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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

२६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

स्तुति करनेमें मेरी जो जिह्वा प्रवृत्त हुई, वह भी आज | दिखलाया और अपने शब्दसे उस समय आकाश, पृथ्वी धन्य हो गयी है ॥ ३२-३३॥ | तथा दिशा-विदिशाओंको भर दिया था ॥ ४४ ॥ आपके दोनों चरणोंका दर्शन करनेसे मेरा कुल एवं | जिन गणेशजीके विराट् स्वरूपमें पृथ्वी चरणतल मेरा शील धन्य हो गया। हे अखण्ड पराक्रमवाले | थी, दिशाएँ उनके कान थीं, सूर्य नेत्र था, ओषधियाँ गणनायक! मुझे आप अपनी अखण्डित भक्ति प्रदान | उनके रोमस्वरूप थीं, धराको धारण करनेवाले पर्वत करें। हे विघ्नराट् ! आप सर्वज्ञको मैं अपना क्या-क्या | उनके नख थे, मेघ स्वेदरूपी जलबिन्दु थे, चतुरानन दुःख बताऊँ। अत्यधिक अभिमान करनेपर भगवान् | ब्रह्माजी उनकी जननेन्द्रिय थे, जिनके कुक्षिक्षेत्रमें सम्पूर्ण शिवके द्वारा अत्यन्त क्रोध करके भूमिपर पटक दिये | चराचर जगत् और चारों सागर स्थित थे ॥ ४५-४६ ॥ जानेके कारण मेरे मस्तक फट गये हैं। तदनन्तर देवर्षि | वे एक होते हुए भी अनन्त मुखवाले थे और नारदजीके अनुग्रहसे मुझे आपके चरणारविन्दका दर्शन | अनन्त नेत्रोंवाले थे, स्वराट् थे, अनन्त रूपवाले थे, हुआ ॥ ३४-३६ ॥ | अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न थे और अत्यन्त प्रकाशमान थे। हे देव ! इस समय आप मुझे तीनों लोकोंमें | उनके एक-एक रोमकूपमें हजारों-हजार ब्रह्माण्ड आभासित सर्वश्रेष्ठ होनेका वर प्रदान करें। मेरे सभी सिरोंमें पूर्वकी | हो रहे थे, ऐसे उस विराट् स्वरूपको देखकर शेषनाग भाँति दक्षता आ जाय और मैं पृथ्वीको धारण करनेमें | भयभीत होकर भ्रान्त-से हो गये ॥ ४७-४८ ॥ समर्थ हो जाऊँ ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर उन्होंने गणेशजीसे प्रार्थना की कि वे पुनः मुझे अचल स्थान प्राप्त हो और मैं निरन्तर आपका | सौम्य स्वरूपवाले हो जायें। तब वे भगवान् गणेश दस दर्शन करता रहूँ। मुझे भगवान् शंकरका भी सान्निध्य | भुजाओंसे समन्वित और सिंहपर आरूढ़ स्वरूपवाले हो प्राप्त हो, मैं नागोंके कुलमें श्रेष्ठता प्राप्त करूँ और | गये। तदनन्तर वर प्रदान करनेवाले वे भगवान् गणेश भगवान् शिवमें मेरी प्रीति बनी रहे ॥ ३८ ॥ | बोले- हे शेष ! तुमने बड़े भाग्यसे तथा मेरी कृपासे इस गणपति बोले- हे नागोंके स्वामी! यह जो | स्वरूपका दर्शन किया है, मेरा यह विराट् स्वरूप तो तुम्हारा मस्तक दस भागोंमें विभक्त हुआ है, अतः तुम अब | देवता भी नहीं देख पाये हैं ॥ ४९-५० ॥ एक हजार मुखवाले तथा एक हजार फणोंसे सुशोभित | प्रसन्न हुए मैंने तुम्हें अपनेमें, पातालमें तथा होओगे। जबतक चन्द्रमा, सूर्य और तारे रहेंगे, तबतक | भगवान् शिवमें अचल स्थान दिया है। तुम इस पृथ्वीको तुम्हारी कीर्ति लोकोंमें बनी रहेगी और पृथ्वीको धारण करनेकी | पुष्पकी भाँति धारण करो ॥ ५१ ॥ तुम्हारी शक्ति और भी दृढ़ हो जायगी ॥ ३९-४० ॥ | शेष बोले- मैं अपने सिरपर इस धरणी पृथ्वीको नागोंमें श्रेष्ठ हे नागराज ! तुम पाँच मुखवाले | धारण करता हूँ, इसलिये मेरा तथा आपका भी भगवान् शिवके पाँचों सिरोंमें मेरी कृपासे अचल स्थान | धरणीधर यह नाम लोकमें अत्यन्त विख्यात हो जाय। प्राप्त करोगे और तुम्हें मेरा सान्निध्य निरन्तर प्राप्त होगा। | आप इस क्षेत्रमें स्थित होकर भक्तोंकी कामनाओंको हे शेष ! अन्य भी जो तुम्हारी अभिलाषा है, वह सब | पूर्ण करें ॥ ५२१/२॥ सफल होगी ॥ ४११/२॥ | ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर ऐसा ही होगा- इस ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारके वर गणेशजीने उन्हें | प्रकार उनसे कहकर विघ्नेश्वर गणपति स्वयं अन्तर्धान प्रदान किये और अपने उदरदेशमें उनको लपेटकर बाँध | हो गये। शेषनागने भी जिस रूपमें उनका दर्शन किया लिया। तबसे गजाननका एक नाम 'व्यालबद्धोदर' प्रसिद्ध | था, वैसी ही मूर्ति बनाकर बड़े ही आदर-भक्तिपूर्वक हो गया। तदनन्तर विभु गणेशजीने अभय होनेके लिये उन | उसकी स्थापना की और एक अत्यन्त ही शुभ मन्दिरका शेषनागके मस्तकपर अपना हाथ रखा ॥ ४२-४३ ॥ | निर्माण किया, जो सुवर्णनिर्मित था और बहुत प्रकारके उन्होंने प्रसन्न होकर अपना विराट् स्वरूप शेषनागको | रत्नोंसे सुसज्जित था ॥ ५३-५४ ॥

उ०ख०-अ०९१] * गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि * २६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शेषनागने उन गणेशजीकी मूर्तिका 'धरणीधर' यह | नाभिकमलमें भी स्थित हुए। हे व्यासजी! इस प्रकार मैंने नाम रखा। तदनन्तर वे शेषनाग भगवान् विष्णुके | गणेशजीकी अद्भुत महिमाका आपसे वर्णन किया ॥ ५६ ॥ शय्याभावको प्राप्त हुए अर्थात् उनकी शय्या बने और | गणेशजी प्रवालनगरमें 'धरणीधर' इस नामसे प्रसिद्ध उन्होंने अपने मस्तकपर पृथ्वीको उसी प्रकार धारण | हुए। [हे व्यासजी!] शेषनागने इन्हीं अभिलाषाओंकी किया, मानो पुष्पको धारण किया हो ॥ ५५ ॥ | पूर्तिके लिये विभु भगवान् गणेशजीकी आराधना की वे विघ्नराज गणेशजीके आभूषणके रूपमें उनके | थी ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शेषोपाख्यान' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥

इक्यानबेवाँ अध्याय गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि, ब्रह्मपुत्र कश्यपद्वारा गणेशजीकी आराधना और विविध वरोंकी प्राप्ति, कश्यपपत्नियोंसे सृष्टिका विस्तार, कश्यपपुत्रोंद्वारा गणेशजीकी स्तुति व्यासजी बोले- हे देव! भगवान् गणेशजीकी | हुए थे और उन्होंने सुन्दर बाजूबन्द पहन रखा था ॥ ८ ॥ दूसरी अन्य कथा भी मुझे बतलाइये। प्रभो! कथाओंको | सुवर्ण, मणि तथा रत्नोंसे समन्वित मौक्तिकमालाओंको सुनते हुए मेरा मन अत्यन्त उत्सुक हो रहा है ॥ १ ॥ | धारण करनेसे उनका कण्ठदेश अत्यन्त सुशोभित हो रहा ब्रह्माजी बोले- एक बारकी बात है कि प्रलय | था। वे अपने उदरमें सर्प लपेटे हुए थे। करोड़ों सूर्योंके होनेके अनन्तर भगवान् गजाननने मुझे आज्ञा देते हुए | दीप्तिमान् मण्डलके समान उनकी आभा थी ॥ ९ ॥ कहा- 'हे ब्रह्मन्! मेरी आज्ञासे आप विविध प्रकारकी | उनके प्रफुल्लित नेत्र सुशोभित हो रहे थे। सुन्दर- सृष्टि करें' ॥ २ ॥ | सूँड़से उनका मुख रमणीय दिखायी दे रहा था। उनके चरण- तब मैंने अपने मनसे सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न | युगल छोटी-छोटी घण्टियों तथा नूपुरोंकी रुन-झुन ध्वनिसे किया। उनके नाम मैं आपको बताता हूँ। कश्यप, गौतम, | झंकृत हो रहे थे। इस प्रकारके स्वरूपवाले भगवान् गजानन जमदग्नि, वसिष्ठ, भरद्वाज, अत्रि एवं विश्वामित्र-ये | कश्यपजीके सामने प्रकट हुए। कश्यपजी उनका दर्शनकर सात मानस पुत्र सभी विद्याओंके ज्ञाता थे ॥ ३-४॥ | हर्षसे विभोर हो उठे और नृत्य करने लगे ॥ १०-११॥ उन सभीने मुझसे कहा- 'हे ब्रह्मन्! हे सुरेश्वर! | कश्यपजीने उन्हें प्रणाम करके विविध प्रकारके हमें आज्ञा दीजिये।' मैंने कश्यपको उन सभीमें अधिक | मांगलिक उपचारोंसे उनकी पूजा की, तदनन्तर दोनों बुद्धिमान् जानकर उन्हें आज्ञा दी। मेरा सृष्टि रचनेका कार्य | हाथ जोड़कर अत्यन्त आनन्दित हुए कश्यपजीने भगवान् तुम करो-ऐसी आज्ञा मैंने उन्हें दी। वे 'ठीक है' ऐसा | गजाननसे इस प्रकार कहा - ॥ १२ ॥ कहकर तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये ॥ ५-६ ॥ | हे तात! मेरे पिता धन्य हैं, मेरी माता धन्य हैं, मेरा उन्होंने दिव्य हजार वर्षोंतक भगवान् गणेशजीके | तप धन्य है, मेरा ज्ञान धन्य है, मेरा यह शरीर धन्य है और एकाक्षर मन्त्रका जप किया। इससे द्विरदानन भगवान् | आज मेरे ये नेत्र धन्य हो गये, यह पृथ्वी धन्य है और ये गणेश प्रसन्न हो गये [और उनके समक्ष प्रकट हुए] ॥ ७ ॥ | लताएँ, वृक्ष तथा फल धन्य हैं। यह एकाक्षर मन्त्र धन्य है, उनकी चार भुजाएँ थीं, कमलके समान सुन्दर | जिसके प्रभावसे आज मुझे अखिलेश्वर, परात्पर, प्रसन्नात्मा, उनके नेत्र थे, वे बहुत बड़े मुकुटको धारण किये थे। | परमात्मा गजाननका दर्शन हुआ है ॥ १३-१४ ॥ वे अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, माला तथा हाथीदाँत लिये | जिसके यथार्थ स्वरूपका निर्धारण करनेमें चारों

२६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वेद भी कुण्ठित हो जाते हैं, वेदान्तके विद्वान् मूक हो जाते हैं, जो मनके तर्कोंसे अगोचर हैं, उन्हीं देव गणेशका आज मैंने दर्शन किया है॥ १५॥ जिनसे ये विष्णु, शिव तथा अग्नि आदि प्रधान देवता प्रकट होते हैं, सातों पाताल तथा चौदहों भुवन आविर्भूत होते हैं और जिनमें लयको प्राप्त होते हैं, उन्हीं देव गणेशका आज मैंने दर्शन किया है। जो निर्गुण हैं, जिनका कोई स्वामी नहीं है, जो गुरुके उपदेशसे जाननेयोग्य हैं, जिनका कोई आकार नहीं है, जिन्हें कुछ लोग ब्रह्म कहते हैं, उन्हीं देव गणेशका आज मैंने दर्शन किया है॥ १६-१७१/२॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके वचनामृतरूपी रससे भगवान् गजानन अत्यन्त प्रसन्न हुए और विविध स्तुतियोंद्वारा स्तवन करनेवाले विनयसम्पन्न उन कश्यपसे बोले- ॥ १८१/२॥ गणेशजी बोले-हे मुने! आपकी श्रद्धा-भक्ति तथा किये गये स्तवन एवं मन्त्रानुष्ठानसे मैं आपपर प्रसन्न हूँ। आप अपने मनमें जो-जो भी अभिलाषा रखते हैं, वे सब मुझसे माँग लें॥ १९१/२॥ कश्यपजी बोले-हे प्रभो! विविध प्रकारकी सृष्टि करनेकी सामर्थ्यके साथ ही मुझे यह भी प्रदान करें कि आपके चरणकमलोंमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे और मुझे कभी भी आपका विस्मरण न हो। मैं जहाँ-कहीं भी आपका स्मरण करूँ, वहाँ-वहाँ आप मुझे दृष्टिगोचर हो जायँ। इसके साथ ही मुझे वैसा पुत्र प्रदान करें, जो कश्यपनन्दनके नामसे विख्यात हो ॥ २०-२११/२॥ गणेशजी बोले-हे महामुने ! आप मुझसे जो-जो भी चाहते हैं, वह सब मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा। आपको मेरी भक्ति तथा अविस्मरणीय स्मृति प्राप्त होगी और आप संकटकालमें मुझे अपने पास पायेंगे। मेरे कृपाप्रसादसे आप विचित्र सृष्टि करनेमें समर्थ होओगे ॥ २२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले-महर्षि कश्यपजीसे इस प्रकार कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये और वे कश्यपजी भी प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये ॥ २४॥ एक समयकी बात है, महर्षि कश्यप अकस्मात् अनंग कामदेवद्वारा पीड़ित हो गये। उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिली, तब वे अपने घरके भीतर चले गये ॥ २५ ॥ उन्हें अपने नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य कर्मोंको करनेका तथा ध्यानयोगका भी स्मरण नहीं रहा। उन्हें उस प्रकारसे कामविह्वल देखकर उनकी दिति, अदिति, दनु, कद्रू तथा विनता आदि चौदह पत्नियाँ उनके समक्ष आयीं। तब कश्यपमुनिने विभिन्न भवनोंमें उन स्त्रियोंके साथ रमण किया। यथोक्त समय उपस्थित होनेपर दिति नामक पत्नीने अनेक दैत्योंको जन्म दिया। अदितिने देवताओं तथा गन्धर्वोंको और दनुने दानवोंको जन्म दिया ॥ २६-२८॥ इसी प्रकार उनकी अन्य स्त्रियोंसे क्रमशः किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, गुह्यक, अनेक प्रकारके ग्राम्य तथा आरण्यक पशु उत्पन्न हुए। इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, वृक्ष, समुद्र, सरिताएँ, लता, विविध धान्य, अनेक धातुएँ, रत्न, मुक्ता, कृमि, पिपीलिका, सर्प तथा पक्षिगण आदि चराचर जगत् उन स्त्रियोंसे उत्पन्न हुआ ॥ २९-३०१/२॥ उस समय इस प्रकारकी विविध सन्तानोंको उत्पन्न हुआ देखकर महर्षि कश्यप अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। तदनन्तर उन धीमान् कश्यपजीने ऋण-धनशोधन, सिद्धमन्त्र और अरिचक्रका विचार करके गणेशजीके विविध मन्त्रोंका उपदेश अपने पुत्रोंको दिया ॥ ३१-३२ ॥ उन मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने किसीको गणेशजीका षोडशाक्षर मन्त्र, किसीको अष्टादशाक्षर मन्त्र, किसीको एकाक्षरमन्त्र, किसीको षडक्षर मन्त्र, किसीको पंचाक्षर मन्त्र, किसीको अष्टाक्षर मन्त्र, किसीको द्वादशाक्षर मन्त्र और किसीको उनका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ३३-३४॥ उन्होंने अपने पुत्रोंसे यह भी कहा कि जबतक अखिलाधार, सर्वसिद्धिप्रदायक भगवान् गणेशजीका दर्शन नहीं होता, तबतक तुम लोग इन मन्त्रोंका अनुष्ठान करते रहो। कश्यपजीने इस प्रकारकी आज्ञा पुत्रोंको प्रदान की और तब वे सभी तपस्या करनेके लिये विभिन्न स्थानोंको चले गये और अपने-अपनेको उपदिष्ट मन्त्रका जप करने लगे ॥ ३५-३६ ॥ वे सभी बैठते समय, भोजनके समय, निद्राके समय तथा जाग्रदवस्थामें-इस प्रकार सभी समय अनन्य

उ०ख०-अ०९१ ] * गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि * २६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भक्ति-निष्ठापूर्वक देवेश्वर गजाननका स्मरण करते रहते थे। दिव्य हजार वर्षोंके बीत जानेपर अनेक रूप धारण करनेवाले, करुणानिधान भगवान् गजानन उन (कश्यपपुत्रों)-के समक्ष प्रकट हुए ॥ ३७-३८ ॥ गणेशजीके जैसे रूपका जिन्होंने ध्यान किया था, उनके समक्ष वे उसी रूपको धारणकर प्रकट हुए, किसीके समक्ष वे मेघके समान आभावाले होकर आठ विशाल भुजाओंको धारण किये हुए प्रकट हुए ॥ ३९ ॥ किसीके समक्ष चन्द्रमाके समान कान्तिसे सम्पन्न होकर चार भुजाओंवाले स्वरूपमें वे आविर्भूत हुए, किसीके आगे रक्तवर्णकी आभासे सम्पन्न होकर वे गणेश्वर छः भुजाओंवाले स्वरूपमें प्रकट हुए ॥ ४० ॥ किसीको हजार नेत्रों तथा हजार भुजाओंसे समन्वित रूपमें वे अपने सामने दिखायी दिये, किसीके सामने बालकके रूपमें, किसीके सामने युवावस्थावाले तथा किसीको वृद्धके रूपमें भी वे आभासित हो रहे थे ॥ ४१ ॥ वे गजानन किसीके सामने दस भुजाओंवाले, किसीके सामने बारह भुजाओंवाले, किसीके सामने धूम्रवर्णके तो किसीके सामने महान् प्रकाशसे समन्वित रूपमें दिखलायी पड़े। किसीके सामने वे अठारह भुजाओंको धारण किये हुए प्रकट हुए और किसीने करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे सम्पन्न उनके स्वरूपका दर्शन किया। वे अत्यन्त तेजसे सम्पन्न तथा विशाल विग्रहवाले थे। कभी वे मूषककी पीठपर सवार दिखायी देते थे, तो कभी सिंहके ऊपर और कभी मयूरवाहनके रूपमें दृश्यमान होते थे। वे कभी हाथीके मुखवाले दीखते थे तो कभी अनेक मुखोंवाले हो जाते थे ॥ ४२-४३ ॥ उन देव गणेशजीका दर्शनकर वे सभी बड़े प्रसन्न हो गये और उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर बड़े ही विनयपूर्वक भक्तिभावसे अनेक प्रकारसे उन भगवान् गजाननकी स्तुति की ॥ ४४ ॥ सभी बोले-जिन अनन्त शक्तिवाले परमेश्वरसे अनन्त जीव प्रकट हुए हैं; जिन निर्गुण अप्रमेय परमात्मासे उन (सत्त्वादि) गुणोंकी उत्पत्ति हुई है; सात्त्विक, राजस और तामस-इन तीन भेदोंवाला यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे प्रकट एवं भासित हो रहा है, उन गणेशका हम सर्वदा नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४५ ॥ जिनसे इस समस्त जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है; जिनसे कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी विश्वरक्षक विष्णु, इन्द्र आदि देव-समुदाय और मनुष्य प्रकट हुए हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४६ ॥ जिनसे अग्नि और सूर्यका प्राकट्य हुआ; पृथ्वी, जल, समुद्र, चन्द्रमा, आकाश और वायुका प्रादुर्भाव हुआ तथा जिनसे स्थावर-जंगम और वृक्षसमूह उत्पन्न हुए हैं, उन गणेशका हम सर्वदा नमन एवं भजन करते हैं। जिनसे दानव, किन्नर, चारण और यक्षसमूह प्रकट हुए; जिनसे हाथी और हिंसक जीव उत्पन्न हुए तथा जिनसे पक्षियों, कीटों और लता-बेलोंका प्रादुर्भाव हुआ, उन गणेशका हम सदा ही नमन और भजन करते हैं ॥ ४७-४८ ॥ जिनसे मुमुक्षुको बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञानका नाश होता है; जिनसे भक्तोंको सन्तोष देनेवाली सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा जिनसे विघ्नोंका नाश और समस्त कार्योंकी सिद्धि होती है, उन गणेशका हम सदा नमन एवं भजन करते हैं। जिनसे पुत्र-सम्पत्ति सुलभ होती है; जिनसे मनोवांछित अर्थ सिद्ध होता है; जिनसे अभक्तोंको अनेक प्रकारके विघ्न प्राप्त होते हैं तथा जिनसे शोक, मोह और काम प्राप्त होते हैं, उन गणेशका हम सदा नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४९-५० ॥ जिनसे अनन्त शक्तिसम्पन्न सुप्रसिद्ध शेषनाग प्रकट हुए; जो इस पृथ्वीको धारण करने एवं अनेक रूप ग्रहण करनेमें समर्थ हैं; जिनसे अनेक प्रकारके अनेक स्वर्गलोक प्रकट हुए हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ ५१ ॥ जिनके विषयमें वेदवाणी कुण्ठित है; जहाँ मनकी भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति सदा सावधान रहकर 'नेति- नेति'-इन शब्दोंद्वारा जिनका वर्णन करती है; जो सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म हैं, उन गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ ५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'गणेशजीकी स्तुतिका वर्णन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_10_1_Front

बानबेवाँ अध्याय

२६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बानबेवाँ अध्याय देवताओंको गणेशजीसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, देवताओं आदिद्वारा गणेशजीकी द्वादश मूर्तियोंकी स्थापना, गणेशजीके सुमुख आदि द्वादश नामोंके स्मरणका माहात्म्य, उपासनाखण्डके श्रवणकी महिमा तथा उपासनाखण्डका उपसंहार ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे वे सभी गणेशजीको प्रणाम करके और उनका स्तवन करके उन गणाध्यक्षसे पुनः बोले- 'आज हम लोग अत्यन्त धन्य हो गये हैं। हमारी तपस्या धन्य है, हमारा दान देना धन्य है, हमारा ज्ञान धन्य है, हमारे द्वारा किये गये यज्ञ-यागादि धन्य हैं, हमारे पूर्वज धन्य हैं और आज हमारे नेत्र धन्य हो गये हैं, जिनके द्वारा गजानन भगवान्का दर्शन किया गया है।' इस प्रकार उन देवों आदिके अमृतरूपी वचनों तथा उनके द्वारा की गयी स्तुतियोंसे वे द्विरदानन भगवान् गणेश अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये और उन सुनते हुए कश्यपपुत्रोंसे गम्भीर वाणीमें बोले - ॥ १-३॥ [हे कश्यपपुत्रो!] आप सब लोगोंने मुझ निर्गुणका विग्रहके रूपमें जैसा प्रत्यक्ष दर्शन किया है, वैसा स्वरूप मैंने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओंको भी नहीं दिखाया है। मैं तुम लोगोंके द्वारा की गयी इस स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ और वर देनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ, आप लोगोंको जो-जो भी अभीष्ट हो, उस सबका आप मुझसे वरण कर लें ॥ ४-५॥ हे मुनीश्वर ! उन भगवान् गणेशके द्वारा इस प्रकार कहे गये उन कश्यपपुत्रोंमें जिसका जो अभिलषित था, वह उसने उन गजाननसे माँगा ॥ ६ ॥ मेरे चार मुखोंके द्वारा भी उन वरदानोंका असंख्य होनेके कारण यथार्थ वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः मैंने संक्षेपमें ही आपको बताया ॥ ७॥ जिन-जिन वरोंको कश्यपपुत्रोंने गणेशजीसे माँगा था, उन सभीको वे वर उन्होंने प्रदान किये। गणेशजी उन सभीसे पुनः बोले- 'यह स्तोत्र मुझे अत्यन्त प्रिय है, जो व्यक्ति तीनों सन्ध्यासमयोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह विद्यावान् तथा पुत्रवान् हो जायगा। वह आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, कीर्तिका विस्तार, विजय एवं अभ्युदयको प्राप्त करेगा और अपनी सभी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेगा तथा अन्तमें परम पदको प्राप्त करेगा' ॥ ८-९ ॥ वे गणोंके अधिपति गणेशजी पुनः बोले- 'जो व्यक्ति तीन दिनोंतक तीनों संध्याकालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जायँगे ॥ १०॥ जो आठ दिनोंतक इन आठ श्लोकोंका एक बार पाठ करेगा और चतुर्थी तिथिको आठ बार इस स्तोत्रको पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियोंको प्राप्त कर लेगा ॥ ११ ॥ जो एक मासतक प्रतिदिन दस बार इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह राजाके द्वारा बन्धनमें डाले गये प्राणदण्डके भागी व्यक्तिको उस बन्धनसे मुक्त कर डालेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥ इस स्तोत्रके पाठसे विद्याका अभिलाषी विद्याको प्राप्त करता है। पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाला पुत्र प्राप्त करता है, भार्याकी कामनावाला भार्या प्राप्त करता है तथा धनार्थी व्यक्ति धन प्राप्त करता है। परम श्रद्धा-भक्तिके साथ भगवान् गणेशजीका ध्यान करते हुए इस स्तोत्रका प्रतिदिन इक्कीस बार पाठ करनेसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी प्राप्ति होती है।' इस प्रकार कहनेके अनन्तर सम्पूर्ण जगत्के आधार, सुन्दर मुखवाले वे भगवान् गजानन सभीके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ॥ १३-१४१/२॥ तदनन्तर देवताओंने सुन्दर मुखमण्डलवाली एक मूर्तिका निर्माण किया और उसे रत्ननिर्मित एक विशाल मन्दिरमें प्रतिष्ठापित किया और अत्यन्त विख्यात उनका 'सुमुख' यह नाम रखा। उस मूर्तिका पूजन करके तथा उसे प्रणाम करके सभी देवता अपने-अपने स्थानोंके लिये चले गये। अपने-अपने कर्तव्योंमें तत्पर रहनेवाले उन सभी मुनियोंने भी [गणेशजीकी एक उत्तम मूर्तिकी स्थापना करके उसकी] पूजा की और 'एकदन्त' यह प्रसिद्ध नाम रखा ॥ १५-१७१/२ ॥ गन्धर्वों तथा किन्नरोंने अत्यन्त श्रेष्ठ सुवर्णमय मन्दिरमें गणेशजीकी एक दूसरी उत्तम प्रतिमा स्थापित Kalyana Visheshank 2021_Section_10_1_Back

उ०ख०-अ०१२ ] * देवताओंको गणेशजीसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति * २६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 की और अनेक प्रकारसे उसकी भलीभाँति पूजा करके उस मूर्तिका 'कपिल' यह उत्तम नाम रखा। इसी प्रकार गुह्यकों, चारणों तथा सिद्धोंने गणेशजीकी एक दूसरी मूर्तिका निर्माण किया और उस श्रेष्ठ मूर्तिकी बहुत बड़े मन्दिरमें स्थापना की। स्थापना-प्रतिष्ठाके अनन्तर उन्होंने प्रणाम किया और उसका पूजन किया। उन सभीने यथार्थ नामवाला उसका 'गजकर्ण' यह प्रसिद्ध नाम रखा। उसके कृपाप्रसादसे वे सभी विमानपर आरूढ़ होकर देवलोकको गये॥ १८-२१॥ मनुष्योंने 'लम्बोदर' इस नामसे गणेशजीकी मूर्ति स्थापित की। वन्य जीवों ने एक दूसरी श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित की और 'विकट' इस नामसे उसकी पूजा की। तदनन्तर वे वनको चले गये। इसी प्रकार पर्वतों तथा वृक्षोंने एक दूसरी मूर्तिकी स्थापनाकर उसकी पूजा की तथा उसका 'विघ्ननाशन' यह नाम रखकर वे पृथ्वीमें अवस्थित हो गये। उन गणेशजीकी कृपासे वे पर्वत तथा वृक्ष भी कीर्तिको प्राप्त हुए॥ २२-२४॥ सभी पक्षियोंने रत्नमयी तथा स्वर्णमयी मूर्तिकी स्थापना की। उन्होंने उस मूर्तिका 'गणाधिप' यह नाम रखा, तदनन्तर उस मूर्तिका पूजन किया और उसे प्रणाम किया॥ २५॥ सभी सर्पोंने गणनायक गणेशजीकी एक मूर्ति स्थापित की और उन्होंने उसका 'धूम्रकेतु' यह प्रसिद्ध नाम रखा। सभी जलाशयोंने एक शुभ प्रतिमाकी स्थापना की और उस मूर्तिका 'गणाध्यक्ष' यह नाम रखकर बड़े ही महोत्सवके साथ उसका पूजन किया॥ २६-२७॥ कृमि तथा कीटादिगणोंने और वनस्पतियों एवं ओषधियोंने मिलकर गणेशजीकी एक श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित की, जो 'भालचन्द्र' नामसे प्रसिद्ध हुई॥ २८॥ दूसरे सचेतन प्राणियोंने विनायक गणेशजीकी एक महान् मूर्ति बनाकर रत्ननिर्मित मन्दिरके मध्य उसकी प्रतिष्ठा की, गणेशजीकी वह मूर्ति 'गजानन' इस नामसे विख्यात हुई। उस मूर्तिका उन्होंने भक्ति-भावपूर्वक पूजन किया। वह 'गजानन' नामक गणेश-प्रतिमा सभीकी सभी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली है। जिन-जिन सचेतन प्राणियोंने उस गजानन नामक महामूर्तिका पूजन किया था, वे अपनी-अपनी जातिमें महान् कीर्तिको प्राप्त हुए। भगवान् गणेशजीकी कृपासे सभी अपने-अपने कार्यमें दक्ष हुए तथा अत्यन्त सुखी हो गये॥ २९-३० १/२॥ [ब्रह्माजी बोले-हे व्यासजी!] गणेशजीके प्रत्येक नामका वर्णन करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है। उनके अनन्त नामोंमेंसे सार-सार ग्रहणकर उनके सहस्रनाम स्तोत्रकी रचना की गयी है। उन सहस्र नामोंमें भी जो बारह नाम सारभूत हैं, उनका मैंने निरूपण किया है। हे ब्रह्मन्! जैसे समुद्र-मन्थनके समय (अनन्त रत्नोंमेंसे) रत्नसागर समुद्रसे चौदह प्रधान रत्न निकले हैं, वैसे ही ये बारह नाम हैं। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें गणेशजीकी नाम-महिमा बतलायी, उन्हें विस्तारसे बतलानेमें न तो (हजार मुखवाले) शेष समर्थ हैं, न भगवान् महादेव समर्थ हैं, न मैं (ब्रह्मा) समर्थ हूँ और न विष्णु ही समर्थ हैं तो फिर हे सत्यवतीनन्दन व्यासजी! अन्य इन्द्रादि देवताओं, मशक आदि प्राणियों, यक्षों तथा राक्षसोंकी क्या गणना? इसलिये सभी कार्यों [के आरम्भ]-में भगवान् गजाननका पूजन करना चाहिये॥ ३१-३५॥ जो विघ्नोंका समूल उच्छेद करनेवाले देवाधिदेव गणेशजीका पूजन नहीं करता है, वह दुरात्मा चाण्डालके समान दूरसे ही परित्याज्य है॥ ३६॥ मुनि बोले-[हे ब्रह्मन्!] उन बारह नामोंका आप मुझसे क्रमशः कथन कीजिये। उन नामोंका श्रवण करने तथा पाठ करनेसे सब कार्य निर्विघ्नतासे सम्पन्न हो जाते हैं॥ ३७॥ ब्रह्माजी बोले-सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, गणाधिप, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र तथा गजानन-इन बारह नामोंका जो विद्यारम्भ, विवाह, प्रवेश, यात्राप्रस्थान, संग्राम तथा संकटके समय पाठ करता है अथवा इन्हें सुनता है, तो उसके कार्यमें कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता॥ ३८-४०॥ सभी विघ्न-बाधाओंको शान्त करनेके लिये श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले, चन्द्रमाके समान श्वेत आभावाले, चार भुजाओंको धारण करनेवाले तथा प्रसन्न मुखमण्डलसे समन्वित भगवान् गणेशका ध्यान करना चाहिये॥ ४१॥ करोड़ों कन्यादानोंके करनेसे, करोड़ों यज्ञ तथा व्रत-उपवास करनेसे, विविध प्रकारकी तपस्याओं, सभी Kalyana Visheshank 2021_Section_10_2_Front

२७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

तीर्थों तथा पुण्यक्षेत्रोंकी यात्राओंसे, हजार भार (एक | निरूपण कर दिया। उन्होंने भी गणेशजीकी उपासनाके तौल) सुवर्णका दान करनेसे तथा अन्य करोड़ों प्रकारके | फलका अन्त नहीं पाया और न ही वे गणेशजीकी नाम- दानोंसे, कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायण व्रतोंको | महिमाको पूर्ण रूपसे जान पाये ॥ ५१ १/२ ॥ करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गणेशजीके इन | भृगुजी बोले-हे राजन्! इस प्रकारसे बारह नामोंके पाठ करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके सौवें | गणेशजीकी वह अद्भुत महिमा मैंने आपको बतलायी, भागके बराबर भी नहीं है ॥ ४२-४३ १/२ ॥ | जिसे प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने व्यासजीके समक्ष निरूपित जो मनुष्य प्रातःकाल उठ करके शौच-स्नान | किया था। हे राजन्! सोमकान्त ! [गणेशपुराणके] आदिसे निवृत्त हो पवित्र होकर समाहित चित्तसे श्रद्धा- | इस उपासनाखण्डका मैंने वर्णन किया, यदि आपको भक्तिपूर्वक इन बारह नामोंका पाठ करता है, उस | श्रवण करनेमें श्रद्धा हो तो मैं गणनाथ गणेशजीके व्यक्तिको कोई भी विघ्न बाधा नहीं पहुँचाते। उसके | अन्य चरितको भी बताऊँगा, जो कि सम्पूर्ण पापोंका सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं और अन्तमें वह मोक्ष प्राप्त | नाश करनेवाला है ॥ ५२-५४ ॥ करता है ॥ ४४-४५ ॥ | सूतजी बोले-हे शौनक आदि महर्षियो ! इस उसके दर्शन करनेसे सभी लोग पवित्र हो जाते हैं। | प्रकारसे मैंने विविध कथाओं तथा उनके मध्य आनेवाली इसलिये हे मुने ! शाक्त समुदायवाले हों, शैव हों या वैष्णव | अवान्तर कथाओंसे समन्वित गणेशजीकी उस उपासनाका हों—सभी गणेशजीके इन द्वादश नामोंका पाठ करके | वर्णन आपके समक्ष किया, जिसका वर्णन ब्रह्माजीने अपने सभी कार्योंको करते हैं, तो फिर गणेशजीको अपना | महर्षि वेदव्यासके लिये किया था और उसी पापनाशक इष्ट माननेवाले गाणेश-सम्प्रदायके लोग ऐसा करें तो | उपासनाका निरूपण महर्षि भृगुने राजा सोमकान्तके इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है ? ॥ ४६-४७ ॥ | समक्ष किया था ॥ ५५-५६ ॥ हे ब्रह्मन्! इन बारह नामोंमेंसे किसी एक भी | जो व्यक्ति इस श्रेष्ठ गणेशपुराणका श्रवण करता नामका उच्चारण कार्यके प्रारम्भमें किये बिना कोई भी | है, वह सभी आपत्तियोंसे मुक्त होकर, अनेक भोगोंका कार्य सिद्ध नहीं होते। इसलिये किसी एक नामका | उपभोग करके, पुत्र-पौत्रादिसे सम्पन्न होकर ज्ञान- उच्चारण अवश्य करना चाहिये ॥ ४८ ॥ | विज्ञानसे समन्वित हो जाता है और गणेशजीकी कृपासे जो दुष्ट हैं, नास्तिक हैं, उनके भी जो-जो कार्य | उत्तम मुक्ति प्राप्त करता है। सैकड़ों करोड़ कल्प बीत सिद्ध होते हैं, [उसमें गणेशानुग्रह ही मुख्य हेतु है], वे | जानेपर भी उसका [इस संसारमें] पुनरागमन नहीं (नास्तिकादि) भी [वास्तवमें] नाम-महिमाको जाने | होता ॥ ५७-५८ १/२ ॥ बिना ही अर्थात् अज्ञानमें गणेशजीके बीजमन्त्रका उच्चारण | जो व्यक्ति अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस गणेश- करके अपना कार्य करते हैं ॥ ४९ ॥ | पुराणको सुनाता है तथा जो सुनता है—दोनों ही इस हे मुने ! इस प्रकार मैंने आपके समक्ष गणेशजीकी | पुराणके सुनने-सुनानेसे मिलनेवाले कहे गये फलको सम्पूर्ण महिमाको अत्यन्त संक्षेपमें बतलाया और उनकी | प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार राजा सोमकान्तने अत्यन्त उपासनाका जो विविध प्रकारका फल है, उसका भी | श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस पुराणको सुननेसे [अभीष्ट] फलको अपनी बुद्धिके अनुसार निरूपण किया ॥ ५० ॥ | प्राप्त किया था, वैसे ही आप लोग भी सर्ववेत्ता और भगवान् विष्णुने जितना कहा था, उतनेका मैंने | सुखी हो जायेंगे ॥ ५९-६० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्मा एवं व्यास और भृगु तथा सोमकान्तके संवादमें गजानन नाम- निरूपण' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणका उपासनाखण्ड पूर्ण हुआ ॥

क्रीडाखण्ड

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमन्महर्षिकृष्णद्वैपायनव्यासविरचित [ श्रीगणेशपुराण ] [ उत्तरार्ध ] क्रीडाखण्ड पहला अध्याय देवान्तक और नरान्तकका जन्म तथा नारदजीका उन्हें पंचाक्षरी महाविद्याका उपदेश देना


[बायाँ स्तम्भ]

मुनिगण बोले— हे सूतजी! हे महामते! हम सबने आपके द्वारा सम्यक् रूपसे वर्णित आख्यानका आदरपूर्वक श्रवण किया; परंतु जैसे प्राणी प्रतिदिन अन्नका भक्षण करनेपर भी तृप्त नहीं होते, वैसे ही हमें भी [कथा- श्रवणसे] तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप अन्य कथाओंको कहिये, जिससे हम सब तृप्त हो सकें ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले— [हे मुनियो!] मैंने उपासनाखण्डका वर्णन किया, अब मैं आप सबके समक्ष क्रीडाखण्डका वर्णन करता हूँ। जिस प्रकारसे गणेशजीने अनेक दैत्योंका वध किया तथा सज्जनों, द्विजों एवं गौओंका पालन किया; उसे मैं अत्यन्त आदरपूर्वक सम्यक् रूपसे कहता हूँ, आप लोग एकाग्र चित्तसे श्रवण करें ॥ ३-४ ॥ मुनिगण बोले— [हे सूतजी!] आप जैसे-जैसे उस [गणेश] पुराणका वर्णन कर रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी श्रवणेच्छा बढ़ती जा रही है, इसलिये आप उसका सम्यक् रूपसे कथन करते रहें, जिससे सभी लोग इस संसार-सिन्धुसे शीघ्र ही मुक्त हो जायें ॥ ५ ॥ सूतजी बोले— पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसे अमित तेजस्वी व्यासजीसे कहा था और भृगु [मुनि]-ने जिसका [राजा] सोमकान्तके प्रति कथन किया था; उस [कथा-प्रसंग]-को मैं आप सबसे कहता हूँ॥ ६ ॥ व्यासजी बोले— हे कमलजन्मा ब्रह्माजी! हे


[दायाँ स्तम्भ]

विभो! गणेशजीके सुन्दर चरितका वर्णन कीजिये। उन प्रभुने जो-जो रूप धारण करके जो-जो [लीलाएँ] की हैं; हे ब्रह्मन्! उन्हें मेरे कहनेसे आप कृपा करके कहिये। इस उपासनाखण्डको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ७-८ ॥ उन गणेशजीने जिन-जिन अवतारोंके द्वारा जिन- जिन महाबली दैत्योंका वध किया है, उनके उन-उन कर्मोंको आप कहिये। आपके मुखकमलसे उनके बालचरित तथा अनेक प्रकारकी लीलाओंका श्रवणकर मेरे मनको विश्राम मिल जायगा ॥ ९-१० ॥ सूतजी बोले— [हे मुनियो!] व्यासजीके इस प्रकार पूछनेपर उनके अनेक प्रश्नोंको सुनकर कमलासन ब्रह्माजीने अनेक प्रकारकी दिव्य कथाओंको कहा ॥ ११ ॥ ब्रह्माजी बोले— हृदयको आनन्दित करनेवाले हे व्यास! तुमने उचित प्रश्न किया है। हे मुने! श्रोताके आदरपूर्वक कथा-श्रवण करनेसे वक्ताकी कथा सुनानेके प्रति प्रीति बढ़ जाती है ॥ १२ ॥ [हे व्यासजी!] तुम्हारे-जैसे पुण्यश्लोक श्रोताके प्रति मैं अत्यन्त गोप्य तथ्योंका भी प्रकाशन कर सकता हूँ; क्योंकि श्रोताके सत्कथाओंके श्रवणमें रुचि लेनेसे वक्ताकी कथा सुनानेकी शक्ति बढ़ जाती है ॥ १३ ॥ इस समय मैं तुमसे सम्पूर्ण गणेशचरितको कहूँगा,

२७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] उन प्रभुने अनेक अवतार ले करके पृथ्वीके भारका हरण किया। उन्होंने अनेक प्रकारसे दैत्योंका वध करके देवताओंको उनके स्थान (पद)-पर स्थापित किया। दुष्टोंका निर्मूलन करनेमें सक्षम वे सज्जनोंका पालन करनेमें तत्पर रहते हैं॥ १४-१५॥ हे मुने! श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले गणेशजीके आख्यानपर आधारित इतिहासका श्रवण कीजिये, जिसे भगवान् विष्णुने कहा था॥ १६॥ [भगवान्] विष्णु बोले—पृथक्-पृथक् युगोंमें गणेशजी भिन्न-भिन्न नामवाले, भिन्न-भिन्न वाहनवाले, भिन्न-भिन्न कर्मोंवाले, भिन्न-भिन्न गुणोंवाले और भिन्न- भिन्न दैत्योंका संहार करनेवाले हुए हैं॥ १७॥ वे सत्ययुगमें सिंहवाहन, दस भुजाओंवाले, तेजोमय स्वरूपवाले, विशाल शरीरवाले, सबको वर देनेवाले और जितेन्द्रिय हुए। [उस समय] उनका नाम 'विनायक' था। त्रेतायुगमें वे मयूरवाहन, छः भुजाओंवाले और श्वेत वर्णवाले थे। [उस समय] वे 'मयूरेश्वर' नामसे त्रिभुवनमें विख्यात हुए॥ १८-१९॥ द्वापरमें वे रक्त वर्णवाले, मूषकवाहन और चतुर्भुज स्वरूपवाले हुए। [उस समय] देवताओं और मनुष्योंद्वारा पूजित उनकी 'गजानन'—इस नामसे प्रसिद्धि हुई॥ २०॥ कलियुगमें वे धूम्रवर्ण, अश्ववाहन और दो भुजाओंवाले होंगे। म्लेच्छोंकी सेनाओंका विनाश करनेवाले वे 'धूम्रकेतु'— इस नामसे विख्यात होंगे॥ २१॥ हे मुने! उन्होंने जिस-जिस दैत्यका हनन किया था, उस सबका अब मैं वर्णन करता हूँ। अंगदेशके एक नगरमें रौद्रकेतु नामक ब्राह्मण हुआ था॥ २२॥ वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता, वेद- वेदांगोंका पारगामी विद्वान्, बृहस्पतिके सदृश [बुद्धिमान्], अग्निहोत्र करनेवाला, देवताओं-गौओं और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला, नित्य ईश्वरकी उपासना करनेवाला और सभी आगम-शास्त्रोंका पारंगत विद्वान् था॥ २३ १/२॥ उसकी पत्नीका नाम शारदा था, जो रूप और कान्तिसे सुशोभित थी। उसके सदृश सुन्दर स्त्री न तो अप्सराओंमें कोई थी, न आठ प्रकारकी नायिकाओंमें ही

[दायाँ स्तम्भ] कोई थी। उसके मुखकी कान्तिने चन्द्रमा [की कान्ति]- को पराजित कर दिया था, मानो जिसके कारण ही चिन्तासे वह क्षयग्रस्त हो गया था॥ २४-२५॥ अनेक दिव्य आभूषणोंसे आभूषित होकर वह इस धरातलको इस प्रकार जगमगाती थी, जैसे आकाशमण्डलको नक्षत्रमालाएँ द्योतित करती हैं॥ २६॥ शरत्कालीन कमलके समान नेत्रोंवाली वह शारदा शरत्कालीन चन्द्रमासे सुशोभित शारद (कार्तिक)मासमें किसी समय गर्भवती हो गयी। [उस समय] उसके शरीरके तेज [के आधिक्य]-से कुछ भी विदित नहीं होता था। उस समय वह साध्वी दोहद-सम्बन्धी जो- जो इच्छाएँ करती थी, उन सभी इच्छाओंको उसका पति पूरा करता था॥ २७-२८॥ इस प्रकार उसने नौवें मासमें जुड़वाँ पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों अत्यन्त कान्तिमान् और माता-पिताके अन्तःकरणको आनन्दित करनेवाले थे। वे दोनों आजानुबाहु (घुटनोंतक लम्बी भुजाओंवाले) और बड़े-बड़े नेत्रोंवाले थे। उन्हें देखकर उनके पिता (रौद्रकेतु)-ने कहा—'आज मैं पितरोंके ऋणसे उऋण हो गया। आज मेरा तप धन्य हो गया, वंश धन्य हो गया और जन्म धन्य हो गया; जो मैंने इन दोनों पुत्रोंको देख लिया॥ २९-३० १/२॥ तत्पश्चात् उसने अर्घ्य आदिसे श्रेष्ठ द्विजोंका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर और गणोंके स्वामी गणेशजीकी पूजा की, इसके बाद मातृकापूजनकर शीघ्र ही स्वस्तिवाचन करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंद्वारा आभ्युदयिक श्राद्ध और जातकर्म-संस्कार सम्पन्न कराया॥ ३१-३२॥ उसने ब्राह्मणोंका भक्तिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे पूजनकर उन्हें अनेक प्रकारके दान दिये तथा वस्त्र, रत्न, धन आदिसे सुहृदोंको सम्मानित किया। पुत्र-जन्मसे अत्यन्त प्रसन्न उसने अनेक प्रकारके बाजे बजवाते हुए घर-घरमें शर्करा और ताम्बूल बँटवाया॥ ३३-३४॥ जैसे कोई ध्यानपरायण योगी सद्वस्तु परब्रह्म परमात्माका दर्शन प्राप्तकर प्रसन्न होता है, [वैसे ही वह पुत्रोंके जन्मपर प्रसन्न था।] तदनन्तर [सूतकके] दस दिन बीत जानेपर उसने ज्योतिर्विद् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको

क्री०ख०-अ०२ ] * देवान्तक और नरान्तककी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट होना * २७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बुलवाकर परम भक्तिसे उनका भलीभाँति पूजनकर उनसे | कहा— ॥ ४३१/२ ॥ पूछा कि 'हे श्रेष्ठ द्विजो ! इन दोनोंका क्या नाम रखना | नारदजी बोले—मैं तुम्हारे पुत्रद्वयकी अद्भुत चाहिये, भूत और भविष्यका ज्ञान करके विचारपूर्वक | और मंगलमयी कीर्तिको सुनकर यहाँ आया हूँ ॥ ४४ ॥ मुझे बतलायें ?' ॥ ३५-३६१/२ ॥ | हे मुने ! इन दोनोंकी कीर्ति आगे और अद्भुत तब उन लोगोंने ध्यानपूर्वक देखकर कहा—हे | होगी। हे मुने ! तुम्हारा महान् भाग्य है, जो तुम्हें इस ब्रह्मन् ! हम लोगोंके मतसे तुम इन दोनोंके आचरणके अनुरूप | प्रकारके पुत्रद्वय प्राप्त हुए हैं ॥ ४५ ॥ इनके नाम देवान्तक और नरान्तक रखो ॥ ३७१/२ ॥ | इन्हें देखकर दूसरे लोगोंका मन आनन्दित हो जाता उनके इस प्रकारके वचन सुनकर ब्राह्मणोंकी | है, तो स्वजनोंका क्या कहना ! नारदजीद्वारा कहे गये ऐसे भक्तिमें संलग्न रहनेवाले उस ब्राह्मण रौद्रकेतुने अपनी | मंगलमय वचनको सुनकर तब वे दोनों—माता-पिता उन शाखामें कही गयी विधिके अनुसार उन दोनोंका | नारदमुनिको नमनकर बोले—' [हे मुनिश्रेष्ठ ! ] अब आपकी नामकरण किया तथा ब्राह्मणों एवं सम्पूर्ण नगर- | कृपासे इन दोनों पुत्रोंको दीर्घायुकी प्राप्ति हो। आप ऐसा निवासियोंको भोजन कराया ॥ ३८-३९ ॥ | अनुग्रह करें, जिससे ये दोनों पराक्रमी, लोकमें प्रसिद्ध, तदनन्तर सुमेरु और मन्दराचलकी भाँति प्रतीत | सर्वज्ञ और शत्रुओंका दमन करनेवाले हों' ॥ ४६-४८ ॥ होनेवाले वे दोनों बालक उसी प्रकार बढ़ने लगे, जैसे | ब्रह्माजी बोले—रौद्रकेतु, शारदा और उनके दोनों समुद्र-तटके तालवृक्ष और बाँसके अंकुर तीव्रतासे बढ़ते | पुत्रोंकी भक्तिको देखकर नारदजीने उन दोनों बालकोंको हैं। वे दोनों अपनी स्वाभाविक इच्छासे जहाँ-जहाँ पैर | पंचाक्षरी महाविद्याका उपदेश किया ॥ ४९ ॥ रख देते थे, पातालस्थित शेषनागका सिर वहाँ-वहाँ झुक | उन्होंने कहा कि हे पुत्रो ! इससे तुम कामदेवके जाता था ॥ ४०-४१ ॥ | शत्रु भगवान् शिवको सम्यक् रूपसे प्रसन्न करो तथा जब वे दोनों खड़े होते थे तो सूर्यमण्डल उनके | उनके सिरपर अपना अभयहस्त रखकर [पंचाक्षरी सिरपर स्थित प्रतीत होता था। वे दोनों अपने माता- | महाविद्याके] अनुष्ठानका आदेश दिया। हे ब्रह्मन् ! तब पिताको अनेक प्रकारके कौतुक दिखलाया करते थे ॥ ४२ ॥ | रौद्रकेतुसे ऐसा कहकर और उससे विदा लेकर दिव्यदर्शन उन दोनों बालकोंकी कीर्ति सुनकर किसी समय | महामुनि नारद अन्तर्धान हो गये ॥ ५०-५१ ॥ नारदजी अकस्मात् रौद्रकेतुके घर गये। उन्होंने उत्सुकतापूर्वक | मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर दोनों पुत्रोंने प्रसन्नतापूर्वक उन दोनों बालकोंको पकड़कर उन्हें अपनी गोदमें | माता-पितासे कहा कि आप दोनों हम दोनोंको अनुष्ठानके बैठाकर उनका मस्तक चूमते हुए उनके माता-पितासे | लिये आज्ञा प्रदान करें ॥ ५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नारदोपदेश' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

दूसरा अध्याय देवान्तक और नरान्तककी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट होना और उन्हें वरदान देना व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन् ! उन दोनों (नरान्तक | [जिस प्रकार] किया, वह सब मैं अब तुमसे कहता हूँ। और देवान्तक)-ने उस (पंचाक्षरी महाविद्या)-का | माता-पिताकी आज्ञा लेकर वे दोनों (देवान्तक और अनुष्ठान कहाँ और कैसे किया ? आदरपूर्वक पूछनेवाले | नरान्तक) अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरे हुए मुझसे वह सब विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ | एक ऐसे अत्यन्त सघन वनमें चले गये, जहाँ वायुकी ब्रह्माजी बोले—हे व्यास ! तुमने बहुत अच्छा | भी गति अवरुद्ध हो जाती थी ॥ २-३ ॥ प्रश्न किया। देवान्तक और नरान्तकने उस अनुष्ठानको | वह वन वापियों एवं सरोवरोंसे समन्वित तथा पुष्पों

२७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- एवं पल्लवोंसे सुशोभित था। वहाँ पर्वतोंकी विशाल गुफाएँ तथा अनेक प्रकारकी प्रस्तर-शिलाएँ थीं ॥ ४॥ वहाँ रहते हुए उन दोनोंने महान् तपस्या प्रारम्भ कर दी। वहाँ वे दोनों एक अँगूठेपर स्थित होकर मनको एकाग्र रखते हुए नारदजीद्वारा उपदिष्ट मंगलमयी पंचाक्षरी विद्याका जप करते थे और भगवान् शंकरका ध्यान करते थे। ऐसा करते हुए वे दोनों एक हजार वर्षोंतक निराहार रहे, [तत्पश्चात्] दो हजार वर्षों तक उन्होंने मात्र वायुका ही भक्षण किया, [तदनन्तर] एक सहस्र वर्षपर्यन्त वे दोनों सूखे पत्तोंका आहार करते रहे ॥ ५-७॥ इस प्रकार [पंचाक्षरी महाविद्याका] जप करते हुए उन दोनोंको दस सहस्र वर्ष बीत गये, तब उनकी इस महान् तपस्यासे उनके तेजमें बहुत वृद्धि हो गयी ॥ ८॥ [उनके उस तेजसे] सूर्य मन्द किरणोंवाले हो गये थे और उनका प्रकाश क्षीण प्रतीत होता था। उन दोनों (देवान्तक और नरान्तक)-का शरीर भस्मसे लेपित था, उन्होंने व्याघ्रचर्म, गजचर्म और अक्षमाला धारण कर रखी थी। वे दोनों उषाकालमें पुष्पों और पल्लवोंसे भगवान् शम्भुका पूजन करते थे। हे वत्स! उन दोनोंके अद्भुत तेजके प्रभावसे उस तपोवनमें सिंह और हाथी आदि जन्मजात शत्रुतावाले प्राणी भी वैररहित हो गये थे ॥ ९-१०१/२ ॥ उनके इस प्रकारके तपसे प्रसन्न पाँच मुखों और तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकरने उन्हें [दर्शन दिये]। उनके दस भुजाएँ थीं, वामभागमें अपर्णा (पार्वतीजी) विराजमान थीं, शिरोभागमें गंगाजी [की धारा] शोभायमान थीं और उन्होंने अपने दाहिने हाथमें डमरु ले रखा था॥ ११-१२॥ नागहारसे समायुक्त उनके गलेमें रुण्डमाला सुशोभित हो रही थी। नीलिमासे युक्त कण्ठवाले वे वृषभपर आरूढ़ थे और अपनी प्रभासे आकाशको प्रकाशित कर रहे थे। अनेक प्रकारके अलंकारोंसे युक्त और गौर वर्णके शरीरवाले उन्होंने चन्द्रमाको सिरपर धारण कर रखा था-ऐसे परमात्मा (शिव)-को देखकर वे दोनों अत्यन्त हर्षको प्राप्त हुए ॥ १३-१४॥ [पहले तो] वे दोनों [हर्षातिरेकसे] नृत्य करने लगे, तत्पश्चात् उन्होंने [भगवान् शिवको] साष्टांग प्रणाम किया, तदनन्तर उन दोनोंने उन देवाधिदेवसे कहा- हे देव! हम दोनोंके माता-पिता धन्य हैं, हमारे जन्म, नेत्र, तप, कुल और शरीर धन्य हैं, जो [हम] आप महेश्वरका दर्शन कर रहे हैं॥ १५-१६॥ आप वेदान्तके द्वारा भी अगोचर और अगम्य हैं, आपके वर्णनमें वाणी आदि इन्द्रियाँ भी उपावृत्त हो (लौट) जाती हैं, आगम और छहों शास्त्र भी आपको जाननेमें कुण्ठित अर्थात् असफल हो जाते हैं, आप मनकी सीमासे परे हैं॥ १७॥ आपकी स्तुति करनेमें सहस्र मुखवाले शेषनाग और सनकादि मुनिगण भी सक्षम नहीं हैं। आप सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा, पालनकर्ता और संहारक हैं। आप रंकको राजा और राजाको रंक कर देते हैं, आप सर्पको कंगन और कंगनको सर्प बना देते हैं। आप निर्धनको धनी और धनवान्‌को निर्धन कर देते हैं ॥ १८-१९१/२ ॥ उन दोनोंकी इस प्रकारकी वाणी सुनकर उमापति महादेवजी बोले- 'तुम दोनोंको साधुवाद है। मैंने तुम्हारे अमृततुल्य वचनोंका प्रसन्नतापूर्वक श्रवण किया। मैं तुम दोनोंकी तपस्यासे प्रसन्न होकर पार्वतीसहित वृषारूढ़ हो ध्यानरत तुम दोनोंको वर देने आया हूँ। तुम दोनों मुझसे अपने अभीष्ट वर माँग लो' ॥ २०-२११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तब अन्धकासुरके शत्रु भगवान् शिवके इन वचनोंको सुनकर उन दोनों- नरान्तक और देवान्तकने हर्षगद्गद वाणीमें कहा कि 'हे देवेश्वर ! हे सर्वेश्वर ! हे जगदीश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि हमें वरदान देना चाहते हैं और हम दोनोंपर अनुग्रह करना चाहते हैं, तो देवताओं, राजाओं, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, मानवों, सर्पों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सभी अस्त्र-शस्त्रों, वन्य और ग्राम्य पशुओं, ग्रहों-नक्षत्रों, भूतों, दानवों, असुरों, कृमियों और कीड़ों-मकोड़ों आदिसे भी दिन या रात्रिमें आपकी कृपासे हम दोनोंकी मृत्यु कदापि न हो। हे जगदीश ! हमें त्रैलोक्यका राज्य और अपने चरणोंकी

क्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भक्ति भी प्रदान करें' ॥ २२-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब उन दोनों भक्तोंके तपसे प्रसन्न शूलपाणि वृषध्वज भगवान् शंकर उनके द्वारा माँगे जानेवाले सभी वरदानोंको सुनकर उनसे बोले- ॥ २८ ॥ शिवजी बोले-जो भी अभिलषित वरदान [तुम दोनोंने] माँगे हैं, वे तुम्हें वैसे ही प्राप्त होंगे, उसमें अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। तुम्हें किसीसे भय नहीं रहेगा, सब प्रकारसे तुम मृत्युसे रहित रहोगे और तुम्हें त्रैलोक्यका राज्य प्राप्त होगा। सबका अन्त कर देनेवाले यमराज भी तुम दोनोंसे भयभीत रहेंगे। ऐसा कहकर भगवान् शंकरने अभय प्रदान करनेवाला अपना करकमल उन दोनोंके सिरपर रखा ॥ २९-३० ॥ [तदनन्तर] उन दोनोंको अभीष्ट वरदान देकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। वे दोनों भी उनकी पूजा, परिक्रमा और वन्दनाकर उनसे अनुज्ञा ले उनके अन्तर्धान होनेपर अपने घर चले आये। उन दोनोंने प्रसन्नतापूर्वक अपने अत्यन्त प्रसन्न माता-पिताको प्रणाम किया ॥ ३१-३२ ॥ [तत्पश्चात्] उन दोनोंने माता-पिताका आलिंगनकर कर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। तब पिताने उन दोनोंका मस्तक सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक कहा-'तुम दोनोंको भगवान् शंकरका दर्शन प्राप्त होने और सुन्दर वर प्राप्त होनेसे तुम्हारा जन्म और कुल पवित्र हो गया और तुम दोनोंने महान् यशका अर्जन किया ॥ ३३-३४ ॥ हे पुत्रो ! तुम्हारा वृत्तान्त सुनकर मेरे अंग शीतल (पुलकित) हो गये हैं और मुझे अमृतपानसदृश परम तृप्तिका अनुभव हो रहा है, इसमें सन्देह नहीं है' ॥ ३५ ॥ तदनन्तर माताद्वारा अभ्यंजन (तेल-उबटन, स्नानादि) कराये जानेके बाद उन दोनोंने पिता और वेदशास्त्रके विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ अनेक प्रकारके सुन्दर स्वादवाले अन्नों (व्यंजनों)-का भोजन किया ॥ ३६ ॥ तदनन्तर माताने अनेक प्रकारके अलंकारों और आभूषणोंसे दोनों पुत्रोंको अलंकृत किया तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया। फिर उनसे बहुत-से आशीर्वाद प्राप्त करके उन्हें प्रणामकर विदा किया। तत्पश्चात् उन दोनों [देवान्तक और नरान्तक]-ने [सुखपूर्वक] रात बितायी ॥ ३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वरप्राप्तिका वर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥ तीसरा अध्याय देवान्तककी देवलोकपर विजय ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास !] तदनन्तर देवान्तक एवं नरान्तक प्रातः उठकर गुरुजनोंका ध्यानकर तथा उनका पूजनकर और सम्पूर्ण देवताओंका स्मरणकर तथा उन्हें प्रणाम करके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशामें गये। मल-मूत्रका त्यागकर और दन्त एवं जिह्वाका शोधनकर उन दोनोंने स्नान करके सन्ध्या-वन्दन एवं इष्टदेवोंका पूजन किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर उन दोनोंने ब्राह्मणोंका भक्तिपूर्वक पूजनकर उन्हें धन और वस्त्र प्रदान किये। फिर कांस्यपात्रस्थित घीमें [अपने मुखका] अवलोकनकर दक्षिणासहित उसे ब्राह्मणको दिया। उसके बाद स्वच्छ दर्पणमें मुख देखकर और वस्त्र धारणकर वे दोनों विचार करने लगे ॥ ३-४॥ ज्येष्ठ भ्राताने कहा-मैं महेश्वरके वरदानसे स्वर्गादिलोकोंकी विजय करूँगा और उन्हींके कृपाप्रसादसे तुम मृत्युलोक और पातालको विजित करो ॥ ५ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उन दोनोंने इस प्रकारका निश्चय किया और एक शुभ दिन देखकर उनमेंसे एक [ज्येष्ठ भ्राता]-ने वायुके समान वेगसे स्वर्गलोकको गमन किया ॥ ६ ॥ अमरावती पहुँचकर उसने उद्यान (नन्दनकानन)-परिसरको तोड़-फोड़ डाला और फेंटा कसकर वह बलशाली [देवान्तक] इन्द्रके सम्मुख जा खड़ा हुआ ॥ ७ ॥ उस समय शीघ्रतापूर्वक दौड़ते हुए देवताओंका महान् कोलाहल होने लगा। [वे कहने लगे-] 'यह कौन है ? यह कौन है ? यह इन्द्रके समीप कैसे आ गया?' ॥ ८॥

२७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] 'इसका वध करो, इसे कठोर बन्धनमें बाँधो, इस मनुष्यको दूर भगाओ'—ऐसा कहते हुए वे (देवता) दौड़ रहे थे। तब उसने सहसा बार-बार उछल-उछल और कूद-कूदकर उन्हें दूर भगा दिया। उसके [बार- बार] उछलने और कूदनेसे स्त्रियोंके गर्भ और बड़े-बड़े वृक्ष गिर गये। [उस समय] पर्वतों, वनों और खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी। उसके शरीरकी कान्तिसे सारे श्रेष्ठ देवता काले पड़ गये॥ ९-११॥ जिस प्रकार रोगोंद्वारा जीता गया व्यक्ति शीघ्र ही विवर्ण (आभारहित) हो जाता है, वैसे ही उसे देखकर सारे देवता विवर्ण हो गये॥ १२॥ हे मुने! उस समय इन्द्र भी विह्वल और विवर्ण हो गये तथा कुछ देवगण तो दशों दिशाओंमें भाग चले और कुछ युद्धके लिये तैयार होने लगे। कुछ अत्यन्त भयभीत और अधीर हुए साधारण देवता उसकी शरणमें चले गये। तब इन्द्र हाथमें वज्र लेकर चार दाँतोंवाले [गजश्रेष्ठ ऐरावत] हाथीपर समारूढ़ हुए॥ १३-१४॥ [तदनन्तर] उन्होंने अत्यन्त भयंकर गर्जन किया, जिससे त्रैलोक्य कम्पायमान हो उठा। उन्होंने युद्धके लिये उद्यत श्रेष्ठ देवताओंको देखकर कहा—'तुम सब क्या देखते हो, जब वह असुर यहाँ आया, तो तुम्हारा पौरुष कहाँ चला गया था?' तब वे (देवगण) संग्रामके लिये उद्यत हो आगे बढ़े॥ १५-१६॥ देवताओंको युद्धके लिये उत्सुक देखकर देवान्तकने इन्द्रसे कहा—'हे शक्र! क्यों [व्यर्थ] श्रम करते हो? मुझे प्राप्त वरदानोंपर विचार करो। सम्पूर्ण प्राणियोंका अन्त कर देनेवाले यमराज भी मेरे भयसे त्रस्त होकर भाग गये। भगवान् शंकरके वरदानसे मैं तुम्हारे वज्रको तिनकेके समान मानता हूँ॥ १७-१८॥ मेरे श्वास छोड़नेमात्रसे तुम्हारे देखते-देखते देवता सब दिशाओंमें पलायन कर जाते हैं, इसलिये हे इन्द्र! मेरी बात सुनो और शान्तिपूर्वक अपने सभी पद (अधिकार) मुझे सौंप दो और तुम स्वयं यहाँ-वहाँ कहीं जाकर रहो, अन्यथा सब कुछ खोकर व्यर्थमें

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] मृत्युको प्राप्त करोगे। हे देवराज! क्या तुम नहीं जानते कि मेरा नाम 'देवान्तक' है?'॥ १९-२०१/२॥ उसका इस प्रकारका वचन सुनकर इन्द्रका हृदय विदीर्ण हो गया। [उस समय उन] शतक्रतु इन्द्रके मुखसे प्रबल अग्नि इस प्रकार बाहर निकली, जैसे कि अत्यन्त तप्त तैलमें जलकी बूँदें गिरनेपर छींटे बाहर निकलते हैं॥ २१-२२॥ तदनन्तर क्रोधके आवेशमें इन्द्रने उससे कहा— 'तुम्हारे-जैसे कितने ही दानव मेरे द्वारा मारे गये हैं। रे नीच असुर! तुम जो इस समय वरदानके गर्वसे यहाँ आ गये हो, तो मेरे वज्र-प्रहारसे मारे जाकर तुम निश्चित ही धरतीपर गिरोगे॥ २३-२४॥ रे बलाभिमानी! तेरे इस नामका समास अन्यपद- प्रधान (बहुव्रीहि) है, जिसका आशय है देवतासे अन्तको प्राप्त होनेवाला। [तूने भ्रमवश अपने नामको तत्पुरुष समासान्त अर्थात् देवताओंका अन्त करनेवाला मान लिया है], अगर तुझमें शक्ति है तो उसका प्रदर्शन कर, केवल डींग मत हाँक। तदनन्तर [ऐसा कहकर] इन्द्रने उसका वध करनेके उद्देश्यसे वज्रको मुट्ठीसे कसकर पकड़कर उसपर प्रहार किया तो वज्र [उसके शरीरसे टकराकर] उसी प्रकार सैकड़ों टुकड़े हो गया, जैसे मिट्टीका बना कोई पात्र हाथसे छूटकर चूर-चूर हो जाता है। देवान्तक [उस प्रहारसे] बिना व्याकुल हुए रणक्षेत्रमें खड़ा रहा, उसके शरीरका रोम भी नहीं टूटा॥ २५-२६॥ तदनन्तर उसने उन देवश्रेष्ठ इन्द्रकी पीठपर मुक्केसे प्रहार किया। इससे वे वैसे ही गिर पड़े, जैसे आँधी आनेसे वृक्ष गिर पड़ते हैं॥ २७॥ उसके इस प्रकारके पराक्रमको जानकर बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्र पलायन कर गये। [यह देखकर देवान्तक] उनके पीछे उसी तरह वेगपूर्वक दौड़ा, जैसे मृगसमूहोंके पीछे सिंह दौड़ता है॥ २८॥ अपना भयंकर मुख फैलाकर उसने भागते हुए उन इन्द्रसे कहा—'अब तुम क्यों भागे जा रहे हो, तुम्हारी

क्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बड़ी-बड़ी बातें कहाँ चली गयीं ? ॥ २९ ॥ हे इन्द्र ! सम्पूर्ण देवसमूहोंके साथ तुम मेरे सामने आओ; क्योंकि श्रेष्ठ वीर पीठ दिखाकर भागनेवालोंको नहीं मारते' । [ऐसा कहकर] उसने स्वयं उन देवताओंके आगे आकर उन्हें मारा। उसने उनके मुखपर थप्पड़ मारकर उनका प्राणान्तकर उन्हें गिरा दिया ॥ ३०-३१ ॥ उसने किसीको घुमाकर पृथ्वीपर पटक दिया, तो किसीको पाद-प्रहार, किसीको मुष्टि-प्रहार और कुछ अन्य देवताओंको कुहनीके प्रहारसे मार डाला ॥ ३२ ॥ उसने कुछ अन्य देवताओंका गला पकड़कर उन्हें तबतक घसीटा, जबतक कि उनका प्राणान्त नहीं हो गया। उसने कुछ देवताओंके घुटने तोड़ डाले तो कुछकी भुजाएँ। कुछ देवताओंकी जँघाएँ तोड़कर उसने उन्हें दूर फेंक दिया। कुछ देवता ऊपरकी ओर मुख करके कुछ नीचेकी ओर मुख किये गिरे पड़े थे और [भूतलपर अपना] मुख पटक रहे थे। कुछ चलनेमें असमर्थ हो गये थे ॥ ३३-३४ ॥ कुछ देवता दुखित होकर मन-ही-मन विचार कर रहे थे कि जगदीश्वरने क्या अकस्मात् प्रलय प्रारम्भ कर दिया। वे सभी देवता वैसे ही छिन्न-भिन्न [अंगोंवाले] हो गये थे, जैसे सिंहसे पीड़ित होकर हाथी हो जाते हैं। तदनन्तर उस जयशील देवान्तकने उसी प्रकार स्वयं गर्जन किया, जैसे मेघोंके गर्जन करनेपर मयूरमण्डली गर्जन करने लगती है। उस समय सूर्य भी अपनी भास्करी नामक पुरीको छोड़कर दूर चले गये ॥ ३५-३७ ॥ [उस समय] सभी देवता अपने-अपने पदों (अधिकारों)-को छोड़कर पलायन कर गये। तब वह निर्भय मनसे स्वयं इन्द्रपदपर आसीन हो गया ॥ ३८ ॥ सभी देवता [उस समय उससे भयभीत होकर] हिमालयकी श्रेष्ठ गुफाओंमें चले गये और कन्द-मूल- फलका आहार करते हुए [बड़े ही] कष्टसे दिन बिताने लगे ॥ ३९ ॥ तदनन्तर पृथ्वीसे तथा सभी दिशाओंसे अगणित दैत्य-दानवोंने अनेक प्रकारके द्रव्यों, अनेक तीर्थोंसे लाये हुए जल तथा अनेक ऋषियोंद्वारा उच्चारित मन्त्र-समूहों और शंख-भेरी-मृदंग एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ उस देवान्तकका अभिषेक किया ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् दैत्योंने अपने उस स्वामीसे कहा- 'दैत्यकुलमें आपके सदृश न तो कोई हुआ है, न होगा। आप हम सबको आज्ञा करें' ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] इस प्रकार उसने इन्द्र एवं उनके अग्रगामी (प्रधान) देवताओंको अकेले ही जीत लिया और देवताओंपर राज्य किया तथा अमरावतीकी रक्षा की ॥ ४३ ॥ तदनन्तर वह करोड़ों दैत्योंसे घिरा हुआ सत्यलोक (ब्रह्मलोक)-को गया। तब ब्रह्माजी भी [उससे भयभीत होकर] वहीं चले गये, जहाँ देवता पहलेसे गये थे, उस समय वह कभी तो ब्रह्माजीके [हंसयुक्त] विमानपर आरोहण करता था और कभी इन्द्रके वाहन ऐरावतपर। तदनन्तर एक नायकको वहाँ (ब्रह्मलोकमें) स्थापितकर (शासन-सूत्र सौंपकर) वह (देवान्तक) वैकुण्ठलोकको गया, परंतु उसके पहुँचनेके पूर्व ही भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीजीके साथ क्षीरसागरको चले गये। तब उसने अपने एक परम विश्वासपात्र दैत्यको वहाँ नियुक्तकर [अन्य दैत्योंसे] विचार-विमर्श करते हुए कहा - ॥ ४४-४६ ॥ हे दैत्यो! बताओ, मैंने किसे नहीं जीता है ? मैं कहाँ जाऊँ। तब उन दैत्योंने कहा कि 'देवताओंका कोई भी स्थान अब शेष नहीं है ॥ ४७ ॥ अब आप विभिन्न लोकपालोंके पदोंपर दैत्यजनोंको नियुक्तकर निर्भय होकर और अन्य कार्य छोड़कर केवल अमरावतीका संरक्षण करें'। मन्त्रियोंद्वारा दिये गये इस उचित परामर्शको सुनकर देवान्तकने परम प्रसन्नतापूर्वक उनके कथनानुसार कार्य किया ॥ ४८-४९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'स्वर्गविजय-वर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

चौथा अध्याय

२७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौथा अध्याय नरान्तककी भूलोक और नागलोकपर विजय

व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे प्रकारकी मायाओंका ज्ञान रखनेवाले अत्यन्त बलवान् देवान्तकके चरितका भक्तिपूर्वक श्रवण किया, अब आप दैत्योंको वहाँ भेजा। वे वहाँ गरुड़का रूप धारण करके मुझे यह बतायें कि नरान्तकने क्या किया ? ॥ १ ॥ गये और उन श्रेष्ठ नागोंका भक्षण करने लगे ॥ १०-११ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे सत्यवतीपुत्र ! तुम्हारे उन दानवोंके द्वारा असंख्य नागोंका भक्षण कर [गणेशजीसे सम्बन्धित कथाओंके प्रति] परम आदरभावको लिये जानेके उपरान्त मोतियों, रत्नों, अनेक प्रकारके देखकर अब मैं तुमसे उसे कहूँगा, संयतचित्त होकर उसे सुन्दर दिव्य वस्त्र और दस हजार नागकन्याओंको साथ श्रवण करो। अनेक दैत्यसमूहोंसे घिरे हुए नरान्तकने लिये शेषनाग उनके सम्मुख गये। उन्होंने वह सब पृथ्वीपर जाकर विध्वंसका ताण्डव मचा दिया, उसने [उपहारके रूपमें] उन्हें देकर उन असुरोंसे सन्धि कर कुछ राजाओंको मार डाला ॥ २-३ ॥ ली ॥ १२-१३ ॥ बहुत-से राजाओंको मारा गया देखकर [शेष] उन अनन्त सिरवाले शेषनागने नरन्तकके आदेशानुसार सभी राजा उसकी शरणमें चले आये। जिस प्रकार उसका शासन स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देना ज्ञानसे अज्ञान और सूर्योदयसे अन्धकार पलायमान हो भी स्वीकार कर लिया ॥ १४ ॥ जाता है, उसी प्रकार वह जिस-जिस [शत्रु] सेनाकी तब भी उस दैत्य (नरान्तक) -ने अनेक दैत्योंसहित ओर देखता था, वह दसों दिशाओंमें भाग खड़ी होती एक श्रेष्ठ दैत्यको रसातलमें सर्वाध्यक्षके रूपमें नियुक्त थी। इस प्रकार नरान्तकने सम्पूर्ण भूमण्डलको अपने करवाया और साथ ही वहाँ नियुक्त उस दैत्यको वशमें कर लिया ॥ ४-५ ॥ नरान्तकने अपने इस आदेशकी सूचना भिजवायी कि जो राजा उसकी शरणमें आ गये थे, उनको 'यदि तुम नागोंमें कोई विकृति (विद्रोहकी भावना) अधीनता स्वीकार कर लेनेके कारण उसने उन्हें उनके देखो, तो दूतके मुखसे हमें सूचित करो। हम सम्पूर्ण पदोंपर पुनः स्थापित कर दिया और जो मार डाले गये नागोंका वध कर डालेंगे' ॥ १५-१६१/२ ॥ थे, उनके पुत्रोंको करदाता [राजा]-के रूपमें नियुक्त कर उसे इस प्रकारकी शिक्षा देकर उन सभी दैत्योंने दिया। जो राजा उससे युद्ध करनेको उद्यत हुए थे, उनको मृत्युलोकमें स्थित नरान्तकके पास जाकर सारा वृत्तान्त भी उसने अपना सेवक बना लिया और अपने मनोनुकूल उससे कहा। मृत्युलोक और पाताललोकमें उत्पन्न दैत्योंको उनके पदोंपर स्थापित कर दिया ॥ ६-७ ॥ होनेवाली वे सभी वस्तुएँ जो स्वर्गलोकमें दुर्लभ थीं, उन्हें उसने समुद्ररूपी वलयसे घिरी हुई [सम्पूर्ण] तथा [दोनों लोकोंके] सम्पूर्ण वृत्तान्त नरान्तक देवान्तकके पृथ्वीका पालन किया। [उस समय] उसके आतंकस्पी लिये सदा भेजा करता था ॥ १७-१९ ॥ भारसे देवता, मनुष्य और किन्नर अत्यन्त पीड़ित हो उसी प्रकार देवान्तक भी उसके लिये वह सब कुछ गये। यज्ञ और स्वाध्यायकर्मसे रहित मुनिजन [उस भेजा करता था, जो भूतलपर दुर्लभ है। इस प्रकार वे समय] पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये। 'वेदका त्याग दोनों परम प्रसन्नतापूर्वक त्रैलोक्यका राज्य करते थे ॥ २० ॥ करना दोषयुक्त है'- ऐसा विचारकर वे मनमें ही वेदका [ राजा ] सोमकान्त बोले- [ हे मुने !] उन अभ्यास करते थे। आतंकित मनवाले होनेके कारण दोनोंका वध किस रूपसे, किस अस्त्र-शस्त्रसे, किस तपस्या भी नहीं कर पा रहे थे ॥ ८-९१/२ ॥ अवतारद्वारा और कैसे हुआ ? वह सब मुझे बतलाइये ॥ २१ ॥ तब नरान्तकने नागलोकको जीतनेकी इच्छासे अनेक भृगुजी बोले- [हे राजन् ! व्यासजीद्वारा] इसी

क्री०ख०-अ०५] * अदितिके तपसे प्रसन्न गणेशजीकी उनके पुत्ररूपमें अवतरित होनेकी स्वीकृति * २७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रकारका प्रश्न किये जानेपर चतुर्मुख ब्रह्माजीने व्यासजीके | जिस अस्त्र-शस्त्रसे मारा था तथा ब्रह्मा [आदि प्रति परम प्रसन्नतापूर्वक जो कथा कही थी, उसे ही मैं | देवताओं]-ने अपने-अपने लोकोंको जिस प्रकार [पुनः] तुमसे कहता हूँ॥ २२॥ | प्राप्त किया था और देवताओंको भी अपने अधिकारोंकी ब्रह्माजी बोले- हे मुने! दुर्जय और वरगर्वित | प्राप्ति हुई, वह सब कहता हूँ। हे मुने! आदरपूर्वक उन दोनोंको जिसने अवतार लेकर, जिस रूपसे और | सुनो॥ २३-२४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'व्यासप्रश्न' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥ पाँचवाँ अध्याय अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न गणेशजीका उनके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करनेकी स्वीकृति देना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] कश्यप [ऋषि] | [प्रश्न] हो, उसे तुम सम्यक् रूपसे पूछो, मैं उसे मेरे ही मानस पुत्र हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान्, पुण्यशाली, | बतलाऊँगा ॥ ९॥ धर्मशील, तपस्वी, जितेन्द्रिय, अत्यन्त दयावान्, संसारमें | अदिति बोली- इन्द्रादि देवगणोंको तो मैंने पुत्ररूपमें सभीके दुःखों और शोकका शमन करनेवाले, ध्यानमें | प्राप्त किया है, किंतु जो परमात्मा चिदानन्द परात्पर स्थित होकर भूत-भविष्य और वर्तमानको जान लेनेवाले, | ईश्वर हैं, वे जब मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हों, तो मेरा मन मानसिक संकल्पसे सृष्टि और संहार कर सकनेवाले, | शान्त हो; मेरे मनमें उनकी सेवा करनेकी इच्छा है। आप वेदान्तके पारगामी विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक | उस उपायको बतलायें, जिससे वे [परम प्रभु] मेरे पुत्र अर्थका ज्ञान रखनेवाले तथा मिट्टीके ढेले और सुवर्णमें | हों और मेरा मन कृतकृत्य हो ॥ १०-१११/२॥ तुल्यबुद्धि रखनेवाले हैं॥ १-३॥ | मुनि बोले- हे महाभाग्यशालिनि! तुमने बहुत अदिति उनकी ज्येष्ठ पत्नी थी, जो उन्हें अत्यन्त | उचित प्रश्न किया है, तुम्हारी बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि प्रिय थी। वह सम्पूर्ण [शुभ] लक्षणोंसे सम्पन्न थी, तीनों | देनेवाली है॥ १२॥ लोकोंमें उसका सौन्दर्य अनुपमेय था। वह अपने | जैसे प्यासे व्यक्तिको जल और भूखेको भोजन पातिव्रतके तेजसे तीनों लोकोंको भस्म कर सकनेमें सक्षम | सन्तुष्टिकारक होता है, वैसे ही हे देवि! तुम्हारी [यह] थी। शेषनाग भी अपने सहस्र मुखोंसे जिसके गुणोंका | बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि देनेवाली है॥ १३॥ वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। [श्रेष्ठ] गुणोंकी प्राप्तिके | किंतु हे देवि! बिना पुण्यके परमात्मा कैसे अपने लिये अष्ट नायिकाएँ भी जिसकी सेवा करती थीं। | पुत्र बनेंगे, अतः मैं तुमको उपाय बताता हूँ, उसे हृदयमें इन्द्रादि देवगणोंको जिस पापरहिताने जन्म दिया था, वह | स्थिर करो॥ १४॥ मूलप्रकृतिरूपा [देवी] वहाँ उस रूपमें (मुनिपत्नीके | हे प्रिये! जो इन्द्रियातीत [परमात्मा] श्रुतियों और रूपमें) निवास करती थी। उसने किसी समय अपने | ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगोचर, निर्गुण, निरहंकार, प्रसन्न मनवाले पतिसे प्रसन्नतापूर्वक कहा- ॥ ४-७॥ | निष्काम और अद्वितीय है, जो मायाका विषय नहीं है, हे स्वामिन्! मैं कुछ पूछना चाहती हूँ, कृपा करके | मायाको नचानेवाला है, मायावियोंको भी मोहित करनेवाला उसे बतलायें; क्योंकि हे प्रभो! किसी सदाचारिणी | है, मायासे परे होते हुए भी मायाका आधार है, स्त्रीकी पतिके अतिरिक्त कोई अन्य गति नहीं होती ॥ ८॥ | कारणातीत है, मायाका विस्तार करनेवाला है, जगत्प्रपंचके कश्यपजी बोले- हे कल्याणकारिणि! हे निष्पाप | कारणका भी कारण है- वह अनुष्ठानके बिना साकार प्रिये! तुमने उचित ही कहा है; तुम्हारे मनमें जो भी | स्वरूपमें कैसे आ सकता है? ॥ १५-१७॥

२८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अदिति बोली—हे महामुने! मुझे इस समय किसका ध्यान करना चाहिये, कौन-सा अनुष्ठान करना चाहिये और किस मन्त्रसे करना चाहिये? वह मुझे बताइये ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] अदितिके इस प्रकार पूछनेपर कश्यपमुनिने उसे [गणेशजीके] पंचाक्षर नाममन्त्रका उपदेश दिया, जो प्रारम्भमें 'ॐ'काररूप पल्लवसे युक्त, चतुर्थी विभक्तिसे समन्वित और अन्तमें 'नमः' पदवाला था। उन्होंने ध्यानसहित एवं न्यास और देवतासे युक्त पुरश्चरणकी सम्पूर्ण विधिको उसे बतलाया ॥ १९-२० ॥ हे ब्रह्मन् ! तब उसने परम प्रसन्नतापूर्वक अपने पति कश्यपजीको प्रणाम किया और आदरपूर्वक उनका पूजन किया। तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर वृक्षों और लताओंसे संयुक्त तथा वायु एवं अन्य उपद्रवोंसे रहित स्थानवाले वनमें तपस्याके लिये चली गयी ॥ २१-२२॥ वहाँ वह अदिति स्नान करके पवित्र वस्त्र धारणकर सुन्दर आसनपर बैठ गयी और चित्तवृत्तियोंका निरोधकर संयत मनसे देवाधिदेव गणेशजीका ध्यान करती हुई, यथाविधि न्यास करके गणेशजीका स्मरण करती हुई उनके परम मन्त्रका जप करने लगी ॥ २३-२४ ॥ अपनी मानसिक वृत्तियोंको गणेशजीके अतिरिक्त अन्य किसीमें न ले जानेवाली वह उनके दर्शनकी अभिलाषासे निराहार रहते हुए तथा वायुमात्रका भक्षण करते हुए उनके ध्यान और मन्त्रजपमें संलग्न रहती थी। उसके तपके प्रभावसे सभी प्राणी वैररहित हो गये थे। [उसके तपसे] पराभूत सभी देवता यही चिन्ता करते थे कि ये न जाने क्या प्राप्त करेंगी! ॥ २५-२६ ॥ अदितिने इस प्रकार सौ वर्षोंतक महान् तपस्या की। उसके अनेक प्रकारके कष्टों तथा स्त्री होते हुए भी उस प्रकारके धैर्यको देखकर करोड़ों सूर्योंके समान प्रभाववाले तेजःपुंज गणाधिपति भगवान् विनायक उसके सम्मुख प्रकट हो गये ॥ २७-२८ ॥ वे हाथीके सदृश मुखवाले, दस भुजाओंसे युक्त और कुण्डलोंसे सुशोभित थे। कामदेवसे भी अधिक सुन्दर शरीरवाले वे सिद्धि और बुद्धिसे समायुक्त थे। वे [कण्ठमें] वर्षाजलसे उत्पन्न मोतियोंकी माला, [हाथमें] परशु, [कमरमें] सोनेकी करधनी धारण किये हुए थे और उनके [ललाटपर] कस्तूरीका तिलक लगा हुआ था। उन्होंने नाभिदेशपर सर्प धारण कर रखा था और उन [मंगलमय प्रभु]-के [श्रीविग्रहपर] दिव्य वस्त्र सुशोभित थे ॥ २९-३० १/२॥ उस महान् तेजोरशिको अपने सम्मुख देखकर अदिति भयभीत हो काँपने लगीं, उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३११/२॥ जप और ध्यान भूलकर वे अपने मनमें यह चिन्ता करने लगीं कि मेरे सम्मुख यह कौन आ गया? यह क्या अद्भुत घटना घटी है ! मैं अपना जप और ध्यान भी भूल गयी हूँ! कहीं ये वही परमेश्वर तो नहीं हैं, [जिनका मैं ध्यान करती हूँ] अपने महान् तेजसे दिशाओंको आलोकित करते हुए मुझे वर देनेके लिये आये हैं—इस प्रकार जब वे व्याकुल थीं, तभी भगवान् गणेश उनसे बोले— ॥ ३२-३४॥ विनायक बोले- हे देवि ! तुम दिन-रात मनमें जिसका ध्यान करती हो, मैं वही हूँ। तुम्हारी निष्ठा और दुष्कर तपस्या देखकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। हे सुव्रते ! तुम्हारे इस तपसे मैं सन्तुष्ट हूँ, तुम्हारे हृदयमें जिन-जिन वरोंकी कामना हो, वे मुझसे माँग लो, मैं उन्हें दूँगा ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [ हे व्यास !] तब उन गणेशजीके वचन सुनकर अदिति स्वस्थ हुई। विनम्र भाववाली उसने दोनों हाथ जोड़कर विनायकको प्रणाम किया और जो मनसे अतर्क्य हैं, ऐसे उन देवाधिदेव गणेशजीसे वह कहने लगी - ॥ ३७१/२॥ अदिति बोली- हे अखिलेश्वर! आप ही इस विश्वकी संरचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप नित्य हैं, निरंजन हैं, भगवान् हैं, निर्गुण हैं, अहंकारसे रहित हैं, विविध रूप धारण करनेवाले हैं, शाश्वत हैं, योगद्वारा जाननेयोग्य हैं, तथा अखिल मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ ३८-३९ ॥

क्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हे विनायक! इस समय आप सौम्य स्वरूप करनेके लिये वनमें गयी और मैंने वहाँ महान् तप किया। धारणकर वर प्रदान करें। हे देवेश्वर! यदि आप तदनन्तर वे भगवान् गजानन महान् प्रकाशपुंजके रूपमें मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप वर देना चाहते हैं, मुझे वर प्रदान करनेके लिये आये। उनका वह स्वरूप तो हे भगवन्! आप मेरी पुत्रताको प्राप्त करें, इसीसे देखकर मैं भयभीत हो गयी, तब मैंने उन विनायकदेवकी मैं कृतकृत्य होऊँगी। तभी मैं आपकी सेवा कर प्रार्थना की॥ ४४-४५॥ पाऊँगी, तभी सज्जनोंकी रक्षा होगी और तभी दुष्टजन हे मुनिश्रेष्ठ! उन्होंने मुझे विविध प्रकारके वर विनाशको प्राप्त करेंगे। साथ ही लोगोंकी कृतकृत्यता प्रदान किये। तदनन्तर वे गजानन 'तुम्हारे पुत्रके रूपमें भी होगी॥ ४०-४१ १/२॥ जन्म ग्रहण करूँगा'-ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये। विनायक बोले-मैं तुम्हारे पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण हे मुने! तब मैं आपके प्रभावसे सफल मनोरथवाली करूँगा, साधुजनोंकी रक्षा करूँगा, दुष्टोंका संहार करूँगा होकर अपने आश्रममें आ गयी॥ ४६ १/२॥ और तुम्हारी भी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! इस प्रकार उसके करूँगा॥ ४२ १/२॥ द्वारा कथित वरदान-सम्बन्धी अमृतमय वचनोंको सुनकर ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर देवाधिदेव वे विनायक वे मुनिश्रेष्ठ कश्यपजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अत्यन्त अन्तर्धान हो गये और वह अदिति महर्षि कश्यपके पास प्रीतिके साथ उन्होंने देवी अदितिके साथ रमण किया। गयी और सारा वृत्तान्त उन्हें बताया॥ ४३ १/२॥ उस समय वे दोनों वैसे ही आनन्दित हुए जैसे कि अदिति बोली-आपकी आज्ञासे मैं तपस्या अमृतपानसे आनन्दकी प्राप्ति होती है॥ ४७-४८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'आश्रमाभिगम' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥ छठा अध्याय दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाकर अपनी व्यथा बताना, ब्रह्मादि देवताओंद्वारा परमात्मा गणेशसे अवतार धारण करनेकी प्रार्थना करना, देवी अदिति और कश्यपके पुत्ररूपमें गणेशजीका अवतरण, कश्यपद्वारा उनके जातकर्मादि संस्कार करना और 'महोत्कट' यह नाम रखना भृगु बोले-दुष्टोंके अत्याचारसे अत्यन्त पीड़ित वैसा आप करें। अन्यथा पर्वतों तथा वनोंसे समन्वित मैं वह पृथ्वी वेश बदलकर कमलके आसनपर विराजमान पृथ्वी रसातलको चली जाऊँगी॥ ४॥ रहनेवाले ब्रह्माजीके पास गयी और दोनों हाथ जोड़कर भृगु बोले-पृथ्वीका यह कथन सुनकर ब्रह्माजी दयनीय अवस्थावाली वह पृथ्वी पद्मोद्भव ब्रह्माजीसे उससे बोले-'मैं, सभी लोकपाल, इन्द्र आदि देवता तथा बोली॥ १ १/२॥ ऋषिगण भी स्वधाकार-स्वाहाकारसे रहित होकर अत्यन्त भूमि बोली-मैं अत्यन्त दीन और यज्ञ, व्रत दुखी हैं। हम सभी उसी प्रकार अपने स्थानसे भ्रष्ट, आदिसे रहित हो गयी हूँ। हे ब्रह्मन्! ऋषिगणोंके साथ मन्त्रोंसे रहित तथा अपने आचार-विचारसे रहित हो गये इन्द्र आदि सभी देवता अपने-अपने स्थानसे च्युत हो गये हैं, जैसे कि प्रलयके समय हो जाते हैं॥ ५-६॥ हैं। दैत्योंके भारसे अत्यन्त संतप्त मैं आप ब्रह्माजीकी इसलिये हम सभी मिलकर देवाधिदेव भगवान् शरणमें आयी हूँ॥ २-३॥ गणेशकी प्रार्थना करें। वे ब्रह्मरूप हैं, निराकार हैं तथा जिस किसी उपायसे उन दुष्ट दैत्योंका विनाश हो, जगत्के कारणका भी कारण हैं। सौभाग्यसे यदि वे

२८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

लोगोंके समक्ष साकाररूप धारणकर प्रकट होंगे तो हे वसुन्धरे! तभी सब लोगोंका और तुम्हारा भी कल्याण होगा' ॥ ७-८ ॥ भृगु बोले-ऐसा कहकर ब्रह्मा आदि देवताओं और ऋषिगणोंने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर निराकार तथा साकाररूप उन भगवान् गणेशका स्तवन किया ॥ ९ ॥ देवता तथा ऋषि बोले-सम्पूर्ण लोकोंके स्वामिन् हे गणपति! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंके धाम! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १० ॥ देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। भक्तोंके बन्धनको काटनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। अपने भक्तोंका पालन-पोषण करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वल्प भक्तिसे भी सन्तुष्ट हो जानेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ११ ॥ हे भगवन्! आप निराकार हैं, नित्य मायासे रहित हैं, परात्पर ब्रह्ममय स्वरूपवाले हैं, क्षर तथा अक्षरसे अतीत हैं, गुणोंसे रहित हैं और दीनोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले आप निरामयको नमस्कार है। सम्पूर्ण दैत्योंका विदारण करनेवाले निरंजनको नमस्कार है। हे परोपकार करनेवाले! आप नित्य, सत्य स्वरूपको नमस्कार है। सर्वत्र समान भाव रखनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है* ॥ १३ ॥ अत्यन्त दुःखसे दुखित तथा व्याकुल वे सभी मुनिगण तथा देवता इस प्रकार स्तुति करके उन देवाधिदेव भगवान् विनायकसे पुनः बोले- ॥ १४ ॥ [हे भगवन्!] सम्पूर्ण जगत्में हाहाकार हो रहा है। सभी स्वधाकार तथा स्वाहाकारसे रहित हो गये हैं। हम लोग मेरुपर्वतकी गुफामें उसी प्रकार रह रहे हैं, जैसे वन्य पशु वहाँ रहते हैं ॥ १५ ॥ अतः हे विश्वम्भर! इस समय आप उस महादैत्यका विनाश करें। इस प्रकारसे जब वे स्तुति कर रहे थे, उसी समय आकाशवाणीने कहा- ॥ १६ ॥ 'इस समय महर्षि कश्यपजीके घरमें भगवान् गणेशजी अवतार ग्रहण करेंगे। वे अद्भुत कर्म करेंगे और आप लोगोंको अपना-अपना पद प्रदान करेंगे। वे दुष्टोंका विनाश तथा सज्जनोंकी रक्षा करेंगे' ॥ १७१/२ ॥ भृगु बोले-उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्माजी पृथ्वीसे बोले ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले-हे देवि! हे धरे! तुम आकाशवाणीपर विश्वास करके स्वस्थ हो जाओ। तुम्हारे लिये सभी देवता मृत्युलोकमें अवतार ग्रहण करेंगे। वे गणेशजी अवतार धारणकर तुम्हारे महान् भारको दूर करेंगे ॥ १९१/२ ॥ भृगु बोले-उन ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार कही गयी वह पृथ्वी अत्यन्त स्वस्थ तथा प्रसन्न मनवाली हो गयी और अपने स्थानको चली गयी ॥ २०१/२ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर देवी अदितिने गर्भ धारण किया। उसका वह गर्भ उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त होने लगा, जैसे चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। नौ मास पूर्ण हो जानेपर उसने श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजीके पूर्वकथनानुसार वह बालक कश्यपनन्दन नामसे प्रसिद्ध हुआ। [जन्मके समय] वह दस भुजाओंवाला था, महान् बलसे सम्पन्न था, उसके कानोंमें कुण्डल सुशोभित हो रहे थे, ललाटपर कस्तूरीका


  • देवर्षय ऊचुः नमो नमस्तेऽखिललोकनाथ नमो नमस्तेऽखिललोकधामन्। नमो नमस्तेऽखिललोककारिन् नमो नमस्तेऽखिललोकहारिन्॥ नमो नमस्ते सुरशत्रुनाश नमो नमस्ते हतभक्तपाश। नमो नमस्ते निजभक्तपोष नमो नमस्ते लघुभक्तितोष॥ निराकृते नित्यनिरस्तमाय परात्परब्रह्ममयस्वरूप। क्षराक्षरातीत गुणैर्विहीन दीनानुकम्पिन् भगवन्नमस्ते॥ निरामयायाखिलकामपूर निरञ्जनायाखिलदैत्यदारिन्। नित्याय सत्याय परोपकारिन् समाय सर्वत्र नमो नमस्ते॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ६।१०-१३)

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क्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिलक लगा हुआ था। मस्तक मुकुटसे शोभायमान था, वह सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित था, कण्ठमें धारण की हुई रत्नमालासे मण्डित हो रहा था, चिन्तामणिसे वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था, उसके अधर जपापुष्पके समान अरुणवर्णके थे, नासिका उन्नत थी, वह सुन्दर भृकुटी तथा ललाटवाला था, दीप्तिमान् दाँतोंसे प्रकाशमान था, उसने अपने देहकी आभासे समस्त अन्धकारको दूर कर दिया था, दिव्य वस्त्रोंको धारण किये था और उसका स्वरूप अत्यन्त मंगलमय था। इस प्रकारके बालकको देखकर दोनों माता-पिता— अदिति और कश्यप उस समय उसके तेजसे अभिभूत दृष्टिवाले हो गये और कुछ भी देखनेमें समर्थ न हो सके। तब उन्होंने बलपूर्वक आँखोंको खोलकर उस उत्तम रूपको देखा। उस समय वे दोनों अत्यन्त आनन्दित हुए। तदनन्तर वह बालरूप गणपति उनसे इस प्रकार बोला— ॥ २३–२७१/२॥ बालक बोला—हे मातः ! चूँकि आपने पूर्वकालमें एक हजार वर्षतक तपस्या करते हुए जिस स्वरूपमें मेरा ध्यान किया और मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान माँगा था, तब उस समय मैंने आपको विविध वर प्रदान किये थे, और अब इस समय मैंने ही आपके पुत्ररूपमें जन्म लिया है। वही अब मैं पृथ्वीके भारका हरण करूँगा, आप दोनोंकी सेवा करूँगा, ब्रह्मा आदि देवताओंको पुनः उनके पदपर प्रतिष्ठित कराऊँगा और दुष्ट दैत्योंका वध करूँगा ॥ २८–३०॥ भृगु बोले—इस प्रकारके उसके वचनोंको सुनकर उन दोनोंके नेत्र आनन्दाश्रुओंसे भर गये। जिस प्रकार चकवा-चकवी आकाशमें सूर्यको देखकर आनन्दित हो उठते हैं, वैसे ही वे दोनों अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१ ॥ तब वे दोनों बोल उठे—‘निश्चित ही हम दोनोंके अद्भुत पुण्यका उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप परमात्मा विनायक हमारे पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३२ ॥ हमारा कुल धन्य हो गया, हमारे माता-पिता धन्य हो गये, हमारा जन्म लेना सफल हो गया और हमारा ज्ञान धन्य हो गया, जो कि सम्पूर्ण चराचरके गुरु, सबके साक्षी, निराकार, नित्य आनन्दमय तथा सत्यस्वरूप भगवान् गणेश हमारे मंगलमय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३३१/२ ॥ जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सूत्रमें पिरोये गये मणिगणोंकी भाँति व्याप्त है, जो सर्वत्र व्याप्त तथा सब कुछ जाननेवाला है, वही आप हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। आपका यह रूप अत्यन्त दिव्य है, इस समय इसको ऐन्द्रजालिककी भाँति आप छिपा लें और सामान्य प्राकृत स्वरूप धारण करें। आगे जिस रूपके द्वारा आपको जैसा कर्म करना होगा, वैसा रूप आप धारण करें' ॥ ३४–३६ ॥ ऐसा वचन सुनकर गणेशजीने अपना वह दिव्य रूप छिपा लिया और दो हाथोंवाले होकर वे सामान्य बालककी भाँति भूमिपर लोटकर रुदन करने लगे ॥ ३७ ॥ उनके रुदनकी ध्वनिसे उस समय रसातल, आकाश, दिशाएँ, विदिशाएँ निनादित हो उठीं। उस रुदनके शब्दको सुनकर वन्ध्या स्त्रियाँ गर्भवती हो गयीं, शुष्क वृक्ष हरे-भरे हो गये, देवताओंके साथ इन्द्र अत्यन्त हर्षित हो उठे और दैत्योंको अत्यन्त भय हो गया, उस समय धरतीकी वृद्धि होने लगी। उस समय महर्षि कश्यपजीने ब्राह्मणोंके साथ बालकका जातकर्म-संस्कार सम्पन्न किया। उस बालकको मधु तथा घृतका प्राशन कराके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका स्पर्श किया ॥ ३८–४० ॥ मन्त्रोच्चारपूर्वक महर्षि कश्यपने बालकको माता अदितिके स्तनोंका पान कराया। बालकका नालच्छेदन करके उसे नहलाकर अदितिने बालकको सुला दिया ॥ ४१ ॥ उस समय कश्यपमुनिने ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान दिये। देवी अदितिने बड़ी प्रसन्नताके साथ सातवें दिन प्रत्येक घरमें इक्षुसार (गुड़ आदि) और पाँचवें दिन भेंट भिजवायी। ग्यारहवें दिन पिता कश्यपने ‘महोत्कट' यह नाम उस बालकका रखा। वह बालक प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। चूँकि वह सभीसे अत्यन्त उत्कट (पराक्रमशाली) था, इसीलिये वह बालक गणेश महोत्कट— इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ ॥ ४२–४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आविर्भाव' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥