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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

यह सुन कर अंधा धृतराष्ट्र अंतःकरणसे भी अंधा ही रहा— राजन् कहता है यहां अर्जुन । वह अद्वयानुभव वरण । संजयका शब्द कर श्रवण । स्तब्ध है धृतराष्ट्र ॥ २८ ॥ संजयका दुखी अंतःकरण । जैसे हैं इसके बाह्य नयन । वैसे ही अंधा है अंतःकरण । कहता संजय ॥ २९ ॥ किंतु वहां वह अर्जुन । बढाता है स्वहित मान । - दूसरा जागृत महान । संकल्प एक ॥ ३० ॥ सोचता यह हृदयानभव । बना लेना है नयनका भाव । बुद्धिमें हुआ इच्छाका उद्भव । सहज भावसे ॥ ३१ ॥ मेरे यही दोनों नयन । करें विश्व-रूप दर्शन । ळालसा हुई दैववान । सहज भावसे ॥ ३२ ॥ आज वह् है कल्पतरुकी शाख । उसकी इच्छा व्यर्थ न होती देख । जो जो कहेगा आज उसका मुख । सिद्ध करेगा दैव ॥ ३३ ॥ सुन कर प्रल्हादका बोल । प्रसन्न हुआ वन सकल । वह सद्गुरु मिला कुशल । अर्जुनको ॥ ३४ ॥ विश्वरूप दर्शनार्थ वैसे । पूछेगा अर्जुन श्रीकृष्णसे । कहूँगा कहता श्रोताओंसे । निवृत्तिदास ज्ञानदेव ॥ ३३५ ॥ गीता श्लोक ४२ ज्ञानेश्वरी ओवी ३३५.

११ विश्व-रूप-दर्शनयोग यह अध्याय शांत अद्भुत रसोंका प्रयागराज है— एकादश है इसके अनंतर । कथा भरी है दो रसोंका भंडार । वहां दर्शन करेगा धनुर्धर । विश्व-रूपका ॥ १ ॥ जहां शांत-रसके सदन । अद्भुत आया अतिथि -वत्त । मिला पंगतका बहुमान । अन्य रसोंको ॥ २ ॥ होता जब वधु-वरोंका मिलन । तब होता बारातियोंका सन्मान । वैसे मिला है देशीका सिंहासन । अन्य रसोंको भी ॥ ३ ॥ किंतु उत्तम जो शांत अद्भुत । जंचेंगे आखोंको कर तृप्त । जैसे हैं प्रेम-भावालिंगित । हरिहर दोनों ॥ ४ ॥ अथवा जैसे अमावासके दिन । करते हैं दोनों बिंब आलिंगन । वैसे दोनों रसोंका सम्मेलन । हुआ इस स्थलमें ॥ ५ ॥ मिले हैं गंगा-यमुनाके ओघ । वैसे रसोंका हुआ है प्रयाग । इसीलिये यहां सुस्नात जग । संपूर्ण-रूपसे ॥ ६ ॥ इसमें गीता-सरस्वती गुप्त । तथा ये दोनों रस-ओघ मूर्त । इसीलिये त्रिवेणी है उचित । सबको प्राप्त है ॥ ७ ॥

सबको त्रिवेणी-स्नान सुलभ हो इसलिये देश-भाषाका घाट बांधा है— अजी ! यहां श्रवणके द्वारसे । तीर्थमें प्रवेश सुलभ हो ऐसे । करवाया है श्री गुरुने मुझसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ८ ॥ अजी ! संस्कृतका तीर है गहन । उसको देशीके ये शब्द सोपान । निर्माण कराये हैं धर्म-निधान । निवृत्तिनाथने ॥ ९ ॥ यहां करना सबको सद्भाव-स्नान । प्रयाग-माधव विश्व-रूप-दर्शन । तथा करना यहां संसार-तर्पण । तिलोदकका ॥ १० ॥ ऐसे हैं यह सावयव । स्वरूप लाये रस-भाव । औ' श्रवण-सुखका चाव । मिला विश्वको ॥ ११ ॥ यहां प्रत्यक्ष शांत-अद्भुत । अन्य रसोंको शोभा प्राप्त । साथ ही हुआ है मोक्ष-प्राप्त । स्पष्ट रूपसे ॥ १२ ॥ यह ग्यारहवां अध्याय है । वेदोंका जो विश्राम-धाम है । सुदैवियोंमें पार्थ श्रेष्ठ है। पहुंचा जो वहां ॥ १३ ॥ पार्थ वहां पहुंचा भला क्यों अकेला । जिसे माता है उसका हुवा सुकाल । गीता-भाव उभरा देशीमें सकल । इसी समय ॥ १४ ॥ संत जनोंसे कविकी विनय — मेरी बात यह इसीलिये । विनय करता सुन-लीजिये । जरासा ध्यानसे चित्त दीजिये । आप सज्जन ॥ १५ ॥ अजी ! यह है संतोंकी परिषद । ऐसा लगाव यहां अ-शोभास्पद । किंतु आपत्य बन आनंद-स्पंद । कहता मैं यह ॥ १६ ॥ आप ही पहले तोतेको पढाते । वह बोलता तब आप डुलते । या बच्चेसे नकल करा रीझते । माता पिता जैसे ॥ १७ ॥ वैसे जो जो कुछ मैं बोलता । प्रभु आपने ही सिखाया था । जो आपने ही जो है दिया था । सुनिये चित्त देकर ॥ १८ ॥ अजी ! गाछ है यह सारस्वतका । आपने ही जो लगाया था उसका । सिंचन कर अवधानामृतका । बढाया कीजिये ॥ १९ ॥ ३३३ विश्व रूप-दर्शनयोग

रस-भाव तब पुष्प-सा खिलेगा । नाना अर्थ फल-भारसे फलेगा । आपके ही धर्मका सुकाल होगा । सारे जगतमें ॥ २० ॥ इस बातसे रीझ उठे सब संत । "भल कहा" कह कर हो प्रमुदित । अब कहो कृष्णार्जुनमें क्या बात । हुयी जो वहां ॥ २१ ॥ तब निवृत्तिदास कहता । कृष्णार्जुनकी मैं क्या जानता । सामान्य क्या मैं कह सकता । कहलाते सब आप ॥ २२ ॥ अजी ! जंगलका जो पात खाते । रावण पर वे विजय पाते । पार्थ अक्षोहिणी सैन्य जीतते । अकेले ही ॥ २३ ॥ तभी जो जो करते हैं समर्थ । चराचरमें होता वह सार्थ । मुझसे कहलाते हैं तदर्थ । संत जन आप ॥ २४ ॥ सुनिये अब यह बोल । गीता भावार्थके निर्मल । वैकुंठ-पतिके सरल । निकल मुखसे ॥ २५ ॥ धन्य धन्य वह ग्रंथ गीता । वेद-प्रतिपाद्य जो देवता । बना है श्रीकृष्ण महा-वक्ता । इस ग्रंथका ॥ २६ ॥ कैसे करें उस गौरवका वर्णन । न होता शिव-बुद्धिको भी आकलन । जीव-भावसे करना उसे वंदन । यही भला है ॥ २७ ॥

बुद्धिने जो स्वीकार किया उसको आंखोंसे देखनेकी इच्छा-अर्जुनका संकोच-

सुनिये अब वह किरीटी । विश्व-रूपपे रख दृष्टि । करने लगा है कैसे गोष्ठि । श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥ सकल ही है यह सर्वेश्वर । अनुभव है यह रुचिकर । होना यह नयनसे गोचर । प्रत्यक्ष रूपमें ॥ २९ ॥ आशा है यह अंतःकरणकी । विवंचना है कैसे कहनेकी । विश्व-रूपके महा-गुपितकी । अर्जुनको यहां ॥ ३० ॥ सोचता पीछे कभी कहीं । प्रिय-जनने पूछा नहीं । सहसा मैं इनको यहीं । पूछूं कैसे ? ॥ ३१ ॥ यद्यपि है हमारा स्नेह चांग । तो क्या लक्ष्मी मातासे अंतरंग । वह भी डरती ऐसा प्रसंग । पूछनेमें ॥ ३२ ॥

ज्ञानेश्वरी ३३४

हमने सेवा की है बहुत नेक । किंतु क्या गरुड़से भी अधिक। इसमें वह भी न पूछता एक । चुपचाप बैठा है ॥ ३३ ॥ मैं क्या सनकादिकसे अधिक। वे भी झमेला करते न देख । मैं हूँ क्या गोपियोंसे भी भावुक । प्रिय-जन उन्हें ? ॥ ३४ ॥ उन प्रिय-जनोंको भी छकाया । दस गर्भ वास भी सहन किया । विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ३५ ॥ ऐसी यह गुपित बात । छिपायी जो हृदय-गत । पूछना क्या मुझे उचित । क्या कैसे ॥ ३६ ॥ यदि मैं यह प्रश्न नहीं पूछता । उसके बिन सुख नहीं मिलता । जान लेना भी संभव नहीं होता । यह बात कभी ॥ ३७ ॥ श्री कृष्णका भक्त-प्रेम— पूछें अब अल्पसी बात । फिर देखें हरिका मत । सोचकर हो भीति-युक्त । पूछता अर्जुन ॥ ३८ ॥ तब अर्जुनका यह भाव । सुन एक दो शब्दमें देख । दिखाता विश्व-रूप-वैभव । पूर्ण-रूपसे ॥ ३९ ॥ गाय जो बछडेको देखकर । ऊठ जाती है हडबडाकर । मुखमें ले स्तन चूसने पर । न स्त्रवेगी क्या दूध ? ॥ ४० ॥ जहां आता है पांडवोंका नाम । रक्षार्थ दौडना जिसका काम । पूछना अर्जुनका सप्रेम । सहेगा कैसे ? ॥ ४१ ॥ श्रीकृष्ण सहज प्रेमावतरण । अर्जुन प्रेम-नशाको उत्तेजन । समरस होनेमें यहां अभिन्न । भिन्नता भान विस्मय ॥ ४२ ॥ अर्जुनके बोलनेसे अब महज । कृष्ण विश्व-रूप दिखायेग सहज । ऐसा अद्भुत प्रसंग आया है आज । सुनियोगा ॥ ४३ ॥ ३३५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥ प्रभो तूने अपने हृदयका दर्शन दिया और — कृष्णसे फिर कहता अर्जुन । श्रीकृष्ण तूने मेरे ही कारण । वाच्य किया था जो गुह्य कथन । कृपा करके ॥ ४४ ॥ महाभूत जब ब्रह्ममें विलीन । जीव महदादि भी होते हैं लीन । अंतिम वह जो है विश्रांति-स्थान । आपका रूप ॥ ४५ ॥ अंतःकरणके वह भीतर । रखा था वेदोंसे भी छिपाकर । कहता है कृष्णसे धनुर्धर । कृपणके भांति ॥ ४६ ॥ वह तूने आज श्री नारायण । दिया है मुझे हृदय-दर्शन । उसपे शिवने अध्यात्म-ध्यान । किया न्योच्छावर ॥ ४७ ॥ ऐसी वस्तु तूने मुझे दी है । क्षण भी विलंब न किया है । यदि हम ऐसे कहते हैं । तो मैं भिन्न हूं क्या ? ॥ ४८ ॥ भंवरमें मैं महा-मोहके । डुबा था शिखा तक देखके । श्रीहरि तूने स्वयं कूदके । उभार लिया मुझे ॥ ४९ ॥ तुझ एक बिना देव कभी कहीं । विश्वमें अन्य वस्तुका नाम नहीं । किंतु देख यहां दुर्दैव है यही । मानते "हम हैं" भिन्न ॥ ५० ॥ विश्वमें मैं कोयी एक अर्जुन । धर ऐसा देहका अभिमान । तथा कौरवको यहां स्वजन । कहता था मैं ॥ ५१ ॥ इस पर भी मैं इन्हें मारूंगा । इसका पाप-भोगी भी बनूंगा । ऐसे दुःस्वप्न रत मुझे जगा- । दिया तूने कृष्ण ॥ ५२ ॥ अर्जुनने कहा करके करुणा मेरी कहा तूने रहस्य जो । उस अध्यात्म विद्यासे मेरा जो मोह था गया ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३६

गंधर्व-नगरकी बस्ती । छोड़ निकला मैं लक्ष्मी-पति । प्याससे पानीका था मैं प्रार्थी । औ' पीता था मृगजल ॥ ५३ ॥ अजी ! वरूके सर्प-दंशसे । चढती विष-ल्हरियोंसे । त्रस्त जीवको मृत्यु-भयसे । उभार लिया देव ॥ ५४ ॥ अपना प्रतिबिंब न जानकर । कूपमें कूदना सिंह देखकर । उसको बचा लिया पकड़कर । मेरी रक्षा की ऐसी ॥ ५५ ॥ मुझपर अपार कृपा करके मेरी रक्षा की - अब-- नही तो मेरा यहां तक । निश्चय हुवा था तू देख । सप्त-सागर हुये एक । मिलकर ॥ ५६ ॥ या डूबने दो युग संपूर्ण । या टूटने दो यह गगन । लड़ेगा नहीं कभी अर्जुन । स्व-गोत्रजोंसे ॥ ५७ ॥ ऐसी अहंकार-उर्मियोंमें उन्मत्त । आग्रह जलमें डूबा था मैं अनंत । उठा लिया है तूने हो स्नेहार्द्र-चित्त । कौन था अन्य मेरा ॥ ५८ ॥ नहीं था यह एक-मात्र अर्जुन । वैसे दूसरेको नाम दे स्वजन । सवार हुवा ऐसा पागलपन । तूने बचा लिया देव ! ॥ ५९ ॥ पहले होना था जब हमारा दहन । भय था तब देह जल जानेका सुन । अब चैतन्य सह होना था दहन । बचा लिया तूने दोनो बार ॥ ६० ॥ हिरण्यासुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर । मोहार्णव-सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ६१ ॥ तेरे ही बलसे मधुसूदन । विवेकने ले लिया है स्व-स्थान । वराहका पुनरावतरण । लेना पडा यह ॥ ६२ ॥ अपार कृपा है तेरी मुझ पर । एक वाचासे ही बोलूं क्यों कर । पंच-प्राण किये तूने न्योच्छावर । मुझपर देव ॥ ६३ ॥ कुछ भी वह व्यर्थ नहीं गया । उसमें संपूर्ण यश भी आया । देव ! मैं साद्यंत रूपसे माया- । रहित हुवा जी ॥ ६४ ॥ आनंद सरोवरके कमल । वैसे हैं तेरे नयन निर्मल । अपने प्रसादके हैं महल । बना लेते हैं ॥ ६५ ॥ (43) ३३७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

उसका तथा मोहका मिलन । है यह व्यर्थ-बातका कथन । मृगजलसे होगा क्या शमन । वडवानलका ॥ ६६ ॥ तथा जो मैं हूं तब श्रीकृष्ण । पाके कृपाका अंतःकरण । करता हूं सानंद भोजन । ब्रह्म-रसका ॥ ६७ ॥ इससे हुवा मेरा मोह निवारण । इसमें क्या भला विस्मयका कारण । इससे हुवा मेरा उद्धार श्रीकृष्ण । तेरे चरणोंकी सौगंध ॥ ६८ ॥ भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥ अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा— अजी ! हे कमल-नयन । कोटि-सूर्य-तेज वदन । मैंने तुझसे जनार्दन । सुना है आज ॥ ६९ ॥ प्रकृतिसे उत्पन्न भूत-जात । वैसे प्रकृतिमें उसका अंत । कैसा होता है जो प्राकृत । कहा है देवने ॥ ७० ॥ प्रकृतिका दिया संपूर्ण-ज्ञान । बताया ब्रह्मका वसति-स्थान । जिसको ओढ करके महान् । हुए हैं वेद ॥ ७१ ॥ ज्ञान-राशीको जो बढाता । धर्म-रत्नोंको प्रसवता । वेद है आश्रय करता । तेरे स्वरूपका ॥ ७२ ॥ ऐसा अगाध है महात्म्य । जो सकल मार्गैक्य-गम्य । तथा है स्वानुभव रम्य । दिखाया मुझे ॥ ७३ ॥ हटाकरके सब बादल । दिखाते जैसे सूर्य-मंडल । सेवार हटाकर निर्मल । जल दिखाते हैं ॥ ७४ ॥ छुडानेसे सांपकी जकडन । होता जैसे चंदन-दर्शन । या करनेसे पिशाचोच्चाटन । मिलती भूमिस्थ निधि ॥ ७५ ॥ उत्पत्ति नाश भूतोंका सुना मैंने सविस्तर । अभंग महिमा वैसे तेरे ही मुखसे प्रभु ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ३३८

वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन । पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥ इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव । किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥ रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर । तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥ जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर । जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥ तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना । कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥ एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना - तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि । उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥ संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता । जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥ वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार । सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥ क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर । लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥ उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन । सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥ , तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है । वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ ३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा तेरा असीम जनार्दन । विश्व-रूप कथा सुनके मन । देखना चाहते वही नयन । प्यासे होकर ॥ ८६ ॥ मेरा संकोच करके दूर । स-स्नेह पूछी चाह श्रीधर । यही एक चाह चक्रधर । पूर्ण करना ॥ ८७ ॥ तेरा विश्व-रूप संपूर्ण । देखना चाहता स-तृष्ण । होकर तन-मन प्राण । एकमात्र ॥ ८८ ॥ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥ और एक बात केशव । विश्व-रूप दर्शनास्तव । मेरी योग्यता है वास्तव । या नहीं है ॥ ८९ ॥ यह मैं आप नहीं जानता । यह क्यों है यदि तू पूछता । अपने रोगका क्या जानता । निदान रोगी ? ॥ ९० ॥ अजी ! होती जब इच्छाकी तीव्रता । भूलते हैं तब अपनी योग्यता । प्यासा मनुष्य है सदैव मानता । अपर्याप्त समुद्र ॥ ९१ ॥ इच्छाकी है ऐसी जो तीव्रता । भुला देती है मेरी योग्यता । जानती किंतु शिशुको माता । सहज-भावसे ॥ ९२ ॥ वैसा तू भक्त जन रंजन । जानता है मेरी संभावना । फिर तू विश्व-रूप दर्शन । देगा हो सदय ॥ ९३ ॥ किंतु मेरी योग्यतानुसार । ना हो तो ना कह कृपाकर । गाके लाभ क्या पंचम स्वर । बहरेके सम्मुख ॥ ९४ ॥ एक प्यासेकेलिये वर्षा होती । उससे पृथ्वीकी प्यास बुझती । किंतु वही चट्टान पर होती । व्यर्थ जाती है ॥ ९५ ॥ चकोरको चंद्रामृत मिलता । अन्योंको क्या इनकार करता । किंतु दृष्टि न होनेसे होता । व्यर्थ ही सब ॥ ९६ ॥ यदि तू मानता शक्य तेरा जो रूप देखना । तभी योगेश्वर देव दिखावो वह अव्यय ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४०

अजी ! तू विश्व-रूप यह सहसा । दिखायेगा इस बातका भरोसा । ऐसी बातोंमें उदार अपना-सा । नित्य-नूतन तू ॥ ९७ ॥ परमात्माकी असमान्य उदारताका वर्णन— तेरी उदारता है जो स्वतंत्र । न देखती देनेमें पात्रापात्र । कैवल्य-सा वर अति-पवित्र । दिया शत्रुओंको भी ॥ ९८ ॥ अजी ! मोक्ष है जो अति दुराराध्य । तेरे चरण हैं उसका आराध्य । होता है वह तेरी बातसे साध्य । सेवकके समान ॥ ९९ ॥ तूने सनकादिकके समान । पूतनाको दिया सायुज्यासन । कराके जो विषका स्तन-पान । मारने आयी थी ॥ १०० ॥ राजसूय सभा-सदनमें । त्रिभुवन जन-सम्मुखमें । जिसने शत दु-र्वचनमें । डुबोया तुझे ॥ १ ॥ ऐसा अपराधी जो शिशुपाल । पाता है तेरे चरणमें स्थल । या उत्थानपादका ध्रुवबाल । चाहता था क्या मोक्ष ॥ २ ॥ ध्रुवबाल आया था वनमें । बैठना है पिताकी गोदमें । उसको किया तूने जगतमें । सूर्य-चंद्रसे ऊंचा ॥ ३ ॥ ऐसे वनवासियोंको सकल । देनेवाला एक है तू धसाल । पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ४ ॥ जिसने मारी लात तेरी छाती पर । उसका पद-चिन्ह किया अलंकार । अब-तक है शत्रु का ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ५ ॥ अपकारी पर भी तेरा उपकार । अपात्रों पर भी तू है अति उदार । द्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ६ ॥ न सुनी जिसने आराधना । रिझाती थी जो तोता अपना । उस गणिकाको जनार्दन । तूने दिया वैकुंठ ॥ ७ ॥ दिखा कर ऐसे व्यर्थके कारण । निज-पद देता तू नारायण । न करेगा तू मुझे ऐसा श्रीकृष्ण । कभी निराश ॥ ८ ॥ जिससे इतने जगत सकल । पाता है शांति तुष्टि पुष्टि औ' बल । उस नंदिनीका बछडा व्याकुल । होगा क्या भूखसे ॥ ९ ॥ ३४१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

इसीलिये मैंने कही पीछे जो बात । देव न करेंगे अस्वीकार निश्चित । उसकी योग्यता देना मुझे अच्युत । यह है विनय ॥ ११० ॥ तेरे विश्व-रूपका आकलन । कर सकेंगे तो मेरे नयन । प्यास बुझावो हे जनार्दन । इन नयनोंकी ॥ ११ ॥ श्री कृष्णकी भक्त-वत्सलता— करता है जब ऐसी विनती । लीन हो करके सुभद्रापति । तब वह षड्गुण-चक्रवर्ति । होता है उतावला ॥ १२ ॥ वह है कृपा-पीयूष सजल । पास आया है यहां वर्षा-काल । अथवा है श्रीकृष्ण कोकिल । अर्जुन बसंत ॥ १३ ॥ देखकर जैसे चंद्र-बिंब वर्तुल । उछल आता है क्षीर-सागर-जल । वैसे प्रेम-बलसे हृदय-कमल । खिला श्री हरिका ॥ १४ ॥ प्रसन्नताके उस उमंगसे । गरज कर कहता कृपासे । पार्थ तू देख देख आनंदसे । स्वरूप मेरा ॥ १५ ॥ केवल विश्व-रूपको देखना । इतनी थी पार्थकी मनो-कामना । यहां विश्व रूपमय त्रिभुवन । किया श्री हरिने ॥ १६ ॥ धन्य-धन्य उदार अपरिमित । याचकको देता देव दिन-रात । चाहता जो उससे अनगिनत । अपना सर्वस्व ॥ १७ ॥ शेषसे भी जो था चुराया । वेदोंको जिससे छकाया । लक्ष्मीसे भी जो था छिपाया । वह हृदय-गुह्य ॥ १८ ॥ प्रकट करेंगे अनेक दर्शन । बनायेंगे विश्व-रूप प्रदर्शन । भाग्यशाली है यह बडा अर्जुन । धन्य धन्य ॥ १९ ॥ स्वप्नमें जाता जैसे मनुष्य जागृत । स्वप्नमें बनता है स्वयं वस्तु जात । वैसे स्वयं बना विराट्-विश्व अनंत । अपने आपमें ॥ १२० ॥ यकायक वह मुद्रा छोडी । स्थूल-दृष्टि थी यवनिका जो फाडी । अथवा खोलकर दिखायी बडी । अपनी योग-सिद्धि ॥ २१ ॥ किंतु यह देखेगा या नहीं । ऐसा विचार कुछ भी नहीं । किया और देख कहना है यही । हो स्नेहातुर ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४२

भगवान उवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥ विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपकी जड़में एक सृष्टिका दर्शन, स्वभाव-विविधता— तूने कहा अर्जुन दिखावो एक । उसीको दिखाया तो क्या रहा नेक । यहां भरा है जो सभी अब देख । मेरे ही रूपमें ॥ २३ ॥ एक कृश तो एक स्थूल । एक लघु एक विशाल । पृथुतर तथा विशाल । अमर्याद सब ॥ २४ ॥ एक अनावर तो एक प्रांजल । कुछ स-व्यापार तो कुछ निश्चल । कुछ उदासीन तो कुछ स्नेहल । कुछ हैं कठोर ॥ २५ ॥ कुछ उन्मन कुछ सावध । कुछ उथल कुछ अगाध । कुछ प्रसन्न तो कुछ क्रुद्ध । तथा मुक्त संकुचित ॥ २६ ॥ कुछ संत कुछ सदा-मद । कुछ स्तब्ध कुछ सानंद । गर्जन रत कुछ निःशब्द । तथा सौम्य भी ॥ २७ ॥ अभिलाषा-युत कुछ विरक्त । कुछ जागृत कुछ निद्रित । कुछ संतुष्ट कुछ है आर्त । अति उदार कुछ ॥ २८ ॥ कुछ अशस्त्र तो कुछ सशस्त्र । तथा अति रौद्र औ' अति-मित्र । कुछ तम-युत कुछ पवित्र । कुछ है समाधिस्थ ॥ २९ ॥ कयी जन लीला-विलास । औ' पालन-शील-लालस । संहारक कुछ सावेश । कुछ है साक्षि-भूत ॥ १३० ॥ नाना विध जो प्रकर्ष ऐसे । प्रकाशित जो दिव्य-तेजसे । वर्णमें भी जो एक एक-से । नहीं थे कोयी ॥ ३१ ॥ श्रीभगवानने कहा देखो मेरे सभी रूप दिव्य शत सहस्र तू । नाना प्रकार आकार वर्ण भी जिसमें बहु ॥ ५ ॥ ३४३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें वर्ण-विविधता— कुछ तो तप्त सुवर्णसे । कुछ भूरे मट-मैलेसे । कुछ सराग चित्रितसे । सिंधुसे नभ ॥ ३२ ॥ कुछ जो सहज स्वाभाविक कांतिके । कुछ रत्न-जडित ब्रह्मांड दीप्तिके । कुछ तो अरुणोदय-प्रभा सरीखे । कुंकुमके समान ॥ ३३ ॥ कुछ शुद्ध स्फटिकोज्ज्वल । कुछ इंद्र-नील सुनील । कुछ काले अंजनाचल । कुछ रक्त-वर्ण ॥ ३४ ॥ कुछ लसित-कंचनसे पीले । कुछ शामल बादलसे नीले । कुछ चंपक-गौर सम पीले । कुछ थे हरे ॥ ३५ ॥ कुछ लाल तप्त-ताम्र सम । कुछ सुंदर जो चंद्र-सम । नाना वर्णके रूप असीम । देख लो भरे ॥ ३६ ॥ जैसे हैं ये अनेक वर्ण । रूपमें भी नहीं प्रमाण । लज्जासे कंदर्प-शरण । रूप होंगे देख ॥ ३७ ॥ विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें रूप विविधता— कुछ अति लावण्य साकार । स्निग्ध-तन कुछ मनोहर । कुछ श्रृंगार-श्रीके-भांडार । खुला प्रदर्शनार्थ ॥ ३८ ॥ कुछ पीनाकवयव मांसल । कुछ शुष्क अति-विकराल । कुछ दीर्घ-कंठ और शिथिल । कुछ अति घिनौने ॥ ३९ ॥ ऐसे नाना-विध वर्ण आकृति । पार नहीं यहां सुभद्रा-पति । यहां प्रत्येक अंगकी आकृति । दिखाती विश्व ॥ १४० ॥ पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥ वसु रुद्र तथा वायु देखो आदित्य अश्विनी । देखो अनेक आश्चर्य न देखे पहले कभी ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४४

विश्वरूपमें अनेक देवताओंका दर्शन— खुलती है जहां दृष्टि । फैलती है आदित्य-सृष्टि । मिटती है जहां दृष्टि । होता अस्त ॥ ४१ ॥ मुखसे निकल हुआ फूत्कार । लेकरके ज्वालाओंका आकार । पावक आदि वसु समाधार । निर्माण करते ॥ ४२ ॥ जहां भ्रू-लताओंका अवसान । क्रोधसे होता रहता मिलन । वहां रुद्रोंके समूह उत्पन्न । होते हैं देख ॥ ४३ ॥ सौम्य आर्द्रतामें यहां सदैव । निर्माण होते हैं अश्विनी देव । तथा श्रोत्रोंमें होते हैं पांडव । वायु अनेक ॥ ४४ ॥ एकेक रूपके ऐसे खेल । सृजते सुर-सिद्धके कुल । ऐसे अपार तथा विशाल । देखो वहां रूप ॥ ४५ ॥ जिसको कहनेमें वेद तुतलाता । देखनेमें कालका आयुष्य खूटता । विधाताको भी उसका नहीं लगता । ठौर ठिकान ॥ ४६ ॥ तीनों देवोंने न सुनी एक । उसको तू प्रत्यक्षमें देख । भोग जो अचरज अनेक । योग-वैभव महा ॥ ४७ ॥ इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥ इस आकृतिके तू किरीटी । रोम-मूलमें है देख सृष्टि । सुर-तरुके तलकी मिट्टी । सृजती तृणांकुर ॥ ४८ ॥ तथा पवनका प्रकाश जैसे । दिखाता उड़ते परमाणु-से । भ्रमते यहां ब्रह्मांड भी वैसे । अंगके सांधोंमें ॥ ४९ ॥ यहांका प्रत्येक अवयव । दिखाता है सविस्तर विश्व । औ' विश्वके पार भी पांडव । देखना चाहो ॥ १५० ॥

देखो अब यहां सारा विश्व तू सचराचर । एकत्र देहमें मेरे इच्छा दर्शन है तुझे ॥ ७ ॥ (44) ३४५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

किसी भी बातकी अपूर्णता । कोई नहीं है यहां सर्वथा । देख सुखसे जो तुझे भाता । मेरे तनमें तू ॥ ५१ ॥ विश्व-मूर्ति उससे ऐसे । बोली जो अति कारुण्यसे । तो दीखता या नहीं ऐसे । न कहता रहा मौन ॥ ५२ ॥ रहा क्यों भला यह ऐसा मौन । सोचकर देखता यह जनार्दन । तब भी इच्छा-भूषित अर्जुन । खडा है उत्कंठित ॥ ५३ ॥ न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामिते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥ उतरा नहीं है उत्कंठोन्माद । न मिला अब भी स्वर्ग सुखद । आकलन नहीं होता विशद् । मेरा रूप ॥ ५४ ॥ अर्जुनको विश्व-रूप देखनेके लिये दिव्य-दृष्टि दी— हंसा देव यह सोचकर । कहने लगा जो हंसकर । “हमने दिखाया रूप पर । तू देखता ही नहीं” ॥ ५५ ॥ बोला तब अर्जुन विलक्षण । यह किसके दोषके कारण । बगलेको देता है सुलक्षण । चंद्रामृत तू ॥ ५६ ॥ दिखाता सुंदर दर्पण । जन्मांधको तू है श्रीकृष्ण । सुनाता तू मधुर बीन । बहरेको जो ॥ ५७ ॥ मकरंद-कणोंका चारा । कहता है तू दादुरसे चर । व्यर्थ मानकर क्यों शार्गधर । बिगडता अब ॥ ५८ ॥ शास्त्रोंसे यह अतींद्रिय घोषित । ज्ञान-दृष्टिका जो विषय निश्चित । कहता इसे देखेंगे कैसे पार्थ । चर्म-चक्षु ॥ ५९ ॥ यह मेरा व्यंग नहीं बोलना । मुझे अपना सहन करना । यह सुन कहता जनार्दन । सच है यह ॥ १६० ॥ किंतु तू चर्म-चक्षूसे न देख सकता मुझे । ले दिव्य दृष्टि है मेरी ईश्वरी योग देख तू ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४६

यह स्वरूप यदि दिखाना होता । दी होती पहले ही यह योग्यता । बोलनेमें मैं प्रेमसे स्वभावता । भूल गया हूं ॥ ६१ ॥ पहले जुताईके बुवाईसे । थकावट भई व्यर्थ इससे । अब देता दिव्य-दृष्टि इससे । देखो निज-रूप ॥ ६२ ॥ इस दृष्टिसे फिर तू अर्जुन । हमारा ऐश्वर्य-योग संपूर्ण । देखके उसे करो संगोपन । अपने अनुभवमें ॥ ६३ ॥ ऐसा वह वेदांत-वेद्य । सकल लोकका जो आद्य । जगताका जो है आराध्य । कहने लगा ॥ ६४ ॥ संजय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ अर्जुनका महा-भाग्य- सुन तू कौरव-कुल-तिलक । विस्मय है मुझे इसी बातका । है क्या लक्ष्मीसे भुवनत्रयका । दूसरा भाग्यवान ॥ ६५ ॥ अथवा तत्व-विवेचनार्थ । है क्या कोई वेदसे समर्थ । सेवामें शेषसे भी विश्वस्थ । दूसरा कौन है ? ॥ ६६ ॥ उसके लिये ऐसे कष्ट सहन । करते हैं जो योगियोंके समान । अनुसरणमें बना है वाहन । गरुड सतत ॥ ६७ ॥ उन सबको है परे हटाया । जबसे पांडवोंका जन्म भया । कृष्ण-सुख सब सहज आया । इनके भागमें ॥ ६८ ॥ इन पांचोंमें भी जो अर्जुन । कृष्ण जैसे उसके आधीन । कामुक होता है अनुदिन । कामिनी-संग ॥ ६९ ॥ संजयने कहा ऐसा बोल कुरु-श्रेष्ठ महायोगेश कृष्णने । दिखाया अपना श्रेष्ठ ईश्वरी-रूप पार्थको ॥ ९ ॥ ३४७ विश्व रूप-दर्शनयोग

सिखाया गया पंछी ऐसा न बोलता । क्रीड़ा-रंत मृग भी ऐसा न चलता । पार्थके दैवका उत्कर्ष जो दीखता । यहां अकथनीय ॥ १७० ॥ पर-ब्रह्म यह आज है संपूर्ण । भोगार्थ सिद्ध इसके ही नयन । इसकी बातका दुलार श्रीकृष्ण । करता है यहां ॥ ७१ ॥ पार्थ कोपता तब वह शांत रहता । यह रूसता तब वह है समझाता । अर्जुनसे पगलाया है जगन्नाथ । निश्चित रूपसे ॥ ७२ ॥ जनमें हैं वैसे विषय जीतकर । शुकादि पुरुष जो श्रेष्ठ मुनिवर । रह गये हैं लीला गाकर सुंदर । भाटोंके समान ॥ ७३ ॥ और योगियोंका समाधि-धन । हो रहा है पार्थके आधीन । देख यह विस्मित होता है मन । महाराज मेरा ॥ ७४ ॥ संजय कहता है कौरवेश । इसमें विस्मय नहीं खास । कृष्ण करलें जिसे अपना-सा । भाग्योदय उसका ॥ ७५ ॥ कहता है इसलिये देवराज । यह दिव्य-दृष्टि ले तू पार्थ आज । इससे देख विश्व-रूप सहज । पूर्ण रूपसे ॥ ७६ ॥ श्रीमुखके ऐसे अक्षर । निकले जिस अवसर । मिटा अविद्याका अंधार । उसी क्षणमें ॥ ७७ ॥ अक्षर नहीं थे वे देख । था ब्रह्म-साम्राज्य-दीपक । अर्जुनार्थ थी चित्कलिका । जगादी श्रीकृष्णने ॥ ७८ ॥ संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्व-रूपसे भर गया— प्रकटे जो दिव्य-चक्षु फिर । ज्ञान-दृष्टिका फूटा अंकुर । तथा दिखाया है सविस्तर । ऐश्वर्य-योग ॥ ७९ ॥ अवतार हैं ये जो सकल । उस महा-सिंधुके कल्लोल । विश्व दीखता है मृगजल । उसके किरणोंसे ॥ १८० ॥ उचित उस अनादि भूमिका पर । प्रकट होता है चित्र स-चराचर । अपने आप अपनेमें दामोदर । दिखाता उसको ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४८

बचपनमें श्रीपतिने जब । इकबार माटी खायी थी तब । माताने क्रोधसे पकड़ी खज्ज । कड़ाई इसकी ॥ ८२ ॥ इसने तब डरके ऐसे । मुख दिखानेके बहानेसे । माताको दिखाया था धीरेसे । ब्रह्मांड सारा ॥ ८३ ॥ या मधु-वनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे । वेद-मति भी कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ८४ ॥ अनुग्रह वैसे कुरुपति । पार्थ पर करता श्रीपति । जानती नहीं है अब मति । माया उसकी ॥ ८५ ॥ प्रकट हुवा यकायक योगैश्वर्य । कल्पांतमें होता जैसे जल-प्रलय । विस्मयमें डूबा चित उस समय । धनंजयका ॥ ८६ ॥ आ-ब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कडेय ही तैरता था । विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लोटने ॥ ८७ ॥ अजी ! कितना था यहां गगन । कौन ले गया वह जो महान । कहें सब चराचर अर्जुन । औ' महाभूत भी ॥ ८८ ॥ मिट गया दिशाओंका नाम-निशान । तना नहीं होता अध-ऊर्ध्वका ज्ञान । जागृतिसे लुप्त होता है स्वप्न । वैसे लोकाकार ॥ ८९ ॥ जैसे अनेक सूर्य-तेज प्रताप । करता स-चंद्र तारागण लोप । वैसे निगल गया है विश्व-रूप । प्रपंच सर्वस्व ॥ १९० ॥ नहीं स्फुरता मनमें तब मनत्व । नहीं संभालता अपनेको बुद्धित्व । लौट आया इंद्रियोंका इंद्रियत्व । हृदयमें ही ॥ ९१ ॥ केवळ वहां स्तब्ध स्तब्धता । एकाग्र है स्वयं एकाग्रता । पडी जैसे संमोहनावस्था । विचारोंपर ॥ ९२ ॥ देखता था वह ऐसा हो विस्मित । सम्मुख था चतुर्भुज रूप स्थित । नाना रूप ले वही था सुसज्जित । चहूँ ओर ॥ ९३ ॥ होते जैसे वर्षा-ऋतुके बादल । या महा-प्रलयके तेजोमंडल । वह रूप वैसा सर्वत्र सकल । भर रहा था एक-मात्र ॥ ९४ ॥ ३४९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

प्रथम स्वरूप समाधान । होकर रहा वह अर्जुन । खुले फिर उसने लोचन । देखा विश्व-रूप ॥ ९५ ॥ देखना इन्ही नयनोंसे । विश्व-रूप संपूर्ण ऐसे । वह दुलार भी कृष्णसे । हुआ पूर्ण ॥ ९६ ॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ विश्व-रूपकी अद्भुतता-- देखता तब वहां अनेक वदन । जैसे रमा-रमणके राज-भवन । प्रकट हुए अनेकानेक निधान । लावण्य श्रियाके ॥ ९७ ॥ या आनंद-वनमें आया बहार । या सौंदर्य राज्य मिले हैं अपार । वैसे देखता वदन मनोहर । श्रीहरिका वह ॥ ९८ ॥ उसमें भी थे जो अनेक । सहज अति भयानक । प्रलय-रात्रीके कटक । उठ आया है ॥ ९९ ॥ या मृत्युके ये मुख उत्पन्न । भयके दुर्ग रचे विभिन्न । या प्रलयाग्निके ये हवन- । कुंड खुले हैं ॥ २०० ॥ ऐसे अद्भुत औ' भयंकर । देखता है रूप धनुर्धर । कई सालंकृत औ' सुंदर । तथा सौम्य भी ॥ १ ॥ ज्ञान-चक्षुसे किया अवलोकन । किंतु न होता मुखोंका अंत न जान । स-कौतुक देखने लगा नयन । विश्व रूपके ॥ २ ॥ नाना वर्णका मानो कमल-वन । विकसित हो रहा था यह जान । आदित्य-समुदायसे वे नयन । देखने लगा पार्थ ॥ ३ ॥ जैसे कृष्ण मेघ-घटाओंमें । कौंधती बिजली प्रलयमें । वैसी देखी भ्रू-भंग तलमें । पिंगलानलकी ॥ ४ ॥ अनेक मुख औ' आंखें जिसमें अति अद्भुत । बहु दिव्य अलंकार अनेक दिव्य आयुध ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ३५०