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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

४५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

घिरा हुआ दैत्यराज सिन्धु देवराज इन्द्रके आसनपर आरूढ़ हो गया। उसने देवताओंके सभी पदोंपर उन दैत्योंको नियुक्त कर दिया। तब शुम्भ आदि दैत्य उन- उन पदोंपर निःशंक होकर स्थित हो गये ॥ ३८-३९ ॥ वे सभी दैत्य उस असुराधिपति सिन्धु, जो सर्वाधिक बल-पराक्रमशाली था, उसकी प्रशंसा करने लगे और विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे स्वर्गलोकको निनादित करने लगे ॥ ४० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'देवताओंकी पराजय' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥

छिहत्तरवाँ अध्याय सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना, देवताओंको आश्वस्तकर भगवान् विष्णुका गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंसहित वहाँ आना, दैत्यसेना तथा देवसेनाका युद्ध

ब्रह्माजी बोले—देवताओंके साथ देवराज इन्द्रने वैकुण्ठलोकमें सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए भगवान् विष्णुके समीप आकर उन्हें प्रणाम किया और अपने आगमनका प्रयोजन बतलाया ॥ १ ॥ इन्द्र बोले—हे गोविन्द! सिन्धुदैत्यद्वारा की गयी हमारी इस दुर्दशाको क्या आप नहीं जानते हैं? हमारी अमरावतीपुरीपर दुष्टोंने आक्रमण किया है ॥ २ ॥ यद्यपि देवताओंको साथ लेकर मैंने उसके साथ यथाशक्ति युद्ध किया, किंतु जब उस दैत्य सिन्धुको जीता नहीं जा सका, तभी मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे जगदीश्वर! आपके बिना हमारी कोई गति नहीं है। आप ही सर्वदा हमारी गति हैं। आप इस दैत्य सिन्धुका वध करें और हमें अपने-अपने स्थानोंको प्राप्त करायें ॥ ३-४॥ ब्रह्माजी बोले—इन्द्रके वचन सुनकर भगवान् विष्णु चिन्ता तथा आश्चर्यसे समन्वित हो गये और इन्द्रसे बोले—'आप लोगोंको भयभीत होनेकी आवश्यकता नहीं है, मैं क्षणभरमें ही उस असुर सिन्धुपर विजय प्राप्त कर लूँगा।' ऐसा कहकर भगवान् हृषीकेश अपने वाहन गरुड़पर आरूढ़ हुए। उस समय उस गरुड़की उड़ानसे तीनों लोक प्रकम्पित हो उठे ॥ ५-६ ॥ पक्षियोंसे समन्वित वृक्ष भूमिपर गिर पड़े। उस समय भगवान् विष्णु मुकुट तथा कुण्डल धारण किये हुए थे और वनमालासे विभूषित थे ॥ ७ ॥ कौस्तुभमणिकी आभासे उनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था। उन्होंने कस्तूरीका उज्ज्वल तिलक लगाया हुआ था। वे अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए थे। इस प्रकारसे सुसज्जित भगवान् विष्णु इन्द्रनगरी अमरावतीमें गये। गरुड़के आसनपर आरूढ़ भगवान् विष्णुसहित सभी देवगणोंको आया हुआ जानकर असुर अपने हाथोंमें विविध प्रकारके शस्त्र धारणकर युद्धके लिये आ पहुँचे ॥ ८-९ ॥ तब महापराक्रमशाली दैत्य सिन्धु भी युद्ध करनेकी इच्छासे हाथमें धनुष, तूणीर तथा चक्र लेकर घोड़ेपर सवार होकर अत्यन्त रोष करता हुआ वहाँ आया ॥ १० ॥ इसके पश्चात् कुबेर, वरुण, वायु, अग्नि, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, मंगल, दोनों अश्विनीकुमार तथा कामदेव भी युद्धस्थलमें आये। सिन्धु दैत्यके सामने ही देवताओं तथा दैत्योंमें द्वन्द्वयुद्ध चल पड़ा। उस युद्धमें दैत्य प्रचण्डका वरुणके साथ, यक्षराज कुबेरका कमल दैत्यके साथ, सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्रका वृत्रासुरके साथ, निशुम्भका वायुके साथ और शुम्भ दैत्यका शक्तिसम्पन्न विष्णुके साथ मल्लयुद्ध हुआ ॥ ११-१३ ॥ इसी प्रकार अग्निदेवने चण्डके साथ और चन्द्रमाने मुण्डके साथ भीषण युद्ध किया। मंगलका कदम्बके साथ, शम्बरासुरका कामदेवके साथ एवं दोनों अश्विनीकुमारोंका कालदैत्यके साथ युद्ध हुआ। सभी सैनिकोंने शस्त्रों तथा अस्त्रोंके आघातसे एक-दूसरेके मर्मस्थानोंपर अनेक बार चोट पहुँचायी ॥ १४-१५ ॥ युद्धके मतवाले कुछ योद्धा मल्लयुद्ध कर रहे थे, कुछ दूसरे शस्त्रोंके आघातसे परस्पर चोट पहुँचा रहे थे।

क्री०ख०-अ०७६ ] * सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना * ४५१ कुछ वीर मृत्युको प्राप्त हो गये, कुछ मरणासन्न अवस्थावाले हो गये और कुछ शरीरके अंगोंके कट जानेपर भी इधर- उधर गति कर रहे थे। कभी वे दूसरेको पराजित कर देते तो कभी स्वयं पराजित हो जाते थे॥ १६-१७॥ तदनन्तर वृत्रासुरने अपनी मुष्टिकाके प्रहारसे इन्द्रके ऊपर आघात किया। तदनन्तर वे दोनों बड़े वेगसे अपने- अपने मस्तकसे दूसरेके मस्तकपर चोट पहुँचाने लगे॥ १८॥ इसी प्रकार हाथसे हाथको, पैरसे पैरको मारने और वक्षःस्थलसे वक्षःस्थलपर टक्कर मारने लगे। तदनन्तर इन्द्रने वज्रसे वृत्रासुरपर प्रहार किया॥ १९॥ वज्रके आघातसे वह भूमिपर गिर पड़ा और उसे जोरकी मूर्च्छा आ गयी। थोड़ी ही देरमें चेतना प्राप्तकर वृत्रासुरने वज्रके समान कठोर मुष्टिके आघातसे इन्द्रपर प्रहार किया, उस चोटसे वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। उनके मुखसे रक्तकी धारा बह चली, वे जबतक भागते, उससे पहले ही सभी दिशाओंसे युद्धकी इच्छा करनेवाले दैत्य वहाँ आ पहुँचे। तब उनका वैसा बल- पराक्रम देखकर इन्द्र अन्तर्धान हो गये॥ २०-२२॥ इस प्रकार जो-जो भी देवता असुरोंसे द्वन्द्वयुद्ध कर रहे थे, उन सभीका अभिमान चूर-चूर हो गया और वे युद्धस्थलसे पलायन कर गये॥ २३॥ इस प्रकार सभी देवताओंके पलायन कर जानेपर भगवान् विष्णुने अपने वाहन गरुडको प्रेरित किया। वे अपने सुदर्शनचक्रकी दीप्तिसे तथा अपनी दीप्तिसे सभी दिशा-विदिशाओंको प्रभासित करते हुए वहाँ आये और उन्होंने अपने चक्रकी धारसे अनेकों दैत्यसमूहोंपर प्रहार किया। उस प्रहारसे कुछ दैत्योंके मुख कट गये, किसीकी गर्दन धड़से अलग हो गयी॥ २४-२५॥ कुछ दैत्योंके सौ भागोंमें टुकड़े हो गये और कोई घुटना, जंघा तथा बाहुसे रहित हो गये। कुछ उनकी शरणमें चले गये, उन्हें भगवान् विष्णुने नहीं मारा॥ २६॥ भगवान् विष्णुके हाथों मारे गये वे सभी महाबली दैत्य मुक्तिको प्राप्त हुए। वहाँ शीघ्र ही रणांगणमें मेद तथा मांस बहानेवाली नदियाँ प्रवाहित होने लगीं॥ २७॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने शंख बजाया, जिसकी तीव्र ध्वनिने सम्पूर्ण जगत्‌को निनादित कर दिया। इस प्रकार भगवान् विष्णुद्वारा सबके ऊपर विजय प्राप्त कर लेनेपर वे शुम्भ आदि सभी दैत्य उस द्वन्द्व-युद्धको करना छोड़कर उनके साथ युद्ध करनेके लिये आ गये॥ २८१/२॥ तब भगवान् श्रीहरिने विराट्रूप धारण किया और चण्ड, मुण्ड, निशुम्भ तथा शुम्भ नामक उन चारों दैत्योंको पकड़कर और घुमाकर उसी प्रकार दूरस्थित श्रेष्ठ नदीके मध्यमें फेंक दिया, जैसे कोई मनुष्य भिन्दिपालके द्वारा पत्थर (-के गोल टुकड़े)-को फेंक देता है। वे कुछ देरके लिये मूर्च्छित हुए, किंतु फिर सचेत होकर अपनी दैत्यसेनामें आ गये॥ २९-३१॥ तदनन्तर श्रीहरिने बिना घबड़ाये दैत्य प्रचण्डके हृदयमें, वृत्रासुरकी पीठमें, काल, कमल एवं भौमासुरके सिरमें मुष्टिसे प्रहार किया। कदम्बासुरपर चक्रसे आघात किया। उन माधवने कोलासुरके हृदयमें गदासे प्रहार किया॥ ३२-३३॥ तदनन्तर वह सिन्धु नामक दैत्य भयंकर कोलाहल ध्वनिद्वारा दिशाओं एवं विदिशाओंको निनादित करते हुए शीघ्र ही दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा और बोला- 'हे विष्णो! मैंने तुम्हारा बलपौरुष देख लिया॥ ३४॥ अब तुम मेरा भी पौरुष देखो, अब तुम यहाँसे जा नहीं सकते हो। मेरी नजरोंके सामनेसे आजतक कभी भी कोई शत्रु जीवित रहकर नहीं गया है॥ ३५॥ तुम तो भूत, भविष्य तथा वर्तमानकालकी सब बातोंको जाननेवाले हो, तुमने पूर्वमें इस विषयमें विचार क्यों नहीं किया? जिसके शब्दमात्रसे तीनों लोक अत्यन्त प्रकम्पित हो उठते हैं, उसकी नगरीमें तुम सूर्यके आगे जुगनूके समान क्यों चले आये हो?'॥ ३६१/२॥ इस प्रकारका मिथ्या प्रलाप करते हुए उस दैत्याधिपति सिन्धुसे देवता बोले-'जो वीर होते हैं, वे डींग नहीं हाँकते, बल्कि पौरुष दिखलाते हैं। हमें भगवान् विष्णुकी आज्ञा प्राप्त नहीं है, नहीं .तो अबतक तुम्हारे सैकड़ों टुकड़े हो गये होते'॥ ३७-३८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विष्णुका रणभूमिमें युद्धार्थ आगमन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥

सतहत्तरवाँ अध्याय

४५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- सतहत्तरवाँ अध्याय सिन्धुदैत्यका देवताओंको पराजित करना, विष्णुका उसके पराक्रमसे प्रसन्न हो वरदानके रूपमें देवोंसहित उसके नगर गण्डकीपुरमें रहना, विष्णुका देवताओंको आश्वस्त करना, दुष्ट सिन्धुदैत्यद्वारा किये गये अधर्माचरणका वर्णन ब्रह्माजी बोले-देवताओंके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर क्रुद्ध हुआ वह दैत्य सिन्धु आगकी चिनगारी उगलता हुआ उन देवताओंपर वैसे ही टूट पड़ा, जैसे कि सिंह हाथियोंके समूहपर टूट पड़ता है ॥ १ ॥ दैत्य सिन्धुने अपनी मुट्ठीसे बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्रपर प्रहार किया, जिस कारण वे पृथ्वीतलपर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्ष भूतलपर गिर पड़ता है। दैत्यराज सिन्धुने कुबेरके मस्तकपर, वरुणके हनुदेश (टुड्डी)-में और यमकी पीठमें चक्रके आघातसे प्रहार किया ॥ २-३ ॥ अग्निदेवके तालुदेशपर चोट पहुँचायी, कामदेवको लातसे मारा, वायुदेवको पैरसे आघात किया और शनैश्चरको कुचल डाला। उसने चन्द्रमा तथा मंगलको पकड़कर बलपूर्वक घुमाया और भूतलपर पटक दिया। सनक तथा सनन्दनके पृष्ठभागमें चोट पहुँचायी ॥ ४-५ ॥ दोनों अश्विनीकुमार तथा देवर्षि नारद कहीं अन्यत्र ही भाग चले। उस सिन्धुदैत्यका पराक्रम देखकर उस समय सभी देवता भाग गये ॥ ६ ॥ कुछ देवता गिर पड़े तथा कुछ मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने चक्रके द्वारा भगवान् विष्णुकी मुट्ठीमें मारा तो उनका चक्र भूमिपर गिर पड़ा ॥ ७ ॥ तब भगवान् माधवने गदाके द्वारा उस दैत्यके सिरपर आघात किया। उस प्रहारसे बचकर दैत्यने अपनी गदा उनके ऊपर फेंकी ॥ ८ ॥ उसके पराक्रमको देखकर मधुसूदन भगवान् विष्णु उससे बोले-'अरे दैत्य ! जो तुम्हारे मनमें हो, वह वर माँगो। इस प्रकारका पुरुषार्थ अभीतक मैंने किसी भी असुरमें नहीं देखा है।' तब अत्यन्त आनन्दित होकर दैत्याधिपति सिन्धु बोला - ॥ ९-१० ॥ हे देवेश्वर ! यदि आप सन्तुष्ट हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो हे हरे! मेरे गण्डकी नामक नगरमें आप अपने परिवारके साथ हमेशाके लिये निवास करें। हे प्रभो ! मैं इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उत्तम वर नहीं माँगता हूँ। तदनन्तर भगवान् महाविष्णु बोले- 'मैं तुम्हारे नगरमें निवास करूँगा। चूँकि मैंने तुम्हें वर दे दिया है, इसलिये मैं तुम्हारे अधीन हो गया हूँ' ॥ ११-१२१/२ ॥ इसके पश्चात् सिन्धु नामक उस दैत्यने सत्यलोक, कैलास, तथा विष्णुलोकमें अपने दैत्यपतियोंको प्रतिष्ठित किया और स्वयं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हो गया, फिर वहाँ भी उसने दूसरे दैत्याधिपतिको स्थापितकर लक्ष्मीपति विष्णुके साथ विविध प्रकारके वाद्यों तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ अपनी पुरी गण्डकीकी ओर प्रस्थान किया। बन्दीजन उसकी स्तुति करते हुए कह रहे थे कि 'ऐसा पुरुष कहीं भी नहीं हुआ, जो कि बहुतसे देवताओंको जीतकर विष्णुभगवान्‌को अपने घरमें ले आया हो' ॥ १३-१५१/२ ॥ गण्डकीनगरके निवासियोंने वरुण, हरि, कुबेर आदि प्रधान-प्रधान देवताओंको उसके समीपमें स्थित देखा। इसके बाद सभी नगरवासी अपने-अपने घरोंको चले गये। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने भगवान् विष्णुसे कहा- 'तुम गण्डकीनगरमें देवताओंके साथ सुखोंका उपभोग करो।' तब उन्होंने भी वैसा ही किया। दैत्य सिन्धुने उस गण्डकीनगरके चारों ओर दूर-दूरतक दैत्यों तथा अन्योंको सुरक्षाहैतु नियुक्त कर दिया ॥ १६-१८ ॥ इसके पश्चात् सभी देवता भगवान् विष्णुसे कहने लगे-'हे गरुडध्वज ! आपने यह क्या किया ? आप अपने पराक्रमका परित्यागकर इस प्रकार आनन्दमें निमग्न होकर क्यों रह रहे हैं ? ॥ १९ ॥ हम लोग कैसे इस कारागारमें पड़ गये हैं। कैसे मृत्युलोकमें आ गये हैं? हे जगदीश्वर ! हमारे इस दुःखभोगका अन्त कब होगा?' ॥ २० ॥

क्री०ख०-अ०७८ ] * बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका संकष्टचतुर्थीव्रत करना * ४५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तदनन्तर श्रीविष्णु उन सबसे बोले—'कालका | कर दिया और उन्हें गहरे जलमें छोड़ दिया। इसीके साथ अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। कालके द्वारा ही सब | दैत्य सिन्धुकी मूर्ति बनाकर अत्यन्त आदरभावसे स्थापित कुछ उत्पन्न होता है, वृद्धिको प्राप्त होता है और अन्तमें | किया और उस मूर्तिकी पूजाके लिये राक्षसोंको नियुक्त संहार भी हो जाता है ॥ २१ ॥ | कर दिया। तदनन्तर वे दूत अपने स्वामी सिन्धुके पास अतः आप लोग समयकी प्रतीक्षा करें, काल ही इसे | आये और कहने लगे—हमने विनायक, शिव, विष्णु, सूर्य अपना ग्रास बना लेगा।' इस प्रकारसे महान् बल तथा पराक्रमसे | तथा लक्ष्मी आदिकी प्रतिमाओंको तोड़-फोड़कर शीघ्र ही सम्पन्न उस दैत्य सिन्धुने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करके | अगाध जलमें उन सबको फेंक दिया है, उनके स्थानपर बड़ी ही प्रसन्नताके साथ वह सम्पूर्ण वृत्तान्त अपने माता- | आपकी प्रतिमाएँ स्थापित कर दी हैं, साथ ही आपकी पिताको बतलाया। माता-पिताने उसका इस प्रकारका पौरुष | प्रतिमाओंकी पूजाके लिये राक्षसोंको भी नियुक्त कर दिया जानकर उसे आशीर्वाद प्रदान किया ॥ २२-२३ ॥ | है। हे स्वामिन्! यह सब करनेके बाद ही हम सब आपके तदनन्तर अत्यन्त दुष्ट दैत्य उस सिन्धुने सम्पूर्ण | पास आये हैं। इस प्रकारसे उस सिन्धु दैत्यके राज्यमें सर्वत्र पृथ्वीपर यह घोषणा करवायी कि 'आजसे देवता, | ही धर्मका लोप होने लगा ॥ २७–३० ॥ ब्राह्मण तथा गौकी पूजा जिस किसीके द्वारा भी की | सभी लोग यज्ञ, दान, पितृपूजन, स्वाहाकार तथा जायगी, वह निश्चित ही वधके योग्य होगा अथवा उसे | वषट्कारसे रहित हो गये। कहीं भी देवताओं, ब्राह्मणों शीघ्र ही मेरे पासमें लाना होगा, जहाँ-जहाँ भी | तथा गुरुजनोंका पूजन नहीं होता था ॥ ३१ ॥ [देवताओंकी] प्रतिमाएँ हैं, उन्हें खण्डित करके जलमें | अनेकों ऋषिगण सुमेरुपर्वतपर चले गये तथा कुछ फेंक दिया जाय। मेरी ही प्रतिमा बनाकर घर-घर लोग | नष्ट हो गये। इस प्रकारसे तीनों लोकोंमें दैत्य और राक्षस उसकी पूजा करें।' सिन्धु दैत्यद्वारा कहे गये इन | अत्यन्त प्रबल हो गये थे। साधु पुरुष तथा देवता या तो वचनोंको दूतोंने जगह-जगहपर लोगोंको पुकार-पुकारकर | कहीं छिप गये या निधनको प्राप्त हो गये। उस दैत्यराज बतलाया ॥ २४–२६ ॥ | सिन्धुसे देवताओंने जिस प्रकारसे मुक्ति प्राप्त की थी, उसे उन्होंने मन्दिरोंको तोड़ डाला, मूर्तियोंको खण्डित | अब आप लोग सुनें ॥ ३२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकृत देवनिग्रहण' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥ ❖ अठहत्तरवाँ अध्याय बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको संकष्टचतुर्थीव्रत करना तथा स्तुतिद्वारा विनायकदेवको प्रसन्न करना, संकष्टहरस्तोत्रकी महिमा, प्रसन्न हो विनायकदेवका देवोंको वरदान देना और चारों युगोंमें होनेवाले अपने स्वरूपका परिचय देना ब्रह्माजी बोले—अत्यन्त पराक्रमशाली दैत्य सिन्धुके | जिसका जैसा भी मत हो, उसे आज आप सब बतायें ॥ २ ॥ द्वारा बन्धनमें डाले गये वे सभी देवता बड़े ही उत्सुक | ब्रह्माजी बोले—देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर होकर उस दैत्यके वधके उपायके विषयमें ही हर समय | ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने कहा—'ईश्वर ही सब कुछ सोचा करते थे ॥ १ ॥ | करनेवाला है, वह निश्चित ही कल्याण करेगा ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—सभी जनोंके अभिमतको जानकर ही | वे परमेश्वर जिस उपायसे सन्तुष्ट हों, वैसा प्रयत्न 'क्या करना चाहिये'—इसका निश्चय करना चाहिये। अतः | करना चाहिये। वे निश्चित ही इस दैत्यराज सिन्धुको

पराजित करके हम सबको अपना-अपना पद अवश्य ही प्रदान करेंगे।' तदनन्तर वक्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ बृहस्पति बोले—'वे विभु स्वल्पमात्र सेवा-पूजासे भी तत्क्षण ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः असुरोंका विनाश करनेवाले तथा इस चराचर जगत्के गुरुकी शीघ्र ही सभी देवताओंद्वारा प्रार्थना की जानी चाहिये' ॥ ४–५ १/२ ॥ देवता बोले- हे वाचस्पति ! आप यह बतलाइये कि आपकी दृष्टिमें इस समय किस देवकी प्रार्थना की जानी चाहिये, हम सब लोग अपने-अपने पदकी प्राप्तिके लिये उन देवताको निश्चित ही प्रसन्न करेंगे ॥ ६ १/२ ॥ बृहस्पति बोले- त्रिदेवोंके रूपमें स्थित जो परमेश्वर ब्रह्मा बनकर सृष्टि करते हैं, विष्णु बनकर उसका पालन एवं रक्षण करते हैं तथा शिव बनकर उसका विनाश करते हैं। जो निर्बीज हैं अर्थात् जिनकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। जो समस्त सृष्टिके बीजरूप हैं, सभी प्रकारकी वाणियोंसे अगोचर हैं, नित्य हैं, ब्रह्ममय हैं, ज्योतिःस्वरूप हैं और शास्त्रैकगम्य हैं ॥ ७-८ ॥ जो आदि-मध्य तथा अन्तसे रहित हैं, निर्गुण हैं, विकाररहित हैं, बहुत रूपवाले तथा एक रूपवाले हैं। सभी लोग जिनका नाम लेकर सभी कार्योंमें अपने अभीष्टकी सिद्धि प्राप्त करते हैं और जो भक्तिपूर्वक पूजित होनेपर संकटका विनाश करते हैं। वे विनायक देव ही [पूजनीय] हैं ॥ ९-१० ॥ आप सभी उनकी आराधना करें, वे आपके कार्योंको सिद्ध करेंगे। हे देवो ! इस समय यह माघमासका कृष्णपक्ष प्रारम्भ हुआ है। इस माघमासके कृष्णपक्षकी मंगलवारयुक्त चतुर्थी तिथि इन विघ्नविनाशक विनायककी प्रिय तिथि है। वे ही विनायक प्रकट हो करके सिन्धु दैत्यका वधकर आप लोगोंको अपने-अपने पद प्रदान करेंगे। इसमें कोई संदेह करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो-जो भी जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, वे उस-उस अभीष्ट पदार्थको प्रदान करते हैं ॥ ११-१३ ॥ देवता बोले- हे गुरो ! हे मुने ! आपने बहुत अच्छी बात कही है, जिसे सुनकर हमें तृप्ति हुई है। आप इस समय हमारे लिये महान् विपत्तिरूपा महानदीसे पार उतारनेके लिये नाविक बने हैं ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर इन्द्र, वरुण, कुबेर, मधुसूदन विष्णु, बृहस्पति, मंगल, चन्द्रमा, सूर्य, यम, अग्नि, वायु तथा ब्रह्मा आदि वे सभी देवता पंचामृत, सुगन्धित द्रव्य, माला, शमी दूर्वा, पंचपल्लव, वनमें उत्पन्न विविध प्रकारके फल तथा विभिन्न [स्थानोंकी] कंकड़-पत्थर आदिसे रहित मिट्टीको लेकर उस गण्डकी नदीके तटपर गये। वहाँ उन्होंने अनेक वृक्षोंको काटकर उनसे एक विशाल मण्डप बनाया ॥ १५-१७ ॥ लताओं तथा केलेके स्तम्भोंसे उस मण्डपको सुशीतल और छायादार बनाया। तदनन्तर स्नानकर सन्ध्यावन्दनादि नित्य क्रियाओंको सम्पन्न करके अत्यन्त सुन्दर मूर्तियोंका निर्माण किया ॥ १८ ॥ विनायककी वे मूर्तियाँ सिंहके ऊपर आरूढ़ थीं, उनकी दस-दस भुजाएँ थीं। उन दस हाथोंमें दस आयुध विद्यमान थे। उन मूर्तियोंका मुख हाथीकी सूँड़से युक्त था। वे नाना प्रकारके वस्त्र एवं आभूषणोंसे सुसज्जित थीं। प्रत्येक मूर्तिके समीप ही सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियाँ शोभित थीं। सभी मूर्तियाँ किरीट तथा कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रही थीं। उन्होंने पीले वस्त्रका परिधान धारण कर रखा था। सर्पोंके आभूषणसे वे विभूषित थीं ॥ १९-२० ॥ उस मण्डपके मध्यमें उन मूर्तियोंकी यथाविधि प्राणप्रतिष्ठापूर्वक स्थापना करके देवताओंने सोलह उपचारोंके द्वारा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया ॥ २१ ॥ उन्होंने पञ्चामृत, शुद्धजल, वस्त्र, सुगन्धित चन्दन, दीपक, विविध प्रकारके नैवेद्य, फलों तथा मंगल आरतीके द्वारा सिद्धि-बुद्धिसहित भगवान् विनायकका पूजन करके उनके मन्त्रका जप किया और भगवान् सूर्यके अस्ताचल चले जानेपर उन देवोंने सवितादेवकी प्रसन्नताके लिये सन्ध्या-वन्दन किया, तदनन्तर प्रभु विनायककी स्तुति की ॥ २२-२३ ॥ देवता बोले- हे दीनोंके स्वामी! हे दयासागर ! हे योगियोंके हृदयकमलमें निवास करनेवाले ! आप आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित स्वरूपवाले हैं। आपको

क्री०ख०-अ०७८ ] * बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका संकटचतुर्थीव्रत करना * ४५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नमस्कार है, नमस्कार है ॥ २४ ॥ हे जगत्को प्रकाशित करनेवाले ! हे चित्स्वरूप ! हे ज्ञानके द्वारा जाने जा सकनेवाले ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुनियोंके मानसपटलमें विराजमान रहनेवालेको नमस्कार है। दैत्योंका विनाश करनेवालेको नमस्कार है। हे तीनों लोकोंके स्वामी ! हे तीनों गुणोंसे परे रहनेवाले ! हे सत्त्वादि गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे विभो ! आप तीनों लोकोंका पालन करनेवाले हैं और सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २५-२६॥ मायासे अतीत रहनेवाले तथा भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले ! आपको नमस्कार है। चन्द्रमा, सूर्य तथा अग्नि-ये आपके तीन नेत्र हैं, ऐसे आप त्रिनेत्रको नमस्कार है। आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। अपरिमित शक्तिवाले आपको नमस्कार है, चन्द्रमाको मस्तकपर धारण करनेवाले आप चन्द्रमौलिको नमस्कार है। आप चन्द्रमाके समान गौर वर्णवाले हैं, शुद्ध हैं और विशुद्ध ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है* ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे, उसी समय उनके समक्ष तेजका एक पुंज प्रकट हुआ। उसे देखते ही सभीकी आँखें चौंधिया गयीं और उस समय वे देवता अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ २९ ॥ फिर उनपर कृपा करनेकी दृष्टिसे वे विनायकदेव सौम्य तेजवाले हो गये। तब उन देवताओैंने देवेश्वर विनायकका दर्शन किया, वे सिंहके आसनपर विराजमान थे। उनके दस हाथ थे, उनमें वे दस प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे। उन्होंने मस्तकपर दिव्य मुकुट धारण कर रखा था। नाना प्रकारकी वेश-भूषासे वे बड़े ही मनोरम लग रहे थे। वे अपने वक्षपर धारण की हुई मोतियोंकी सुन्दर मालासे सुशोभित हो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ उन्होंने अपने शरीरपर दिव्य सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेपन किया हुआ था। उनके उदरदेशमें करधनीके रूपमें सर्प बँधा हुआ था। उनके पैरोंमें छोटे-छोटे घुँघरू बँधे थे, जिनसे सुन्दर ध्वनि हो रही थी और अपने मस्तकपर कस्तूरीका तिलक धारण करनेसे वे अत्यन्त उज्ज्वल हो रहे थे। इस प्रकारके स्वरूपवाले उन प्रभु विनायकदेवका दर्शन करके देवताओैंने उन्हें प्रणाम किया और वे कहने लगे ॥ ३२ १/२ ॥ हमने गुरुदेव बृहस्पतिजीके कथनानुसार जिस स्वरूपवाले प्रभुका ध्यान किया था, ये वे ही विनायक हैं। आज वाणी तथा मनसे सर्वथा अगोचर उन्हीं देवका हम साक्षात् दर्शन कर रहे हैं। हे देवो ! आज हमारा जन्म लेना धन्य हो गया, हमारी दृष्टि धन्य हो गयी। हमारा तप तथा दान भी आज धन्य हो गया ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर वे विनायकदेव उन देवताओंसे बोले—मैं आज आप लोगोंकी स्तुतिसे अत्यन्त तृप्त हो गया हूँ, आप लोगोंद्वारा की गयी पूजा, भक्ति तथा किये गये संकष्टीव्रतसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ ३५ ॥ यह स्तोत्र 'संकष्टहरस्तोत्र' के नामसे विख्यात होगा। हे देवो ! जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह मेरे लिये सम्माननीय होगा ॥ ३६ ॥ ऐसे उस भक्तके दर्शनसे यक्ष-राक्षस विनष्ट हो जायँगे। वह यहाँ विविध भोगोंका उपभोग करेगा और अन्तमें मुक्तिपदको प्राप्त करेगा ॥ ३७॥ आप लोग मेरे वचनको पुनः सुनें। आप लोग सिन्धु दैत्यद्वारा पीड़ित किये गये हैं। यज्ञ-यागादि तथा वेद आदिसे वंचित हो जानेपर आप मेरी शरणमें आये हैं। आप लोगोंको गण्डकीनगरमें उस दैत्य सिन्धुने बन्दी बनाकर रखा है। आप लोग स्वाहाकार, स्वधाकारसे

  • सर्वे ऊचुः दीननाथ दयासिन्धो योगिहृत्पद्मसंस्थित । अनादिमध्यरहितस्वरूपाय नमो नमः ॥ जगद्भास चिदाभास ज्ञानगम्य नमो नमः । मुनिमानसविष्टाय नमो दैत्यविघातिने ॥ त्रिलोकेश गुणातीत गुणक्षोभ नमो नमः । त्रैलोक्यपालन विभो विश्वव्यापिन्प्रभो नमः ॥ मायातीताय भक्तानां कामपूराय ते नमः । सोमसूर्याग्निनेत्राय नमो विश्वम्भराय ते ॥ प्रमेयशक्तये तुभ्यं नमस्ते चन्द्रमौलये । चन्द्रगौरfilterाय शुद्धाय शुद्धज्ञानकृते नमः ॥

४५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

रहित हो गये हैं। अतः उस सिन्धु दैत्यका वध करनेके | मूषक होगा और मेरा नाम 'गजानन' होगा ॥ ४२-४३ ॥ लिये मेरा अब दूसरा अवतार होगा ॥ ३८-३९ ॥ | हे देवो! तदनन्तर कलियुगके आनेपर मेरा वर्ण हे देवो! मैं अब देवी पार्वतीके घरमें अवतरित होऊँगा | श्याम होगा। मेरी मूर्ति पत्थरकी होगी और मैं 'धूम्रकेतु' और 'मयूरेश्वर' इस नामसे मैं ख्याति प्राप्त करूँगा। तब | इस नामसे विख्यात होऊँगा। हे देवो! मैं आपके मेरे द्वारा उस सिन्धु दैत्यका वध किये जानेपर आप लोगोंको | मनोभिलषित कार्यकी शीघ्र ही सिद्धि करूँगा ॥ ४४ १/२ ॥ [अपने-अपने] पदों तथा स्थानोंकी प्राप्ति होगी। इसमें | ब्रह्माजी बोले-उन देवताओंसे इस प्रकार कहकर कोई सन्देह नहीं है। हे देवताओ! सत्ययुगमें जो मेरा | वे विनायकदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। हम लोगोंका अवतार हुआ, वह सिंहपर आरूढ़ था। उसकी दस भुजाएँ | कार्य निश्चित ही सम्पन्न होगा-ऐसा समझकर देवताओंको थीं, उसका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी था और वह 'विनायक' | बड़ा ही आनन्द हुआ। जो इस श्रेष्ठ आख्यानका श्रवण इस नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ४०-४१ १/२ ॥ | करता है अथवा अन्य किसीको सुनाता है अथवा [अब इस] त्रेतायुगमें मैं छः भुजाओंवाला तथा | भगवान् विनायकका ध्यान करके परम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक चन्द्रमाके समान वर्णवाला होऊँगा, मेरा वाहन मोर होगा | इसका पाठ करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओंको और मेरा 'मयूरेश्वर' यह नाम होगा। द्वापरयुगमें मेरा विग्रह | प्राप्त कर लेता है और मृत्युके अनन्तर ब्रह्ममें लीन हो रक्तवर्णका होगा। मेरी चार भुजाएँ होंगी। मेरा वाहन | जाता है ॥ ४५-४७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'देवताओंको समृद्धिका वर प्रदान करनेका वर्णन' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥

उन्यासीवाँ अध्याय भगवान् शिवका गौरी तथा गणोंसहित त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमन, भगवान् शिवद्वारा गौरीको गणेशजीके माहात्म्यका प्रतिपादन और उन्हें गणेशाराधनाका उपदेश, देवी पार्वतीका तपस्या करनेके लिये लेखनाद्रिपर्वतपर गमन

ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] दैत्यराज सिन्धुके | हम अगोचर भगवान् शिवका इस दण्डकारण्यमें दर्शन द्वारा देवताओंको जीत लिये जानेका वृत्तान्त जानकर | कर रहे हैं। आज हमारा पाप समाप्त हो गया और महान् भगवान् शम्भु अपने सात करोड़ गणोंसे घिरे हुए होकर | पुण्य फलीभूत हो गया है ॥ ४-५ ॥ अपने स्थानसे त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें आ गये ॥ १ ॥ | भगवान् शिवका दर्शन कर लेनेपर अब हमें वैसे वहाँपर दैत्य सिन्धुके भयसे गौतम आदि महर्षिगण | ही कोई दुःख नहीं होगा, जैसे कि दिवानाथ भगवान् स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार तथा वेद आदिके | सूर्यके उदित हो जानेपर कहीं भी अन्धकार नहीं दिखायी अध्ययनसे रहित होकर निवास कर रहे थे। भगवान् | देता है।' तदनन्तर भगवान् महादेव उन सभी श्रेष्ठ त्र्यम्बकका दर्शनकर वे सभी महर्षिगण चारों ओरसे उन्हें | मुनियोंसे कहने लगे - ॥ ६ १/२ ॥ घेरकर वैसे ही खड़े हो गये, जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण तीर्थस्थलको | शिवजी बोले- दैत्य सिन्धुने तीनों लोकोंपर तथा बालक अपनी माताको घेर लेते हैं ॥ २-३ ॥ | आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन बना लिया है। महर्षियोंने उन्हें प्रणाम किया। उनकी पूजा की | देवताओंको बन्दी बना लिया है। उसने कुछ मुनियोंको और वे कहने लगे- 'आज हम धन्य-धन्य हो गये। | भी बन्धनमें डाल रखा है। यह सब जानकर मेरा मन हमारे नेत्रोंका होना धन्य हो गया। हमारा जन्म लेना | अत्यन्त खिन्न है, मुझे [किसी भी] स्थानपर शान्ति नहीं धन्य हो गया और हमारा ज्ञान धन्य हो गया, जो कि | प्राप्त हो रही है। अतः मैं यहाँ चला आया हूँ ॥ ७-८ ॥

क्री०ख०-अ०७९ ] * भगवान् शिवका गौरी तथा गणोंसहित त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमन * ४५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] आप सभीके दर्शनसे मैं सन्तुष्ट हुआ हूँ और मुझे अत्यन्त प्रसन्नता भी हो रही है। इस समय आप सभी मुझे परिवारसहित रहनेका कोई स्थान प्रदान करें ॥ ९ ॥ महान् पुण्यके फलीभूत होनेपर ही आपका दर्शन होता है, जो समस्त प्रकारके पापोंको विनष्ट करनेवाला है। यहाँपर रहकर मैं जगदीश्वरका श्रेष्ठ ध्यान करूँगा ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोले— त्रिशूली भगवान् शंकरके ये वचन सुनकर वे सभी महर्षि कहने लगे—'हे देव! आप तो सभीके ईश्वर हैं, फिर आपको स्थान देनेवाला दूसरा दाता और कौन हो सकता है ? ॥ ११ ॥ कल्पवृक्षकी कौन-सी कामना हो सकती है ? और वह कामना किस दूसरेके द्वारा पूरी की जा सकती है? क्षीरसागरके जलको पीनेकी तृष्णा क्या छोटे सरोवरके जलसे शान्त हो सकती है ? ॥ १२ ॥ यह पृथिवी आपका ही एक रूप है। वह सदैव आपके वशवर्तिनी है। आप समस्त लोकोंके स्वामी हैं। आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा आप करें ॥ १३ ॥ हे देवेश्वर ! हम आपके रहनेके लिये आपको सुन्दर आश्रम दिखलाते हैं। वह स्थान विविध प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे घिरा हुआ है। वहींपर रमणीय वापी तथा सरोवरका जल उपलब्ध है, उसमें जलजन्तु तथा अनेक पक्षी स्थित हैं। वहाँपर वृक्षोंकी घनी छाया है और वह दूर-दूरतक फैला हुआ है। उस स्थानपर स्वादिष्ट कन्द-मूल तथा फल प्राप्त हैं, वहाँ भूमिपर कोमल-कोमल घास उगी हुई है। हे त्रिनेत्र भगवान् शंकर ! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यहाँपर निवास करें और हम सभीकी रक्षा करें' ॥ १४-१५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर भगवान् महादेव गंगा तथा गौरी और गणोंके साथ वहाँपर निवास करने लगे। हे मुने ! उस आश्रममण्डलको भगवान् शिवने कैलाससे भी अधिक रुचिकर माना। भगवान् शिवका आश्रय पा करके गौतम आदि महर्षिगण संतापरहित होकर विविध प्रकारके तप करने लगे। गंगा तथा गौरीके साथ अवस्थित भगवान् शिवने भी वहाँ तपस्या प्रारम्भ कर दी ॥ १६-१८ ॥ महात्मा भगवान् शिवके गण उनके लिये सभी प्रकारकी सामग्री जुटाते थे। एक दिनकी बात है, देवी

[दायाँ स्तम्भ] गौरी भगवान् सदाशिवसे पूछने लगीं— ॥ १९ ॥ हे शंकर ! आप ही इस विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं। इसका पालन-पोषण करनेवाले हैं और इसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप पृथ्‍वी, जल, अग्नि इत्यादि रूपोंसे अष्टमूर्तिस्वरूप हैं और मूर्तिसे रहित अर्थात् निराकार भी आप ही हैं। आप सर्वेश्वर हैं और सभीको तृप्त करनेवाले हैं। आप सर्वश्रेष्ठतम हैं, सभीकी सब प्रकारकी कामनाकी पूर्ति करनेवाले भी आप ही हैं। हे देव! आप आठों प्रकारके कर्मोंका फल प्रदान करनेवाले और सब प्रकारके अर्थोंके ज्ञाता हैं ॥ २०-२१ ॥ फिर आपसे श्रेष्ठतम और कौन है, जिसका आप ध्यान करते हैं, उसे मुझे बतलायें। देवता, मुनि, नाग, यक्ष, मनुष्य तथा राक्षस और सम्पूर्ण विश्व जिनकी सत्तापर निर्भर है, फिर उन आपसे भी श्रेष्ठ कोई है क्या? तैंतीस करोड़ देवताओं तथा सिद्धों और साधकोंद्वारा आपकी ही पूजा की जाती है ॥ २२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले— पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् शिव कहने लगे— शिवजी बोले— देवि ! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। हे अनघे ! तुम्हारे कथनसे मैं बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ। हे देवि ! तुम सावधान होकर सुनो। मैं विस्तारसे तुम्हें बताता हूँ। हे सुरेश्वरी ! मैं जिनका ध्यान करता हूँ, उन्हें आजतक तुम क्यों नहीं जान पायी ? ॥ २४-२५ ॥ मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये, लोकोंके कल्याणके लिये तथा [जीवोंको] संसार-सागरसे पार करनेके लिये उन (परमात्मा)-के स्वरूपका वर्णन करता हूँ॥ २६ ॥ जो ईश्वर सभी प्राणियोंमें [अन्तरात्मारूपमें] गूढ़ भावसे स्थित हैं, इस विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, जो अनन्त सिरवाले, अनन्त ऐश्वर्यवाले, अनन्त चरणोंवाले हैं, स्वराट् हैं, अनन्त कानोंवाले, अनन्त नेत्रोंवाले तथा अनन्त नामोंवाले हैं। तीनों गुणोंसे अतीत हैं। अनन्त स्वरूप धारण करनेवाले हैं। जो देव वेदोंकी सृष्टि करनेवाले और अखिल अर्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। जो अनन्त शक्तिसे सम्पन्न हैं, विश्वकी आत्मा हैं। सब प्रकारकी उपमाओंसे रहित हैं, पुरातन हैं। शेषनाग, चन्द्रमा, समुद्र, आकाश, नारायण, भारत अर्थात् नर

४५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ऋषिके अवतार अर्जुन तथा मुनि वेदव्यासजीसे भी जिनकी उपमा नहीं दी जा सकती, जिनसे अनन्त जीव उसी प्रकार उत्पन्न होते हैं, जैसे मेघोंसे जलकी धारा निकलती है और जैसे अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं, जिन प्रभुने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदिको सत्त्व, रज तथा तमोगुण प्रदान किये हैं और फिर जिन्होंने उन तीनों देवोंको सृष्टि, पालन तथा संहार करनेकी आज्ञा प्रदान की है, वे ही देव तीनों गुणोंका विभाग करनेवाले होनेसे 'गुणेश' इस नामसे प्रसिद्ध हैं। उन्हीं इन परमात्मा गुणेशका, जो परसे भी परतर हैं, सर्वसमर्थ हैं, परब्रह्मस्वरूप हैं, मैं रात-दिन ध्यान किया करता हूँ॥ २७-३३॥ गौरीजी बोलीं—मैं आपके कथनसे सन्तुष्ट हूँ। लेकिन मुझे विश्वास कैसे हो सकता है? मैं उन गुणेशका प्रत्यक्ष दर्शन कैसे करूँ तथा कैसे उनका भजन करूँ? हे विभो! हे शंकर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो उस उपायको बताइये॥ ३४१/२॥ ब्रह्माजी बोले—गौरीके इन वचनोंको सुनकर महेश्वर पुनः उनसे बोले॥ ३५॥ शिवजी बोले—हे देवि! जबतक तुम अनन्य मनसे एकाग्रचित्त होकर तपस्याद्वारा उनकी आराधना नहीं करोगी, तबतक वे प्रभु कैसे तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन देंगे?॥ ३६॥ देवी बोलीं—हे विभो! हे देवेश! हे अनघ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह मुझे सत्य-सत्य बतलाइये कि किस प्रकारसे मुझे तपस्या करनी होगी और किस उपायके द्वारा उनका दर्शन होगा?॥ ३७॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे भगवान् विनायकके प्रति देवीका आदर-भाव देखकर भगवान् शिवने देवी गिरिजाको वह उपाय बतलाया, जिससे कि उनपर गुणवल्लभ गुणेश प्रसन्न हो सकें॥ ३८॥ तदनन्तर भगवान् शिवने देवी गिरिजाको भगवान् विनायकका एक अक्षरवाला मन्त्र भलीभाँति प्रदान किया और कहा—'तुम बारह वर्षतक तपस्या करो। तदनन्तर तुम्हारे ऊपर विभु विनायक प्रसन्न होंगे॥ ३९॥ तब भगवान् गुणेश तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन देंगे, इसमें कोई संशय नहीं है।' तब देवी पार्वतीने प्रसन्न होकर गिरीश भगवान् शंकरको प्रणाम किया और वे उसी समय तपस्याके लिये जीर्णापुरके उत्तरमें स्थित अत्यन्त मनोहर लेखनाद्रि पर्वतपर चली गयीं और वहाँ मन्त्र- जप तथा ध्यानमें संलग्न हो गयीं॥ ४०-४१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[भगवान् शिवके द्वारा] गौरीजीको मन्त्रोपदेश' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७९॥ अस्सीवाँ अध्याय पार्वतीजीका लेखनाद्रिपर्वतपर बारह वर्षतक तपस्या करना, प्रसन्न हुए भगवान् गुणेशका प्रकट होकर दर्शन देना, गौरीका उन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर माँगना और गणेशजीका उन्हें आश्वासन देना, पार्वतीजीद्वारा सिद्धिक्षेत्रमें प्रासाद तथा गणेशप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, पुनः त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें आकर भगवान् शिवको सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित करना, शिव-पार्वती दोनोंका प्रसन्न होना ब्रह्माजी बोले—वहाँ पहुँचकर देवी पार्वतीने एक अत्यन्त रमणीय वन देखा, जो अनेक प्रकारके पुष्पों तथा [नदियों एवं सरोवरोंके] जलोंसे युक्त था। देवी पार्वती वहाँ पद्मासन लगाकर बैठ गयीं, उन्होंने अपनी दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर स्थिर कर रखी थी॥ १॥ वे पूर्वकी ओर मुख करके गुणेशके ध्यानमें निरत हो गयीं और उनके एकाक्षर मन्त्रके जपमें उसी प्रकार परायण हो गयीं, जैसे कि शुष्क वृक्ष निश्चल भावसे स्थित रहता है॥ २॥ वे न तो फल, न जल, न मूल, न पत्र, न कन्द और न वायुका ही आहार ले रही थीं। वे निश्चल होकर परम शान्तिकी स्थितिको प्राप्त हो गयी थीं॥ ३॥

क्री०ख०-अ०८० ] * पार्वतीजीका लेखनाद्रिपर्वतपर बारह वर्षतक तपस्या करना * ४५९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

इसी प्रकार साधनामें स्थित रहते हुए उनके बारह वर्ष व्यतीत हो गये। तदनन्तर प्रसन्न होकर कृपा करनेके लिये गुणवल्लभ विभु गुणेश साक्षात् प्रकट हुए॥ ४॥ उन्होंने मुकुट तथा कुण्डल धारण कर रखा था, उनकी दस भुजाएँ थीं, उन्होंने त्रिशूल धारण कर रखा था, उनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था, शंख-चक्र तथा मोतियोंकी मालासे वे विभूषित थे ॥ ५ ॥ उन्होंने अक्षमाला तथा कमलको धारण कर रखा था। मस्तकपर कस्तूरीका तिलक लगाया हुआ था। उनके मुखका मध्यभाग नारायणके मुखके समान, दक्षिण भाग शिवके मुखके समान और बायाँ भाग ब्रह्माके मुखके समान था। वे प्रभु शेषनागके ऊपर पद्मासन लगाकर बैठे हुए थे। शेषनागके फणोंके मण्डलकी छाया उनपर हो रही थी, उनका वर्ण कुन्द पुष्प एवं कर्पूरके समान धवल था ॥ ६-७॥ वे विनायक उन जगदम्बा पार्वतीसे बोले—'हे वरानने ! आप रात-दिन जिनका ध्यान करती रहती हैं और गुणेश-गुणेश—इस नामका जप किया करती हैं, वही मैं आपकी निष्ठा, भक्ति और कठिन तपस्याको देखकर आपके समक्ष प्रकट हुआ हूँ। मैं आपके ऊपर प्रसन्न हूँ, [अतः] अपने यथार्थ स्वरूपको बताऊँगा ॥ ८-९ ॥ तैंतीस करोड़ देवताओंमें मुझसे अधिक कोई श्रेष्ठ नहीं है। सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विभेद करनेके कारण लोग मुझे 'गुणेश' इस नामसे जानते हैं॥ १० ॥ सत्त्वादि तीनों गुणोंके कारण मैं [ब्रह्मा-विष्णु- शिवरूप] त्रिविध शरीरवाला हूँ। मैं आपकी तपस्यासे अतिसन्तुष्ट हूँ। आपके मनमें जो भी कामना हो, उसे मुझसे वरके रूपमें आप माँग लें ॥ ११ ॥ हे महेश्वरि ! इस त्रिलोकीमें जो कुछ असाध्य भी होगा, उसे मैं प्रदान करूँगा।' उनके इस प्रकारके वचनको सुनकर अत्यन्त प्रसन्नताके कारण गद्गद वाणीवाली उन गौरीने अपने नेत्रोंको खोला तो सामने स्थित प्रभु विनायकको देखा। उन्होंने उन गुणेश, त्रिगुणेश तथा त्रिविध शरीरवाले प्रभुको प्रणाम किया ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर वे बोलीं—आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया है, मेरी निष्ठा धन्य हो गयी, मेरी तपस्या धन्य हो गयी, मेरा मन्त्र जपना सफल हो गया, मेरे स्वामी शंकर भी आज धन्य हो गये हैं, जो कि आपके चरणकमलका मुझे दर्शन हुआ है॥ १४॥ आज मुझे परम सिद्धिकी प्राप्ति हो गयी, जो कि आपका मैंने प्रत्यक्ष दर्शन किया है। अब मैं किसी अन्य वरकी कामना नहीं करती हूँ, फिर भी मैं आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करूँगी। अतः [हे देव!] आप मेरे पुत्ररूपमें उत्पन्न होइये और आप मुझे प्रीति प्रदान करनेवाले होवें, मुझे आपका निरन्तर दर्शन प्राप्त होता रहे और मैं आपकी सेवा-पूजा करती रहूँ ॥ १५-१६ ॥ देवी गौरीका ऐसा वचन सुनकर गुणेश विनायक अत्यन्त आनन्दित हुए और वे उन गिरिजासे बोले—'मैं आपका पुत्र बनूँगा, मैं आपकी मनोकामना पूर्ण करूँगा और दूसरे लोगोंको भी उनका अभीष्ट प्रदान करूँगा।' उनसे इस प्रकार कहकर भगवान् गुणेश क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये ॥ १७-१८ ॥ जब देवी पार्वतीने दूसरे ही क्षण वहाँ उन गुणेशको नहीं देखा, तो उन्होंने समझा कि मुझे क्षणभरका जो दर्शन मिला था, वह क्या एक सुखद सपना था ? ॥ १९ ॥ ईश्वर (शिवजी)-के उपदेशसे मैंने सम्पूर्ण अर्थोंको प्रदान करनेवाले देव गुणेशका दर्शन किया था, किंतु अब मैं उनके वियोगको सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। ऐसा कहकर देवी पार्वतीने भगवान् गुणेशकी प्रतिमा बनाकर आदरपूर्वक उसकी स्थापना की। उन्होंने एक मन्दिर बनवाया, जिसमें चार दरवाजे थे और वह बड़ा ही सुन्दर था ॥ २०-२१ ॥ देवी पार्वतीने उस प्रतिमाका 'गिरिजानन्दन' यह सुन्दर नाम रखकर उसे प्रतिष्ठापित किया और कहा कि यह स्थान 'सिद्धिक्षेत्र' इस नामसे विख्यात होगा तथा यहाँ अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंको निश्चित ही सिद्धिकी प्राप्ति होगी। इसमें संशय नहीं है। उस स्थानको इस प्रकारका वर प्रदानकर और मन्दिरमें उन विनायककी यथाविधि पूजा करके उन्होंने उनकी प्रदक्षिणा की और उन्हें प्रणाम करके ब्राह्मणोंका पूजन किया। उन ब्राह्मणोंको

४६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

क्री०ख०-अ०८९ ] * पार्वतीका भाद्रमासकी चतुर्थीको गुणेशका पार्थिव-पूजन करना * ४६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ध्यान आदि उपचार, जल, पंचामृत, अनेक प्रकारके वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, धूप, दीप, नाना प्रकारके पुष्प, विविध नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल, गीले पूगीफल एवं लवंग-इलायची आदिसे समन्वित ताम्बूल, दूर्वा, शमीपत्र तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणाओंके समर्पणसे, अनेक प्रकारकी आरतियों, विविध मन्त्रपुष्पांजलियों, अनेक प्रकारके स्तुतिपाठ, प्रदक्षिणा एवं प्रार्थना तथा ब्राह्मणोंके पूजन करनेसे गणेशजीकी मिट्टीसे बनायी गयी वह मूर्ति सजीव हो उठी ॥ ८-११ ॥ उस समय उस मूर्तिकी आभाने करोड़ों सूर्योंकी प्रभाको जीत लिया। प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाको भी जीत लिया और अनन्त चन्द्रमाओंकी चाँदनीको भी फीका कर दिया। उस ज्योतिने गौरीके नेत्रोंकी प्रभाको भी क्षीण कर दिया, जिस कारण वे मूर्च्छित हो भूमिपर गिर पड़ीं। मुहूर्तभरमें जब उनकी मूर्च्छा टूटी तो वे उन जगदीशवरसे बोलीं- ॥ १२-१३ ॥ हे देव ! लगता है मेरे द्वारा आपके पूजन करनेमें कोई गड़बड़ी हो गयी है, जिसके द्वारा यह अभिचार कर्म किया गया है, मैं उसे नहीं जान पा रही हूँ। हे देव ! हे कृपानिधान ! मेरा प्रयत्न विफल क्यों हुआ ? ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन गौरीका इस प्रकारका वचन सुनकर वे प्रभु सौम्य तेजवाले हो गये। उस समय वे अपने समक्ष बालरूपी विनायकको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं ॥ १५१/२ ॥ वे प्रभु विनायक असंख्य मुख, असंख्य नेत्र, असंख्य चरण, तथा असंख्य कण्ठ और असंख्य मुकुट धारण किये हुए थे। सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि-ये उनके तीन नेत्र थे, वे मोतियों तथा मणियोंकी माला धारण किये हुए थे। अत्यन्त दीप्तिमान् थे, उन्होंने अपने हाथोंमें अनेक आयुधोंको धारण कर रखा था और उनके सभी अंग अत्यन्त सुन्दर थे। प्रभुके इस प्रकारके परम अद्भुत पावन स्वरूपका दर्शनकर वे अपने शुभ नेत्रोंको बन्दकर मन- ही-मन सोच-विचार में पड़ गयीं ॥ १६-१८१/२ ॥ उनका शरीर कम्पित होने लगा। वे यह नहीं समझ पा रही थीं कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये। मैं जिनका ध्यान कर रही थी, क्या ये वे ही हैं अथवा मैं किसी अद्भुत अरिष्टको देख रही हूँ। तदनन्तर उन पार्वतीने अपने नेत्रोंको खोलकर दिव्य दृष्टिसे देखा तो उन्हें उस समय भगवान् शिवके द्वारा बताये गये उपदेशके अनुसार वह सब ज्ञात हो गया और वे बोलीं- ॥ १९-२०१/२ ॥ पार्वतीजी बोलीं-इन्हींकी मायासे मोहित होकर मैं अपने समक्ष [स्थित] इन प्रभुको नहीं पहचान पा रही हूँ। तब फिर उन्होंने उनसे पूछा, आप कौन हैं ? आपका आगमन कहाँसे हो रहा है ? आप किसलिये यहाँ आये हैं ? यदि आप गुणेश हैं तो वह मुझे बतलायें ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उनका यह वचन सुनकर वे महापुरुष अपने शब्दोंकी ध्वनिसे सभी दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए बोले- ॥ २३ ॥ देव बोले-हे शुभे ! आप अनुष्ठान करते हुए रात-दिन जिनका ध्यान करती हैं, मैं वही परम पुरुष गुणेश हूँ, मैं परसे भी परतर हूँ। चूँकि वराभिलाषिणी आपसे मैंने कहा था कि मैं आपका पुत्र बनूँगा, इसलिये आपके घरमें अवतरित हुआ हूँ। हे देवि ! इस समय जो मुझे करणीय है, उसे आप सुनें ॥ २४-२५ ॥ मुझे आप दोनों माता-पिताकी सेवा करनी है, दैत्य सिन्धुका वध करना है और देवताओंको उनका अपना- अपना पद प्रदान करना है। [यह सब करनेके] अनन्तर मैं अपने धामको चला जाऊँगा ॥ २६ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन भगवान् गुणेश्वरके वचनामृतका पान करके वे देवी पार्वती परम प्रसन्न होकर उनसे बोलीं- ॥ २७ ॥ गिरिजा बोलीं-आज मेरा परम सौभाग्य सफल हुआ है, यह मेरी तपस्याका परम उत्तम फल है, जो कि मैंने अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके नायक, चिदानन्दघन प्रभु परमात्माका दर्शन किया है, जिनसे अनेक प्रकारकी सृष्टि प्रादुर्भूत हुई है ॥ २८ ॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश-इन पंचमहाभूतों, ब्रह्मा, शिव, विष्णु, चन्द्रमा, इन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, गन्धर्व, यक्ष, मुनिगण, वृक्ष, पर्वत, सभी पक्षीगण, Kalyana Visheshank 2021_Section_16_2_Front

४६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

क्री०ख०-अ०८२] * शंकरद्वारा गौरीपुत्र गुणेशकी महिमाका कथन * ४६३ अमंगलोंका विनाश करनेवाले कल्याणकारी प्रभु शंकर पुनः पार्वतीजीसे बोले- ॥ ६-७॥ हे देवि! गुणोंसे अतीत परमात्मा ही तुम्हारे पुत्र रूपमें अवतरित हुए हैं। तुमने अपने महान् तपस्यानुष्ठानसे साक्षात् विभुका दर्शन किया है ॥ ८ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब शिवजीने ब्राह्मणोंको आमन्त्रितकर गणपतिपूजन, मातृकापूजन, पुण्याहवाचन करके आभ्युदयिक श्राद्ध किया और बालकको घृत एवं मधुका प्राशन कराया। तदनन्तर भूमिको अभिमन्त्रण करनेके पश्चात् देवी पार्वती ने उस शिशुको अपना स्तनपान कराया ॥ ९-१० ॥ भगवान् शिवने गौतम आदि महर्षियोंकी पूजा करके उन्हें अनेक प्रकारके दान दिये। तब उनकी अनुमति पा करके वे महर्षिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर शंकरजीसे बोले- ॥ ११ ॥ ये अनादिसिद्ध, अखिलेश्वर, सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाले और चराचर जगत्के गुरुके भी गुरु आपके पुत्रके रूपमें प्रकट हुए हैं। ये मायाके अधिष्ठाता तथा वेद-वेदान्तादि शास्त्रोंके लिये भी अगोचर हैं। ये सूर्यके मध्याकाशमें स्थित रहनेपर शुभ मुहूर्तमें अवतीर्ण हुए हैं। ये आपके यशका विस्तार करेंगे ॥ १२-१३ ॥ भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको सोमवारके दिन स्वाति नक्षत्रमें, सिंह लग्नमें तथा पाँच शुभग्रहोंके उत्तम योगमें ये पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ १४ ॥ ये श्रीसम्पन्न, पराक्रमशाली, अद्भुत कर्म करनेवाले महान् बलसे सम्पन्न और समस्त लोकों तथा भक्तोंको अत्यन्त सुख प्रदान करनेवाले होंगे। हे शम्भो ! आप ग्यारहवें दिन इनका शुभ नामकरण-संस्कार करें ॥ १५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे सभी मुनिगण अपने-अपने स्थानोंकी ओर चले गये। भगवान् शिव बालकको पार्वतीकी सुन्दर शय्यापर रखकर सभी लोगोंको विदा करके प्रसन्नताके साथ भवनसे बाहर चले आये ॥ १६-१७ ॥ उसी समय शेषनाग वहाँपर आये और उन्होंने अपने फणोंकी छाया बालकपर की। मेघोंने वर्षा करके भूमिको धूलिरहित बना दिया। मालती पुष्पकी गन्धसे समन्वित सुखद वायु प्रवाहित होने लगी। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वोंके समूह गायन करने लगे। चारण उन प्रभुकी स्तुति करने लगे ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर मुनिगणोंने विनायककी मिट्टीकी एक उत्तम मूर्ति बनायी। एक सुन्दर मण्डप बनाया, उसे कदलीवृक्षों तथा पुष्पोंसे सजाया। तदनन्तर पद्मासनमें बैठकर उन्होंने परम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की और वे सभी 'गुणेश-गुणेश' इस नाम-मन्त्रका प्रसन्नतासे निरन्तर जप करने लगे ॥ २०-२१ ॥ उन्होंने एक दिन-रातका उपवास किया तथा रात्रिमें जागरण किया। यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन ब्राह्मणों (मुनियों)-ने व्रतका पारण किया ॥ २२ ॥ इसी प्रकारसे उन्होंने दस दिनोंतक बड़े ही आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन देव गुणेशकी प्रसन्नताके लिये घर-घर महोत्सव किया ॥ २३ ॥ ग्यारहवें दिनकी बात है, उन सभी मुनिजनोंको भगवान् शिवने आमन्त्रित किया और वे सभी भगवान् शिवके पुत्रका नामकरण-संस्कार करनेके लिये वहाँ आये। भगवान् शिवने भलीभाँति उनका मान-सम्मान किया, तब उन मुनियोंने उस बालकका सभीका ईश्वर होनेके कारण 'गुणेश' यह नाम रखा। जो अत्यन्त उत्तम, शुभकारक और सब प्रकारके विघ्नोंका नाश करनेवाला है ॥ २४-२५ ॥ भगवान् शिवने भी उन मुनिजनोंसे कहा कि आप लोगोंने बहुत अच्छा नाम रखा है। तदनन्तर शंकरने यह वरदान दिया कि सभी कर्मोंके आरम्भमें यह प्रथमपूज्य होगा। अनेक प्रकारके दानोंके देनेसे पूजित हुए वे सभी मुनिगण भगवान् शंकरसे आज्ञा लेकर अपने-अपने आश्रमोंको चले आये ॥ २६-२७ ॥ घरके भीतर स्थित देवी पार्वती ने स्वयं भी देवताओंका पूजन किया। तबसे लेकर वह चतुर्थी तिथि गुणेशकी तिथिके रूपमें प्रसिद्ध हो गयी, जो अनेक प्रकारके वर प्रदान करनेवाली है। अपने कल्याणकी प्राप्तिके लिये उस चतुर्थी तिथिको महान् उत्सव मनाना चाहिये।

४६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भगवान् गुणेशकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर यथाविधि उसका पूजन करना चाहिये॥ २८-२९॥ सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। उपवास करके रात्रिमें जागरण करना चाहिये। मोदक, अपूप तथा लड्डुओं और खीरका नैवेद्य लगाकर प्रभु गुणेशका पूजन करना चाहिये॥ ३०॥ दूसरे दिन यथाविधि इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करे। उन्हें प्रणाम करे, तदनन्तर स्वयं भी भोजन करे। जो इस चतुर्थी तिथिको भगवान् गुणेशकी मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर उनका पूजन नहीं करता है, वह बार-बार विघ्नोंके द्वारा बाधित होता है। इसीके साथ ही वह विविध रोगोंसे भी पीड़ित होता है। पतित व्यक्तिकी भाँति ऐसे व्यक्तिका कभी भी दर्शन नहीं करना चाहिये॥ ३१-३३॥ यदि कदाचित् ऐसे व्यक्तिका दर्शन हो जाय तो 'गुणेश' इस नामका मनमें स्मरण करना चाहिये। गणेशचतुर्थीकी महिमाका यथार्थरूपसे वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ। तथापि मैं उनके कर्मोंका यथामति निरूपण करता हूँ॥ ३४१/२॥ सिन्धुदैत्यके दूत गुप्तरूपसे भगवान् शंकरके स्थानपर निवास कर रहे थे। उन दूतोंने जा करके वहाँका सम्पूर्ण समाचार उस सिन्धु दैत्यको बतलाया। उस समय दैत्य सिन्धु बहुत-से योद्धाओंसे घिरा हुआ बैठा था। उसने अप्सराओंके नृत्य तथा गन्धर्वोंके गानका आयोजन किया हुआ था॥ ३५-३६१/२॥ दूत बोले—दक्षिण दिशाके दण्डकारण्यमें त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें हमलोग रह रहे थे। वहाँ रहते हुए हमने शिव नामवाले भगवान्‌को तथा अट्ठासी हजार मुनियोंके बहुत-से आश्रमोंको देखा॥ ३७-३८॥ एक दिनकी बात है, [शिवकी पत्नी] देवी पार्वतीने एक बालकको जन्म दिया। उसकी छः भुजाएँ थीं। वह लावण्यका खजाना था। तीनों लोकोंमें उसके समान कोई नहीं था और वह तेजसे उज्ज्वल था॥ ३९॥ अत्यन्त महान् उत्सवोंके साथ दस दिन बीत जानेपर ग्यारहवें दिन मुनिश्रेष्ठोंने तथा भगवान् शंकरने उस बालकका 'गुणेश' यह नाम रखा॥ ४०॥ उस समय वहाँ हो रहे वाद्योंके निनादसे हम लोग बधिर-से होकर वहाँ स्थित थे। यदि हम उस समय उसे सहसा पहुँचकर मारनेके लिये जाते तो वहाँ जो सात करोड़ गण थे, वे हमें मार डालते। उनमेंसे एक-एक गणका ऐसा बल-पराक्रम था कि वह पर्वतको उखाड़नेमें भी समर्थ था। तब फिर शीघ्र ही आपके पास आकर इस समाचारको कौन बतलाता ?॥ ४१-४२॥ ब्रह्माजी बोले—जब दूत इस प्रकार बोल ही रहे थे कि उस समय एक आकाशवाणी सुनायी पड़ी कि 'अरे दैत्य सिन्धु! तुम्हें मारनेवाला कहीं उत्पन्न हो चुका है, अतः तुम सावधान हो जाओ'॥ ४३॥ सिन्धु बोला—यहाँ कौन है, जो ऐसे दुष्ट वचन बोल रहा है, मारो, मार डालो॥ ४३१/२॥ ब्रह्माजी बोले—तब कुछ दैत्य तो उछल-कूद करते हुए गिर पड़े, और कुछ दौड़ते हुए पलायित हो गये। उसी समय वह दैत्य भी महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गया और भूमिपर गिर पड़ा। वह अत्यन्त चिन्तित, म्लान मुखवाला, उत्साहरहित और हतप्रभ हो गया॥ ४४-४५॥ जब मुहूर्तभरका समय बीत जानेपर उसे चेतना आयी तो वह लड़खड़ाती आवाजमें बोला—'तीनों लोकोंका कण्टक तो मैं हूँ, फिर मेरे लिये यह नया कंटक कौन आ गया ? ॥ ४६॥ बकरा सिंहको कैसे मार सकता है अथवा मच्छर क्या कभी हाथीको मार सकता है? मैंने तैंतीस करोड़ देवताओंको क्षणभरमें जीत लिया था॥ ४७॥ इस प्रकारके पराक्रमवाले मेरी मृत्यु किसके हाथोंमें हो सकती है? आकाशवाणी जो हुई, वह झूठी है, अथवा यदि वह सत्य भी हो तो मैं अपने उस शत्रुको खानेके लिये दौड़ पडूँगा'॥ ४८॥ ऐसा कहकर वह आधे क्षणमें [उठकर] भद्रासनपर बैठ गया। उसकी उस प्रकारकी बात सुनकर सभी वीर उसके पास चले आये और कहने लगे—आप तो कालके भी काल हैं, फिर आपकी मृत्यु कैसे हो सकती है? अथवा आपको कोई मारनेवाला हो तो उसे हम मार

क्री०ख०-अ०८३] * पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्‌का शिशुके दर्शनके लिये आना * ४६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 डालेंगे, चाहे वह स्वर्गमें हो, भूमिपर हो, पातालमें हो | अनेक प्रकारकी माया करके शत्रु‌का विनाशकर मुझे अथवा आकाशमें रह रहा हो। आप हमें आज्ञा प्रदान | समाचार दें॥ ५२१/२॥ करें, हम लोग जायँगे। तब दैत्यराज सिन्धुने उन दैत्योंसे | ब्रह्माजी बोले— इस प्रकार दैत्यराजकी आज्ञा प्राप्तकर कहा— ॥ ४९-५१॥ | वे असंख्य दैत्य वहाँसे निकल पड़े और त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें आप-जैसे मित्रों तथा सेवकोंकी वचनसुधाका | पहुँचकर गुप्तरूपसे वहाँ निवास करने लगे। उनके मनमें पानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आप लोग शीघ्र | यही विचार था कि गौरीका पुत्र गुणेश जहाँ-कहीं भी वहाँ जायँ, जहाँ मेरा वह शत्रु रहता है। आप लोग | होगा, उसे हम मायासे मार डालेंगे॥ ५३-५४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दैत्यवीरोंके त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमनका वर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८२॥ तिरासीवाँ अध्याय पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्‌का शिशुके दर्शनके लिये आना और उसे अनेक प्रकारसे आभूषणोंसे अलंकृतकर उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखना, फिर हिमालयका प्रस्थान, गृध्रासुरद्वारा बालक हेरम्बका हरणकर आकाशमें ले चलना, पार्वतीका शोक, बालक हेरम्बद्वारा गृध्रासुरका वध ब्रह्माजी बोले— हे ब्रह्मन् व्यासजी! वह बालक | लगा रहता है॥ ५१/२॥ गुणेश शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने | ब्रह्माजी बोले— पिताके इस प्रकारके वचनोंको लगा। पार्वतीको सुन्दर पुत्रकी प्राप्ति हुई है—यह | सुननेके पश्चात् पार्वतीजीने उन्हें बैठनेके लिये सुन्दर आसन समाचार जानकर पार्वतीके पिता हिमालय भी बहुत सारे | प्रदान किया। आसनपर बैठनेके अनन्तर गिरिवर हिमालय अनमोल रत्नोंसे समन्वित अलंकारोंको लेकर वहाँ गये। | पुनः अपनी पुत्रीसे कहने लगे—'मैंने देवर्षि नारदजीके मुखसे पिता हिमालयको अपने आँगनमें आया देखकर [उनकी] | सुना है कि तुम्हें परम अद्भुत पुत्रकी प्राप्ति हुई है, इसी कारण पुत्री पार्वतीजी दौड़कर उनके पास गयीं॥ १-२॥ | मैं सभी प्रकारके विघ्नोंका हरण करनेवाले उस मंगलमय बहुत समयके बाद आये हुए पिताका गौरीने | बालकको देखनेके लिये आया हूँ'॥ ६-७१/२॥ आनन्दपूर्वक आलिंगन किया। आनन्दके कारण उन | ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर पार्वतीजीने बालकको दोनों पिता-पुत्रीकी आँखोंसे आँसू निकल पड़े, तदनन्तर | लाकर पिताकी गोदमें बैठाया। तब पिता हिमवान्‌ने उसे गौरीने अपने पिता हिमालयसे कहा—॥ ३॥ | नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित किया और फिर वे गौरी बोली— हे निर्दय पिताजी! आप इतने | उसकी महिमाको बतलाने लगे॥ ८१/२॥ निष्ठुर क्यों हो गये हैं, आप न तो कभी मेरा समाचार | वे हिमालय बोले— यह महान्‌ मायासम्पन्न ही लेते हैं और न अपना समाचार ही भेजते हैं ?॥ ४॥ | बालक इस पृथ्वीको उसी प्रकार निष्कंटक बना देगा, हिमवान् बोले— हे गौरी ! तुम सत्य ही कह रही | जैसे कि चन्द्रमा अपनी किरणोंसे इस पृथिवीको शीतल हो। तुम्हारे बिना मेरे प्राण तो कण्ठमें आकर रुक गये | बना देता है। यह सभी देवताओंको अपने-अपने हैं, अतः हे हरप्रिये! तुम्हें देखनेकी अभिलाषावाला मैं | स्थानपर प्रतिष्ठित करेगा॥ ९-१०॥ यहाँ आया हूँ। जैसे गौका मन हर समय अपने बछड़ेपर | यह तुम्हारे चरणोंकी सेवा करेगा और इसके लगा रहता है, वैसे ही मेरा मन भी निरन्तर तुममें ही | चरणोंकी सेवा मुनीश्वर करेंगे। सभी स्थावर तथा जंगम

४६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] प्राणी इसीके रूप हैं। यह ब्रह्मा आदि देवोंके लिये सदा ध्येय है। यह हजार नेत्रोंवाला, हजार चरणोंवाला तथा सभी ब्रह्माण्डोंके कारणोंका भी कारण है॥ ११-१२॥ यह हजार मुखवाला, अनन्त मूर्तियोंवाला तथा समष्टि और व्यष्टिरूप है। मैंने तीनों लोकोंमें इस प्रकारका तेजोमय बालक कहीं भी नहीं देखा है॥ १३॥ मैं इसके चरणकमलका दर्शनकर उसमें वैसे ही तल्लीन हो गया, जैसे कि जलमें छोड़ा गया जल क्षणभरमें ही तन्मय अर्थात् उसी रूपवाला हो जाता है। हे शुभे! इसके पालन-पोषणका प्रयत्न करो, यह पुरातन निधि है॥ १४ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर पर्वतराज हिमालयने उसके मस्तकपर मुकुट पहनाया, दोनों भुजाओंपर बाजूबन्द धारण कराये, हृदयदेशमें कमलकी आकृतिका आभूषण पहनाया, दोनों कानोंमें रत्नजटित कुण्डल पहनाये, कमरमें करधनी धारण करवायी और पैरोंमें छोटी घण्टियोंसे युक्त बहुमूल्य नूपुरोंको धारण करवाया। इस प्रकार विविध आभूषणोंसे सुसज्जितकर हिमवान्ने उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखा। यह नाम महान् विघ्नोंका हरण करनेवाला तथा भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाला है॥ १५-१७॥ तदनन्तर भोजन करनेके उपरान्त पुत्री पार्वतीकी अनुमति प्राप्तकर पर्वतराज हिमालयने अपने स्थानको प्रस्थान कर दिया। एक दिनकी बात है, बालक हेरम्ब अपने भवनमें खेल रहे थे, उसी समय गृध्रासुर नामक एक असुर गीधका रूप धारणकर वहाँ आया। वह महान् बलवान् तथा अत्यन्त पराक्रमसम्पन्न था। उसके पंखोंकी हवासे पर्वतोंके समूह चूर-चूर हो जाते थे और उसके पंजोंके आघातसे विशाल पर्वतशिखर तथा वृक्ष भी गिरकर टूट जाते थे॥ १८-१९ १/२॥ उस समय गृध्रासुरने [हेरम्बको उठा लिया और] अपने पंखोंकी छायासे बालक हेरम्बको आच्छादित करके आकाशमें उड़ने लगा॥ २०॥ उसने अपने पंखोंकी फड़फड़ाहटसे उठी हुई धूलके द्वारा सभीके नेत्रोंको आच्छादित कर दिया था। [उसके पंखोंसे होनेवाली] महान् ध्वनिसे लोगोंके कान

[दायाँ स्तम्भ] बधिर हो गये। तदनन्तर उस महान् गृध्रासुरने अपनी चोंचके द्वारा बालक हेरम्बको वैसे ही पकड़ लिया, जैसे कि गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है और वह आकाशमार्गमें दूरतक चला गया॥ २१-२२॥ बालकके पराक्रमको न जानता हुआ वह दुष्ट असुर आकाशमें भ्रमण करने लगा। तभी गिरिपुत्री पार्वतीने देखा कि मेरा बालक कहाँ चला गया!॥ २३॥ जब उन्होंने आँगनमें बालकको नहीं देखा तो वे शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और कहने लगीं— किस दुष्ट दुरात्माने मेरे बालकका हरण कर लिया है? तदनन्तर उन्होंने ऊपर आकाशमें गृध्रके मुखमें अपने बालकको देखा। वे मूर्च्छित होकर भूमिमें गिर पड़ीं और 'दौड़ो-दौड़ो'—इस प्रकारसे कहने लगीं॥ २४-२५॥ हे सुरेश्वर! बिना पुत्रके मेरे प्राण निकल जायँगे। क्यों मेरे ऊपर यह आकाश गिर पड़ा है? जगदीश्वर शंकर क्यों मुझपर ही इस प्रकारसे निष्ठुर हो गये हैं? मैंने तो बारह वर्षोंतक निराहार रहकर व्रत किया था। तब वे करुणासागर स्वयंप्रकाश प्रभु मेरे घरमें अवतरित हुए थे, आज वे ही निधिरूप मुझ अभागिनके पापसंचयके फलस्वरूप चले गये हैं, मेरे बालकके चले जानेपर मेरा जो आत्यन्तिक सुख है, वह सर्वथा चला गया है॥ २६-२८ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे उन पार्वतीको शोकमें पड़ा देखकर उनकी सखियाँ भी दुखी हो गयीं। तब उन्होंने अपने बुद्धिबलसे युक्तियोंके द्वारा उनका समाधान किया कि—'[हे देवि!] वह बालक आदि और अन्तसे रहित है, अतः उसके लिये आपको शोक नहीं करना चाहिये॥ २९-३०॥ आपके तपस्यारूपी महान् अनुष्ठानके फलस्वरूप वे स्वयंप्रकाशस्वरूप आपके यहाँ अवतरित हुए हैं। बतलाओ तो सही, क्या कहीं कोई मिट्टीकी मूर्ति सजीव हुई है? हे शुभे! आप स्वस्थ हो जायँ, क्षणभरमें ही आप अपने पुत्रको देखेंगी, वह बालक कालका भी काल है, वह आपके स्नेहवश शीघ्र ही आयेगा'॥ ३१-३२॥ जिस समय सखियाँ इस प्रकारसे कह रही थीं, उसी समय उस बलवान् बालकने अपनी मुट्ठीमें उस

क्री०ख०-अ०८४ ] * बालक हेरम्बकी बाल-लीलामें दैत्योंके वधका आख्यान * ४६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गृध्रासुरकी चोंचको पकड़ लिया, जिससे उसकी साँस बाहर न निकल सकी ॥ ३३ ॥ श्वासके रुक जानेसे वह गृध्र प्राणहीन हो गया और उस बालकसहित वह भूमितलपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे कि वज्रसे आहत होकर पर्वत गिर पड़ता है। गिरते हुए उस गृध्रासुरकी दस योजन विस्तारवाली देहसे बहुत-से घर आदि चूर-चूर हो गये। यह एक महान् आश्चर्यजनक बात हुई! देवालय आदिमें स्थित वृक्षोंके टूट जानेसे पक्षिगण दिशाओंमें भाग चले। तब उस बालकको देखकर सखियाँ कहने लगीं—यह पार्वतीका पुत्र इस प्रकारसे गिरा है कि इसके शरीरमें कहीं भी चोट नहीं लगी है ॥ ३४-३६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—सखिजनोंका इस प्रकारका वचन सुनकर गौरीने शीघ्र ही बालकको पकड़ लिया और उसे अपने हृदयसे लगाकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ। उन्होंने [अरिष्टनिवारणार्थ] अनेकों प्रकारके दान दिये ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा—हे द्विजो ! इस समय तो इस बालकका महान् अरिष्ट चला गया है, आगे भी न हो, ऐसा कहकर ब्राह्मणोंको नमस्कार करके पार्वतीजी अपने भवनमें चली गयीं ॥ ३९ ॥ कहाँ तो वह दस योजन विस्तारवाला पराक्रमी गृध्रासुर और कहाँ यह कोमल शरीरवाला छोटा बालक ! फिर भी इसने उस असुरको मार डाला ॥ ४० ॥ इस समय बालकपनमें जब इसका इतना बल है, तो आगे चलकर यह न जाने क्या करेगा? इसे छोटा नहीं समझना चाहिये, जिस प्रकार आगकी एक चिनगारी विशाल काष्ठसमूहको भस्म कर डालती है, वैसे ही इसने भी उस विशाल असुरको मार डाला है ॥ ४१ १/२ ॥ गौरीने इस प्रकारकी बात अपनी सखियोंसे कही और फिर उन्होंने प्रसन्न होकर बालकको स्तनपान कराया। तदनन्तर शिवगणोंने उस गृध्रासुरकी देहके टुकड़ोंको दूर ले जाकर फेंक दिया। जो इस आख्यानका श्रवण करता है, वह असुरोंके द्वारा पराजित नहीं होता ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गृध्रासुरवधवर्णन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८३ ॥ चौरासीवाँ अध्याय बालक हेरम्बकी बाल-लीलाद्वारा क्षेम, कुशल, क्रूर तथा बालासुर आदि दैत्योंके वधका आख्यान ब्रह्माजी बोले—बालक हेरम्बके दूसरे मासमें सायंकालके समय पार्वतीने उसे उबटन आदि लगाकर पालनेमें रखा और वे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक गीत गाने लगीं। उसी समय क्षेम तथा कुशल नामक दो दैत्य, जो बालक हेरम्बका वध करना चाहते थे, वे दोनों मायावी चूहेका रूप धारणकर वहाँ आये ॥ १-२ ॥ नख तथा दाँत ही उन दोनोंके आयुधरूप थे, ऐसे वे दोनों भयानक चूहे घरके अन्दर आये और जहाँपर बालक हेरम्ब पालनेपर लेटा था, वहींपर आकर परस्पर लड़ने लगे। उन दोनों दुष्टोंके शरीरके बाल खड़े हो गये थे ॥ ३ ॥ उन दोनों चूहोंके चीत्कार शब्दसे कान बहरे हो गये थे तथा उनके पैरोंके आघातसे वहाँकी सम्पूर्ण भूमि जोती हुई भूमिके समान कृषियोग्य हो गयी। तब देवी पार्वती लाठी लेकर उन दोनों चूहोंको डराने लगीं तो भागते हुए वे दोनों ऊपरकी ओर जाने लगे ॥ ४-५ ॥ तदनन्तर परस्पर युद्ध करते हुए वे दोनों भयानक चूहे बालक हेरम्बके ऊपर गिरे। वक्षःस्थलमें चोट लगनेके कारण कर्कश शब्द करता हुआ वह श्रेष्ठ बालक हेरम्ब जग पड़ा। उस समय वे पार्वती डर गयीं। भयभीत हुएके समान बालकने भी अपने दोनों हाथोंको इधर-उधर चलाया। बालकके हाथोंके उस प्रहारसे वे दोनों प्राणहीन-से होकर भूमिपर गिर पड़े। उन दोनोंके मुखसे रक्त प्रवाहित हो रहा था। यह दृश्य देखकर पार्वतीजी अत्यन्त घबड़ा गयीं ॥ ६-८ ॥

४६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जब उन चूहोंके प्राण पूरी तरह नहीं निकले थे, | देवी पार्वती अपने बालकको लेकर शय्यापर सोयी थीं। उससे पूर्व ही भगवान् शिवके गण उन्हें फेंकनेके लिये | उस समय उनकी जो सेविकाएँ थीं, उनमेंसे कुछ तो सो बाहर ले गये। गणेशजीके हाथोंका आघात लगनेके | गयी थीं और कुछ दूसरे कार्योंमें लगी हुई थीं॥ १९-२०॥ फलस्वरूप वे दोनों मोक्षको प्राप्त हुए॥ ९॥ | कुछ सेविकाएँ भवनके द्वारपर बैठकर वार्तालाप दस योजन विस्तारवाले तथा महान् भयंकर उन | कर रही थीं। उसी समय क्रूर नामक असुर विडालका दोनों असुरोंके देह जब बाहर गिरे तो उन्हें देखकर | रूप धारणकर देवी पार्वतीके घरमें प्रविष्ट हुआ॥ २१॥ शिवके गणों, पार्वती तथा उनकी सखियोंका उस समय | वह महाबली दुष्ट असुर लोगोंकी नजर बचाता महान् कोलाहल होने लगा॥ १०१/२ ॥ | हुआ कुत्तेके समान वहाँ गया। पार्वतीजीको सोया हुआ उन दोनों असुरोंके प्राणरहित विस्तृत आकारवाले | देखकर वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ कि जबतक शरीरोंके गिरनेसे आश्रम, वृक्ष, पर्वत तथा घर विध्वस्त | ये गिरिजा सोती रहती हैं, उसी बीच मैं इस शिशुको उठा हो गये। तब शिवके गण उनके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े | ले जाऊँगा। वह शीघ्र ही पलंगके ऊपर चढ़ गया और करके बाहर फेंकनेके लिये ले गये॥ ११-१२॥ | बालकको अपने मुखमें पकड़कर शीघ्र ही पलंगसे नीचे उस समय पार्वती अत्यन्त भयभीत हो गयीं, उन्होंने | कूदा। उस समय बालक रोने लगा॥ २२-२३१/२ ॥ शीघ्र ही बालकको गोदमें ले लिया और वे पुत्रके प्रति | उसी समय पार्वतीजी नींदसे जग पड़ीं, उन्होंने वात्सल्यभावके कारण स्नेहपूर्वक अपना स्तनपान कराने | विडालके मुखमें अपने बालकको देखा तो वे भयसे लगीं। उसी समय पुण्यमयी ऋषिपत्नियां वहाँ आ पहुँचीं | विह्वल हो उठीं और 'दौड़ो-दौड़ो' इस प्रकारसे चिल्लाने और पार्वतीजीसे बोलीं-हे गौरी ! तुम्हारा महान् पुण्य | लगीं। दुःख तथा भयसे उनके नेत्र बन्द हो गये। उन्हें है, जिसके कारण यह विघ्न नष्ट हो गया है। इस दो | मूर्च्छा आ गयी॥ २४-२५॥ मासकी अवस्थावाले बालकने दुष्ट महान् असुरोंको मार | जबतक वह विडाल बालकके कण्ठमें दाँत चुभाता, डाला है। आगे भी तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं | उससे पहले ही बालकने उसके दोनों कानोंको अपने होगा॥ १३-१५॥ | दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और बालस्वभाववश अपने हे माता! यह भूमि राक्षसभूमि है, अतः यहाँ | पैरोंसे उसके सिरपर आघात किया तथा उस महान् शिशुकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। गुप्त रूपसे | असुरको पलंगसे नीचे गिरा दिया। उस विडालका हृदय यहाँ रहनेवाले राक्षस तथा दूसरे मायावी असुर इस | विदीर्ण हो गया और वह बाहर जाकर उसी प्रकार गिर बालकका हरण कर सकते हैं॥ १६॥ | पड़ा, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्षसे थोड़ा-सा पका हुआ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे ऋषिपत्नियां | फल गिराया जाता है। उसका दुर्गन्धयुक्त रक्त भूमिपर चली गयीं, तब शिवगणोंने देवी पार्वतीसे कहा- हे | गिरने लगा॥ २६-२८॥ शिवे! आपका यह बालक तो प्रतिदिन असुरोंका वध | तब उस समय शोकसे विह्वल गिरिजाने दुर्गन्धसे करेगा, ऐसेमें हम लोगोंके द्वारा कबतक मरे हुए | बचनेके लिये अपनी नाक बन्द कर ली और वहाँ पहुँचकर असुरोंको बाहर फेंका जायगा? उसी समय मुनिगण वहाँ | उन्होंने झटसे बालकको पकड़कर प्रीतिपूर्वक अपना आ पहुँचे और उन्होंने रक्षामन्त्रोंके पाठसे उस बालकको | स्तनपान कराया। बालकके रुदनकी ध्वनि सुनकर सभी अभिमन्त्रित किया। देवीने उन्हें अनेक प्रकारके दान | सेविकाएँ वहाँ आ पहुँचीं और कौतूहलयुक्त होकर प्रत्येक दिये, फिर उन्हें प्रणामकर विदा किया॥ १७-१८१/२ ॥ | सेविका उस बालकके अंगोंको छूने लगी॥ २९-३०॥ तीसरे मासकी बात है, एक दिन जब सभी लोग | वे उस बालकके विषयमें दृढ़मति थीं कि यह अपने-अपने कार्यमें व्यस्त थे। मध्याह्नकालका समय था। | बालक अजर-अमर है। उस समय वह विडाल बारह

क्री०ख०-अ०८४ ] * बालक हेरम्बकी बाल-लीलामें दैत्योंके वधका आख्यान * ४६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 योजन विस्तारवाला हो गया॥ ३१ ॥ उसके गिरनेसे कुछ सखियाँ चूर-चूर हो गयी थीं और कितनी ही सेविकाएँ भी चूर-चूर हो गयीं। उस समय भगवान् शिवके गण भी उस प्रकारके विडालको देखने वहाँ आये। वे बालकके बल-पराक्रमको देखकर परम आश्चर्य करने लगे और कहने लगे कि कहाँ तो यह अनेक प्रकारकी माया करनेवाला दुष्ट दैत्य और कहाँ बालकका चरण-प्रहार ? ॥ ३२-३३॥ जो दैत्य इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी सर्वथा अवध्य थे, उन्हें यह बालक लीलामें ही मार गिरा रहा है! ऐसा कहकर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे शिवगण अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ३४ ॥ कुछ बलवान् गणोंने उस दैत्यको कमरसे पकड़कर खींचते हुए बाहर ले जाकर छोड़ा। तदनन्तर वे देवी पार्वती अपने भवनके अन्दर गयीं ॥ ३५ ॥ चौथे मासमें सूर्यके उत्तरायण होनेपर मुनिपत्नियाँ विविध प्रकारके सौभाग्य-द्रव्योंको लेकर पार्वतीके मंगलमय भवनमें आयीं, उनमेंसे कुछ अपने बालकोंको साथ लायी थीं और कुछ अकेले ही आयी थीं। तब देवी पार्वती ने आसन आदि प्रदानकर उनका सत्कार किया ॥ ३६-३७ ॥ अपने बालकको गोदमें पकड़े हुए ही पार्वती ने उन मुनिपत्नियोंको नमस्कार किया। वे सभी हरिद्रा तथा कुंकुमके द्वारा परस्पर एक-दूसरेका पूजन करने लगीं ॥ ३८ ॥ उस समय उन मुनिपत्नियोंने अपने चलनेवाले बालकोंको तथा जो अभी ठीकसे चलना नहीं जानते थे, उन शिशुओंको भूमिपर बैठाया हुआ था। तब देवी पार्वतीका बालक भी उन बालकोंके साथ क्रीडा करने लगा। उस पार्वतीपुत्रकी शोभासे वे सभी बालक ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रमाके द्वारा अन्य तारे सुशोभित होते हैं। यह दृश्य देखकर वे मुनिपत्नियाँ गिरिपुत्री पार्वतीसे इस प्रकार कहने लगीं- ॥ ३९-४० ॥ हे गौरी ! भगवान् शिवके द्वारा प्रदत्त इस तेजस्वी पुत्रको पाकर तुम धन्य हो। तुम्हारे बालकका सान्निध्य पाकर हमारे बालक भी प्रकाशमान-से दिखायी देते हैं ॥ ४१ ॥ पारसमणिका संयोग प्राप्तकर लोहा भी अपने लोहत्वको समाप्तकर सुवर्ण हो जाता है। इस प्रकार कौतुकसम्पन्न वे सभी मुनिपत्नियाँ हलदी, कुमकुम, ईंखके टुकड़े, चन्दन, गुंजक, तिल, गुड़, ताड़पत्र तथा विविध सुगन्धित द्रव्योंसे परस्पर एक-दूसरेका पूजन करने लगीं। कोई-कोई शरीरमें तथा मुखमण्डलमें हलदीका उबटन लगा रही थीं ॥ ४२-४३ १/२ ॥ उसी बीच बालासुर नामका महान् दैत्य समान अवस्थावाला बालक बनकर उन बालकोंके साथ क्रीडा करनेके लिये वहाँ आ पहुँचा। वह पार्वतीपुत्रके साथ मनोविनोदके रूपमें युद्ध-सा करता हुआ, वैसे ही क्रीड़ा करने लगा, जैसे कोई सियार सिंहके साथ और जैसे कोई महिष हाथीके साथ खेलता हो। वे दोनों कठोर बनकर गलेसे गलेको रगड़ते हुए भूमिपर गिर रहे थे ॥ ४४-४६ ॥ तदनन्तर उस दुष्ट असुरने अपने दोनों पैरोंसे गजाननके मस्तकपर प्रहार किया और वह अपने दोनों हाथोंसे बालक विनायकके बालोंको पकड़कर जोरसे खींचने लगा। इतना ही नहीं, वह दुष्ट उसी प्रकारकी ध्वनि करने लगा, जैसे रात्रिमें वृद्ध सियार चिल्लाता है। उन दोनोंको वैसी स्थितिमें देखकर वे गिरिजा उन मुनिपत्नियोंसे कहने लगीं। यह बलवान् बालक किस ऋषिका है, जो मेरे पुत्रको मार रहा है ? यह दुष्ट गधेकी भाँति प्रहर-प्रहरमें चिल्ला रहा है ॥ ४७-४९॥ तदनन्तर बालकोंका ऐसा स्वभाव ही होता है, यह समझकर पार्वती उस ओरसे उदासीन हो गयीं। वे दोनों अत्यन्त प्रिय बालक बार-बार लोट-पोट करने लगे ॥ ५० ॥ वे दोनों बालक एक-दूसरेके सिरके बालोंको सभी ओरसे पकड़कर खींच रहे थे। स्वयं हँस भी रहे थे और अन्य बालकों तथा मुनियोंकी स्त्रियोंको हँसा भी रहे थे। बालक विनायक जान रहे थे कि यह महान् दैत्य है, फिर भी वे उसके साथ खेल रहे थे। तदनन्तर उस दुष्ट बालासुरने अपने दोनों हाथोंसे गणनायक गणेशके कण्ठदेशको इस प्रकार कसकर पकड़ा, ताकि उनके प्राण निकल जायँ। तब विनायकने भी उसी प्रकारसे उस बालासुरको पकड़ा। अब तो असुरकी साँस रुकने लगी ॥ ५१-५३ ॥ उस दैत्यपुत्र (बालरूप दैत्य) को विह्वल देखकर वे