देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| १६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ | | :--- | :--- |
| गुणा गुणेषु वर्तन्ते भूतानि च तथैव च।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु को दोषस्तत्र चात्मनः॥ ४५ | गुणोंमें गुण, पंचभूतोंमें पंचभूत तथा इन्द्रियोंके विषयोंमें इन्द्रियाँ स्वयं रमण करती हैं; इसमें आत्माका क्या दोष है?॥ ४५॥ | | मर्यादा सर्वरक्षार्थं कृता वेदेषु सर्वशः।<br>अन्यथा धर्मनाशः स्यात्सौगतानामिवानघ॥ ४६<br><br>धर्मनाशे विनष्टः स्याद्वर्णाचारोऽतिवर्तितः।<br>अतो वेदप्रदिष्टेन मार्गेण गच्छतां शुभम्॥ ४७ | हे पवित्रात्मन्! सबकी सुरक्षाके लिये वेदोंमें सब प्रकारसे मर्यादाकी व्यवस्था की गयी है। यदि ऐसा न होता तो नास्तिकोंकी भाँति सब धर्मोंका नाश हो जाता। धर्मके नष्ट हो जानेपर सब कुछ नष्ट हो जायगा और सब वर्णोंकी आचार-परम्पराका उल्लंघन हो जायगा। इसलिये वेदोपदिष्ट मार्गपर चलनेवालोंका कल्याण होता है॥ ४६-४७॥ | | शुक उवाच<br>सन्देहो वर्तते राजन्न निवर्तति मे क्वचित्।<br>भवता कथितं यत्तच्छृण्वतो मे नराधिप॥ ४८ | शुकदेवजी बोले—हे राजन्! आपने जो बात कही उसे सुनकर भी मेरा सन्देह बना हुआ है; वह किसी प्रकार भी दूर नहीं होता॥ ४८॥ | | वेदधर्मेषु हिंसा स्यादधर्मबहुला हि सा।<br>कथं मुक्तिप्रदो धर्मो वेदोक्तो बत भूपते॥ ४९<br><br>प्रत्यक्षेण त्वनाचारः सोमपानं नराधिप।<br>पशूनां हिंसनं तद्वद्भक्षणं चामिषस्य च॥ ५०<br><br>सौत्रामणौ तथा प्रोक्तः प्रत्यक्षेण सुराग्रहः।<br>द्यूतक्रीडा तथा प्रोक्ता व्रतानि विविधानि च॥ ५१ | हे भूपते! वेदधर्मोंमें हिंसाका बाहुल्य है, उस हिंसामें अनेक प्रकारके अधर्म होते हैं। [ऐसी दशामें] वेदोक्त धर्म मुक्तिप्रद कैसे हो सकता है? हे राजन्! सोमरस-पान, पशुहिंसा और मांस-भक्षण तो स्पष्ट ही अनाचार है। सौत्रामणियज्ञमें तो प्रत्यक्षस्वरूपसे सुराग्रहणका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार द्यूतक्रीड़ा एवं अन्य अनेक प्रकारके व्रत बताये गये हैं॥ ४९-५१॥ | | श्रूयते स्म पुरा ह्यासीच्छशबिन्दुर्नृपोत्तमः।<br>यज्वा धर्मपरो नित्यं वदान्यः सत्यसागरः॥ ५२<br><br>गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता चोत्पथगामिनाम्।<br>यज्ञाश्च विहितास्तेन बहवो भूरिदक्षिणाः॥ ५३ | सुना जाता है कि प्राचीन कालमें शशबिन्दु नामके एक श्रेष्ठ राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, यज्ञपरायण, उदार एवं सत्यवादी थे। वे धर्मरूपी सेतुके रक्षक तथा कुमार्गगामी जनोंके नियन्ता थे। उन्होंने पुष्कल दक्षिणावाले अनेक यज्ञ सम्पादित किये थे॥ ५२-५३॥ | | चर्मणां पर्वतो जातो विन्ध्याचलसमः पुनः।<br>मेघाम्बुप्लावनाज्जाता नदी चर्मण्वती शुभा॥ ५४ | [उन यज्ञोंमें] पशुओंके चर्मसे विन्ध्यपर्वतके समान ऊँचा पर्वत-सा बन गया। मेघोंके जल बरसानेसे चर्मण्वती नामकी शुभ नदी बह चली॥ ५४॥ | | सोऽपि राजा दिवं यातः कीर्तिरस्याचला भुवि।<br>एवं धर्मेषु वेदेषु न मे बुद्धिः प्रवर्तते॥ ५५ | वे राजा भी दिवंगत हो गये, किंतु उनकी कीर्ति भूमण्डलपर अचल हो गयी। जब इस प्रकारके धर्मोंका वर्णन वेदमंत्रोंमें/वेदमें है, तब हे राजन्! मेरी श्रद्धाबुद्धि उनमें नहीं है॥ ५५॥ | | स्त्रीसङ्गेन सदा भोगे सुखमाप्नोति मानवः।<br>अलाभे दुःखमत्यन्तं जीवन्मुक्तः कथं भवेत्॥ ५६ | स्त्रीके साथ भोगमें पुरुष सुख प्राप्त करता है और उसके न मिलनेपर वह बहुत दुःखी होता है तो ऐसी दशामें भला वह जीवन्मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ ५६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 D
| अ० १९] | प्रथम स्कन्ध | १६५ |
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| जनक उवाच | जनकजी बोले— |
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| हिंसा यज्ञेषु प्रत्यक्षा साहिंसा परिकीर्तिता।<br>उपाधियोगतो हिंसा नान्यथेति विनिर्णयः॥ ५७ | यज्ञोंमें जो हिंसा दिखायी देती है, वह वास्तवमें अहिंसा ही कही गयी है; क्योंकि जो हिंसा उपाधियोगसे होती है वही हिंसा कहलाती है, अन्यथा नहीं—ऐसा शास्त्रोंका निर्णय है॥ ५७॥ |
| यथा चेन्धनसंयोगादग्नौ धूमः प्रवर्तते।<br>तद्वियोगात्तथा तस्मिन्निर्धूमत्वं विभाति वै॥ ५८<br>अहिंसां च तथा विद्धि वेदोक्तां मुनिसत्तम।<br>रागिणां सापि हिंसैव निःस्पृहाणां न सा मता॥ ५९ | जिस प्रकार [गीली] लकड़ीके संयोगसे अग्निसे धुआँ निकलता है, उसके अभावमें उस अग्निमें धुँआ नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार हे मुनिवर! वेदोक्त हिंसाको भी आप अहिंसा ही समझिये। रागीजनोंद्वारा की गयी हिंसा ही हिंसा है, किंतु अनासक्त जनोंके लिये वह हिंसा नहीं कही गयी है॥ ५८-५९॥ |
| अरागेण च यत्कर्म तथाहङ्कारवर्जितम्।<br>अकृतं वेदविद्वांसः प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६० | जो कर्म रागरहित तथा अहंकाररहित होकर किया जाता हो, उस कर्मको वैदिक विद्वान् मनीषीजन न किये हुएके समान ही कहते हैं॥ ६०॥ |
| गृहस्थानां तु हिंसैव या यज्ञे द्विजसत्तम।<br>अरागेण च यत्कर्म तथाहंकारवर्जितम्॥ ६१<br>साहिंसैव महाभाग मुमुक्षूणां जितात्मनाम्॥ ६२ | हे द्विजश्रेष्ठ! रागी गृहस्थोंके द्वारा यज्ञमें जो हिंसा होती है, वही हिंसा है। हे महाभाग! जो कर्म रागरहित तथा अहंकारशून्य होकर किया जाता है, वह जितात्मा मुमुक्षुजनोंके लिये अहिंसा ही है॥ ६१-६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य जनकोपदेशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः
शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना
| शुक उवाच | शुकदेवजी बोले— |
|---|---|
| सन्देहोऽयं महाराज वर्तते हृदये मम।<br>मायामध्ये वर्तमानः स कथं निःस्पृहो भवेत्॥ १<br>शास्त्रज्ञानं च सम्प्राप्य नित्यानित्यविचारणम्।<br>त्यजते न मनो मोहं स कथं मुच्यते नरः॥ २ | हे महाराज! मेरे हृदयमें यह शंका हो रही है कि मायामें लिप्त रहते हुए कोई मनुष्य निःस्पृह कैसे हो सकता है? शास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नित्यानित्यका विचार करनेपर भी चित्तसे मोह नहीं दूर होता। तब भला वह मनुष्य मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ १-२॥ |
| अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शास्त्राद् बोधो हि न क्षमः।<br>यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया॥ ३<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्तव्यः सर्वदा बुधैः।<br>स कथं राजशार्दूल गृहस्थस्य भवेत्तथा॥ ४ | मनुष्यके मनमें स्थित मोहको दूर करनेके लिये केवल शास्त्रबोध ही समर्थ नहीं हो सकता, जैसे केवल दीप जलानेकी बात करनेसे अन्धकार दूर नहीं होता। अतः बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे कभी किसीसे द्वेष-भाव न रखें, परंतु हे नृपश्रेष्ठ! गृहस्थसे वह कैसे सम्भव है?॥ ३-४॥ |
| १६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| वित्तैषणा न ते शान्ता तथा राज्यसुखैषणा।<br>जयैषणा च सङ्ग्रामे जीवन्मुक्तः कथं भवेः॥ ५ | अभी भी आपकी धनप्राप्तिकी कामना, राज्यसुख तथा युद्धमें विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा शान्त नहीं हुई है, तब आप जीवन्मुक्त कैसे हो सकते हैं? ॥ ५॥ | | चौरेषु चौरबुद्धिस्तु साधुबुद्धिस्तु तापसे।<br>स्वपरत्वं तवाप्यस्ति विदेहस्त्वं कथं नृप॥ ६ | अभी भी चोरोंके प्रति चौरबुद्धि तथा तपस्वीके प्रति साधुबुद्धि आपकी है ही। अपने-परायेका भेदभाव भी अभी आपमें है, तो फिर हे राजन्! आप विदेह कैसे? ॥ ६॥ | | कटुतीक्ष्णकषायाम्लरसान्वेत्सि शुभाशुभान्।<br>शुभेषु रमते चित्तं नाशुभेषु तथा नृप॥ ७ | अभी आप कटु, तिक्त, कसैले एवं खट्टे रसोंका तथा भले-बुरेका ज्ञान रखते ही हैं। हे राजन्! आपका चित्त शुभ कर्मोंमें रमता है, अशुभ कर्मोंमें नहीं। | | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तव राजन् भवन्ति हि।<br>अवस्थास्तु यथाकालं तुरीया तु कथं नृप॥ ८ | जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये अवस्थाएँ अभी आपको समयानुसार होती ही हैं; तब भला आपको तुरीयावस्था कैसे प्राप्त होती होगी? ॥ ७-८॥ | | पदात्यश्वरथेभाश्च सर्वे वै वशगा मम।<br>स्वाम्यहं चैव सर्वेषां मन्यसे त्वं न मन्यसे॥ ९ | हे राजन्! घोड़े, रथ, हाथी तथा पैदल सैनिक—ये सब मेरे अधीन हैं और मैं इन सबका स्वामी हूँ—ऐसा आप अपनेको मानते हैं या नहीं? | | मिष्टमत्सि सदा राजन्मुदितो विमनास्तथा।<br>मालायां च तथा सर्पे समदृक् क्व नृपोत्तम॥ १० | आप मधुर भोजनको प्रसन्नतापूर्वक अथवा बेमनसे खाते ही होंगे। हे नृपश्रेष्ठ! आप माला और सर्पमें क्या समान दृष्टिवाले हैं? ॥ ९-१०॥ | | विमुक्तस्तु भवेद्राजन् समलोष्टाश्मकाञ्चनः।<br>एकात्मबुद्धिः सर्वत्र हितकृत्सर्वजन्तुषु॥ ११ | हे राजन्! विमुक्त पुरुष तो वह कहलाता है, जो मिट्टीके ढेले और स्वर्णको समान समझता हो, सब जीवोंमें एकात्मबुद्धि रखता हो तथा जीवमात्रका उपकार करता हो॥ ११॥ | | न मेऽद्य रमते चित्तं गृहदारादिषु क्वचित्।<br>एकाकी निःस्पृहोऽत्यर्थं चरेयमिति मे मतिः॥ १२ | मेरा मन घर-स्त्री आदिमें कभी नहीं लगता। इसलिये अकेले ही निःस्पृह भावसे मैं सदा विचरण करता रहूँ—यही मेरा विचार है॥ १२॥ | | निःसङ्गो निर्ममः शान्तः पत्रमूलफलाशनः।<br>मृगवद्विचरिष्यामि निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः॥ १३ | निःसंग, ममतारहित और शान्त होकर केवल पत्र, मूल, फल इत्यादि ग्रहण करता हुआ मैं निर्द्वन्द्व एवं अपरिग्रही होकर मृगकी भाँति स्वच्छन्द विचरण करूँगा॥ १३॥ | | किं मे गृहेण वित्तेन भार्यया च सुरूपया।<br>विरागमनसः कामं गुणातीतस्य पार्थिव॥ १४ | हे पार्थिव! गृह, धन तथा रूपवती स्त्रीसे मुझ विरक्तचित्त और गुणातीतका क्या प्रयोजन है? ॥ १४॥ | | चिन्त्यसे विविधाकारं नानारागसमाकुलम्।<br>दम्भोऽयं किल ते भाति विमुक्तोऽस्मीति भाषसे॥ १५ | आप अनेक प्रकारकी राग-द्वेषयुक्त बातें सोचते हैं, फिर भी 'मैं विमुक्त हूँ'—ऐसा आप कहते हैं। यह सब मुझे तो केवल आपका दम्भ ही जान पड़ता है। | | कदाचिच्छत्रुजा चिन्ता धनजा च कदाचन।<br>कदाचित्सैन्यजा चिन्ता निश्चिन्तोऽसि कदा नृप॥ १६ | आपको कभी शत्रुकी, कभी धनकी तथा कभी सेनाकी चिन्ता रहती ही है, तब हे राजन्! आप निश्चिन्त कहाँ? ॥ १५-१६॥ |
| अ० १९ ] | प्रथम स्कन्ध | १६७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| वैखानसा ये मुनयो मिताहारा जितव्रताः।<br>तेऽपि मुह्यन्ति संसारे जानन्तोऽपि ह्यसत्यताम्॥ १७ | स्वल्पाहारी, अटल व्रतवाले जो वैखानस मुनि हैं, वे इस संसारकी अनित्यताको जानते हुए भी इसमें आसक्त हो जाते हैं॥ १७॥ |
| तव वंशसमुत्थानां विदेहा इति भूपते।<br>कुटिलं नाम जानीहि नान्यथेति कदाचन॥ १८ | हे राजन्! आपके वंशमें उत्पन्न सभी राजाओंका नाम विदेह—यह हो जाता है, इसमें भी आप धोखा समझिये, दूसरा कुछ नहीं॥ १८॥ |
| विद्याधरो यथा मूर्खो जन्मान्धस्तु दिवाकरः।<br>लक्ष्मीधरो दरिद्रश्च नाम तेषां निरर्थकम्॥ १९<br><br>तव वंशोद्भवा ये ये श्रुताः पूर्वे मया नृपाः।<br>विदेहा इति विख्याता नामतः कर्मतो न ते॥ २० | जिस प्रकार किसी मूर्खका नाम विद्याधर, जन्मान्धका नाम दिवाकर तथा सतत दरिद्री मनुष्यका नाम लक्ष्मीधर रखना निरर्थक है, उसी प्रकार पूर्वकालमें आपके वंशमें उत्पन्न जिन-जिन राजाओंको मैंने सुना है, वे नामसे ही विदेह प्रसिद्ध हुए हैं कर्मसे नहीं॥ १९-२०॥ |
| निमिनामाभवद्राजा पूर्वं तव कुले नृप।<br>यज्ञार्थं स तु राजर्षिर्वसिष्ठं स्वगुरुं मुनिम्॥ २१<br><br>निमन्त्रयामास तदा तमुवाच नृपं मुनिः।<br>निमन्त्रितोऽस्मि यज्ञार्थं देवेन्द्रेणाधुना किल॥ २२<br><br>कृत्वा तस्य मखं पूर्णं करिष्यामि तवापि वै।<br>तावत्कुरुष्व राजेन्द्र सम्भारं तु शनैः शनैः॥ २३ | हे नृप! आपके कुलमें पहले निमि नामके राजा हो चुके हैं। उन राजर्षिने एक बार अपने गुरु वसिष्ठमुनिको यज्ञके लिये निमन्त्रित किया। उस समय वसिष्ठजीने उनसे कहा कि आपसे पहले इन्द्रने मुझे यज्ञके लिये आमन्त्रित कर रखा है। इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न कराकर मैं आपका भी यज्ञ पूर्ण करूँगा। अतः हे राजेन्द्र! तब तक आप धीरे-धीरे यज्ञ-सामग्री एकत्र कराइये॥ २१—२३॥ |
| इत्युक्त्वा निर्ययौ सोऽथ महेन्द्रयजने मुनिः।<br>निमिरन्यं गुरुं कृत्वा चकार मखमुत्तमम्॥ २४ | ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि इन्द्रका यज्ञ करानेके लिये चले गये और महाराज निमिने किसी दूसरेको आचार्य बनाकर अपना उत्तम यज्ञ सम्पन्न कर लिया॥ २४॥ |
| तच्छ्रुत्वा कुपितोऽत्यर्थं वसिष्ठो नृपतिं पुनः।<br>शशाप च पतत्वद्य देहस्ते गुरुलोपक॥ २५ | यह सुनकर वसिष्ठजी राजापर अत्यन्त क्रोधित हुए और उन्हें शाप देते हुए बोले—'हे गुरुका परित्याग करनेवाले! तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाय'॥ २५॥ |
| राजापि तं शशापाथ तवापि च पतत्वयम्।<br>अन्योन्यशापात्पतितौ तावेव च मया श्रुतम्॥ २६ | यह सुनकर महाराज निमिने भी शाप दिया कि आपका भी शरीर नष्ट हो जाय। इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरेके शापसे नष्ट हो गये—ऐसा मैंने सुना है॥ २६॥ |
| विदेहेन च राजेन्द्र कथं शप्तो गुरुः स्वयम्।<br>विनोद इव मे चित्ते विभाति नृपसत्तम॥ २७ | हे राजेन्द्र! विदेह होकर भी राजाने अपने गुरुको स्वयं शाप क्यों दे डाला! हे नृपश्रेष्ठ! यह तो मेरे मनमें परिहास-जैसा प्रतीत हो रहा है॥ २७॥ |
| जनक उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चिदिदं मतम्।<br>तथापि शृणु विप्रेन्द्र गुरुर्मम सुपूजितः॥ २८ | जनकजी बोले—हे विप्रवर! आपने ठीक ही कहा है; इसमें मिथ्या कुछ भी नहीं है—ऐसा मैं मानता हूँ। फिर भी आप मेरी बात सुनें। हे विप्रेन्द्र! |
१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितुः सङ्गं परित्यज्य त्वं वनं गन्तुमिच्छसि।<br>मृगैः सह सुसम्बन्धो भविता ते न संशयः॥ २९ | गुरु व्यासजी मेरे परम पूज्य हैं। उन अपने पिताका साथ त्याग करके आप वनमें जाना चाहते हैं। वहाँ भी तो मृग आदि पशुओंके साथ आपका स्नेह-सम्बन्ध रहेगा ही; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९॥ |
| महाभूतानि सर्वत्र निःसङ्गः क्व भविष्यसि।<br>आहारार्थं सदा चिन्ता निश्चन्तः स्याः कथं मुने॥ ३० | पृथ्वी, जल आदि महाभूत तो सर्वत्र ही विद्यमान हैं। तब आप निःसंग कैसे हो पायेंगे ? और फिर हे मुने! भोजन आदिकी भी चिन्ता रहेगी ही, तो आप निश्चिन्त कैसे रहेंगे ?॥ ३०॥ |
| दण्डाजिनकृता चिन्ता यथा तव वनेऽपि च।<br>तथैव राज्यचिन्ता मे चिन्तयानस्य वा न वा॥ ३१ | जिस प्रकार आपको वनमें दण्ड और मृगचर्मकी चिन्ता बनी रहेगी, उसी प्रकार मुझ विचारशील राजाको भी राज्यसम्बन्धी चिन्ता तो होगी ही॥ ३१॥ |
| विकल्पोपहतस्त्वं वै दूरदेशमुपागतः।<br>न मे विकल्पसन्देहो निर्विकल्पोऽस्मि सर्वथा॥ ३२ | आप ही भ्रममें पड़कर यहाँतक दूर देशमें आये हैं। मुझे किसी प्रकारका विकल्परूपी सन्देह नहीं है; क्योंकि मैं तो सर्वथा निर्विकल्प हूँ॥ ३२॥ |
| सुखं स्वपिमि विप्राहं सुखं भुञ्जामि सर्वथा।<br>न बद्धोऽस्मीति बुद्ध्याहं सर्वदैव सुखी मुने॥ ३३<br><br>त्वं तु दुःखी सदैवासि बद्धोऽहमिति शङ्कया।<br>इति शङ्कां परित्यज्य सुखी भव समाहितः॥ ३४ | हे विप्र! मैं सुखसे भोजन करता हूँ और सुखपूर्वक शयन करता हूँ। हे मुने! 'मैं बद्ध नहीं हूँ' इस भावनासे मैं सर्वदा सुखी रहता हूँ। [इसके विपरीत] 'मैं बद्ध हूँ'—इस शंकासे आप सर्वदा दुःखी ही रहते हैं, अतः आप इस शंकाको छोड़कर सदा सुखी एवं स्वस्थ हो जाइये॥ ३३-३४॥ |
| देहोऽयं मम बन्धोऽयं न ममेति च मुक्तता।<br>तथा धनं गृहं राज्यं न ममेति च निश्चयः॥ ३५ | यह शरीर मेरा है—यही बन्धनका कारण है; यह मेरा नहीं है—ऐसा निश्चय ही मुक्ति है। यह गृह, सम्पत्ति, राज्य मेरा नहीं है—ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है॥ ३५॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शुकः प्रीतमनाभवत्।<br>आपृच्छ्य तं जगामाशु व्यासस्याश्रममुत्तमम्॥ ३६ | सूतजी बोले—महाराज जनककी बात सुनकर शुकदेवजी हर्षित हुए और उनसे आज्ञा लेकर व्यासजीके उत्तम आश्रमके लिये चल पड़े॥ ३६॥ |
| आगच्छन्तं सुतं दृष्ट्वा व्यासोऽपि सुखमाप्तवान्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं पप्रच्छ कुशलं पुनः॥ ३७ | व्यासजीने अपने ज्ञानी पुत्रको आते देखकर सुख प्राप्त किया। उन्होंने शुकदेवजीको हृदयसे लगाकर तथा उनका सिर सूँघकर उनकी कुशलता पूछी॥ ३७॥ |
| स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये पितुः पार्श्वे समाहितः।<br>वेदाध्ययनसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः॥ ३८<br><br>जनकस्य दशां दृष्ट्वा राज्यस्थस्य महात्मनः।<br>स निर्वृतिं परां प्राप्य पितुराश्रमसंस्थितः॥ ३९ | सब शास्त्रोंमें कुशल एवं वेदाध्ययनमें तत्पर श्रीशुक-देवजी अपने पिताके साथ उस रमणीय आश्रममें सावधान होकर रहने लगे। राज्य करते हुए महात्मा जनककी वह विदेहावस्था देखकर शुकदेवजी परम शान्तिको प्राप्तकर अपने पिताके आश्रममें ही स्थित हो गये॥ ३८-३९॥ |
| अ० १९ ] | प्रथम स्कन्ध | १६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितॄणां सुभगा कन्या पीवरी नाम सुन्दरी।<br>शुकश्चकार पत्नीं तां योगमार्गस्थितोऽपि हि॥ ४०<br>स तस्यां जनयामास पुत्रांश्चतुर एव हि।<br>कृष्णं गौरप्रभं चैव भूरिं देवश्रुतं तथा॥ ४१<br>कन्यां कीर्तिं समुत्पाद्य व्यासपुत्रः प्रतापवान्।<br>ददौ विभ्राजपुत्राय त्वणुहाय महात्मने॥ ४२ | योगमार्गमें स्थित रहते हुए भी शुकदेवजीने पितरोंकी पीवरी नामकी सौभाग्यवती सुन्दर कन्याको पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया। उन्होंने उससे कृष्ण, गौरप्रभ, भूरि और देवश्रुत नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही उन प्रतापी व्याससुत शुकदेवजीने कीर्ति नामकी एक कन्या उत्पन्न करके उस कन्याका विवाह विभ्राजके पुत्र महात्मा अणुहके साथ कर दिया॥ ४०—४२॥ |
| अणुहस्य सुतः श्रीमान्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्।<br>ब्रह्मज्ञः पृथिवीपालः शुककन्यासमुद्भवः॥ ४३<br>कालेन कियता तत्र नारदस्योपदेशतः।<br>ज्ञानं परमकं प्राप्य योगमार्गमनुत्तमम्॥ ४४<br>पुत्रे राज्यं निधायाथ गतो बदरिकाश्रमम्।<br>मायाबीजोपदेशेन तस्य ज्ञानं निर्गलम्॥ ४५ | शुकदेवजीकी कन्यासे उत्पन्न अणुहके पुत्र श्रीमान् ब्रह्मदत्त हुए जो बड़े प्रतापी, ब्रह्मज्ञानी एवं पृथ्वीके रक्षक थे। वे कुछ समयके बाद देवर्षि नारदके उपदेशसे और परमश्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान पाकर योगमार्गका आश्रय लेकर राज्यका भार अपने पुत्रको सौंपकर बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ नारदजीके कृपाप्रसादसे प्राप्त मायाबीजके उपदेशसे उन्हें निर्बाध तथा तत्क्षण मुक्तिदायक ज्ञान उत्पन्न हुआ॥ ४३—४५ १/२॥ |
| नारदस्य प्रसादेन जातं सद्यो विमुक्तिदम्।<br>कैलासशिखरे रम्ये त्यक्त्वा सङ्गं पितुः शुकः॥ ४६<br>ध्यानमास्थाय विपुलं स्थितः सङ्गपराङ्मुखः।<br>उत्पपात गिरेः शृङ्गात्सिद्धिं च परमां गतः॥ ४७<br>आकाशगो महातेजा विरराज यथा रविः।<br>गिरेः शृङ्गं द्विधा जातं शुकस्योत्पतने तदा॥ ४८<br>उत्पाता बहवो जाताः शुकश्चाकाशगोऽभवत्।<br>अन्तरिक्षे यथा वायुः स्तूयमानः सुरर्षिभिः॥ ४९<br>तेजसातिविराजन्वै द्वितीय इव भास्करः। | उधर शुकदेवजी भी अपने पिताका साथ त्यागकर कैलासके सुरम्य शिखरपर चले गये और निःसंग भावसे अविचल ध्यान लगाकर स्थित हो गये। कुछ ही दिनोंमें उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी और वे पर्वतके शिखरसे उड़ गये तथा महातेजस्वी वे शुकदेवजी आकाशमें जाकर सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। तब शुकदेवजीके उड़ते ही पर्वत-शिखर दो भागोंमें विभाजित हो गया। शुकदेवजीके आकाशमें जाते ही अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए वे शुकदेवजी अन्तरिक्षमें वायुकी भाँति स्थित हो गये। वे अपने तेजसे दूसरे सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे थे॥ ४६—४९ १/२॥ |
| व्यासस्तु विरहाक्रान्तः क्रन्दन्पुत्रेति चासकृत्॥ ५०<br>गिरेः शृङ्गे गतस्तत्र शुको यत्र स्थितोऽभवत्।<br>क्रन्दमानं तदा दीनं व्यासं मत्वा श्रमाकुलम्॥ ५१<br>सर्वभूतगतः साक्षी प्रतिशब्दमदात्तदा।<br>तत्राद्यापि गिरेः शृङ्गे प्रतिशब्दः स्फुटोऽभवत्॥ ५२ | इसी बीच पुत्रके वियोगसे व्यग्र होकर व्यासजी बार-बार 'हा पुत्र! हा पुत्र!' कहते हुए उस पर्वतकी चोटीपर पहुँचे, जहाँ शुकदेवजी रहते थे। थके हुए व्यासजीको दीन भावसे करुण क्रन्दन करते हुए देखकर सभी जीवोंमें साक्षीरूपसे विद्यमान परमात्माने प्रतिध्वनिके रूपमें उत्तर दिया। आज भी उस पर्वतके शृंगपर वैसी ही प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनायी देती है॥ ५०—५२॥ |
| १७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |
| रुदन्तं तं समालक्ष्य व्यासं शोकसन्वितम्।<br>पुत्र पुत्रेति भाषन्तं विरहेण परिप्लुतम्॥ ५३<br>शिवस्तत्र समागत्य पाराशर्यमबोधयत्।<br>व्यास शोकं मा कुरु त्वं पुत्रस्ते योगवित्तमः॥ ५४<br>परमां गतिमापन्नो दुर्लभां चाकृतात्मभिः।<br>तस्य शोको न कर्तव्यस्त्वयाऽशोकं विजानता॥ ५५<br>कीर्तिस्ते विपुला जाता तेन पुत्रेण चानघ। | अपने प्रिय पुत्र शुकदेवके विरहमें ‘हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहकर विलाप करते हुए व्यासजीको शोक-सन्तप्त देखकर साक्षात् शंकरजी वहाँ आकर उन्हें सान्त्वना देने लगे—‘हे व्यासजी! आप शोक मत कीजिये; आपके पुत्र श्रेष्ठ योगवेत्ता हैं। उन्होंने अकृतात्माओंके लिये भी दुर्लभ परमगति प्राप्त कर ली है। अतः ब्रह्मज्ञान रखनेवाले आपको उन [ब्रह्मज्ञानी] शुकदेवके लिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये; हे पवित्रत्मन्! शुकदेवके समान पुत्रके द्वारा आपकी महान् कीर्ति हुई है’॥ ५३-५५ ½ ॥ | | व्यास उवाच<br>न शोको याति देवेश किं करोमि जगत्पते॥ ५६<br>अतृप्ते लोचने मेऽद्य पुत्रदर्शनलालसे। | व्यासजी बोले—‘हे देवेश! हे जगत्पते! मैं क्या करूँ, शोक दूर नहीं हो रहा है; पुत्र-दर्शनकी लालसावाले मेरे नेत्र अतृप्त हैं’॥ ५६ ½ ॥ | | महादेव उवाच<br>छायां द्रक्ष्यसि पुत्रस्य पार्श्वस्थां सुमनोहराम्॥ ५७<br>तां वीक्ष्य मुनिशार्दूल शोकं जहि परन्तप। | महादेवजी बोले—‘अब आप अपने पुत्रकी रमणीय छाया अपने पास सर्वदा विद्यमान देखेंगे। हे मुनिवर! हे परन्तप! उस छायाको देखकर आप अपना शोक दूर कीजिये’॥ ५७ ½ ॥ | | सूत उवाच<br>तदा ददर्श व्यासस्तु छायां पुत्रस्य सुप्रभाम्॥ ५८<br>दत्त्वा वरं हरस्तस्मै तत्रैवान्तरधीयत।<br>अन्तर्हिते महादेवे व्यासः स्वाश्रममभ्यगात्॥ ५९<br>शुकस्य विरहेणापि तप्तः परमदुःखितः॥ ६० | **सूतजी बोले—**तदनन्तर व्यासजीने अपने पुत्र शुकदेवकी ओजस्विनी छाया देखी। उन्हें वरदान देकर शंकरजी वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीके अन्तर्हित हो जानेपर व्यासजी भी अपने आश्रमको लौट आये। शुकदेवजीके वियोगसे सन्तप्त होकर वे अत्यन्त दुःखी रहने लगे॥ ५८-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य विवाहादिकार्यवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
सत्यवतीका राजा शन्तनुसे विवाह तथा दो पुत्रोंका जन्म, राजा शन्तनुकी मृत्यु, चित्रांगदका राजा बनना तथा उसकी मृत्यु, विचित्रवीर्यका काशिराजकी कन्याओंसे विवाह और क्षयरोगसे मृत्यु, व्यासजीद्वारा धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति
| ऋषय ऊचुः<br>शुकस्तु परमां सिद्धिमाप्तवान्देवसत्तमः।<br>किं चकार ततो व्यासस्तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्॥ १ | ऋषियोंने कहा—[हे सूतजी!] शुकदेवजीको जब परम सिद्धि प्राप्त हो गयी तब देवश्रेष्ठ व्यासजीने क्या किया? यह सब विस्तारपूर्वक हमसे कहिये॥ १॥ | | सूत उवाच<br>शिष्या व्यासस्य येऽप्यासन्वेदाभ्यासपरायणाः।<br>आज्ञामादाय ते सर्वे गताः पूर्वं महीतले॥ २ | **सूतजी बोले—**उस समय व्यासजीके जितने वेदपाठी शिष्य थे, वे सब व्यासजीकी आज्ञा पाकर पहले ही भूमण्डलमें इधर-उधर चले गये थे॥ २॥ |
| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| असितो देवलश्चैव वैशम्पायन एव च।<br>जैमिनिश्च सुमन्तुश्च गताः सर्वे तपोधनाः॥ ३<br><br>तानेतान्वीक्ष्य पुत्रं च लोकान्तरितमप्युत।<br>व्यासः शोकसमाक्रान्तो गमनायाकरोन्मतिम्॥ ४ | असित, देवल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु आदि सभी तपोधन मुनि चले गये थे। उन ऋषियोंको अन्यत्र तथा अपने पुत्र शुकदेवको अन्तरिक्षमें गया हुआ देखकर शोकाकुल व्यासजीने वहाँसे चले जानेका विचार किया॥ ३-४॥ |
| सस्मार मनसा व्यासस्तां निषादसुतां शुभाम्।<br>मातरं जाह्नवीतीरे मुक्तां शोकसमन्विताम्॥ ५ | उसी समय व्यासजीने मन-ही-मन निषादकन्या अपनी कल्याणकारिणी माताका स्मरण किया, जिन्हें उन्होंने शोकावस्थामें गंगाजीके तटपर ही छोड़ दिया था॥ ५॥ |
| स्मृत्वा सत्यवतीं व्यासस्त्यक्त्वा तं पर्वतोत्तमम्।<br>आजगाम महातेजा जन्मस्थानं स्वकं मुनिः॥ ६ | अपनी माता सत्यवतीका स्मरण करके उस श्रेष्ठ पर्वतको त्यागकर महातेजस्वी व्यासजी अपने जन्मस्थानपर चले आये॥ ६॥ |
| द्वीपं प्राप्याथ पप्रच्छ क्व गता सा वरानना।<br>निषादास्तं समाचख्युर्दत्ता राज्ञे तु कन्यका॥ ७<br><br>दाशराजोऽपि सम्पूज्य व्यासं प्रीतिपुरःसरम्।<br>स्वागतेनाभिसत्कृत्य प्रोवाच विहिताञ्जलिः॥ ८ | इस प्रकार उन्होंने उस द्वीपपर जाकर लोगोंसे पूछा कि 'वे सुन्दर मुखवाली [मेरी माता] कहाँ चली गयीं?' तब निषादोंने बताया कि उस कन्याका तो निषादराजने राजा [शन्तनु]-से विवाह कर दिया। तत्पश्चात् निषादराजने व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन एवं सत्कार करके हाथ जोड़कर कहा—॥ ७-८॥ |
| दाशराज उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म पवित्रं नः कुलं मुने।<br>देवानामपि दुर्दर्शं यज्जातं तव दर्शनम्॥ ९ | दाशराज बोला—हे मुने! मेरा जन्म सफल हो गया और हमारा कुल पवित्र हो गया जो कि आज देवताओंके लिये दुर्लभ आपका दर्शन प्राप्त हुआ॥ ९॥ |
| यदर्थमागतोऽसि त्वं तद् ब्रूहि द्विजसत्तम।<br>अपि दारा धनं पुत्रास्त्वदायत्तमिदं विभो॥ १० | हे विप्रवर! आप जिस कामसे आये हैं, वह बताइये। हे विभो! धन, पुत्र, कलत्र आदि—यह सब आपके अधीन है॥ १०॥ |
| सरस्वत्यास्तटे रम्ये चकाराश्रममण्डलम्।<br>व्यासस्तपःसमायुक्तस्तत्रैवास समाहितः॥ ११ | [निषादराजके प्रार्थना करनेपर] व्यासजीने सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर अपना आश्रम बनाया और सावधान-चित्त हो वे पुनः तप करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ११॥ |
| सत्यवत्याः सुतौ जातौ शन्तनोरमितद्युतेः।<br>मत्वा तौ भ्रातरौ व्यासः सुखमाप वने स्थितः॥ १२ | अपूर्व तेजस्वी महाराज शन्तनुको सत्यवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए। इन दोनोंको अपना भाई मानकर वनवासी व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १२॥ |
| चित्राङ्गदः प्रथमो रूपवाञ्छत्रुतापनः।<br>बभूव नृपतेः पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यनामासौ द्वितीयः समजायत।<br>सोऽपि सर्वगुणोपेतः शन्तनोः सुखवर्धनः॥ १४ | उनमें राजाका पहला पुत्र चित्रांगद रूपवान्, शत्रुओंको कष्ट देनेवाला तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। शन्तनुके दूसरे पुत्रका नाम विचित्रवीर्य था। वह भी सर्वगुणसम्पन्न एवं शन्तनुके लिये सुखवर्द्धक हुआ॥ १३-१४॥ |
| १७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| गाङ्गेयः प्रथमस्तस्य महावीरो बलाधिकः।<br>तथैव तौ सुतौ जातौ सत्यवत्यां महाबलौ॥ १५ | इसके पूर्व उन राजा शन्तनुको गंगासे भीष्म नामक बलशाली एवं पराक्रमी पुत्र पैदा हुआ था। उसी प्रकार सत्यवतीसे दो पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए॥ १५॥ |
| शन्तनुस्तान्सुतान्वीक्ष्य सर्वलक्षणसंयुतान्।<br>अमंस्ताजय्यमात्मानं देवादीनां महामनाः॥ १६ | उन सर्वलक्षणसम्पन्न तीनों पुत्रोंको देखकर महामना शन्तनु अपने आपको देवताओंसे अजेय समझने लगे थे॥ १६॥ |
| अथ कालेन कियता शन्तनुः कालपर्ययात्।<br>तत्याज देहं धर्मात्मा देही जीर्णमिवाम्बरम्॥ १७ | कुछ समय बीतनेपर यथासमय धर्मात्मा शन्तनुने उसी प्रकार अपना शरीर त्याग दिया, जिस प्रकार कोई मनुष्य अपना पुराना वस्त्र छोड़ देता है। |
| कालधर्मगते राज्ञि भीष्मश्चक्रे विधानतः।<br>प्रेतकार्याणि सर्वाणि दानानि विविधानि च॥ १८ | शन्तनुके कालके वशीभूत हो जानेपर भीष्मने विधिवत् उनके समस्त प्रेतकार्य किये और विविध प्रकारके दान दिये॥ १७-१८॥ |
| चित्राङ्गदं ततो राज्ये स्थापयामास वीर्यवान्।<br>स्वयं न कृतवान् राज्यं तस्माद्देवव्रतोऽभवत्॥ १९ | तदनन्तर पराक्रमी भीष्मने चित्रांगदको राज्यसिंहासनपर बैठाया। उन्होंने स्वयं राज्य नहीं किया, इसी कारण उनका नाम देवव्रत हुआ॥ १९॥ |
| चित्राङ्गदस्तु वीर्येण प्रमत्तः परदुःखदः।<br>बभूव बलवान्वीरः सत्यवत्यात्मजः शुचिः॥ २० | सत्यवतीपुत्र चित्रांगद बलगर्वित, शत्रुसन्तापकर्ता, बलशाली, वीर तथा पवित्र थे॥ २०॥ |
| अथैकदा महाबाहुः सैन्येन महतावृत्तः।<br>प्रचचार वनोद्देशान्यश्यन्वध्यान्मृगान् रुरून्॥ २१ | महाबाहु चित्रांगद एक बार महान् सेनासे युक्त होकर आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ वध्य रुरुमृगोंको खोजते हुए वे विविध वन-प्रदेशोंमें घूम रहे थे। |
| चित्राङ्गदस्तु गन्धर्वो दृष्ट्वा तं मार्गगं नृपम्।<br>उत्ततारान्तिकं भूमेर्विमानवरमास्थितः॥ २२ | मार्गमें उन राजाको जाता हुआ देखकर चित्रांगद नामक एक गन्धर्व अपने सुन्दर विमानसे भूमिपर उनके समीप उतर पड़ा॥ २१-२२॥ |
| तत्राभूच्च महद्युद्धं तयोः सदृशवीर्ययोः।<br>कुरुक्षेत्रे महास्थाने त्रीणि वर्षाणि तापसाः॥ २३ | **सूतजी बोले—**हे तपस्वियो ! उस समय कुरुक्षेत्रके उस विशाल मैदान में तीन वर्षतक समान बलवाले उन दोनोंमें घमासान युद्ध होता रहा॥ २३॥ |
| इन्द्रलोकमवापाशु गन्धर्वेण हतो रणे।<br>भीष्मः श्रुत्वा चकाराशु तस्यौर्ध्वदैहिकं तदा॥ २४ | अन्तमें उस गन्धर्वके द्वारा राजा चित्रांगद युद्धमें मारे गये और उन्हें शीघ्र ही इन्द्रलोक प्राप्त हुआ। यह सुनकर भीष्मने उसी समय चित्रांगदका और्ध्वदैहिक संस्कार किया॥ २४॥ |
| गाङ्गेयः कृतशोकस्तु मन्त्रिभिः परिवारितः।<br>विचित्रवीर्यनामानं राज्येशं च चकार ह॥ २५ | तत्पश्चात् मन्त्रियोंने भीष्मको समझा-बुझाकर शोकरहित किया। उन्होंने छोटे भाई विचित्रवीर्यको राजा बना दिया॥ २५॥ |
| मन्त्रिभिर्बोधिता पश्चाद् गुरुभिश्च महात्मभिः।<br>स्वपुत्रं राज्यगं दृष्ट्वा पुत्रशोकहतापि च॥ २६ | मन्त्रियों, गुरुजनों एवं महात्माओंके समझानेके बाद शुभलक्षणा राजमाता सत्यवती अपने [ज्येष्ठ] पुत्रकी मृत्युसे शोकाकुल होती हुई भी अपने छोटे पुत्र |
| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सत्यवत्यतिसन्तुष्टा बभूव वरवर्णिनी।<br>व्यासोऽपि भ्रातरं श्रुत्वा राजानं मुदितोऽभवत्॥ २७ | विचित्रवीर्यको राजसिंहासनपर बैठा देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं। व्यासजी भी अपने भ्राताके राजा होनेका समाचार पाकर प्रसन्न हुए॥ २६-२७॥ |
| यौवनं परमं प्राप्तः सत्यवत्याः सुतः शुभः।<br>चकार चिन्तां भीष्मोऽपि विवाहार्थं कनीयसः॥ २८ | जब सत्यवतीके सुन्दर पुत्र विचित्रवीर्य पूर्ण युवा हुए तब भीष्म अपने कनिष्ठ भ्राताके विवाहकी चिन्ता करने लगे॥ २८॥ |
| काशिराजसुतास्तिस्रः सर्वलक्षणसंयुताः।<br>तेन राज्ञा विवाहार्थं स्थापिताश्च स्वयंवरे॥ २९ | उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं—जो सभी शुभलक्षणोंसे युक्त थीं; उन राजाने विवाहके लिये उनका स्वयंवर रचाया॥ २९॥ |
| राजानो राजपुत्राश्च समाहूताः सहस्रशः।<br>इच्छास्वयंवरार्थं वै पूज्यमानाः समागताः॥ ३०<br>तत्र भीष्मो महातेजास्ता जहार बलेन वै।<br>निर्मथ्य राजकं सर्वं रथेनैकेन वीर्यवान्॥ ३१<br>स जित्वा पार्थिवान्सर्वांस्ताश्चादाय महारथः।<br>बाहुवीर्येण तेजस्वी ह्याससाद गजाह्वयम्॥ ३२ | हजारों पूज्यमान राजा तथा राजकुमार आमन्त्रित होकर उस इच्छास्वयंवरमें उपस्थित हुए थे तथा पराक्रमी भीष्मने अकेले ही रथपर बैठकर सभी राजाओंको रौंदकर बलपूर्वक उन कन्याओंका हरण कर लिया। वे महारथी तथा तेजस्वी भीष्म अपने बाहुबलसे उन सभी राजाओंको जीतकर उन कन्याओंको लेकर हस्तिनापुर चले आये॥ ३०—३२॥ |
| मातृवद्भगिनीवच्च पुत्रीवच्चिन्तयन्किल।<br>तिस्रः समानयामास कन्यका वामलोचनाः॥ ३३<br>सत्यवत्यै निवेद्याशु द्विजानाहूय सत्वरः।<br>दैवज्ञान्वेदविदुषः पर्यपृच्छच्छुभं दिनम्॥ ३४ | सुन्दर नेत्रोंवाली उन तीनों राजकुमारियोंमें माता, भगिनी एवं पुत्रीकी भावना रखते हुए भीष्म उन्हें ले आये और उन्हें सत्यवतीको सौंपकर शीघ्रतापूर्वक ज्योतिर्विदों तथा वेदके विद्वान् ब्राह्मणोंको बुलाकर उनसे विवाहका शुभ मुहूर्त पूछा॥ ३३—३४॥ |
| कृत्वा विवाहसम्भारं यदा वै भ्रातरं निजम्।<br>विचित्रवीर्यं धर्मिष्ठं विवाहयति ता यदा॥ ३५<br>तदा ज्येष्ठाप्युवाचेदं कन्यका जाह्नवीसूतम्।<br>लज्जमानासितापाङ्गी तिसृणां चारुलोचना॥ ३६<br>गङ्गापुत्र कुरुश्रेष्ठ धर्मज्ञ कुलदीपक।<br>मया स्वयंवरे शाल्वो वृतोऽस्ति मनसा नृपः॥ ३७<br>वृताहं तेन राज्ञा वै चित्ते प्रेमसमाकुले।<br>यथायोग्यं कुरुष्वाद्य कुलस्यास्य परन्तप॥ ३८<br>तेनाहं वृतपूर्वाऽस्मि त्वं च धर्मभृतां वरः।<br>बलवानसि गाङ्गेय यथेच्छसि तथा कुरु॥ ३९ | विवाहकी तैयारी करके अपने छोटे भाई धर्मात्मा विचित्रवीर्यके साथ उन कन्याओंका विवाह करनेको जब भीष्म उद्यत हुए तब उन तीनोंमें सबसे बड़ी एवं सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याने गंगापुत्र भीष्मसे लज्जित होते हुए इस प्रकार प्रार्थना की। हे गंगापुत्र! हे कुरुश्रेष्ठ! हे धर्मज्ञ! हे कुलदीपक! मैंने स्वयंवरमें मन-ही-मन राजा शाल्वका पतिरूपमें वरण कर लिया था। उन राजाने भी प्रेमपूर्वक हृदयसे मुझे अपनी पत्नी मान लिया था। हे परन्तप! अब आप इस कुलकी परम्पराके अनुसार जैसा उचित हो, वैसा कीजिये। उन्होंने पहलेसे ही मुझे वरण कर लिया है। हे गांगेय! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा बलवान् हैं; आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये॥ ३५—३९॥ |
| सूत उवाच<br>एवमुक्तस्तया तत्र कन्यया कुरुनन्दनः।<br>अपृच्छद् ब्राह्मणान्वृद्धान्मातरं सचिवांस्तथा॥ ४० | सूतजी बोले— इस प्रकार उस कन्याके कहनेपर कुरुनन्दन भीष्मजीने कुलवृद्धों, ब्राह्मणों, माता सत्यवती तथा मन्त्रियोंसे इस विषयमें परामर्श |
| १७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वेषां मतमाज्ञाय गाङ्गेयो धर्मवित्तमः।<br>गच्छेति कन्यकां प्राह यथारुचि वरानने॥ ४१ | किया। सबकी अनुमति प्राप्त करके धर्मज्ञ गङ्गापुत्रने उस कन्यासे कहा—हे वरानने! तुम स्वेच्छापूर्वक जा सकती हो॥ ४०-४१॥ |
| विसर्जिताथ सा तेन गता शाल्वनिकेतनम्।<br>उवाच तं वरारोहा राजानं मनसेप्सितम्॥ ४२<br><br>विनिर्मुक्तास्मि भीष्मेण त्वन्मनस्केति धर्मतः।<br>आगतास्मि महाराज गृहाणाद्य करं मम॥ ४३<br><br>धर्मपत्नी तवात्यन्तं भवामि नृपसत्तम।<br>चिन्तितोऽसि मया पूर्वं त्वयाहं नात्र संशयः॥ ४४ | भीष्मसे विदा होकर वह सुन्दरी कन्या राजा शाल्वके घर गयी और अपने मनकी अभीष्ट बात उनसे कहने लगी—हे महाराज! आपके प्रति आसक्तचित्त जानकर भीष्मने मुझे धर्मपूर्वक मुक्त कर दिया है। अब मैं आ गयी हूँ; आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये। मैं आपकी पूर्णरूपसे धर्मपत्नी होऊँगी; मैंने पूर्वमें आपको चाहा है और आपने मुझे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४२–४४॥ |
| शाल्व उवाच<br>गृहीता त्वं वरारोहे भीष्मेण पश्यतो मम।<br>रथे संस्थापिता तेन न ग्रहीष्ये करं तव॥ ४५<br><br>परोच्छिष्टां च कः कन्यां गृह्णाति मतिमान्नरः।<br>अतोऽहं न ग्रहीष्यामि त्यक्तां भीष्मेण मातृवत्॥ ४६ | शाल्वने कहा— हे सुन्दरि! मेरे देखते-देखते भीष्मने तुम्हें पकड़ा और अपने रथपर बैठा लिया था, अतः अब मैं तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं कर सकता। कौन बुद्धिमान् मनुष्य दूसरेके द्वारा उच्छिष्ट कन्याको स्वीकार करेगा? अतः भीष्मके द्वारा मातृभावनासे भी त्यागी गयी तुम्हें मैं स्वीकार नहीं करूँगा॥ ४५-४६॥ |
| रुदती विलपन्ती सा त्यक्ता तेन महात्मना।<br>पुनर्भीष्मं समागत्य रुदती चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>शाल्वो मुक्तां त्वया वीर न गृह्णाति गृहाण माम्।<br>धर्मज्ञोऽसि महाभाग मरिष्याम्यन्यथा ह्यहम्॥ ४८ | महात्मा शाल्वने रोती तथा विलाप करती उस कन्याका त्याग कर दिया और वह पुनः भीष्मके यहाँ आकर रोती हुई इस प्रकार कहने लगी—हे वीर! आपके त्याग देनेके कारण शाल्व भी मुझे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हे महाभाग! आप धर्मज्ञ हैं, इसलिये आप मुझे स्वीकार कीजिये, अन्यथा मैं प्राण दे दूँगी॥ ४७-४८॥ |
| भीष्म उवाच<br>अन्यचित्तां कथं त्वां वै गृह्णामि वरवर्णिनि।<br>पितरं स्वं वरारोहे व्रज शीघ्रं निराकुला॥ ४९ | भीष्म बोले— हे वरवर्णिनि! तुम दूसरेपर आसक्त चित्तवाली हो, अतः मैं तुम्हें कैसे स्वीकार करूँ? हे वरारोहे! अब तुम चिन्ता त्यागकर शीघ्र अपने पिताके पास चली जाओ॥ ४९॥ |
| तथोक्ता सा तु भीष्मेण जगाम वनमेव हि।<br>तपश्चकार विजने तीर्थे परमपावने॥ ५० | भीष्मके ऐसा कहनेपर वह [अपने पिताके घर न जाकर] वनमें चली गयी और वहाँ किसी निर्जन एवं परम पवित्र तीर्थमें तप करने लगी॥ ५०॥ |
| द्वे भार्ये चातिरूपाढ्ये तस्य राज्ञो बभूवतुः।<br>अम्बालिका चाम्बिका च काशिराजसुते शुभे॥ ५१ | काशिराजकी अन्य दो रूपवती तथा कल्याणमयी कन्याएँ अम्बिका एवं अम्बालिका विचित्रवीर्यकी रानियाँ बन गयीं॥ ५१॥ |
| राजा विचित्रवीर्योऽसौ ताभ्यां सह महाबलः।<br>रेमे नानाविहारैश्च गृहे चोपवने तथा॥ ५२ | महाबली राजा विचित्रवीर्य भी उन दोनोंके साथ कभी राजभवनमें और कभी उपवनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे॥ ५२॥ |
अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५
अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५
| वर्षाणि नव राजेन्द्रः कुर्वन् क्रीडां मनोरमाम्।<br>प्रापासौ मरणं भूयो गृहीतो राजयक्ष्मणा ॥ ५३ | इस प्रकार पूरे नौ वर्षतक मनोहर क्रीड़ा करते हुए राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मारोगसे ग्रसित हो गये और अन्तमें मृत्युको प्राप्त हुए ॥ ५३ ॥ | | मृते पुत्रेऽतिदुःखार्ता जाता सत्यवती तदा।<br>कारयामास पुत्रस्य प्रेतकार्याणि मन्त्रिभिः ॥ ५४ | उस समय पुत्रके मर जानेपर माता सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने मन्त्रियोंद्वारा पुत्रके सभी प्रेतकर्म सम्पन्न कराये ॥ ५४ ॥ | | भीष्ममाह तदैकान्ते वचनं चातिदुःखिता।<br>राज्यं कुरु महाभाग पितुस्ते शन्तनोः सुत ॥ ५५<br><br>भ्रातृभार्यां गृहाण त्वं वंशञ्च परिरक्षय।<br>यथा न नाशमायाति ययातेर्वंश इत्युत ॥ ५६ | तत्पश्चात् एक दिन अत्यन्त दुःखी होकर सत्यवतीने भीष्मसे एकान्तमें कहा—हे महाभाग! हे पुत्र! अब तुम अपने पिता शन्तनुका राज्य सम्भालो और अपनी भ्रातृजायाको स्वीकार करो और अपने वंशकी रक्षा करो, जिससे महाराज ययातिका वंश नष्ट न हो जाय ॥ ५५-५६ ॥ | | भीष्म उवाच<br>प्रतिज्ञा मे श्रुता मातः पित्रर्थे या मया कृता।<br>नाहं राज्यं करिष्यामि न चाहं दारसंग्रहम् ॥ ५७ | भीष्म बोले—हे माता! अपने पिताजीके लिये मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे तो आप सुन चुकी हैं। अतः मैं न तो राज्य ग्रहण करूँगा और न तो विवाह ही करूँगा ॥ ५७ ॥ | | सूत उवाच<br>तदा चिन्तातुरा जाता कथं वंशो भवेदिति।<br>नालसाद्धि सुखं मह्यं समुत्पन्ने ह्यराजके ॥ ५८ | सूतजी बोले—तब सत्यवती चिन्तित हो गयीं कि अब वंश कैसे चलेगा ? अपने कर्तव्यके प्रति यदि मैं उदासीन रहूँ तो अराजकताके व्याप्त होनेपर मुझे सुख कैसे प्राप्त होगा ? ॥ ५८ ॥ | | गाङ्गेयस्तामुवाचेदं मा चिन्तां कुरु भामिनि।<br>पुत्रं विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रजं चोपपादय ॥ ५९<br><br>कुलीनं द्विजमाहूय वध्वा सह नियोजय।<br>नात्र दोषोऽस्ति वेदेऽपि कुलरक्षाविधौ किल ॥ ६०<br><br>पौत्रं चैवं समुत्पाद्य राज्यं देहि शुचिस्मिते।<br>अहं च पालयिष्यामि तस्य शासनमेव हि ॥ ६१ | [इस प्रकार माताको चिन्तित देखकर] भीष्मने उनसे कहा—हे भामिनि! आप चिन्ता न करें। विचित्रवीर्यकी पत्नीके गर्भसे क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न कराइये। किसी कुलीन विद्वान् ब्राह्मणको बुलाकर वधूके साथ नियोग कराइये। इसमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि वंशरक्षाका विधान वेदमें भी है। हे प्रसन्नवदने! इस प्रकार पौत्र उत्पन्न कराकर आप उसीको राज्य सौंप दीजिये, मैं उसके राज्यशासनका सम्यक् संरक्षण करता रहूँगा ॥ ५९—६१ ॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कानीनं स्वसुतं मुनिम्।<br>जगाम मनसा व्यासं द्वैपायनमकल्मषम् ॥ ६२ | भीष्मकी वह बात सुनकर सत्यवतीने अपनी कुमारी अवस्थामें उत्पन्न अपने निर्दोष पुत्र द्वैपायन व्यासमुनिका स्मरण किया ॥ ६२ ॥ | | स्मृतमात्रस्ततो व्यास आजगाम स तापसः।<br>कृत्वा प्रणामं मात्रेऽथ संस्थितो दीप्तिमान्मुनिः ॥ ६३ | स्मरण करते ही तपस्वी व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और माताको प्रणाम करके वे तेजस्वी मुनि सामने खड़े हो गये ॥ ६३ ॥ |
| १७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
|---|
| भीष्मेण पूजितः कामं सत्यवत्या च मानितः।<br>तस्थौ तत्र महातेजा विधूमोऽग्निरिवापरः॥ ६४ | भीष्मने उनकी भलीभाँति पूजा की और माता सत्यवतीने भी आदर किया। उस समय महातेजस्वी व्यासजी वहाँ इस प्रकार सुशोभित हुए मानो धूमरहित साक्षात् दूसरे अग्निदेव ही हों॥ ६४॥ |
| तमुवाच मुनिं माता पुत्रमुत्पादयाधुना।<br>क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य सुन्दरं तव वीर्यजम्॥ ६५ | माता सत्यवतीने व्यासमुनिसे कहा—इस समय तुम विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें अपने तेजसे सुन्दर पुत्र उत्पन्न करो॥ ६५॥ |
| व्यासः श्रुत्वा वचो मातुराप्तवाक्यममन्यत।<br>ओमित्युक्त्वा स्थितस्तत्र ऋतुकालमचिन्तयत्॥ ६६ | माताका वचन सुनकर व्यासजीने उसे आप्तवाक्य माना और ‘ठीक है’—कहकर वे वहींपर ठहर गये और ऋतुकालकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ६६॥ |
| अम्बिका च यदा स्नाता नारी ऋतुमती तदा।<br>सङ्गं प्राप्य मुनेः पुत्रमसूतान्धं महाबलम्॥ ६७<br><br>जन्मान्धं च सुतं वीक्ष्य दुःखिता सत्यवत्यपि।<br>द्वितीयां च वधूमाह पुत्रमुत्पादयाशु वै॥ ६८ | जब अम्बिका ऋतुमती होकर स्नान कर चुकी तब उसने मुनि व्यासजीके तेजसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जो महाबली और जन्मान्ध था। उस बालकको जन्मान्ध देखकर सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ। तब उन्होंने दूसरी वधू अम्बालिका से कहा कि तुम भी शीघ्र एक पुत्र उत्पन्न करो॥ ६७-६८॥ |
| ऋतुकालेऽथ सम्प्राप्ते व्यासेन सह सङ्गता।<br>तथा चाम्बालिका रात्रौ गर्भं नारी दधार सा॥ ६९<br><br>सोऽपि पाण्डुः सुतो जातो राज्ययोग्यो न सम्मतः।<br>पुत्रार्थं प्रेरयामास वर्षान्ते च पुनर्वधूम्॥ ७०<br><br>आहूय च ततो व्यासं सम्प्रार्थ्य मुनिसत्तमम्।<br>प्रेषयामास रात्रौ सा शयनागारमुत्तमम्॥ ७१<br><br>न गता च वधूस्तत्र प्रेष्या सम्प्रेषिता तया।<br>तस्यां च विदुरो जातो दास्यां धर्मांशतः शुभः॥ ७२ | ऋतुकाल प्राप्त होनेपर उस अम्बालिकाने व्यासजीसे गर्भ धारण किया। उससे उत्पन्न पुत्र भी पाण्डुरोगसे ग्रसित होनेके कारण राजा होनेके योग्य नहीं था। इसलिये माताने वधू अम्बालिकाको एक वर्षके बाद पुनः एक पुत्रके लिये प्रेरित किया। माता सत्यवतीने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीका आह्वानकर उनसे इसके लिये प्रार्थना की, परंतु उसने स्वयं न जाकर अपनी दासीको भेज दिया। उस दासीके गर्भसे धर्मके अंशसे युक्त शुभ विदुर उत्पन्न हुए॥ ६९—७२॥ |
| एवं व्यासेन ते पुत्रा धृतराष्ट्रादयस्त्रयः।<br>उत्पादिता महावीरा वंशरक्षणहेतवे॥ ७३<br><br>एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्य वंशसमुद्भवम्।<br>व्यासेन रक्षितो वंशो भ्रातृधर्मविदानघाः॥ ७४ | इस प्रकार वंशकी रक्षाके लिये व्यासजीने धृतराष्ट्र आदि तीन महापराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। भ्रातृ-धर्मको जाननेवाले व्यासजीने ऐसा करके वंशकी रक्षा की। हे पुण्यात्मा मुनिजनो! इस प्रकार उनकी वंशोत्पत्तिसे सम्बन्धित समस्त कथानक मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ७३-७४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे धृतराष्ट्रादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥
॥ प्रथमः स्कन्धः समाप्तः॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
द्वितीयः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
ब्राह्मणके शापसे अद्रिका अप्सराका मछली होना और उससे राजा मत्स्य तथा मत्स्यगन्धाकी उत्पत्ति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>आश्चर्यकरमेतत्ते वचनं गर्भहेतुकम्।<br>सन्देहोऽत्र समुत्पन्नः सर्वेषां नस्तपस्विनाम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] आपकी यह बात आश्चर्यजनक एवं रहस्यपूर्ण है। इस सम्बन्धमें हम सब तपस्वियोंको महान् सन्देह उत्पन्न हो गया है॥ १॥ |
| माता व्यासस्य मेधाविन्नाम्ना सत्यवतीति च।<br>विवाहिता पुरा ज्ञाता राज्ञा शन्तनुना यथा॥ २<br><br>तस्याः पुत्रः कथं व्यासः सती स्वभवने स्थिता।<br>ईदृशी सा कथं राज्ञा पुनः शन्तनुना वृता॥ ३<br><br>तस्यां पुत्रावुभौ जातौ तत्त्वं कथय सुव्रत।<br>विस्तरेण महाभाग कथां परमपावनीम्॥ ४<br><br>उत्पत्तिं वद व्यासस्य सत्यवत्यास्तथा पुनः।<br>श्रोतुकामाः पुनः सर्वे ऋषयः संशितव्रताः॥ ५ | हे मेधाविन्! पूर्वकालमें सत्यवती नामसे विख्यात व्यासजीकी माताका राजा शन्तनुके साथ जिस प्रकार विवाह हुआ, उन सतीके अपने घरमें रहते हुए भी उनसे पुत्ररूपमें व्यास कैसे उत्पन्न हुए, ऐसी सत्यवतीका शन्तनुने पुनः वरण कैसे किया और उनसे दो पुत्रोंकी उत्पत्ति कैसे हुई? हे सुव्रत! हे महाभाग! आप इस परम पावन कथाको विस्तारपूर्वक कहिये। आप व्यासजी तथा सत्यवतीकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये; हम सभी व्रतधारी ऋषि इस विषयमें सुननेके लिये उत्सुक हैं॥ २–५॥ |
| सूत उवाच<br>प्रणम्य परमां शक्तिं चतुर्वर्गप्रदायिनीम्।<br>आदिशक्तिं वदिष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्॥ ६ | **सूतजी बोले—**मैं चतुर्वर्ग [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] प्रदान करनेवाली परमा आदिशक्तिको प्रणाम करके यह शुभ पौराणिक कथा कहूँगा॥ ६॥ |
| यस्योच्चारणमात्रेण सिद्धिर्भवति शाश्वती।<br>व्याजेनापि हि बीजस्य वाग्भवस्य विशेषतः॥ ७<br><br>सम्यक् सर्वात्मना सर्वैः सर्वकामार्थसिद्धये।<br>स्मर्तव्या सर्वथा देवी वाञ्छितार्थप्रदायिनी॥ ८ | जिनके विशिष्ट वाग्भव बीजमन्त्र (ऐं)-का किसी भी बहानेसे उच्चारण करते ही शाश्वती सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उन इच्छित फल देनेवाली भगवतीका सभी लोगोंको अपनी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेके लिये समर्पण भावसे सम्यक् स्मरण करना चाहिये॥ ७-८॥ |
| राजोपरिचरो नाम धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>चेदिदेशपतिः श्रीमान् बभूव द्विजपूजकः॥ ९ | उपरिचर नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा, ब्राह्मणपूजक तथा श्रीमान् राजा हुए, जो चेदि |
| १७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तपसा तस्य तुष्टेन विमानं स्फाटिकं शुभम्।<br>दत्तमिन्द्रेण तत्तस्मै सुन्दरं प्रियकाम्यया॥ १० | देशके शासक थे। उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर देवराज इन्द्रने उन्हें प्रसन्न करनेके लिये स्फटिक मणिका बना हुआ एक सुन्दर तथा दिव्य विमान दिया॥ ९-१०॥ |
| तेनारूढस्तु सर्वत्र याति दिव्येन भूपतिः।<br>न भूमावुपरीस्थोऽसौ तेनोपरिचरो वसुः॥ ११<br><br>विख्यातः सर्वलोकेषु धर्मनित्यः स भूपतिः।<br>तस्य भार्या वरारोहा गिरिका नाम सुन्दरी॥ १२ | उस दिव्य विमानपर चढ़कर चेदिराज सर्वत्र विचरण करते थे। वे कभी भूमिपर न उतरने तथा पृथ्वीसे ऊपर-ही-ऊपर चलनेके कारण सभी लोकोंमें 'उपरिचर' वसुके नामसे प्रसिद्ध हुए। वे राजा अत्यन्त धर्मपरायण थे। उनकी धर्मपत्नीका नाम गिरिका था, जो रूपवती तथा सुन्दरी थी॥ ११-१२॥ |
| पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः।<br>पृथग्देशेषु राजानः स्थापितास्तेन भूभुजा॥ १३ | महाराज उपरिचरके पाँच पुत्र हुए जो बड़े महान् वीर एवं परम प्रतापी थे। [यथासमय] उन्होंने अपने राजकुमारोंको अलग-अलग देशोंका राजा बना दिया॥ १३॥ |
| वसोस्तु पत्नी गिरिका कामान् काले न्यवेदयत्।<br>ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः॥ १४<br><br>तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति।<br>तच्छ्रुत्वा चिन्तयामास भार्यामृतुमतीं तथा॥ १५<br><br>पितृवाक्यं गुरुं मत्वा कर्तव्यमिति निश्चितम्।<br>चचार मृगयां राजा गिरिकां मनसा स्मरन्॥ १६ | एक बार राजा वसुकी पत्नी गिरिकाने ऋतुकालके स्नानसे पवित्र होकर राजासे पुत्रप्राप्तिकी कामना की। जिस समय वह प्रार्थना करने लगी, उसी समय उनके पितरोंने उन राजासे कहा— हे राजन्! मृगोंको मार लाओ—इस आदेशको सुनकर राजाको अपनी ऋतुमती पत्नीका भी स्मरण हो आया, किंतु पितरोंकी आज्ञा श्रेष्ठ मानकर तथा अपने कर्तव्यका निश्चयकर राजा मन-ही-मन गिरिकाका स्मरण करते हुए आखेटके लिये चल पड़े॥ १४-१६॥ |
| वने स्थितः स राजर्षिश्चिन्तते सस्मार भामिनीम्।<br>अतीव रूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम्॥ १७<br><br>तस्य रेतः प्रचस्कन्द स्मरतस्तां च कामिनीम्।<br>वटपत्रे तु तद्राजा स्कन्नमात्रं समाक्षिपत्॥ १८ | वनमें रहते हुए राजा वसु साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूपवती अपनी पत्नीका स्मरण करने लगे। इस प्रकार उस कामिनीके ध्यानसे एकाएक उनका वीर्य स्खलित हो गया और राजाने शीघ्र ही उस स्खलित वीर्यको बरगदके पत्तेपर रख लिया॥ १७-१८॥ |
| इदं वृथा परिस्कन्नं रेतो वै न भवेत्कथम्।<br>ऋतुकालं च विज्ञाय मतिं चक्रे नृपस्तदा॥ १९<br><br>अमोघं सर्वथा वीर्यं मम चैतन्न संशयः।<br>प्रियायै प्रेषयाम्येतदिति बुद्धिमकल्पयत्॥ २० | यह स्खलित तेज व्यर्थ न हो—[यह सोचकर] तथा स्त्रीका ऋतुकाल जानकर उन्होंने ऐसा निश्चय कर लिया कि मेरा तेज सर्वथा अमोघ है, इसमें सन्देह नहीं है अतः अवश्य ही इसे मैं रानीके पास भेज दूँ॥ १९-२०॥ |
| शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य सः।<br>अभिमन्त्र्याथ तद्वीर्यं वटपर्णपुटे कृतम्॥ २१ | राजा जब उस वीर्यको बरगदके दोनेमें रखकर अपनी रानीके पास भेजने लगे तब उन्होंने रानीका ऋतुकाल जानकर उस वीर्यको अभिमन्त्रित किया। |
| अ० १ ] | द्वितीय स्कन्ध | १७९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पार्श्वस्थं श्येनमाभाष्य राजोवाच द्विजं प्रति।<br>गृहाणेदं महाभाग गच्छ शीघ्रं गृहं मम॥ २२<br><br>मत्प्रियार्थमिदं सौम्य गृहीत्वा त्वं गृहं नय।<br>गिरिकायै प्रयच्छाशु तस्यास्त्वार्तवमद्य वै॥ २३ | राजाने पास ही बैठे हुए बाज पक्षीको बुलाकर उससे कहा—‘हे महाभाग! तुम इसे ग्रहण करो और शीघ्र ही मेरे घर चले जाओ। हे सौम्य! मेरा हित करनेके लिये इसे लेकर तुम मेरे घर जाओ और इसे शीघ्र ही गिरिकाको दे देना; क्योंकि आज ही उसका ऋतुकाल है’॥ २१—२३॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा प्रददौ पर्णं श्येनाय नृपसत्तमः।<br>स गृहीत्वोत्पपाताशु गगनं गतिवित्तमः॥ २४ | **सूतजी बोले—**ऐसा कहकर नृपश्रेष्ठने बाजको वह दोना दे दिया और वह द्रुतगामी बाज भी उसे लेकर शीघ्र ही आकाशमें उड़ने लगा॥ २४॥ |
| गच्छन्तं गगनं श्येनं धृत्वा चञ्चुपुटे पुटम्।<br>तमपश्यदथायान्तं खगं श्येनस्तथापरः॥ २५ | चोंचमें पत्तेका दोना लेकर आकाशमें उड़ते हुए उस बाजको एक दूसरे बाजपक्षीने अपनी ओर आते हुए देखा॥ २५॥ |
| आमिषं स तु विज्ञाय शीघ्रमभ्यद्रवत्खगम्।<br>तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः॥ २६<br><br>युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि।<br>खगौ तौ निर्गतौ कामं पुटके पतिते तदा॥ २७ | बाजकी चोंचमें मांसका टुकड़ा समझकर तत्काल उसने उस बाजपर आक्रमण कर दिया। दोनों बाजोंके बीच आकाशमें चोंचोंसे घोर युद्ध होने लगा। उन दोनोंके युद्ध करते समय वीर्यवाला वह दोना यमुनाजीके जलमें जा गिरा। दोनेके गिर जानेपर दोनों पक्षी वहाँसे यथेच्छ दिशामें चले गये॥ २६-२७॥ |
| एतस्मिन्समये काचिदद्रिका नाम चाप्सराः।<br>ब्राह्मणं समनुप्राप्तं सन्ध्यावन्दनतत्परम्॥ २८<br><br>कुर्वन्ती जलकेलिं सा जले मग्ना चचार सा।<br>जग्राह चरणं नारी द्विजस्य वरवर्णिनी॥ २९ | उसी समय अद्रिका नामकी एक अप्सरा जलमें निमग्न होकर जलक्रीडा कर रही थी। उस सुन्दरी स्त्रीने वहाँपर उपस्थित सन्ध्यावन्दन करनेमें तत्पर एक ब्राह्मणको देखा और उन ब्राह्मणका पैर पकड़ लिया॥ २८-२९॥ |
| प्राणायामपरः सोऽथ दृष्ट्वा तां कामचारिणीम्।<br>शशाप भव मत्स्यी त्वं ध्यानविघ्नकरी यतः॥ ३०<br><br>सा शप्ता विप्रमुख्येन बभूव यमुनाचरी।<br>शफरी रूपसम्पन्ना ह्यद्रिका च वराप्सराः॥ ३१ | प्राणायाम करते हुए ब्राह्मणने उस स्वेच्छाचारिणीको देखकर उसे यह शाप दे दिया कि ‘तुमने मेरे ध्यानमें विघ्न डाला है, अतएव तुम मछली हो जाओ।’ इस प्रकार ब्राह्मणश्रेष्ठसे शाप पाकर वह अद्रिका नामकी रूपवती श्रेष्ठ अप्सरा मछली बनकर यमुनाके जलमें विचरने लगी॥ ३०-३१॥ |
| श्येनपादपरिभ्रष्टं तच्छुक्रमथ वासवी।<br>जग्राह तरसाभ्येत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी॥ ३२ | बाजके पादाघातसे गिरे हुए उस वीर्यके पास जाकर मत्स्यरूपधारिणी अद्रिका अप्सराने उसे शीघ्रतापूर्वक निगल लिया॥ ३२॥ |
| अथ कालेन कियता मत्स्यीं तां मत्स्यजीवनः।<br>सम्प्राप्ते दशमे मासि बबन्ध तां मनोरमाम्॥ ३३ | कुछ समय बाद दस महीने बीतनेपर एक मछुआरेने उस सुन्दर मछलीको अपने जालमें फँसा लिया॥ ३३॥ |
| उदरं विददाराशु स तस्या मत्स्यजीवनः।<br>युग्मं विनिःसृतं तस्मादुदरान्मानुषाकृति॥ ३४ | उस मछुआरेने शीघ्र ही उस मछलीका पेट चीर दिया। उसके उदरसे मनुष्यके आकारवाली जुड़वाँ सन्तति निकली॥ ३४॥ |
| १८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बालः कुमारः सुभगस्तथा कन्या शुभानना।<br>दृष्ट्वाश्चर्यमिदं सोऽथ विस्मयं परमं गतः ॥ ३५ | उन दोनोंमें एक रूपवान् बालक तथा एक सुन्दर मुखवाली बालिका थी। इस अद्भुत घटनाको देखकर वह भी अत्यन्त विस्मित हुआ॥ ३५॥ |
| राज्ञे निवेदयामास पुत्रौ द्वौ तु झषोद्भवौ।<br>राजापि विस्मयाविष्टः सुतं जग्राह तं शुभम् ॥ ३६ | उसने मछलीके पेटसे निकले उन दोनों बच्चोंको राजा उपरिचरको सौंप दिया। राजा भी आश्चर्यचकित हुआ और उसने उस सुन्दर पुत्रको ले लिया॥ ३६॥ |
| स मत्स्यो नाम राजासौ धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>वसुपुत्रो महातेजाः पित्रा तुल्यपराक्रमः ॥ ३७ | वह वसुपुत्र मत्स्य नामक राजा हुआ, जो अपने पिताके समान ही धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, महातेजस्वी तथा पराक्रमी था॥ ३७॥ |
| कालिका वसुना दत्ता तरसा जलजीविने।<br>नाम्ना कालीति विख्याता तथा मत्स्योदरीति च ॥ ३८ | राजा उपरिचर वसुने वह कन्या उस मछुआरेको ही दे दी, जो आगे चलकर काली तथा मत्स्योदरी नामसे प्रसिद्ध हुई। अपने गुणविशेषके कारण वह मत्स्यगन्धा नामसे कही जाने लगी। उस मछुआरे दाशके घर वह सुन्दरी वासवी धीरे-धीरे बढ़ने लगी॥ ३८-३९॥ |
| मत्स्यगन्धेति नाम्ना वै गुणेन समजायत।<br>विवर्धमाना दाशस्य गृहे सा वासवी शुभा ॥ ३९ | |
| ऋषय ऊचुः<br>अद्रिका मुनिना शप्ता मत्स्यी जाता वराप्सराः।<br>विदारिता च दाशेन मृता च भक्षिता पुनः ॥ ४० | ऋषिगण बोले— हे सूतजी! मुनिके द्वारा शापित वह अद्रिका नामकी श्रेष्ठ अप्सरा जब मछली हो गयी और मछुआरेने उसे चीर डाला, तब वह मर गयी अथवा उसने उसे खा लिया। उस अप्सराका फिर क्या हुआ? उसके शापकी समाप्ति कैसे हुई और उसे पुनः स्वर्ग कैसे मिला? यह बताइये॥ ४०-४१॥ |
| किं बभूव पुनस्तस्या अप्सराया वदस्व तत्।<br>शापस्यान्तं कथं सूत कथं स्वर्गमवाप सा ॥ ४१ | |
| सूत उवाच<br>शप्ता यदा सा मुनिना विस्मिता सम्बभूव ह।<br>स्तुतिं चकार विप्रस्य दीनेव रुदती तदा ॥ ४२ | सूतजी बोले— जब मुनिने उसे शाप दिया, तब वह विस्मित हो गयी और दीनतापूर्वक रोती हुई उस ब्राह्मणकी स्तुति करने लगी॥ ४२॥ |
| दयावान् ब्राह्मणः प्राह तां तदा रुदतीं स्त्रियम्।<br>मा शोकं कुरु कल्याणि शापान्तं ते वदाम्यहम् ॥ ४३ | दयालु ब्राह्मणने उस रोती हुई स्त्रीसे कहा—हे कल्याणि! तुम शोक न करो, मैं तुम्हारे शापके अन्तका उपाय बताता हूँ। हे शुभे! मैंने क्रुद्ध होकर जो शाप दिया है, उससे तुम मत्स्ययोनिको प्राप्त होओगी; किंतु तुम अपने उदरसे एक युग्म मानव-सन्तान उत्पन्नकर इस शापसे मुक्त हो जाओगी॥ ४३-४४॥ |
| मत्क्रोधशापयोगेन मत्स्ययोनिं गता शुभे।<br>मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ॥ ४४ | |
| इत्युक्ता तेन सा प्राप मत्स्यदेहं नदीजले।<br>बालकौ जनयित्वा सा मृता मुक्ता च शापतः ॥ ४५ | उनके ऐसा कहनेपर वह यमुनाजलमें मछलीका शरीर पाकर तथा दो सन्तानोंको उत्पन्न करके मर गयी और शापसे मुक्त हो गयी॥ ४५॥ |
| सन्त्यज्य रूपं मत्स्यस्य दिव्यरूपमवाप्य च।<br>जगामामरमार्गं च शापान्ते वरवर्णिनी ॥ ४६ | इस प्रकार शापोद्धार होनेपर वह सुन्दरी मछलीका शरीर त्यागकर दिव्य रूप धारण करके स्वर्गको चली गयी॥ ४६॥ |
| अ० २ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८१ |
|---|
| एवं जाता वरा पुत्री मत्स्यगन्धा वरानना।<br>पुत्रीव पाल्यमाना सा दाशगेहे व्यवर्धत ॥ ४७ | इस प्रकार सुन्दर मुखवाली उस कन्या मत्स्य-गन्धाका जन्म हुआ। दाशके घरमें पुत्रीकी भाँति पालन-पोषणकी जाती हुई वह कन्या बढ़ने लगी ॥ ४७ ॥ |
| मत्स्यगन्धा तदा जाता किशोरी चातिसुप्रभा।<br>तस्य कार्याणि कुर्वाणा वासवी चातिसुप्रभा ॥ ४८ | जब वह मत्स्यगन्धा किशोरावस्थाको प्राप्त हुई, तब उसका सौन्दर्य और भी बढ़ गया। वह परम सुन्दरी वसुकन्या निषादराजके कार्योंको करती हुई रहने लगी ॥ ४८ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे मत्स्यगन्धोत्पत्तिवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
~ ~ ~ ० ~ ~ ~
अथ द्वितीयोऽध्यायः
व्यासजीकी उत्पत्ति और उनका तपस्याके लिये जाना
</div>| सूत उवाच | |
|---|---|
| एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन् पाराशरो मुनिः।<br>आजगाम महातेजाः कालिन्द्यास्तटमुत्तमम् ॥ १ | **सूतजी बोले—**एक बार तीर्थयात्रा करते हुए महान् तेजस्वी पराशरमुनि यमुनानदीके उत्तम तटपर आये और उन धर्मात्माने भोजन करते हुए निषादसे कहा—मुझको नावसे यमुनाके पार पहुँचा दो ॥ १-२ ॥ |
| निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा।<br>प्रापयस्व परं पारं कालिन्द्या उडुपेन माम्॥ २ | |
| दाशः श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं कुर्वाणो भोजनं तटे।<br>उवाच तां सुतां बालां मत्स्यगन्धां मनोरमाम् ॥ ३ | मुनिका वचन सुनकर यमुनाके तटपर भोजन करते हुए उस निषादने अपनी सुन्दर युवा पुत्री मत्स्यगन्धासे कहा—‘हे सुन्दर मुसकानवाली पुत्रि! तुम इन मुनिको नावमें बैठाकर पार उतार दो; क्योंकि ये धर्मात्मा तपस्वी उस पार जानेके इच्छुक हैं’ ॥ ३-४ ॥ |
| उडुपेन मुनिं बाले परं पारं नयस्व ह।<br>गन्तुकामोऽस्ति धर्मात्मा तापसोऽयं शुचिस्मिते ॥ ४ | |
| इत्युक्ता सा तदा पित्रा मत्स्यगन्धाथ वासवी।<br>उडुपे मुनिमासीनं संवाहयति भामिनी ॥ ५ | पिताके ऐसा कहनेपर वह सुन्दर वासवी मत्स्यगन्धा मुनिको नावमें बैठाकर खेने लगी। यमुनानदीके जलपर नावसे चलते समय दैवयोगसे प्रारब्धानुसार मुनि पराशर उस सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याको देखकर आसक्त हो गये ॥ ५-६ ॥ |
| व्रजन् सूर्यसुतातोये भावित्वाद्दैवयोगतः।<br>कामार्तस्तु मुनिर्जातो दृष्ट्वा तां चारुलोचनाम् ॥ ६ | |
| ग्रहीतुकामः स मुनिर्दृष्ट्वा व्यञ्जितयौवनाम्।<br>दक्षिणेन करेणैनामस्पृशद्दक्षिणे करे ॥ ७ | प्रस्फुटित यौवनवाली उस कन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छावाले मुनिराजने अपनी दाहिनी भुजासे उसकी दाहिनी भुजाका स्पर्श किया ॥ ७ ॥ |
| तमुवाचासितापाङ्गी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कुलस्य सदृशं वः किं श्रुतस्य तपसश्च किम् ॥ ८ | इसपर उस असितापांगीने मुसकराकर कहा—क्या आपका यह कृत्य आपके कुल, तपस्या तथा वेदज्ञानके अनुरूप है ? हे धर्मज्ञ! आप वसिष्ठजीके वंशज हैं और कुल तथा शीलसे युक्त हैं फिर भी कामदेवसे पीड़ित होकर आप क्या करना चाहते हैं ? ॥ ८-९ ॥ |
| त्वं वै वसिष्ठदायादः कुलशीलसमन्वितः।<br>किं चिकीर्षसि धर्मज्ञ मन्मथेन प्रपीडितः॥ ९ |
| १८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम।<br>तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः॥ १० | हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर मनुष्यजन्म दुर्लभ है। उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म लेना तो मैं विशेषरूपसे दुर्लभ मानती हूँ॥ १०॥ |
| कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन<br>द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च।<br>अनार्यभावं कथमागतोऽसि<br>विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम्॥ ११<br>मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे<br>शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम्।<br>समीपं समायासि कामातुरस्त्वं<br>कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम्॥ १२ | हे विप्रेन्द्र! आप कुलसे, शीलसे तथा वेदाध्ययनसे एक धर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं? मुझ मत्स्यगन्धाको देखकर आप अनाचारयुक्त विचारवाले कैसे हो गये? हे अमोघ बुद्धिवाले ब्राह्मण! मेरे शरीरमें स्थित किस विशेषताको देखकर आप मेरा हाथ पकड़नेके लिये कामासक्त होकर मेरी ओर चले आ रहे हैं? क्या आपको अपने धर्मका ज्ञान नहीं है?॥ ११-१२॥ |
| अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-<br>ञ्जले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा।<br>मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं<br>न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम्॥ १३ | अहो, ये मन्दबुद्धि ब्राह्मण इस जलमें मुझे पकड़नेको आतुर हो रहे हैं। मेरा स्पर्श करके कामबाणसे आहत इनका मन व्याकुल हो उठा है। इस समय कोई भी इन्हें रोकनेमें समर्थ नहीं है॥ १३॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम्।<br>धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै॥ १४ | ऐसा सोचकर उस निषादकन्याने महामुनि पराशरसे कहा—हे महाभाग! आप धैर्य धारण करें; मैं अभी आपको उस पार ले चलती हूँ॥ १४॥ |
| सूत उवाच<br>पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम्।<br>करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः॥ १५ | सूतजी बोले—मुनि पराशर उसका हितकारी वचन सुनकर उसका हाथ छोड़ करके वहीं स्थित हो गये और उस पार पहुँच गये॥ १५॥ |
| मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनिः कामातुरस्तदा।<br>वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरःस्थितम्॥ १६<br>दुर्गन्धांहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे।<br>समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः॥ १७ | तदनन्तर पराशरमुनिने मत्स्यगन्धाको पकड़ लिया। तब भयसे काँपती हुई वह कन्या सम्मुखस्थित मुनिसे कहने लगी—हे मुनिवर! मैं दुर्गन्धवाली हूँ, मुझसे क्या आपको घृणा नहीं हो रही है? समान रूपवालोंके बीच ही परस्पर सम्बन्ध आनन्ददायक होता है॥ १६-१७॥ |
| इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी।<br>कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना॥ १८ | मत्स्यगन्धाके ऐसा कहते ही पराशरमुनिने क्षण-मात्रमें अपने तपोबलसे उस भामिनी कन्याको सुमुखी, रूपवती तथा योजनगन्धा बना दिया॥ १८॥ |
| मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम्।<br>जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः॥ १९<br>ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः॥ २० | उसे कस्तूरीकी सुगन्धिवाली मनोहर स्त्री बनाकर कामातुर मुनिराजने अपने दाहिने हाथसे उसे पकड़ लिया। तब सत्यवती नामवाली उस सुन्दरीने संयोगकी कामनावाले मुनिसे कहा—हे मुने! तटपर स्थित मेरे पिता तथा सभी लोग यहाँ हमें देख रहे हैं॥ १९-२०॥ |
| पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः।<br>प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्भवति यामिनी॥ २१ | हे मुनिश्रेष्ठ! यह भीषण पशुवत् व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता। जबतक रात नहीं हो जाती, तबतक प्रतीक्षा कीजिये॥ २१॥ |
| अ० २ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि।<br>दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः॥ २२<br><br>कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः॥ २३<br><br>नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै।<br>नीहारे च समुत्पन्ने ततेऽतितमसा युते॥ २४<br><br>कामिनीं तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः।<br>कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः॥ २५<br><br>अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति।<br>पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्द्वाव्यहम्॥ २६<br><br>त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत्। | मनुष्यके लिये कामसंसर्ग रातमें ही विहित है, दिनमें नहीं। दिनमें संसर्ग करनेसे महान् दोष होता है और बहुत-से लोग उसे देख भी लेते हैं॥ २२॥<br><br>हे महाबुद्धे! अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें, लोकनिन्दा अत्यन्त कष्टकर होती है। सत्यवतीका कहा गया युक्तिसंगत वचन सुनकर उदार बुद्धिवाले पराशरमुनिने अपने पुण्यबलसे तत्क्षण कुहरा उत्पन्न कर दिया। उस कुहरेके उत्पन्न हो जानेपर अत्यन्त अन्धकारमय नदीतटपर उस कामिनीने पराशरमुनिसे मधुर वाणीमें यह वचन कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैं अभी कन्या हूँ और आप मेरे साथ संसर्ग करके चले जायँगे। हे ब्रह्मन्! आप अमोघ वीर्यवाले हैं, ऐसी स्थितिमें मेरी क्या गति होगी? यदि मैं गर्भधारण कर लूँगी तो पिताको क्या उत्तर दूँगी? हे ब्रह्मन्! मेरे साथ संसर्ग करके आप चले जायँगे तब मैं क्या करूँगी, उसे बताइये?॥ २३—२६ १/२॥ |
| पराशर उवाच<br>कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि॥ २७<br><br>वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि। | पराशर बोले— हे प्रिये! आज मुझे प्रसन्न करके भी तुम कन्या ही बनी रहोगी। हे भामिनि! हे भीरु! तुम जो वर चाहती हो, उसे माँग लो॥ २७ १/२॥ |
| सत्यवत्युवाच<br>यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद॥ २८<br><br>कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम।<br>पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्भुतवीर्यवान्॥ २९<br><br>गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम्। | सत्यवती बोली— हे मानद! आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मेरे माता-पिता लोकमें इसे न जान सकें। साथ ही हे विप्रवर! आप ऐसा करें, जिससे मेरा कन्याव्रत नष्ट न हो और जो पुत्र उत्पन्न हो, वह आपहीके समान अपूर्व ओजस्वी हो, मेरी यह सुगन्ध सदा बनी रहे और मेरा यौवन नित नूतन बना रहे॥ २८–२९ १/२॥ |
| पराशर उवाच<br>शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्णवंशसम्भवः शुचिः॥ ३०<br><br>भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि।<br>केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि॥ ३१<br><br>कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने।<br>दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम्॥ ३२<br><br>दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम्।<br>तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम्।<br>पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने॥ ३४<br><br>वेदविद्भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये। | पराशर बोले— हे सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा पुत्र पवित्र तथा भगवान् विष्णुके अंशसे अवतीर्ण होगा। हे सुन्दरि! वह तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। मैं तुम्हारे ऊपर किसी कारणविशेषसे ही कामासक्त हुआ हूँ। हे सुमुखि! मुझे ऐसा मोह पूर्वमें कभी नहीं हुआ। अप्सराओंके रूपको देखकर भी मैं सदा धैर्य धारण किये रहा। दैवयोगसे ही तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार कामके वशीभूत हुआ हूँ। इस विषयमें तुम कोई विशेष कारण ही समझो, दैवका अतिक्रमण अत्यन्त कठिन है, अन्यथा अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार क्यों मोहित होता! हे वरानने! तुम्हारा पुत्र पुराणोंका रचयिता, वेदोंका विभाग करनेवाला तथा तीनों लोकोंमें विख्यात होगा॥ ३०—३४ १/२॥ |