सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

सकल भूतोंके हितार्थ । निरालंब औ' अव्यक्त ।
उसमें हुआ जो आसक्त । बिना भक्तिके ॥ ६० ॥
उसको इन्द्रादिक पद । करते हैं पथमें वध ।
तथा ऋद्धि-सिद्धियोंका द्वंद्व । बनते हैं रोडे ॥ ६१ ॥
काम-क्रोधके उत्पात । करते बडे आघात ।
तथा शून्यसे भिडन्त । नित है तनको ॥ ६२ ॥
प्याससे प्यास ही है पीना । भूखसे भूख ही है खाना ।
दिन रात हवा गिनना । हवासे ही ॥ ६३ ॥
सतत-जागृति जहां सोना । इन्द्रिय इन्द्रियको ही भोगना ।
वृक्षोंसे मैत्री करके बोलना । स्वभावसे ॥ ६४ ॥
शीतको बिछाना । तापको ओढना ।
घरमें हैं सोना । वर्षाके ॥ ६५ ॥
अथवा यह हे धनंजया । अग्नि-प्रवेश है नित-नया ।
आंतर बिना ही पूर्णतया । करना ही योग ॥ ६६ ॥
न है यह स्वामीका काज । जिसमें मिलता स-व्याज ।
किंतु मात्र मृत्युसे झूज । नित्य-नयी ॥ ६७ ॥
ऐसा मृत्युसे भी जो भीषण । तप्त विष घूंटसे भी तीक्ष्ण ।
पहाड लीलनेमें आनन । न फटेगा क्या ? ॥ ६८ ॥
योगीका जो पथ । चलते हैं पार्थ ।
दुःख ही हैं साथ । उनके सदा ॥ ६९ ॥
अजी ! लोहेके ही चने । पडते हैं नित खाने ।
पेट भरने या मरने । क्या कहें इसे ? ॥ ७० ॥
बाहुसे तरना सागर । पैरोंसे गगन विहार ।
ऐसा ही है पांडुकुमार । बात जो यह ॥ ७१ ॥
बीच रण रंगमें जाकर । तनपे घाव न झेलकर ।
सूर्य मण्डलको भेदकर । आना कैसे ? ॥ ७२ ॥
४११ भक्तियोग

पंगुकी बराबरी वायुसे । शरीरीकी निर्गुणमें वैसे ।
प्रवेश है समान रूपसे । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥
फिर भी करके साहस । लिपट लेते हैं आकाश ।
जिससे पायेंगे वे क्लेश । निश्चित जान ॥ ७४ ॥
किंतु इस और पार्थ । न जाने क्या है व्यथा ।
तभी है ये भक्ति-पंथ । आते हैं जन ॥ ७५ ॥
भक्ति पंथ सरल है—क्यों कि—
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते ॥ ६ ॥
कर्मेंन्द्रिय यहां स-सुख । करती हैं कर्म विशेष ।
प्राप्त हैं जो वर्ण विशेष । स्वभाव-जन्य ॥ ७६ ॥
विधिको है पालना । निषिद्धको त्यागना ।
अर्पण कर जलाना । कर्म-फलको ॥ ७७ ॥
इस भांति कर समर्पण । कर्मका करते हैं क्षालन ।
ऐसे करते कर्म अर्जुन । जो हैं भक्त ॥ ७८ ॥
दूसरे भी हैं जो जो सर्व । काया वाचा मनके भाव ।
मेरे बिना नहीं है ठाव । कोई भी अन्य । ॥ ७९ ॥
ऐसे होके जो मत्पर । उपासते निरंतर ।
जिससे हैं मेरा घर । ध्यानसे वे ॥ ८० ॥
उनकी रुचि चाह चाव । मेरे लिए ही है ये सर्व ।
योग-क्षेम मोक्षादि भाव । त्यजे कुलादि भी ॥ ८१ ॥
ऐसा यह अनन्य-योग । न्योच्छावर मन प्राण अंग ।
उनका क्या है एकेक भाग । करता हूं मैं सब ॥ ८२ ॥
किंतु जो सब ही कर्म करके मुझ अर्पण ।
अनन्य भक्तिसे मेरा करते नित्य चिंतन ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१२

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत प्रेम करता हूँ—
अथवा जो पांडुकुमार । आता जो माताके उदर ।
उससे माता कैसे प्यार । करती है नित ॥ ८३ ॥
वैसा मैं करता उनसे । जहां वे जैसे रहते वैसे ।
कलिकालके परिहारसे । करता स्वीकार ॥ ८४ ॥
वैसा तो कभी मेरा भक्त । संसार चिंता नहीं करता ।
अजी ! क्या श्रीमंतकी कांता । मांगती कोरास ॥ ८५ ॥
वैसा वे सर्वदा सर्वत्र । माननाजी मेरा कलत्र ।
लजाऊँ ना मैं तिलमात्र । उनकी सेवामें ॥ ८६ ॥
जन्म-मृत्युके भंवरमें । देख डूबे हुए विश्वमें ।
उठे ये विचार मनमें । ऐसे सब ॥ ८७ ॥
भव सागरके खम्भारमें । भय न हो किसके हियमैं ।
यहां यदि मेरे ही जनमें । होगी भीति ॥ ८८ ॥
इसीलिये मैं अर्जुन ! रूप लेकर सगुण ।
जहां बसते सज्जन । आया वहां ॥ ८९ ॥
मेरे नाम हैं जो अनंत । नांव है यहां मूर्तिमंत ।
इसको लेकर मैं पार्थ । बना मांझी ॥ ९० ॥
ये जो परिग्रह रहित । उनको लगाया ध्यानार्थ ।
जो ये परिग्रह सहित । उनको नाममें ॥ ९१ ॥
प्रेमकी पेटी बांधकर । लाया किसीको तैराकर ।
पहुंचाया है तीर पर । सायुज्यके ॥ ९२ ॥
रोक्ता मुझमें चित्त उनको शीघ्र मैं स्वयम् ।
बिना विलम्ब उद्धार करता भव-सिंधुसे ॥ ७ ॥
४१३ भक्तियोग

जिसने पकडे मत्पाद । भले ही होवे चतुष्पाद ।
उनको मिला महापद । मेरे सानिध्यका ॥ ९३ ॥
इसीलिए जी भक्त । नहीं होते चिंतित ।
उनका समुद्धर्त्ता । मैं हूं सदा ॥ ९४ ॥
तथा जबसे की भक्ति । दी मुझको चित्त-वृत्ति ।
उनके फंदकी शक्ति । खींचती मुझे ॥ ९५ ॥
इस कारणसे अर्जुन । कर भक्तिका आचरण ।
यह मंत्र रखो स्मरण । मनमें सदा ॥ ९६ ॥
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥
मन बुद्धि आदिका मुझमें लीन होनेसे मद्रूप हो जाता है—
अजी ! मानस यह एक । मेरे स्वरूपमें वृत्तिक ।
करके रख तू निष्कंक । निश्चित बुद्धिसे ॥ ९७ ॥
इन दोनों साधनसे । मुझमें रहे प्रेमसे ।
मिलन होगा मुझसे । तेरा निश्चित ॥ ९८ ॥
मन बुद्धिने घर । किया मेरे भीतर ।
रहा क्या भेद और । मेरे तेरेका ॥ ९९ ॥
जैसे ज्योति बुझने पर । मिट जाती कांति सत्वर ।
या अस्त होते ही भास्कर । जाता प्रकाश ॥ १०० ॥
तजता जब तनको प्राण । निकल जाते सभी कण ।
जहां मन-बुद्धिका गमन । वहां अहंकार ॥ १ ॥
इसीलिये मेरे स्वरूपमें । मन बुद्धिके रत आनेमें ।
होगा तू विश्व-व्यापकतामें । मैं ही मान ॥ २ ॥
मनको मुझमें रोक बुद्धि भी मुझमें रख ।
तभी तू फिर निःशंक पाएगा मम रूप ही ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१४

इस बचनमें कहीं । अन्यथा कछु भी नहीं ।
मेरी प्रतिज्ञा है यही । सौगंध पूर्वक ॥ ३ ॥
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥
मद्रूपका क्षणिक अनुभव-अभ्यास-योग—
अथवा यह चित्त । मन बुद्धि सहित ।
मुझको अचुंबित । न दे सके तो ॥ ४ ॥
तब तो ऐसा कर । दिनमें क्षण भर ।
सबको भूलकर । रत हो मुझमें ॥ ५ ॥
जिससे तू निमिष एक । अनुभवेगा मेरा सुख ।
उससे होगा अरोचक । विषय-मात्र ॥ ६ ॥
जैसा शरत्काल आता । सूखते जाती सरिता ।
वैसी छूटेगी ममता । प्रपंचसे ॥ ७ ॥
फिर पूर्णमासीसे जैसे । शशि-बिंब लगता वैसे ।
अमावसमें पूर्णरूपसे । मिट जाता है ॥ ८ ॥
ऐसे वासनासे निकलकर । मुझमें चित्त चुभते जाकर ।
धीरे धीरे वह अर्जुन स्थिर । होगा मद्रूप ॥ ९ ॥
अजी ! अभ्यास योगका अर्थ । एक ही जो है सर्व समर्थ ।
जिससे न होगा कुछ प्राप्त । ऐसा नहीं ॥ ११० ॥
सुन अभ्यासका बल । देता मति अन्तराल ।
व्याघ्र सर्पको प्रांजल । करते इससे ॥ ११ ॥
विषका ही आहार बनता । सागरपे पगसे चलता ।
कोई वाग्ब्रह्मको ही जीतता । अभ्यास बलसे १२ ॥
करना चित्तको शांत असाध्य मुझमें तब ।
अभ्यास योगसे चाह तू मेरी प्राप्तिको कर ॥ ९ ॥
४१५ भक्तियोग

अभ्यासको कुछ नहीं । सर्वथा दुष्कर कहीं ।
इसलिए मुझमें ही । उससे रत हो ॥ १३ ॥
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥
निराग्रह वृत्तिसे जीवन-यापन—
अथवा अभ्यासमें ऐसा । न आता साहस सहसा ।
तब रह अब है जैसा । अर्जुन तू ॥ १४ ॥
इन्द्रियोंका निग्रह न कर । विषय-भोग कम न कर ।
याभिमानका त्याग न कर । स्वजातिका ॥ १५ ॥
कर कुल धर्माचरण । विधि निषेधका पालन ।
तब भी सुखसे जीवन । चलता रहता है ॥ १६ ॥
किंतु काया वाचा मन । करता जो आचरण ।
उसका जो अहंपन । न मान तू ॥ १७ ॥
जिसको है विश्व चलाना । पूर्ण यह उसने जाना ।
करना या नहीं करना । उसका काम ॥ १८ ॥
उसमें कुछ जो न्यून पूर्ण । उससे अछूता रख मन ।
स्वजातिके लिए ही जीवन । देकर तू ॥ १९ ॥
जैसा ही माली चलाता ले जाता । वैसा ही पानी है सहज जाता ।
यदि तू वैसा ही करता जाता । निराभिमानसे ॥ १२० ॥
वैसे ही देख तू पार्थ । कैसा है अपना पथ ।
देखता क्या यह रथ । अल्पसा भी ॥ २१ ॥
तभी प्रवृत्ति या निवृत्ति । इससे दूर रख मति ।
तथा अखंड चित्त-वृत्ति । मेरे स्मरणमें ॥ २२ ॥
अभ्याससे न हो साध्य तब मत्कर्म आचर ।
मिलेगी तुझको सिद्धि सत्कर्म करने पर ॥ १०
ज्ञानेश्वरी ४१६

जैसे वृक्ष अथवा वेल। गिर देते हैं पक्व फल।
वैसे तज दें फल सकल। कर्म सिद्धिके ॥ ज्ञा. १२-१२९

The provided image is completely blank and contains no text.

कर्म जो होता है तुझे प्राप्त । न मान तू अल्प या बहुत ।
चुपचाप कर तू अर्पित । मुझको सदा ॥ २३ ॥
ऐसी ही मद्भावना । तन त्यागमें अर्जुना ।
तू सायुज्य सदन । पायेगा मेरा ॥ २४ ॥
कर्म-रत रहकर कर्म फल समर्पण—
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥
न तो यह भी तुझे । न दे सके कर्म मुझे ।
तब तू सतत मुझे । भजते जा ॥ २५ ॥
बुध्दिके पेट पीठमें । कर्मके आदि अंतमें ।
मुझको जोड़ देनेमें । यदि है दुस्तर ॥ २६ ॥
तो यह भी रहने दो । मदर्पणकी जाने दो ।
किंतु निग्रही होने दो । बुध्दि तेरी ॥ २७ ॥
और जैसे जिस काल । कर्म होते हैं सकल ।
उसके वे सब फल । तजते जा ॥ २८ ॥
जैसे वृक्ष अथवा वेल । गिरा देते हैं पक फल ।
वैसे त्यज दे फल सकल । कर्म सिद्धिके ॥ २९ ॥
मनमें मेरा करना स्मरण । अथवा मुझे करना अर्पण ।
यदि है तुझे यह अग्रहण । जाने दे शून्यमें ॥ ३० ॥
जैसे पत्थर पे पड़ी वर्षा व्यर्थ । तथा आगमें हुई बुवाई व्यर्थ ।
अथवा देखा हुआ स्वप्न है व्यर्थ । वैसा कर्म-फळ ॥ ३१ ॥
अजी ! जैसे आत्मजामें । जीव निष्काम मनमें ।
वैसे सकल कर्ममें । अकाम होना ॥ ३२ ॥
ऐसा कर्म न होता तो मुझमें योग साधके ।
यत्नसे छोड़ तू सारे कर्मके फल अर्जुन ॥ ११ ॥
(53) ४१७ भक्तियोग

जैसे उठती अग्नि-ज्वाल । आकाशमें व्यर्थ सकल ।
वैसे लय हो कर्म-फल । शून्यमें ही ॥ ३३ ॥
अर्जुन यह जो फल त्याग । दीखता है अति असंग ।
योगमें है यह महायोग । सर्वोत्कृष्ट ॥ ३४ ॥
फल-त्याग यह अविकार । जिससे न हो कर्म विस्तार ।
अंकुरता वेणु एक बार । उसी भांति ॥ ३५ ॥
इस शरीरसे ही शरीर । पाना है रुकता बार बार ।
पुनरागमनपे पत्थर । पड़ता मानो ॥ ३६ ॥
अभ्यासकी महत्ता—
फिर अभ्यासका सोपान । सौंपता है ज्ञानका स्थान ।
ज्ञानसे ध्यानका मिलन । सहज होगा ॥ ३७ ॥
ध्यानका तब आलिंगन । करते हैं भाव संपूर्ण ।
रहते तब दूर जान । कर्म-जात ॥ ३८ ॥
जहां कर्म ही दूर है । फल-त्याग सरल है ।
त्यागका जो सहज है । शांति-सुख ॥ ३९ ॥
शांतिके लिये है तब । अभ्यास करना अब ।
क्रमागत ही है सब । सुभद्रापति ॥ १४० ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात् कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनंतरम् ॥ १२ ॥
अभ्याससे भी गहन । अर्जुन फिर है ज्ञान ।
ज्ञानसे भी है जो ध्यान । महत्वका ॥ ४१ ॥
फिर है कर्म-फल-त्याग । जो है ध्यानसे भी सुभग ।
उससे श्रेष्ठ है जो भोग । शांति सुखका ॥ ४२ ॥
मिलता यज्ञसे ज्ञान होती तन्मयता फिर ।
तब पूर्ण फल-त्याग देता है शांति सत्वर ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१८

अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग

यह है ऐसा पथ । इस पथसे पार्थ ।
शांतिका ही मध्यस्थ । प्राप्त करता है ॥ ४३ ॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणा एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
भक्तकी स्थिति-गुण-विकास—
अजी प्राणि मात्रमें कहीं । द्वेषका जो नाम भी नहीं ।
आप-पर-भाव भी नहीं । चैतन्यका-सा ॥ ४४ ॥
उत्तमका करना स्वीकार । अधमका करें अस्वीकार ।
नहीं जानती ऐसा प्रकार । जैसे धरणी ॥ ४५ ॥
राजाके तनको चलाना । रंक-शरीरको हनना ।
न सोचता कृपालु प्राण । वैसा ही वह ॥ ४६ ॥
करें गायका तृषा-निवारण । विष बन व्याघ्रको दे मरण ।
न जानता ऐसा एक भी क्षण । नदी-नीर ॥ ४७ ॥
वैसे हैं सभी भूत-मात्र । उसके समान जो मित्र ।
जैसे धात्रीको है सर्वत्र । सम-भाव ॥ ४८ ॥
मैं तूकी भाषा बोलना । सुख-दुःखको जानना ।
“मेरा” ऐसा भी कहना । नहीं है उसे ॥ ४९ ॥
क्षमामें वैसी ही क्षमता । धरित्री समान योग्यता ।
संतोष नित है बढ़ता । उसकी गोदमें ॥ १५० ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
किसीका न करे द्वेष दया मैत्री बना क्षमा ।
मैं मेरा सब भूला जो सहके सुख दुःखको ॥ १३ ॥
सदा संतुष्ट जो योगी संयमी दृढ निश्चयी ।
मन-बुद्धि मुझे देता भक्त है मुझको प्रिय ॥ १४ ॥
४१९ भक्तियोग

वर्षा-ऋतुके बिना सागर । पूर्ण रहता आत्म-निर्भर ।
वैसा ही वह निरुपचार । सदा-संतुष्ट ॥ ५१ ॥
देकर अपनी सौगंध । देता है हृदयको बोध ।
इससे निश्चयमें बाध । न आता कभी ॥ ५२ ॥
हृदय-भुवनमें जिसके । एक ही आसन पे बैठके ।
शासन करते विराजके । जीव-परमात्मा ॥ ५३ ॥
ऐसी योग समृद्धि । पाकर निरवधि ।
चढाके मन-बुद्धि । मुझपे ही ॥ ५४ ॥
बाहर भीतर योग । शुद्धतामें भी सुबग ।
फिर भी ममानुराग । जिसे सप्रेम ॥ ५५ ॥
अर्जुन ऐसे जो भक्त । वही योगी तथा मुक्त ।
वह वल्लभा मैं कांत । ऐसे जान ॥ ५६ ॥
उससे मुझे जो प्रेम है । जीवनसे भी अधिक है ।
यह बात भी अपूर्ण है । कहूं कैसे ॥ ५७ ॥
अजी ! भक्तोंकी जो कहानी । मुझपे मोहके मोहिनी ।
अकथनीय है कथनी । कहलाती श्रद्धा ॥ ५८ ॥
इसीलिए जी हम । कह गये उपमा ।
वैसे तो वह प्रेम । रहता मौन ॥ ५९ ॥
रहने दो यह किरीटी । प्रिय जनोंकी यह जो गोष्टि ।
प्रेमसे जो पुलक उठी । अति वेगसे ॥ १६० ॥
उसपर भी हे पार्था । सकल संवाद-कर्ता ।
उसको यहां यथार्थ । उपमा भला ॥ ६१ ॥
इसीलिए पांडुसुता । प्रिय तू औ' तू ही श्रोता ।
फिर प्रियकी ही वार्ता । प्रसंग आया है ॥ ६२ ॥
तभी मैं अब बोलता । बोलका सुख भोगता ।
कहके हरि डुलता । आनंद मगन ॥ ६३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२०

फिर कहता यह सुन । उस भक्तके ये लक्षण ।
उसको मैं अंतःकरण । आसनार्थ देता हूं ॥ ६४ ॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
भक्त भय-उद्वेग रहित—
जैसे सागरके भीतर । भीत न होता जलचर ।
या जलचरोंसे सागर । उकताता नहीं ॥ ६५ ॥
वैसे ही उन्मत्त जगत । न करता उसे दुखित ।
तथा न ऊबता जगत । उससे कभी ॥ ६६ ॥
अथवा मान तू पांडव । जैसे तनको अवयव ।
नहीं ऊबते वैसे जीव । औ' जीवोंसे वह ॥ ६७ ॥
विश्व ही जैसे देह हो गया । इसलिए प्रिया-प्रिय गया ।
हर्ष शोकादि द्वन्द्व भी गया । द्वैत मिटनेसे ॥ ६८ ॥
ऐसा द्वन्द्वसे जो मुक्त । भय उद्वेग रहित ।
फिर भी अनन्य भक्त । वह मेरा ॥ ६९ ॥
तभी है वह मेरा प्रिय । दिखाऊँ कैसा मेरा हिय ।
वह है मुझमें तन्मय । इससे जीता हूं ॥ १७० ॥
जो है निजानन्दमें तृप्त । मानो ब्रह्मको जन्म प्राप्त ।
पूर्णताका वह है आप्त । वल्लभ जैसा ॥ ७१ ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
ऊबता जो न लोगोंसे न ऊबे उससे जन ।
हर्ष-शोक भय क्रोध न जाने जो मुझे प्रिय ॥ १५ ॥
नहीं व्यथा उदासीन दक्ष निर्मल निस्पृह ।
तजे आरंभ जो सारे भक्त है मुझको प्रिय ॥ १६ ॥
४२१ भक्तियोग

संतका पावन चरित—
न है उसमें अपेक्षा । वैसी ही नहीं उपेक्षा ।
जीवन बिन आकांक्षा । केवल आत्मोत्कर्ष ॥ ७२ ॥
मोक्ष देनेमें उदार । काशी नामका आदर ।
किंतु उसमें शरीर । त्यजना होगा ॥ ७३ ॥
पाप हरता हिमवंत । भयभीत कर जीवित ।
संतका पावन चरित । वैसा नहीं ॥ ७४ ॥
पावन है गंगोदक । पाप तापका शामक ।
किंतु उसमें है एक । डूबनेका भय ॥ ७५ ॥
गहराई जिसकी अपार । किंतु डूबनेका है डर ।
रोकड़ मोक्षका है घर । जीवनमें ही ॥ ७६ ॥
संतोंके चरण स्पर्शसे । मुक्त है गंगा भी पापसे ।
ऐसे संत-संगके कैसे । कहना शुचित्व ॥ ७७ ॥
अजी ! यह रहने दो अब । बना तीर्थोंका आश्रय सब ।
धोकर मनका मल शुभ- । शुचित्वसे ॥ ७८ ॥
होता तन मनसे निर्मल । सूर्यके समान है उज्ज्वल ।
तत्त्वार्थिथोंमें है पायल । ब्रह्म-धनका ॥ ७९ ॥
व्यापक तथा उदास । रहता जैसे आकाश ।
वैसे उसका मानस । सदा-सर्वत्र ॥ १८० ॥
जो है संसार-व्यथासे मुक्त । निरपेक्षाळंकार-भूषित ।
मानो व्याध-बाणसे विमुक्त । विहंगमसा ॥ ८१ ॥
सुखमें जो है लीन सतत । न होती कभी टीस प्रतीत ।
न जाने जैसे लज्जाको प्रेत । उसी भांति ॥ ८२ ॥
तथा कार्यारंभका है नहीं । अहंकार तनिक भी कहीं ।
जैसा निर्इंधन होके वह्नि । बुझ जाता है ॥ ८३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२२

ऐसा हुआ जब उपशम । मोक्ष-सत्रमें लिखाया नाम ।
हुआ है वह निष्काम-काम । धनंजय ॥ ८४ ॥
अर्जुन वह यहीं पर । सोऽहं भावसे भरकर ।
पहुंच चुका उस पार । द्वैत-भावके ॥ ८५ ॥
किंतु भक्ति-सुखके कारण । कर अपना दो विभाजन ।
सेवा धर्मका अंगीकरण । करता आप ॥ ८६ ॥
अन्यको है मैं कहता । फिर स्तोत्र नहीं होता ।
भक्तिका मार्ग दिखाता । योगी वह ॥ ८७ ॥
हमें है उसका व्यसन । उसका ही निज-ध्यान ।
या उसमें ही समाधान । मिलता हमको ॥ ८८ ॥
उसके लिये रूप-धारण । इस विश्वमें अवतरण ।
न्योछावर है उसपे प्राण । सर्व-भावसे ॥ ८९ ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
जो आत्म लाभके समान । सुन्दर कछु नहीं आन ।
तभी भोगमें न दें मन । न हो आनंदित ॥ ९० ॥
आप ही है विश्व बन गया । भेद भाव सहज धो गया ।
तब द्वेश भी है मिट गया । उस पुरुषका ॥ ९१ ॥
जो है अपना संतत्व । कल्पांतमें है अस्तित्व ।
तभी भूतका है स्वत्व । कभी न सोचता ॥ ९२ ॥
तथा उसके परे कुछ भी नहीं । अपना जो है अपने पास यहीं ।
तभी उसकी आकांक्षा है ही नहीं । कुछ भी कभी ॥ ९३ ॥

न उल्लास न संताप न चाह सोच भो नहीं ।
भला बुरा सभी छोडा भजता जो मुझे प्रिय ॥ १७ ॥
४२३ भक्तियोग

बीभत्स है या सुंदर । न जाने वह अंतर ।
जैसे जाने ना भास्कर । दिन औ' रात ॥ ९४ ॥
ऐसे बोधसे केवल । रहता है जो निष्कल ।
फिर भी भजनशील । मुझमें वह ॥ ९५ ॥
उसके समान और । नहीं हमें प्रियकर ।
कहता हूं धनुर्धर । सौगंध तेरी ॥ ९६ ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥
भक्तकी सम-भावना—
जिसके मनमें पार्था । नहीं वैषम्यकी वार्ता ।
रिपु-मित्रकी समता । रहे सदा ॥ ९७ ॥
अपनोंको प्रकाश देना । परायोंको अंधेरा देना ।
जैसा दीप यह सोचना । जानता नहीं ॥ ९८ ॥
करता जो वृक्ष-छेदन । या करता गाछ-पालन ।
दोनोंको दे छाया समान । जैसा वृक्ष ॥ ९९ ॥
मालीको देता मीठा रस । पेरकको न खट्टा रस ।
सबको है मधुर रस । देता ईख-सा ॥ २०० ॥
शत्रु-मित्रमें तैसा । उसका भाव ऐसा ।
रहता है एकसा । मानापमानमें ॥ १ ॥
तीनों ऋतुओंमें समान । रहता है जैसा गगन ।
वैसा ही एक समान । शीतोष्ण जिसे ॥ २ ॥
दक्षिण उत्तर मारुत । जैसा है मेरु पांडुसुत ।
तैसा सुख दुःख हो प्राप्त । मध्यस्थ है जो ॥ ३ ॥
सम जो शत्रु-मित्रोंमें मानापमानमें सम ।
शीतोष्ण सुख दुःखोंमें क्लिप्त सम-भावसे ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२४

चंद्रिकाकी शीतलता । राजा रंककी समता ।
वैसे जो सकळ भूत । है सामान ॥ ४ ॥
संपूर्ण जगत एक । जैसे सेवन उदक ।
वैसे उसकी त्रिलोक । करते चाह ॥ ५ ॥
अंतर बाह्य संग । करके सब अंग ।
शून्य हो अन्तरंग । वस्तुलीन ॥ ६ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
विश्व ही मेरा घर ऐसी जिसकी मति--
निंदासे जो न खिन्न । स्तुतिसे न प्रसन्न ।
रहे जैसा गगन । निर्लेप ॥ ७ ॥
जो निंदा और स्तुति । रखके एक पांति ।
रमता प्राण-वृत्ति । सदा-सर्वत्र ॥ ८ ॥
सत्यासत्यको जो समान । बोलकर रहता मौन ।
भोगता है सदा उन्मन । अतृप्त भावसे ॥ ९ ॥
लाभसे जो न हरषाता । न अलाभसे कुम्हलाता ।
वर्षाके बिन ना सूखता । समुद्र जैसा ॥ २१० ॥
जैसा वायुका इक ठौर । रहता नहीं है आधार ।
वैसा ही न उसका घर । कहीं रहता ॥ ११ ॥
संपूर्ण आकाश स्थिति । वायुकी नित्य-वसति ।
वैसे है विश्व विश्रांति- । स्थान उसका ॥ १२ ॥
विश्व ही यह मेरा घर । ऐसी मति जिसकी स्थिर ।
या हुआ जो सचराचर । अपनेमें आप ॥ १३ ॥
स्तुति-निंदा तजे मौनी संतुष्ट प्राप्त-भोगमें ।
स्थिर-बुद्धि निराधार भक्त जो है मुझे प्रिय ॥ १९ ॥
४२५ भक्तियोग
(54)

इस पर भी हे पार्थ । मेरे भजनमें आस्था ।
उसको करू मैं माथा । पर मुकुट ॥ १४ ॥
उत्तमको मस्तक । नमाना क्या कौतुक ।
मान देता त्रिलोक । पद रेणुको ॥ १५ ॥
श्रद्धा वस्तुका आदर । करना जानो प्रकार ।
होता है यदि शंकर । श्री गुरु ॥ १६ ॥
रहने दो यह भाषा । करनेमें है प्रशंसा ।
शंभुकी होती सहसा । आत्म-स्तुति ॥ १७ ॥
रहने दो यह उक्ति । कहता है रमापति ।
लेकर करता स्तुति । माथेपे उसे ॥ १८ ॥
अपने भक्तके अलिंगनके लिये दो हाथ कम पडे—
सिद्धि चौथा पुरुषार्थ । लेकर अपने हाथ ।
चला है जो भक्ति-पंथ । देते विश्वको ॥ १९ ॥
कैवल्यका ले अधिकार । करे मोक्षका व्यवहार ।
रहता नम्र जैसा नीर । स्वभावसे ॥ २२० ॥
उसको करूंगा नमस्कार । मुकुट धरूंगा सिरपर ।
चरण हृदय पीठ पर । पूजूंगा मैं ॥ २१ ॥
उसके गुणका भूषण । होगा मेरी वाणीका गान ।
उसकी कीर्तिका श्रवण । प्रेमसे करूंगा ॥ २२ ॥
उसके दर्शनका प्रलोभन । बने मुझ अचक्षुके नयन ।
करूं लीला सुमनसे पूजन । उसका मैं ॥ २३ ॥
अजी ! दो पर दो और । कर लेकर मैं चार ।
आलिंगनार्थ आतुर । आया उसके ॥ २४ ॥
उसके संगके सुखके लिये । आया हूं विदेही मैं देह लिये ।
उसके प्रेम बखानके लिये । वाणी है असमर्थ ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२६

उसका मैं हूं मित्र । उसमें क्या विचित्र ।
सुनता जो चरित्र । उसका वह ॥ २६ ॥
करता है गुणगान । उससे भी मैं प्रसन्न ।
वह है प्राण समान । मुझको प्रिय ॥ २७ ॥
अजी ! यह सांगत । कहा है जो प्रस्तुत ।
भक्तियोग समस्त । योग-रूप ॥ २८ ॥
करता उसका आदर । धरता उसे सिरपर ।
उस स्थितिकी है अपार । श्रेष्ठता सुन ॥ २९ ॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
भक्त क्या ? मुझे अत्यधिक मधुर है—
गोष्ठि है यह रम्य । अमृत धारा धर्म्य ।
करें प्रतीति-गम्य । सुनकर ॥ २३० ॥
श्रद्धाका जिसमें आदर । उरमें इसका विस्तार ।
होता है चितमें सत्वर । अनुष्ठान सुलभ ॥ ३१ ॥
जैसे किया है निरूपण । वैसे ही मनका धारण ।
तभी सुक्षेत्रमें रोपणं । हुआ मानो ॥ ३२ ॥
मुझे मानकर परम । इसीलिये करके प्रेम ।
यही सर्वस्व सर्वोपम । मान लेते जो ॥ ३३ ॥
विश्वमें अजी पार्थ । वही योगी औ' भक्त ।
उत्कंठा है तदर्थ । मुझको सदा ॥ ३४ ॥
वही तीर्थ वही क्षेत्र । विश्वमें हैं वे पवित्र ।
भक्ति कथाका हैं मित्र । सदैव ही ॥ ३५ ॥
——————
जो धर्म-सार है नित्य मुझमें लीन होकर ।
सेते श्रद्धालु जो भक्त अत्यंत प्रिय है मुझे ॥ २० ॥
४२७ भक्तियोग

करता म उनका ध्यान । मेरा यह देवतार्चन ।
उस बिना माने ना मन । दूसरा भला ॥ ३६ ॥
उसका है मुझे व्यसन । मेरा वह निधि निधान ।
अथवा मेरा समाधान । उनके मिलनमें ही ॥ ३७ ॥
ऐसी प्रेमकी वार्ता । जो है अनुवादता ।
है परम देवता । हमारी वह ॥ ३८ ॥
ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण—
जो है निज-जनानंद । तथा जगदादिकंद ।
कहता है श्री मुकुन्द । बोला संजय ॥ ३९ ॥
होता है जो निर्मल । निष्कल लोक कृपाल ।
शरणागत प्रतिपाल । शरण्य वह ॥ ४० ॥
वह है धर्म-कीर्ति धवल । अगाध-दातृत्वमें सरल ।
तथा अतुल बल प्रबल । बलि बंधन ॥ ४१ ॥
सुर-सहायशील । लोक-लालन-लील ।
प्रणत-प्रतिपाल । खेल जिसका ॥ ४२ ॥
भक्त-जन-वत्सल । प्रेमी-जन-प्रांजल ।
सत्य-केतू सरल । कला निधि ॥ ४३ ॥
वह कृष्ण वैकुंठका । चक्रवर्ति अपनोंका ।
कहता बोल प्रेमका । सुनता पार्थ ॥ ४४ ॥
संजय कहता श्रीकृष्ण । अब करेंगे निरूपण ।
कीजिये आप श्रवण । धृतराष्ट्रसे ॥ ४५ ॥
ज्ञानदेव कहता तुम । संत सेवा करना हम ।
सिखाया है महा-महिम । निवृत्तिनाथने ॥ ४६ ॥
गीता श्लोक ५५
ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.