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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

२२ पराशरस्मृतिः ॥

जलावगाहनात्तेषां सद्यःशौचंविधीयते ॥ ५० ॥
असगोत्रमबन्धुंच प्रेतीभूतंद्विजोत्तमम् ।
नीत्वाचदाहयित्वाच प्राणायामेनशुद्ध्यति ॥ ५१ ॥
अनुगम्येच्छयाप्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेववा ।
स्नात्वासचैलंस्पृष्ट्वाग्निं घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ॥ ५२ ॥
क्षत्रियंमृतमज्ञानाद् ब्राह्मणोयोऽनुगच्छति ।
एकाहमशुचिर्भूत्वा पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ ५३ ॥
शवंचवैश्यमज्ञानाद् ब्राह्मणोह्यनुगच्छति ।
कृत्वाशौचंद्विरात्रंच प्राणायामान्षडाचरेत् ॥ ५४ ॥
प्रेतीभूतंतुयःशूद्रं ब्राह्मणोज्ञानदुर्बलः ।
अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ ५५ ॥
त्रिरात्रेतुततःपूर्णे नदींगत्वासमुद्रगाम् ।
प्राणायामशतंकृत्वा घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ॥ ५६ ॥
विनिर्वर्त्ययदाशूद्रा उदकान्तमुपस्थिताः ।


कर्म करने में कुछ भी अशुभ वा दोष नहीं है क्योंकि जल में स्नान करने से उन की उसी समय शुद्धि हो जाती है ॥ ५० ॥ जो ब्राह्मण अपने गोत्र का न हो और अपना बन्धु भी न हो वह मरजाय तो श्मशान में ले जा कर और दाह करके प्राणायाम करने से शुद्ध हो जाता है ॥५१॥ अपने कुटुम्ब के वा अन्य कुटुम्ब के मुर्दा के संग जाकर वस्त्रों सहित स्नान, अग्नि का स्पर्श और थोड़ा घी खाकर शुद्ध होता है ॥५२॥ मरे हुए क्षत्रिय के संग जो ब्राह्मण श्मशान में जाता है वह एक दिन अशुद्ध रह कर पञ्चगव्य सेवन करने से शुद्ध होता है ॥५३॥ जो ब्राह्मण मरे हुए वैश्य के संग अज्ञान से जावे वह दो दिन रात का अशौच करके छः प्राणायाम करे ॥ ५४ ॥ जो अज्ञानी ब्राह्मण मरे हुए शूद्र के संग जाता है वह तीन दिन रात अशुद्ध होता है ॥ ५५ ॥ तीन दिन के पीछे जो समुद्र में जाने वाली हो उस नदी में जाके स्नान करे प्राणायाम कर और घी खाके शुद्ध होता है ॥ ५६ ॥ जब श्मशान से लौटकर शूद्र लोग जल के समीप तिलाञ्जलि देने को आवें तब द्विज लोग उन के स-

भाषार्थसहिता ॥ २३

द्विजैस्तदानुगन्तव्या एषधर्मःसनातनः ॥ ५७ ॥
तस्माद्द्विजोमृतंशूद्रं नस्पृशेन्नचदाहयेत् ।
दृष्टेसूर्यावलोकेन शुद्धिरेषापुरातनी ॥ ५८ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे तृतीयोध्यायः ॥

अतिमानादतिक्रोधात्स्नेहाद्वायदिवाभयात् ।
उद्वध्नीयात्स्त्रीपुमान्वा गतिरेषाविधीयते ॥ १ ॥
पूयशोणितसंपूर्णे त्वन्धेतमसिमज्जति ।
षष्टिवर्षसहस्राणि नरकंप्रतिपद्यते ॥ २ ॥
नाशौचंनोदकंनाग्निं नाश्रुपातंचकारयेत् ।
वोढारोऽग्निप्रदातारः पाशच्छेदकरास्तथा ॥ ३ ॥
तप्तकृच्छ्रेणशुद्ध्यन्तीत्येवमाहप्रजापतिः ।
गोभिर्हतंतथोद्वद्धं ब्राह्मणेनतुघातितम् ॥ ४ ॥
संस्पृशन्तितुयेविप्रा वोढारश्चाग्निदाश्चये ।


सीप जांय यही सनातन धर्म की रीति है ॥ ५७ ॥ तिस से द्विज लोग मरे हुए शूद्र का न तो स्पर्श करें और न दाह करावें यदि मरे शूद्र को देख ले तो सूर्यनारायण के दर्शन से शुद्धि होती है यह शुद्धि पुरातन धर्म की मर्यादा है ॥५८॥

यह पाराशरीय धर्मशास्त्र का तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥

अत्यन्त मान से वा अत्यन्त क्रोध से या किसी के साथ अधिक प्रेम होने से वा भय से स्त्री अथवा पुरुष परस्पर फांसी दें तो उन की निम्न लिखित गति होती है ॥ १ ॥ पीव और रुधिर से भरे नरक में साठ हजार वर्ष तक गोता खाते हैं ॥ २ ॥ न उन का अशौच, न जलदान, न अग्निदाह, और न आंसू वहाते हुये उन के लिये कोई रोवे जो उन्हें गंगा आदि में ले जांय वा जो अग्नि में दाह करे और जो उन की फांसी को काटे ॥ ३ ॥ वे लोग तप्त कृच्छ्र व्रत करने से शुद्ध होते हैं ऐसा प्रजापति ने कहा है-जो पुरुष गौओं से मारा गया हो वा बन्धन (फांसी) से मरा हो वा जिस को ब्राह्मण ने मारा हो ॥४॥ उसका जो ब्राह्मण स्पर्श करें वा उसके मृत देहको श्मशान में लेजांय वा जो

२४ पाराशरस्मृतिः ॥

अन्येऽपिवाऽनुगन्तारः पाशच्छेदकराश्चये ॥ ५ ॥
तप्तकृच्छ्रेणशुद्धास्ते कुर्युर्ब्राह्मणभोजनम् ।
अनडुत्सहितांगांच दद्युर्विप्रायदक्षिणाम् ॥ ६ ॥
त्र्यहमुष्णंपिबेद्वारि त्र्यहमुष्णंपयःपिबेत् ।
त्र्यहमुष्णंपिबेत्सर्पिर्वायुभक्षोदिनत्रयम् ॥७॥
षट्पलंतुपिबेदंभस्त्रिपलंतु पयःपिबेत् ।
पलमेकंपिबेत्सर्पिस्तप्तकृच्छ्रंविधीयते ॥ ८ ॥
योवैसमाचरेद्विप्रः पतितादिष्वकामतः ।
पञ्चाहंवादशाहंवा द्वादशाहमथापिवा ॥ ९ ॥
मासार्द्धमासमेकंवा मासद्वयमथापिवा ।
अब्दार्द्धमब्दमेकंवा भवेदूर्ध्वंहितत्समः ॥ १० ॥
त्रिरात्रंप्रथमेपक्षे द्वितीयेकृच्छ्रमाचरेत् ।
तृतीयेचैवपक्षेतु कृच्छ्रं सान्तपनंचरेत् ॥ ११ ॥
चतुर्थेदशरात्रंस्यात्पराकःपञ्चमेमतः ।


अग्नि में दाह करे और जो उस के संग जाय वा जो फांसी काटें ॥५॥ वे तप्त कृच्छ्र व्रत से शुद्ध हुए ब्राह्मणों को भोजन करावें और एक बैल और एक गौ ब्राह्मण को दक्षिणा देवें ॥ ६ ॥ तीन दिन गर्म जल पीवे फिर तीन दिन गर्म दूध पीवे फिर तीन दिन गर्म घी पीवे फिर तीन दिन वायु को भक्षण करके रहे ॥७॥ छः पल जल, तीन पल दूध, एक पल घी, इस को तप्त कृच्छ्र कहते हैं (पांच तोला चारमासे का एक पल होता है) ॥ ८ ॥ जो ब्राह्मण पतित आदिकों के साथ अज्ञान से पांच, दश, वा बारह दिन व्यवहार करता है ॥९॥ पन्द्रह दिन, वा एक महीना, वा दो महीने, वा चार महीने, वा एक वर्ष, तक पतित के साथ व्यवहार करे वह उस प्रायश्चित्त को करै जो आगे कहेंगे और एक वर्ष से अधिक व्यवहार करे तो वह भी उसी पतित के तुल्य (पतित) हो जाता है ॥ १० ॥ पांच दिन पतित का संग करने में तीन दिन उपवास, दश दिन करने में एक कृच्छ्र, बारह दिन के संग में शान्तपन कृच्छ्र करे ॥ ११ ॥ पन्द्रह दिन के संग में दश दिन का व्रत एक महीने के संग में पराक व्रत,

भाषाथंसहिता ॥ २५

कुर्याच्चान्द्रायणंपष्ठे सप्तमेत्वैन्दवद्वयम् ॥ १२ ॥ शुद्ध्यर्थमष्टमेचैव षण्मासान्कृच्छ्रमाचरेत् । पक्षसंख्याप्रमाणेण सुवर्णान्यपिदक्षिणा ॥ १३ ॥ ऋतुस्नानातुयानारी भर्त्तारंनोपसर्पति । सामृतानरकंयाति विधवाचपुनःपुनः ॥ १४ ॥ ऋतुस्नातांतुयोभार्या सन्निधौनोपगच्छति । घोरायां भ्रूणहत्यायां युज्यतेनात्रसंशयः ॥ १५ ॥ अदुष्टापतितांभार्थी यौवनेयःपरित्यजेत् । सप्तजन्मभवेत्स्त्रीत्वं वैधव्यंचपुनःपुनः ॥ १६ ॥ दरिद्रंव्याधितंमूर्खं भर्त्तारंयावमन्यते । सामृताजायतेव्याली वैधव्यंचपुनःपुनः ॥ १७ ॥ पत्यौजीवतियानारी उपोष्यव्रतमाचरेत् । आयुष्यंहरतेभर्तुः सानारीनरकंव्रजेत् ॥ १८ ॥


दो महीने के संग में चान्द्रायण और चार महीने के संग में दो चान्द्रायण व्रत करे ॥१२॥ एक वर्ष के संग में छः महीने तक कृच्छ्रव्रत करे और एक पक्ष की संख्या के प्रमाण से सुवर्ण दान की संख्याओं का प्रमाण जानो । अर्थात् एक महिने के संग का प्रायश्चित्त हो तो दो सुवर्ण दक्षिणा देवे (सोलह मासा सोने को 'सुवर्ण' कहते हैं) ॥ १३ ॥ जो स्त्री ऋतु काल में चौथे दिन स्नान करके छठे आदि दिन पति के समीप नहीं जाती वह मर कर नरक में जाती है और बारं बार विधवा होती है ॥ १४ ॥ जो पुरुष ऋतु में स्नान जिसने किया हो उस अपनी पत्नी के समीप नहीं जाता उसे घोर भ्रूण हत्या लगती है ॥ १५ ॥ जो पतित न हुई हो ऐसी निर्दोष पत्नी को युवावस्था में जो पुरुष छोड़ देता है वह सात जन्म तक स्त्री योनि में जन्म लेता और बार २ विधवा होता है ॥ १६ ॥ दरिद्री, रोगी मूर्ख भी जो अपना पति हो उस का जो स्त्री अपमान करती है वह मर कर सांपिन होती और बारं बार विधवा होती है ॥ १७ ॥ पति के जीवते जो स्त्री उपवास तथा व्रत करती है वह अपने पति की अवस्था घटाती और आप नरक में जाती है ॥ १८ ॥

३६

पराशरस्मृतिः ॥

अपृष्ट्वाचैवभर्त्तारं यानारीकुरुतेव्रतम् ।
सर्वंतद्राक्षसान्गच्छेदित्येवंमनुरब्रवीत् ॥ १९ ॥
बान्धवानांसजातीनां दुर्वृत्तंकुरुतेतुया ।
गर्भपातंचयाकुर्यान्न तांसंभाषयेत्क्वचित् ॥ २० ॥
यत्पापं ब्रह्महत्याया द्विगुणं गर्भपातने ।
प्रायश्चित्तंनतस्यास्ति तस्यास्त्यागोविधीयते ॥ २१ ॥
नकार्यमावसथ्येन नाग्निहोत्रेणवापुनः ।
सभवेत्कर्मचाण्डालो यस्तुधर्मपराङ्मुखः ॥ २२ ॥
ओघवाताहृतंबीजं यस्यक्षेत्रेप्ररोहति ।
सक्षेत्रीलभतेबीजं नबीजीभागमर्हति ॥ २३ ॥
तद्वत्परस्त्रियःपुत्रौ द्वौसुतौकुण्डगोलकौ ।
पत्यौजीवतिकुण्डस्तु मृतेभर्त्तरिगोलकः ॥ २४ ॥
औरसःक्षेत्रजश्चैव दत्त:कृत्रिमकःसुतः ।


जो स्त्री अपने पति को पूछे बिना व्रत करती है वह सब राक्षसों को मिलता है यह मनुजी ने कहा है ॥१९॥ जो स्त्री अपने सजातीय बांधवों के संग दुष्ट आचरण वा गर्भपात करती है उस के संग कभी भी पति न बोले ॥ २० ॥ जो पाप ब्रह्महत्या का है उस से दूना गर्भ के पात (गिराने) में है उस गर्भघातिनी का प्रायश्चित्त कुछ नहीं है किन्तु उस का त्याग कर देवे ॥ २१ ॥ उस गर्भपात करने वाली पत्नी के त्याग से श्रौत स्मार्त्त अग्निहोत्र भले ही छूट जाय कुछ चिन्ता न करे किन्तु उस स्त्री के साथ अग्निहोत्र करने वाला धर्म विरोधी होने से कर्मचाण्डाल माना जायगा ॥ २२ ॥

आंधी रूप वायु के वेग से उड़कर आया बीज यदि दूसरे के खेत में उपज आवे तो वह खेत वाले का ही भाग होगा और बीज वाले को उस का भाग मिलना योग्य नहीं ॥ २३ ॥ इसी प्रकार अन्यपुरुष के बीज से दूसरे की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न हो वह भी उस का होगा जिस की वह स्त्री हो सो ऐसे कुण्ड और गोलक दो पुत्र होते हैं एक पति के जीते जो जार से उत्पन्न हो वह कुण्ड और पति के मरे पीछे होय तो गोलक कहाता है ॥ २४ ॥ औरस, क्षेत्रज, दत्तक, और कृत्रिम ये चार पुत्र कहाते हैं । जिस को माता वा पिता

भाषार्थसहिता ॥
३७

दद्यान्मातापितावापि सपुत्रोदत्तकोभवेत् ॥ २५ ॥
परिवित्तिःपरीवेत्ता ययाचपरिविद्यते ।
सर्वेतेनरकंयान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥ २६ ॥
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुतेयोऽग्रजेसति ।
परिवेत्तासविज्ञेयः परिवित्तिस्तुपूर्वजः ॥ २७ ॥
द्वौकृच्छ्रौपरिवित्तेस्तु कन्यायाःकृच्छ्रएवच ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रौदातृस्तु होताचान्द्रायणं चरेत् ॥२८॥
कुब्जवामनषण्ढेषु गद्गदेषुजडेषुच ।
जात्यन्धेबधिरेमूके नदोषःपरिविन्दतः ॥ २६ ॥
पितृव्यपुत्रःसापत्नः परनारीसुतस्तथा ।
दाराग्निहोत्रसंयोगे नदोषःपरिवेदने ॥ ३० ॥
ज्येष्ठोभ्रातायदातिष्ठेदाधानंनैवकारयेत् ।
अनुज्ञातस्तुकुर्वीत शंखस्यवचनंयथा ॥ ३१ ॥


दे देवे वह दत्तक पुत्र होता है ॥ २५ ॥ परिवित्ति ( परिवेत्ता का बड़ा भाई ) परिवेत्ता ( बड़े भाई से पहिले जो छोटा बिवाह करै ) वह कन्या जिस के साथ बिवाह करने से वह परिवेत्ता हुआ है, कन्या का दाता और याजक (विवाह पढ़ने वाला) ये सब नरक में जाते हैं ॥२६॥ ज्येष्ठ भाई से पहिले जो अपना विवाह करे वा अग्निहोत्र ग्रहण करे वह परिवेत्ता और ज्येष्ठ भाई परिवित्ति कहाता है ॥ २७ ॥ परिवित्ति दो कृच्छ्र व्रत करे कन्या एक कृच्छ्र व्रत करे, कन्याका दाता कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र दोनों व्रत करे तथा विवाह कराने वाला पुरोहित चांद्रायण व्रत करै ॥ २८ ॥ कुबड़ा, विलंदिया (बौना) नपुंसक, तोतला, महा मूर्ख, जन्मान्ध, बहरा, गूंगा, इन ऐसे जेठे भाइयों के परिवेदन करने ( पहिले विवाह वा अग्निहोत्र लेने ) में दोष नहीं है ॥ २९ ॥ यदि जेठा भाई चाचा का पुत्र हो, वा सौतेली माता का पुत्र हो, वा दूसरे की स्त्री का पुत्र हो तो उस से पहिले बिवाह करने और अग्निहोत्र लेने से उस के परिवेदन में दोष नहीं है ॥३०॥ जेठा भाई विद्यमान हो पर स्वयं अग्निहोत्र न ले तब शंख ऋषि के वचनानुसार उस बड़े भाई की आज्ञा से छोटा भाई अग्निहोत्र को ग्रहण करले ॥ ३१ ॥

२८ पराशरस्मृतिः ॥

नष्टेमृतेप्रव्रजिते क्लीबेचपतितेपतौ ।
पञ्चस्वापत्सुनारीणां पतिरन्योविधीयते ॥ ३२ ॥
मृतेभर्त्तरियानारी ब्रह्मचर्य्यव्रतेस्थिता ।
सामृतालभतेस्वर्गं यथातेब्रह्मचारिणः ॥ ३३ ॥
तिस्रःकोट्योऽर्द्धकोटीच यानिलोमानिमानवे ।
तावत्कालंवसेत्स्वर्गे भर्त्तारंयाऽनुगच्छति ॥ ३४ ॥
व्यालग्राहीयथाव्यालं बलादुद्धरतेबिलात् ।
एवंस्त्रीपतिमुद्धृत्य तेनैवसहमोदते ॥ ३५ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
वृकश्वानशृगालादि दष्टोयस्तुद्विजोत्तमः ।
स्नात्वाजपेत्सगायत्रीं पवित्रांवेदमातरम् ॥ १ ॥
गवांशृङ्गोदकस्नानान्महानद्योस्तुसंगमे ।


जिस से सगाई हुई हो वह पति नष्ट ( परदेश में गया हो और खबर न हो ) हो जाय, वा मर जाय, वा संन्यासी हो जाय, वा नपुंसक निकले, वा पतित हो जाय, तो इन पांच आपत्तियों में दूसरा पति कहा है अर्थात् सगाई हुये पीछे दूसरे के संग सगाई करके विवाह कर देवे ॥ ३२ ॥
पति के मरे पीछे जो स्त्री ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहती है। वह मर कर स्वर्ग में इस प्रकार जाती है जैसे वे ब्रह्मचारी गये ॥ ३३ ॥ जो स्त्री पति के संग अनुगमन ( सती होना ) करती है वह साढ़े तीन करोड़ मनुष्य के शरीर में जो लोम हैं उतने ही वर्ष तक स्वर्ग में बसती है ॥३४॥ सांप को पकड़ने वाला जैसे बिले में से सांप को निकाल लेता है ऐसे ही वह स्त्री भी नरक से अपने पति का उद्धार करके उस पति के संग ही स्वर्ग में आनन्द भोगती है ॥३५॥

यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ४ चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥

भेड़िया, कुत्ता, गीदड़, आदि जिस ब्राह्मण को काटें वह स्नान करके वेदों की माता पवित्र गायत्री का जप करे ॥ १ ॥ कुत्ता जिसे काटे वह गौ के सींग के जलस्नान से वा गङ्गादि महानदियों के सङ्गम में स्नान करने

भाषाधर्मसंहिता ॥ २९

समुद्रदर्शनाद्वापि शुनादष्टःशुचिर्भवेत् ॥ २ ॥
वेदविद्याव्रतस्नातः शुनादष्टोद्विजोयदि ।
सहिरण्योदकेस्नात्वा घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ॥ ३ ॥
सव्रतस्तुशुनादष्टस्त्रिरात्रंसमुपोषितः ।
घृतंकुशोदकंपीत्वा व्रतशेषंसमापयेत् ॥ ४ ॥
अव्रतःसव्रतोवापि शुनादष्टोभवेद्विजः ।
प्रणिपत्यभवेत्पूतो विप्रैश्चानुनिरीक्षितः ॥ ५ ॥
शुनाघ्राताऽवलीढस्य नखैर्विलिखितस्यच ।
अद्भिःप्रक्षालनंप्रोक्तमग्निनाचोपचूलनम् ॥ ६ ॥
ब्राह्मणीतुशुनादष्टा जम्बुकेनवृकेणवा ।
उदितंसोमनक्षत्रं दृष्ट्वासद्यःशुचिर्भवेत् ॥ ७ ॥
कृष्णपक्षेयदासोमो नदृश्येतकदाचन ।
यांदिशंव्रजतेसोमस्तांदिशंचाऽवलोकयेत् ॥ ८ ॥
असदब्राह्मणकेग्रामे शुनादष्टोद्विजोत्तमः ।


से वा समुद्र के दर्शन से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ वेद विद्या पढ़े वा ब्रह्मचर्य व्रत पूरा करके समावर्त्तन स्नान किये गृहस्थ ब्राह्मण को यदि कुत्ता काटे तो वह सुवर्ण सहित जल से स्नान कर और घी खाके शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ यदि व्रत वाले ब्राह्मण को कुत्ता काटे तो तीन दिन रात उपवास करै फिर घृत और कुशों के जल को पीकर शेष व्रत को पूरा करदेवे ॥ ४ ॥ व्रत वाले वा बिना व्रत वाले कैसे ही द्विज को कुत्ता काटे तो ब्राह्मणों को प्रणिपात (नमस्कार) करने और तपस्वी ब्राह्मणों के देखनेसे शुद्ध होता है॥५॥ जो वस्तु कुत्तेने सूंघा, वा चाटा हो, वा नखों से खोदा हो वह जल से धोने और अग्नि में तपाने से शुद्ध होती है ॥६॥ यदि ब्राह्मणी को कुत्ता वा गीदड़ वा भेड़िया काटे तो उदय हुए चन्द्रमा और नक्षत्रों को देख कर शुद्ध होती है ॥७॥ यदि कृष्णपक्ष में कभी चन्द्रमा न दीखे तो जिस दिशा को चन्द्रमा उदय हो कर जाता है उस दिशा को देख लेवे ॥ ८ ॥ जिस में ब्राह्मण कोई न हो वा ब्रह्मतेज से हीन दुराचारी ब्राह्मण रहते हों ऐसे ग्राम में यदि ब्राह्मण को कुत्ता काटे

३० पराशरस्मृतिः ॥

वृषंप्रदक्षिणोकृत्य सद्यःस्नात्वाशुचिर्भवेत् ॥ ९ ॥
चण्डालेनश्वपाकेन गोभिर्विप्रैर्हतोयदि ।
आहिताग्निर्मृतोविप्रो विषेणात्माहतोयदि ॥ १० ॥
दहेत्तं ब्राह्मणंविप्रो लोकाग्नौमन्त्रवर्जितम् ।
स्पृष्ट्वाचोह्याचदग्ध्वाच सपिण्डेषुचसर्वदा ॥ ११ ॥
प्राजापत्यंचरेत्पश्चाद्विप्राणामनुशासनात् ।
दग्ध्वास्थीनिपुनर्गृह्य क्षीरैःप्रक्षालयेद्द्विजः ॥ १२ ॥
स्वेनाऽग्निनास्वमन्त्रेण पृथगेतन्पुनर्दहेत् ।
आहिताग्निर्द्विजः कश्चित्प्रवसेत्कालचोदितः ॥ १३ ॥
देहनाशमनुप्राप्तस्तस्याऽग्निर्वसतेगृहे ।
श्रौताग्निहोत्रसंस्कारः श्रूयतांमुनिपुङ्गवाः ! ॥ १४ ॥
कृष्णाजिनंसमास्तीर्य कुशैस्तुपुरुषाकृतिम् ।
षट्शतानिश्शतंचैव पलाशनांचवृन्तकम् ॥ १५ ॥


तो शिव जी के बाहन बैल ( नन्दी ) की प्रदक्षिणा कर शीघ्र स्नान करके शुद्ध होता है ॥ ९ ॥ यदि किसी ब्राह्मण को चाण्डाल, श्वपाक ( महतर की जाति डोम ) गौ, वा ब्राह्मण, मारडाले वा विष खा कर स्वयं मरजाय और वह आहिताग्नि नाम अग्निहोत्री होय तो ॥ १० ॥ उस ब्राह्मण का लौकिक अग्नि से दाह करे । और यदि सपिण्ड के लोग उस का स्पर्श करें, श्मशान में ले जांय वा दाह करें तो क्रिया करने पश्चात् सदैव ॥ ११ ॥ ब्राह्मणों की आज्ञा से प्राजापत्य व्रत करें और उस के फंके हुये हाड़ों को फिर बीन कर द्विज लोग दूधसे धोवें ॥ १२ ॥ फिर अपने अग्नि और अपनी शाखा के मन्त्र से दूसरी जगह विधिपूर्वक उस चाण्डादि के हाथ से मरे ब्राह्मण के हड्डियों का दाह करें। यदि अग्निहोत्री ब्राह्मण परदेश में काल वश ॥ १३ ॥ मरण को प्राप्त हो जाय और अग्नि उस के घर में विद्यमान होय तो हे मुनियो में श्रेष्ठ लोगो ! उस प्रेत का वेदोक्त अन्त्येष्टि संस्कार तुम सुनो ॥ १४ ॥ कालीमृगछाला बिछाकर कुशाओं से पुरुष का आकार बनावे सातसौ ७०० ढांकके पत्ते डंडी सहित इस निम्न लिखित प्रकार से उसमें लगावे ॥ १५ ॥

भाषाऽर्थसहिता ॥ ३१

चत्वारिंशच्छिरेदद्यात्षष्टिंकण्ठेतुविन्यसेत् । बाहुभ्यांचशतंदद्यादङ्गुलीषुदशैवतु ॥ १६ ॥ शतंचोरसिसंदद्याच्छतंचैवोदरेन्यसेत् । दद्यादष्टौवृषणयोःपञ्चमेढूरेतुविन्यसेत् ॥ १७ ॥ एकविंशतिमूरुभ्यां जानुजङ्गेचविंशतिम् । पादाङ्गुल्‍योःशताद्वंच यज्ञपात्रंततोन्यसेत् ॥ १८ ॥ शम्यांशिशनेविनिक्षिप्य अरणिंमुष्कयोरपि । जूहूंचदक्षिणेहस्ते वामेतूपभृतंन्यसेत् ॥ १९ ॥ कर्णेतूलूखलंदद्यात्पृष्ठे चमुसलंन्यसेत् । उरसिंक्षिप्यदृषदं तण्डुलाज्यतिलान्मुखे ॥ २० ॥ श्रोत्रेचप्रोक्षणींदद्यादाज्यस्थालींचचक्षषोः । कर्णनेत्रेमुखेघ्राणे हिरण्यशकलंन्यसेत् ॥ २१ ॥ अग्निहोत्रोपकरणमशेषंतत्रविन्यसेत् । असौस्वर्गायलोकायस्वाहेतिचघृताहुतिम् ॥ २२ ॥


चालीस शिर में, साठ पत्ते कंठ में, दोनों भुजाओं में सौ २ पत्ते, और दश २ (पचास) पत्ते अंगुलियों में लगावे ॥१६॥ सौ पत्ते छाती में, सौ पत्ते उदर में, और आठ पत्ते दोनों वृषणों (अण्डकोशों) में, और पांच मेढ्र (लिङ्ग) में, रक्खे ॥१७॥ इक्कीस २ पत्ते घोंटू से ऊपर दोनों जांघों में, घोंटू से नीचे गोड़ों में बीश २ पत्ते, और पगों की अङ्‌गुलियों में पचाश पत्ते रक्खै । फिर यज्ञ के पात्रों का विनियोग निम्न लिखित रीति से करे ॥१८॥ शम्या नामक यज्ञ पात्र को लिंग पर, अरणी को अंडकोशों पर, दहिने हाथ पर जुहू को, वांयें हाथ में उपभृत् को रक्खै ॥ १९ ॥ दहिने कान पर ऊखल को, पीठ पर मूसल को रक्खै, छाती पर दृषद् (हविषपीषने की शिल) तंडुल, घी, और तिल मुख पर रक्खे ॥ २० ॥ कान पर प्रोक्षणी पात्र, नेत्रों में आज्य स्थाली को रक्खै, कान, नेत्र, मुख, नाक, इन के छिद्रों में सुवर्ण के टुकड़े डाले ॥ २१ ॥ और अग्निहोत्र के शेष बचे सब औजार वहां चितापर रखदे फिर (असौस्वर्गाय लोकाय स्वाहा) इस मंत्र से घृत की एक आहुति छोड़े ॥२२॥

३२ पाराशरस्मृतिः ॥

दद्यात्पुत्रोऽथवाभ्राताप्यन्योवापिचबान्धवः ।
यथादहनसंस्कारस्तथाकार्यंविचक्षणैः ॥ २३ ॥
ईदृशंतुविधिंकुर्याद्ब्रह्मलोकगतिःस्मृता ।
दहन्तियेद्विजास्तंतु तेयान्तिपरमांगतिम् ॥ २४ ॥
अन्यथाकुर्वतेकर्म त्वात्मबुद्धिप्रचोदिताः ।
भवन्त्यल्पायुषस्तेवै पतन्तिनरकेऽशुचौ ॥ २५ ॥
इति पाराशरोये धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि प्राणहत्यासुनिष्कृतिम् ।
पराशरेणपूर्वोक्तां मन्वर्थापिचविस्तृताम् ॥ १ ॥
क्रौंचसारसहंसांश्च चक्रवाकंचकुकुटम् ।
जालपादंचशरभं हत्वाऽहोरात्रतःशुचिः ॥ २ ॥
बलाकाटिट्टिभौवापि शुकपारावतावपि ।
अटीनवकघातीचशुद्ध्येतेनक्तभोजनात् ॥ ३ ॥
वृककाककपोतानां सारीतित्तिरिघातकः ।


पुत्र, भाई, अथवा अन्य कोई बांधव इस आहुति को देवे । फिर जैसे अग्नि से दाह करते हैं वैसे ही विद्वान् लोग सब कर्म करें ॥ २३ ॥ जिस मृतक का ऐसे पूर्वोक्त विधान से दाह कर्म किया जाय उस को ब्रह्मलोक प्राप्त होता है और जो ब्राह्मणादि द्विज उस अग्निहोत्री का दाह करते हैं वे भी परमगति को प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ जो लोग अपनी बुद्धि से अन्यथा शास्त्र विरुद्ध कर्म करते हैं वे अल्प अवस्था वाले होते हैं और अशुद्ध नरक में पड़ते हैं ॥ २५ ॥

यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूराहुआ ॥

यहां से प्राणियों की हत्याओं का प्रायश्चित्त कहते हैं। जो प्रथममहर्षि पाराशर ने कहा और जिसे मनु जी ने भी विस्तार से कहा है ॥ १ ॥ क्रौंच, सारस, हंस, चकवा, मुरगा, जालपाद, शरभ (एक प्रकार का मृग) इनको मारकर एक दिन रात व्रत करने से शुद्ध होता है ॥ २ ॥ बलाका, टिट्टिभ, तोता, कबूतर, अटीनवक (जो वगला उड़ता फिरे) इन के मारने पर दिन भर व्रत कर रात्रि को भोजन करने से शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ भेड़िया, कौआ, कपोत, सारी ( पक्षिभेद ) और

भाषार्थसहिता ॥ ३३

अन्तर्जलेउभेसंध्ये प्राणायामेनशुद्ध्यति ॥ ४ ॥ गृध्रश्येनशशादीनामुलूकस्यचघातकः । अपक्वाशीदिनंतिष्ठे त्त्रिकालंमारुताशनः ॥ ५ ॥ वल्गुणीचटकानांच कोकिलाखञ्जरीटकान् । लावकान्रक्तपादांश्च शुद्ध्येतेनक्तभोजनात् ॥ ६ ॥ कारण्डवचकोराणां पिङ्गलाकुररस्यच । भारद्वाजादिकंहत्वा शिवंसंपूज्यशुद्ध्यति ॥ ७ ॥ भेरुण्डचाषभासांश्च पारावतकपिञ्जलौ । पक्षिणांचैवसर्वेषामहोरात्रमभोजनम् ॥ ८ ॥ हत्वामूषकमार्जारसर्पांऽजगरडुण्डुभान् । कृसरंभोजयेद्विप्रान्मोहदण्डंचदक्षिणाम् ॥ ९ ॥ शिशुमारंतथागोधां हत्वाकूर्मंचशल्यकम् । वृन्ताकफलभक्षीवाऽप्यहोरात्रेणशुद्ध्यति ॥ १० ॥ वृकजम्बुकऋक्षाणां तरक्षूणांचघातकः।


तीतर इन को जो मारे वह दोनों संध्या (प्रातःकाल और सायंकाल) ओं में जल के भीतर प्राणायाम करने से शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ गीध, बाज, खरहा, और उल्लू इन को जो मारे वह दिनभर पका अन्न न खावे किन्तु तीनों काल वायु भक्षण करता हुआ खड़ा रहे ॥ ५ ॥ बलगुणी, चटका, कोइल, खंजरीट, (खंजन) लावक (लवा) रक्तपग वाले इन को मार कर दिन को अपादिव्रत तथा रात को भोजन करने से शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ कारंडव (हंस का भेद) चकोर, पिंगला, (छोटा उल्लू) कुरर (कुररी) भारद्वाज (व्याघ्राट) आदि को मार कर शिव जी का पूजन करने से शुद्ध होता है ॥ ७ ॥ भेरुण्ड (भुरड) पपीहा, भास, पारावत, कपिंजल, और अन्य सब पक्षियों को मार कर एक दिन रात भोजन न करे ॥ ८ ॥ मूसा, बिलाव, सांप, अजगर, डुंडुभ, को मारने वाला ब्राह्मणों को खिचड़ी जिमाकर लोहे का डंडा दक्षिणा में देवे ॥ ९ ॥ शिशुमार, गोह, कछुआ, सेही, इनको जो मारे वह और जो बैंगन खाय वह एक दिन रात व्रत उपवास करने से शुद्ध होता है ॥ १० ॥ भेड़िया, गीदड़, रीछ, तरक्षु (चीता) इन को जो मारे वह ब्राह्मणको एक सेर भर तिल

३५ पराशरस्मृतिः ॥

तिलप्रस्थंद्विजेदद्याद्वायुभक्षोदिनत्रयम् ॥ ११ ॥ गजस्यचतुरङ्गस्य महिषोष्ट्रनिपातने । प्रायश्चित्तमहोरात्रं त्रिसंध्यमवगाहनम् ॥ १२ ॥ कुरङ्गं वानरं सिंहं चित्रंव्याघ्रञ्चघातयेत् । शुद्ध्येतसत्रिरात्रेण विप्राणांतर्पणेनच ॥ १३ ॥ मृगरोहिद्वराहाणामवेर्बस्तस्यघातकः । अफालकृष्टमश्नीयादहोरात्रमुपोष्यसः ॥ १४ ॥ एवंचतुष्पदानांच सर्वेषांवनचारिणाम् । अहोरात्रोषितस्तिष्ठेज्जपन्वैजातवेदसम् ॥ १५ ॥ शिल्पिनंकारुकंशूद्रं स्त्रियंवायस्तुघातयेत् । प्राजापत्यद्वयंकृत्वा वृषैकादशदक्षिणा ॥ १६ ॥ वैश्यंवाक्षत्रियंवापि निर्दोषंयोऽभिघातयेत् । सोऽतिकृच्छ्रद्वयंकुर्याद् गोविंशंदक्षिणांददेत् ॥ १७ ॥ वैश्यंशूद्रंक्रियासक्तं विकर्मस्थंद्विजोत्तमम् ।


देवै और तीन दिन वायु मात्र का भक्षण करे अर्थात् उपवास करे ॥ ११ ॥ हाथी, घोड़ा, भैंसा, ऊंट, इन को जो मारे वह एक दिन रात उपवास करे और त्रिकाल स्नान करै ॥ १२ ॥ कुरंग मृग, वानर, सिंह, चीता, बाघ, इनको जो मारै वह तीन दिन रात व्रत करने और ब्राह्मणों को भोजन कराने से शुद्ध होता है ॥ १३॥ हरिण, लालमृग, सूकर, भेड़, बकरा, इन को जो मारे वह एक दिन रात उपवास करके उस अन्न को खाय जो बिना जोते पैदा हुआ हो ॥ १४ ॥ इसी प्रकार सब चौपाये और सब वन के विचरने वाले जीवों को मार कर जातवेदस अग्नि के मंत्र काजप करता हुआ एक दिन रात खाड़ रह के उपवास करे ॥१५॥ शिल्पी, कारीगर, शूद्र, और स्त्री इनको जो मारडाले, वह दो प्राजापत्य करके दश गौ ग्यारहवां बैल दक्षिणा में देवै ॥१६ ॥ निर्दोष वैश्य वा क्षत्रिय को जो मार डाले वह दो अतिकृच्छ्र व्रत करै और बीस गौ दक्षिणा में देवै ॥१७॥ शुभ कर्म में तत्पर वैश्य वा शूद्र को और निन्दित कर्म करने वाले ब्राह्मण को जो मार डाले वह चांद्रायण व्रत करै और तीस

भाषार्थसहिता ॥ ३५

हत्वाचान्द्रायणं कुर्यात् त्रिंशद्गाश्चैव दक्षिणा ॥ १८ ॥ चाण्डालं हतवान्कश्चिद् ब्राह्मणोयदि कञ्चन । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं गोद्वयंदक्षिणां ददेत् ॥ १९ ॥ क्षत्रियेणापि वैश्येन शूद्रेणैवेतरेण च । चाण्डाले वधसंप्राप्ते कृच्छ्रार्द्धेन विशुद्ध्यति ॥ २० ॥ चौरः श्वपाकश्चाण्डालो विप्रेणाभिहतो यदि । अहोरात्रोषितः स्नात्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥ २१ ॥ श्वपाकं चापि चाण्डालं विप्रः संभाषते यदि । द्विजैः संभाषणं कुर्यात्सावित्रीं च सकृज्जपेत् ॥ २२ ॥ चाण्डालैः सह सुप्तं तु त्रिरात्रमुपवासयेत् । चाण्डालैकपथं गत्वा गायत्रीस्मरणाच्छुचिः ॥ २३ ॥ चाण्डालदर्शने सद्य आदित्यमवलोकयेत् । चाण्डालस्पर्शने चैव सचैलं स्नानमाचरेत् ॥ २४ ॥ चाण्डालखातवापीषु पीत्वा सलिलमग्रजः । अज्ञानात्त्रिकनक्तेन त्वहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥ २५ ॥ चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं पीत्वा कूपगतं जलम् ।


गो दक्षिणा में देवे ॥ १८ ॥ यदि कोई ब्राह्मण किसी चांडाल को मार डाले तो कृच्छ्र प्राजापत्य व्रत करे और दो गौ दक्षिणा में देवे ॥ १९ ॥ यदि क्षत्रिय वैश्य वा शूद्र वा अन्य कोई वर्णसंकर ये चांडाल को मार डालें तो आधा कृच्छ्र व्रत करने से शुद्ध होते हैं ॥ २० ॥ यदि कोई ब्राह्मण, चौर श्वपाक, चांडाल इन को मार डाले तो एक दिन रात उपवास पूर्वक स्नान करके पञ्चगव्य पीने से शुद्ध होता है ॥ २१ ॥ यदि श्वपाक और चांडाल इन के संग ब्राह्मण संभाषण करे तो ब्राह्मणों के साथ संभाषण करके एक बार गायत्री जपै ॥ २२ ॥ जो ब्राह्मण चांडाल के संग सोवे तो तीन दिन उपवास करने से और चांडाल के संग एक मार्ग में चलै तो गायत्री के स्मरण से शुद्ध होता है ॥ २३ ॥ चाण्डाल का दर्शन करे तो शीघ्र ही सूर्य्य का दर्शन करै और चांडाल का स्पर्श करे तो सचैल स्नान करे ॥ २४ ॥ चाण्डाल की खोदी बावड़ी वा कुआ में अज्ञान से ब्राह्मण जल पीवे तो एक रात भर और जान कर पीवे तो एक दिन रात व्रत करने से शुद्ध होता है ॥ २५ ॥ जिस कूप में चाण्डाल के

३६ पराशरस्मृतिः ॥

गोमूत्रयावकाहारस्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् ॥ २६ ॥ चाण्डालघटसंस्पृष्टं यत्तोयं पिवति द्विजः । तत्क्षणात्क्षिपतेयस्तु प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ २७ ॥ यदि न क्षिपतेतोयं शरीरेयस्यजीर्यति । प्राजापत्यं न दातव्यं कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ २८ ॥ चरेत्सांतपनं विप्रः प्राजापत्यंतुक्षत्रियः । तदर्धंतुचरेद्वैश्यः पादं शूद्रस्यदापयेत् ॥ २९ ॥ भाण्डस्थमन्त्यजानां तु जलं दधि पयः पिबेत् । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैवप्रमादतः ॥ ३० ॥ ब्रह्मकूर्चोपवासेन द्विजातीनांतुनिष्कृतिः । शूद्रस्यचोपवासेन तथादानेनशक्तितः ॥ ३१ ॥ भुङ्क्तेऽज्ञानाद्द्विजश्रेष्ठः चाण्डालात्नंकथंचन । गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेणशुद्ध्यति ॥ ३२ ॥ एकैकंग्रासमश्नीयाद् गोमूत्रयावकस्यच । दशाहंनियमस्थस्य व्रतंतत्तुविनिर्दिशेत् ॥ ३३ ॥


वर्तन का स्पर्श हुआ हो उस कुए का जल पिया होतो गोमूत्र और कुलत्थ को खाकर एक दिन रात व्रत करने से शुद्ध होता है ॥ २६ ॥ यदि चांडाल के घट का जल ब्राह्मण पीलेवे और उस जल को उसी क्षण में वमन कर दे तो एक प्राजापत्य व्रत करे ॥ २७ ॥ यदि वमन न करदे और उस जल को पचाजाय तो प्राजापत्य न करै किन्तु सांतपन कृच्छ्र व्रत करे ॥ २८ ॥ ब्राह्मण कृच्छ्र सांतपन व्रत, क्षत्रिय प्राजापत्य, वैश्य आधा प्राजापत्य और शूद्र चौथाई प्राजापत्य व्रत करे ॥ २९ ॥ यदि अन्त्यजों के पात्र में रक्खा जल, दही, दूध, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र भूल कर के पी लेवें तो ॥ ३० ॥ ब्रह्मकूर्च उपवास से द्विजातियों की और एक उपवास तथा यथाशक्ति किये दान से शूद्र की शुद्धि होती है ॥ ३१ ॥ यदि किसी प्रकार अज्ञान से ब्राह्मण चांडाल के अन्न को खालेवे तो गोमूत्र और कुलत्थ को खाकर दश दिन में शुद्ध होता है ॥ ३२ ॥ और गोमूत्र में कुलत्थ को दश दिन तक एक २ ग्रास खाय और नियम से रहे यही व्रत उस ब्राह्मण के लिये बताना चाहिये ॥ ३३ ॥

भावार्थसहिता ॥ ३१

अविज्ञातस्तुचाण्डालो यस्यवेश्मन्नितिष्ठति । विज्ञातउपसंन्यस्य द्विजाःकुर्युरनुग्रहम् ॥३४॥ मुनिवक्त्रोद्गतान्धर्मान् गायन्तोवेदपारगाः । पतन्तमुद्धरेयुस्ते धर्मज्ञाःपापसंकटात् ॥ ३५ ॥ दध्नाचसर्पिषाचैव क्षीरगोमूत्रयावकम् । भुञ्जीतसहभृत्यैश्च त्रिसंध्यमवगाहनम् ॥ ३६ ॥ त्र्यहंभुञ्जीतदध्नाच त्र्यहंभुञ्जीतसर्पिषा। त्र्यहंक्षीरेणभुञ्जीत एकैकेनदिनत्रयम् ॥३७ ॥ भावदुष्टंनभुञ्जीत मोच्छिष्टंकृमिदूषितम् । दधिक्षीरस्यत्रिपलं पलमेकंघृतस्यतु ॥ ३८ ॥ भस्मनातुभवेच्छुद्धिरुभयोःकांस्यताम्रयोः । जलशौचेनवस्त्राणां परित्यागेनमृन्मयम् ॥ ३९ ॥


यदि बिना जाने कोई चांडाल द्विजों के घर में ठहरे तो जान लेने पर उसे निकाल कर द्विज ब्राह्मण लोग उस ब्राह्मण पर दया कर उसे शुद्ध करें ॥३४॥ मुनियों के मुख से निकले धर्मों को गाते हुये वेद के पार पहुंचे हुए धर्म के ज्ञाता विद्वान् लोग पतित हुए उस ब्राह्मण को प्रायश्चित्त कराके पाप संकट से उद्धार करें ॥ ३५ ॥ वह ब्राह्मण जिस के घर में अज्ञात चाण्डाल मिल जुल के रहा हो दही, घी, दूध, गोमूत्र, और कुलत्थ इन को भृत्यों और स्त्री पुत्रादि के सङ्ग निम्न प्रकार से खावे और त्रिकाल स्नान करै ॥ ३६ ॥ तीन दिन दही से, तीन दिन घी से, और तीन दिन दूध से ( यावक ) नाम कुल्माष-( कुलथी ) खावे और तीन दिन एक २ दही आदि खावे ॥ ३७ ॥ जिस में कोई दोषारोपण हो गया हो वा दूषित होने की शंका हो गयी हो, जो किसी का झूठा हो, जिस में कृमि पड़ गये हों,उसे न खावे । दही और घी ऊपर कहे व्रत में तीन २ पल ( अर्थात् चार तोला का एक पल होता तब १२ तोले के तीन पल हुए ) और घी एक पल खावे ॥ ३८ ॥ जिस के घर में चाण्डाल रह चुका हो उस घर के कांसे और तांबे के पात्रों की शुद्धि भस्म से, जलमें धोने से वस्त्रों की शुद्धि होती और मही के पात्र अशुद्ध हों तो त्याग देने चाहिये ॥ ३९ ॥

३८ पाराशरस्मृतिः ॥

कुसुम्भगुडकार्पासलवणंंतैलसर्पिषी ।
द्वारेकृत्वातुधान्यानि दद्याद्वेश्मनिपावकम् ॥ ४० ॥
एवंशुद्धस्ततःपश्चात्कुर्याद्ब्राह्मणतर्पणम् ।
त्रिंशतंगाववृषंचैकं दद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ ४१ ॥
पुनर्लेपनखातेन होमजाप्येनशुद्ध्यति ।
आधारेणचविप्राणां भूमिदोषोनविद्यते ॥ ४२ ॥
चाण्डालैःसहसंपर्कं मासंमासार्द्धमेववा ।
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ ४३ ॥
रजकीचर्मकारीच लुब्धकीवेणुजीविनी ।
चातुर्वर्ण्यस्यतुगृहे त्वविज्ञातानुतिष्ठति ॥ ४४ ॥
ज्ञात्वातुनिष्कृतिंकुर्यात् पूर्वोक्तस्यार्द्धमेवतु ।
गृहदाहंनकुर्वीत शेषंसर्वंचकारयेत् ॥ ४५ ॥
गृहस्याभ्यन्तरंगच्छेच्चाण्डालोयदि कस्यचित् ।
तमागाराद्विनिःसार्य मृद्भाण्डंतुविसर्जयेत् ॥ ४६ ॥
रसपूर्णंतुमृद्भाण्डं नत्यजेत्तु कदाचन ।


फिर घर के द्वारपर कुसुम, गुड़, कपास, लवण, तेल, घी अन्न इन को निकाल कर घर में अग्नि लगा देवे ॥४०॥ इस प्रकार शुद्ध होकर ब्राह्मणों को भोजन कराके तृप्त करै और तीस गौ एक बैल ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे ॥ ४१ ॥ दुबारा लीपना, खोदना, होम, जप, और ब्राह्मणों के बैठने से पृथ्वी शुद्ध होती है फिर उस भूमि में कुछ दोष नहीं रहता ॥ ४२ ॥ यदि चांडालों के संग एक महीना वा पन्द्रह दिन संसर्ग रहे तो पन्द्रह १५ दिन तक गोमूत्र और कुलथी खाकर शुद्ध होता है ॥४३॥ रजकी (धोबिन) चमारी, व्याधनी, बांस के पात्र बना के जीविका करने वाले की स्त्री, ये यदि अज्ञान से चारों वर्णों के घर में निवास करें तो ॥४४॥ जानने पीछे पूर्वोक्त का आधा प्रायश्चित करै घर को जलावे नहीं और सब कृत्य आधा करै ॥४५॥ यदि किसी के घर के भीतर चांडाल चला जाय तो उस को घर से बाहर निकाल कर मिट्टी के पात्रों को फेंक देवे ॥ ४६ ॥ परंतु रस के भरे मिट्टी

भाषार्थसहिता ॥ ३९

गोमयेनतुसंमिश्रैर्जलैःप्रोक्षेद्गृहंतथा ॥ ४७ ॥ ब्राह्मणस्यव्रणद्वारे पूयशोणितसंभवे । क्रमिरुत्पद्यतेयस्य प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ ४८ ॥ गवांमूत्रपुरीषेण दध्नाक्षीरेणसर्पिषा । त्र्यहंस्नात्वाचपीत्वाच कृमिदष्टःशुचिर्भवेत् ॥ ४९ ॥ क्षत्रियोऽपिसुवर्णस्य पञ्चमाषान्प्रदायतु । गोदक्षिणांतुवैश्यस्याप्युपवासंविनिर्दिशेत् ॥ ५० ॥ शूद्राणांनोपवासः स्याच्छूद्रोदानेनशुद्ध्यति । ब्राह्मणांस्तुनमस्कृत्य पञ्चगव्येनशुद्ध्यति ॥ ५१ ॥ अच्छिद्रमितियद्वाक्यं वदन्तिक्षितिदेवताः । प्रणम्यशिरसाग्राह्यमग्निष्टोमफलंहितत् ॥ ५२ ॥ जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रंयज्ञकर्मणि । सर्वंभवतिनिश्चिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितम् ॥ ५३ ॥ व्याधिव्यसननिष्क्रान्ते दुर्भिक्षेडामरेतथा ।


के पात्रों को कदापि न त्यागै और गोबर मिले जल से घर को लीपे वा छिड़के ॥ ४७ ॥ राध ( पीव ) और रुधिर से भरे ब्राह्मण के घाव में यदि कृमि ( कीड़े ) पड़ जांय तो प्रायश्चित्त कैसे हो सो कहते हैं ॥ ४८ ॥ गोमूत्र, गोबर, गोदही गोदूध गोघृत इन को मिला कर तीन दिन स्नान और इन को तीन दिन पीकर वह कीड़ों का काटा हुआ पुरुष शुद्ध होता है ॥ ४९ ॥ क्षत्रिय भी पांच मासे सुवर्ण का दान देवे । वैश्य एक गौ की दक्षिणा देवे इसी उपवास से वह शुद्ध होता है ॥ ५० ॥ शूद्रों को उपवास का निषेध है इस से शूद्र दान से शुद्ध होता है । शूद्र दान देने पश्चात् ब्राह्मणों को प्रणाम कर और पञ्चगव्य का प्राशन करने से शुद्ध होता है ॥ ५१ ॥ जिस काम को ब्राह्मण लोग (अच्छिद्रमस्तु) ऐसा कह देवें । उस वाक्य को सब लोग शिरोधार्य मानकर ग्रहण करें क्योंकि उससे अग्निष्टोम यज्ञ का फल होता है ॥५२॥ जप का छिद्र तप का छिद्र और यज्ञ कर्म का छिद्र नाम जो कुछ त्रुटि है । ब्राह्मणों के कहने से यह सब छिद्र रहित हो जाता है ॥ ५३ ॥ यदि शूद्र मनुष्य व्याधियों से पीड़ित दुःखित हो, वा दुर्भिक्ष से पीड़ित हो, वा लूट लड़ाई

४० | पराशरस्मृतिः ॥

उपवासोव्रतोहोमो द्विजसंपादितान्निवै ॥ ५४ ॥
अथवाब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वेकुर्वन्त्यनुग्रहम् ।
सर्वान्कामानवाप्नोति द्विजैःसंवर्धिताशिषा ॥५५॥
दुर्बलानुग्रहःप्रोक्तस्तथावैबालवृद्धयोः ।
ततोऽन्यथाभवेद्दोषस्तस्मान्नानुग्रहःस्मृतः ॥ ५६
स्नेहाद्वायदिवालोभाद्भयादज्ञानतोऽपिवा ।
कुर्वन्त्यनुग्रहंयेतु तत्पापंतॆषुगच्छति ॥ ५७ ॥
शरीरस्यात्ययेप्राप्ते वदन्तिनियमंतुये ।
महत्कार्योपरोधेन नस्वस्थस्यकदाचन ॥ ५८ ॥
स्वस्थस्यमूढाःकुर्वन्ति नियमंतुवदन्तिये ।
तेतस्यविघ्नकर्तारः पतन्तिनरकेऽशुचौ ॥ ५९ ॥
स्वयमेवव्रतंकृत्वा ब्राह्मणंयोऽवमन्यते ।
वृथातस्योपवासःस्यान्नसपुण्येनयुज्यते ॥ ६० ॥


आदि से दुःखित हो तो उपवास, व्रत, और होम सुपात्र ब्राह्मण द्वारा करावे ॥ ५४ ॥ अथवा प्रसन्न संतुष्ट हुए सब ब्राह्मण लोग अनुग्रह (कृपा) करते हैं । अर्थात् ब्राह्मणों के आशीर्वाद से बढ़ा हुआ वह शूद्र सब कामनाओं को प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥ निर्बल (असमर्थ) बालक, और वृद्ध इन पर अनुग्रह करना चाहिये । यदि इन से भिन्न मनुष्यों पर अनुग्रह किया जाय अर्थात् प्रायश्चित्त न कराया जाय तो ठीक नहीं है ॥ ५६ ॥ उसको अनुग्रह नहीं कहते जो स्नेह से, भय से, लोभ से, अथवा अज्ञान से, ब्राह्मण लोग किसी पर अनुग्रह करते हैं तो अपराधी का पाप उन को ही लगता है ॥५७॥ जो ब्राह्मण लोग प्राण नाश की सम्भावना होने पर भी प्रायश्चित्त का विधान करते, और बड़े महान् कामों की हानि होने के विचार से स्वस्थ पुरुष को नियम पालन का निषेध करते हैं ॥५८॥ तथा जो मूढ़लोग स्वस्थ पुरुष के पालनीयनियम को लोभादि से स्वयं पालन करते वा कहते हैं । वे सब उस के कार्य में विघ्न करने वाले होने से अपवित्र नरक में पड़ते हैं ॥५९॥ जो पुरुष विद्वानों से पूछे बिना आपही व्रत करके ब्राह्मणों का तिरस्कार करता है। उस का उपवास वृथा है और उसे पुण्य फल प्राप्त नहीं होता ॥६०॥

भाषार्थसहिता ॥ ४९

सएवनियमोग्राह्यो यमेकोऽपिवदेद्विजः । कुर्याद्वाक्यंद्विजानांतु अन्यथाभ्रूणहाभवेत् ॥ ६१ ॥ ब्राह्मणाजङ्गमंतीर्थं तीर्थभूताहिसाधवः । तेषांवाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्तिमलिनाजनाः ॥ ६२॥ ब्राह्मणायानिभाषन्ते मन्यन्तेतानिदेवताः । सर्वदेवमयोविप्रो नतद्वचनमन्यथा ॥ ६३ ॥ उपवासोव्रतंचैव स्नानंतीर्थंजपस्तपः । विप्रैःसंपादितंयस्य संपूर्णंतस्यतद्भवेत् ॥६४ ॥ अन्नाद्येकीटसंयुक्ते मक्षिकाकेशदूषिते । तदन्तरास्पृशेच्चापस्तदन्नंभस्मनास्पृशेत् ॥ ६५ ॥ भुञ्जानश्चैवयोविप्रः पादंहस्तेनसंस्पृशेत् । समुच्छिष्टमसौभुङ्क्ते योभुङ्क्तेभुक्तभाजने ॥ ६६ ॥ पादुकास्थोनभुञ्जीत पर्यङ्कस्थःस्थितोऽपिवा।


इससे वही नियम ग्रहण करना योग्य है जिसे एक भी ब्राह्मण कहे । और ब्राह्मण के वचन को अवश्य स्वीकार करे यदि न करेगा तो भ्रूणहत्या का दोष लगता है ॥ ६१ ॥ क्योंकि ब्राह्मण लोग जंगम ( चेतन ) तीर्थ हैं और साधु ( सीधे शुद्ध निर्विकार ब्राह्मण लोग ) भी तीर्थ रूप ही होते हैं । उन ब्राह्मणों के वाक्य रूप जल से ही मलिन पुरुष शुद्ध हो जाते हैं ॥ ६२ ॥ ब्राह्मण लोग जिन धर्मयुक्त वाक्यों को कहते हैं उन्हें देवता भी मानते हैं । ब्राह्मण सर्व देवताओं का रूप है इस से उस का वचन अन्यथा नहीं हो सकता ॥ ६३ ॥ उपवास व्रत स्नान जप तप ये सब जिस के ब्राह्मण ने संपादन ( अनुमोदन ) कर दिये उस को ही इन का ठीक फल होता है ॥ ६४॥ यदि पकाये हुये अन्न में कीड़े मिल गये हों वा वह भोज्यान्न मक्खी और केशों से दूषित हो गया हो तो कीड़ा, मक्खी केशादि को निकाल के उस के बीच २ जल से धो कर शुद्ध करे और उस अन्न का भस्म से स्पर्श करे ॥६५॥ जो भोजन करता हुआ ब्राह्मण पग को दहिने हाथ से छूलेवे तो अथवा किसी के जूठे पात्र में भोजन करे तो उस का उच्छिष्ट भोजन करना जानो ॥ ६६ ॥

खड़ागू पर बैठ कर वा खाट अथवा बिस्तरे पर बैठ कर अथवा खड़ा हो कर