोग होता है इस से वह तोशक तकिया सहित नयी खटिया का दान करे ॥ ६६॥ सांप को मारने वाले को निद्रा अधिक तर घेरे रहती है। इस से वह दक्षिणा स- हित लोहे के दण्ड का दान करे। मूषक को मारने वाला कुबड़ा होता है वह सुवर्ण दक्षिणा सहित सतनजा का दान करे ॥ ६७ ॥

१६ शातातपस्मृतिः ॥

मयूरघातनेचाथ जायतेकृष्णमण्डलम् ।
निष्कतत्रयमितोदेयस्तेनस्वर्णमयःशिखी ॥ ६८ ॥
हंसघातीभवेद्यस्तु तस्यस्याच्छ्वेतमण्डलम् ।
रौप्यंपलत्रयमितं हंसंदद्याद्विशुद्धये ॥ ६६ ॥
कुक्कुटेनिहतेचैव वक्रनासःप्रजायते ।
पारावतंससौवर्णं प्रदद्यान्निष्कमात्रकम् ॥ ७० ॥
शुकसारिकयोर्घाती नरःस्खलितवाग्भवेत् ।
सच्छास्त्रपुस्तकंदद्यात्सर्वापायसदक्षिणाम् ॥ ७१ ॥
वकघातीदीर्घनासो दद्याद्गांधवलप्रभाम् ।
काकघातीकर्णहीनो दद्याद्गामसितप्रभाम् ॥ ७२ ॥
हिंसायांनिष्कृतिरियं ब्राह्मणेसमुदाहृता ।
तदर्द्धार्द्धप्रमाणेन क्षत्रियादिष्वनुक्रमात् ॥ ७३ ॥
क्षत्रियोमृगयांचक्रे मृगान्निघ्नन्नदुष्यति ।


मोर के मारने पर कृष्ण मण्डल रोग होता है उस को तीन तोले सुवर्ण का मोर बनवा के दान करना चाहिये ॥ ६८ ॥ जो हंस की हत्या करे उस के जन्मान्तर में श्वेतमण्डल रोग होता है वह अपनी शुद्धि के लिये बारह तोला चांदी का हंस बनवा के दान करे ॥ ६९ ॥ मुर्गा की हत्या करने पर जन्मान्तर में टेढ़ी नासिका वाला होता है। वह एक तोला सुवर्ण का कबूतर बना के दान करे ॥ ७० ॥ तोता और मैना का मारनेवाला पुरुष गूंगा होता है। वह दक्षिणा सहित सत्शास्त्र के पुस्तक का दान ब्राह्मण को देवे ॥ ७१ ॥ बगुला का मारनेवाला बड़ीनाकवाला होता है वह श्वेत गौ का दान करे। कौवे का मारनेवाला बधिर (बहरा) होता वह काली गौ का दान करे ॥ ७२ ॥ यहां तक ब्राह्मण के लिये हिंसा का प्रायश्चित्त कहा गया है। उससे आधा क्षत्रिय को तथा चौथाई प्रायश्चित्त वैश्य को करना चाहिये ॥७३॥ क्षत्रिय पुरुष वन जङ्गल में मृगादि को शिकार करता हुआ दूषित नहीं होता। युद्ध के मैदान में प्राप्त जो क्षत्रिय उस का जो धर्म है उस से वह भले

भाषार्थसंहिता ॥ ९७

तस्ययुद्धाङ्गणगतो योधर्मस्तेनमापयेत् ॥ ७४ ॥ गजादिकान्सप्तदश सप्तसप्तोत्तरान्क्रमात् । निघ्नन्नवाप्नोतिनरश्चिह्नानानिकथितानिच । मयूराद्यास्तथासप्त चतुर्दशोत्तरान्क्रमात् ॥ ७५ ॥ गर्भपातकरीनारी स्वदेहेभोगलिप्सया । सप्तजन्मावधिर्यावन्नरकान्तेहसन्तिका ॥ ७६ ॥ तत्पातकविनाशाय बालं कुर्याद्धिरण्मयम् ॥ ७७ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्म्मविपाके हिंसादि प्रायश्चित्तविधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ सुरापःश्यावदन्तःस्यात् प्राजापत्याष्टकंचरेत् । शर्करायास्तुलाःसप्त दद्यात्पापविशुद्धये ॥ १ ॥ जपित्वातुमहारुद्रं दशांशंजुहुयात्तिलैः ।


ही हिंसा करे ॥ ७४ ॥ हाथी आदि सत्रह परिगणितों को युद्ध में न मारे ( मनु० ७ । ९१-९३ तक में १७ को मारने का निषेध है ) और पिछले ब्राह्मणादि सात २ को मारता हुआ क्षत्रिय भी पूर्वोक्त चिह्नों वाला जन्मान्तर में होता है ( इसी अ० २ के ५२ श्लोक से लेके हाथी आदि १७ के वध के प्रायश्चित्त कहे हैं उन को क्षत्रिय भी शिकार आदि में न मारे ) ६८ श्लोक से लेकर कहे मोर आदि सात ओर उन से पहिले गिनाये चौदह को क्षत्रिय भी यदि मारेगा तो उस को भी पाप लगेगा और जन्मान्तर में वैसे २ चिह्नों वाला होगा ॥ ७५ ॥ अपने शरीर में काम भोग का सुख चाहती हुई नारी यदि गर्भपात करे तो सात जन्मों तक अगौठी बनती है ॥ ७६ ॥ उस पातक को नष्ट करने के लिये सुवर्ण का बालक बना कर वस्त्र सहित ब्राह्मण को दान करे ॥ ७७ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में हिंसादिकर्मविपाक सम्बन्धी प्रायश्चित्तविधायक द्वितीयाध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

सुरा पीनेवाला ब्राह्मण नरक भोग के पश्चात् मनुष्य जन्म में काले दांतवाला होता वह अपने पातक की शुद्धि के लिये आठ प्राजापत्य व्रत और सातपसेरी शक्कर का दान करे ॥ १ ॥ फिर महारुद्र ( रुद्रो के १२१ पाठ ) जप

१८ शातातपस्मृतिः ॥

ततोऽभिषेकःकर्तव्यो मन्त्रैर्वारुणदैवतैः ॥ २ ॥
मद्यपोरक्तपित्तोस्यात्सदद्यात्सर्पिषोघटम् ।
मधुनोऽर्द्धघटंचैव सहिरण्यंविशुद्धये ॥ ३ ॥
अभक्ष्यभक्षणाच्चैव जायतेकृमिकोदरः ।
यथावत्तेनशुद्ध्यर्थमुपोष्यंभीष्मपञ्चकम् ॥ ४ ॥
उदक्यावेक्षितंभुक्त्वा जायतेकृमिलोदरः ।
गोमूत्रयावकाहारस्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥ ५ ॥
भुक्त्वाचास्पृश्यसंयुक्तो जायतेकृमिलोदरः ।
त्रिरात्रंवैष्णवंकृत्वा सततपातकशान्तये ॥ ६ ॥
श्वमार्जाररादिभिःस्पृष्टं भुक्त्वादुर्गन्धवान्भवेत् ।
पीत्वात्रिरात्रंगोमूत्रं भोजयेद्ब्राह्मणत्रयम् ॥ ७ ॥
अनिवेद्यसुरादिभ्यो भुञ्जानोजायतेनरः ।
भोजयेत्त्रिशतान्विप्रान्सहस्रंतुप्रमाणतः ॥ ८ ॥
परान्नविघ्नकरणादजीर्णमभिजायते ।


करा के घृत मिले तिलों से दशांश होम करे। फिर वरुण देवतावाले मन्त्रों से यजमान का अभिषेक विद्वान् लोग करें ॥ २ ॥ मद्य पीनेवाला जन्मान्तर में रक्त पित्त रोगयुक्त होता है वह अपनी शुद्धि के लिये एक घड़ा भर घी और आधा घड़ा शहद का सुवर्ण सहित दान करे ॥ ३ ॥ अभक्ष्य भक्षण करने से जन्मान्तर में उदरकृमि रोग युक्त होता है । वह अपनी शुद्धि के लिये भीष्मपञ्चक के (कात्तिक शुक्ल ११ एकादशी से पौर्णमासी तक) पांच दिन यथावत् उपवास करे ॥ ४ ॥ रजस्वला के देखे हुए का भोजन करने पर पेट में कृमि रोगवाला होता है । वह गोमूत्र सहित कुलत्थ को तीनदिन तक खाता हुआ व्रत करे तो शुद्ध होता है ॥५॥ स्पर्श न करने योग्य चाण्डालादि के मेल में भोजन करने पर उदर कृमिरोग युक्त होता है । वह उस पातक की शान्ति के लिये विष्णुभगवान् की पूजा उपासना का व्रत तीन दिन करे ॥ ६ ॥ कुत्ता बिल्ली आदि का छुआ भोजन करके दुर्गन्ध युक्त होता है । वह तीन दिन तक गोमूत्र पीकर उपवास करके तीन ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥७॥ जो देवतादि को भोग वा देवेयज्ञादि न करके भोजन करता है वह नास्तिक होता, वह एक हजार वा तीनसौ ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥८॥ अन्यके भोजन में वि-

भावार्थसहिता ॥ १९

लक्षहोमंसकुर्वीत प्रायश्चित्तंयथाविधि ॥ ९ ॥
मन्दोदराग्निर्भवति सतिद्रव्येकदन्नदः ।
प्राजापत्यत्रयं कुर्याद् भोजयेच्चशतंद्विजान् ॥ १० ॥
विषदःस्याच्छर्दिरोगो दद्याद्दशपयस्विनीः ।
मार्गहापादरोगोस्यात्सोऽश्वदानंसमाचरेत् ॥ ११ ॥
पिशुनोनरकस्यान्ते जायतेश्वासकासवान् ।
घृतंतेनप्रदातव्यं सहस्रपलसम्मितम् ॥ १२ ॥
द्यूतोऽपस्माररोगीस्यात्तत्पापविशुद्धये ।
ब्रह्मकूर्चत्रयंकृत्वा धेनुंदद्यात्सदक्षिणाम् ॥ १३ ॥
शूलीपरोपतापेन जायतेतत्प्रमोचने ।
सोऽन्नदानंप्रकुर्वीत तथारुद्रंजपेन्नरः ॥ १४ ॥
दावाग्निदायकश्चैव रक्तातीसारवान्भवेत् ।
तेनोदपानंकर्त्तव्यं रोपणीयस्तथावटः ॥ १५ ॥
सुरालयेजलेवापि सकृद्विष्टांकरोतियः ।


घ्र करने से अजीर्ण रोगी होता है। वह विधिपूर्वक एक लाख आहुति गायत्री से घी मिले तिलों का होम करे ॥९॥ द्रव्य नाम धन सम्पत्ति अच्छी होने पर भी निकृष्ट अन्न का दान करने वाला मन्दाग्नि रोग युक्त होता है वह तीन प्राजापत्य व्रत करके सौ १०० ब्राह्मण जिमावे ॥ १० ॥ विष देने वाला जन्मान्तर में वमन रोगी होता है। वह दूध देती हुई दश गौओं का दान करे। मार्ग को नष्ट करने वाला पगों में रोगी होता है वह घोड़े का दान करे ॥ ११ ॥ चुगली निन्दा करनेवाला नरक भोग के अन्त में श्वास कास (दमा) का रोगी होता है उसको एक मन भर ४० सेर घी का दान करना चाहिये ॥१२॥ जुआ खेलने वाला मृगी रोग युक्त होता है वह उस पाप की शुद्धि के लिये पराशरस्मृति के ११वें अ० में कहे तीन ब्रह्म कूर्च व्रत करके दक्षिणा सहित दूध देने वाली गौ का दान करे ॥ १३ ॥ अन्यों को दुःख देने वाला जन्मान्तर में शूल रोग युक्त होता है वह उस को छुड़ाने के लिये अन्न का दान और रुद्रों का पाठ करे ॥ १४ ॥ वन में आग लगाने वाला रक्तातीसार (रुधिर के दस्त) रोग युक्त होता है वह वटका वृक्ष लगावे और प्याऊ बैठावे ॥ १५ ॥ देव मन्दिर में वा जलाशय में एक बार भी

२० शातातपस्मृतिः ॥

गुदरोगोभवेत्तस्य पापरूपःसुदारुणः ॥ १६ ॥
मासंसुरार्चनेनैव गोदानद्वितयेनतु ।
प्राजापत्येनचैकेन शाम्यन्तिगुदजारुजः ॥ १७ ॥
गर्भस्तम्भकरीनारी काकवन्ध्याप्रजायते ।
तयाकार्यंप्रयत्नेन गोदानंविधिपूर्वकम् ॥ १८ ॥
गर्भपातनजारोगा यकृत्प्लीहजलोदराः ।
तेषांप्रशमनार्थाय प्रायश्चित्तमिदंस्मृतम् ॥ १९ ॥
एतेषुदद्याद्विप्राय जलधेनुंविधानतः ।
सुवर्णरूप्यताम्राणां पलत्रयसमन्विताम् ॥ २० ॥
प्रतिमाभङ्गकारीच व्रणकायःप्रजायते ।
संवत्सरत्रयंसिंचेदश्वत्थंप्रतिवासरम् ॥ २१ ॥
उद्वाहयेत्तमश्वत्थं स्वगृहोक्तविधानतः ।
तत्रसंस्थापयेद्देवं विघ्नराजंसुपूजितम् ॥ २२ ॥
दुष्टवादीखण्डितःस्यात्सर्वंदद्याद्विजातये ।


जो मल मूत्र त्याग करे उन के गुदेन्द्रिय में पाप रूप भयङ्कर रोग होता है ॥ १६ ॥ एक महीने तक देवता का पूजन करने, दो गो देने, और एक प्राजापत्य व्रत करने से गुदा के रोग शान्त होते हैं ॥ १७ ॥ गर्भस्थिति को रोकने वाली स्त्री काक वन्ध्या होती है । उस को यत्न के साथ विधि पूर्वक गोदान करने चाहिये ॥ १८ ॥ गर्भपात कराने से यकृत्-प्लीह-जलोदर रोग होते हैं उन की शान्ति के लिये आगे प्रायश्चित्त यह कहते हैं कि ॥१९॥ इन यकृत् आदि रोगों की शान्ति के लिये चार २ तोला सुवर्ण, चांदी और तांबा से युक्त विधि पूर्वक जल धेनु ब्राह्मण को देवे ॥ २० ॥ प्रतिमा को तोड़ने वाले के शरीर में अधिकांश फोड़ा फुंसी होते हैं वह पुरुष तीन वर्ष तक प्रति दिन पीपल वृक्ष के मूल में जल दिया करे ॥ २१ ॥ और अपने गृहासूत्रोक्त विधि से उस पीपल का विवाह करे । तथा उस पीपल के नीचे विघ्नों के राजा गणेश जी देवता का स्थापन करके पूजन करे ॥ २२ ॥ दुष्ट वचन बोलने वाला खण्डित ( अङ्गहीन ) होता है । वह दो घड़े दूध सहित आठ तोला चांदी

भाषार्थसहिता ॥ २१

रूप्यंपलद्वयंदुग्धं घटद्वयसमन्वितम् ॥ २३ ॥ खल्वाटःपरनिन्दायां धेनुंदद्यात्सकाञ्चनाम् । परोपहासकृत्काणः सगांदद्यात्समौक्तिकाम् ॥ २४ ॥ सभायांपक्षपातीच जायतेपक्षघातवान् । निष्कत्रयमितंहेम सदद्यात्सत्यवर्त्तिनाम् ॥ २५ ॥ इति शातातपोये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके प्रकीर्णप्रा- यश्चित्तं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ कुलघ्नो नरकस्यान्ते जायते विप्रहेमहृत् । सतुस्वर्णशतंदद्यात्कृत्वाचान्द्रायणत्रयम् ॥ १ ॥ औदुम्बरीताम्रचौरौ नरकान्तेप्रजायते । प्राजापत्यंसकृच्चैवं ताम्रंपलशतंदिशेत् ॥ २ ॥ कांस्यहारीचभवति पुण्डरीकसमन्वितः । कांस्यंपलशतंदद्यादुपोष्यादिवसंनरः ॥ ३ ॥ रीतिहृत्पिङ्गलाक्षःस्यादुपोष्यहरिवासरम् ।


सुपात्र ब्राह्मण को दान देवे ॥ २३ ॥ अन्य की निन्दा करने पर गंजा होता है तब सुवर्ण सहित दूध वाली गौ का दान करे । अन्यों का उपहास ( न- कलादि ) करने वाला काणा ( एकाक्ष ) होता है वह मोतियों सहित गौ का दान करे ॥ २४ ॥ सभा में पक्षपात करने वाला पक्षाघात राग युक्त होता है । वह सत्य के आचरणी सुपात्र ब्राह्मणों को तीन तोला सुवर्ण का दान करे ॥ २५ ॥ यह शातातपीय धर्मशास्त्र के कर्मविपाक विषय में मिश्रित प्राय- श्चित्त वर्णन तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥ ब्राह्मण का सुवर्ण चुराने वाला नरक भोग के अन्त में कुलघ्न (जिस से आगे कुल न चले) होता है। वह तीन चान्द्रायण व्रत करके सौ १०० अशर्फी सुवर्ण का दान करे ॥१॥ तांबे को चुराने वाला नरक भोग के अन्त में औदुम्बरी रोग युक्त होता है। वह प्राजापत्य व्रत करके चार सेर तांबे के पात्रों का दान करे ॥२॥ कांसे को चुरानेवाला पुण्डरीकरोग युक्त होता है वह एक दिन उपवास करके कांसे के चारसेर पात्रों का दान करे ॥ ३ ॥ पीतल चुरानेवाला पीली आंखों से युक्त

२२ शातातपस्मृतिः॥

रीतिंपलशतंदद्यादलङ्कृत्यद्विजंशुभम् ॥ ४ ॥
मुक्ताहारीचपुरुषो जायतेपिङ्गमूर्द्धजः ।
मुक्ताफलशतंदद्यादुपोष्यसविधानतः ॥ ५ ॥
त्रपुहारीचपुरुषो जायतेनेत्ररोगवान् ।
उपोष्यदिवसंचापि दद्यात्पलशतंत्रपु ॥ ६ ॥
सीसहारीचपुरुषो जायेतशीर्षरोगवान् ।
उपोष्यदिवसंदद्याद् घृतधेनुंविधानतः ॥ ७ ॥
दुग्धहारीचपुरुषो जायतेबहुमूत्रकः।
सद्याद्दुग्धधेनुंच ब्राह्मणावयथाविधि॥ ८ ॥
दधिचौरश्चपुरुषो जायतेमद्गवान्यतः ।
दधिधेनुःप्रदातव्या तेनविप्रायशुद्धये ॥ ९ ॥
मधुचोरस्तुपुरुषो जायतेदांतरोगवान् ।
सद्यान्मधुधेनुंच समुपोष्यद्विजातये ॥ १० ॥
इक्षोर्विकारहारीच भवेद्गुदरुगान्वितः ।


होता है। वह एकादशी के दिन उपवास करके पीतल के चार सेर पात्रों का सुपात्र ब्राह्मण को वस्त्रादि सहित दान करे ॥ ४ ॥ मोती चुरानेवाला पुरुष पीले केशोंवाला होता है। वह एक दिन उपवास करके विधिपूर्वक सौ १०० मोती का दान करे ॥ ५ ॥ रांगा का चुरानेवाला पुरुष नेत्र का रोगी होता वह एक दिन उपवास करके चार सेर रांगे का दान करे ॥ ६ ॥ सीसे का चुरानेवाला शिर के रोग से युक्त होता है वह एक दिन उपवास करके घी की कागद में रखकर विधिपूर्वक घी का दान करे ॥ ७ ॥ दूध चुरानेवाला बहुमूत्ररोग युक्त होता है वह विधिपूर्वक ब्राह्मण को दुग्ध धेनु का दान करे ॥८॥ दही चुराने से मनुष्य मन्द ( मदयुक्त ) होता है उसको अपनी शुद्धि के लिये दधि धेनु का ब्राह्मण के लिये दान देना चाहिये ॥ ९ ॥ शहद चुरानेवाला पुरुष दांत के रोग से युक्त होता है वह एक दिन उपवास करके ब्राह्मण को मधु धेनु देवे ॥ १० ॥ ईख के विकार रस गुड़ आदि को चुरानेवाला

भाषाधर्मसंहिता ॥ २३

गुड़धेनुःप्रदातव्या तेनतद्दोषशान्तये ॥ ११ ॥ लोहहारीचपुरुषो जायतेबर्बरोगवान् । लोहंपलशतंदद्यादुपोष्यसतुवासरम् ॥ १२ ॥ तैलचोरस्तुपुरुषोभवेत्कण्ड्वादिपीडितः । उपोष्यसतुविप्राय दद्यात्तैलघटद्वयम् ॥ १३ ॥ आमान्नहरणाच्चैव दन्तहीनःप्रजायते । सदद्यादश्विनौहेमनिष्कद्वयविनिर्मितौ ॥ १४ ॥ पक्वान्नहरणाञ्चैव जिह्वारोगःप्रजायते । गायत्र्याःसजपेल्लक्षं दशांशंजुहुयात्तिलैः ॥ १५ ॥ फलहारीचपुरुषो जायतेव्रणिताङ्गुलिः । नानाफलानामयुतं सदद्यादथद्विजन्मने ॥ १६ ॥ ताम्बूलहरणाञ्चैव श्वेतोष्ठःसंप्रजायते । सदक्षिणांप्रदद्याच्च विद्रुमस्यद्वयंवरम् ॥ १७ ॥ शाकहारीचपुरुषो जायतेनीललोचनः ।


उदर में गुल्मरोग युक्त होता है उसको अपने दोष की शान्ति के लिये गुड़ धेनु का दान करना चाहिये ॥ ११ ॥ लोहा चुरानेवाला पुरुष बर्बरोगवाला होता है वह एक दिन उपवास करके चार सेर लोहे का दान करे ॥ १२ ॥ तैल चुरानेवाला पुरुष खुजली के राखादि से पीड़ित होता है वह दिनभर उपवास करके दो घड़े तेल ब्राह्मण को दान करे ॥ १३॥ कच्चा अन्न चुरानेवाला दांतों से हीन होता है । वह आठ तोला सुवर्ण से अश्विनी कुमार देवों की प्रतिमा बनाके दान करे ॥ १४ ॥ पकाया अन्न चुराने से जीभ में रोग होता है वह एक लाख गायत्री का जप करके घी युक्त तिलों से दशांश होम करे ॥१५॥ फल चुरानेवाला अंगुलियों में फोड़ा फुंसी युक्त होता है वह अनेक प्रकार के दशहजार फलों का दान ब्राह्मण को देवे ॥ १६ ॥ पान ( ताम्बूल ) चुराने से श्वेत ओठोंवाला होता है वह दो उत्तम मूंगा (पन्नादी) दक्षिणा देवे ॥१७॥ शाक चुरानेवाला पुरुष नीली आंखों से युक्त होता है । वह ब्राह्मण को दो महार-

२४ शातातपस्मृतिः ॥

ब्राह्मणायप्रदद्याद्वै महानीलमणिद्वयम् ॥ १८ ॥ कन्दमूलस्यहरणाद् ह्रस्वपाणिःप्रजायते । देवतायतनंकार्य्यमुद्यानंतेनशक्तितः ॥ १९ ॥ सौगन्धिकस्यहरणाद् दुर्गन्धाङ्गःप्रजायते । सलक्षमेकंपद्मानां जुहुयाज्जातवेदसि ॥ २० ॥ दारुहारीचपुरुषः खिन्नपाणिःप्रजायते । सदद्याद्विदुषेशुद्धौ काश्मीरजपलद्वयम् ॥ २१ ॥ विद्यापुस्तकहारीच किलमूकःप्रजायते । न्यायेतिहाससंध्यात्स ब्राह्मणायसदक्षिणम् ॥ २२ ॥ वस्त्रहारीभवेत्कुष्ठी संप्रदद्यात्प्रजापतिम् । हेमनिष्कमितंचैव वस्त्रयुग्मंद्विजातये ॥ २३ ॥ ऊर्णीहारीलोमशःस्यात् सदद्यात्कंबलान्वितम् । स्वर्णनिष्कमितंहेम वह्निंदद्याद्विजातये ॥ २४ ॥ पट्टसूत्रस्यहरणान्निर्लोमाजायतेनरः ।


नील मणि दक्षिणा में देवे ॥ १८ ॥ कन्द तथा मूलों के चुराने पर छोटे २ हाथों वाला होता है उसको यथाशक्ति देव मन्दिर और बगीचा लगवाना चाहिये ॥ १९ ॥ सुगन्धि की चोरी करने से दुर्गन्ध अङ्गों से युक्त होता है । वह एक लाख कमलों का अग्नि में होम करे ॥ २० ॥ काष्ठ की चोरी करनेवाले के हाथों में खेद हुआ करता है वह विद्वान् को आठ तोला मणिका हीर।दिका दान करे ॥ २१ ॥ विद्या के पुस्तक को चुरानेवाला निश्चयकर मूक (गूंगा) होता है वह न्याय और इतिहास के पुस्तकों का दक्षिणा सहित दान करे ॥ २२ ॥ वस्त्र चुरानेवाला कुष्ठरोगी होता है वह चार तोला सुवर्ण से प्रजापति की प्रतिमा बनाकर दो वस्त्रों सहित ब्राह्मण को दान करे ॥ २३ ॥ ऊन चुरानेवाला शरीर पर बहुत रोम युक्त होता है वह चार तोले सुवर्ण से अग्नि देवता की प्रतिमा बनाकर एक कम्बल सहित ब्राह्मण को दान देवे ॥ २४ ॥ रेशम का वस्त्र चुराने से मनुष्य सर्वथा लोमों से रहित होता है वह अपनी शुद्धि के

भाषार्थसंहिता ॥ २५

तेनधेनुःप्रदातव्या विशुद्धयर्थंद्विजन्मने ॥ २५ ॥ औषधस्यापहरणे सूर्यावर्त्तःप्रजायते । सूर्यायार्घ्यःप्रदातव्यो माषंदेयंचकाञ्चनम् ॥ २६ ॥ रक्तवस्त्रप्रवालादि हारीस्याद्रक्तवातवान् । सवस्त्रांमहिषींदद्यान्मणिरागसमन्विताम् ॥ २७ ॥ विप्ररत्नापहारीचाप्यनपत्यःप्रजायते । तेनकार्यंविशुद्ध्यर्थं महारुद्रजपादिकम् ॥ २८ ॥ मृतवत्सोदितःसर्वो विधिरत्रविधीयते । दशांशहोमःकर्त्तव्यः पालाशेनयथाविधि ॥ २९ ॥ अनड्वान्वस्त्रसंयुक्तः पलार्द्धाद्धंचकाञ्चनम् । निर्धनेनप्रकर्त्तव्यं द्विजस्यमुच्यतेक्षणात् ॥ ३० ॥ ब्राह्मणस्यधनंलोभाद्योनार्पयतिमूढधीः । निर्वंशोजायतेतस्य दद्याद्दशपयस्विनीः ॥ ३१ ॥


लिये ब्राह्मण को गौ का दान देवे ॥ २५ ॥ औषधों के चुराने पर सूर्यावर्त्त नामक शिर के रोग से युक्त होता है वह सूर्यनारायण को नित्य अर्घ्य दिया करे और एक माषा सुवर्ण का दान करे ॥२६॥ वस्त्र और मूंगादि सुर्ख पदार्थों को चुरानेवाला वातरक्त रोग युक्त होता है वह रक्तमणि और रक्तवस्त्र सहित भैंसी का दान करे ॥ २७ ॥ ब्राह्मण के रत्न ( उत्तम ) पदार्थों को चुरानेवाला सन्तान हीन निर्वंशी होता है उसको अपनी शुद्धि के लिये महारुद्र ( पीछे कहे १२१ रुद्री के पाठ ) करने चाहिये ॥२८॥ जिसके पुत्र मर२ जाते हैं उसके लिये जो श्लोक ३१ से ४१ तक अ० २ में विधान कह चुके हैं वही सब यहां करे और ढांककी समिधाओं को घृताक्त कर २ उनसे दशांश होम करे ॥२९॥ और प्रायश्चित्ती मनुष्य निर्धन हो तो एक तोला सुवर्ण और वस्त्र सहित एक बैल का दान करे तो ब्राह्मण के अपराध से मुक्त होजाता है ॥ ३० ॥ जो मूढ पुरुष धरोहर में रक्खे ब्राह्मण के धनको लोभ से मारलेता है वह निर्वंशी होजाता है इससे वह दूध देतीं हुई दश गौओं का सुपात्र ब्राह्मणों को दान देवे ॥३१॥

२६ शातातपस्मृतिः ॥

देवस्वहरणाच्चैव जायतेविविधोज्वरः । ज्वरोमहाज्वरश्चैव रौद्रोवैष्णवएवच ॥ ३२ ॥ ज्वरेरौद्रंजपेत्कर्णे महारुद्रंमहाज्वरे । अतिरौद्रंजपेद्रौद्रे वैष्णवेतद्द्वयंजपेत् ॥ ३३ ॥ नानाविधद्रव्यचौरो जायतेग्रहणीयुतः । तेनान्नोदकवस्त्राणि हेमदेयंचशक्तितः ॥ ३४ ॥ माषतिललोहहारी गजचर्माप्रजायते । माषद्वयमितांदद्याद् धेनुंद्विपतिलान्विताम् ॥ ३५ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके स्तेयप्रायश्चित्तं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ मातृगामीभवेद्यस्तु लिङ्गंतस्यविनश्यति । चाण्डालीगमनेचैव हीनकोशःप्रजायते ॥ १ ॥ तस्यप्रतिक्रियांकर्त्तुं कुम्भमुत्तरतोन्यसेत् ।


देव पूजा सम्बन्धी धनके चुरानेसे रौद्र ज्वर, वैष्णवज्वर, इत्यादि अनेक प्रकार का ज्वर अपराधी को होता है ॥ ३२ ॥ साधारण ज्वर में अपराधी के निकट रुद्री के ११ पाठ, महाज्वर में महारुद्र (रुद्री के १२१ पाठ) रौद्रज्वर में अतिरौद्र (रुद्री के १३३१ पाठ) और वैष्णवज्वर में महारुद्र अतिरुद्र दोनों का अनुष्ठान करावे । पीछे तदनुसार दशांश का होम कराया जाय ॥ ३३ ॥ अनेक प्रकार के द्रव्यों को चुरानेवाला संग्रहणीरोग युक्त होता है उसको अन्न, जल, वस्त्र और सुवर्ण का यथाशक्ति दान करना चाहिये ॥ ३४ ॥ उड़द, तिल और लोहे को चुरानेवाला हाथी के तुल्य चर्म रोगवाला होता है वह दो मासे सुवर्ण की धेनु को हाथी से स्पर्श कराये तिलों सहित दान करे ॥ ३५ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के कर्मविपाक विषय में चोरी का प्रायश्चित्तरूप चतुर्थोऽध्याय पूरा हुआ ॥

माता से गमन करनेवाले का नरक भोगके अन्त में होनेवाले मनुष्य जन्म में लिङ्गेन्द्रिय नष्ट होजाता है। और चाण्डाली से गमन करने पर अण्डकोशों से हीन उत्पन्न होता है ॥ १ ॥ उस पाप की निवृत्ति के लिये पुनीत स्थान

भाषार्थसहिता ॥ २७

कृष्णवस्त्रसमाच्छन्नं कृष्णमाल्यविभूषितम् ॥ २ ॥ तस्योपरिन्यसेद्देवं कांस्यपात्रेधनेश्वरम् । सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितंनरवाहनम् ॥ ३ ॥ यजेत्पुरुषसूक्तेन धनदंविश्वरूपिणम् । अथर्ववेदविद्विप्रो ह्याथर्वणंसमाचरेत् ॥ ४ ॥ सुवर्णपुत्तलिकांकृत्वा निष्कविंशतिसंख्यया । दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ ५ ॥ निधीनामधिपोदेवः शंकरस्यप्रियसखा । सौम्याशाधिपतिःश्रीमान् ममपापंव्यपोहतु ॥ ६ ॥ इमंमन्त्रंसमुच्चार्य आचार्याययथाविधि । दद्याद्देवंहीनकोशो लिङ्गनाशेविशुद्धये ॥ ७ ॥ गुरुजायाभिगमनान्मूत्रकृच्छ्रःप्रजायते । तेनापिनिष्कृतिःकार्य्या शास्त्रदृष्टेनकर्मणा ॥ ८ ॥


के उत्तरभाग में एक कलश स्थापितकरे उसको कालेवस्त्र और काले फूलों की माला से शोभित करे ॥२॥ उस कलश के समीप में एक कांसे के पात्र में कुबेर देवता की प्रतिमा चौबीस तोला सुवर्ण की बनवाके (जो मनुष्य पर सवार हो ऐसी प्रतिमाको) स्थापित करे ॥३॥ फिर सर्वरूप कुबेर देवता का पुरुष सूक्त से पूजन करे । और अथर्ववेदी ब्राह्मण अथर्व का पाठ भी वहीं करे ॥४॥ फिर अस्सी तोला सुवर्ण की एक पुतली (कुबेर देव की प्रतिमा) बनाकर उसका सम्यक् पूजन करके 'मैं निष्पाप होऊँ' ऐसा कहता हुआ निम्न रीति से ब्राह्मण को दान कर देवे ॥५॥ सब खज़ानों के मालिक, शंकर भगवान् के प्रियमित्र, उत्तर दिशा के स्वामी श्रीमान् कुबेरदेव मेरे पाप को नष्ट करें ॥६॥ अण्डकोशों से हीन होने वा लिङ्गेन्द्रिय हीन होने के अपराध से मुक्त होने के लिये ( निधीनामधिपो० ) इस मन्त्र का उच्चारण करके देव प्रतिमा का विधि पूर्वक आचार्य को दान कर देवे ॥ ७ ॥ गुरुपत्नी के साथ गमन करने से मूत्र कृच्छ्र रोग से युक्त होता है । उस को धर्म शास्त्रोक्त कर्म द्वारा प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ८ ॥

२८ शातातपस्मृतिः ॥

स्थापयेत्कुम्भमेकन्तु पश्चिमायांश्रुभेदिने ।
नीलवस्त्रसमाच्छन्नं नीलमाल्यविभूषितम् ॥ ६ ॥
तस्योपरिन्यसेद्देवं ताम्रपात्रेप्रचेतसम् ।
सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितांयादसाम्पतिम् ॥ १० ॥
यजेत्पुरुषसूक्तेन वरुणंविश्वरूपिणम् ।
सामविद्ब्राह्मणस्तत्र सामवेदंसमाचरेत् ॥ ११ ॥
सुवर्णपुत्तिकांकृत्वा निष्कविंशतिसंख्यया ।
दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ १२ ॥
यादसामधिपोदेवो विश्वेषामपिपावनः ।
संसाराब्धौकर्णधारो वरुणःपावनोऽस्तुमे ॥ १३ ॥
इमंमन्त्रंसमुच्चार्य आचार्याययथाविधि ।
दद्याद्देवमलङ्कृत्य मूत्रकृच्छ्रप्रशान्तये ॥ १४ ॥
स्वसुतागमनेचैव रक्तकुष्ठंप्रजायते ।
भगिनीगमनेचैव पीतकुष्ठंप्रजायते ॥ १५ ॥
तस्यप्रतिक्रियांकर्तुं पूर्वतःकलशंन्यसेत् ।


किसी शुभ दिन पूजन स्थान के पश्चिम भाग में एक कलश नीले वस्त्र और नीले फूलों से शोभित करके स्थापित करे ॥ ९ ॥ उस कलश के ऊपर तांबे के पात्र में २४ तोला सुवर्ण से बनायी जल के अधिष्ठाता वरुण देवता की प्रतिमा स्थापित करे ॥ १० ॥ फिर विश्वरूपी वरुण देवका पुरुष सूक्त के मन्त्रों से पूजन करे और साथ ही सामवेदी ब्राह्मण सामगान करे ॥ ११ ॥ फिर अस्सी तोला सुवर्ण की प्रतिमा वरुण देवता की बनाके उस का सम्यक् पूजन करके (मैं निष्पाप हो जाऊं) ऐसा कहता हुआ निम्न रीति से ब्राह्मण गुरु को प्रतिमा का दान करे ॥ १२ ॥ सब को पवित्र करने वाले जल के अधिष्ठाता, संसार समुद्र से पार करने वाले (मल्लाह) वरुण देव मुझ को पवित्र करने वाले हों ॥ १३ ॥ इस मन्त्र का उच्चारण करके मूत्रकृच्छ्र की शान्ति के अर्थ पुष्पादि से भूषित देव प्रतिमा को विधि पूर्वक गुरु के लिये देवे ॥ १४ ॥ अपनी पुत्री से गमन करने पर जन्मान्तर में रक्त कुष्ठी होता और भगिनी से गमन करने पर पीत कुष्ठी होता है ॥ १५ ॥ उस का प्रायश्चित्त करने के लिये

भाषाऽर्थसहिता ॥ २५

पीतवस्त्रसमाच्छन्नं पीतमाल्यविभूषितम् ॥ १६ ॥ तस्योपरिन्यसेत्स्वर्ण पात्रेदेवंसुरेश्वरम् । सुवर्णनिष्कषट्केन निर्मितंवज्रधारिणम् ॥ १७ ॥ यजेत्पुरुषसूक्तेन वासवंविश्वरूपिणम् । यजुर्वेदंतत्रसाम ऋग्वेदंचसमापयेत् ॥ १८ ॥ सुवर्णपुत्तिकांकृत्वा सुवर्णदशकेनतु । दद्याद्विप्रायसंपूज्य निष्पापोऽहमितिब्रुवन् ॥ १९ ॥ देवानांमधिपोदेवो वज्रीकुलिशकेतनः । शतयज्ञःसहस्राक्षः पापंममनिकृन्ततु ॥ २० ॥ इमंमन्त्रंसमुच्चार्य्य आचार्याय्ययथाविधि । दद्याद्देवंसहस्राक्षं स्वपापस्यापनुत्तये ॥ २१ ॥ भ्रातृभार्याभिगमनाद् गलत्कुष्ठंप्रजायते । स्ववधूगमनेचैव कृष्णकुष्ठंप्रजायते ॥ २२ ॥ तेनकार्य्यविशुद्ध्यर्थं प्रागुक्तस्यार्द्धमेवहि ।


पीले वस्त्र और पीली फूल मालाओं से भूषित एक कलश पूजन स्थान के पूर्वभाग में स्थापित करे ॥१६॥ उस कलश के ऊपर सुवर्ण के पात्र में २४ तोला सुवर्ण से बनायी वज्रधारी इन्द्र देवता की प्रतिमा को स्थापित करे ॥१७॥ फिर विश्वरूपी इन्द्रदेव का पुरुष सूक्त से पूजन करे, साथ ही उस २ वेद के ज्ञाता ब्राह्मण लोग वहां ऋग्, यजुः-सामवेद का पाठ करें ॥ १८ ॥ और दश तोला सुवर्ण की एक प्रतिमा इन्द्रदेवता की बनाके 'मैं निष्पाप होऊं' ऐसा कहता हुआ वह प्रतिमा सम्यक् पूजन करके निम्न प्रकार ब्राह्मण गुरु को देवे ॥ १९ ॥ देवों के स्वामी, सौ यज्ञ करने वाले, सहस्रों चक्षु वाले, वज्र चिन्ह युक्त वज्रधारी इन्द्रदेव मेरे पाप को नष्ट करें ॥ २० ॥ अपने पाप के नाशार्थ इस मन्त्र का उच्चारण करके इन्द्रदेव की प्रतिमा विधि पूर्वक आचार्य को देवे ॥२१॥ भाई की पत्नी से गमन करे तो गलत्कुष्ठ और पुत्र वधू से गमन करे तो जन्मान्तर में काला कुष्ठ प्रकट होता है ॥ २२ ॥ उस को अपनी शुद्धि-

३० शातातपस्मृतिः ॥

दशांशहोमः सर्वत्र घृताक्तैः क्रियते तिलैः ॥ २३ ॥ स्वाम्यङ्गनाभिगमनाज्जायते दद्रुमण्डलम् । कृत्वा लोहमयीं धेनुं पलषष्टिप्रमाणतः ॥ २४ ॥ कार्पासभाण्डसंयुक्तां कांस्यदोहां सवत्सिकाम् । दद्याद्विप्राय विधिवदिमं मन्त्रमुदीरयेत् । सुरभिर्वैष्णवी माता मम पापं व्यपोहतु ॥ २५ ॥ विश्वस्तभार्यागमने गजचर्मा प्रजायते । तस्य पापविनाशाय प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ २६ ॥ कृत्वारौप्यमयीं धेनुं निष्कृतिं विश्वसंख्यया । तस्य पापस्य नाशाय छत्रोपानहसंयुताम् ॥ २७ ॥ मातुः सपत्निगमने जायते चाश्मरीगदः । स तु पापविशुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ २८ ॥ दद्याद्विप्राय विदुषे मधुधेनुं यथोदितम् ।


के लिये पूर्व कहे पुत्री गमन के प्रायश्चित्त से आधा करना चाहिये और सभी जप पाठों में घृत मिले तिलों से दशांश होम तो करना ही चाहिये ॥ २३ ॥ स्वामी (मालिक) की स्त्री से सेवक गमन करे तो जन्मान्तर में मण्डलाकार (दखन्दावाली) दाद होती है । वह तीन सेर लोहे की गौ बनवाके, बिनौले, बसन, कांसे की दोहनी और बछड़े सहित गौ (सुरभि०) मन्त्रोच्चारण पूर्वक विधि के साथ ब्राह्मण को दान देवे कि विष्णु देवता सम्बन्धिनी सुरभि गौ माता मेरे पाप को नष्ट करे ॥ २४।२५ ॥ अपना विश्वास रखनेवाले की पत्नी से गमन करे तो अन्मान्तर में हाथी के से चर्मवाला होता है । उस पाप का प्रायश्चित्त यह है कि ॥ २६ ॥ नौ तोला चांदी की प्रायश्चित्त रूप गौ बनाकर उस पाप के नाशार्थ छाता और जूता सहित दान करे ॥ २७ ॥ अपनी सौतेली माता से गमन करे तो जन्मान्तर में मूंगारोग होता है । वह पुरुष उसका निम्न प्रायश्चित्त करे ॥ २८ ॥ विद्वान् ब्राह्मण को शहद की गौ शास्त्रविध्यनुकूल दान

भाषाऽर्थसहिता ॥ ३१

तिलद्रोणशतंचैव हिरण्येनसमन्वितम् ॥ २९ ॥
पितृष्वस्रभिगमनाद्दक्षिणांशव्रणीभवेत् ।
तेनापिनिष्कृतिःकार्या अजादानेनशक्तितः ॥ ३० ॥
मातुलान्यांतुगमने पृष्ठकुब्जःप्रजायते ।
कृष्णाजिनप्रदानेन प्रायश्चित्तंसमाचरेत् ॥ ३१ ॥
मातृष्वस्रभिगमने वामाङ्गे व्रणवान्भवेत् ।
तेनापिनिष्कृतिःकार्या सम्यग्दासीप्रदानतः ॥ ३२ ॥
पितृव्यपत्नीगमनात्कटिकुष्ठंप्रजायते ।
निष्कृतिस्तेनकर्त्तव्या कन्यादानेनयत्नतः ॥ ३३ ॥
यदगम्यासुसंयोगात्प्रायश्चित्तमुदीरितम् ।
तदेवमुनिभिःप्रोक्तं नियतंतत्सुतास्वपि ॥ ३४ ॥
मृतभार्याभिगमने मृतभार्यःप्रजायते ।
तत्पातकविशुद्ध्यर्थं द्विजमेकंविवाहयेत् ॥ ३५ ॥
सगोत्रस्त्रीप्रसंगेन जायतेचभगन्दरः ।


देवे और सुवर्ण के सहित २५ मन तिलों का दान करे ॥ २९ ॥ फूपी ( बुआ ) के साथ गमन करे तो शरीर के दहिने भाग में फोड़े फुंसी होते हैं । वह य-थाशक्ति बकरियों के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥३०॥ मामी के साथ गमन करे तो कुबड़ी पीठवाला होता वह कृष्ण मृगचर्मों के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे॥३१॥ मौसी के साथ गमन करे तो शरीर के वामभाग में फोड़ा फुंसीयुक्त होता है वह दासी के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥ ३२ ॥ चाची के साथ गमन करे तो कटि भाग में कुष्ठरोगयुक्त होता है वह कन्याओं के दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥ ३३ ॥ जिन२ अगम्यास्त्रियोंके साथ संग करने से जो२ प्रायश्चित्त कहा गया है। उन२ स्त्रियों की पुत्रियोंके साथ गमन करने पर भी ऋषियों ने वही २ प्रायश्चित्त कहा है ॥३४॥ मृत पुरुष की स्त्री के साथ गमन करे तो जन्मान्तर में उसकी भी पत्नी मर जा-या करती है । उस पाप की शुद्धि के लिये एक ब्राह्मण का विवाह करावे ॥३५॥ अपने गोत्र की स्त्री से गमन करे तो जन्मान्तर में भगन्दर रोग होता है ।

३२ शातातपस्मृतिः ॥

तेनापिनिष्कृतिःकार्या महिषीदानयत्नतः ॥ ३६ ॥
तपस्विनीप्रसंगेन प्रमेहीजायतेनरः ।
मासंरुद्रजपःकार्यो दद्याच्छक्त्याचकाञ्चनम् ॥ ३७ ॥
दीक्षितस्त्रीप्रसंगेन जायतेदुष्टरक्तदृक् ।
सपातकविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यानिषट्चरेत् ॥ ३८ ॥
प्राणनाथंपरित्यज्य देवरंसेवतेध्रुवम् ।
गुदमध्येभवेद्व्याधी रशनावामहदुःसहा ।
तयाकार्यंप्रयत्नेन गोदानंहेमसम्मितम् ॥ ३९ ॥
गोविन्दगोपीजनवल्लभेशः कंसासुरघ्नस्त्रिदशेशवन्द्यः ।
गोदानतृप्तःकुरुतेदयालु रीशाननाथादपितारिवर्गः ॥ ४० ॥
श्रोत्रियस्त्रीप्रसंगेन जायतेनासिकाव्रणी ।
आचरेत्सविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यचतुष्टयम् ॥ ४१ ॥
स्वजातिजायागमने जायतेहृदयव्रणी ।
तत्पापस्यविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥ ४२ ॥
धातृउत्तरस्त्रीगमनाज्जायतेमस्तकव्रणः ।


वह भैंसियों के यथाशक्ति दान द्वारा प्रायश्चित्त करे ॥३६॥ तपस्विनी स्त्री के साथ संगकरे तो प्रमेह रोग युक्तहोता है वह एक मास तक रुद्री का पाठ दशांश होम और यथाशक्ति सुवर्ण का दान करे ॥३७॥ दीक्षित पुरुष की स्त्री से संग करे तो रक्तविकार रोगयुक्त होता है वह छः प्राजापत्य व्रत प्रायश्चित्त करे ॥३८॥ जो स्त्री अपने पति को छोड़के देवर से संग करती है उसके गुदेन्द्रिय में रोग होता और असह्यपीड़ा होती है वह स्त्री बड़े यत्न से सुवर्ण सहित गोदान वार२ करे ॥३९॥ गोविन्द गोपीजनों के प्रियस्वामी कंसासुर के हन्ता, देवताओं के स्वामी इन्द्र के भी पूजनीय, ईशान दिशा के स्वामी महादेव जी से भी विशेषकर जिनका वर्ग तारनेवाला है ऐसे कृष्ण भगवान् गोदान से तृप्त हुए प्रायश्चित्ती पर दयाकरते हैं ॥ ४० ॥ वेदपाठी की स्त्री के साथ संग करे तो प्रायः नासिका में फोड़ा फुंसी होते हैं । वह अपनी शुद्धि के लिये चार प्राजापत्य व्रत करे ॥४१॥ अपने वर्ण की स्त्री से संग करे तो हृदय में प्रायः फोड़ा फुंसी होते हैं । उस पाप की शुद्धि के लिये दो प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४२ ॥ धायी के साथ संग

भावार्थसहिता ॥ ३३

सपातकविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ ४३ ॥ पशुयोनौचगमने मूत्राघातःप्रजायते । तिलपात्रद्वयंचैव दद्यादात्मविशुद्धये ॥ ४४ ॥ अश्वयोनौचगमनाद् भुजस्तम्भःप्रजायते । सहस्रकलशैःस्नानं मासं कुर्याच्छिवस्यच ॥ ४५ ॥ आसुरीअलसीदासी चर्मकारीचनर्त्तकी । रजकीभिःसमंभोगात्पतन्तिपितृभिःसह ॥ ४६ ॥ उपोष्यैकादशींशुद्धां जागरंकारयेन्निशि । तस्यपापविशुद्ध्यर्थं दद्यादेकांपयस्विनीम् ॥ ४७ ॥ एतेदोषानराणांस्युर्नरकान्तेनसंशयः । स्त्रीणामपिभवन्त्येते तत्तत्पुरुषसंगमात् ॥ ४८ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके अगम्यागमन प्रायश्चित्तं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


करे तो मस्तक में प्रायः फोड़ा फुंसी होतेहैं यह उस पातक की शुद्धि के लिये एक प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४३ ॥ पशुजाति के संग मैथुन करने से मूत्राघात रोग होता है । उसकी शुद्धि के लिये तिलों से भरके दो पात्र दान करे ॥ ४४ ॥ घोड़ी के साथ मैथुन करने से भुजा जकड़ने का रोग होता है । इसके लिये एक महिने तक एक हज़ार कलशों से शिवजी को स्नान करावे ॥ ४५ ॥ आसुरी (राक्षसी ) अलसी ( आलसिनी ) दासी, चर्मकारी, नटिनी, वा वेश्या, और धोबिनि इन के साथ संग करने से अपने पितरों के सहित पतित हो जाते हैं ॥ ४६ ॥ इस के लिये जो अन्य तिथि से विद्ध न हो ऐसी शुद्ध एकादशी को उपवास करके रात भर जागरण करे और उस पाप से शुद्ध होने के लिये एक दूध देती गौ का दान करे ॥ ४७ ॥ इस अध्याय में कहे दोष नरक भोग के अन्तमें उन २ पापोंसे पुरुषों के निस्सन्देह होते ही हैं । और जिन २ स्त्रियों के संग से पुरुषों को दोष दिखाए हैं उन्हीं २ के पुरुषों से संग करने वाली स्त्रियों को भी वे २ पाप दोष लगते हैं इस से उन को भी उक्त प्रायश्चित्त ही करना चाहिये ॥ ४८ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में कर्मविपाक सम्बन्धी अगम्यागमन प्रायश्चित्तरूप पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

३४ शातातपस्मृतिः ॥

अश्वशूकरशृङ्ग्यद्रि द्रुमादिशकटेनच ।
भृग्वग्निदारुशस्त्राश्मविषोद्बन्धनजैर्मृताः ॥ १ ॥
व्याघ्रादिगजभूपालचोरवैरिदृकाहताः ।
काष्ठशल्यमृतायेच शौचसंस्कारवर्जिताः ॥ २ ॥
विसूचिकागलकवलदवातीसारतोमृताः ।
डाकिन्यादिग्रहैर्ग्रस्ता विद्युत्पातहताश्चये ॥ ३ ॥
अस्पृश्याअपवित्राश्च पतिताःपुत्रवर्जिताः ।
पञ्चत्रिंशत्प्रकारैश्च नाप्नुवन्तिगतिंमृताः ॥ ४ ॥
पित्राद्याःपिण्डभाजःस्युस्त्रयोलेपभुजस्तथा ।
ततोनान्दीमुखाःप्रोक्तास्त्रयोप्यश्रुमुखास्त्रयः ॥ ५ ॥
द्वादशैतेपितृगणास्तर्पिताःसन्ततिप्रदाः ।
गतिहीनाःसुतादीनां सन्ततिंनाशयन्तिते ॥ ६ ॥
दशव्याघ्रादिनिहता गर्भान्निघ्नन्त्यमीक्रमात् ।


घोड़ा, सुवर, सींगों वाले पशुओं ने मारे, पर्वत तथा वृक्षादि से गिरके, गाड़ी से पिचल के मरे, पर्वत की शिला, अग्नि, लकड़ी, शस्त्र, पत्थर, विष, और फांसी से मरे ॥ १ ॥ वाघ आदि, हाथी, राजा, चोर, शत्रु, भेड़िया, इन ने जिन को मारा, काष्ठ वा कांटे से घाव हो कर मरे जो शुद्धि तथा उपनयनादि संस्कारों से हीन रहते हुए मरे हों ॥ २ ॥ हैजा द्वारा, अन्न से, गले में ग्रास अटक जाने से, बन के अग्नि से, अतीसार (अधिक दस्तों के होने से) डाकिनी आदि से, ग्रहों (राहु आदि) से ग्रस्त (पकड़े हुए), बिजली पड़ने से, ॥ ३ ॥ स्पर्श न करने योग्य वा अपवित्र दशा (विष्ठा मूत्रादि में पड़के) में, पतित होके और पुत्रहीन हो कर जो मरे हों इन पैंतीश ३५ प्रकारों से मरे मनुष्यों की अच्छी गति नहीं होती है ॥ ४ ॥ पितादि तीन (पिता, पितामह, प्रपितामह, ) पिण्डों के भागी, उन से पहिले तीन लेप भागी, उनसे पहिले तीन नान्दीमुखश्राद्धभागी और उन से भी पहिले तीन अश्रुमुख पितर कहलातेहैं ॥५॥ ये बारह पितृगण श्राद्ध तर्पणादि से तृप्त हुये पुत्रादि की सन्तति बढ़ाते हैं। और श्राद्धादि न किये जावें तो वे ही पुत्रादि की सन्तति को नष्ट करते हैं ॥ ६ ॥ इसी श्लो० में कहे व्याघ्रादि दश के द्वारा मरे हुए पितर