बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
·२३४· बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् जो ग्रह अपनी उच्चराशि में होता है वह दीप्त होता है। अपने अधिमित्र के गृह में हो तो स्वस्थ, मित्र के गृह में हो तो मुदित, सम के गृह में हो तो दीन।।७।। शत्रुभे दुःखितोऽतीवविकलः पापसंयुतः। खलः खलग्रहे ज्ञेयः कोपी स्यादर्कसंयुतः॥८॥ शत्रु की राशि में हो तो अतिदुःखी, पापग्रह के साथ हो तो विकल, पापग्रह की राशि में हो तो खल और सूर्य के साथ हो तो कोपी होता है॥८।। पाके प्रदीप्तस्य धराधिपत्यमुत्साहशौर्यं धनवाहने च। स्त्रीपुत्रलाभं शुभबन्धुपूजां क्षितीश्वरान्मानमुपैति विद्याम्।।९।। दीप्त ग्रह की राशि में पृथ्वी का लाभ, उत्साह, पराक्रम, धन, वाहन, स्त्री-पुत्र का लाभ, शुभकार्य, बंधुओं से प्रतिष्ठा और राजा से प्रतिष्ठा का लाभ होता है।।८।। स्वस्थस्य खेटस्य दशाविपाके स्वस्थो नृपाल्लब्धधनादिसौख्यम्। विद्यां यशः प्रीतिमहत्त्वमाराद्वारार्थभूम्यात्मजधर्ममेति।।१०।। स्वस्थ ग्रह की दशा में स्वस्थता, राजा से प्राप्त धन आदि का सुख, विद्या, यश, धन-धर्म आदि का लाभ होता है।।१०।। मुदान्वितस्यापि दशाविपाके वस्त्रादिकं गन्धसुतीर्थधैर्यम्। पुराणधर्मश्रवणादिलाभं हयादियानाम्बरभूषणाप्तिम्।।११।। मुदित ग्रह की दशा में वस्त्र, गंध, तीर्थयात्रा, धैर्य, पुराण आदि का श्रवण, घोड़ा आदि सवारियों का लाभ, आभूषण का लाभ होता है।।११।। दशाविपाके सुखधर्ममेति शान्तस्य भूपुत्रकलत्रयानम्। विद्याविनोदान्वितधर्मशास्त्रं बह्वर्थदेशाधिपपूज्यतां च।।१२।। शांत की दशा में सुख, धर्म का लाभ, भूमि, स्त्री, सवारी, विद्या- का विनोद, धर्मशास्त्र, बहुत धन तथा राजाओं से पूज्य होता है।।१२।। स्थानच्युतिबन्धुविरोधता च दीनस्य खेटस्य दशाविपाके। जीवत्यसौ कुत्सितहीनवृत्त्या त्यक्तो जनै रोगनिपीडितः स्यात्।१३। दीन ग्रह की दशा में स्थानच्युति, बंधुओं से विरोध, कुत्सित वृत्ति से जीविका, लोगों से त्यागा हुआ और रोग से पीडित होता है।।१३।।
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २३५ दुःखार्दितस्यापि दशाविपाके नानाविधं दुःखमुपैति नित्यम्। विदेशगो बन्धुजनैर्विहीनश्चौराग्निभूपैर्भयमातनोति।।१४।। अतिदुःखी ग्रह की दशा में अनेक प्रकार के दुःखों से युक्त, विदेश यात्रा, बंधुओं से त्याज्य, चोर, अग्नि और राजा से भय होता है।।१४।। वैकल्यखेटस्य दशाविपाके वैकल्यमायाति मनोविकारम्। मित्रादिकानां मरणं विशेषात्स्त्रीपुत्रयानाम्बरचोरपीडाम्।।१५।। विकल ग्रह की दशा में शरीर में विकलता, मन में विकार, मित्रादिकों का मरण, स्त्री, पुत्र, सवारी आदि की पीडा होती है।।१५।। दशाविपाके कलहं वियोगं खलस्य खेटस्य पितुर्वियोगम्। शत्रोर्जनानां धनभूमिनाशमुपैति नित्यं स्वजनैश्च निन्दाम्।।१६।। खल ग्रह की दशा में कलह, वियोग, पिता का वियोग, शत्रु द्वारा जन, धन, भूमि का नाश और अपने ही लोगों से नित्य निंदा होती है।।१६।। कोपान्वितस्यापि दशाविपाके पापाः समायान्ति बहुप्रकारैः। विद्याधनस्त्रीसुतबन्धुनाशं पुत्रादिकृच्छ्रं खलु नेत्ररोगम्।।१७।। कोपी ग्रह की दशा में अनेक प्रकार के पापकर्म, विद्या, धन, स्त्री, पुत्र और बंधुओं का नाश, पुत्रादि को कष्ट और नेत्ररोग होता है।।१७।। अथ बालाद्यवस्थाफलम्- बालो रसांशैरसमे प्रदिष्टस्ततः कुमारो हि युवाथ वृद्धः। मृतः क्रमादुत्क्रमतः समर्क्षे बालाद्यवस्था कथिता ग्रहाणाम्।। फलं तु किञ्चिद्वितनोति बालश्चार्द्धं कुमारो यतते न पुंसाम्। युवा समग्रं खचरोऽथ वृद्धः फलं च दुष्टं मरणं मृताख्यम्।।१९।। एक राशि में षष्ठांश के तुल्यं बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत ये पाँच अवस्थाएँ होती हैं। बाल साधारण, कुमार में आधा, युवा में कुछ, वृद्ध में संपूर्ण और मृत में मृत्यु होती है।।१८।१९।। अथ प्रवासाद्यवस्थाफलम्- प्रवासनष्टा च मृता जया हास्या रतिर्मुदा। शुचा ज्वरा च कम्प्रा च सुस्थिता चाथ सन्निभा।।२०।।
२३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रवास, नष्टा, मृत, जय, हास्य, रति, मुद, सुदा, भुक्त, ज्वर, कंप और स्थिर ये १२ अवस्थाएँ होती हैं।।२०।। षष्ठिघ्नं गतभं भुक्तघटीयुक्तं युगाहतम्। शराब्धिहल्लभ्यतोऽर्काच्छेषावस्था द्विजोत्तम।।२१।। गत नक्षत्र की संख्या को ६० से गुणाकर उसमें नक्षत्र की भुक्त घटी को जोड़कर ४ से गुणाकर उसमें ४५ से भाग देवे तो लब्धि तुल्य अवस्था होती है। लब्धि १२ से अधिक हो तो उसमें १२ से भाग देने से शेष गत अवस्था होती है।।२१।। प्रवासः प्रवासोपगे जन्मकालेऽर्थनाशस्तु नष्टोपगे मृत्युभीतिः। मृतावस्थिते स्याज्जयायां जयस्तु विलासस्तु हास्योपगे कामिनीभिः।। रतौ स्याद्रतिः क्रीडिता सौख्यदात्री प्रसुप्तापि निद्रां कलिं देहपीडाम्। भयं तापहानिः सुखं स्यात्तु भुक्त्वा ज्वराकम्पितासुस्थितासु क्रमेण।।२३।। अवस्थाओं के नाम के अनुसार ही उनके फल होते हैं।।२२-२३।। अथ लज्जिताद्यवस्था तत्फलं चाह- लज्जितो गर्वितश्चैव क्षुधितस्तृषितस्तथा। मुदितः क्षोभितश्चैव ग्रहावस्थाः प्रकीर्त्तिताः।।२४।। लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित, क्षोभित, ये ६ ग्रहों की अवस्थाएँ होती हैं।।२४।। पुत्रगेहगतः खेटो राहुकेतुयुतो भवेत्। रविमन्दकुजैर्युक्तो लज्जितो ग्रह एव च।।२५।। पाँचवें भाव में ग्रह राहु, केतु, रवि, शनि और भौम से युक्त हो तो लज्जित होता है।।२५।। तुङ्गस्थानगतो वापि त्रिकोणेऽपि भवेत्पुनः। गर्वितः सोऽपि गदितो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२६।। यदि अपनी उच्चराशि वा मूल त्रिकोण में हो तो गर्वित होता है।।२६।। शत्रुगेही शत्रुयुक्तो रिपुदृष्टो भवेद्यदि। क्षुधितः स च विज्ञेयः शनियुक्तो यथा तथा।।२७।।
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २३७ शत्रु की राशि में हो, शत्रु से युक्त हो, शत्रु से देखा जाता हो अथवा शनि से युक्त हो तो क्षुधित होता है।।२७।। जलराशौ स्थितः खेटः शत्रुणा चावलोकितः। शुभग्रहा न पश्यन्ति तृषितः स उदाहृतः।।२८।। ग्रह जलराशि में हो, अपने शत्रु से देखा जाता हो, शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो तृषित होता है।।२८।। मित्रगेही मित्रयुक्तो मित्रेण चावलोकितः। गुरुणा सहितो यश्च मुदितः स प्रकीर्त्तितः।।२९।। यदि ग्रह मित्र के गृह में हो, मित्र से युक्त हो और मित्र से देखा जाता हो और गुरु से युक्त हो तो मुदित होता है।।२९।। रविणा सहितो यश्च पापाः पश्यन्ति सर्वथा। क्षोभितं तं विजानीयाच्छत्रुणा यदि वीक्षितः।।३०।। रवि से युक्त हो और केवल पापग्रह से दृष्ट हो और शत्रु से देखा जाता हो तो क्षोभित होता है।।३०।। येषु येषु च भावेषु ग्रहास्तिष्ठन्ति सर्वथा। क्षुधितः क्षोभितो वापि स नरो दुःखभाजनः।।३१।। जिन-जिन भावों में क्षुधित और क्षोभित ग्रह रहते हैं उन-उन भाव के फलों का नाश होता है।।३१।। एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वभावेषु पण्डितैः। बलाबलविचारेण वक्तव्यः फलनिर्णयः।।३२।। इसी प्रकार सभी भावों का बलाबल के विचार से फल का निर्णय करना चाहिए।।३२।। अन्योन्यं च मुदा युक्तं फलं मिश्रं वदेत्पुनः। बलहीने तथा हानिः सबले च महाफलम्।।३३।। परस्पर मुदित ग्रह हों तो मिश्रित फल होता है। यदि ग्रहहीन बल हो तो हानि और बली हो तो अधिक फल होता है।।३३।। कर्मस्थाने स्थितो यस्य लज्जितस्तृषितस्तथा। क्षुधितः क्षोभितो वापि स नरो दुःखभाजनः।।३४।। जिसके कर्मभाव में लज्जित वा तृषित ग्रह हो अथवा क्षुधित वा क्षोभित ग्रह हो तो वह मनुष्य दुःखी होता है।।३४।।
२३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सुतस्थाने भवेद्यस्य लज्जितो ग्रह एव च। सुतनाशो भवेत्तस्य एकस्तिष्ठति सर्वदा।।३५।। जिसके पुत्रस्थान में लज्जित ग्रह हो तो उसके पुत्र का नाश होता है।।३५।। क्षोभितस्तृषितश्चैव सप्तमे यस्य वा भवेत्। म्रियते तस्य नारी च सत्यमाहुर्द्विजोत्तम।।३६।। जिसके सातवें भाव में क्षोभित वा तृषित ग्रह हो तो उसकी स्त्री का नाश होता है।।३६।। नवालयारामसुखं नृपत्वं कलापटुत्वं विदधाति पुंसाम्। सदार्थलाभं व्यवहारवृद्धिं फलं विशेषादिह गर्वितस्य।।३७।। भवति मुदितयोगे वासशालाविशाला विमलवसनभूषाभूमियोषासु सौख्यम्। स्वजननजनविलासो भूमिपागारवासो रिपुनिवहविनाशो बुद्धिविद्याविकासः।।३८।। गर्वित ग्रह की दशा में नूतन मकान, बगीचा का सुख, नृपत्व, कला में पटुता, सदा धन का लाभ, व्यवहार में कुशलता, राजगृह में वास और शत्रुओं के समूह का नाश होता है।।३८।। दिशति लज्जितभाववशाद्रतिं विगतराममतिं विमतिक्षयम्। सुतगदागमनं गमनं वृथा कलिकथाभिरुचिं न रुचिं शुभे।।३९।। लज्जित ग्रह की दशा में ईश्वर में अनिच्छा, सुंदर बुद्धि की हानि, पुत्र को कष्ट, व्यर्थ भ्रमण, झगड़ा आदि में रुचि और धर्म में अरुचि होती है।।३९।। संक्षोभितस्यापि फलं विशेषाद्दरिद्रजातं कुमतिं च कष्टम्। करोति वित्तक्षयमंघ्रिबाधां धनादिबाधामवनीशकोपात्।।४०।। क्षुधितग्रहवशाद्वै शोकमोहादितापः परिजनपरितापादाधिभीत्या कृशत्वम्। कलिरपि रिपुलोकैरर्थबाधा नराणा- मखिलबलनिरोधो बुद्धिरोधो विषादात्।।४१।।
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २३९ क्षोभित ग्रह की दशा में दरिद्रता, दुर्बुद्धि, कष्ट, धन का नाश, पैर में कष्ट, राजा के कोप से धनप्राप्ति में बाधा होती है। क्षुधित ग्रह की दशा में शोक, मोह, परिजनों के कष्ट से मानसिक व्यथा, कृशता, शत्रु से विवाद, धन की हानि और विरोध से बुद्धि की हानि होती है।।४१।। तृषितखगभवे स्यादंगनासंगमध्ये भवति गदविकारो दुष्टकार्याधिकारः। निजजनपरिवादादर्थहानिः कृशत्वं खलकृतपरितापो मानहानिः सदैव।।४२।। तृषित ग्रह की दशा में स्त्री के संसर्ग से रोग, दुष्ट कार्य का अधिकार, अपने ही लोगों के विवाद से धन की हानि, कृशता, दुष्टों से कष्ट और मानहानि होती है।।४२।। अथ शयनाद्यवस्थानयनम्- शयनं चोपवेशं च नेत्रपाणिप्रकाशनम्। गमनागमनं चाथ सभायां वसतिं तथा।।४३।। आगमं भोजनं चैव नृत्यलिप्सां च कौतुकम्। निद्रां ग्रहाणां चेष्टां च कथयामि तवाग्रतः।।४४।। १ शयन, २ उपवेशन, ३ नेत्रपाणि, ४ प्रकाशन, ५ गमन, ६ आगमन, ७ सभावास, ८ आगम, ९ भोजन, १० नृत्यलिप्सा, ११ कौतुक, १२ निद्रा
- ये १२ अवस्था और उनकी चेष्टाओं को कहता हूँ।।४३-४४।। यस्मिन्नृक्षे भवेत्खेटस्तेन तं परिपूरयेत्। पुनरंशेन सम्पूर्य स्वनक्षत्रं नियोजयेत्।।४५।। यातदण्डं तथा लग्नमेकीकृत्य सदा बुधः। रविणा हरते भागं शेषं कार्ये नियोजयेत्।।४६।। जिस नक्षत्र में ग्रह हो उसकी संख्या से ग्रहसंख्या को गुणा कर दे। गुणन- फल को ग्रह की नवांश संख्या से गुणा कर दे। गुणनफल में जन्मनक्षत्र संख्या को जोड़ दे और इसमें इष्टघटी और लग्न की संख्या को जोड़ कर उसमें १२ का भाग देने से शेष के तुल्य शयन आदि अवस्था होती है।।४५-४६।। नाक्षत्रिकदशाक्रमेण पुनः पूरणमाचरेत्। नामाक्षरेण संयुक्ते हर्तव्यं रविणा ततः।।४७।।
२४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् फिर शेषांक को उसी से गुणा कर गुणनफल में नाम के आद्यक्षर के अनुसार स्वरांक को जोड़ दे और १२ से भाग देवे, शेष में ग्रह का ध्रुवांक. जोड़ दे।।४७।। रवौ पञ्च तथा देयं चन्द्रे दद्याद्द्वयं तथा। कुजे द्वयं च संयुक्तं बुधे त्रीणि नियोजयेत् ।।४८।। जैसे रवि का ५, चंद्र का २, भौम का २, बुध का ३।।४८।। गुरौ बाणाः प्रदेयाश्च त्रयं दद्याच्च भार्गवे। शनौ त्रयमथो देयं राहौ दद्याच्चतुष्टयम् ।।४९।। गुरु का ५, शुक्र का ३, शनि का ३ और राहु का ४।।४९।। शेषं हतं च रामेण ग्रहाणां त्रिविधं भवेत्। दृष्टिं चेष्टां विचेष्टां च कथयामि तवाग्रतः ।।५०।। जोड़कर ३ का भाग देने से १ बचे तो दृष्टि, २ बचे तो चेष्टा और ३ या ० बचे तो विचेष्टा होती है।।५०।। उदाहरण— जैसे सूर्य ३-१८-२६-१४ जन्मनक्षत्र पुनर्वसु, इष्टघटी ३२ और जन्मलग्न मकर है। सूर्य आश्लेषा नक्षत्र में है, उसकी संख्या ९ है, रवि की संख्या १ को गुणा किया तो ९ हुआ, रवि की नवांश संख्या ६ से गुणा करने पर ६x९=५४ हुआ। इसमें जन्मनक्षत्र संख्या ७, इष्टघटी ३२ और जन्मलग्न संख्या १० इन तीनों को जोड़ने से १०३ हुआ। इसमें १२ का भाग देने से शेष ७ बचा, अतः सातवीं सभावास अवस्था सूर्य की हुई। फिर शेष को उसी से गुणा करने से ४९ हुआ। इसमे दिनेश के आद्य अक्षर का स्वरांक ५ जोड़कर १२ से भाग देने से ६ शेष बचा। इसमें रवि का ध्रुवांक ५ जोड़कर तीन का भाग देने से २ बचा, अतः चेष्टा अवस्था हुई। स्वराङ्कचक्र
| १ | २ | ३ | ४ | ५ |
|---|---|---|---|---|
| अ. | इ. | उ. | ए. | ओ. |
| क | ख | ग | घ | च |
| छ | ज | झ | र | ठ |
| ड | ढ | त | थ | द |
| ध | न | प | फ | ब |
| भ | म | य | र | ल |
| व | श | ष | स | ह |
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४१ दृष्ट्यादिफलम्- दृष्टौ स्वल्पफलं ज्ञेयं चेष्टायां विपुलं धनम्। विचेष्टायां फलं न स्यादेवं दृष्टिफलं विदुः॥५१॥ दृष्टि में ग्रहों की अवस्था का अल्पफल, चेष्टा में अधिक फल और विचेष्टा में निष्फल होता है।।५१।। शुभाशुभं ग्रहाणां च समीक्ष्याथ बलाबलम्। तुङ्गस्थाने विशेषेण बलं ज्ञेयं तथा बुधैः॥५२॥ ग्रहों का शुभाशुभ और बलाबल विचार कर फलादेश करना चाहिए।।५२।। अथ रवेर्द्वादशावस्थाफलम्- मन्दाग्निरोगो बहुधा नराणां स्थूलत्वमंघ्रेरपि पित्तकोपः। व्रणं गुदे शूलमुरःप्रदेशे यदोष्णभानौ शयनं प्रयाते॥५३॥ यदि सूर्य शयन अवस्था में हो तो जातक को मंदाग्निरोग, चरण में स्थूलता, पित्तप्रकोप, गुदा में व्रण तथा हृदय में शूल होता है।।५३।। दरिद्रताभारविहारशाली विवादविद्याभिरतो नरः स्यात्। कठोरचित्तः खलु नष्टवित्तः सूर्यो यदा चेदुपवेशनस्थः॥५४॥ उपवेशन अवस्था में हो तो दरिद्रता को भोगने वाला, कठोर चित्त वाला तथा नष्ट धन वाला होता है।।५४।। नरः सदानन्दधरः विवेकी परोपकारी बलवित्तयुक्तः। महासुखी राजकृपाभिमानी दिवाधिनाथो यदि नेत्रपाणौ॥५५॥ नेत्रपाणि अवस्था में हो तो सदा आनंद भोगनेवाला, विवेकी, परोपकारी, बली, धनी, महासुखी, राजा की कृपा से अभिमानी होता है।।५५।। उदारचित्तः परिपूर्णवित्तः सभासु वक्ता बहुपुण्यकर्त्ता। महाबली सुन्दररूपशाली प्रकाशने जन्मनि पद्मिनीशे॥५६॥ प्रकाशन में हो तो उदार चित्तवाला, धन से पूर्ण, सभा मे वक्ता, अनेक पुण्य करने वाला, महाबली, सुंदर रूपवाला होता है।।५६।। प्रवासशाली किल दुःखमाली सदालसी धीधनवर्जितश्च। भयातुरः कोपपरो विशेषाद्दिवाधिनाथे गमने मनुष्यः॥५७॥
२४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गमन अवस्था में हो तो जातक प्रवास मे रहने वाला, दुःखी, सदा आलसी, बुद्धि-धन से रहित, भयातुर, क्रोधी होता है।।५७।। परदाररतो जनतारहितो बहुधा गमने गमनाभिरुचिः। कृपणः खलताकुशलो मलिनं दिवसाधिपतौ मनुजः कुमतिः।।५८।। आगमन अवस्था में हो तो परस्त्री में आसक्त, जनमत से रहित, यात्रा में रुचि, कृपण, दुष्टता में कुशल और मलिन होता है।।५८।। सभागते हिते नरः परोपकारतत्परः सदार्थरत्नपूरितो दिवाकरे गुणाकरः। वसुन्धरानवाम्बरालयान्वितो महाबली विचित्रमित्रवत्सलः कृपाकलाधरः परः।।५९।। सभा अवस्था में हो तो परोपकारी, सदा धन-रत्न से परिपूर्ण, गुण का भंडार, भूमि, नूतन वस्त्र, गृह से युक्त, महाबली, अनेक मित्रों से युक्त और कृपालु होता है।।५९।। क्षोभितो रिपुगणैः सदा नरश्चञ्चलः खलमतिः कृशस्तथा। धर्मकर्मरहितो मदोद्धतश्चागमे दिनपतौ यदा तदा।।६०।। आगम अवस्था में सूर्य हो तो जातक शत्रुओं से क्षुभित, चंचल, दुष्टबुद्धि, कृशशरीर, धर्म-कर्म से रहित और उद्धत स्वभाव का होता है।।६०।। सदाङ्गसन्धिवेदना पराङ्गनाधनक्षयो बलक्षयः पदे पदे यदा तदा हि भोजने। असत्यता शिरोव्यथा तथा वृथान्नभोजनं रवावसत्कथारतिः कुमार्गगामिनी मतिः।।६१।। भोजन अवस्था में हो तो जातक हमेशा संधियों में वेदना, परस्त्री से द्रव्य की हानि, बल की हानि, असत्यभाषी, शिर में पीडा, व्यर्थ अन्न और भोजन करने वाला, व्यर्थ बकवाद करने वाला, कुमार्गगामी होता है।।६१।। विज्ञलोकैः सदा मण्डितः पण्डितः काव्यविद्यानवद्यप्रलापान्वितः। राजपूज्यो धरामण्डले सर्वदा नृत्यलिप्सागते पद्मिनीनायके।।६२।। नृत्यलिप्सा में हो तो सदा विज्ञजनों से आवृत, पंडित, काव्य करने वाला, राजा से पूज्य होता है।।६२।।
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४३ सर्वदानन्दधर्ता जनो ज्ञानवान्यज्ञकर्ता धराधीशसद्मस्थितः। पद्मबन्धावरातेर्भयं स्वाननः काव्यविद्याप्रलापी मुदा कौतुके ।।६३।। कौतुक अवस्था में हो तो सदा आनंद करने वाला, ज्ञानी, यज्ञ करने वाला, राजगृह में रहने वाला, शत्रु से भयभीत, सुंदर मुख और काव्य करने वाला होता है।।६३।। निद्राभरारक्तनिभे भवेतां निद्रागते लोचनपद्मयुग्मे। रवौ विदेशे वसतिर्जनस्य कलत्रहानिः कतिथार्थनाशः।।६४।। निद्रा अवस्था में हो तो निद्रा से भरे नेत्रों वाला, विदेशी, स्त्री की हानि और अनेक प्रकार से धन का नाशक होता है।।६४।। अथ चन्द्रावस्थाफलम्- जनुःकाले क्षपानाथे शयनं चेदुपागते। मानी शीतप्रधानश्च कामी वित्तविनाशकः।।६५।। यदि चंद्रमा शयन अवस्था में हो तो उसकी दशा में जातक मानी, शीतल स्वभाव, कामी और धन का नाश करने वाला होता है।।६५।। रोगार्दितो मन्दमतिर्विशेषाद्वित्तेन हीनो मनुजः कठोरः। अकार्यकारी परवित्तहारी क्षपाकरे चेदुपवेशनस्थे।।६६।। उपवेशन अवस्था में हो तो रोगी, मंदबुद्धि, धनहीन, कठोर, कुकर्म में रत, दूसरे के धन को हरण करने वाला होता है।।६६।। नेत्रपाणौ क्षपानाथे महारोगी नरो भवेत्। अनल्पजल्पको धूर्त्तः कुकर्मनिरतः सदा।।६७।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो महारोगी, व्यर्थ बोलने वाला, धूर्त्त और कुकर्म करने वाला होता है।।६७।। यदा राकानाथे गतवति विकाशं च जनने विकाराः संसारे विमलगुणराशेरवनिपात्। नवाशामाला स्यात्करितुरगलक्ष्म्या परिवृता विभूषा योषाभिः सुखमनुदिनं तीर्थगमनम्।।६८।। यदि प्रकाश अवस्था में हो तो संसार में प्रसिद्ध, अपने गुणों से राजा से द्रव्य प्राप्त करने वाला, हाथी, घोड़ा, लक्ष्मी से युक्त, स्त्री से सुखी और तीर्थयात्री होता है।।६८।।
२४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सितेतरे पापरतो निशाकरे विशेषतः क्रूरतरो नरो भवेत्। सदाक्षिरोगैः परिपीड्यमानो बलक्षपक्षे गमने भयातुरः॥६९॥ यदि चंद्रमा कृष्णपक्ष में गमन अवस्था में हो तो पापी और क्रूर स्वभाव का, नेत्ररोगी और शुक्लपक्ष में भयभीत होता है॥६९॥ विधावागमने मानी पादरोगी नरो भवेत्। गुप्तपापरतो दीनो मतितोषविवर्जितः॥७०॥ आगमन अवस्था में हो तो मानी, चरण में रोग युक्त, गुप्त पाप करने वाला दीन, मलिन और असंतोषी होता है॥७०॥ सकलजनवदान्यो राजराजेन्द्रमान्यो रतिपतिसमकान्तिः शान्तिकृत्कामिनीनाम्। सपदि सदसि याते चारुबिम्बे शशाङ्के भवति परमरीतिप्रीतिविज्ञो गुणज्ञः॥७१॥ सभावस्था में हो तो सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ, राजाओं का मान्य, कामदेव के समान सुंदर, स्त्रियों को सुखदाता, प्रीति के रीति को जाननेवाला होता है॥७१॥ विधावागमने मर्त्यो वाचालो धर्मपूरितः। कृष्णपक्षे द्विभार्यः स्याद्रोगी दुष्टनरो हठी॥७२॥ आगमन अवस्था मे हो तो वक्ता, धर्मात्मा, कृष्णपक्ष हो तो दो स्त्री वाला, रोगी, दुष्ट और हठी होता है॥७२॥ भोजने जनुषि पूर्णचन्द्रमा मानयानजनतासुखं नृणाम्। आतनोति वनितासुतासुखं सर्वमेव न सितेतरे शुभम्॥७३॥ भोजन अवस्था में हो तो मान-प्रतिष्ठा, सवारी और सुख से संपन्न, स्त्री-पुत्र से सुखी होता है। कृष्णपक्ष का चन्द्रमा हो तो उक्त फल नहीं होता है॥७३॥ नृत्यलिप्सागते चन्द्रे सबले बलवान्नरः। गीतज्ञो हि रसज्ञश्च कृष्णो पापकरो भवेत्॥७४॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो और चन्द्रमा शुक्लपक्ष का हो तो बलवान्, गीतज्ञ, रसज्ञ होता है और कृष्णपक्ष का हो तो पापी होता है॥७४॥ कौतुकभवनं गतवति चन्द्रे भवति नृपत्वं वा धनपत्वम्। कामकलासु सदा कुशलत्वं वारवधूरतिरमणपटुत्वम्॥७५॥
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४५ कौतुक अवस्था में हो तो राजा वा धनी, कामकला में कुशल और स्त्रियों का प्रेमी होता है।।७५।। निद्रागते जन्मनि मानवानां कलाधरे जीवयुतं महत्त्वम्। यदाङ्गनासञ्चितवित्तनाशः शिवालये रौति विचित्रमुच्चैः।।७६।। निद्रा अवस्था में हो, गुरु से युत हो तो प्रतिष्ठावान् होता है। गुरु से युत न हो, चन्द्रमा क्षीण हो तो स्त्री और संचित धन का नाश और सियारिन उसके घर में उच्च स्वर से रोती है।।७६।। अथ भौमावस्थाफलम्- शयने वसुधापुत्रे जन्तुरङ्गे व्रणो भवेत्। बहुना कण्डुना युक्तो दद्रुणा च विशेषतः।।७७।। शयन अवस्था में भौम हो तो जातक के शरीर में बहुधा व्रण, खुजली और दाद से पीड़ित रहता है।।७७।। बली सदा पापरतो नरः स्यादसत्यवादी नितरां प्रगल्भः। धनेन पूर्णो निजधर्महीनो धरासुतश्चेदुपवेशनस्थः।।७८।। उपवेशन अवस्था में हो तो पापरत, असत्यभाषी, प्रगल्भ, धन से पूर्ण और अपने धर्म से हीन होता है।।७८।। यदा भूमिसुतो लग्ने नेत्रपाणिमुपागतः। दरिद्रता सदा पुंसामन्यभे नगरेशता।।७९।। यदि नेत्रपाणि अवस्था में लग्न में हो तो सदा दरिद्र, अन्यभाव में हो तो नगरसेठ होता है।।७९।। प्रकाशो गुणस्यापि वासः प्रकाशे धराधीशभर्तुः सदा मानवृद्धिः। सुते भूसुते पुत्रकान्तावियोगो भवेद्राहुणा दारुणो वा निपातः।।८०।। प्रकाशावस्था में हो तो गुणों का विकास, राजा से सम्मान, यदि पाँचवें भाव में भौम हो तो पुत्र-स्त्री का वियोग, राहु से युक्त हो तो घोर पतन होता है।।८०।। गमनागमने कुरुतेऽनुदिनं व्रणजालभयं वनिताकलहः। बहुदद्रुककण्डुभयं बहुधा वसुधातनयो वसुहानिकरः।।८१।।
२४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गमन अवस्था में हो तो सदा यात्रा करने वाला, व्रणभय, स्त्री से कलह, दाद, खुजली का भय और धन की हानि होती है॥८१॥ आगमने गुणशाली मणिमाली वा करालकरवाली। गजगंता रिपुहन्ता परिजनसन्तापहारको भौमे॥८२॥ आगमन अवस्था में हो तो गुणी, मणियों की माला धारण करने वाला, भीषण तलवार से युक्त, हाथी पर चलने वाला, शत्रुनाशक, अपने परिजनों के संताप को हरने वाला होता है॥८२॥ तुङ्गे युद्धकलाकलापकुशलो धर्मध्वजो वित्तपः कोणे भूमिसुते सभांमुपगते विद्याविहीनः पुमान्। अन्तेऽपत्यकलत्रमित्ररहितः प्रोक्तेतरस्थानगे- ऽवश्यं राजसभाबुधो बहुधनी मानी च दानी जनः॥८३॥ अपनी उच्चराशि में होकर सभा अवस्था में हो तो युद्धकला में निपुण, धर्मध्वजी, धनी होता है। यदि ५-९ भाव में हो तो विद्या से रहित होता है। १२वें भाव में हो तो पुत्र, स्त्री और मित्र से रहित होता है। इनसे भिन्न स्थानों में हो तो राजसभा का पंडित, बड़ा धनी, मानी और दानी होता है॥८३॥ आगमे भवति भूमिजे जनो धर्मकर्मरहितो गदातुरः। कर्णशूलगुरुशूलरोगवानेव कातरमतिः कुसङ्गमी॥८४॥ आगम अवस्था में भौम हो तो जातक धर्म-कर्म से हीन, रोगी, कान के दर्द एवं बड़े शूलरोग से पीडित, कातरबुद्धि और दुष्टों की संगति करने वाला होता है॥८४॥ भोजने मिष्टभोजी च जनने सबल कुजे। नीचकर्मकरो नित्यं मनुजो मानवर्जितः॥८५॥ भोजन अवस्था में हो तो मिठाई खानेवाला, नीचकर्म करने वाला और अप्रतिष्ठित होता है॥८५॥ नृत्यलिप्सागते भूसुते जन्मिनामिन्दिराराशिरायाति भूमीपतेः। स्वर्णरत्नप्रवालैः सदा मण्डिता वासशाला नराणां भवेत्सर्वदा॥८६॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो राजा के यहाँ से लक्ष्मी की प्राप्ति, सदा सुवर्ण, रत्न, मूंगा आदि से युक्त गृह वाला होता है॥८६॥
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४७ कौतुकी भवति कौतुके कुजे मित्रपुत्रपरिपूरितो जनः। उच्चगे नृपतिगेहमण्डितः पूजितो गुणवरैर्गुणाकरैः ।।८७।। कौतुक अवस्था में हो तो कौतुक करने वाला, मित्र, पुत्र से परिपूर्ण, यदि उच्च में भौम हो तो राजगृह और गुणियों से पूजित होता है।।८७।। निद्रावस्थां गते भौमे क्रोधी धीधनवर्जितः। धूर्तो धर्मपरिभ्रष्टो मनुष्यो गदपीडितः ।।८८।। निद्रा अवस्था में भौम हो तो क्रोधी, बुद्धि-धन से हीन, धूर्त, धर्म से भ्रष्ट और रोगी होता है।।८८।। अथ बुधावस्थाफलम्— क्षुधातुरो भवेदङ्गे खञ्जो गुञ्जानिभेक्षणः। अन्यभे लम्पटो धूर्तो मनुजः शयने बुधे।।८९।। बुध शयन अवस्था में होकर लग्न में हो तो भूखा, चलने में असमर्थ, गुंजा के समान (लाल) नेत्रवाला होता है। अन्य भावों में हो तो लंपट, धूर्त होता है।।८९।। शशाङ्कपुत्रे जनुरङ्गगेहे यदोपवेशे गुणराशिपूर्णः। पापेक्षिते पापयुते दरिद्रो हिते शुभे वित्तसुखी मनुष्यः।।९०।। उपवेशन अवस्था में बुध लग्न में हो तो गुणी, पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो दरिद्र, शुभग्रह वा मित्र से युत-दृष्ट हो तो धनी होता है।।९०।। विद्याविवेकरहितो हिततोषहीनो मानी जनो भवति चन्द्रसुतेऽक्षिपाणौ। प्रजालये सुतकलत्रसुखेन हीनः कन्याप्रजा नृपतिगेहबुधो वरार्थः ।।९१।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो विद्या-विवेक से रहित, मित्रतारहित, अभिमानी, ५वें भाव में बुध हो तो स्त्री-पुत्र के सुख से रहित, कन्या संततिवाला, राजा से धन प्राप्त करने वाला होता है।।९१।। दाता दयालुः खलु पुण्यकर्त्ता विकाशने चन्द्रसुते मनुष्यः। अनेकविद्यार्णवपारगन्ता विवेकपूर्णः खलवर्गहन्ता ।।९२।। प्रकाश अवस्था में हो तो दानी, दयालु, पुण्यात्मा; अनेक विद्याओं को जानने वाला, विवेकी और दुष्टों का दमन करने वाला होता है।।९२।।
२४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गमनागमने भवतो गमने बहुधा वसुधाधिपतेर्भवने । भवनं च विचित्रमलं रमया विदि नुश्च जनुः समये नितराम् ॥ ९३ ।। गमन अवस्था में हो तो राजगृह में जाने वाला, लक्ष्मी से पूर्ण गृहवाला होता है। यही फल आगमन अवस्था का भी होता है ।।९३।। सपदि विदिजनानामुच्चगे जन्मकाले सदसि धनसमृद्धिः सर्वदा पुण्यवृद्धिः। धनपतिसमता वा भूपता मन्त्रिता वा हरिहरपदभक्तिः सात्त्विकी मुक्तिलब्धिः ।। ९४ ।। सभा अवस्था में हो तो धनी, पुण्यकर्त्ता, उच्चराशि में हो तो बहुत धनी, राजा का मंत्री तथा ईश्वर का भक्त और अंत में मुक्ति पानेवाला होता है ।। ९४ ।। आगमे जनुष जन्मिनां यदा चन्द्रजे भवति हीनसेवया । अर्थसिद्धिरपि पुत्रयुग्मता बालिका भवति मानदायिका ।। ९५ ।। आगमन अवस्था में हो तो नीच सेवा से धन प्राप्त करने वाला, दो पुत्र और एक कन्या प्रतिष्ठा को देनेवाली होती है ।। ९५ ।। भोजने चन्द्रजे जन्मकाले यदा जन्मिनामर्थहानिः सदा वादतः । राजभीत्या कृशत्वं चलत्वं मतेरङ्गसङ्गो न जाया न मायासुखम् ।। भोजन अवस्था में हो तो वाद-विवाद (मुकदमे में) में द्रव्य की हानि, राजभय, कृशता, मन की अस्थिरता, शरीर, स्त्री तथा धन का सुख नहीं होता है ।। ९६ ।। नृत्यलिप्सागते चन्द्रजे मानवो मानयानप्रवालव्रजैः संयुतः । मित्रपुत्रप्रतापैः सभापण्डितः पापभे वारवामारतो लम्पटः ।। ९७ ।। नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो मान, वाहन, रत्न, मित्र, पुत्र और प्रताप से युक्त होता है। पापराशि में हो तो वेश्याप्रेमी और लम्पट होता है ।। ९७ ।। कौतुके चन्द्रजे जन्मकाले नृणामङ्गभे गीतविद्याऽनवद्या भवेत् । सप्तमे नैधने वारवध्वा रतिः पुण्यभे पुण्ययुक्ता मतिः सद्गतिः ।। कौतुकावस्था में होकर लग्न में हो तो गीतविद्या का पंडित, सातवें आठवें भाव में हो तो वेश्यागामी, ९वें भाव में हो तो पुण्यवान् बुद्धि होती है ।। ९८ ।।
.ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४९ निद्राश्रिते चन्द्रसुते न निद्रासुखं सदा व्याधिसमाधियोगः। सहोत्यवैकल्यमनल्पतापो निजेन वादो धनमाननाशः।।९९।। निद्रावस्था में हो तो निद्रा से सुख, आधि-व्याधि से पीडित, सहोदर से हीन, अधिक संताप, अपने कुटुंब से विवाद और धन का नाश होता है।।९९।। अथ गुरोरवस्थाफलम्— वचसामधिपे तु जनुःसमये शयने बलवानपि हीनरवः। अतिगौरतनुः खलु दीर्घहनुः सुतरामरिभीतियुतो मनुजः ।।१००।। यदि जन्मसमय में गुरु शयनावस्था में हो तो बलवान् होते हुए भी जातक हीन शब्द (मंदस्वर), अत्यंत गौरवर्ण, लंबी दाढ़ीवाला और निरंतर शत्रु के भय से युक्त होता है।।१००।। उपवेशं गतवति यदि जीवे वाचालो बहुगर्वपरीत:। क्षोणीपतिरिपुजनपरितप्तः करजङ्घास्यपदव्रणयुक्तः।।१०१।। उपवेशन अवस्था में हो तो वक्ता, अत्यंत गर्वीला, राजा और शत्रु से संताप पानेवाला, हाथ, जंघा, मुख और पैर में घाव से युक्त होता है।।१०१।। नेत्रपाणि गते देवराजार्चिते रोगयुक्तो वियुक्तो वरार्थश्रिया। गीतनृत्यप्रियः कामुकः सर्वदा गौरवर्णो विवर्णोद्भवप्रीतियुक् ।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो रोगी, धन से हीन, गाने-नाचने का प्रेमी, कामी, गौरवर्ण, विजातियों से प्रेम करने वाला होता है।।१०२।। गुणानामानन्द विमलसुखकन्दं वितनुते सदा तेजःपुञ्जं व्रजपतिनिकुञ्जं प्रतिगमम्। प्रकाशं चेदुच्चे द्रुतमुपगतो वासवगुरु- र्गुरुत्वं लोकानां धनपतिसमत्वं तनुभृताम् ।।१०३।। प्रकाश अवस्था में हो तो गुणों का आनंद, स्वच्छ सुख के समूहों का आनंद, तेजस्वी कृष्णचंद्र के स्थान (वृन्दावन) को जाने को उद्यत, यदि गुरु उच्चराशि का हो संसार में मान्यता और कुबेर के समान धनी होता है।।१०३।। साहसी भवति मानवः सदा मित्रवर्गसुखपूरितो सदा। पण्डितो विविधवित्तमण्डितो वेदविद्यादि गुरौ गमं गते ।।१०४।।
२५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि गमनावस्था में हो तो साहसी, मित्रवर्ग के सुख से पूर्ण, पंडित, अनेक सम्पत्तियों से युक्त और वेद को जानने वाला होता है।।१०४।। आगमने जनता वरजाया यस्य जनुःसमये हरिमाया। मुञ्चति नालमिहालयमद्धा देवगुरौ परितः परिविद्धा।।१०५।। आगमन अवस्था में हो तो उसके गृह में जनता, सुंदरी स्त्री और लक्ष्मी (धन) सदा उपस्थित रहता है।।१०५।। सुरगुरुसमवक्ता शुभ्रयुक्ता फलाढ्यः सदसि सपदि पूर्णो वित्तमाणिक्ययानैः। गजतुरगरथाढ्यो देवताधीशपूज्यो जनुषि विविधविद्यागर्वितो मानवः स्यात् ।।१०६।। सभावस्था में हो तो बृहस्पति के समान वक्ता, सुंदर मोतियों से युक्त, धन, रत्न, हाथी, घोड़ा, रथ आदि सवारियों से युक्त, इन्द्र से पूज्य और अनेक विद्याओं को जानने वाला गर्वयुक्त होता है।।१०६।। नानावाहनमानयानपटलीसौख्यं गुरावागमे- भृत्यापत्यकलत्रमित्रजसुखं विद्यानवद्या भवेत्। क्षोणीपालसमानतानवरतं चातीव हृद्या मतिः काव्यानन्दरतिः सदा हितगतिः सर्वत्र मानोन्नतिः ।।१०७।। आगमन अवस्था में हो तो संसार में मान-प्रतिष्ठा से युक्त, अनेक वाहन-समूह से युक्त, नौकर, पुत्र, स्त्री, मित्र का सुख, उत्तम विद्या, राजा के समान, अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धिवाला, काव्यप्रेमी, अच्छे मार्ग से चलने वाला और मान-मर्यादा वाला होता है।।१०७।। भोजने भवति देवगुरौ यस्य तस्य सततं सुभोजनम्। नैव मुञ्चति रमालयं तदा वाजिवारणरथैश्च मण्डितम् ।।१०८।। भोजनावस्था में हो तो उसे निरंतर सुंदर भोजन मिलता है, कभी भी धन उसका साथ नहीं छोड़ता है। हमेशा घोड़ा, हाथी, रथ आदि सवारियों से घिरा रहता है।।१०८।। नृत्यलिप्सागते राजमानी धनी देवताधीशवन्द्यः सदा धर्मवित्। तन्त्रविज्ञो बुधैर्मण्डितः पण्डितः शब्दविद्यानवद्यो हि सद्यो जनः ।। नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो राजा से मान्य, धनी, धर्म को जानने वाला, तंत्रविद्या को जानने वाला, पंडितों से घिरा हुआ श्रेष्ठ पंडित और शब्दशास्त्र (व्याकरण) का पंडित होता है।।१०९।।
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५१ कुतूहली सकौतुके महाधनी जनः सदा निजान्वये च भास्करः कृपाकलाधरः सुखी। निलिम्पराजपूजिते सुतेन भूनयेन वा युतो महाबली धराधिपेन्द्रसद्मपण्डितः।।१९०।। कौतुक अवस्था में हो तो कुतूहली, महाधनी, अपने घर में सूर्य के समान तेजस्वी, कृपालु, सुखी, पुत्र, भूमि से युक्त और नीतिमान्, महाबली और राजपंडित होता है।।१९०।। गुरौ निद्रागते यस्य मूर्खता सर्वकर्मणि। दरिद्रतापरिक्रान्तं भवनं पुण्यवर्जितम्।।१९१।। निद्रावस्था में हो तो वह सभी कर्मों में मूर्खता करने वाला, दरिद्रता से युक्त और पुण्यहीन होता है।।१९१।। अथ भृगोरवस्थाफलम्- जनो बलीयानपि दन्तरोगी भृगौ महारोषसमन्वितः स्यात्। धनेन हीनं शयनः प्रयाते वराङ्गनासङ्गमलम्पटश्च।।१९२।। यदि जन्मसमय शुक्र शयन अवस्था में हो तो जातक बलवान् होते हुए भी दंतरोगी, महाक्रोधी, निर्धन और स्त्रीलंपट होता है।।१९२।। यदि भवेदुशना उपवेशने नवमणिव्रजकाञ्चनभूषणैः। सुखमजस्रमरिक्षय आदरादवनिपादपि मानसमुन्नतिः।।१९३।। उपवेशन अवस्था में हो तो नूतन मणि, सुवर्ण के आभूषणों से सुखी, शत्रुओं का नाश करने वाला, राजा से आदर और प्रतिष्ठा में वृद्धि वाला होता है।।१९३।। नेत्रपाणिं गते लग्नगेहे कवौ सप्तमे मानभे यस्य तस्य ध्रुवम्। नेत्रपाते निपातो धनानामलं चान्यभे वासशाला विशाला भवेत्।। नेत्रपाणि अवस्था में शुक्र लग्न, सप्तम वा दशम भाव में हो तो नेत्रहीनता के कारण धन का नाश होता है व अन्य भाव में हो तो बड़ा मकान होता है।।१९४।। स्वालये तुङ्गभे मित्रभे भार्गवे तुङ्गमातङ्गलीलाकलापीजनः। भूपतेस्तुल्य एव प्रकाशं गते काव्यविद्याकलाकौतुकी गीतवित्।।
२६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रकाश अवस्था में हो और अपने उच्च, स्वगृह वा मित्रगृह में हो तो मतवाले हाथी के समान बलवान्, राजा के सदृश धनी, सुखी, काव्य और संगीत में पारंगत होता है।।१९५।। गमने जनने शुक्रे तस्य माता न जीवति। आधियोगो वियोगश्च जनानामरिभीतितः ।।१९६।। गमन अवस्था में हो तो माता नहीं जीती है, मानसिक चिन्ता, बंधुओं का वियोग और शत्रु से भय होता है।।१९६।। आगमनं भृगुपुत्रे गतवति वित्तेश्वरो मनुजः। सत्तीर्थभ्रमणशाली नित्योत्साही करांघ्रिरोगी च।।१९७।। आगमन अवस्था में हो तो महाधनी, तीर्थयात्री, उत्साही और हाथ- पैर के रोग से युक्त होता है।।१९७।। अनायासेनालं सपदि महसा याति सहसा प्रगल्भत्वं राज्ञः सदसि गुणविज्ञः किल कवौ। सभायामायाते रिपुनिवहहन्ता धनपतेः समत्वं वा दाता बलतुरगगन्ता नरवरः।।१९८।। सभावस्था में हो तो अनायास ही अपने ही प्रताप से राजदरबार में प्रगल्भता होती है। स्वयं गुणी, शत्रु का नाश करने वाला, महाधनी दाता और हाथी तथा घोड़े की सवारी पर चलनेवाला होता है।।१९८।। आगमे भार्गवे नागमो जन्मिनामर्थराशेररातेरतीव क्षतिः। पुत्रपातो निपातो जनानामपि व्याधिभीतिः प्रियाभोगहानिर्भवेत् ।। आगमन अवस्था में हो तो शत्रु द्वारा धन की अधिक हानि, पुत्र, परिजनों का वियोग, रोग का भय और स्त्री के सुख की हानि होती है।।१९९।। क्षुधातुरो व्याधिनिपीडितः स्यादनेकधारातिभयार्दितश्च। कवौ यदा भोजनगे युवत्या महाधनो पण्डतमण्डितश्च।।१२०।। भोजन अवस्था में हो तो भूख से व्याकुल, रोग से पीडित और बारम्बार शत्रु से पीडित होता है।।१२०।। काव्यविद्यानवद्या च हृद्या मतिः सर्वदा नृत्यलिप्सागते भार्गवे। शङ्खवीणामृदङ्गादिगानध्वनिव्रातनैपुण्यमेतस्य वित्तोन्रतिः।।
- ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५३ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो काव्य करने वाला, बुद्धिमान्, वीणा, मृदंग आदि बाजों को बजाने में चतुर और धन की उन्नति करने वाला होता है।।१२१।। कौतुकभवनं गतवति शुक्रे शक्रेशत्वं सदसि महत्त्वम्। हृद्या विद्या भवति च पुंसः पद्मा निवसति सद्मादरतः।।१२२।। कौतुक अवस्था में हो तो इन्द्र के समान पराक्रमी, सभा में चतुर, उत्तम विद्या और गृह मे सदा लक्ष्मी के वास वाला होता है।।१२२।। परसेवारतो नित्यं निद्रामुपगते कवौ। परनिन्दापरो वीरो वाचालो भ्रमते महीम्।।१२३।। यदि निद्रावस्था में हो तो दूसरे की सेवा करने वाला, दूसरे की निंदा करने वाला; व्यर्थ बोलनेवाला और व्यर्थ घूमने वाला होता है।।१२३।। अथ शनेरवस्थाफलम्- क्षुत्पिपासापरिक्रान्तो विश्रान्तः शयने शनौ। वयसि प्रथमे रोगी ततो भाग्यवतां वरः।।१२४।। यदि शनि शयनावस्था में हो तो जातक बाल्यकाल में रोगी, भूख-प्यास से पीडित रहता है, परन्तु वृद्धावस्था में भाग्यवान् होता है।।१२४।। भानोः सुते चेदुपवेशनस्थे करालकारातिजनानुतप्तः। अपायशाली खलु दद्रुमाली नराऽभिमानी नृपदण्डयुक्तः।।१२५।। उपवेशन अवस्था में हो तो प्रबल शत्रु द्वारा पीड़ित, व्यर्थ अपव्यय करने वाला, दाद-खुजली रोग वाला, अभिमानी और राजदंड से दंडित होता है।।१२५।। नयनपाणिगते नृपनन्दने परमया रमया रमया युतः। नृपतितो हिततो मतितोषकृद्बहुकलाकलितो विमलोक्तिकृत्।।१२६।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो परम सुंदरी स्त्री और संपत्ति से युक्त, राजा और मित्रों से उपकृत, अनेक कलाओं का ज्ञाता और प्रिय बोलने वाला होता है।।१२६।। नानागुणग्रामधनाधिशाली सदां नरो बुद्धिविनोदमाली। प्रकाशने भानुसुते सुभानुः कृपानुरक्तो हरपादभक्तः।।१२७।। प्रकाश अवस्था में हो तो अनेक गुण-ग्राम-धन से युक्त, बुद्धिमान्,