अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
२४ भाषार्थसहिता ॥
नाग्निंमुखेनेतिचयलौकिकेयोजयन्तितत् ॥ १५ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ नवमः खंडः ॥ ९ ॥
यथाहनितथाप्रातर्नित्यंस्नायादनातुरः । दन्तान्प्रक्षालयनद्यादौ गृहेचेत्तदमन्त्रवत् ॥ १ ॥ नारदाद्युक्तवृक्षांयदष्टाङ्गुलमपाटितम् । सत्वचंदन्तकाष्ठंस्यात्तदग्रेणप्रधावयेत् ॥ २ ॥ उत्थायनेत्रेप्रक्षाल्य शुचिर्भूत्वासमाहितः । परिजप्यचमन्त्रेण भक्षयेद्दन्तधावनम् ॥ ३ ॥ आयुर्बलंयशोवर्चः प्रजाःपशून्वसूनिच । ब्रह्मप्रज्ञांचमेधांच तन्नोधेहिवनस्पते ॥ ४ ॥ मासद्वयंश्रावणादिसर्वांनद्योरजस्वलाः । तासुस्नानंनकुर्वीत वर्जयित्वासमुद्रगाः ॥ ५ ॥
को मुख से न फूके ऐसा मनु ने कहा है तो वह मनु जी का कथन लौकिक (साधारण) अग्नि के लिये है ॥ १५ ॥
यह नवां खंड पूरा हुआ ॥ ९ ॥
नीरोग मनुष्य जैसे दिन में स्नान करे तैसे ही प्रातःकाल भी करे नदीआदि के समीप दातौन करके स्नान करे और घर में करे तो मन्त्रों के बिनाहीकरे ॥१॥ नारद आदि ऋषियों ने कहे जो वृक्ष उन की आठ अंगुल लम्बी बिना फटी और वक्कल सहित-दांतौन होनी चाहिये उस के अग्रभाग से दातों को अच्छी तरह शुद्ध करे ॥२॥ प्रातःकाल सोते से उठ कर नेत्रों को धोके सावधानी से शुद्ध होकर और (अन्नाद्यायव्यूहध्वं०) इत्यादि मन्त्र को जप के दातौन करे॥३॥ और वनस्पति से प्रार्थना करे कि हे वृक्ष तू मुझे अवस्था-बल कीर्त्ति तेज,प्रजा, पशु, धन, वेद और उत्तम बुद्धि इन को दे ॥४॥ श्रावण आदि दो महीनों में सब नदी रजस्वला [मलिन जल वाली] होजाती हैं जो नदी समुद्र तक जाती हैं उन को छोड़ कर रजस्वला नदियों में स्नान न करे ॥ ५ ॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ २५
धनुःसहस्राण्यष्टौतु गतिर्यासांनविद्यते ।
नतानदीशब्दवहा गर्त्तास्ताःपरिकीर्त्तिताः ॥ ६ ॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे प्रेतस्नानेतथैवच ।
चन्द्रसूर्यग्रहेचैव रजोदोषोनविद्यते ॥७॥
वेदाश्छन्दांसिसर्वाणि ब्रह्माद्याश्चदिवौकसः ।
जलार्थिनोऽथपितरो मरीच्याद्यास्तथर्षयः ॥८॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे स्नानार्थंब्रह्मवादिनः ।
पिपासूननुगच्छन्ति सन्तुष्टाःस्वशरीरिणः ॥६॥
समागमस्तुयत्रैषां तत्रहत्यादयोमन्नाः ।
नूनंसर्वेक्षयंयान्ति किमुतैकंनदीरजः ॥१०॥
ऋषीणांसिच्यमानाना-मन्तरालंसमाश्रितः ।
सम्पिबेद्यःशरीरेण पर्षन्मुक्तजलच्छटाः । ११॥
विद्यादीन्ब्राह्मणःकामान्वरादीन्कन्यकाऽऽप्नुयात् ।
आठ हजार धनुष तक जो नहीं जातीं उन को नदी नहीं कहते किन्तु उनका नाम गर्त है ॥६॥ उपाकर्म नाम श्रावणी के दिन होने वाला वेदारम्भ और उत्सर्ग नाम वेद समाप्ति का स्नान प्रेत के निमित्त स्नान चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण का स्नान इन में नदी के रजस्वला होने का दोष नहीं है ॥७॥ वेद, संपूर्ण छंद ब्रह्मादिक देवता और जल के अभिलाषी पितर और मरीचि आदि ऋषी ॥ ८ ॥ ये सब अपना २ सूक्ष्म शरीर धारण कर उस समय उन के पीछे चलते हैं जिस समय सन्तोषी वेद के ज्ञाता देहधारी उपाकर्म और उत्सर्ग के स्नान के निमित्त जाते हैं ॥ ९ ॥ जहां इन वेद आदिकों का समागम है वहां जब हत्या आदि बड़े २ सब पाप निश्चय से नष्ट हो जाते हैं तब नदी का रज नष्ट क्यों न होगा?॥१०॥ सींचे जाते ( हुए ) ऋषियों के मध्य में ठहरा जो मनुष्य अपने शरीर के द्वारा शिष्य समुदाय से छुट्टी जल की छटाओं ( बूंदों ) को पीता है अर्थात् ऋषि आदि के तर्पणो गङ्ग के छींटें अपने शरीर पर लेता है ॥ ११ ॥
२६ भाषार्थसहिता ॥
आमुष्मिकान्यपिसुखान्याप्नुयात्सनसंशयः ॥१२॥ अशुचयशुचिनादत्त माममन्तर्जलादिना । अनिर्गतदशाहास्तु प्रेतारक्षांसिभुञ्जते ॥१३॥ स्वर्धुन्द्यम्भःसमानिस्युः सर्वाण्यम्भांसिभूतले । कूपस्थान्यपिसोमार्क ग्रहणेनात्रसंशयः ॥१४॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्दशः खण्डः ॥ इतिकर्म्मप्र- दीपे परिशिष्टे कात्यायनविरचिते प्रथमः प्रपाठकः १ अतऊर्द्धंप्रवक्ष्यामि संन्ध्योपासनकंविधिम् । अनर्हःकर्मणांविप्रः सन्ध्याहीनोयतःस्मृतः ॥१॥ सव्येपाणौकुशान्कृत्वाकुर्यादाचमनक्रियाम् ॥ ह्रस्वाःप्रचरणीयाःस्युः कुशादीर्घास्तुवर्हिषः ॥२॥ दर्भाःपवित्रमित्युक्तमतःसन्ध्यादिकर्मणि । सव्यःसोपग्रहःकार्यो दक्षिणःसपवित्रकः ॥३॥
यह यदि ब्राह्मण हो तो विद्या आदि मनोरथों को यदि कन्या हो तो उत्तम वर आदि को प्राप्त होती हैं और परलोक के सुखों को भी प्राप्त होते हैं इस में संशय नहीं ॥ १२ ॥ मरे के दश दिन के भीतर अशुद्ध पुरुष ने दिया जो निमन्त्र अन्न और जलादि है उस को प्रेत और राक्षस भोगते हैं इस से दश दिन के भीतर अन्न दानादि न करे ॥ १३ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी पर के और कुये के जल चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण में गंगा जल के समान हैं इस में सन्देह नहीं ॥१४॥ यह चौदहवां खंड पूरा हुआ- और कात्यायन के रचे परिशिष्ट कर्म प्रदीप में प्रथम प्रपाठक पूरा हुआ ।
इस से आगे संध्या वंदन की विधि कहते हैं जिस से संध्या हीन ब्राह्मण सब कर्मों के अयोग्य कहा ॥१॥ बांये हाथ में कुशा रख कर आचमन करे छोटे दाभ कुश कहाते हैं और बड़े कुश बर्हि कहाते हैं ॥२॥ इस से सन्ध्या आदि कर्म में दर्भ ही पवित्र कहे हैं बांये हाथ में सोपग्रह (१६कुशा) ले और दहिने में पवित्री ॥३॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ ५९
रक्षेद्द्वारिणात्मानं परिक्षिप्यसमंततः । शिरसोमार्जनंकुर्यात्कुशैः सोदकविन्दुभिः ॥ ४ ॥ प्रणवोभूर्भुवःस्वश्च सावित्रीचतृतीयिका । अब्दैवतंस्यृचश्चैव चतुर्थमितिमार्जनम् ॥ ५ ॥ भूराद्यास्तिस्रएवैता महाव्याहृतयोऽव्ययाः । महर्जनस्तपःसत्यं गायत्रीचशिरस्तथा ॥ ६ ॥ आपोज्योतीरसोमृतं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरितिशिरः । प्रतिप्रतीकं प्रणवमुच्चारयेदन्तेचशिरसः ॥ ७ ॥ एताएतांसहानेनतथैभिर्दशभिःसह । त्रिर्जपेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥ ८ ॥ करेणोद्धृत्यसलिलंघ्राणमासज्यतत्रच । जपेदनायतासुर्वात्रिःसकृद्वाघमर्षणम् ॥ ९ ॥ उत्थाय कर्मातिप्राहेसवित्रेकेणाऽञ्जलिनाम्भसः ।
अपने शरीर के चारों ओर जल भ्रमा के अपनी रक्षा करे और जल को लेकर कुशाओं से शिर का मार्जन करे । प्र० ओंकार भूः, भुवः, स्वः, और तीसरी गायत्री, जल है देवता जिन का ऐसी तीन ऋचा ( आपो हिष्ठा० आदि ) यह चौथा मार्जन है ॥ ५ ॥ भूः भुवः स्वः ये तीन नित्य अविनाशी महाव्याहृती हैं महःजनः तपः सत्य और गायत्री और शिरः ॥ ६ ॥ (आपोज्योती रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वः) यह शिर मंत्र है। भूः आदि प्रत्येक के साथ और शिरः मंत्र के पीछे ओंकार का उच्चारण करे ॥ ७ ॥ ये सात व्याहृति गायत्री यह शिरोमंत्र और ओंकार इन दशों का प्राणों को रोक कर तीन बार जो जप करना है उसे प्राणायाम कहते हैं ॥ ८ ॥ हाथ में जल को उठा के और नासिका में लगाकर तीन बार वा एकबार प्राणों को रोके हुए वा न रोके हुए अघमर्षण (ऋतंच सत्यंचा०) इत्यादि मंत्र को जपै ॥ ९ ॥ उठकर जल की अंजलि से सूर्य के सम्मुख हो अर्थात् गायत्री मन्त्र पढ़ के अंजली देवे फिर ( उदुत्यं
८८ पाराशर्य्यसंहिता ॥
उद्यच्चित्रम्ऋग्द्वयेनाथचोपतिष्ठेदनन्तरम् ॥ १० ॥ संध्याद्वयेऽप्युपस्थानमेतदाहुर्मनीषिणः । मध्येत्वन्ह उपस्थायविभ्राडादीच्छयाजपेत् ॥ ११ ॥ तदसंसक्तपाष्णिर्वाएकपाददृढंपादपि । कुर्यात्कृताञ्जलिर्वापि ऊर्ध्वबाहुरथापिवा ॥ १२ ॥ यत्रस्यात्कृच्छ्रभूयस्त्वं श्रेयसोऽपिमनीषिणः । भूयस्त्वंब्रुवतेतस्यकृच्छ्रेणोहावाप्यते ॥ १३ ॥ तिष्ठेदुदयनात्पूर्वामध्यनामपिशक्तितः । आसीनस्तुसमाप्तान्त्यां संध्यांपूर्वेत्रिकंजपन् ॥ १४ ॥ एतत्संध्यात्रयंप्रोक्तं ब्राह्मण्यंयत्प्रतिष्ठितम् । यस्यनास्त्यादरस्तत्र नसब्राह्मणउच्यते ॥ १५ ॥ सन्ध्यालोपाच्चचकितः स्नानशीलश्चयःसदा ।
ज्ञान० । चित्रंदेवानां ) इत्यादि दो ऋचाओं से सूर्य की स्तुति करे ॥ १० ॥ दोनों संध्याओं में यही सूर्य का उपस्थान है ऐसा मुनीश्वर लोग कहते हैं और मध्यान्ह में स्तुति के पीछे अपनी इच्छा हो तो (विभ्राड्) इस अनुवाकादि को जपे ॥ ११ ॥ उस स्तुति के समय ऐड़ी पृथ्वी पर न लगे अथवा एक ही पैर से खड़ा रहे अथवा आधे पैर से फिर हाथ जोड़ कर अथवा ऊपर को भुजा करके सूर्य की स्तुति करे ॥ १२ ॥ एक पग से खड़े होने आदि जिस प्रकार करने में कष्ट बहुत हो उसी में कल्याण भी बहुत होता है यह बुद्धिमान् कहते हैं क्योंकि कष्ट से ही कल्याण प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ उदय से पूर्व प्रातःकाल और मध्याह्न की संध्या में यथाशक्ति यथावकाश पूर्वाभिमुख खड़े होके गायत्री जपे और सायंकाल में सूर्यास्त होने से पूर्व बैठ कर गायत्री जपे ॥ १४ ॥ ये जो तीन संध्या कही हैं उन्हीं में ब्राह्मण्य (ब्राह्मणपन) ठहरता है जिस को इन तीनों में आदर श्रद्धा नहीं वह ब्राह्मण भी नहीं है ॥ १५ ॥ जो सन्ध्या के न करने में पाप से भयभीत है और स्नान करने
कात्यायनस्मृतिः ॥ २९
तन्दोषानोपसर्पन्ति गरुत्मन्तमिवोरगाः ॥ १६ ॥
वेदमादितआरभ्यशक्तितोऽहरहर्जपेत् ।
उपतिष्ठेततोरुद्रं सर्वाद्वावैदिकज्जपात् ॥ १७ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ एकादशः खंडः ॥ ११ ॥
अथाद्भिरुत्तर्पयेद्देवान्सतिलाभिःपितॄनपि ।
नमोऽन्तेतर्पयामीति आदावोमितिचब्रुवन् ॥ १ ॥
ब्रह्माणंविष्णुंरुद्रंप्रजापतिंवेदान्देवान्छन्दांस्यृषीन् पु-
राणाचार्यान्गंधर्वानितरान्मासंसंवत्सरंसावयवं देवीरप्स-
सोदेवानुगान्नागान्सागरानपर्वतान्सरितो दिव्यान्मनुष्या-
नितरान्मनुष्यान्यक्षान्रक्षांसिसुपर्णान्पिशाचान् भूतानि-
पृथिवीमोषधीःपशून्वनस्पतीन्भूतग्रामंचतुर्विधमित्युपवी-
त्यथप्राचीनावीतियमंयमपुरुषान्कव्यवाडन लं सोमंयमम-
का सदा स्वभाव वाला है उस से पाप ऐसे ही भागते हैं जैसे गरुड़ के डर से सांप भागते हैं ॥ १६ ॥ प्रति दिन प्रथम से आरम्भ करके शक्ति के अनुसार वेद का पाठ करे उस के पीछे व पहिले वेद के रुद्राध्याय महादेव जी की स्तुति करे अथवा सब वेद का पाठ न करके केवल रुद्री का ही पाठ करे॥१७॥
यह ग्यारहवाँ खंड पूरा हुआ ॥ ११ ॥
फिर आदि में ओं और नमस्क़े अन्त में तर्पयामि ( ओं ब्रह्मणे नमो ब्रह्माणं तर्पयामि) इत्यादिनाम मन्त्र कहना हुआ शुद्ध जलों से देवताओं-और तिल सहित जलों सेपितरों का तर्पण करे तर्पयामि बोलनाआश्वलायनादि गृह्यसूत्रकारों की रायहै। पर शुक्ल यजु के पारस्करगृह्यानुसार (ब्रह्मा तृप्यताम्) इत्यादिप्रकार पढ़ना चाहिये ] ॥ १॥ उस का यह क्रम है-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, प्रजापति, वेद, देव, छन्द, ऋषि, पुराणाचार्य, गंधर्व, इतराचार्य, मास, संवत्सरसावयव, देवी, अप्सरा, देवानुग, नाग, सागर, पर्वत, सरित, दिव्यमनुष्य, इतरमनुष्य, यक्षरक्षः, सुपर्ण, पिशाच भूत, पृथिवी, ओषधी, पशु, वनस्पति, भूतग्रामचतुर्विध-इन का तर्पण सव्य होकर करे फिर अपसव्य होकर यम, यम पुरुष, कव्यवा-
| ३० | भाषार्थसहिता ॥ |
|---|
र्य्यमणमग्निष्वात्तान् सोमपीथान् बर्हिषदोऽथस्वान् पितॄन्सकृत्सकृन्मातामहांश्चेतिप्रतिपुरुषमभ्यस्येज्ज्येष्ठभ्रात्- श्वशुरपितृव्यमांतुलांश्च पितृवंशमातृवंशीयेचान्येमत्तउद- कमर्हन्तितांस्तर्पयामीत्ययमवसानाञ्जलिरथ श्लोकाः ॥२॥ छायांयथेच्छेच्छरदातपार्त्तः पयःपिपासुःक्षुधितोऽलमन्नम् । बालोजनित्रींजननीचबालं योषित्पुमांसंपुरुषश्चयोषाम् ॥३॥ तथासर्वाणिभूतानि स्थावराणिचराणिच । विप्रादुदकमिच्छन्ति सर्वाभ्युदयकृद्धि सः ॥ ४॥ तस्मात्सदैवकर्त्तव्यमकुर्वन्महतेनसा । युज्यतेब्राह्मणःकुर्वन्विश्वमेतद्विभर्त्तिहि ॥ ५ ॥ अल्पत्वाद्वोमकालस्य बहुत्वात्स्नानकर्मणः । प्रातर्नतनुयात्स्नानं होमलोपोहिगर्हितः ॥ ६ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ द्वादशः खण्डः ॥१२॥
अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्ता, सोमपीथ, बर्हिषद्, इस के अनन्तर, अपने पितरों का और मातामहों का एक २ बार तर्पण करे और प्रत्येक पितरों का नाम ले ज्येष्ठ भ्राता श्वशुर चाचा, मामा फिर पिता माता के वंश में जो मरे हों अथवा और जो मेरे से जल की इच्छा करते हैं उन को तृप्त करता हूं यह सब से पीछें अञ्जलि दे ॥ २ ॥ अब श्लोक कहते हैं जैसे घप से दुःखी हुआ मनुष्य छाया चाहता है प्यासा मनुष्य जल भूखा अन्न बालक माता को और माता बालक को स्त्री पुरुष को और पुरुष स्त्री को चाहता है ॥ ३ ॥ तिसी प्रकार स्थावर और जङ्गम सब प्राणी ब्राह्मण से जल चाहते हैं क्योंकि ब्राह्मण सब को सुख देने वाला है ॥ ४ ॥ इस से ब्राह्मण सदैव तर्पण करे जो नहीं करता वह बड़े पाप से युक्त होता है और जो ब्राह्मण नियम से तर्पण करता है वह जानो इस जगत् को पालता है ॥ ५ ॥ होम का समय थोड़ा है और स्नान का कृत्य बहुत इस से प्रातःकाल में स्ना विस्तार से न करे क्योंकि होम का लोप निन्दित है ॥ ६ ॥
यह बारह वां खंड पुरा हुआ ॥१२॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ ३१
पंचानामथसत्राणां महतामुच्यतेविधिः ।
यैरिष्ट्वासततंविप्रः प्राप्नुयात्सद्मशाश्वतम् ॥ १ ॥
देवभूतपितृब्रह्ममनुष्याणामनुक्रमात् ।
महासत्राणिजानीयात्तएवेहमहामखाः ॥ २ ॥
अध्यापनंब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तुतर्पणम् ।
होमोदैवोबलिर्भौतो नृयज्ञोतिथिपूजनम् ॥३॥
श्राद्धंवापितृयज्ञःस्यात्पिण्ड्योबलिरथापिवा ।
यश्चश्रुतिजपःप्रोक्तो ब्रह्मयज्ञःसवोच्यते ॥४॥
सचावार्कतर्पणात्कार्यः पश्चाद्वाप्रातराहुतेः ।
वैश्वदेवावसानेवा नान्यत्रैतौनिमित्तकात् ॥५॥
अप्येकमाशयेद्विप्रं पितृयज्ञार्थसिद्धये ।
अदैवंनास्तिचेदन्यो भोक्ताभोज्यमथापिवा ।
अप्युद्धृत्ययथाशक्त्या किंचिदन्नंयथाविधि ।
इस के अनन्तर सत्तम जो पांच महायज्ञ उन की विधि कहते हैं। जिन को ब्राह्मण निरन्तर अनुष्ठान करके सनातन स्थान [वैकुण्ठ] को प्राप्त होता है।१।
देवयज्ञ भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, इन पांचों को क्रम से महासत्र जानो और ये ही पांच महामख (बड़े यज्ञ) कहे हैं ॥ २ ॥
विधिपूर्वक वेद का पढ़ाना ब्रह्मयज्ञ है तर्पण पितृयज्ञ है होम दैवयज्ञ बलि रखना भूतयज्ञ है और अतिथि का पूजन मनुष्ययज्ञ है ॥ ३ ॥ अथवा नित्य श्राद्ध को वा पितरों के नाम से जो एक ग्रास (पितृभ्यः स्वधानमः) से दिया जाता है वह पितृयज्ञ है और श्रुति वेद मन्त्रादि का जो जप कहा है वह ब्रह्मयज्ञ है ॥४॥ उस ब्रह्मयज्ञ को तर्पण से पहिले अथवा प्रातःकाल के होम से पीछे अथवा वैश्वदेव के पीछे करे किसी निमित्त के विना अन्य समय में न करे ॥५॥ यदि भोजन करने वाला दूसरा कोई न मिले वा भोजन न मिले तो विश्वेदेवाओं के बिना ही एक ब्राह्मण को पितृयज्ञ की सिद्धि के निमित्त जिमा देवे ॥६॥ यथाशक्ति थोड़ासा अन्न निकाल कर विधिसे पितरों
३२ माधवसंहिता ॥
पितृभ्योऽथम मनुष्येभ्यो दद्यादहरहर्द्विजे ॥७॥
पितृभ्यश्चेदमित्युक्त्वा स्वधाकारमुदीरयेत् ।
हन्तकारं मनुष्येभ्यस्तदर्घेनिनयेदपः ॥८॥
मुनिभिर्द्धिरशनमुक्तं विप्राणांमर्त्यवासिनांनित्यम् ।
अहनिचतथातमस्विन्यां सार्द्धप्रथमयामान्तः ॥९॥
सायंप्रातर्वैश्वदेवः कर्त्तव्योबलिकर्म्मच ।
अनश्नतापि सततमन्यथाकिल्विषीभवेत् ॥१०॥
अमुष्मै नम इत्येवं बलिदानंविधीयते ।
बलिदानप्रदानार्थं नमस्कारः कृतोयतः ॥११॥
(स्वाहाकारवषट्कारनमस्कारादिवौकसाम् ।
स्वधाकारः पितृणांच हन्तकारोनृणांहृतः ॥१२॥
स्वधाकारेणनिनयेत्पितृभ्यंबलिमतःसदा ।
तदर्थेकेनमस्कारं कुर्व्वंतेनेतिगौतमः ॥ १३ ॥
और मनुष्यों के निमित्त ब्राह्मण को प्रतिदिन दे देवे तो भी पितृयज्ञ मनुष्य यज्ञ पूरे हो जाते हैं ॥७॥ पितृभ्यश्चेदं ऐसा कह कर स्वधा कह दे मनुष्यों को भोजन देते समय ( हन्ततइदमन्नम् ) ऐसा कहे और पितरों को दिये अन्नपर पीछे से जल छोड़ देवे ॥८॥ भूलोक के वासी ब्राह्मणों को दो समय ( एक बार दिन में एक बार रात्रि में ) डेढ़ पहर दिन चढ़े वा रात गये तक मुनियों ने भोजन करना कहा है तीसरी बार नहीं ॥९॥ भोजन न करे तो भी सायंप्रातःकाल को बलि वैश्वदेव करे जो न करे तो पाप भागी होता है ॥१०॥ ( इन्द्राय नमः ) इत्यादि मन्त्रों से बलि देना कहा है क्योंकि बलि के लिये नमः शब्द बोलना ही मुख्य है ॥११॥ देवताओं को स्वाहा, वषट्, नमस्कार, पितरों को स्वधा और मनुष्यों को हन्तकार कहना चाहिये ॥ १२ ॥ इस से स्वधा कह कर पितरों को सदैव बलि देवे उस के पीछे नमस्कार करे यह कोई ऋषि कहते हैं और गौतम ऋषि कहते हैं कि न करे ॥ १३ ॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ ३१
नावराद्ध्वर्ध्याबलयोभवन्ति महामार्गश्रवणप्रमाणान् । एकत्रचेदविकृष्टाभवंतीतरेतरसंसक्ताश्च ॥ १४ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ त्रयोदशः खंडः ॥ १३ ॥
अतस्तद्विन्यासोवृद्धिपिंडानिवोत्तरांश्चतुरोबलीन्निदध्यात्पृ थिव्यैवायवेविश्वेभ्योदेवेभ्यःप्रजापतयइतिसव्यतएतेषामेकै- कमद्भ्यओषधिवनस्पतिभ्यआकाशायकामायेत्येतेषामपिम- न्यवइन्द्रायवासुकयेब्रह्मणेइत्येतेषामपिरक्षोजनेभ्यइति स- र्वेषांदक्षिणतःपितृभ्यइतिचतुर्दशनित्याआशस्यप्रभृतयःका- म्याःसर्वेषामुभयतोऽद्भिःपरिषेकःपिंडवच्चपश्चिमाप्रतिपत्तिः१। नस्यातां काम्यसामान्ये जुहोतिबलिकर्म्मणी । पूर्वनित्यविशेषोक्तंजुहोतिबलिकर्म्मणोः ॥ २ ॥ काममन्तेभवेयातां नतुमध्यैकदाचन । नै कस्मिन्क र्म्मणितते कर्म्मान्यदापतेद्यतः ॥ ३ ॥
आपसी बुद्धि धन आदि) बलिदिने से कम नहीं होता सनातन मार्ग (संप्रदाय) का जो श्रवण ही इस में प्रमाण है। यदि व्यवधान न हो अथवा परस्पर संबंध (से ।) हो तो एक ही जगह सब बलि दे देवे ॥ १४ ॥
यह तेरहवां खंड पूरा हुआ ॥१३॥
अब बलि देने का क्रम कहते हैं-नांदीमुख के पिंडों के समान चार द- क्षिण उत्तर दिशा में दे पृथिवी, वायु, विश्वेदेवा, प्रजापति ४ इन के दक्षिण में जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश, काम, और मन्यु, इन्द्र, वासुकी, ब्रह्मा, और रक्षोजन, और सबसे दक्षिण दिशा में पितरों को एक बलि देवे ये सबबलि नित्य हैं और आशस्य आदि बलि काम्य हैं जिन को कामना हो तो करे अन्यथा नहीं दोनों ओर की सब बलियों को जल से सींचे और इस से पिछला कर्म पिंड के समान है ॥ १ सामान्य काम्य कर्म में होम और बलि कर्म नहीं होते क्यों कि होम और बलि कर्म का नित्य कर्म से विशेष कहा है ॥२॥ कर्म के अन्त में चाहे इन्हें करले परन्तु बीच में कभी नहीं क्योंकि एक कर्म का जहां प्रारंभ हो वहां दूसरा कर्म प्रारंभ करना नहीं कहा है ॥ ३ ॥
३४ कात्यायनस्मृति ॥
अग्न्यादिर्गौतमाद्युक्तो होमःशाकलएवच । अनाहिताग्नेरप्येष युज्यतेबलिभिःसह ॥ ४ ॥ स्पृष्ट्वापोवोक्ष्यमाणोऽग्निं कृतांजलिपुटस्ततः । वामदेव्यजपात्पूर्वंप्रार्थयेद्द्रविणोदयम् ॥ ५ ॥ आरोग्यमायुरैश्वर्यं धीर्धृतिःशबलंयशः । ओजोवर्चःपशून्वीर्यंब्रह्मन्नाब्राह्मण्यमेवच ॥ ६ ॥ सौभाग्यंकर्मसिद्धिंच कुलज्यैष्ठ्यं सुकृत्वताम् । सर्वमेतत्सर्वसाक्षिन्द्रविणोदश्शरीहितः ॥ ७ ॥ नब्रह्मयज्ञादधिकोस्तियज्ञो नतत्प्रदानात्परमस्तिदानम् । सर्वेनदंताःक्रतवःसदानानान्तोदृष्टःकैश्चिदस्यद्विकस्य ॥८॥ ऋचःपठन्मधुपयःकुल्याभिस्तर्पयेत्सुरान् । घृतामृतौघकुल्याभिर्यजूंष्यपि पठन्सदा ॥ ९ ॥ सामान्यपिपठन्सोममृतकुल्याभिरन्वहम् ।
गौतम आदि ऋषि का कहा अग्नि आदि के आज्यभाग और शाकल (देव कृतस्यैन०) इत्यादि ङः मन्त्रों से होम और बलि कर्म भूत यज्ञ इन को वह ब्राह्मण भी करे जो अग्निहोत्री न हो ॥ ४ ॥ आचमन करके अग्नि को देखता हुआ हाथ जोड़ कर और वामदेव्य सूक्त के जप से पहिले-धन वृद्धि की प्रार्थना करे ॥ ५ ॥ आरोग्य, अवस्था, ऐश्वर्य्य, बुद्धि धैर्य, सुख, बल शुद्ध, यश, ओज, (पराक्रम) वर्च (तेज) पशु वेद, ब्राह्मणशास्त्र ॥ ६ ॥ सौभाग्य, कर्म-की सिद्धि, उत्तम कुल, उत्तमऋतुता, ये सब जो पदार्थ हैं सबके साक्षी द्रविणोद (कुवेर) हमको दीजिये । ७ ॥ ब्रह्मयज्ञ से अधिक यज्ञ और वेद के दान से अधिक दान नहीं है । दान सहित सब यज्ञ यहां तक ही कहे हैं इस से इन दोनों (ब्रह्मयज्ञ और वेद के दान) के फल का अंत किसी ने नहीं देखा ॥ ८ ॥ ऋग्वेद के पढ़ने से शहद और दूध की कुल्याओं (छोटी नदी-वागूल) से देवताओं को और सदैव यजुर्वेद के पढ़ने से घृत और अमृत की कुल्याओं से ॥ ९ ॥ सामवेद के पढ़ने से सोम (अमृत की लता के रस) के
भाषार्थसहिता ॥ ३५
मेदःकुल्याभिरपिच अथर्वाङ्गिरसःपठन् ॥ १० ॥ मांसक्षीरौदनमधुकुल्याभिस्तर्पयेत्पठन् । वाकोवाक्यं पुराणानि इतिहासांनिचान्वहम् ॥ ११ ॥ ऋगादीनामन्यतममेतेषांशक्तितोऽन्वहम् । पठन्मध्वाज्यकुल्याभिः पितॄनपिचतर्पयेत् ॥ १२ ॥ तेतृप्तास्तर्पयन्त्येनं जीवन्तंप्रेतमेवच । कामचारीचभवति सर्वेषुपुरसद्मसु ॥ १३ ॥ गुर्वप्येनोनतंस्पृशेत् पंक्तिञ्चैवपुनातिसः । यंयंक्रतुञ्चपठति फलभाक्तस्यतस्यच ॥ १४ ॥ वसुपूर्णांवसुमतीं त्रिर्दानफलमाप्नुयात् । ब्रह्मयज्ञादपिब्रह्मदानमेवातिरिच्यते ॥ १५ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्दशः खंडः ॥ ब्रह्मणेदक्षिणादेया यत्रयापरिकीर्त्तिता । कर्मान्तेऽनुच्यमानापि पूर्णपात्रादिकाभवेत् ॥ १ ॥
और घृत की कुल्याओं से—और आंगिरस अथर्व वेद के पढ़ने से मेद की कुल्याओं से ॥ १० ॥ वाकोवाक्य पुराण और इतिहास इन को प्रति दिन पढ़ने से मांस दूध ओदन (भात) और मधु इन की कुल्याओं से पुरुष देवताओं को तृप्त करता है ॥११॥ इन ऋग्वेद आदि में से किसी एक को यथाशक्ति प्रति दिन पढ़ने से सहत और घी की कुल्याओं से पितरों को भी तृप्त करता है ॥ १२ ॥ तृप्त हुये वे पितर इस मनुष्य को जीते और मर जाने पर भी तृप्त करते हैं और वह पुरुष सब देवताओं के स्वर्गीय घरों में इच्छा पूर्वक जाने वाला होता है ॥१३॥ बड़ा भी पाप उस को नहीं लगता और जिस पंक्ति में वह बैठता उस को भी पवित्र कर देता है जिस २ यज्ञ को वह पढ़ता है उस २ के फल का भागी होता है ॥१४॥ और धन से भरी हुई पृथ्वी के तीनवार दान के फल को प्राप्त होता है । इस ब्रह्मयज्ञ से अधिक एक ब्रह्म (विद्या) का दान ही है ॥१५॥
यह १४ खण्ड पूरा हुआ॥
जहां २ जो २ दक्षिणा कही है वही दक्षिणा ब्रह्मा को देनी चाहिये यदि किसी कर्म के अन्त में न कही हो तो वहां पूर्णपात्र दक्षिणा देवे ॥ १ ॥
६
३६ कात्यायनस्मृतिः ॥
यावताबहुभोक्तुस्तु तृप्तिःपूर्णेनविद्यते । नावरादूर्ध्वमतःकुर्यात् पूर्णपात्रमितिस्थितिः ॥ २॥
विदध्याद्धौत्रमन्यश्चेद्वक्षिणार्द्धहरोभवेत् । स्वयं चेदुभयंकुर्यादन्यस्मैप्रतिपादयेत् ॥ ३ ॥
कुलर्त्विजमधीयानं सन्निकृष्टंतथागुरुम् । नातिक्रामेत्सदादित्सन्यइच्छेदात्मनोहितम् ॥ ४ ॥
अहमस्मैददामीति एवमाभाष्यदीयते । नैतावपृष्ट्वाददतः पात्रेऽपिफलमस्तिहि ॥ ५ ॥
दूरस्थाभ्यामपिद्वाभ्यां प्रदायमनसावरम् । इतरेभ्यस्ततोदेया देषदानविधिःपरः ॥ ६ ॥
सन्निकृष्टमधीयानं ब्राह्मणंयोव्यतिक्रमेत् । यदद्यातितमुल्लंघ्य ततःस्तेयेनयुज्यते ॥ ७ ॥
यस्यत्वेकगृहेमूर्खो दूरस्थश्चगुणान्वितः ।
बहुत खाने वाले मनुष्य की तृप्ति जिस भरे हुए पात्र से हो सके उस से कम पूर्णपात्र न करै यह मर्यादा है ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मा से भिन्न होता का काम कोई अन्य ब्राह्मण करे तो आधी दक्षिणा उसको तथा आधी ब्रह्मा को देवे । यदि होता और ब्रह्मा का कर्म आप ही करै तो किसी और सुपात्र ब्राह्मण को पूर्ण पात्र दक्षिणा देदेवे ॥ ३ ॥ कुलका ऋत्विज यदि पढित हो अथवा गुरु समीप में होय तो अपने कल्याण को चाहता हुआ मनुष्य दान देने के समय इन दोनों का उल्लंघन न करे अर्थात् इन्ही को देवे ॥ ४ ॥ मैं इस को देता हूं यह कह कर दिया जाता है इन पुरोहित गुरु के बिना पूछे सुपात्र को देने से भी दाता को फल नहीं होता ॥ ५ ॥ यदि ये दोनों दूरदेश में हों तो उत्तम बस्तु मन से इन दोनों को देकर अन्य मनुष्योंको देवे यह उत्तम दान की विधि है ॥ ६ ॥ समीप के पढित ब्राह्मण को छोड़कर जो दूरस्थ को जितना द्रव्य देता है उतने द्रव्य की चोरी के फल को वह भोगता है ॥ ७ ॥ जिस के घर में एक मूर्ख है और गुणी दूर है तो वहां गुणीको ही देवे क्योंकि वहां मूर्खका उल्लंघन नहीं
भाषार्थसहिता ॥ ३७
गुणान्वितायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ॥ ८ ॥ ब्राह्मणातिक्रमोनास्ति विप्रेवेदविवर्जिते । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहिभस्मनिहूयते ॥ ९ ॥ आज्यस्थालीचकत्र्त्तव्या तैजसद्रव्यसंभवा । महीमयीवाकर्त्तव्या सर्वास्याज्याहुतीषुच ॥ १० ॥ आज्यस्थाल्याःप्रमाणंतु यथाकामन्तुकारयेत् । सुदृढामव्रणांभद्रामाज्यस्थालींप्रचक्षते ॥ ११ ॥ तिर्यगूद्ध्र्वं समिन्मात्रा दृढानातिबृहन्मुखी । मृन्मय्यौदुम्बरीवापि चरुस्थालीप्रशस्यते ॥ १२ ॥ स्वशाखोक्तःप्रसुस्विन्नो ह्यदग्धोऽकठिनःशुभः । नचातिशिथिलःपाच्यो नचरुञ्चारसस्तथा ॥ १३ ॥ इध्मजातीयमिध्मार्थं प्रमाणंमेक्षणंभवेत् । वृत्तं चाङ्गुष्ठपृथ्वग्रमवदानक्रियाक्षमम् ॥ १४ ॥ एषैवदर्वीस्तत्र विशेषस्तमहंब्रुवे ।
माना जायगा ॥ ८ ॥ वेद से रहित ब्राह्मण का उलंघन नहीं है क्योंकि जलते हुए अग्नि को छोड़कर भस्म में आहुति नहीं दी जाती है ॥ ९ ॥
घी की सब आहुतियों में सोने चांदी कांसा तांबादि की वा मिट्टी की आज्यस्थाली ( घी का पात्र ) बनाना चाहिये ॥ १० ॥ आज्यस्थाली का प्रमाण अपनी इच्छा के अनुसार रक्खे परन्तु छिद्र रहित दृढ दर्शनीय पात्र को ही विद्वान् लोग आज्यस्थाली कहते हैं ॥ ११ ॥ जो तिरछी और ऊंची समिधा की बराबर दृढ हो और अधिक चौड़ा जिसका मुख न हो ऐसी चरुस्थाली ( भात पकाने का पात्र ) श्रेष्ठ होता है ॥ १२ ॥ जो अपनी शाखा में कहा हो जिसमें जल न टपके जला न हो—कड़ा न हो— सुन्दर हो—बहुत गला न हो—रस वाला हो ऐसे चरु को पकावे ॥ १३ ॥ जिस काठ का इध्म हो उसी काठ का और इध्म का आधा प्रमाण लम्बा—और गोल—और अंगूठा के समान जिसका अग्रभाग मोटा हो और जो चरु के लेने में समर्थ हो ऐसा मेक्षण होता है ॥ १४ ॥ इसी को
३८ कात्यायनस्मृतिः ॥
दर्वीद्व्यंगुलपृथ्वग्रा तुरीयोनान्तुमेक्षणम् ॥ १५ ॥
मुसलोलूखलेवार्क्षे स्वायत्तेसुदृढेतथा ।
इच्छाप्रमाणेभवतः शूर्पं वैणवमेवच ॥ १६ ॥
दक्षिणंवामतोबाह्यमात्माभिमुखमेवच ।
करंकरस्यकुर्वीत करणेन्यञ्चकर्मणः ॥ १७ ॥
कृत्वाग्न्यभिमुखौपाणी स्वस्थानस्थौसुसंयतौ ।
प्रदक्षिणं तथासीनः कुर्यात्परिसमूहनम् ॥ १८ ॥
बाहुमात्राःपरिधय ऋजवःसत्वचोऽव्रणाः ।
त्रयोभवन्तिशीर्णाग्रा एकेषान्तुचतुर्दिशम् ॥ १९ ॥
प्रागग्रावलिभिःपश्चादुदगग्रमथापरम् ।
न्यसेत्परिधिमन्यंचेदुदगग्रमथपूर्वतः ॥ २० ॥
यथोक्तवस्तुसंपत्तौग्राह्यं तदनुकारयेत् ।
दर्वि कहते हैं। इस में जो विशेषता है उसे हम कहते हैं दर्वि का दो अंगुल मोटा अग्रभाग होता है मेक्षण उस में आधा अंगुल मुटाई में कम होता है ॥१५॥
मुसल और ऊखल काठ के होते हैं अच्छे चौड़े-और दृढ़ और अपनी इच्छा नुसार प्रमाण वाले बनावे और सूप बांस का होता है ॥ १६ ॥ नीचे को कोई काम करना हो तो प्रथम दहिने हाथ को अपने सम्मुख औंधा रक्खे और बांयां हाथ उस से ऊपर औंधा रक्खे ॥ १७ ॥ अग्नि के सन्मुख दोनों हाथ आगे दहिना पीछे वांयां सम्यक् तत्पर करके प्रदक्षिण क्रम से परिसमूहन करें ॥ १८ ॥ भुजा की बराबर लम्बी-कोमल-बक्कल सहित-जो घुनी न हो आगे से फटी तीनपरिधि होती हैं किन्हीं ऋषियों के मत में चारो दिशाओं में चार होती हैं ॥ १९ ॥
तीन परिधि रखने के पक्ष में अग्नि कुण्ड की उत्तर दक्षिण मेखलाओं पर दो परिधि पूर्व को अग्रभाग करके घरे तथा पश्चिम मेखला पर उत्तराग्र धरे । यदि चौथी रक्खे तो पूर्वकी मेखला पर उत्तराग्र धरे । वा पूर्व में खाली रक्खे ॥२०॥
यदि शास्त्र में कही हुई वस्तु न मिले तो उस के सदृश को ग्रहण करे
भाषार्थसहिता ॥ ३९
यवानांमिवगोधूमा व्रीहीणामिवशालयः ॥ २१ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ पञ्चदशः खण्डः ॥ १५ ॥
पिण्डान्वाहार्य्यकं श्राद्धं क्षीणेराजनिशस्यते ।
वासरस्यतृतीयांशे नातिसन्ध्यासमीपतः ॥ १ ॥
यदाचतुर्द्दशीयामं तुरीयमनुपूरयेत् ।
अमावास्याक्षीयमाणा तदैवश्राद्धमिष्यते ॥ २ ॥
यदुक्तंयदहस्त्वेव दर्शनंनैतिचन्द्रमाः ।
अनयापेक्षयाज्ञेयं क्षीणेराजनिचेत्यपि ॥ ३ ॥
यच्चोक्तंदृश्यमानेपितच्चतुर्द्दश्यपेक्षया ।
अमावास्यां प्रतीक्षेत तदन्तेर्वापनिर्वपेत् ॥ ४ ॥
अष्टमेंऽशेचतुर्द्दश्याः क्षीणोभवतिचन्द्रमाः ।
अमावास्याष्टमांशंच पुनःकिलभवेदणु ॥ ५ ॥
आग्रहायण्यमावस्या तथाज्यैष्ठस्ययाभवेत् ।
विशेषमाभ्यांब्रुवते चन्द्रचारविदो जनाः ॥ ६ ॥
अत्रेन्दुराय प्रहरेवतिष्ठते चतुर्थभागोनकलावशिष्टः ।
जौ के सदृश गेहूं हैं और व्रीहि (धान) के समान शालि (चावल सफेद) होते हैं ॥ २१ ॥ यह १५ वां खण्ड पूरा हुआ ॥
पिण्डान्वाहार्य्यक श्राद्ध (जो मावस को होता है) जिस दिन चन्द्रमा क्षीण हो तब करे तीसरे प्रहर में कुछ सन्ध्या काल के अति निकट न हो ऐसे अवसर में करना उत्तम होता है ॥ १ ॥ जब अमावस्था की हानि हो तो चतुर्दशी के चौथे प्रहर में श्राद्ध करना कहा है ॥ २ ॥ जो यह कहा है कि जिस दिन चन्द्रमा न दीखे उसी अपेक्षा से अमावस की हानि होने पर चतुर्दशी को श्राद्ध करे ॥ ३ ॥ और जो श्रुति में कहा है कि चन्द्रमा के दीखने पर भी श्राद्ध करे सो चतुर्दशी के अनुरोध से है परन्तु मावस की प्रतीक्षा करे अथवा चतुर्दशी के अन्त में पिण्ड देदेवे ॥ ४ ॥ चौदश के आठवें भाग में ही चन्द्रमा क्षीण होजाता है और अमावश्या के आठवें भाग में अणु (सूक्ष्म) रूप होता है ॥ ५ ॥ अगहन और जेठकी जो मावस हैं इन दोनों में चन्द्रमा की गति के जानने वाले कुछ विशेषता कहते हैं ॥ ६ ॥ इन दोनों मावसों के पहिले प्रहर में सोलहवें भाग से चतुर्थांश कम चन्द्रमा
४०
कात्यायनस्मृतिः ॥
तदन्तएवक्षयमेतिकृत्स्नमेवंज्योतिश्चक्रविदोवदन्ति ॥ ७ ॥
यस्मिन्नब्देद्वादशैकश्चत्रयव्यस्तस्मिंस्तृतीयायापरिदृश्योनोपजायते।
एवंचारंचन्द्रमसोविदित्वाक्षीणेतस्मिन्नपराण्हेचदद्यात् ॥ ८ ॥
सम्मिश्रायाचतुर्द्दश्याअमावस्याभवेत्क्वचित् ।
खर्व्विकांतांविदुःकेचिद्गताध्वामितिचापरे ॥ ९ ॥
वर्द्धमानाममावस्यां लभेच्चेदपरेहनि ।
यामांस्त्रीनधिकान्वापि पितृयज्ञस्ततोभवेत् ॥ १० ॥
पक्षादावेवकुर्वीत सदापक्षादिकंचरुम् ।
पूर्वाण्हएवकुर्व्वन्ति विद्धेऽप्यन्येमनीषिणः ॥ ११ ॥
सपितुःपितृकृत्येषु ह्यधिकारोनविद्यते ।
नजीवन्तमतिक्रम्य किंचिद्दद्यादितिश्रुतिः ॥ १२ ॥
पितामहेजीवतिच पितुःप्रेतस्यनिर्वपेत् ।
पितुस्तस्यचवृत्तस्य जीवेच्चेत्प्रपितामहः ॥ १३ ॥
पितुःपितुःपितुश्चैव तस्यापिपितुरेवच ।
रहता है फिर एक प्रहर के वाद सब क्षय होजाता है ऐसे ज्योतिष के ज्ञाता कहते हैं ॥ ७ ॥ जिस संवत् में तेरह महीने होते हैं उस में तीसरे पहर से पीछे चौदस को चन्द्रमा नहीं दीखे इस प्रकार चन्द्रमा की गति जानकर क्षीण चन्द्रमा के समय मध्यान्ह के पीछे पिण्ड देवे ॥ ८ ॥ यदि कभी चौदश से मिली मावस होय तो उसे कोई खर्व्विका और कोई गताध्वा कहते हैं ॥ ९ ॥ यदि अगले दिन तीन पहर वा अधिक मावस मिले तो उस दिन पितृ यज्ञ ( श्राद्ध ) होता है ॥ १० ॥ पक्ष याग का चरु पक्ष की आदि (१में) तिथि के विद्ध होने भी मध्यान्ह से पूर्व ही करे यह कोई कहते हैं ॥ ११ ॥ जिस का पिता जीवित हो उसको पितृ कर्म में श्राद्ध का अधिकार नहीं है क्योंकि जीते हुए का उलंघन करके अर्थात् जीवते पिता को छोड़ के पितामहादि को कुछ न देवे यह वेद में लिखा है ॥ १२ ॥ पिता-पितामह-प्रपिता मह इन तीनों को ३ पिण्ड देवे । यदि पिता मर गया हो और पितामह जीवित हो तो मरे पिताको पिण्ड देवे । यदि प्रपितामह जीवित हो तथा पिता पितामह दोनों मर गये हों ॥ १३ ॥ तो वृद्ध प्रपितामह ( बूढा परबाबा )
भाषाऽर्थसहिता ॥
४९
कुर्यात्पिण्डत्रयंयस्य संस्थितःप्रपितामहः ॥ १४ ॥
जीवन्तमतिदद्याद्वा प्रेतायान्नोदकेद्विजः ।
पितुःपितृभ्योवादद्यात् सपितेत्यपराश्रुतिः ॥ १५ ॥
पितामहःपितुःपश्चात्पञ्चत्वंयदिगच्छति ।
पौत्रेणैकादशाहादिकर्तव्यंश्राद्धषोडशम् ॥ १६ ॥
नैतत्पौत्रेणकर्तव्यं पुत्रवांश्चेत्पितामहः ।
पितुःसपिण्डनंकृत्वा कुर्यान्मासानुमासिकम् ॥ १७ ॥
असंस्कृतौनसंस्कार्यौ पूर्वौपौत्रप्रपौत्रकैः ।
पितरंतत्रसंस्कुर्यादितिकात्यायनोऽब्रवीत् ॥ १८ ॥
पापिष्ठमपिशुद्धेन शुद्धं पापकृतापिवा ।
पितामहेनपितरंसंस्कुर्यादितिनिश्चयः ॥ १९ ॥
ब्राह्मणादिहतेताते पतितेसंगवर्जिते ।
व्युत्क्रमाच्चमृतेदेयं येभ्यएवददात्यसौ ॥ २० ॥
मातुःसपिण्डीकरणं पितामह्यासहोदितम् ।
पितामह और अपना पिता इन के लिये तीन पिण्ड वह पुरुष करे ॥ १४ ॥
(जीवते हुए का उलंघन करके मरे हुए को भी द्विज अन्न और जल देवे अथवा जिस का पिता जीवित हो वह अपने पिता के पितरों को देवे यह दूसरी श्रुति है)॥ १५ ॥
यदि पिता से पीछे पितामह मरे तो पोता एकादश आदि सोलह श्राद्ध करै ॥१६॥
यदि पितामह के कोई अन्य पुत्र होय तो पोता श्राद्ध न करै किन्तु पुत्र पिता की सपिंडी करके महीने २ में मासिक श्राद्ध करै ॥ १७ ॥
पितामह आदि यदि संस्कार हीन होंय तो पोते वा प्रपोते उनका संस्कार (दाह आदि) न करें यदि पिता संस्कार हीन होय तो उसका संस्कार पुत्र करै यह कात्यायन ऋषि ने कहा है ॥ १८ ॥
और यह निश्चय है कि पापी भी शुद्ध के संग शुद्ध हो जाता है पापी भी पितामह के संग पिता का संस्कार (श्राद्ध आदि) पुत्र करै ॥ १९ ॥
यदि पिता ब्राह्मण आदि से मरा हो वा पतित हो वा सत्संग से हीन हो अथवा फांसी से मरा हो तो भी उसे और जिनको यह देता है सब को पिण्ड देवे ॥ २० ॥
माता की सपिंडी दादी के
४२ कात्यायनस्मृतिः ॥
यथोक्तेनैवकल्पेन पुत्रिकायानचेत्सुतः ॥ २१ ॥ नयोषिद्भ्यःपृथग्दद्यादवसानदिनादृते । स्वभर्तृपिण्डमात्राभ्यस्तृप्तिरासांयतःस्मृता ॥ २२ ॥ मातुःप्रथमतःपिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः । द्वितीयंतुपितुस्तस्यास्तृतीयंतुपितुःपितुः ॥ २३ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ षोडशः खण्डः ॥ १६ ॥ पुरतोयात्मनःकुर्युःसापूर्वापरिकीर्त्यते । मध्यमादक्षिणेनास्यास्तद्दक्षिणतउत्तमा ॥ १ ॥ वाय्वग्निदिङ्मुखान्तास्ताः कार्याःसार्द्धांगुलान्तराः । तीक्ष्णान्तायवमध्याश्च मध्यंनावद्वोत्किरेत् ॥ २ ॥ शंकुश्चखादिरःकार्यो रजतेनविभूषितः । शंकुश्चैवोपवेषश्च द्वादशाङ्गुलइष्यते ॥ ३ ॥ अग्न्याशाग्रैः कुशैःकार्यं कर्षूणांस्तरणंघनैः ।
संग शास्त्रोक्त विधि से करे यदि पुत्रिका (जो इस प्रतिज्ञा से बिवाही जाती है कि जो इस के लड़का हो सो मैं लूंगा) का पुत्र न हो ॥ २१ ॥ मरण के दिन से बिना स्त्रियों को पति से पृथक् (पिण्डादि) न देवे क्योंकि स्त्रियों की तृप्ति पति के पिंड के लेश से ही कही है ॥ २२ ॥ जो पुत्रिका का पुत्र है वह पहिला पिण्ड माता को दूसरा नाना को तीसरा परनाना को देवे ॥ २३ ॥
यह १६ खण्ड पूरा हुआ ॥
जो रेखा अपने सामने की जाती है उसे पूर्वा और पूर्वा से जो दक्षिण की तरफ की जाती है उसे मध्यमा—और मध्यमा से दक्षिण की तरफ हो उसे उत्तमा कहते हैं ॥ १ ॥ इन तीनों को ऐसे क्रम से करे जैसे वायव्य दिशा से आरम्भ करके आग्नेय दिशा में अग्र भाग हो और डेढ़ अंगुल का बीच रहे और इन तीनों का अग्रभाग पैना और बीच का भाग जौ के समान मोटा हो जैसा कि नाव का आकार होता है ॥ २ ॥ चांदी जिसमें लगी हो और खैर का हो ऐसा शंकु नाम (नाप करने को गाढ़ने की खूंटी) करना यह शंकु और उपवेष नाम हाथ के तुल्य पांच अंगुलि वाला यज्ञ पात्र ये दोनों बारह २ अंगुल के बनावे ॥ ३ ॥ अग्नि की दिशा में है अग्रभाग जिनका ऐसे
भाषार्थसहिता ॥ ४३
दक्षिणांन्तंतदग्रैस्तु पित्र्ययज्ञेपरिस्तरेत् ॥ ४ ॥
स्थगरंसुरभिज्ञेयं चन्दनादिविलेपनम् ।
सौवीराञ्जनमित्युक्तं पिङ्गुलीनांयदञ्जनम् ॥ ५ ॥
स्वस्तरेसर्वमासाद्य यथावदुपयुज्यते ।
देवपूर्व्वंततःश्राद्धमत्वरःशुचिरारभेत् ॥ ६ ॥
आसनाद्यर्घपर्यन्तं वसिष्ठेनयथेरितम् ।
कृत्वाकर्मार्थपात्रेषु उक्तंदद्यात्तिलोदकम् ॥ ७ ॥
तूष्णींपृथगपोदत्वा मन्त्रेणतुतिलोदकम् ।
गन्धोदकंचदातव्यं सन्निकर्षक्रमेणतु ॥ ८ ॥
आसुरेणतुपात्रेण यस्तुदद्यात्तिलोदकम् ।
पितरस्तस्यनाश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्च ॥ ९ ॥
कुलालचक्रनिष्पन्नमासुरंमृन्मयंस्मृतम् ।
तदेवहस्तघटितं स्थाल्यादिदैविकंभवेत् ॥ १० ॥
गन्धान्ब्राह्मणसात्कृत्वा पुष्पाण्युतुभवानिच ।
कुशों से कर्षू नाम उक्त तीनों रेखाओं का आच्छादन करे। और पितरों के श्राद्ध में दक्षिणा को है अग्रभाग जिनका ऐसे कुशों का परिस्तरण करे ॥ ४ ॥
सुगन्ध वाले चन्दन आदि के लेपन को स्थगर और पिङ्गुलियों के अञ्जन को सौवीराञ्जन कहते हैं ॥ ५ ॥ अच्छे कुशों के आसन पर सब वस्तुओं को यथोचित रख कर शीघ्रता न करके देवताओं का पूजन आदि पूर्वक शुद्ध होकर श्राद्ध का प्रारम्भ करे ॥ ६ ॥ आसन से लेकर अर्घ पर्यन्त कर्म वशिष्ठ जी ने जैसा कहा है उस प्रकार करके पात्र में पूर्वोक्त तिलोदक देवे ॥ ७ ॥ प्रथम मन्त्र के विना पृथक् २ जल देकर मन्त्र द्वारा तिल जल देवे और समीप के क्रम से फिर गन्धोदक देवे ॥ ८ ॥ आसुर पात्र से जो पुरुष तिलोदक देता है पन्द्रह वर्ष तक उसके यहां पितर नहीं खाते ॥ ९ ॥ कुलाल के चाक से जो मिट्टी का पात्र बनता है उसे आसुर (राक्षसों का) पात्र कहते हैं और वही मट्टी का पात्र स्थाली आदि हाथ से बनता है उसे दैविक (देवताओं का) पात्र कहते हैं ॥ १० ॥ गन्ध और ऋतु में पैदा हुये फूल और दूध ब्राह्मणों को क्रम से
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