छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
( २० )
त्रयोदश खण्ड
२२९. आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्त्व .... ... ७६१
चतुर्दश खण्ड
२३०. स्मरणसे आशाकी महत्ता .... ... ७६४
पञ्चदश खण्ड
२३१. आशासे प्राणका प्राधान्य .... ... ७६७
षोडश खण्ड
२३२. सत्य ही जानने योग्य है .... ... ७७४
सप्तदश खण्ड
२३३. विज्ञान ही जानने योग्य है ... ... ७७६
अष्टादश खण्ड
२३४. मति ही जानने योग्य है .... .... ७७९
एकोनविंश खण्ड
२३५. श्रद्धा ही जानने योग्य है .... ..- ७८०
विंश खण्ड
२३६. निष्ठा ही जानने योग्य है .... .... ७८१
एकविंश खण्ड
२३७. कृति ही जानने योग्य है ... .... ७८२
द्वाविंश खण्ड
२३८. सुख ही जानने योग्य है .... ... ७८३
त्रयोविंश खण्ड
२३९. भूमा ही जानने योग्य है ... .... ७८५
चतुर्विंश खण्ड
२४०. भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन ... .... ७८६
पञ्चविंश खण्ड
२४१. सर्वत्र भूमा ही है .... ... ७९३
षड्विंश खण्ड
२४२. इस प्रकार जाननेवालेके लिये फलका उपदेश .... ... ७९८
अष्टम अध्याय
प्रथम खण्ड
२४३. दहर-पुण्डरीकमें ब्रह्मकी उपासना ... .... ८०३
२४४. पुण्यकर्मफलोंका अनित्यत्व .... .... ८१९
( २१ )
द्वितीय खण्ड २४५. दहर-ब्रह्मकी उपासनाका फल ... ... ८२१
तृतीय खण्ड २४६. असत्यसे आवृत्त सत्यकी उपासना और नामाक्षरोपासना .... ८२६
चतुर्थ खण्ड २४७. सेतुरूप आत्माकी उपासना .... ... ८३६
पञ्चम खण्ड २४८. यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यादिदृष्टि .... .... ८४२
षष्ठ खण्ड २४९. हृदयनाडी और सूर्यरश्मिरूप मार्गकी उपासना ... .... ८५४
सप्तम खण्ड २५०. आत्मतत्त्वका अनुसंधान करनेके लिये इन्द्र और विरोचनका प्रजापतिके पास जाना ... .... ८६५
अष्टम खण्ड २५१. इन्द्र तथा विरोचनका जलके शिकोरेमें अपना प्रतिबिम्ब देखना .... ८७६
नवम खण्ड २५२. इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना ... ... ८८७
दशम खण्ड २५३. इन्द्रके प्रति स्वप्नपुरुषका उपदेश ... .... ८९४
एकादश खण्ड २५४. सुषुप्त पुरुषका उपदेश ... .... ९०१
द्वादश खण्ड २५५. मर्त्यशरीर आदिका उपदेश .... ... ९०६
त्रयोदश खण्ड २५६. ‘श्यामाच्छबलम्’ इस मन्त्रका उपदेश ... .... ९३७
चतुर्दश खण्ड २५७. कारणरूपसे आकाशसंज्ञक ब्रह्मका उपदेश ... ... ९३९
पञ्चदश खण्ड २५८. आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और फलका वर्णन ... ... ९४३
ॐ
केशाः कञ्जालिकासाभाः
शमब्जाम्बुनगौकसः ।
विविगोपतयो दद्युः
करकारिपिनाकिनः ॥
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भाष्यकार भगवान् शङ्कर
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
छान्दोग्योपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
सच्चिदानन्दसान्द्राय सर्वातीताय साक्षिणे ।
नमः श्रीदेशिकेन्द्राय शिवायाशिवघातिने ॥
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
मेरे [हाथ-पाँव आदि] अङ्ग सब प्रकारसे पुष्ट हों, वाणी, प्राण, नेत्र और श्रोत्र पुष्ट हों तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ बल प्राप्त करें । उपनिषदमें प्रतिपादित ब्रह्म ही सब कुछ है । मैं ब्रह्मका निराकरण (त्याग) न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे। इस प्रकार हमारा अनिराकरण (निरन्तर मिलन) हो, अनिराकरण हो । उपनिषदोंमें जो शम आदि धर्म कहे गये हैं वे ब्रह्मरूप आत्मामें निरन्तर रमण करनेवाले मुझमें सदा बने रहें, वे मुझमें सदा बने रहें । आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापकी शान्ति हो ।
प्रथम अध्याय
प्रथम अध्याय
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ओमित्येतदक्षरमित्याद्यष्टाध्यायी छान्दोग्योपनिषत् । तस्याः संक्षेपतोऽर्थजिज्ञासुभ्य ऋजुविवरणमल्पग्रन्थमिदमारभ्यते ।<br><br>तत्र सम्बन्धः—समस्तं कर्माधिगतं प्राणादिदेवताविज्ञानसहितमर्चिरादिमार्गेण ब्रह्मप्रतिपत्तिकारणम् । (प्रयोजनम्) केवलं च धूमादिमार्गेण चन्द्रलोकप्रतिपत्तिकारणम् । स्वभावप्रवृत्तानां च मार्गद्वयपरिभ्रष्टानां कष्टाधोगतिरुक्ता । | 'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाला यह आठ अध्यायोंका ग्रन्थ छान्दोग्य उपनिषद् है। उसका अर्थ जाननेकी इच्छावालोंके लिये इस छोटे-से ग्रन्थके रूपमें उसकी सरल व्याख्या संक्षेपसे आरम्भ की जाती है।<br><br>वहाँ [कर्मकाण्डके साथ] इसका सम्बन्ध इस प्रकार है—[विहित और निषिद्ध रूपसे] जाने हुए समस्त कर्मका प्राणादि देवताओंके विज्ञानपूर्वक अनुष्ठान करनेपर वह अर्चि आदि (देवयान) मार्गके द्वारा ब्रह्मलोककी प्राप्तिका कारण होता है तथा केवल (उपासनारहित) कर्म धूमादि मार्गसे चन्द्रलोककी प्राप्तिका हेतु होता है। जो इन दोनों मार्गोंसे पतित एवं स्वभावानुसार प्रवृत्त होनेवाले होते हैं उनकी कष्टमयी अधोगति बतलायी गयी है। |
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २७
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| न चोभयोर्मार्गयोरन्यतर-<br>स्मिन्नपि मार्ग आत्यन्तिकी<br>पुरुषार्थसिद्धिरित्यतः कर्मनिर-<br>पेक्षमद्वैतात्मविज्ञानं संसार-<br>गतित्रयहेतूपमर्देन वक्तव्यमित्यु-<br>पनिषदारभ्यते । | इन दोनों मार्गोंमेंसे किसी भी एक मार्गपर रहनेसे आत्यन्तिक पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। अतः संसार-की [उपर्युक्त] त्रिविध गतियोंके हेतु-भूत कर्मका निराकरण करते हुए कर्मकी अपेक्षासे रहित अद्वैत-आत्म-ज्ञानका प्रतिपादन करना है; इसी उद्देश्यसे इस उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। |
| न चाद्वैतात्मविज्ञानादन्यत्रा-<br>ज्ञानस्यैव त्यान्तिकी निःश्रेय-<br>मोक्षसाधनत्वम् सम्प्राप्तिः । वक्ष्यति<br>हि—"अथ येऽन्यथातो विदुरन्य-<br>राजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति ।"<br>(छा० उ० ७ । २५ । २)<br>विपर्यये च "स स्वराड्भवति"<br>(छा० उ० ७।२५।२) इति । | अद्वैतात्मविज्ञानके बिना और किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसा कि आगे कहेंगे भी—"जो लोग इस (अद्वैतात्मज्ञान) से विपरीत जानते हैं, वे अन्यराज (अनात्माके अधीन) होते और क्षीण होनेवाले लोकोंमें जाते हैं।" किंतु इससे विपरीत आत्म-ज्ञान होनेपर [श्रुति कहती है कि] "वह स्वराट् होता है।" |
| तथा द्वैतविषयानृताभिसंधस्य<br>बन्धनं तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे<br>बन्धदाहभावः संसारदुःखप्राप्ति-<br>श्चेत्युक्त्वाद्वैतात्मसत्याभिसंध- | इस प्रकार तपे हुए परशुको ग्रहण करनेसे चोरके जलने और बन्धनमें पड़नेके समान द्वैतविषय-रूप मिथ्यामें अभिनिवेश रखनेवाले पुरुषका बन्धन होता है तथा उसे सांसारिक दुःखोंकी प्राप्ति होती है—यह बतलाकर श्रुति |
२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| स्यात्तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे बन्धदाहाभावः संसारदुःखनि- वृत्तिर्मोक्षश्चेति । | अद्वैत आत्मारूप परम सत्यमें प्रतीति रखनेवाले पुरुषको, जो पुरुष चोर नहीं है उसके तप्त परशु ग्रहण करनेपर दाह और बन्धन न होनेके समान, संसार-दुःखकी निवृत्ति और मोक्षकी प्राप्ति बतलावेगी । |
|---|---|
| कर्मसमुच्चय-निराकरणम् <br> अत एव न कर्मसहभावि- अद्वैतात्मदर्शनम् । क्रियाकारकफलभे- दोपमर्देन "सन्...एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) इत्येवमादिवाक्य- जनितस्य बाधकप्रत्ययानुप- पत्तेः । कर्मविधिप्रत्यय इति चेत् ? न, कर्तृभोक्तृस्वभाव- विज्ञानवतस्तज्जनितकर्मफलरा- गद्वेषादिदोषवतश्च कर्मविधा- नात् । | इसीसे [अर्थात् कर्म और ज्ञान दोनों विरुद्ध फलवाले हैं-ऐसा निश्चय होनेके कारण ही] अद्वैतात्म-दर्शन कर्मके साथ होनेवाला नहीं है । क्योंकि क्रिया, कारक और फलरूप भेदका बाध करके "सत् [ब्रह्म] एक और अद्वितीय है" "यह सब आत्मा ही है" इत्यादि प्रकारके वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले अद्वैत आत्मज्ञानका कोई बाधक प्रत्यय होना सम्भव नहीं है । यदि कहो कि कर्मविधिविषयक ज्ञान ही [उसका बाधक] है तो ऐसा होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि जो अपनेको स्वभावसे ही कर्त्ता-भोक्त्तारूप जानता है और उससे होनेवाले कर्मफलमें रागद्वेषरूप दोषोंसे युक्त है, उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है । |
| अधिगतसकलवेदार्थस्य कर्म- विधानादद्वैतज्ञानवतोऽपि कर्मे- ति चेत् ? | शङ्का—जो सम्पूर्ण वेदार्थको जानने-वाला है उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है; इसलिये अद्वैतात्मज्ञानी-को भी तो कर्म करना ही चाहिये ? |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न; कर्माधिकृतविषयस्य कर्तृभोक्त्रादिज्ञानस्य स्वाभाविकस्य “सत्...एकमेवाद्वितीयम्” 'आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यनेनोपमर्दितत्वात् । तस्मादविद्यादिदोषवत एव कर्माणि विधीयन्ते नाद्वैतज्ञानवतः । अत एव हि वक्ष्यति—“सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति” (छा० उ० २।२३।१) इति ।<br><br>(प्रकरणप्रतिपाद्यनिरूपणम्)<br>तत्रैतस्मिन्नद्वैतविद्याप्रकरणेऽभ्युदयसाधनान्युपासनान्युच्यन्ते । कैवल्यसंनिकृष्टफलानि चाद्वैतादीषद्विकृतब्रह्मविषयाणि मनोमयःप्राणशरीर इत्यादीनि, कर्मसमृद्धिफलानि च कर्माङ्गसम्बन्धीनि । रहस्यसामान्यान्मनोवृत्तिसामान्याच्च; यथाऽद्वैतज्ञानं | **समाधान—**नहीं, क्योंकि कर्मके अधिकारीसे सम्बन्ध रखनेवाला कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि रूप स्वाभाविक विज्ञान “सत [ ब्रह्म ] एक और अद्वितीय है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि वाक्योंसे बाधित हो जाता है । इसलिये कर्मोंका विधान अविद्यादि दोषवान् पुरुषके लिये ही किया गया है, अद्वैतात्मज्ञानीके लिये नहीं किया गया । इसीलिये श्रुति आगे कहेगी—“ये सब [कर्मकाण्डी] पुण्यलोकोंको प्राप्त होते हैं तथा ब्रह्मनिष्ठ [परमहंस] अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।”<br><br>वहाँ इस अद्वैतविद्याविषयक प्रकरणमें अभ्युदयकी साधनभूता उपासनाएँ बतलायी जाती हैं, जिनका फल कैवल्यमोक्षका समीपवर्ती है और जो अद्वैतब्रह्मकी अपेक्षा 'मनोमयः प्राणशरीरः' इत्यादि वाक्योंके अनुसार कुछ विकारको प्राप्त हुए ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं । वे उपासनाएँ कर्माङ्गसे सम्बद्ध हैं और कर्मफलकी समृद्धि ही उनका फल है । क्योंकि रहस्यमें [ अर्थात् उपनिषद् शब्दसे ज्ञातव्य होनेमें ] तथा मनोवृत्तिरूप होनेमें उन (आत्मज्ञान और उपासनाओं) में समानता है [इसीसे वे उपासनाएँ आत्मविद्याके प्रकरणमें रक्खी गयी हैं] । जिस |
३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| मनोवृत्तिमात्रं तथान्यान्यप्युपासनानि मनोवृत्तिरूपाणीत्यस्ति हि सामान्यम्। कस्तर्ह्यद्वैतज्ञानस्योपासनानां च विशेषः? उच्यते— | प्रकार अद्वैतज्ञान मनोवृत्तिमात्र है उसी प्रकार अन्य उपासनाएँ भी मनोवृत्तिरूप ही हैं--यही उन दोनोंकी समानता है। तो फिर अद्वैतज्ञान और उपासनाओंमें अन्तर क्या है? सो बतलाया जाता है— | | ज्ञानोपासनयोर्विशेषः<br>स्वाभाविकस्यात्मन्यक्रियेऽध्यारोपितस्य कर्त्रादिकारकक्रियाफलभेदविज्ञानस्य निवर्तकमद्वैतविज्ञानम्, रज्ज्वादाविव सर्पाद्यध्यारोपलक्षणज्ञानस्य रज्ज्वादिस्वरूपनिश्चयः प्रकाशनिमित्तः। उपासनं तु यथाशास्त्रसमर्थितं किञ्चिदालम्बनमुपादाय तस्मिन् समानचित्तवृत्तिसंतानकरणं तद्विलक्षणप्रत्ययानन्तरितमिति विशेषः। | अद्वैतात्मज्ञान अक्रिय आत्मामें स्वभावसे ही आरोपित कर्ता आदि कारक, क्रिया और फलके भेदज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला है, जिस प्रकार कि प्रकाशके कारण होनेवाला रज्जु आदिके स्वरूपका निश्चय रज्जु आदिमें आरोपित सर्पादिके ज्ञानको निवृत्त कर देता है। किंतु उपासना तो किसी शास्त्रोक्त आलम्बनको ग्रहण कर उसमें विजातीय प्रतीतिसे अव्यवहित सदृश चित्तवृत्तिका प्रवाह करना है—यही इन दोनोंमें अन्तर है। | | तान्येतान्युपासनानि सत्त्वशुद्धिकरत्वेन वस्तुतत्त्वावभासकत्वादद्वैतज्ञानोपकारकाण्यालम्बनविषयत्वात्सुसाध्यानि चेति पूर्वमुपन्यस्यन्ते। तत्र कर्माङ्गा- | वे ये उपासनाएँ चित्तशुद्धि करनेवाली होनेसे वस्तुतत्त्वकी प्रकाशिका होनेके कारण अद्वैतज्ञानमें उपकारिणी हैं तथा आलम्बनयुक्त होनेके कारण सुगमतासे सम्पन्न की जा सकती हैं—इसीलिये इनका पहले निरूपण किया जाता है। वहाँ [ साधारण पुरुषोंमें ] |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
| सस्य दृढीभूतत्वात्कर्मपरित्यागेनोपासन एव दुःखं चेतःसमर्पणं कर्तुमिति कर्माङ्गविषयमेव तावदादावुपासनमुपन्यस्यते— | कर्माभ्यासकी दृढ़ता होनेके कारण कर्मका परित्याग करके उपासनामें ही चित्तको लगाना अत्यन्त कठिन है। इसीसे सबसे पहले कर्माङ्ग-सम्बन्धिनी उपासनाका ही उल्लेख किया जाता है— |
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उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥
ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिये । 'ॐ' ऐसा [उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता] उद्गान ( उच्चस्वरसे सामगान ) करता है । उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥
| ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमित्येतदक्षरं परमात्मनोऽभिधानं नेदिष्ठम् । तस्मिन्हि प्रयुज्यमाने स प्रसीदति प्रियनामग्रहण इव लोकः । तदिहेतिपरं प्रयुक्तमभिधायकत्वाद्व्यावर्तितं शब्दस्वरूपमात्रं प्रतीयते । तथा चार्चादिवत्परस्यात्मनः | उद्गीथशब्दवाच्य 'ॐ' इस अक्षरकी उपासना करे—'ॐ' यह अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती ( प्रियतम ) नाम है । उसका प्रयोग (उच्चारण) किया जानेपर वह प्रसन्न होता है, जिस प्रकार कि साधारण लोग अपना प्रिय नाम उच्चारण करनेपर प्रसन्न होते हैं । वह ओंकार यहाँ ( इस मन्त्रमें ) इतिपरक ( जिसके आगे 'इति' शब्द है; ऐसा ) प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् परमात्माका अभिधायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा व्यावर्तित ( पृथक् निर्दिष्ट ) होकर वह केवल शब्दस्वरूपसे प्रतीत होता है और इस प्रकार वह मूर्ति |
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३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| प्रतीकं सम्पद्यते। एवं नामत्वेन प्रतीकत्वेन च परमात्मोपासनसाधनं श्रेष्ठमिति सर्ववेदान्तेष्ववगतम्। जपकर्मस्वाध्यायाद्यन्तेषु च बहुशः प्रयोगात्प्रसिद्धमस्य श्रैष्ठ्यम्। <br><br> अतस्तदेतदक्षरं वर्णात्मकमुद्गीथभक्त्यवयवत्वादुद्गीथशब्दवाच्यमुपासीत। कर्माङ्गावयवभूत ॐकारे परमात्मप्रतीके दृढामैकाग्र्यलक्षणां मतिं संतनुयात्। स्वयमेव श्रुतिरोङ्कारस्योद्गीथशब्दवाच्यत्वे हेतुमाह—ओमिति ह्युद्गायति। ओमित्यारभ्य हि यस्मादुद्गायत्यत उद्गीथ ओङ्कार इत्यर्थः। | आदिके समान परमात्माका प्रतीक ही सिद्ध होता है। इस तरह नाम और प्रतीकरूपसे वह परमात्माकी उपासनाका उत्तम साधन है—ऐसा सम्पूर्ण वेदान्त-ग्रन्थोंमें विदित है। जप, कर्म और स्वाध्यायके आदि एवं अन्तमें इसका बहुधा प्रयोग होनेके कारण ❁ इसकी श्रेष्ठता प्रसिद्ध है। <br><br> अतः वह यह वर्णरूप अक्षर उद्गीथभक्तिका अवयव होनेके कारण 'उद्गीथ' शब्दवाच्य है, इसकी उपासना करे। अर्थात् [ उद्गीथ- ] कर्मके अङ्गभूत और परमात्माके प्रतीकस्वरूप ओंकारमें सुदृढ़ एकाग्रतारूप बुद्धिको अविच्छिन्न भावसे संयुक्त करे। ओंकारके 'उद्गीथ' शब्दवाच्य होनेमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है—'ॐ' ऐसा कहकर उद्गान करता है—क्योंकि उद्गाता 'ॐ' इस अक्षरसे आरम्भ करके उद्गान करता है, इसलिये ओंकार उद्गीथ है। |
❁ जैसा कि भगवान्ने भी कहा है—
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ ( गीता १७ । २४ )
'इसलिये वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।'
† सामवेदीय स्तोत्रविशेषका नाम 'उद्गीथभक्ति' है। ओंकार उसका अंश है। इसलिये इसे उद्गीथ कहा गया है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
| तस्योपव्याख्यानम्—तस्याक्षरस्योपव्याख्यानमेवमुपासनमेवंविभूतयेवंफलमित्यादिकथनमुपव्याख्यानम्, प्रवर्तत इति वाक्यशेषः ॥ १ ॥ | [ यहाँ ] उसका उपव्याख्यान आरम्भ किया जाता है—उस अक्षरकी सम्यग् व्याख्या की जाती है । 'इस प्रकार उसकी उपासना होती है, यह उसकी विभूति है और यह फल है,' इत्यादि प्रकारका जो कथन है, उसे उपव्याख्यान कहते हैं । यहाँ 'प्रवर्तते' ( आरम्भ किया जाता है ) यह क्रियापद वाक्यशेष है ॥ १ ॥ |
उद्गीथका रसतमत्व
एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसः ।
अपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो
वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २॥
इन [ चराचर ] प्राणियोंका पृथिवी रस ( उत्पत्ति, स्थिति और लयका स्थान ) है । पृथिवीका रस जल है, जलका रस ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुरुष है, पुरुषका रस वाक् है, वाक्का रस ऋक् है, ऋक्का रस साम है और सामका रस उद्गीथ है ॥ २ ॥
| एषां चराचराणां भूतानां पृथिवी रसो गतिः परायणमवष्टम्भः । पृथिव्या आपो रसोऽप्सु हि ओता च प्रोता च पृथिवी, अतस्ता रसः पृथिव्याः । अपामोषधयो रसः, अप्परिणामत्वादोषधीनाम् । तासां पुरुषो रसः, अन्नपरिणामत्वात्पुरुषस्य । | इन चराचर भूतोंका पृथिवी रस–गति–परायण अर्थात् आश्रय है । पृथिवीका रस आप् (जल) है, क्योंकि पृथिवी जलमें ही ओतप्रोत है; इसलिये वह पृथिवीका रस है । जलका रस ओषधियाँ हैं, क्योंकि ओषधियाँ जलका ही परिणाम हैं । उन ( ओषधियों ) का रस पुरुष है, क्योंकि पुरुष ( नरदेह ) अन्नका ही परिणाम है । |
३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तस्यापि पुरुषस्य वाग्रसः, पुरुषावयवाना हि वाक्सारिष्ठा, अतो वाक् पुरुषस्य रस उच्यते। <br><br> तस्या अपि वाच ऋग्रसः सारतरा। ऋचः साम रसः सारतरम्। तस्यापि साम्न उद्गीथः प्रकृतत्वादोंकारः सारतरः ॥२॥ <br><br> एवम्— | उस पुरुषका भी रस वाक् है। पुरुषके अवयवोंमें वाक् ही सबसे अधिक सार वस्तु है, इसलिये वाक् पुरुषका रस कही जाती है। उस वाणीका भी उससे अधिक सारभूत ऋक् ही रस है, ऋक्का रस साम है जो उससे भी अधिक सारतर वस्तु है तथा उस सामका भी रस उद्गीथ (ॐकार) है। यहाँ उद्गीथ शब्दसे ओंकार ही लेना चाहिये; क्योंकि उसीका प्रकरण है, यह सामसे भी सारतर है ॥ २ ॥ <br><br> इस प्रकार — |
स एष रसानाँ२ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो यदुद्गीथः ॥ ३ ॥
यह जो उद्गीथ है वह सम्पूर्ण रसोंमें रसतम, उत्कृष्ट, परमात्माका प्रतीक होने योग्य और पृथिवी [आदि रसोंमें] आठवाँ है ॥ ३ ॥
| स एष उद्गीथाख्य ॐकारो भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामतिशयेन रसो रसतमः परमः परमात्मप्रतीकत्वात्। परार्ध्यः-अर्धं स्थानं परं च तदर्धं च परार्धं तदर्हतीति परार्ध्यः परमात्मस्थानार्हः परमात्मवदुपास्यत्वादित्यभिप्रायः। अष्टमः पृथिव्यादिरससंख्यायां यदुद्गीथो य उद्गीथः ॥ ३ ॥ | वह यह उद्गीथसंज्ञक ओंकार भूत आदिके उत्तरोत्तर रसोंमें अतिशय रस अर्थात् रसतम है, परमात्माका प्रतीक होनेके कारण परम (उत्कृष्ट) है, परार्ध्य है--अर्ध कहते हैं स्थानको जो पर होते हुए अर्ध भी हो उसका नाम परार्ध है, उसके योग्य होनेसे यह परार्ध्य है; तात्पर्य यह है कि परमात्माके समान उपासनीय होनेके कारण यह परमात्माका आलम्बन होने योग्य है। तथा यह जो उद्गीथ है पृथिवी आदि रसोंकी गणनामें आठवाँ है॥३॥ |
खण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ [३५
उद्गीथोपासनान्तर्गत ऋक्, साम और उद्गीथका निर्णय
| वाच ऋग्रस इत्युक्तम्— | वाणीका रस ऋक् है—ऐसा कहा गया— |
कतमा कतमर्क्तमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥ ४ ॥
अब यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन-सा ऋक् है, कौन-कौन-सा साम है और कौन-कौन-सा उद्गीथ है ? ॥ ४ ॥
| सा कतमा ऋक् ? कतम-<br>त्तत्साम ? कतमो वा स उद्गीथः ?<br>कतमा कतमेति वीप्सादरार्था । | कौन-सी वह ऋक् है, कौन-सा<br>वह साम है और कौन-सा वह<br>उद्गीथ है? 'कतमा-कतमा' (कौन-<br>कौन) यह द्विरुक्ति आदरके लिये है । |
| ननु 'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच् ।' न ह्यत्र ऋग्जाति-<br>बहुत्वम्, कथं डतमच्प्रयोगः ? | शङ्का—'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच्' *(५।३।९३) इस<br>पाणिनीय सूत्रके अनुसार अनेक<br>जातिके लोगोंमेंसे किसी एक जातिका<br>निश्चय करनेके लिये प्रश्न होनेपर<br>'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग इष्ट माना<br>गया है, किंतु यहाँ ऋग्जातिकी बहु-<br>लता सम्भव नहीं है, फिर 'डतमच'<br>प्रत्ययका प्रयोग कैसे किया गया ? |
* इस सूत्रका तात्पर्य यह है कि जहाँ विभिन्न जातियोंके अनेक पदार्थ होते हैं वहाँ किसी एक जातिके पदार्थका निश्चय करनेके लिये प्रश्न उपस्थित होनेपर 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग किया जाता है । जिस प्रकार कठ आदि बहुत सी वेदशाखाएँ हैं, उनका स्वाध्याय करनेवाले द्विज लोगोंकी जाति उन्हीं शाखाओंके नामसे प्रसिद्ध हुई है । उनमेंसे कठ जातिका निश्चय करनेके लिये ही 'कतमः कठः' ऐसा प्रश्न किया जा सकता है । परंतु यहाँ तो ऋग्वेद एक ही जाति है, फिर इसमें 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग कैसे हो सकता है ?
छा० उ० २—
३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]
३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| नैष दोषः; जातौ परिप्रश्नो जातिपरिप्रश्न इत्येतस्मिन्विग्रहे जातावृगव्यक्तीनां बहुत्वोपपत्तेः। न तु जातेः परिप्रश्न इति विगृह्यते। | समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि 'जातिपरिप्रश्न' इस पदका 'जातिमें परिप्रश्न' ऐसा विग्रह करनेपर ऋक् जातिमें ऋक् व्यक्तियों (विभिन्न ऋचाओं) की अनेकता तो सम्भव है ही; यहाँ 'जातिका परिप्रश्न' ऐसा विग्रह नहीं किया जाता। |
| ननु जातेः परिप्रश्न इत्यस्मिन् विग्रहे कतमः कठ इत्याद्युदाहरणमुपपन्नम्, जातौ परिप्रश्न इत्यत्र तु न युज्यते। | शङ्का— किंतु 'जातिका परिप्रश्न' ऐसा विग्रह करनेपर ही 'कतमः कठः' (आपमें कठशाखावाला कौन है ?) इत्यादि उदाहरण सम्भव हो सकता है, 'जातिमें परिप्रश्न' ऐसा विग्रह होनेपर यह उदाहरण नहीं दिया जा सकता। |
| तत्रापि कठादिजातावेव व्यक्तिबहुत्वाभिप्रायेण परिप्रश्न इत्यदोषः। यदि जातेः परिप्रश्नः स्यात्कतमा कतमर्गित्यादावुपसंख्यानं कर्तव्यं स्यात्। विमृष्टं भवति विमर्शः कृतो भवति ॥४॥ | समाधान— वहाँ भी कठादि जातिमें ही व्यक्तियोंकी बहुलताके अभिप्रायसे ऐसा प्रश्न किया गया है—यह मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता। यदि यह प्रश्न (ऋगादि-) जातिसे सम्बन्ध रखता तो पूर्वोक्त सूत्रसे 'कौन-कौन ऋक् हैं' इत्यादि उदाहरण सिद्ध न होनेके कारण उसके लिये किसी पृथक् सूत्रका विधान किया जाता। * [अब यह] विमृष्ट होता है अर्थात् इसका विचार किया जाता है ॥४॥ |
* तात्पर्य यह है कि यदि यहाँ जातिमें प्रश्न न मानकर जातिसम्बन्धी प्रश्न माना जाय तो 'कौन-कौन ऋक् हैं?' यह प्रश्न असंगत हो जाता है; क्योंकि ऋक् एक जाति है, उसमें रहनेवाले भिन्न-भिन्न मन्त्रोंकी पृथक्-पृथक् जाति नहीं है। अतः यहाँ ऋक्त्वजातिविशिष्ट मन्तरूप व्यक्तियोंके विषयमें ही प्रश्न किया गया है, ऐसा मानना चाहिये।
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
| विमर्शे हि कृते सति प्रति-वचनोक्तिरुपपन्ना— | इस प्रकार विचार करनेपर ही यह प्रतिवचन ( उत्तर ) रूप उक्ति संगत हो सकती है कि— |
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वागेवर्क् प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ।
तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्व प्राणश्चर्क च साम च ॥५॥
वाक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ॐ यह अक्षर उद्गीथ है । ये जो ऋक् और सामरूप वाक् और प्राण हैं, परस्पर मिथुन (जोड़े) हैं ॥५॥
| वागेवर्क् प्राणः साम, ओमि- | वाणी ही ऋक् है, प्राण साम है तथा ॐ यह अक्षर उद्गीथ है । |
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| त्येतदक्षरमुद्गीथ इति । वागृ- | इस प्रकार वाक् और ऋक्की एकता होनेपर भी [तीसरे मन्त्रमें बतलाये |
| चोरेकत्वेऽपि नाष्टमत्वव्याघातः, | हुए उद्गीथके] अष्टमत्वका व्याघात नहीं होता, क्योंकि यह पूर्व वाक्यसे |
| पूर्वस्माद्वाक्यान्तरत्वात्; आप्ति- | भिन्न वचन है, 'ओमित्येतदक्षर-मुद्गीथः' यह वचन ओंकारके व्याप्ति- |
| गुणसिद्धये हि ओमित्येतदक्षर- | गुणकी सिद्धिके लिये प्रयुक्त हुआ है [और द्वितीय मन्त्र उसके रसतम- |
| मुद्गीथ इति । | त्वका प्रतिपादन करनेके लिये है] । |
| वाक्प्राणावृक्सामयोनी इति | वाक् और प्राण क्रमशः ऋक् और सामके कारण हैं । इसलिये |
| वागेवर्क प्राणः सामेत्युच्यते । | वाक् ही ऋक् है और साम प्राण हैं—ऐसा कहा जाता है । क्रमशः ऋक् |
| यथाक्रममृक्सामयोन्योर्वाक्प्राण- | और सामके कारणरूप वाक् और प्राणका ग्रहण करनेसे |
| योर्ग्रहणे हि सर्वांसामृचां सर्वेषां | सम्पूर्ण ऋक् और सम्पूर्ण सामका |
| च साम्नामवरोधः कृतः स्यात् । | अन्तर्भाव हो जाता है, तथा |
३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| सर्वर्क्सामावरोधे चर्क्सामसाध्यानां सर्वकर्मणामवरोधः कृतः स्यात्। तदवरोधे च सर्वे कामा अवरुद्धाः स्युः। ओमित्येतदक्षरमुद्गीथ इति भक्त्याशङ्का निवर्त्यते।<br><br>तद्वा एतदिति मिथुनं निर्दिश्यते किं तन्मिथुनम्? इत्याह—<br><br>यद्वाक्च प्राणश्च सर्वर्क्सामकारणभूतौ मिथुनम्। ऋक्च साम चेति ऋक्सामकारणावृक्सामशब्दोक्तावित्यर्थः। न तु स्वातन्त्र्येण ऋक्च साम च मिथुनम्। अन्यथा हि वाक्च प्राणश्चेत्येकं मिथुनमृक्साम चापरं मिथुनमिति द्वे मिथुने स्याताम्। तथा चतद्वैतन्मिथुनमित्येकवचननिर्देशोऽनुपपन्नः स्यात्। तस्मादृक्सामयोन्योर्वाक्प्राणयोरेव मिथुनत्वम्॥ ५ ॥ | सम्पूर्ण ऋक् और सम्पूर्ण सामका अन्तर्भाव होनेपर ऋक् और सामसे सिद्ध होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंका अन्तर्भाव हो जाता है, और उनका अन्तर्भाव होनेपर समस्त कामनाएँ उनके अन्तर्भूत हो जाती हैं।※<br><br>'उद्गीथ' शब्दसे सम्पूर्ण उद्गीथ-भक्ति न ले ली जाय, इस आशङ्काको 'ओम्' यह अक्षर ही उद्गीथ है' ऐसा कहकर निवृत्त किया जाता है।<br><br>'तद्वा एतत्' इत्यादि वाक्यसे मिथुनका निर्देश किया जाता है। वह मिथुन कौन है? यह बतलाते हैं यह जो सम्पूर्ण ऋक् और सामके कारणभूत वाक् और प्राण हैं मिथुन हैं। 'ऋक् च साम च' इसमें ऋक् और सामके कारण ही ऋक् और साम शब्दोंसे कहे गये हैं। ऋक् और साम स्वतन्त्रतासे मिथुन नहीं हैं; नहीं तो वाक् और प्राण यह एक मिथुन तथा ऋक् और साम-यह दूसरा मिथुन इस प्रकार दो मिथुन होते; और ऐसा होनेपर 'तद्वा एतन्मिथुनम्' इस वाक्यमें जो एकवचनका निर्देश किया गया है, वह असंगत हो जाता। अतः ऋक् और सामके कारणभूत वाक् और प्राण ही मिथुन हैं॥ ५ ॥ |
※ इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिका कारण होनेवाला ओंकार व्याप्तिगुणविशिष्ट है—यह सिद्ध होता है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३९
ॐ.. में संसृष्ट मिथुनके समागमका फल
तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् ॥ ६ ॥
वह यह मिथुन ॐ इस अक्षरमें संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुनके अवयव) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक-दूसरेकी कामनाओंको प्राप्त करानेवाले होते हैं ॥ ६ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तदेतदेवंलक्षणं मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते । एवं सर्वकामावाप्तिगुणविशिष्टं मिथुनमोंकारे संसृष्टं विद्यत इत्योंकारस्य सर्वकामावाप्तिगुणवत्त्वं प्रसिद्धम् । वाङ्मयत्वमोंकारस्य प्राणनिष्पाद्यत्वं च मिथुनेन संसृष्टत्वम् । | वह यह ऐसे लक्षणवाला मिथुन ॐ इस अक्षरमें संयुक्त होता है । इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त मिथुन ओंकारमें संयुक्त रहता है, इसलिये ओंकारका सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त होना सिद्ध होता है । ओंकार वाङ्मय है और प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है—यही उसका मिथुनसे संयुक्त होना है । |
| मिथुनस्य कामापयितृत्वं प्रसिद्धमिति दृष्टान्त उच्यते-यथा लोके मिथुनौ मिथुनावयवौ स्त्रीपुंसौ यदा समागच्छतो ग्राम्यधर्मतया संयुज्येयातां तदापयतः प्रापयतोऽन्योन्यस्येतरेतरस्य तौ कामम् । तथा च स्वात्मानुप्रविष्टेन मिथुनेन सर्वकामाप्ति- | कामनाओंको प्राप्ति करा देना यह मिथुनका प्रसिद्ध धर्म है—इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है—जिस प्रकार लोकमें मिथुन यानी मिथुनके अवयवभूत स्त्री और पुरुष परस्पर मिलते हैं—ग्राम्यव्यवहार(रति) के लिये आपसमें संसर्ग करते हैं, उस समय वे एक दूसरेकी कामना पूर्ण कर देते हैं । इसी प्रकार अपनेसे अनुप्रविष्ट मिथुनके द्वारा ओंकारका |