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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

[ १२ ] ✿ निरन्तर भगवत्स्मरण सभीके लिये परम श्रेयस्कर है ............................................. ६५० १७. करुणालहरी ............................................ ६५३ ✿ प्रेमी भक्तका भगवान्‌के प्रति मधुर उपालम्भ.. ६५३ १८. गजेन्द्र-मुक्ति ......................................... ६५५ ✿ आर्तभक्तकी प्रार्थना ................................. ६५५ १९. संकल्प-बल ............................................ ६५८ ✿ परमात्मा ही जगत्‌के उपादान और निमित्त कारण ............................................... ६५९ ✿ संकल्पका प्राधान्य .................................. ६५९ ✿ संकल्पके अनुसार ही क्रियाकी निष्पत्ति ... ६६१ ✿ असत्संकल्पोंको त्यागनेकी रीति ............... ६६१ ✿ सत्-तत्त्वका प्रभाव ................................ ६६२ ✿ संकल्पसिद्धिका बाधक—अविश्वास ......... ६६२ ✿ संकल्पका स्वरूप .................................. ६६४ ✿ शुभसंकल्पकी ही भावना करें .................. ६६४ ✿ योगियोंका संकल्प-बल ........................... ६६५ ✿ मनसे पापकर्मोंका परित्याग और अच्छे कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये ............. ६६५ ✿ बुरे कर्मोंके संकल्पोंको रोकना परमावश्यक .. ६६६ ✿ सत्कर्म और उत्तम मन्त्रोंके जपसे संकल्पका बल दुगुना हो जाता है ............................ ६६७ ✿ मन्त्रजपके अधिकारी-अनधिकारी ............ ६६८ २०. ज्ञान और भक्ति ...................................... ६७० ✿ ज्ञान बड़ा या भक्ति बड़ी ........................... ६७० ✿ भक्ति और ज्ञानका स्वरूप ....................... ६७१ ✿ भक्तिसे ज्ञानकी प्राप्ति ............................ ६७२ ✿ भक्तिका अर्थ ज्ञान है .............................. ६७३ ✿ ज्ञान नामकी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है ......... ६७४ ✿ वेदोंके दो काण्ड—कर्मकाण्ड और उपासना- काण्ड................................................. ६७५ ✿ भक्तिका उत्कर्ष ................................... ६७५ ✿ भक्ति और वेदान्त ................................ ६७६ ✿ भक्ति और ज्ञानके उत्कर्ष तथा अपकर्षका चिन्तन व्यर्थ है ................................... ६७८ ✿ भक्तिसे ज्ञानद्वारा परम तत्त्वकी प्राप्ति....... ६८१ ✿ सगुणोपासना और निर्गुणोपासनाका तारतम्य .. ६८२ ✿ सगुणोपासना सरल है .......................... ६८४ ✿ जीवन्मुक्तकी भी भगवान्‌के भजनमें अभिरुचि ... ६९० २१. भक्तिरसामृतास्वादन .................................... ६९१ ✿ प्रेम वाणीका विषय नहीं ......................... ६९३ ✿ विरक्तोंद्वारा भी भक्तिकी कामना ............. ६९४ ✿ भगवत्प्रेमके साधन ............................... ६९४ ✿ चित्तद्रुतिसे भक्तिमें भेद ........................ ६९५ ✿ परब्रह्मकी प्रेमास्पदता ............................ ६९६ ✿ ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्‌में भेद....... ६९७ ✿ निर्गुण और सगुणका स्वरूप .................. ६९९ ✿ भगवान्‌के सभी गुण भक्तोपयोगी ............. ७०० ✿ भगवान्‌की तीन शक्तियाँ ......................... ७०१ ✿ बिम्बप्रतिबिम्बभाव ................................. ७०२ ✿ अज्ञातज्ञापकत्व ही प्रमाणोंका प्रामाण्य है .... ७०३ ✿ आचार्य श्रीमद्मधुसूदनजी सरस्वती—व्यक्तित्व एवं कृतित्व ......................................... ७०४ २२. क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ..... ७०५ ✿ विविध शंकाओंके युक्तियुक्त शास्त्रोक्त समाधान .............................................. ७०५ चतुर्थ खण्ड—ज्ञानतत्त्वदर्शन १. वेदान्तरससार ........................................... ७१४ ✿ मंगलाचरण ......................................... ७१४ ✿ वेदप्रामाण्य-तात्पर्यविमर्श ....................... ७१४ ✿ ब्रह्मकी सच्चिदानन्दरूपता और जगत्‌की असच्चिदानन्दरूपता ............................ ७१५ ✿ मायाकी अनिर्वचनीयता ............................ ७१५ ✿ ज्ञानस्वरूप-विमर्श ................................. ७१६ ✿ भगवत्तत्त्व-प्रतिपादन ............................ ७१६ ✿ भगवत्तत्त्वकी आत्मरूपता ......................... ७२० ✿ शोधित अहमर्थकी प्रत्यगात्मरूपता .......... ७२३ ✿ ब्रह्मात्मतत्त्वकी रसरूपता ......................... ७२५ ✿ अविक्रिय विज्ञानघन आत्माकी ब्रह्मरूपता.. ७२७ ✿ भ्रमबीज द्वैतमूल अज्ञानातीत आत्माकी स्वप्रकाश आनन्दरूपता ........................ ७२८ ✿ सबीज ब्रह्मकी परिणामोपादानता और निर्बीज ब्रह्मकी विवर्तोपादानता ........................... ७३० ✿ अनुभवगोचरता और आच्छादकताके कारण अज्ञानकी भावरूपता न कि ज्ञानाभावरूपता .. ७३२ ✿ निष्प्रपंच परमात्मामें कल्पित तादात्म्य-सम्बन्धसे प्रकृति तथा प्रपंचकी विद्यमानता ............ ७३३ ✿ वेदान्ताभ्यासजन्य संस्कारसम्पन्न निरुद्धान्तःकरणसे निरावरण ब्रह्मसाक्षात्कारकी सम्पन्नता ......... ७३५

[ १३ ] ✿ ब्रह्मात्मविज्ञानसे सर्वविज्ञानकी बाधरूपता... ७३९ ✿ तारतम्यशून्य अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्वकी निरतिशय बृहद् ब्रह्मरूपता ........... ७४६ २. सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ........................ ७४९ ✿ महेश्वरकी महाशक्ति और उसकी अद्भुत चमत्कृति ........................................... ७४९ ✿ वैदिक तथा अवैदिक दर्शनभेद .............. ७४९ ✿ चार्वाकमत-प्रतिपादन ............................ ७४९ ✿ बौद्धमतविवेचन .................................. ७५० ✿ बौद्धमतप्रभेद ..................................... ७५० ✿ जैनमतनिरूपण ................................... ७५० ✿ न्यायमतनिरूपण ................................. ७५१ ✿ सांख्यमतप्रतिपादन ................................ ७५१ ✿ योगमतनिरूपण ................................... ७५१ ✿ मीमांसामतविवेचन .............................. ७५१ ✿ वेदान्तमतप्रभेदप्रतिपादन ........................ ७५२ ✿ श्रीमाध्वमतनिरूपण .............................. ७५२ ✿ श्रीरामानुजमतनिरूपण ........................... ७५२ ✿ श्रीनिम्बार्कमतनिरूपण ........................... ७५२ ✿ श्रीवल्लभमतविवेचन ............................. ७५३ ✿ शैवादि विविधमतविवेचन ........................ ७५३ ✿ सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकार ...................... ७५४ ✿ सुन्दोपसुन्दन्यायकी अप्रसक्ति, किंतु सोपानारोह- क्रमकी प्रसक्ति .................................... ७५५ ✿ अद्वैतमें द्वैतान्तभावकी प्रसक्ति ................ ७५५ ✿ द्वैतप्रपंचभगवदाश्रिता अनिर्वचनीयताशक्तिकी अद्भुत चमत्कृति ................................. ७५५ ✿ द्रष्टा आत्माकी दृश्यतादात्म्यापत्तिके कारण विविध वादोंकी प्रवृत्ति .......................... ७५५ ✿ परोवरीयक्रमके समादरसे समन्वयकी सिद्धि तथा वास्तव आत्माकी समुपलब्धि ......... ७५५ ✿ तदभिमतविषयविशेषकी उपादेयता तथा तदतिरिक्तकी उपेक्षा—समन्वयकी स्वरूप- विधा................................................. ७५६ ✿ सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मकी निरावरण स्फूर्ति शिवादि पंचदेवोंमें एकातिरिक्त अन्योंकी निन्दा निज इष्टमें दृढ़ आस्था-सम्पादनकी विधा .... ७५८ ✿ कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म और कार्यकारणातीत परब्रह्ममें पूर्व-पूर्वकी निन्दा उत्तरोत्तरकी उत्कृष्टताकी स्वस्थ दिशा .................... ७५९ ✿ सत्ताभेदकी समीचीनता ........................ ७६१ ✿ उपाधिपर्यन्त व्यावहारिक भेदके कारण भगवद्भक्तिके लिये अपेक्षित जीवेश्वरभेदकी सम्पन्नता .......................................... ७६२ ✿ कर्मसंन्यासकी शास्त्रसम्मतता ................. ७६२ ✿ सर्वविध व्यवधानकी असहिष्णुता भगवत्प्रेमकी प्रगल्भता ........................................... ७६३ ✿ स्वात्मसमर्पणसे ही भक्ति और भगवान्‌की पूर्णता .............................................. ७६४ ✿ भगवद्-विग्रहकी व्यावहारिकता तथापि उपादानांशमें परमार्थता एवं निमित्तांशमें आकाशादिसे विलक्षणता ..................... ७६५ ✿ स्वरूपतः निर्गुण-निरपेक्ष-परमानन्दस्वरूप भगवत्तत्त्वके सगुण-साकाररूपसे प्रादुर्भावमें विशुद्ध सत्त्वात्मिका शक्तिकी निमित्तमात्रता .................................... ७६५ ✿ सबके अभिमत स्वरूपकी वास्तविक भगवद्रूपता .......................................... ७६६

࿇ पूर्णपरात्पर भगवान् श्रीकृष्ण ࿇ शिखिमुकुटविशेषं नीलपद्माङ्गदेशं विधुमुखकृतकेशं कौस्तुभापीतवेशम्। मधुररवकलेशं शं भजे भ्रातृशेषं व्रजजनवनितेशं माधवं राधिकेशम्॥

भक्तिसुधा प्रथम खण्ड—श्रीकृष्णलीला-दर्शन श्रीकृष्ण-जन्म श्रीनन्दराय और देवी नन्दरानीजीका परिचय 'श्रीगोपालचम्पू' में श्रीकृष्ण-जन्मका बड़ा सुन्दर वर्णन मिलता है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके बाल्य- सुखके उपभोक्ता श्रीमन्नन्दराय कौन थे? 'गोप' शब्दसे भी उनका व्यवहार होता है। 'सच्छूद्रौ गोपनापितौ' इत्यादि वचनोंके आधारपर कुछ लोग उन्हें शूद्र समझ सकते हैं। वैसे तो भगवान्‌का जहाँ ही प्राकट्य हो, वही कुल धन्य है, फिर कोई भी क्यों न हो! परंतु 'श्रीगोपालचम्पू' के रचयिताने तो उन्हें क्षत्रियसे वैश्यकन्यामें उत्पन्न, अतएव वैश्य माना है। वृष्णिवंशमें भूषणस्वरूप देवमीढ़ मथुरापुरीमें निवास करते थे। उनकी दो स्त्रियाँ थीं, एक वैश्यकन्या और दूसरी क्षत्रियकन्या। क्षत्रियकन्यासे शूर हुए, जिनके वसुदेवादि हुए और वैश्यकन्यासे पर्जन्य हुए। अनुलोम संकरोंका वही वर्ण होता है, जो माताका होता है। इसी कारण पर्जन्यने वैश्यताको ही स्वीकार किया और गोपालनमें ही विशेष रूपसे प्रवृत्त हुए, जो कि वैश्य- जातिका प्रधान कर्म है, इसीलिये वे गोप भी कहे गये— 'वृष्णिवंशावतंसः श्रीदेवमीढ़नामा परमगुण- धामा मथुरामध्यासयामास। तस्य भार्याद्वयमासीत्। प्रथमा द्वितीयवर्णा द्वितीया तृतीयवर्णा। तयोश्च क्रमेण शूरः पर्जन्य इति पुत्रद्वयं बभूव। शूरस्य वसुदेवादयः समुदयन्ति स्म। श्रीमान् पर्जन्यस्तु 'मातृवर्णवद्दर्णसङ्कर' इति न्यायेन वैश्यतामेवाविश्य गवामेवैश्यं वश्यं चकार।' पर्जन्य बड़े धर्मात्मा और ब्रह्म-हरिपूजनपरायण थे। उनका मातृवंश वैश्य सर्वत्र विस्तीर्ण और प्रशंसनीय था, उनमें भी वैश्यविशेष आभीर वंश था। वैश्यकी पुत्रीमें ब्राह्मणसे उत्पन्न पुत्र 'अम्बष्ठ' होता है और अम्बष्ठ-कन्यामें ब्राह्मणसे उत्पन्न 'आभीर' होता है। यह आभीर वैश्य ही होता है। ऐसे ही वैश्यकुलकी कन्यामें देवमीढ़ क्षत्रियसे उत्पन्न पर्जन्य वैश्य थे। ये ही गोपवंशरूपसे कृष्णलीलामें प्रख्यात हैं, अतएव इससे शूद्र गोप पृथक् हैं। यह तो वैश्य ही गोपालन कर्मसे गोप कहे गये। ब्रह्माने भी आभीरापरपर्याय गोप-कन्याको पत्नीत्वेन स्वीकार करके उसके साथ यज्ञ किया था। अतएव 'भागवत' में भी गर्गजीसे नन्दजीने कहा था कि इन दोनों पुत्रोंका द्विजातिसंस्कार करो—'कुरु द्विजातिसंस्कारम्॥' (श्रीमद्भा० १०।८।१०) कृष्णने भी 'कृषिवाणिज्य- गोरक्षा कुसीदं तुर्यमुच्यते। वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्॥' (श्रीमद्भा० १०।२४।२१) इत्यादिसे अपनेको गोवृत्त वैश्य कहा है। पर्जन्यके उपनन्द, अभिनन्द, नन्द, सनन्द और नन्दन—ये पाँच पुत्र हुए। उनमें भी श्रीमन्नन्दराय सबके ही प्रेमास्पद थे। किसी सुमुख नामक प्रमुख गोपने श्रीमन्नन्दरायको परम धन्या, सुननेवालों,

देखनेवालों, भक्तिवालोंको यश देनेवाली यशोदा नाम्नी कन्याको प्रदान किया। पर्जन्यने मध्यम पुत्र नन्दको ही सर्वसम्मतिसे राज्य दिया और सम्पूर्ण भाई मन्त्री आदिका कार्य करते थे। पाँचों भाइयोंमें कोई सन्तति न थी। पुत्रेष्टि यज्ञादि किये गये, अनेक प्रकारकी भगवदाराधना होती रही। एक दिन श्रीमन्नन्दरायने नन्दरानीसे कहा—'मानिनि ! मैं तुम्हारे अंकमें दुग्धोद्गारी पयोधरपर क्रीड़ा करनेवाला श्यामवर्णका चंचल, चारु, दीर्घ नेत्रोंवाला बालक स्पष्ट रूपसे देख रहा हूँ। क्या यह स्वप्न है या जागर ? सहधर्मिणि ! ठीक कहो, क्या तुम्हें भी वैसा ही प्रतीत होता है ? श्यामश्चञ्चलचारुदीर्घनयनो बालस्तवाङ्कस्थले दुग्धोद्गारि पयोधरे स्फुटमसौ क्रीडन् मयालोक्यते। (गोपालचम्पू) नन्दरानीने कहा—'देव ! मेरे भी मनमें ऐसी ही बात आ रही है।' इसके अनन्तर दोनोंने ही अपनी मनोरथपूर्तिके लिये द्वादशी-व्रत प्रारम्भ किया। वर्ष पूर्ण होनेपर समान कालमें ही दोनोंके सामने देवदेवका प्राकट्य हुआ और कहा कि 'अहो ! तुम व्रतसे क्यों खिन्न हो रहे हो ? जो अतसीकुसुमके समान सुषमा- सम्पन्न सुकुमार तुम दोनोंके अनुभवमें आता है, वह तुम्हारे संकल्पका ही फल है।' ऐसा कहकर देव अन्तर्हित हुए। यथासमय दिव्य कालमें, जिस समय जाति (जूही)-के साथ माधवी, केतकीके साथ केतक, अम्बुजोंके साथ कुमुद फूले थे, दिशाएँ प्रसन्न थीं, उसी समय सर्वाश्चर्यनिधि श्रीकृष्णका जन्म हुआ। ललित स्मितसे नील कमलोंके सम्राट्के समान बालकका मुख था। वस्तुतः वह स्वरूप ऐसा विचित्र था कि औरोंकी तो कौन कहे, वह अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान्‌को ही आश्चर्यसिन्धु या विस्मयमें डालनेवाला था— यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) भूषणोंको भी विभूषित करनेवाले अंगोंको मणिमय प्रांगणमें प्रतिबिम्बित देखकर कृष्ण स्वयं मुग्ध होकर उससे मिलनेके लिये उत्सुक हो उठते थे— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम् । आदातुकामस्तदलाभखेदा- न्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ कुछ महानुभावोंका कहना है, श्रीभगवान्‌का सम्बन्ध केवल प्रेम-निबन्धन ही है। तभी कहा है— 'भक्त्याहमेकया ग्राह्यः' (श्रीमद्भा० ११।१४।२१) अर्थात् भगवान् केवल भक्तिसे ही ग्राह्य होते हैं। जो जिस भावसे प्रभुको भजते हैं, प्रभु भी उन्हें वैसे ही प्राप्त होते हैं, अतः श्रीमन्नन्दराय एवं नन्दरानीके भावानुसार प्रभु वात्सल्य-प्रेमानुकूल उनकी पुत्रताको प्राप्त हुए। श्रीवसुदेवजीको भी वात्सल्य- रस प्राप्त था, परंतु सूतिका-गृहमें ही भगवान्‌के ऐश्वर्यपूर्ण रूपको देखनेसे उनमें वात्सल्य-रसका उतना तारल्य नहीं रह गया था, किंतु श्रीमन्नन्दरायमें सर्वदा समुद्बुद्ध अतएव सर्वदा ही शुद्ध वात्सल्य- रस रह गया था। वसुदेव और देवकीने भगवान्‌को मनसे ही पुत्रत्वेन धारण किया था, यह बात अग्रिम वचनोंसे ज्ञात होती है। 'आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१६) अर्थात् अंशभागसे भगवान् आनकदुन्दुभिके मनमें प्रविष्ट हुए। 'दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१८) अर्थात् जैसे पूर्वा दिक् आनन्दकर चन्द्रमाको धारण करती है, वैसे ही देवकीने मनसे ही सर्वान्तरात्मा कृष्णको धारण किया। जैसे वसुदेव-देवकीने मनसे ही कृष्णको धारण किया था, वैसे ही श्रीव्रजराज और व्रजरानीने भी पुत्रत्वेन उन्हें धारण किया था;

श्रीकृष्ण-जन्म १७ इसलिये कहा जाता है कि माघ शुक्ल प्रतिपदाकी सर्व-सुखसम्पन्न रजनीमें श्रीव्रजराजकी सेवा करती हुई यशोदाने तन्द्राामें स्वप्नके समान कुछ चमत्कार देखा। जिस कुमारको पहले देखा था, वही किसी सर्वावरणकारिणी दिव्य कुमारीसे अपनेको आवृत करके व्रजराजके हृदयसे निकलकर उनके हृदयमें प्रविष्ट हुए। बालक हृदयमें विराजमान हुआ और कन्या उदरमें और उसी समयसे नन्दरानीमें गर्भ- लक्षण दिखलायी देने लगे। व्रजरानीमें प्रस्फुरित होनेसे ही कृष्णका लोकमें भी वैसे ही स्फुरण हुआ, जैसे स्फटिक-घटीमें रहनेवाला दीपक भीतर- बाहर सर्वत्र प्रकाश करता है— व्रजराज्ञां स्फुरितात्मा कृष्णः स्फुरति स्म लोकेऽपि। दीपः स्फटिकघटी भागन्तर्बहिरपि विभाति तत्तुल्यः ॥ यद्यपि नन्दरानी रसना-रसके जीतनेवाले धैर्यसे युक्त और गाम्भीर्यादि गुणोंमें अत्यन्त प्रवीण थीं, फिर भी कृष्णावेशसे तुलसी-संस्कृत घृत और सितायुक्त स्वच्छ परमान्नरूप दोहदकी उन्हें इच्छा होने लगी। उधर योगमायाने देवकीके सप्तमासिक गर्भको आकर्षित करके रोहिणीमें रख दिया। फिर रोहिणीने श्रावणसे पहले श्रवण नक्षत्रमें गौर सुन्दर कुमारको उत्पन्न किया। जैसे पौर्णमासी पूर्ण चन्द्रको प्रकट करती है, सिंहवधू विक्रमी शावकको उत्पन्न करती है, वैसे ही रोहिणीने बलरामको प्रकट किया। उस बालकके अंगकी कान्ति सूर्यकी कान्तिको लज्जित करती थी, मुखकान्ति चन्द्रमाकी कान्तिको लजानेवाली थी। महाप्रभावशाली वह बालक अन्य समयमें अत्यन्त जड़-सा ही दिखायी देता था, परंतु कृष्णको गर्भमें धारण करनेवाली नन्दरानी जब उसको अपनी गोदमें लेती थी, तभी बालकको विश्रान्ति और प्रसन्नता होती थी। अनन्तर परम शुभ कालमें कृष्णका प्रादुर्भाव हुआ। ललितस्मित नीलकमलके समान मुख, सूक्ष्म भ्रमरसे चित्रित कैरव-कोशके समान नेत्र, मधुर श्यामल तिल-प्रसूनके समान नासिका, सिन्दूर-गिरि- समुद्भूत जवाकुसुम और बिम्बाफलके सदृश ओष्ठ और अधर थे। अंजनभूमि-समुद्भूत श्याम लता-पत्रके समान कान, नवपल्लवयुक्त नव तमाल-शाखाके समान दोनों ही श्रीहस्त, कोमल मृणालतन्तुसदृश रोमोंकी दक्षिणावर्तराजिसे लांछित दक्षिण वक्षःस्थल और सुवर्णवर्ण रोमोंकी वामावर्तराजिसे लांछित वाम वक्षःस्थल विद्युत्से आश्लिष्ट श्यामल मेघ-खण्डके समान सुशोभित होता था। वे बालकृष्ण अपने मुखसे महापद्मको, नयनोंसे पद्मको, नासिकासे मकरको, स्मितसे कुन्दको, कण्ठसे शंखको, चरणपृष्ठोंसे कच्छपको और दीप्तिसे इन्द्रनीलको जीतनेवाले थे। इनका आविर्भाव स्नेहमयी स्फूर्ति-परम्पराके वशीकारसे ही होता है, अन्यथा नहीं। पुत्र-रूपसे आविर्भावमें पितृभावमय स्नेह ही बीज है। जहाँ भी कहीं पुत्रभावसे उनका प्रादुर्भाव होता है, वहाँ तत्सम्बन्धमय स्नेहकी स्फूर्ति ही मुख्य कारण है। व्रजराज आदिमें शुद्ध समुद्बुद्ध वात्सल्य भाव था। श्रीदेवकी-वसुदेवके हृदयमें वही चतुर्भुजरूपसे थे, अतएव बाहर भी वैसे ही प्रकट हुए। श्रीव्रजराज- व्रजरानीके हृदयमें द्विभुज ही स्वरूप था, अतएव बाहर भी उन्हें द्विभुज स्वरूपका ही उपलम्भ हुआ। जिस समय देवकीको कंसके भयसे आविर्भूत चतुर्भुजरूपको आच्छादन करके द्विभुज रूप देखनेकी इच्छा हुई, उस समय श्रीयशोदाके यहाँ प्रकट द्विभुज स्वरूप ही वहाँ प्रकट होकर चतुर्भुज स्वरूपको अपनेमें लीन करके आविर्भूत हुआ। साकाररूप माताके गर्भमें स्थित रहकर भी निराकारतया योगमाया ऊर्ध्व गतिसे द्विभुज कृष्णको देवकीके पास वैसे ही लायी, जैसे गन्धवाह नीलकमल-दलको लाये, वैसे ही सबसे अलक्षित होकर एवं माताको भी मोहित करके आयी और गर्भस्थ आकारसे माताको प्रसूतिक भ्रम पैदा करके अपने-आपको बाहर प्रकट करके शय्यापर स्थित रही। उसीने संकर्षणको हटाकर रोहिणीमें प्रवेश कराया था। 'अथाहमंशभागेन'

१८ भक्तिसुधा (श्रीमद्भा० १०।२।९) का यही आशय है कि आकारभेद चतुर्भुज स्वरूपके साथ द्विभुज कृष्णका अवतार होगा और वह आकारभेद द्विभुजाकार नन्दनन्दनमें मिल जायगा। अनन्तर वसुदेवजी योगमायाके प्रभावसे सबके प्रसुप्त हो जानेपर उस बालकको लेकर श्रीनन्दरायके भवनमें पहुँचे और नन्दरानीकी शय्यापर उस बालकको पधराकर वहाँसे कन्याको उठा लाये। ईश्वरता-प्रत्यायक चतुर्भुजरूपसे और उपदेशसे भगवान्ने वसुदेवके यहाँ उत्पन्न होना तो व्यक्त कर दिया, परंतु पुत्रता-सन्देह उत्पन्न किया, अतएव उन्हें अनेकों बार उनकी पुत्रतामें सन्देह होता था। श्रीमन्नन्दरानी और नन्दके यहाँ तो द्विभुजरूपसे और वचनादि शक्तिको व्यक्त करनेसे निःसन्देह पुत्रताको व्यक्त किया। आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-को इन बातोंका कुछ भी अनुसन्धान नहीं हुआ। फिर भी श्रीनन्दकी कन्याको ले जाकर उसे खो दिया, उसके बदलेमें कोई प्रतिदान नहीं दिया। ऐसी स्थितिमें वे छोड़े हुए कृष्णमें अपनापन कैसे मान सकते थे? आगमादिकोंमें भी नन्दनन्दन, नन्दात्मज आदि स्पष्ट पद आते हैं। नन्दरानीके पुत्रदर्शनका उल्लास फिर मायाके उपरत होनेपर नन्दरानीने जागकर प्रत्यक्ष नीलोत्पल-दल-श्याम पुत्रको देखा— ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्। नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ बालकका दिव्यातिदिव्य इन्द्रनीलमणिके समान वपु और चन्द्रको जीतनेवाला परम मनोहर मुख था। लोकातीत कमल-दलके सदृश नेत्र और कल्पतरु- नव-पल्लव दलोंके सदृश हाथ थे। हस्त-पादादिको कुछ चलाते हुए वह अपने मृदु, मधुर क्रन्दनसे विश्वको मोहित करता था। 'क्या यह श्यामल प्रकाशोंका साम्राज्य या रूपरत्नाकरोंकी निधि है, लावण्यभागियोंका भाग्य—किंवा तत्तत् अंगावलियोंका विलसित सिद्धान्त है' जबतक नन्दरानी यह विचार कर ही रही थीं, तबतक 'ओमोम्' इस तरह रोदन- व्याजसे बालकने उसकी विकल्पपरम्पराको स्वीकार किया। प्रजात पुत्रको देखकर नन्दरानी सखियोंको भी न बुला सकीं, फिर और चेष्टित होना तो दूर रहा। प्रेमाश्रुओंसे आँखें मिच गयीं, कण्ठ गद्गद हो उठा, वपु स्तब्ध हो उठा, लालनकी लालसासे आत्मा व्यग्र हो उठा। जब माया चली गयी, तब लोगोंका मोह गया। पुरुषोत्तमके प्राकट्यमें व्यवहित नरनारियोंके भी मन वैसे ही विकसित हो उठे, जैसे चन्द्रोदय होते ही व्यवहित कुमुदिनियोंके भी सुमन खिल उठते हैं। वह बालक केवल नन्दरानीकी शय्यापर ही नहीं, अपितु स्निग्धाओंके स्वच्छ चित्तोंमें भी प्रतिबिम्बके समान प्रस्फुरित हुआ, अतः वे शीघ्र ही रोहिणी आदिके संग आकर बालकको वैसे देखने लगीं, जैसे समुदित होते ही चन्द्रको चकोरगण देखते हैं। यशोदा यद्यपि प्रेममें स्तब्ध थीं तथापि स्मेर नेत्रोंसे बालकको देख रही थीं। व्रजपुर-पुरन्ध्रीगण कल्पना करती हैं—क्या यह नवीन इन्दीवर महान् इन्द्रनील है किंवा वैदूर्य है? अहो! यह जो बालकका स्वरूप है, वह मानो मृगमद-सौरभ और तमाल-दलसे बना हुआ है, अद्भुत लावण्यसे अभ्यक्त है, निज देहके तेजसे उद्वर्तित है, निज मुखनिर्गत कान्तिसुधासे स्नात है, सौन्दर्यसे अनुलिप्त है, त्रैलोक्य-लक्ष्मीसे समलंकृत है। चूर्णीभूत तमके समान इसके केश और चन्द्रबिम्बके समान इसका मुख है। मानो सबका मन खींचनेके लिये ही उसने मुट्ठी बाँध रखी है। यमुना-तरंगके समान चरण- कमलको चलाते हुए उस बालकको देखकर सब बहुत ही प्रसन्न हुईं और कहने लगीं—'अहो! इसे सिरपर रखें, नयनमें रखें या हृदय-मध्यमें रखें।' बार- बार उस बालकको देखकर भी नहीं तृप्त होतीं। फिर धैर्यसे किसी तरह उन्होंने स्नानादि कृत्य सम्पादित किया। श्रीमन्नन्दादि गोपोंको कृष्ण-जन्मका समाचार जब प्राप्त हुआ, तब परमानन्दमें सब विभोर हो गये। क्या भारतको वह शुभ दिन देखनेका सौभाग्य पुनः प्राप्त होगा?

श्रीकृष्णकी बालक्रीडा १९ श्रीकृष्णकी बालक्रीडा वेदान्तवेद्य, परात्पर, पूर्णतम भगवान् अपने परम प्रिय धर्मके संस्थापन तथा गो, विप्र, साधुजनोंकी रक्षाके लिये अपनी दिव्य लीलाशक्तिद्वारा अद्भुत सौन्दर्य, माधुर्य, सौगन्ध्य, सौरस्य, सौस्वर्य सुधाजलनिधि मंगलमय विग्रह धारण करके प्रकट होते हैं। भक्तोंको अभय देनेवाले विश्वान्तरात्मा भगवान्का प्रादुर्भाव प्राकृत जीवोंकी तरह नहीं होता, अपितु भौतिक धातुसम्बन्ध बिना ही मनमें उनका प्राकट्य होता है। व्यापक विरज ब्रह्मका धारण सिवा निर्मल अग्र्य मनके और किसी तरह बन ही नहीं सकता। अनन्त, अखण्ड ब्रह्मतेजको ग्रहण तथा धारण करनेसे प्राणीमें तेज, प्रागल्भ्य आदि दिव्य शक्तियाँ स्फुरित होती हैं। अतएव अचिन्त्य भगवान् श्रीवसुदेवजीके मनमें ही प्रविष्ट हुए और मनसे ही देवकीने वसुदेवजीसे श्रीकृष्णको धारण किया— 'आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः॥' 'काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥' (श्रीमद्भा० १०।२।१६, १८) जन्मोत्सवका उल्लास सकललोकनायक पुरुषोत्तमका आगमन जानकर समस्त प्रकृति अपने प्रियतम, जीवनधन प्रभुके स्वागतके लिये उतावली हो उठी। परमशोभन समय प्रकट हुआ और शान्त-दिव्य नक्षत्र तथा ग्रह-तारक आ जुटे। समस्त दिशा-विदिशाएँ प्रभु-सम्मिलनकी सम्भावनासे प्रसन्न हो उठीं। निर्मल उडुगणोंसे युक्त गगनके आनन्दकी सीमा न रही। पुर, ग्राम, व्रजसहित माधवी श्रीभूदेवीने सर्वमांगल्यसम्पन्नरूप धारण किया। सरोवर, सरिताओंका जल शीतल, निर्मल तथा सुहावना होकर कमल-कमलिनियोंकी दिव्यश्रीसे सुशोभित हो उठा। भ्रमरवृन्द, मयूर, हंस, सारस, कारण्डव, कोकिल, शुक, तित्तिर, पारावत और अनेक दिव्यवर्ण विहंगमोंके सुमधुर निनादसे उन सरित्-सरोवर तथा वनराजियोंके पुष्पस्तबक पल्लवादि सन्नादित होने लगे और पुष्पगन्धयुक्त सुखद, सुस्पर्श, सुन्दर, शीतल समीर बहने लगा। इतना ही नहीं, दुष्ट दानवोंके अत्याचारसे प्रशान्त अग्नि श्रीभगवान्का आगमन जानकर फिरसे देदीप्यमान हो उठे और आततायियोंके उत्पीड़नसे मुरझाये हुए सत्पुरुषोंके सुमनोरूप सुमनस पुनः प्रफुल्लित हो गये, देवलोकमें भी देवता दुन्दुभि बजाने लगे और ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र आदि पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे। सिद्ध, चारण आदि पवित्र मन्त्रोंसे ब्रह्माण्डनायक प्रभुका स्तवन करने लगे। किन्नर, गन्धर्वगण जगत्पावन गुणोंका गान करने लगे और विद्याधर अप्सराओंके साथ प्रभु-प्रेममें निर्भर होकर नृत्य करने लगे। ऐसे सुयोगमें देवरूपिणी देवकीमें आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र ऐसे प्रकट हुए, जैसे प्राची दिक्में पूर्णचन्द्र। पूर्णिमाको छोड़कर अन्य तिथियोंमें ठीक पूर्वा दिक्का सम्बन्ध न होनेसे चन्द्रमामें पूर्णता नहीं होती। यही कारण है कि श्रीकृष्णचन्द्रके पूर्ण प्रकाशके लिये देवकीदेवीको प्राची दिक् बतलाया गया है— 'देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः। आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥' (श्रीमद्भा० १०।३।८) श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीने भी आनन्दवर्द्धन श्रीरामचन्द्रके पूर्णतम रूपमें प्रकट होनेके लिये श्रीकौसल्यामाताको प्राची बतलाया है—'बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची।' (रा०च०मा० १।१६।४) परंतु यहाँ एक बात और है। अलौकिक अद्भुत आनन्द-सुधासिन्धु-समुद्भूत श्रीकृष्णचन्द्र जैसे सकलंक लौकिक चन्द्रसे विलक्षण हैं, वैसे ही निर्मल- विशुद्ध-सत्त्वमयी देवकीरूपा प्राची भी प्राकृत प्राचीसे विलक्षण हैं। फिर जैसे सूर्यकान्तमणिपर ही सूर्यका पूर्णरूपेण प्राकट्य होता है, वैसे वेदान्तमहावाक्यजन्य ब्रह्माकाराकारित परमसत्त्वमयी मानसी वृत्तिपर ही पूर्णतम पुरुषोत्तमका प्राकट्य होता है। अतः यहाँपर वही परम सत्त्वसमूहाधिष्ठात्री महाशक्ति देवरूपिणी श्रीदेवीकी हैं और उनमें पूर्णतम तत्त्वका ही आनन्दघन श्रीकृष्णचन्द्ररूपमें प्राकट्य हुआ है। बालरूपकी झाँकी जन्म होनेपर श्रीवसुदेवजीने एक ऐसे अद्भुत

२० भक्तिसुधा बालकको देखा, जिसके कमलदलके समान लोचन हैं और जो अपनी चार भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए है। उसका शरीर नव-नील- नीरदके समान परम सुभग-सौन्दर्य-सम्पन्न है और उसपर श्रीवत्स-चिह्नयुक्त कौस्तुभमणि तथा पीताम्बर विराज रहा है। परम-तेजोमय किरीट तथा कुण्डलकी दिव्य दीप्तिसे उसके सहस्रों कुन्तल (स्निग्ध सुचिक्कण- दीप्ति श्यामल अलकावली) आलिंगित हैं, उनमें किरीटकी दीप्तिसे ऊर्ध्व और कुण्डलोंकी दीप्तिसे निम्नभागकी अलकावली वैडूर्यमणिकी तरह नाना- छवियुक्त हो रही है। ऐसे तेजोमयी कांची आदिसे अत्यन्त शोभायुक्त बालकको विस्मयसे प्रफुल्ल नेत्रोंद्वारा देखकर श्रीवसुदेवजीने परब्रह्म परमात्माको ही अपने पुत्ररूपमें समझा और उसके जन्मोत्सवमें मनसे ही ब्राह्मणोंके लिये दस सहस्र गौओंका संकल्प कर डाला। फिर उस बालकको अपने दिव्य ब्राह्म-तेजसे सूतिका-भवनको प्रभासित करते हुए, अपने श्रीअंगकी सुभगता, श्यामलता और मधुर दिव्य दीप्तिसे नीलमणि तथा नीलेन्दीवरकोशकी सहज सुभगता और श्यामलता तथा अपरिगणित सूर्य-चन्द्रके सुमधुर दिव्य प्रकाशको लजानेवाला साक्षात् परम पुरुष परमात्मा जानकर वे विनम्र और कृतांजलि तथा प्रभावित होनेके कारण निर्भय होकर स्तुति करने लगे। स्तुति-निवेदन 'हे नाथ! मैंने आपकी मंगलमयी कृपासे ही आपको जाना। आप प्रकृतिपार सर्व-बुद्धि-साक्षी निर्मल-बोध तथा आनन्दरूप साक्षात् परम पुरुष हैं। आप ही पहले अपनी प्रकृतिसे त्रिगुणात्मक प्रपंचका निर्माणकर पश्चात् उसमें अप्रविष्ट होकर भी (क्योंकि सर्वप्रकाशक सर्वाधिष्ठान, व्यापक असंग तत्त्वका प्रवेश नहीं बन सकता) प्रविष्टके समान प्रतीत होते हैं। जैसे महदादि अविकृत भाव विकृत भूतोंके साथ मिलकर विराट्का निर्माण करते हैं और उनमें अनुगतसे प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें अप्रविष्ट ही हैं, हे नाथ! वैसे ही आप सर्वप्रकाशक, सर्वाधिष्ठान, सर्वकारण हैं। आपका विवर्त्तभूत जगत् आपमें ही है और आप स्वरूपसे असंग होते हुए भी तत्तत्प्रपंचोंकी सत्ता और स्फूर्तिरूपसे उनमें प्रविष्ट-से प्रतीत होते हैं। यहाँ तात्पर्य यह है कि कार्यसे प्रथम ही कारण सिद्ध होता है। किं बहुना कारणका ही कार्यरूपमें प्रादुर्भाव होता है। कारणसे भिन्न कार्य कुछ होता ही नहीं, फिर कार्यमें कारणका प्रवेश या परस्पर आधाराधेय भाव कैसे हो सकता है, पर तब भी कुण्डलमें सुवर्ण, पटमें तन्तु—ऐसा व्यवहार होता है। इसलिये अनिर्वचनीय कार्य और कार्यमें कारणका अनिर्वचनीय प्रवेश प्रतीत होता ही है। हे नाथ! आप रूपज्ञानादि साधनोंसे अनुमित इन्द्रियों तथा तद्ग्राह्य रूपादि विषयोंके साथ सत्ता और स्फूर्तिरूपसे विराजमान रहते हुए भी इन्द्रियादिसे अग्राह्य ही रहते हैं। जैसे चक्षुसे रूप-ग्रहणकालमें रूपके साथ विद्यमान भी रस नहीं गृहीत होता; क्योंकि इसके ग्रहणमें चक्षुकी शक्ति नहीं है, वैसे ही विषय तथा इन्द्रियादिमें विद्यमान रहते हुए भी आप इन्द्रियादिसे उपलब्ध नहीं होते; क्योंकि इन्द्रियोंमें सर्वाधिष्ठानभूत आपका प्रकाश करनेका सामर्थ्य नहीं है। परिच्छिन्न पक्षी आदिका नीडमें प्रवेश होता है, आप अपरिच्छिन्न हैं, अतः आपका बाह्य-आभ्यन्तर भाव ही नहीं बन सकता। आप सर्वस्वरूप तथा सर्वात्मा एवं परमार्थवस्तु हैं, आपका प्रवेश कैसे और कहाँ हो सकता है? यदि कोई कहे कि दृश्य-प्रपंचमें आपका प्रवेश हो सकता है सो ठीक नहीं; क्योंकि निर्विकार सच्चिदानन्द भगवान्से भिन्न दृश्य-प्रपंचमें जो सत्यत्व बुद्धि करता है, वह अविवेकी है (हेयादि दृश्य-अनुवाद वाचारम्भणको छोड़कर किसी तरहसे भी विचारसह नहीं है, किंतु तत्त्वकोटिसे अत्यन्त बहिर्भूत अविचारितरमणीय ही है)। हे नाथ! यद्यपि आप निरीह, निर्गुण तथा निर्विकार हैं तथापि तत्त्वज्ञगण सकल प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आपसे ही कहते हैं। आपके मायायुक्त और मायातीतरूपमें ये दोनों बातें विरुद्ध नहीं हैं। अर्थात् आपके मायायुक्तरूपसे अनन्त ब्रह्माण्डके सृष्ट्यादि होते हैं और मायातीतरूपसे आप निरीह निर्गुण भी हैं। वस्तुतः आपके आश्रित रहनेवाली मायाके समस्त

श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २१ विलास आपमें औपचारिक दृष्टिसे व्यपदिष्ट होते हैं। त्रिलोकी-पालनके लिये आप ही सत्त्वका अवलम्बन करके शुक्लरूपको धारण करते हैं और उत्पादन तथा संहारके लिये रक्त और कृष्णरूप धारण करते हैं। हे विभो! आप इस लोककी रक्षाके लिये ही मेरे गृहमें अवतीर्ण हुए हैं और आप असुर-यूथपोंकी सुसज्जित बड़ी-से-बड़ी सेनाओंका वध करके भू- भारका अपनयन करेंगे; परंतु आपके अग्रजोंका वध करनेवाला यह कंस तो अभी ही आपका जन्म-श्रवण करते ही शस्त्र लेकर आयेगा। इस तरह श्रीवसुदेवजीकी स्तुति समाप्त होनेपर देवकी भी महापुरुष-लक्षण-सम्पन्न पुत्रको देखकर तथा कंससे भयभीत होकर स्तुति करने लगी—'जिस अव्यक्त, आद्य, निर्विकार, निर्गुण ब्रह्मज्योतिको वेद निर्विशेष, निरीह तथा सत्तामात्र बतलाते हैं, वह समस्त कार्य-कारण, अध्यात्मके प्रकाशक, व्यापक विशुद्ध ब्रह्म आप ही हैं। कालचक्रके वेगमें समस्त प्रपंचका विलयन हो जानेपर भी एक आप ही अवशिष्ट रहते हैं। हे प्रकृति-प्रवर्तक प्रभो! यह कालचक्र भी केवल आपकी ही लीला है। अतः नाथ! मैं आपके प्रपन्न हूँ। हे नाथ! मरणधर्मा प्राणी मृत्यु-व्यालसे भीत होकर पलायन करता हुआ समस्त लोकोंमें गया, परंतु कहीं निर्भय न हुआ, पर जब कभी वह आपकी कृपासे आपके श्रीचरणोंको प्राप्त करता है, तभी स्वस्थ होकर सुखकी नींद सोता है, फिर तो मृत्यु उससे बहुत दूर रहती है। हे नाथ! आप हम सबकी इस कंससे रक्षा करें और साथ ही यह भी प्रार्थना है कि यह ध्यानास्पद स्वरूप सर्वसाधारणको दृष्टिगोचर न हो और कंस मुझमें हुए आपके जन्मकी बात न जाने।' इस तरह नाना प्रकारसे वसुदेव और देवकीका स्तवन श्रवणकर उनके पूर्वजन्मकी तपस्या तथा वर- प्राप्तिकी बात बताकर एवं अपनेको नन्दके घर पहुँचानेका संकेत करके माता-पिताके देखते-देखते ही अपनी दिव्य योगमायाके प्रभावसे श्रीकृष्ण शिशु रूपमें व्यक्त हो गये। भगवान्‌के संकेतसे ज्यों ही श्रीवसुदेवजीने अपने शिशुको नन्दके घर पहुँचानेका मन किया, त्यों ही श्रीवसुदेवजीके चरणोंके बन्धन शिथिल हो गये और पहरेदार सो गये। वज्रमय कपाट भी खुल गये। जिस समय श्रीवसुदेवजी बालकरूप परमपुरुषको लेकर चले, नागराज श्रीशेष अपने सहस्त्र फणोंसे छाया करते हुए साथ चले और श्रीयमुनाजी गाध हो गयीं। इस तरह श्रीयोगमायाकी सहायतासे श्रीवसुदेवजीने श्रीमन्नन्दरायके मंगलमय भवनमें, जिसका द्वार खुला था, पहुँचकर प्रसुप्त श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीकी शय्यापर अपने सर्वस्व पुत्ररत्न किंवा अन्तरात्माको ही लिटा दिया और कन्यारूपमें श्रीयशोदाजीसे उत्पन्न योगमायाको लेकर वे अपने स्थानको लौट आये। श्रीवसुदेवके चले जाने तथा योगमायाका प्रभाव मिट जानेपर सब लोग प्रबुद्ध हो गये— ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्। नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ यशोदाजीको बालरूपके दर्शन श्रीव्रजेन्द्रगेहिनीने प्रबुद्ध होकर नीलोत्पलदल- श्याम मनोहर पुत्रको देखा और वे अत्यन्त हर्षको प्राप्त हुईं। इस समयकी बालकृष्णकी शोभा या छविका कहना ही क्या है! भगवान् दिव्यातिदिव्य महेन्द्र नीलमणि तथा अति दिव्य नीलकमल, किंवा नील नीरधर या मयूरपिच्छचन्द्रकसे कोटिगुणित सुन्दर, श्यामल, कोमल, गम्भीर एवं दीप्तिमान् हैं और अपने अमृतमय मुखचन्द्रकी दिव्य छविसे अनन्त कोटि चन्द्रमाओंको लजानेवाले हैं। लोकातीत कमलदल- सरीखे मनोहर नयन हैं और कल्पतरुके सुकोमल नवल दलकी मृदुता एवं मनोहरताको प्रहसन करनेवाले अंघ्रि-पल्लव हैं। श्रीव्रजेन्द्रगेहिनी यशुमति अपने मधुरतम ललन श्रीकृष्णको देखकर कल्पना करती हैं, क्या यह श्यामल महोमय परतत्त्व श्याममय प्रकाश- पुंजोंका साम्राज्य है, किंवा रूपरत्नाकरोंकी दिव्यनिधि है, किंवा लावण्यामृतमाणिक्यका परम सौभाग्य है, किंवा तत्तत् अंगावलियोंका सुशोभित सिद्धान्त है। यशोदानन्दन श्रीश्यामसुन्दरके सुमधुर स्वरूपका अनुभव करके भगवद्भक्त कवीन्द्रगण भी कल्पना करते हैं कि श्रीव्रजेन्द्रगेहिनी यशोदाके अंकमें विराजमान

२२ भक्तिसुधा श्रीकृष्ण मानो अद्भुत कुवलय अर्थात् रात्रिविकासी पंकज हैं। वह पंकज भी जलीय सरोवरके साधारण पंक या क्षीरसरोवरके नवनीतमय पंकसे जायमान नहीं है, किंतु पूर्णानुरागरससार सरोवरके सारमय पंकसे उत्पन्न होनेवाला पंकज है। यह ऐसा अलौकिक कुवलय है कि आजतक भृंगोंने इसका आघ्राण एवं मकरन्द-पान नहीं किया। अर्थात् भक्तोंने अबतक श्रीमन्नारायणके ही रूपमाधुर्यका आस्वादन किया, पर इन यशोदोत्संग-लालित श्रीकृष्णका माधुर्यामृत पान नहीं किया और अनिलोंने अभीतक इस पंकजका सौगन्ध्य भी नहीं हरण किया। अभिप्राय यह है कि कवीश्वरोंने अबतक नारायणके यशका ही वर्णन किया है, अतः यह उनके लिये भी अपूर्व ही है और यह नीरमें उत्पन्न होनेवाला भी नहीं अर्थात् प्रपंचमें श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव ही नहीं है। तरंगोंने भी इस पंकजको आहत नहीं किया है अर्थात् मायामय गुणोंके तरंगोंसे यह असंस्पृष्ट है और आजतक किसीने कहीं भी इस अद्भुत कमलको देखा भी नहीं है या वैकुण्ठवासियोंने भी इस तत्त्वका दर्शन नहीं किया है अथवा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दके श्रीअंगका ऐसा अद्भुत नित्य नवनवायमान माधुर्य है कि भक्तगण अनादि कालसे उसका आस्वादन करते हुए भी उसको प्रतिक्षण अभिनव एवं अपूर्व ही समझते हैं, वैसे रसिकजन भी सदा ही श्रीकृष्णके सुमधुर यशका वर्णन करते हैं, पर तब भी उन्हें प्रतिक्षण उसमें अपूर्वताका ही भान होता है— अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दसरसो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत् ॥ (आनन्दवृन्दावनचम्पू) व्रजांगनाओंको माधुर्यरूप बालप्रभुका दर्शन श्रीनन्दरानी मृदु मधुर विश्व-मोहन शिशु- रुदनको सुनकर प्रेमानन्दमें चित्रलिखित-सी रह गयीं। योगमायाका प्रभाव मिट जानेपर शिशु-रुदनसे आकर्षित होकर स्निग्ध व्रजयुवतीजन समीप आयीं। जैसे चन्द्रमाका अभ्युदय होते ही व्यवधानयुक्त भी (साक्षात् चन्द्रिका-सम्बन्ध न होनेपर भी) कुमुदिनी प्रफुल्लित होती है, वैसे ही श्रीकृष्णचन्द्रके अभ्युदयमात्रसे परमानन्दवती स्निग्धाओंके सुमनस (शोभन मन) प्रफुल्लित हो उठे। श्रीकृष्ण केवल श्रीयशोदाकी शय्यापर ही नहीं, अपितु व्यवधान होनेपर भी स्निग्धोंके स्वच्छ चित्तपर भी प्रतिबिम्बकी तरह स्फुरित हुए। नवनील नीरधरके समागममें चातकीके समान प्रहृष्ट होकर व्रजांगनाएँ शीघ्र ही समीप आकर रोहिणी आदिके साथ बालकको देखने लगीं। जैसे अभ्युदित होते हुए पूर्ण चन्द्रमाको उत्कण्ठित होकर चकोरीगण देखती हैं, वैसे ही व्रजांगनागण श्रीकृष्णको सतृष्ण निर्निमेष नयनोंसे देखती हुई सोचती हैं कि क्या यह अद्भुत अलौकिक नीलकमलमय माल्य है, किंवा अलौकिक इन्द्रनीलमणि है अथवा विचित्रच्छविका सुमधुर वैदूर्य है। अहो! यह बालक अनुपमेय और अज्ञेय है। इस बालकके तनु और सर्वेन्द्रियोंकी रचना नयनोंकी निर्द्वन्द्वताका विस्तार करती है। अहो! मानो इस बालकके श्रीअंग मृगमद-सौरभ तथा तमाल-दलसारसे अभ्यंजित हैं, मानो निखिल- ब्रह्माण्डव्यापी लावण्यामृतसारसे ही इस बालकके श्रीअंगमें उबटन हुआ है और निजांगतेजसे ही यह नहलाया गया है। मानो निज-मुखचन्द्रसे विनिःसृत कान्ति-सुधासे ही इसका अनुलेपन हुआ है एवं मंगलमय लक्ष्मीसे ही इस बालकका अंग भूषित किया गया है। अथवा इस बालकके सुन्दर अंगोंमें मानो अति सुगन्धित स्नेह (तेल या प्रेम)-से अभ्यंग हुआ है और सौरभ्य (विश्वव्यापी सौगन्ध्यामृतसार)-से उबटन हुआ है, माधुर्यामृतसारसे स्नान कराया गया है और लावण्यसारसे मार्जन किया गया है। सौन्दर्यसारसर्वस्वसे अनुलेपन और त्रैलोक्य-लक्ष्मीसे ही इसका शृंगार हुआ है। अभ्यंग-स्नान-मार्जन आदिसे लोकमें यत्किंचित् स्निग्धता-मधुरता-लावण्यादिका सम्पादन होता है, यहाँ तो स्नेह-माधुर्य-लावण्य-सौन्दर्यादि सुधासार-

श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २३ सर्वस्वसे ही अभ्यंग आदि हुआ है। यह बालक मानो अभिनव नीलमणीन्द्रका अंकुर है अथवा श्यामल तमालका सुभग मृदुल पल्लव है अथवा मानो नवाम्भोदका अति स्निग्ध कन्दल है या त्रैलोक्य- लक्ष्मीका अत्यन्त उत्कृष्ट और सुरभित कस्तूरिका- तिलक है किंवा सौभाग्यसम्पत्तिका अति चिक्कण एवं सर्वाकर्षण-सम्पन्न सिद्धांजन है। क्या यह बालक सुरभित श्यामल मृगमद कर्दम है या श्यामामृत- महोदधिके मन्थनसे समुद्भूत अति स्निग्ध और मधुर नवनीतपिण्ड है अथवा मृगमद-रससे श्यामलीकृत शुद्ध दुग्धफेनखण्ड या सौन्दर्य-माधुर्य सुधाजलनिधिका रत्न है किंवा सुछवि युवतीका ललित लोचन है। श्रीनन्दरानीद्वारा पयःपान कराना पहले तो श्रीनन्दरानी बालकके दिव्यांगमें अपना प्रतिबिम्ब देखकर ‘यह कौन है’ ऐसी शंकासे व्याकुल हो उठीं और सोचने लगीं कि ‘क्या प्रसवके समय मेरा रूप धरकर यह कोई योगिनी आ गयी है।’ पश्चात् नृसिंह मन्त्र जपती हुई, उससे ‘दूर हो’ ऐसा कहती हैं। तत्पश्चात् दीर्घश्वासके सम्बन्धद्वारा निजप्रतिबिम्ब मिटनेपर श्रीव्रजरानीने उस अद्भुत बालकको देखा, जिसका अंग मृगमदसार-पंकके समान अत्यन्त सुकोमल है, जिसका मुखचन्द्र चूर्णित घनान्धतमकी तरह स्निग्ध श्यामल अलकावलीसे शोभित है और जो मानो सबके मनको आकर्षित करनेके लिये ही दोनों हाथोंकी मुट्ठी बाँधे हुए कालिन्दी-तरंगकी तरह चरणको चला रहा है। स्वयं परम कोमलांगी होती हुई भी अंकमें लेनेसे भयभीत होती हैं कि कहीं मेरे कठोर अंगसे बालकका सुकुमार शरीर पीड़ित न हो, अपने पयोधरके अग्रको उसके अधरपुटमें रखकर वे पयःपान कराने लगीं। फिर व्रजपुरन्ध्रियोंके शिक्षानुसार श्रीकृष्णको गोदमें लेकर मूर्त अमृत-रसकी तरह स्तन-रस पिलाने लगीं। स्नेहके आवेगसे दुग्ध अधिक प्रसृप्त होकर मृदुल बिम्बाधरके प्रान्तसे कपोलतलको आप्लावित करने लगा, तब श्रीव्रजरानी सादर सस्नेह सुकोमलतर आँचलसे उसको पोंछने लगीं। श्रीव्रजरानीकी समस्त सखियाँ बालकको देखकर प्रमुदित होती हैं और विचार करती हैं—‘अहो! इस शिशुको सिरपर धारण करें किंवा नयनोंमें धारण करें किंवा हृदय या हृदयके मध्यमें इसे बिठला लें।’ फिर देखती हुई कल्पना करती हैं, मानो देदीप्यमान नीलमणिसे इस बालकके सर्वांगका निर्माण हुआ है। कुरुविन्द (अरुण कान्तिवाले मणि)-से बिम्बाधर एवं पद्मरागसे श्रीचरण और हस्त तथा पक्व दाड़िम- बीजके समान शिखरमणिसे नखोंका निर्माण हुआ है, अतः क्या यह मणिमय बालक है? पुनः बालकके श्रीअंगकी कोमलताका अनुभव करके कठिन मणि- मयत्वकी कल्पनाको अनुचित समझकर दूसरी कल्पना करती हैं, मानो नीलेन्दीवरसे बालकके सकल अवयवोंका, बन्धूकसे बिम्बाधर ओष्ठका, जवाकुसुमसे पाणिपादका और प्रान्तरत्न मल्ली-कोरकसे नखसमूहका निर्माण हुआ है, अतः क्या यह कुसुममय बालक है? फिर सोचती हैं कि क्या वस्तुतः अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्य-माधुर्य-बिन्दुका उद्गमस्थान और अचिन्त्य अनन्त सौन्दर्य-माधुर्य-सुधासिन्धु-सार-सर्वस्व किंवा सकेलि सुषमा और शोभासारको ही लेकर किसी अद्भुत अलौकिक जगन्मोहन कामने ही अपने सु- करकमलसे इस बालकका निर्माण किया है! श्रीव्रजेश्वरीका बालकृष्णके मनोरम अंगोंको देखकर मुग्ध होना श्रीव्रजेश्वरी अपने ललन श्रीबालकृष्णको स्नेहस्रुत पयोधर पिलाती हुई दक्षिण वक्षःस्थलमें मृणालतन्तुके समान स्वच्छ सुभग सुस्निग्ध दक्षिणावर्त रोमराजिस्वरूप श्रीवत्सचिह्नको देखकर स्तनरस-कणोंके निपात- विन्यासको समझकर मृदुल अंचलसे पोंछती हैं, परंतु पोंछनेपर भी जब वह न मिटा, तब यह कोई ‘महापुरुष-लक्षण है’ ऐसा चिन्तन करने लगीं। पुनः वक्षःस्थलके वामभागमें स्वर्णसरीखे वामावर्त रोमराजीरूप लक्ष्मीचिह्नको देखकर कल्पना करती हैं, क्या यह सुकोमल नवल तमाल-पल्लवपर बैठी हुई अतिसूक्ष्म पीतवर्णकी कोई विहंगी है या अति सुन्दर स्निग्ध

१. प्रथम तरंग: भक्ति-स्वरूप, लक्षण, साधन-भक्ति एवं प्रमाण-मीमांसा

२४ भक्तिसुधा नीलाम्बुदके अंकुरपर शोभायमान सुन्दर विद्युत्कलिका है या किसी दिव्य कसौटीपर रंजित कनक-रेखा है। अरुण-कमलके सदृश मुख, श्रीहस्त और चरणसहित दीप्यमान श्यामल सर्वांगको देखकर समझती हैं कि यह चार-पाँच अरुण कमलकोशसे संयुक्त सुन्दर यमुना-तरंग हैं। अमृतमय मुखचन्द्र और सुन्दर अलकावलियोंको देखकर श्रीनन्दरानी कल्पना करती हैं कि यह क्या सौन्दर्य-माधुर्यमय मादक मधुका अधिक पान कर लेनेसे उन्मदान्ध अतएव भ्रमणमें असमर्थ निश्चल मधुकरसमूह है, किंवा स्निग्ध-श्यामल गाढान्धकारके अंकुर-समूह ही अलक-समूहरूपमें भासमान हो रहे हैं! नयनोंको देखकर उनमें मुकुलित नीलोत्पलकी कल्पना और सुन्दर युगल कपोलोंमें दिव्य नीलमणिमय जलके विशाल बुद्बुदकी कल्पना करती हैं और अति-सुभग युगल श्रवणको देखकर उनमें श्यामल महो (तेजो)-मयी लतिकाके अभिनवोन्मिषित युगल पल्लवकी कल्पना करती हैं। तिमिर-द्रुमके अंकुरके समान नासाशिखर, यमुनाके बुद्बुदके समान दोनों नासापुट, द्विदल जवाकोरकके समान अधर, ओष्ठ परिपक्व तथा छोटे-छोटे यमल (सहजात या युग्म) जम्बूफलके समान चिबुक (ठोढ़ी)-को निरीक्षणकर नयनोंके फलको पाकर व्रजरानीने आनन्द-जलधिमें अपनी आत्माको अवगाहन कराया। बालदर्शनसे श्रीनन्दरायजी आनन्दमूर्च्छित हो गये इतनेमें ही श्रीमन्नन्दरायके समीप जाकर व्रजपुरपुरन्ध्रियोंने पुत्रजन्मका मंगल-सन्देश सुनाया। ग्रीष्मसे सूखे हुए सरोवरको अमृत-धाराओंसे सरस करते हुए अद्भुत मधुर घन-गर्जनकी तरह पुत्रजन्म- श्रवण करते ही श्रीमन्नन्दराय जैसे हर्षवर्षामें स्नानकर, अमृत-महार्णवमें प्रविष्ट होकर, आनन्द-मन्दाकिनीसे आलिंगित होकर बालकके अवलोकनके लिये उत्कण्ठित हो उठे। यद्यपि आनन्द-मूर्च्छाके समय सूतिका- भवनमें प्रवेश असम्भव था तथापि स्वयं उपस्थित मूर्त्तिमान् ब्रह्मानन्द चमत्कारने ही श्रीव्रजराजके श्रीहस्तको पकड़कर सूतिका-भवनमें पहुँचाया। फिर भी स्खलन सम्भव था, अतः समुचित सुकृतसमूह चातुर्य ही आकर्षण करता हुआ सूतिका-भवनकी ओर ले चला। इतना ही नहीं, आनन्द-मूर्च्छाके पश्चात् उत्पन्न होनेवाली उत्कण्ठाने अपने दोनों हस्तोंसे पृष्ठकी ओर प्रेरित किया। इस तरह इन सबकी सहायतासे सूतिका- भवनमें पहुँचकर यशोदोत्संगलालित श्रीकृष्णको देखकर वे विचार करने लगे कि क्या यह अखण्ड सान्द्रानन्दका बीज है, किंवा जगन्मंगल मंगलोदयका अंकुर है अथवा सिद्धांजनलताका पल्लव है या चिरतर-समय- समुत्पन्न सुकृतकल्पमहीरुहा-रामका कुसुम है अथवा समस्त उपनिषद् कल्पलता-श्रेणीका सुन्दर फल है, किंवा श्रीव्रजेश्वरीकी श्रीअंगररूपा अपराजितालताका ही कुसुम है। इस तरह अभिनव बालकको देखकर श्रीनन्दराय मानो सर्वमनोरथ-सम्पत्तिसे सिद्ध हो गये, आनन्द साक्षात्कार चमत्कारसे विक्षिप्त हो गये या लिखित चित्रकी तरह जड़ीकृत हो गये। भगवान्का जातकर्म-संस्कारोत्सव इस प्रकार प्रथम आनन्द-मूर्च्छामें प्रसुप्त होनेके बाद श्रीकृष्ण-दर्शन-सुखका अनुभव करानेके लिये चेतनादेवीने ही इन्हें प्रतिबोधित किया। उज्जृम्भमाण विपुल आनन्दसे पुलकावली और आनन्दवाष्पकणनिकर- निपात आदिसे लक्षित किसी अलौकिक दशाको प्राप्त होकर सनन्द, उपनन्द, सन्नन्द आदि तथा विप्रगणसहित पुरोधससे जातकर्मादि संस्कार कराकर अपार सम्पत्ति रत्न-मणि-भूषण-वसन-गोधनादिका उन्होंने दान दिया। श्रीमन्नन्दरायके दान-कालमें चिन्तामणि, कल्पतरु, कामधेनुओंके समुदाय शक्तिहीनसे हो गये, रत्नाकरोंमें नाना मत्स्यादिमात्र ही शेष रह गये, किं बहुना त्रैलोक्य-लक्ष्मीके भी पास लीला-कमल ही अवशिष्ट रहा। श्रीव्रजराजकुमार श्रीकृष्णका जन्म हुआ, यह मंगलमय ध्वनि मुखोंमुख, मार्गोंमार्ग, कानोंकान सर्वत्र फैल गयी और सब सोचने लगे कि श्रीयशोदा अद्भुत कल्पलता है, जिसमें भगवत्प्रकाश-रूप दिव्य फल प्रकट

श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २५ हुआ। मूर्तिमती वात्सल्य-रसाधिष्ठात्री महालक्ष्मीके समान तथा चलती-फिरती तेजोमयी मंजरीके समान अपने कुलको यश देनेवाली श्रीयशोदा धन्य है। इस तरह अपने मधुर चरित्रोंसे अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्र आत्मारामोंको भक्तियोगमें लगाने (प्रवृत्त करने)-के लिये और नर-लीला रसकी रचनासे अपने भक्तोंको आनन्दित करनेके लिये श्रीव्रजराजके भवनमें मूर्त्तानन्द श्रीकृष्णचन्द्र प्रकट हुए। मुक्त मुनियोंके अभिलषित परमानन्दसार-सर्वस्व श्रीकृष्ण-फलको श्रीदेवरूपिणी श्रीदेवकीने उत्पन्न किया, श्रीव्रजेन्द्ररोहिणीने उसका प्रकाशन तथा पालन किया और श्रीव्रजांगनाओं एवं तदीय चरणाम्बुजानुरागियोंने उस सुमधुर फलका सम्यक् सम्भोग किया— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः ॥ श्रीगर्गजी

२६ भक्तिसुधा

श्रेणी और मधुर अक्षरोंकी चित्र-श्रेणीने माँको चित्र- सा कर दिया। शुकके समान बालभगवान् धात्रीजनोंसे बोलना सीखते हैं और तर्जनीसे प्रश्न करते हैं। शनैः- शनैः बलराम 'कृष्ण' और कृष्ण बलरामको 'आर्य' कहने लगते हैं। जब माता कहीं जानेसे मना करनेके लिये डराती हैं, तब दोनों वहाँ जानेके लिये कौतुकवशात् प्रवृत्त होते हैं। 'चंचल चल ना ना' माताके ऐसे वाक्यको सुनकर छद्मसे हँसते-हुए लौटकर दोनों माताको निवृत्त करते हैं और फिर उसी वाञ्छित कार्यमें लग जाते हैं— नैव नैव चल चंचल रे रे वाक्यमेतदवकर्ण्य जनन्याः। मायया स्म परिवृत्य हसित्वा तां निवर्त्य ललिते रविवर्ति ॥ अत्यन्त आसक्ता माता कभी हँसते, कभी रोते हुए दोनों शिशुओंको पकड़कर घरमें लाती हैं और उबटन-अभ्यंग, वेश-परिवर्तनादि श्रृंगार करके सुलाती हैं। कभी दोनों जानु तथा हस्तोंसे चलते हुए शुभ्र पाषाणमय स्थलमें अपने अंगका प्रतिबिम्ब देखकर बालक चकित होते हैं और उसे पकड़ने दौड़ते हैं, पर जब प्रतिबिम्ब मूर्ति भी उन्हें पकड़ना चाहती है, तब आप संकुचित होकर साशंक माँके अंकमें छिप जाते हैं। कभी स्फटिक तथा महेन्द्र नीलमणिके समान श्यामगौरदिव्य तेजवाले चन्द्रमा और नवनील नीरदांकुरकी तरह, पुण्डरीक-नीलोत्पलकी तरह, ज्योत्स्नाशकल और तिमिरसार-शकलके समान राम तथा कृष्ण दोनों व्रजकर्दममें आनन्दसे खेलते हैं। एक-दूसरेकी दिव्य- दीप्तिसे श्याम-गौर दोनों तेजोंका विनिमय होने लगता है। कभी दृप्त वृषभादिकोंके सामने निःशंक दौड़ते हैं, कभी व्यालोंको पकड़ना चाहते हैं तो कभी अग्निशिखापर आक्रमण करना चाहते हैं। नवनीतचोरी-लीला एक दिन अपने ही भवनमें श्रीश्यामघन नवनीत चुरा रहे थे। इतनेमें ही मणिमय स्तम्भके भीतर अपनी ही साँवली सलोनी मंगलमयी मूर्तिको देखकर उसीसे कहते हैं कि 'मेरी माँसे चोरी न बताना, बराबर हिस्सा भले ही बँटवा लो।' इन वचनोंको माता एकान्तमें चुपके सुन रही थी। कौतुकात् जननीके पास आ जानेपर कृष्ण अपने अंग-प्रतिबिम्बको दिखलाकर कहते हैं—'माँ, यह कौन है? लोभसे नवनीत चुरानेके लिये घरमें घुसा है। मेरे मना करनेपर भी नहीं मानता, डाँटनेपर यह भी बिगड़ने लगता है। माँ, तू तो जानती है कि मुझे माखन अच्छा नहीं लगता।' किसी दूसरे दिन माँको किसी और काममें व्यग्र देखकर फिर आप नवनीत चुराने पहुँच गये। माँ आकर देखती और पूछती है कि कृष्ण कहाँ है? यह सुनकर आप कहते हैं कि 'मैया, कंकणके पद्मराग-तेजसे मेरा हाथ जल रहा है, इसीलिये उसे नवनीतभाण्डमें छोड़कर शीतल कर रहा हूँ।' ऐसे मनोहर कर्णरम्य वचनोंको श्रवण करके माता कहती है—'आओ, वत्स! आओ, देखूँ तो तेरा हाथ कैसे तप रहा है?' कृष्ण हाथ फैलाते हैं। उसका चुम्बन करके माता कहती है—'सचमुच हाथ जल रहा है, यहाँसे पद्मरागको दूर करो।' मैया, मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों एक दिन पूर्ण-चन्द्रिकासे धौत अपने मणिमय प्रांगणमें व्रज-देवियोंके साथ गोष्ठी करती हुई व्रजरानी विराजमान थीं। वहाँ श्रीकृष्णने चन्द्रमाको देखा और पीछेसे आकर सिरसे खिसके हुए पटपर माताकी स्खलित वेणीको पकड़कर कहने लगे कि 'माँ, मैं इनको लूँगा।' बालकको गद्गद-कण्ठ देखकर माँ स्नेहार्द्रचित्त हो गयी और अपने पास बैठी हुई सखियोंपर दृष्टि डालकर कहने लगी कि 'तुम्हीं पूछो, यह क्या माँगता है?' विनय, प्रणय, स्नेहसहित वे पूछती हैं, 'बेटा, क्या क्षीर चाहते हो?' कृष्ण 'नहीं'। तब फिर क्या 'सुन्दर दधि ?' 'नहीं।' 'फिर क्या कूर्चिका ?' 'नहीं-नहीं।' 'तब क्या आमिक्षा?' 'अरे नहीं'। 'तब बेटा, क्या नवनीत लोगे?' 'उँहूँ।' 'तब फिर क्यों मचलते हो और माँको कुपित करते हो?' श्रीकृष्ण अँगुली उठाकर चन्द्रको दिखलाते हुए कहते हैं कि 'मैं तो वह नवनीत-खण्ड लूँगा।' किं क्षीरं न किमुत्तमं दधि न ना किं कूर्चिका वा न ना- मिक्षा किं न न किं तवेप्सितमहो हैयङ्गवीनं घनम्। दास्यामो न विषीद वत्स नतरां कुप्यस्व मात्रे गृहो- त्पनेनारुचिरित्युदङ्गुलिदलः शीतांशुमालोकयन् ॥ व्रजदेवियाँ कहती हैं कि अरे बेटा, यह नवनीत

श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २७ नहीं है, व्योमवीथी-तड़ागमें यह कलहंस है। कृष्ण— 'तब तो फिर इसीके साथ खेलूँगा, देखो कहीं भाग न जाय' ऐसा कहकर भूमिपर चरणयुगलोंको नचाते हुए बड़ी उत्कण्ठासे व्रजदेवियोंके कण्ठमें लिपट जाते हैं और कहते हैं—'मेरे लिये इसे ला दो।' जब वे बाल्यावेशसे रोने लगते हैं, तब कुछ व्रजदेवियाँ कहती हैं—'बेटा! इन लोगोंने प्रतारण किया है। यह कलहंस नहीं, पीयूष-रश्मि चन्द्रमा है।' इसपर कृष्ण फिर कहते हैं—'मैं उसीको खेलनेके लिये माँग रहा हूँ।' बालकको जोरोंसे रोते देखकर माँ गोदमें उठा लेती है और कहती है—'लाल, यह न राजहंस है, न चन्द्रमा; वह नवनीत ही है, पर दैवात् उसमें विष मिल गया है, उसे कोई खाता नहीं है।' कृष्णने उत्सुक होकर पूछा—'माँ, विष क्या होता है ? वह इसे कैसे लग गया ?' पूर्व आवेश छोड़कर रसान्तरको प्राप्त श्रीकृष्णकी कथा-श्रवणमें जिज्ञासा देखकर माता सोचती है कि चलो अच्छा ही हुआ। फिर आलिंगन करके मधुर स्वरमें कहती है—'बेटा, एक क्षीरसागर है।' झट कृष्ण पूछ बैठते हैं—'वह कौन है ?' माता उत्तर देती है—'जैसे यह दूध दिखायी देता है, वैसे ही दूधका समुद्र है।' पर बालकृष्णको इस उत्तरसे सन्तोष कहाँ ? वे फिर पूछते हैं—'माँ, कितनी गौओंके स्तनोंसे इतना दूध निकला कि समुद्र बन गया ?' यशोदा उत्तर देती हैं—'वत्स, वह गो-दुग्ध नहीं है।' यह बात बालककी समझमें नहीं आती है। वह कहता है—'बस रहने दे माँ, झूठी बातें मत बना। भला बिना गौओंके भी कहीं दूध होता है ?' इसपर हँसते हुए माँ कहती है—'बेटा, जिसने गौओंमें दूध रचा है, वही बिना उनके भी क्षीरसागर रच सकता है।' कृष्ण 'माँ, वह कौन है ?' माता 'वह भगवान् हैं, जो सब संसारके कारण हैं।' कृष्ण 'माँ, फिर भगवान् कौन हैं ?' माता 'वत्स, वे अजन्मा हैं।' इसपर कृष्ण चुप हो जाते हैं और यशोदा कथा आगे बढ़ाती है। 'बेटा, एक बार देवताओं और असुरोंके विवादमें असुरोंको मोहन करनेके लिये उन्हीं भगवान्ने क्षीरसागरका मन्थन किया था। वहाँ मन्दराचल मथानीका दण्ड और नागराज वासुकि रज्जु बने थे, जिसको एक ओरसे देवता और दूसरी ओरसे असुर खींचते थे।' इसपर कृष्ण बीचहीमें बोल उठे 'जैसे गोपांगनाएँ दधि मथती हैं।' 'हाँ' कहकर माता फिर कथा सुनाती है, 'क्षीरसागर मथनेपर उसमेंसे कालकूट नामका विष निकला।' कृष्ण 'दूधमें कहीं विष होता है ? वह तो माँ सर्पमें होता है।' माता—'अरे, सुन तो बेटा, देवताओंकी प्रार्थनापर उस कालकूट विषका भगवान् शंकरने पान किया। उस समय विषके जो बिन्दु गिर पड़े थे, उन्हींको पीकर भुजंग विषधर बन गये। यह उसी भगवान्की शक्ति है, जिससे दुग्धमें भी विष हो गया। यह नवनीत-खण्ड (चन्द्र) भी उसी क्षीरसागरके मन्थनसे निकला था, इसीलिये इसमें विषका अंश है। तभी तो लोग इसमें कलंक मानते हैं। इसके लिये हठ न करके घरका नवनीत खा लो बेटा!' यह कथा समाप्त भी न होने पायी थी कि भगवान् कृष्ण 'हूँ' 'हूँ' करते सो गये। नर्तन और वेणुवादन-लीला कभी व्रजदेवियाँ कहती हैं, 'हे कुलेश लाल, रे मोहन, बलिहारी जाऊँ नेक थि, थि, नाचो तो।' यह सुनकर ताल एवं लयसे भगवान् नाचते हैं। निर्मञ्छनं तव भजाम कुलेशलाल्य बाल्यातिमोहन बलानुज नृत्य नृत्य। इत्यङ्गनाभिरसकृत्थि थि थीत्थि थीत्ति क्लृप्तेन तालवलयेन हरिनर्नर्त॥ मुग्ध होकर जब व्रजांगनाएँ कहती हैं कि 'वाह, वाह, कितना सुन्दर नाच है', तब और नाचते हैं, परंतु जब वे सौष्ठव तथा स्खलनमें मुदित होकर हँसने लगती हैं, तब लज्जित होकर श्यामसुन्दर माँकी गोदमें भाग जाते हैं। कभी वे गोपियोंके कहनेपर माताके समीप वेणु बजाते हैं। 'निर्मञ्छनं तव नयामि मुखस्य तात वेणुं पुनर्ललन वादय वादयेति। ऊचुर्यदा स जननीजनकोपकण्ठे तं वादयन्नथ तदा सरसीकरोति।' श्रीकृष्णभगवान्की बाल-लीलाएँ अनन्त हैं। उनका वर्णन कहाँतक किया जाय। यह सारा विश्वप्रपंच उनकी लीला ही तो है।

२८ भक्तिसुधा भगवान्‌का मंगलमय स्वरूप भगवान् सर्वथा अनुपमेय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके दिव्य मंगलमय विग्रहकी तापहारिणी अपारसौन्दर्यशालिनी कान्तिको चन्द्रमाकी उपमा दी जाती है, पर भगवान्‌का रूपसौन्दर्य अप्राकृत होनेसे प्राकृत चन्द्र उपमान वहाँ ठीक नहीं घटता। तथापि लोकमें सबसे अधिक पूर्णचन्द्र ही प्राणियोंके मनको हरण करनेवाला है। प्राकृत जनोंकी दृष्टिमें अन्य कोई अप्राकृत वस्तु नहीं आ सकती। इसलिये चन्द्रमाकी उपमा दी जाती है, पर एक चन्द्रमासे काम नहीं चलेगा। अनन्त कोटि चन्द्रोंकी कल्पना कीजिये और ऐसे अपार चन्द्रसागरका मन्थन करके जो सारातिसार तत्त्व निकले, उस तत्त्वको पुनः मथकर उससे जो सारातिसार तत्त्व निकले, इस प्रकार शतधा मन्थन करके जो सारातिसार चन्द्रतत्त्व निकले, उस चन्द्रका उपमान भगवान्‌में है। यह चन्द्रका उपमान भगवान्‌की उस तापहारिणी शीतल ज्योत्स्नामें है। उनके दुर्निरीक्ष्य तेजका वर्णन गीतामें हुआ ही है कि— दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ (गीता ११।१२) अस्तु, भगवान्‌की शान्तिदायिनी शीतल ज्योत्स्ना सारातिसार तत्त्वरूप चन्द्रके समान है, पर चन्द्रमें कलंक है और चन्द्र क्षय-वृद्धिशील है। भगवान्‌की दिव्य ज्योत्स्ना अमृतमय सारातिसार चन्द्र-तत्त्वके समान है, वह निष्कलंक है, निर्विकार है, उससे भावुकोंको प्रतिक्षणवर्धमान प्रेम प्राप्त होता है। वह ऐसा अद्भुत सौन्दर्य है कि उस सौन्दर्य-सुधाका एक कण भी जो पान कर लेता है, उसकी पिपासा बढ़ती ही जाती है। जिसके नेत्र और मन भगवान्‌के एक रोमपर भी पड़े हों, वे उस एक ही रोमके सौन्दर्यपर इतने मुग्ध हो जाते हैं कि वहाँसे वे आगे बढ़ ही नहीं सकते। चंचला लक्ष्मी भी वहाँ आकर अचला हो जाती है, फिर औरोंकी बात ही क्या है? भगवान्‌के दिव्यातिदिव्य सौन्दर्यमें प्राकृत उपमान केवल इतना ही प्रयोजन सिद्ध करते हैं कि इनके द्वारा भगवत्सौन्दर्यका ध्यान करते-करते मन विशुद्ध हो जाता है और मनमें जैसे-जैसे विशुद्धि आती है, वैसे- वैसे भगवान्‌का जैसा वास्तविक रूप है, वह अचिन्त्य अप्राकृत मंगलमय दिव्यरूप भक्तके सामने प्रकट होने लगता है। भगवान्‌में केवल चन्द्रमाका ही उपमान नहीं, कारण भगवान् घनश्याम भी हैं, पर यह प्राकृत श्याम नहीं। उनकी श्यामतामें महेन्द्र नीलमणिकी उपमा दी जाती है, जिसमें दीप्तिमत्ता-विशिष्ट विलक्षण नीलिमा है। उस नीलिमामें ऐसी दीप्ति है कि वह अनन्त कोटि चन्द्रोंकी सम्मिलित दीप्तिमत्ताको तिरस्कृत करती है। इस दिव्य दीप्ति-सम्पन्न भगवन्मूर्त्तिरूप नीलकमलमें ऐसी सुकोमलता है कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सुकोमलताकी मूर्ति श्रीलक्ष्मी भी उनके पाँवको स्पर्श करती हुई सकुचाती हैं कि हमारे हाथोंकी कठोरता इसके सुकोमल पाँवोंको कष्टदायक न हो। अनन्तकोटि कमलोंकी सारातिसार कोमलता इस कोमलताके पास भी नहीं आने पाती। ऐसे शीतल, ऐसे सुन्दर, ऐसे सुकोमल भगवान् इतने गम्भीर हैं कि नवीन नीरधरकी गम्भीरता अनन्तकोटिगुणित होकर भी उनका वास्तविक स्वरूप नहीं प्रकट कर सकती। भगवान्‌का केवल मुख ही चन्द्रोपम है—ऐसा नहीं, सर्वांग ही चन्द्रोपम है। वर्ण स्वभावतः कृष्ण है, दीप्तिसे अकृष्ण है—नीलिमागर्भित दीप्तिमत्ता है। भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रह श्याम होते हुए भी अनन्तकोटि चन्द्रकी दीप्तिको तिरस्कृत करनेवाला है। महेन्द्रनीलमणि, नूतन नील नीरधर और नील सरोरुहकी जो उपमाएँ दी गयी हैं, उनसे बहुत-से विवक्षित अंश सूचित होते हैं। महेन्द्रनीलमणिसे दीप्तिमत्ता, चिक्कणता और दृढ़ता तथा नीलिमा

भगवान्का मंगलमय स्वरूप २९ सूचित होती है; नूतन नीरधरसे नीलिमा, रस्यता, तापापनोदकता और गम्भीरता सूचित होती है और नीलसरोरुहसे नीलिमा, सुकोमलता, शीतलता और सौगन्ध्य सूचित होता है, पर ये महेन्द्रनीलमणि आदि सब प्राकृत हैं। इनसे यथार्थ-बोध नहीं होता, पर बोधके समीप पहुँचनेके लिये अन्य कोई उपाय नहीं है। प्राकृत तत्त्वोंसे ही अप्राकृतकी कल्पना कर लेनी है। इन सबसे अनन्तकोटिगुणित ये गुण भगवान्में हैं। भगवान्को देखकर वृन्दावनवर्त्ती मयूरवृन्द घनश्यामको श्याम घन जानकर नृत्य करते हैं। भगवान् जो वंशी बजाते हैं, वह मयूरवृन्दोंके लिये मानो मन्द-मन्द मेघगर्जन ही है। पर मेघ दूर होते हैं और यह मेघश्याम बिलकुल समीप है। परिच्छिन्न होते हुए भी इस मेघकी गम्भीरता ऐसी है कि उनके किसी भी अंगपर किसीके नेत्र पड़ जायँ तो वहीं उनकी टकटकी बँध जाय। आगे बढ़कर उनके सब अंगोंको देखनेकी भला किसमें सामर्थ्य ? व्रजांगनाएँ कहती हैं कि भगवान्के एक-एक रोमके सौन्दर्यको देखनेके लिये यदि हमारे एक-एक रोममें कोटि- कोटि नेत्र होते तो देख सकतीं और तब कह सकतीं कि यह परिच्छिन्न है या अपरिच्छिन्न। भगवान्के मंगलमय दिव्य अंगोंकी शोभा भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहकी गम्भीरता अपार है। किसीमें उसे ग्रहण करनेकी सामर्थ्य नहीं। यह घनश्याम श्याम घनसे विलक्षण घनश्याम है। श्याम घनमें जो विद्युत् होती है, ऐसी अनन्तकोटि विद्युतोंकी सम्मिलित द्युतिको तिरस्कृत करनेवाली इनकी कौशेयाम्बरदीप्ति है। श्याम घन जीवन (जल)- दाता है तो मनमोहन भी जीवनदाता हैं। श्याम घन जल बरसाता है, परंतु घनश्याम प्रेमामृत-आनन्दामृतकी वर्षा करते हैं। व्रजांगनाओंको हृच्छयाग्निसे दह्यमान होनेके कारण श्यामघनकी आवश्यकता थी। वेणुनिनादसे प्रेम-बीज बोया गया, पुलकावलिरूपसे वह अंकुरित हुआ, पर वह हृच्छयाग्निसे जलने लगा, अश्रुधाराएँ बहकर उसका सिंचन करने लगीं, पर उस उष्ण जलधारासे हृदयको वह शान्ति कहाँसे मिलती ? इसलिये उन्होंने जीवन-प्राप्तिके लिये इन नूतन नील जलधर श्याम घनकी शरण ली। भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहके सौन्दर्यादि गुणोंकी महिमा कैसे समझी जाय ? दिव्यातिदिव्य प्राकृत पदार्थोंको असंख्यगुणोपेत करके अपना काम करते-करते चित्त शुद्ध होकर भगवदीय अनुकम्पासे वास्तविक स्वरूपका हृदयमें प्राकट्य होता है। बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संस्पृष्ट अतसी- पुष्पकी श्यामता दूरसे दमदमाती हुई बड़ी ही मनोहर लगती है। इस मनोहर श्यामताकी शतकोटिगुणित कल्पना करो तो कुछ वैसी श्यामता भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहकी है। सायंकालमें भी अतसी- पुष्पकी दीप्तियुक्त नीलिमा बड़ी मनोहर होती है। यह मनोहारिता शतकोटिगुणित होकर भगवान्की श्याम मनोहारिताकी कुछ कल्पना करा सकती है अथवा भ्रमरकी श्यामता लीजिये। भ्रमर दूरसे काला दीखता है, पर वह काला नहीं, उसमें बड़ी ही सुन्दर नीलिमा है। ऐसी मनोहर नीलिमा अन्य किसी प्राकृत पदार्थमें नहीं। व्रजांगनाओंने भगवान्की नीलिमाको मधुपकी नीलिमासे ही उपमित किया है और कहा है—हे मधुप, तुम भी मधुपतिकी तरह बड़े कपटी हो। भ्रमरके पीले पंख भी भगवान्के पीतपटका स्मरण दिलाते हैं और उसका मधुमय गुंजार भगवान्के मधुमय वेणुनिनादका या उनके मीठे-मीठे वचनामृतोंका स्मरण दिलाता है। जैसे भ्रमर जबतक रस है, तभीतक ही पुष्पोंसे स्नेह रखता है, नहीं तो भाग जाता है, वैसे ही भगवान् भी रसके ग्राहक हैं, रस नहीं तो भगवान्से भेंट कहाँ ? अस्तु। भगवान्की श्यामता शतकोटिगुणित मधुपकी श्यामतासे तथा भगवान्की दीप्तिमत्ता चन्द्रसिन्धुके सारातिसार तत्त्वका मन्थन करके प्राप्त चन्द्रतत्त्वकी दीप्तिसे कथंचित् उपमित की जा सकती है। कल्पनासे इस प्रकार भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहको पदाम्बुजसे मुखाम्बुजतक अथवा मुखाम्बुजसे पदाम्बुजतक देख जाइये।

मनःकल्पित अनन्ततेजःपुंजके भीतर अनुसन्धान कीजिये अथवा बालसूर्यमें मन और दृष्टिको स्थिर करके देखिये। भगवान्‌का श्रीमुखचन्द्र चन्द्रवत्‌ वर्तुलाकार दिव्य विकसित अति विलक्षण अरविन्द है, चन्द्रमाके समान दीप्तिमान् वर्तुलाकार मुखारविन्द समुचित तारतम्यके साथ नतोन्नत भावसहित है। इसकी मनोहारिता अत्यद्भुत है। चन्द्रवत् वर्तुलाकार विकसित सुकोमल मुखाम्बुज सारातिसार चन्द्रतत्त्वकी दीप्ति और शतकोटिगुणोपेत भ्रमरनीलिमासे युक्त अति विलक्षण है। यह सम्मिलित समस्त मुखाम्बुज है। यह मन्दहासोपेत दिव्य मुखाम्बुज ऐसा शोभित होता है मानो दिव्यातिदिव्य चन्द्रतत्त्व नीलकमलमें छिपना चाहता है—छिपता है और फिर-फिर प्रकट होता है। यह हास भगवान्‌के ‘अनुग्राह्याह्वयस्थेन्दुसूचक- स्मितचन्द्रिकः’ अनुग्रह नामक हृदयस्थ चन्द्रकी चन्द्रिका है। अनुग्रहरूप चन्द्रकी ये तापहारिणी किरणें खिन्नातिखिन्न भावुकोंको समाश्वासन दिलाती हैं कि घबराओ मत, अनुग्रहाख्य चन्द्रका यहाँ निवास है। यह समाश्वासन—यह दिव्य आशा ही भावुकोंको उनकी थकावट और खिन्नताको दूर करके आगे बढ़ाती है। आशाबन्ध ही भक्ति-मार्गका मूल है। यह आशा—भगवत्सान्निध्यकी यह तृष्णा अद्भुत है, यह कैवल्यसे खरीदी जाती है। भगवान्‌का उदार हास ‘शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम्’ शोकाश्रु- सागरोंको सोख लेनेवाला है। बहुल हास जब मुखारविन्दमें प्रादुर्भूत होता है, तब वह ‘हारहासः’ हास हारके समान होता है—कुन्दकुद्मलके समान दशनपंक्ति दिव्यातिदिव्य महेन्द्रनीलके सदृश वक्षःस्थलपर हारवत् प्रतिबिम्बित होती है। यह हारहास अरुणिमा- विशिष्ट है—स्वच्छातिस्वच्छ होता हुआ भी किंचित् अरुण है। यह अधरकी अरुणिमा दन्तपंक्तिमें प्रतिबिम्बित है—जैसे जवाकुसुमके सकाशसे स्फटिक लोहित हुआ हो। यह अरुणिमा-विशिष्ट कुन्दकुद्मलके समान दशनपंक्तियुक्त हास्य दिव्य हारके समान शोभित होता है। कपोल और चिबुक अपने दिव्य सौन्दर्यसे मानो यही कह रहे हैं कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके सारातिसार सौन्दर्यका परमोद्गम-स्थान यही है। यही अचिन्त्य सौन्दर्यसुधानिधि है, जिसका केवल एक कण अनन्तकोटि ब्रह्माण्डमें विस्तीर्ण है। बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संसृष्ट विकसित कमलका अग्रोर्ध्व-भाग जैसे स्वच्छतामय होता है, वैसे कपोल और चिबुकपर इस नील विकसित मुखाम्बुजकी दीप्तिमत्ता अन्य अंगोंकी अपेक्षा कुछ विशेष है। नीलकमलके केशरका सान्निध्य छोड़कर जो नीलिमायुक्त अंश हैं, वे बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संसृष्ट होकर अधिक दीप्त होते हैं, वैसे ही भगवान्‌के कपोल और चिबुक विशिष्ट दीप्तिमत्ता-सम्पन्न हैं। विशाल मस्तकपर शोभायमान दिव्य किरीटकी जगमगाती हुई दिव्य कान्ति इन उन्नत अंगोंपर—उच्च स्थल पाकर—अधिक मात्रामें अवतीर्ण और विस्तीर्ण हो रही है तथा वह सौन्दर्य-सुधा उभय कपोलप्रान्तसे भी अधिक चिबुकपर आकर परम विकसित और मनोरम हुई है। भगवान्‌के नेत्रोंकी अरुणिमा अरुण कमलके समान प्रभुके दिव्य नेत्रोंके सम्बन्धमें ऐसा ध्यान है कि कपोलप्रान्त जैसे-जैसे नेत्रोंके सन्निहित हैं, वैसे-वैसे उनमें अधिकाधिक विशिष्ट दीप्तिमत्तायुक्त अरुणिमा है और कपोलाभिमुख नीचेकी ओर क्रमशः दीप्तिविशिष्ट नीलिमा है और अरुणिमाकी न्यूनता है। खास नेत्र अरुण हैं; यहाँ स्वच्छता और अरुणिमा मानो अरुणिमारूप रजसे भगवान् अपने भावुकोंके अभीष्टका सृजन और स्वच्छतारूप सत्त्वसे पालन करते हैं। नेत्रोंमें स्वच्छता और अरुणिमाका ऐसा तारतम्य है कि अनुकम्पा, राग आदि मानस विकृतियोंकी जहाँ अभिव्यक्ति है, वहाँ अरुणिमा अधिक होती है और जहाँ रागादिरहित प्रसन्नता है, वहाँ स्वच्छता अधिक होती है। कोपादि तापक भावोंसे अरुणिमाकी अधिक वृद्धि होती है।

भगवान्‌का मंगलमय स्वरूप ३१ कोई अरुणिमा अग्निसदृश है, व्रजांगनाओंके स्वच्छातिस्वच्छ नेत्रोंमें जो अरुणिमा है, वह हृच्छयाग्निकी अरुणिमा है। उसीकी शान्तिके लिये वे भगवान्‌के नीलपादाम्बुजकी नीलरजका अंजन लगाती हैं। भगवान्‌के नेत्रोंमें कमलकोशकी-सी अरुणिमा है और उनके विशाल नेत्र कर्णप्रान्तपर्यन्त दीर्घ हैं। इनकी कल्पना भावुक ही कर सकते हैं। भगवान्‌के नेत्रोंकी अरुणिमाके साथ कमलकोशगत अरुणिमाका सादृश्य देखकर 'गोपीगीत' में ऐसी कल्पना की गयी है कि भगवान् मानो इस अरुणिमारूप दिव्यातिदिव्य श्रीको दिव्यकमलोंके सम्राट्‌के अभेद्य दुर्गको भेदकर अति सुरक्षित अति गुप्त कोषसे चुरा लाये हैं— शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमूषा दृशा। सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।२) दिव्यातिदिव्य कमलसम्राट्‌को यह पूरी खबर थी कि ये चोरजारशिखामणि एक-एक अंग चोरी करनेवाले हैं। यह कहीं मेरी श्री न हर लें, जो सर्वोत्कृष्ट है। इस भयसे यह पंकजसम्राट् जलमें जाकर रहे। पर जलमें श्रीकृष्ण कहीं जलक्रीड़ा करने आ जायँ, इसलिये उन्होंने जलमें भी ग्रीष्मऋतुका परित्याग करके शरन्निवास ही ग्रहण किया और इस शरत्कालीन जलाशयमें भी अपने-आपको छिपानेके लिये अपने चारों ओर अनन्त कमल उत्पन्न करके उनका पहरा बैठा दिया। इन कमलसैनिकोंकी रक्षाके लिये प्रत्येकको शत-शत पत्र तथा नाल और नालोंमें काँटे देकर ऐसा जलदुर्ग निर्माण किया कि कहींसे कोई घुस न सके। फिर ऐसे अभेद्य दुर्गके बीच चारों ओरसे सुरक्षित स्थानमें आप जा विराजे। फिर भी श्रीको श्रीकृष्ण ले तो नहीं जायँगे, यह भय बना ही रहा। इसलिये उस श्रीको उस पंकजसम्राट्‌ने स्वयं चारों ओरसे सुरक्षित होकर भी अपने कोश-स्वरूप उदरमें छिपा रखा, जैसे कोई कृपण अपने धनको छिपा रखता है, पर भगवान् ऐसे चतुर चोर-चक्रवर्ती कि उनके नेत्रारविन्द वहाँसे भी उस कमल-कुलपतिकी परम दुर्लभ सम्पत्तिको चुरा ही ले आये। यह चोरी भगवान्‌की इतनी अद्भुत और भावुकोंके लिये इतनी मधुर है कि गोपियाँ बड़े प्रेमसे इसके गीत गाती फिरती हैं। तभी तो भावुकोंने कहा है—'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥' अस्तु, पद्मगर्भारुणेक्षण भगवान्‌के इन 'पद्मगर्भारुण' नेत्रोंमें स्वच्छता और अरुणिमाका अद्भुत पारस्परिक सम्मेलन है और नेत्रान्तःपाती जो तारक हैं, वे श्याम हैं। इस प्रकार नेत्रारविन्दमें त्रिवेणी संगम हुआ है। यही संगम कुछ विलक्षण रूपसे नेत्रोंकी पलकोंमें भी हुआ है; पलकें अत्यद्भुत दीप्तियुक्त नीलिमा ली हुई हैं और किंचित् अरुणिमाका भी इनमें योग हुआ है। ऐसे दिव्य विशाल नेत्र कर्णप्रान्ततक विस्तीर्ण हैं। भगवान्‌की दिव्य नासिकाकी शोभा दोनों नेत्रोंके मध्यसे नीचेकी ओर ऊर्ध्वोन्मुख उन्नत दिव्य नासिका कीरतुण्ड-सी शोभा पा रही है। जिसकी दीप्ति दिव्य गण्डस्थलकी-सी ही जगमगा रही है। नासिकामें एक वर-मौक्तिक भी सुशोभित है। नासिकाकी दीप्तियुक्त नीलिमा होठोंकी विलक्षण अरुणिमासे मिलकर अति विलक्षण मनोहारित्व व्यक्त कर रही है। कुन्दकुडमलकी-सी दिव्य दशन- पंक्तिकी स्वच्छता अरुण अधरोंपर और अधरोंकी अरुणिमा दिव्य दशन-पंक्तिपर प्रतिबिम्ब होकर एक बड़े ही दिव्य आदान-प्रदानका भाव दिखा रही है। अधरोंसे बढ़कर शोभा और किसीकी नहीं। सकल- सुधानिधि भगवान्‌की यह दिव्य अधरसुधा है। व्रजांगनाओंका इसीपर सबसे अधिक प्रेम है। यह पीतिमा दिव्य मकराकृत कुण्डलद्वयसे आकर यहाँ झलक रही है। ये कुण्डल अद्भुत दीप्ति-सम्पन्न हैं और यह दीप्ति पीतिमा लिये हुए है। गोस्वामी तुलसीदासजी 'रामगीतावली' में भगवान्‌के चंचल कुण्डलद्वयकी दीप्तिमत्ता, शोभा और चंचलताका वर्णन करते हैं कि ये दोनों कुण्डल शुक्र और गुरुसे चमक रहे हैं। इनकी चंचलता यह बतलाती है कि