ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अकारादि क्रमसे ज्ञानेश्वरीकी विषय-सूची क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ कृतज्ञता के कुछ शब्द १ १ अक्रोध ६३६ ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरी ५ २ अक्षर पुरुषका वर्णन ६१५ ज्ञानेश्वरी विषयसूची २३ ३ अखंड सम चित्तता ४७९ अभ्यासार्थ विषय विश्लेषण ३७ ४ अगले अध्यायकी भूमिका १०५ ज्ञानेश्वरी ५ अज्ञान ३४७ १ अर्जुन-विषाद-योग १ ६ अज्ञानका रूप ५९७ २ सांख्य-योग ३२ ७ अज्ञानके लक्षण ६८४ ३ कर्म-योग ७६ ८ अज्ञानावृत्त प्रकाशही क्षेत्रज्ञ है ५६८ ४ ज्ञान-कर्म संन्यासयोग १०६ ५ कर्म-संन्यास-योग १३२ ९ अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है ७१७ ६ आत्म-संयमयोग १५२ ७ ज्ञानविज्ञानयोग २०० १० अदंभका विवेचन ३५७ ८ सातत्ययोग २२२ ११ अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता ९ समर्पणयोग २४९ किंतु भक्ति होती है ८१२ १० विभूति-चिंतनयोग २९८ १२ अद्रोह ६५२ ११ विश्व-रूप-दर्शनयोग ३३२ १३ अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता ७९ १२ भक्तियोग ४०५ १३ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोग ४२९ १४ अध्यात्मज्ञानके बिना सब व्यर्थ ४९९ १४ गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग ५३१ १५ पुरुषोत्तम दर्शनयोग ५७१ १५ अध्यात्मज्ञान ज्ञेय दर्शन ४८२ १६ देवासुर-संपद्विभाग-योग ६२५ १६ अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप ३५३ १७ श्रद्धा-निरूपण-योग ६७० १८ सर्व-गीतार्थसंग्रह ईश्वर-प्रसाद-योग ७१० १७ अनहंकार ४७१ परिशिष्ट १८ अनन्य भक्तसे कहागया हृदयगूढ ८२९ १९ महारथियोंका परिचय १ २० कर्मयोगियोंका परिचय ४१ १९ अनादिसे ये दोनों मार्ग चले आये हैं ६४९ २१ विभूतियोंका परिचय ५५ २२ पौराणिक संदर्भ ८५ २० अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यासावस्था ७९६ २३ विशेष शब्दोंका विशिष्ट अर्थ १०५ २४ कठिन शब्दकोश १९९ २१ अनासक्ति ४७९ २३
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ २२ अनिंदा ११७ ५१ अर्जुनके सात प्रश्न २२२ २३ अन्य अनेक ऊर्ध्व शाखाओंका ५२ अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म विवेचन ५८७ होनेका भास ३११ २४ अन्य देवताओंसे पाये गये ५३ अर्जुनको विश्वरूप देखनेकी भोग नाशवंत होते हैं २१५ दिव्य दृष्टि दी ३३८ २५ अपने पथके शत्रुओंको ५४ अक्षोभ ६३९ जीतनेके बाद ८०६ ५५ अविचार ४९० २६ अपने भक्तके आलिंगनके लिये ५६ अविद्या सिंधु और स्वर्ग- दो हाथ कम पड़े ४२६ संसारसे मुक्तिकी प्रार्थना ४९० २७ अभय ३३१ ५७ अव्यक्त प्रकृतिका रूप ४३७ २८ अभिन्न शरणागतिसे सभी ५८ अव्यक्तोपासकसे व्यक्तो- मैं हो जाता हूँ ८३६ पासक भले ४१० २९ अभिमान ४८४ ५९ अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन ५६६ ३० अभिमान ६४५ ६० अव्यभिचारी शत्रुतासे ३१ अभ्यास और वैराग्यसे भी मेरी प्राप्ति होती है २९० मन स्थिर होता है १९१ ६१ अशांति ४८५ ३२ अभ्यासकी महत्ता ४१८ ६२ अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा ६७८ ३३ अमानित्व ४४५ ६३ अशौच ४८६ ३४ अमानित्व ६४३ ६४ अहंकारके कारण अलग पड़ा ३५ अर्जुनका अद्वैतानुभव ३३० हुवा आत्मा अधिदैवत है २२५ ३६ अर्जुनका अनाड़ीपन ३९६ ६५ अहंकारका रूप ४५६ ३७ अर्जुनका किया हुवा ६६ अहंता छेदन ४१ विराट-स्तवन ३८२ ६७ अहम्ममताके भ्रमके ३८ अर्जुनका गंवारपन ३९५ कारण जन्म मरण २०७ ३९ अर्जुनका प्रत्युत्तर ३५ ६८ अहिंसा ६३५ ४० अर्जुनका भाग्य ८५६ ६९ अहिंसाका विवेचन ४४८ ४१ अर्जुनका महाभाग्य ३४७ ७० अहिंसा विवेचनमें वाग्विलासकी ४२ अर्जुनका संदेह १८० क्षमायाचना ४५६ ४३ अर्जुनका समरसैक्य २० ७१ आकारसे परे देखने पर ही ४४ अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा ३३८ योगानुभव आता है २६१ ४५ अर्जुनकी उत्कट जिज्ञासा १६५ ७२ आचार्य वंदना ५२९ ४६ अर्जुनकी करुणा २० ७३ आचार्योपासना ४६० ४७ अर्जुनकी क्षमायाचना ३८२ ७४ आजके तूने विवस्वतसे ४८ अर्जुनकी प्रशंसा १६३ कैसे कहा १०९ ४९ अर्जुनकी मनोदशा ३२ ७५ आत्मज्ञका वर्णन १६० ५० अर्जुनकी-विभूति ७६ आत्मज्ञानका निश्चय न होने विस्तार-सुननेकी इच्छा ३१६ तक कर्म अनिवार्य है ७२३ ७७ आत्मज्ञानकी ले करवाल ५६२ ज्ञानेश्वरी २४
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ७८ आत्मरत कर्मसे कर्म-मुक्ति ८२ ३ स्वेच्छाचारी इह परमें शांति ७९ आत्मरत कर्मसे विकास और नहीं पाते हैं १६७ प्रकृतिरुंत्र कर्मसे विनाश ९६ ४ आहारका विविधरूप ५८० ८० आत्मरूपी गणेशवंदन ४२९ ५ इंद्रिय दमन ही इनको जीतनेका ८१ आत्मलक्ष्य ८३ उपाय है १०४ ८२ आत्मलीन ही कर्ममुक्त है ९० ६ इंद्रियनिग्रह ५७२ ८३ आत्मत्व प्राप्त पुरुष भी देहेंद्रियोंके ७ इंद्रिय विवेचन ४३८ साडसे क्लेश पाता है ७० ८ इंद्रियोंकी प्रबलता ६७ ८४ आत्महित और लोकहितार्थ कर्म ९१ ९ इंद्रियोंकी अंतर्मुख दृष्टिसे ८५ आत्मा और शरीरकी तुलना ईश्वरत्वका अनुभव होता है २५५ और संबंध ५२३ ११० इंद्रियोंसे सतत कर्म ८६ आत्मा कभी कर्ता नहीं होता ७४४ योगी अंतरंगमें निष्कर्म १५८ ८७ आत्माके एकत्वका विवेचन ५०९ ११ इच्छाका स्वरूप और द्वेष ४४० ८८ आत्मानात्म विचार ४३० १२ इनका जीवन सूत्र टूट चुका है ३७८ ८९ आत्मानात्म-विवेक जीववादी १३ इन दोनोंमेंसे तत्वता तुझे दृष्टिसे ४३२ कौन जानता है ? ४०७ ९० आत्मानात्म-साधनाका उपाय ५१० १४ इन सबसे अक्षरचैतन्य ९१ आत्मानात्म व्यवहारके भिन्न है २३७ राजहंस ५८७ १५ इस अभ्याससे मन निश्चल ९२ आत्मानुभवीका अमहंकारी बनता है १८४ देहभाव ७४६ १६ इस कर्म फलसे बढ़ता, नहीं ९३ आत्मा शरीरमें रह कर भी तो मुकता ७३३ न कुछ करता न लीपता ५२५ १७ इसका मूल रजोगुण है २०१ ९४ आयुर्वेदकी अहिंसा ४४८ १८ इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं ? ५८० ९५ आर्जव ६३४ १९ इसको महारुव कहते हैं ५६८ ९६ आसुरी गुणोंकी ओर संकेत ६४५ १२० इस गीता-ज्ञानकी परंपरा ८६५ ९७ आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको २१ इस ज्ञानकी आदि परंपरा ८६६ दुःख ६६१ २२ इस ज्ञानसे मेरे समान ९८ आसुरी लोगोंके अभिमानका होते हैं ५३५ रूप ६५८ २३ इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ९९ आसुरी लोगोंके लिये ओतप्रोत भरा हूँ ५४१ ज्ञानेश्वरकी करुणा ६६४ २४ इस निश्चलताके सम्मुख दुःख १०० आसुरी वृत्ति चर्म-चेनुआ नहीं रहता १८४ आहार तोड़ती है ६५४ २५ इस अवधूतका फैलाव ५८३ १ आसुरी संपदाका वर्णन ६५० २६ इस योगकी प्राचीनता १०७ २ आसुरी संपदा विनाशक है ६४७ २७ इस लिये तू मेरे स्मरणपूर्वक युद्ध कर २२८ ३५ विषयसूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ २८ इस लिये मेरे स्मरणका अभ्यास कर २३० ५३ अंतर्यामीका घात नहीं होता ४६ ५४ कठोरता ६४६ २९ इस लिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है ७२ ५५ कर्ता कारण और कर्म ७५४ ५६ कर्मका तिरस्कार और कर्म-फलमें आशा दोनों नहीं ११६ ३० इस लिये स्वधर्माचरण करना ९८ ५७ कर्मकी विविधताका विवेचन १३८ ३१ ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग ४०७ ५८ कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ७१५ ३२ ईश्वर शरणता ही शांतिका एकमेव साधन ८२० ५९ कर्म त्यागमें नैष्कर्म्यका दंभ ८२ ३३ ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण है ६२ १६० कर्म नाशकी कर्मकुशलता ७८५ ३४ ईश्वरार्पित बुद्धिसे अनासक्त कर्म ५८ ६१ कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन ७४१ ३५ ईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है ६३ ६२ कर्म बुद्धि और धृतिका संबंध ७७८ ६३ कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर १३३ ३६ उच्च स्थितिकी प्राप्तिके लिये अष्टांगयोगकी सीढियां १५६ ६४ कर्मयोगीका ब्रह्मयज्ञ १८० ६५ कर्मयोगीके लक्षण ११८ ३७ उठो और स्वधर्माचरणके लिये कर्म करो ९६ ६६ कर्मयोगीके विविधयज्ञ १२२ ६७ कर्मयोगीके विविध यज्ञोंकी तुलना १२४ ३८ उपहार लूटनेके किये यज्ञ ६६० ३९ उल्लसित अर्जुनका सेनावलोकन १८ ६८ कर्मरत रहकर कर्म-फल समर्पण ४१७ ४० उस चैतन्यकी व्यक्तव्यकता २४० ४१ उसे मैं अपना हृदय सिंहासन देता हूँ ८४४ ६९ कर्म सिद्धिका कारण अहंकार ७३९ १७० कर्म सिद्धिका कारण देह ७३८ ४२ ऊर्ध्वमूलका फल जाना ५८८ ७१ कर्म सिद्धिका कारण दैव ७४१ ४३ ऊर्ध्वमूल ब्रह्मका वर्णन ५७७ ७२ कर्मसिद्धिका कारण भिन्न भिन्न क्रिया ७४० ४४ एक श्लोकमें भारतका सार ८५७ ४५ एकही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग १५५ ७३ कर्म सिद्धिके पांच कारण ७३७ ७४ कर्म सिद्धिके विविध कारण १७९ ४६ एकांतमें अरुचि जनसंघमें प्रीति ४९८ ७५ कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें ११७ ४७ ऐसा यह अक्षरचैतन्य भक्तिसे स्पष्ट होता है २४१ ७६ कर्मातीत अवस्थामें कर्म-त्याग संभव ८१ ४८ ओं तत्सत् का दर्शन ७०१ ४९ ओंका महत्त्व ७०२ ७७ कवीकी नम्रता ६ ५० अंतःकरणका विवेचन ७५४ ७८ कवीकी नम्रता ८६१ ५१ अंतकालकी स्थितिका वर्णन २८७ ७९ कामक्रोधसे सदा सर्वत्र दूर ६६५ ५२ अंतर्मुख दृष्टिसे ज्ञान प्राप्त होता है ५३५ ८० काम प्रबोधनसे सदा कर्म-प्रवृत्ति ६६५ ज्ञानेश्वरी ३६
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ८१ कारण और हेतु मिलनसे ३ क्षराक्षर पुरुष विचार ६२३ कर्म निर्माण ७४२ ४ क्षात्रधर्म महत्ता ५३ ८२ कार्य और गुण करुणाकी महत्ता २५० ५ क्षेत्रके विषयमें सभी ८३ कालवादियोंकी दृष्टिसे अज्ञानमें हैं ४३५ आत्माभास विवेक ४३४ ६ ग्रंथ लेखनका स्थल काल ८७० ८४ किंतु जो मद्भूत है वह किसी ७ गजपति वंदन १ भी कार्यसे अद्भूत पाता है २४५ ८ गणेशरूप गुरु वंदन ६७० ८५ किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही ९ गीता और वेदकी समानता ८३७ अधिक है २७९ २१० गीताकी फलश्रुति ८५५ ८६ कुटिलता ४८५ ११ गीताकी महानताका कथन ८१८ ८७ कुलाकुलका अज्ञान ६४० १२ गीताकी वह धरोहर श्रीगुरु ८८ कृष्णका उपदेश ३३ कृपाका फल है २९९ ८९ कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते १३ गीता महिमावर्णन ८५८ समय संजयकी मनस्थिति २१६ १४ गीतारत्न प्रासादका १९० कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप कलशाध्याय ७१२ समझता है ५६१ १५ गीता वेदका भी मूलसूत्र है ८३६ ९१ कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका १६ गीता-साधनाका सारांशमें वर्णन ८५१ पुनःकथन ८२० ९२ कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका १७ गुण-दोष दर्शन ४७४ लय होना ८५२ १८ गुण निसारका विवेचन ५५९ ९३ कृष्णार्जुन-गुरुशिष्य प्रेमका १९ गुणनिसारसे मोक्ष प्राप्त वर्णन ७३५ होता है ५५९ ९४ कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन ७१६ २२० गुणनिसारका साधन ५६६ ९५ केवल अनन्य भक्तिसे वह २१ गुण-द्वंद्वोंका स्थान ५५६ मिलता है ४०१ २२ गुणातीतकी समवृत्ति ५६४ ९६ केवल अभक्त मुझ एक को २३ गुणातीत कैसे होता है ५६१ अनेक रूपसे देखते हैं ११३ २४ गुणोंके कल्लोलमें निर्लिप्त ९७ केवल शास्त्रीय भक्तिसे मेरी तृप्ति रहता है ५६१ नहीं होती है २८८ २५ गुणोंके जालमें निर्लिप्त निष्कंप ९८ कोई भाग्यवान ही विश्वकी रहता है ५६२ विविधतामें एकता देख २६ गुरुकी मधुरा भक्ति ४६३ सकता है ५१८ २७ गुरुकी मानसपूजा ४६२ ९९ कर्मयोगी सदैव मुझे भोगता २८ गुरुकी वात्सल्य भक्ति ४६२ रहता है ८१३ २९ गुरुकृपाकी महिमा ७ २०० क्रोध ३४६ २३० गुरुगृह वियोग ४६१ १ क्षत्रियॉंका स्वभाव-धर्म ७८५ ३१ गुरुचिंतन प्रसाद सेवन ४६३ २ क्षमा ६४१ ३२ गुरुजीवनसे संपूर्ण समरसता ४६४ २० विषयसूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ३३ गुरु-द्रोह ४८६ ५७ जीवन कृतार्थ हुवा है आज ८१७ ३४ गुरुप्रसादकी सूचना ७ ५८ जीवनभर जो मेरी सेवा ३५ गुरुमुखसे श्रवण करनेके बाद ही करता है अंतकालमें मैं पवित्र ज्ञानका अनुभव २५२ उसकी सेवामें आता हूँ २३५ ३६ गुरुवंदन २ ५९ जीवन भोगके लिये है और ३७ चंचल मनको कैसे स्थिर सब झूठ है ६५२ किया जाय १९० २६० जीव मुझसे अभिन्न भिन्न है ५९० ३८ चतुर्भुज सौम्य रूप देखनेकी ६१ जीव स्व-सामर्थ्यसे परमा- कामना ३९३ त्माको नहीं जान सकता ३१५ ३९ चांचल्य ४८७ ६२ जो जिस क्षणसे भक्त बना २४० चातुर्वण्य प्राकृतिक गुणोंके उसी क्षणसे मेरा बना २८६ कारण हैं २१४ ६३ जो देख भकुला रहा त्रिकोक ३६२ ४१ चार प्रकारके मेरे भक्त २११ ६४ जो मेरा रूप जानते हैं वे ४२ चित्सूर्यरूपी श्रीगुरु वंदन ७१० मद्रूप होते हैं ११२ ४३ चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन ६२७ ६५ जो मेरे पास आता है वही ४४ चेतनाका विवेचन ४४१ शुद्ध पुण्य है २७६ ४५ चैतन्य विश्वाकार कैसे ६६ जो वास्तविक हितका होता है दीखता है ६१९ वही इंद्रियोंको दुःख ४६ चौदहवे अध्यायकी भूमिका ५२५ दायक है १८४ ४७ छठे अध्यायकी भूमिका १५२ ६७ जो सदा सर्वत्र मुझे देखता है ४८ छठे अध्यायकी भूमिका रूप- वह संदेह मुक्त है २८५ योगमार्ग दर्शन १५० ६८ जो सदैव मेरा स्मरण करता ४९ जन्मजन्मांतरके सत्यवचन है वह सदैव मुक्त है २४४ फलका यह गीतार्थ ६२७ ६९ ज्ञान और योगाका समन्वय ५६७ २५० जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग २७० ज्ञान कर्म कर्ता मी त्रिगुणसे भजन कैसे २७० घिरे है ७५५ ५१ जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं २७१ ७१ ज्ञानका लक्षण ऋजुता ४५९ ५२ जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य ७२ ज्ञानका लक्षण शांति ४५८ विवेचन १७२ ७३ ज्ञानका विवेचन ८१६ ५३ जाते समय जीव इंद्रियोंके ७४ ज्ञानकी महानता १२६ साथ जाता है ६०२ ७५ ज्ञानकी महानता ४४३ ५४ जिसने अंतःसुख नहीं देखा वह ७६ ज्ञानके पास ये दुष्ट आ विषय सुखके पीछे पडता है १४४ बसते हैं १०३ ५५ जिसने यह जान लिया वह ७७ ज्ञानके लिये वैराग्य है ५७४ मुक्त है ५१० ७८ ज्ञानखड्ग १२९ ५६ जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर ७९ ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु २३३ मूर्खता २९३ २८० ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण ४२८ ज्ञानेश्वरी २८
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ८१ ज्ञानपूर्वक जो स्वधर्माचरण १३ तभी जीवको ब्रह्म-स्वराज नहीं करते उनकी गति १०० मिलेगा १०४ ८२ ज्ञान प्राप्तिका उपाय ६२९ १४ तभी मैं उनको दंड देता हूँ ६६२ ८३ ज्ञान प्राप्तिका साधन १२५ १५ तमप्रधान मृत्युसमय २४५ ८४ ज्ञान प्राप्तिके बाद और १६ तमोगुणके लक्षण ५५६ कुछ पाना नहीं रहता ६२८ १७ तमोगुणीका स्वभावधर्म ५५३ ८५ ज्ञान मनुष्यके हृदयमें होता है ५३४ १८ तामस कर्ताके लक्षण ७६९ ८६ ज्ञानी अहिंसकका चलना ४५० १९ तामस कर्मका लक्षण ७६४ ८७ ज्ञानी अहिंसकका देखना ४५२ ३२० तामसिक आहारका विवेचन ६८३ ८८ ज्ञानी अहिंसकका बोलना ४५१ २१ तामसिक कर्म त्याग ७२५ ८९ ज्ञानी अहिंसककी कार्य प्रणाली ४५३ २२ तामसिक ज्ञानका विवेचन ७५८ २९० ज्ञानीकीबुद्धि इंद्रातीत होती है ७५० २३ तामसिक तप ६९३ ९१ ज्ञानीके अहिंसक मनका स्वरूप ४५४ २४ तामसिक दान ६९७ ९२ ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है ५७३ २५ तामसिक धृतिके लक्षण ७७७ ९३ ज्ञानी भक्तका महान अनुभव २१३ २६ तामसिक बुद्धिके लक्षण ७७५ ९४ ज्ञानी भक्त सदा सर्वत्र २७ तामसिक यज्ञका विवेचन ६८५ एको भावसे मुझे ही देखता है २६९ २८ तामसिक सुखका विवेचन ७८२ ९५ ज्ञानेश्वरका उपसंहार २४८ २९ तीन प्रकारके कर्मफल ७३१ ९६ ज्ञानेश्वरका देश भाषा प्रेम १५३ ३३० तीन प्रकारके सुखका विवेचन ७७९ ९७ ज्ञानेश्वरका पंथराज १६५ ३१ तीनों गुण, समय समय पर ९८ ज्ञानेश्वरका मातृभाषा प्रेम ३०१ बदलते हैं ५४९ ९९ ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम ८५६ ३२ तीनों गुणोंका परिणाम ५५५ ३०० ज्ञानेश्वरकी सहज वाक्स्फूर्ति ४८२ ३३ तीसरे पुरुषोत्तमका वर्णन ६१७ १ ज्ञानेश्वर कृत कृष्ण वर्णन १६५ ३४ तुम कौन हो प्रभु ३७६ २ ज्ञानेश्वर महाराजका विनय ६२४ ३५ तू इससे दूर रहकर मेरी ३ ज्ञानेश्वर स्तुति सुमन ८७१ भक्ति कर २९५ ४ ज्ञानेश्वर स्तुति सुमन ८७२ ३६ तू दैवी संपदाका स्वामी है ६४८ ५ ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें ८६२ ३७ तेज २१ ६ ज्ञानेश्वरी ग्रंथ संशोधन वृत्तांत ८७१ ३८ तेन त्यक्तेन शेष प्रसाद सेवन ८७ ७ ज्ञेयका स्वरूप ३३ तेरहवे अध्यायका उपसंहार ५२८ ८ ज्ञेयकी पूर्वपीठिका ५०० ३४ तेरा दर्शन सब कुछ देता है ८४८ ९ तत्कारसे होनेवाले लाभ ७०३ ३५ तेरे तेजसे सारा विश्व ३१० तप ६३४ संतप्त है ३६१ ११ तपका स्वरूप ६८८ ३६ तेरे बिना कुछ भी न होनेसे १२ तब वह न रहनेकासा संदेह भी नहीं रहा ८४९ रहता है ८१४ ३७ तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं ११० २४ विषय सूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ३८ तो कर्म करने क्यों कहता है ७६ ६५ धृतिका विवेचन ५४२ ३९ त्याग ६३८ ६६ धैर्य ६४२ ३४० त्याग और संन्यासका ६७ नमस्कार भक्तिसे सद्रूप अर्थैकत्व ७१७ होते हैं २६७ ४१ त्याग भी तीन प्रकारका ७२३ ६८ नष्ट होना शरीरका ४२ त्याग वृत्तिका रहस्य ७२१ स्वभाव ही है ४७ ४३ दंभ ४८४ ६९ नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे ४४ दंभ ६४४ आराधना करनेवाले ही ४५ दम ६३२ अधिक २१४ ४६ दया ६३८ ३७० नित्य नैमित्तिक कर्मोंका ४७ दर्प ६४५ विवेचन ७१९ ४८ दान ६३२ ७१ निरहंकार निष्काम कर्म कर ८३ ४९ दिनरात मेरा चिंतन करनेवाला ७२ निराकार योगमार्ग ४०७ भक्त मुझे जानता है ४०८ ७३ निराग्रह वृत्तिसे जीवनयापन ४१६ ३५० दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता ३७ ७४ निर्मल देह पक्व फलकी भांति ५१ दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना ३१ अलिप्त होता है ७९५ ५२ दृश्य और द्रष्टाका अद्वयभाव ३५४ ७५ निर्विशेष तेरा वंदन कैसे करूं? ७११ ५३ देहधारीको कर्म अनिवार्य ७३० ७६ निष्काम एकनिष्ठ भक्ति ४८० ५४ देहाभिमान ४८९ ७७ निष्काम कर्मयोगीकी ५५ देहाहंकार आत्मबोधमें लय महानता १४० होनेके बाद ७४७ ७८ निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत ५६ दैवी गुणोंकी महानता ६४३ प्रेम करता हूँ ४८० ५७ दोनों सेनामें केवल पांडव ७९ निष्काम भावसे दिये गये ही बचेंगे ३७९ शुष्क भोजनका आनंद १५४ ५८ दो भक्तोंकी भेंट आनंद ३८० नैष्कर्म्यका अर्थ आलस्य नहीं १३४ महोत्सव है ३०९ ८१ नैष्कर्म्य भावका दर्शन १३९ ५९ द्वंद्वचिंता छोडकर ८२ पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका ५७४ स्वचिंतन करना ८०० ८३ परं दृष्ट्वा निवर्तते ६७ ३६० द्वैत गुरु शिष्योंके संवादमें ८४ परमात्माका मनोगत ३७३ अद्वैतके परेका अनुभव ६११ ८५ परमात्माकी असामान्य ६१ द्वैतस्थितिमें जाकर गुरुशिष्य उदारता ३४१ संवाद ८४० ८६ परिवर्तन देहोंका होता है ४७ ६२ धर्म-रक्षणके लिये ८७ पार्थका प्रश्न, कर्म त्याग मेरा अवतार ११० या कर्म योग ? १३२ ६३ ध्यान देने पर आनंद सिंहासन ८८ पावित्र्य ४६६ पर चढ़ते हैं २१६ ८९ पितृरूपमें गुरु वंदन २४८ ६४ धृतराष्ट्रकी जडताका दर्शन ८५४ ज्ञानेश्वरी ३०
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ १९० पुण्यकी समाप्तिके बाद १४ ब्रह्मांडका पूर्ण रूप ५४० पुनः मृत्युलोक २७५ १५ ब्रह्मा, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे ९१ पुरुषोत्तमका विवेचन ६२० मुक्त नहीं २३७ ९२ प्रकृतिके आठ गुणोंकी १६ ब्राह्मणोंका स्वभाव धर्म ७८५ सहायतासे ब्रह्मांड निर्माण ५३९ १७ भक्त और भगवानका ९३ प्रकृतिके गुणोंसे सामर्थ्य ८६६ होनेवाला भास ७९३ १८ भक्तकी स्थिति गुण विकास ४१९ ९४ प्रकृतिके ये त्रिगुण १९ भक्तकी क्षमायाचना ४२४ सर्वव्यापी हैं ७८३ ४२० भक्त केवल मेरा प्रेम सुख ९५ प्रकृति प्रेरित कर्मयोग का चाहता है ३१० मौका ५१० २१ भक्त भय उद्वेग रहित ४२१ ९६ प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे २२ भक्त मनोरथार्थे विश्वरूप बना ३६० आत्मनात्म विवेक ४३२ २३ भक्त मुझे अत्यधिक मधुर हैं ४२७ ९७ प्रभो तूने अपने हृदयका २४ भक्तिके अष्टसिद्धि भाव २९६ दर्शन दिया ३३६ २५ भक्तिपंथ सरल है ४१२ ९८ प्रत्येक कर्मके प्रथम २६ भगवानका हेतु अर्जुनका मोह ३६९ आयास होते हैं ७९४ २७ भगवानकी अनंत विभूतियोंकी ९९ प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है २०० कल्पना ३१८ ४०० फिर अपनेमें अपना रूप २८ भगवानकी उपाधिता ६१३ आप देखना ५९३ २९ भगवानकी प्रधान विभूतियां ३१९ १ बहिर्मुख मनको अंतर्मुख ४३० भवद्रुमका विस्तार ५७९ करनेकी साधना २३३ ३१ भवद्रुमका स्वरूप ५८० २ बावलकी भांति जो बनता ३२ भिन्न अस्तित्व रखकर और बिगडता है वह २२५ शरणागति ९३४ ३ बारहवे अध्यायकी भूमिका ४०४ ३३ भोगलीप्सा ४८६ ४ बुद्धिका लक्षण ४३७ ३४ भोगार्थ असीम आशा और वैर ६५५ ५ बुद्धिके तीन प्रकार ७७१ ३५ मदप्रिय ज्ञानी भक्त २११ ६ बुद्धिने जो स्वीकार किया ३६ मद्रूपका क्षणिक अनुभव ४१५ उसको देखनेकी इच्छा ३३४ ३७ मनका विवेचन ४३८ ४ बुद्धियोगका वज्र कवच ५७ ३८ मन-बुद्धि आदिका मुझमें लीन हो ८ ब्रह्म और योगका स्वरूप २३० जानेसे मद्रूप हो जाते हैं ४१४ ९ ब्रह्मतत्त्व सिद्धिका विवेचन ७९८ ३९ ममत्वसे भी भक्त मुझसे ४१० ब्रह्म-दर्शनकी कृतार्थता ५०४ मिलते हैं २९१ ११ ब्रह्म प्राप्तिके पथके ये शत्रु ८०४ ४४० महाभारतका वर्णन ३ १२ ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन ८०७ ४१ मातृरूपसे गुरुवंदन ४०५ १३ ब्रह्मलीन होकर जो ४२ मानवके निःसीम स्थितिका नहीं लौटते ५९८ विवेचन १४८
५१ विषयसूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ४३ मानसिक तप सात्त्विक ६९० ६४ मैं उनका हो जाता हूँ जो मेरी ४४ मार्दव ६३९ निष्काम भक्ति करता है २८१ ४५ मुझ पर अपार कृपा कर मेरी ६५ मैं केवल निमित्तमात्र हूँ ४६६ रक्षा की ३३७ ६६ मैं गुरुकी कठपुतली हूँ ७ ४६ मुझमें मिलनेके बाद कोई भिन्नता ६७ मैं तो आँखोंसे दीखता हूँ ३०२ नहीं रहती २९० ६८ मैं भक्तोंके कीर्तनमें रहता हूँ २६५ ४७ मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ६९ मैं सबका संहार करनेवाला ढक दिया २०७ काल हूँ ३७७ ४८ मुझे जाननेके लिये इंद्रियोंको ७० मैं सर्वत्र हूँ यह विश्व मेरा अंतर्मुख करो ३०४ विस्तार है २५४ ४९ मुझे जाननेवाला कोई एकाद ७१ मैं सर्वव्यापी हूँ ३०८ होता है २०१ ७२ मैं सर्वव्यापी हूँ किंतु २१६ ५० मुझे निष्काम प्रेम चाहिए २८२ ७३ मैं स्वयं कर्मरत हूँ ८२ ५१ मूर्ख लोग हृदयको छोड़ कर बाह्य ७४ मोक्षके लिये स्वधर्ममें आस्था सुखकी ओर दौड़ते हैं २५३ अनिवार्य है ७९२ ५२ मृत्युके समय असहाय स्थितिमें ७५ मोह आंधीमें फंसकर भगवद् स्मरण होगा क्या ? २३४ तामांधमें ६५९ ५३ मृत्युके समयकी पहली स्थिति ७६ मोहग्रस्त धृतराष्ट्रकी जिज्ञासा ८ चैतन्य प्रधान २४४ ७७ मौन छोड़ कर गुढ़ गुण वर्णनके ५४ मृत्यु समयकी दो स्थितियां २४२ लिये क्षमा ६२६ ५५ मेरा चित्त हो श्रीकृष्ण ७८ मौन भूषणादिसे गुरु पूजन ७१२ गुण-वर्णनमें समर्थ ४०६ ७९ यश ६२२ ५६ मेरा वह परम पद ५९७ ८० यज्ञके भी तीन प्रकार हैं ६८५ ५७ मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब ८१ यज्ञादिके आदि लेनेका कुछ मुझे समर्पण करना २९५ मंगलनाम ७०० ५८ मेरी भक्तिमें कुल जाति आदिका ८२ यह अध्याय शांत और अद्भुत बंधन नहीं २८९ रसका प्रयागराज है ३३२ ५९ मेरे शुद्ध रूपमें कल्पनासे विश्व ८३ यह अनुपम ग्रंथरत्न है ६८८ उत्पन्न होता है २५५ ८४ यह नहीं करना चाहिए ८४१ ६० मेरे स्मरण पूर्वक जो शरीर ८५ यह गीता आत्मज्ञानकी लता है ६२२ छोड़ता है वह मद्रूप होता है २२८ ८६ यह नाम शुद्ध पर ब्रह्म है ७०६ ६१ मेरे भक्तोंसे जो यह गीता ८७ यह विज्ञान है २०२ कहेगा वह मद्रूप होगा ८६६ ८८ यह शब्द ब्रह्मका नवनीत ६३८ ६२ मैं अंधोंके हाथमें पड़ा ८९ यह सब मिथ्या स्फुरण है मोति-सा हूँ २६४ उस मैं का स्वरूप ८१५ ६३ मैं अकेला सबमें भरा हूँ ६०५ ९० यह सब मैं ही हूँ अविद्याके कारण भिन्न दीखता है २३६ ज्ञानेश्वरी ३२
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ९१ यह सुनकर अंधा धृतराष्ट्र १९ लोक क्षयके लिये आसुरी अंतःकरणसे भी अंधा रहा ३३१ लोगोंका जन्म है ६५३ ९२ यह स्थिति स्वयं प्राप्त ५२० लोक संग्रहार्थ कुशलता करनी होती है १५९ पूर्वक कर्म ९४ ९३ युद्ध परांगमुखता २३ २१ वर्ण व्यवस्थाके आधार भी ९४ युद्ध वर्णन ७ त्रिगुण हैं ७८३ ९५ ये सभी अध्याय मैने २२ वर्णानुसार सहज कर्म ही गुरु कृपासे गाये हैं २२६ अधिकार है ७८९ ९६ योग-ज्ञान व्यवस्था ६३२ २३ वह भाग्य अर्जुनको मिला जो ९७ योग साधनाका प्रारंभ और किसीको नहीं मिला ३९९ ऐसे करना १६८ २४ वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको ९८ योग साधनाका पाता है ५९५ स्थान ऐसा हो १६७ २५ वाणीका तप सात्त्विक ६८९ ९९ योग साधनाका विस्तार २६ वास्तविक अहिंसा ४५० और परिणाम १७१ २७ विजय गया अब दूर ५६९ ५०० योग साधनामें आसन १६८ २८ विदेहावस्था में किये गये १ योगाग्निसे सतत उपासना १२० मुक्त कर्म ७४८ २ योगी आत्म-धर्म आत्मामें और २९ विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य देह-धर्म देहमें देखता है ६०३ होता है ७४२ ३ रहो हृदयमें सदा ५३० विश्वरूपकी अद्भुतता ३५० अनुरक्त मेर ६८ ३१ विश्वरूपकी भयानकतासे ४ राजस दुःखका लक्षण ७८१ विह्वल सृष्टि ३५२ ५ राजस ज्ञानका विवेचन ७५७ ३२ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूप ६ राजसिक आहारका विवेचन ६८२ जड़में एक सृष्टि ३४३ ७ राजसिक कर्ताके लक्षण ७६७ ३३ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूपमें ८ राजसिक कर्मके लक्षण ७६२ रूप विविधता ३४४ ९ राजसिक कर्मत्याग ७२६ ३४ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूपमें ५१० राजसिक तप ६९२ वर्ण विविधता ३४४ ११ राजसिक दान ६९६ ३५ विश्वरूपके संबंधमें अर्जुनकी १२ राजसिक धृतिके लक्षण ७७५ जिज्ञासा ३५७ १३ राजसिक बुद्धिके लक्षण ७७३ ३६ विश्वरूपमें अनेक देवताओंका १४ राजसिक यज्ञका विवेचन ५४५ दर्शन ३४५ १५ रजोगुणीके लक्षण ५४५ ३७ विश्वरूप विसर्जन ३९८ १६ रजोगुणीका स्वभाव धर्म ५५२ ३८ विश्व ही मेरा घर ऐसी भावना ४२५ १७ रोगसे असावधान ४१६ ३९ विषय विस्तारके लिये १८ लज्जा ३४० निवृत्तिनाथका उलाहना १४७ ३३ विषयसूचि (3)
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ५४० विषयीको आत्म सुख नहीं मिलता ६८ ६३ शौच ६४२ ४१ विषयोंका स्पष्टीकरण ४१९ ६४ श्रद्धाका विविध रूप ६७६ ४२ वृद्धावस्थासे अनजान ५१२ ६५ श्रद्धा भी तीन प्रकारकी ६७४ ४३ वेद आज्ञाके अनुसार कर्त्तव्य कर्म ६६७ ६६ श्रद्धा हीन कार्य कभी सफल नहीं होता ७०८ ४४ वेद वादियोंके वाग्जालमें नहीं आवो ५९ ६७ श्रीकृष्णका अर्जुन प्रेम ३३० ४५ वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता ८३९ ६८ श्रीकृष्णका भक्त-प्रेम ३३५ ४६ वेदोंको भी अगम्य ब्रह्मपद २५२ ६९ श्रीकृष्णकी भक्तवत्सलता ३५२ ४७ वैभव पूर्ण पूजनसे मैं किसीका नहीं होता २८२ ५७० श्रीकृष्णद्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण १८१ ४८ वैराग्य ४७२ ७१ श्रीगुरूका सामर्थ्य २१२ ४९ वैराग्य और अभ्याससे अज्ञा-नको दूरकरना अधियज्ञ २५७ ७२ श्रीगुरूकी अवर्णनीय महिमा २९९ ५५० वैराग्यका लाभ और श्रीगुरूका लोभ ७९९ ७३ श्रीगुरूकी मानस पूजा ५७१ ५१ वैश्य तथा शूद्रोंका स्वभाव धर्म ७८२ ७४ श्री गुरूको वंदन १५४ ५२ व्यवहारिक अहिंसा ४४९ ७५ श्री गुरु निवृत्तिनाथका आध्यात्मिक वर्णन २९८ ५३ शरणागतिका विवेचन ८३३ ७६ श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी महिमा ८६२ ५४ शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व ४३६ ७७ श्रीमद्भगवद्गीता महिमा ५ ५५ शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार ४३० ७८ श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान १६४ ५६ शरीर नाशवान है ९७ ७९ श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन १०६ ५७ शरीर-भाव रहित आत्मा अधियज्ञ २२७ ५८० श्रोताओंको नमन ६ ५८ शरीर है जितना आत्मज्ञानभी अपना- ६०० ८१ संकल्पवादियोंकी दृष्टिसे आत्मानात्म विवेक ४३३ ५९ शांति ६३७ ८२ संकल्प-शून्य मन चैतन्यमय हो सर्व-व्यापी होता है १३५ ५६० शारीरिक तप सात्विक ६२८ ८३ संघात और क्षेत्र विवेचन ४४२ ६१ शास्त्रपूर्वक श्रद्धापूर्वक पूजनेवाले लागोंकी गति ६७३ ८४ संतका पावन चरित ४२२ ६२ शास्त्रोक्त निष्काम कर्ममें आत्मज्ञान मिलता है ७९० ८५ संतजनोंसे कविकि विनय ३३३ ८६ संतोंको ही आत्म-दर्शनकी शक्यता है ४५ ८७ संदेह विनाशका घर १२६ ८८ संन्यासकी परिभाषा-काम्य कर्मका त्याग ७१८ ८९ संन्याससे मूल अविद्या नहीं रहती ७३४ ज्ञानेश्वरी ३४
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ५९० संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्वरूपमें १४ सबको त्रिवेणी ज्ञानसुलभ हो भर गया ३४८ इसलिये देशी भाषामें ९१ संसारमें कुछ दुखी और कुछ यह घाट रचा ३३३ सुखी क्यों ? ५०७ १५ सभी अहंकारकी भूत ९२ संसार वृक्ष उन्मूलून चेष्टामें आते हैं २१० कैसे करना ? ५८८ १६ सभी प्रकारके मोहसे ९३ संसारवृक्षका पहला पल्लव ५७९ मुक्त मनुष्य २४७ ९४ संसारवृक्षका बीज और बड ५७७ १७ सभी साकार वस्तुओंमें ९५ संसारवृक्षकी कल्पना ५७५ ओतप्रोत अविनाशी हम २२४ ९६ सकल जन-जीवनका जीवन १८ सभी सुख दुख उसीमें लीन ७३ वैश्वानर मैं हूं ६०६ १९ सभी स्वभावके आधीन ८२४ ९७ सरकर्म तीर्थमें उज्वल होनेसे ६२० २० सम दृष्टिसे कर्म करना ७२९ सत्व-संशुद्धि होती है ७२४ २१ सम बुद्धिसे लड ५७ ९८ सत्भावसे होनेवाले लाभ ७०४ २२ समरस भक्तिकी अद्वयावस्था ८१७ ९९ सत्य ६३५ २३ समर्पणका रहस्य ८२१ ६०० सत्वको स्पष्ट करने रज तम २४ समर्पणका भाव ४६३ कहे गये हैं ६९८ २५ सरल बुद्धि जिज्ञासुके १ सत्वगुणके लक्षण ५४४ सम्मुख गुह्यका उद्घाटन २४२ २ सत्व रज तम इन तीन गुणोंके २६ सरल शब्दोंमें उपदेश दो ७७ कारण पुनर्जन्म ५४३ २७ सरस्वती वंदन २ ३ सत्व संशुद्धि ६३१ २८ सर्वत्र परमात्म दर्शनका ४ सत्वस्थका स्वभाव-धर्म ५५० सरल मार्ग १८४ ५ सदा विषय-सेवन ४९५ २९ सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है २५६ ६ सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी ६३० सर्वत्र सुखका वर्णन २७७ दुर्गति नहीं होती १९३ ३१ सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे ७ सबका नाश करनेवाली मुझमें लीन हो ८३० दैवी शक्ति ३६९ ३२ स-संकोच विश्वरूप ८ सबका मूल आधार ५६९ दर्शनकी प्रार्थना ३३९ ९ सबके अज्ञानका कारण भी मैं ६०९ ३३ सहज नित्यत्व है अध्यात्म २२४ ६१० सबके लिये मेरा द्वार खुला है २१२ ३४ सातवे अध्यायका उप संहार २१९ ११ सबके हृदयमें जो आत्म ३५ सात्विक आहारका महत्व ६१८ स्फुरण है ६०८ ३६ सात्विक आहारका विवेचन ७५७ १२ सब कोई मुझसे ही ३७ सात्विक कर्ताके लक्षण ७६६ उत्पन्न हुए हैं ३०४ ३८ सात्विक कर्मके लक्षण ७६१ १३ सबको तेरे दांत पीस रहे हैं ३७३ ३९ सात्विक ज्ञानका विवेचन ७५७ ६४० सात्विक तप ६९३ ३५ विषयसूचि
{llr | llr} क्रमांक & विषय & पृष्ठ & क्रमांक & विषय & पृष्ठ
४१ & सात्विक त्याग & ७२८ & ५६ & सोलहवे अध्यायकी समालोचना & ६६९
४२ & सात्विक दान & ६९४ & ५७ & स्वधर्म अनादि और अनिवार्य है & ८४
४३ & सात्विक धृतिके लक्षण & ७७५ & ५८ & स्वधर्ममें मृत्यू भी श्रेष्ठ है & ९९
४४ & सात्विक बुद्धिके लक्षण & ७७२ & ५९ & स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि & ५३
४५ & सात्विक यज्ञका विवेचन & ६८५ & ६० & स्वभाववादियोंकी दृष्टिसे आत्मानात्म विवेक & ४३४
४६ & सात्विक श्रद्धावाला शास्त्रोंका अनुकरण करता है & ६७७ & ६१ & स्वरूप विस्मरण ही अज्ञान है & ४३६
४७ & सात्विक सुखका विवेचन & ७७९ & ६२ & स्वाध्याय & ६३३
४८ & साधना अधुरी रही तो & १९३ & ६३ & स्थितप्रज्ञके लक्षण & ६५
४९ & साधनावस्थाका विवेचन & ८०१ & ६४ & स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा & ६४
५० & सुख दुःखका स्वरूप & ५०० & ६५ & स्थैर्य & ४७०
५१ & सुख भोगकेलिये पापसे धन संचय & ६५६ & ६६ & स्थैर्य & ६४१
५२ & सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या ? & ८४६ & ६७ & स्वैराचार & ४८७
५३ & सूत्र रूपसे पिछले नौ अध्यायोंका उप संहर & ३०० & ६८ & हरिकृपाका वर्णन & ३९
५४ & सेवाका मूल्य प्रसाद दान & ८६८ & ६९ & हिंसा & ४८५
५५ & सोलहवे अध्यायका समारोप & ६७१ & ७० & हे आदि अनादि पुरुष क्षमा कर & ३८८
\begin{center} ❧ ॐ ❧ \end{center}
ज्ञानेश्वरीके विशेष अध्ययनके लिये विषय - विश्लेषण ❖❖❖❖❖ ज्ञानेश्वरीकी एक विषयसूचि पहले दी है। वह सामान्य विषयसूचि है। विशेष अध्येताओंके लिये दूसरी एक विषय सूचि यहां दी जाती है। इससे ज्ञानेश्वरीमें कौन कौन विषय किस अध्यायके किन ओवियोंमें आये हैं इसका पता चलेगा। इसमें १४० के करीब मुख्य विषय चुनकर फिर उनके उपविभाग किये गये हैं। विषयके जो अंक हैं वे काले-बोल्ड-टाइपमें अध्यायके और सादे-पायका-टाइपमें ओवियोंके हैं। जैसे 'अक्रोध' १६ : १२५-१२९ ओवी संख्या । ॐ \t अनिंदा १६ : १४१-१५२ नमन- १ : १, २-२० \t अभ्यासयोग- नामका उपयोग- १७ : १५७-१६७ \t -का सामर्थ्य ८ : ८१-८५, १२:१११-११३ ब्रह्मका नाम- ८ : ११८, १७ : ३४३ \t -का स्वरूप ६ : ४१९-४२६, १२:९७-११० अक्रोध- १६ : १२५-१२९ \t अमानित्व १३ : १८४-२०० १६ : २०५ अचापल्य- १६ : १८३-१८५ \t अमृत- अद्रोह- १६ : १९९-२०३ \t -का दुर्लभत्व २ : २४० अधिभूत- ८ : ३०-३२ \t -का परिणाम १ : ७७ 'अध्यात्म- \t -की उत्पत्ति १८ : १४७६-१४७७ -की महत्ता ११ : ४४-४७ \t परमामृत २ : ६७, १० : १९४-१९८ -की परिभाषा ८ : १८-१९ \t प्राकृत १० : २२०-२२५ -ज्ञाननित्यत्व १६ : ६१५-६२० \t अर्चिरामार्ग- -विद्या १० : २६६ \t -का स्वरूप और फल ८ : २२०-२२५ अध्यायसंबंध- \t अर्जुन- पहला और दूसरा १ : २७४-२७५ \t -का कृष्णसे सख्य १ : ५३७-५५४ दूसरा और तीसरा २ : ३७१-३७३ \t -का कृष्णसे समरसैक्य १०:२९३-२९४, तीसरा और चौथा ३ : २७४ \t १३ : ११४५ १५ : ४५५, १५ : ४५८, पांचवां और छटा ५ : १७७-१७८ \t १८ : १३४८ सातवां और आठवां ७ : १६९-२०५ \t -का निर्मोह, ११ : ४९-६८, १८ : नौंवां और दसवां १० : ४९ \t १५५८-१५६६ दसवां और ग्यारहवां १० : ३३०-३३५ \t -का पूछनेका चातुर्य ७ : २०३-२०४ ग्यारहवां और बारहवां ११ : ७०२-७०६ \t -का शौर्य १:२०१, २ : ८-११, ११ : तेरहवां और चौदहवां १४ : ३३-३८ \t ३८७, १८ : १२९५-१२९६ पंद्रहवां और सोलहवां १६ : ४९-६३ \t -की अनन्यभक्ति २ : ५८-६०, ३ : २१- सत्रहवां और अठारहवां १८ : ६०-७४ \t २९, ९ : २६३-२६२ १० : १८३-१८४ अध्यायसंगति १० : २४-२९, १८ : १४५५ १४५५ ३७ \t विषय-विश्लेषण
-की प्रशस्ति श्रीकृष्णसे १ : २२९, ४ : २८-३०, ६ : १४८-१५१ ९ : ३६-४१, १० : ५६-६१ १५ : ४४७-४५२ १५ : ५७७-५८१, १६ : २६९-२७० -संजयकी ओरसे ४ : ७-१५, ११ : १६५- १७५, ११ : ६४१-६४६, १७ : ४२७- ४३०, १८ : १४७०-१४७२ -ज्ञानेश्वरकी ओरसे ६ : १२०-१३०,८ : ८-१४,१८ : १६८६-१६८९ -की विरक्ति १० : १४५-१८४,११ : ५५५-६०८ -के विशेषण २ : ८-११, १२ : २०, १७ : ३१-३३ -मोहग्रस्त १।१७७-२०६, ११:४९-६१ से कृष्णका प्रेम १ : १४१-१४३, ५ : १६७-१७३, ६ : १४६, १० : ५३-६०, ११ : ३९-४३, १८ : २८२-२८५, १८ : १३४७-१३५१, १८ : १३६८-१३७८, १८ : १३८६-१३८३. १८ : १४१८-१४२५ अलोलुप्त्व १६ : १६३-१६७ अवतार- -का कारण ४ : ४९-५१, १० : २५२ -का कार्य ४ : ५२-५७, १० : २५३- २५४, -की पूर्वस्थिति ६ : ३२०-३२३, ११ : ८३-८५, ११ : १८०-१८१, ११ : ६१४-६१५, १३ : १०७२-१०७४, १३ : ११४०-११४१, १५ : ३१२-३१६ अवस्था- उन्मनी ६ : ३०९-३२०, १५ : ५३३-५४१, जागृती १ : २४६, १८ : ४०४-४०५, १८ : ११०४ निद्रा १८ : ३८१, १८ : ४०३,१२ : ५४०
सुषुप्ति १५ : ५२६ स्वप्न ५ : ५३-५४, ८ : ७३ असक्त बुद्धि-१३ : ५९३, १८ : ९५६-९५९ अहंकार- -का कार्य ३ : १७७-१७८, ३ : १८४- १८५, ७ : १६५-१७१ १८ : १०५१, १८ - १२७४-१२७७ -का स्वरूप १३ - ७७-८३, १३-७१४-७२७, -की उत्पति १४ : ९२, नाहंकृतिभाव ५ : ३८-६३, १८ : ४०१-४२१ निरहंकार १३ : ५२४-५३३, अहिंसा-१३ : २१७-३१०, १६ : ११४, अक्षर- प्रणव ८ : ११०-११८, ब्रह्म ८ : १५-१७, लक्षण ८ : १००-१०३, ८ : १८०-१८३, . अज्ञान-४ : ६८-७०, १४ : १२९-३३, -का कार्य १५ : १३८, १५ : ३४२, १६ : ४३-५१, १८ : ३२६, १८ : ४६०, १८ : ५४१, -का त्याग ५ : ८३; १८ : १३९०-१३९५, -का स्वरूप १४ : ७०-७९, १६ : २४६-५१, -के लक्षण १३ : ६५६-८५१, -परमात्म विषयक ५ : ८२, ९ : १५५-१७० आचार्योपासना-गुरुसेवा- आचार्य-वर्णन, १३ : ३७१-४५३, १४ : १ गुरुका प्रेम १३ : ४५५-४५७, १५ : १९-२६ गुरुका भजन ४ : १६५-१६७, १८ : १५६२-१५७५
ज्ञानेश्वरी ३८.
गुरुका सामर्थ्य- १ : ७७-७९, इच्छा- १८ : १७२३-१७३४ -का कार्य १३ : ९६८ गुरुकृपाका फल १ : ७५, ६ : ३२-३६, -का स्वरूप ७ : १६५-१६६, १८ : १७३४, १३ : १२२-१२५ गुरुकृपाकी आवश्यकता १० : १५३-१७२, इंद्रियां- गुरुके लक्षण १७ : २०८, कर्मेंद्रिय १३ : १००-१०२ गुरुसेवाका फल ४ : १६२, १३ : ३६९, -का दमन २ : ३५७, ३ : २६८, १५ : ९-१६, १८ : ७८५-७८७, १८ : ८३५, आत्मा- १८ : १०१७, अगम्य २ : २६८-२७५, -की आधीनता २ : १११-१२०, -का अकर्तृत्व १३ १०८२-११२८, १३ : १३९-१४२, १३ : २०२-२१२, १८ : २६८-२७५, १८ : ५१५-५१६, -की दृढता २ : ३१०-३१४, -का अनुभव २ : ७२-७६, २ : ३४८-३५० ६ : ३६९-३७२, -के लक्षण १८ : ५०६ -का उद्धार ६ : ६८-८१, -के विषय १३ : ११७-१२० -का स्वरूप २ : १२५-१७१, जितेंद्रिय २ : १२३-१२४, १३ : ११०६-११२०, २ : ३०१-३०९, २ : ३१५-३१६ -प्राप्तिके उपाय १८ : ३९७-४००, २ : ३५१-३५२, ६ : ६२, ६ : ९०-९१, प्राप्तिके रोडे ४ : १९-२६, ज्ञानेंद्रियां १३ : ९१-९९, -लाभ १८ : १२५९, ईश्वर- आत्मानात्मविचार-२ : १२६-१३३' -और भक्तका कार्य ६ : ३२४, १३ : १०३६-१०३८, ८ : १२७-१३०, १० : १३३-१४७, १३ : ११३५-११४२, १५ २९६, १२ : ८२-९५ १५ : ३८१-३९०, -और २ भक्त लंपटता १ : १४२-१४३, आप- ४ : १६४, ५ : १०५, ६ : १३१, १२ : १५६-१५७ ५ : ११०-११२, ६ : ७१, ८ : ६०, १२ : २१४-२२९, १२ : २३४-४०, १४ : ३१७, १५ : २६७, और भक्तका योगक्षेम ९ : ३३५-३४३ १५ : २७४, १८ : ८४२-८४३, कर्मकर्ता ३ : १६०-१६७, आर्जव- १३ : ३५४-३६६, १६ : ११३, का अकर्तृत्व ५ : ७६-८१ १८ : ८४२-८४३, -का अवतारकार्य ४ : ४९-५७, आहार- १० : २५२-२५४, -का महत्व १७ : ११२-११५ -का औदार्य ११ : ९८-१०७, -के प्रकार तामस १७ : १५३-१५९ -दुर्लभत्व ४ : ८-१३, ६ : १४६, राजस १७ : १३९-१५२, -का प्रसाद १८ : २१८-२२१, सात्विक १७ : १२५-३७ १८ : १६६९-१६७३ साधकका ६ : ३४९, १८ : १०२४-१०२७ १८ : १३२०-१३२२, अन्नका महत्व ३ : १३३-१३५ १८ : १३८३-१३८७, ३९ विषय-विश्लेषण
१८ : १४०९-१४१५, —का सगुण रूपवर्णन ११ : ६००-६०८ —का वर्णन १८ : १२९९-१३०४ —का स्तवन अर्जुनसे १० : १४४-१८४, ११ : ९८-१०९, —की अगम्यता ५ : १७४, १० : ६४-७१ —की व्यापकता १० : २१५-३०७ —के गुण २ : २९०, ३ : २८, ६ : ३७-३८ १२ : २३९-२४४, १७ : ४२३ —के विशेषण ९ : २७८-२९५ —प्राप्तिकी साधना ९ : ४३०, ९ : ४६५-४६६, ९ : ४७०-४७१, ९ : ५१६, १० : ७२-७३, ११ : ६८५-६८८, ११ : ६९६-६९८ १२ : ३५-३८, १२ : ४०-८१, १२ : ९८-१४०, १८ : ९१४-९२२, —शरणागति १८ : १३१९, १८ : १३९८-१४०० —साक्षीभूत ९ : १२९ —स्वरूपकी व्यापकता ७ : ३३-३९, ७ : १५९-१६४, ९ : २६५-३०२, १० : ८२-११४, १० : २६३-२६४, १० : ३१७, ११ : २७१-२७७ १४ : ३७३-३८०, १५ : ३९७-४२१, उपाधि— अक्षरपुरुष १५ : ५०२-५१९ निरुपाधिकतत्त्वके ज्ञानके लिये २ : १४८-१५०, ८ : १७९-१८१ ८ : १९४, १५ : ४६४-४७०, १५ : ५२५-५५७ एकांतसेवा ६ : १६४-१७९, १३ ; १९८-१९९, १३ : ५१८-५१९ १३ : ६१२-६१३, १८ : १०२२-१०२३, ऐश्वर्ययोग— ९ : ७१-९२, कर्ता— —का स्वरूप ३ : १७८, १८ : ३२१-३२६, —के प्रकार तामस १८ : ६६२-६८८ ” राजस १८ : ६६०-६६१ ” सात्विक १२ : ६३१-६४८ —ज्ञानी १८ : २१२-२१४ कर्म— —अपरिहार्य ३ : ५६-६३ कर्माकर्म विवंचना ४ : ८५-९८ काम्य— १८ : ९८-१०५ —का कारण और हेतु १८ : ३१५-३७६ का फल ३ : १५१, १८ : १२२-१२३, १८ : १३९, १८ : १५८-१६३, —का फलत्याग १८ : १२४-१२६, १८ : २५७-२६७, —का फलत्याग न करनेवाला ७ : १५१-१५८ —का योग-रूप साधन ६ : ५४-६०, —की प्रचोदना १८ : ४६१-४७७, —की व्याख्या ४ : ८९, ८ : २७-२९, १८ : ५०७-५१४, —कुशलता १७ : ३४६-३५२, १८ : १६४-१७७ —के विविध फल १८ : २३३-२५६, —तामस—१८ : ६११-६२६ नित्य—१८ : ११५-११७, निषिद्ध—४ : ९१ नैमित्तिक—१८ : ११०-१११ नैष्कर्म्य ४ : ९३-९८, १८ : १५४, १८ : ९७०-९८३, १८ : २२७-२३२. प्रायश्चित्त—१८ : १०१७. —फल ईश्वरार्पण १८ : २२७-२३२. फल हेतुरहित—२ : २६४-२७७, २ : २७८-२७९ ३ : ६८-७५. —बंध ३ : १८४-१८५, ८ : २०५ ज्ञानेश्वरी ५०
बिना नामकां- १७ : ४१४-४२२ ब्राह्मण- १८ : ८३३-८५४, मिथ्याचार ३ : ६४-६६ योग- ३ : ३७, ३ : ४४, ५ : १६-१७. राजस- १८ : ५९०-६१० लोकसंग्रहार्थ- ३ : १५४-१९५, ३ : १७३-१७६ विकर्म ४ : ९० विभूति-७ : ४६-५१ विहित-३ : ११८-१२६, १८ : १४९-१५३ वैश्य-१८ : ८८०-८८२ शास्त्रोक्त-१८ : ८८८-८९३ शूद्र-१८ : ८८३. -संग्रह १८ : ४७८-५१५ सात्विक-१८ : ५८६-५९३ क्षत्रिय-१८ : ८५६-८७८. कामक्रोध- -का परिणाम- ३ : २६०-२६२, १६ : ४४५-४५४. -का वर्णन ३ : २१-२८, ३ : २३९-२५९, १६ : ३२७-३४२ १६ : ३९५-३९६, १८ : १०५७-१०६१. -का सामर्थ्य ३ : २३२-२६६. -के त्यागका कारण १६ : ४२५-४३६ -के त्यागका फल १६ : ४३७-४४४ -को जीतनेका उपाय ३ : २६७-२७० कीर्तन- अप्राप्य ९ : २०६ -का फल ९ : १९५-२०५, ९ : २०७-२०९. -का स्वरूप ९ : २१०, १० : ११९-१२९, कुंडलिनी- -का परिणाम ६ : २६०-२९०, ९ : २१४ -का मार्ग १२ : ४८-५७ १८ : १०३६-१०४० -का स्वरूप ६ : २२२-२५० -की शक्ति ६ : २५१-२५९. कृतार्थता-३ : १४७-१४८, ७ : १११, ७ : १७६-१७७, १५ : १८५-१८७, १८ : १५६२-१५७१. क्रमयोग- १८ : १०११-११११ गणेश- १ : १-२०, १० : १२४, १३ : १, १७ : १-८. गीता- -और कर्म १८ : १४३७-१४३९. -और ज्ञान १८ : १४४६-१४५१ -का उपासनाकांड १८ : १४४०-१४४५ -का फल १८ : ४८, १८ :१६९६. -का माहात्म्य १ : ५०-५५, १८ : ३०-५९ १८ : १६६०-१६८९. -का संप्रदाय १८ : १४७५-१५०९. -की गहनता १ : ७०-७१, ११ : २६-२७, -की वेदोंसे तुलना १८ : १४५६-१४६२, १८ : १५१०-१५११. -के अधिकारी १ : ५६-६०, ६ : २२-३०, ९ : ३६-४० १२ : २३०-२३३, १५ : ५८१, १८ : १७४९ -के अनधिकारी ६ : १९४-१९६. -के विषय १८ : १२४३-१२४४. -वेदका मूल है १८ : १४२६-१४६६ गुण- -और बंध १४ : १४६-१४८, -और मरणोत्तर गति १४ : २५६-२५८, रज १४ : २७२-२७३, १४ : २३८-२४२ सत्व १४ : २१४-२२५, १४ : २७१. -और गुणातीत १४ : ३२७-३६९. -की उत्पत्ति : १४ १३९-१४५, तम-१४ : १७४-१९५, १४ : २५५-२५९. १५ : १६३-१७४. रज-१४ : १६०-१७३, १५ : १५५-१६२, सत्व-१४ : १४९ १५९, (4) ४१ विषय-विश्लेषण
१५ : १८४-२०५. —की वृद्धि— तम १४ : २४४-२५४ रज १४ : २२७-२३६ सत्व १४ : २०५-२१३, —की व्याप्ति १७ : ५६-६० १८ : ८१४-८१७ —से मुक्त होनेका मार्ग १४ : ३०१-३०८ १४ : ३७१-४०० चित्त— आत्म-रत ३ : १८३, ५ : ३४-३६, ५ : १४८ ईश्वर-रत १८ : १२६७-१२६९ —शुद्धि १८ : १५५-१६०. चिंता— ईश्वरविषयक—६ : ४४७. लौकिक १६ : ३३०-३३३. जगत्— —का स्वरूप १८ : २३८-२३९ —की उत्पत्ति १४ : ६६., १० : ९७-११६ जन्म-मृत्यु— —अनिवार्य है २ : १५९-१६०, १८ : १०१ —का अनुदर्शन १३ : ५३६-५५४, १६ : १७५-१८६ —का स्वरूप १८ : १२८०. जरा— अनुदर्शन १३ : ५५५-५८६ —का वर्णन १३ : ७५६-७६०. जीव— अविद्याग्रस्त—७ : ६०-६७. कर्ता—१८ : ४९०-५०५. —का पुनर्जन्म १५ : ३६१-३६७. —का स्वरूप १८ : ३२१-३२६, अलिप्तता १४ : ३४८-३५०. —स्त्रीके विषयमें १५ : ३६८-३७२. परमात्मासे ऐक्य प्राप्त—६ : ७१-८४, ६ : ४८०, १२ : १५३. प्रकृतितत्त्व—१५ : ३५२-३६०. तत्— —नामका उपयोग १७ : ३७०-३७३. तत्त्वज्ञानार्थदर्शन—१३ : ६२३-६३१. तप— —का स्वरूप ४ : ६५, १६ : १०५-११२, १८ : ८३७. —तामसिक १७ : २५४-२६२, —मानसिक १७ : २२७-२३७ राजसिक १७ : २४२-२५७ वाचिक—१७ : २१६-२३३ शारीरिक—१७ : २०२-२१४. सात्विक— १७ : २४०-२४१, तेज १६ : १८६-१९०, १८ : ८५८-८६० त्याग— —का स्वरूप १६ : १३१-१३५, १८ : ९२ तामसिक— १८ : १७८-१८३, राजसिक— १८ : १८४-१९८ सात्विक— १८ : १९९-२१६, दंभ— ३ : २५०, १३ : ६५८-६६०, १६ : २१७-२२३ —त्याग ( अदंभ ) १३ : २०२-२१५, दम— १६ : ८९-९३, १८ : ८३५-८३६, दया— १६ : १५४-१६२, दर्प— १६ : २२४-२२९, १६ : ३९३-३९४, १८ : १०५५-१०५७, दान— —दैवीगुण १६ : ८५-८८, —क्षत्रियोंमें १८ : ८६९-८७०, तामसिक १७ : २९४-३०७, —राजसिक १७ : २८४-२९३ —सात्विक १७ : २६६-२८३, दुःख— —का अनुदर्शन १३ : ५९०-५९१ —का कारण २ : १११-११९, ज्ञानेश्वरी ४२