ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
यह सुन कर अंधा धृतराष्ट्र अंतःकरणसे भी अंधा ही रहा—
राजन् कहता है यहां अर्जुन । वह अद्वयानुभव वरण ।
संजयका शब्द कर श्रवण । स्तब्ध है धृतराष्ट्र ॥ २८ ॥
संजयका दुखी अंतःकरण । जैसे हैं इसके बाह्य नयन ।
वैसे ही अंधा है अंतःकरण । कहता संजय ॥ २९ ॥
किंतु वहां वह अर्जुन । बढाता है स्वहित मान । -
दूसरा जागृत महान । संकल्प एक ॥ ३० ॥
सोचता यह हृदयानभव । बना लेना है नयनका भाव ।
बुद्धिमें हुआ इच्छाका उद्भव । सहज भावसे ॥ ३१ ॥
मेरे यही दोनों नयन । करें विश्व-रूप दर्शन ।
ळालसा हुई दैववान । सहज भावसे ॥ ३२ ॥
आज वह् है कल्पतरुकी शाख । उसकी इच्छा व्यर्थ न होती देख ।
जो जो कहेगा आज उसका मुख । सिद्ध करेगा दैव ॥ ३३ ॥
सुन कर प्रल्हादका बोल । प्रसन्न हुआ वन सकल ।
वह सद्गुरु मिला कुशल । अर्जुनको ॥ ३४ ॥
विश्वरूप दर्शनार्थ वैसे । पूछेगा अर्जुन श्रीकृष्णसे ।
कहूँगा कहता श्रोताओंसे । निवृत्तिदास ज्ञानदेव ॥ ३३५ ॥
गीता श्लोक ४२
ज्ञानेश्वरी ओवी ३३५.
११
विश्व-रूप-दर्शनयोग
यह अध्याय शांत अद्भुत रसोंका प्रयागराज है—
एकादश है इसके अनंतर । कथा भरी है दो रसोंका भंडार ।
वहां दर्शन करेगा धनुर्धर । विश्व-रूपका ॥ १ ॥
जहां शांत-रसके सदन । अद्भुत आया अतिथि -वत्त ।
मिला पंगतका बहुमान । अन्य रसोंको ॥ २ ॥
होता जब वधु-वरोंका मिलन । तब होता बारातियोंका सन्मान ।
वैसे मिला है देशीका सिंहासन । अन्य रसोंको भी ॥ ३ ॥
किंतु उत्तम जो शांत अद्भुत । जंचेंगे आखोंको कर तृप्त ।
जैसे हैं प्रेम-भावालिंगित । हरिहर दोनों ॥ ४ ॥
अथवा जैसे अमावासके दिन । करते हैं दोनों बिंब आलिंगन ।
वैसे दोनों रसोंका सम्मेलन । हुआ इस स्थलमें ॥ ५ ॥
मिले हैं गंगा-यमुनाके ओघ । वैसे रसोंका हुआ है प्रयाग ।
इसीलिये यहां सुस्नात जग । संपूर्ण-रूपसे ॥ ६ ॥
इसमें गीता-सरस्वती गुप्त । तथा ये दोनों रस-ओघ मूर्त ।
इसीलिये त्रिवेणी है उचित । सबको प्राप्त है ॥ ७ ॥
सबको त्रिवेणी-स्नान सुलभ हो इसलिये देश-भाषाका घाट बांधा है—
अजी ! यहां श्रवणके द्वारसे । तीर्थमें प्रवेश सुलभ हो ऐसे ।
करवाया है श्री गुरुने मुझसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ८ ॥
अजी ! संस्कृतका तीर है गहन । उसको देशीके ये शब्द सोपान ।
निर्माण कराये हैं धर्म-निधान । निवृत्तिनाथने ॥ ९ ॥
यहां करना सबको सद्भाव-स्नान । प्रयाग-माधव विश्व-रूप-दर्शन ।
तथा करना यहां संसार-तर्पण । तिलोदकका ॥ १० ॥
ऐसे हैं यह सावयव । स्वरूप लाये रस-भाव ।
औ' श्रवण-सुखका चाव । मिला विश्वको ॥ ११ ॥
यहां प्रत्यक्ष शांत-अद्भुत । अन्य रसोंको शोभा प्राप्त ।
साथ ही हुआ है मोक्ष-प्राप्त । स्पष्ट रूपसे ॥ १२ ॥
यह ग्यारहवां अध्याय है । वेदोंका जो विश्राम-धाम है ।
सुदैवियोंमें पार्थ श्रेष्ठ है। पहुंचा जो वहां ॥ १३ ॥
पार्थ वहां पहुंचा भला क्यों अकेला । जिसे माता है उसका हुवा सुकाल ।
गीता-भाव उभरा देशीमें सकल । इसी समय ॥ १४ ॥
संत जनोंसे कविकी विनय —
मेरी बात यह इसीलिये । विनय करता सुन-लीजिये ।
जरासा ध्यानसे चित्त दीजिये । आप सज्जन ॥ १५ ॥
अजी ! यह है संतोंकी परिषद । ऐसा लगाव यहां अ-शोभास्पद ।
किंतु आपत्य बन आनंद-स्पंद । कहता मैं यह ॥ १६ ॥
आप ही पहले तोतेको पढाते । वह बोलता तब आप डुलते ।
या बच्चेसे नकल करा रीझते । माता पिता जैसे ॥ १७ ॥
वैसे जो जो कुछ मैं बोलता । प्रभु आपने ही सिखाया था ।
जो आपने ही जो है दिया था । सुनिये चित्त देकर ॥ १८ ॥
अजी ! गाछ है यह सारस्वतका । आपने ही जो लगाया था उसका ।
सिंचन कर अवधानामृतका । बढाया कीजिये ॥ १९ ॥
३३३ विश्व रूप-दर्शनयोग
रस-भाव तब पुष्प-सा खिलेगा । नाना अर्थ फल-भारसे फलेगा ।
आपके ही धर्मका सुकाल होगा । सारे जगतमें ॥ २० ॥
इस बातसे रीझ उठे सब संत । "भल कहा" कह कर हो प्रमुदित ।
अब कहो कृष्णार्जुनमें क्या बात । हुयी जो वहां ॥ २१ ॥
तब निवृत्तिदास कहता । कृष्णार्जुनकी मैं क्या जानता ।
सामान्य क्या मैं कह सकता । कहलाते सब आप ॥ २२ ॥
अजी ! जंगलका जो पात खाते । रावण पर वे विजय पाते ।
पार्थ अक्षोहिणी सैन्य जीतते । अकेले ही ॥ २३ ॥
तभी जो जो करते हैं समर्थ । चराचरमें होता वह सार्थ ।
मुझसे कहलाते हैं तदर्थ । संत जन आप ॥ २४ ॥
सुनिये अब यह बोल । गीता भावार्थके निर्मल ।
वैकुंठ-पतिके सरल । निकल मुखसे ॥ २५ ॥
धन्य धन्य वह ग्रंथ गीता । वेद-प्रतिपाद्य जो देवता ।
बना है श्रीकृष्ण महा-वक्ता । इस ग्रंथका ॥ २६ ॥
कैसे करें उस गौरवका वर्णन । न होता शिव-बुद्धिको भी आकलन ।
जीव-भावसे करना उसे वंदन । यही भला है ॥ २७ ॥
बुद्धिने जो स्वीकार किया उसको आंखोंसे देखनेकी इच्छा-अर्जुनका संकोच-
सुनिये अब वह किरीटी । विश्व-रूपपे रख दृष्टि ।
करने लगा है कैसे गोष्ठि । श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥
सकल ही है यह सर्वेश्वर । अनुभव है यह रुचिकर ।
होना यह नयनसे गोचर । प्रत्यक्ष रूपमें ॥ २९ ॥
आशा है यह अंतःकरणकी । विवंचना है कैसे कहनेकी ।
विश्व-रूपके महा-गुपितकी । अर्जुनको यहां ॥ ३० ॥
सोचता पीछे कभी कहीं । प्रिय-जनने पूछा नहीं ।
सहसा मैं इनको यहीं । पूछूं कैसे ? ॥ ३१ ॥
यद्यपि है हमारा स्नेह चांग । तो क्या लक्ष्मी मातासे अंतरंग ।
वह भी डरती ऐसा प्रसंग । पूछनेमें ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३४
हमने सेवा की है बहुत नेक । किंतु क्या गरुड़से भी अधिक।
इसमें वह भी न पूछता एक । चुपचाप बैठा है ॥ ३३ ॥
मैं क्या सनकादिकसे अधिक। वे भी झमेला करते न देख ।
मैं हूँ क्या गोपियोंसे भी भावुक । प्रिय-जन उन्हें ? ॥ ३४ ॥
उन प्रिय-जनोंको भी छकाया । दस गर्भ वास भी सहन किया ।
विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ३५ ॥
ऐसी यह गुपित बात । छिपायी जो हृदय-गत ।
पूछना क्या मुझे उचित । क्या कैसे ॥ ३६ ॥
यदि मैं यह प्रश्न नहीं पूछता । उसके बिन सुख नहीं मिलता ।
जान लेना भी संभव नहीं होता । यह बात कभी ॥ ३७ ॥
श्री कृष्णका भक्त-प्रेम—
पूछें अब अल्पसी बात । फिर देखें हरिका मत ।
सोचकर हो भीति-युक्त । पूछता अर्जुन ॥ ३८ ॥
तब अर्जुनका यह भाव । सुन एक दो शब्दमें देख ।
दिखाता विश्व-रूप-वैभव । पूर्ण-रूपसे ॥ ३९ ॥
गाय जो बछडेको देखकर । ऊठ जाती है हडबडाकर ।
मुखमें ले स्तन चूसने पर । न स्त्रवेगी क्या दूध ? ॥ ४० ॥
जहां आता है पांडवोंका नाम । रक्षार्थ दौडना जिसका काम ।
पूछना अर्जुनका सप्रेम । सहेगा कैसे ? ॥ ४१ ॥
श्रीकृष्ण सहज प्रेमावतरण । अर्जुन प्रेम-नशाको उत्तेजन ।
समरस होनेमें यहां अभिन्न । भिन्नता भान विस्मय ॥ ४२ ॥
अर्जुनके बोलनेसे अब महज । कृष्ण विश्व-रूप दिखायेग सहज ।
ऐसा अद्भुत प्रसंग आया है आज । सुनियोगा ॥ ४३ ॥
३३५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
प्रभो तूने अपने हृदयका दर्शन दिया और —
कृष्णसे फिर कहता अर्जुन । श्रीकृष्ण तूने मेरे ही कारण ।
वाच्य किया था जो गुह्य कथन । कृपा करके ॥ ४४ ॥
महाभूत जब ब्रह्ममें विलीन । जीव महदादि भी होते हैं लीन ।
अंतिम वह जो है विश्रांति-स्थान । आपका रूप ॥ ४५ ॥
अंतःकरणके वह भीतर । रखा था वेदोंसे भी छिपाकर ।
कहता है कृष्णसे धनुर्धर । कृपणके भांति ॥ ४६ ॥
वह तूने आज श्री नारायण । दिया है मुझे हृदय-दर्शन ।
उसपे शिवने अध्यात्म-ध्यान । किया न्योच्छावर ॥ ४७ ॥
ऐसी वस्तु तूने मुझे दी है । क्षण भी विलंब न किया है ।
यदि हम ऐसे कहते हैं । तो मैं भिन्न हूं क्या ? ॥ ४८ ॥
भंवरमें मैं महा-मोहके । डुबा था शिखा तक देखके ।
श्रीहरि तूने स्वयं कूदके । उभार लिया मुझे ॥ ४९ ॥
तुझ एक बिना देव कभी कहीं । विश्वमें अन्य वस्तुका नाम नहीं ।
किंतु देख यहां दुर्दैव है यही । मानते "हम हैं" भिन्न ॥ ५० ॥
विश्वमें मैं कोयी एक अर्जुन । धर ऐसा देहका अभिमान ।
तथा कौरवको यहां स्वजन । कहता था मैं ॥ ५१ ॥
इस पर भी मैं इन्हें मारूंगा । इसका पाप-भोगी भी बनूंगा ।
ऐसे दुःस्वप्न रत मुझे जगा- । दिया तूने कृष्ण ॥ ५२ ॥
अर्जुनने कहा
करके करुणा मेरी कहा तूने रहस्य जो ।
उस अध्यात्म विद्यासे मेरा जो मोह था गया ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३६
गंधर्व-नगरकी बस्ती । छोड़ निकला मैं लक्ष्मी-पति ।
प्याससे पानीका था मैं प्रार्थी । औ' पीता था मृगजल ॥ ५३ ॥
अजी ! वरूके सर्प-दंशसे । चढती विष-ल्हरियोंसे ।
त्रस्त जीवको मृत्यु-भयसे । उभार लिया देव ॥ ५४ ॥
अपना प्रतिबिंब न जानकर । कूपमें कूदना सिंह देखकर ।
उसको बचा लिया पकड़कर । मेरी रक्षा की ऐसी ॥ ५५ ॥
मुझपर अपार कृपा करके मेरी रक्षा की - अब--
नही तो मेरा यहां तक । निश्चय हुवा था तू देख ।
सप्त-सागर हुये एक । मिलकर ॥ ५६ ॥
या डूबने दो युग संपूर्ण । या टूटने दो यह गगन ।
लड़ेगा नहीं कभी अर्जुन । स्व-गोत्रजोंसे ॥ ५७ ॥
ऐसी अहंकार-उर्मियोंमें उन्मत्त । आग्रह जलमें डूबा था मैं अनंत ।
उठा लिया है तूने हो स्नेहार्द्र-चित्त । कौन था अन्य मेरा ॥ ५८ ॥
नहीं था यह एक-मात्र अर्जुन । वैसे दूसरेको नाम दे स्वजन ।
सवार हुवा ऐसा पागलपन । तूने बचा लिया देव ! ॥ ५९ ॥
पहले होना था जब हमारा दहन । भय था तब देह जल जानेका सुन ।
अब चैतन्य सह होना था दहन । बचा लिया तूने दोनो बार ॥ ६० ॥
हिरण्यासुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर ।
मोहार्णव-सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ६१ ॥
तेरे ही बलसे मधुसूदन । विवेकने ले लिया है स्व-स्थान ।
वराहका पुनरावतरण । लेना पडा यह ॥ ६२ ॥
अपार कृपा है तेरी मुझ पर । एक वाचासे ही बोलूं क्यों कर ।
पंच-प्राण किये तूने न्योच्छावर । मुझपर देव ॥ ६३ ॥
कुछ भी वह व्यर्थ नहीं गया । उसमें संपूर्ण यश भी आया ।
देव ! मैं साद्यंत रूपसे माया- । रहित हुवा जी ॥ ६४ ॥
आनंद सरोवरके कमल । वैसे हैं तेरे नयन निर्मल ।
अपने प्रसादके हैं महल । बना लेते हैं ॥ ६५ ॥
(43) ३३७ विश्व-रूप-दर्शनयोग
उसका तथा मोहका मिलन । है यह व्यर्थ-बातका कथन ।
मृगजलसे होगा क्या शमन । वडवानलका ॥ ६६ ॥
तथा जो मैं हूं तब श्रीकृष्ण । पाके कृपाका अंतःकरण ।
करता हूं सानंद भोजन । ब्रह्म-रसका ॥ ६७ ॥
इससे हुवा मेरा मोह निवारण । इसमें क्या भला विस्मयका कारण ।
इससे हुवा मेरा उद्धार श्रीकृष्ण । तेरे चरणोंकी सौगंध ॥ ६८ ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा—
अजी ! हे कमल-नयन । कोटि-सूर्य-तेज वदन ।
मैंने तुझसे जनार्दन । सुना है आज ॥ ६९ ॥
प्रकृतिसे उत्पन्न भूत-जात । वैसे प्रकृतिमें उसका अंत ।
कैसा होता है जो प्राकृत । कहा है देवने ॥ ७० ॥
प्रकृतिका दिया संपूर्ण-ज्ञान । बताया ब्रह्मका वसति-स्थान ।
जिसको ओढ करके महान् । हुए हैं वेद ॥ ७१ ॥
ज्ञान-राशीको जो बढाता । धर्म-रत्नोंको प्रसवता ।
वेद है आश्रय करता । तेरे स्वरूपका ॥ ७२ ॥
ऐसा अगाध है महात्म्य । जो सकल मार्गैक्य-गम्य ।
तथा है स्वानुभव रम्य । दिखाया मुझे ॥ ७३ ॥
हटाकरके सब बादल । दिखाते जैसे सूर्य-मंडल ।
सेवार हटाकर निर्मल । जल दिखाते हैं ॥ ७४ ॥
छुडानेसे सांपकी जकडन । होता जैसे चंदन-दर्शन ।
या करनेसे पिशाचोच्चाटन । मिलती भूमिस्थ निधि ॥ ७५ ॥
उत्पत्ति नाश भूतोंका सुना मैंने सविस्तर ।
अभंग महिमा वैसे तेरे ही मुखसे प्रभु ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३८
वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन ।
पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥
इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव ।
किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥
रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर ।
तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥
जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर ।
जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥
तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना ।
कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना -
तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि ।
उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥
संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता ।
जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥
वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार ।
सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥
क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर ।
लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥
उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन ।
सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥
, तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है ।
वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग
ऐसा तेरा असीम जनार्दन । विश्व-रूप कथा सुनके मन ।
देखना चाहते वही नयन । प्यासे होकर ॥ ८६ ॥
मेरा संकोच करके दूर । स-स्नेह पूछी चाह श्रीधर ।
यही एक चाह चक्रधर । पूर्ण करना ॥ ८७ ॥
तेरा विश्व-रूप संपूर्ण । देखना चाहता स-तृष्ण ।
होकर तन-मन प्राण । एकमात्र ॥ ८८ ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
और एक बात केशव । विश्व-रूप दर्शनास्तव ।
मेरी योग्यता है वास्तव । या नहीं है ॥ ८९ ॥
यह मैं आप नहीं जानता । यह क्यों है यदि तू पूछता ।
अपने रोगका क्या जानता । निदान रोगी ? ॥ ९० ॥
अजी ! होती जब इच्छाकी तीव्रता । भूलते हैं तब अपनी योग्यता ।
प्यासा मनुष्य है सदैव मानता । अपर्याप्त समुद्र ॥ ९१ ॥
इच्छाकी है ऐसी जो तीव्रता । भुला देती है मेरी योग्यता ।
जानती किंतु शिशुको माता । सहज-भावसे ॥ ९२ ॥
वैसा तू भक्त जन रंजन । जानता है मेरी संभावना ।
फिर तू विश्व-रूप दर्शन । देगा हो सदय ॥ ९३ ॥
किंतु मेरी योग्यतानुसार । ना हो तो ना कह कृपाकर ।
गाके लाभ क्या पंचम स्वर । बहरेके सम्मुख ॥ ९४ ॥
एक प्यासेकेलिये वर्षा होती । उससे पृथ्वीकी प्यास बुझती ।
किंतु वही चट्टान पर होती । व्यर्थ जाती है ॥ ९५ ॥
चकोरको चंद्रामृत मिलता । अन्योंको क्या इनकार करता ।
किंतु दृष्टि न होनेसे होता । व्यर्थ ही सब ॥ ९६ ॥
यदि तू मानता शक्य तेरा जो रूप देखना ।
तभी योगेश्वर देव दिखावो वह अव्यय ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४०
अजी ! तू विश्व-रूप यह सहसा । दिखायेगा इस बातका भरोसा ।
ऐसी बातोंमें उदार अपना-सा । नित्य-नूतन तू ॥ ९७ ॥
परमात्माकी असमान्य उदारताका वर्णन—
तेरी उदारता है जो स्वतंत्र । न देखती देनेमें पात्रापात्र ।
कैवल्य-सा वर अति-पवित्र । दिया शत्रुओंको भी ॥ ९८ ॥
अजी ! मोक्ष है जो अति दुराराध्य । तेरे चरण हैं उसका आराध्य ।
होता है वह तेरी बातसे साध्य । सेवकके समान ॥ ९९ ॥
तूने सनकादिकके समान । पूतनाको दिया सायुज्यासन ।
कराके जो विषका स्तन-पान । मारने आयी थी ॥ १०० ॥
राजसूय सभा-सदनमें । त्रिभुवन जन-सम्मुखमें ।
जिसने शत दु-र्वचनमें । डुबोया तुझे ॥ १ ॥
ऐसा अपराधी जो शिशुपाल । पाता है तेरे चरणमें स्थल ।
या उत्थानपादका ध्रुवबाल । चाहता था क्या मोक्ष ॥ २ ॥
ध्रुवबाल आया था वनमें । बैठना है पिताकी गोदमें ।
उसको किया तूने जगतमें । सूर्य-चंद्रसे ऊंचा ॥ ३ ॥
ऐसे वनवासियोंको सकल । देनेवाला एक है तू धसाल ।
पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ४ ॥
जिसने मारी लात तेरी छाती पर । उसका पद-चिन्ह किया अलंकार ।
अब-तक है शत्रु का ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ५ ॥
अपकारी पर भी तेरा उपकार । अपात्रों पर भी तू है अति उदार ।
द्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ६ ॥
न सुनी जिसने आराधना । रिझाती थी जो तोता अपना ।
उस गणिकाको जनार्दन । तूने दिया वैकुंठ ॥ ७ ॥
दिखा कर ऐसे व्यर्थके कारण । निज-पद देता तू नारायण ।
न करेगा तू मुझे ऐसा श्रीकृष्ण । कभी निराश ॥ ८ ॥
जिससे इतने जगत सकल । पाता है शांति तुष्टि पुष्टि औ' बल ।
उस नंदिनीका बछडा व्याकुल । होगा क्या भूखसे ॥ ९ ॥
३४१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
इसीलिये मैंने कही पीछे जो बात । देव न करेंगे अस्वीकार निश्चित ।
उसकी योग्यता देना मुझे अच्युत । यह है विनय ॥ ११० ॥
तेरे विश्व-रूपका आकलन । कर सकेंगे तो मेरे नयन ।
प्यास बुझावो हे जनार्दन । इन नयनोंकी ॥ ११ ॥
श्री कृष्णकी भक्त-वत्सलता—
करता है जब ऐसी विनती । लीन हो करके सुभद्रापति ।
तब वह षड्गुण-चक्रवर्ति । होता है उतावला ॥ १२ ॥
वह है कृपा-पीयूष सजल । पास आया है यहां वर्षा-काल ।
अथवा है श्रीकृष्ण कोकिल । अर्जुन बसंत ॥ १३ ॥
देखकर जैसे चंद्र-बिंब वर्तुल । उछल आता है क्षीर-सागर-जल ।
वैसे प्रेम-बलसे हृदय-कमल । खिला श्री हरिका ॥ १४ ॥
प्रसन्नताके उस उमंगसे । गरज कर कहता कृपासे ।
पार्थ तू देख देख आनंदसे । स्वरूप मेरा ॥ १५ ॥
केवल विश्व-रूपको देखना । इतनी थी पार्थकी मनो-कामना ।
यहां विश्व रूपमय त्रिभुवन । किया श्री हरिने ॥ १६ ॥
धन्य-धन्य उदार अपरिमित । याचकको देता देव दिन-रात ।
चाहता जो उससे अनगिनत । अपना सर्वस्व ॥ १७ ॥
शेषसे भी जो था चुराया । वेदोंको जिससे छकाया ।
लक्ष्मीसे भी जो था छिपाया । वह हृदय-गुह्य ॥ १८ ॥
प्रकट करेंगे अनेक दर्शन । बनायेंगे विश्व-रूप प्रदर्शन ।
भाग्यशाली है यह बडा अर्जुन । धन्य धन्य ॥ १९ ॥
स्वप्नमें जाता जैसे मनुष्य जागृत । स्वप्नमें बनता है स्वयं वस्तु जात ।
वैसे स्वयं बना विराट्-विश्व अनंत । अपने आपमें ॥ १२० ॥
यकायक वह मुद्रा छोडी । स्थूल-दृष्टि थी यवनिका जो फाडी ।
अथवा खोलकर दिखायी बडी । अपनी योग-सिद्धि ॥ २१ ॥
किंतु यह देखेगा या नहीं । ऐसा विचार कुछ भी नहीं ।
किया और देख कहना है यही । हो स्नेहातुर ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४२
भगवान उवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपकी जड़में एक सृष्टिका दर्शन, स्वभाव-विविधता—
तूने कहा अर्जुन दिखावो एक । उसीको दिखाया तो क्या रहा नेक ।
यहां भरा है जो सभी अब देख । मेरे ही रूपमें ॥ २३ ॥
एक कृश तो एक स्थूल । एक लघु एक विशाल ।
पृथुतर तथा विशाल । अमर्याद सब ॥ २४ ॥
एक अनावर तो एक प्रांजल । कुछ स-व्यापार तो कुछ निश्चल ।
कुछ उदासीन तो कुछ स्नेहल । कुछ हैं कठोर ॥ २५ ॥
कुछ उन्मन कुछ सावध । कुछ उथल कुछ अगाध ।
कुछ प्रसन्न तो कुछ क्रुद्ध । तथा मुक्त संकुचित ॥ २६ ॥
कुछ संत कुछ सदा-मद । कुछ स्तब्ध कुछ सानंद ।
गर्जन रत कुछ निःशब्द । तथा सौम्य भी ॥ २७ ॥
अभिलाषा-युत कुछ विरक्त । कुछ जागृत कुछ निद्रित ।
कुछ संतुष्ट कुछ है आर्त । अति उदार कुछ ॥ २८ ॥
कुछ अशस्त्र तो कुछ सशस्त्र । तथा अति रौद्र औ' अति-मित्र ।
कुछ तम-युत कुछ पवित्र । कुछ है समाधिस्थ ॥ २९ ॥
कयी जन लीला-विलास । औ' पालन-शील-लालस ।
संहारक कुछ सावेश । कुछ है साक्षि-भूत ॥ १३० ॥
नाना विध जो प्रकर्ष ऐसे । प्रकाशित जो दिव्य-तेजसे ।
वर्णमें भी जो एक एक-से । नहीं थे कोयी ॥ ३१ ॥
श्रीभगवानने कहा
देखो मेरे सभी रूप दिव्य शत सहस्र तू ।
नाना प्रकार आकार वर्ण भी जिसमें बहु ॥ ५ ॥
३४३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें वर्ण-विविधता—
कुछ तो तप्त सुवर्णसे । कुछ भूरे मट-मैलेसे ।
कुछ सराग चित्रितसे । सिंधुसे नभ ॥ ३२ ॥
कुछ जो सहज स्वाभाविक कांतिके । कुछ रत्न-जडित ब्रह्मांड दीप्तिके ।
कुछ तो अरुणोदय-प्रभा सरीखे । कुंकुमके समान ॥ ३३ ॥
कुछ शुद्ध स्फटिकोज्ज्वल । कुछ इंद्र-नील सुनील ।
कुछ काले अंजनाचल । कुछ रक्त-वर्ण ॥ ३४ ॥
कुछ लसित-कंचनसे पीले । कुछ शामल बादलसे नीले ।
कुछ चंपक-गौर सम पीले । कुछ थे हरे ॥ ३५ ॥
कुछ लाल तप्त-ताम्र सम । कुछ सुंदर जो चंद्र-सम ।
नाना वर्णके रूप असीम । देख लो भरे ॥ ३६ ॥
जैसे हैं ये अनेक वर्ण । रूपमें भी नहीं प्रमाण ।
लज्जासे कंदर्प-शरण । रूप होंगे देख ॥ ३७ ॥
विश्व-रूपके प्रत्येक रोम-कूपमें रूप विविधता—
कुछ अति लावण्य साकार । स्निग्ध-तन कुछ मनोहर ।
कुछ श्रृंगार-श्रीके-भांडार । खुला प्रदर्शनार्थ ॥ ३८ ॥
कुछ पीनाकवयव मांसल । कुछ शुष्क अति-विकराल ।
कुछ दीर्घ-कंठ और शिथिल । कुछ अति घिनौने ॥ ३९ ॥
ऐसे नाना-विध वर्ण आकृति । पार नहीं यहां सुभद्रा-पति ।
यहां प्रत्येक अंगकी आकृति । दिखाती विश्व ॥ १४० ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
वसु रुद्र तथा वायु देखो आदित्य अश्विनी ।
देखो अनेक आश्चर्य न देखे पहले कभी ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४४
विश्वरूपमें अनेक देवताओंका दर्शन—
खुलती है जहां दृष्टि । फैलती है आदित्य-सृष्टि ।
मिटती है जहां दृष्टि । होता अस्त ॥ ४१ ॥
मुखसे निकल हुआ फूत्कार । लेकरके ज्वालाओंका आकार ।
पावक आदि वसु समाधार । निर्माण करते ॥ ४२ ॥
जहां भ्रू-लताओंका अवसान । क्रोधसे होता रहता मिलन ।
वहां रुद्रोंके समूह उत्पन्न । होते हैं देख ॥ ४३ ॥
सौम्य आर्द्रतामें यहां सदैव । निर्माण होते हैं अश्विनी देव ।
तथा श्रोत्रोंमें होते हैं पांडव । वायु अनेक ॥ ४४ ॥
एकेक रूपके ऐसे खेल । सृजते सुर-सिद्धके कुल ।
ऐसे अपार तथा विशाल । देखो वहां रूप ॥ ४५ ॥
जिसको कहनेमें वेद तुतलाता । देखनेमें कालका आयुष्य खूटता ।
विधाताको भी उसका नहीं लगता । ठौर ठिकान ॥ ४६ ॥
तीनों देवोंने न सुनी एक । उसको तू प्रत्यक्षमें देख ।
भोग जो अचरज अनेक । योग-वैभव महा ॥ ४७ ॥
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
इस आकृतिके तू किरीटी । रोम-मूलमें है देख सृष्टि ।
सुर-तरुके तलकी मिट्टी । सृजती तृणांकुर ॥ ४८ ॥
तथा पवनका प्रकाश जैसे । दिखाता उड़ते परमाणु-से ।
भ्रमते यहां ब्रह्मांड भी वैसे । अंगके सांधोंमें ॥ ४९ ॥
यहांका प्रत्येक अवयव । दिखाता है सविस्तर विश्व ।
औ' विश्वके पार भी पांडव । देखना चाहो ॥ १५० ॥
देखो अब यहां सारा विश्व तू सचराचर ।
एकत्र देहमें मेरे इच्छा दर्शन है तुझे ॥ ७ ॥
(44) ३४५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
किसी भी बातकी अपूर्णता । कोई नहीं है यहां सर्वथा ।
देख सुखसे जो तुझे भाता । मेरे तनमें तू ॥ ५१ ॥
विश्व-मूर्ति उससे ऐसे । बोली जो अति कारुण्यसे ।
तो दीखता या नहीं ऐसे । न कहता रहा मौन ॥ ५२ ॥
रहा क्यों भला यह ऐसा मौन । सोचकर देखता यह जनार्दन ।
तब भी इच्छा-भूषित अर्जुन । खडा है उत्कंठित ॥ ५३ ॥
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामिते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
उतरा नहीं है उत्कंठोन्माद । न मिला अब भी स्वर्ग सुखद ।
आकलन नहीं होता विशद् । मेरा रूप ॥ ५४ ॥
अर्जुनको विश्व-रूप देखनेके लिये दिव्य-दृष्टि दी—
हंसा देव यह सोचकर । कहने लगा जो हंसकर ।
“हमने दिखाया रूप पर । तू देखता ही नहीं” ॥ ५५ ॥
बोला तब अर्जुन विलक्षण । यह किसके दोषके कारण ।
बगलेको देता है सुलक्षण । चंद्रामृत तू ॥ ५६ ॥
दिखाता सुंदर दर्पण । जन्मांधको तू है श्रीकृष्ण ।
सुनाता तू मधुर बीन । बहरेको जो ॥ ५७ ॥
मकरंद-कणोंका चारा । कहता है तू दादुरसे चर ।
व्यर्थ मानकर क्यों शार्गधर । बिगडता अब ॥ ५८ ॥
शास्त्रोंसे यह अतींद्रिय घोषित । ज्ञान-दृष्टिका जो विषय निश्चित ।
कहता इसे देखेंगे कैसे पार्थ । चर्म-चक्षु ॥ ५९ ॥
यह मेरा व्यंग नहीं बोलना । मुझे अपना सहन करना ।
यह सुन कहता जनार्दन । सच है यह ॥ १६० ॥
किंतु तू चर्म-चक्षूसे न देख सकता मुझे ।
ले दिव्य दृष्टि है मेरी ईश्वरी योग देख तू ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४६
यह स्वरूप यदि दिखाना होता । दी होती पहले ही यह योग्यता ।
बोलनेमें मैं प्रेमसे स्वभावता । भूल गया हूं ॥ ६१ ॥
पहले जुताईके बुवाईसे । थकावट भई व्यर्थ इससे ।
अब देता दिव्य-दृष्टि इससे । देखो निज-रूप ॥ ६२ ॥
इस दृष्टिसे फिर तू अर्जुन । हमारा ऐश्वर्य-योग संपूर्ण ।
देखके उसे करो संगोपन । अपने अनुभवमें ॥ ६३ ॥
ऐसा वह वेदांत-वेद्य । सकल लोकका जो आद्य ।
जगताका जो है आराध्य । कहने लगा ॥ ६४ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥
अर्जुनका महा-भाग्य-
सुन तू कौरव-कुल-तिलक । विस्मय है मुझे इसी बातका ।
है क्या लक्ष्मीसे भुवनत्रयका । दूसरा भाग्यवान ॥ ६५ ॥
अथवा तत्व-विवेचनार्थ । है क्या कोई वेदसे समर्थ ।
सेवामें शेषसे भी विश्वस्थ । दूसरा कौन है ? ॥ ६६ ॥
उसके लिये ऐसे कष्ट सहन । करते हैं जो योगियोंके समान ।
अनुसरणमें बना है वाहन । गरुड सतत ॥ ६७ ॥
उन सबको है परे हटाया । जबसे पांडवोंका जन्म भया ।
कृष्ण-सुख सब सहज आया । इनके भागमें ॥ ६८ ॥
इन पांचोंमें भी जो अर्जुन । कृष्ण जैसे उसके आधीन ।
कामुक होता है अनुदिन । कामिनी-संग ॥ ६९ ॥
संजयने कहा
ऐसा बोल कुरु-श्रेष्ठ महायोगेश कृष्णने ।
दिखाया अपना श्रेष्ठ ईश्वरी-रूप पार्थको ॥ ९ ॥
३४७ विश्व रूप-दर्शनयोग
सिखाया गया पंछी ऐसा न बोलता । क्रीड़ा-रंत मृग भी ऐसा न चलता ।
पार्थके दैवका उत्कर्ष जो दीखता । यहां अकथनीय ॥ १७० ॥
पर-ब्रह्म यह आज है संपूर्ण । भोगार्थ सिद्ध इसके ही नयन ।
इसकी बातका दुलार श्रीकृष्ण । करता है यहां ॥ ७१ ॥
पार्थ कोपता तब वह शांत रहता । यह रूसता तब वह है समझाता ।
अर्जुनसे पगलाया है जगन्नाथ । निश्चित रूपसे ॥ ७२ ॥
जनमें हैं वैसे विषय जीतकर । शुकादि पुरुष जो श्रेष्ठ मुनिवर ।
रह गये हैं लीला गाकर सुंदर । भाटोंके समान ॥ ७३ ॥
और योगियोंका समाधि-धन । हो रहा है पार्थके आधीन ।
देख यह विस्मित होता है मन । महाराज मेरा ॥ ७४ ॥
संजय कहता है कौरवेश । इसमें विस्मय नहीं खास ।
कृष्ण करलें जिसे अपना-सा । भाग्योदय उसका ॥ ७५ ॥
कहता है इसलिये देवराज । यह दिव्य-दृष्टि ले तू पार्थ आज ।
इससे देख विश्व-रूप सहज । पूर्ण रूपसे ॥ ७६ ॥
श्रीमुखके ऐसे अक्षर । निकले जिस अवसर ।
मिटा अविद्याका अंधार । उसी क्षणमें ॥ ७७ ॥
अक्षर नहीं थे वे देख । था ब्रह्म-साम्राज्य-दीपक ।
अर्जुनार्थ थी चित्कलिका । जगादी श्रीकृष्णने ॥ ७८ ॥
संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्व-रूपसे भर गया—
प्रकटे जो दिव्य-चक्षु फिर । ज्ञान-दृष्टिका फूटा अंकुर ।
तथा दिखाया है सविस्तर । ऐश्वर्य-योग ॥ ७९ ॥
अवतार हैं ये जो सकल । उस महा-सिंधुके कल्लोल ।
विश्व दीखता है मृगजल । उसके किरणोंसे ॥ १८० ॥
उचित उस अनादि भूमिका पर । प्रकट होता है चित्र स-चराचर ।
अपने आप अपनेमें दामोदर । दिखाता उसको ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४८
बचपनमें श्रीपतिने जब । इकबार माटी खायी थी तब ।
माताने क्रोधसे पकड़ी खज्ज । कड़ाई इसकी ॥ ८२ ॥
इसने तब डरके ऐसे । मुख दिखानेके बहानेसे ।
माताको दिखाया था धीरेसे । ब्रह्मांड सारा ॥ ८३ ॥
या मधु-वनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे ।
वेद-मति भी कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ८४ ॥
अनुग्रह वैसे कुरुपति । पार्थ पर करता श्रीपति ।
जानती नहीं है अब मति । माया उसकी ॥ ८५ ॥
प्रकट हुवा यकायक योगैश्वर्य । कल्पांतमें होता जैसे जल-प्रलय ।
विस्मयमें डूबा चित उस समय । धनंजयका ॥ ८६ ॥
आ-ब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कडेय ही तैरता था ।
विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लोटने ॥ ८७ ॥
अजी ! कितना था यहां गगन । कौन ले गया वह जो महान ।
कहें सब चराचर अर्जुन । औ' महाभूत भी ॥ ८८ ॥
मिट गया दिशाओंका नाम-निशान । तना नहीं होता अध-ऊर्ध्वका ज्ञान ।
जागृतिसे लुप्त होता है स्वप्न । वैसे लोकाकार ॥ ८९ ॥
जैसे अनेक सूर्य-तेज प्रताप । करता स-चंद्र तारागण लोप ।
वैसे निगल गया है विश्व-रूप । प्रपंच सर्वस्व ॥ १९० ॥
नहीं स्फुरता मनमें तब मनत्व । नहीं संभालता अपनेको बुद्धित्व ।
लौट आया इंद्रियोंका इंद्रियत्व । हृदयमें ही ॥ ९१ ॥
केवळ वहां स्तब्ध स्तब्धता । एकाग्र है स्वयं एकाग्रता ।
पडी जैसे संमोहनावस्था । विचारोंपर ॥ ९२ ॥
देखता था वह ऐसा हो विस्मित । सम्मुख था चतुर्भुज रूप स्थित ।
नाना रूप ले वही था सुसज्जित । चहूँ ओर ॥ ९३ ॥
होते जैसे वर्षा-ऋतुके बादल । या महा-प्रलयके तेजोमंडल ।
वह रूप वैसा सर्वत्र सकल । भर रहा था एक-मात्र ॥ ९४ ॥
३४९ विश्व-रूप-दर्शनयोग
प्रथम स्वरूप समाधान । होकर रहा वह अर्जुन ।
खुले फिर उसने लोचन । देखा विश्व-रूप ॥ ९५ ॥
देखना इन्ही नयनोंसे । विश्व-रूप संपूर्ण ऐसे ।
वह दुलार भी कृष्णसे । हुआ पूर्ण ॥ ९६ ॥
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
विश्व-रूपकी अद्भुतता--
देखता तब वहां अनेक वदन । जैसे रमा-रमणके राज-भवन ।
प्रकट हुए अनेकानेक निधान । लावण्य श्रियाके ॥ ९७ ॥
या आनंद-वनमें आया बहार । या सौंदर्य राज्य मिले हैं अपार ।
वैसे देखता वदन मनोहर । श्रीहरिका वह ॥ ९८ ॥
उसमें भी थे जो अनेक । सहज अति भयानक ।
प्रलय-रात्रीके कटक । उठ आया है ॥ ९९ ॥
या मृत्युके ये मुख उत्पन्न । भयके दुर्ग रचे विभिन्न ।
या प्रलयाग्निके ये हवन- । कुंड खुले हैं ॥ २०० ॥
ऐसे अद्भुत औ' भयंकर । देखता है रूप धनुर्धर ।
कई सालंकृत औ' सुंदर । तथा सौम्य भी ॥ १ ॥
ज्ञान-चक्षुसे किया अवलोकन । किंतु न होता मुखोंका अंत न जान ।
स-कौतुक देखने लगा नयन । विश्व रूपके ॥ २ ॥
नाना वर्णका मानो कमल-वन । विकसित हो रहा था यह जान ।
आदित्य-समुदायसे वे नयन । देखने लगा पार्थ ॥ ३ ॥
जैसे कृष्ण मेघ-घटाओंमें । कौंधती बिजली प्रलयमें ।
वैसी देखी भ्रू-भंग तलमें । पिंगलानलकी ॥ ४ ॥
अनेक मुख औ' आंखें जिसमें अति अद्भुत ।
बहु दिव्य अलंकार अनेक दिव्य आयुध ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ३५०