भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

तत्सद्ब्रह्मणे नमः

छान्दोग्योपनिषद्

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

सच्चिदानन्दसान्द्राय सर्वातीताय साक्षिणे ।
नमः श्रीदेशिकेन्द्राय शिवायाशिवघातिने ॥

शान्तिपाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

मेरे [हाथ-पाँव आदि] अङ्ग सब प्रकारसे पुष्ट हों, वाणी, प्राण, नेत्र और श्रोत्र पुष्ट हों तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ बल प्राप्त करें । उपनिषदमें प्रतिपादित ब्रह्म ही सब कुछ है । मैं ब्रह्मका निराकरण (त्याग) न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे। इस प्रकार हमारा अनिराकरण (निरन्तर मिलन) हो, अनिराकरण हो । उपनिषदोंमें जो शम आदि धर्म कहे गये हैं वे ब्रह्मरूप आत्मामें निरन्तर रमण करनेवाले मुझमें सदा बने रहें, वे मुझमें सदा बने रहें । आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापकी शान्ति हो ।

प्रथम अध्याय

प्रथम अध्याय


प्रथम खण्ड

सम्बन्ध-भाष्य

संस्कृतहिन्दी
ओमित्येतदक्षरमित्याद्यष्टाध्यायी छान्दोग्योपनिषत् । तस्याः संक्षेपतोऽर्थजिज्ञासुभ्य ऋजुविवरणमल्पग्रन्थमिदमारभ्यते ।<br><br>तत्र सम्बन्धः—समस्तं कर्माधिगतं प्राणादिदेवताविज्ञानसहितमर्चिरादिमार्गेण ब्रह्मप्रतिपत्तिकारणम् । (प्रयोजनम्) केवलं च धूमादिमार्गेण चन्द्रलोकप्रतिपत्तिकारणम् । स्वभावप्रवृत्तानां च मार्गद्वयपरिभ्रष्टानां कष्टाधोगतिरुक्ता ।'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाला यह आठ अध्यायोंका ग्रन्थ छान्दोग्य उपनिषद् है। उसका अर्थ जाननेकी इच्छावालोंके लिये इस छोटे-से ग्रन्थके रूपमें उसकी सरल व्याख्या संक्षेपसे आरम्भ की जाती है।<br><br>वहाँ [कर्मकाण्डके साथ] इसका सम्बन्ध इस प्रकार है—[विहित और निषिद्ध रूपसे] जाने हुए समस्त कर्मका प्राणादि देवताओंके विज्ञानपूर्वक अनुष्ठान करनेपर वह अर्चि आदि (देवयान) मार्गके द्वारा ब्रह्मलोककी प्राप्तिका कारण होता है तथा केवल (उपासनारहित) कर्म धूमादि मार्गसे चन्द्रलोककी प्राप्तिका हेतु होता है। जो इन दोनों मार्गोंसे पतित एवं स्वभावानुसार प्रवृत्त होनेवाले होते हैं उनकी कष्टमयी अधोगति बतलायी गयी है।

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २७


शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
न चोभयोर्मार्गयोरन्यतर-<br>स्मिन्नपि मार्ग आत्यन्तिकी<br>पुरुषार्थसिद्धिरित्यतः कर्मनिर-<br>पेक्षमद्वैतात्मविज्ञानं संसार-<br>गतित्रयहेतूपमर्देन वक्तव्यमित्यु-<br>पनिषदारभ्यते ।इन दोनों मार्गोंमेंसे किसी भी एक मार्गपर रहनेसे आत्यन्तिक पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। अतः संसार-की [उपर्युक्त] त्रिविध गतियोंके हेतु-भूत कर्मका निराकरण करते हुए कर्मकी अपेक्षासे रहित अद्वैत-आत्म-ज्ञानका प्रतिपादन करना है; इसी उद्देश्यसे इस उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है।
न चाद्वैतात्मविज्ञानादन्यत्रा-<br>ज्ञानस्यैव त्यान्तिकी निःश्रेय-<br>मोक्षसाधनत्वम् सम्प्राप्तिः । वक्ष्यति<br>हि—"अथ येऽन्यथातो विदुरन्य-<br>राजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति ।"<br>(छा० उ० ७ । २५ । २)<br>विपर्यये च "स स्वराड्भवति"<br>(छा० उ० ७।२५।२) इति ।अद्वैतात्मविज्ञानके बिना और किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसा कि आगे कहेंगे भी—"जो लोग इस (अद्वैतात्मज्ञान) से विपरीत जानते हैं, वे अन्यराज (अनात्माके अधीन) होते और क्षीण होनेवाले लोकोंमें जाते हैं।" किंतु इससे विपरीत आत्म-ज्ञान होनेपर [श्रुति कहती है कि] "वह स्वराट् होता है।"
तथा द्वैतविषयानृताभिसंधस्य<br>बन्धनं तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे<br>बन्धदाहभावः संसारदुःखप्राप्ति-<br>श्चेत्युक्त्वाद्वैतात्मसत्याभिसंध-इस प्रकार तपे हुए परशुको ग्रहण करनेसे चोरके जलने और बन्धनमें पड़नेके समान द्वैतविषय-रूप मिथ्यामें अभिनिवेश रखनेवाले पुरुषका बन्धन होता है तथा उसे सांसारिक दुःखोंकी प्राप्ति होती है—यह बतलाकर श्रुति

२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

स्यात्तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे बन्धदाहाभावः संसारदुःखनि- वृत्तिर्मोक्षश्चेति ।अद्वैत आत्मारूप परम सत्यमें प्रतीति रखनेवाले पुरुषको, जो पुरुष चोर नहीं है उसके तप्त परशु ग्रहण करनेपर दाह और बन्धन न होनेके समान, संसार-दुःखकी निवृत्ति और मोक्षकी प्राप्ति बतलावेगी ।
कर्मसमुच्चय-निराकरणम् <br> अत एव न कर्मसहभावि- अद्वैतात्मदर्शनम् । क्रियाकारकफलभे- दोपमर्देन "सन्...एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) इत्येवमादिवाक्य- जनितस्य बाधकप्रत्ययानुप- पत्तेः । कर्मविधिप्रत्यय इति चेत् ? न, कर्तृभोक्तृस्वभाव- विज्ञानवतस्तज्जनितकर्मफलरा- गद्वेषादिदोषवतश्च कर्मविधा- नात् ।इसीसे [अर्थात् कर्म और ज्ञान दोनों विरुद्ध फलवाले हैं-ऐसा निश्चय होनेके कारण ही] अद्वैतात्म-दर्शन कर्मके साथ होनेवाला नहीं है । क्योंकि क्रिया, कारक और फलरूप भेदका बाध करके "सत् [ब्रह्म] एक और अद्वितीय है" "यह सब आत्मा ही है" इत्यादि प्रकारके वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले अद्वैत आत्मज्ञानका कोई बाधक प्रत्यय होना सम्भव नहीं है । यदि कहो कि कर्मविधिविषयक ज्ञान ही [उसका बाधक] है तो ऐसा होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि जो अपनेको स्वभावसे ही कर्त्ता-भोक्त्तारूप जानता है और उससे होनेवाले कर्मफलमें रागद्वेषरूप दोषोंसे युक्त है, उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है ।
अधिगतसकलवेदार्थस्य कर्म- विधानादद्वैतज्ञानवतोऽपि कर्मे- ति चेत् ?शङ्का—जो सम्पूर्ण वेदार्थको जानने-वाला है उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है; इसलिये अद्वैतात्मज्ञानी-को भी तो कर्म करना ही चाहिये ?

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
न; कर्माधिकृतविषयस्य कर्तृभोक्त्रादिज्ञानस्य स्वाभाविकस्य “सत्...एकमेवाद्वितीयम्” 'आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यनेनोपमर्दितत्वात् । तस्मादविद्यादिदोषवत एव कर्माणि विधीयन्ते नाद्वैतज्ञानवतः । अत एव हि वक्ष्यति—“सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति” (छा० उ० २।२३।१) इति ।<br><br>(प्रकरणप्रतिपाद्यनिरूपणम्)<br>तत्रैतस्मिन्नद्वैतविद्याप्रकरणेऽभ्युदयसाधनान्युपासनान्युच्यन्ते । कैवल्यसंनिकृष्टफलानि चाद्वैतादीषद्विकृतब्रह्मविषयाणि मनोमयःप्राणशरीर इत्यादीनि, कर्मसमृद्धिफलानि च कर्माङ्गसम्बन्धीनि । रहस्यसामान्यान्मनोवृत्तिसामान्याच्च; यथाऽद्वैतज्ञानं**समाधान—**नहीं, क्योंकि कर्मके अधिकारीसे सम्बन्ध रखनेवाला कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि रूप स्वाभाविक विज्ञान “सत [ ब्रह्म ] एक और अद्वितीय है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि वाक्योंसे बाधित हो जाता है । इसलिये कर्मोंका विधान अविद्यादि दोषवान् पुरुषके लिये ही किया गया है, अद्वैतात्मज्ञानीके लिये नहीं किया गया । इसीलिये श्रुति आगे कहेगी—“ये सब [कर्मकाण्डी] पुण्यलोकोंको प्राप्त होते हैं तथा ब्रह्मनिष्ठ [परमहंस] अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।”<br><br>वहाँ इस अद्वैतविद्याविषयक प्रकरणमें अभ्युदयकी साधनभूता उपासनाएँ बतलायी जाती हैं, जिनका फल कैवल्यमोक्षका समीपवर्ती है और जो अद्वैतब्रह्मकी अपेक्षा 'मनोमयः प्राणशरीरः' इत्यादि वाक्योंके अनुसार कुछ विकारको प्राप्त हुए ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं । वे उपासनाएँ कर्माङ्गसे सम्बद्ध हैं और कर्मफलकी समृद्धि ही उनका फल है । क्योंकि रहस्यमें [ अर्थात् उपनिषद् शब्दसे ज्ञातव्य होनेमें ] तथा मनोवृत्तिरूप होनेमें उन (आत्मज्ञान और उपासनाओं) में समानता है [इसीसे वे उपासनाएँ आत्मविद्याके प्रकरणमें रक्खी गयी हैं] । जिस

३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| मनोवृत्तिमात्रं तथान्यान्यप्युपासनानि मनोवृत्तिरूपाणीत्यस्ति हि सामान्यम्। कस्तर्ह्यद्वैतज्ञानस्योपासनानां च विशेषः? उच्यते— | प्रकार अद्वैतज्ञान मनोवृत्तिमात्र है उसी प्रकार अन्य उपासनाएँ भी मनोवृत्तिरूप ही हैं--यही उन दोनोंकी समानता है। तो फिर अद्वैतज्ञान और उपासनाओंमें अन्तर क्या है? सो बतलाया जाता है— | | ज्ञानोपासनयोर्विशेषः<br>स्वाभाविकस्यात्मन्यक्रियेऽध्यारोपितस्य कर्त्रादिकारकक्रियाफलभेदविज्ञानस्य निवर्तकमद्वैतविज्ञानम्, रज्ज्वादाविव सर्पाद्यध्यारोपलक्षणज्ञानस्य रज्ज्वादिस्वरूपनिश्चयः प्रकाशनिमित्तः। उपासनं तु यथाशास्त्रसमर्थितं किञ्चिदालम्बनमुपादाय तस्मिन् समानचित्तवृत्तिसंतानकरणं तद्विलक्षणप्रत्ययानन्तरितमिति विशेषः। | अद्वैतात्मज्ञान अक्रिय आत्मामें स्वभावसे ही आरोपित कर्ता आदि कारक, क्रिया और फलके भेदज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला है, जिस प्रकार कि प्रकाशके कारण होनेवाला रज्जु आदिके स्वरूपका निश्चय रज्जु आदिमें आरोपित सर्पादिके ज्ञानको निवृत्त कर देता है। किंतु उपासना तो किसी शास्त्रोक्त आलम्बनको ग्रहण कर उसमें विजातीय प्रतीतिसे अव्यवहित सदृश चित्तवृत्तिका प्रवाह करना है—यही इन दोनोंमें अन्तर है। | | तान्येतान्युपासनानि सत्त्वशुद्धिकरत्वेन वस्तुतत्त्वावभासकत्वादद्वैतज्ञानोपकारकाण्यालम्बनविषयत्वात्सुसाध्यानि चेति पूर्वमुपन्यस्यन्ते। तत्र कर्माङ्गा- | वे ये उपासनाएँ चित्तशुद्धि करनेवाली होनेसे वस्तुतत्त्वकी प्रकाशिका होनेके कारण अद्वैतज्ञानमें उपकारिणी हैं तथा आलम्बनयुक्त होनेके कारण सुगमतासे सम्पन्न की जा सकती हैं—इसीलिये इनका पहले निरूपण किया जाता है। वहाँ [ साधारण पुरुषोंमें ] |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१


सस्य दृढीभूतत्वात्कर्मपरित्यागेनोपासन एव दुःखं चेतःसमर्पणं कर्तुमिति कर्माङ्गविषयमेव तावदादावुपासनमुपन्यस्यते—कर्माभ्यासकी दृढ़ता होनेके कारण कर्मका परित्याग करके उपासनामें ही चित्तको लगाना अत्यन्त कठिन है। इसीसे सबसे पहले कर्माङ्ग-सम्बन्धिनी उपासनाका ही उल्लेख किया जाता है—

उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥

ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिये । 'ॐ' ऐसा [उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता] उद्गान ( उच्चस्वरसे सामगान ) करता है । उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमित्येतदक्षरं परमात्मनोऽभिधानं नेदिष्ठम् । तस्मिन्हि प्रयुज्यमाने स प्रसीदति प्रियनामग्रहण इव लोकः । तदिहेतिपरं प्रयुक्तमभिधायकत्वाद्व्यावर्तितं शब्दस्वरूपमात्रं प्रतीयते । तथा चार्चादिवत्परस्यात्मनःउद्गीथशब्दवाच्य 'ॐ' इस अक्षरकी उपासना करे—'ॐ' यह अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती ( प्रियतम ) नाम है । उसका प्रयोग (उच्चारण) किया जानेपर वह प्रसन्न होता है, जिस प्रकार कि साधारण लोग अपना प्रिय नाम उच्चारण करनेपर प्रसन्न होते हैं । वह ओंकार यहाँ ( इस मन्त्रमें ) इतिपरक ( जिसके आगे 'इति' शब्द है; ऐसा ) प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् परमात्माका अभिधायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा व्यावर्तित ( पृथक् निर्दिष्ट ) होकर वह केवल शब्दस्वरूपसे प्रतीत होता है और इस प्रकार वह मूर्ति

३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| प्रतीकं सम्पद्यते। एवं नामत्वेन प्रतीकत्वेन च परमात्मोपासनसाधनं श्रेष्ठमिति सर्ववेदान्तेष्ववगतम्। जपकर्मस्वाध्यायाद्यन्तेषु च बहुशः प्रयोगात्प्रसिद्धमस्य श्रैष्ठ्यम्। <br><br> अतस्तदेतदक्षरं वर्णात्मकमुद्गीथभक्त्यवयवत्वादुद्गीथशब्दवाच्यमुपासीत। कर्माङ्गावयवभूत ॐकारे परमात्मप्रतीके दृढामैकाग्र्यलक्षणां मतिं संतनुयात्। स्वयमेव श्रुतिरोङ्कारस्योद्गीथशब्दवाच्यत्वे हेतुमाह—ओमिति ह्युद्गायति। ओमित्यारभ्य हि यस्मादुद्गायत्यत उद्गीथ ओङ्कार इत्यर्थः। | आदिके समान परमात्माका प्रतीक ही सिद्ध होता है। इस तरह नाम और प्रतीकरूपसे वह परमात्माकी उपासनाका उत्तम साधन है—ऐसा सम्पूर्ण वेदान्त-ग्रन्थोंमें विदित है। जप, कर्म और स्वाध्यायके आदि एवं अन्तमें इसका बहुधा प्रयोग होनेके कारण ❁ इसकी श्रेष्ठता प्रसिद्ध है। <br><br> अतः वह यह वर्णरूप अक्षर उद्गीथभक्तिका अवयव होनेके कारण 'उद्गीथ' शब्दवाच्य है, इसकी उपासना करे। अर्थात् [ उद्गीथ- ] कर्मके अङ्गभूत और परमात्माके प्रतीकस्वरूप ओंकारमें सुदृढ़ एकाग्रतारूप बुद्धिको अविच्छिन्न भावसे संयुक्त करे। ओंकारके 'उद्गीथ' शब्दवाच्य होनेमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है—'ॐ' ऐसा कहकर उद्गान करता है—क्योंकि उद्गाता 'ॐ' इस अक्षरसे आरम्भ करके उद्गान करता है, इसलिये ओंकार उद्गीथ है। |

❁ जैसा कि भगवान्‌ने भी कहा है—
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ ( गीता १७ । २४ )
'इसलिये वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।'

† सामवेदीय स्तोत्रविशेषका नाम 'उद्गीथभक्ति' है। ओंकार उसका अंश है। इसलिये इसे उद्गीथ कहा गया है।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


| तस्योपव्याख्यानम्—तस्याक्षरस्योपव्याख्यानमेवमुपासनमेवंविभूतयेवंफलमित्यादिकथनमुपव्याख्यानम्, प्रवर्तत इति वाक्यशेषः ॥ १ ॥ | [ यहाँ ] उसका उपव्याख्यान आरम्भ किया जाता है—उस अक्षरकी सम्यग् व्याख्या की जाती है । 'इस प्रकार उसकी उपासना होती है, यह उसकी विभूति है और यह फल है,' इत्यादि प्रकारका जो कथन है, उसे उपव्याख्यान कहते हैं । यहाँ 'प्रवर्तते' ( आरम्भ किया जाता है ) यह क्रियापद वाक्यशेष है ॥ १ ॥ |


उद्गीथका रसतमत्व

एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसः ।
अपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो
वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २॥

इन [ चराचर ] प्राणियोंका पृथिवी रस ( उत्पत्ति, स्थिति और लयका स्थान ) है । पृथिवीका रस जल है, जलका रस ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुरुष है, पुरुषका रस वाक् है, वाक्‌का रस ऋक् है, ऋक्‌का रस साम है और सामका रस उद्गीथ है ॥ २ ॥


| एषां चराचराणां भूतानां पृथिवी रसो गतिः परायणमवष्टम्भः । पृथिव्या आपो रसोऽप्सु हि ओता च प्रोता च पृथिवी, अतस्ता रसः पृथिव्याः । अपामोषधयो रसः, अप्परिणामत्वादोषधीनाम् । तासां पुरुषो रसः, अन्नपरिणामत्वात्पुरुषस्य । | इन चराचर भूतोंका पृथिवी रस–गति–परायण अर्थात् आश्रय है । पृथिवीका रस आप् (जल) है, क्योंकि पृथिवी जलमें ही ओतप्रोत है; इसलिये वह पृथिवीका रस है । जलका रस ओषधियाँ हैं, क्योंकि ओषधियाँ जलका ही परिणाम हैं । उन ( ओषधियों ) का रस पुरुष है, क्योंकि पुरुष ( नरदेह ) अन्नका ही परिणाम है । |

३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| तस्यापि पुरुषस्य वाग्रसः, पुरुषावयवाना हि वाक्सारिष्ठा, अतो वाक् पुरुषस्य रस उच्यते। <br><br> तस्या अपि वाच ऋग्रसः सारतरा। ऋचः साम रसः सारतरम्। तस्यापि साम्न उद्गीथः प्रकृतत्वादोंकारः सारतरः ॥२॥ <br><br> एवम्— | उस पुरुषका भी रस वाक् है। पुरुषके अवयवोंमें वाक् ही सबसे अधिक सार वस्तु है, इसलिये वाक् पुरुषका रस कही जाती है। उस वाणीका भी उससे अधिक सारभूत ऋक् ही रस है, ऋक्का रस साम है जो उससे भी अधिक सारतर वस्तु है तथा उस सामका भी रस उद्गीथ (ॐकार) है। यहाँ उद्गीथ शब्दसे ओंकार ही लेना चाहिये; क्योंकि उसीका प्रकरण है, यह सामसे भी सारतर है ॥ २ ॥ <br><br> इस प्रकार — |

स एष रसानाँ२ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो यदुद्गीथः ॥ ३ ॥

यह जो उद्गीथ है वह सम्पूर्ण रसोंमें रसतम, उत्कृष्ट, परमात्माका प्रतीक होने योग्य और पृथिवी [आदि रसोंमें] आठवाँ है ॥ ३ ॥

| स एष उद्गीथाख्य ॐकारो भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामतिशयेन रसो रसतमः परमः परमात्मप्रतीकत्वात्। परार्ध्यः-अर्धं स्थानं परं च तदर्धं च परार्धं तदर्हतीति परार्ध्यः परमात्मस्थानार्हः परमात्मवदुपास्यत्वादित्यभिप्रायः। अष्टमः पृथिव्यादिरससंख्यायां यदुद्गीथो य उद्गीथः ॥ ३ ॥ | वह यह उद्गीथसंज्ञक ओंकार भूत आदिके उत्तरोत्तर रसोंमें अतिशय रस अर्थात् रसतम है, परमात्माका प्रतीक होनेके कारण परम (उत्कृष्ट) है, परार्ध्य है--अर्ध कहते हैं स्थानको जो पर होते हुए अर्ध भी हो उसका नाम परार्ध है, उसके योग्य होनेसे यह परार्ध्य है; तात्पर्य यह है कि परमात्माके समान उपासनीय होनेके कारण यह परमात्माका आलम्बन होने योग्य है। तथा यह जो उद्गीथ है पृथिवी आदि रसोंकी गणनामें आठवाँ है॥३॥ |

खण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ [३५


उद्गीथोपासनान्तर्गत ऋक्, साम और उद्गीथका निर्णय

वाच ऋग्रस इत्युक्तम्—वाणीका रस ऋक् है—ऐसा कहा गया—

कतमा कतमर्क्तमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥ ४ ॥

अब यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन-सा ऋक् है, कौन-कौन-सा साम है और कौन-कौन-सा उद्गीथ है ? ॥ ४ ॥

सा कतमा ऋक् ? कतम-<br>त्तत्साम ? कतमो वा स उद्गीथः ?<br>कतमा कतमेति वीप्सादरार्था ।कौन-सी वह ऋक् है, कौन-सा<br>वह साम है और कौन-सा वह<br>उद्गीथ है? 'कतमा-कतमा' (कौन-<br>कौन) यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ।
ननु 'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच् ।' न ह्यत्र ऋग्जाति-<br>बहुत्वम्, कथं डतमच्प्रयोगः ?शङ्का—'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच्' *(५।३।९३) इस<br>पाणिनीय सूत्रके अनुसार अनेक<br>जातिके लोगोंमेंसे किसी एक जातिका<br>निश्चय करनेके लिये प्रश्न होनेपर<br>'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग इष्ट माना<br>गया है, किंतु यहाँ ऋग्जातिकी बहु-<br>लता सम्भव नहीं है, फिर 'डतमच'<br>प्रत्ययका प्रयोग कैसे किया गया ?

* इस सूत्रका तात्पर्य यह है कि जहाँ विभिन्न जातियोंके अनेक पदार्थ होते हैं वहाँ किसी एक जातिके पदार्थका निश्चय करनेके लिये प्रश्न उपस्थित होनेपर 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग किया जाता है । जिस प्रकार कठ आदि बहुत सी वेदशाखाएँ हैं, उनका स्वाध्याय करनेवाले द्विज लोगोंकी जाति उन्हीं शाखाओंके नामसे प्रसिद्ध हुई है । उनमेंसे कठ जातिका निश्चय करनेके लिये ही 'कतमः कठः' ऐसा प्रश्न किया जा सकता है । परंतु यहाँ तो ऋग्वेद एक ही जाति है, फिर इसमें 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग कैसे हो सकता है ?

छा० उ० २—

३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]

३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
नैष दोषः; जातौ परिप्रश्नो जातिपरिप्रश्न इत्येतस्मिन्विग्रहे जातावृगव्यक्तीनां बहुत्वोपपत्तेः। न तु जातेः परिप्रश्न इति विगृह्यते।समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि 'जातिपरिप्रश्न' इस पदका 'जातिमें परिप्रश्न' ऐसा विग्रह करनेपर ऋक् जातिमें ऋक् व्यक्तियों (विभिन्न ऋचाओं) की अनेकता तो सम्भव है ही; यहाँ 'जातिका परिप्रश्न' ऐसा विग्रह नहीं किया जाता।
ननु जातेः परिप्रश्न इत्यस्मिन् विग्रहे कतमः कठ इत्याद्युदाहरणमुपपन्नम्, जातौ परिप्रश्न इत्यत्र तु न युज्यते।शङ्का— किंतु 'जातिका परिप्रश्न' ऐसा विग्रह करनेपर ही 'कतमः कठः' (आपमें कठशाखावाला कौन है ?) इत्यादि उदाहरण सम्भव हो सकता है, 'जातिमें परिप्रश्न' ऐसा विग्रह होनेपर यह उदाहरण नहीं दिया जा सकता।
तत्रापि कठादिजातावेव व्यक्तिबहुत्वाभिप्रायेण परिप्रश्न इत्यदोषः। यदि जातेः परिप्रश्नः स्यात्कतमा कतमर्गित्यादावुपसंख्यानं कर्तव्यं स्यात्। विमृष्टं भवति विमर्शः कृतो भवति ॥४॥समाधान— वहाँ भी कठादि जातिमें ही व्यक्तियोंकी बहुलताके अभिप्रायसे ऐसा प्रश्न किया गया है—यह मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता। यदि यह प्रश्न (ऋगादि-) जातिसे सम्बन्ध रखता तो पूर्वोक्त सूत्रसे 'कौन-कौन ऋक् हैं' इत्यादि उदाहरण सिद्ध न होनेके कारण उसके लिये किसी पृथक् सूत्रका विधान किया जाता। * [अब यह] विमृष्ट होता है अर्थात् इसका विचार किया जाता है ॥४॥

* तात्पर्य यह है कि यदि यहाँ जातिमें प्रश्न न मानकर जातिसम्बन्धी प्रश्न माना जाय तो 'कौन-कौन ऋक् हैं?' यह प्रश्न असंगत हो जाता है; क्योंकि ऋक् एक जाति है, उसमें रहनेवाले भिन्न-भिन्न मन्त्रोंकी पृथक्-पृथक् जाति नहीं है। अतः यहाँ ऋक्त्वजातिविशिष्ट मन्तरूप व्यक्तियोंके विषयमें ही प्रश्न किया गया है, ऐसा मानना चाहिये।

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७

विमर्शे हि कृते सति प्रति-वचनोक्तिरुपपन्ना—इस प्रकार विचार करनेपर ही यह प्रतिवचन ( उत्तर ) रूप उक्ति संगत हो सकती है कि—

वागेवर्क् प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ।
तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्व प्राणश्चर्क च साम च ॥५॥

वाक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ॐ यह अक्षर उद्गीथ है । ये जो ऋक् और सामरूप वाक् और प्राण हैं, परस्पर मिथुन (जोड़े) हैं ॥५॥

वागेवर्क् प्राणः साम, ओमि-वाणी ही ऋक् है, प्राण साम है तथा ॐ यह अक्षर उद्गीथ है ।
त्येतदक्षरमुद्गीथ इति । वागृ-इस प्रकार वाक् और ऋक्की एकता होनेपर भी [तीसरे मन्त्रमें बतलाये
चोरेकत्वेऽपि नाष्टमत्वव्याघातः,हुए उद्गीथके] अष्टमत्वका व्याघात नहीं होता, क्योंकि यह पूर्व वाक्यसे
पूर्वस्माद्वाक्यान्तरत्वात्; आप्ति-भिन्न वचन है, 'ओमित्येतदक्षर-मुद्गीथः' यह वचन ओंकारके व्याप्ति-
गुणसिद्धये हि ओमित्येतदक्षर-गुणकी सिद्धिके लिये प्रयुक्त हुआ है [और द्वितीय मन्त्र उसके रसतम-
मुद्गीथ इति ।त्वका प्रतिपादन करनेके लिये है] ।
वाक्प्राणावृक्सामयोनी इतिवाक् और प्राण क्रमशः ऋक् और सामके कारण हैं । इसलिये
वागेवर्क प्राणः सामेत्युच्यते ।वाक् ही ऋक् है और साम प्राण हैं—ऐसा कहा जाता है । क्रमशः ऋक्
यथाक्रममृक्सामयोन्योर्वाक्प्राण-और सामके कारणरूप वाक् और प्राणका ग्रहण करनेसे
योर्ग्रहणे हि सर्वांसामृचां सर्वेषांसम्पूर्ण ऋक् और सम्पूर्ण सामका
च साम्नामवरोधः कृतः स्यात् ।अन्तर्भाव हो जाता है, तथा

३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
सर्वर्क्सामावरोधे चर्क्सामसाध्यानां सर्वकर्मणामवरोधः कृतः स्यात्। तदवरोधे च सर्वे कामा अवरुद्धाः स्युः। ओमित्येतदक्षरमुद्गीथ इति भक्त्याशङ्का निवर्त्यते।<br><br>तद्वा एतदिति मिथुनं निर्दिश्यते किं तन्मिथुनम्? इत्याह—<br><br>यद्वाक्च प्राणश्च सर्वर्क्सामकारणभूतौ मिथुनम्। ऋक्च साम चेति ऋक्सामकारणावृक्सामशब्दोक्तावित्यर्थः। न तु स्वातन्त्र्येण ऋक्च साम च मिथुनम्। अन्यथा हि वाक्च प्राणश्चेत्येकं मिथुनमृक्साम चापरं मिथुनमिति द्वे मिथुने स्याताम्। तथा चतद्वैतन्मिथुनमित्येकवचननिर्देशोऽनुपपन्नः स्यात्। तस्मादृक्सामयोन्योर्वाक्प्राणयोरेव मिथुनत्वम्॥ ५ ॥सम्पूर्ण ऋक् और सम्पूर्ण सामका अन्तर्भाव होनेपर ऋक् और सामसे सिद्ध होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंका अन्तर्भाव हो जाता है, और उनका अन्तर्भाव होनेपर समस्त कामनाएँ उनके अन्तर्भूत हो जाती हैं।※<br><br>'उद्गीथ' शब्दसे सम्पूर्ण उद्गीथ-भक्ति न ले ली जाय, इस आशङ्काको 'ओम्' यह अक्षर ही उद्गीथ है' ऐसा कहकर निवृत्त किया जाता है।<br><br>'तद्वा एतत्' इत्यादि वाक्यसे मिथुनका निर्देश किया जाता है। वह मिथुन कौन है? यह बतलाते हैं यह जो सम्पूर्ण ऋक् और सामके कारणभूत वाक् और प्राण हैं मिथुन हैं। 'ऋक् च साम च' इसमें ऋक् और सामके कारण ही ऋक् और साम शब्दोंसे कहे गये हैं। ऋक् और साम स्वतन्त्रतासे मिथुन नहीं हैं; नहीं तो वाक् और प्राण यह एक मिथुन तथा ऋक् और साम-यह दूसरा मिथुन इस प्रकार दो मिथुन होते; और ऐसा होनेपर 'तद्वा एतन्मिथुनम्' इस वाक्यमें जो एकवचनका निर्देश किया गया है, वह असंगत हो जाता। अतः ऋक् और सामके कारणभूत वाक् और प्राण ही मिथुन हैं॥ ५ ॥

※ इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिका कारण होनेवाला ओंकार व्याप्तिगुणविशिष्ट है—यह सिद्ध होता है।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३९


ॐ.. में संसृष्ट मिथुनके समागमका फल

तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् ॥ ६ ॥

वह यह मिथुन ॐ इस अक्षरमें संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुनके अवयव) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक-दूसरेकी कामनाओंको प्राप्त करानेवाले होते हैं ॥ ६ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तदेतदेवंलक्षणं मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते । एवं सर्वकामावाप्तिगुणविशिष्टं मिथुनमोंकारे संसृष्टं विद्यत इत्योंकारस्य सर्वकामावाप्तिगुणवत्त्वं प्रसिद्धम् । वाङ्मयत्वमोंकारस्य प्राणनिष्पाद्यत्वं च मिथुनेन संसृष्टत्वम् ।वह यह ऐसे लक्षणवाला मिथुन ॐ इस अक्षरमें संयुक्त होता है । इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त मिथुन ओंकारमें संयुक्त रहता है, इसलिये ओंकारका सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त होना सिद्ध होता है । ओंकार वाङ्मय है और प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है—यही उसका मिथुनसे संयुक्त होना है ।
मिथुनस्य कामापयितृत्वं प्रसिद्धमिति दृष्टान्त उच्यते-यथा लोके मिथुनौ मिथुनावयवौ स्त्रीपुंसौ यदा समागच्छतो ग्राम्यधर्मतया संयुज्येयातां तदापयतः प्रापयतोऽन्योन्यस्येतरेतरस्य तौ कामम् । तथा च स्वात्मानुप्रविष्टेन मिथुनेन सर्वकामाप्ति-कामनाओंको प्राप्ति करा देना यह मिथुनका प्रसिद्ध धर्म है—इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है—जिस प्रकार लोकमें मिथुन यानी मिथुनके अवयवभूत स्त्री और पुरुष परस्पर मिलते हैं—ग्राम्यव्यवहार(रति) के लिये आपसमें संसर्ग करते हैं, उस समय वे एक दूसरेकी कामना पूर्ण कर देते हैं । इसी प्रकार अपनेसे अनुप्रविष्ट मिथुनके द्वारा ओंकारका

४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| गुणवत्त्वमोंकारस्य सिद्धमित्य- | सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे | | अभिप्रायः ॥ ६ ॥ | युक्त होना सिद्ध होता है—यह इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥ |


उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना करनेका फल

तदुपासकोऽप्युद्गाता तद्धर्मा भवतीत्याह—उस (ओंकार) का उपासक उद्गाता भी उसीके समान धर्मसे युक्त होता है, यह बतलाया जाता है-

आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ७ ॥

जो विद्वान् (उपासक) इस प्रकार इस उद्गीथरूप अक्षरकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥७॥

आपयिता ह वै कामानां यजमानस्य भवति । य एतदक्षरमेवमाप्तिगुणवदुद्गीथमुपास्ते तस्यैतद्यथोक्तं फलमित्यर्थः । "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" (मं० ब्रा० २०) इति श्रुतेः॥७॥यजमानकी कामनाओंको प्राप्त करा देनेवाला होता है। तात्पर्य यह है कि जो इस प्रकार इस आप्तिगुणवान् अक्षर उद्गीथकी उपासना करता है उसे यह पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है, जैसा कि "उसकी जिस-जिस प्रकार उपासना करता है वैसा ही हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ७ ॥

ओंकारकी समृद्धिगुणवत्ता

समृद्धिगुणवांश्चोंकारः, कथम्ओंकार समृद्धि गुणवाला भी है, सो किस प्रकार ?

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१


तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किं चानुजानात्योमि-
त्येव तदाहं एषा एव समृद्धिर्यदनुज्ञा । समर्धयिता
ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथ-
मुपास्ते ॥ ८ ॥

वह यह ओंकार ही अनुज्ञा (अनुमतिसूचक) अक्षर है। [मनुष्य] किसीको जो कुछ अनुमति देता है तो 'ॐ' (हाँ) ऐसा ही कहता है। यह अनुज्ञा ही समृद्धि है। जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण कामनाओंको समृद्ध करनेवाला होता है ॥ ८ ॥

संस्कृतहिन्दी
तद्वा एतत्प्रकृतमनुज्ञाक्षरम-<br><br>नुज्ञा च साक्षरं च तत् । अनुज्ञा<br><br>चानुमतिरोङ्कार इत्यर्थः । कथ-<br>मनुज्ञा? इत्याह श्रुतिरेव—यद्धि<br>किं च यत्किं च लोके ज्ञानं धनं<br>वानुजानाति विद्वान्धनी वा<br>तत्रानुमतिं कुर्वन्नोमित्येव तदाह।<br><br>तथा च वेदे—"त्रयस्त्रिंशदित्यो-<br>मिति होवाच" (बृ० उ० ३ ।<br>९ । १) इत्यादि । तथा च<br>लोकेऽपि तवेदं धनं गृह्णामीत्युक्त<br>ओमित्येवाह !वह यह ओंकार ही, जिसका प्रक-<br>रण चल रहा है, अनुज्ञाक्षर है। जो<br>अनुज्ञा हो और अक्षर भी हो उसे<br>अनुज्ञाक्षर कहते हैं। अनुज्ञा अनुमति-<br>का नाम है, अर्थात् ॐकार अनुज्ञा<br>है। वह अनुज्ञा किस प्रकार है ?<br>सो स्वयं श्रुति ही बतलाती है—<br>लोकमें कोई विद्वान् या धनी पुरुष<br>जिस किसी ज्ञान अथवा धनके लिये<br>अनुमति देता है तो उस सम्बन्धमें<br>अपनी अनुमति देते हुए वह 'ॐ'<br>ऐसा ही कहता है। तथा वेदमें भी<br>"तैंतीस ऐसा कहनेपर [शाकल्यने]<br>'ॐ' ऐसा कहा" * इत्यादि उदा-<br>हरण हैं और लोकमें भी 'मैं तेरा<br>यह धन लेता हूँ' ऐसा कहनेपर<br>'ॐ' (हाँ) ऐसा ही कहते हैं।

* शाकल्यनामक एक ब्राह्मणने याज्ञवल्क्यसे पूछा कि कितने देवता हैं ? उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा—'तैंतीस' । तब शाकल्यने 'ॐ' ऐसा कहकर अपनी अनुमति प्रकट की । (बृहदारण्यकोपनिषद्)

| ४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |

४२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| अत एषा उ एवैषैव समृद्धि-<br><br>र्यदनुज्ञा; यानुज्ञा स समृद्धिस्त-<br><br>न्मूलत्वादनुज्ञायाः । समृद्धो<br><br>ह्योमित्यनुज्ञां ददाति । तस्मात्<br><br>समृद्धिगुणवानोङ्कार इत्यर्थः ।<br><br>समृद्धिगुणोपासकत्वात्तद्धर्मा सन् समर्धयिता ह वै कामानां यजमानस्य भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यादि पूर्ववत् ॥ ८ ॥ | अतः 'एषा उ एव' अर्थात् यही समृद्धि है। जो कि अनुज्ञा कहलाती है। जो अनुज्ञा है वही समृद्धि है, क्योंकि अनुज्ञा समृद्धिमूलक होती है। समृद्ध पुरुष ही 'ॐ' ऐसी अनुज्ञा देता है। अतः तात्पर्य यह है कि ओंकार समृद्धि गुणवाला है। जो ऐसा जाननेवाला पुरुष इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह समृद्धिगुणयुक्त वस्तुका उपासक होनेके कारण उसके ही समान धर्मवाला होकर अपने यजमानकी कामनाओंको समृद्ध (पूर्ण) करनेवाला होता है—इत्यादि पूर्ववत् जानना चाहिये ॥ ८ ॥ |

ओंकारकी स्तुति

| अथेदानीमक्षरं स्तौत्युपास्य-<br><br>त्वात्प्ररोचनार्थम्, कथम् ? | इसके बाद अब श्रुति उस अक्षर (ॐ) में रुचि उत्पन्न करनेके लिये उसकी स्तुति करती है, क्योंकि वह उपास्य है। कैसे स्तुति करती है, [ यह बताते हैं ]— |

तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्यो-<br> मिति शꣳसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै<br> महिम्ना रसेन ॥ ९ ॥

उस अक्षरसे ही यह [ऋग्वेदादिरूप] त्रयीविद्या प्रवृत्त होती है। 'ॐ' ऐसा कहकर ही [अध्वर्यु] आश्रावण कर्म करता है, 'ॐ' ऐसा कहकर ही होता शंसन करता है तथा 'ॐ' ऐसा कहकर ही उद्गाता उद्गान करता है। इस अक्षर [परमात्मा] की पूजाके लिये ही [सम्पूर्ण वैदिक कर्म हैं] तथा इसीकी महिमा और रस (व्रीहि-यवादि हवि) के द्वारा [सब कर्म प्रवृत्त होते हैं] ॥ ९ ॥

खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४३
शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
तेनाक्षरेण प्रकृतेनेयमृग्वेदा-<br>दिलक्षणा त्रयीविद्या त्रयी-<br>विद्याविहितं कर्मेत्यर्थः । न हि<br>त्रयीविद्यैवांश्रावणादिभिर्वर्तते ।<br>कर्म तु तथा प्रवर्तत इति प्रसि-<br>द्धम्। कथम् ? ओमित्याश्रावयत्यो-<br>मिति शंसत्योमित्युद्गायतीति<br>लिङ्गाच्च सोमयाग इति गम्यते ।<br>तच्च कर्मैतस्यैवाक्षरस्यापचि-<br>त्यै पूजार्थम् । परमात्मप्रतीकं<br>हि तत् । तदपचितिः परमात्मन<br>एव सा । “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य<br>सिद्धिं विन्दति मानवः” (गीता<br>१८ । ४६) इति स्मृतेः ।<br>किं चैतस्यैवाक्षरस्य महिम्ना<br>महत्त्वेन ऋत्विग्यजमानादि-उस प्रकृत अक्षरसे ही यह ऋग्वेदादिरूप त्रयीविद्या अर्थात् त्रयीविद्यासे विधान किया हुआ कर्म प्रवृत्त होता है, क्योंकि आश्रावण आदि कर्मोंद्वारा स्वयं त्रयीविद्या ही प्रवृत्त नहीं हुआ करती । हाँ, यह प्रसिद्ध ही है कि कर्म इस प्रकार प्रवृत्त हुआ करता है। किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] ॐ ऐसा कहकर [अध्वर्यु ] आश्रावण करता है, ॐ ऐसा कहकर [होता] शंसन करता है और ॐ ऐसा कहकर [उद्गाता] उद्गान करता है । इस प्रकार आश्रावण आदि तीनों कर्मोंके समाहाररूप लिङ्ग* (लक्षण) से जाना जाता है कि यह सोमयागका वर्णन है।<br>तथा वह कर्म भी इस अक्षरकी ही अपचिति—पूजाके लिये है, क्योंकि वह परमात्माका प्रतीक है, अतः उसकी पूजा परमात्माकी ही पूजा है; जैसा कि “अपने कर्मसे उसका पूजन करके मनुष्य सिद्धि लाभ करता है” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है ।<br>तथा इस अक्षरकी महिमा—महत्त्व, यानी ऋत्विज् एवं यजमान

* अध्वर्यु होता और उद्गाता—इन तीनोंके कर्मोंका समाहार दर्शपूर्णमास आदिमें सम्भव नहीं है । अग्निष्टोम आदि यज्ञोंमें ही जो सोमयागसंस्थाके अन्तर्गत हैं उसकी सम्भावना है । अतः यहाँ उक्त तीनों कार्योंके समाहाररूप लिंग ( लक्षण ) से यह सूचित होता है कि यहाँ ॐकारसे आरम्भ होनेवाले त्रयीविद्या-विहित कर्म-सोमयागका ही वर्णन है ।

४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| प्राणैरित्यर्थः । तथैतस्यैवाक्षरस्य रसेन व्रीहियवादिरसनिर्वृत्तेन हविषेत्यर्थः; यागहोमाद्यक्षरेण क्रियते । तच्चादित्यमुपतिष्ठते । ततो वृष्ट्यादिक्रमेण प्राणोऽन्नं च जायते । प्राणैरन्नेन च यज्ञस्तायते । अत उच्यते 'अक्षरस्य महिम्ना रसेन' इति ॥९॥ | आदिके प्राणोंसे ही तथा इस अक्षरके रस—व्रीहि-यवादिरससे निष्पन्न हुए हविष्यसे ही [वैदिककर्म सम्पन्न होते हैं] । [तो क्या वे प्राण और हवि उस अक्षरके विकार हैं ? इसपर कहते हैं—] वे याग-होमादि इस अक्षरके उच्चारणपूर्वक ही किये जाते हैं । वे कर्म आदित्यको प्राप्त होते हैं । फिर उससे वृष्टि आदि क्रमसे प्राण और अन्नकी उत्पत्ति होती है तथा प्राण और अन्नसे यज्ञका अनुष्ठान किया जाता है। इसीलिये 'इस अक्षरकी महिमासे और रससे' ऐसा कहा गया है ॥९॥ |

उद्गीथविद्याके जानने और न जाननेवालेके कर्मका भेद

| तत्राक्षरविज्ञानवतः कर्म कर्तव्यमिति स्थितमाक्षिपति — | ऐसी अवस्थामें जिसे अक्षर-विज्ञान है उसीको कर्म करना चाहिये—इस अवस्थामें श्रुति आक्षेप करती है— |

तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ।
नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति
श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेत-
स्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥१०॥

जो इस (अक्षर) को इस प्रकार जानता है और जो नहीं जानता वे दोनों ही उसके द्वारा [कर्म] करते हैं । किंतु विद्या और अविद्या—दोनों भिन्न-भिन्न [फल देनेवाली] हैं । जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है वही प्रबलतर होता है, इस प्रकार निश्चय ही यह सब इस अक्षरकी ही व्याख्या है ॥ १० ॥