ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
प्रकाशक : राजाराम शास्त्री ( काशी विद्यापीठ ) संचालक प्रकाशन विभाग संत साहित्य सदन मसूरी. ( उ. प्र० ) प्रथमावृत्ति ३००० पुस्तकका सर्वाधिकार बाबुराव कुमठेकर. मुद्रक : ज्ञानेश्वरीके पृष्ठ १-६२४ मूल्य ५० रु. वृंदावन प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स प्रा. लि. १२-१३ लालबाग फोर्ट रोड, बेंगलूर ४ अन्य सब पांडुरंग दाजीबा मोरे निर्णयसागर प्रेस, २६-२८ डॉक्टर एम् बी. वेलकर स्ट्रीट, मुंबई २ इस पुस्तकके किसी अंशका अन्यत्र उपयोग करनेसे प्रथम लेखककी लिखित स्वीकृति लेना अनिवार्य है ।
प्रकाशककी ओरसे— हिंदीमें ज्ञानेश्वरीके कई अनुवाद हैं। फिर भी हम इस अनुवादको प्रकाशित कर रहे हैं। अन्य अनुवादोंसे इसकी जो विशेषता है वह विज्ञ पाठक स्वयं अनुभव करेंगे। संत साहित्य सदन एक उद्देश्य लेकर काम कर रहा है। भिन्न भिन्न भाषाओंके संतोंका साहित्य मूलके रूपमें हिंदीमें प्रकाशित करना सदनका एक उद्देश्य है। इसी उद्देश्यसे सदनने ऋग्वेदके २४ सूक्तोंके आचमनके बाद यह दूसरा कदम उठाया है। आशा है हिंदी पाठक इसका स्वागत करेंगे। इस महान ग्रंथके भूमिका लेखक श्री धुंडामहाराज हिंदी भाषा भाषियोंसे अपरिचित हैं। महाराज महाराष्ट्रके एक संतपरिवारके हैं। करीब २५० वर्षोंसे देगलूरकर परिवार ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरीके उपासक है। इस अवधिमें इस परिवारके दो महान संत हो गये हैं। महाराष्ट्रके संतचरित्र लेखक श्री महीपति बाबा भी इसी परिवारके हैं। स्वयं भूमिका- लेखक ज्ञानेश्वरीके उपासक हैं। महाराष्ट्रभरमें कीर्तन प्रवचन द्वारा ज्ञानेश्वरीका प्रचार करना अपना स्वधर्म मानते हैं। महाराज, संस्कृत, मराठी, हिंदी तथा तेलगूके विद्वान हैं, आधुनिक वैज्ञानिक विचारोंसे भी पर्याप्त परिचित हैं। आपने तेलगू भाषामें ज्ञानेश्वरीका गद्यानुवाद किया है। अत्यंत व्यस्त कार्यक्रमके होते हुए भी आपने विस्तृत भूमिका लिख दी इसके लिये हम महाराजके कृतज्ञ हैं। वैसे ही इस पुस्तकको अधिकसे अधिक सुंदर बनानेके लिये प्रसाद मासिकके श्री. म. य. जोशीने जो अपने ब्लॉक दिये तथा निर्णयसागर प्रेसके व्यवस्थापक श्री. मोरेने सहयोग दिया उसके लिए उनके भी आभारी हैं। हमारी आगामी पुस्तकें, कन्नडमेंसे दास साहित्यका प्रथम पाद, मराठी ज्ञानेश्वर और उनका साहित्य, ज्ञानेश्वर महाराजका अनुभवामृत, संस्कृतसे उपनिषद संग्रह भाग पहला, और गुजरातीसे नरसी भगत उनका साहित्य और कार्य ये होंगी। प्रकाशक.
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प्रस्तावना -ह. भ. प. धुंडामहाराज देगलूरकर- ज्ञानेश्वरी यह ग्रंथ मराठी भाषामें...देशी भाषामें... "सत्यं शिवं सुंदरं" का मूर्तिमंत आविष्कार है । वाङ्मयमें जो जो दिव्य भव्य ऐसा रहता है उन सबका इस महा- ग्रंथमें पूर्ण साक्षात्कार हुवा है । यह ग्रंथ वाङ्मयीनक्षेत्रका एक महान् आश्चर्य है । यदि कोई श्रद्धा, बुद्धिसंपन्न मनुष्य इस ग्रंथको सरसरी निगाहसे देखेगा तो भी उसको 'आश्चर्य- वत्पश्यति” का अनुभव होगा । जो लोग एलोरा अजंताकी पुरानी कलाकृतियोंको देखकर जैसे कोई कलाकार दिङ्मूढ-सा हो जाता है, जैसे पुनः पुनः उन कलाकृतियोंकी ओर उसकी आंखें खींचती हैं उसके सूक्ष्माति-सूक्ष्म कलागुणसे वह प्रभावित होजाता है, उन कलाकृतियोंमें कलाकारकी ओरसे आविष्कृत नवरसोंरका दर्शन करता है, उनमेंसे किस कलाकृतिको महत्त्व देना कौनसी कलाकृति श्रेष्ठ है इसका निर्णय करना असंभवसा हो जाता है किंतु उन कला- कृतियोंको देखते देखते दर्शक मानो सविकल्प-समाधिमें डूब-सा जाता, यही हालत ज्ञाने- श्वरीके सुज्ञ वाचककी होती है, कुछ विद्वानोंका यह मत है 'शास्त्र और काव्य एक स्थान पर नहीं रहते ! “कोलेरीजने” “जो शास्त्र नहीं वह काव्य” ऐसे काव्यकी व्याख्या की है । —Poetry is the anti thesis of Seinee— अर्थात् काव्य और शास्त्रके रूप परस्पर विरोधी है । किंतु सरसरी निगाहसे ज्ञानेश्वरीका अवलोकन करने पर भी उपरोक्त सिद्धांत तथ्यहीन होनेका अनुभव आएगा। ज्ञानेश्वर महाराजने जैसे ज्ञानेश्वरीमें काव्यकी अपनी कसौटी कही है— ज्ञानेश्वरीका साहित्यिक रूप :— वाचाका सौंदर्य कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व । रसिकत्वमें है पर तत्व । स्पर्श जैसे ॥ १८-३४७ ॥ उस कसौटी पर ज्ञानेश्वरी उतरी है। रोग-निवारक शक्ति औषधका महत्वपूर्ण आवश्यक गुण है । फिर वह औषध कटु भी हो तो भी उसमें कोई आपत्ति नहीं है अथवा कटुता, या तीतापन औषधीका दोष नहीं माना जा सकता। किंतु यदि कोई औषध संपूर्णरूपसे रोग-निवारक होकर भी मधुर और सुस्वादु है तो वह सबको अत्यंत प्रिय होगा । गीता तथा ज्ञानेश्वरी के विषयमै ज्ञानेश्वर, महाराज यही कहते हैं — रोगको है यदि जीतना । उसपर ओषध देना । किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ ३-१९ ॥ गीता तत्वज्ञानका ग्रंथ है। वह अध्यात्मशास्त्र है, योगशास्त्र है. वह ब्रह्मविद्या है उसमें सभी प्रकारके अध्यात्म विचार भरे हैं, वे मोह निवारक हैं अर्थात वह अन्य सभी शास्त्र तथा विद्याओंसे श्रेष्ठ प्रकारका शास्त्र या विद्या है। उपनिषद, गीता ब्रह्मसूत्र, उसके भाष्य, आदि ग्रंथोंमें इसका सांगोपांग विचार किया है किंतु साहित्य क्षेत्रमें उसका कोई स्थान नहीं है। केवल तत्व- विचारक ही इन ग्रंथोके अध्ययनमें प्रवृत्त हो सकता है। सर्वसामान्य मनुष्य इन ग्रंथोंकी ओर आकर्षित नहीं हो सकता। सामान्य वाचककी इसमें कोई रुचि नही हो सकती किंतु ज्ञानेश्वरी ग्रंथका ऐसा नहीं है। इस विषयमें १
ज्ञानेश्वर महाराज स्वयं अत्यंत आत्मविश्वासके साथ कहते हैं "इस ग्रंथमें अंतरंगके अधिकारी सब-कुछ पाएंगे ही किंतु सर्वसामान्य भी वाक्चातुर्य पाकर सुखी होंगे। वस्तुतः गीताग्रंथ शांत रस प्रधान ग्रंथ है। ज्ञानेश्वर महाराजने यह जगह जगह कहा है जैसे वे चौथे अध्यायमें कहते हैं — इसकी उत्तमता पर। आठो रस है न्योच्छावर। वह है सज्जनोंका घर। आसरेका॥ ४-२१३॥ प्रकट करेगा शांतिरस निर्मल। है वह महासागरसे भी खोल। मेरी देशभाषाका अनमोल बोल। अर्थपूर्ण॥ ४-२१४॥ ऐसेही ज्ञानेश्वर महाराजने अनेक स्थान पर कहा है। ज्ञानेश्वर महाराज अपने इस ग्रंथके विषयमें कहते हैं- यहां साहित्य तथा शांति। वैसे रेखा शब्द पद्धति। जैसे लावण्यगुण कुलवति। तथा पतिव्रता॥ ४-२१५॥ जैसे किसी स्त्रीमें पातिव्रत्य एक महान गुण होता है। वह श्रेष्ठतम महान गुण तो हैं ही, साथही साथ जो लावण्यमें सर्वांगपूर्ण हैं गुणोंकी खान भी है तथा कुलवती भी है ऐसा यह मेरा ग्रंथ है। उसमे मोह-निवार, शक्ति तो हैं हीं साथही साथ साहित्य गुण भी हैं। यहां जो शांत रस है वह साहित्यगुणके साथ हैं। वैसे काव्यशास्त्र शृंगारको रसराज कहता है। शृंगाररस तो सबकी चित्तवृत्तिको लुभाता है, उसमें गुदगुदी पैदा करके उस पर अपना प्रभाव डालनेवाला सार्वजनिक रस है किंतु ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं मैं अपनी देशभाषाके सौंदर्य को इतना ऊंचा उठाऊंगा कि जिससे वह सौंदर्य शृंगाररसको जीतकर उसके सिरपर पैर रखता हुवा आगे बढेगा और मेरी ये ओवियां देशभाषाका अलंकार बनेंगी, भूषण बनेंगी। इतनी इसमें साहित्यिक परिपूर्णता प्रकट होगी। ज्ञानेश्वर महाराज तेरहवे अध्यायमेः- केवल यह शांतिकथा। चलेगी शब्दोंका सत्पथ। पग रख शृंगार माथा। पर अविरत॥ १३-११५५॥ देशीके बोल सुंदर। समझायेंगे अलंकार। लजायेंगे जो मधुर। अमृतको यहां॥ १३-११५६॥ यह कहते हुए अपनी भाषाके कलात्मक सौंदर्यका असामान्य प्रभाव दिखाते हैं। वे ज्ञानेश्वरीके दसवे अध्यायमें कहते हैं:— यहां देशीका नागरपन। जीतेगा शांत रसको जान॥ ओवियां ये होंगी महा-भूषण। साहित्यका॥ १०-४२॥ ऐसी काव्य रचनामेंसे साहित्यिक कलासौंदर्यका अथवा साहित्यिक कला प्रकर्ष artistie perf ection निर्माण होता है। अत्यंत लावण्यपूर्ण काव्य रचना करके जिसमें केवल शांत रसकी प्रधानता है उस तत्त्वज्ञानको काव्यका रूप देकर शांतरस शृंगार-रससे केवल स्पर्धा ही नहीं कर सकता अपितु शृंगारको जीत सकता है, शृंगार पर अपना सिक्का जमा सकता है इतना सामर्थ्य मेरे शांत रसमें है ऐसी लोकविलक्षण प्रतिज्ञा ज्ञानेश्वर महाराजने की है। इस प्रकारके काव्यकी शब्दरचना कैसी होगी या होनी चाहिये इसका विवेचन करते हुए ज्ञानेश्वर महाराज कहते है:— ज्ञानेश्वरी २
वैसा सत्य और कोमल । हित मित किंतु सरल । मानो बोल होते कल्लोल । अमृतके ॥ १३-२६९ ॥ पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृतकल्लोल । वैसे कोमल तथा सरल । बोलें शब्द ॥ ८-५७ ॥ सूज्ञ पाठक-वर्गको ज्ञानेश्वरीका अध्ययन करते समय बार बार इसका अनुभव आएगा ही । ज्ञानेश्वरीके पंद्रहवे अध्यायके प्रारंभमें ज्ञानेश्वर महाराज कहते है :- असंख्य पूर्ण सुधाकर । करें जिसपे निछावर । होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ १५-११ ॥ सूर्य उदित पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश । करती दीवाली ज्ञानदशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १५-१२ ॥ जैसे ज्ञानेश्वर महाराजने अपने बारहवे अध्यायके प्रारंभमें कहा है। इस ग्रंथमें नवरसके सागर भरे हैं, भावार्थके बडे बडे गिरिवर खडे हुए हैं, साहित्यकी सुवर्ण खाने खुली हैं, विवेक वल्लीके उद्यान लगे मिलेंगे, संवादफलोंसे भरे प्रमेयोंके उपवन मिलेंगे किंतु यहां पाखंडकी खाइयां नहीं होंगी, वाग्वादके टेडे मेडे कांटेले रास्ते नहीं होंगे, कुतर्कके दुष्ट श्वान भी नहीं मिलेंगे । ऐसा यह सुरतरुओंका उपवन है । अपनी शब्द शक्तिके विषयमें ज्ञानेश्वर महाराज छठे अध्यायके प्रारंभमें कहते है कि इन शब्दोंकी व्याप्ति असाधारण है । भावज्ञ पुरुषोंको इसमें चिंतामणिके गुण मिलेंगे, मैने शब्द पक्वान्नकी जो ये थाली परोस रखी है इसके शब्द कैवल्यरससे सने है । यह शब्द भोजन निष्काम साधक बंधुओंके लिये मैंने परोस रखा है । यह ज्ञानेश्वरी ग्रंथ इस प्रकार सर्वांगपूर्ण बना है। इसमें तत्वज्ञानकेसाथ ही साथ रस, रूपक, उपमादि अलंकार, आदिसे शब्दोंके पूर्णभाव प्रकट हुए हैं और यह वेदांत-ग्रंथ उत्कृष्ट, सर्वांगपूर्ण साहित्य-ग्रंथ बना हुवा है। यह महान ग्रंथ मानो सरस्वतीका-सारस्वतका-लावण्य रत्न भांडार ही बन पडा है । ज्ञानेश्वरीका स्थायी भाव :- इस ग्रंथमें साहित्यके सभी गुण उत्कटतासे प्रकट हुए हैं किंतु यही इस ग्रंथका स्थायीभाव नहीं है। एक सर्वोत्कृष्ट साहित्य ग्रंथ लिखना ज्ञानेश्वर महाराजका जीवन-उद्देश्य नहीं है। ज्ञानेश्वर महाराजका अवतार-कार्य उत्कृष्ट साहित्य निर्माण नहीं जगदुद्धार है। जब ज्ञानेश्वर महाराजका जन्म हुवा उस समय भारतके उत्तरमें मुसलमानी सत्ता स्थिर हो गयी थी और दक्षिण पर उसके आक्रमण भी होने लगे थे । उस समय महाराष्ट्रमें यद्यपि स्वराज्य था उसपर परचक्रके बादल मंडारा रहे थे। राज्योंमें परस्पर द्वेष और संघर्ष चल रहे थे । समाज भोग-वादी बना था । इसका वर्णन भी ज्ञानेश्वरीमें देखनेको मिलता है। इसका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं :- जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर । जिससे विस्मृति अपार । आत्मबोधकी ॥ ४-२० ॥ देहको ही सर्वस्व माननेवाला, "जीवन भोगके लिये है" ऐसा समझनेवाला भोगप्रधान समाज, समाजके सभी क्षेत्रोंमें मतमतांतरोंका गलबला, एकका संबंध दुसरेको नहीं, परस्पर सहयोगका नाम नहीं, पंडित, शास्त्री, सब विद्वत्ताके अपने अभिमानमें चूर, समाजमें परंपरा- गत ज्ञानका प्रसार करना, समाजको विचार प्रणव बनाना, समाज-शक्तिका संघटन करना, ३ —प्रस्तावना
इसका भान किसीको नहीं; धर्म, तत्त्वज्ञान आदि सब विद्वन्मान्य संस्कृत भाषाके पिटारेमें बंद, सब कुछ गुह्य, गुप्त, बहुजन समाजको उसकी हवा भी नहीं लगती, वह सब समाज- विमुख, अपने अभिमानमें चूर, मुट्ठी भर लोगोंके हाथमें, ! धर्म, अध्यात्म, तत्त्वज्ञान आदिके नामसे कोईकुछ भी कहे, कुछ भी करें, और जन-सामान्यके अज्ञानका लाभ लेकर अपना पेट भरलें, ऐसी अराजकताके समय ज्ञानेश्वर महाराजका अवतार हुवा था; वैसे ही जिनपर समाजको धार्मिक तथा आध्यात्मिक संस्कारोंसे संपन्न करनेका दायित्व था वे धर्मपीठ अपना आसन और पीठ संभाल लेनेमें ही दत्त-चित्त रहते थे। ज्ञानेश्वरके जन्मके समय महाराष्ट्रकी परिस्थिति ऐसी थी। सारे भारतवर्षकी परिस्थिति इससे कुछ भिन्न नहीं थी। इस परिस्थितिका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं— मोहके बहुत बढनेसे। काल बहुत बीत जानेसे । लोप हुवा है योग इससे। इस लोकमें ॥ ४-२६ ॥ ज्ञानेश्वर समकालीन संत श्रीनामदेव कहते हैं- भ्रष्ट हुए जन राजा यवन । दोष बढे थे सर्वत्र महान । तब अवतार हुए महान । करने कलि दोष निवारण ॥ ज्ञानेश्वर महाराजने तब समाजका सूक्ष्म अवलोकन किया तथा अनुभव किया कि समाज सत्यज्ञानसे विमुख हुवा है। सबसे प्रथम समाजको ज्ञानाभिमुख करना चाहिये, उसके लिये जनसामान्यकी भाषाका ही स्वीकार करना होगा। समाजकी भाषामें, समाज उसको समझ सके, उसको सहज पचा सके, इस ढंगसे समाजको ज्ञानसंपन्न, संस्कारसंपन्न करना होगा; तब किंकर्तव्यमूढ समाज सत्यज्ञानका लाभ लेकर अपने जीवन का उत्कर्ष कर सकेगा ! इसके लिये ज्ञानेश्वर महाराजने भारतमें प्राचीन कालमें ऐसीही परिस्थितिमें कही गयी गीतको चुना। द्वापर- युगके अंतमें, अर्थात आजसे करीब साडेतीन हजार वर्ष पहले, युद्ध भूमिपर, कर्तव्याकर्तव्यके मोहमें डूबकर, किंकर्तव्यमूढ अर्जुनको, भगवान श्रीकृष्णने गीतोपदेश दिया था और अर्जुनका मोह निवारण हुवा था; इसी गीतासे समाजका मोहनिवारण होगा यह मानकर ज्ञानेश्वर महाराजने सर्वकालोपयुक्त गीताके ज्ञानखड्गको देश भाषाकी सान पर चढाकर समाजके हातमें दिया, इसी बातको ज्ञानेश्वर महाराजने जरा दूसरे ढंगसे ग्यारहवे अध्यायमें कहा है। संस्कृ- तका प्रवाह अत्यंत गहरा है। उसमें निर्मल नीर बहता है। लोक उस पानी तक नहीं जा सकते। इसलिये मैंने निवृत्तिनाथकी आज्ञासे देशी भाषाका घाट बांधा है। इसमें जो चाहे वह स्नान करें, यहां प्रयाग माधवका विश्वरूप देखें, तथा संसारको तिलोदक दें ! ज्ञानेश्वर महाराज अठारहवे अध्यायके अंतमें गीताको मैने मराठी भाषा अर्थात देशभाषाका विषय क्यों बनाया इसका समर्थन करते हुए ज्ञानेश्वरीके अंतमें कहते हैं- लाया मैं इसी कारण। गीतार्थ देशीमें जान । किया है इसको जन। दृष्टिका विषय ॥ १८-१७३५ ॥ किंतु देशी बोलमें रंगकर । जान लेंगे गीतापद् मधुर । न होगा मूल न जानकर । एक पक्षीय ॥ १८-१७३६ ॥ और कहें यदि मूल गाकर । बनेगा वह मूलका अलंकार । वैसे आएगा देशीमें भी सुंदर । गीतार्थ पूर्ण ॥ १८-१७३७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४
चार्वांगी पर न चढे भूषण । फिर भी वह शोभती जान । सुंदर तनुका बना भूषण । वह अतियोग्य ॥ १८-१७३८ ॥ या मोतियोंकी ऐसी जाति । सुवर्णमें भी लाती कांति । या अपने रूपमें अति । सजते आप ॥ १८-१७३९ ॥ या मोतिया वसंतागमनका । खुला हो या गूंथा हो उसका । एकसा परिमल होता जिसका । उसी प्रकार ॥ १८-१७४० ॥ मूल सहित जो है सजता । उसके विना भी जो है शोभा लाता । रचा मैने ऐसा लाभद गाथा । ओवी छंदमें ॥ १८-१७४१ ॥ इसमें अबाल सुबोध । ओवीके छंदमें प्रबंध । ब्रह्म-रसमें है सुस्वाद । गूंथे हैं अक्षर ॥ १८-१७४२ ॥
इसमें संदेह नहीं कि महाराष्ट्रमें भी आज ज्ञानेश्वरीकी मराठी भाषा सुबोध नहीं है । किंतु जैसे इसी देश भाषामें लिखे गये अपने इस ग्रंथके परिणामके विषयमें वे तेरहवे अध्यायके अंतमे कहते है.
इससे पिशाचका भी मन । बनेगा सात्विकताकी खान । श्रवणमात्रसे है सुमन । पायेगा समाधि ॥ १३-११५८ ॥ वाग्विलास विस्तार कर । गीतार्थसे विश्वको भर । बांधेंगे विशाल मंदिर । इस जगतका ॥ १३-११५९ ॥ मिटेगी न्यूनता विवेककी । सार्थकता हो कान मनकी । खुलेगी खान ब्रह्म-विद्याकी । चाहे जिसको ॥ १३-११६० ॥ परतत्व देखें नयन । पाये सुख वसंत्तोद्यान । आकंठ ब्रह्मरसपान । करे विश्व ॥ १३-११६१ ॥
यह अबाल सुबोध प्रबंध है । अर्थात ज्ञानेश्वर महाराजके कालमें वह भाषा अबाल सुबोध थी ।
श्रीमद्भगवद्गीतापर ज्ञानेश्वर महाराजको अत्यंत श्रद्धा है । वे भगवद्गीताको " भारतकमल पराग " मानते हैं । गीता व्यासबुद्धीद्वारा शब्द ब्रह्माब्धिका मंथन करके निकाला हुवा नवनीत है । वह भी ज्ञानाग्निसे तपा कर विवेक परिपक्व सुगंधित घी बना है । इससे विरक्त उसकी अपेक्षा करते हैं, संत उसका अनुभव करते हैं, विद्वान उसमें रमते हैं; तथा उसके सोऽहंभावमें सभी लीन होते हैं । ऐसी इस गीताको श्रीकृष्णने स्वयं कहा है । यह कोई शब्दशास्त्र नहीं है किंतु संसारपर विजय पानेके लिये मानव मात्रको मिला हुवा एक महान शस्त्र है ! इसमें विश्वको स्वानंद भोग प्राप्त कर देनेकी शक्ति है । गीता द्वापरके अंतमें युद्ध भूमि पर श्रीकृष्णने मोहग्रस्त अर्जुनको कही थी; उससे भला सबको क्या लाभ ? तथा राजनै- तिक दृष्टिसे अर्जुन एक महान व्यक्ति था। उसके सामने जो समस्या थी, वह सबके सामने कहां है ? ऐसा एक प्रश्न उपस्थित हो सकता है । किंतु यहां पर अर्जुन मोहग्रस्त हुवा था । मोहका अर्थ अविवेक । अविवेक मानवकी एक भूमिका है। यहां छोटे बडेका सवाल नहीं है । गीता अविवेक ग्रस्त मनुष्यके लिये उपदेश है । अर्जुन ऐसे अविवेक ग्रस्त समाज पुरुषका
५ —प्रस्तावना
प्रतीक था। श्रीकृष्णने अर्जुनको समाज पुरुषका प्रतीक मानकर ही यह उपदेश दिया है इसी भावको ध्यानमें लेकर श्रीमदाद्यशंकराचार्यने अपने भाष्यमें कहा है- इत्यतः संसार- बीजभूतौ शोकमोहौ। तयोः च सर्वकर्मसंन्यास पूर्ववत् आत्मज्ञाननिष्ठा मात्रात् न अन्यतो निवृत्तिः इति, तदुपदिदिक्षुः सर्वलोकानुग्रहार्थं अर्जुनं निमित्तीकृत्य आह भगवान् वासुदेवः ॥ गीताभाष्य २-११ ॥ ज्ञानेश्वर महाराजने भी अठारहवे अध्यायके अंतमे गाय बछडेको निमित्त बनाकर जैसे घरभरको दूध देती है; मेघ चातकको निमित्त बनाकर स्वयं बरसकर जैसे सारे संसारको शांति देते हैं, अपने अनन्य कमलको निमित्त बनाकर सूर्य जैसे संसारको प्रकाश देता है, वैसे श्रीकृष्णने अर्जुनको निमित्त बनाकर मोहग्रस्त विश्वको गीतो- पदेश दिया है ऐसा कहा है। उसी प्रकार ज्ञानेश्वरमहाराजने भी विश्वकल्याणके हेतुसे अपने ग्रंथकी रचना की है। उनका जन्मक्षेत्र महाराष्ट्र होनेसे स्वाभाविक ही कार्यक्षेत्र भी महाराष्ट्र बना। वैसे ही उनके सामने बैठनेवाले लोग मराठी भाषिक थे इसलिये उनको मराठी भाषाको माध्यम बनाना पडा; किंतु उनकी दृष्टि “गीतार्थसे विश्वको भरना” थी। जैसे ऊपर कहा है कि श्रीकृष्णने जैसे मोहग्रस्त अर्जुनको निमित्त बनाकर संसारको गीताका उपदेश दिया वैसे ज्ञानेश्वर महाराजने महाराष्ट्रको निमित्त बनाकर मानवमात्रके लिये यह वाग्विस्तार किया है इसमें संदेह नहीं। यह बात उन्होंने कई जगह कही है जैसे वे तेरहवे अध्यायके अंतमें कहते हैं। वाग्विलास विस्तार कर। गीतार्थसे विश्वको भर। बांधेंगे विशाल मंदिर। इस जगतका॥ १३-११५९ ॥ श्रीमद्भगवद्गीता और ज्ञानेश्वरीके विषयमें इतना लिखनेके बाद जरा हम देखे कि अन्य भाष्योंसे इसका क्या विशेष है। गीता ग्रंथ पर संस्कृतमें अनेक आचार्योने भाष्य रचा है। उस पर अनेक टीका प्रतीटीकाके आलोचनात्मक प्रबंध लिखे गये हैं; किंतु इन सबमें गीताके किसी एक विशिष्ट सिद्धांतके प्रतिपादनके लिये स्वपक्ष मंडन और प्रतिपक्ष खंडन पर ही सारी शक्ति लगाई है। कुछ भाष्योंको पढते समय तो ऐसे लगता हे कि केवल यह टीकाकारके पांडित्य प्रदर्शनका प्रयास हो रहा है! इस प्रकारके भाष्योंमें जन-सामान्यको वह तत्वज्ञान आत्मसात करना है यह बात अक्षरशः भुलाई गयी है। वैसे ही यह सब विद्वन्मान्य संस्कृत भाषामें होनेसे जनसामान्य इससे वंचित रहे। बहुजन समाजको इससे कुछ भी नहीं मिला। ज्ञानेश्वरीमें यह दृष्टि नहीं है। ज्ञानेश्वर महाराजने न संस्कृत भाषाको चुना न वे शास्त्रीय पद्धतिसे स्वमत मंडन तथा परमत खंडनके पचडेमें पडे। उन्होंने जन-सामान्यकी भाषाका स्वीकार किया तथा विषय प्रतिपादनमें उपमा दृष्टांत आदिसे बहुजन समाजके लिये आकर्षण निर्माण किया। शास्त्र कथनमें काव्य-पद्धतिको अपनाया। उसमें माधुर्य, ओज, प्रसाद, अर्थव्याप्ति, औदार्य, कांति, आदि सभी काव्यगुणोंका आविष्कार करके अत्यंत उत्कटताके साथ इन गुणोंका उत्कर्ष करके एक महान वेदांत काव्यकी निर्मिती की। परिणामस्वरूप बहुजनसमाज इस ओर आकर्षित हुआ। ज्ञानेश्वरीके कुछ अध्यायोंके मंगलाचरणके गुरुवंदनमें कुछ संस्कृतमय ‘मराठी’ ओवियां आई हैं। उदारणके लिये दसवे अध्याय, चौदहवे अध्याय, अठरहवे अध्यायके मंगलाचरणको देख सकते हैं। यहां जो शब्दालंकार सौंदर्य है तथा शब्दमाधुर्य है, इससे ज्ञानेश्वर महाराजके संस्कृतभाषापांडित्यका परिचय मिलता है। ज्ञानेश्वरीके सोलहवे अध्यायके मंगलाचरणमें ज्ञानेश्वरमहाराजने अपने श्रीगुरुपर किया हुवा चित्सूर्यका रुपक, ज्ञानेश्वरी ६
किसी भी काव्यमें अलंकारका एक अद्वितीय प्रकार है। अक्षरशः यह अभूतपूर्व है, अलौकिक है । किसी भी संस्कृत महाकाव्यके शिरोभागमें शोभास्पद है। यह देखकर बडे बडे विद्वान साहित्यिक काव्यानंदनमें डूब जाते हैं। इससे ग्रंथका सौंदर्य और वैभव बढा है । द्विगुणित हुआ है। अपने लाडले नन्हे बालकको अनेक चिडियोंके किस्से या बोलियां सुनाकर दूध-भात खिलानेवाली मांकी भांती ज्ञानेश्वर महाराज ज्ञानेश्वरीमें अपने श्रोताओंको अनेक काव्य गुणोंसे सानकर तत्वज्ञानका अमृतान खिलाते हैं। ज्ञानेश्वरीमें दो हजारसे अधिक रूपक या दृष्टांत हैं, इन सबका उद्देश तत्वज्ञानको सर्व-सुलभ बनाना है ! जनमनरंजन नहीं किंतु जनमन संस्कार संपन्न बनाना इस काव्य लेखनका उद्देश्य है। इसीलिये सारा महाराष्ट्र प्रेम और कृतज्ञतासे ज्ञानेश्वरको-और ज्ञानेश्वरीको भी-माउली कहता है। ज्ञानेश्वरकालीन एक महान संत श्रीनामदेव कहते हैं- ज्ञानेश्वर मेरी योगियोंकी माउली । “ ज्ञानेश्वरमाऊली ” यह महाराष्ट्रके भागवतानुगमका महामंत्र है । इतनाही नहीं समग्र महाराष्ट्रका महामंत्र है। बिना इस महामंत्रके महाराष्ट्रके सबसे बडे भागवत समुदायका- जिसको वारकरी संप्रदाय कहते हैं- भजन पूर्ण नहीं होता । भजनके अंतमें "ज्ञानेश्वर माउली ज्ञानराज माउली ” यह घोष होता है । ज्ञानेश्वरीका महत्व :- गीताके विषयमें लिखते समय ज्ञानेश्वर महाराजने लिखा है कि गीता कांडत्रय रूपिणी श्रुतीही है । तथा यह सर्वमान्य भी है। अन्य भाष्यकारोंने भी यह कहा है, किंतु इसका रूप व स्थान स्पष्ट करते समय अन्य सभी भाष्यकारोंने बडी खींचतानी की है। किंतु अध्येता ज्ञानेश्वरी ग्रंथमें यह नहीं देखेंगे। ज्ञानेश्वरी ग्रंथमें इन तीनोंका उत्कृष्ट समन्वय देखनेको मिलेगा। इसके उदाहरण रूप हम निम्न ओवी देते हैं। अथवा कर्मयोग ओघ । मिलके भक्त-चित्त गंगौघ । पाया स्वानंदोदधि सवेग । मद्रूपका ॥ १८-१२२२ ॥ कर्मयोगका प्रवाह भक्तिकी गंगासे मिला और वह गंगा मद्रूपके स्वानंदसागरमें मिली । ज्ञानेश्वरीमें कर्म है किंतु कर्मका त्रास नहीं, भक्ति है किंतु वह बावलेपनके अज्ञानकी नहीं, उन्होंने तत्वज्ञान के साथ प्रेमका माधुर्य जोड दिया है तो भक्तिको ज्ञानकी दृष्टि दी है; उनके दृष्टांतोंमे कौटुंबिक वात्सल्य है, पशु पक्षी तथा चराचर विश्वके विषयमें अलौकिक आत्मी- यता है। इसी आत्मीयतामेंसे ज्ञानेश्वर माउलीका घोष फूट पडा है। इसमेंसे ज्ञानेश्वरका विश्वप्रेम प्रकट हुवा है। इसी विश्व-प्रेमके कारण उनके काव्यमें असीम माधुर्य आया है। भावोंमें कोमलता, कल्पनाओंमें उदारता, अर्थमें गंभीरता, शब्दोंकी मधुरता इत्यादि काव्यकी उत्कटताकी आधारशिला ज्ञानेश्वरका यही विश्वप्रेम है । ज्ञानेश्वर महाराजने गीताके शब्दोंसे भी गीतामेंसे श्रीकृष्णका मनोगत जाननेका प्रयास किया है। यह वे कहते भी हैं — परमात्माका मनोरथ । हमें दिखाता है तू मूर्त । यह कहने पर चित्त । उमड आयेगा ॥ १३-५६० ॥ इस विषयमें निवृत्तिनाथादि श्रोताओने ज्ञानेश्वर महाराजको प्रशस्ति पत्र दिया है । महाराष्ट्रके आधुनिक संत, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिके विद्वान, अलाहाबाद विश्वविद्यालयके भूतपूर्व-कुलपति श्री रा. द. रानडे इस विषयमें कहते हैं “उपमा, भाषासौंदर्य तत्वज्ञान ७ -प्रस्तावना
साक्षात्कार, भक्ति, अद्वैत दर्शन, इसका संबंध जोडकर, अलौकिक निरीक्षण शक्ति, अप्रतिहत कवित्वशैली, अमापवाङ्माधुर्य, इन सर्वगुण संपन्नतासे "ज्ञानेश्वरी" यह ग्रंथ 'न भूतो न भविष्यति हुवा है' ऐसे कहनेमें कोई आपत्ति नहीं हैं।" यद्यपि साहित्यिक दृष्टिसे ज्ञानेश्वरी एक समृद्ध ग्रंथ है फिर भी यही उस ग्रंथका वास्तविक महत्त्व नहीं है। ज्ञानेश्वरीकी वास्तविक भूमिका तत्वज्ञानकी है। ज्ञानेश्वर महाराज अत्यंत श्रेष्ठतमसंतपुरुष थे। उनके समकालीन तथा उनके बादवाले सभी संतोंने इसको एक मतसे स्वीकार किया है। संतोका श्रेष्ठत्व उनके तत्त्वज्ञानमूलक स्वयंपूर्ण अनुभूति पर निर्भर होता हैं। ज्ञानेश्वरीमें संतोके रूपका विवेचन करते समय आत्मज्ञानमें शुद्ध सिद्ध। रहते संत जन प्रसिद्ध। ऐसा किया है। इस अनुभूतिका अर्थ परतत्व स्पर्श है! गीता यह अध्यात्मशास्त्र हैं। श्रीमत्शंकराचार्य भी यह स्वीकार करते हैं। इसके विषयमें ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं। मोक्षदानमे जो स्वतंत्र। ज्ञानप्रधान यह शास्त्र। इसीसे हैं यह सुसूत्र। लिया हाथमे ॥ १८-१३४६ ॥ भारतीय तत्त्वज्ञानमें, उपनिषदोंमें, मोक्षको सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ माना है। ज्ञानेश्वरीमें भी चौदहवे अध्यायकी चारसौ एक ओवीमें "इस ब्रह्मपदको सायुज्य" कहते हैं ऐसा कहा गया है। गीता ही एकमात्र मोह निवारक तत्वज्ञान है। यही आत्मज्ञान है। गीता यह तत्वज्ञान पर ग्रंथ है इसीलिये उसको प्रस्थानत्रयीमें स्थान दिया गया है। काल प्रवाहमें इस तत्त्वज्ञानका लोप हो रहा था। अनेक अवैदिक मतमतांतर निर्माण होकर अपना प्रचार कार्य कर रहे थे। समाज सारासार विचार करके सत्य ग्रहणमें असमर्थ था। ऐसे समय जब सत्यज्ञान तथा भक्तिका लोप हो रहा था यह देखकर ज्ञानेश्वर महाराज व्यथित हुए। ज्ञानेश्वर महाराजकी आरतीमें श्रीरामानजार्दन गाते है — जगतमें ज्ञान हुवा लोप। हित न जाने अपना आप। अवतरित हैं पांडुरंग। कहाता है वह ज्ञानदेव। प्रकट गुह्य वह बोलता। विश्वको ब्रह्ममय करता। ज्ञानेश्वरमहाराजके रूपमें कारुण्य मूर्त हो आया था। तत्त्वज्ञानशून्य समाज अधिकाधिक बहिर्मुख होकर अनीति बढती है। यह देखकर ज्ञानेश्वर महाराज तडपते थे। उनकी यह अकुलाहट उन्हीके शब्दोंमें कहना हो तो या कीचमें फंसी गाय देखकर। नहीं देखा जाता सूखी या दुधार। उसकी जीवन व्यथा देखकर। चित्त होता व्याकुल ॥ १६-१४२ ॥ डूबतेको देखकर सकरुण। न पूछता तू अंत्यज या ब्राह्मण। जानता उसके बचाने हैं प्राण। इतना मात्र ॥ १६-१४३ ॥ वैसे अज्ञान प्रमादमें। अथवा दुर्दैव या दोषमें। सभी प्रकारके निंद्यत्वमें। जकडे गये जो ॥ १६-४४५ ॥ उन्हे अपने अंगके। भले गुण देकरके। भुलाते हैं चुभनेके। सभी शल्य ॥ १६-१४६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८
ये ओवियां पर्याप्त हैं। इन ओवियोंको देखनेसे ज्ञानेश्वर महाराजके कार्यके प्रेरणास्रोत दर्शन भलीभांति हो सकता है। इसी व्याकुलताके कारण ज्ञानेश्वर महाराजने महाराष्ट्रके समाजको जागृत करके उसके हाथमें नये तत्वज्ञानकी मशाल दी। अथवा ज्ञानखड्ग हाथमें दिया। महाराष्ट्रके बहुजन समाजपर उसका अच्छा परिणाम हुवा। इस महाराष्ट्रमें ब्रह्म विद्याका सुकाल बना। क्यों कि कठिनसे कठिन समस्याएं सरल बनी थीं। गीता सुसेव्य बनी थी। अबाल सुबोध बनी थी। ज्ञानेश्वरीके तत्व-ज्ञानके कारण जीव, जगत, तथा पर- ब्रह्मका सर्वंकश विचार हुवा था। उसमेंसे सबकी अभेद-सिद्धिका दर्शन हुवा था। ज्ञानेश्वर महाराजने ज्ञानेश्वरीके तेरहवे अध्यायमें "उस ज्ञानका प्रवेश होते ही वह अविद्याका नाश करके जीव आत्माका ऐक्य करता है। इंद्रियोंके द्वारको रोकते हुए, प्रवृत्तिके पैर तोडकर मन और बुद्धिका दारिद्य रोकता है। द्वैतका अकाल दूर करता है, सर्वत्र साम्यानुभवका सुकाल होता है। मदको मारकर सभी प्रकारके अविवेक को दूर करता हुवा आप पर भेदको नष्ट करता है। यह संसारका उन्मूलन करके संकल्प-महामलको धोता हुवा अनावर ज्ञेयका दर्शन कराता है। इससे जीवकी आंखे खुलती हैं तथा जीव आनंदधाममें खेलने लगता है।" ऐसा यह ज्ञान पवित्र-संपत्ति है। इससे सदा सर्वत्र निर्मल होता है। ऐसी उज्ज्वल स्थितिको ज्ञानावस्था कहते हैं। ज्ञानेश्वर महाराजने कई जगह इस ज्ञानका सर्वांगपूर्ण विवेचन किया है। इस विवेचनको देखनेसे ज्ञानेश्वर महाराजकी वास्त- विक भूमिकाका सर्वांगपूर्ण दर्शन होता है। उन्होने कभी "दुःखं दुःखं क्षणिकं क्षणिकं" की घोषणा नहीं की। किंतु परमात्माने यह विश्व आनंदमय किया है। हम इसको आनंदमंदिर बनारखे ऐसा आवाहन किया। जीवको आनंद साम्राज्यके सिंहासन पर बिठानेकी बात कही। "विश्व है सर्वत्र सच्चिदानंद" कहा। उन्होने सारा विश्व मेरे सर्वात्मक-देवका विस्तार है। कहते हुए अपने तत्वज्ञान की नींव डाली है। उस ब्रह्मको मेरा विश्वात्मक देव कहा। इस भांति उन्होंने विश्व- और विश्वात्मककी समरसता दिखाई है। इसको उन्होने अनेक रूपकोंसे जनमानस पर बिंबित किया जैसे ज्ञानेश्वरीके चौदहवे अध्यायमें— तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति। अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति ॥ होना उसकी पूर्ण निश्चिति। अत्यावश्यक ॥ १४-३७२ ॥ अब सुन तू अर्जुन। यहां है मेरा क्या स्थान। रत्नमें तेज जो रत्न। वैसा हूँ मैं ॥ १४-३७३ ॥ या द्रवणवत है नीर। अवकाश है अंबर। या मिठास ही है शकर। नहीं भिन्न ॥ १४-३७४ ॥ या अग्निही है ज्वाल। दल ही है कमल। वृक्ष जो वही डाल। फलादिक ॥ १४-३७५ ॥ हिम होता जो संघटित। कहलाता वह हिमवंत। या जामन लगा दूध पार्थ। कहलाता दही ॥ १४-३७६ यहां विश्व है जो अर्जुन। स्वयं है हूं वह संपूर्ण। चंद्र बिंबका तरासना। नहीं होता जैसे ॥ १४-३७७ ॥ ९ —प्रस्तावना
An exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:
अजी ! जमा हुआ घृत । जमकर भी रहता घृत । या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ १४-३७८ इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण । ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व ही मैं हूं ॥ १४-३९० ॥ इस तादात्म्यके साथ परमात्मासे समरस होना ही भक्ति है ऐसे उन्होंने भक्तिका सार- सर्वस्व कह दिया । परमात्माको संपूर्ण रूपसे विश्वके साथ जानना ही अव्यभिचारी भक्ति है । इसमें भेद करना व्यभिचार ऐसे अव्यभिचारी भक्तिका अर्थ करते समय ज्ञानेश्वर महाराजने स्पष्ट रूपसे कहा है । अर्थात् संपूर्ण तादात्म्यके साथ विश्व-सह विश्वात्मामें लीन होना ही अव्यभिचारी भक्ति है । यदि यहां विश्व तथा विश्वात्मामें भेदका दर्शन होता है तो उसको व्यभिचार समझना ! इसके लिये अभेद चित्त होकर अपने साथ आत्माको जानना चाहिये । सोनेसे सोना जडा जानेकी भांति, तेजसे तेज-किरण प्रस्फुटित होने की भांति, भूतलसे परमाणु और हिमाचलसे हिमकण प्रस्फुटित होनेकी भांति, यह विश्व और विश्वात्मा अभिन्न है। सागर और उसकी लहरकी भांति विश्व और विश्वात्मा अभिन्न है । ऐसी एकात्मकता सर्वत्र और सतत अनुभव करना अनन्य भक्ति है। इसी बातको और अधिक स्पष्ट करते समय ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं- ज्ञानी इसको स्व संवित्ति । शैव कहते हैं इसे शक्ति । तथा हम परम भक्ति । कहते अपनी ॥ १८-११३३ ॥ वैसे ही और एक स्थान पर कहते हैं मेरे सहज प्रकाशको भक्ति कहते हैं यह अनन्य भक्ति कैसे अद्वैत भक्ति बनती है यह अनेक दृष्टांत देकर ज्ञानेश्वर महाराजने समझाया है । एक स्थान पर वे कहते हैं जैसे तरुणी अपने तारुण्यका भोग करती है वैसे भक्त परमात्माका भोग करता है । पानी जैसे अपने सर्वांगसे बिंबका चुंबन करके प्रतिबिंंबका अपनेमें भोग करता है जैसे अलंकार स्वर्णका भोग करते है जैसे चंदन सुगंधका भोग करता है जैसे चंद्र चांदनीका भोग करता है, वैसे भक्त स्वयं परमात्मा बनकर अपनेमें अपने परमात्माका भोग करता है। यह भक्ति कोई क्रिया नहीं है किंतु एक अनुभव है । ज्ञानेश्वर महाराजने इस अनुभवका वर्णन करते हुए दस प्रकरणोंका अनुभवामृत नामका स्वतंत्र ग्रंथ ही लिखा है । इस ग्रंथमें इस अनन्य भक्तिका विस्तारके साथ विवेचन किया है जो कोई ज्ञानेश्वर महाराजके ग्रंथोंका अध्ययन करेगा उसको जीवन विश्व तथा विश्वात्माकी ओर देखनेकी एक विशिष्ट दृष्टि मिलती है । क्यों कि ज्ञानेश्वर महाराज स्वतः एक श्रेष्ठ अनुभवी संत थे । उनकी भेददृष्टि मिट गयी थी । वे सर्वत्र अभेदका अद्वयानुभव करते थे । सर्वत्र विश्वात्मक देवका दर्शन करते थे, उनको सत चित् आनंद अथवा सत्यं शिवं सुंदरम् इन भिन्न भिन्न शब्दोंसे संबोधन की जानेवाली शक्ति केवल आनंदमय बन गयी थी । इस आनंदमें सबको सम्मिलित करना यह आनंद सबको वितरण करना या यह आनंद सबको मिले ऐसा करना उनका जीवन-कार्यसा बन गया था । इसीलिये उनके साहित्यमें तर्क, कल्पना, भावना, आदिके भिन्न भिन्न सभी कार्य सर्वत्र केवल सौंदर्य निर्मितीका कारण बने हैं । शास्त्र और काव्यकी सीमारेखा पोंछ गयी है मणशक्ति चिंतनशक्ति, बुद्धि शक्ति आदि सभी शक्ति एक जीव एक रूप बनकर शुद्ध वस्तुरूपके साक्षात्कार करनेके लिये संवेदन रूप बनकर वही संवेदन जीवनमें ओतप्रोत बन गया था । यही संवेदनशील हृदय शब्दका आकार बनकर प्रकट होता जाता था । तथा ज्ञानेश्वरी २०
समय समय पर उनके मुखसे "साराही संसार सुखका करूंगा मोदसे भरूँगा तीनों लोक ॥" ऐसे प्रतिज्ञा वचन उमड पडते थे । उनके हृदयकी मृदु मधुरता इतनी व्यापक थी कि इतने बडे ग्रंथमें कहीं भी दुरुक्ति नहीं, कहीं भी किसी भी सांप्रदायिक बातका आग्रह नहीं, किसी भी मतका खंडन नहीं; शुष्क विद्वत्ताका अभिनिवेश अथवा प्रदर्शन नहीं । ज्ञानेश्वरीकी प्रसाददानकी ओवियोंमें उनकी सद्भावनाकी व्यापकताका मंगलमय दर्शन होता है। वे अपने विश्वात्मकगुरुदेवसे प्रसाददान मांगते हुए कहते है " हे मेरे विश्वात्मक देव ! इस वाग्यज्ञसे संतुष्ट होकर आप मुझे यह प्रसाददान दें कि जिससे खलोंकी कुटिलताका अंत हो, उनमें सत्कर्म रतिकी आस्था हो, दुरितका अंधःकार मिटकर सर्वत्र स्वधर्म-सूर्यका उदय हो, सभी प्राणियोंको इच्छित-वर मिले; ईश्वर-निष्ठोंके समुदाय मंगलकी वर्षा करते हुए सर्वत्र संचार करें, सर्वत्र सभी सज्जनही हों! वे सब चलते कल्पतरु, बोलते अमृत निर्झर तथा चेतन चिंतामणिकी खानसे बने ! ये सज्जन अलांछित चंद्रमासे, ताप रहित सूर्यसे, सबके आप्त बने और सब आदिपुरुषमें अखंडरूपसे दत्त चित्त होकर शाश्वत सुख अनुभव करें!" इन्ही शब्दोंमें ज्ञानेश्वरी ग्रंथ समाप्त होता है। अर्थात ज्ञानेश्वरीका उगम इन्ही भावनाओंसे हुवा है। इन्ही भावना ओंके तानेबानेसे वह बुना गया है, और अंतमें इन्ही भावनाओंमें डूब गया है। इन भावनाओंके स्पर्शके बिना इस ग्रंथका मूल्यांकन करना असंभवसा है। अनुवाद और अनुवादक — तत्वज्ञानी संत और उनके तत्वज्ञानको देश-काल तथा भाषाकी मर्यादायें कभी नहीं होती यद्यपि कुछ नैसर्गिक कारणोंसे कुछ समय यह प्रवाह अवरुद्ध सा रहता है। कोई भी तत्वज्ञान हो वह आखिर किसी न किसी भाषामें कहना या लिखना पडता है। कालभेद, स्थलभेद, तथा भाषाभेदके कारण वह भाषा सबको अवगत होना शक्य नहीं होता । परिणामस्वरूप सामान्य जनता उस ज्ञानसे वंचित रहती है। इसीलिये एक भाषामें कहे गये ऐसे अनुभवी तत्वज्ञानका दूसरी भाषामें अनुवाद करना आवश्यक होता है। उपनिषद गीता आदि ग्रंथोंका ऐसे अनुवाद सभी भाषाओंमें हुए है। वैसेही ज्ञानेश्वरी एक अवतारी पुरुषद्वारा भगवतगीता पर लिखागया एक भाष्य है जिससे वह ज्ञान सबको उपल- ब्ध हो, सबको प्रिय हो, सब उसको सहज पचा सके और सारा विश्व उससे कृतकृत्य हो । यद्यपि यह सब मराठी भाषामें कहा गया है फिर भी उसका तत्वज्ञान कभी किसी भाषाके आवरणमें बँध नहीं जाता। वह सूर्यसा सर्वकष होता है। किंतु उसका सही अनुवाद होना अत्यंत आवश्यक होता है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। श्रीज्ञानेश्वरीका राष्ट्रभाषामें अनुवाद करनेका अत्यंत उपयुक्त, आवश्यक, तथा अत्यंत कठिन काम, हमारे मित्र, दे. म. श्री बाबूराव कुमठेकरने किया है। उनके कार्यका मूल्यांकन करना आसान नहीं है। क्यों कि यह कार्य वैसेही महत्त्वका है। प० पू० वै.वा. ह. भ. प. आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजी कुमठेकरजीके कार्यके विषयमें अपने एक पत्रमें लिखते हैं। "भारतको स्वातंत्र्य मिला और नेताओंने भाषिक राज्य रचनाका प्रयोग करनेका निश्चय किया किंतु इसका एक अकल्पित परिणाम यह दीखने लगा कि उससे द्वैत ही बढा । यहांतक कि नेतलोग भी यह सोचने लगे देशकी एकात्मकता टूट जायेगी ! " इस आपत्तिका सदाके लिये दूर करनेके जो अनेक उपाय हैं उनमें एक महत्त्वका उपाय राष्ट्रभाषामें भिन्न भिन्न भाषाओंके उत्कृष्ट वाङ्मयका आविष्कार करना है; और विश्वमें संत साहित्य ही एक ऐसा साहित्य है जो विश्वैक्यकी भाषा बोलता है तथा यही एक ११ —प्रस्तावना
विचार प्रकट करता है। संत एक परिवार हैं। संत, फिर कहीं भी जन्म ले अथवा कभी जन्म लें वह एकही भाषा बोलता है और एक ही तत्त्व कहता है। "ऐसे संत साहित्यका हिंदी आविष्कार होकर संतोंका संदेश भारतके घर घर पहुंचकर भारतकी एकता दृढ होनेमें मदद हो इस भावनासे श्री कुमठेकरने संत साहित्य सदनका काम उठाया है।" किसी भी भाषाके काव्यका अन्य भाषामें भाषांतर करनेके लिये, वह भी समवृत्तमें, दोनों भाषाओंपर उत्तम प्रभुत्व होना आवश्यक होता है, यहां, केवल भाषाप्रभुत्वका पाथेय भी अधूरा ही होता है। यह तत्त्वज्ञानका ग्रंथ होनेसे उस शास्त्रके गूढ प्रमेयोंका आकलन होनेके लिये उसका भी पूर्ण अभ्यास करना आवश्यक है। उसके प्रति अनन्य निष्ठा, उतनी ही आत्मीयता, और कार्य सातत्यशक्तिकी आवश्यकता होती है। क्यों कि ऐसे काम सामान्य प्रयत्नोंसे सेतमेंतमें होनेवाले काम नहीं हैं। बडे बडे विद्वानोंकी भी बुद्धि कुंठित करनेवाली नौ हजार ओवियां; उनमें स्वयंप्रभ, मौलिक, निगूढ तत्त्वज्ञानके इस महान ग्रंथका भाषांतर करना आसान नहीं है। प्रत्येक शब्दोमेंसे ग्रंथका शब्दसौंदर्य, ध्वनिमाधुर्य, अर्थ गांभीर्य, तथा ग्रंथकर्ताके भावको व्यक्त करना अत्यंत कठिन कार्य है। ज्ञानेश्वरीका कथन करते समय जैसे समय स्वयं ज्ञानेश्वरमहाराज कहते हैं - उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठाव । कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १४-४१५ ॥ यह सब होनेके लिये मूल ग्रंथकारके हृदयमें प्रवेश करना पडता है, उनका अंतरंग खोजना पडता है, उनकी भावनाओंसे समरस होना पडता है, उनमें तद्रूप तन्मय होना पडता है, तभी मूल ग्रंथकारका हृदय अपने शब्दोंसे अभिव्यक्त किया जा सकता है ! इसके साथ साथ आवश्यकता है भाषाप्रभुत्वकी ! श्रीकुमठेकरका अनुवाद देखनेसे ऐसा लगता है ऊपरकी बातोंमें वे पर्याप्त यशस्वी हुये हैं। खास करके, मराठी या हिंदी दोनोंही श्रीकुमठेकरकी मातृभाषायें नहीं है। इन दोनो भाषाओंका व्याकरणशुद्ध अभ्यास करके उन्हे यह काम करना पडा है। इसके पहले भी ज्ञानेश्वरीके दो तीन अनुवाद हो चुके हैं। किंतु वे केवल भाषांतर या रूपांतरसे हैं। यह अनुवाद समवृत्तमें है। ओवीवृत्त हिंदीमें नहीं है यह मराठीका सर्वजनसुलभ अपना वृत्त है। उसमें गण मात्रदिका विशेष बंधन नहीं है। उसके साडेतीन या साडेचार चरण होते हैं। यद्यपि हिंदी भाषामें ओवी छंद नहीं है अनुवादकने हिंदीमें ओवी छंदकी रचना करके ज्ञानेश्वरी जैसे अद्वितीय ग्रंथ, समवृत्तमें हिंदीमें अनुवाद करनेकी अपनी जिद्द अत्यंत सामर्थ्यके साथ पूरी की है। साथ साथ ज्ञानेश्वरमहा- राजकी भाषा सूत्रमय है। "अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतोमुखं !" यह सूत्रका लक्षण है। सूत्रमें अक्षर थोडे और अर्थ विस्तृत होता है। ऐसे अर्थपूर्ण अक्षरोंका गिनतीके उतनेही अक्षरोंमें, वही भाव और अर्थ प्रकट करना और उसी शब्द-सौंदर्य और नाद-माधुर्यके साथ, यह आसान काम नहीं है। अनुवादक इसमें भी पर्याप्त यशस्वी हुए हैं। उनके इस यशके विषयमें महा- राष्ट्रके अत्यंत विद्वान तथा प्रसिद्ध समालोचक प्रो. न. र. फाटक अपने एक पत्रमें लिखते है " हिंदीमें ओवी छंद नहीं है। फिरभी हिंदीमें उस भाषाकी दृष्टिसे अनुकूल हो ऐसा, मराठी ओवी छंदको नया रूप देकर स्व-रचित नये वृत्तमें, ज्ञानेश्वरी जैसे प्रासादिक वेदांत काव्य ग्रंथका, मूलके समान, उतनाही सशक्त और सरल अनुवाद करके, मानो महाराष्ट्र सारस्वतका हृदय ही अन्य भाषिके भाव-जीवनसे जोडकर श्री कुमठेकरने ज्ञानेश्वरी १२
महान कार्य किया है।.......श्री कुमठेकरका किया हुवा ज्ञानेश्वरीका हिंदी अनुवाद देख कर ऐसा लगता है “ ज्ञानेश्वरी मूलमें ही हिंदीमें लिखी गयी हो !” प्रो० न०र० फाटकके इस कथनमें यत्किंचित अत्युक्ति नहीं है। इतनाही नहीं श्री कुमठेकरने अकारादि विषयानुक्रमणिका, विषयसूचि तथा अनेक परिशिष्टादि द्वारा अध्येताओंके लिये यह ग्रंथ अत्यंत सुलभ बना दिया है। ज्ञानेश्वरी अभ्यास करने जैसा ग्रंथ है । अभ्यास करनेवालोंके लिये श्री कुमठेकरने यह ग्रंथ अत्यंत सुलभ बना दिया है। विशेष कर, विशिष्ट शब्दोंके विशेष विवेचन द्वारा तथा विशिष्ट प्रकारके शब्द कोश द्वारा भी पुस्तकको सर्वांग पूंण तथा सर्वांग सुंदर बनानेमें अनुवादकने अत्यंत परिश्रम किये हैं। वस्तुतः श्री कुमठेकरका पूर्वांयुष्य सारा राजनैतिक क्षेत्रमें बीता है। यदि वे चाहते तो स्वातंत्र्योत्तर कालमें किसीके पिछ लग्गू बन कर किसी बडे अधिकारके स्थान पर विराजमान हो सकते थे। किंतु उनको इस मोहने स्पर्श भी नहीं किया। जब अन्य सब राजनैतिक क्षेत्रकी ओर धंस रहे थे ,तब उन्होने वह क्षेत्र छोडकर अपना जीवन संतकार्यमें दे दिया और अत्यंत निष्ठासे वे इस कार्यमें दत्तचित्त हैं। इसी एक बातसे उनके अंतरंगका दर्शन हो सकता है; उसकी पूर्ण कल्पना आ सकती है। महाराष्ट्रीय संतोके दिव्य अध्यात्मिक वाङ्मयका उतना ही समर्थ अनुवाद द्वारा हिंदी साहित्य संपदाको समृद्ध करके उन्होने जैसे हिंदी भाषिकोकों चिरऋणी बना रखा है वैसे ही उनका कार्य महाराष्ट्रको भी भूषण भूत है । इसमें महाराष्ट्रका महान गौरव है। हमें पूर्ण विश्वास है कि हिंदीका भावुक वाचक-वर्ग तथा महाराष्ट्रीय इसको मान्य करेंगे। श्रीकुमठेकरके इस ऋणसे मुक्त होनेका प्रयास करेंगे। श्री कुमठेकरके इस कार्यके विषयमें, दो वर्ष प्रथम वैकुंठवासी बने हुए पौर्वात्य पाश्चात्य विद्या-विभूषित, महाराष्ट्रके वारकरी संप्रदायके ज्येष्ठ श्रेष्ठ अध्वर्यु, प. पू. आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजीने प्रशस्ति पत्र देकर गौरव किया था। इस परसे श्री कुमठेकरके कार्यका महत्व समझमें आएगा। आचार्य श्री दांडेकरने इस अनुवादको देखा था। उन्होने भी इस अनुवादकी प्रशंसा की थी। वे ज्ञानेश्वरीके एक विद्वान भाष्यकार थे । यह अनुवाद कब प्रसिद्ध होगा इसकी उनको तडप थी । वास्तविक इस अनुवादकी प्रस्तावना उन्हीको लिखनी थी किंतु काल प्रवाहमें उन्हे यह शक्य नहीं हुवा। फिर भी यह अनुवादकका सुदैव ही समझना चाहिए कि आचार्य श्री दांडेकरकीं प्रशस्ति-उनको मिली। वैसेही महाराष्ट्रमें अन्य अनेक विद्वान अधिकारी पुरुष होने पर भी इस ग्रंथकी प्रस्तावना लिखनेका दायित्वपूर्ण काम मुझ जैसे सामान्य व्यक्तिको क्यों सौंपा गया यह भी मैं समझ नहीं पाया किंतु श्री. बाबुराव कुमठेकर के प्रेमाग्रहके कारण यथाशक्ति इन सर्वांगपूर्ण ग्रंथ पर प्रस्तावणारूप चार शब्द लिखे हैं। अंतमें ज्ञानेश्वर महाराजके पुनः पुनः आगे इससे। इस ग्रंथ पुण्य संपतिसे। सर्वभूत सर्व सुखसे। होना है संपूर्ण ॥ १८-१८०८ ॥ इन शब्दोंमे यह प्रस्तावना समाप्त करता हूँ ।
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कभी स्वप्नमें भी नहीं सोचा था ऐसा काम जब किसीसे सफलता पूर्वक संपन्न हो जाता है तब उसका हृदय कृतार्थतासे कैसे भर आता है इसका अनुभव अब हो रहा है। जब हृदयमें बिना ओर छोरका आनंद लहरें मार रहा होता है तब मौन रहना ही अच्छा होता है ! बिना ओरछोरके उस आनंद-सागरको भला शब्दोंके चम्मचसे कहां तक भरें और कैसे भरें ? वस्तुतः उसकी आव- श्यकता भी नहीं होनी चाहिये । किंतु जीवनमें कुछ बातें ऐसी होती हैं कि जिन्हें समयपर नहीं कहना शायद कृतघ्नता कहा जाय । इसीलिये यहां ये शब्द लिखे जा रहे हैं। कभी ज्ञानेश्वरीकी कुछ ओवियोंका सहज ही अनुवाद हो गया । वह, वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध, गुरु-जनोंको अच्छा लगा । पू० आचार्य शं. वा. दांडेकर, श्री.न्यायरत्न धुंडिराज शास्त्री विनोद, प्रा० न० र० फाटक जैसे विद्वान् गुरुजनोंने इसी ढंगसे छंदोबद्ध ज्ञानेश्वरी लिखनेकी प्रेरणा दी। पू० शं० वा० दांडेकरजीने कहा “तुमने और कुछ भी काम नहीं किया किंतु इसी ढंगसे ज्ञानेश्वरी हिंदीमें लिख दी तो हम समझेंगे तुम्हारा यह जन्म सार्थक हुआ !” और मैंने भी इसीको गुरुजनोंकी आज्ञा मान- कर अपना अधिकार अथवा अपनी योग्यताका विचार किये बिना ही ज्ञानेश्वरीके अनुवादका काम हातमें लिया । ॐ नमोजी आद्य ! लिखते हुए आदि पुरुषको प्रणाम कर कार्यका श्रीगणेशा किया । किंतु आगे ........! काम धीरे धीरे आगे रेंगता गया । जैसे जैसे काम आगे रेंगता गया शरीर सूखता गया । ऐसे भी लगा “यह काम इस शरीरसे पूरा नहीं होगा !” किंतु काम अधूरा छोडना भी असंभव था । बिना किसी कारणके दुर्बलता बढती गयी । दिन भर थकानका अनुभव होने लगा । पडा रहता तो न दिन और न रात घंटों सो जाता । नींदमें सारा दिन बीत जाता । जब जगा रहता, कुछ काममें लगता तो अपने आप खो जाता ! अर्थात् बीच बीचके कालखंडका स्मरण ही नहीं रहता । अब क्या हुआ ? मैं कहां था ? क्या करता था ? आदिका भान ही नहीं रहता । मेरे एक डॉक्टर मित्र चिकित्सा करते । दवा देते । कभी कभी सुयी भी लगाते । मैं अपनी बात उनसे ठीक कह नहीं सकता था, ऐसे महीने बीते । सालभर होने आया । इसी बीचमें एक दिन श्री. शंभु आपटे नामके एक सज्जनका परिचय हो गया। दूसरे जिस सज्जनद्वारा यह परिचय हुवा था उसने कहा था “वे योगी हैं । आध्यात्मिक साधनामं रत रहते हैं ।" आदि आदि। इस परिचयके तुरंत बाद अनुवादित ज्ञानेश्वरीके कुछ पृष्ठ देखकर उन्होंने कहा “आप ज्ञानेश्वरीका अनुवाद कर रहे हैं । किंतु यह काम आपसे पूरा नहीं हुवा तो आपको दुःखी नहीं होना चाहिए। मैं देख रहा हूं कि यह काम आपसे पूरा नहीं होगा। इसके पहले यह शरीर छूट जायेगा !” यह सुनकर मैंने हँसते हुए कहा “मेरे एक बुजुर्ग मित्र मेरे लिये सदैव कहते हैं कि तीन चार सालमें एक बार यह ऊपर जाकर यमराजका दरवाजा खटखटाता है और वह दरवाजा खोलनेके पहले ही अंदरसे चिल्लाकर कहता है “नो व्हेकन्सी !” ” “दरवाजा खोलनेके पहले ही वह क्यों चिल्लाकर कहता है ? दरवाजा खोलकर सज्जनतासे क्यों नहीं कहता !” मेरा परिचय करा देनेवाले मित्रने पूछा।
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“दरवाजा खोलते ही कुमठेकरजी अंदर घुस जायेंगे तब बाहर निकालना मुश्किल होगा न !” शंभु आपटेने कहा और भारी बना हुवा वातावरण कुछ हलका बना। किंतु मेरा और शंभु आपटेजीका संबंध बढता गया। मुझ पर उनकी बातोंका भी कुछ असर होता गया। मेरे कामकी गति धीमी होती गयी। शरीरके कष्ट बढते गये। और एक दिन ऐसे ही बातबातमें मैंने शंभु आपटेजीसे कहा “मुझे लगता है मुझे अब आपके पास आना छोड देना चाहिए। क्यों कि आपकी बातोंका मुझ पर प्रभाव पडता जाता है। ज्ञानेश्वरी लिखने बैठते समय मन साशंक होता है। मैं इसे प्रकाशित हुवा देखना चाहता हूं और माना मुझसे यह काम पूरा नहीं होगा; किंतु ज्ञानेश्वरीका समवृत्तमें अनुवाद करते करते शरीर छोडना भी कम भाग्य नहीं है!!” यह कहते समय मेरी आँखें भर आयीं। शंभु आपटेजी भी द्रवित हुए। उन्होंने कहा “ऐसी बात नहीं है। मैं भी चाहता हूं कि यह काम पूरा हो। किंतु कैसे हो? मैं यही सोचता हूँ। मैं इस काममें सहायक बनना चाहता हूँ। रोडा अटकाना नहीं चाहता !” हम दोनोंका संबंध बना रहा। बढता गया। एक दिन उन्होंने यकायक कहा “कुमठेकरजी कृपा करके तुम डाक्टरसे दवा लेना छोड दो। ऐसे ही चलने दो।” उस दिन मुझे माथेमें बडी वेदनाएँ हो रही थीं। इसीलिये मैं शंभु आपटेजीके घर गया था। उन्होंने मेरा सिर गोदमें लेकर मसाज किया। ऐसे करते समय भी वे बडे प्यारसे समझाते रहे कि तुम्हे औषधी लेना छोड देना चाहिए। मैंने डाक्टरी ट्रीटमेंट छोड दी। शंभु आपटेजी ही मेरे डाक्टर बने। मेरा उनके घरमें आना जाना बढता गया। हम दोनों न जाने क्या क्या बोलते बैठते थे। एक दिन अकस्मात मैंने ज्ञानेश्वरीका किया हुवा अनुवाद सुनाया। अनुवाद अच्छा था। सुननेवाला और सुनानेवाला मानो एक हो गये थे। समयका भान भी नहीं रहा। और ...... और मैं अत्यंत थक गया। शंभुजीकी पत्नीने काफी बना कर दी। मैं आराम कुर्सी पर पडा था। शंभुजी यकायक उठे। हाथ पैर धो आये। अगरबत्ती जलायी। एक पाट रखा। उस पर मुझे बिठाया। पांच दस मिनिट मेरे सामने आंखे मूंदकर बैठे रहे। फिर उठे। अंदर जा कर एक श्रीफल और पांच रुपये ले आये। श्रीफल तथा पांच रुपये मेरे हाथमें देकर बोले, “यह नोट संभा- लकर रखो। खर्च मत करो, बैंकमें मत रखो, अपने पास ही रखो !” और मुझे तिलक लगाया । थोडी देर मेरा माथा और गर्दन जहां दर्द होता था - सहलाते बैठे रहे। फिर अपने भाईको भेज कर टैक्सी मंगवाई और मुझे डेरे पर भेज दिया। इसके कुछ दिन बाद वे बोले “अब आप लिखिये। अब लगता है भगवान आपसे यह काम करा ही लेंगे। इतने दिन मुझे लगता था कि यह काम होना तो चाहिए किंतु कैसे पूरा होगा ?' इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नीसे मेरे लिये काफी बनानेके लिये कहा और फिर बोले “कुमठेकर ! आखिर मैंने अपनी पत्नीसे पूछा यदि मैने यह शरीर छोड दिया तो तुम कैसे निभाओगी ?” पहले वह झझाई बोली “यह कैसा प्रश्न करते हो तुम ? यह सवाल ही क्यों उठा ?” फिर मेरे आग्रह करने पर बोली “तुम जानते हो मुझे सीना आता है। अपना एक मशीन ले लूंगी। उस पर काम करूंगी। जो मिलेगा उसीसे अपना और बच्चोंका खर्चा चलाऊंगी। न किसीसे कुछ मांगूगी। न किसीका दिया हुवा कुछ लूंगी !!” “यह सुनकर मनका समाधान हुवा। दीक्षा लेते समय मैंने अपने गुरुको बचन दिया था कभी पर स्त्री और पर धनकी आशा नहीं करूंगा !” इतनेमें उनकी पत्नी काफी ले आयी। उनसे काफी लेते लेते मैंने कहा “किंतु यह प्रश्न ही क्यों पैदा हुवा ?” उनकी पत्नीने कहा- “यही इनकी आदत है !” ज्ञानेश्वरी ५
हमने काफी पी। आश्चर्य जनक रूपसे मेरा स्वास्थ्य सुधरने लगा। तेजीसे काम आगे बढा। नौ हजार ओवियोंका समवृत्तमें अनुवाद हुवा। उसकी पांडुलिपि तयार हुई। छपाई आदिके खर्चकी व्यवस्था हुई। यह सारी बातें मैंने शंभु आपटेजीसे कहीं। तब उन्होंने पूछा "ज्ञानेश्वरीका पसायदान-प्रसाददान-लिख कर पूरा हुवा ?" मैंने पढकर सुनाया। "जो चाहता था वह हो गया !" "पुस्तक मुद्रणके लिये दे रहा हूँ। कल ही बेंगलूर जा रहा हूँ?" "हिंदी छपाइके लिये बेंगलूर क्यों ?" "वहां मेरे मित्रका प्रेस है। हम दोनोंका पच्चीस सालका संबंध है। छपाई जल्दी हो जायेगी !" मुझे किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होगी। "अच्छा !" मैं बेंगलूर गया। पुस्तक छपने लगी। आखिर वहां किसी तरह साल भरमें पंद्रह अध्याय छप तो गये। मैं उसकी डमी कापी बनाकर बंबई लौटा। बंबई आते ही सीधा शंभु आपटेजीके घर गया। किंतु..... वे जहाँ अक्सर बैठते थे, उसी स्थानके पास दीवारको लगी सीनेकी मशीन बैठी थी। उसके ऊपर शंभुजीकी तसवीर टंगी थी और सिंदूरकी बिंदी जो सदैव श्रीमती आपटेजीके भालपर लगी रहती थी वह उस तसवीरके भालपर लगी थी। घरमें जहां उत्साह रहता था वहां उदासी थी। मै वहां क्षणभर बैठा रहा। उनकी धर्मपत्नी मौन और उदास मेरे सामने बैठी रही। कोई कुछ नहीं बोल पाया। वहां मेरा दम घुट रहता था। शंभुजीने मेरे हाथमें श्रीफल देते समय कहा था "तुमपर भगवानकी असीम कृपा है। कृपा करके कोई दवा मत लो। तुम अच्छे हो जाओगे।" पांच रुपयोंका नोट देते समय उन्होंने कहा था "अब इस कामके लिये कहीं न कहींसे आर्थिक सहायता मिलती जायेगी !" उन्होंने कई बार कहा था, "मैंने कई बार सोचा, तुम इतना अच्छा काम कर रहे हो। यह काम कैसे पूरा होगा ? इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?" क्षणभरमें कई बातें स्मृतिपटल पर उठ कर डूब गयीं। उदास, निःशब्द वातावरणमें दम घुट रहा था। किसी तरह मैंने कहा "अच्छा ! अब मैं जाता हूँ!" और चला आया ! आते समय मनमें अनेक बातें आयीं। किंतु मनमें उठनेवाली सभी बातें लिखनेकी आवश्यकता नहीं होती। जीवनमें होनेवाली सभी घटनाओंका अर्थ करना संभव नहीं होता। इस घटना पर कोई भाष्य किये बिना शंभुजीके लिये केवल कृतज्ञताकी अश्रु-अंजली देना ही मेरा कर्तव्य रह गया है। वैसे ही पू. आचार्य शं. वा. दांडेकर इस काममें बार बार प्रोत्साहन देने परभी "कार्य संपन्न हुवा" यह देखनेके लिये नहीं रहे। वही बात श्रीन्यायरत्न धुंडीराज विनोदकी है। किंतु प्रा. न. र. फाटकजीने इन सबकी कमी पूरी की। अनुवाद करते समय कोई बात समझमें नहीं आयी फाटकजीके पास गया। प्रकाशनके लिये कभी आर्थिक तंगी आयी। फाटकजीके पास गया। दूसरा कोई संकट सामने आया तो फाटकजीके पास गया। और, उन्होंने भी कभी निराश नहीं किया। दौडते हुए पास आनेवाले बालकको जिस भावसे मां पास लेकर उनकी बातें सुनती है, जैसे उसकी सहायता करती है वैसे उन्होने मेरी कठिनाइयोंको हल कर दिया। वह भी निष्काम भावनासे। वैसे ही श्री. स. का. पाटील, सेठ अरविंद मफतलाल, से. धरमसी मोरारजी खटाऊ, श्री. वामनराव वंदे इन्होंने जब कभी आर्थिक कठिनायी आयी, उनको मालूम हुवा, किसी न किसी तरह उसको हल कर दिया। ३ कृतज्ञताके कुछ शब्द