ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
१३
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
आत्म-रूपी गणेश वंदन—
आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण ।
नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन ।
चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥
तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता ।
नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥
भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र ।
हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥
श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय ।
महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥
उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान ।
कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥
भगवान उवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
श्रीभगवानने कहा
इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू ।
जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥
आत्मानात्म विचार-
सुन तू अब यह पार्था । देह है क्षेत्र कहलाता ।
इसको जो सही जानता । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७ ॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
यहां है जो क्षेत्रका पालक । मुझको जान क्षेत्रज्ञ एक ।
बन सभी क्षेत्रका रक्षक । रहता हूं मैं ॥ ८ ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको मान । जानना है यहां ज्ञान ।
समझें हम अर्जुन । इस समय ॥ ९ ॥
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥
तभी हमने है क्षेत्र कहा । किस भावसे देहको यहां ।
कहता हूं प्रयोजन सह । सुन तू पार्थ ॥ १० ॥
इसको क्षेत्र क्यों कहना । इसका पैदा कैसा होना ।
किन विकारोंसे बढ़ना । कहता हूं यही ॥ ११ ॥
यह क्या तीन अर्ध हाथका है । या इससे भी अधिक बड़ा है ।
यह बंजर है या उर्वरा है । तथा है किसका ॥ १२ ॥
इत्यादि इसके सर्व । जो जो हैं वे सभी भाव ।
कहूंगा यह अपूर्व । सुन तू सावधान हो ॥ १३ ॥
शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार-
क्षेत्रज्ञ मुझको जान बसा मैं सब क्षेत्रमें ।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञका ज्ञान उसे मैं ज्ञान मानता ॥ २ ॥
क्षेत्र क्या उसमें कैसे विकार रहते कहो ।
कैसा क्षेत्रज्ञ कौन कहवा सुन तू यह ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३०
अजी ! इसी स्थलके कारण । श्रुतिका चलता है भाषण ।
तर्ककी वाद वैखरी तीक्ष्ण । इसके लिये है ॥ १४ ॥
छाननेमें यह स्थान । थक गये हैं दर्शन ।
मिटे नहीं जो घर्षण । उनके कभी ॥ १५ ॥
अजी ! शास्त्रोंका भी नाता । इससे ही है टूटता ।
तथा इसीसे जुड़ता । झगडा जगतका ॥ १६ ॥
बातसे बात न मिलती । एक-वाक्यता नहीं होती ।
बनके वाचालता युक्ति । हुई समर्थ ॥ १७ ॥
न जाने किसका है यह स्थल । किंतु कैसी अभिलाषाका बल ।
घर घरमें है यह कपाल- । मोक्ष गाथा ॥ १८ ॥
नास्तिकोंसे करने मुठभेड़ । वेदोंने किया विद्रोह प्रचंड ।
उसको देख कर हैं पाखंड । बकवाद करते ॥ १९ ॥
कहते तुम निर्मूल । झूठा तुम्हारा वाग्जाल ।
प्रण हमारा है सबल । बीडा उठाकर ॥ २० ॥
पक्ष है जो पाखंड । नग्न लुंचित-मुंड ।
नियोजित वितंड । आते भानपे ॥ २१ ॥
मृत्यूके कसे हुए पाशमें । जायेगा यह इस भयमें ।
चले योगी-जन निर्णयमें । इस क्षेत्रके ॥ २२ ॥
मृत्यूसे हैं जो भयग्रस्त । करते वनमें एकांत ।
यम-दम-अभ्यास-रत । हो पाते पूर्ण ॥ २३ ॥
इस क्षेत्राभिमान मगन । कैलास तजता है ईशान ।
बसता है जाकर स्मशान । उलझन भयसे ॥ २४ ॥
इस प्रतिज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर ।
करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ २५ ॥
तथा सत्य-लोक-नाथ । वदन चार वादार्थ ।
किंतु वे नहीं सर्वथा । जानते कुछ ॥ २६ ॥
३३१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वर द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें भिन्न भिन्न मतोंका विवेचन—
आत्मानात्म विवेक जीववादी दृष्टिसे-
एक कहता यह स्थल । जीवका ही है सहमूल ।
फिर प्राण है यह कुल । उसका यहां ॥ २७ ॥
घरमें उस प्राण के । चार भाई जो उसके ।
तथा मन-सा जिसके । प्रबंधक है ॥ २८ ॥
इन्द्रिय-बैलोंका जो समूह । नहीं देखता काल प्रवाह ।
करता है श्रम बिना आह । विषय-खेतमें ॥ २९ ॥
खोकर विहित-कर्म अवसर । अन्याय-बीजकी बुवाई कर ।
कुकर्मार्थ सब परिश्रम कर । फसल काटता ॥ ३० ॥
तभी उसीके समान । पाता है पाप जो मन ।
भोगता दुःख महान । जन्म-कोटि ॥ ३१ ॥
या विधिवत कर उद्यान । किया सत्कर्म-बीजारोपण ।
शत शत है जन्मानुदिन । सुख-भोग ॥ ३२ ॥
प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे—
कहते हैं तब कुछ औ । जीवका न कहो यह ठौर ।
हमसे जानो इसका विचार । पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
अजी ! है यहां जीव पथिक । चलती राहमें रहा रुक ।
प्राण है जो यहां मालिक । जग रहा है ॥ ३४ ॥
यहां जो अनादि प्रकृति है । सांख्य जिसके गीत गाते हैं ।
खेत यह उसकी वृत्ति है । जान तू यह ॥ ३५ ॥
गाया विविध मंत्रोंमें ऋषियोंने इसे पृथक् ।
कहा है ब्रह्म-सूत्रोंमें सप्रमाण सुनिश्चित ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३२
इसके पास है साधन । घरका ही है बारदान ।
तब बनती है किसान । अपने आप ॥ ३६ ॥
झमेलेमें नित चतुर । इसके हैं तीन कुमार ।
करते सब कारोबार । गुण हैं जो ॥ ३७ ॥
रजो-गुण बुवाई करता । सत्व जो उसको संभालता ।
तमोगुण फसल काटता । अकेला ही ॥ ३८ ॥
महत्तत्वका रच खलिहान । काल-सांडसे कराके मांडन ।
अव्यक्तका वहां ढेर महान । होता रहता है ॥ ३९ ॥
संकल्प वादियोंकी दृष्टिसे-
तब कहते कुछ बुद्धिमान । प्रकृति वादियोंसे बुरा मान ।
यह है अति आर्वाचीन । आप लोगोंका ॥ ४० ॥
अजी ! चित देकरके हो स्वस्थ । सुनो तुम यह क्षेत्र-वृत्तांत ।
तत्वमें कहां प्रकृतिकी बात । कहते हैं यह ॥ ४१ ॥
वह शून्य शय्यागृहमें । पूर्णावस्थाकी लीनतामें ।
शक्त-संकल्पने शय्यामें । निद्रा की थी ॥ ४२ ॥
जगा जो वह अकस्मात । उद्योगमें था भाग्यवंत ।
मिली है पूंजी अमानत । इच्छ-मात्रसे ॥ ४३ ॥
निराकारके उद्यानमें । त्रिभुवनकी समतामें ।
आया जो है व्यक्त रूपमें । उससे यह ॥ ४४ ॥
महा-भूतोंकी जो ऊसर । कसके उसे उर्वर ।
भूतग्रामके बांधे चार । सीमा-मेड़ें ॥ ४५ ॥
अजी ! प्रारंभ किया फिर । पंच तत्वात्मक शरीर ।
समुचित मिश्रण कर । पंच-भूतका ॥ ४६ ॥
कर्माकर्मके पत्थर । रख बांधे दोनों ओर ।
किया है अति उर्वर । ऊसर था जो ॥ ४७ ॥
आवागमनार्थ यहां फिर । जन्म मृत्युके बांधे गन्हर ।
रक्षाका ऐसा प्रबंध कर । संकल्पने तब ॥ ४८ ॥
४३३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(55)
अहंकारसे हो एक । वह भी पूर्णायुतक ।
बुद्धिसे कार्य कृषक । कराया चराचर ॥ ४९ ॥
इस भांति है निराली । बडी संकल्पकी डाली ।
इसीलिये है वह मूली । यहां प्रपंचकी ॥ ५० ॥
ऐसे हैं यह मत-मुक्तक । व्यक्त हुए हैं जब शाब्दिक ।
जी ! आप हैं बडे विचारक । कहते हैं और ॥ ५१ ॥
स्वभाव-वादियोंकी दृष्टिसे--
अजी ! गांवमें पर-तत्वके । पर्यंकको देखें संकल्पके ।
तो क्यों प्रकृति-वादियोंके । तर्क नहीं माने ॥ ५२ ॥
किंतु ऐसा नहीं कहना । इसमें तुम्हें न पडना ।
कहा जायेगा यह पूर्ण । हमसे अब ॥ ५३ ॥
आकाश कहो है कौन । भरता मेघोंसे पूर्ण ।
अधरमें तारा-गण । कौन रखता ॥ ५४ ॥
गगनका यह वितान । किसने ताना महान ।
होता वायुका संचालन । किसकी आज्ञासे ॥ ५५ ॥
रोमोंकी बुवाई करता कौन । समुद्रको सदा भरता कौन ।
पर्जन्य धाराको गिराता कौन । कहो यहां ॥ ५६ ॥
यह क्षेत्र है ऐसा स्वाभाविक । न है कोई इसका मालक ।
पाता है जो करता देखरेख । अन्य नहीं कोई ॥ ५७ ॥
कालवादिकी दृष्टिसे--
कहता है तब और एक । तुम कहते हो बडा नेक ।
कहो कैसे भोगता है एक । केवल काल ॥ ५८ ॥
यह क्रोधी मृत्यु-सिंहका । गह्वर अपना उसका ।
नहीं क्या व्यर्थ प्रलापका । सही उत्तर ॥ ५९ ॥
सभी हैं इसकी मार । देखते हैं अनिवार ।
किंतु स्व-मतपे भार- । वे बोलते हैं ॥ ६० ॥
ज्ञा.-
नेश्वरी
४३४
महा कल्पके उस ओर । यकायक झपट्टा मार ।
प्रहार भद्र जाती पर । किया सत्य लोकके ॥ ६१ ॥
नित-नव नव लोकपाल । तथा दिग्गजोंको यह काल ।
स्वर्ग-काननमें जा विपुल । तोड़ता रहता ॥ ६२ ॥
शरीर-समीरसे इसके । गर्तमें जनम-मरणके ।
भूमिष्ठ पडे निर्जीव होके । जीव-मृग हैं ॥ ६३ ॥
फैला है इसका पंजा । मानो यह है शिंकजा ।
बनाके आकर गज- । करता है ग्रास ॥ ६४ ॥
इसीलिये कालकी सत्ता । कहते हैं हम निश्चित ।
ऐसा वाद है पांडुसुत । इस क्षेत्रका ॥ ६५ ॥
इस क्षेत्रके विषयमें सभी अज्ञानमें हैं—
कर चुका है वाद विपुल । नैमिशारण्यमें ऋषि-कुल ।
पुराण इसके अनुकूल । आधार रूप हैं ॥ ६६ ॥
हैं अनुष्टुप आदि छंद । इस विषयमें विविध ।
होते हैं आधार स-श्रध्द । आज भी लोगोंके ॥ ६७ ॥
वेदोंके बृहत्साम-सूत्र । जो हैं अतिशय पवित्र ।
उसको भी है यह क्षेत्र । अज्ञात-रूप ॥ ६८ ॥
अन्य और अगणित । महा-कवि बुद्धिमंत ।
इसपे अपना मत । देते रहते हैं ॥ ६९ ॥
किंतु यह किसका है । किसके स्वामित्वमें है ।
समझमें न आता है । किसीक भी ॥ ७० ॥
अजी ! यह है जैसे । अब क्षेत्र है कैसे ।
कहता मैं तुझसे । सुन सायन्त ॥ ७१ ॥
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
पंच भूत अहंकार बुद्धि अव्यक्त मूल जो ।
एकादश इंद्रियोंको खींचे विषय पंचक ॥ ५ ॥
४३५
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व—
है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक ।
बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥
और भी है एक । विषय-दशक ।
द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥
तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति ।
कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥
कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ ।
औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥
पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन ।
ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥
अहंकारका रूप—
जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन ।
या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥
बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन ।
या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥
अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें ।
वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥
अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर ।
होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥
ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर ।
नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥
इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना ।
विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३६
अहंकारका इक अचरज है । अज्ञानियोंको जो नहीं सताता है ।
ज्ञानियोंको ही नचाता रहता है । सिर पर चढ़के ॥ ८२ ॥
बुद्धिका लक्षण—
बुद्धिके जो लक्षण । जान ले तू अर्जुन ।
कहता है श्रीकृष्ण । यदुराज ॥ ८३ ॥
कंदर्पका ले सहाय । वृत्ति-सह जो इन्द्रिय ।
जीत लाते हैं विषय । धनुर्धर ॥ ८४ ॥
सुख दुःखके लूटका माल । जीवको अंतरंग सकल ।
दिखाता तब देता फैसला । चुनावमें योग्य ॥ ८५ ॥
यह है क्लेष या तोष । है यह गुण या दोष ।
मैला है या यह चोख । दिखाता सब ॥ ८६ ॥
अधमोत्तम जिसे सूझता । छोटा बड़ा है जो देख पाता ।
अपनी दृष्टिसे परखता । विषयोंको जो ॥ ८७ ॥
तेज तत्वका आदि । सत्व-गुणकी वृद्धि ।
आत्म-जीवकी संधि । जागृत रखता ॥ ८८ ॥
अव्यक्त प्रकृतिका रूप
जान तू यह अर्जुन । बुद्धि-तत्त्व है संपूर्ण ।
अब सुन पहचान । अव्यक्तकी ॥ ८९ ॥
जिसको है सांख्य सिद्धांत । करता प्रकृति घोषित ।
यहांपे है यही प्रस्तुत । अव्यक्त जो ॥ ९० ॥
तथा है सांख्य-योगके मतसे । प्रकृति-विचार कहा तुझसे ।
जहां प्रकृतिके दोनों रूपसे । तू है परिचित ॥ ९१ ॥
दूजी जो वहां जीव दशा । जिसका नाम है वीरेशा ।
उसे यहां अव्यक्त ऐसा । कहा गया है ॥ ९२ ॥
रजनीका होते ही अस्त । नभमें होते तारा लुप्त ।
रुकती होनेपे सूर्यास्त । भूतमात्रकी क्रिया ॥ ९३ ॥
४३७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
देह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन ।
कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥
बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त ।
अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥
वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम ।
लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥
उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना ।
अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥
इंद्रिय विवेचन ---
यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण ।
इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥
मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके ।
करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥
फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार ।
तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥
ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण ।
कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥
प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती ।
तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥
ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन ।
कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥
मनका विवेचन ---
इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार ।
अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥
आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा ।
व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३८
तथा-शुक्रशोणित मिलन । देता है पंच-तत्वको चिह्न ।
एक वायु-तत्व अर्जुन । बनता दस रूप ॥ ६ ॥
फिर यह दस प्रकार । देहका सामर्थ्य लेकर ।
अपने निज स्थान पर । हुए प्रतिष्ठित ॥ ७ ॥
वहां चांचल्य चपल । रहा जो एक केवल ।
इससे रजका बल । लिया उसने ॥ ८ ॥
बुद्धिके वह बाहर । अहंताके डर पर ।
ऐसे मध्य-स्थान पर । दृढ हो बैठा ॥ ९ ॥
व्यर्थ है उसका नाम मन । जो मात्र कल्पना मूर्तिमान ।
उसके संगसे मिला जान । वस्तुको जीव भाव ॥ ११० ॥
प्रकृतिका है जो मूल । कामको जिसका बल ।
चेतता है जो प्रबल । अहंकार ॥ ११ ॥
इच्छाको वह बढ़ाता । आशाको वह चढ़ाता ।
रक्षण नित करता । भयका जो ॥ १२ ॥
द्वैतका जो उगम-स्थान । अविद्या करे बलवान ।
इन्द्रियोंका करे पतन । विषयोंमें ॥ १३ ॥
संकल्पोंसे है सृष्टि रचता । विकल्पोंसे उसको तोड़ता ।
मनोरथोंका ढेर चढा था- । उतराता वह ॥ १४ ॥
भ्रांतिका जो भंडार । वायु तत्व्-अंतर ।
तथा बुद्धिका द्वार । करता बंद ॥ १५ ॥
यह कहलाता मन । अन्य कछु नहीं जान ।
अब विषयाभिदान । बताता हूं ॥ १६ ॥
विषयोंका स्पष्टीकरण-
स्पर्श तथा शब्द । रूप रस गंध ।
हैं ये पंच-विध । ज्ञानेंद्रियोंके ॥ १७ ॥
४३९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इन द्वारोंसे निरंतर । दौड़ता है ज्ञान बाहर ।
भ्रांत हो जैसा जानवर । हरा चारा देख ॥ १८ ॥
फिर स्वर वर्ण विसर्ग । अथवा स्वीकार औ' त्याग ।
तथा संक्रमण उत्सर्ग । विण्मूत्रोंका ॥ १९ ॥
कर्मेंद्रियोंके पांच । विषय हैं ये सच ।
बांध करके माच । चलती क्रिया ॥ १२० ॥
ऐसे दस बसे हैं । देहमें विषय हैं ।
इच्छा जो कहाती है । कहते अब ॥ २१ ॥
इच्छाका स्वरूप तथा द्वेष—
गत भोग जब है स्मरता । या ऐसा शब्द कानपे आता ।
तो कानपे हाथ रख जाता । न तो वृत्ति-जगती ॥ २२ ॥
विषयेंद्रिय भेंट होती । तभी वह जाग उठती ।
कामका हाथ धर वृत्ति । उठती जो ॥ २३ ॥
अजी ! उठनेसे यह वृत्ति । मनकी होती तीव्र-गति ।
जहां नहीं जाना वहां जाती । ललचाकर इन्द्रियां ॥ २४ ॥
जिस प्रवृत्तिके लोभसे । बुद्धि हो पगलाई जैसे ।
इन्द्रियां लुब्ध हो उससे । वह है इच्छा ॥ २५ ॥
इन्द्रियोंका जो इच्छित विषय । नहीं पाती वे जब धनंजय
तब अनुभवती जो इन्द्रिय । वह है द्वेष ॥ २६ ॥
सुख दुःखका स्वरूप—
कहता हूं अब सुख । वह ऐसा है तू देख ।
जिस एकसे अशेष । भूले सब जीव ॥ २७ ॥
अजी ! तन मन वचन । अपनी सौगंधसे जान ।
देह-स्तुतिको बल-हीन । करते आता ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४०
पानेसे जिसे अर्जुन । शिथिल होता है प्राण ।
दूना होता है सत्व-गुण । पहलेसे भी ॥ २९ ॥
इन्द्रिय-वृत्तियोंको संपूर्ण । हृदयमें ला एकांत स्थान ।
करता है शांत निद्राधीन । पुचकारकर ॥ १३० ॥
कहूं क्या इससे अधिक । जीव होता आत्मासे एक ।
उस स्थितिका नाम सुख । पांडुकुमार ॥ ३१ ॥
तथा ऐसी अवस्था । न पाके जीना पार्थ ।
तुम जानो सर्वथा । नाम दुःखका ॥ ३२ ॥
मनोरथ जो संगसे नहीं । वैसे वह स्वयं-सिद्ध है ही ।
इन दोनोंके कारणसे ही । सुख है औ' दुःख ॥ ३३ ॥
चेतनाका विवेचन—
अब है असंग औ' साक्षी-भूत । जिसकी सत्ता देहमें सतत ।
नाम उसका यहां पांडुसुत । चेतना है ॥ ३४ ॥
नखसे जो शिख पर्यंत । तन पे सर्वत्र जागृत ।
नहीं होता परिवर्तित । अवस्थात्रयमें ॥ ३५ ॥
मन-बुद्धि आदि प्रफुल्लित । औ' प्रवृत्ति-वनमें वसंत ।
खिला रहता जिससे पार्थ । सदैव ही ॥ ३६ ॥
जडाजड़से समान । करता है जो वर्तन ।
कहता हूं मैं चेतन । यह नहीं मिथ्या ॥ ३७ ॥
राजा परिवार नहीं जानता । आज्ञासे पर-चक्र दूर होता ।
पूर्ण-चंद्र देख उमड़ आता । महा-सागर ॥ ३८ ॥
या चुंबकका सन्निधान । करता लोहेको चेतन ।
सूर्य-संगसे होते जन । कार्य-प्रवृत्त ॥ ३९ ॥
मुख लगाये बिन । पिल्लोंका है पोषण ।
करती है अर्जुन । कूर्मी जैसे ॥ १४० ॥
(56) ४४१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
उसी भांतिसे अर्जुन । आत्म-संगसे है तन ।
प्राप्त करता जीवन । जड़ है जो ॥ ४१ ॥
इसको है चेतन । कहते हैं अर्जुन ।
धृतिका विवेचन । सुन तू अब ॥ ४२ ॥
धृतिका विवेचन—
पंच तत्वमें परस्पर । जाति-स्वभावसे है वैर ।
डुबोता है पृथ्विको नीर । प्रकट रूपसे ॥ ४३ ॥
पानीको तेज सोखता । वायु तेजसे लड़ता ।
वायुका नाश करता । गगन सहज ॥ ४४ ॥
कभी किसीमें न मिलकर । किसीसे मिलन न होकर ।
पैठकर भी भिन्न भीतर । रहता आकाश ॥ ४५ ॥
पंच-भूत ऐसे परस्पर । करते रहते सदा वैर ।
किंतु एक बनके शरीर । रूप होता प्रकट ॥ ४६ ॥
शत्रुता छोड भीषण । रहते कर संघटन ।
परस्पर कर पोषण । अपने गुणसे ॥ ४७ ॥
जिनमें स्वभावसे शत्रुता । रहती है वे कर मित्रता ।
जिस गुणसे है यह होता । धृति उसका नाम ॥ ४८ ॥
संघात और क्षेत्र-विवेचन—
तथा जीव सह साथ । छत्तीस है यहां साथ ।
वह है यहां संघात । तत्व जान ॥ ४९ ॥
ऐसे छत्तीस ही भेद । किये तुझसे विशद ।
इसको जान प्रसिध्द । क्षेत्र है यह ॥ १५० ॥
जैसे रथांगोंका समुदाय । रथ कहलाता धनंजय ।
या शरीरावयव इंद्रिय । कहलाता शरीर ॥ ५१ ॥
करि तुरंगादिका समाज । कहलाता है सैन्य सहज ।
वाक्य कहलाते हैं जो पुंज । शब्दोंके ॥ ५२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४२
जल-धरोंके मंडल । कहलाते हैं बादल ।
अनेक लोक सकल । कहलाता जगत ॥ ५३ ॥
या तेल बात अगिन । आते जब एक स्थान ।
दीप कहते हैं जान । धनंजय ॥ ५४ ॥
ये जो छत्तीस ही तत्व । मिलते हैं हो एकत्र ।
वह समूह-परत्व । कहलाता क्षेत्र ॥ ५५ ॥
बोआईके व्यवहारसे । पाप-पुण्य पक जानेसे ।
हमने कहा कौतुकसे । क्षेत्र है यह ॥ ५६ ॥
अनेकोंका है मत । देह है यह पार्थ ।
इसके हैं अनंत । यहां नाम ॥ ५७ ॥
इस ओर परतत्वके । औ' उस ओर स्थावरके ।
होता जाता है जो उसके । नाम क्षेत्र है ॥ ५८ ॥
किंतु सुर-नर-उरग । आदि होते योनि-विभाग ।
सब गुण-कर्मके संग । भिन्न हैं पार्थ ॥ ५९ ॥
यह गुण-विवेचन । आगे आता है अर्जुन ।
प्रस्तुत है यहां ज्ञान- । रूप दिखाऊं ॥ १६० ॥
ज्ञानकी महानता, ध्यानकी विविधता—
तुझे क्षेत्र सविस्तर । मैंने कहा स-विकार ।
सुन अब तू उदार । ज्ञानका रूप ॥ ६१ ॥
जिस ज्ञानार्थ योगी-जन । स्वर्गका कर उल्लंघन ।
निगलते सदा गगन । धनंजय ॥ ६२ ॥
सिधिकी आस न करते । ऋद्धिका ध्यान न धरते ।
योगके कष्ट हैं सहते । तुच्छ मानके ॥ ६३ ॥
तप-दुर्गोंको पार करते । यज्ञादि अनुष्ठान करते ।
तथा उलटाकर छोड़ते । कर्म-वल्ली ॥ ६४ ॥
४४३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
कुछ जो भजन मगन । दौडते हैं खुले बदन ।
कुछ सुरंगमें अर्जुन । घुसते सुषुम्नाके ॥ ६५ ॥
ऐसे हैं इस ज्ञानार्थ । मुनीश्वर जो इच्छित ।
फिरते हैं पात पात । वेद-तरुके ॥ ६६ ॥
देगी यह गुरु-सेवा । इस बुध्दिसे पांडव ।
करते जन्मका ठेवा । न्योच्छावर ॥ ६७ ॥
अजी ! प्रवेश उस ज्ञानका । नाश करता है अविद्याका ।
ऐक्य साधता जीव-आत्मका । पांडुकुमार ॥ ६८ ॥
इंद्रियोंका द्वार रोकता । प्रवृत्तिका पैर तोड़ता ।
दारिद्य्रको नष्ट करता । मन-बुध्दिका ॥ ६९ ॥
हरता द्वैतका अकाल । करता साम्यका सुकाल ।
प्राप्त होती ऐसी उज्ज्वल । स्थिति ज्ञानसे ॥ १७० ॥
मदको करता नाम शेष । न रखता भ्रांति-अवशेष ।
तथा आप-परका है भास । नष्ट करता ॥ ७१ ॥
करता संसार उन्मूल । धोता संकल्प-महामल ।
घेरता ज्ञेयको सकल । जो है अनावर ॥ ७२ ॥
जिसका है उज्ज्वलपन । खोलता बुध्दिके नयन ।
बने जीवका क्रीडांगन । आनंद धाम ॥ ७३ ॥
ऐसे है यह ज्ञान । पवित्र्यक्य निधान ।
जहां भृष्ट हो मन । होता निर्मल ॥ ७४ ॥
आत्माको जो जीव-बुद्धि । लगी जैसी क्षय-व्याधि ।
वह उसकी सन्निधि । करती दूर ॥ ७५ ॥
उस अनिरूपका निरूपण । सुनकर होगा बुद्धिको ज्ञान ।
किंतु देख न सकेंगे नयन । उसको कभी ॥ ७६ ॥
अजी ! शरीरमें वह जब । शक्ति प्रकट करता तब ।
इंद्रियोंके व्यापारसे सब । देखेंगे नयन ॥ ७७ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४४
वसंतका शुभागमन । दिखाता खिला हुवा वन ।
वैसे दिखाते हैं करण । अस्तित्व ज्ञानका ॥ ७८ ॥
वृक्षके जड़में नीर । पातालमें धनुर्धर ।
दिखाते वह अंकुर । लहरा कर जैसे ॥ ७९ ॥
अथवा भूमिकी है मृदुता । कहे अंकुरोंकी कोमलता ।
आचार गौरव विविधता । सत्कुलिनोंकी ॥ १८० ॥
आदरातिथ्यका समारोह । प्रकट करता जैसे स्नेह ।
या दर्शनसे होता उत्साह । पुण्य-पुरुषके ॥ ८१ ॥
कदली-वृक्षमें उत्पन्न कपूर । जाना जाता है सुगंधसे सुन्दर ।
जैसे प्रकाश फैलाता है बाहर । स्फटिक घटका दीप ॥ ८२ ॥
अजी ! वैसे हृदय स्थित-ज्ञान । प्रकटता बन देह-लक्षण ।
उसे कहता हूं तुझे अर्जुन । सुन ध्यान देकर ॥ ८३ ॥
अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
ज्ञानके लक्षण–१ अमानित्व—
नहीं रुचता है उसे । होड करना किसीसे ।
सजनता भी है उसे । लगता बोझ ॥ ८४ ॥
करनेसे गुण-वर्णन । मान्यताका भी दिया मान ।
प्रकट होनेसे अर्जुन । योग्यताका ॥ ८५ ॥
घबडाता है वह कैसा । व्याधसे घिरा मृग जैसा ।
अथवा भंवरमें फसा । तैराक मानो ॥ ८६ ॥
सम्मानको यह सुभट । पास आया मान संकट ।
आने न देता है निकट । गरिमा अपने ॥ ८७ ॥
नम्रता दंभ-शून्यत्व अहिंसा ऋजुता क्षमा ।
पवित्रय गुरु-शुश्रूषा स्थिरता आत्म-संयम ॥ ७ ॥
४४५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
न देखना आंखोंसे पूजना । स्वकीर्ति कानोंसे न सुनना ।
लोगोंको स्मरण नहीं होना । अपना कभी ॥ ८८ ॥
वहां सत्कारकी गोष्ठि । न आदर न है भेटी ।
मनमें होता है कष्टी । नमस्कारसे ॥ ८९ ॥
वाचस्पतिकी भांति । सर्वज्ञताकी प्राप्ति ।
होके भी है छिपाती । भीति कीर्तिकी ॥ १९० ॥
चातुर्यको छिपाता । महत्त्वको भुलाता ।
बावला हो रहता । प्रेमसे जो ॥ ९१ ॥
लौकिकका उसे उद्वेग । शास्त्रार्थका भी है उबग ।
मनमें है नाम सुभग । रहता स्वस्थ ॥ ९२ ॥
लोगोंसे हो अनादर । आप्तोंसे न अंगीकार ।
ऐसी लालसा अपार । रहती उसकी ॥ ९३ ॥
नम्रताका व्यवहार । अल्पत्व हो अलंकार ।
करना ऐसे आचार । उसका स्वभाव ॥ ९४ ॥
रहता है या नहीं । ऐसा रहना कहीं ।
मनमें आशा यही । जीवनमें सदा ॥ ९५ ॥
चलता है या नहीं वहां । हवासे उडता है कहां ।
ऐसा भ्रम हो जहां तहां । सहज रहे ऐसा ॥ ९६ ॥
मेरा अस्तित्व हो लोप । मिट जाये नाम-रूप ।
जिससे भय हो लोप । प्राणि-मात्रका ॥ ९७ ॥
उसकी ऐसी मनौति । एकांतमें होती प्रीति ।
एकांतसे नित्य-रति । उसको सर्वत्र ॥ ९८ ॥
हवासे उसका पटता । गगनसे बोलना भाता ।
वृक्षोंसे मैत्री है करता । जीव-भावसे ॥ ९९ ॥
अथवा है इस भांतिके । लक्षण दीखते जिसके ।
सह-शय्यामें ही उसके । रहता ज्ञान ॥ २०० ॥
ज्ञानेश्वरी ४४६
साधकमें अमानित्व गुण । जानना है ऐसा सु-लक्षण ।
कहूंगा अदंभका लक्षण । तुझसे अब ॥ १ ॥
२ अदंभका विवेचन—
अदंभत्व यह ऐसा । लोभीका धन हो जैसा ।
न कहता ठाव जैसा । प्राणांतमें भी ॥ २ ॥
उस पर मानो सुभट । आया यदि प्राण-संकट ।
किंतु न करता प्रकट । सत्कर्म अपना ॥ ३ ॥
सहज आयी दुग्धाद्रता । सोखती गायकी दुष्टता ।
या छिपाती वेश्या प्रौढता । वैसे ही धनंजय ॥ ४ ॥
या श्रीमंत श्री-मानता । अरण्यमें है छिपाता ।
या तनकी सुंदरता । कुलांगना ॥ ५ ॥
बोया हुवा बीज छिपाता । उसपे है माटी डालता ।
ऐसे ही सत्कर्म छिपाता । पुण्यके वह ॥ ६ ॥
देहकी पूजा नहीं करता । लोक-रंजन नहीं करता ।
स्वधर्मको न बांध सकता । वाग्ध्वजमें कभी ॥ ७ ॥
परोपकार नहीं कहता । न करें साधनाकी वाच्यता ।
पाया हुवा पुण्य न बेचता । वैभवार्थ कभी ॥ ८ ॥
देख उसके अंग-भोग । लगता कृपण अभाग ।
धर्म-कर्ममें महा-भाग । न कम या अधिक ॥ ९ ॥
घरमें सदा तंग । रहता कृष अंग ।
दानमें आगे पग । सुर-तरु-सा ॥ २१० ॥
या स्वधर्ममें महान । स-समय देता दान ।
आत्म-चर्चामें निपुण । वैसे मूढ ॥ ११ ॥
कदलीका अंग छिलकेडार । लगे हलका थोथा धनुर्धर ।
होता है रसाल पकनेपर । वैसा ही जान ॥ १२ ॥
४४७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
या हलका अंग जैसे मेघका । उडायेगा मानो झोंका वायुका ।
किंतु बरसते आश्चर्यका । घनघोर मेह ॥ १३ ॥
होता वह पूर्णत्वमें जैसे । देख तृष्णा भी पूर्ण हो वैसे ।
किंतु रहता है कंगालीसे । परिपूर्ण ॥ १४ ॥
ऐसे जो चिन्ह-युत । दीखता है सतत ।
ज्ञान है करगत । नित्य उसके ॥ १५ ॥
है जो अदंभ पन । इसीका नाम जान ।
अब तू मर्म सुन । अहिंसाका ॥ १६ ॥
३ अहिंसा-विवेचन, याज्ञिक-अहिंसा-
अहिंसाके अनेक प्रकार । कहते हैं नाना मतांतर ।
करते हैं अपना प्रचार । निरूपणसे ॥ १७ ॥
वह सब ऐसा देख । जैसा तोड़ कर शाख ।
किया है जडमें देख । उससे बाढ ॥ १८ ॥
या हाथोंको तोड-बेचकर । करना क्षुधाका परिहार ।
या मंदिरको तुड़वा कर । बांधलें पौली ॥ १९ ॥
वैसे हिंसा कर अहिंसा । उत्पन्न करना है ऐसा ।
निर्णय है पूर्ण-मीमांसा- । का धनंजय ॥ २२० ॥
अवृष्टिके उपद्रवसे जब । विश्व होता है जर्जरित तब ।
करना याग नाना विध सब । पर्जन्यार्थ ॥ २१ ॥
जब होता यज्ञका मूल । पशु-हिंसासे ही सरल ।
कहो तब अहिंसा-कूळ । देखें कैसे ? ॥ २२ ॥
बोनेसे केवल हिंसा । फलेगी कैसी अहिंसा ।
अचरजका साहस । याज्ञिकोंका ॥ २३ ॥
आयुर्वेद और अहिंसा-
तथा आयुर्वेद संपूर्ण । इसी ढंगका है अर्जुन ।
करना जीवके कारण । जीव घात ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४८