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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सं० २०७२ इकतीसवाँ पुनर्मुद्रण ४,००० कुल मुद्रण १,७६,००० ❖ मूल्य— ₹ ७० (सत्तर रुपये) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५ (गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान) फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स : (०५५१) २३३६९९७ web: gitapress.org e-mail: booksales@gitapress.org गीताप्रेस प्रकाशन gitapressbookshop. in से online खरीदें।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥ निवेदन त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥ मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥ महर्षि वेदव्यासरचित ब्रह्मसूत्र बड़ा ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें थोड़ेसे शब्दोंमें परब्रह्मके स्वरूपका सांगोपांग निरूपण किया गया है, इसीलिये इसका नाम 'ब्रह्मसूत्र' है। यह ग्रन्थ वेदके चरम सिद्धान्तका निदर्शन कराता है, अतः इसे 'वेदान्त-दर्शन' भी कहते हैं। वेदके अन्त या शिरोभाग— ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद्के सूक्ष्म तत्त्वका दिग्दर्शन करानेके कारण भी इसका उक्त नाम सार्थक है। वेदके पूर्वभागकी श्रुतियोंमें कर्मकाण्डका विषय है, उसकी समीक्षा आचार्य जैमिनिने पूर्वमीमांसा-सूत्रोंमें की है। उत्तरभागकी श्रुतियोंमें उपासना एवं ज्ञानकाण्ड है; इन दोनोंकी मीमांसा करनेवाले वेदान्त- दर्शन या ब्रह्मसूत्रको 'उत्तरमीमांसा' भी कहते हैं। दर्शनोंमें इसका स्थान सबसे ऊँचा है; क्योंकि इसमें जीवके परम प्राप्य एवं चरम पुरुषार्थका प्रतिपादन किया गया है। प्रायः सभी सम्प्रदायोंके प्रधान-प्रधान आचार्योंने ब्रह्मसूत्रपर भाष्य लिखे हैं और सबने अपने-अपने सिद्धान्तको इस ग्रन्थका प्रतिपाद्य बतानेकी चेष्टा की है। इससे भी इस ग्रन्थकी महत्ता तथा विद्वानोंमें इसकी समादरणीयता सूचित होती है। प्रस्थानत्रयीमें ब्रह्मसूत्रका प्रधान स्थान है। संस्कृतभाषामें इस ग्रन्थपर अनेक भाष्य एवं टीकाएँ उपलब्ध होती हैं; परंतु हिंदीमें कोई सरल तथा सर्वसाधारणके समझने योग्य टीका नहीं थी; इससे हिंदीभाषा-भाषियोंके लिये इस गहन ग्रन्थका भाव समझना बहुत कठिन हो रहा था। यद्यपि 'अच्युत ग्रन्थमाला' ने ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य एवं रत्नप्रभा व्याख्याका हिंदीमें अनुवाद प्रकाशित करके हिंदीजगत्का महान् उपकार किया है। तथापि भाष्यकारकी व्याख्या शास्त्रार्थकी शैलीपर लिखी जानेके कारण

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साधारण बुद्धिवाले पाठकोंको उसके द्वारा सूत्रकारके भावको समझनेमें कठिनाई होती है। इसके सिवा, वह ग्रन्थ भी बहुत बड़ा एवं बहुमूल्य हो गया है, जिससे साधारण जनता उसे प्राप्त भी नहीं कर सकती। अतः हिंदीमें ब्रह्मसूत्रके एक ऐसे संस्करणको प्रकाशित करनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई, जो सर्वसाधारणके लिये समझनेमें सुगम एवं सस्ता होनेके कारण सुलभ हो। इन्हीं बातोंको दृष्टिमें रखकर गत वर्ष वैशाख मासमें जब मैं गोरखपुरमें था, मेरे एक पूज्य स्वामीजी महाराजने मुझे आज्ञा दी कि 'तुम सरल हिंदीमें ब्रह्मसूत्रपर संक्षिप्त व्याख्या लिखो।' यद्यपि अपनी अयोग्यताको समझकर मैं इस महान् कार्यका भार अपने ऊपर लेनेका साहस नहीं कर पाता था, तथापि पूज्य स्वामीजीकी आग्रहपूर्ण प्रेरणाने मुझे इस कार्यमें प्रवृत्त कर दिया। मैं उसी समय गोरखपुरसे स्वर्गाश्रम (ऋषिकेश) चला गया और वहाँ पूज्यपाद भाईजी श्रीजयदयालजीसे स्वामीजीकी उक्त आज्ञा निवेदन की। उन्होंने भी इसका समर्थन किया। इससे मेरे मनमें और भी उत्साह और बल प्राप्त हुआ। भगवान्की अव्यक्त प्रेरणा मानकर मैंने कार्य प्रारम्भ कर दिया और उन्हीं सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी सहज कृपासे एक मास इक्कीस दिनमें ब्रह्मसूत्रकी यह व्याख्या पूरी हो गयी। इसमें व्याकरणकी दृष्टिसे तो बहुत-सी अशुद्धियाँ थीं ही, अन्य प्रकारकी भी त्रुटियाँ रह गयी थीं, अतः इस व्याख्याकी एक प्रति नकल कराकर मैंने उन्हीं पूज्य स्वामीजीके पास गोरखपुर भेज दी। उन्होंने मेरे प्रति विशेष कृपा और स्वाभाविक प्रेम होनेके कारण समय निकालकर दो मासतक परिश्रमपूर्वक इस व्याख्याको देखा और इसकी त्रुटियोंका मुझे दिग्दर्शन कराया। तदनन्तर चित्रकूटमें सत्संगके अवसरपर पूज्यपाद श्रीभाई जयदयालजी तथा पूज्य स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराजने भी व्याख्याको आद्योपान्त सुना और उसके संशोधनके सम्बन्धमें अपनी महत्त्वपूर्ण सम्मति देनेकी कृपा की। यह सब हो जानेपर इस ग्रन्थको प्रकाशित करनेकी उत्सुकता हुई। फिर समय मिलते ही मैं गोरखपुर आ गया। फाल्गुन कृष्णा प्रतिपदासे इसके पुनः संशोधन और छपाई आदिका कार्य आरम्भ किया गया। इस समय पूज्य पण्डित श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने इस व्याख्यामें व्याकरण आदिकी दृष्टिसे जो-जो अशुद्धियाँ रह गयी थीं, उनका अच्छी तरह संशोधन किया और भाषाको भी सुन्दर बनानेकी पूरी-पूरी चेष्टा की। साथ ही आदिसे

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अन्ततक साथ रहकर प्रूफ देखने आदिके द्वारा भी प्रकाशनमें पूरा सहयोग दिया। पूज्य भाई श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार तथा उपर्युक्त पूज्य स्वामीजीने भी प्रूफ देखकर उचित एवं आवश्यक संशोधनमें पूर्ण सहायता की। इन सब महानुभावोंके अथक परिश्रम और सहयोगसे आज यह ग्रन्थ पाठकोंके समक्ष इस रूपमें उपस्थित हो सका है। इस ग्रन्थकी व्याख्या लिखते समय मेरे पास हिंदी या अन्य किसी भारतीय भाषाकी कोई पुस्तक नहीं थी। संस्कृत भाषाके आठ ग्रन्थ मेरे पास थे, जिनसे मुझे बहुत सहायता मिली और एतदर्थ मैं उन सभी व्याख्याकारोंका कृतज्ञ हूँ। उक्त ग्रन्थोंके नाम इस प्रकार हैं—(१) श्रीशंकराचार्यकृत शारीरक-भाष्य, (२) श्रीमद्रामानुजाचार्यकृत श्रीभाष्य, (३) श्रीवल्लभाचार्यकृत अणुभाष्य, (४) श्रीनिम्बार्कभाष्य, (५) श्रीभास्कराचार्यकृत भाष्य, (६) ब्रह्मानन्ददीपिका, (७) श्रीविज्ञानभिक्षुकृत भाष्य तथा (८) आचार्य श्रीरामानन्दकृत व्याख्या। पाठक मेरी अल्पज्ञतासे तो परिचित होंगे ही; क्योंकि पहले योग-दर्शनकी भूमिकामें मैं यह बात निवेदन कर चुका हूँ। मैं न तो संस्कृत-भाषाका विद्वान् हूँ और न हिंदी-भाषाका ही। अन्य किसी आधुनिक भाषाकी भी जानकारी मुझे नहीं है। इसके सिवा, आध्यात्मिक विषयमें भी मेरा विशेष अनुभव नहीं है। ऐसी दशामें इस गहन शास्त्रपर व्याख्या लिखना मेरे-जैसे अल्पज्ञके लिये सर्वथा अनधिकार चेष्टा है, तथापि अपने आध्यात्मिक विचारोंको दृढ़ बनाने, गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करने तथा मित्रोंको संतोष देनेके लिये अपनी समझके अनुसार यह टीका लिखकर इसे प्रकाशित करानेकी मैंने जो धृष्टता की है, उसे अधिकारी विद्वान् तथा संत महापुरुष अपनी सहज उदारतासे क्षमा करेंगे—यह आशा है। वस्तुतः इसमें जो कुछ भी अच्छापन है, वह सब पूर्वके प्रातःस्मरणीय पूज्यचरण आचार्यों और भाष्यकारोंका मंगलप्रसाद है और जो त्रुटियाँ हैं, वे सब मेरी अल्पज्ञताकी सूचक तथा मेरे अहंकारका परिणाम है। जहाँतक सम्भव हुआ है, मैंने प्रत्येक स्थलपर किसी भी आचार्यके ही चरणचिह्नोंका अनुसरण करनेकी चेष्टा की है। जहाँ स्वतन्त्रता प्रतीत होती है, वहाँ भी किसी-न-किसी प्राचीन महापुरुष या टीकाकारके भावोंका आश्रय लेकर ही वैसे भाव निकाले गये हैं। अनुभवी विद्वानोंसे मेरी विनम्र प्रार्थना है कि वे कृपापूर्वक इसमें प्रतीत होनेवाली

त्रुटियोंको सूचित करें, जिससे दूसरे संस्करणमें उनके सुधारका प्रयत्न किया जा सके। यहाँ प्रसंगवश ब्रह्मसूत्र और उसके प्रतिपाद्य विषयके सम्बन्धमें भी कुछ निवेदन करना आवश्यक प्रतीत होता है। ब्रह्मसूत्र अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है। कुछ आधुनिक विद्वान् इसमें सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन, पाशुपत और पांचरात्र आदि मतोंकी आलोचना देखकर इसे अर्वाचीन बतानेका साहस करते हैं और बादरायणको वेदव्याससे भिन्न मानते हैं; परंतु उनकी यह धारणा नितान्त भ्रमपूर्ण है। ब्रह्मसूत्रमें जिन मतोंकी आलोचना की गयी है, वे प्रवाहरूपसे अनादि हैं। वैदिककालसे ही सद्वाद और असद्वाद (आस्तिक और नास्तिकमत)-का विवाद चला आ रहा है। इन प्रवाहरूपसे चले आते हुए विचारोंमेंसे किसी एकको अपनाकर भिन्न-भिन्न दर्शनोंका संकलन हुआ है। सूत्रकारने कहीं भी अपने सूत्रमें सांख्य, जैन, बौद्ध या वैशेषिक मतके आचार्योंका नामोल्लेख नहीं किया है। उन्होंने केवल प्रधानकारणवाद, अणुकारणवाद, विज्ञानवाद आदि सिद्धान्तोंकी ही समीक्षा की है। सूत्रोंमें बादरि, औडुलोमि, जैमिनि, आश्मरथ्य, काशकृत्स्न और आत्रेय आदिके नाम आये हैं, जो अत्यन्त प्राचीन हैं; इनमेंसे कितनोंके नाम मीमांसासूत्रोंमें भी उल्लिखित हैं। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी 'हेतुमद्' विशेषणसहित 'ब्रह्मसूत्र' का नाम आता है, इससे भी इसकी परम प्राचीनता सिद्ध होती है। बादरायण शब्द पुराणकालसे ही श्रीवेदव्यासजीके लिये व्यवहृत होता आया है। अतः ब्रह्मसूत्र वेदव्यासजीकी ही रचना है, यह माननेमें कोई बाधा नहीं है। पाणिनिने पाराशर्य व्यासद्वारा रचित 'भिक्षुसूत्र' की भी चर्चा अपने सूत्रोंमें की है। वह अब उपलब्ध नहीं है। अथवा यह भी सम्भव है, वह ब्रह्मसूत्रसे अभिन्न रहा हो। सूत्रकारने अपने ग्रन्थको चार अध्यायों और सोलह पादोंमें विभक्त किया है। पहले अध्यायमें बताया गया है कि सभी वेदान्तवाक्योंका एकमात्र परब्रह्मके प्रतिपादनमें ही अन्वय है; इसलिये उसका नाम 'समन्वयाध्याय' है। दूसरे अध्यायमें सब प्रकारके विरोधाभासोंका निराकरण किया गया है, इसलिये उसका नाम 'अविरोधाध्याय' है। तीसरेमें परब्रह्मकी प्राप्ति या साक्षात्कारके साधनभूत ब्रह्मविद्या तथा दूसरी-दूसरी उपासनाओंके विषयमें निर्णय किया गया है, अतः उसको 'साधनाध्याय' कहते हैं और चौथेमें उन विद्याओंद्वारा साधकोंके

( ७ ) अधिकारके अनुरूप प्राप्त होनेवाले फलके विषयमें निर्णय किया गया है, इस कारण उसकी 'फलाध्याय' के नामसे प्रसिद्धि है। इस ग्रन्थमें वर्णित समग्र विषयोंका संक्षिप्त परिचय विषय-सूचीसे अवगत हो सकता है। यहाँ कुछ चुनी हुई सैद्धान्तिक बातोंका दिग्दर्शन कराया जाता है। ब्रह्मसूत्रमें पूज्यपाद वेदव्यासजीने अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन करते समय मेरी अल्पबुद्धिके अनुसार इस प्रकार निर्णय दिया है— (१) यह प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाला जो जडचेतनात्मक जगत् है, इसका उपादान और निमित्तकारण ब्रह्म ही है (ब्र० सू० १। १। २)। (२) सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरकी जो परा (चेतन जीवसमुदाय) और अपरा (परिवर्तनशील जडवर्ग) नामक दो प्रकृतियाँ हैं, वे उसीकी अपनी शक्तियाँ हैं, इसलिये उससे अभिन्न हैं (३। २। २८)। वह इन शक्तियोंका आश्रय है, अतः इनसे भिन्न भी है। परब्रह्म जीव और जड-वर्गसे सर्वथा विलक्षण और उत्तम हैं (२। १। २२), (३। २। ३१)। (३) वह परब्रह्म परमेश्वर अपनी उपर्युक्त दोनों प्रकृतियोंको लेकर ही सृष्टिकालमें जगत्की रचना करता है और प्रलयकालमें इन दोनों प्रकृतियोंको अपनेमें विलीन कर लेता है (१। ४। ८—१०), (२। १। १७)। (४) परब्रह्म परमात्मा शब्द, स्पर्श आदिसे रहित, निर्विशेष, निर्गुण एवं निराकार भी है तथा अनन्त कल्याणमय गुणसमुदायसे युक्त सगुण एवं साकार भी है। इस प्रकार एक ही परमात्माका यह उभयविध स्वरूप स्वाभाविक तथा परम सत्य है, औपाधिक नहीं है (३। २। ११ से २६ तक)। (५) जीव-समुदाय उस परब्रह्मकी परा प्रकृतिका समूह है, इसलिय उसीका अंश है (२। ३। ४३)। इसी दृष्टिसे वह अभिन्न है। तथापि परमेश्वर जीवके कर्मफलोंकी व्यवस्था करनेवाला (३। २। ३८ से ४१), सबका नियन्ता और स्वामी है। (६) जीव नित्य है (२। ४। १६)। उसका जन्मना और मरना शरीरके सम्बन्धसे औपचारिक है (२। ३। १६—१८)। (७) जीवका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें और लोकान्तरमें भी जाना-आना शरीरके सम्बन्धसे ही है। ब्रह्मलोकमें भी वह सूक्ष्म-शरीरके सम्बन्धसे ही जाता है (४। २। ९)।

( ८ ) (८) परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें पहुँचनेपर ज्ञानीका किसी प्रकारके प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, वह अपने दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होता है (४। ४। १)। वह उसकी सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित मुक्तावस्था है (४। ४। २)। (९) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले जीवको वहाँके भोगोंका उपभोग संकल्पमात्रसे भी होता है और उसके संकल्पानुसार प्राप्त हुए शरीरके द्वारा भी (४। ४। ८ तथा ४। ४। १२)। (१०) देवयान-मार्गसे जानेवाले विद्वानोंमेंसे कोई तो परब्रह्मके परमधाममें जाकर सायुज्यमुक्ति लाभ कर लेते हैं (४। ४। ४) और कोई चैतन्यमात्र स्वरूपसे अलग भी रह सकते हैं (४। ४। ७)। (११) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले उस लोकके स्वामीके साथ प्रलयकालके समय सायुज्यमुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं (४। ३।१०)। (१२) उत्तरायण-मार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवालोंके लिये रात्रिकाल या दक्षिणायनकालमें मृत्यु होना बाधक नहीं है (४। २। १९-२०)। (१३) जीवका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धमें औपचारिक है (२। ३। ३३ से ४० तक)। (१४) जीवके कर्तापनमें परमात्मा ही कारण है (२। ३। ४१)। (१५) जीवात्मा विभु है; उसका एकदेशित्व शरीरके सम्बन्धसे ही है, वास्तवमें नहीं है (२। ३। २९)। (१६) जिन ज्ञानी महापुरुषोंके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती, जो सर्वथा निष्काम और आप्तकाम हैं उनको यहीं ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। उनका ब्रह्मलोकमें जाना नहीं होता (३। ३। ३०, ४२; ३। ३। ५२; ३। ४। ५२) (४। २। १२–१६)। (१७) ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहके लिये सभी प्रकारके विहित कर्मोंका अनुष्ठान कर सकता है (४। १। १६-१७)। (१८) ब्रह्मज्ञान सभी आश्रमोंमें हो सकता है। सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है (३। ४। ४९)। (१९) ब्रह्मलोकमें जानेवालेका पुनरागमन नहीं होता (४। ४।२२)।

( ९ ) (२०) ज्ञानीके पूर्वकृत संचित पुण्य-पापका नाश हो जाता है। नये कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता (४।१।१३-१४)। प्रारब्धकर्मका उपभोगद्वारा नाश हो जानेपर वर्तमान शरीर नष्ट हो जाता है और वह ब्रह्मलोकको या वहीं परमात्माको प्राप्त हो जाता है (४।१।१९)। (२१) ब्रह्मविद्याके साधकको यज्ञादि आश्रमकर्म भी निष्कामभावसे करने चाहिये (३।४।२६)। शम-दम आदि साधन अवश्य कर्तव्य हैं (३।४।२७)। (२२) ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग नहीं है (३।४।२ से २५ तक)। (२३) परमात्माकी प्राप्तिका हेतु ब्रह्मज्ञान ही है (३।३।४७ तथा ३।४।१)। (२४) यह जगत् प्रलयकालमें भी अप्रकटरूपसे वर्तमान रहता है (२।१।१६)। इन सबको ध्यानमें रखकर इस ग्रन्थका अनुशीलन करना चाहिये। इससे परमात्माका क्या स्वरूप है, उनकी प्राप्तिके कौन-से साधन हैं और साधकका परमात्माके साथ क्या सम्बन्ध है—इन बातोंकी तथा साधनोपयोगी अन्य आवश्यक विषयोंकी जानकारी प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचनेमें विशेष सहायता प्राप्त हो सकती है। अतः प्रत्येक साधकको श्रद्धापूर्वक इस ग्रन्थका अध्ययन एवं मनन करना चाहिये। श्रीरामनवमी ⎫ विनीत, संवत् २००९ वि० ⎭ हरिकृष्णदास गोयन्दका

वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-के प्रधान विषयोंकी सूची

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥ वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-के प्रधान विषयोंकी सूची पहला अध्याय पहला पाद सूत्र विषय पृष्ठ १-११ ब्रह्मविषयक विचारकी प्रतिज्ञा तथा ब्रह्म ही जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है, जडप्रकृति नहीं, इसका युक्ति एवं प्रमाणोंद्वारा प्रतिपादन................................ २३-३१ १२-१९ श्रुतिमें 'आनन्दमय' शब्द परमात्माका ही वाचक है, जीवात्मा अथवा जडप्रकृतिका नहीं, इसका समर्थन ....... ३२-३७ २०-२१ 'विज्ञानमय' तथा 'सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष' की ब्रह्मरूपताका कथन..................................... ३७-३८ २२-२७ 'आकाश', 'प्राण', ज्योति' तथा 'गायत्री' नामसे श्रुतिमें परब्रह्मका ही वर्णन है, इसका प्रतिपादन................... ३८-४३ २८-३१ कौषीतकि श्रुतिमें भी 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही उपदेश हुआ है, इसका समर्थन.................................... ४३-४६ दूसरा पाद १-७ वेदान्त-वाक्योंमें परब्रह्मकी ही उपास्यताका निरूपण तथा जीवात्माकी उपास्यताका निराकरण..................... ४७-५२ ८ सबके हृदयमें रहते हुए भी परमात्मा जीवोंके सुख- दुःखोंका भोग नहीं करता, इसका प्रतिपादन............... ५३ ९-१० चराचरग्राही भोक्ता परमात्मा ही हैं, इसका निरूपण....... ५३-५४ ११-१२ हृदयगुहामें स्थित दो आत्मा-जीवात्मा तथा परमात्माका प्रतिपादन................................................... ५५-५६ १३-१७ नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषकी ब्रह्मरूपता................................ ५७-६१

( ११ ) सूत्र विषय पृष्ठ १८ अधिदैव आदिमें ‘अन्तर्यामीरूप’ से ब्रह्मकी स्थिति......... ६२ १९-२० जडप्रकृति और जीवात्माकी अन्तर्यामिताका निराकरण....... ६३-६४ २१-२२ श्रुतिमें जिसे अदृश्यत्व आदि धर्मोंसे युक्त बताया है, वह ब्रह्म है, प्रकृति या जीवात्मा नहीं; इसका प्रतिपादन........ ६४-६६ २३ विराट्‌रूपके वर्णनसे ब्रह्मकारणवादका समर्थन............ ६६-६७ २४-२८ श्रुतिमें ‘वैश्वानर’ नाम ब्रह्मके लिये ही आया है, इसका युक्तियुक्त विवेचन................................................... ६७-७२ २९-३२ सर्वव्यापी परमात्माको देशविशेषसे सम्बद्ध बतानेका रहस्य.................................................................... ७२-७५ तीसरा पाद १-७ द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार ब्रह्म ही है, जीवात्मा अथवा प्रकृति नहीं, इसका प्रतिपादन........................... ७६-८० ८-९ ब्रह्म ही भूमा है—इसका उपपादन.............................. ८०-८३ १०-१२ श्रुतिमें ब्रह्मको ‘अक्षर’ कहा गया है इसका युक्तियुक्त समर्थन... ८३-८५ १३ ‘ॐ’ इस अक्षरके द्वारा ध्येय तत्त्व भी ब्रह्म ही है, इसका निरूपण........................................................ ८५-८६ १४-२३ दहराकाशकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन.......................... ८६-९३ २४-२५ अंगुष्ठमात्र पुरुषकी परब्रह्मरूपता और उसे हृदयमें स्थित बतानेका रहस्य........................................................ ९३-९४ २६-३० ब्रह्मविद्यामें मनुष्योंके सिवा देवताओंके भी अधिकारका प्रतिपादन और इसमें सम्भावित विरोधका परिहार......... ९४-९९ ३१-३३ यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्यामें देवताओंके अधिकारका जैमिनिद्वारा विरोध और बादरायणद्वारा उसका परिहार...... ९९-१०१ ३४-३८ वेदविद्यामें शूद्रके अनधिकारका कथन......................... १०१-१०६ ३९ अंगुष्ठमात्र पुरुषके ब्रह्मरूप होनेमें दूसरी युक्ति............ १०६-१०७ ४०-४३ ‘ज्योति’ तथा ‘आकाश’ भी ब्रह्मके ही वाचक हैं, इसका समर्थन........................................................ १०७-११०

सूत्र विषय पृष्ठ

( १२ ) सूत्र विषय पृष्ठ चौथा पाद १-२ सांख्योक्त प्रकृतिकी अवैदिकताके प्रसंगमें 'अव्यक्त' शब्दपर विचार और उसके शरीरवाचक होनेका कथन...... १११-११३ ३-५ वेदोक्त प्रकृति स्वतन्त्र और जाननेयोग्य नहीं, परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी शक्ति है, इसका प्रतिपादन....... ११३-११५ ६-७ 'अव्यक्त' शब्द प्रकृतिसे भिन्न अर्थका वाचक क्यों है? इसका युक्तिपूर्ण विवेचन........................................ ११५-११७ ८-१० श्रुतिमें 'अजा' शब्द परब्रह्मकी शक्ति विशेषका बोधक है, सांख्योक्त प्रधानका नहीं, इसका प्रतिपादन............. ११७-१२० ११-१३ 'पञ्च-पञ्चजनाः'शब्दसे सांख्योक्त प्रकृतिके पचीस तत्त्वोंका श्रुतिमें वर्णन किया गया है, इस मान्यताका खण्डन....... १२१-१२३ १४-१५ आकाश आदिकी सृष्टिमें ब्रह्म ही कारण है तथा उस प्रसंगमें आये हुए 'असत्' आदि शब्द भी उसीके वाचक हैं इसका समर्थन........................................... १२३-१२५ १६-२२ कौषीतकि श्रुतिमें सोलह पुरुषोंका कर्ता एवं ज्ञेयतत्त्व ब्रह्मको ही बताया गया है, जीव, प्राण या प्रकृतिको नहीं, इसका सयुक्तिक उपपादन........................... १२६-१३१ २३-२९ ब्रह्मकी अभिन्न निमित्तोपादान कारणताका निरूपण....... १३१-१३७ दूसरा अध्याय पहला पाद १-११ सांख्योक्त प्रधानको जगत्का कारण न माननेमें सम्भावित दोषोंका उल्लेख और उनका परिहार............ १३८-१४६ १२ अन्य वेदविरोधी मतोंका निराकरण........................... १४६ १३-१४ ब्रह्मकारणवादके विरुद्ध उठायी हुई शंकाओंका समाधान.... १४६-१४९ १५-२० युक्तियों और दृष्टान्तोंद्वारा सत्कार्यवादकी स्थापना एवं ब्रह्मसे जगत्की अनन्यता.................................... १४९-१५२

( १३ ) सूत्र विषय पृष्ठ २१—२३ उक्त अनन्यतामें सम्भावित ‘हिताकरण’ आदि दोषोंका परिहार.......................................................... १५२—१५६ २४-२५ ब्रह्मके द्वारा संकल्पमात्रसे बिना साधन-सामग्रीके ही जगत्की रचनाका कथन......................................... १५६—१५८ २६—२८ ब्रह्मकारणवादमें सम्भावित अन्यान्य दोष तथा श्रुति- विरोधका परिहार................................................ १५८—१६० २९-३० सांख्यमतमें दोष दिखाकर ग्रन्थकारद्वारा अपने सिद्धान्तकी पुष्टि................................................. १६१-१६२ ३१—३३ कारण और प्रयोजनके बिना ही परमेश्वरद्वारा संकल्प- मात्रसे होनेवाली जगत्की सृष्टि उनकी लीलामात्र है— इसका प्रतिपादन.............................................. १६३-१६४ ३४-३५ ब्रह्ममें आरोपित विषमता और निर्दयता दोषका निराकरण....................................................... १६५-१६७ ३६-३७ जीवों और उनके कर्मोंकी अनादि सत्ताका प्रतिपादन तथा ब्रह्मकारणवादमें विरोधके अभावका कथन............ १६८—१६९ दूसरा पाद १-१० अनेक प्रकारके दोष दिखाकर सांख्योक्त प्रधान कारणवादका खण्डन........................................... १७०—१७७ ११-१७ वैशेषिकोंके परमाणुकारणवादका निराकरण............... १७८-१८४ १८-३२ बौद्धमतकी असंगतियोंको दिखाते हुए उसका खण्डन..... १८४-१९६ ३३-३६ जैनमतमें पूर्वापरविरोध दिखाते हुए उसका खण्डन....... १९६-१९९ ३७-४१ पाशुपतमतका खण्डन............................................ १९९-२०२ ४२-४५ पांचरात्र आगममें उठायी हुए आंशिक अनुपपत्तियोंका परिहार........................................................... २०२-२०५ तीसरा पाद १-९ ब्रह्मसे आकाश और वायुकी उत्पत्तिका उपपादन करके ब्रह्मके सिवा, सबकी उत्पत्तिशीलताका कथन............. २०६-२११

( १४ ) सूत्र विषय पृष्ठ १०—१३ वायुसे तेजकी, तेजसे जलकी और जलसे पृथिवीकी उत्पत्तिमें भी ब्रह्म ही कारण हैं, इसका प्रतिपादन .............. २११—२१३ १४-१५ सृष्टिक्रमके विपरीत प्रलयक्रमका कथन तथा इन्द्रियोंकी उत्पत्तिमें क्रमविशेषका अभाव .................................... २१३-२१५ १६–२० जीवके जन्म-मृत्यु-वर्णनकी औपचारिकता तथा जीवात्माकी नित्यता .................................................... २१६–२२० २१-२९ जीवात्माके अणुत्वका खण्डन और विभुत्वकी स्थापना ... २२०-२२६ ३०-३२ जीव शरीरके सम्बन्धसे एकदेशी है, सत् जीवात्माका ही सृष्टिकालमें प्राकट्य होता है और वह अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषयोंका अनुभव करता है, इसका प्रतिपादन... २२६-२३० ३३–४२ जीवात्माका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे औपचारिक है तथा उसमें परमात्मा ही कारण हैं; क्योंकि वह उन्हींके अधीन है, इसका निरूपण ....................... २३०–२३८ ४३-४७ जीवात्मा ईश्वरका अंश है, किंतु ईश्वर उसके दोषोंसे लिप्त नहीं होता; इसका प्रतिपादन ............................ २३८-२४३ ४८-५० नित्य एवं विभु जीवोंके लिये देहसम्बन्धसे विधि-निषेधकी सार्थकता और उनके कर्मोंका विभाग ........................ २४३-२४५ ५१-५३ जीव और ब्रह्मके अंशांशिभावको औपाधिक माननेमें सम्भावित-दोषोंका उल्लेख .................................... २४५-२४७ चौथा पाद १-४ इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भूतोंसे नहीं परमात्मासे ही होती है, इसका प्रतिपादन और श्रुतियोंके विरोधका परिहार ....... २४८-२५० ५-७ इन्द्रियोंकी संख्या सात ही है, इस मान्यताके खण्डनपूर्वक मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंकी सिद्धि तथा सूक्ष्मभूतोंकी भी ब्रह्मसे उत्पत्तिका कथन ............................................. २५१-२५२ ८-१३ मुख्य प्राणकी ब्रह्मसे ही उत्पत्ति बताकर उसके स्वरूपका निरूपण ................................................................. २५३-२५६

( १५ ) सूत्र विषय पृष्ठ १४-१६ ज्योतिः आदि तत्त्वोंका अधिष्ठाता ब्रह्म और शरीरका अधिष्ठाता नित्य जीवात्मा है, इसका कथन ............. २५६-२५८ १७-१९ इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता .............................. २५८-२५९ २० ब्रह्मसे ही नाम-रूपकी रचनाका कथन .................... २६० २१-२२ सब तत्त्वोंका मिश्रण होनेपर भी पृथिवी आदिकी अधिकतासे उनसे पृथक्-पृथक् कार्यका निर्देश ........... २६०-२६१ तीसरा अध्याय पहला पाद १-६ शरीरके बीजभूत सूक्ष्म तत्त्वोंसहित जीवके देहान्तरमें गमनका कथन, 'पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषरूप हो जाता है' श्रुतिके इस वचनपर विचार, उस जलमें सभी तत्त्वोंके सम्मिश्रणका कथन और अन्यान्य विरोधोंका परिहार .... २६२-२६८ ७-११ स्वर्गमें गये हुए पुरुषको देवताओंका अन्न बताना औपचारिक है, जीव स्वर्गसे कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, श्रुतिमें 'चरण' शब्द कर्मसंस्कारोंका उपलक्षण और पाप-पुण्यका बोधक है, इसका उपपादन........... २६८-२७२ १२-१७ पापी जीव यमराजकी आज्ञासे नरकमें यातना भोगते हैं, स्वर्गमें नहीं जाते, कौषीतकिश्रुतिमें भी समस्त शुभकर्मियोंके लिये ही स्वर्गगमनकी बात आयी है; इसका वर्णन .... २७२-२७५ १८-२१ यम-यातना छान्दोग्यवर्णित तीसरी गतिसे भिन्न एवं अधम चौथी गति है, इसका वर्णन तथा स्वेदज जीवोंका उद्भिज्जमें अन्तर्भाव ........................................ २७६-२७८ २२-२७ स्वर्गसे लौटे हुए जीव किस प्रकार आकाश, वायु, धूम, मेघ, धान, जौ आदिमें स्थित होते हुए क्रमशः गर्भमें आते हैं, इसका स्पष्ट वर्णन ................................... २७८-२८१ दूसरा पाद १-६ स्वप्न मायामात्र और शुभाशुभका सूचक है, भगवान् ही

( १६ ) सूत्र विषय पृष्ठ जीवको स्वप्नमें नियुक्त करते हैं, जीवमें ईश्वरसदृश गुण तिरोहित हैं, परमात्माके ध्यानसे प्रकट होते हैं, उसके अनादि बन्धन और मोक्ष भी परमात्माके सकाशसे हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका तिरोभाव देहके सम्बन्धसे है ...... २८२-२८६ ७-१० सुषुप्तिकालमें जीवकी नाड़ियोंके मूलभूत हृदयमें स्थिति, उस समय उसे परमात्मामें स्थित बतानेका रहस्य, सुषुप्तिसे पुन: उसी जीवके जाग्रत् होनेका कथन तथा मूर्च्छाकालमें अधूरी सुसुप्तावस्थाका प्रतिपादन ......... २८६-२९० ११-२६ सर्वान्तर्यामी परमात्माका किसी भी स्थान-दोषसे लिप्त न होना, परमेश्वरका निर्गुण-निर्विशेष, सगुण-सविशेष दोनों लक्षणोंसे युक्त होना, इसमें सम्भावित विरोधक परिहार उक्त दोनों लक्षणोंकी मुख्यता, परमात्मामें भेदका अभाव, सगुणरूपकी औपाधिकताका निराकरण, प्रतिबिम्बके दृष्टान्तका रहस्य, परमेश्वरमें शरीरके वृद्धि-ह्रास आदि दोषोंका अभाव, निषेध श्रुतियोंद्वार इयत्तामात्रका प्रतिषेध, निर्गुण- सगुण दोनों स्वरूपोंका मन-बुद्धिसे अतीत होना तथा आराधनासे भगवान्के प्रत्यक्ष दर्शन होनेका कथन .................. २९१-३०४ २७-३३ परमात्माका अपनी शक्तियोंसे अभेद और भेद तथा अभेदोपासना और भेदोपासनाके उपदेशका अभिप्राय .... ३०४-३१० ३४-३७ शरीर आदिके सम्बन्धसे जीवोंके परस्पर भेदकी सिद्धि, प्रकृतियोंमें भेद होनेपर भी परब्रह्ममें भेद या नानात्वका अभाव.. ३११-३१३ ३८-४१ कर्मोंका फल देनेवाला परमात्मा ही है, कर्म नहीं; इसका प्रतिपादन ................................................ ३१३-३१५ तीसरा पाद १-१० वेदान्तवर्णित समस्त ब्रह्मविद्याओंकी एकता, भेद- प्रतीतिका निराकरण, शाखा-विक्षेपके लिये ही शिरोव्रत आदिका नियम, समानविद्याके प्रकरणमें एक जगह

( १७ ) सूत्र विषय पृष्ठ कही हुई बातोंके अन्यत्र अध्याहार करनेका कथन, उद्देश्यकी एकता होनेपर विद्याओंमें भेदका अभाव, ब्रह्मविद्यासे भिन्न विद्याओंकी एकता या भिन्नताके निर्णयमें संज्ञा आदि हेतुओंके उपयोगका कथन .............................. ३१६—३२४ ११—१८ ब्रह्मके 'आनन्द' आदि धर्मोंका ही अन्यत्र अध्याहार उचित, 'प्रियाशिरस्त्व' रूपकगत धर्मोंका नहीं, आनन्दमयकी ब्रह्मरूपता, विरोध-परिहार तथा अन्न-रसमय पुरुषके ब्रह्म न होनेका प्रतिपादन .................................... ३२४—३२९ १९—२५ एक शाखामें कही विद्याकी एकता, नेत्र एवं सूर्य- मण्डलवर्ती पुरुषोंके नाम और गुणका एक-दूसरेमें अध्याहारकी अनावश्यकता, उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके सर्वाधारता और सर्वव्यापकता आदि धर्मोंके अध्याहारका निषेध तथा पुरुष विद्यामें प्रतिपादित दिव्य गुणोंके और कठवर्णित वेध्यत्व आदि धर्मोंके अन्यत्र अध्याहारका अनौचित्य ............... ३३०—३३५ २६ ब्रह्मविद्याके फल-वर्णनमें हानि (दुःखनाश आदि) और प्राप्ति (परमपदकी प्राप्ति आदि), दोनों प्रकारके फलोंका सर्वत्र सम्बन्ध .............................................. ३३५—३३७ २७—३२ ब्रह्मलोकमें जानेवाले ज्ञानी महात्माके पुण्य और पापोंकी यहीं समाप्ति, संकल्पानुसार ब्रह्मलोक-गमन या यहीं ब्रह्म-सायुज्यकी प्राप्ति सम्भव, ब्रह्मलोक जानेवाले सभी उपासकोंके लिये देवयानमार्गसे गमनका नियम, किंतु कारकपुरुषोंके लिये इस नियमका अभाव .................. ३३८—३४२ ३३—४१ अक्षरब्रह्मके लक्षणोंका सर्वत्र ब्रह्मके वर्णनमें अध्याहार आवश्यक, मुण्डक, कठ और श्वेताश्वतर आदिमें जीव और ईश्वरको एक साथ हृदयमें स्थित बतानेवाली विद्याओंकी एकता, ब्रह्म जीवात्माका भी अन्तर्यामी आत्मा है, इसमें विरोधका परिहार, जीव और ब्रह्मके भेदकी औपाधिकताका निराकरण एवं विरोध-परिहार ... ३४२—३५१

( १८ ) सूत्र विषय पृष्ठ ४२—५२ ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी पुरुषोंके लिये भोग भोगनेका अनिवार्य नियम नहीं, बन्धनसे मुक्त होना ही विद्याका मुख्य फल, कर्मसे मुक्तिका प्रतिपादन करनेवाले पूर्वपक्षका उल्लेख और खण्डन, ब्रह्मविद्यासे ही मुक्तिका प्रतिपादन तथा साधकोंके भावानुसार विद्याके आनुषंगिक फलमें भेद ....... ३५२—३६१ ५३-५४ शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता न माननेवाले नास्तिक- मतका खण्डन ............................................ ३६१-३६२ ५५—६० यज्ञांगसम्बन्धी उपासना प्रत्येक वेदकी शाखावालोंके लिये अनुष्ठेय है, एक-एक अंगकी अपेक्षा सब अंगोंसे पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है, शब्दादि भेदसे विद्याओंमें भिन्नता है, फल एक होनेसे साधककी इच्छाके अनुसार उनके अनुष्ठानमें विकल्प हैं; किंतु भिन्न-भिन्न फलवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमें कामनाके अनुसार एकाधिक उपासनाओंका समुच्चय भी हो सकता है—इन सब बातोंका वर्णन .................... ३६३—३६६ ६१—६६ यज्ञांगसम्बन्धी उपासनाओंमें समुच्चय या समाहारका खण्डन .................................................... ३६६—३६९ चौथा पाद १ ज्ञानसे ही परम पुरुषार्थकी सिद्धि .............................. ३७० २—७ ‘विद्या कर्मका अंग है’ जैमिनिके इस मतका उल्लेख .... ३७१—३७३ ८—१७ जैमिनिके उक्त मतका खण्डन तथा ‘विद्या कर्मका अंग नहीं, ब्रह्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है’ इस सिद्धान्तकी पुष्टि ...... ३७४—३८० १८—२० पूर्वपक्षके खण्डनपूर्वक संन्यास आश्रमकी सिद्धि ......... ३८०—३८३ २१-२२ अपूर्व फलदायिनी उद्गीथ आदि उपासनाओंका विधान .. ३८३-३८४ २३-२४ उपनिषद्‍वर्णित कथाएँ विद्याका ही अंग हैं, यज्ञका नहीं, इसका प्रतिपादन .................................... ३८५-३८६ २५ ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, ईंधन आदिकी अपेक्षाका अभाव ..................................................... ३८६

(१९) सूत्र विषय पृष्ठ २६-२७ विद्याकी प्राप्तिके लिये वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी अपेक्षा तथा शम-दम आदिकी अनिवार्य आवश्यकता ......... ३८७-३८९ २८-३१ प्राणसंकटके सिवा अन्य समयमें, आहार-शुद्धिविषयक सदाचारके त्यागका निषेध ....................................... ३९०-३९२ ३२-३३ ज्ञानीके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रमकर्मके अनुष्ठानकी आवश्यकता .............................................................. ३९३ ३४-३९ भक्तिसम्बन्धी श्रवण-कीर्तन आदि कर्मोंके अनुष्ठानकी अनिवार्य आवश्यकता तथा भागवतधर्मकी महत्ताका प्रतिपादन ................................................................ ३९४-४०० ४०-४३ वानप्रस्थ, संन्यास आदि ऊँचे आश्रमोंसे वापस लौटनेका निषेध, लौटनेवालेका पतन और ब्रह्मविद्या आदिमें अनधिकार ............................................................... ४००-४०२ ४४-४६ उद्गीथ आदिमें की जानेवाली उपासनाका कर्ता तो ऋत्विक् है किंतु उसके फलमें यजमानका अधिकार है, इसका वर्णन ........................................................... ४०३-४०४ ४७-५० संन्यास, गृहस्थ आदि सब आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार ................................................................ ४०४-४०७ ५१-५२ मुक्तरूप फल इस जन्ममें मिलता है या जन्मान्तरमें, इसी लोकमें मिलता है या लोकान्तरमें ? इसका नियम नहीं है यह कथन ............................................................... ४०८-४०९ चौथा अध्याय पहला पाद १-२ उपदेश-ग्रहणके पश्चात् ब्रह्मविद्याके निरन्तर अभ्यासकी आवश्यकता .............................................................. ४१०-४११ ३ आत्मभावसे परब्रह्मके चिन्तनका उपदेश ....................... ४११-४१२ ४-५ प्रतीकमें आत्मभावनाका निषेध और ब्रह्मभावनाका विधान ४१२-४१३ ६ उद्गीथ आदिमें आदित्य आदिकी भावना ......................... ४१४

( २० ) सूत्र विषय पृष्ठ ७—१० आसनपर बैठकर उपासना करनेका विधान ............. ४१४—४१६ ११ जहाँ चित्त एकाग्र हो, वही स्थान उपासनाके लिये उत्तम .. ४१६-४१७ १२ आजीवन उपासनाकी विधि ........................................ ४१७-४१८ १३-१४ ब्रह्मसाक्षात्कारके पश्चात् ज्ञानीका भूत और भावी शुभाशुभ कर्मोंसे असम्बन्ध ................................. ४१८—४२० १५ शरीरके हेतुभूत प्रारब्ध कर्मका भोगके लिये नियत समयतक रहना ..................................................... ४२० १६-१७ ज्ञानीके लिये अग्निहोत्र आदि तथा अन्य विहित कर्मोंका लोकसंग्रहार्थ विधान ............................................. ४२०-४२२ १८ कर्मांग उपासनाका ही कर्मके साथ समुच्चय .............. ४२२ १९ प्रारब्धका भोगसे नाश होनेपर ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति .... ४२३ दूसरा पाद १-४ उत्क्रमणकालमें वाणीकी अन्य इन्द्रियोंके साथ मनमें, मनकी प्राणमें और प्राणकी जीवात्मामें स्थितिका कथन .. ४२४-४२६ ५-६ जीवात्माकी सूक्ष्मभूतोंमें स्थिति ............................. ४२६-४२७ ७ ब्रह्मलोकका मार्ग आरम्भ होनेसे पूर्वतक ज्ञानी और अज्ञानीकी समान गतिका प्रतिपादन ......................... ४२७-४२८ ८ अज्ञानी जीवका परब्रह्ममें स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है .............................................................. ४२८-४२९ ९-११ जीवात्मा उत्क्रमणके समय जिस आकाश आदि भूतसमुदायमें स्थित होता है, वह सूक्ष्म शरीर है, इसका प्रतिपादन .......................................................... ४२९-४३० १२-१६ निष्काम ज्ञानी महात्माओंका ब्रह्मलोकमें गमन नहीं होता, वे यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, इसका निरूपण .. ४३१-४३४ १७ सूक्ष्म शरीरमें स्थित जीव किस प्रकार ब्रह्मलोकमें जानेके लिये सुषुम्ना नाडीद्वारा शरीरसे निकलता है, इसका वर्णन.. ४३५-४३६ १८ शरीरसे निकलकर जीवात्माका सूर्यरश्मियोंमें स्थित होना ४३६

( २१ ) सूत्र विषय पृष्ठ १९-२० रात्रि और दक्षिणायनकालमें भी सूर्यरश्मियोंसे उसका बाधारहित सम्बन्ध .............................................. ४३७-४३८ २१ योगीके लिये गीतोक्त कालविशेषका नियम ................ ४३८-४३९ तीसरा पाद १ ब्रह्मलोकमें जानेके लिये 'अर्चिरादि' एक ही मार्गका कथन .............................................................. ४४०-४४१ २ संवत्सरसे ऊपर और सूर्यलोकके नीचे वायुलोककी स्थिति.. ४४१-४४२ ३ 'विद्युत्' से ऊपर वरुणलोककी स्थिति ......................... ४४२ ४ 'अर्चिः', 'अहः', 'पक्ष', 'मास', 'अयन' आदि आतिवाहिक पुरुष हैं, इसका प्रतिपादन .................................... ४४३ ५ अर्चि आदिको अचेतन माननेमें आपत्ति ..................... ४४३-४४४ ६ विद्युल्लोकसे ऊपर ब्रह्मलोकतक अमानव पुरुषके साथ जीवात्माका गमन ................................................ ४४४ ७-११ 'ब्रह्मलोकमें कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है', इस बादरिके मतका वर्णन ..................................................... ४४५-४४७ १२-१४ 'ब्रह्मलोकमें परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' इस जैमिनिमतका उपपादन ............................................................ ४४७-४४९ १५-१६ प्रतीकोपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सभी उपासक ब्रह्मलोकमें जाकर संकल्पानुसार कार्यब्रह्म अथवा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यह बादरायणका सिद्धान्त .... ४४९-४५१ चौथा पाद १-३ परब्रह्मपरायण जीवके लिये परमधाममें पहुँचकर अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होने एवं सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मरूपसे स्थित होनेका कथन ४५२-४५४ ४-६ ब्रह्मलोकमें पहुँचनेवाले उपासकोंकी तीन गति— (१) अभिन्नरूपसे ब्रह्ममें मिल जानेका, (२) पृथक् रहकर परमात्माके सदृश दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होनेका