ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वस्तुतः यह अकेलेका काम नहीं, सबका काम, सबने मिलकर संपन्न किया । सबने कृतार्थताका अनुभव किया । ऐसी स्थितिमें कौन किसका आभार माने ? मुझे भी इन सबको धन्यवाद देनेका अथवा सबका आभार माननेका क्या अधिकार है ? फिर भी, जब कोई कार्य संपन्न होता है तब उसके कारणीभूत सभी मित्रोंका स्मरण होना स्वाभाविक है। यह केवल कृतज्ञताका स्मरण है ! अपने अपने कर्तव्य किये हुए साथी या सहायकोंको धन्यवाद देनकी उद्धंडता नहीं । हम सब सदैव परस्पर सहयोगसे ऐसे ही सत्कर्म रत रहें, हमारी यह परस्पर मित्रता बढती जाय; हममें प्रेम और विश्वास बढता जाय, परस्पर दायित्व भावना बढती जाय, इसलिये किया गया यह सन्मित्रोंका कृतज्ञता-स्मरण है । एक प्रकारसे यह भी इस सन्मित्र मंडलमें अपनी विशिष्टताका दर्शन कराना है ! इस लिये मैं हृदयसे सबका क्षमा प्रार्थी हूँ । वैसे ही परिशिष्ट लिखनेमें श्री. चित्राव शास्त्रीके चरित्रकोश, श्री. महादेवशास्त्रीजीके सांस्कृतिक कोश आदिका जो उपयोग हुवा इसके लिये भी उन सबका कृतज्ञ हूँ। तथा ज्ञानेश्वरीका अर्थ करनेमें श्री साखरे महाराज, आचार्य श्री. दांडेकर श्री. भिडे आदि सज्जनोंकी ज्ञानेश्वरीका जो उपयोग किया गया उनको भी कृतज्ञतापूर्वक प्रणाम करता हूँ !
बाबूराव कुमठेकर
ॐ
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ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरी १ कविका संक्षिप्त परिचय— वैसे तो ज्ञानेश्वर महाराजका सारा जीवन १ चमत्कारोंसे भरा है किंतु सब चमत्कारोंका चमत्कार उनके लिखे हुए दो वेदांत ग्रंथ ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृत हैं। ये ग्रंथ उन्होंने अपनी आयुके पंद्रहवे वर्षमें लिखे हैं और जो बात शब्दोंसे नहीं व्यक्त हो सकती वह शब्द चित्रोंसे मूर्तिमान करके दिखाई है। ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतको पढते पढते अमूर्त विचारोंका स्पष्ट शब्दचित्र देखकर सहसा हृदय कह उठता है " वाल्मीकीकी प्रतिभा, व्यासकी प्रज्ञा, कृष्णकी आत्मानुभूति, शंकरका वैराग्य और बुद्धकी करुणाका समीकरण ज्ञानेश्वर महाराज हैं। सूर्यसे भी प्रखर ज्ञानके साथ चांदनीसे भी शीतल करुणाका स्पर्श होता है यहां। इसी लिये आधुनिक युगमें भी सारा महाराष्ट्र उन्हे माउली कहता है। महाराष्ट्रमें माउली शब्दका अर्थ ज्ञानेश्वर है और कोशमें माउली शब्दका अर्थ मां। महाराष्ट्रकी इस माउलीने अपने साहित्यके रूपमें मराठी भाषाभाषी जनताको कल्पवृक्षकी छायामें बिठाकर कामधेनुके दूधमें पकाया हुवा अमृतान्न खिलाया है अक्षय-पात्रमें ! इसीलिये ज्ञानेश्वर महाराजके बाद जो कोई महापुरुष महाराष्ट्रमें पैदा हुवा उसने ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरीका ऋण स्वीकार किया है। ज्ञानेश्वरीके बाद मराठी भाषामें लिखे गये प्रत्येक धर्म-ग्रंथ पर अथवा पारमार्थिक ग्रंथ पर ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतका प्रभाव देखनेको मिलता है। ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृत कोई रामकथा अथवा कृष्णकथा नहीं किंतु वेदांत-ग्रंथ है। वेदांत काव्य है। मराठी भाषामें ऐसे कई वेदांत ग्रंथ हैं, उनमेंसे कुछ ज्ञानेश्वरीके पहल भी लिखे गये थे और कुछ ज्ञानेश्वरीके बाद भी लिखे गये हैं, पर मराठी भाषाभाषी जन-मानसपर ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतका जो प्रभाव है वह और किसीका नहीं दीखता। आधुनिक विज्ञान-विद्या विभूषित होकर भी नौ हजार छंदोंका ग्रंथ कंठस्थ कर उसका नित्य-पाठ करनेवाले महाराष्ट्रीय हजारो हैं। वैसे तो लाखों लोग ज्ञानेश्वरीका नित्य-पाठ करते हैं। अपनी आयुके पंद्रहवे सालमें ऐसे ग्रंथ लिखानेवाले ज्ञानेश्वर महाराजका जन्म शा. शक ११९७ युवा नाम संवत्सर श्रावणवद्य अष्टमी रातको बारह बजे हुवा था। इसलिये सारे महाराष्ट्रकी यह मान्यतासी हो गयी है कि भगवान कृष्णने ही अपनी गीता समझानेके लिये ज्ञानेश्वरके रूपमें जन्म लिया था। ज्ञानेश्वर महाराज जिस समय करीब दस सालके थे उसी समय समाजके विद्वान लोगोंकी अशानुसार उनके माता पिताने देहान्त प्रायश्चित्त लिया था। उस समयका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराजकी छोटी बहन मुक्ताई कहती है टिप्पणी (१) इसी लेखककी ज्ञानेश्वर और उनका साहित्य इस पुस्तकमें ज्ञानेश्वर महाराजके विषयमें संपूर्ण जानकारी दी है। ५
Based on the provided image, here is the complete Devanagari transcription:
तात मात जब छोड गये हमें । छोटे थे हम पांडुरंग । निवृत्ति ज्ञानेश्वर भिक्षाअनमें जाते । संभाले सोपान मेरे पास ॥ इस समय ज्ञानेश्वर महाराजके अग्रज और श्रीगुरु निवृत्तिनाथ बारह वर्षके थे । ज्ञानेश्वर महाराज दस वर्षके, सोपानदेव आठ वर्षके और छ वर्षकी मुक्ताई । आजमी सारा महाराष्ट्र जिनके स्मरणमात्रसे रोमांचित होता है, अनेक प्रकारके कष्ट सहन करके जिनके समाधि-स्थानके दर्शन करने जाता है, जिनके समाधि दिन पर और समाधि स्थानपर लाखों लोगोंका मेला लगता है उनके जन्मसे उनके माता-पिताको समाजमें अनंत यातनाएं और अपमान सहना पडा था। इतना ही नहीं इनके माता-पिता तथा इन अबोध बालकोंका मुंह देखना असगुन माना जाता था, पाप माना जाता था ! ! क्यों किः— ज्ञानेश्वर महाराजके पिता विट्ठलपंत स्वभावसे ही विरक्त थे । अपना विद्याअध्ययन होते ही वे तीर्थ-यात्राके लिये निकल पडे थे। पुरानी पोथियोंमें उनकी यात्राओंका वर्णन देखनेको मिलता है । उन्होंने करीब करीब भारतके सभी पुण्यक्षेत्रोंका दर्शन किया था। सभी पुण्य-तीर्थोंका स्नान किया था । जब विट्ठलपंत भीमाशंकर आये, भीमा नदीका उगम-स्थान देखा, तब पंढरपुरके स्मरणसे पंढरपुरके लिये चल पडे। भीमाशंकरसे पंढरपुर जाते समय रास्तेमें एक छोटासा गांव पडता है आलंदी । आलंदी इंद्रायणी नदीके किनारे पर बसा हुआ एक छोटासा गांव है । किंतु अत्यंत प्राचीन । इस गांवको पहले अलकापुर कहा जाता था । यहां एक शिवालय है । इसको सिद्धेश्वर कहते हैं। यह अत्यंत प्राचीन शिवपीठमें एक है । विठ्ठलपंत आलंदी आये । इंद्रायणीमें स्नान किया । मंदिरके सामने एक पीपलके वृक्षकी छायामें बैठकर अपना नित्य-कर्म करने लगे । मंदिरके सामनेवाले अश्वत्थकी छायामें बैठकर, स्वच्छ मंत्रोच्चारसे धर्म-कार्यमें मग्न तेजस्वी युवकको देखकर सिध्देश्वर मंदिरके पुजारी, उसी गांव और पंचक्रोशीके ग्रामाधिकारी, सिध्देश्वर पंत प्रसन्न हुए । उन्होंने आग्रहसे विठ्ठलपंतको भोजन पर बुलाया । खाते खाते रहने करनेकी जानकारी ले ली । प्रवासका उद्देश जान लिया और मन ही मन मेरी कन्या रुक्मिणीके लिये योग्य वर होनेका निश्चय कर लिया । २ स्वप्न और विवाह — उसी दिन विठ्ठलपंत तथा सिद्धेश्वरपंतको एक-सा स्वप्न हुआ और स्वप्नमें पंढरपुरके विट्ठलने रुक्मिणी और विठ्ठलपंतके विवाहका आदेश दिया । प्रातःकाल उठते ही सरल स्वभावके दोनों ब्राह्मणोंने अपने अपने स्वप्नकी बात एक दूसरेसे कही और विट्ठलपंतने कहा “मैं रामेश्वरकी यात्राका संकल्प करके रामेश्वर जा रहा हूँ, दूसरी बात, बिना मातापिताकी आज्ञाके विवाह नहीं कर सकता !” तब सिद्धेश्वरपंतने कहा आप आजकी रात यही रहिए । आजकी रातको जो आज्ञा होगी वैसे कीजिये । विठ्ठलपंत यह बात मानकर उस दिन वहां रहे और उस रातको पुनः स्वप्नमें आदेश मिला “ तू भक्ति, ज्ञान, वैराग्यका घर बना हुआ है । ये इसके उदरमें जन्म लेना चाहते हैं । इसलिये तुझे मेरी आज्ञा है तू यह विवाह कर ” दूसरे दिन विट्ठलपंतने अपना स्वप्न सिद्धेश्वरपंतसे कहा ! ज्योतिषीको बुलाकर पत्रिका दिखायी गयी । छत्तीस गुण मिलते थे । बस उसी ज्येष्ठ महीनेमें रुक्मिणीसे विठ्ठलपंतका विवाह हुआ और थोडेही दिनोंमें पंढरपुर जानेवाले वैष्णवोंके झुंड देखते ही विट्ठलपंत पंढरपुर जानेके लिये उतावले हो गये । उन्होने सिद्धेश्वरपंतसे आज्ञा मांगी और सिद्धेश्वर पंतभी अपनी पत्नी और पुत्रीके साथ विट्ठलपंतको लेकर पंढरपुरके लिये रवाना हुये । पंढरपुरमें विट्ठल दर्शन करके विट्ठलपंत अपने संकल्पनुसार अकेले ही रामेश्वर गये । ज्ञानेश्वर ३
रामेश्वर यात्रा करके वहांसे पुनः आलंदी आये और आपेगांव जाकर माता-पिताके दर्शनकी अपनी इच्छा उन्होंने सिद्धेश्वरपंतसे कही। सिद्धेश्वर पंतने भी प्रसन्नतासे दामादकी इच्छा मान ली। स्वयं पत्नी और पुत्रीको साथ लेकर दामादके साथ उनके घर जानेके लिये तैयार हो गये। वहां आपेगांवमे विट्ठलपंतके पिता गोविंदपंत और माताजी अपने पुत्रके आगमनकी प्रती- क्षामें घुल रहे थे। वे पुत्रको, वह भी पत्नीके साथ आया हुआ देखकर बडे प्रसन्न हो गये। सिद्धेश्वरपंतने वस्त्राभरणसे गोबिंदपंत और उनकी पत्नी नीरादेवीका सन्मान किया। विवाहकी सारी कथा सुनाई और दामाद और अपनी पुत्रीको उनके घर छोडकर अपने घर लौट आये। विठ्ठलपंतने सुखसे माता पिता और पत्नीके साथ कुछ दिन बिताये। वार्धक्यके कारण मातापिता वैकुंठवासी हो गये। घर प्रपंचका सारा भार विठ्ठलपंत पर आया। वह भी अपने गांवके ग्रामाधिकारी थे। किंतु वे इन सबसे उदासीन रहते थे। उनके जीवनक्रमके विषयमे पुरानी पोथियोंमें तत्कालीन संत नामदेवने लिख रखा है -
नित्य हरिकथा नाम-संकीर्तन संत दर्शन सर्वकाल॥ आषाढ कार्तिकमें पंढरीकी यात्रा विठ्ठल अकेला सुखरूप ॥
ऐसी स्थितिमें पुनः पुनः विठ्ठलपंतके मनमें संन्यास लेनेकी बात आने लगी। वह अपनी पत्नीसे वही वही बात कहने लगा। रुक्मिणीने यह बात अपने पितासे कही। सिद्धेश्वरपंतने पुत्रीसे "बिना संतानके संन्यास न लेनेकी बात कहलवाई" कुछ दिन ऐसे ही बीते। विठ्ठलपंत पुनः अपनी पुरानी बात दुहराने लगे। वे बार बार कहते "मुझे संन्यास लेनेकी इच्छा हुई है। तू अपनी आज्ञा दे!" बार बार यही यही बात सुनकर रुक्मिणीने कभी असावधानीसे कह दिया "जाइये" बस यही अपनी पत्नीकी आज्ञा मान कर विठ्ठलपंत चल दिये। वे सीधा काशी गये। यहां पत्नी विठ्ठलपंतकी राह देखते देखते थक गयी। उसने सारी बात सिद्धेश्वरपंतसे कही। पिता आकर लडकीको अपने घर ले गये। वहां जाते ही रुक्मिणीदेवीने अश्वत्थ प्रदक्षिणादि अपने व्रतनियम प्रारंभ कर दिये।
३ संन्यास और संसार- काशी जाकर विठ्ठलपंतने किसी श्रीपादस्वामीसे संन्यास लेलिया और चैतन्याश्रमके नामसे वहीं गुरुके साथ रहने लगे। ऐसे ही कुछ काल बीता। चैतन्याश्रम शास्त्राध्ययन और ब्रह्म-चिंतनमें लीन रहने लगा। इस बीचमें श्रीपाद स्वामीने रामेश्वर - यात्राकी सोची। आश्रमका सारा दायित्व चैतन्याश्रम पर सौंप करके श्रीपादस्वामी रामेश्वर-यात्राके लिये रवाना हो गये। रामेश्वर यात्रामें प्रवास करते करते श्रीपादस्वामी आलंदी आये। आलंदीमें उसी प्राचीन- तम सिद्धेश्वर मंदिरमें उतरे। वहांका वही अश्वत्थ। रुक्मिणीदेवी नियमसे उस अश्वत्थकी परि- क्रमा करती थी। परिक्रमा करके अश्वत्थको प्रणाम करते समय सहज ही उन्होंने श्रीपादस्वामीको भी प्रणाम किया और, "पुत्रवती भव" स्वामीजीने आशीर्वाद दिया। स्वामीजीका आशीर्वाद सुन कर उस दुःखमें भी रुक्मिणीदेवीको हंसी आयी। स्वामीजीने कारण पूछा और देवीजीने सारी बात स्वामीजीसे कह डाली। देवीजीकी बातें सुनकर स्वामीजीको लगा हो या न हो, संभवतः चैतन्याश्रम ही इस दुखियाका पति है। सिद्धेश्वर पंतसे भी स्वामीजीकी बातें हुईं। स्वामीजीने कहा "आप अपनी पुत्रीको लेकर मेरे साथ काशी चलें। मैं विठ्ठलपंतसे आपकी भेंट करा देता हूँ। इतना ही नहीं पत्नीका स्वीकार करनेको कहूंगा!" श्रीपादस्वामी, सिद्धेश्वरपंत और रुक्मिणीदेवीको साथ लेकर काशी गये। पिता-पुत्रीकी अलग रहनेकी व्यवस्था करके स्वामीजी आप आश्रम गये। आश्रममें जाते ही स्वामीजीने चैतन्या-
९ ज्ञानेश्वर
श्रमको बुलाकर पूछा "तुम्हारे घरमें कौन कौन हैं ?" प्रश्न सुनकर चैतन्याश्रम सहमसे गये । उन्होंने सोचा, गुरु श्रीपाद स्वामीका रामेश्वरकेलिये जाकर बीच यात्रासे लौटने और आते ही चैतन्या- श्रमको बुलाकर ऐसा प्रश्न पूछनेमें हो न हो कुछ रहस्य अवश्य है ! चैतन्याश्रमने भी सारी सच्ची घटना गुरु श्रीपादस्वामीसे निवेदन करके "पत्नीकी आज्ञा लेकर आया था।" कहते हुए श्री चरणोंमें प्रणाम किया । श्रीपाद स्वामीने शिष्यको उठाया, और अपने पिताके साथ काशी आयी हुई रुक्मिणी- देवीकी भेंट कराके कहा "इसका स्वीकार करो । निषिद्ध कर्म मानकर मनमें इसका भय न करो । पर- मेश्वर तुम्हारे साथ है। अपने गांवमें जाओ और सुखरूप स्वधर्म मानकर गृहस्था श्रमका पालन करो !" अपने गुरु पर संशयातीत श्रद्धा ही चैतन्याश्रमका पाथेय था । गुरु-आज्ञा ही उनके लिये शास्त्र था । दूसरा मार्ग वह नहीं जानते थे। इसलिये गुरु आज्ञाको उन्होंने शिर आंखों पर चढ़ालिया । गेरूवे वस्त्र उतारे । गृहस्थाश्रमका चोगा पहना । पत्नीके साथ अपने गांवमें आये । संन्यास छोड़कर गृहस्थाश्रम स्वीकार करना लोक-रूढ़ी तथा धार्मिक परंपराके विरुद्ध था । लोक-निंदा स्वाभाविक थी । यह एक महा-पाप था । धर्म-भीरु ब्राह्मण-समाजने उनको बहिष्कृत किया । विठ्ठलपंतने गांवके बाहर एक झोपड़ी बांधी । एकांतमें ब्रह्म-चिंतनमें जीवन बिताने लगे । ऐसे बारह वर्ष बीते । यह काल उनके लिये अत्यंत क्लेश-कारक था । यह बारह वर्षकी तपस्या आगे आनेवाले महापुरुषोंके निर्माणकी तपस्या थी । स्वर्गको भी तुच्छ माननेवाले योग-भ्रष्ट आत्मा सहज सेंत-मेंतमें अवतरित नहीं होते । बारह वर्षकी ऐसी तपस्या पूरी होनेके बाद शा. श. ११९५ में श्रीमुखसंवत्सर माघबद्य प्रतिपदा सोमवारके दिवस सूर्योदयके समय श्रीनिवृत्तिनाथका जन्म हुवा । इसके दो वर्ष बाद शा. श. ११९७ युवा संवत्सर श्रावण वद्य अष्टमी-कृष्णाष्टमी गुरुवारकी मध्यरात्रीके समय श्रीज्ञानदेवका जन्म हुवा । शा. श. ११९९ ईश्वरसंवत्सर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा रविवार प्रहर रातमें श्रीसोपानदेवका जन्म हुवा और शा. श. १२०१ प्रमाथी संवत्सर आश्विन शुक्ल १ शुक्रवार मध्यान्हमें श्रीमुक्ताईका जन्म हुवा । उपरोक्त जन्मतिथियां स्पष्ट होने पर भी निर्विवाद नहीं है । सामान्य नियमानुसार इस बातमें भी विद्वानोंमें मतभेद है । कुछ विद्वानोंने श्रीनिवृत्तिनाथ शा. श. ११९०, श्रीज्ञानदेव शा. श. ११९३ श्रीसोपानदेव शा. श. ११९६, श्रीमुक्ताई शा. श. ११९९ ऐसा जन्मकाल दिया है । दोनों ओरके विद्वानोंने अपने मत-प्रतिपादनमें पर्याप्त आधार दिये हैं और अंतमें यह भी कह दिया है कि इन दो कालके विषयमें एकवाक्यता करनेका प्रयत्न करना व्यर्थ है । शायद इन दो मेंसे कोई एक सच होगा या दोनों गलत होंगे ! अस्तु, प्रत्येक भाषाके साहित्यमें, प्रत्येक महत्वके प्रश्न पर, विद्वानोंके ऐसे निर्णय होते ही हैं, नहीं तो भला वह विद्वत्ता किस बातकी ? विद्वान भले ही किसी निर्णय पर पहुंचे । विठ्ठलपंतके ये चार संतान हुए थे इस बातमें तो किसीको कोई संदेह नहीं ! इन चारोंको ही महाराष्ट्रने आदर्श- पुरुष मानकर अक्षरशः सिर पर लिया । उनके महानिर्वाणके सात सौ वर्ष बाद भी आज उनकी समा- धियोंपर मेले लगते हैं, और लाखों लोग वहां जाते हैं । किंतु उन्ही बालकोंका बचपन अत्यंत करुणा- जनक स्थितिमें बीता । इनके जन्मके बाद माता-पिताको अनन्वित हाल सहने पड़े । किसीभी महान व्यक्तिको अपनी परंपराको तोड़कर नयी परंपरा निर्माण करते समय जो दुःख कष्ट उठाने पडते हैं, जो अपमान सहने पडते हैं, वे सब विठ्ठलपंतको सहने पडे ही। साथ ही साथ, इन अबोध बाल- कोंके भावी जीवनके विषयमें सोचकर उन्हे जो वेदनाएं हुई होंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती; क्यों कि जैसे संन्यास छोड़कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करने वालेका मुखावलोकन अथवा दर्शन पाप हे असगुन है, वही बात संन्यासीके लडकोंकी थी ! उनके नसीबमें भी माता पिताके ज्ञानेश्वरी ८
संचितकर्मके रूपमें वे सब दुःख, क्लेश, अपमान, बहिष्कार आदि स्वाभाविक था। ऐसे वातावरणमें वे बालक बड रहे थे। संभव है कि उन बालकोंको बाहर जितना डांट फटकार पडा, उससे अधिक घरमें प्रेमवात्सल्य तथा सहानुभूति मिली हो ! घरमें भारतीय वाङ्मयका गहरे प्रभाव भी पडे हों। रामायण और महाभारतके कहानियोंसे उनके मन बुद्धि खिली हो ! साथ साथ तीर्थयात्राके प्रेमी विठ्ठलपंतके साथ कुछ यात्राएँ भी हुई हो। किंतु विठ्ठलपंतके मनमें सदैव इन बालकोंका विचार रहा होगा ! इनका जनेऊ कैसे हो ? समाजमें इनका क्या स्थान है ? समाजसे होनेवाले बहिष्कार तिरस्कारसे इन बालकोंको बचानेके लिये तथा समाजमें उनको उचित स्थान दिलानेके लिये माता- पिताका तडपना स्वाभाविक है। इस लिये उन्होंने अत्यंत बचपनसे अपने ही बालकोंका विद्याध्ययन भी किया होगा। ४ तपश्चर्या और ब्रह्मदीक्षा- ऐसी स्थितिमें विठ्ठलपंत अपनी पत्नी और पुत्रोंको साथ लेकर त्र्यंबकेश्वर गये। त्र्यंबकेश्वर महाराष्ट्रका एक पुण्य-क्षेत्र है। परमपावनी गोदावरीका उगमस्थान, वहां ब्रह्मगिरि- पर्वत है। पवित्र पर्वत ब्रह्मगिरि, देह- दंडनसे पापक्षालनकनके विचारसे विठ्ठलपंत रातके समय उस ब्रह्मगिरीकी परिक्रमा करने लगे। ऐसे ही समय एक दिन अकस्मात शेर आनेसे परिवार अस्त व्यस्त हो भागने लगा। शेरसे बचनेके लिये भागने वाले निवृत्ति, गुहामें समाधिस्थ गहिनीनाथकी गोदमें जा पडे। गहिनी नाथ और निवृत्ति, अनेक पीढियोंका संबध । विठ्ठलपंतके दादा त्र्यंबकपंतको स्वयं गोरखनाथने उपदेश दिया था। गहिनीनाथ गोरखनाथके पट्ट शिष्य। निवृत्तिनाथके दादा गोविंदपंत और दादी नीरादेवीको गहनीनाथने उपदेश दिया था। जिसका परदादा गुरुबंधु और दादा शिष्य, और पिता ? गहिनीनाथके अनुग्रहसेही उनके माता पिताकी वृद्धावस्थामें हुई संतान था ! शायद गहिनीनाथने अनुभव किया होगा कि नाथपरंपराका पुण्य - फलही मेरे सम्मुख आ खडा है। गहिनीनाथने उस बालकको पास लेकर सिरपर हाथ रखा। दीक्षाके रूपमें नाथसंप्रदायका सारसर्वस्व उसको दे डाला !! बाघके भयसे गुहामें गये हुए निवृत्तिनाथ संपूर्ण निर्भय होकर गुहासे बाहर आये। गुहामें वे कितने दिन रहे इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। निवृत्तिनाथ घर आये और उन्होंने अपने सभी भाइयोंको “अपने जैसे ही किया है तत्काल !” वाली कहावत सच कर बताई ! किंतु विठ्ठलपंतकी दृष्टिसे निवृत्तिनाथ उपनयनके लिये योग्य था। गांवके ब्राह्मण, विठ्ठलपंत और इन बालकोंका मुखा- वलोकन भी पाप समझते थे। ऐसी हालतमें बालकोंका जनेउ कैसे हो ? आखिर अपने बालकोंके अभ्युदय निःश्रेयसके लिये विठ्ठलपंत ब्राह्मणोंकी शरण गये। बिना इसके दूसरा चारा ही नहीं था। ब्रह्म सभा बैठी। शास्त्रोंकी पोथियां खुलीं। किंतु धर्म-ग्रंथोंमें ऐसा कोई आधार नहीं मिला अथवा ऐसा कोइ प्रायश्चित्त नहीं मिला जिससे “संन्याससे गृहस्थाश्रममें आये हुए व्यक्तिका अथवा संन्यासीके लडकोंका शुद्धिकरण हो !” इसके पहले यदि ऐसी कोई घटना हुई होती तो शास्त्रोंमें ऐसा उल्लेख होता। शास्त्रकारोंने सामाजिक अभ्युदयको ध्यानमें रखकर वर्णाश्रम व्यवस्था बनाई। मनुष्यकी संपूर्ण शक्ति- यांका समाजके हितमें पूर्ण उपयोग हो इसलिये वानप्रस्थ और संन्यासकी व्यवस्था की। यदि किसीमें तीव्र वैराग्य उदय हुआ है तो, वह कुछ पहले चतुर्थाश्रम ले सकता है किंतु तीव्र वैराग्यसे चतुर्थाश्र- ममें गया हुआ मनुष्य भला संन्याससे गृहस्थ क्यों बनेगा ? इसके पहले कभी ऐसी समस्या पैदा ही नहीं हुई होगी ! अंतमें शास्त्रमें जिस महापापका कोई प्रायश्चित ही नहीं उसके लिये देहांत प्रायश्चित ही है ! पाप हुवा निश्चित। नहीं होनी चाहिये थी और अब तक नहीं हुई थी, ऐसी बात हुई है। विठ्ठलपंतको पश्चाताप हुवा है। वह प्रायश्चित्त चाहता है। शास्त्र कोई प्रायश्चित्त नहीं कहते। ९ ज्ञानेश्वर
तब देहांत प्रायश्चित्त ही है ! ब्राह्मणोंने विठ्ठलपंतसे कहा "शास्त्रमें आप तथा आपके परिवारको शुद्ध करलेनेका कोई प्रायश्चित्त नहीं है। इसके लिये देहांत प्रायश्चित्त एक मात्र प्रायश्चित्त है। अब आप विचार करके जो योग्य है सो कीजिये !" विठ्ठलपंत जन्मतः विरक्त । संन्यास लिया था तब संसारकी ममता टूट चुकी थी। संन्यास छोड़ा तब संन्यस्तका अहंकार भी समाप्त हुआ। केवल कर्तव्य-रूप जीवन बिता रहे थे। यदि उनके देहत्यागसे संतानका भला होता है, उनको अभ्युदय और निःश्रेयसका अधिकार मिलता है, तब वे कहां पीछे हटनेवाले थे ? उन्होंने ब्रह्मसभाको वंदन कर कहा " त्रिवेणीमें शरीर त्याग करके मैं यह प्रायश्चित्त लूँगा" ! और "पीछे मुड़कर देखनेके पहले" चल पड़े । उनकी धर्म-पत्नी उनकी छायाकी भांति उनके पीछे थी ही। विठ्ठलपंत शरीर त्यागके लिये आलंदीसे प्रयागराज तक चलते गये ! भारतके महापुरुषोंने भारतकी भावात्मक एकताकी नींव ऐसे डाली है ! ! शास्त्रज्ञोंने विठ्ठलपंतको देहांत प्रायश्चित्त कहा। पिताके विषयमें शास्त्रोंका यह कठोर निर्णय सुनकर भी ज्ञानेश्वर महाराज लिखते हैं - शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य-सुख-भोग तृण मानना । विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द विरुद्ध ॥ १६-४६० ॥ यहां महापुरुषोंके हृदयकी गहराई दीखती है। उनकी महानताका दर्शन होता है। ज्ञानेश्वरी एक मौलिक चिंतन है किंतु मौलिकताके नशेमें कहीं भी निष्ठा हीनता नहीं दीखती। परंपरापर आघात नहीं। वैचा- रिक कटुता नहीं। सदैव सर्वत्र उदार, विचार सभी प्रकारकी निष्ठाका पालन । यह ज्ञानेश्वरीकी विशेषता है। ५ जीवन समर्पण हुवा किंतु समस्या वैसी ही रही - माता पिताने त्रिवेणीमें देहार्पण किया किंतु संन्यासीके पुत्रोंकी सामाजिक अथवा धार्मिक समस्या वैसे ही बनी रही। ब्रह्मसभाके सम्मुख विठ्ठलपंतका जो प्रश्न था "इन लडकोंका क्या होगा ?" यह प्रश्न ही रहा। केवल प्रश्न कर्ता बदला ! पहले विठ्ठलपंतने ब्राह्मणसभासे यह प्रश्न पूछा था अब निवृत्तिनाथने पूछा ब्राह्मणोंने कहा "आप पैठण जाइये। पैठणसे शुद्धी-पत्र लाइये। तब हम आपका स्वीकार करेंगे। हमारे पास आपके प्रश्नका उत्तर नहीं है।" इस पर निवृत्तिनाथ विरक्त हुए। "देहाश्रित वर्णाश्रम विहित कर्मबंधनके फंदेमें फसनेकी हमें कोई आवश्यकता नहीं " निवृत्तिनाथने कहा। सोपान देवको भी "ब्राह्मणोंद्वारा पावन होनेकी आवश्यकता " प्रतीत नहीं हुई। किंतु ज्ञानदेव, इससे सहमत नहीं थे। उनका कहना था "स्वरूप लीन स्थितिमें इसकी आवश्यकता नहीं यह स्वीकार। किंतु विधिबाह्य आचरण दूषण है यह वेदका मत। कुल धर्म पावन है, यह शास्त्रवचन । संतोंको इसका पालन करना ही चहिये। यदि वही समा- जके पथप्रदर्शक, शास्त्रविरुद्ध चले तो लोगोंके सम्मुख कौनसा आदर्श होगा ? इसलिये इसका विचार आवश्यक है।" सबने ज्ञानदेवकी बात स्वीकार की। ये दस बारह वर्षके बालक पैठणके विद्वान ब्राह्मणोंसे न्याय मांगने निकले । बारह वर्षके निवृत्तिनाथ, दस वर्षके ज्ञानदेव, आठ वर्षके सोपान और छ वर्षकी मुक्ताई !! आलंदीसे पैठण। पैठणके विद्वान ब्राह्मण-सभाके सम्मुख निवृत्तिनाथने आलंदीके विद्वानोंका पत्र रखा। अपनी सारी बात कही । "संन्यासीका संतान" इस शब्दसे ही "माता पिता तथा उनके संतान दोनों कुल-भ्रष्ट है। उनको किसी प्रकारका कोई प्रायश्चित्त नहीं है ! !" ब्राह्मण सभाने यह निर्णय दिया । ज्ञानेश्वरी १०
“ किंतु हमारी गति क्या ?” निवृत्तिनाथका प्रश्न स्पष्ट था । इसका कोई उत्तर नहीं दे सकते । किंतु उत्तर न देना भी अल्पताका द्योतक है ? विद्वान इस अल्पताको कैसे स्वीकार करेंगे ? यदि किसी प्रश्नपर निरुत्तर रहे तो विद्वत्ता किस बातकी ? निरुपाय होकर विद्वानोंने कहा “शास्त्र सम्मत ऐसा एक ही उपाय है, परमात्माकी अनन्य भक्ति करना ! प्राणिमात्रसे नम्र होकर व्याकुल भावसे भजन करना । ब्राह्मण और चांडालमें भेद न करते हुए सबको प्रणाम करना ! ” सुनकर सबको संतोष हुआ । सबने प्रसन्न मनसे कहा ‘ हमको यह स्वीकार है !! ” ६ प्रवृत्ति चक्रप्रवर्तन- किंतु बात यहीं नहीं रुकी । ब्राह्मणसभाके बाद, वहीं कुछ लोगोंने, निवृत्ति ज्ञानदेवादि के नाम पर कुछ निंदा नालस्ती की । ज्ञानदेवकी सहज कही हुई बातको लेकर निवृत्ति ज्ञानदेवको चुनौति दी गयी और वहां ज्ञानदेवकी योग-सिद्धियोंके अनेक चमत्कार दिखाये । इससे पैठणके विद्वान लोग आश्चर्य चकित हो गये । इन छोटे छोटे बालकोंके नेत्र दीपक योगसामर्थ्यसे ब्राह्मणसभा हतबुद्ध हो गयी । हम यहां किस लिए एकत्र हुए थे यह भी सब भूल गये । ब्राह्मण सभाके सम्मुख जो प्रश्न था वैसे ही रहा और अनजानमें सभा विसर्जन भी हो गयी । इस घटनाके बाद, निवृत्ति ज्ञानदेवादि कुछ काल पैठणमें रहे । पैठणमें वे कुछ काल अध्यात्म- ग्रंथोंका अवलोकन करते, दोपहरको प्रवचन होता और रातको भजन, कीर्तन । इसके बाद, उस कालका महान विद्वान, पंडित बोपदेवने शुद्धिपत्र लिखा । “ये स्वर्गीय देव- त्रयका अवतार रूप हैं । इनको कौन और क्या शुद्धिपत्र दें ?” इससे निवृत्ति-ज्ञानदेवकी कीर्तिसुगंध चारों ओर फैल गयी । इन बालकोंने पैठण छोडा । चारों ओरसे इन्हें बुलावा आने लगा । पहले संन्यासीकी संतान कह कर अवमान होता था अब इसी बात पर सम्मान होने लगा । लोक-मानस सदैव झूलेकी भांति रहा है । वे चारों भाई बहन पैठनसे चले । जैसे पैठनमें ब्राह्मण-सभाने जो कुल-धर्म कहा था “सबको समान मान कर परमेश्वरकी अनन्य भक्ति ” यही एक व्यवसाय था । बिना इसके दूसरा कोई कार्य नहीं था । परमात्म भक्तिका कार्य करते करते इनका संचार प्रारंभ हुआ । ऐसा प्रवास करते करते वे प्रवरानदीके किनारे पर बसे नेवासा गांवमें आये । वहां ज्ञानदेवके गीताप्रवचनोंको लिख लेनेवाला सच्चिदानंद बाबा मिला । वहां शिवालयमें ज्ञानदेव प्रवचन करते और सच्चिदानंद बाबा उनको लिख लेते ! ऐसे शा. श. १२१२ में ज्ञानेश्वरी ग्रंथ तैयार हुआ । ज्ञानदेवकी वाणी सच्चिदानंद बाबाने लिपि-बद्ध की; ग्रंथ तैयार हुआ । संभवतः सच्चिदानंद बाबाने कृतार्थताका अनुभव करके समय देखकर—जब श्रीगुरु निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेवादि साथ बैठे थे तब-लिपि बद्ध वह ग्रंथ श्रीगुरुके सम्मुख रख कर प्रणाम करते हुए कहा “यह भावार्थ-दीपिका तैयार हो गयी है ।” इस पर श्रीगुरु निवृत्तिनाथने इस ग्रंथकी ओर आंख उठाकर देखनेके पहले ही कहा “मुकुंदराजका परमार्थसार विशुद्ध ग्रंथ है । उसमें अपने अनुभवके अलावा और कोई आधार नहीं है !” सच्चिदानंद बाबाने ग्रंथ उठालिया । ज्ञानदेवने इस बातको “केवल अपने अनुभवके आधार पर ग्रंथ लिखनेकी आज्ञा ” समझा और “अनुभवामृत” लिखा । अनुभवामृत ज्ञानेश्वर महाराजका अपना मौलिक ग्रंथ है । उसको किसीका आधार नहीं है । किंतु जन्म भर पढने पर भी उस छोटेसे ग्रंथका अभ्यास नहीं हो पाता । जितनी बार पढते हैं उतनी बार एक न एक नया अर्थ झलकता है । यह ग्रंथ चिंतनशील साधकको नित्य नया आनंद ११ ज्ञानेश्वर
और नया मार्गदर्शन देता है । इस ग्रंथ पर महाराष्ट्रके ४३ विद्वान, साधु संतोने, भाष्य लिखा है, फिर भी इसका अभ्यास करना रहा ही है !! कुछ विद्वान लोगोंका कहना है "नाथसंप्रदायका सारा तत्वज्ञान और अंतिम अनुभव इस ग्रंथमें देखनेको मिलता है।" कुछ विद्वान कहते हैं "इसमें आधुनिक विज्ञानके बीज देखनेको मिलते हैं।" इसके बाद जैसे कमलकी सुगंधसे भ्रमर खींचे जाते हैं वैसे महाराष्ट्रके संतजन ज्ञानदेवकी ओर खींचे जाने लगे । नामदेव परिवार, गोरा कुंभार, नरहरी सोनार, विसोबा खेचर, सावता माली, सेना नाई, बंका महार, जनाबाई, भागू महारीण, ब्राह्मणसे चांडालतक सारे स्त्रीपुरुष संत-जन निवृत्ति-ज्ञानदेवके चारों ओर सूर्य-किरणकी भांति एकत्र हुए ! और ज्ञानदेवकी कीर्ति सुगंध तापी तीरपर योग-साधनामें लीन चांगदेव तक पहुंच गयी ! वे अपनी योग-शक्तिके बल बूते पर प्रचंड शक्तियोंके स्वामी बने हुए थे । उन्होंने ज्ञानदेवके दिखाये हुए योग-चमत्कार सुने ! जो भैंसेके मुखसे वेद कहलाये ! ऐसे ये नये योगी कौन ? उन्होने ज्ञानदेवको पत्र लिखा । ज्ञानदेवने पत्रका उत्तर लिखा । ६५ छंद, ओबियां । उसको 'चांगदेव' पासष्टी कहते हैं । यह पढ़ कर चांगदेव चमत्कृत हो गये । इसकी भावानुभूति उनकी शक्तिके परेकी बात थी । उनकी जिज्ञासा बढ़ी । वे अपनी योगशक्तिका संपूर्ण परिचय देते हुए ज्ञानदेवसे मिलने आये । ज्ञानदेवने वैसे ही उनका स्वागत किया । चांगदेव दिखाना चाहते थे बुद्धिके बल बूते पर मैंने समग्र जीवसृष्टि पर स्वामित्व पाया है और श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी प्रेरणासे ज्ञानदेवने दिखाया भावुकके लिये निर्जीव ऐसा कुछ भी नहीं । मनुष्य अपनी भावशक्तिसे निर्जीवको भी सजीव बना सकता है । जीवसृष्टि पर स्वामित्व पाये हुए चांगदेव, निर्जीव सजीव यह भेद मिटाये हुए ज्ञानदेवकी शरण आये ! ज्ञानदेवने मुक्ताईके द्वारा चांगदेवको आत्मानुभव कराया । ७ तीर्थयात्रा और महा-यात्रा- नामदेव पंढरपुरका पगला । उसका सारा विश्व पंढरपुरमें । विठ्ठल उसका सर्वस्व । जो कोई मिला पंढरपुर ले चलो । वे निवृत्ति ज्ञानदेवको भी पंढरपुर लाये । पंढरपुरका अर्थ भजन कीर्तन ! वहां दिन रात भजन कीर्तन चलता रहता है । और ज्ञानदेव "हरिनाममें नित्यतृप्त !" पंढरपुरमें कुछ काल रहनेके बाद तीर्थयात्राकी बात सूझी । उनको तो समाजको मार्ग-दर्शन करना था अथवा अपने आनंदसे विश्व भरना था ! ज्ञानदेवने नामदेवको साथ बुलाया । नामदेव कहता है "मेरा प्राण पंढरपुरकी देहरीसे अटका है !" विश्वके अणुअणुमें आत्मदर्शन करने वाले ज्ञानदेव और विठ्ठलके अलावा सब कुछ सूना कहनेवाले नामदेव ! नामदेवको विठ्ठल वियोग असह्य ! अंतमें इसी विठ्ठलकी आज्ञासे नामदेव ज्ञानदेवके साथ यात्रामें गये । यह यात्रा छ साल तक चली । ज्ञानदेव नामदेवादिकी यह यात्रा बहता हुवा अमृत प्रवाह है । पंढरपुर, नाशिक, सह्याद्रीका सातपुडा पार करके, गुजरातका सोमनाथ, द्वारका, प्रभास, उज्जैन, प्रयाग, काशी, अयोध्या, गया, मथुरा, वृंदावन करके छ सालके बाद पुनः पंढरपुर आये । यहां ज्ञानदेवका जीवन कार्य समाप्त हुआ । पानेका सब कुछ कबके पा चुके थे, अब करनेका सब कुछ कर चुके । तब भला शरीर धारणाकी क्या आवश्यकता ? उन्होने श्रीगुरु निवृत्तिनाथ तथा पंढरीनाथसे चिर-समाधीकी आज्ञा मांगी । ज्ञानदेवने इंद्रायणीके किनारे आलंदीमें, माता जिस अश्वत्थकी परिक्रमा करती थी उस स्वर्ण अश्वत्थकी छायामें, पिताके श्रीगुरुने जहां बैठकर माताको "पुत्रवती भव" का आशीर्वाद दिया था वहां, उस अजानवल्लीके पास गुहामें समाधि-स्थान निश्चित किया । श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी आज्ञा लेकर कार्तिक वद्य त्रयोदशीका दिवस समाधि दिवस निश्चित किया गया । कार्तिक शुद्ध देवोत्थान एकादशीको पंढरपुर आयेहुए सारे संतजन एकादशीके उत्सव समाप्त करके ज्ञानेश्वरी १२
ताल तंबोरा मृदंगके साथ, धर्म-पताका कंधोंपर लिये हुए, पंढरपुरसे आलंदी आये। आलंदीका इंद्रायणी नदी किनारा 'राम कृष्ण हरि" से गूंजने लगा। "श्रीहरि विठ्ठल जय हरि विठ्ठल" के जय घोष आकाशसे भिड़ने लगे। सारे संत सज्जन इंद्रायणीके किनारे अश्रुभरी आंखोंसे "उस काल" की प्रतीक्षा करने लगे। क्षण क्षण युगसा लगता था। अंतमें समय आया। ज्ञानदेव उठे। शांत, धीर, गंभीर, नयना- भिराम, स्फुरद्रूपी युवक, धीरे धीरे कदम बढाकर अपने अग्रज, श्रीगुरु, जिनकी कृपासे शब्दोंसे कही नहीं जा सकनेवाली बात शब्दचित्रोंसे सुननेवालोंकी आंखोंके सम्मुख प्रत्यक्ष ला रखी, ऐसी गुरु-माउली श्रीनिवृत्तिनाथके चरणोंमें झुककर चरणपर मस्तक रखा चरण वंदना की। अंतिम चरण-वंदना ! अखंड चरण वंदना ! सागरकी भांति, सदैव अपनी सहज साम्यावस्थामें स्थिर गंभीर मर्यादामें रहनेवाले श्रीगुरु निवृत्तिनाथने भी, इस समय चंद्र देखकर उछलनेवाले सागरकी भांति, गुरु शिष्यकी सारी सीमाओंको तोडकर, ज्ञानदेवको, अपने छोटे भाईको, अपने एकमात्र शिष्यको, उठाकर गले लगाया। बाल संवारे, मोक्ष सिंहासनकी महायात्रामें निकले हुए इस यात्रीके अंग अंग स्पर्श करके गुरु-स्पर्श कवचसे अजय किया ! अमर किया ! सोपान और मुक्ताईने अपने अग्रज और श्रीगुरुके चरणस्पर्श किये। "तुम्हे भी यह सुख मिलेगा एक दिन।" ज्ञानदेवने उन्हे आशीर्वाद दिया। आश्वासन दिया। श्रीगुरु निवृत्तिनाथ अपने एक मात्र प्रिय शिष्य, अपने ब्रह्मानुभवका सर्वस्व-धरोहर, ज्ञानदेवको समाधिके सुखासन तक ले गये। वह सुखासन प्रातःकालसे नामदेवके पुत्रोंने लीप पोत कर शुद्ध किया था। महाराष्ट्रके संतोंने उस पर कोमल तृणांकुर बिछाकर सजाया था। प्रत्येक संतने अपना अपना तुलसी पत्र रखा था। महाराष्ट्रके सभी संतोंके सद्भाव, श्रद्धा, आशीर्वादसे, शाश्वत सुखके लिये सजाया गया वह "संजीविनी समाधि" का अखंड दीर्घ समाधीका सुखासन, उस पर श्रीगुरु निवृत्ति नाथने अपने शिष्यको बिठाया। ज्ञानदेव उस समधिके सुखासन पर बैठे। श्रीगुरुनिवृत्तिनाथकी चरण-वंदना कर ज्ञानदेवने एक सौ एक छंदोंका संत वंदन किया। सारा संत समाज सांस रोक कर अपने आराध्यदेवका अंतिम वंदन स्वीकार कर रहा था आंखें अश्रु सुमनांजली अर्पण कर रही थीं। वंदन समाप्त हुवा। ज्ञानदेवकी धीर गंभीर वाणी गूंज उठी। अजी ! ध्यानसे चित दीजिए ! सबसुखका पात्र बनिए ! प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये ! प्रकट बात ॥ ज्ञानेश्वरीका नौवा अध्याय। राज-विद्या, राजगुह्य- ईश्वर-समर्पणयोग, जीवन साधनका सार सर्वस्व। ज्ञानदेव वह गाने लगे। सारे संत समाजको दिया गया उस योगेश्वरका यह अंतिम संदेश। संत जन अपने कोटि कोटि रोमकूपोंके कान बनकर वह सुनने लगे। आंखें अश्रु सुमनोंकी माला गुंथने लगीं, प्राण अकुलाकर तडपने लगे। मन, बुद्धि, भाव, चित्त, अंतःकरण, सारा वातनामय सा अनुभव होने लगा। अजी देना अवधान। चढना आनंद सिंहासन । झाली दैवाने माला श्रवण- । इंद्रियको आज ॥ नौवा अध्याय पूर्ण हुवा। श्रीगुरुनिवृत्ति नाथने, जिनकी कृपासे ज्ञानदेवका शरीर भी इतना दिव्य हो गया था कि "जिसे मृत्यु भी छूनेफा साहस नहीं कर सकती थी" समाधिद्वार पर पत्थर रख कर उसे सर्वदाके लिये बंद कर दिया। और अब तक रुकी हुई संतवाणी कल्पांतके पानीकी भांति आकाशको चीर कर ब्रह्ममें लीन हो गयी। पुंडलीक वरद पांडुरंग हरि विठ्ठल !!! १३ ज्ञानेश्वर
इस महोत्सवके एक ही महिनेमें मार्गशीर्ष वद्य त्रयोदशीको आलंदीके पास सासवडमें श्री सोपानदेवने भी वही शाश्वत सुख पाया। सोपानदेवकी इस मोक्ष-तिथिके पांच महिने बाद वैशाख बद्य द्वादशीको तापी नदीके किनारे पर बिजली कडकी और मुक्ताई खो गयी। स शरीर समाधि। और ठीक एक महिने बाद, वह आदर्श श्रीगुरु निवृत्ति नाथ, अपने शिष्यको तथा उनके शिष्योंको भी, अंतिम स्थान तक मार्गदर्शन करके, वहां पहुंचने तक उनको अपना संरक्षण देकर, आगे आगे लडखडाते चलनेवाले अबोध बालक पर अपनी प्रेम दृष्टिकी छाया करके पीछे चलनेवाली ममता मयी मांके भांति, वे जहांसे आये वहां पहुंचाकर, उन्होंने "ज्यों की त्यों धरि दीन्ही चदरियां" यह देख कर कृतार्थ भावसे, त्र्यंबकेश्वरमें महा-लीन हो गये। तब नामदेवका हृदय अकुलाकर गा उठा अस्त हुवा भानु पढा है अंधार। गये निवृत्तिनाथ योगेश्वर ॥ और विठ्ठलका वह एकाकी सुभट, नामदेव, सारे भारत वर्षमें विठ्ठल-नाम गूंज उठे इस महान संकल्पसे, पंढरपुरसे पंजाब तक, भजन गाते गाते चले और अंतिम क्षणमें पंढरपुरमें आकर सपरिवार विठ्ठल चरणोंमें लीन हो गये ।
८ ज्ञानेश्वर चरित्रके कुछ विवाद प्रश्न- ज्ञानेश्वरके विषयमें इतना लिखनेके बाद उनके जीवनके विषयमें अब तक जो वाद- विवाद चले हैं उसका कुछ उल्लेख करना भी आवश्यक है, नहीं तो वह अधूराही रहेगा। ज्ञानेश्वरके जन्म-स्थानके विषयमें भी महाराष्ट्रके विद्वानोंमें एक वाद है। ज्ञानेश्वरका जन्म कहां हुवा था ? आपेगांव या आलंदी ? कुछ विद्वान लिखते हैं कि “आपेगांवमें ज्ञानेश्वरादि चार बंधुओंका जन्म हुवा" तो कुछ विद्वानोंका मत है कि "इन बंधुओंका जन्म आलंदीमें" हुवा। निवृतीनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव तथा मुक्ताईके साहित्यमें इस विषयमें कुछ भी उल्लेख नहीं है। तथा समकालीन संत नामदेव, जिन्होंने निवृत्ति ज्ञानदेवके विषयमें ही नहीं उनके माता पिताके विषयमें भी बहुत कुछ कहा है; किंतु उसमें कहीं भी इसके विषयमें कुछ भी उल्लेख नहीं है; किंतु विद्वान लोग उस समयकी परिस्थितिका विचार करके "अपने मतसें" निर्णय करते हैं कि "उनका जन्म आपेगांवमें हुवा अथवा आलंदीमें हुवा !" साथ साथ वे समकालीन संत वचनोंका ऐसा आधार लेते हैं कि जनसामान्यको उन्हीका कहना सच लगे ! किंतु आलंदीमें आज भी ज्ञान- देवके नानाके घरकी जगह और उनका जन्म-स्थान दिखाया जाता है। और एक जगह ऐसी दिखाई जाती है कि जहां श्रीविठ्ठलपंतकी झोपडी थी और वे वहां अपने पुत्रपुत्रीके साथ रहते थे। उस स्थानको सिद्धबेट कहा जाता है।
वैसे ही, उनके जन्मस्थानकी तरह जन्म दिनका भी एक वाद है। उनका जन्म दिन (१) निवृत्तिनाथ श. श. १११५ श्रीमुखसंवत्सर, माघवद्य १ सोमवार प्रातः काल (२) ज्ञानदेव शा. श. १११७ युवा संवत्सर श्रावण वद्य ८ गुरुवार मध्यरात्र, (३) सोपानदेव शा. श. १११९ ईश्वर संवत्सर कार्तिक शुद्ध १५ रविवार प्रहर रात्र, (४) मुक्ताई शा. श. १२०१ प्रमाथी संवत्सर आश्विनशुद्ध १ शुक्रवार मध्यान्ह है अथवा (१) निवृत्तिनाथ शा. श. १११० (२) ज्ञानदेव शा. श. १११३ श्रावण व ८ मध्यरात्र. (३) सोपानदेव शा. श. १११६ और (४) मुक्ताई शा. श. १११९ है ! इस विषयमें भी विद्वानोंमें मतभेद है।
ज्ञानेश्वरी २४
इसके साथही साथ निवृत्ति ज्ञानदेवादिके पिता श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षा-गुरुके विषयमें भी एक वाद है। निवृत्ति ज्ञानदेवके समकालीन संत नामदेव श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षा-गुरुके विषयमें कहते हैं "श्रीपाद गुरु !" यह नाम तीन चार स्थान पर आया है। नाथ संप्रदायके दूसरे एक संत- ज्ञानेश्व- तरकालीन निलोबा कहते हैं "नृसिंहाश्रम" ने विठ्ठलपंतको दीक्षा देकर "चैतन्याश्रम" बनाया। संत नामदेव भी विठ्ठलपंतका संन्यासाश्रमका नाम "चैतन्याश्रम" कहते हैं। किंतु भारतीय अर्वाचीन कोशमें श्री र. भा. गोडबोले कहते हैं कबीरदासके गुरु श्री रामानंद श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षागुरु थे ! इस पर अनेक विद्वानोंके कथनका विचार करने पर ऐसा लगता है कि ज्ञानदेवका जन्म कबीरदासके जन्मसे सामान्यतया १२५ वर्ष प्रथम हुवा था। श्री विठ्ठलपंतकी संन्यासदीक्षा इससे ३० वर्ष प्रथम हुई थी। इस दृष्टिसे विचार किया जाय तो कबीरकी दीक्षाके समय श्री रामानंद करीब १८० वर्षके रहे होंगे जो संभव नहीं दीखता। साथ साथ ज्ञानदेव और रामानंदके तत्त्वज्ञानका भी कहीं कोई संबंध नहीं है। महाराष्ट्रके विद्वानोंने अनेक दृष्टिसे विचार विनिमय करके इस बातको अस्वीकार कर दिया है! ऐसे करते समय महाराष्ट्रके विद्वानोंने, सर्वश्री हरिऔध, मिश्रबंधु, श्यामसुंदरदास, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामकुमार वर्मा, पुरुषोत्त- मदास श्रीवास्तव आदि हिन्दी विद्वानोंके पर्याप्त उद्धरण दिये है और रामानंद और ज्ञानेश्वरके कालके अंतरके साथ ज्ञानदेवको विठ्ठलपंतसे रामानंद संप्रदायके सिद्धांतोंका जरा भी बोध न होनेकी बात भी कही है।
इसके अलावा और एक वाद है, और वह है ज्ञानदेव अथवा ज्ञानेश्वर एक ही व्यक्ति है या दो भिन्न व्यक्ति ! इस पर विद्वानोंने खूब लिखा है। इसमें योगी ज्ञानेश्वर और भक्त ज्ञानेश्वर ऐसा भेद भी किया है। इस पर परस्पर विरोधी ऐसा इतना अधिक लेखन हुवा है कि उसका उल्लेख करना भी कठिन है। उसमें दिये गये कई उदाहरण केवल विद्वानोंको ही शोभा देते हैं। साथ साथ ज्ञानेश्वरीमें कहीं भी विठ्ठलका नाम निर्देश न होनेका भी एक कारण है, क्यों कि ज्ञानदेवके अभंगोंमें सर्वत्र विठ्ठल है। किंतु नाथ संप्रदाय स्वयं योग और भक्तिका सुंदर समन्वय है और भक्त ज्ञानदेवके अभंगोंमें योगके अनेक रहस्य कहे गये हैं जिसके बीज ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतमें हैं। पू. विनोबाजीने “ज्ञानदेवाचे अभंग” इस पुस्तकमें लिखा है "ज्ञानदेवके इन अभंगोंके अध्ययनके बिना उनके योगका पूर्ण बोध होना संभव नहीं !” वस्तुतः योग और भक्ति परस्पर भिन्न है यह कल्पना ही अज्ञानजन्य है। योगी ज्ञानेश्वरकी ज्ञानेश्वरीमेंसे कई स्थान पर भक्तिका पवित्र झरना फूट पडता है तो भक्त ज्ञानेश्वरके अभंगों- मेंसे योगके अनेक रहस्य खुलते हैं ज्ञानेश्वरीमें जिस गवाक्षका पर्दा नहीं उठा है। किंतु विद्वान लोगोंकी तर्क शक्तीकी मोहिनी इतनी प्रबल है कि वह व्यास पीठपर एक ज्ञानेश्वरकी घोषणा करनेवालोंको भी खानगी बातोंमें “अभंग, ज्ञानेश्वरी लिखनेवाले ज्ञानदेवके नहीं हो सकते" कहनेके लिये ललचाती है।
अस्तु, इसके साथ ही साथ ज्ञानेश्वरी नेवासामें लिखी गयी या आपेगांवमें ? ऐसा भी एक वाद है किंतु ज्ञानेश्वरी की अंतिम ओवियोंमें जो ज्ञानेश्वरीका स्थल काल कहती है उस ओवीका एक एक शब्द लेकर, उसके साथ ही साथ नेवासा क्षेत्र महात्म्यके महालया महात्म्यके श्लोकोंको दिखाकर विद्वानोंने ज्ञानेश्वरीका जन्मस्थान नेवासा होनेका सिद्ध किया है। साथ ही साथ सैकडो वर्षोंसे वहांके एक शिवालयमें एक खंभा था जिसके पास बैठकर ज्ञानेश्वर ज्ञानेश्वरी कहते थे। आगे मुसलमानोंने उस जगह पर अपना स्वामित्व स्थापन किया और वहाँ नमाज पढने लगे। परिणाम स्वरूप शांतता भंग होनेकी नौबत आयी । १९१७ में उस सम- यके जिलाधीशने वह जगह सरकार जमा की। न्यायालयमें मुकदमा चला। अपील हुआ और अंतमें
१५ ज्ञानेश्वर
अध्याय १: अर्जुनविषादयोग
बंबईके बडे न्यायालयमें १९३८ को वह स्थान ज्ञानेश्वर भक्तोंके हाथमें आया । न्यायालयके इस विषयक निर्णयमें न्यायमूर्तिने स्पष्ट रूपसे मान्य किया है “ज्ञानेश्वरने पैठणसे आलंदी आते समय नेवासाके शिवमंदिरमें ज्ञानेश्वरी कही और वह नेवासा गांवका कुलकर्णी सच्चिदानंद बाबाने लिखी ऐसा इतिहास कहता है !” और ज्ञानेश्वरीमें इसका उल्लेख है ।
९ ज्ञानेश्वरी-
संत ज्ञानेश्वर और उनके विषयमें कई वादोंका विचार करनेके बाद ज्ञानेश्वरीके विष- यमें भी कुछ लिखना आवश्यक है और ज्ञानेश्वर विषयक वादोंका संबंध अनुवादकके कार्यसे कुछ भी नहीं आ सकता किंतु.ज्ञानेश्वरी विषयक वादका अनुवादकके कार्यसे संबंध आता है । ज्ञानेश्वरी महाराष्ट्रका प्रसिद्धतम ग्रन्थ है । इस ग्रन्थके विषयमें सामान्यतया मराठी भाषा भाषी प्रत्येक मनुष्यके हृदयमें एक अभिमान और आदर भाव है, और महाराष्ट्रमें “सच्ची ज्ञानेश्वरी कौनसी ?” इस विषयमें आजकल विद्वानोंमें अत्यंत मतभेद है । महाराष्ट्रमें स्थान स्थानपर अब तक ज्ञानेश्वरीकी ३२ हस्त लिखित प्राचीन पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं । इनमें सबसे प्राचीन पांडुलिपि संभवतः शा. श. १५५१ की लिखी हुई है और अंतिम प्रति शा. श. १७८२ की है । इनमेंसे चार प्रतियां ज्ञानेश्वर महाराजके भक्त मंडलके मठोंमेंसे प्राप्त हैं । तथा १२ देशके भिन्न भिन्न अनुसंधान संस्थानोंसे मिली हैं । अन्य व्यक्तिगत संग्रहकी है । इन ३२ ग्रन्थोंमें कमसे कम ओवियां ८९३२ हैं और अधिकसे अधिक ९५३५ हैं । स्थान स्थानपर अनेक पाठभेद हैं । गीताके श्लोकोंके साथ ओवियोंका अर्थ मेल न खासके इतना ओवियोंके स्थानांतर भी हुए हैं। इन सब पांडुलिपियोंको देख कर इनका संशोधन कर एक ग्रन्थ तैयार करना है । किंतु इसमें वादका विषय दूसरा ही है और वह कुछ हदतक भावात्मक है । इसके लिये. ज्ञानेश्वरीकी अध्ययन परंपराका इतिहास देखना आवश्यक-सा है । ज्ञानेश्वर महाराजने शा. श. १२१२ में-इ. स. १२९०-अपने ज्ञानेश्वरीप्रवचन समाप्त किये और कुछ वर्षोंमें महाराष्ट्र पर उत्तरसे मुस्लीम आक्रमण हुवा । इस आक्रमणकी तीव्रता ई. स. के १६ वे सदीमें कुछ कम हुई और ज्ञानेश्वरी ग्रंथकी ओर सामूहिक दृष्टिसे महाराष्ट्रका ध्यान गया । उस समय तक स्थान स्थान पर व्यक्तिगत रूपमें ज्ञानेश्वरीका पाठ आदि होता हीं होगा । संत नाम- देवके अनेक अभंगोंपर ज्ञानेश्वरीका प्रत्यक्ष प्रभाव दीखता है । कहीं कहीं तो ज्ञानेश्वरीके शब्दोंमें नामदेवने अपने अभंग गाये हैं । ई. स. १३५० तक नामदेवने इस तरह ज्ञानेश्वरीका प्रचार किया है और उन्होंने उत्तरमें भारतभर सर्वत्र भ्रमण किया है । उसके बादके साहित्यपर ज्ञानेश्वरीका ऐसा कोई प्रभाव नहीं दीखता । नामदेव ज्ञानेश्वरके करीब दो सौ वर्षके बाद, महाराष्ट्रमें और एक महान संत-पुरुषका जन्म हुवा और वे हैं संत एकनाथ महाराज । संत एकनाथ विद्वान थे । संस्कृतका भी अच्छा खास अध्ययन था । श्रीजनार्दन स्वामीके शिष्य। श्रीजनार्दन स्वामी विद्वान और अधिकार संपन्न श्रीगुरु । महाराष्ट्रमें यह श्रद्धा है कि स्वयं दत्तात्रेयसे उन्हे अकर्तात्मक बोधका रहस्य प्राप्त हुवा था और इन्ही श्री जनार्दनस्वामीके श्रीमुखसे एकनाथ महाराजने ज्ञानेश्वरी सुनी है । एकनाथ महाराज छ वर्षतक श्रीजनार्दन स्वामीके श्रीचरणोंमें रहकर आत्मबोध प्राप्त करनेके बाद वहांसे घर आये । ज्ञानेश्वर महाराजकी भांति एकनाथ महाराजका जीवन भी महाराष्ट्रको परम पावन है । एकनाथ महाराजके भागवतपर ज्ञानेश्वरीका अत्यधिक प्रभाव है । एकनाथ महाराजके साहित्यिक कार्यको ही देखा जाय तो उन्हे मराठी भाषाका व्यास कहा जा सकता है । उनकी करीब १ लाख ओवियां हैं ! उसके अलावा अभंग और भारूड
ज्ञानेश्वरी १६
ज्ञानेश्वर महाराजकी समाधिके करीब तीन सौ सालके बाद एक दिन एकनाथ महाराजको स्वप्न हुवा । स्वप्नमें ज्ञानेश्वर महाराजने कहा “ अजान वृक्षकी जड मेरे गलेमें जा रही है। मुझे बडा कष्ट हो रहा है ! तू आकर वह जड निकाल । ” एकनाथ महाराज, साथ कुछ लोगोंको लेकर आलंदी गये । उस समय समाधिस्थान पर जंगल बढ गया था । इस स्वप्नके बाद एकनाथ महाराजने वह जंगल काटकर उसको साफ कराया । ज्ञानेश्वर महाराजकी समाधिका वह पत्थर खोला जो श्री गुरु निवृत्तिनाथने लगाया था । वे समाधिमें गये । अजान वृक्षकी जो जड ज्ञानेश्वर महाराजकी गलेमें लग रही थी वह निकाली । उसी समय ज्ञानेश्वर महाराजने एकनाथ महाराजको ज्ञानेश्वरीकी प्रति तैयार करनेका आदेश दिया और एकनाथ महाराजने उस समय उपलब्ध अनेक प्रतियोंकी सहायतासे ज्ञानेश्वरीकी शुद्ध प्रति तैयार की । ” महाराष्ट्रके भावुक ज्ञानेश्वर भक्तोंमें यह घटना आदरसे कही सुनी जाती है। साथ ही साथ ज्ञानेश्वरीका वही पाठ अबतक प्रचलित रहा है जो यह माना जाता है कि ज्ञानेश्वर महाराजके आदेशसे एकनाथ महाराजने संशोधन करके प्रचलित किया था । इस घटनाके कई सौ वर्षके बाद महाराष्ट्रके प्रसिद्ध इतिहास संशोधक श्री. राजवाडेको बीडमें ज्ञानेश्वरीकी एक प्रति मिली । उन्होंने अपनी ऐतिहासिक दृष्टिसे विवेचन विश्लेषण करके “ एकनाथ पूर्वकालीन भाषा होने से ” तथा “अन्य कई वैज्ञानिक कारणोंसे ” यही ज्ञानेश्वरीकी असली प्रति होनेका निर्णय करके उसको प्रकाशित किया । इस पुस्तककी प्रस्तावनामें इतिहासाचार्य श्री. राजवाडेने “ वह शा. श. १२१२-१२४० के मध्य लिखी गयी थी” ऐसा लिखा है। इसके बाद कई विद्वानोंने इसीको “ असली ज्ञानेश्वरी ” मानना और कहना प्रारंभ किया और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिसे ज्ञानेश्वरीका विचार होना प्रारंभ हुवा । परिणाम स्वरूप ज्ञानेश्वरीके विषयमें कई वाद निर्माण हुए । इसमें ज्ञानेश्वरकालीन भाषा तथा एकनाथ कालीन भाषाका भी एक प्रश्न था । इससे, प्राप्त पांडुलिपियोंका दो खंडोंमें विभाजन हुवा । एकनाथ पूर्वकालीन ज्ञानेश्वरीकी प्रतियां और एकनाथोत्तर ज्ञानेश्वरीकी प्रतियां । इन सब बातोंमें यहां यह बात ध्यानमें रखना अत्यंत आवश्यक है कि “सुदैवसे श्रीसच्चिदानंद बाबाकी लिखी हुई अथवा तत्समकालीन ज्ञानेश्वरीकी प्रति अब तक नहीं मिली, वैसे ही प्रत्यक्ष एकनाथ महाराजने अपने हाथसे लिखी हुई ज्ञानेश्वरीकी शुद्ध प्रति भी उपलब्ध नहीं है” वह नष्ट होते समय, उससे पहले, उसकी जो नकल बनाकर रखी गयीथी वही आज उपलब्ध है। ऐसे समय संभव है कि नकल करते समय बुद्धिदोष, दृष्टिदोष तथा हस्तदोषसे कुछ गलतियां रह गयी हों अथवा पाठभेद हुवा हो । आगे चलकर ज्ञानेश्वर भक्तोंने परंपरासे पैठणके श्रीएकनाथ महाराजके मठमें जाकर उनके घरमें बैठकर कुछ प्रतियां बना लीं; इससे आज उपलब्ध प्रतियोंमें कुछ प्रतियां श्रीएकनाथ महाराजकी प्रतिसे मिलती जुल्ती हैं तो कुछ इतिहासाचार्य राजवाडेजीकी प्रतिसे मिलती जुल्ती हैं। ई.स.१९०८-९ में राजवाडे प्रतिका प्रकाशन हुवा अर्थात् उसके बाद ही यह वाद चल पडा । अनेक विद्वानोंने “ वही प्रति सच्ची ज्ञानेश्वरी मान कर ” उसमें जो छंद नहीं हैं वे सब “ प्रक्षिप्त हैं ” ऐसे कहना प्रारंभ किया भले ही वे छंद मूल विषय और तत्त्वज्ञानका सुंदर विवेचन करते हों ! और परंपरागत-सांप्रदायिक ! -विचारवंतोंने राजवाडे प्रतिमें जो विसंगतियां या असंगतियां हैं उनका स्पष्टीकरण कर दिखाया ! और वाद बढता गया । आग्रहपूर्वक, तर्कशुद्ध या तर्क-कर्कश शब्दोंका पिरामिड रचा गया और सत्य उसके नीचे दब गया । एक प्रकारसे “ राजवाडे प्रति विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी " हो गयी । विद्वानोने सच्ची ज्ञानेश्वरीके प्रकाशन के लिये सरकारके पास दौड लगायी । १७ ज्ञानेश्वर (३) १०७४
मं. सरकारने उसके लिये एक “ज्ञानेश्वरी संशोधन मंडल” बनाया । उस मंडलमें सभी महाराष्ट्रके वयोवृद्ध प्रकांड पंडित ही हैं । उन्होंने इतिहासाचार्य राजवाडे प्रतिसे मिलती जुलती पांच प्रतियोंका विचार करके, प्रयत्नपूर्वक और निष्ठापूर्वक उन सबका संशोधन करके सरकार मान्य एवं विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरीका प्रकाशन किया । १० अनुवादकका अंतर्द्वन्द्व- ज्ञानेश्वरी विषयक यह वाद और इतिहास देखनेके बाद प्रस्तुत अनुवादकके सम्मुख एक प्रश्न था अनुवादके लिये कौनसी ज्ञानेश्वरी चुने ? अनुवादकने खूब सोचा, कुछ बुजुर्ग गुरुजनोंसे भी बात की और "विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी" और "लोकमान्य ज्ञानेश्वरी" दोनोंका अध्ययन किया । अंतमें " केवल विद्वानोंके विरोधसे बचनेके लिये" अनुवादके लिये विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी चुनी ! उसके ४-५ अध्यायोंका अनुवाद हुवा और इसी बीच ऐसे ही एक विद्वानसे मिलनेका मौका आया । ज्ञानेश्वरीके अनुवादके विषयमें चर्चा चली तो मैंने कहा-सरकारी ज्ञानेश्वरी ली है।” मेरा वह उत्तर सुनकर वे कुछ झल्लाये । मूल राजवाडेकी प्रति क्यों नहीं ली ? वही असली ज्ञानेश्वरी है । यदि शिवाजी महाराजने अपने हस्ताक्षरमें "शि" दीर्घ लिखा हो तो किसी विद्वानको वह ह्रस्व करनेका क्या अधिकार है !! अर्थात् शिवाजी महाराजका हस्ताक्षर जितना प्रामाणिक उतना ही राजवाडे ज्ञानेश्वरी प्रति प्रामाणिक ! यह उक्त विद्वान सज्जनका तर्क था । साथ साथ उस प्रकांड विद्वन्महाशयका यह भी एक तर्क था कि सरकार द्वारा संघटित उस मंडलमें महाराष्ट्रके सभी विद्वान नहीं थे। उस कमेटीके बाहर कोई गेलेलियो भी हो सकता है ? वस्तुतः गेलेलियो कभी किसी कमेटीका मेंबर तो नहीं बना अर्थात् जिस किसीको किसी कमेटी पर जानेका भाग्य ही नहीं मिला हो तो उसे अपने आपको गेलेलियो मान लेनेका अधिकार मिलही गया और अनुवादक भी कभी किसी कमेटीका सदस्य नहीं बना और आगे भी ऐसी कोई संभावना नहीं है । तब वह अपने आपको क्यों गेलेलियो न मान लें ? अस्तु; इन सब बातोंमें मुझे उक्त सज्जनसे और एक जानकारी मिली । फ्रान्ससे एक विद्वान सज्जन डॉ. द लेरे सात वर्षसे पूनामें रह कर मराठी भाषा सीख करके ज्ञानेश्वरीका फ्रेंच भाषामें अनुवाद कर रहे हैं । इसी उद्देश्यसे वे फ्रांससे पूना आये हैं। यह सब कहनेकें बाद मुझे उक्त सज्जनने बडे त्वेषके साथ कहा " डॉ. द लेरे ने भी श्री. दांडेकरकी प्रति ली है ! जो आता है वह दांडेकरकी प्रति लेता है या सरकारी प्रति लेता है ! जब राजवाडेकी सच्ची ज्ञानेश्वरी मिली है तब किसीको दूसरी ज्ञानेश्वरी लेनेका क्या अधिकार है ?" यह सब सुनकर मैं घर आया। पच्चीस रुपये देकर 'श्री. दांडेकर प्रति' खरीद ली । श्री. शं. वा. दांडेकरजी स्वयं सरकार द्वारा नियुक्त ज्ञानेश्वर संशोधन मंडलके अध्यक्ष हैं किंतु उन्होंने अपनी ओरसे श्री. एकनाथ महाराज द्वारा संपादित प्रति आवश्यक संपादन तथा गद्यानुवाद करके प्रका- शित की है । उसकी प्रस्तावनामें लिखा है “ ज्ञानेश्वरी संशोधनकार पैठणके श्री. एकनाथ महाराजकी समाधिके तीस वर्ष बाद ही उनके घरमें बैठकर उतारी गयी प्रति मिली थी । उसके आधारपर उसकी नकल करके तैयार की गयी प्रति श्री वेंकट स्वामीने - श्री. दांडेकरजीके गुरु बंधु-प्रकाशित की थी उसीको यहां जैसेके वैसे - अक्षर छापनेकी पुरानी पद्धति छोड़कर प्रकाशित किया गया है !" इस ज्ञानेश्वरीकी कीमत २५ रुपये अब ३० रुपये और सरकारी ज्ञानेश्वरी कोई आवृत्ति पांच या कोइ आवृत्ति आठ रूपयोंमें मिलती है फिर भी श्री दांडेकरकी ज्ञानेश्वरी १९५६ से १९६९ तक ज्ञानेश्वरी १८
करीब तीस हजार बिक गयी हैं। वैसे ही अन्य कुछ ज्ञानेश्वरी प्रतियां जो इसी एकनाथ महाराजकी संशोधित आवृत्तियां हैं हजारोंकी संख्यामे बिक रही हैं यद्यपि सरकारी ज्ञानेश्वरीसे उसकी कीमत दूनी तो है ही श्रीएकनाथ महाराज स्वयं विद्वान होनेके साथ महान संत भी थे। इसके अतिरिक्त श्रीएकनाथ महाराजने अपने श्रीगुरु जनार्दनस्वामीसे भी ज्ञानेश्वरी सुनी थी । तथा श्रीएकनाथ महाराजके बाद संत तुकाराम और समर्थ रामदासने भी वही ज्ञानेश्वरी पढी और उससे स्फूर्ति ली। आधुनिक युगमें भी श्री साखरे बुवा, श्री. विष्णुबुवा जोग, श्री. बंकट स्वामी, तथा सरकारी ज्ञानेश्वरी संशोधन मंडलके अध्यक्ष श्री दांडेकर जैसे विद्वान भी श्री. एकनाथ द्वारा संशोधित आवृत्ति पढते रहे, महाराष्ट्रके ज्ञानेश्वरभक्त, जो लाखों हैं श्रद्धा भक्तिसे उसीका नित्यपाठ करते हैं। एकनाथ कालसे आज तक, साढेचार सौ वर्षसे अधिक काल तक महाराष्ट्रके लाखों सहृदय भक्तजनोंने उसीका पाठ किया, उसीको कंठ किया, उससे स्फूर्ति ली, उससे प्रेरणा ली, उसीको अपने जीवनका आधार बनाया, उसी ज्ञानेश्वरीको माउली मानकर उपासना की, उससे तुष्ट और पुष्ट हुए, उसको मैं महाराष्ट्रका प्राति- निधिक ग्रंथ मानूं या चार (गेलेलियो) विद्वानोंके मान्य ग्रंथको ? जिनके पीछे कोई परंपरा नहीं, साधना नहीं, उपासना नहीं, यदि कुछ है तो आग्रह, तीखा, कर्कश, असंगत और विसंगत तर्क, अभिनिवेश, और एक प्रकारसे अनुभूतिशून्य शाब्दिक कसरत ! श्री. राजवाडे प्रति ही सच्ची ज्ञानेश्वरी है कहनेवाले विद्वानकी और एक बातने मुझे और अधिक अंतर्मुख किया; “जो कोई आता है सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी देखता है, इस नयी सच्ची ज्ञानेश्वरीका विचार ही नहीं करता !” इसी समय उन विद्वान महाशयने कहा था “फ्रांससे डॉ. द. लेरे आये हैं ! उन्होने सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी ली !” मैं सोचने लगा डॉ. द. लेरे साहबने “सांप्रदायिक” ज्ञानेश्वरी क्यों ली होगी ? इसीके उत्तरमें मुझे ऊपरके विचार सूझे । और ! “सांप्रदायिक” है क्या ? आजकल, कुछ शब्द अर्थ-शून्य-से हो गये हैं । “सांप्र- दायिक” यह शब्द एक गाली-सी बन गया है। ज्ञानेश्वरी जैसे महान ग्रंथके विषयमें भी सांप्रदायिक ग्रंथ और अ-सांप्रदायिक ग्रंथ । उसके अर्थके विषयमें भी सांप्रदायिक-अर्थ और अ-सांप्रदायिक अर्थ ! धर्म, राजनीति, तत्वज्ञान, भाषा, साहित्य आदि विषयमें भी “मैं प्राचीन कुछ नहीं मानता” कहने- वाला तथाकथित, प्रगति-प्रिय बुद्धिजीवियोंका एक “अ-सांप्रदायिक संप्रदाय” बन गया है जो सदैव पूर्वपरंपरासे कटकर अपने आपको अधांतरमें लटकनेवाले जड कटे वृक्षकी भांति लटकता हुवा किसी अज्ञात दिशामें प्रगति कर रहा है। यदि किसी प्रतिभा-संपन्न बुद्धिमान व्यक्तिके लिये किसी बातका नया अर्थ करना हो, समाजको नयी दृष्टि देनी हो, समाजको नया विचार और आचार देना हो, तो उसको अपनी पूर्व-परंपराका पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है। किसी भी तत्वज्ञान विषयक ग्रंथकी, उसके किसी विषयकी, “नयी व्याख्या” करनेसे प्रथम उसके पूर्वाचार्योने उस विषयक शब्दोंसे क्या क्या संकेत लिये हैं इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। साथ साथ लेखकने कहां कहां किस अर्थमें किस शब्दका प्रयोग किया है यह भी जानना आवश्यक है। बिना इसके, केवल कोश और व्याकरण देख कर किया गया नया ! अर्थ अनर्थ कर सकता है। अर्थात जब तक किसीको किसी शब्द तथा उसके विचारकी पूर्व परंपराका यह पूर्ण ज्ञान नहीं है उसका किया हुवा नया- अर्थ अथवा दी हुयी नयी दृष्टि “अज्ञान वितरण समारोह ही” है, इसलिये निष्ठा पूर्वक अपनी पूर्व परंपराका पालन करना जन सामान्यका युग-धर्म है। असामान्य गेलेलियोंकी बात दूसरी है ! उनको कभी कहीं देखनेकी आवश्कता नहीं है। जो कुछ उनके प्रथम हो चुका है वह सब सांप्रदायिक है। असांप्रदायिका सब कुछ अपनेसे ही प्रारंभ होता है जैसे अंधेके लिये विश्वमें वह अकेलाही है ! ! अनुवादक इस श्रेणीका प्रतिभा संपन्न व्यक्ति हैही नहीं अथवा उसे अपने आपको अधांतरमें लटकनेवाले जड कटे वृक्षकी भांति बना लेनेका धैर्य है। वह प्रगति करना चाहता है १९ ज्ञानेश्वरी
किंतु सही दिशा जानकर और दिशा जाननेके बाद भी, उस दिशामें कौन कौन गयें यह देख कर, उनसे राह पूछ कर ही किसी रास्ते पर आगे बढ़ना चहता है। इसलिये अनुवादकने “केवल विद्वानोंके विरोधसे बचनेके “भय” से अथवा अज्ञात भावसे अपना नाम असंप्रदायिक आधुनिक विद्वानोंमें लिखानेके “लोभसे” अनुवादके लिये जो “सरकार मान्य और विद्वन्मान्य” ज्ञानेश्वरी चुननेकी गलती की थी उसको सुधारा ! १५०-२०० पृष्ठोंके भाषांतरको गंगार्पण करके श्रीएकनाथ महाराज द्वारा संशोधित सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी लेकर पुनः “ॐ नमोजी आद्य” से श्रीगणेश किया। साथ ही साथ अनुवाद करते समय जहां कहीं अर्थके लिये संदर्भ देखना पडा वहां श्रीसाखरे महाराज तथा श्री शं. वा. दांडेकरजी द्वारा संपादित श्रीबंकट स्वामीकी ज्ञानेश्वरीको ही प्रमाण माना है ! वैसे तो अनुवाद करते समय अनुवादकके सामने श्री साखरे महाराज, श्री शं. वा. दांडेकर तथा श्री भिडेकी सार्थ ज्ञानेश्वरी रही है। किंतु अर्थ निर्णय करते समय अनुवादकने न तो स्व-बुद्धिको प्राधान्य दिया न श्रीभिडेके अर्थको किंतु श्री साखरे महाराज अथवा श्री दांडेकरजीके किये गये तथाकथित सांप्रदायिक अर्थकोही प्राधान्य दिया है ! अस्तु; इतना स्पष्ट लिखनेके बाद ज्ञानेश्वरीके वादके विषयमें कुछ लिखना नहीं रहता तथा ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें भी। क्यों कि वह पाठकके हाथमें दिया जा रहा है। ज्ञानेश्वरी मराठीका सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथमें क्या क्या विषय हैं यह इस ग्रंथकी, अलग अलग प्रकारसे की गयी दो विषय-सूचियोंको देखनेसे पता चलेगा। मूलमें विषय सूची नहीं है। हिंदी अनुवाद छपते छपते यह नयी कल्पना सूझी और विषय सूची बनाई गयी। यह जो प्रयास हुवा है वह परंपरा- गत नहीं, हिंदी अनुवादमेंही पहली बार हुवा है। साथ साथ जो कुछ हुवा वह भी शीघ्रता या उता- वलेपनमें हुवा है। परिणामस्वरूप कुछ अटपटा भी लग सकता है। किंतु गहरे अध्येताओंके लिये जो अलग विषय विवेचन है वह अधिक चुस्त है। वह आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजीका बनाया हुवा है। उसमें कुछ परिवर्तन कर दिया गया है। सामान्य वाचकके लिये पहली विषय सूची सहायक होगी तो गहरे अध्ययनके लिये दूसरा विषय विवेचन मार्ग-दर्शक होगा । ११ अनुवादकके विषयमें कुछ- ज्ञानेश्वरी रामकथा या कृष्णकथा नहीं किंतु वेदांत-काव्य है। विषयकी गहनताके साथ मूलकी भाषा अत्यंत प्राचीन है। आज इस भाषाका रूप प्रचलित नहीं है। महाराष्ट्रका सामान्य सुशिक्षित नागरिक भी मूल ज्ञानेश्वरीको भली भांति नहीं समझ पाता। विद्वानोंके लिये भी वह भारी पडता है। ऐसी स्थितिमें एक कन्नड भाषाभाषी द्वारा प्राचीन मराठी वेदांत ग्रंथका हिंदी भाषामें किया गया अनुवाद, वह भी समवृत्तमें, एक प्रकारसे “अव्यापारेषु व्यापार” है। उछलते कूदते, भूतके बंगलेमें घुसनेके बाद, विच्छू कटे बंदरकी शराबके नशेमें की हुई मर्कट चेष्टा-सी ! किंतु केवल प्रेममें ऐसी मूर्खता करनेका साहस होता है। हिंदी भारतकी राष्ट्र-भाषा है। राष्ट्रके साथ जो प्रेम है, आदर या भक्ति है, वही राष्ट्र भाषासे होना स्वाभाविक है। हिंदीको राष्ट्र भाषा मान कर इ. स. १९३५ में हिंदी सीखने के लिये काशी गया। वहांसे लौट कर हिंदी प्रचारका कुछ काम किया। गांधीजीकी वानरसेनाका सैनिक बनकर जो कुछ हम लोगोंने उछल कूद की, इससे, या अन्य कारणोंसे, विदेशी शासनके स्थान पर स्वदेशी शासन आया। स्थिति बदली। स्वदेशी शासनमें जन-समान्यकी हिंदी भाषा वैधानिकरूपसे राज-भाषा बनकर भी केवल वैधानिक भाषा ही रही। हमारा दृष्टिकोण वैज्ञानिक और विशाल होता गया। उस विशालतामें भारत है या नहीं अथवा कहां है यह ढूँढनेपर भी पता नहीं चलता। ऐसी स्थितिमें भारतकी आनेवाली पीढी, लोक-भाषा हिंदीके ज्ञानेश्वरी २७ -
गवाक्षमेंसे वेदसे वर्तमानतक, आसेतु हिमाचलका, मंगलमय पावन दर्शन कर सके इस उद्देश्यसे यह सब काम चल रहा है । प्रस्तुत अनुवादकको इसमें जरा भी संदेह नहीं कि उसमें यह योग्यता नहीं है । इस महान कार्य करनेके लिये वह योग्य नहीं । उसकी इस अयोग्यताका उसको पूर्ण ज्ञान और भान है । किंतु जो योग्य हैं उनको, उनकी योग्यताके अनुसार अन्य बडी बडी बातें करनी हैं । बडे बडे काम हैं। साथ साथ यह काम भी करनाही है । इसीलिये, कुछ मूर्खता होगी, अव्यापारेषु व्यापार होगा, छोटी मोटी ही नहीं हिमालयकी-सी भी त्रुटियां रह जायेंगी, यह सब मानकर ही यह काम हाथमें लिया है ! अर्थात इस महाग्रंथमें जो त्रुटियां होंगी, भूलें होंगी, अशुद्धियां होंगी उसके लिये विद्वान लोग उदारतासे अनुवादकको क्षमा करनेकी कृपा करेंगे ऐसा विश्वास है !
इस क्षमा याचनाके बाद, ज्ञानेश्वरीके वृत्तके विषयमें एक दो बातें कहना अनुपयुक्त नहीं होगा । इस वेदांत-काव्यका छंद स्वाभाविक ही मराठीका अपना छंद है। ओवी और अभंग ये दो वृत्त मराठी संत-साहित्यका हृदय और मस्तिष्कसे हैं। ओवी छंदमें, जहां परमामृत, ज्ञानेश्वरी, अनुभवामृत, स्वानंद-लहरी, दास-बोध जैसे वेदांत काव्य ग्रंथ हे वहां कृष्ण चरित्रके अनेक प्रसंग, भागवत, रामायण, श्रीकृष्ण चरित्र, भारत जैसे चरित्र ग्रंथ भी हैं और कवियोंमें सर्वश्री मुकुंदराज, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, श्रीकृष्णदयार्णव, रामदास और मुक्तेश्वर जैसे महान कवि हैं। ये सब काव्य प्रासादिक और विद्वन्मान्य हैं अभंग और ओवी इन दोनो छंदोंके विषयमें मराठीके अन्यान्य विद्वानोंने जो कुछ लिखा है उसका सार इतना ही है कि वैदिक अनुष्टुप छंदसे प्रेरणा लेकर इस छंदकी रचना की गयी है। ये दोनों अक्षर छंद हैं। अभंग और ओवी दोनोंका रूप एक है। कुछ विद्वानोंने लिखा है “ओवियोंकी मालिकाको अभंग कहते हैं।” ऐसे विधान उन दोनोंकी एक-रूपता बताते हैं इतना ही । किंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है। “अभंग” शब्दके विषयमें संत नामदेवने कहां है “सम चरणमें अभंग । नहीं तान छंद-भंग।” “सम चरणमें” ये शब्द सूचक माने जाते हैं। जो वृंदावनके त्रिभंगी कन्हय्या की भांति बेढ पैरसे खडा न जोहोकर “समचरण” विठ्ठल-खडा है वह “अभंग-विठ्ठल” है। अभंगके साथ विठ्ठल शब्द जुडकर अभंग विठ्ठल बना । ऐसे विठ्ठल भक्ति परंपराका यह छंद “अभंग” है। साथ ही साथ “दो सोल्ह छंदोंके सम चरण पर खडा अभंग” । ऐसा इसका पहला भाग कहता है। किंतु किसी अभंग गायकने अक्षरोंको गिननेका प्रयास कभी नहीं किया है। अनेक संतोंके अभंगोका अध्ययन करके कुछ निरुद्योगी (!) विद्वानोंने मोटे तौर पर इसके कुछ प्रकार दिखायें हैं और उनको अलग अलग नाम भी दिये हैं। ज्ञानेश्वरको महाराष्ट्र जैसा माउली कहता है वैसे ज्ञानोबा भी कहता है और ज्ञानोबासे विनोबा तक आध्यात्मिक महाराष्ट्रने अपनी इस अभंग-वाणीको अक्षुण्ण रखा है। इस प्रकार यह छंद पारमार्थिक महाराष्ट्रके हृदयकमलका “अभंग” सुगंध है और ओवी इससे भी प्राचीन छंद है। ई. स. ११२९ में भी इसका दर्शन होता है। उस कालके एका ग्रंथमें इस छंदके विषयमे लिखा है कि -
पीसते कूटते ओवियां गाती हैं जो महाराष्ट्रमें ।
और स्वनामधन्य लोकमान्य तिलकजीके विषयमें कहा जाता है कि वे सदैव कहा करते थे “चक्की पर बैठते ही ओवियां अपने आप सूझती हैं!” ओवीके विषयमें कभी किसीने, कभी किसीने कुछ लक्षण लिखे हैं किंतु वे कभी सर्वमान्य नहीं हुए हैं। जैसे सोल्हवे शतमानके एक साहित्यिकने लिखा है “ओवीके पहले चरण छ से आठ अक्षरके हों और चौथा चरण चारसे छ अक्षरका।” किंतु ज्ञाने- श्वरीमें ही पहले तीन चरण छ से चौदह अक्षर तकके हैं। पहले तीन चरणमें अंतिम प्रास होता २१ ज्ञानेश्वर
है और चौथे चरणमें प्रास नहीं होता । इस ओवी छंदके मूलके विषयमें ऊपर कहा गया है कि वैदिक अनुष्टुप् छंदसे प्रेरणा लेकर इसका विकास किया गया है। किंतु कुछ विद्वानोंका कहना है कि यह कन्नड त्रिपदीका मराठी करण है पर कन्नड त्रिपदी छंद संभवतः वैदिक गायत्री छंदका कन्नडीकरण हो ! कुछ भी हो, ये दोनो छंद कहींसे आये हों, पर ये मराठी संत साहित्यके प्रकाशस्तंभ हैं ! महाराष्ट्रके शान और भक्तिके अमृतस्रोत हैं। महाराष्ट्र सारस्वतमें ओवियोंकी संख्या लाखोंसे गिननी होगी। साथ साथ प्रत्येक कविका एक न एक वैशिष्ट्य है। ओवी सुनते ही मराठी साहित्यका जानकार झट कह सकता है यह ओवी किसकी है इतना वह वैशिष्ट्य सु-स्पष्ट है। ओवियां जैसे ग्रंथस्थ हैं वैसे कुछ कंठस्थ भी हैं। विशेषतया गांवोंमें स्त्रियां या लडकियां, पीसते समय, कूटते समय, लडकियां झूले पर बैठ कर झूलते समय, मातायें बच्चोंको पालनेमें झुलाते समय, या गोदमें सुलाते समय ओवियां गाती हैं जो आज भी सुना जा सकता है। ये ओवियां तित- लियोंकी भांति बहुरंगी और क्षणिक उडती हुई रहती हैं। इनके विषय अनंत हैं। महाराष्ट्रका दैवत पांडुरंग और उस पांडुरंगके पगले संत तो इन ओवियोंका विशेष विषय है। साथ साथ अन्य देवी देवता भी इनका विषय बनता है। माता-पुत्रका प्रेम, भाई बहनका प्रेम, आदिका सुगंध लेकर ओवी तितली खूब उडती है। पति-पत्नीके बीच भी यह घुस कर उन्हे हंसा रुलाकर दो तन एक मन कर देती है। अर्थात ओवी छंद महाराष्ट्रीय जन जीवनकी माधुरी भी है जैसे महाराष्ट्रीय आध्य त्मिक अमृत सागरके अथांग तरंग हैं। इस दृष्टिसे ओवी छंदसे परिचित होना सही अर्थमें महा- राष्ट्रके हृदयसे परिचित होना है और ज्ञानदेवकी ओवियां तो विशेष कर। क्यों कि मराठी साहित्यके मर्मज्ञोंका कहना है मोरोपंतकी आर्या , ज्ञानेश्वरकी ओवियां और तुकारामके अभंग मराठी साहित्यकी निधि है। इसलिये ज्ञानेश्वरीके इस अनुवादका एक वैशिष्ट्य है जो इससे पहले हिंदीमें अनुवा- दित ज्ञानेश्वरीमें नहीं था। जो विशेषतायें हैं वे सब मूलकी देन हैं और त्रुटियां अनुवादककी अपनी, आशा है विद्वान् और साहित्यके मर्मज्ञ उदारता पूर्वक इसकी क्षमा करनेकी कृपा करेंगे ! बाबुराव कुमठेकर.
अकारादि क्रमसे ज्ञानेश्वरीकी विषय-सूची क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ कृतज्ञता के कुछ शब्द १ १ अक्रोध ६३६ ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरी ५ २ अक्षर पुरुषका वर्णन ६१५ ज्ञानेश्वरी विषयसूची २३ ३ अखंड सम चित्तता ४७९ अभ्यासार्थ विषय विश्लेषण ३७ ४ अगले अध्यायकी भूमिका १०५ ज्ञानेश्वरी ५ अज्ञान ३४७ १ अर्जुन-विषाद-योग १ ६ अज्ञानका रूप ५९७ २ सांख्य-योग ३२ ७ अज्ञानके लक्षण ६८४ ३ कर्म-योग ७६ ८ अज्ञानावृत्त प्रकाशही क्षेत्रज्ञ है ५६८ ४ ज्ञान-कर्म संन्यासयोग १०६ ५ कर्म-संन्यास-योग १३२ ९ अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है ७१७ ६ आत्म-संयमयोग १५२ ७ ज्ञानविज्ञानयोग २०० १० अदंभका विवेचन ३५७ ८ सातत्ययोग २२२ ११ अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता ९ समर्पणयोग २४९ किंतु भक्ति होती है ८१२ १० विभूति-चिंतनयोग २९८ १२ अद्रोह ६५२ ११ विश्व-रूप-दर्शनयोग ३३२ १३ अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता ७९ १२ भक्तियोग ४०५ १३ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोग ४२९ १४ अध्यात्मज्ञानके बिना सब व्यर्थ ४९९ १४ गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग ५३१ १५ पुरुषोत्तम दर्शनयोग ५७१ १५ अध्यात्मज्ञान ज्ञेय दर्शन ४८२ १६ देवासुर-संपद्विभाग-योग ६२५ १६ अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप ३५३ १७ श्रद्धा-निरूपण-योग ६७० १८ सर्व-गीतार्थसंग्रह ईश्वर-प्रसाद-योग ७१० १७ अनहंकार ४७१ परिशिष्ट १८ अनन्य भक्तसे कहागया हृदयगूढ ८२९ १९ महारथियोंका परिचय १ २० कर्मयोगियोंका परिचय ४१ १९ अनादिसे ये दोनों मार्ग चले आये हैं ६४९ २१ विभूतियोंका परिचय ५५ २२ पौराणिक संदर्भ ८५ २० अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यासावस्था ७९६ २३ विशेष शब्दोंका विशिष्ट अर्थ १०५ २४ कठिन शब्दकोश १९९ २१ अनासक्ति ४७९ २३