भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५१८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५

५१८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५


| न हि सर्वस्य सर्वात्मकत्वे देशकालनिमित्णावरुद्धत्वात्सर्वात्मनोपमर्दः कस्यचित्क्वचिदभिव्यक्तिर्वा सर्वात्मनोपपद्यते। तथा कर्मणामपि साश्रयाणां भवेत्।<br><br>यथा च पूर्वानुभूतममुष्यमयूरमर्कटादिजन्मभिरभिसंस्कृता विरुद्धानेकवासना मर्कटत्वप्रापकेन कर्मणा मर्कटजन्मारभमाणेण नोपमृद्यन्ते तथा कर्माण्यप्यन्यजन्मप्राप्तिनिमित्तानि नोपमृद्यन्त इति युक्तम्। यदि हि सर्वाः पूर्वजन्मानुभववासना उपमृद्येरन्मर्कटजन्मनिमित्तेन कर्मणा मर्कटजन्मन्यारब्धे मर्कटस्य जात- | है*। अतः सबका सर्वात्मकत्व होनेपर देश, काल और निमित्तसे अवरुद्ध होनेके कारण किसी पदार्थका सर्वथा नाश अथवा सर्वथा अभिव्यक्ति कभी नहीं हो सकती। ऐसा ही कर्म और उनके आश्रयके विषयमें भी होगा [अर्थात् उनका भी सर्वथा नाश अथवा सर्वथा आविर्भाव नहीं हो सकता]।<br><br>जिस प्रकार पहले अनुभव किये हुए मनुष्य, मयूर एवं वानर आदि जन्मोंमें सम्पादित की हुई अनेकों विरुद्ध वासनाएँ वानरत्वकी प्राप्ति करानेवाले वानरजन्मके आरम्भक कर्मसे क्षीण नहीं होतीं उसी प्रकार अन्य जन्मोंकी प्राप्तिके निमित्तभूत कर्म भी क्षीण नहीं होते—यह ठीक ही है। यदि वानरजन्मके निमित्तभूत कर्मसे पूर्वजन्मोंके अनुभवकी समस्त वासनाएँ क्षीण हो जातीं तो वानरजन्मका आरम्भ होनेपर तत्काल उत्पन्न हुए वानरको माताके |


* इसका तात्पर्य यह है कि समस्त पदार्थोंमें न्यूनाधिकरूपसे सभीकी सत्ता रहती है। प्रत्येक पदार्थकी अभिव्यक्ति और विनाशके कारण भी भिन्न-भिन्न हैं। अतः एक व्यक्तिकी मृत्यु किन्हीं-किन्हीं संचित कर्मोंकी अभिव्यञ्जक होनेपर भी सबकी अभिव्यक्ति नहीं कर सकती। इसलिये शेष कर्म अपने उपयुक्त अभिव्यञ्जक निमित्तकी प्राप्तितक फलोन्मुख नहीं होते और न वे आगामी जन्मके आरम्भक ही होते हैं।

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१९


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
मात्रस्य मातुः शाखायाः शाखान्तरगमने मातुरुदरसंलग्नत्वादिकौशलं न प्राप्नोति, इह जन्मन्यनभ्यस्तत्वात्; न चातीतानन्तरजन्मनि मर्कटत्वमेवासीत्तस्येति शक्यं वक्तुम्, “तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च” ( बृ० उ० ४ । ४ । २ ) इति श्रुतेः। तस्माद्वासनावन्नाशेषकर्मोपमर्द इति शेष-कर्मसंभवः । यत एवं तस्माच्छेषेणोपभुक्तात्कर्मणः संसार उपपद्यत इति न कश्चिद्विरोधः ।एक शाखासे दूसरी शाखापर जाते समय उसके पेटसे चिपके रहने आदिकी कुशलता प्राप्त न होती; क्योंकि इस जन्ममें तो उसका अभ्यास हुआ नहीं और ऐसा भी कहा नहीं जा सकता कि इसके पूर्ववर्ती जन्ममें भी उसे वानरत्व ही प्राप्त था । “विद्या और कर्म उसका अनुगमन करते हैं तथा पूर्वजन्मकी वासना भी” इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है । अतः वासनाके समान समस्त कर्मोंका भी क्षय नहीं हो सकता, इसलिये शेष कर्मोंका रहना सम्भव है । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये उपभुक्त हुए कर्मोंसे बचे हुए कर्मद्वारा संसारकी प्राप्ति होना उचित ही है—इस प्रकार कोई विरोध नहीं आता ।
कोऽसावध्वा यं प्रति निवर्तन्ते?वह कौन मार्ग है जिसके प्रति ये लौटते हैं ?
इत्युच्यते—यथेतं यथागतं निवर्तन्ते ।इसपर श्रुति यह कहती है कि जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटते हैं ।
[गमनागमनक्रमयोर्भेद आक्षेपः]<br>ननु मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमस-**शङ्का—**गमनका क्रम तो इस प्रकार बतलाया गया था कि मासोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होता है, किंतु निवृत्ति इस प्रकार

५२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

५२० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५


संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी-अनुवाद
मिति गमनक्रम उक्तो न तथा निवृत्तिः। किं तर्हि ? आकाशाद्वायुमित्यादि, कथं यथेतमित्युच्यते?<br><br>नैष दोषः, आकाशप्राप्तेस्तुल्यत्वात्पृथिवीप्राप्तेश्च (तत्परिहारः)। न चात्र यथेतमेवेति नियमोऽनेवंविधमपि निवर्तन्ते पुनर्निवर्तन्त इति तु नियमः। अत उपलक्षणार्थमेतद्यथेतमिति अतो भौतिकमाकाशं तावत्प्रतिपद्यन्ते।नहीं बतलायी जाती। तो कैसे बतलायी जाती है?—आकाशसे वायुको प्राप्त होता है इत्यादि रूपसे बतलायी जाती है; फिर 'जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटते हैं'- ऐसा कैसे कहा जाता है?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आकाशकी प्राप्ति और पृथिवीकी प्राप्ति ये दोनों दशाओंमें समान हैं। इसके सिवा इसमें ऐसा नियम भी नहीं है कि जिस मार्गसे गये थे उसीसे लौटें, किसी अन्य प्रकार भी लौट ही सकते हैं। नियम तो केवल इतना ही है कि वे फिर लौटते हैं। अतः 'जिस मार्गसे गये थे' इत्यादि कथन केवल उपलक्षणमात्र है। अतः भौतिक आकाशको तो वे प्राप्त होते ही हैं।
यास्तेषां चन्द्रमण्डले शरीरारम्भिका आप आसंस्तास्तेषां तत्रोपभोगनिमित्तानां कर्मणां क्षये विलीयन्ते, घृतसंस्थानमिवाग्निसंयोगे। ता विलीना अन्तरिक्षस्था आकाशभूता इव सूक्ष्माचन्द्रमण्डलमें जो उनके शरीरका आरम्भ करनेवाला जल होता है वह वहाँके उपभोगके निमित्तभूत कर्मोंका क्षय होनेपर विलीन हो जाता है, जिस प्रकार कि अग्निका संयोग होनेपर घृतका पिण्ड विलीन हो जाता है। वह अन्तरिक्षस्थ जल विलीन होकर आकाशभूतके समान सूक्ष्म

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५२१

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भवन्ति । ता अन्तरिक्षाद्वायुर्भवन्ति । वायुप्रतिष्ठा वायुभूता इतश्चामुतश्चोह्यमानास्ताभिः सह क्षीणकर्मा वायुभूतो भवति ।<br><br>वायुर्भूत्वा ताभिः सहैव धूमो भवति । धूमो भूत्वाभ्रम् अभ्ररणमात्ररूपो भवति ॥ ५ ॥हो जाता है । अन्तरिक्षसे वायुरूप हो जाता है । वह वायुमें स्थित होकर वायुरूप हुआ इधर-उधर ले जाया जाता है तथा उसके ही साथ, जिसके कर्म क्षीण हो गये हैं यह जीव वायुरूप हो जाता है । वायु होकर वह उस जलके सहित ही धूम हो जाता है तथा धूम होकर अभ्र-जलभरणमात्ररूप हो जाता है॥५॥

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अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्तेऽतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥

वह अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है । तब वे जीव इस लोकमें धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्टप्रद है । उस अन्नको जो-जो भक्षण करता है और जो-जो वीर्यसेचन करता है, तद्रूप ही वह जीव हो जाता है ॥ ६ ॥

अभ्रं भूत्वा ततः सेचनसमर्थो मेघो भवति; मेघो भूत्वोन्नतेषु प्रदेशेष्वथ प्रवर्षति; वर्षधारारूपेण शेषकर्मा पततीत्यर्थः । त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिल-अभ्र होकर उसके पश्चात् वह वर्षा करनेमें समर्थ मेघ होता है । फिर मेघ होकर ऊँचे स्थानोंमें वृष्टि करता है अर्थात् कर्मोंके शेष रहनेके कारण वर्षाकी धाराओंके रूपमें गिर जाता है । वे जीव इस लोकमें धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल

५९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५९२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| माषा इत्येवंप्रकारा जायन्ते । क्षीणकर्मणामनेकत्वाद्वहुवचननिर्देशः । मेघादिषु पूर्वेष्वेकरूपत्वादेकवचननिर्देशः । | और उड़द इत्यादि प्रकारसे उत्पन्न होते हैं। क्षीणकर्मा जीवोंकी अनेकता होनेके कारण यहाँ ['ते जायन्ते' इत्यादि रूपसे] बहुवचनका निर्देश किया गया है; इससे पहले मेघ आदिमें एकरूप होनेके कारण एकवचनका निर्देश हुआ है। | | यस्माद्गिरितटदुर्गनदीसमुद्रारण्यमरुदेशादिसंनिवेशसहस्राणि वर्षधाराभिः पतितानाम्, अतस्तस्माद्धेतोर्वै खलु दुर्निष्प्रपतरं दुर्निष्करणं दुर्निसरणम् । यतो गिरितटादुदकस्रोतसोह्यमाना नदीः प्राप्नुवन्ति, ततः समुद्रं ततो मकरादिभिर्भक्ष्यन्ते; तेऽप्यन्येन; तत्रैव च सह मकरेण समुद्रे विलीनाः समुद्राम्भोभिर्जलधरैराकृष्टाः पुनर्वर्षधाराभिर्मरुदेशे शिलातटे वागम्ये पतितास्तिष्ठन्ति, कदाचिद्व्यालम्मृगादिपीता | क्योंकि वर्षाकी धाराओंद्वारा गिरे हुए जीवोंके पर्वततट दुर्ग, नदी, समुद्र, वन एवं मरुस्थल आदि सहस्रों स्थान हैं, अतः इन सब कारणोंसे उनका यह दुर्निष्प्रपतर—दुर्निष्क्रमण अर्थात् कष्टमय निःसरण है; क्योंकि जलके प्रवाहद्वारा गिरितटसे ले जाये जाते हुए वे (जीव) नदीको प्राप्त होते हैं और उससे समुद्रको; तथा उसके पश्चात् मकरादिसे खाये जाते हैं और वे भी दूसरोंसे भक्षित होते हैं। तथा वहाँ समुद्रमें ही यदि मकरके साथ लीन हो गये तो समुद्रके जलके साथ मेघोंसे आकर्षित होकर फिर वर्षाकी धाराओंद्वारा मरुभूमि, शिलातट अथवा अगम्य स्थानोंमें गिरकर पड़े रहते हैं; कभी सर्प एवं मृगादिसे पी लिये जाते हैं अथवा अन्य |

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
भक्षिताश्चान्यैः; तेऽप्यन्यैरित्येवंप्रकाराः परिवर्तेरन्, कदाचिद्भक्ष्येषु जातास्तत्रैव शुष्येरन्; अभक्ष्येष्वपि स्थावरेषु जातानां रेतःसिग्देहसंबन्धो दुर्लभ एव, बहुत्वात्स्थावराणाम् इत्यतो दुर्निष्क्रमगत्वम् ।जीवोंद्वारा भक्षित होते हैं और वे भी किन्हीं अन्य जीवोंद्वारा खा लिये जाते हैं [ इस प्रकार वे अनुशयी जीव परिवर्तित होते रहते हैं ] । कभी अभक्ष्योंमें उत्पन्न होनेपर वे वहीं सूख जाते हैं।* भक्ष्योंमें भी स्थावरोंमें उत्पन्न हुए जीवोंको वीर्यसेचन करनेवाले शरीरका सम्बन्ध प्राप्त होना तो कठिन ही है, क्योंकि स्थावरोंकी संख्या बहुत है। इसलिये अनुशयी जीवका निष्क्रमण दुःखमय ही है।
अथवातोऽस्माद्व्रीहियवादिभावाद्दुर्निष्प्रपतरं दुर्निर्गमतरम् । दुर्निष्प्रपतरमिति तकार एको लुप्तो द्रष्टव्यः । व्रीहियवादिभावो दुर्निष्प्रपतस्तस्मादपि दुर्निष्प्रपतातरेतःसिग्देहसंबन्धो दुर्निष्प्रपततर इत्यर्थः; यस्मादूर्ध्वरेतोभिर्बालैः पुंस्त्वरहितैः स्थविरैर्वा भक्षिता अन्तराले शीर्यन्ते, अनेकत्वादन्नादानाम् । कदाचित्काकतालीयवृत्त्या रेतःसिग्भि-अथवा यों समझो कि इस व्रीहियवादिभावसे जीवका छुटकारा होना बहुत कठिन है। 'दुर्निष्प्रपतरम्' इस पदमें एक तकार लुप्त समझना चाहिये। अतः तात्पर्य यह है कि व्रीहियवादिभाव दुर्निष्प्रपत है और उस दुर्निष्प्रपतसे भी वीर्यसेचन करनेवाले शरीरका सम्बन्ध दुर्निष्प्रपतर है, क्योंकि अन्न भक्षण करनेवाले अनेकों होनेके कारण ऊर्ध्वरेता, बालक, नपुंसक अथवा वृद्ध पुरुषोंद्वारा खाये जानेपर वे पेटके भीतर ही नष्ट हो जाते हैं।* जिस समय काकतालीयन्यायसे वे कभी वीर्यसेचन करनेवाले पुरुषोंद्वारा भक्षित किये

* इन दोनों स्थानोंपर जो जीवके सूखने और नष्ट होनेकी बात कही है, वह वैराग्यवृद्धिके उद्देश्यसे स्वर्गावरोहणकी अतिशय दुःखरूपता प्रदर्शित करनेके लिये है।

५२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५२४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| भक्ष्यन्ते यदा, तदा रेतःसिग्भावं गतानां कर्मणो वृत्तिलाभः । | जाते हैं उसी समय वीर्यसेचक-रूपताको प्राप्त हुए उन जीवोंको कर्मोंकी वृत्तिका लाभ होता है। | | कथम् ? यो यो ह्यन्नमत्त्यनुशयिभिः संश्लिष्टं रेतःसिक्, यश्च रेतः सिञ्चत्यृतुकाले योषिति तद्भूय एवतदाकृतिरेव भवति; तदवयवाकृतिभूयस्त्वं भूय इत्युच्यते, रेतोरूपेण योषितो गर्भाशयेऽन्तःप्रविष्टोऽनुशयी रेतसो रेतःसिगाकृतिभावितत्वात्, | किस प्रकार वृत्तिलाभ होता है ?—जो-जो वीर्यसेचक अनुशयी जीवोंसे युक्त अन्न भक्षण करता है और फिर ऋतुकालमें स्त्रीमें वीर्य-सेचन करता है वह जीव ‘तद्भूय’ अर्थात् उसीके आकारका हो जाता है। उसके अवयवोंकी आकृतिकी अधिकता होना ‘भूय’ ऐसा कहा जाता है। इस प्रकार वीर्यरूपसे स्त्रीके गर्भाशयमें प्रविष्ट हुआ जीव ‘तद्भूय’ हो जाता है’ क्योंकि वीर्य वीर्यसेचन करनेवालेकी आकृतिसे भावित होता है, जैसा कि | | “सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः संभूतम्” ( ऐ० उ० ४।१) इति हि श्रुत्यन्तरात् । अतो रेतःसिगाकृतिरेव भवतीत्यर्थः । तथा हि-पुरुषात्पुरुषो जायते गोर्गवाकृतिरेव न जात्यन्तराकृतिः, तस्माद्युक्तं तद्भूय एव भवतीति । | “वीर्य पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ तेज होता है” इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है । इस लिये तात्पर्य यह है कि वह वीर्य सेचन करनेवालेकी ही आकृतिका हो जाता है । इसीसे पुरुषसे पुरुष और बैलसे बैलके आकारवाला ही प्राणी होता है, अन्य जातिकी आकृतिवाला नहीं होता । अतः वह ‘तद्भूय’ ही होता है—यह कथन ठीक ही है। |

खण्ड १० ]शाङ्करभाष्यार्थ५२५

ये त्वन्येऽनुशयिभ्यश्चन्द्रमण्डलमना<br>रुह्यैवापापकर्मभिर्घोरैर्व्रीहियवादिभावं प्रतिपद्यन्ते, न<br>पुनर्मनुष्यादिभावम्, तेषां नानुशयिनासिव । दुर्निष्प्रपतरम् ।<br>कस्मात् ? कर्मणा हि तैर्व्रीहियवादिदेह उपात्त इति तदुपभोगनिमित्तक्षये व्रीह्यादिस्तम्बदेहविनाशे यथाकर्मार्जितं देहान्तरं<br>नवं नवं जलूकावत्संक्रमन्ते<br>सविज्ञाना एव; “सविज्ञानो<br>भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति” (बृ० उ० ४।४।२)<br>इति श्रुत्यन्तरात् । यद्यप्युपसंहृतकरणाः सन्तो देहान्तरं<br>गच्छन्ति तथापि स्वप्नवद्देहान्तरप्राप्तिनिमित्तकर्मोद्भावितवासनाज्ञानेन सविज्ञाना एव देहान्तरं<br>गच्छन्ति, श्रुतिप्रामाण्यात् ।किंतु जो अनुशयि जीवोंसे भिन्न<br>प्राणी अपने घोर पापकर्मोंके कारण<br>चन्द्रमण्डलपर आरूढ हुए बिना ही<br>व्रीहि-यवादि भावको प्राप्त होते हैं,<br>मनुष्यादि भावको प्राप्त नहीं होते,<br>उनका व्रीहि-यवादि भावसे निष्क्रमण<br>होना बहुत कष्टप्रद नहीं है। क्यों<br>नहीं है ? क्योंकि उन्होंने कर्मके<br>कारण ही व्रीहि-यवादि देह प्राप्त किया<br>है; अतः उस उपभोगके निमित्तका<br>क्षय होनेपर व्रीहि आदि स्तम्बदेहका<br>नाश हो जानेके कारण वे जान-बूझकर<br>एक तिनकेसे दूसरे तिनकेपर जानेवाली जोंकके समान अपने कर्मानुसार<br>उपार्जित अन्य नवीन-नवीन शरीरमें<br>विज्ञानयुक्त रहकर ही संक्रमण करते<br>हैं; जैसा कि “वह सविज्ञान<br>होता है और सविज्ञान रहता<br>हुआ ही अन्य शरीरमें संक्रमण<br>करता है” इस अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध<br>होता है। यद्यपि जीव इन्द्रियोंका उपसंहार (हृदयमें लय) हो जानेपर ही<br>देहान्तरमें जाते हैं, तथापि इस श्रुतिप्रमाणसे वे स्वप्नके समान देहान्तरकी<br>प्राप्तिके निमित्तभूत कर्मसे उत्पन्न क॑<br>हुई वासनाके विज्ञानसे सविज्ञान हुए<br>ही देहान्तरको प्राप्त होते हैं।

| ५२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |

५२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृतहिन्दी
तथार्चिरादिना धूमादिना च गमनं स्वप्न इवोद्भूतविज्ञानेन, लब्धवृत्तिकर्मनिमित्तत्वादगमनस्य । न तथानुशयिनां व्रीह्यादिभावेन जातानां सविज्ञानमेव रेतःसिग्योषिद्देहसंबन्ध उपपद्यते, न हि व्रीह्यादिलवनकण्डनपेषणादौ च सविज्ञानानां स्थितिरस्ति ।इसी प्रकार उपासकोंका अर्चि आदि मार्गसे और सकाम कर्मियोंका धूम आदि मार्गसे जो गमन होता है वह भी स्वप्नके समान उद्भूतवासनात्मकविज्ञानसे सविज्ञान हुए जीवोंका ही होता है; क्योंकि वह गमन लब्धवृत्ति (अपना फल देनेके लिये उन्मुख) कर्मके कारण होता है । किंतु व्रीहि यवादिरूपसे उत्पन्न हुए अनुशयी जीवोंका जो वीर्यका आधान करनेवाले पुरुष अथवा स्त्रीके देहोंसे सम्बन्ध होता है वह उनके सविज्ञान रहते हुए ही हो, यह सम्भव नहीं है; क्योंकि व्रीहि आदिके काटने, कूटने अथवा पीसनेमें सविज्ञान जीवोंकी स्थिति नहीं रह सकती ।
ननु चन्द्रमण्डलादप्यवरोहतां इष्टापूर्तादि-लब्धगतेर्दुःखस्वरूपत्वान्नाज्ञानार्थक्यमित्याक्षेपः देहान्तरगमनस्य तुल्यत्वाज्जलूकावत्सविज्ञानतैव युक्ता, तथा सति घोरो नरकानुभव इष्टापूर्तादिकारिणां चन्द्रमण्डलादारभ्य प्राप्तो यावद्ब्राह्मणादिजन्म; तथा च सत्यनर्थायैवेष्टापूर्ताद्युपासनं विहितं स्यात्; श्रुतेश्चाप्रामाण्यं प्राप्तम्, वैदिकानां कर्मणामनर्थानुबन्धित्वात् ।शङ्का—चन्द्रमण्डलसे उतरनेवाले जीवोंका देहान्तरगमन भी वैसा ही होनेके कारण उनकी भी जोंकके समान सविज्ञानता ही माननी उचित है । ऐसा होनेपर इष्ट-पूर्त्त आदि कर्म करनेवालोंको चन्द्रमण्डलसे लेकर जबतक ब्राह्मणादिजन्मकी प्राप्ति होगी तबतक घोर नरकका अनुभव होना सिद्ध होगा । ऐसी अवस्थामें इष्ट-पूर्त्त आदि उपासना अनर्थके लिये ही विहित मानी जायगी और इस प्रकार वैदिक कर्मके अनर्थकारी होनेके कारण श्रुतिकी अप्रामाणिकता सिद्ध होगी ।

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५२७


संस्कृत (मूल/भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
[आक्षेप-परिहारः]<br>न, वृक्षारोहणपतनवद्विशेषसंभवात्। देहाद्देहान्तरं प्रतिपित्सोः कर्मणो लब्धवृत्तित्वात्कर्मणोद्भावितेन विज्ञानेन सविज्ञानत्वं युक्तम्। वृक्षाग्रमारोहत इव फलं जिघृक्षोः, तथार्चिरादिना गच्छतां सविज्ञानत्वं भवेत्; धूमादिना च चन्द्रमण्डलमारुरुक्षताम्। न तथा चन्द्रमण्डलादवरुरुक्षतां वृक्षाग्रादिव पततां सचेतनत्वम्।**समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वृक्षपर चढ़ने और उससे गिरनेके समान इन अवस्थाओंमें अन्तर रहना सम्भव है। एक देहसे दूसरे देहको प्राप्त करानेकी इच्छावाले कर्म लब्धवृत्ति होनेके कारण उन कर्मोंद्वारा उत्पन्न किये हुए विज्ञानसे उस जीवका सविज्ञान रहना उचित है। फल लेनेकी इच्छासे वृक्षपर चढ़नेवाले मनुष्यकी जिस प्रकार सविज्ञानता सम्भव है, इसी प्रकार अर्चिरादि मार्गसे जानेवाले तथा धूमादि मार्गसे चन्द्रमण्डलपर आरूढ़ होनेवाले जीवोंकी भी सविज्ञानता सम्भव है। किंतु इसी तरह वृक्षाग्रसे गिरनेवाले पुरुषोंके समान चन्द्रमण्डलसे गिरनेवालोंकी सचेतनता सम्भव नहीं है।
यथा च मुद्गराद्यभिहतानां तदभिघातवेदनानिमित्तसंमूर्च्छितप्रतिबद्धकरणानां स्वदेहेनैव देशाद्देशान्तरं नीयमानानां विज्ञानशून्यता दृष्टा, तथा चन्द्रमण्डलान्मानुषादिदेहान्तरं प्रत्य-जिस प्रकार कि मुद्गरादिसे आहत पुरुष जिनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उनके आघातोंकी वेदनाके कारण मूर्च्छित अथवा प्रतिबद्ध (कुण्ठित) हो गयी हैं, अपने देहसे ही एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाते समय विज्ञानशून्य (अचेत) देखे गये हैं, उसी प्रकार स्वर्गभोगके निमित्तभूत कर्मोंका क्षय हो जानेसे जिनके जलीय शरीर नष्ट हो गये

५२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

५२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५


| वरुरुक्षतां स्वर्गभोगनिमित्त-<br>कर्मक्षयान्मृदिताब्ददेहानां प्रति-<br>बद्धकरणानाम् । अतस्तेऽपरि-<br>त्यक्तदेहबीजभूताभिरद्भिर्मूर्च्छिता<br>इवाकाशादिक्रमेणेमामवरुह्य<br>कर्मनिमित्तजातिस्थावरदेहैः<br>संश्लिष्यन्ते । प्रतिबद्धकरणतया-<br>नुद्भूतविज्ञाना एव । | हैं तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अवरुद्ध हो<br>गयी हैं उन चन्द्रमण्डलसे मनुष्यादि<br>देहान्तरोंके प्रति गिरनेवाले अनुशयी<br>जीवोंकी [ विज्ञानशून्यता उचित ही<br>है ] । अतः देहके बीजभूत जलके<br>परित्यक्त न होनेसे वे उसके सहित<br>ही मूर्च्छित हुएके समान आकाशा-<br>दिक्रमसे इस पृथिवीपर उतरकर<br>अपने कर्मानुसार जातिवाले स्थावर-<br>शरीरोंमें मिल जातेहैं और इन्द्रियोंके<br>प्रतिबद्ध रहनेके कारण अनुद्भूतविज्ञान<br>(अचेत) ही रहते हैं । | | तथा लवनकण्डनपेषणसं-<br>स्कारभक्षणरसादिपरिणामरेतः-<br>सेककालेषु मूर्च्छितवदेव, देहा-<br>न्तरारम्भकस्य कर्मणोऽलब्धवृ-<br>त्तित्वात् । देहबीजभूताप्तसंबन्धा-<br>परित्यागेनैव सर्वास्ववस्थासु<br>वर्तन्त इति जलूकावच्चेतनावत्त्वं<br>न विरुध्यते । अन्तराले त्ववि-<br>ज्ञानं मूर्च्छितवदेवेत्यदोषः । | इसी प्रकार वे काटने, कूटने,<br>पीसने, पकाने, खाने, रसादिरूपमें<br>परिणत होने और वीर्यसेचनके<br>समय भी मूर्च्छितसे ही रहते हैं,<br>क्योंकि उनका देहान्तरका आरम्भ<br>करनेवाला कर्म अलब्धवृत्ति रहता<br>है । वे समस्त अवस्थाओंमें देहके<br>बीजभूत जलका सम्बन्ध न छोड़ते<br>हुए ही विद्यमान रहते हैं, अतः<br>जोंकके समान उनके चेतनायुक्त<br>होनेमें भी कोई विरोध नहीं आता ।<br>बीचमें जो विज्ञानशून्य दशा रहती<br>है वह मूर्च्छितके समान है; इस-<br>लिये उसमें कोई दोष नहीं है । |

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थे ५२९


न च वैदिकानां कर्मणां हिंसायुकत्वेनोभयहेतुत्वं शक्यमनुमातुम्, हिंसायाः शास्त्रचोदितत्वात् "अहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" इति श्रुतेः शास्त्रचोदिताया हिंसाया नाधर्महेतुत्वमभ्युपगम्यते । अभ्युपगतेऽप्यधर्महेतुत्वे मन्त्रैर्विषादिवत्तदपनयोपपत्तेर्न दुःखकार्यारम्भकत्वोपपत्तिर्वैदिकानां कर्मणां मन्त्रेणेव विषभक्षणस्येति ॥ ६ ॥

—: ० :—

अनुशयी जीवोंकी कर्मानुरूप गति

तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥

उन (अनुशयी जीवों) में जो अच्छे आचरणवाले होते हैं वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं। वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ आचरणवाले होते हैं वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्तेकी योनि, सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥

५३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तत्तत्र तेष्वनुशयिनां य इह लोके रमणीयं शोभनं चरणं शीलं येषां ते रमणीयचरणा रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा उच्यन्ते। क्रौर्या-नृतमायावर्जितानां हि शक्य उपलक्षयितुं शुभानुशयसद्भावः। तेनानुशयेन पुण्येन कर्मणा चन्द्रमण्डले भुक्तशेषेणाभ्याशो ह क्षिप्रमेव, यदितिक्रियाविशे-षणम्, ते रमणीयां क्रौर्यादि-वर्जितां योनिमापद्येरन्प्राप्नु-युर्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिय-योनिं वा वैश्ययोनिं वा स्व-कर्मानुरूपेण ।तत्-वहाँ उन अनुशयी जीवोंमें जिनका इस लोकमें रमणीय-शुभ चरण-शील होता है वे शुद्धाचारी जीव-जिनका रमणीयचरणसे उपलक्षित शुभ अनुशय यानी पुण्य-कर्म होता है-वे रमणीयचरण कहलाते हैं । जो लोग क्रूरता, असत्य और कपटसे रहित हैं उन्हींमें शुभानुशयकी सत्ता देखी जा सकती है । चन्द्रमण्डलके भोगसे बचे हुए उस पुण्य अनुशय यानी कर्मसे वे अभ्याश-शीघ्र ही रमणीय-क्रूरता आदिसे रहित योनिको प्राप्त होते हैं। यहाँ 'यत' शब्द क्रियाविशेषण है । अपने कर्मोंके अनुसार वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनिको प्राप्त करते हैं।
अथ पुनर्ये तद्विपरीताः कपू-यचरणोपलक्षितकर्माणोऽशुभानु-शया अभ्याशो ह यत्ते कपूयां यथाकर्म योनिमापद्येरन्कपूया-मेव धर्मसंबन्धवर्जितां जुगुप्सितां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वाकिंतु उनसे विपरीत जो कपूय-चरणसे उपलक्षित कर्मवाले अर्थात् अशुभ अनुशयवाले होते हैं वे शीघ्र ही अपने कर्मानुसार कपूययोनिको प्राप्त होते हैं। कपूय-धर्मसम्बन्ध-से रहित अर्थात् निन्दनीय योनिको ही प्राप्त होते हैं। वे भी अपने

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५३१

सूकरयोनिं वा चाण्डाल-कर्मोंके ही अनुसार कुत्तेकी योनि,
योनिं वा स्वकर्मानुरूपे-सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि
णैव ॥ ७ ॥प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥

चतुर्थ प्रश्नका उत्तर

(अशास्त्रीय प्रवृत्तिवालोंकी गति)

ये तु रमणीयचरणा द्विजा-किंतु जो शुभाचरणशील
तयस्ते स्वकर्मस्थाश्चेदिष्टदिका-द्विजाति हैं वे यदि अपने कर्मोंमें
रिणस्ते धूमादिगत्या गच्छ-स्थित रहकर इष्टादि कर्म करनेवाले
न्त्यागच्छन्ति च पुनः पुनर्घ-होते हैं तो घटीयन्त्रके समान
टीयन्त्रवत् । विद्यां चेत्प्राप्नु-धूमादि मार्गसे पुनः-पुनः आते-जाते
युस्तदार्चिरादिना गच्छन्ति। यदारहते हैं और यदि उन्हें [उपासना-
तु न विद्यासेविनो नापीष्टा-त्मक] विद्याकी प्राप्ति हो जाती है
दिकर्म सेवन्ते तदा—तो अर्चि आदि मार्गसे जाते हैं।
और जिस समय वे न तो उपासना
करनेवाले होते हैं और न इष्टादि
कर्मोंका ही सेवन करते हैं, उस
समय—

अथैतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयꣳस्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेष श्लोकः ॥ ८ ॥

इनमेंसे किसी मार्गद्वारा नहीं जाते। वे ये क्षुद्र और बारम्बार आने-जानेवाले प्राणी होते हैं। 'उत्पन्न होओ और मरो' यही उनका तृतीय स्थान होता है। इसी कारण यह परलोक नहीं भरता। अतः [इस संसारगतिसे] घृणा करनी चाहिये। इस विषयमें यह मन्त्र है-॥८॥

५१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

अथैतयोः पथोर्यथोक्तयोरर्चिर्धूमादिलक्षणयोर्न कतरेण अन्यतरेण च नापियन्ति । तानीमानि भूतानि क्षुद्राणि दंशमशककीटादीन्यसकृदावर्तीनि भवन्ति । अत उभयमार्गपरिभ्रष्टा ह्यसकृज्जायन्ते म्रियन्ते चेत्यर्थः । तेषां जननमरणसन्ततेरनुकरणमिदमुच्यते । जायस्व म्रियस्वेतीश्वरनिमित्तचेष्टोच्यते । जननमरणक्षणेनैव कालयापना भवति, न तु क्रियासु शोभनेषु भोगेषु वा कालोऽस्तीत्यर्थः ।वे इन पूर्वोक्त अर्चि आदि और धूमादि मागोंमेंसे किसी भी एकके द्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र प्राणी डाँस, मच्छर और कीड़े आदि बारम्बार आने-जानेवाले जीव होते हैं । अतः तात्पर्य यह है कि वे इन दोनों ही मागोंसे परिभ्रष्ट होकर बारम्बार जन्मते-मरते रहते हैं । यह उनके जन्म-मरणकी अविच्छिन्न परम्पराका अनुकरण कहा जाता है; 'जन्म लो और मरो' यह ईश्वरसम्बन्धी चेष्टा बतलायी जाती है*। अर्थात् उनका समय जन्म लेने और मरनेमें ही जाता है, कर्म करने अथवा सुन्दर भोग भोगनेके लिये उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता ।
एतत्क्षुद्रजन्तुलक्षणं तृतीयं पूर्वोक्तौ पन्थानावपेक्ष्य स्थानं संसरताम्, येनैवं दक्षिणमार्गगा अपि पुनरागच्छन्ति, अनधिकृतानां ज्ञानकर्मणोरगमनमेव दक्षिणेन पथेति, तेनासौ लोको न सम्पूर्यते ।जन्म-मरण-परम्परामें पड़े हुए जीवोंका पहले दो मागोंकी अपेक्षा यह क्षुद्र जीवरूप तीसरा स्थान है । क्योंकि इस प्रकार दक्षिणमार्गगामी भी लौट आते हैं तथा ज्ञान और कर्मके अनधिकारियोंका तो दक्षिणमार्गसे वहाँ जाना भी नहीं होता, इसलिये यह परलोक नहीं भरता ।

  • ॐ तात्पर्य यह है कि उन जीवोंको दोनों मागोंसे पतित हुए देखकर मानो ईश्वर ही कहता है कि 'तुम जन्म लो और मरो।'

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३१


संस्कृत-भाष्यभाष्यार्थ
पञ्चमस्तु प्रश्नः पञ्चाग्निविद्यया व्याख्यातः । प्रथमो दक्षिणोत्तरमार्गाभ्यामपाकृतः । दक्षिणोत्तरयोः पथोर्व्यावर्तनापि—मृतानामग्नौ प्रक्षेपः समानः, ततो व्यावर्तना, अन्येऽर्चिरादिना यन्ति, अन्ये धूमादिना, पुनरुत्तरदक्षिणायने षण्मासान्प्राप्नुवन्तः संयुज्य पुनर्व्यावर्तन्ते, अन्ये संवत्सरमन्ये मासेभ्यः पितृलोकम्—इति व्याख्याता । पुनरावृत्तिरपि क्षीणानुशयानां चन्द्रमण्डलादाकाशादिक्रमेणोक्ता । अमुष्य लोकस्यापूरणं स्वशब्देनैवोक्तम्, तेनासौ लोको न सम्पूर्यत इति ।[ उपर्युक्त प्रश्नोंमेंसे ] पाँचवें प्रश्नकी व्याख्या पञ्चाग्निविद्याद्वारा की गयी; प्रथम प्रश्नका अपाकरण दक्षिण एवं उत्तरमार्गके वर्णनसे किया गया । तथा—मरे हुए उपासक और कर्मठ इनको अग्निमें डालना एक समान होता है, वहाँसे आगे उनका वियोग होता है, उनमेंसे एक अर्चि आदि मार्गसे जाते हैं और दूसरे धूमादि मार्गसे; फिर उत्तरायण और दक्षिणायन—इन छः-छः मासोंको प्राप्त होकर वे एक बार मिलकर फिर बिछुड़ जाते हैं । उनमेंसे एक तो संवत्सरको प्राप्त होते हैं और दूसरे मासाभिमानी देवताओंसे पितृलोकको जाते हैं—इस प्रकार दक्षिण और उत्तर मार्गोंकी व्यावर्तना—व्यावृत्तिकी भी व्याख्या की गयी । जिनका अनुशय (कर्म) क्षीण हो गया है, उन जीवोंकी चन्द्रमण्डलसे आकाशादि क्रमसे पुनरावृत्ति भी बतला दी गयी । इस परलोककी अपूर्तिका तो 'तेनासौ लोको न सम्पूर्यते' ऐसे प्रत्यक्ष शब्दोंसे ही उल्लेख कर दिया गया ।
यस्मादेवं कष्टा संसारगतिस्तस्माज्जुगुप्सेत । यस्माच्चक्योंकि इस प्रकार संसारगति अत्यन्त कष्टमयी है, इसलिये उससे घृणा करनी चाहिये । क्योंकि

५३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५
जन्ममरणजनितवेदनानुभवकृत-<br>क्षणाः क्षुद्रजन्तवो ध्वान्ते च<br>घोरे दुस्तरे प्रवेशिताः सागर<br>इवागाधेऽप्लवे निराशाश्चोत्तरणं<br>प्रति; तस्माच्चैवंविधां संसार-<br>गतिं जुगुप्सेत बीभत्सेत घृणी<br>भवेत्, मा भूदेवंविधे संसार-<br>महोदधौ घोरे पात इति ।<br>तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोकः पञ्चा-<br>ग्निविद्यास्तुतये ॥ ८ ॥जन्म-मरणसे होनेवाली वेदनाके<br>अनुभवमें ही जिनका समय जाता<br>है वे क्षुद्र जीव नौकाहीन अगाध<br>सागरके समान, जिसे पार करनेमें<br>वे निराश रहते हैं, अति दुस्तर घोर<br>अज्ञानान्धकारमें प्रविष्ट कर दिये<br>जाते हैं; इसलिये इस प्रकारकी<br>संसारगतिमें जुगुप्सा—बीभत्सा<br>अर्थात् घृणा करनी चाहिये कि इस<br>प्रकारके घोर संसार महासागरमें<br>हमारा पतन न हो । उसी अर्थमें<br>पञ्चाग्निविद्याकी स्तुतिके लिये यह<br>मन्त्र है ॥ ८ ॥
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पाँच पतित

स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्र-<br>ह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तैरिति ॥९॥

सुवर्णका चोर, मद्य पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग करनेवाला भी ॥ ९ ॥

स्तेनो हिरण्यस्य ब्राह्मणसु-<br>वर्णस्य हर्ता। सुरां पिबन्ब्राह्मणः<br>सन् । गुरोश्च तल्पं दारानाव-<br>सन् । ब्रह्महा ब्राह्मणस्य हन्ता<br>चेत्येते पतन्ति चत्वारः पञ्च-<br>मश्च तैः सहाचरन्निति ॥ ९ ॥सुवर्णका चोर अर्थात् ब्राह्मणका<br>सोना चुरानेवाला, ब्राह्मण होकर<br>मदिरा पीनेवाला, गुरुके तल्प यानी<br>पत्नीसे सहवास करनेवाला और<br>ब्रह्महा—ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला<br>—ये चार पतित होते हैं और<br>पाँचवाँ उनके साथ आचरण<br>(व्यवहार) करनेवाला ॥ ९ ॥
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३५


पञ्चाग्निविद्याका महत्त्व

अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न सह तैरप्याचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥

किन्तु जो इस प्रकार इन पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उनके साथ आचरण (संसर्ग) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता । वह शुद्ध पवित्र और पुण्यलोकका भागी होता है, जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है ॥१०॥

| अथ ह पुनर्यो यथोक्तानपञ्चाग्नीन्वेद, स तैरप्याचरन्महापातकिभिः सह न पाप्मना लिप्यते, शुद्ध एव । तेन पञ्चाग्निदर्शनेन पावितो यस्मात्पूतः, पुण्यो लोकः प्राजापत्यादिर्यस्य सोऽयं पुण्यलोको भवति । य एवं वेद यथोक्तं समस्तं पञ्चभिः प्रश्नैः पृष्टमर्थजातं वेद । द्विरुक्तिःसमस्तप्रश्ननिर्णयप्रदर्शनार्था ॥ १० ॥ | किंतु जो उपर्युक्त पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उन महापापियोंके साथ आचरण (व्यवहार) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता, शुद्ध ही रहता है; क्योंकि उस पञ्चाग्निविद्यासे वह पवित्र हो जाता है इसलिये पुण्यलोक—जिसे ब्रह्मलोक आदि पवित्र लोककी प्राप्ति होती है ऐसा पुण्यलोक हो जाता है; जो कि इस प्रकार जानता है अर्थात् पाँच प्रश्नोंद्वारा पूछे हुए उपर्युक्त समस्त विषयको जानता है । द्विरुक्ति समस्त प्रश्नोंका निर्णय प्रदर्शित करनेके लिये है ॥१०॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥

—:०:—

एकादश खण्ड


| दक्षिणेन पथा गच्छतामन्नभाव उक्तः--'तद्देवानामन्नम्' 'तं देवा भक्षयन्ति' इति; क्षुद्रजन्तुलक्षणा च कष्टा संसारगतिरुक्ता । तदुभयदोषपरिजिहीर्षया वैश्वानरात्तृभावप्रतिपत्त्यर्थमुत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते, 'अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम्' इत्यादिलिङ्गात् । आख्यायिका तु सुखावबोधार्था विद्यासंप्रदानन्यायप्रदर्शनार्था च । | 'वह देवताओंका अन्न है' देवगण उसका भक्षण करते हैं'—ऐसा कहकर दक्षिणमार्गसे जानेवालोंके अन्नभावका प्रतिपादन किया गया तथा क्षुद्रजन्तुरूप संसारकी कष्टमयी गति भी बतलायी गयी । उन दोनों दोषोंको त्यागनेकी इच्छासे वैश्वानरसंज्ञक भोक्तृत्वकी प्राप्तिके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—जैसा कि 'तू अन्न भक्षण करता है, प्रियको देखता है' इत्यादि लिङ्गोंसे जाना जाता है । यहाँ जो आख्यायिका है वह सरलतासे समझानेके लिये और विद्याप्रदानकी उचित विधि प्रदर्शित करनेके लिये है । |

औपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक प्रस्ताव

प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं ब्रह्मेति ॥ १ ॥

उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ, भल्लविके पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराश्वका पुत्र

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२७


बुडिल—ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १ ॥

प्राचीनशाल इति नामत उपमन्योरपत्यमौपमन्यवः । सत्ययज्ञो नामतः पुलुषस्यापत्यं पौलुपिः । तथेन्द्रद्युम्नो नामतो भल्लवेरपत्यं भाल्लविस्तस्यापत्यं भाल्लवेयः । जन इति नामतः शर्कराक्षस्यापत्यं शार्कराक्ष्यः । बुडिलो नामतोऽश्वतराश्वस्यापत्यमाश्वतराश्विः । पञ्चापि ते हैते महाशाला महागृहस्था विस्तीर्णाभिः शालाभिर्युक्ताः संपन्ना इत्यर्थः । महाश्रोत्रियाः श्रुताध्ययनवृत्तसंपन्ना इत्यर्थः । त एवंभूताः सन्तः समेत्य संभूय क्वचिन्मीमांसां विचारणां चक्रुः कृतवन्त इत्यर्थः ।<br><br>कथम् ? को नोऽस्माकमात्मा ? किं ब्रह्म ? इत्यात्मब्रह्मशब्दयोरितरेतरविशेषणविशेष्यत्वम् । ब्रह्मेत्यप्यात्मपरिच्छिन्नमात्मानं निवर्तयत्यात्मेति चात्मव्यतिरिक्तस्यादित्यादिब्रह्मण उपास्यत्वं निवर्तयति । अभेदेनात्मैव ब्रह्मजो नामसे प्राचीनशाल था वह उपमन्युका पुत्र औपमन्यव, पुलुषका पुत्र पौलुषि जो नामसे सत्ययज्ञ था, भल्लविके पुत्रको भाल्लवि कहते हैं, उसका पुत्र भाल्लवेय जो नामसे इन्द्रद्युम्न था, जन ऐसे नामवाला शर्कराक्षका पुत्र शार्कराक्ष्य तथा बुडिल नामक अश्वतराश्वकां पुत्र आश्वतराश्वि—ये पाँचों ही महाशाल—बड़े कुटुम्बी अर्थात् विस्तृत शालाओंसे युक्त तथा महाश्रोत्रिय अर्थात् श्रुत यानी शास्त्राध्ययन और सदाचारसे सम्पन्न थे । इस प्रकारके वे सब किसी समय आपसमें मिलकर मीमांसा अर्थात् विचार करने लगे ।<br><br>किस प्रकार विचार करने लगे ?—'हमारा आत्मा कौन है ? ब्रह्म क्या है ?' यहाँ 'आत्मा' और 'ब्रह्म' शब्दोंका परस्पर विशेषण-विशेष्यभाव है । 'ब्रह्म' इस शब्दसे श्रुति देह-परिच्छिन्न आत्माके ग्रहणका निवारण करती है तथा 'आत्मा' इस शब्दसे आत्मासे भिन्न आदित्यादि ब्रह्मके उपास्यत्वकी निवृत्ति करती है । अतः दोनोंका अभेद होनेके