अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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श्रीगणेशायनमः ॥
अथवासिष्ठस्मृतिप्रारम्भः॥
अथातः पुरुषनिःश्रेयसार्थं धर्मजिज्ञासा ॥ १ ॥ ज्ञात्वा चानुतिष्ठन्धार्मिकः प्रशस्यतमो भवति लोके प्रेत्य च स्वर्गं लोकं समश्नुते ॥२॥ श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः ॥३॥ तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम् ॥ ४ ॥ शिष्टः पुनरकामात्मा ॥५॥ अगृह्यमाणकारणो धर्मः ॥६॥ आर्यावर्त्तः प्रागादर्शात्प्रत्यक्कालकवनादुदक्पारियात्राद् दक्षिणेन हिमवत उत्तरेण विन्ध्यस्य ॥७॥ तस्मिन्देशे ये धर्मा येचाचारास्ते सर्वे प्रत्येतव्याः ॥८॥ नत्वन्ये प्रतिलोमकल्पधर्म्माणः ॥६॥ एतदार्यावर्त्तमित्याचक्षते ॥१०॥ गङ्गायमुनयोरन्तरेऽप्येके ॥ ११ ॥ यावद्वा कृष्ण-
अब वसिष्ठस्मृति का प्रारम्भ किया जाता है ॥ सुखाभिलाषी होने से मनुष्य के कल्याणार्थ धर्म को जानने की इच्छा करनी चाहिये ॥ १ ॥ धर्मको जानकर सेवन करता हुआ मनुष्य लोक में प्रामाणिक धर्मात्मा कहाता हुआ अत्यन्त प्रशंसा के योग्य होता और जन्मान्तर में स्वर्ग का सुख भोगता है ॥२॥ श्रुति (वेद) तथा स्मृति (धर्मशास्त्र) में विधान किया कर्त्तव्य-धर्म कहाता है ॥३॥ जिसका प्रमाण श्रुति स्मृति में न हो उसके लिये शिष्ट लोगों का आचार ही प्रमाण है ॥४॥ निःस्पृह निर्लोभ निष्काम पुरुष शिष्ट कहाते हैं ॥५॥ जो काम लोभादिकारणके विना ही किया जाय वही धर्म है ॥६॥ आदर्श से पूर्व' कालक बन से पश्चिम, पारियात्रसे उत्तर, हिमालय से दक्षिण और विन्ध्याचल से उत्तर में जो देश है वह आर्यावर्त्त कहाता है ॥७॥ उस आर्यावर्त्त देश में जो २ धर्म और आचार हैं वे सब प्रतीति (विश्वास करने) योग्य हैं ॥ ८ ॥ अन्य प्रान्तीय धर्म प्रतिलोम उलटी कल्पना से युक्त होने से विश्वास के योग्य नहीं हैं ॥६॥ इस देश को (आर्यावर्त्तम्) एसा कहते हैं ॥१०॥ कोई आचार्य गंगा यमुना के बीच को आर्यावर्त्त कहते हैं ॥११॥ और कोई आचार्य कहते
२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
मृगो विचरति तावद्ब्रह्मवर्चसमित्यन्ये ॥१२॥ अथापि भा- ल्लविनो निदाने गाथामुदाहरन्ति ॥ १३ ॥ पश्चात्सिन्धुर्विहरिणी सूर्यस्योदयनंपुरः । यावत्कृष्णोऽभिधावति तावद्वैब्रह्मवर्चसम् ॥ १४ ॥ त्रैविद्यवृद्धायंब्रूयुर्धर्मन्धर्मविदो जनाः । पवनेपावनेचैव सधर्मोनात्रसंशयः । इति ॥१५॥ देशधर्मजातिधर्मकुलधर्मान् श्रुत्यभावादब्रवीन्मनुः ॥१६॥ सूर्याभ्युदितः सूर्याभिनिर्मुक्तः कुनखी श्यावदन्तः परिवित्तिः परिवेत्ताऽग्रेदिधिषूर्दिधिषूपतिर्वीरहा ब्रह्मोञ्झइत्येनस्विनः १७ पञ्च महापातकान्याचक्षते ॥१८॥ गुरुतल्पं सुरापानं भ्रूणहत्यां ब्राह्मणसुवर्णापहरणं पतितसंयोगञ्च ॥१९॥ ब्राह्मेण वा यौनेन
हैं कि जहां तक कृष्ण (कषांयल) हिरण स्वभाव से विचरते हैं वहां तक के प्रदेशों में ब्रह्मतेज होने से धर्म की भूमि है ॥ १२ ॥ और भी भाल्लवी शाखाध्यायी ऋषि लोग प्राचीन गाथा का उदाहरण देते हैं कि-॥१३॥ पश्चिम में विहार करती हुई सिन्धु नदी, पूर्व में सूर्य नारायण के उदय का स्थान और जहां तक कृष्ण मृग स्वभाव से विचरता है वहां तक ब्रह्मतेज (यज्ञियभूमि) है ॥ १४ ॥ तीनों वेद की विद्या में जो वृद्ध (विशेष जानकार) हैं वे धर्म का तत्त्व जानने वाले विद्वान् लोग जिस धर्म को कहें उसके पावन होने वा शोधक होने में सन्देह नहीं है ॥१५॥ देशधर्म, जातिधर्म, कुल धर्मों को श्रुति में न होने से मनुजी ने कहा है ॥१६॥ सूर्य के उदय तथा अस्त होने के समय जो सन्ध्यादि न करे, बिगड़े नखों वाला, कालेदांतों वाला, जेठभाई से पहिले अपना विवाह करने तथा अग्निहोत्र लेने वाला-परिवेत्ता, उसका बड़ाभाई परिवित्ति, जिस के आगे (विद्यमान रहते) ही स्त्री ने दूसरा पति कर लिया हो वह अग्रेदिधिषू और उसका द्वितीयपति-दिधिषूपति, स्थापित अग्नि को त्यागने वाला, और वेदाध्ययन को त्यागने वाला ब्राह्मण ये सब पापी कहाते हैं ॥१७॥ पांच महा पातक विद्वान् लोग कहते हैं ॥१८॥ गुरुपत्नीगमन, सुरापीना, भ्रूण (ब्राह्मण से ब्राह्मणी में हुए गर्भ की) हत्या करना, ब्राह्मण का सुवर्ण चुराना, और इन पतितों के साथ सम्बन्ध करना ॥१९॥ वह सम्बन्ध वेदादि के पढ़ने पढ़ाने
भाषार्थसंहिता ॥ ३
वा ॥२०॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥२१॥
संवत्सरेणपतति पतितेनसहाऽऽचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्नतुयानासनाशनात् । इति ॥२२॥
योऽग्नीनपविध्येद् गुरुं च यः प्रतिजघ्नुयान्नास्तिको ना-
स्तिकवृत्तिः सोमं च विक्रीणीयादित्यपपातकानि ॥ २३ ॥
तिस्रो ब्राह्मणस्य भार्या वर्णानुपूर्व्येण,द्वे राजन्यस्य,एकैका
वैश्यशूद्रयोः ॥ २४ ॥ शूद्रामप्येके मन्त्रवर्जं तद्वत् ॥ २५ ॥
तथा न कुर्यात् ॥ २६ ॥ अतो हि ध्रुवः कुलापकर्षः प्रेत्य चा-
स्वर्गः ॥ २७ ॥ षड्विवाहाः ॥ २८ ॥ ब्राह्मो दैव आर्षो गा-
न्धर्वः क्षात्रो मानुषश्चेति ॥ २९ ॥ इच्छत उदकपूर्वं यां द-
द्यात्स ब्राह्मः ॥ ३० ॥ यज्ञतन्त्रे वितत ऋत्विजे कर्म कुर्वते
तथा विवाह करने इन दो प्रकार से पतित करता है ॥ २० ॥ इस पर श्लोक प्रमाण कहते हैं कि-॥ २१ ॥ पतित को यज्ञ कराने, वेद पढ़ाने और उसकी कन्या से विवाह करने से एक वर्ष में पतित होजाता है । परन्तु एक सवारी नौकादि में, वा सभादि में पतित के साथ चलने बैठने तथा एक पङ्क्ति में भोजन करने से पतित नहीं होता । किन्तु उसमें भी कुछ पाप अवश्य लगता है ॥२२॥
जो स्थापित अग्नियों को नष्ट करे, गुरु को त्यागे वा विरोध करे, वेद का निन्दक, नास्तिकताके कामों से जीविका करने वाला, और जो यज्ञ में सोम को बेंचे वे सब उपपातकी कहाते हैं ॥ २३ ॥ ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या ये तीन ब्राह्मण की पत्नी, क्षत्रिया, वैश्या दो क्षत्रिय की, वैश्य तथा शूद्र की अपने २ वर्ण की एक २ स्त्री हो ( ब्राह्मण क्षत्रिय कामी हों तो उन को सवर्णा से भिन्न उक्त स्त्रियों से विवाह करना व्यभिचार से अच्छा मध्यम कोटि है । और एक सवर्णा से विवाह करना सर्वथा उत्तम है ) ॥ २४ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि ब्राह्मणादि वेद मन्त्रों के बिना शूद्र कन्या से भी चाहें तो विवाह क-रलें ॥ २५ ॥ सो वैसा न करे ॥ २६ ॥ क्योंकि शूद्र कन्या के साथ विवाह करने से अवश्य ही कुल बिगड़ता और जन्मान्तर में स्वर्ग प्राप्त नहीं हो सकता ॥ २७ ॥ विवाह छः हैं ॥ २८ ॥ ब्राह्म१ । दैव२ । आर्ष३ । गान्धर्व४ । क्षात्र५ । मानुष६ ॥२९॥ इच्छा करते हुये योग्य वर को हाथ में जल लेके संकल्प पूर्वक जिस कन्या को देवे वह ब्राह्म विवाह कहाता है ॥३०॥ अनेक विध अङ्गाङ्गिभाव से
४ | वसिष्ठस्मृतिः ॥
कन्यां दद्यादलङ्कृत्य तं दैवमित्याचक्षते ॥३१॥ गोमिथुनेन चाऽऽर्षः ॥ ३२ ॥ सकामां कामयमानः सदृशीं यो निरुह्यात्स गान्धर्वः ॥ ३३ ॥ यां बलेन सहसा प्रमथ्य हरन्ति स क्षात्रः ॥ ३४ ॥ पणित्वा धनक्रीतां स मानुषः ॥ ३५ ॥ तस्माद्दुहितृमतेऽधिरथं शतं देयमितीह क्रयो विज्ञायते ॥ ३६ ॥ या पत्युः क्रीता सत्यथान्यैश्चरतीति ह चातुर्मास्येषु ॥ ३७ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३८ ॥ विद्याप्रणष्टापुनरभ्युपैति जातिप्रणाशोत्त्विहसर्वनाशः । कुलापदेशेनहयोऽपिपूज्यस्तस्मात्कुलीनांस्त्रियमूद्वहन्तिइति॥३६॥ त्रयो वर्णा ब्राह्मणस्य वशे वर्त्तेरन् ॥४०॥ तेषां ब्राह्मणो धर्मान्प्रब्रूयान् ॥४१॥
विस्तार के साथ यज्ञ में ऋत्विज् का काम करते हुये वर को वस्त्राभूषणों से सहित कन्या को देवे उस को दैव विवाह कहते हैं ॥ ३१ ॥ एक गौ एक बैल वा उन का मूल्य वा कुछ न्यूनाधिक धन वर से लेकर कन्या देना आर्ष विवाह है ॥ ३२ ॥ कन्या वर दोनों की परस्पर कामना से अपने वर्ण की सदृश कन्या का ग्रहण करना गान्धर्व विवाह कहाता है ॥ ३३ ॥ जिस को बल पूर्वक विना विचारे रोकने वालों से युद्ध कर मार पीट के हर लाना यह क्षात्र विवाह है ॥ ३४ ॥ मूल्य ठहरा कर कन्या को खरीद लेना मानुष विवाह कहाता है ॥ ३५ ॥ श्रुति में लिखा है कि तिस से कन्या वाले को रथ सहित सौ धन ( स्वर्ण मुद्रादि ) देवे इस विधि से कन्या का खरीदना जाना जाता है ( परन्तु अन्य रीति से कार्य न होने पर यह निकृष्ट पक्ष है ) ॥ ३६ ॥ और चातुर्मास्ययागों के प्रकरण में यह लिखा है कि " जो पति की खरीदी हुई अन्य पुरुषों से संग करती है ( वह पापिनी नीच है ) " इस से भी उक्त अभिप्राय ही प्रकट होता है ॥ ३७ ॥ अब अन्य श्लोक भी उदाहरण में कहते हैं ॥३८॥ पढ़ी हुई विद्या नष्ट हो जाय तो फिर भी पढ़ना हो सकता है पर नीच स्त्री से जो जाति (वंश) का नाश (नीचता) हो जाय तो सभी नष्ट हुआ जानो । क्यों कि अच्छी नसल रूप कुलीनताके बहाने से घोड़ा भी प्रशंसा के योग्य होता है इस कारण कुलीन स्त्री से विवाह करे ॥३९॥ क्षत्रियादि तीनों वर्ण ब्राह्मण के आधीन रहें ॥४०॥ उन सब को यथाधिकार ब्राह्मण धर्मोपदेश करे ॥ ४१ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ३
तं राजाचानुशिष्यात् ॥ ४२ ॥ राजा तु धर्मेणानुशासत् षष्ठमंशं धनस्य हरेत् ॥ ४३ ॥ अन्यत्र ब्राह्मणात् ॥ ४४ ॥ इष्टापूर्तस्य तु षष्ठमंशं भजति-इति ह ब्राह्मणो वेदमार्गं करोति, ब्राह्मणआपदउद्धरति, तस्माद् ब्राह्मणोऽनाद्यः ॥४५॥ सोमोऽस्य राजा भवतीति ह प्रेत्य चाऽऽभ्युदयिकमिति ह विज्ञायते ॥ ४६ ॥
इति श्रीवासिष्ठे धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
चत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः ॥१॥ त्रयो वर्णा द्विजातयो ब्राह्मणक्षत्रियवैश्याः ॥२॥ तेषां मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जीबन्धने ॥३॥ तत्रास्य माता सावित्री पितात्वाचार्यउच्यते ॥४॥ वेदप्रदानात्पितृत्वेनाचार्यमाचक्षत ॥ ५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥६॥ द्वयमुर्वै ह पुरुषस्य रेतो ब्राह्मणस्योर्ध्व-
और ब्राह्मण को अपने धर्म पर चलानेवाला राजा शासक रहे ॥ ४२ ॥ राजा धर्मानुकूल सबकी रक्षा वा शासन करता हुआ धन के लाभ में से छठा२ भाग कर लेवे ॥ ४३ ॥ परन्तु ब्राह्मण से कुछ भी कर न लेवे ॥ ४४ ॥ धर्म सम्बन्धी श्रौत स्मार्त्त ब्राह्मण के किये कराये कर्मों का छठा भाग पुण्य फल राजा को मिलता है । ब्राह्मण वेद को मुख्य मान के ग्रहण करता वा पढ़ाता है तथा आपदाओं से बचाता है जिससे ब्राह्मण का अन्न धनादि राजा न लेवे ॥ ४५॥ वेद में लिखा है कि (सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा) ब्राह्मण का राजा सोम होता है । और मर कर भी ब्राह्मण सुख देनेवाला है यह भी वेद से जाना जाता है ॥ ४६ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में प्रथमाध्याय पूरा हुआ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ये चार वर्ण कहाते हैं ॥१॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ये तीन वर्ण द्विजातिहैं ॥२॥ उनका पहिला जन्म माता से और द्वितीय जन्म उपनयन संस्कार से होता है ॥३॥ उस द्वितीय जन्म में माता सावित्री मन्त्र और आचार्य पिता माना जाता है ॥४॥ वेद के देने से आचार्य को पिता कहते हैं ॥५॥ इस में श्रुति का उदाहरण कहते हैं कि-॥ ६ ॥ "ब्राह्मण पुरुष के शरीर में सन्तानोत्पादन की शक्ति दो प्रकार की है । एक नाभि से ऊपर
६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
नाभेरर्वाचीनमन्यद्यदूर्ध्वं नाभेस्तेनास्यानीरसी प्रजा जायते ॥७॥ यदुपनेयति जनन्यां जनयति यत्साधू करोति ॥८॥ अथ यदर्वाचीनं नाभेस्तेनेहास्यौरसी प्रजा जायते ॥६॥ तस्माच्छ्रोत्रियमनूचानमप्रजोऽसीति न वदन्तीति ॥१०॥ हा- रीतोऽप्युदाहरति ॥११॥ नह्यस्यविद्यतेकर्म किंचिदामौञ्जिबन्धनात् । वृत्त्याशूद्रसमो ज्ञेयो यावद्वेदेनजायत । इति ॥१२॥ अन्यत्रोदककर्मस्वधापितृसंयुक्तेभ्यः ॥१३॥ विद्याहवैब्राह्मणमाजगाम गोपायमाशेवधिस्तेऽहमस्मि । असूयकायाऽनृजवेऽयताय नमां ब्रूयावीर्यवतीतथास्याम् ॥१४॥ यमातृणत्त्यवितथेनकर्मणा यद्दुःखंकुर्वन्नमृतंसंप्रयच्छन् ।
के भाग हृदयादि में, द्वितीय नाभि से नीचे के भाग में, उनमें जो नाभि से ऊपर के भाग में शक्ति है उस से अनौरसी (वीर्य से न होनेवाली) शिष्यरूप द्वितीय जन्म की प्रजा होती है ॥७॥ कि जो उपनयन संस्कार करता है तथा जो स्त्री में उत्पन्न करता है ये दोनों ही जन्म अच्छे करता है ॥ ८ ॥ अब जो इस आचार्य की नाभि से नीचे की शक्ति है उससे औरसी ( वीर्य सेचन द्वारा ) प्रजा होती है ॥ ९ ॥ तिस से उक्त कला का वेद को पढ़ने जानने वाला पुरुष सन्तान हीन हो तो भी उससे ऐसा न कहें कि तुम निर्वंश हो"॥१०॥ महर्षि हारीत भी कहते हैं कि ॥ ११ ॥ उपनयन संस्कार से पहिले द्विजभावी बालक के लिये किसी वेदोक्त कर्म का अधिकार नहीं है । जबतक संस्कार-उपनयन न हो तबतक उसके साथ शूद्र कासा बर्ताव करना चाहिये ॥१२॥ परन्तु संस्कार हीन दशा में दैवयोग से पिता के मर जानेपर उस के हाथ से जलदान और पितरों की सपिण्डी आदि के स्वधापूर्वक पिण्डदानमें संस्कार हीन बालक को भी अधिकार है ॥१३॥ विद्या रूप को धारण करके ब्राह्मण के निकट आयी और कहने लगी कि हे ब्राह्मण ! तू मेरी रक्षा कर मैं तेरा कोश(खजाना)हूँ । निन्दक, कठोरवादी, लम्पट, शिष्यको मुझे न देवेगा तो मैं अपना प्रभाव वा फल दिखानेवाली होऊंगी॥१४॥जो आचार्य स्वयं बहुत दुःख करता कष्ट सहता और शिष्यको अमृत पिलाता हुआ वेदाध्यापनरूप सत्यकर्मकी पवित्रध्वनिसे शिष्यके दोनों
भाषार्थसहिता ॥ ७
तम्मन्येतपितरंमातरंच तस्मै न द्रुह्येत्कतमञ्चनाह ॥ १५ ॥
अध्यापितायेगुरुंनाऽऽद्रियन्ते विप्रावाचामनसाकर्मणावा ।
यथैवतेनगुरोर्भोजनीयास्तथैवतान्नभुनक्तिश्रुतंतत् ॥१६॥
यमेवविद्याःशुचिमप्रमत्तं मेधाविनंब्रह्मचर्योपपन्नम् ।
यस्तेनद्रुह्येत्कतमञ्चनाह तस्मैमांब्रूयानिधिपायब्रह्मन्! ॥१७॥
दहत्याग्नैर्यथाकक्षं ब्रह्मपृष्ठमनादृतम् ।
नब्रह्मतस्मैप्रब्रूयाच्छवयंमानमकुर्वते । इति॥ १८ ॥
षट् कर्माणि ब्राह्मणस्य ॥१९॥ अध्ययनमध्यापनं यजनं-
याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति ॥२०॥ त्रीणि राजन्यस्य ॥२१॥ अ-
ध्ययनं यजनं दानं च शस्त्रेण च प्रजापालनं स्वधर्मस्तेन
जीवेत् ॥२२॥ एतान्येव त्रीणि वैश्यस्य, कृषिवार्णिज्यं पाशुपा-
ल्यं कुसीदं च ॥ २३ ॥
कान भर देता तथा शिष्य के मानस वाचिक कायिक दोषों को नष्ट कर देता है। उस को पिता माता माने उस से कभी द्रोह न करे। क्योंकि उस ने वेद के साथ क्या उत्तम शिक्षा नहीं कही ? अर्थात् सभी कुछ कह दिया है ॥१५॥ जो पढ़ाये हुए ब्राह्मण शिष्य मन वाणी तथा शरीर से गुरु का आदर नहीं करते वे जैसे गुरु की रक्षा करने योग्य नहीं होते वैसे ही पढ़ा हुआ वेद शास्त्र भी उन की रक्षा नहीं करता है ॥ १६ ॥ हे ब्राह्मण ! जिस को तुम शुद्ध, अप्रमादी, ब्रह्मचर्य से युक्त और बुद्धिमान् जानो और जो तुम से कदापि द्रोह वा विरोध न करे हे ब्रह्मन् उसी विद्या कोश के रक्षक शिष्य के लिये मेरा कथन करो ॥ १७ ॥ जैसे अग्नि घास को जला देता वैसे गुरु का अनादर करने वाले के पृष्ठ को तथा अध्यापक को भी वेद भस्म करता है। इस से यथाशक्ति सम्मान न करने वाले शिष्य को वेद नहीं पढ़ाना चाहिये ॥१८॥ ब्राह्मण के छः कर्म धर्मानुकूल हैं ॥ १९ ॥ वेद का पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञादि कर्म करना, कराना, दान देना, लेना ॥ २० ॥ तीन कर्म क्षत्रिय के हैं ॥ २१ ॥ वेद का पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, और शस्त्रों के द्वारा प्रजा की रक्षा करना क्षत्रिय का निज ( खास ) धर्म है उससे ही अपनी जीविका करे ॥२२ ॥ ये ही वेदाध्ययनादि तीन कर्म वैश्य के धर्मसंचयार्थ हैं और खेती, वाणिज्य, पशुरक्षा, और सूद लेना ये वैश्य के निज कर्म हैं ॥ २३ ॥
८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
एतेषां परिचर्या शूद्रस्य ॥ २४ ॥ अनियता वृत्तिः ॥ २५ ॥ अनियतकेशवेशाः सर्वेषां मुक्तशिखावर्जम् ॥२६॥ अजीवन्तः स्वधर्मेणानन्तरां पापीयसीं वृत्तिमातिष्ठेरन् ॥२७॥ न तु कदा- चिज्ज्यायसीम् ॥२८॥ वैश्यजीविकामास्थाय पण्येन जीवन्तो- ऽश्मलवणमणिशाणकौशेयक्षौमाजिनानि च तान्तवं रक्तं सर्वं च कृतान्नं पुष्पमूलफलानि च गन्धरसा उदकं चौषधीनां रसः सोमश्च शस्त्रं विषं मांसं च क्षीरं च सविकारमयस्त्रपु जतु सीसं च ॥२९॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३० ॥ सद्यः पततिमांसेन लाक्षयालवणेन च । त्र्यहेणशूद्रोभवति ब्राह्मणःक्षीरविक्रयात् । इति ॥३१॥ ग्राम्यपशूनामेकशफाः केशिनश्च सर्वे चारण्याः पशवो वयांसि
ब्राह्मणादि द्विजों की सेवा करना शूद्र का कर्म है ॥ २४ ॥ शूद्र की जीविका नियत नहीं है कि यही करे ॥ २५ ॥ केशों के रखने का नियम सभी वर्णों का नहीं है कि कौन कितने केश रक्खे । परन्तु शिखा सब रक्खें । और शूद्र की शिखा खुली रहा करे ॥ २६ ॥ अपने धर्म से जीविका न होसकती हो तो अपने २ से नीचे वर्ण की वह जीविका सब ब्राह्मणादि करें जिस में अधिक पाप न होवे ॥ २७ ॥ परन्तु नीचे २ वर्ण अपने से ऊंचे २ वर्ण की जीविका कदापि न करें ॥ २८ ॥ यदि ब्राह्मणादि आपत्काल में वैश्य वृत्ति का सहारा लेकर दुकान से जीविका करें तो पत्थर, लवण, मणि ( मूगादि, ) शण-रेशम-अलसी के वस्त्र, मृगादि के चर्म, रंगे हुये सूत के वस्त्र, सब प्रकार का पकाया अन्न, फल, पुष्प, मूल, गन्ध (केशरादि, ) रस, ( खटाई आदि, ) जल, ओषधियों के रस, यज्ञादि में सोमलता, शस्त्र, विष ( संखिया हरतालादि,) मांस, दूध, दही, खोयादि, लोहा, रांगा, जस्ता, शीशा, इन सब को ब्राह्मण न बेंचे ॥ २९ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि-॥ ३० ॥ मांस, लाख, और लवण बेंचने से ब्राह्मण शीघ्र ही पतित हो जाता और दूध या दूध के विकार दही आदि को बेंचने से तीन दिन में पतित होजाता है ॥ ३१॥ गांव के पशुओं में जुड़े खुरों वाले (एकशफ) भेड़ आदि केशों वाले पशु और सब वन के पशु सब पक्षी, बड़ी डाढ़ों वाले
भाषार्थसहिता ॥
दंष्ट्रिणश्च ॥३२॥ धान्यानां तिलानाहुः ॥३३॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥३४॥ भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद् यदन्यत्कुरुतेतिलैः । कृमीभूतः श्वविष्ठायां पितृभिःसहमज्जति । इति ॥३५॥ कामं वा स्वयं कृष्योत्पाद्य तिलान्विक्रीणीरन् ॥३६॥ तस्मात्साण्डाभ्यां सनस्योताभ्यां प्राक्प्रातराशात्कर्मी स्यात् ॥३७ ॥ निदाघेडपः प्रयच्छेत् ॥३८॥ नातिपीडयंल्लाङ्गलं प्रवीरवत्सुशेवं सोमपित्सरु । तदुद्वपति गामविं चाजानश्वातरश्वतरखरोष्ट्रांश्च प्रफव्यं च पीवरीं प्रस्थावद्रथवाहनमिति ॥३९॥ लाङ्गलं प्रवीरवद्वीरवत्सु मनुष्यवदनडुद्वत्सुशेवं कल्याणनासिकं कल्याणीह्यस्य नासिका नासिकयोद्वर्पति दूरेऽपविद्ध्यति, सोमपित्सरु सोमो
कुत्तादि इन को भी ब्राह्मण न पाले न बेचे ॥ ३२ ॥ धान्यों में तिलों को न बेचे ॥३३॥ इस पर श्लोकका प्रमाण कहते हैं ॥३४॥ भोजन, उबटन और ब्राह्मण को वा श्राद्ध तर्पण होमादि में दान, इन तीन से भिन्न अन्य जो कुछ काम तिलों से जो कोई करता है वह मनुष्य कुत्ते की विष्ठा में कृमि होकर अपने पितरों के सहित डूबता है ॥ ३५ ॥ परन्तु किसान ब्राह्मण स्वयं अपने खेत में उत्पन्न किये तिलों को भले ही बेचा करे ॥ ३६ ॥ तिससे जिन को बधिया न किया गया हो ऐसे अण्ड क्रोशों वाले नाथे हुए बैलों द्वारा मध्यान्ह के भोजन से पहिले खेत को जोता करे ॥ ३७ ॥ ग्रीष्म ( गर्मी वा विशेष घाम ) के दिनों में बीच में भी बैलों को जल पियावे ॥ ३८ ॥ बैलों को अत्यन्त पीडित ( तंग ) न करे ( लाङ्गलं प्रवीर० ) इत्यादि वेद संहिता का मन्त्र है । शुक्ल यजुर्वेद सं० अ० १२ । मं० ७१ भी यही मन्त्र है । पर इसके पाठ से अन्तर है इससे अन्य किसी शाखा का यह मन्त्र यहां लिखा गया है । (रथवाहनम् ) तक मन्त्र का पाठ है ॥ ३९ ॥ उक्त मन्त्र का अर्थरूप ही ४० सूत्रस्थ ब्राह्मण श्रुति लिखी गयी है-यथा ( लाङ्गलम् ) हल ( प्रवीरवत् ) जिसको चलानेवाले मनुष्य और बैल प्रकृष्ट वीर रुष्ट पुष्ट हों ( सुशेवम् ) कल्याण करनेवाला नासिका स्थानी फाला जिसमें लगा है । इस हलकी नासिका (फाल) कल्याण सुख करनेवाली इसलिये है कि उस से अन्नोत्पत्ति द्वारा
१० वसिष्ठस्मृतिः ॥
ह्यस्य प्राप्नोति, तत्तत्सरु तदुद्वपति गाञ्चाविंचाजा नश्वानश्व- तरखरोष्ट्रांश्च प्रफव्यं च पीवरीं दर्शनीयां कल्याणीं च प्रथमयु- वतीम् ॥४०॥ कथं हि लाङ्गलमुद्वपेदन्यत्र धान्यविक्रयात् ॥४१॥ रसा रसैर्महतो हीनतो वा निमातव्या नत्वेव लवणं रसैः॥४२॥ तिलतण्डुलपक्वान्नं विद्या मनुष्यांश्च विहिताः परिवर्तकेन ॥ ४३ ॥ ब्राह्मणराजन्यौ वार्धुष्यान्नं नाद्याताम् ॥ ४४ ॥ अ- थाप्युदाहरन्ति ॥ ४५ ॥ समर्घधान्यमुद्धृत्य महार्घयःप्रयच्छति । सवैवार्धुषिकोनाम ब्रह्मवादिषुगर्हितः ॥
मनुष्यों तथा पशुओं की जीवन रक्षा होती है यह हल उसी ना- सिका से ( उद्वपति ) पृथवी को खोदता भीतर से वेधन करता उखाड़ता है ( सोमपित्सरु ) सोमयागादि का अवसर भी यजमान को कृषि द्वारा अन्नादि की प्राप्ति से होता है। त्सरु नाम मुठिया ( पकड़ने का स्थान ) दबाने से वह ऊपर को महां उखाड़ता है। वह हल ( गामविमृ० ) गौ, भेड़, बकरी बकरा, घोड़ा, खच्चर, गधा, ऊंटो को ( प्रफर्येचपीवरीम् ) फुर्ती से चलनेवाली पुष्ट अंगों से युक्त मोटी २ प्रथम युवती (ओसर) गौ आदिको तथा ( प्रस्यावद्रथवाहनम् ) अच्छे दौड़नेवाले रथ नाम बग्घी के घोड़े आदि को प्राप्त कराता है ॥ ४० ॥ हलके द्वारा उत्पन्न किये धान्य को बेंचना अच्छा नहीं है ॥ ४१ ॥ अधिक वा कम रसों से रसों को बदला भले ही कर लेंवे । परन्तु किसी भी रस के बदले में लवण का लेन देन न करें ॥ ४२ ॥ तिल, चा- वल, पक्वान्न ( पूरी मिठाई आदि ) विद्या, और मनुष्यों का बदला भले ही कर लेवे । जैसे तिलों के बदले चावल वा चावलों के बदले तिल लेलेवे वा पक्वान्न देकर तिल चावल ले लेवे । किसी प्रकार की विद्या अन्य किसी को सि- खा देंवे उस के बदले अन्य किसी विद्या को सीख लेवे इत्यादि ॥ ४३ ॥ ब्रा- ह्मण, क्षत्रिय, दोनों सूद लेनेवाले का अन्न न खावें ॥४४॥ इस पर श्लोक प्र- माण कहते हैं कि-॥४५॥ जो किसानादि से सस्ता अन्न लेकर फिर उसको महंगा करके देता है वह वार्धुषिक (सूदखोर) कहाता और वह वेदमतावलम्बियों में निन्दित है। सूद लेनेवाला और ब्रह्महत्यारा इन दोनों को तराजू में तौला गया तो ब्रह्म हत्यारा हल्का होने से उठ गया और वार्धुषिक पाप से
भाषार्थसहिता ॥ ११
वार्धुषिंब्रह्महन्तारं तुलयासमतोलयन् ।
अतिष्ठद्भूणहाकोट्यां वार्धुषिर्नव्यकम्पत ॥इति ॥४६॥
कामं वा परिलुप्तकृत्याय पापीयसे दद्याताम् ॥ ४७ ॥
द्विगुणं हिरण्यं त्रिगुणं धान्यम् ॥४८॥ धान्येनैवरसा व्याख्या-
ताः ॥ ४९ ॥ पुष्पमूलफलानि च ॥ ५० ॥ तुलाधृतमष्टगुणम्
॥ ५१ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५२ ॥
राजानुमतभावेन द्रव्यवृद्धिंविनाशयेत् ।
पुनराजाभिषेकेण द्रव्यवृद्धिंचवर्जयेत् ॥ ५३ ॥
द्विकंत्रिकंचतुष्कंच पञ्चकंचशतंस्मृतम् ।
मासस्यवृद्धिंगृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ॥५४॥
वसिष्ठवचनप्रोक्तां वृद्धिंवार्धुषिकेशृणु ।
पञ्चमाषास्तुविंशत्या एवंधर्मोनहायते । इति ॥५५॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
भारी होने के कारण हिला भी नहीं । जो अन्य के सुख दुख का कुछ विचार न करके अतिलोभ में ग्रस्त होकर अन्याय से तिगुना चौगुना तक लेता है उसी की यहां निन्दा जानो ) ॥ ४६ ॥ और जो पुरुष धर्म कर्म से हीन पापी हो उसको भले ही ब्राह्मण क्षत्रिय भी वृद्धि (सूट) के लिये धन देवें ॥४७॥ परन्तु सुवर्ण चांदी रुपया पैसा चाहें जितने दिनों वा वर्षों में मिलें दूने से अधिक न लेवें और तिगुना तक अन्न लेवें ॥ ४८ ॥ रसों को भी तिगुने तक ही लेवें ॥ ४९ ॥ पुष्प, मूल, फल भी तिगुने तक ही लेवें ॥ ५० ॥ परन्तु तौलकर दिया घी बहुत काल में आवे तो अष्टगुणा लेवे ॥ ५१ ॥ इसमें श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ ५२ ॥ राजा बहुत भद्र पुरुषों की अनुमतभाव से द्रव्य के सूद को गरीबों पर सर्वथा त्याग देवे । और फिर राजा अभिषेकोत्सव के साथभी धन की वृद्धि ( सूद ) को खैरात में छोड़ देवे ॥ ५३ ॥ ब्राह्मण प्रति सैंकड़ा २) ३) ४) ५) रु० माहना प्रतिमास ब्राह्मणादि वर्णों से क्रमशः सूद ले सकता है । यह मत किन्हीं आचार्यों का है ॥ ५४ ॥ परन्तु वार्धुषिक के लिये महर्षि वसिष्ठ ने जितनी वृद्धि ( सूद ) लेनी कही है सो सुनो कि प्रतिमास प्रत्येक बीशीपर पांच माशे सूद लिया जाय तो धर्म की हानि इस में नहीं है ॥ ५५ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में द्वितीयाध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
२
१२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
अश्रोत्रिया अननुवाक्या अनग्नयो वा शूद्रधर्माणो भवन्ति ॥ १ ॥ मानवं चात्र श्लोकमुदाहरन्ति ॥ २॥
योऽनधीत्यद्विजोवेदमन्यत्रकुरुतेश्रमम् ।
सजीवन्नेवशूद्रत्वमाशुगच्छतिसान्वयः ॥ ३ ॥
नानुग्ब्राह्मणोभवति नवाणिङ्नकुशीलवः ।
नशूद्रप्रेषणंकुर्वन्नस्तेनोनचिकित्सकः ॥ ४ ॥
अव्रताह्यनधीयाना यत्रभैक्षचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभक्तप्रदोहिसः ॥ ५ ॥
चत्वारोऽपित्रयोवापि यद्ब्रूयुर्वेदपारगाः ।
सधर्मइतिविज्ञेयो नेतरेषांसहस्रशः ॥ ६ ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।
जिन ब्राह्मणों ने न पूरा वेद पढ़ा, न उसका अनुवाकादि कुछ भाग पढ़ा और न अग्निस्थापन करके अग्निहोत्र किया वे शूद्रों के तुल्य धर्मों वाले हो जाते हैं ॥१॥ इस पर मनु जी का श्लोक उदाहरण में कहते हैं ॥ २ ॥ जो द्विज मुख्य वेद को न पढ़के अन्य ग्रन्थों में वा अन्य कामों में श्रम करता है। वह अपने जीवित ही कुटुम्ब (स्त्री पुत्रादि) सहित शूद्रवत् हो जाता है ॥३॥ वेद को न पढ़ने जानने, वणिग् व्यापार करने, राजा रईसादि की मिथ्या प्रशंसा करने, (राय भाट आदि के काम करनेवाले) शूद्र रईसों की नौकरी करने, चोरी करने और चिकित्साद्वारा जीविका करनेवाले (ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने पर भी) ब्राह्मण नहीं रहते वा पतितों के तुल्य नीच हो जाते हैं ॥४॥ जिनके सन्ध्यादि कर्म का नियम नहीं और न वेदादि शास्त्र पढ़ते हैं किन्तु ब्राह्मण नाम से भिक्षा मांगकर खाते हैं ऐसे ब्राह्मण जिस गांव में बसते हों वह गांव चोरों को भाग देनेवाला है ऐसा मानकर राजा उस ग्राम को दण्ड देवे ॥ ५ ॥ वेद के तत्त्वज्ञानी चार या तीन भी विद्वान् ब्राह्मण धर्मांश में जो कहें उसको ही धर्म जाने किन्तु अन्य हज़ारों मूर्ख भी मिलकर जिसे अच्छा कहें वह धर्म नहीं है ॥ ६ ॥ वेदादि विद्या (गुणों) और सन्ध्यादि कर्मों से हीन, ब्राह्मणजाति में होनेमात्र से जीविका करनेवाले सहस्रों
भाषार्थसहिता ॥ १३
सहस्रशःसमेतानां परिषत्त्वंनविद्यते ॥ ७ ॥
यंवदन्तितमोमूढा मूर्खाधर्ममतद्विदः ।
तत्पापंशतधाभूत्वा तद्वक्तॄनधिगच्छति ॥ ८ ॥
श्रोत्रियायैवदेयानि हव्यकव्यानिनित्यशः ।
अश्रोत्रियायदत्तंहि पितॄर्न्नातिनदेवताः ॥ ९ ॥
यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेंचैवबहुश्रुतः ।
बहुश्रुतायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ॥ १० ॥
ब्राह्मणातिक्रमोनास्ति मूर्खेवेदविवर्जिते ।
ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहिभस्मनिहूयते ॥ ११ ॥
यश्चकाष्ठमयो हस्ती यश्चचर्ममयोमृगः ।
यश्चविप्रोऽनधीयानस्त्रयस्तेनामधारकाः ॥ १२ ॥
विद्वद्भोज्यान्यविद्वांसो येषुराष्ट्रेषुभुञ्जते ।
तान्यनावृष्टिमुच्छन्ति महद्वाजायतेभयम् । इति ॥१३॥
इकट्ठे होने पर भी वह सभा नहीं हो सकती ॥७॥ अज्ञानान्धकार में ग्रस्तधर्म का मर्म न जानने वाले मूर्ख ब्राह्मण जिस धर्म का निर्णय कर कहते हैं वह सैकड़ों प्रकार का पाप होकर उन धर्म वक्ता मूर्खों को प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ देवता और पितरों सम्बन्धी भोजनादि दान नित्यशः सदैव वेदपाठी ब्राह्मणों को ही देना चाहिये । क्योंकि वेदपाठी से भिन्न ब्राह्मणों को दिया भोजनादि पितरों और देवों को प्राप्त नहीं होता ॥ ९ ॥ जिस के घर में वा अति समीप मूर्ख ब्राह्मण वसता हो और बड़ा विद्वान् दूर वसता हो तो विद्वान् को देना चाहिये क्योंकि मूर्ख का उल्लङ्घन वा अपमान नहीं माना जायगा ॥ १० ॥ वेद वेदाङ्गादि न पढ़े मूर्ख ब्राह्मण का उल्लंघन ब्राह्मण के उल्लंघन में नहीं गिना जायगा । क्योंकि जलते हुए अग्नि को छोड़के भस्म में होम नहीं किया जाता है ॥११॥ जो काष्ठ का हाथी जो चाम का हरिण और जो मूर्खब्राह्मण वे तीनों नाम ही मात्र हाथी आदि हैं असल में नहीं हैं ॥ १२ ॥ जिन राज्यों में विद्वानों को भोजन कराने योग्य उत्तम पदार्थों को अविद्वान् मूर्ख लोग भोगते हैं उनमें सूखा पड़ती दुर्भिक्ष होते वा भयंङ्कर दुर्घटना उपस्थित होती हैं॥१३॥
१४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
अप्रज्ञायमानं वित्तं योऽधिगच्छे द्राजा तद्धरेदधिगन्त्रे षष्ठमंशं प्रदाय ॥ १४ ॥ ब्राह्मणश्चेदधिगच्छेत् षट्कर्मसु वर्त्तमानो न राजा हरेत् ॥ १५ ॥ आततायिनं हत्वा नात्र प्राणच्छेत्तुः किंचित्किल्विषमाहुः ॥ १६ ॥ षड्विधास्तत्वाततायिनः ॥१७॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १८ ॥ अग्निदोगरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः । क्षेत्रदारहरश्चैव षडेतेआततायिनः ॥ १९ ॥ आततायिनमायान्तमपिवेदन्तपारगम् । जिघांसन्तं जिघांसीयान्नतेन ब्रह्महाभवेत् ॥ २० ॥ स्वाध्यायिनंकुलेजातं योहन्यादाततायिनम् । नतेनभ्रूणहासस्यान्मन्युस्तंमन्युमृच्छति । इति ॥२१॥
कहीं अज्ञात गड़ा हुआ धन जिस को मिले उस को उस धन का छठा भाग देकर शेष को राजा ले लेवे ॥ १४ ॥ यदि वेदादि को पढ़ने पढ़ाने आदि अपने छः कर्मों में तत्पर ब्राह्मण को अज्ञात धन मिले तो राजा को कुछ नहीं लेना चाहिये ॥ १५ ॥ आततायी को मार डालने पर मारनेवाले को हत्या का कुछ भी पाप नहीं लगता ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥ १६ ॥ छः प्रकार के मनुष्य आततायी होते हैं ॥ १७ ॥ इस पर श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ १८ ॥ १-आग लगाने वाला, २-विष देने वाला, ३-हाथ में शस्त्र लेके मारने को जो आता हो, ४-धन का नाश करने वा छीनने लूटने वाला, ५-खेतका सर्वथा नाश करने वाला और ६-किसी की स्त्री को बलात्कार हरने वा जबरदस्ती से स्त्री का धर्म बिगाड़ने वाला ये छः आततायी कहाते हैं ॥ १९ ॥ आततायी हो कर यदि वेद वेदान्त का पूर्ण विद्वान् ब्राह्मण भी आता हो तो अपने को मार डालना चाहते हुए उस आततायी को बिना विचारे ही मार डाले क्योंकि ऐसी दशा में ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगेगा ॥२०॥ वेदपाठी कुलीन ब्राह्मण आततायी को जो मारडाले तो उस से मारने वाला ब्रह्महत्यारा नहीं होता क्योंकि वहां क्रोध का क्रोध से युद्ध माना जाता है ॥ २१ ॥
भाषार्थसहिता ॥ १५
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णवांश्चतुर्मेधा वाजसनेयी षडङ्गविद्ब्रह्मदेयानुसंतानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगो मन्त्रब्राह्मणविद्यः स्वधर्मानधीते यस्य दशपुरुषं मातृपितृवंशः श्रोत्रियो विज्ञायते विद्वांसः स्नातकाश्चैते पङ्क्तिपावना भवन्ति२२ चातुर्विद्योविकल्पीच अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयोमुख्याः परिषत्स्याद्दशावरा ॥ २३ ॥ उपनीय तु यः कृत्स्नं वेदमध्यापयेत्सआचार्यः ॥ २४ ॥ यस्त्वेकदेशं स उपाध्यायो यश्च वेदाङ्गानि ॥२५॥ आत्मत्राणे वर्णसंकरे वा ब्राह्मणवैश्यौ शस्त्रमाददीयाताम् ॥२६॥ क्षत्रियस्य
यजुर्वेद को पढ़ने जानने और उस के नियम व्रतों को करने वाला त्रिणाचिकेत, पञ्चाग्नि-श्रौतस्मार्त्त अग्निहोत्र करने वाला, ऋग्वेद के होतृ कर्म को पढ़ने जानने और तदुक्त नियम व्रतों को करने वाला-त्रिसुपर्णवान्, चारो वेद में जिस की बुद्धि चलती हो, वाजसनेयी संहिता को पढ़ने जानने वाला, वेद के छः अङ्गों का विद्वान्, ब्राह्म विवाह से उत्पन्न, सामवेदी, सामवेद के आरण्यक भाग का विद्वान्-ज्येष्ठसामग, मन्त्र ब्राह्मण दोनों वेदभागों का ज्ञाता, जो अपने वर्ण तथा आश्रम के धर्मों को विशेष कर पढ़ता जानता हो, जिस के माता पिता के वंश में दश पीढ़ी से वेद के पढ़ने की परम्परा चली आयी हो, ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थ बने विद्वान्, ये त्रिणाचिकेतादि ब्राह्मण पङ्क्तिपावन कहाते हैं (जिस पांति में बैठते हैं उसे पवित्र कर देते हैं) ॥ २२ ॥ चारो वेद के पढ़ने जानने वाले चार विद्वान्, नैयायिक, वेदाङ्गों का पढ़ने जानने वाला, मीमांसा वा धर्मशास्त्रों का पढ़ने जानने वाला, अपने २ आश्रम के धर्म को यथावत् सेवन करने वाले ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, ये तीनों मुख्याश्रमी इन दश पुरुषों की दशावरा धर्मसभा कहाती है ॥२३॥ जो यज्ञोपवीत संस्कार करा के पूर्ण वेद को पढ़ावे वह आचार्य कहाता है ॥२४॥ जो वेद के किसी भाग को और व्याकरणादि अङ्गों को पढ़ावे वह उपाध्याय कहाता है ॥ २५ ॥ अपनी रक्षा के लिये वा जब राजादि के अत्याचार से वर्णसंकरता का प्रचार बढ़ता हो तो ऐसे अवसरों में ब्राह्मण तथा वैश्यों को हथियार हाथ में लेना चाहिये ॥ २६ ॥ और प्रजा की रक्षा का भार
| १६ | वसिष्ठस्मृतिः ॥ |
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तु तन्नित्यमेव रक्षणाधिकारात् ॥ २७ ॥ प्राङ्गोदङ्ग्वाऽऽसीनः प्रक्षाल्य पादौ पाणी चाऽऽमणिबन्धनात् ॥२८॥ अङ्गुष्ठमूलस्योत्तरतो रेखा ब्राह्मं तीर्थं तेन त्रिराचामेदशब्दवद् द्विःपरिमृज्यात् ॥२९॥ खान्यद्भिः संस्पृशेत् ॥३०॥ मूर्द्धन्यपो निनयेत् ॥ ३१ ॥ सव्ये च पाणौ व्रजंस्तिष्ठञ्शयानः प्रणतो वा नाऽऽचामेत् ॥३२॥ हृदयङ्गमाभिरद्भिर्बुद्बुदाभिरफेनाभिर्ब्राह्मणः कण्ठगाभिः क्षत्रियः शुचिः ॥३३॥ वैश्योद्भिः प्राशिताभिस्तु स्त्रीशूद्रौ स्पृष्टाभिरेवच ॥३४॥ पुत्रदारादयोऽपि गोस्तर्पणाः स्युः ॥ ३५ ॥ न वर्णगन्धरसदुष्टाभिर्याश्च स्युरशुभागमाः ॥३६॥ न मुख्या विप्रुष उच्छिष्टं कुर्वन्त्यनङ्गे श्लिष्टाः ॥३७॥ सुप्त्वा भुक्त्वा पीत्वा क्षुत्वा रुदित्वा स्नात्वा चाऽऽचान्तः
का अधिकार होने से क्षत्रिय पुरुषों को तो सदा नित्य ही शस्त्र अपने साथ रखने चाहिये ॥ २७ ॥ दोनों पगों और मणि बन्धस्थान ( पहुंचों ) तक दोनों हाथों को धोकर पूर्व वा उत्तर को मुख कर बैठा हुआ ॥ २८ ॥ अंगुष्ठ के मूल के उत्तर भाग में ब्राह्मतीर्थ कहाता है उस ब्राह्मतीर्थ से तीन बार ऐसे आचमन करे जिस में शब्द न हो फिर दोवार जल से मुख को शुद्ध करे ॥ २९ ॥ मुख, नासिका, चक्षु और श्रोत्ररूप छिद्रों का जल हाथ में लगाके स्पर्श करे ॥३०॥ फिर मस्तक पर जल छिड़के ॥ ३१ ॥ चलता, खड़ा, लेटा, वा तिर्छा झुका हुआ और वाम हाथ से आचमन न करे ॥ ३२ ॥ फेन जिस में न हो ऐसे हृदय तक पहुंचने वाले जल के आचमन से ब्राह्मण तथा कण्ठ तक पहुंचने वाले जल के आचमन से क्षत्रिय शुद्ध होता है ॥३३॥ मुख के भीतर तक पहुंचने वाले जल से वैश्य और स्त्री तथा शूद्र ओष्ठों में जल के स्पर्श मात्र आचमन से शुद्ध होते हैं ॥३४॥ स्त्री पुत्रादि भी आचमन तथा इन्द्रिय स्पर्शादि द्वारा इन्द्रियाभिमानी देवताओं को तृप्त करने वाले हों ॥ ३५ ॥ रूप रस तथा गन्ध जिस का बिगड़ा हो वा जो अपवित्र मार्ग से प्राप्त हो ऐसे जल से आचमनादि न करे ॥ ३६ ॥ यदि अंग पर न पड़े तो मुख से झरने वाली थूक की छींटे मनुष्य को उच्छिष्ट वा अशुद्ध नहीं करती हैं ॥३७॥ सोना, खाना, पीना, छींकना, रोना, और स्नान करना
भाषाधर्मसंहिता ॥ १९
पुनराचामेत् ॥३८॥ वासश्च परिधायौष्ठौ च संस्पृश्य यत्राला मकौ न श्मश्रुगतो लेपः ॥३९॥ दन्तवद्दन्तसक्तेषु यच्चान्तर्मुखेभवेत् । आचान्तस्यावशिष्टंस्यान्निगिरन्नेवतच्छुचिः ॥ ४० ॥ परानथाऽऽचामयतः पादौयाविप्रुषोगताः । भूम्यास्तास्तुसमाःप्रोक्तास्ताभिर्नोच्छिष्टभाग् भवेत् ॥४१॥ प्रचरन्नभ्यवहार्य्यपूच्छिष्टंयदिसंस्पृशेत् । भूमौ निक्षिष्यतद्द्रव्यमाचान्तःप्रचरेत्पुनः ॥४२॥ यद्यन्मीमांस्यं स्यात्तत्तदद्भिः संस्पृशेत् ॥ ४३ ॥ श्वहताश्चमृगावन्याः पतितंचखगैःफलम् । बालैरनुपरिक्रान्तं स्त्रीभिराचरितंचयत् ॥ ४४ ॥ प्रसारितंचयत्पण्यं येदोषाःस्त्रीमुखेषुच ।
इन कामों को करके पहिले किया हो तो भी फिर से आचमन करे ॥३८॥ वस्त्र धारण कर, ( बदल के ) तथा जहां बाल नहीं जमते वहां ओठों का स्पर्श करके भी आचमन करे और मूंछों में लगी जूठन वा कफशुद्ध नहीं माना जायगा उस को धोकर भी आचमन करना चाहिये ॥ ३९ ॥ विधि पूर्वक आचमन कर लेने पर दांतों में वा मुख में कहीं खाये हुये शेष अन्नादि का अंश जान पड़े तो उस से वह मनुष्य उच्छिष्ट नहीं माना जायगा किन्तु निगलते ही शुद्ध हो जाता है ॥ ४० ॥ अन्य लोगों को जल पिलाते वा आचमन कराते समय पगों पर जो जल के छींटे पड़ जावें उन को पृथिवी की धूलि के समान कहा है उन से मनुष्य अशुद्ध नहीं होता है ॥४१॥ भोजन करने योग्य पकाये अन्नादि को ले जाते हुये यदि किसी उच्छिष्ट को छूलेवे तो उस भोज्य वस्तु को भूमि पर रख कर आचमन करके फिर लेजावे ॥ ४२ ॥ जिस २ वस्तु के अशुद्ध होने न होने में शंका हो जावे उस २ को शुद्ध जल से स्पर्श वा प्रक्षालन कर लेवे ॥ ४३ ॥ कुत्तों ने मारे वन के मृग, पक्षियों ने उच्छिष्ट करके वृक्षों से गिराये फल, हाथ आदि धोये बिना भी बालकों ने ग्रहण किये-पकड़े भोज्य वस्तु, स्त्रियों ने किये आचरण वा कोई काम, ॥ ४४ ॥ बेंचने के लिये दुकान पर नीच पुरुष ने भी फैलाये पदार्थ, स्त्रियों के मुख में जो दोष हैं, मक्खी तथा मच्छर नील का स्पर्श करके भी जिस भोज्य वस्तु पर बैठ गये
१८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
मशकेर्मक्षिकामिश्च नीलीयेनोपहन्यते ॥ ४५ ॥
क्षितिस्थाश्चैवयाआपो गवां तृप्तिकराश्चयाः ।
परिसंख्यायतान्सर्व्वान् शुचीनाहप्रजापतिः । इति ॥ ४६॥
लेपगन्धापकर्षणे शौचममेध्यलिप्तस्याद्भिर्मृदा च ॥ ४७ ॥ तैजसमृन्मयदारवतान्तवानां भस्मपरिमार्जनप्रदा-
हतक्षणनिर्णेजनानि ॥ ४८ ॥ तैजसवदुपलमणीनां मणिव-
च्छङ्खशुक्तीनां दारुवदस्थ्नां रज्जुविदलचर्मणां चैलवच्छौ
चम् ॥ ४९ ॥ गोवालैः फलमयानां गौरसर्षपकल्केन क्षौम-
जानाम् ॥ ५० ॥ भूम्यास्तु संमार्जनप्रोक्षणोपलेपनोल्लेखनै-
र्यथास्थानं दोषविशेषात्प्रायत्यमुपैति ॥ ५१ ॥ अथाप्युदाह-
रन्ति ॥ ५२ ॥
खननाद्दहनाद्वर्षाद् गोभिराक्रमणादपि ।
और उनमें से कुछ खा भी लिया हो, ॥४५॥ शुद्ध एकान्त भूमि में ठहरा जल, और जिस को पीकर गौएं तृप्त हो सकें उतना थोड़ा भी शुद्ध जल, इन कुत्तों ने मारे मृगादि सब को गिन्ती करके प्रजापति नाम ब्रह्मा जी ने शुद्ध कहा है ॥४६॥ अशुद्ध हुए वस्तु की मही और जल से इतनी शुद्धि करे जिस से उस का लेप और दुर्गन्ध सर्वथा मिट जावे ॥ ४७ ॥ अशुद्ध हुये कांसे पीतल आदि तैजस पदार्थों की भस्म से मांज कर धोने से, मिट्टी के पात्रों को फिर से अग्नि में पकाने पर, काष्ठ के पात्रादि का अशुद्धांश छील डालने से, और सूत के वस्त्रादि की धोने से शुद्धि होती है ॥ ४८ ॥ पत्थर और मणि मूंगादि के पात्रादि की शुद्धि तैजस पात्रादि के तुल्य, मणि के तुल्य शंख तथा सीपी की शुद्धि, काष्ठ पात्रादि के तुल्य हाथी दांतादि के पात्रादि की शुद्धि, रस्सी, बेंत और चर्म पात्रादि की शुद्धि सूत के वस्त्रों के तुल्य कही है ॥ ४९ ॥ गौ के बालों से फल रूप पदार्थों की, श्वेत सरसों के औंटाये रस से अतसी के मुकुटादि वस्त्रों की शुद्धि होती है ॥ ५० ॥ झाडू से बुहारने, सींचने, लीपने और अशुद्धांश को खोद कर निकाल देने वा गोड़ देने से भूमि की शुद्धि होती है। अर्थात् जहां जैसा दोष भूमि में लगा हो वैसे ही एक वा कई झाडूने आदि उपायों से पृथिवी ठीक शुद्ध हो जाती है ॥ ५१ ॥ इस पर श्लोक कहते हैं ॥ ५२ ॥ खोदने, अग्नि जलाने, वर्ष ने वा सींचने, गौओं के धसने और पांचवें लीपने से
भाषार्थसहिता ॥ १९
चतुर्भिःशुध्यतेभूमिः पञ्चमाच्चोपलेपनात् । इति ॥५३॥
रजसाशुध्यतेनारी नदीवेगेनशुध्यति ।
भस्मनाशुध्यतेकांस्यं ताम्रमम्लेनशुध्यति ॥ ५४ ॥
मद्यैर्मूत्रैःपुरीषैर्वा श्लेष्मपूयाश्रुशोणितैः ।
संस्पृष्टंनैवशुध्येत पुनःपाकेनमृन्मयम् ॥ ५५ ॥
अद्भिर्गात्राणिशुध्यन्ति मनःसत्येनशुध्यति ।
विद्यातपोभ्यांभूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेनशुध्यति ॥ ५६ ॥
अद्भिरेव काञ्चनं पूयते तथा रजतम् ॥ ५७ ॥ अङ्गुलिक-
निष्ठिकामूले दैवं तीर्थम् ॥५८॥ अङ्गुल्यग्रे मानुषम् ॥ ५९ ॥
पाणिमध्यआग्नेयम् ॥ ६० ॥ प्रदेशिन्यङ्गुष्ठयोरन्तरा पित्र्य-
म् ॥ ६१ ॥ रोचन्तइति सायं प्रातरग्नीनभिपूजयेत् ॥ ६२ ॥ स्व-
दितमिति पित्र्येषु ॥ ६३ ॥ संपन्नमित्याभ्युदयिकेषु ॥ ६४ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अशुद्ध हुई भूमि शुद्ध होजाती है ॥ ५३ ॥ रजोधर्म होजाने पर स्त्री, प्रवाह के वेग से नदी, भस्म से मांजने पर कांसे के पात्र, और खटाई से तांबे के पात्र शुद्ध होजाते हैं ॥५४॥ मद्य, मल, मूत्र, थूक, पीव, और रुधिर ये सब वा कोई जिसमें रक्खे गये हों ऐसा मिट्टी का पात्र फिर से अग्नि में पकाने से भी शुद्ध नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥ शरीर के हाथ पांव आदि अङ्ग जल से, सत्यभाषण करने से मन, विद्याभ्यास और तप करने से सूक्ष्म शरीर वा जीवात्मा और तत्त्वज्ञान होने से बुद्धि शुद्ध होती है ॥ ५६ ॥ सुवर्ण और चांदी के पात्रादि केवल जल से धोने पर शुद्ध होजाते हैं ॥ ५७ ॥ छोटी अंगुलि के मूल में दैव-तीर्थ कहाता है ॥ ५८ ॥ अंगुलियों के अग्र भाग में मनुष्य तीर्थ है ॥ ५९ ॥ हथेली के बीच में आग्नेय तीर्थ है ॥ ६० ॥ प्रदेशिनी और अंगूठा के बीच में पितरों को जल देने का तीर्थ है ॥ ६१ ॥ ( रोचन्ते ) ऐसा कहकर सायं प्रातः काल गार्हपत्यादि अग्नियों का पूजन करे ॥ ६२ ॥ श्राद्धादि पितृ सम्बन्धी कामों में भोजन किये ब्राह्मणों से ( स्वदितम् ) ऐसा कहे ॥ ६३ ॥ आभ्युदयिक विवाहादि कामों में ( संपन्नम् ) ऐसा कहे ॥ ६४ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
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