भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
वैसे व्रजमें कोई भी ऐसा नहीं, जो श्रीकृष्णको अपना प्रियतम न समझे, सभी उनका आनुरूप चाहते थे। गोपबालाओंके माता-पिता आदि सभी श्रीश्यामसुन्दरके साथ अपनी पुत्रियोंका विवाह करना चाहते थे। इसमें रसाक्रान्तिकी तरह, मूर्तिमान् शृंगारके प्रादुर्भावकी तरह, व्रजसीमन्तिनी तथा व्रजबालाओंका श्रीकृष्णसे मिलते रहनेपर भी सम्मिलनोत्कण्ठाका उदय हुआ रहता था। एक समय गोपियोंके पिताओंने श्रीगर्गजीसे श्रीश्यामसुन्दरके साथ अपनी पुत्रियोंके विवाहके विषयमें पूछा— (यह प्रकट लीला है, श्रीशुकदेवजीने प्रकट-अप्रकट दोनों लीलाओंका वर्णन किया है)। उत्तरमें श्रीगर्गजीने कहा— 'आपलोगोंका यह भाव बहुत उत्तम है, परंतु यदि आपकी कन्याओंका विवाह श्रीकृष्णके साथ हो गया तो आप सबका श्रीकृष्णके साथ वियोग हो जायगा, उनका दर्शन दुर्लभ हो जायगा।' तबसे सब सावधान हो गये और गोपियोंके लिये श्रीकृष्णदर्शनतकमें रुकावट उत्पन्न हो गयी। यह सब हुआ केवल श्रीकृष्णके वियोग-भयसे, किसी द्वेष-बुद्धिसे नहीं। इस प्रसंगमें पूर्णमासीने वृन्दासे पूछा कि 'जब मन्त्रोंमें भी श्रीकृष्णका 'गोपीजनवल्लभ' नाम है, तब श्रीकृष्णके साथ गोपियोंके विवाह क्यों रोके गये ? और दूसरी जगह क्यों हुए ? इसपर वृन्दाने यही कहा कि 'ये सब दुःख स्वप्नमात्र हैं। वास्तवमें गोपांगनाओंका सम्बन्ध श्रीकृष्णको छोड़कर अन्यत्र हुआ ही नहीं। इसीलिये—'मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) और 'न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह संगमः।' (उज्ज्वलनीलमणि ३१) आदि कहा गया है। यत्र- तत्र जो गोपांगनाओंकी पत्यन्तर-प्रतीति है, वह सब मायामय है। उन-उन व्रजदेवियोंका मायामय पतियोंके साथ ही संगम होता था।' 'उज्ज्वलनीलमणि' में कहा गया है कि रसशास्त्रमें प्रधान रसके पोषण-प्रसंगमें परोढ़ाके परिग्रहमें कवियोंने जो रसाभास माना है, वह गोकुलांगना-समूहको छोड़कर है; क्योंकि इसमें दुर्लभता, प्रच्छन्नकामुकता आदिसे उत्कण्ठावृद्धि, अद्भुत प्रेमप्राखर्य आदि होते हैं। इस रूपमें यह सब (परकीयात्व आदिके पोषक भाव) प्रीतिवृद्धिके लिये होते हैं। जितनी-जितनी प्राप्तव्यके प्रति दुर्लभता बढ़ती जाती है, उतनी ही उसके प्रति गाढ़ानुरागता भी बढ़ती है। फिर वह साधारणविषयक न होकर सर्वेश्वरके प्रति है। श्रीराधाकी यह जो श्रीकृष्णविषयक दुर्लभता बतलायी गयी है, वह वैसे ही है, जैसे अमृत और उसकी मधुरिमाका कभी भी वियोग न होनेपर भी वियोग और विह्वलता बतलायी जाय। सारस तथा लक्ष्मणाका सर्वदा संयोग रहता है और चक्रवाक-चक्रवाकीका सर्वदा वियोग रहता है। यहाँ दोनोंका सामंजस्य है। अनन्तकोटिगुणित संयोग एवं वियोगका श्रीश्यामा-श्यामको एक कालमें सदा आस्वाद बना रहता है। श्रीजीवगोस्वामीने एक प्रसंगमें कहा है कि कुलांगनाके लिये सबसे बड़ा कष्ट— महाकष्ट लज्जात्याग है। परंतु यह बड़े-से-बड़ा दुःख भी श्रीश्यामसुन्दर नटनागरके सम्बन्धमें उतना ही महान् सौख्य हो जाता है, यह दुःख अनन्त, अलौकिक सुखविषयक है। यही प्रेमका प्राखर्य है। माता-पिता आदिके तीव्रातितीव्र निषेध जैसे-जैसे बढ़ते जाते हैं, प्रीति उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। श्रीवृषभानुनन्दिनी इस प्रकार अपने प्रेमप्राखर्य और विविध निरोधोंका अनुभव कर रही हैं। वह सोचती हैं कि 'यदि मैं आज कोई पक्षी होती तो दर्शनार्थ उड़कर प्रेष्ठके समीप पहुँच जाती, पर करूँ क्या? 'वपुः परवशम्' यह शरीर परवश है। इसी समय उन्हें पुलिन्दियों, हरिणियोंका स्मरण होता है। वे उनका भाग्य सराहती हैं—'अहो ! वे भील- भामिनियाँ धन्य हैं, जिन्हें प्रियतमपादारविन्दसंलग्न कुंकुमका तो दर्शन मिला। इनसे भी अधिक धन्य वे हरिणांगनाएँ हैं, जो अपने पतियोंके साथ उन नन्दनन्दनका प्रेमावलोकसे पूजन करती हैं, दर्शन करती हैं। उनके पति 'कृष्णसार' ('कृष्ण एव सारो येषां ते') हैं। हम गोपांगनाओंके पति 'अभिमान-सार' हैं। वे हरिण अपनी हरिणियोंको साथ लेकर दर्शन करने आते हैं, सब जगह जाकर दर्शन करते हैं, अतः वे हरिणियाँ धन्य हैं—
श्रीरामपञ्चाध्यायी ३८९ धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) परंतु 'वयं अधन्याः'। कथंचित् दर्शनार्थ जायँ भी, पर यह जन्म जो एक कुलीन वंशमें हुआ है— 'जनुः परमिदं कुलीनान्वये।' खानदानमें बट्टा लग जानेका भय है। अहह! कितनी विवशता है तथापि क्या यह मैं अबतक जी रही हूँ? हा! मुझे भला मौत कहाँ?—'न जीवति तथापि किं परमदुर्मरोऽयं जनः?' मरना बड़ा कठिन है, मर जाऊँ तो अच्छा। मृत्युसे भी कहीं अधिक ये प्राणधनके वियोगके कष्ट तो न होंगे। इस प्रकारके चिन्ता-सन्तापमें मग्न श्रीराधिकारानी किसी समय अपने लीलाशुकको अपने हस्तारविन्दके अंगुष्ठप्रान्तपर बिठाकर उसे दाडिमी बीज चुगाती हुई स्नेहसे उसके चंचुपुट का चुम्बन करती हुई पढ़ा रही थीं—'कृष्ण कहु, कृष्ण कहु, राधा कहु मति रे।' शुक बहुत विशेषज्ञ था, अपनी पालिकापर उसे प्रेम और दया थी, उसके वियोगदुःखको देखकर वह दुःखी था। वह तुरन्त पद्यसन्देश लेकर उड़ा और श्रीनन्दरायके प्रांगणमें जा पहुँचा, जहाँ श्रीश्यामसुन्दर क्रीडामें आसक्त थे। एक ऊँची-सी जगह निर्भीक भावसे बैठकर वह पद्य उसने उन्हें सुनाया। अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी प्रियाका वह भावगम्भीर पद्य सुनकर श्रीश्यामसुन्दर मुग्ध हो गये। बड़े आग्रह एवं अनुनयसे श्रीकृष्णने उस शुकको अपने पास बुलाया, अपने सुकोमल हस्तारविन्दपर उसे बिठलाकर कई बार उस पद्यको सुना और समीक्षा करने लगे—'यह किसी महानुरागवतीका पद्य है। इतनेहीमें वहाँ मधुरिका और कुसुमासव सखा भी आ गये। परस्पर प्रश्न हुए। मधुरिकाने कहा—'मैं इस शुकको ढूँढ़ने आयी हूँ।' कुसुमासव बीचमें ही बोल उठे—'सखि! यह तो हमारे श्रीश्यामसुन्दरका शुक है। यदि यह तुम्हारी प्रियाजूका है तो इसे अपने पास बुलाओ।' मधुरिकाने कहा—'सखे! क्या कोई भी इन श्रीलालजूके हाथसे छूटकर जा सकता है?' यह तो भला एक प्रेमी जीव है। इनके हाथमें आते ही जड़ चेतन हो जाते हैं और चेतन जड़ हो जाते हैं। इनके हाथमें आते ही जड़ वेणु सजीव हो जाती है। उनका यह रसमय प्रसंग चल ही रहा था कि इतनेमें ही श्रीयशोदाजी वहाँ आ गयीं और बोलीं—'सखि! लालाको अभी खेल लेने दे, फिर मैं इसे तुम्हारे ही घरतक पहुँचा दूँगी।' इस तरह लोकापवादादि भयसे भीत श्रीश्यामाजू प्रच्छन्नकामुकता आदिके लोकोत्तर साधन शुकप्रेषणादिका रसवर्धनार्थ आश्रय लेती हैं, अस्तु, ऐसे विलक्षण गूढ़ संचारवती श्रीमती राधा तथा तत्प्रिय सखियोंको प्रसन्न करनेका भगवान्को कोई उपाय नहीं सूझता। अतः वे श्रीललिताजीसे पूछती हैं— लोकापवाददलितां मम लम्भनेऽपि एतां कथं कथमहो परिसान्त्वयामि॥ हृदयसे हृदयका कभी विप्रयोग नहीं होता, पर फिर भी भ्रमसे ऐसा होता ही है; क्योंकि श्रीमद्भागवतादिमें विप्रयुक्तोंकी अवस्थाका दिग्दर्शन हुआ है। अन्यत्र भी 'दावानलज्वालिवनी सहक्षाम' आदिसे विप्रयुक्तोंकी लोकसिद्ध किसी भी सद्वस्तुमें वस्त्वन्तरकी प्रतीति होनेके उदाहरण मिलते हैं। अस्तु, किसीको संयोगसे, किसीको वियोगसे सान्त्वना दी जाती है। परंतु इन्हें कैसे प्रसन्न करें, जो प्रत्येक दशामें दुःखका ही अनुभव करती हैं? सखी श्रीललिता कहती हैं—'महाराज! श्रीप्रियाजूको तो अंक (गोद)-में विराजमान करके ही प्रसन्न करो; क्योंकि वे आपके अन्यान्य गुणगणोंसे सिवा मूर्च्छित होनेके सुखी नहीं होतीं'— न मूढधीरस्मि न वा दुराग्रहा शरीरभोगेषु न चापि लालसा। किन्तु व्रजाधीशसुतस्य ते गुणा बलादपस्मारदशां नयन्ति माम्॥ गोप-सुन्दरियोंके भी ऐसे ही मिलते-जुलते भाव हैं। इसने उच्च गम्भीर भाववती, फिर आत्मरहित भी उन गोपबालाओंको प्रसन्न करनेका उनके अनुकूल होनेके सिवा भगवान्के पास कोई भी अन्य साधन नहीं है।
३९० भक्तिसुधा पूर्वोक्त 'चूतप्रियालपनसासन' (श्रीमद्भा० १०।३०।९) इस पद्यमें आमके 'चूत' और 'आम्र' ये दो नाम आये हैं। इस द्विरुक्तिके टीकाकारोंने विभिन्न अर्थ किये हैं। अम्ल (खट्टे) रसवाले आमको 'चूत' और मधुर रसवाले आमको 'आम्र' कहते हैं। इस तरह रसभेदसे दो नाम, दो भेद हैं। अथवा 'करुणया च्यवते इति चूतः' करुणासे जो दीनोंपर द्रुत हो, उसे 'चूत' कहते हैं। अन्यत्रके आमोंमें चाहे यह बात न हो, पर श्रीवृन्दावनधामके आमोंमें तो यह विशेषता है ही। ये श्रीश्यामसुन्दरके यहाँ अन्तरंग हैं अथवा परिकरोंमें कोई हैं। मुनिजन भी यहाँकी वृक्षता चाहते हैं। श्रीव्रजांगनाएँ कहती हैं—'वैसे हे आम्रवृक्षो! आपलोग दुःखियोंका दुःख देखकर द्रुत होते हैं। दूसरोंमें दया नहीं, अतः वे द्रुत नहीं होते। हमसे बढ़कर दूसरा दुखिया और कौन होगा? हमपर दया करो। आमका भव—जन्म परोपकारके लिये हैं। फल, पुष्प, पत्र और काष्ठ आदि आपकी सभी वस्तुएँ केवल परोपकारके लिये हैं। आपका निवास साक्षात् प्रेमद्रववती श्रीयमुनाके तटपर है। श्रीयमुनाजलकी तरह ही मानसरोवर, कृष्णसरोवर आदि भी व्रजके तीर्थ अनुरागद्रव हैं। इन श्रीयमुनाजल आदिके दर्शन, स्पर्श, पान आदिसे दूसरोंको भी श्रीकृष्णविषयक ज्ञान देनेके कारण आपका नाम 'चिति संज्ञाने' से चेतति 'अन्यांश्चेतयतीति वा चूतः' हुआ है। इतनी ऊँची आपलोगोंकी योग्यता है। आप हम दुःखियोंको भी श्रीश्यामसुन्दरका पता देकर कृतार्थ करो।' जब इतनी स्तुति करनेपर भी आम्रवृक्षोंने कुछ उत्तर नहीं दिया, तब गोपांगनाएँ बड़ी खिन्न हुईं। असूयासे अब उनके प्रति दोषोंका अनुसन्धान हुआ— ('च्योतति, प्रच्युतयति इति चूतः') 'सखि! ये तो थे परोपकारी, पवित्र तीर्थवासी ही, परंतु अब स्वरूपसे प्रच्युत हो जानेके कारण निष्ठुर हो गये हैं। 'यमुनोपकूलाः' ये यमुनाके किनारे रहते हैं। यमुना यमराजकी बहन हैं, यम सर्व दुःखदायी हैं। 'संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति' उसी यमसम्पर्कसे ये अब निर्दय हो गये हैं। हमारे तीव्रतापसे इन्हें प्रसन्नता हो रही है।' 'प्रियाल' पीले सालवृक्षका नाम है ('प्रियाः इति आलापो यस्य सः' ) सखीगण जिसे प्रिय हों, यह नामार्थ 'प्रियाल' का गोपांगनाओंने निकाला। 'सखि, वह हम सखियोंपर अवश्य अनुकम्पा करेगा, यह अवश्य हमारा हित सोचेगा। हित तो श्रीश्यामसुन्दरके मिलनमें है, सो यह उनका पता बतलायेगा। अजी! यह 'प्रियं लाति इति प्रियालः' है, प्रिय श्रीकृष्णको देनेवाला है।' 'प्रियं लाति' अर्थात् जो प्रिय पदार्थको दे, वह 'प्रियाल' है। वृन्दावनका 'प्रियाल' श्रीकृष्णको देनेवाला है। 'वृन्दावनशतक' में वृन्दावनस्थ तरुओंकी बड़ी महिमा कही गयी है। कहा है—'यदि तुमसे और कुछ भजन-भावना नहीं बन सकती तो इन वृक्षोंका ही दर्शन करो, ये तुम्हें प्रियको देंगे, स्वयं प्रियका अन्वेषण करके तुम्हें समर्पित करेंगे।' इस अंशमें वृन्दावनके सभी वृक्ष 'प्रियाल' हैं, फिर साक्षात् प्रियालकी तो बात ही क्या? इसी आशासे गोपीजन प्रियालकी प्रशंसा करती हैं। अद्भुत प्रेमोन्मादमें उन्हें जड़ और चेतनका ज्ञान नहीं रह गया, उन्हें अभी यही भावना बनी है कि ये हमें अभी प्रियका पता देंगे। प्रेमीकी आशाका कुछ ठिकाना नहीं, वह जड़में भी चेतनकी कल्पना करता है। प्रेमकी प्रतिमूर्ति व्रजदेवियाँ श्यामसुन्दरके आभूषणोंकी, मालाकी प्रशंसा करती हैं। इतना ही नहीं, वे तो उस वायुकी भी स्तुति करनेको उद्यत हैं, यदि वह मोहन प्यारेकी ओरसे आ रहा हो। वे चन्द्रमासे कहती हैं—'हे हिमकर, अपनी किरणों (करों)—का हमसे स्पर्श न होने दो, परंतु यदि वे (आपकी किरणें) प्यारे श्यामसुन्दरका स्पर्श करके आयी हों तो उनसे हमें अवश्य स्पर्श करो, हम तुम्हारा उपकार मानेंगी।' इससे अधिक परम्परा- सम्बन्धकी महिमा क्या होगी? परंतु ब्रह्मादि देवता इस परम्परामें और भी आगे बढ़े हैं। वे इसीमें कृतार्थ हैं कि अस्मदधिष्ठातृक तत्तदिन्द्रियोंसे व्रजवासी उस आनन्दसिन्धु ब्रह्मतत्त्वका दर्शन, स्पर्श, श्रवण आदि कर रहे हैं; क्योंकि देवतालोग देवत्वके कारण साक्षात् रूपसे उस ग्वारिये गोपालकी रसमाधुरीका आस्वाद लेनेमें सर्वथा असमर्थ
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९१
हैं, अतएव बेचारे नेत्रादिरूपसे परम्परासम्बन्ध स्थापित करते हैं। उनकी दृष्टिमें धन्य हैं वे व्रजवासी, जो अपने नेत्रादिसे साक्षात् श्रीश्यामसुन्दरके चरणामृत, सौगन्ध्याद्यमृतका पान करते हैं। नेत्रका अधिष्ठातृदेव सूर्य है। वह इतनेमें ही कृतकृत्य है कि किसी भी व्रजवासीने श्यामसुन्दरको मदधिष्ठातृक नेत्रसे देखा। नासिकाके देवता अश्विनीकुमार हैं। वे व्रजवासीके घ्राणसे अपना सम्बन्ध स्थापित करके आनन्दमग्न हैं। श्रोत्रों (कानों)-की अधिष्ठात्री दिग्देवता हैं। व्रजवासी श्रीनन्दनन्दनके वचन और वेणुगीतको सुनते हैं, इसीमें वह फूली नहीं समाती। वह सोचती है—धन्य हूँ मैं, जो मदधिष्ठातृक श्रोत्रोंसे व्रजवासी श्रीश्यामके वेणुगीतको सुनते हैं। चित्तके अधिष्ठाता ब्रह्मा हैं। इसी प्रकार विभिन्न इन्द्रियोंके विभिन्न अधिष्ठाता हैं। सब इसी प्रकार अपनेको कृतकृत्य मानते हैं। स्वयं ब्रह्माजीने भगवान्की स्तुति करते समय कहा है—हे अच्युत, इन व्रजवासियोंके भाग्यकी महिमाका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। जो कि हमलोग रुद्र, चन्द्र आदि इसलिये प्रशस्त भाग्यशाली हैं कि इनके इन्द्रियरूप पात्रोंसे आपके चरणकमल-मकरन्दका, जो अमृतके समान अतिमिष्ट और आसवके जैसा मदकारी है, बार-बार पान करते हैं। जब एक-एक इन्द्रियके अभिमानी हमलोग आपकी कीर्ति, सौन्दर्य, सौगन्ध आदि एक देशके सेवन करनेवाले भी कृतार्थ हैं, तब समस्त इन्द्रियोंसे सर्वसेवी इन व्रजवासियोंके भाग्यकी सराहना किन शब्दोंमें की जाय? एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ता- मेकादशैव हि वयं बत भूरिभागाः। एतद्धृषीकचषकैरसकृत् पिबामः शर्वादयोऽङ्घ्र्युदजमध्वमृतासवं ते॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३३) इन्द्रियादिके ये अधिष्ठाता हैं—अहंकारके शिव, बुद्धिके ब्रह्मा, मनके चन्द्रमा, श्रोत्रोंकी दिशाएँ, त्वक् (त्वचा)-के वायु, नेत्रोंके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासिकाके अश्विनीकुमार, वाणीके अग्नि, हस्तके इन्द्र, चरणके उपेन्द्र, पायुके मित्र, उपस्थके प्रजापति और चित्तके अधिष्ठाता स्वयं भगवान् माने गये हैं। पान-पात्रका नाम 'चषक' है। व्रजांगनादिका वह पात्र इन्द्रियाँ हैं, उसीसे वे श्रीश्यामसुन्दरके पादारविन्द- सौन्दर्यामृतका पान करती हैं। उस मादक सुधासवके पानसे व्रजांगनाजनको देह, गेह, लोकलाज सब एक बार ही विस्मृत हो गये। इसपर श्रीनन्दनन्दनकी उस मोहक मुसकानसे तो वह और भी अधिक पुष्ट हो गयीं। इसका पूरा आस्वादन तो व्रजदेवियोंको ही प्राप्त हुआ। इसपर थोड़ा विचार करें—पात्रको रसका आस्वाद नहीं आता। दर्वीको, जिससे भक्ष्यवस्तु परोसी जाती है, वस्तुका स्वाद नहीं आता। इसी प्रकार इन्द्रियाँ पात्रमात्र हैं, उन्हें रसास्वाद नहीं हो सकता। परंतु यह लौकिक रसकी बात है, भगवद्विषयक रस अलौकिक, विलक्षण होता है, उसके तो सम्पर्कसे भी रसास्वादकी अनुभूति सिद्ध है। ऐसी स्थितिमें पात्र—दर्वी आदिको रसका आस्वाद असम्भव नहीं। इस प्रसंगमें व्रजदेवियोंकी वंशीके प्रति ऐसी भावना है कि श्रीश्यामसुन्दरसे शतशः सम्पृक्त होते रहनेपर भी उसे रसका आस्वाद नहीं मिला। उनकी इस विषयमें उपपत्ति इस प्रकार है— वंशीको वस्तुतः अधरामृत नहीं दिया गया। यदि ऐसा होता तो यह सूखी ही कैसे रह जाती? उस वेणुगीतपीयूषसे यमुना भी जमकर इन्द्रनीलमणिकी शिलाके समान हो गयी और पाषाण भी यमुना-प्रवाहकी तरह बह चले, पर बाँसकी वंशीमें एक पल्लवतक नहीं जमा, यह पोली, शुष्क, सग्रन्थि और सच्छिद्र ही रह गयी। जहाँ 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९)-के अनुसार स्थिर पदार्थ जंगम बन गये और जंगम स्थिर हो गये, सूखे हरे हो गये, वहाँ वंशीके पल्ले कुछ नहीं लगा। यह तो केवल विप्रयोगलीलामें वंशीछिद्रोंसे हमारे (व्रजदेवियोंके) कर्णकुहरोंमें प्रविष्ट होनेका, हमारी जीवनरक्षाका उपायमात्र किया गया है। इस सिद्धान्तसे वंशीकी तरह दर्वी सूखी ही है, रसासम्पृक्त ही है। परंतु दूसरे कहते हैं—नहीं, आखिर सम्बन्ध तो हुआ न, किसी भी तरह सही। इसीसे कृतकृत्यता हो जाती है। अतः पात्र—'चषक'—भी परम्परासे कृतार्थ हुए। ऐसे पात्रका तो स्पर्श करनेवाले भी
कृतार्थ हो जाते हैं। ब्रह्मादि इतनेहीसे अपनेको धन्य मानते हैं। वंशीको श्यामसुन्दरकी अधरसुधाका सम्बन्ध होनेपर रसास्वाद भी अवश्य हुआ ही, अतएव गोपांगनाजनकी ही परस्पर उक्ति है—'गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) अर्थात् इस वेणुने कौन पुण्य किया है, जो श्रीश्यामसुन्दर इसको अपने हस्तारविन्दोंमें लेते, अधरपर पधराते, अपने सुकोमल अंगुलीदलसे इसका पादसंवाहन करते, अधरामृतका भोग लगाते और मुकुटका छत्र लगाकर कुण्डलोंसे इसकी आरती उतारते हैं, कैसी अनोखी पूजा करते हैं? यह तो जो ताल-तलाइयोंमें कुमुदिनीका विकास—प्रफुल्लता देख पड़ रही है, यह इन्हें वंश (बाँस)—के सौभाग्योदयपर हर्षातिरेकसे मानो रोमांच हुआ है। ये समझते हैं कि हमारे ही जलसे पालित, पुष्ट होकर वंशीकी यह इतनी उन्नति हुई है, वह श्रीमन्मोहनके अधरपर शोभित हुई है। इस अवसरपर इनको कैसी प्रसन्नता हुई, जैसी पाल-पोसकर बड़े किये गये बालकको साम्राज्य मिलनेपर उसके माता-पिता, कुटुम्बियोंको होती है। वृक्षोंको भी अपने सजातीय वेणुके इस उत्कर्षपर बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके नेत्रोंसे मधुधाराके व्याजसे आनन्दाश्रु बह चले—'तरवोऽश्रु मुमुचुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) अपने वंशमें किसीके भक्तप्रवर होनेसे जैसे कुलवृद्ध प्रसन्न होते हैं, अपनेको धन्य-धन्य मानते हैं, वैसे ही वेणुसजातीय वृक्ष अपनेको मानते हैं—अहो! हमारी वृक्षजातिमें भला एक तो ऐसा उत्पन्न हुआ, जो कूक-कूककर (निर्भीकता और आनन्दके साथ) श्यामसुन्दरके अधरामृतरसका पान कर रहा है। यदि वंशीको कुछ भी रसका आस्वाद न होता तो ऐसी बातें कैसे कही जा सकती थीं! यहाँ तर्क हो सकता है कि यदि उस वंशीको रसास्वाद हुआ है तो यह अबतक सग्रन्थि कैसे? सच्छिद्र कैसे? छिद्रोंके रहनेपर तो अनर्थ ही होते हैं—'छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति' रसका आस्वाद आनेपर, तत्त्वकी स्फूर्ति होनेपर तो ग्रन्थि खुल जाती है, छिद्र (दोष) नहीं रह जाते—जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥ (रा०च०मा० ७।११७। ४) परंतु चरणरजसे सब दोष दूर हो जाते हैं। व्रजांगनाओंका प्रेमोन्माद व्रजदेवियोंको वेणुके कर्मपर बहुत आश्चर्य है। वे सोचती हैं—'अहो, इसका वह कौन-सा कुशल कर्म है, जो मोहनाधरसुधाका पान करता है और सच्छिद्र रहकर भी उसे छिपाकर रखता है। किसीको पता ही नहीं लगता कि इसने अधरसुधा-रस पान किया है। स्थिर और जंगम अपनी प्रकृतिसे च्युत हो गये, सुध-बुध भूल गये, पर इसने तो अधरसुधाको खूब अघाकर पान करके भी ऐसा गुप्त रखा है, जैसे कृपणका धन। बड़ी चतुराई है, बड़ी धीरता है। हाँ, इसने सोचा है यदि मैं हरी-भरी हो गयी, हमारी सुस्वाद-मर्मज्ञता प्रकट हो गयी तो फिर बजनेलायक न रहूँगी, फेंक दी जाऊँगी। वह आनन्द किस कामका, जो फिर फेंक दी जाऊँ? गोपांगनाएँ सोचती हैं कि इस तरह मोहनके विप्रयोगभयसे वह वंशी अपने आनन्दको छिपाती है, परंतु हम तो बावरी, पागल हो जाती हैं।' इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि गोपांगनाएँ प्रेमको छिपा रखनेमें महत्त्व समझती हैं, पर वह अवांछनीय विक्षिप्तता बरबस प्रकट हो जाती है। 'वृन्दावनचम्पू' में गोपांगनाओंके प्रेमको साठीके धानकी उपमा दी गयी है। उनका सिद्धान्त है—'गुप्त प्रेम सखि सदा दुरइये।' प्रेममें 'टोना' लग जाता है। उसे अवश्य छिपाना चाहिये। फिर वह बहुत बेश- कीमत है, मूल्यवान् वस्तु सात तालेके भीतर धरी जाती है। जब 'चिन्तामणि' पत्थर-जैसी वस्तु भी छिपाकर रखी जाती है, तब प्रेमका तो उससे कहीं अधिक महत्त्व है। पर आज तो प्रेमका ढिंढोरा पीटा जाता है। श्रीश्यामसुन्दरकी अधरसुधाका पान करके अन्य जड़-चेतनोंकी तरह मुरलीको भी आनन्द आता है, पर वह चतुर है, विप्रयोग-भयसे, 'टोना' के भयसे उसे छिपाती है। इस प्रकार तात्पर्य यही कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनादि-समुत्थ यह रस ही ऐसा अलौकिक है कि इसकी परम्परामें भी आस्वाद है,
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९३ इसीलिये ब्रह्मादि देवगण व्रजवासियोंके हृषीकचषकमात्र भी बनकर अपनेको कृतार्थ समझते हैं—'एतावत्तैव हि वयं बत भूरिभागाः।' विरहव्याकुल गोपांगनाओंका मन एक क्षणके लिये भी श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनके चिन्तनसे मुक्त नहीं होता। वे कभी श्रीश्यामसुन्दर नवलबिहारीके अलौकिक रसका, उसकी परम्परामें भी अनुभूतिका तो कभी उनके अंगके संगी आभूषण आदिका चिन्तन, मनन, उनमें गुण-दोषका आरोप, अधिकार-अनधिकारकी चर्चा आदि करती हुईं प्राणप्यारेके अन्वेषणमें व्यग्र हैं। श्रीव्रजराजकिशोरकी मालाका स्मरणकर व्रजदेवियोंको भावना हुई—सखियो, देखो, हमसे अधिक सयानी तो वे सुमन (पुष्प), मुक्ता, हीरक आदिकी मालाएँ हैं, जो कभी उनका संग नहीं छोड़तीं। वे जड़ होकर भी कितनी विवेकसम्पन्न हैं और हम कामपरवश स्त्री अतएव मुग्धता या मूढ़तावश उनका साथ छोड़ बैठी हैं। हाय, कामपरवशात् स्त्री जगत्में मुक्ता, हीरक आदिसे भी—कंकड़-पत्थर आदिसे भी अधिक विचारशून्य है। दूसरा भाव यह भी है कि जब सुमन, मुक्ता, हीरक आदि भी उन श्रीश्यामसुन्दरको नहीं छोड़ सकते, तब हम कामके वशमें पड़ी हुई स्त्रियाँ कैसे छोड़ दें? कैसे उन्हें भुला दें— अहो सुमनसो मुक्ता वज्राण्यपि हरेरुरः । न त्यजन्ति वयन्तत्र का वा स्मरवशः स्त्रियः ॥ श्रीश्यामसुन्दरके कण्ठमें, वक्षःस्थलपर मुक्तामालाएँ हैं, मानो इन्द्रनीलमणिके शिखरपर गंगाकी दो धारा, किंवा नवनीलनीरदपर हंसोंकी पंक्ति, काली घटापर हंसोंकी दो पंक्तिके समान विराज रही हैं। मालामें विविध मणि, रत्न जड़े हैं, कोई सूर्यके सदृश देदीप्यमान, कोई चन्द्रके समान समुज्ज्वल और कोई नक्षत्रोंकी तरह प्रकाशमान है। ऐसी वनमाला, मुक्तामाला, वैजयन्तीमाला आदि अनेक मालाएँ श्रीप्रभुने धारण की हैं। गोपांगनाओंकी इसपर एक और ऊँची सूझ है। वे कहती हैं—ये सुमनस केवल सुमनस—पुष्प नहीं, किंतु शोभन-तत्त्वचिन्तानुकूल मनवाले तत्त्वज्ञ ही सुमनस—पुष्पके रूपमें अनन्त तपस्या करके श्रीहरिके विशाल वक्षःस्थलपर विराजमान हुए हैं और ये मुक्त हुए मुक्त—वामदेव, वसिष्ठ, शुक, सनकादि हैं, जो मुक्त होकर—मोती बनकर हमारे प्यारेके अंगमें आ विराजते हैं। ये भी हमारे श्यामके उरको नहीं छोड़ना चाहते। ये क्यों रागी हो गये, जो विरक्त हैं? वहाँ तो हमें ही रहना चाहिये। सखि, हम तो स्त्री हैं, अशेषशेखरमें हमारा तो राग युक्त है, पर इन जड़ मुक्ता, वज्र आदिका वहाँ क्या काम ? जब ये नहीं छोड़ते, तब हम स्त्रियाँ कैसे छोड़ें ? श्रीश्यामसुन्दरके कर्णाभरणादिके प्रति व्रजांग- नाओंकी ईर्ष्या देखते ही बनती है। श्रीत्रिभुवनमोहनने कानोंमें मकराकृति कुण्डल पहने हैं, जब उनका सिर हिलता है, तब वे कुण्डल या उनकी आभा स्वच्छ, स्निग्ध कपोलोंसे टकराती है, उस समय मालूम होता है कि मीन भगवान्के कपोलोंका चुम्बन कर रहे हैं। इसे देखकर व्रजांगना रसोद्रेकमें विह्वल हो जाती हैं, उन्हें ईर्ष्या होती है, वे कह उठती हैं—'हा मीन, आज मधुर कपोलोंका, जो हमारे ही हैं, तुम चुम्बन कर रहे हो।' इसी सम्पर्कमें उन्हें अन्य श्यामांगसंगियोंके प्रति भी सापत्न्य उदय हो आता है। वे वंशीसे कहती हैं—हे मुरलिके ! अधिकारिणी तो हम हैं और तुम इस अधरसुधाका लम्पटता, अकृपणतासे पान कर रही हो। हे माले ! हमसे बिना ही पूछे—हमारी अनुमतिके बिना ही हमारे प्रियतमके श्रीअंगका निरन्तर परिरम्भण कर रही हो अथवा ठीक है, तुम सब जगज्जालसे परे—विधि-निषेधसे दूर हो गयी हो, तुम्हारी तपस्याके सूखे वृक्षमें आज फल लग गये हैं, सौभाग्यका उदय हुआ है। हम तो विधि-निषेधमें बँधी हैं, जंगलोंमें भटक रही हैं। इस तरह कृष्णप्रेममें प्रमत्त व्रजदेवियाँ अचेतनोंको चेतन ही जानकर उलाहना दे रही हैं। इसी प्रकार वृक्षोंके प्रति धारणा करती हैं और कहती हैं—जिन कदम्ब, आम्र, प्रियाल आदिका आश्रय लेकर श्यामसुन्दर विराजते हैं, वे अवश्य हमें उनसे मिलायेंगे और कहती हैं, हे प्रियके आलय प्रियाल ! तुम हमें श्यामसे मिला दो, हम तुम्हारा बड़ा उपकार मानेंगी। इस प्रकार गोपदेवियाँ श्रीकृष्ण परमात्माके
३९४ भक्तिसुधा विप्रयोगमें सन्तप्त प्रेममुग्ध हुईं उन्हें ढूँढ़ती, वृक्षोंसे पूछती फिरती हैं— चूतप्रियालपनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्ववकुलाम्रकदम्बनीपाः । येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।९) यह बात कही जा चुकी है कि व्रजांगनाओंको जबतक उत्तरकी आशा रहती है, तबतक खूब स्तुति, गुणगान करती हैं और उस आशाके निराशामें बदलते ही दोषोंका गान करने लगती हैं। पहले प्रियालकी बड़ी स्तुति हुई। जब देखा कि यह जरा भी नहीं पसीजता, तब कहने लगीं—'प्रियं न लातीति प्रियालः (प्रिय-अ) नञ् (लः) प्रियप्राप्तौ प्रतिबन्धकः।' जो प्रियका पता न दे, उसके सम्मिलनमें व्यवधान उपस्थित करे, वह पापी प्रायश्च
परंतु तुम इन सबको मात करते हो; क्योंकि तुम सर्वात्मा, सर्वान्तर्यामी प्राणेश्वरका दान करते हो, तुम महादानी हो।' रात्रि भी दानी है—(‘स्त्री-राति, त्राति इति रात्री') परंतु किसका दान, किसका पालन, यह भी तो विचारणीय है। देव और पात्रके महत्त्वसे दानकी महिमा है। दस रुपयेका दान और गायका दान समान नहीं है। माघमें दस रुपयेका दान और तिलका दान समान नहीं है। कंकड़-पत्थरका दान और सर्वात्माका दान समान नहीं है। फिर किसको देना, पात्रका भारी महत्त्व है। एक तो दानका द्रव्य पाकर उसका आटा लेकर मछली पकड़ेगा और दूसरा उससे श्रीसदाशिव विश्वनाथके मन्दिरमें, श्रीहरिमन्दिरमें दीपक जलायेगा। कितना अन्तर है—गृहीताके उपयोगका ? इसीके अनुसार दाताको जो फलकी प्राप्ति होगी, उसमें भी महान् अन्तर है। वायसरायका कुत्ता भी धनी है, जो सुख महाधनीको नहीं, वह उस कुत्तेको है। हीन देश, काल, पात्रके दानकी महिमासे वह उस दानके फलको कुत्ता बनकर भोग रहा है। ज्ञान या भगवद्विद्याके दान आदिका फल कुत्ता बनकर नहीं भोगा जाता। वह वैकुण्ठादिमें जाकर या मनुष्य, उत्तम ब्राह्मण आदि बनकर ही मिलेगा। अतएव ऐसे विद्यालय आदि खोलने चाहिये, जिनसे अपने माता-पिता आदिकी, अपनी सद्गति हो। 'व्रजांगनाओंके कात्यायनीव्रत, अर्चनसे प्रसन्न होकर भगवान् कृष्णने उन्हें रात्रियोंका दान दिया—'मयेमा रंस्यथ क्षपाः।' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) उन रात्रियोंमें रमणका भगवान्ने स्मरण भी किया है— 'तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण।' (श्रीमद्भा० ११।१२।११) ‘...ता रात्री:...’ रात्री:—दान देनेवाली—ये बड़ी दानी हैं। गोपियोंको दान दिया—‘इमाः क्षपाः' उस समय मूर्तिमती रात्रि आयी। खजांची देय वस्तु सामने लाकर रखता है। योगमायाने रात्रियोंको सामने लाकर रखा। भगवान्ने कहा—'इन रात्रियोंमें मेरे साथ रमण करें।' योगमायासे अनन्त करोड़ ब्राह्मी रात्रियोंमें चार घड़ीकी रात्रि प्रविष्ट हुई। श्रीकृष्णके बालसखा मधुमंगलकी माता पूर्णमासी योगमाया ही थी, उसकी महिमासे एक रात्रिमें उन रात्रियोंका प्रवेश हुआ। दुःखमें एक-एक क्षण वर्षोंके बराबर बीतते हैं— 'क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत् ॥' (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) और सुखमें वर्ष-के-वर्ष एक क्षणके समान बीतते हैं। वृन्दावनका प्रमाण बहुत प्रशस्त माना गया है, इतना प्रशस्त कि उसका मध्यभाग 'गोवर्द्धन' है—'मध्ये गोवर्द्धनं तत्र।' परंतु व्रजांगनाओंकी कोटि-कोटि संख्या थी। इतनी अधिक उस विशाल वृन्दावनमें भी न आ सकीं। इनके अतिरिक्त कितनी ही श्रीराधाजीके रोम-रोमसे उत्पन्न हुई थीं और श्रुतिरूपा, मुनिरूपा अलग थीं, फिर इन सबके केलिधाम अलग तैयार थे। विहारके उपयुक्त कुंज आदि भी उसी प्रकार बने थे। यह सब पूर्ववर्णित रात्रियोंकी तरह यहाँ नित्य वृन्दावनधाम भी प्रकट हुआ था, जिसमें सब सविकास समा गये। हाँ, तो इन रात्रियोंका महादानीपना क्या हुआ? इन्होंने कौन महादान दिया? इन्होंने ब्रह्मविद्याका—पुरुषोत्तमविद्याका दान किया। 'जीवाभयप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।' इतना ही नहीं, इन्होंने साक्षात् श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दका ही दान किया। वह भी किनको? उन व्रजदेवियोंको, जिनके पादरजके लिये ब्रह्मादि तरसते हैं, जो प्रेमपथिकोंकी परम आचार्य हैं। वह दान वृथा नहीं है। 'वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्' की तरह नहीं है। ये तो उस दानकी परम अधिकारिणी हैं, उसके लिये लालायित रहती हैं। उनके दर्शनमें पलक पड़नेको विघ्न मानती हैं, ब्रह्माको कोसती हैं—'सखि, जड है विधाता।' ऐसे पात्रोंको इन रात्रियोंने दान दिया श्रीश्यामसुन्दरका और इसीसे उनका रक्षण भी किया। अन्यथा उनका रक्षण होना ही दुःशक था। फिर यह दान पवित्र देश वृन्दावन और तदनुकूल कालमें हुआ। यह श्रीशुकदेवकृत वर्णन है। योगीन्द्रवन्द्यपादारविन्द गोपांगना कोविदारकी स्तुति करती हैं। देश, काल, पात्र, देशकी महत्ता बतलाती हैं, उन रात्रियोंने उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररूप रसिकशेखरका दान किया, यमुनाके किनारे, साक्षात् प्रेमद्रवके पास और परमवियोगिनियोंको। भूखेको दान
३. तृतीय तरंग: शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य एवं मधुर रस दार्शनिक समन्वय
देनेका बड़ा महत्त्व है। 'कोविदार'! ऐसा देश, काल, पात्र न मिलेगा। बतलाओ, हमारे प्राणधन श्यामसुन्दर कहाँ हैं? किस ओर गये हैं?' कोविदार एक तो वृक्ष, वैसे ही जड़ और उनकी प्रेमदशा, उनकी बातोंसे और भी वह स्तब्ध-सा हो गया, कुछ कहता ही नहीं। उसके इस व्यवहारसे गोपांगनाओंमें असूयाका उदय हो आया। वे कहने लगीं- 'सखियो! यह 'कोविदेभ्यो न रातीति कोविदारः' है। यह केवल 'कुं भूमिं विदारयतीति कोविदारः' है। यह तो 'मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारः' है।' 'चलो, आगे उस जामुनसे पूछें, उसका वर्ण श्यामसरीखा है।' तारीफमें उसे 'जी जये' से उणादि निष्पन्न करती हैं और असूयामें वही 'जी अभिभवे' से बननेका अधिकारी हो जाता है। आगे मार्गमें 'अर्क' (आक) पड़ा, उससे भी व्रजांगनाओंने अपने प्राणप्रियका पता पूछा। व्रजांगनाओंसे किसीने कहा- 'बड़े-बड़े महाफली वृक्षोंसे पूछकर अब इस क्षुद्रसे क्या पूछोगी?' तब कहने लगीं- 'नहीं, यह गोपीश्वर (वृन्दावनस्थ महादेव)-का प्रेमी है, उनके मस्तकपर विराजता है, वे इसको पाकर भक्तोंके अभीष्ट पूर्ण कर देते हैं। यह अवश्य प्रष्टव्य है। दूसरे, चन्द्रावली (प्रतिनायिका) आदिसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं। यह सूर्यकी तरह हमारे प्रिय-विश्लेषजन्य दुःखरूप तमको दूर कर सकता है। यह 'ऋणादि प्रियं गमयति इति अर्कः' है। हे अर्क! हे शिवप्रिय! हमें श्यामसे मिला दो।' जब वह भी नहीं बोलता, तब असूयासे कहती हैं- 'यह बौड़मके पास रहनेसे बौड़म हो गया है, विषवृक्ष है, इसे किसीके सुख- दुःखका क्या पता? हम यह कुछ असूयासे नहीं कहतीं। देखो, इसके स्वामी जैसे अस्सी हजार वर्षकी अखण्ड समाधिमें बैठते हैं, वैसे ही यह भी समाधिमें बैठा है।' परंतु भोलेबाबाकी यहाँ (वृन्दावन)-की समाधि और है। कैलासकी समाधिमें वे अग्राह्य स्वात्मस्वरूपमें लीन होते हैं, यहाँकी समाधिमें वे श्रीश्यामसुन्दरकी पदनखमणि-चन्द्रिकामें विलीन होते हैं।' मधुसूदन सरस्वतीने कहा है- पादनखनिविष्टमूर्तिक एकादशतामिवावहन्नित्यम्। यं समुपासते गिरिशस्तं वन्दे नन्दमन्दिरे कञ्चित्॥ भक्तिकी दस अवस्थाओंमें शिव सन्तुष्ट न हुए, उन्होंने ग्यारहवीं निष्ठाको स्वीकार किया। वैसे 'शिवस्य हृदयं विष्णुः' तो है ही। नन्दप्रांगणमें जाकर एक बार 'श्रीसदाशिवने श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनको प्रणाम किया। श्यामल, महोमयरूप श्रीकृष्णकी नीलकमलके समान अँगुलीयाँ हैं, उनपर दस नख मणिके जैसे हैं, जो अनन्त ब्रह्माण्डको जगमगा देते हैं- 'ज्योत्स्नाभिराहतमहद्दृढद्या- न्धकारम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२८।२१) (महताम् - सनकादिशुकादीनां हृदयान्धकारम् आहतं भवति। 'ज्योत्स्नाभिराहतमिव हृदयान्धकारम्।' उससे सब अज्ञानान्धकार मिट जाता है। भगवान् शिव जब नन्दबाबाके प्रांगणमें आये और वहाँ क्रीड़ामग्न श्रीश्यामसुन्दरको प्रणाम करनेके लिये झुके, तब प्रभुके नखोंमें उनकी मूर्ति प्रतिबिम्बित हुई। जिस भगवत्प्रसादको श्रीः - जाया, संकर्षण - बन्धु और आत्मा स्वयं भी न ले सके, उसे श्रीसदाशिवने प्राप्त किया। कुन्द और इन्दु की तरह स्वच्छ धवलिमा, मनोहर दीप्तिवाली देह और दुग्धधवल धाराके समान प्रवहणशील गंगाको सिरपर धारण किये तथा कोटि- कोटि कामोंको लजानेवाला श्रीशिवका मुख जिन नखोंमें प्रतिबिम्बित हुआ, वह पादारविन्द कितना स्वच्छ होगा? श्रीप्रभुके पादारविन्दके ऊपरका भाग श्यामल-महोमयं-दीप्ति-सम्पन्न, नीचेका भाग सुकोमल लाल और उसपर स्वच्छ नख हैं, उनमें शिवका प्रतिबिम्ब चमकृत है।' प्रभुका पादारविन्द कल्पवृक्ष आदि विविध चित्रोंसे अलंकृत था, केवल नखमें कोई चित्र नहीं था, श्रीसदाशिवके प्रतिबिम्बने उसे स्वकायचित्रसे अलंकृत कर दिया। श्रीशिव वहीं उपासनाकी अलौकिक समाधिमें लीन हो गये। तात्पर्य यह कि श्रीभोलेबाबाकी यहाँकी-व्रजकी समाधि तो यह है। गोपियाँ कहती हैं- 'सखि ! यह श्रीशिवका साथी अर्क भी, मालूम होता है, ऐसी ही किसी समाधिमें लीन है। चलो और किसीसे पूछेंगी।' इस प्रकार प्रेमविह्वल गोपांगनाएँ प्रिय मोहनको
ढूँढ़ती हैं, वृक्षोंसे पूछती फिरती हैं, कोई भी उन्हें बतलाता नहीं, परंतु उनके उत्साहमें कमी, अश्रद्धा न आयी। अर्कको छोड़कर वे बिल्व के समीप पहुँचीं। रूप देखकर उन्हें उसका नाम याद आ गया। कहने लगीं—'इसका नाम बड़ा अच्छा है—बिल्व। 'विरुद्धं लुनातीति बिल्वः' ये वृन्दावनके बिल्व ही श्यामप्राप्ति प्रतिबन्धका लवन—छेदन करते हैं। हे बिल्व ! हमें एक बार प्यारे मनमोहनके दर्शन करा दो, हम तुम्हारा बड़ा उपकार मानेंगी। तुम हमारी सखी लक्ष्मीके वृक्ष हो, श्रीवृक्ष हो। लक्ष्मी हमारे श्यामसुन्दरकी प्रेयसी हैं। हमारा पक्षपात करो, श्रीश्याम-प्रतिबन्ध-संयोगको मिटाकर शीघ्र प्राणधनसे मिला दो।' इस तरह गोपांगनाओंने प्रार्थना की, थोड़ी देर खड़ी रहीं, परंतु बिल्वकी ओरसे भी उन्हें कोई आश्वासन न मिला। निराशाकी साँस छोड़कर वे बोलीं—'गोपीश्वरके सम्बन्धसे यह भी समाधिष्ठ प्रतीत हो रहा है, नहीं तो कुछ बोलता न?' कोई कहती है—'सखि, इसका तो नाम हमारे लिये उलटा पड़ गया, यह तो 'अस्मन्मनोरथान् विशेषेण लुनातीति बिल्वः' हो गया। इससे अब आशा रखनी व्यर्थ है।' 'चलो, वह सामने बकुल दिख रहा है, उससे पूछेंगी। हे बकुल ! आप शिव और विष्णु दोनोंके भक्त हैं और अपने भक्तिभावसे दोनोंको भूमिपर ले आनेवाले हैं—'उश्च अश्च अनयोः समाहारो वः तौ कौ लाति (ला आदाने) आनयतीति वकुलः' हे हरिहरपरायण ! अपने प्रेमयोगसे हरिहरको यहाँ ले आनेवाले हे बकुल ! हम तुम्हें नमन करती हैं, हमारे प्राणधन मोहन प्यारेको यहाँ ला दो, उनसे हमें भी मिला दो अथवा पता ही बतला दो, वे किधर गये हैं?' कुछ प्रतीक्षाके बाद कहती हैं—'सखियो ! यह नहीं बतलायेगा; क्योंकि यह शिव और विष्णुका भक्त है, ये दोनों उन निष्ठुर श्यामसुन्दरके ही पक्षपाती हैं, उनका यह भक्त हमें कैसे बतलायेगा ? यह तो महापक्षपाती है।' व्रजांगनाओंकी यह निन्दा, निन्दा नहीं, ये तो प्रेमकी बातें हैं—'ब्रजकी गारी'। ऐसी असूया तो इन्हें श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मासे भी होती है। ये तो उनके चरितसे भी असूया करती हैं। यह इनकी प्रेममयी असूया है। प्रसन्न रहती हैं, तब स्तुति करती हैं— तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।९) कहती हैं—'ईर्ष्या देवताओंमें भी लगी रहती है, पर आपकी कथामें यह नहीं है। आपके गुणोंका गान सनकादि क्रान्तदर्शियोंने किया है। वे देवोंका गुणगान नहीं करते। देवता अमृतकलश लेकर श्रीशुकादिके समीप आये और उन्होंने बदलेमें अमृत देकर आपकी कथा चाही। आपके भक्त कथाप्रेमी श्रीशुकादिने उसका तिरस्कार कर दिया। कहाँ कथा और कहाँ अमृत ? मणिका काँचसे कौन मनीषी परिवर्तन करेगा?— 'क्व सुधा क्व कथा लोके क्व काचः क्व मणिर्महान्।' (श्रीमद्भागवत, माहात्म्य १।१६) आसन्नमृत्यु राजा परीक्षित्ने भी देवोंका इसपर उपहास किया। योगीन्द्र-मुनीन्द्र भी आपकी कथाकी स्तुति करते हैं। आपकी कथा; शोभा और लक्ष्मी दोनोंसे सम्पन्न है, लोकमें व्याप्त है। देवोंका अमृत एक जगह रखा है, महानाग उसकी रक्षा करते हैं। आपकी कथासुधाका दान होता है। इसके दाता महान् हो जाते हैं।' परंतु जब व्रजांगनाओंके प्रेमपाथोधिमें ईर्ष्याकी तरंग उठती है, तब वे उसकी भरपेट निन्दा भी करती हैं, कहती हैं—'आपकी कथा क्या है, मनुष्यकी साक्षात् मृत्यु है। कोई विरहिणी आपकी कथा सुनकर दुःख मोल लेती है, कथाके सुननेसे उनका विप्रयोगसन्निपात तीव्र हो जाता है। आपकी विस्मृतिमें वह सुखसे रहती है। उसको होशमें लानेकी दवा आपकी कथाका त्याग है।' यही कहा है— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः । स्मारय किमपि तदितरद् विस्मारय हन्त मोहनं मनसः ॥ अर्थात् उनकी कथा मत छेड़ो, यदि इस सखीको थोड़ा भी सुख-शान्ति देना चाहती हो। जैसे भी बने, इसके मनसे मोहनको भुलवा दो, उसकी कथा मत चलाओ। उसके आवेशमें इसकी व्रीडा विलुप्त हो जाती है, धैर्यका बाँध टूट जाता है—'व्रीडां विलोपयति मुञ्चति धैर्यम्।' बस, उस विरहिणीके लिये आपकी कथा ही मरण है, जलेमें नमक छिड़कना है। जैसे
यहाँ पृष्ठ ३१८ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:
३१८ भक्तिसुधा तैलपूर्ण महाकटाह भट्ठेपर चढ़ा हो, नीचे खूब आग की—'सखि! जब हमारे रोने-धोनेसे वे निष्ठुर श्यामसुन्दर धधक रही हो, तैल खूब परितप्त हो चुका हो और भी प्रसन्न होते हैं, तब इसकी तो बात ही क्या?' २-३ सेर महाविष भी मिला हो, उसमें पड़ा एक कीट अच्छा सखियो, देखो, वह सामने आम्र दिख कितना जीयेगा ('तप्ते कटाह यथा जीवनम्')। रहा है, उसके पत्ते हिल रहे हैं, मालूम पड़ता है, वह हम विरहिणी व्रजांगनाओंके जीवनके लिये आपकी अपनी पल्लवांगुलियोंसे हमें बुला रहा है, चलो, कथा वही सुतप्त तैलपूर्ण कटाह-पातके जैसी है। फिर उससे पूछें। कितना सुन्दर नाम है—'आम्रः अमयति कथा सुननेसे एक गहरी वेदना, सन्ताप यह होता है श्रीकृष्णं अथवा अम्यते प्राप्यते सेव्यते कि जो हमारे अन्तःकरणमें बसा है, हमारे अंग-अंगसे अर्थाभिलाषुकैयैः।' आम काटनेवालेको पछताना सम्मिलित रहता है हाय, हम आज उसकी कथामान्न पड़ता है, यह देववृक्ष है। यह वृन्दावनस्थ आम्र ही सुन रही हैं, क्या आज हमें उसका वियोग है, श्रीश्यामसुन्दरको मिलानेवाला है। यह 'रसाल' है, समालिंगन नहीं प्राप्त है? उस अवसरपर उसकी कथा, रसनिर्यांस श्रीश्यामसुन्दरको समर्पण करता है ('रस- केवल कथा, वही काम करती है, जो तप्ततैलपूर्ण मालातीति रसालः')। हे रसाल! यदि रस न दो तो महाकटाहमें जलकी बूँदें—'तप्ते कटाह जीवनम्- तुम फिर 'रसाल' ही कैसे? रस तो प्राणप्यारे जलमिव।' उस समय जैसे कटाहमें आग भभक नन्ददुलारे ही हैं—'रसो वै सः' वे ही हैं, अवश्य उठती है, हमारे हृदयमें वैसे ही प्रिय-विरह-वैश्वानरकी उन्हें बतलाओ। जब असूयापर उतरीं, तब कहती महाज्वाला प्रदीप्त हो उठती है। यदि कोई पूछे कि हैं—कुछ नहीं जी, यह रस-वस कुछ नहीं देता, यह इतनी दुःखद मरणप्रद यह कथा है तो इसको लोग तो रोग देता है—'अमयति रोगं यच्छतीत्याम्रः।' क्यों गाते हैं? इसपर कहती हैं—इसे गाते कौन हैं? रातको इसके नीचे सोनेपर बीमारी निश्चित है। जाने कवि न! कवि क्या नहीं कहते?—'कवयः किन्न दो सखि इसे। जल्पन्ति।' वे तो भैंसकी भी तारीफ करते हैं। फिर 'चलो अपने उस 'कदम्ब' के पास चलें। जैसे यह कथा 'श्रवणमात्रे मङ्गलम्' है, किंतु 'परिणामे श्रीरामका सिंहासन कल्पवृक्ष है, वैसे प्यारेका सिंहासन दुःखदम् अमङ्गलम्' है। जिसने इस कथाको सुना, यह कदम्ब है। सप्तावरण, अष्ट प्रकृतिके भीतर जो वह बाबा बनकर भीख माँगता है। 'राधेश्याम, वृन्दावन है, उसमें यह कदम्ब है। इसकी स्तुतिमें नारायण, हरि' कहकर गली-गली टुकड़ा माँगता भगवान् व्यासने क्या अच्छा कहा है— फिरता है। प्रश्न होगा—ऐसी चीजका दुनियामें विस्तार 'कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससम्।' (श्रीमद्भा० कैसे हो गया? तो उत्तर यही है कि प्रमादी धनियोंने २।२।९) इसका सौगन्ध्य, इसके फल सब लोकोत्तर कष्ट देनेके लिये उसे दुनियामें फैला दिया है— हैं। आनन्दकन्द, वृन्दावनचन्द्र यशोदानन्दके भी 'श्रीमदाततम्।' किंच जो उस कथाको गाते फिरते मनोरथोंको यह पूर्ण करता है—'कं प्रेमात्मकं सुखं हैं, उनके लिये हम क्या कहें, वे तो सर्वस्वनाशक हैं। ददातीति कदः।' साधारण क्षुद्रानन्दको देनेवाले 'भुवि गृणन्ति ते, भूरिदा जनाः' ('भूरीणि द्यन्ति बहुत हैं। वे श्रीघनश्याम उदार हैं, घन पात्रका विचार दोऽवखण्डने') चित्रकेतु कर घरु उन घाला। नहीं करते। श्यामल घन भी जीवन-जलरूप- कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥' (रा०च०मा० परमामृतका खूब वर्षण करते हैं। यह जल केवल १।७९।२) इन ऐसे लोगोंने राजा चित्रकेतुको लाखों जीवन है, पर श्रीश्याम तो साक्षात् जीवन हैं। रानियोंसे वियुक्त कराकर वन-वनमें भटकाया। प्रह्लादको यह घन-नवनीलनीरद-दामिनीसे आवेष्टित है और गर्भमें ही ऐसा पढ़ाया कि बेचारेका वंश ही मिट गया। वे घनश्याम कनकलतावेष्टित-श्रीवृषभानुनन्दिनीसे व्रजांगनाओंकी यह सब असूया प्रेमोन्मादकी विचित्र आवेष्टित हैं।' यहाँ दामिनीस्थानीया श्रीवृषभानुनन्दिनी दशा है। उसी दशामें ग्रस्त उन्होंने बकुलकी भी निन्दा हैं। दामिनीको देखकर श्रीजीको ईर्ष्या होती है—
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९९ तडितः पुण्यशालिन्यो याः सदा घनजीविताः। तेन सार्द्धं व्यदृश्यन्त न व्यदृश्यन्त कर्हिचित्॥ अर्थात् ये सौदामिनी धन्य हैं, जिनका घन ही जीवन है। ये सदा अपने प्रियके अंगमें ही दीखती हैं। घनके बिना इनका दर्शन ही नहीं होता। व्रजांगना भी इसकी प्रशंसा करती हैं—'सखि, तुमने कौन देश, तीर्थमें कितने दिन पवित्र तपस्या की है, जो श्याम- मेघके उरमें, जो श्रीहरिके वक्षःस्थलके समान है, सदा रमण करती हो?—'अयि तडित् त्वमसौ क्व नु किन्तपः यदिदमम्बुधरं हरिवक्षसस्तुलितम्।' 'गोपालचम्पू' में एक भाव है—जब श्रीव्रजेन्द्रनन्दिनी मेघकी श्यामलताको देखतीं, तब उड़कर वहाँ पहुँचनेका यत्न करतीं। उन्हें प्रत्यक्ष ही भान होता कि यह मेरे प्राणप्यारेका उरःस्थल है, शीघ्र आलिंगन करूँ। चैतन्य महाप्रभुकी भी ऐसी ही स्थिति थी—वे भी जब मेघका दर्शन करते, तब समुद्रकी ओर दौड़ पड़ते। श्रीघनश्यामके आकर्षक सौन्दर्यकी स्तुति गौड़ब्रह्मानन्दीकारने अपनी वन्दनामें भी की है'— नमो नवघनश्यामकामकामितदेहिने। कमलाकामसौदामणकामुकगेहिने ॥ अर्थात् जिनका देहसौन्दर्य कामदेवके भी द्वारा वांछित हुआ, दूसरोंको महावैभवप्रदाता होकर भी जिन्होंने लक्ष्मीकी इच्छा रखनेवाले सुदामा ब्राह्मणके कणोंको चाहा और ग्रहण किया, उन नवीन घनके समान श्यामको मैं नमस्कार करता हूँ। लोकमें प्रायः देखा जाता है—कामद्वारा लोगोंकी कामना होती है, परंतु यहाँ तो उन व्रजेन्द्रचन्द्रकी अपूर्व छविमाधुरीपर काम भी मुग्ध हो गया। वह उन प्रभुपादारविन्दकी नखमणिचन्द्रिकाकी छटाको दूरसे ही देखकर इतना व्यामुग्ध हुआ कि अपनी सब सुध-बुध भूल गया, मूर्च्छित होकर कहीं आप गिरा और कहीं धनुष; कुछ होश आनेपर उसने विचार किया, अब खूब उग्र तपस्या करके कामिनी बनकर इस नखमणिचन्द्रिकाका सेवन करूँ, तब जन्म सफल हो। वह पुंस्त्वको मिटाकर स्त्रीत्व-प्राप्तिके लिये तपस्याका निश्चय करता है— 'कामैरपि कामितो देहो यस्य।' एक क्या, सैकड़ों और सहस्रों काम उस त्रिभंगललितके लावण्यपर न्यौछावर हो गये। अस्तु, प्राकृत मेघमें और इस मेघमें बहुत अन्तर है, वह पात्रापात्रका विवेक नहीं करता, यह लताओंको भी प्रेम-रस देता है— सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतोभद्राः । कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ? उस महोमयी मूर्ति मेघने सबमें प्रेमरस बरसाया। रसालको तो परिपूर्ण ही किया। कदम्बकी तो बात ही क्या, उसे तो आत्मसमर्पण ही कर दिया। उसीके प्रेमानन्दकी वर्षा करनेवाले हुए 'कदा' और उन्हें 'वातीति कदम्बः।' यह वह कदम्ब है। जिसने इसका सेवन किया, श्रीराधावेष्टित कृष्णका—घनश्यामका ध्यान किया, उसे यह श्रीश्यामसुन्दरको दे देता है। 'अतः हे कदम्ब ! हे सर्वानन्ददाता ! हमें प्राणप्यारेको बतला दो'—'शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।९) 'कदम्ब' और 'नीप' एक ही वस्तु है, भेद इतना ही है कि नीप रजःप्रधान एवं बड़े पुष्पवाला होता है और कदम्बके पुष्प छोटे होते हैं। 'नयति—प्रापयति मोहनमिति नीपः।' इसकी भी व्रजांगनाओंने खूब स्तुति की—'हे नीप! तुमपर मोहन बड़े मुग्ध रहते हैं, तुम्हारे बड़े-बड़े फूलोंकी माला उन्हें खूब पसन्द है। तुम्हारी सुगन्ध उनको खूब प्रिय है। तुम्हारी ठण्डी छायामें बैठकर वे वंशीकी मधुर ध्वनिसे वृन्दावनको गुंजार देते हैं। हे मोहनके प्रिय सखा, जरा अपने मित्रका पता देकर हमें भी सुखी करो।' सब तरह प्रयल करनेपर भी जब कदम्बकी ओरसे कोई आशा न मिली, तब निराश व्रजांगनाओंने उसकी निन्दापर कमर कसी। कहने लगीं—'यह कदम्ब है, कदम्बका अर्थ होता है— खोटी माँका बेटा—'कुत्सिता अम्बा यस्य असौ कदम्बः।' इसकी उत्पत्ति काकखातशेषसे होती है। 'नीप' भी ऐसा ही है—'नयति दूरङ्गमयति श्रेयस इति।' व्रजदेवियोंने वृन्दावनके सब वृक्षोंका दरवाजा प्रियकी प्राप्तिके लिये खटखटाया, सबकी स्तुति की, प्रार्थना की, परंतु किसीसे भी उनको आश्वासन नहीं मिला। निराश होकर सभी वृक्षोंको उन्होंने परोपकारकी परीक्षामें 'फेल' कर दिया। 'परार्थभवकाः' आदिका
स्तुतिपक्षमें पहले अर्थ किया जा चुका है, असूयार्थ भी प्रायः उन-उन स्थलोंमें निर्दिष्ट हुआ है। अब उनके विषयमें व्रजांगनाओंने आखिरी फैसला किया— ‘ये परार्थाय भवकाः रुद्राः संहारकाः’ हैं। ‘दूसरोंका नाश करनेके लिये, उनके अर्थका संहार करनेके लिये इन सब वृक्षोंका जन्म है। ये ‘यमुनोपकूलाः’ तीर्थवासी पण्डे हैं, महाकठोर हैं। अच्छा, इनकी करनी ये जानें।’ कहीं ‘भविकम्’ पाठ है, जिसका अर्थ अभ्युदय है अर्थात् ‘दूसरेका माल हड़पनेमें ही ये तीर्थ-पुरोहित अपना अभ्युदय समझते हैं।’ इस प्रसंगमें वृक्षादिसे पूछना, अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना, यह मानिनी व्रजांगनाओंकी बात नहीं है। वृक्षोंसे प्रश्न मानिनियोंने भी किये हैं, पर उनमें भेद है। उनके प्रश्न इस तरहके हुए हैं—‘वृक्षो ! अपने सखा, उन चौरचक्रवर्तीको बतलाओ, वे हमारा ‘मन’ चुराकर ले भागे हैं, किस मार्गसे गये, जरा बतलाओ तो’—‘शंसन्तु कृष्णपदवीम्।’ यदि वृक्ष उपेक्षा करें कि ‘जाने दो व्रजांगनाओ, साधारण वस्तुकी चोरीपर क्यों झगड़ा करती हो’ तो कहती हैं—‘नहीं, उन्होंने हमारी सबसे बड़ी चोरी की है, सर्वस्व लूट लिया है, हमें उन्होंने आत्मासे रहित कर दिया है। कोई देह, गेह, आभूषण आदिसे रहित होता है, हम तो आत्मासे रहित हैं—‘रहितात्र्नाम्।’ आप सब सन्त हो, तीर्थवासी हो, कृपा करो, बतलाओ, हम उस चोरको धरेंगी। देखो, झूठ न बोलना। शपथ देती हैं—‘यमुनोपकूलाः’ यमुनाके किनारे आपलोग खड़े हो। दूसरा मार्ग मत बतला देना।’ जब वृक्ष कुछ उत्तर नहीं देते, तब कहती हैं—‘जाने दो, इनको ज्यादा न छेड़ो, ये प्रेमसमाधिमें मग्न हैं, अतः कैसे बतलायें ?’ गोपांगनाओंद्वारा पृथ्वीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवेात्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) व्रजदेवियाँ अपने प्राणधन श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनको वृन्दावनधाममें सब जगह ढूँढ़ चुकीं, लता, तरु, सबसे पूछ चुकीं, पर कहीं पता न मिला। अन्तमें एक सखी कहती है—‘आप सब यों ही पूछ रही हैं, पहले जिनसे आप पूछ रही हैं, वे उन्हें जानते भी हैं या नहीं, यह तो सोच लो। जो जानता है, वही न बतलायेगा ? अतः उनसे पूछो, जो उन्हें जानें। वृथा ही इन बेचारे तीर्थवासियोंकी निन्दा क्यों करती हो ?’ दूसरी सखी कहती है—‘अच्छा सखि, फिर तुम्हीं बतलाओ, किससे पूछें? कौन उन्हें जानता है ?’ इसपर पहली कहती है—‘पूछना ही है तो इस भूमिसे पूछो, यह उन्हें अवश्य जानती है; क्योंकि वे कहींपर छिपे होंगे तो आखिर पृथ्वीपर ही।’ यह सुनते ही सबकी दृष्टि पृथ्वीपर गयी और वे कहने लगीं—‘ये दूर्वा, तरु, लता इसके रोमांच हैं और यह रोमांच श्रीश्यामसुन्दरके चरण-संस्पर्शसे ही हुआ है। यह बड़ी सौभाग्यशालिनी है।’ पृथ्वीसे कहती हैं—‘हे क्षिते (‘क्षिति’ यह प्रयोग छान्दस है) ! तुमने कौन- सा तप किया है, जिससे यह संयोग तुम्हें प्राप्त हुआ ? यद्यपि हमलोगोंको, गोप, यशोदा आदिको भी उनका संयोग प्राप्त होता है, किंतु वियोग भी होता है। परंतु तुम्हें तो कभी उनका वियोग होता ही नहीं। वे श्यामसुन्दर जहाँ भी जाते हैं, तुम्हें कभी नहीं छोड़ते। देवि ! वह तप हमको भी बतलाओ, हम भी करें और इस तीव्र विरहतापसे सदाके लिये मुक्त हो जायें।’ कदाचित् क्षिति कहे कि इसमें क्या प्रमाण कि मैंने तपस्या की और मुझे श्रीकेशवके चरणका अविच्छिन्न संस्पर्श मिला है ? तो इसपर कहती हैं— ‘केशवके चरणका संस्पर्श बिना तपके नहीं मिलता, तुम्हें वह मिला है, इसका प्रमाण तुम्हारी यह
- ‘भगवान्की प्रेयसी पृथ्वीदेवी ! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की है कि श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके तुम आनन्दसे भर रही हो और तृण-लता आदिके रूपमें अपना रोमांच प्रकट कर रही हो ? तुम्हारा यह उल्लास-विलास श्रीकृष्णके चरणस्पर्शके कारण है अथवा वामनावतारमें विश्वरूप धारण करके उन्होंने तुम्हें जो नापा था, उसके कारण है ? कहीं उनसे भी पहले वराह- भगवान्के अंग-संगके कारण तो तुम्हारी यह दशा नहीं हो रही है ?’
!
And before 'श', there is 'ह्म' with an 'e' matra on top!
So it is indeed: ब्रह्मेशो!
Wait, let me re-examine: is there an 'o' matra on ह्म?
Wait, look at line 32 of col 1: ब्रह्मा, शिव (line 32 of right col: जिस भूमिकी रजको ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मी...).
Here in line 34: यान् ब्रह्मेशो रमा देवी...
Wait, look at the text: ब्रह्मेशो or ब्रह्मोशो?
Let me look with maximum magnification:
It's यान् space ब्र ह्म... wait, above ह्म is an e-matra slanting to the left.
Wait, between ह्म and श, there is a little gap. Is there a kana line? No! It's just the top line.
Wait, why does it look like ब्रह्मेशो? Because it IS ब्रह्मेशो! Sanskrit grammar and the actual Bhāgavatam verse 10.30.34 is:
"यान् ब्रह्मेशो रमा देवी दधुर्मूर्ध्न्याघनुत्तये"
Wait, wait! Let me look at that word again: दधुर्मूर्...
Is it `दध
४०२ भक्तिसुधा
पुत्रवत्सला यशोदा अम्बाने गोचारणके लिये जाने ही क्यों दिया ? वह तो जैसे फणी अपनी मणिको छिपाकर रखे, वैसे अपने लालको अंकमें छिपाकर रखती थी, रातमें भी जाग-जागकर मस्तक सूंघती थी, जैसे रंक अपनी निधिको बराबर टटोले। फिर उसने अपने कन्हैयाको कहीं जाने ही क्यों दिया ? लक्ष्मी व्रजमें सेविका बनकर रहना चाहती थी। फिर वह लक्ष्मी रासेश्वरी विराजमान है, वह भी श्री है 'श्रीयते सर्वगुणैः।' श्री ही हैं एक लक्ष्मी, एक श्रीराधा। पहली 'श्रयते हरिमिति श्रीः' है और दूसरी 'श्रीयते हरिणा या सा श्रीः' सुन्दरता, मृदुता, कोमलता आदि उनकी सेवाके लिये लालायित रहती हैं। 'देवीभागवत' में वर्णित शोभा, शान्ति, कान्ति आदि सब गोपांगनाओंके रूपमें श्रीराधाकी सेविकाएँ हैं। उन्हींकी सरसता आदि लोकमें कणमात्र है। अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत मृदुता, कोमलताकी मूर्तिमती महाशक्ति, जिसके चरणोंमें प्राकृत कमलकी पंखुड़ीके भी गड़ जानेका डर है, वे अपने परम कोमल करोंसे श्रीराधाके चरण-स्पर्श करनेमें सकुचाती हैं कि कहीं आघात न लग जाय। अतः 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्हरिणा च या सा श्रीः' ठीक ही है। जब वृन्दावनमें निवास करें, तब धनकी कैसी कमी ? सैकड़ों नौकर लगाकर गोचारण आदि कराया जा सकता है, फिर स्वयं श्यामसुन्दर भगवान्को वह क्यों करने दिया गया ? परंतु ये तो गोपालकी लीला थी, बाललीला, वनलीला आदि उनके विनोद थे। श्रीमद्वल्लभाचार्यके सिद्धान्तानुसार जगत्के, प्रकृतिके सब तत्त्व उस प्राणप्यारेके आलिंगनके लिये उत्कट उत्कण्ठित हैं। इसके लिये वनकी देवी, वनकी शक्ति कोई दूर्वा, कोई लता, कोई पाषाण आदि बने हैं। यदि वनलीला न हो तो इनकी अभिलाषा कैसे पूर्ण हो ? भगवान् वांछाकल्पतरु कैसे कहे जायँ ? किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०)
पुत्रवत्सला अम्बा यशोदाने अपने लालको गोचारण, वनगमनकी कभी अनुमति नहीं दी। हठीले श्यामसुन्दरके हठ अथवा परिस्थितिसे विवश यशोदाने वैसा होने दिया। परंतु वनगमनकी बात सुनकर नन्दरानी न जाने कितनी बार मूर्च्छित हुई। 'दिनभर कैसे कटेगा' आदि चिन्ता उसके चित्तसे क्षणभरके लिये भी शान्त न होती थी। गोचारणके लिये वन जानेके समयकी गोपालकी मूर्तिको निहारकर गोप, गोपी सब चित्रलिखे-से खड़े रहते, वे सब उनका तबतक एकटक दर्शन करते रहते, जबतक वे अपने सखाओंके साथ ओझल न हो जाते। इसके बाद भी घण्टों उनके पीछे उड़ रही धूलिका दर्शन करते रहते और अन्तमें उनकी विविध चिन्ताओंमें ही बेसुध हो जाते। वन, पक्षी, मृग, जड़, चेतन सबकी यही स्थिति थी। तब नन्दरानीकी स्थिति कैसी होगी, यह वर्णनके बाहर है। इसके साथ एक बात यह भी थी कि छोटे बछड़े श्रीश्याम और श्रीबलरामके साथ इतने मिल- जुल गये थे कि उनके बिना आँगनके बाहर पैर ही नहीं रखते थे। दोनों भैया उनकी पूँछ पकड़कर व्रजकर्दममें खेलते, वे उनको एकटक दृष्टिसे देखते, सूँघते और जिह्वासे चाटते थे। ऐसी स्थितिमें बड़े होकर भी श्रीकन्हैया और श्रीदाऊको छोड़कर डण्डाकी मार खाकर भी वे बाहर जानेका नाम न लेते। किसी समय तो वे स्वयं कृष्ण हो गये। आगे चलकर गायोंने भी बछड़ोंका ही अनुकरण किया, उन्होंने भी अपने प्रिय श्यामसुन्दरके बिना कहीं भी जाना-आना छोड़ दिया। अब तो एक समस्या उपस्थित हो गयी। इधर गोपालन निज धर्म था ही। जहाँ धर्मका सम्बन्ध आया, नन्द, यशोदा दोनों ही मूक हो गये। गर्गाचार्यकी प्रतीक्षा होने लगी। वन, लता, मृगादिके मनोरथ पूर्ण होनेका अवसर आ गया। स्मरण-समकाल ही गर्गजी पधारे और तुरंत दूसरे ही दिन गोपाष्टमीका ही मुहूर्त निकल आया, मानो प्रतीक्षामें ही बैठे थे। परंतु गोपियाँ बड़े कष्टमें पड़ गयीं। जिन्हें एक क्षण भी बिना देखे नहीं रह सकतीं, उनका अब दिनभरके लिये असह्य वियोग कैसे सहा जायगा ? दूसरे, 'इतने मधुर, सुकोमल मनमोहन कण्टकाकीर्ण वनमें कैसे विचरेंगे'
श्रीरासपञ्चाध्यायी ४०३
इस बातकी चिन्ता तो सभीको और भी अधिक कष्ट दे रही थी, परंतु बड़े कष्टसे उन्होंने सब कुछ सहा। गोपजनके कुतूहलमें भावी कष्ट कुछ विस्मृत हुआ। बड़े समारोहसे गोपूजन हुआ। गौ, वत्स वस्त्रालंकारादिसे सजाये गये; धूप, दीप, नैवेद्यके साथ उनकी परिक्रमा, दण्डवत् प्रणाम आदि हुआ। माता यशोदाने, गोपांगनाओंने श्रीश्यामसुन्दरको पादुका पहनकर वन जानेका प्रस्ताव रखा, परंतु उन्होंने अस्वीकार किया, कहा—यह धर्मविरुद्ध है, जब हमारे उपास्य देवता गौएँ बिना पादत्राणके विचरेंगी, तब हम भी वैसे ही रहेंगे। अतएव गोपदेवियोंको चिन्ता है— चलसि यद् व्रजाच्चारयन् पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्। शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति॥* (श्रीमद्भा० १०।३१।११) और भी '····तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१९) यदि प्रभुके पादोंमें पादत्राण होते तो पद-पदपर काँटा आदि गड़नेकी गोपियोंको चिन्ता न होती। अतः यह सौभाग्य किसीको प्राप्त नहीं हुआ। यह तो श्रीवृन्दावनभूमिको ही प्राप्त हुआ, जिसने निरावरण केशव-चरणोंको प्राप्त किया। अतएव 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) कहा गया है। भगवच्चरणारविन्दके विषयमें गोपांगनाओंकी कई अन्तरंग भावनाएँ हैं। उन्होंने अपने प्रेष्ठ श्रीश्यामसुन्दरको कई स्थानोंमें 'देवकीसुत' कहा है, यह उनकी ओरसे प्रणयकोपमें साभिप्राय उक्ति है अर्थात् देवकीके—क्षत्राणीके—कठोरहृदयके सुत हैं, उनके शरीरमें क्षत्रियाणीका कठोर खून है, अतएव इनके पाद कठोर हैं, विप्रयोगतापसन्तप्त कठिन हृदयमें हम उनको धारण करके तापशान्ति चाहती हैं। इसी प्रकार 'न खलु गोपिकानन्दनो भवान्' (श्रीमद्भा० १०।३१।४) कहकर यह बतलाया कि 'आप कोमलहृदया गोपिका—यशोदाके सुत नहीं हैं, अन्यथा इतने कठोर न होते।' वृन्दावनधामके प्रसंगमें यह भी समझना चाहिये कि वृन्दावनधाम अलग और भूमि अलग है। नित्य वृन्दावनधामका जो व्यापी वैकुण्ठ है, यहाँ अवतार है। यह सब महत्त्व भूमिके एक देशको था, पर इतनेसे ही समस्त भूमिको बड़ा अभिमान था। परंतु किसीका भी अभिमान सदा स्थिर नहीं रहता। भगवान्को तो वह अच्छा ही नहीं लगता। फलतः पृथिवी एक बार गौ बनी और त्रिपादक्षीण धर्म—वृषभ। पृथिवी अपने ऊपर हो रहे अत्याचारोंसे दुःखी होकर भगवान्से करुण प्रार्थना कर रही थी, कलियुग दोनोंको डण्डा मारकर भगा रहा था। धर्म भूमिसे उस समय पूछ रहा था—'तुम इतनी दुःखी क्यों हो? रोती क्यों हो?' इसपर गोरूपधारिणी भूमिने कहा—'श्रीभगवान् पूर्णपुरुषोत्तम श्यामसुन्दरके साक्षात् चरणस्पर्शकी प्राप्तिसे कृतकृत्य होकर मैं महाभिमानमत्त हो गयी थी, उसीका यह फल भोग रही हूँ।' एक बार श्रीनारदने विन्ध्याचलसे पूछा—तुम बड़े हो या सुमेरु ? मैं तो समझता हूँ कि सुमेरु बड़ा है। विन्ध्याचलसे सुमेरुकी स्तुति न सही गयी, वह खड़ा हो गया। अब तो भूमि और आकाश एक हो गया, आफत मच गयी। तब देवताओंने महामुनि अगस्त्यको उसके समीप भेजा, जो उसके गुरु थे। उन्हें देखते ही विन्ध्यने साष्टांग प्रणाम किया और उनकी आज्ञा मानकर वैसे ही रह गया। लोगोंने शान्तिकी साँस ली, पर उसके हृदयमें छोटेपनका सन्ताप बना ही रहा। परंतु जब भगवान् रामचन्द्र वनवासके प्रसंगसे उसके यहाँ पधारे, तब तो सुमेरु, हिमालय आदि सभी विन्ध्यकी स्तुति करने लगे। उस समय विन्ध्याचलने बिना परिश्रमके ही बड़ाई पायी—'बिनु श्रम बिपुल बड़ाई पाई।' ऐसे ही भगवत्पादार्पणसे चित्रकूटका
- हमारे प्यारे स्वामी ! तुम्हारे चरण कमलसे भी सुकोमल और सुन्दर हैं। जब तुम गौओंको चरानेके लिये व्रजसे निकलते हो, तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके और कुश-काँटे गड़ जानेसे कष्ट पाते होंगे, हमारा मन बेचैन हो जाता है। हमें बड़ा दुःख होता है।
४०४ भक्तिसुधा महत्त्व माना गया और इस एक देशके महत्त्वसे समस्त भूमिकामहत्त्व माना गया। इसी प्रकार 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' की बात है। अतः व्रजरजकी महिमा महान् है। व्रजदेवियोंने अपने शरीरकी वृन्दावनसे तुलना की है। वृन्दावनमें श्रीयमुना बहती हैं। व्रजांगना कहती हैं—हमारे शरीरमें श्रीकृष्णप्रेमधारा निरन्तर प्रवाहित है। हमारा हृदय ही श्रीगोवर्द्धनपर्वत है और ये वृन्दावनकी लताएँ हमारी रोमराजि हैं। पर हाय, तब भी प्यारे श्यामसुन्दर वृन्दावनमें साक्षात् विहार करते हैं, उसे सदा अलंकृत करते हैं और हमें दर्शनतक नहीं देते। वृन्दावनमें स्थल-स्थलपर झरने झरते हैं, व्रजांगना उनकी समानता अपने प्रेमद्रव, मूर्च्छा, स्वेद आदि आठ सात्त्विक भावोंसे करती हैं। वृन्दावनमें लतादिकी अलौकिकता है, जो सर्वथा लोकोत्तर है। अतः अब व्रजदेवियाँ वृन्दावनकी भूमिसे ही पूछती हैं— 'किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि ।' 'हे सखि भूमि ! बतलाओ, छिपाओ नहीं— तुमने कौन-सी तपस्यासे यह लोकोत्तरता प्राप्त की है।' भूमि बोलती नहीं, तब अपने ही आप कल्पना करती हैं—मालूम होता है इसकी कोई उग्र तपस्या है, आत्मसन्तापन, पीड़न भी एक तप है। जब भगवान् श्रीवामनने महाविराट् रूपमें अपने चरणसे तुम्हारा स्पर्श किया, उस समय तुम दबी, तुम्हारा उत्पीड़न हुआ। यह एक तपस्या हुई। यह आनन्दोद्रेकका रोमाँचोद्गम साधारण तपका फल नहीं, अपितु श्रीवामनभारसे है अथवा उतनेसे न होगा। श्रीवामनका स्पर्श ऐश्वर्यवाला है, यहाँ माधुर्य है, ऐश्वर्यमें माधुर्य सम्भव नहीं, वह तो तपसे ही सम्भव है, अतः श्रीवामनस्पर्शरूप तपसे यह मिला होगा अथवा वराह भगवान्के द्वारा निपीडनरूप तपका फल होगा, जो श्रीश्यामसुन्दरके स्पर्शोत्सवसे तुम अति पुलकित हो रही हो। किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) इस प्रकार व्रजांगनाएँ अपने प्राणाधिकप्रिय श्रीश्यामसुन्दरका अन्वेषण करती हुई वृक्षादिकोंसे कुछ उत्तर न पाकर भूमिसे पूछती हैं और विविध भावमय कल्पनाओंसे पुष्ट अनुमानद्वारा उसे श्रीकृष्ण- सम्पर्कवती जानकर उसके प्रति विमुग्ध हो जाती हैं और उनकी कल्पनाओंका प्रवाह बढ़ता ही जाता है। निवास और गत्यर्थक 'क्षि' धातुसे ('क्षि निवास गत्योः') 'क्षिति' शब्द निष्पन्न हुआ है। उसका अर्थ है सर्वनिवास और गमनकी आधारभूता। संसारके सभी प्राणियोंकी स्थिति, गति भूमिके ही आधारपर है। व्रजांगनाएँ प्रार्थना करती हैं—'हे सर्वाधारभूते भूमि ! तुम परोपकारिणी हो, बड़ी दयामयी हो, श्रीश्यामसुन्दरका पता बतलाकर हमपर दया दिखाओ। सखि ! सच- सच बतलाओ, तुम्हारी किस तपस्याका यह फल है, जो श्रीश्यामचरण तुम्हें प्राप्त हुआ है? श्रीकेशवाङ्घ्रिस्पर्श तुम्हें मिला है? यह तो स्पष्ट है कि तुम्हें उन प्रभुका चरणस्पर्श अवश्य मिला है; क्योंकि उसके बिना तुम्हारा यह लता, झरनारूप अंगरुह, यह हर्षोद्रेक, यह लोकोत्तर उत्सव कभी सम्भव नहीं। अब जानना यह है कि यह तुम्हें भगवान्के किस स्वरूपसे प्राप्त हुआ? यदि महाविराटका रूप धारण करते समय भगवान् वामनसे तो यह हम मान सकतीं नहीं; क्योंकि उनके द्वारा इतना उत्सव मिलना असम्भव है। यह तो हमारे श्रीश्यामसुन्दरके चरण-सम्मिलनका ही महाफल हो सकता है। आहोस्वित् रसातलसे तुम्हारा उद्धार करते समय भगवान् वराहके परिरम्भणका यह फल है। परंतु जड़-चेतन सबमें रसका संचार कर देनेवाली यह विशेषता तो उन मुरलीमनोहरमें ही है। वामन या वाराहकी तो यह बात कहीं भी प्रसिद्ध नहीं। यह तो उन्हींकी महिमा है, जो अमृतमय निज मुखचन्द्रसे विनिर्गत वेणुगीत-पीयूषके पानसे स्थावर जंगम और जंगम स्थावर हो जाते हैं, वृक्ष भी हृष्यत्त्वक्- रोमांचवाले हो जाते हैं। यह तुम्हारा लोकोत्तर उत्पुलोत्सव अवश्य उन्हींकी कृपाका प्रसाद है।
श्रीरासपंचाध्यायी ४०५ सखि! तुम भाग्यशालिनी हो, हम तो भाग्यविधुरा हैं। सखि, वसुधे! तुम ऐसी महाभाग्यवती हो कि ये श्यामसुन्दर कभी वामनरूपसे तो कभी वाराहरूपसे तुम्हारा आलिंगन करते हैं और साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र यशोदा-नन्दन आनन्द-कन्दरूपसे भी सदा तुमसे संयुक्त रहते हैं। हमसे, गोपालसे, अपने प्रियसखाओंसे वे वियुक्त हो जाते हैं, पर तुमसे कभी वियुक्त नहीं होते। सचमुच तुम स्वाधीनभर्तृका हो। अनन्तानन्त महापुण्यवानोंको भगवद्ध्यान, भगवत्स्पर्श प्राप्त होता है, फिर साक्षात् सम्बन्ध हो जाय तो कहना ही क्या?' अघासुरकी मुक्ति लोग चकित रह गये, अघासुरकी मुक्ति देखकर। पहले उसके कन्दराकार मुखमें ग्वाल-बाल, वत्स प्रविष्ट हुए, फिर श्रीगोपाल स्वयं भी प्रविष्ट हो गये और उसके मुखका विदारणकर वत्सादिके सहित उससे बाहर निकल आये। अपनी दृष्टिसे सुधासिंचनकर वत्स-वत्सपोंको सजीव किया। उस समय उस असुरके मुखसे एक ज्योति निकली और उन त्रिभुवनमोहनके मुखमें समा गयी। इस घटनासे सब आश्चर्यचकित रह गये। जो प्रत्यक्ष सायुज्य देवोंको दुर्लभ है, वह इस हत्यारेको मिली। श्रीशुकदेव महामुनि कहते हैं— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) एक बार भी अन्तःकरणमें विराजित प्रभुकी मनोमयी मूर्ति भावुकोंको भागवती गति देती है— आत्मसमर्पण कर देती है। उक्त अघासुरको तो फिर वह साक्षात् ही मिली, फिर उसको प्रभुप्राप्तिमें सन्देह ही क्या? बाहर मन्दिरादिमें प्रतिष्ठित दिव्य काष्ठादि-निर्मित भगवन्मूर्तिका दर्शन करके भक्तलोग वैसी ही मूर्ति अपने हृदयमें पधराकर रखते हैं। इसीके लिये काष्ठादिकी मूर्ति बनाकर पूजा- सेवाके विधान हैं। इस विषयमें श्रीवल्लभाचार्यजीका सिद्धान्त इस प्रकार है— मानसी-आराधनाकी महिमा कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत् सिद्धयै तनुवित्तजा॥ तत्प्रवणता ही सेवा है, अपने प्रियतम, पूर्णतम पुरुषोत्तमकी ओर संसार छोड़कर मन ऐसा प्रवाहित हो, जैसा सावन-भादोंकी गंगा आदि नदियाँ समुद्रकी ओर प्रवाहित होती हैं। मनमें प्रभुस्वरूप प्रकट हो जाय। ध्यान करने बैठें, मन नहीं लगता, भजनके समय कामिनी, शिशु और भी अत्यन्त सुन्दर वस्तुओंका स्मरण हो आता है। परंतु, क्या कोई भी वस्तु उन त्रिभुवन-मोहन श्यामसे अधिक सुन्दर है? फिर क्या बात है, उनके देवदुर्लभ चरणारविन्दको छोड़कर वह अन्यत्र क्यों भटकता है? कारण स्पष्ट है, उसमें प्रभुकी मूर्ति अंकित नहीं हुई—मानसी मूर्ति नहीं बन पायी। 'स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुुक्त्या लोचनं नृणाम्।' (श्रीमद्भा० ११।१।६) ('लोकेभ्यो लावण्यस्य निर्मुक्तिर्यया सा') प्रभुकी मंगलमयी मूर्तिके एक-एक रोममें अनन्त सौन्दर्यामृत-माधुर्यामृत- सिन्धु समाये हैं, सारे संसारमें उसका एक कण बँटा है। जब सब सौन्दर्य-विश्वमोहन कन्दर्प भी जिसकी नखमणिचन्द्रिकासे व्यामुग्ध हो जाता है, उसकी यदि मनोमयी मूर्ति बन जाय तो यह शिकायत न रह जाय कि मन नहीं लगता। प्रभुने देखा कि जीवोंके चित्त माधुर्यादिकी तरफ खिंचते हैं, पर वे नरक ले जानेवाले हैं—'ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।' (गीता ५।२२) आद्यन्तवन्त हैं, क्षणभंगुर हैं, बुध इनमें नहीं रमते। पर ये जो हमारे शब्द, रूपादि, माधुर्यादि हैं, इनको हम ऐसे रूपमें प्रकट करें कि सबका चित्त एक बार ही उधर आकृष्ट हो जाय। प्राणियोंके चित्तका परिचय अदृश्य, अग्राद्य, अलक्षण, अरूप, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, अशब्दसे नहीं हुआ, इसीलिये वह लौकिक शब्दादिके लिये मचलता है। यही सब विचारकर प्रभुने अपना ऐसा रूप बनाया कि सनकादि, शुकादि भी उसपर विमुग्ध हो गये। श्रीश्यामसुन्दर पूर्णतम पुरुषोत्तमका ही एक रामरूप है, जिसे देखकर दण्डकारण्यवासी तपस्वी मुग्ध हो गये। श्रीकृष्णका रूप तो जरा और ठाटका है, कहीं
४०६ भक्तिसुधा मुकुट, कहीं लकुट, कहीं पीताम्बर, कहीं फेंटा, कहीं वंशी आदिसे वह खूब सजा है। पर श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र तो बाबाजीकी तरह जटा, चीर आदि धारण किये थे, उनपर भी मुनियोंका चित्त खिंच गया। यद्यपि खरदूषणकी बहनका नाक-कान काटा, पर जब सामने आये, तब उनके भी मुखसे निकल पड़ा— जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥ (रा०च०मा० ३।१९।५) क्रूर, गोभक्षक भी उन्हें देखकर सहज ही विभोर हो गये। राह चलती स्त्रियोंने भी उन्हें देखकर उनके मार्गकी निर्बाधता-सर्प, वृश्चिक आदिसे राहित्य विधातासे माँगा। फिर श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरके रूपमें जो शृङ्गाराक्रान्त परम कमनीय था, प्रकट होकर तो अपने साधकोंके मनकी सभी शिकायतोंको दूर कर दिया। लावण्य, सौरस्य, सौरस्य- सुधा-सिन्धुको छोड़कर भला कौन ऐसा है, जो अप्सरा आदिको चाहेगा? परंतु उस मूर्तिके मनोमयी होनेपर ही यह बात होती है, अतएव 'मानसी सा परा मता।' यह सिद्ध कैसे हो, इसके लिये पहले एक ऊँचे अभिनिवेशसे तनुजा और वित्तजा सेवा होनी चाहिये। धातु आदिकी प्रभुप्रतिमा पधराकर अष्टयामकी सेवा, भावना, दिव्यातिदिव्य शृंगार, भोगरागसे उन्हें अपना सर्वस्व समझकर महावैभवसे खूब सेवा करनी चाहिये, तब वह मूर्ति मनमें आयेगी और एक बार आकर ही सदाके लिये कृतकृत्य कर देगी। अतएव कहा गया है— 'सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्।' (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) ध्रुव, प्रह्लाद आदिको इसी मानसी प्रतिमाने— मनोमयी मूर्तिने आत्मसमर्पण किया। फिर उस अघासुरकी क्या बात, जिसके मुखमें वह मूर्ति साक्षात् समा गयी ! मुख्य बात यह है कि किसी भी स्वरूपसे, कैसे भी प्रभु-सम्बन्ध होना चाहिये। व्रजांगनाएँ कहती हैं—'सखि धरित्रि ! तुम्हें यह जो श्रीकृष्ण-स्पर्श मिला, वह जन्म-जन्मकी उग्र तपस्याओंका फल है। पहले वामनचरणके तीव्राघात तपसे पुण्य उत्पन्न हुआ, उससे वाराह-संस्पर्शपुण्य उत्पन्न हुआ। फिर इन दोनों पुण्योंसे श्रीश्यामसुन्दरके सार्वदिक् संस्पर्श-सौभाग्यका उदय हुआ। सखि! हमको भी उस तपस्याका क्रम बतलाओ, जिससे तुमने उत्तरोत्तर उन्नति की।' व्रजांगनाओंने श्रीश्यामसुन्दरके चरणसंस्पर्शको अधिक महत्त्व दिया है। कोई कहे कि स्पर्श तो सब समान ही है—जैसे श्रीवामनभगवान्का या वाराह- भगवान्का, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरका, केशवभगवान्का, उसमें कोई भी अन्तर कैसा? परंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह भेद तो भावुक ही समझ सकते हैं, दूसरोंके लिये यह अगम्य है। इसपर व्रजदेवियोंके बहुत ऊँचे भाव हैं। केशव उनकी दृष्टिमें साधारण केशव नहीं, अपितु ब्रह्मा, विष्णु और महेशको वशमें करनेवाला केशव—('कः-ब्रह्मा, ईः-विष्णुः, शः- शिव, तान् वशयतीति केशवः') है। भगवदवतारोंमें कोई अंशावतार, कोई कलावतार और कोई आवेशावतार होते हैं। परंतु पूर्ण, पूर्णतर और पूर्णतम अवतार पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द यशोदानन्दनका ही हुआ है। इसमें भी भक्तोंकी उच्च भावनाके अनुसार—'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' की व्यवस्था है। इसके अनुसार निकुंजस्थ श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन ही पूर्णतम अथवा श्रेष्ठतम हैं। निकुंजस्थ माधुर्यनिधि श्यामसुन्दरकी श्रेष्ठता—एक रोचक दृष्टान्त कदम्बखण्डीके नागाजी व्रजमें एक अतिप्रसिद्ध भावुक भक्त हो गये हैं। वे वहीं आनन्दमग्नावस्थामें घूमा करते थे। एक दिन उनकी जटा एक झाड़ीमें उलझ गयी। प्रयत्न किया, पर नहीं सुलझी, तब आपने निश्चय किया—'जिसने उलझायी है, अब वही आकर सुलझायेगा।' वहाँ गौओंको चराने आनेवाले ग्वालबालों तथा अन्यान्य लोगोंने बहुत प्रार्थना की—'बाबा, हम सुलझा दें।' पर आपने किसीकी न सुनी, अटल निश्चय किया—'बस, अब तो वही आयेगा, तभी सुलझेगी।' आप इसी प्रणयकोप अथवा भावावेशमें बहुत समयतक उसी तरह खड़े
रहे। नागाजीकी प्रतिज्ञासे श्रीश्यामसुन्दर अधीर हो उठे। वे आये और नागाजीकी जटा अपने कोमल करोंसे सुलझानेको ज्यों ही उद्यत हुए, नागाजीने रोक दिया। कहा—‘पहले आप अपना परिचय दीजिये, आप कौनसे कृष्ण हैं—व्रजके, वनके या निकुंजके ? हम तो निकुंजके उपासक हैं।’ श्रीप्रभुने कहा— ‘बाबा, मैं वही हूँ, जाकी तुम उपासना करो हो।’ नागाजीने कहा—‘कैसे विश्वास हो ? इसका प्रमाण कौन दे ?’ श्रीप्रभुने कहा—‘जैसे तुमकूं विश्वास हो, सोई करो।’ नागाजीने कहा—‘यदि हमारी श्रीस्वामिनीजू आकर कहें कि हाँ, ये निकुंजके ही श्याम हैं, तब हम मानें।’ इतनेमें श्रीव्रजेश्वरी वृषभानुनन्दिनी श्रीस्वामिनीजू भी पधारीं और उन्होंने नागाजीको विश्वास दिलाया कि ये ही नित्यनिकुंज-मन्दिरस्थ श्रीश्यामसुन्दर हैं, तब अनुमति मिलनेपर बड़ी उत्सुकतासे श्रीप्रभुने चार हाथ लगाकर नागाजीकी जटा सुलझायी। कहनेका तात्पर्य यही कि इस प्रकार श्रीकृष्णके तीन भेद हुए। इनमें मथुरानाथ और द्वारकानाथके दो भेद और जोड़ देनेसे पाँच भेद हो जाते हैं। जैसे एक ही स्वातिबिन्दु स्थानभेदसे विभिन्न नामवाला होता है—सीपमें मोती, हाथीमें गजमुक्ता, गौमें गोरोचन आदि, वैसे ही श्यामसुन्दरके ये पाँच भेद हैं। रसिक भक्तोंके यहाँ जितनी माधुर्यकी अधिकता है, उतनी ही ऐश्वर्यकी कमी। व्रजनाथ, द्वारकानाथमें यही भेद है। उत्तरोत्तर ऐश्वर्यकी न्यूनता और माधुर्यकी अधिकतासे व्रजमें पूर्ण, वृन्दावनधाममें पूर्णतर और नित्य निकुंजमें पूर्णतम प्रभु माने गये हैं। अतएव अन्य अवतारोंके स्पर्शकी अपेक्षा श्रीश्यामसुन्दरके चरणका स्पर्श व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें अधिक महत्त्व रखता है। भगवान्की लोकोत्तर अलकावलीका माधुर्य केशवका एक दूसरा अर्थ है—(‘प्रशस्ताः केशा यस्य सः’) सुन्दर केशवाला। सचमुच श्रीश्यामसुन्दर केशवके समान किसीके भी केश नहीं हैं। गोपांगनाएँ उनके केशोंपर मुग्ध हैं— वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री- गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३९) कहती हैं—‘श्यामसुन्दर! हम आपके इस लोकोत्तर सुन्दर अलकावलीसे आवृत्त मुखपर विमुग्ध हैं और अक्रीत, अशुल्कदासी हैं।’ उन सौन्दर्यगर्वप्रमत्त गोपांगनाओंका गुमान गोविन्दके घुँघराले केशपाशको देखकर ही चूर-चूर हो गया, वे सदाके लिये नायिकात्व, स्वाधीनभर्तृकात्व छोड़कर दासी बन जानेको प्रस्तुत हो गयीं। कदाचित् भगवान् कहें कि ‘गोपांगनाओ, आप ऐसा मत कहो, आप कुलांगना हो’ तो कहती हैं—‘श्यामसुन्दर, आपकी इस रूपराशिको देखकर हम भुला जाती हैं, ठगी-सी रह जाती हैं। ये आपकी बिखरी अलकें मनको खींच लेती हैं। ये आपकी अलकें कुटिल हैं, स्निग्ध हैं, स्वच्छ हैं और हमारा मन भी सत्त्वसम्पन्न होनेसे स्निग्ध, रजोगुणसम्पृक्त होनेसे कुटिल और तमसे जुष्ट होकर श्यामलताको धारण करता है। जैसे आपके केशोंमें घुँघरालापन है, वैसे ही हमारे मनमें कुटिलता है। इस प्रकार हमारा मन आपके केशोंको बन्धु समझकर उनके पास चला गया और वहाँ जाकर उनके जालमें फँस गया।’ भगवान्के केशोंके विषयमें ‘कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्’ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५)-में कुटिलता कही गयी है। कोई तो इन सचिक्कण काले केशोंकी काले नागोंसे उत्प्रेक्षा करते हैं—मानो श्रीकृष्णचन्द्रके अद्भुत अमृतमय, निष्कलंक पूर्णमुखचन्द्रपर अमृतके लोभसे वे काले-काले नागशिशु फैले हैं। किसी भावुकके मतसे पूर्णानुरागससारसरोवरसमुद्भूत नीलकमलपर ये मधुलम्पट आ विराजे प्रतीत होते हैं। श्रीधर स्वामीने भगवान्के केशावृत मुखको अलिकुलमालासंकुल परागपरिप्लुत नीलकमल माना है। फिर संशय होता है कि यह अलिकुल स्थिर क्यों है ? तो उत्तर मिलता है—मकरन्दपानसे स्तब्ध है, विभोर होनेसे गुंजार नहीं करता। ऐसा है भगवान्का अलकावृत मुख। इस प्रकार उन केशवके माधुर्य-लावण्य-सौन्दर्य-सम्पन्न एक-एक अंगकी बड़ी विलक्षण शोभा है। उनका