भारतकोश
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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

उ०ख०-अ०४ ] * सोमकान्तका वनगमन * ४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 राज्यका मूल (आधार) कही जाती है। राजा कामादि | विद्याधीश नामक मन्त्रियोंको बुलवाया और शुभ मुहूर्त छः शत्रुओं* (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह तथा | देखकर [राज्याभिषेकके लिये आवश्यक] सामग्रियोंका मत्सर)-को जीतकर तत्पश्चात् अन्य शत्रुओंपर विजय | संकलनकर अनेक स्थानोंसे वेदके विद्वान्, यज्ञकर्ममें प्राप्त करे ॥ ३७ ॥ | निष्णात ब्राह्मणों, महान् राजाओं, महारानियों, अपने श्रेष्ठ राजा कभी किसीकी आजीविकाका उच्छेद, | सुहृज्जनों, सभी वर्गोंके प्रमुख लोगों और श्रेष्ठ नागरिकोंको प्रजाका विनाश, देवसम्पत्तिका हरण, वन-उपवनोंका | शत्रुओंका नाश करनेवाले अपने पुत्रके राज्याभिषेक- विनाश तथा देवालयों और स्मारकोंका ध्वंस न करे ॥ ३८ ॥ | समारोहका अवलोकन करनेके लिये आमन्त्रित पर्वकालमें दान दे, यशके लिये त्याग करे, मित्रके | किया ॥ ४२-४५ १/२ ॥ साथ छल न करे और गोपनीय विषयका कथन स्त्रियोंसे | तदनन्तर गणेशजीका और इष्टदेवताका यथाविधि न करे ॥ ३९ ॥ | पूजनकर मातृकाओंका पूजन और स्वस्तिवाचन करवाकर ब्राह्मणका ऋणसे और गायका कीचड़से सम्यक् | आभ्युदयिक श्राद्धकर और ब्राह्मणोंको भोजनादिसे सन्तुष्टकर रूपसे उद्धार करे। कभी असत्य न बोले और कभी | उन राजा सोमकान्तने वेदमन्त्रोंके उद्घोषके साथ पुत्र सत्यको न छोड़े ॥ ४० ॥ | हेमकण्ठका राज्याभिषेक करवाकर अपने तीन प्रमुख मन्त्रियों, प्रजा और सेवकोंके चित्तका हरण करनेवाला | मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा- ॥ ४६-४८ ॥ बने और सदा ब्राह्मणों एवं देवताओंको नमस्कार | राजा बोले- हे मन्त्रियो ! मैं अपने इस पुत्रको करे ॥ ४१ ॥ | आप लोगोंके हाथमें सौंपता हूँ। 'यह मेरा ही पुत्र है'— सूतजी बोले- इस प्रकार राजाने जैसे स्वयं | इस प्रकारकी बुद्धि आप लोगोंकी [मेरे इस पुत्रमें सदा] [परम्परासे] सुना था, वैसे ही धर्मशास्त्रके साथ | रहे। नीतिनिपुण आपलोगोंने जैसे मेरी आज्ञाओंका पालन आचार, नीतिशास्त्र एवं अन्य उपयोगी विषयोंकी शिक्षा | किया है, वैसे ही सभी वर्गोंके प्रमुखजनोंके साथ मिलकर अपने पुत्र हेमकण्ठको देकर क्षेमंकर, रूपवान् और | इसके भी राज्य-संचालनमें सहयोग दें ॥ ४९-५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'आचारादिनिरूपण' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥ चौथा अध्याय सोमकान्तका वनगमन सूतजी बोले- राज्याभिषेक सम्पन्न होनेपर उन | धन दिया ॥ २-४ ॥ राजा सोमकान्तने ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें | तदनन्तर पूर्वजन्मार्जित दोषोंके कारण दुःख और अंगभूत दक्षिणाके साथ दस सहस्र गौएँ तथा मणि, मोती | शोकसे युक्त राजा सोमकान्तने अत्यन्त मलिन और और मूँगे प्रदान किये। उन्होंने उन सबको हाथी, गौएँ, | अपवित्र अवस्थामें वनके लिये प्रस्थान किया ॥ ५ ॥ घोड़े, धन, रेशमी परिधान देकर सन्तुष्ट किया ॥ १ १/२ ॥ | उनके जाते ही लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। उन्होंने राजाओं, राजपत्नियों, उनके सेवकों, ग्रामप्रमुखों | सब लोग अपना-अपना कार्य छोड़कर राजाके पीछे चल तथा गुणीजनोंको यथायोग्य अनेक देशोंके सुवर्णजटित | दिये ॥ ६ ॥ वस्त्रों, कश्मीर देशमें निर्मित अनेक रंगोंके श्रेष्ठ वस्त्रोंको | मन्त्रिगण, राजाकी पत्नी सुधर्मा, पुत्र हेमकण्ठ तथा प्रदान किया। साथ ही मन्त्रियोंको अन्य अर्थात् पूर्वमें | सुहृद्गण भी उठते, गिरते, लुढ़कते, दौड़ते और रोते हुए दिये गये ग्रामोंके अतिरिक्त अनेक ग्राम और बहुत-सा | उनके पीछे गये ॥ ७ ॥

  • कामः क्रोधस्तथा लोभो मदमोहौ च मत्सरः । (किराता० १।९ पर मल्लिनाथकृत घण्टापथ टीका)

५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मन्त्रियों और नगरके लोगोंने भी दुखी होकर राजाको रोका। दो गव्यूति* (चार कोस) जानेके बाद श्रमित होकर राजा रुक गये॥ ८॥ [वहाँ] उन्होंने अनेक वृक्षोंसे घिरी हुई और शीतल जलसे सम्पन्न वापी (बावड़ी)-को देखकर सभी नागरिकों, मन्त्रियों और स्वजनोंसे कहा— ॥ ९॥ हे सज्जनो! दीर्घकालतक राज्य करते हुए मैंने जो अपराध किये हों, उनके लिये आप लोग [मुझे] क्षमा करें; मैं आप लोगोंको हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ॥ १०॥ मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ कि दैववश मुझे यह जो [रोग] प्राप्त हो गया है, इससे मेरे प्रति आप लोग अपने स्नेहको कम न करियेगा और मेरे पुत्रपर अपनी कृपा बनाये रखियेगा॥ ११॥ आप सभी आये हुए लोग स्त्रियों और वृद्धोंसहित नगरको वापस जायँ और मेरे पुत्रद्वारा पालित होते हुए दुःखरहित होकर निवास करें॥ १२॥ मैं प्रसन्न चित्तसे वन जाऊँ, इसके लिये आप सब लोग अनुज्ञा प्रदान करें [और घर लौट जायँ]। आप लोगोंके जानेके बाद ही मेरा मन शान्त हो सकेगा॥ १३॥ [अतः] आप लोग मेरे ऊपर यह महान् उपकार करनेकी कृपा करें; मैं दुखी हूँ, मरनेकी इच्छा करता हूँ, पर निष्ठुर वचन बोलनेका मुझमें उत्साह नहीं है॥ १४॥ मेरा यह जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित किया गया महान् पाप ही है, जिसके कारण मुझे राज्यके हितैषी प्रजाजनोंसे वियोग हो रहा है; परंतु मैं क्या करूँ? मैं तो गलित कुष्ठसे पीड़ित हूँ। सभीको अपने किये सुकृत (पुण्यकर्मों) और दुष्कृत (पापकर्मों)-का फल भोगना ही पड़ता है॥ १५-१६॥ सूतजी बोले—राजाकी इस प्रकारकी बात सुनकर उनके सुहृज्जन मूर्च्छित हो गये, कुछ लोग अत्यन्त दुखी होकर अपने हाथोंसे अपना सिर पीटने लगे। उनमेंसे जो कुछ विद्वान् लोग थे, वे पूर्वकालमें उत्पन्न हुए राजाओंके चरितोंकी चर्चाकर राजाको और परस्पर [एक-दूसरेको भी] सान्त्वना देने लगे॥ १७-१८॥ उस स्थितिको देखकर कुछ अन्य लोग अनिर्वचनीय अवस्थाको उसी प्रकार पहुँच गये, जैसे आत्मस्वरूपका ज्ञान होनेपर ज्ञानवृत्तिवाले योगी॥ १९॥ कुछ धैर्यशाली लोगोंने अपने दुःखका नियमन करके वन जानेको उद्यत उन दुखी राजा सोमकान्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २०॥ लोगोंने कहा—हे प्रजावत्सल! जैसे अग्नि उष्णताका और जल शीतलताका त्याग नहीं करता, समुद्र अपनी मर्यादाका और सूर्य अपने प्रकाशकत्व गुणका त्याग नहीं करता; वैसे ही आपको हमारा पालन-पोषण करके फिर त्यागकर जाना उचित नहीं है। हम आपके बिना नगरको वापस कैसे जा सकते हैं?॥ २१-२२॥ जैसे नक्षत्रोंसे भरा होनेपर भी बिना चन्द्रमाके आकाश सुशोभित नहीं होता, वैसे ही शत्रुओंका दमन करनेवाले हे राजन् ! आपके बिना यह नगर शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥ हे स्वामी! हम सब भी आपके साथ दो-तीन तीर्थोंकी यात्रापर चलेंगे; [हमें विश्वास है कि] तीर्थ- सेवनसे आपका रूप कान्तिमान् हो जायगा ॥ २४॥ तदनन्तर हम लोग आपके साथ महान् हर्षपूर्वक मंगलवाद्योंकी ध्वनिके साथ बन्दीजनोंको आगे करके ध्वज-पताकाओंसे सुसज्जित नगरमें आयेंगे ॥ २५॥ सूतजी बोले—इस प्रकार उनके वचनोंको सुनकर क्रोध और दुःखसे परिपूर्ण राजाने उन सबको नमस्कार करके 'ऐसा न करो, ऐसा न करो' बार-बार कहा॥ २६॥ तदनन्तर स्नेह और करुणापूर्ण भावोंसे युक्त हेमकण्ठने मन्त्रियोंके साथ पुत्रवत्सल राजासे विनयपूर्वक निवेदन किया— ॥ २७॥ पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा—मैं आपके बिना [नगरमें] जाने, राज्य करने और जीवित रहनेमें भी उत्साह नहीं रखता हूँ। मैंने इससे पूर्व कभी आपका वियोग नहीं देखा है, तो फिर उसे कैसे सहन करूँ?॥ २८॥ राजा (सोमकान्त)-ने कहा—इसीलिये मैंने

  • गव्यूतिः स्त्री क्रोशयुगम्। (अमरकोश २। १। १८)

उ०ख०-अ०५] * सुधर्मा-च्यवन-संवाद * ५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पहले ही तुम्हें उत्तम नीतिशास्त्रके सहित धर्मशास्त्रका | या गाड़े गये धनमें ही स्थित रहता है, वैसे ही वनमें चले उपदेश किया है। तुम्हें उस मंगलमय उपदेशको व्यर्थ | जानेपर भी मेरा मन तुम्हींमें लगा रहेगा। दैवयोगसे यदि नहीं करना चाहिये॥ २९ ॥ | [ मेरा कुष्ठ रोग दूर हो गया और] मैं सुन्दर शरीरवाला ऐसा सुना जाता है कि पूर्वकालमें नीतिज्ञ और परम | हो गया, तो पुनः घरको लौट आऊँगा ॥ ३३-३४ ॥ बुद्धिमान् जमदग्निनन्दन परशुरामने पिताके कहनेपर | मेरी आज्ञाका पालन करनेसे जैसा तुम्हें धर्मलाभ माताको मार डाला था ॥ ३० ॥ | होगा, वैसा मेरे साथ चलनेसे नहीं, इसलिये तुम [पिताकी आज्ञासे ही] श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मणके | [नगरको] जाओ और मैं भी [वनको] जाता हूँ॥ ३५ ॥ साथ राज्य छोड़कर वन चले गये और [ पितृसदृश | सूतजी बोले-तब मन्त्रियों, नगरके निवासियों ज्येष्ठ भ्राताकी आज्ञासे ही] बिना कारण पूछे लक्ष्मण | और पुत्र (हेमकण्ठ)-ने महान् कष्टके साथ वापस सीताको वनमें छोड़ आये थे॥ ३१ ॥ | लौटनेका मन बनाकर राजाको नमस्कार किया। राजाने इसलिये हे हेमकण्ठ! तुम तीनों मन्त्रियोंके साथ | भी आशीर्वाद एवं अभिनन्दनपूर्वक लौटनेका आदेश शीघ्र ही नगरको जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करते | दिया और सब लोग राजाकी प्रदक्षिणाकर नगरके लिये हुए मेरे द्वारा प्रदान किये गये राज्यका शासन करो ॥ ३२ ॥ | निकल पड़े ॥ ३६-३७ ॥ जैसे परमात्मतत्त्वके विद्वान् व्यक्तिका चित्त उसके | तब छत्र और ध्वजसे सुशोभित माननीय हेमकण्ठने लौकिक कार्योंमें लगे रहनेपर भी परमात्मामें ही संलग्न | गज-अश्व-रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त महान् सेनाको रहता है, जैसे सामान्य जनोंका चित्त अपने द्वारा रखे गये | आगे करके नगरको प्रस्थान किया ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हेमकण्ठपुरप्रवेशन' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥ पाँचवाँ अध्याय सुधर्मा-च्यवन-संवाद सूतजी बोले- [हेमकण्ठने] तत्पश्चात् (राजासे | मैं पातिव्रत धर्मके कारण पराधीन हूँ ॥ ४-५ ॥ विदा लेकर) माताके पास आकर स्नेहसे व्याकुल | सूतजी बोले-ऐसा सुनकर पुत्र हेमकण्ठने अपने बुद्धिसे उससे कहा कि हे माता ! मुझ निरपराधका त्याग | सुहृज्जनोंके साथ माताको प्रणाम किया और उनकी आप कैसे कर रही हैं ? ॥ १ ॥ | प्रदक्षिणा करके और उनकी आज्ञा प्राप्तकर नगरको पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा-'यह पुत्र भी हमारे | प्रस्थान किया ॥ ६ ॥ साथ चले'- ऐसा आपको पिताजीसे कहना चाहिये। | उस समय वह नगर इन्द्रके नगर अर्थात् स्वर्गलोककी यदि आपके अनुरोधपर वे मुझे साथ ले चलेंगे, तब मैं | भाँति नागरिकोंद्वारा ध्वजाओं, पताकाओं और पल्लवोंसे आप दोनोंकी सेवा करूँगा, मेरी बुद्धि राज्य करनेमें नहीं | अलंकृत किया गया था और उसके मार्गोंको सुगन्धित है। वह राज्य मुझे क्या सुख देगा, जो आप दोनोंसे रहित | द्रव्य आदिसे सींचा गया था ॥ ७॥ हो ! ॥ २-३ ॥ | [तदनन्तर] राजाने स्वजनोंको वस्त्र और पान सुधर्माने कहा-हे महाबाहु ! दुःख और शोकसे | देकर विदा किया और अपने ऐश्वर्यसम्पन्न भवनमें प्रवेश युक्त राजा इस समय मेरी बात नहीं मानेंगे। इसलिये मेरी | किया; उस समय उसे हर्ष और शोक दोनों था ॥ ८ ॥ आज्ञासे तुम [नगरको] जाओ। पुत्र! स्त्रियोंके लिये | [उसने] प्रजाका पुत्रवत् पालन करते हुए धर्मपूर्वक पतिके अतिरिक्त अन्य कोई देवता मान्य नहीं होता और | राज्य किया और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षकी जैसी शिक्षा

५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

प्राप्त हुई थी, उसमें उसी प्रकार मन लगाया ॥ ९ ॥ ऋषियोंने कहा- [हे सूतजी !] राजा सोमकान्त कैसे और किस वनको गये ? उनके सहायक कौन थे और [वहाँ जाकर] उन्होंने क्या कार्य किया ? - यह सब आप हमें विस्तारपूर्वक बतायें ॥ १० ॥ सूतजी बोले- हे निष्पाप ऋषियो ! सोमकान्त जिस प्रकार वनको गये और वहाँ जो कार्य किया, अब मैं उसे आप सबसे कहूँगा, उसे आदरपूर्वक सुनिये ॥ ११ ॥ [राजाने] सुबल और ज्ञानगम्य नामक दो मन्त्रियों और धर्मपत्नी सुधर्माके साथ दुर्गम वनमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥ आगे-आगे मन्त्री, मध्यमें राजा और उनके पीछे उनकी धर्मपत्नी सुधर्मा वैसे ही चल रही थी, जैसे रामके पीछे सीता [वनको गयी थीं] ॥ १३ ॥ वे चारों समान मनवाले, सुख-दुःखमें समान भाव रखते हुए एक बार ही भोजन करते, वनमें ही निवास करते और एक वनसे दूसरे वनको जाते थे ॥ १४ ॥ ऊँचे-नीचे रास्तोंपर चलनेके कारण भूख-प्यास और थकानसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर छायाका आश्रय लेकर वे कभी बैठ जाते थे ॥ १५ ॥ पुनः दूसरे वनमें जानेपर उन्होंने एक विशाल सरोवर देखा, जिसमें कछुओंसहित हाथीके समान [विशाल] मगरमच्छ दिखायी दे रहे थे ॥ १६ ॥ वह चारों ओरसे ताल (ताड़), तमाल (एक काली छालवाला वृक्ष), सरल (चीड़), प्रियाल (अंगूरोंकी बेल), मंगलकारी बकुल (मौलसिरी), रसाल (आम), पनस (कटहल), जम्बू (जामुन), निम्ब (नीम), अश्वत्थ (पीपल), वट (बरगद) आदिके वृक्षों और अनेक प्रकारके लताजालोंसे घिरा था, [जिसके कारण] वहाँ ऐसा घना अन्धकार व्याप्त था, जैसा कि पर्वतकी गुफामें रहता है ॥ १७-१८ ॥ वहाँकी वायु कमल और कदम्बके पुष्पोंकी सुगन्धसे सुगन्धित और स्पर्शमें सुखद थी, वहाँसे मुनिजन फूल और फल ले जाते थे ॥ १९ ॥ वहाँ हंस, बगुले, बाज, तोते, कौवे, कोयल, मैना और चकवा पक्षी अनेक प्रकारके शब्द कर रहे थे ॥ २० ॥ हे श्रेष्ठ द्विजगण ! वहाँ अनेक प्रकारकी लताओं और पुष्पोंके कुंजोंका आश्रय लेनेवालोंको सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें भी स्पर्श नहीं कर पाती थीं। वहाँ भूख-प्यास और मृत्युका भय वैसे ही नहीं था, जैसे पुण्यात्माओंको स्वर्गमें नहीं रहता ॥ २१ ॥ वहाँ जाकर उन सबने श्रमापहारी शीतल जलका पान किया और स्नान एवं नित्य क्रिया करके फलाहार किया। तदनन्तर राजा कोमल बालुकामय तट-प्रदेशमें सो गये और उनकी धर्मपत्नी सुधर्मा उनके पैर दबाने लगीं ॥ २२-२३ ॥ राजाका अभिप्राय समझकर दोनों मन्त्री कन्द, मूल, फल और कमल-नाल लाने चले गये ॥ २४ ॥ तब वहाँ सुधर्माने एक अद्भुत बालकको देखा, जो अपनी कान्तिसे देदीप्यमान हो रहा था। [उस समय सुधर्माने] उस उत्कृष्ट रूपवाले बालकको [देख करके] यही माना कि कामदेव ही इस बालकके रूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥ उस बालकको देखकर ही वह सुधर्मा हर्षित हो गयी और उसने उसे [अपना] हितकारी माना। क्षुब्ध या प्रसन्न हृदय स्वयं ही समीक्षा करके बता देता है कि कौन अपकारी है और कौन उपकारी ॥ २६ ॥ [तब सुधर्माने] उस बालकसे पूछा कि बताओ तुम कौन हो? कहाँ जा रहे हो? किसके पुत्र हो और तुम्हारी माता कौन है? अपने शब्दोंकी अमृतधारासे मित्रकी भाँति मेरे दोनों कानोंको शीघ्र सन्तुष्ट करो ॥ २७ ॥ सूतजी बोले- ऐसा पूछनेपर उस बालकने राजपुत्री (सुधर्मा)-को अमृतमयी वाणीमें उत्तर देते हुए कहा- हे भामिनि ! महर्षि भृगु मेरे पिता हैं और पुलोमा मेरी माता। जल लेनेकी इच्छासे मैं अपने घरसे यहाँ आया हूँ ॥ २८ ॥ हे शुभे ! मेरा नाम च्यवन है और मैं पिताका आज्ञाकारी हूँ; तुम कौन हो और ये तुम्हारे कौन हैं? तथा इस वनमें क्यों आये हैं? ॥ २९ ॥ इनके अंगोंसे वर्षाकालके पर्वतकी भाँति स्राव क्यों हो रहा है? किस कर्मके कारण इनके शरीरसे इतनी दुर्गन्ध आ रही है - यह बतलाओ ॥ ३० ॥

उ०ख०-अ०६ ] * राजा सोमकान्तका भृगुमुनिके आश्रममें जाना * ५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तुम स्वयं अत्यन्त सुन्दरी, सुकुमारी और सुन्दर | यहाँ राक्षस, प्रेत, भूत और अनेक प्रकारके पशु- नेत्रोंवाली होकर भी कीड़ोंसे भरे शरीरवाले इनकी सेवा | पक्षी हमें भयभीत करते रहते हैं, पर न जाने क्यों वे हमें कैसे करती हो ? ॥ ३१ ॥ | खाते नहीं हैं ? ॥ ४१ ॥ तुम सुन्दर और प्रसन्न मुखवाली तथा समस्त | न जाने वे आगे दुःख भोगनेके लिये ही हमें बनाये अंगोंसे सुन्दर एवं शोभनीय हो; क्या तुम्हारे पिता, | रखेंगे, मैं अपने पापकर्मजनित दुःखोंका अन्त नहीं देख सुहृज्जनों, भाइयों और [पुरोहित आदि] द्विजोंको विवाहसे | पा रही हूँ ॥ ४२ ॥ पूर्व यह ज्ञात नहीं था कि वर कुष्ठ रोगसे पीड़ित और | द्विजोंसे घिरे इन राजाकी [पूर्वकालमें] कड़वे, कृमियोंसे आक्रान्त है ? आपने कैसे इनका वरण कर | तीखे, खट्टे, नमकीन, मीठे, स्निग्ध (घृतपक्व) व्यंजनोंमें लिया और इस दुर्गम वनको चली आयीं ? ॥ ३२-३३ ॥ | वैसी रुचि नहीं होती थी, जैसी कि इस समय कन्द- सूतजी बोले- उस बुद्धिमान् मुनिपुत्रके द्वारा इस | मूल और कसैले-खट्टे फलोंमें होती है ॥ ४३१/२ ॥ प्रकार पूछे जानेपर शोक और हर्षसे युक्त उस सुधर्माने | दरिद्रोंका आहार बहुत अधिक होता है और उनके सम्पूर्ण वृत्तान्त उससे कह सुनाया ॥ ३४ ॥ | द्वारा खाया हुआ भोजन पच भी जाता है, जबकि सुधर्माने कहा- सौराष्ट्रदेशमें देवपुर नामसे | श्रीसम्पन्न (ऐश्वर्यवान्) लोगोंकी शक्ति उतना भोजन विख्यात एक विशाल नगर है, वहाँ ये मेरे पति | करने और उसे पचानेकी नहीं होती ॥ ४४१/२ ॥ सोमकान्त राज्य करते थे। ये अत्यन्त सम्मान्य, दानशील, | जो [राजा] कोमल, दिव्य और मनोरम शय्यापर शूरवीर, दृढ़ पराक्रमी, असंख्य सेनासे सम्पन्न, शत्रुओंके | शयन करता था; समय विपरीत होनेपर देखिये कि वह राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले, सौन्दर्यशाली, यज्ञशील, | आज यहाँ-वहाँ कहीं भी सो जाता है ॥ ४५१/२ ॥ ऐश्वर्यसम्पन्न, मित्रोंको आनन्द देनेवाले, सभी कार्योंके | जिसके चारों तरफ दिशाएँ अनेक प्रकारके मांगलिक विवेचक और नीतिशास्त्रके पण्डित थे ॥ ३५-३७ ॥ | सुगन्धित द्रव्योंकी सुगन्धसे व्याप्त रहती थीं, वही आज हे द्विजश्रेष्ठ ! राजाने दीर्घकालतक अपने राज्यका | मवाद, रक्त और सड़े मांसकी दुर्गन्धसे व्याप्त है ॥ ४६१/२ ॥ भोग किया, परंतु पूर्वजन्मोंके कर्म-विपाकके कारण इस | जो विद्वानोंसे घिरा हुआ आनन्दसिन्धुमें निमग्न रहता अवस्थाको प्राप्त हुए हैं, और पुत्रको राज्य देकर | था, आज वही दुःखदायी कीड़ोंसे घिरा हुआ है ॥ ४७१/२ ॥ मन्त्रिद्वयके साथ इस वनको आये हैं। मैं भी इनके पीछे- | हे भृगुनन्दन ! मेरी समझमें नहीं आ रहा कि हम पीछे चलती हुई सुबल और ज्ञानगम्य नामक मन्त्रियोंके | इस दुःखसागरको कैसे पार करेंगे? इस अगाध [दुःख]- साथ यहाँतक चली आयी। राजाकी आज्ञा लेकर वे दोनों | सागरमें डूबती हुई [हम लोगोंकी] नौकाके लिये आप फल लाने वनमें गये हैं ॥ ३८-४० ॥ | जहाज बन जाइये ॥ ४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सुधर्मा-च्यवन-संवादवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥ छठा अध्याय राजा सोमकान्तका भृगुमुनिके आश्रममें जाना सूतजी बोले- सुधर्माके इस प्रकारके वचन सुनकर | भृगु बोले- हे पुत्र! तुमने ऐसी क्या अपूर्व (जो भृगुपुत्र च्यवनने त्वरापूर्वक अपना जलसे भरा कलश | पहले न देखी हो) बात देख ली है, जो चकित-से उठाया और परदुःखकातर होनेके कारण चुपचाप अपने | दिखायी दे रहे हो; तुम्हें विलम्ब क्यों हो गया—यह घरको चले गये। तब भृगुने विलम्बकर आनेवाले पुत्रसे | मुझसे बताओ ॥ ३ ॥ पूछा-१-२ ॥ | पुत्र बोला- हे मुने! सौराष्ट्रदेशमें देवपुर नामसे

५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विख्यात एक नगर है, वहाँ कमलके समान नेत्रवाला सोमकान्त नामका प्रसिद्ध राजा था। उसने बहुत समयतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्य किया, परंतु दैववश वह दुर्भाग्यको प्राप्त हो गया। हे पिता! वह अपने पुत्रको राज्य देकर पतिकी आज्ञा माननेवाली अपनी पत्नी सुधर्मा और दो मन्त्रियों- सुबल और ज्ञानगम्यके साथ यहाँ आया है। गलित कुष्ठसे पीड़ित और कीड़ोंसे युक्त वह राजा भ्रमण करते हुए दुर्गम सरोवरतक आया है, वह ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे गौतममुनिद्वारा शापित सहस्र भगसे युक्त इन्द्र हो ॥ ४-७॥ कहाँ सुन्दर अंगोंवाली वह सुधर्मा और कहाँ उसका गलित कुष्ठसे पीड़ित पति ! इसी वृत्तान्तको उससे पूछनेपर मेरा कुछ समय बीत गया था ॥ ८ ॥ उसके करुणापूर्ण वचनोंसे मेरा चित्त द्रवीभूत हो गया, तब मैं शीघ्र ही कलश भरकर चला आया ॥ ९ ॥ सूतजी बोले- [इस प्रकार ] उस (सुधर्मा) ने जो कुछ कहा था, वह सब उसने उनसे (भृगुजीसे) कह दिया। उसे सुनकर पुत्र च्यवनसे भृगुने पुनः कहा- ॥ १० ॥ भृगु बोले- हे पुत्र ! दूसरोंका उपकार करनेवाले लोग तो स्वयं संसारमें विख्यात होते हैं। [वे] महाराज सोमकान्त धर्मनिष्ठ, पूज्य और सम्मान्य हैं, अतः उनको ले आओ। मेरी आज्ञासे तुम जाओ और उन सबको शीघ्र ले आओ, मैं उनकी आश्चर्यजनक स्थितिको देखूँगा और उन्हें भी अपना [तपोजेनित कौतुक ] दिखाऊँगा ॥ ११-१२॥ सूतजी बोले-पिताके द्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर सुधर्माको देखनेके लिये उत्सुक करुणानिधि च्यवन शीघ्रतापूर्वक वहाँ सरोवरके पास गये ॥ १३ ॥ उसी समय सुबल और ज्ञानगम्य नामवाले दोनों अमात्य भी फल और कन्दका भार लिये हुए राजाके समीप आ गये ॥ १४ ॥ तदनन्तर उन मुनिपुत्र च्यवनने सुन्दर नेत्रोंवाली सुधर्मासे कहा- हे सुव्रते ! मेरे पिता आप सबको अपने आश्रमपर बुला रहे हैं ॥ १५ ॥ तब उन (मुनि च्यवन)- का इस प्रकारका वचन सुनकर दुःखसे व्याकुल सुधर्मा वैसे ही सावधान हो गयी, मानो शरीरमें प्राण आ गये हों ॥ १६ ॥ तब उनके वचनामृतका पान करके सुन्दर अंगोंवाली और शीलसम्पन्न राजपत्नी सुधर्मा दोनों मन्त्रियों और पति राजा सोमकान्तके साथ मुनिपुत्रको आगे करके चली। उस समय मार्गके मध्यमें उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, जैसे बृहस्पतिको आगे करके शिवा (पार्वतीजी) गणेश और स्कन्दसहित शिवके साथ जा रही हों। इस प्रकार वे वेदमन्त्रोंके उच्च स्वरसे ध्वनित भृगुजीके आश्रम-मण्डलमें पहुँचीं ॥ १७-१९ ॥ [वह आश्रम] अनेक प्रकारकी पुष्पलताओंस आच्छादित और अनेक प्रकारके पक्षियोंके कलरवसे निनादित था। वहाँ बिलाव, बगुले, बाज, हाथी, गाय, मोर, सर्प, पक्षी, सिंह और व्याघ्र क्रीड़ा कर रहे थे। वहाँ न हवा तेज चलती थी, न ही सूर्य अधिक तपते थे और न बादल ही अधिक वर्षा करते थे, अपितु उन मुनिकी इच्छानुसार ही वर्षा करते थे—ऐसे आश्रममें मुनिपुत्रको आगे करके उन सबने प्रवेश किया ॥ २०-२२ ॥ वहाँ उन्होंने व्याघ्रचर्मपर विराजमान उन सूर्यसदृश अद्भुत स्वरूपवाले तेजस्वी भृगुमुनिको देखा। तब राजा सोमकान्त, उनकी पत्नी सुधर्मा और दोनों मन्त्रियोंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया तथा राजाने कहा- ॥ २३ ॥ राजा बोले - हे द्विजेन्द्र ! आज मुझे ब्राह्मणोंद्वारा दिये गये आशीष, मेरा धर्म और मेरी तपस्या भी सुफल हो गयी है, मैं आजन्म पवित्र हो गया हूँ और मेरे जननी-जनकका भी जीवन सुजीवन हो गया है ॥ २४ ॥ मेरे पूर्वार्जित पुण्योंके समूहसे इस समय आपका दर्शन हुआ है, जिससे [अतीत तथा वर्तमानके] पापोंका नाश हो गया। हे मुनीन्द्र ! इससे मेरा भविष्य भी कल्याणमय हो गया है। इस प्रकार आपका दर्शन तीनों कालोंमें मेरे जन्मको पवित्र बना रहा है ॥ २५ ॥ हे अमोघ दर्शनवाले मुनीन्द्र ! मैं सौराष्ट्रदेशमें देवपुर [नामक नगर]-में नीतिपूर्वक, पापोंसे डरते हुए और ब्राह्मणों एवं देवताओंकी पूजा करते हुए राज्य करता था। अकस्मात् मेरा यह कौन-सा उग्रतर और अन्तहीन पाप उदित हो गया, जिससे कि मैं इस

उ०ख०-अ०७ ] * भृगुमुनिके द्वारा राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका वर्णन * ५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दुर्दशाको प्राप्त हो गया? मैं इसका किंचित् प्रतिकार भी | जिसके कारण तुम इस अवस्थाको पहुँच गये हो—वह नहीं जानता हूँ॥ २६-२७॥ | भी मैं बताऊँगा ॥ ३१॥ मेरे द्वारा किये जानेवाले उपाय भी अपाय | [आप] सब लोग बहुत समयसे भूखे हैं, अतः (अनिष्टकारक) हो जाते हैं, लेकिन आपद्वारा किया | भोजन करें। एक वनसे दूसरे वनको जाते रहनेके कारण गया उपाय, उपाय ही होगा—ऐसा मुझे लगता है; | [आप सब] बहुत अधिक थक गये हैं और आप सबके क्योंकि आपके आश्रममें रहनेवाले जन्मजात वैरी भी | मुख कान्तिहीन हो गये हैं ॥ ३२ ॥ निर्वैर हो जाते हैं। मैं आपके शरणागत हूँ ॥ २८ ॥ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर [मुनिने] पहले सूतजी बोले—उन (राजा)-के इस प्रकारके | उनकी उत्तम तेलसे मालिश करवायी, फिर स्नान वचन सुनकर सद्‌व्रतोंका आचरण करनेवाले भृगुमुनि | करवाया, तत्पश्चात् षड्रसोंसे युक्त अनेक प्रकारके करुणामुक्त होकर ध्यानपूर्वक अवलोकनकर राजा | व्यंजनोंका भोजन करवाया ॥ ३३॥ सोमकान्तसे बोले— ॥ २९ ॥ | थके हुए उन लोगोंने भी अमित तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ भृगु बोले—हे राजन्! मैं उपाय बताता हूँ, तुम्हें | भृगुकी आज्ञा पाकर सम्यक् रूपसे स्नानादिपूर्वक अलंकृत चिन्ता करना उचित नहीं है। मेरे आश्रममें आनेवाले | होकर भोजन किया। तत्पश्चात् दुर्जय चिन्ताका त्यागकर प्राणी दुःख नहीं पाते हैं ॥ ३० ॥ | मुनिद्वारा परिकल्पित कोमल शय्याओंपर वे सब इस प्रकार हे नृपश्रेष्ठ ! जन्मान्तरमें जो तुमने पाप किया है, | सो गये, मानो अपने राज्यमें पहुँच गये हों ॥ ३४-३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भृगु-आश्रमगमनवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ सातवाँ अध्याय भृगुमुनिके द्वारा राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका वर्णन ऋषियोंने कहा—[हे सूतजी!] तब राजा सोमकान्तने | उत्तर नहीं देता—वे दोनों इस लोकमें गूँगे और बहरे होते वहाँ जाकर क्या किया और सर्वज्ञ भृगुमुनिने उन्हें क्या | देखे गये हैं। इसलिये हे श्रेष्ठ द्विजगण! मैं [राजा] उपाय बताया ? ॥ १ ॥ | सोमकान्तकी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें— ॥ ३-५ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! आप हम श्रोताओंके समक्ष इस | उस रात्रिके बीत जाने और दिवसाधिपति सूर्यके कथाको कहिये; क्योंकि आपके वचनामृतका पान करके | उदित होनेके बाद स्नान, सन्ध्या, जप, हवन आदि करके हम तृप्तितक नहीं पहुँच रहे हैं अर्थात् तृप्त नहीं हो पा | उन भृगुश्रेष्ठने पत्नी और मन्त्रियोंसहित स्नान और जप रहे हैं ॥ २ ॥ | कर चुके राजा सोमकान्तसे उनके पूर्वजन्मकी कथा सूतजी बोले—हे महाभाग [ऋषियो !] आपने | कहना आरम्भ किया ॥ ६-७ ॥ उचित प्रश्न किया है। आप लोग तो स्वयं ही ज्ञानके | भृगुजी बोले—विन्ध्यपर्वतके निकट रमणीय समुद्र हैं। हे द्विजगण! जो श्रोता कथाका अन्ततक | कोल्हारनगरमें चिद्रूप—इस नामसे विख्यात एक महान् श्रवण नहीं करता अथवा जो वक्ता कथाका अन्ततक | धनवान् वैश्य हुआ। उसकी सुलोचना नामसे प्रसिद्ध वाचन नहीं करता या केवल लिखे हुएका ही वाचन | पत्नी अत्यन्त सौभाग्यवती, सुशीला, दानी, पतिवाक्यपरायणा करता है अथवा पुस्तककी चोरी करता है और जो शिष्य | (पतिकी आज्ञा माननेवाली) और सती थी। हे नृपश्रेष्ठ ! गुरुसे प्रश्न नहीं करता तथा जो गुरु शिष्यके प्रश्नका | पूर्वजन्ममें तुम उसीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे।

५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- ब्राह्मणोंके कथनानुसार उन दोनोंने तुम्हारा 'कामन्द'- यह नाम रखा ॥ ८-१० ॥ माता-पिताकी वृद्धावस्थामें तुम्हारा जन्म हुआ था और तुम उनके एकमात्र पुत्र थे, इसलिये वे दोनों दिन- रात तुम्हें अत्यन्त स्नेह करते थे और तुम्हारा लालन- पालन करते थे ॥ ११ ॥ उन दोनोंने हिरणी-जैसे नेत्रोंवाली, सुकुमार अंगोंवाली और 'कुटुम्बिनी' नामसे प्रसिद्ध [कन्याके साथ] तुम्हारा पर्याप्त धन खर्चकर, कौतुक और मांगलिक उत्सवपूर्वक विवाह किया ॥ १२ ॥ [तुम्हारी पत्नी] ब्राह्मणों, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करनेमें प्रेम रखनेवाली और तुममें ही अनुरक्त चित्तवाली थी। समस्त स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा वह अत्यन्त सुन्दरी थी ॥ १३ ॥ पाँच बाण धारण करनेवाले कामदेवकी पत्नी रतिकी भाँति सुन्दर उस सात पुत्रों और पाँच पुत्रियोंवाली कुटुम्बिनीने अपने नामको सार्थक किया था ॥ १४ ॥ तदनन्तर बहुत समय बाद तुम्हारे पिता पंचतत्त्वोंमें विलीन हो गये और तुम्हारी साध्वी माता भी उन्हींके साथ दग्ध होकर स्वर्गको चली गयीं ॥ १५ ॥ तब तुमने अपनी मित्रमण्डलीके साथ [मौजमस्तीमें] बहुत-सा धन नष्ट कर दिया। [उनके द्वारा] कुछ धन उठा ले जाया गया, कुछ नष्ट कर दिया गया और कुछ खाने-पीनेमें समाप्त हो गया-इस प्रकार सम्पूर्ण धन विनाशको प्राप्त हो गया ॥ १६ ॥ चिन्तित होकर तुम्हारी धर्मपत्नीने तुम्हें बहुत रोका, किंतु तुमने उसकी बात नहीं मानी और घर भी बेच दिया ॥ १७ ॥ कुलके लिये कण्टकके समान तुम्हें छोड़कर वह अपने बच्चोंके पालन-पोषणके लिये तुम्हारी आज्ञा लेकर बच्चोंके साथ पिताके घर चली गयी ॥ १८ ॥ तदनन्तर तुम दुराचारी हो गये। मदिरापान करके उन्मत्त हो जाते और पागल हाथीकी भाँति नगरमें अत्याचार करते ॥ १९ ॥ तुम दूसरेका द्रव्य हरण करते, परनारियोंसे व्यभिचार करते, गाँवमें चोरी करते और लोगोंको सन्ताप दिया करते थे। तुम द्यूतक्रीडामें निपुण, मूर्तिमान् पापसमूह, हिंसाप्रिय तथा बलहीन होते हुए भी अपनेको शूरवीर माननेवाले थे ॥ २० ॥ जो-जो लोग तुम्हारे सुखके साथी थे और तुम्हारे द्वारा तृप्त किये गये थे, उनसे बहुत-सा धन लेकर तुम खा गये। तुम्हारे पिताने धरोहरके रूपमें अपने मित्रोंके यहाँ जो कुछ रखा था, उसे भी लेकर तुम खा गये ॥ २१ ॥ तुमने अनेक बार झूठी कसमें खायीं, अनेक बार स्त्रियोंसे झूठ बोले और झूठे प्रमाण दिये। इसलिये सभी लोग तुमसे वैसे ही भयभीत रहते थे, जैसे घरमें घुसे हुए अत्यन्त विषैले साँपसे ॥ २२ ॥ इस प्रकार जब तुम लोगोंके लिये पायसमें पड़े हुए [कँटीले] गोखुरकी भाँति हो गये, तब इसी कारणसे लोगोंने राजाकी अनुमति लेकर तुम्हें नगरसे निकलवा दिया ॥ २३ ॥ वनमें रहते हुए तुम नित्य बहुत-से प्राणियोंकी हत्या करते थे। तुम स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंकी हत्या करते थे और किसी श्रेष्ठ पुरुषको देखकर वैसे ही पलायन कर जाते थे, जैसे सिंहको देखकर भेड़िया या मृग भाग जाता है ॥ २४ ॥ तुमने मछलियों, बगुलों, सारस, मुर्गों, भेड़ियों, हिरनों, बन्दरों, कोयल, गैंडों, खरगोशों और घड़ियालोंको निष्प्रयोजन मारकर और उन्हें खाकर पापपूर्ण आचरणसे ही अपने शरीरका पोषण किया ॥ २५ ॥ तुमने अनेक स्थानोंमें रहनेवाले दुर्धर्ष चोरोंको अपने साथ मिलाकर और सिंहों, व्याघ्रों एवं सियारोंको पर्वत-कन्दराओंसे निकालकर लकड़ी, मिट्टी और पत्थरोंसे एक उत्तम गृहका निर्माण किया; जो एक कोस विस्तारवाला और अनेक प्रकारके चमत्कारोंसे युक्त था ॥ २६-२७ ॥ तुम्हारी पत्नीके पिताने जनता और राजाके भयसे उसे बालकोंके साथ तुम्हें सौंप दिया और वह तुम्हारे घर आ गयी ॥ २८ ॥

उ०ख०-अ०८ ] * राजा सोमकान्तद्वारा गणेश-मन्दिरके जीर्णोद्धारका वर्णन * ५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अनेक प्रकारके वस्त्रों एवं अलंकारोंसे सुशोभित तुम्हारी पत्नी देवांगनाकी भाँति शोभा पाती थी, तुम्हारे बालक भी तेजस्वी थे। वहाँ तुम चोरोंके साथ रहते तथा रास्तेमें चलनेवाले गरीब लोगोंकी हत्या करके घर भाग आते। चोरों, बालकों और स्त्रीके साथ तुम राजाकी भाँति प्रतीत होते थे। किसी समय गुणवर्धन नामसे विख्यात एक विद्वान् ब्राह्मण तुम्हें मध्याह्नकालमें रास्तेमें एकाकी दिखायी पड़ा ॥ २९-३१ ॥ तब तुमने उस ब्राह्मणका दाहिना हाथ पकड़कर उसे रोक लिया। तुम्हारे द्वारा पकड़कर खींचे जानेसे वह तुम्हारे मनकी बात जान गया और थर-थर काँपने लगा। तुम्हें अपना काल मानकर वह मूर्च्छित हो गया और जीवित रहनेकी इच्छासे अत्यन्त करुणापूर्ण एवं तर्कसंगत वाक्योंसे तुम्हारा प्रबोधन करते हुए कहने लगा - ॥ ३२-३३ ॥ गुणवर्धन बोला - मैं ब्राह्मण हूँ, नव-विवाहिताका पति हूँ, शान्त स्वभाववाला हूँ और निरपराध हूँ; धनवान् और सौभाग्यवान् होकर भी तुम मुझे मारनेकी इच्छा क्यों करते हो ? ॥ ३४ ॥ दुर्बुद्धिपूर्ण वासनाका त्याग करके तुम अपनी बुद्धिको सद्धर्ममें लगाओ। मेरी पहली पत्नी परलोकको चली गयी, तब मैंने उससे श्रेष्ठ यह दूसरी पत्नी प्राप्त की है। यह सुन्दर आचरणवाली, परम उदार, साध्वी और सभी गुणोंकी खान है। पितरोंके ऋणसे मुक्त होने, धर्म और सन्तानकी वृद्धिके लिये तथा गृहस्थ धर्मके पालनकी इच्छासे मैंने अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक उससे विवाह किया है। मेरे बिना उसका और उसके बिना मेरा जीवन व्यर्थ हो जायगा ॥ ३५-३७ ॥ अतः तुम मेरे रक्षक पिता हो जाओ, मैं भी तुम्हारा पुत्र हो जाऊँगा; क्योंकि शास्त्रमें जीवन देनेवाले और भयसे रक्षा करनेवाले-दोनोंको पिता कहा गया है। डाकू भी ब्राह्मण या शरणमें आये हुए-की रक्षा करते हैं, अतः मुझ ब्राह्मण, विद्वान् और शरणागतको तुम्हें मुक्त कर देना चाहिये, अन्यथा तुम हजारों कल्पोंतक नरकोंमें पड़ते रहोगे ॥ ३८-३९१/२ ॥ [तुम्हारे द्वारा लाये गये धनके] स्त्री, पुत्र और सुहृज्जन सभी उपभोक्ता हैं। ये ठग लोग तुम्हारे धनसे सुखी तो हैं, पर तुम्हारे पापमें भागीदार नहीं होंगे, अतः यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि तुम कितने जन्मांतक इस पापका फल भोगते रहोगे ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सोमकान्तके पूर्वजन्मका कथन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥ आठवाँ अध्याय राजा सोमकान्तद्वारा पूर्वजन्ममें किये गये पापों तथा वृद्धावस्थामें गणेश-मन्दिरके जीर्णोद्धारका वर्णन भृगुजी बोले - उस ब्राह्मण (गुणवर्धन)-ने इस प्रकार बार-बार करुणासे युक्त एवं अवसादपूर्ण वचन कहे, परंतु उन्हें सुनकर भी तुम्हारा हृदय नहीं पसीजा ॥ १ ॥ सचमुच, ब्रह्माने वज्रके सारभागसे ही तुम्हारा निर्माण किया था। बहुत-से जन्तुओं और हजारों मनुष्योंकी हत्यासे तुम्हारे मनने कृतघ्नकी भाँति अति निष्ठुरता प्राप्त कर ली थी। तदनन्तर (ब्राह्मणकी बात सुनकर) तुमने निष्ठुर यमराजकी भाँति उससे कहा - ॥ २-३ ॥ चोर [ जो इस जन्ममें राजा सोमकान्त था ] बोला - रे ब्राह्मण ! बधिरके सम्मुख पाण्डित्यकी बातें और अधोमुख घड़ेमें जल भरने-जैसा प्रयास तुम अपने इन वाक्यसमूहोंद्वारा मुझपर व्यर्थमें क्यों कर रहे हो ? कहाँ मेरी मूढ़ बुद्धि और कहाँ तुम्हारा यह [ज्ञानपूर्ण] उपदेश ! जैसे मदिरापान किये हुए-के सम्मुख तत्त्व- चिन्तन व्यर्थ है, वैसे ही तुम्हारी ये बातें मुझे रुचिकर नहीं लग रही हैं। जिसकी धनमें आसक्ति है, उसके लिये

५८      * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *      [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

पिता और भाईका कोई विचार नहीं होता, जैसे कि कामातुरको भय और लज्जा नहीं होती ॥ ४-६ ॥ क्या तुमने कौएको शुद्धिका विचार करते हुए, जुआ खेलनेवालेको सत्य बोलते हुए, नपुंसकको धैर्य रखते हुए, स्त्रियोंमें निष्कामता और सर्पोंमें क्षमाके भावको देखा है ? ॥ ७ ॥ विधाताने दैवयोगसे तुम्हें मुझ आजीविकारहितके पास भेज दिया है, मैं तुम्हें कदापि नहीं छोड़ सकता ॥ ८ ॥ भृगुजी बोले—ऐसा कहकर तुमने अपने दाहिने हाथमें तीक्ष्ण धारवाला खड्ग लेकर उस (ब्राह्मण)-का सिर उसी प्रकारसे काट दिया, जिस प्रकार बिलाव मूषकका ॥ ९ ॥ इस प्रकार तुम्हारे द्वारा की गयी ब्रह्महत्याओंकी गणना करना सम्भव नहीं है, उसमें भी विशेष रूपसे स्त्रियों, बालकों, वृद्धजनों और जीव-जन्तुओंकी हत्याओंकी गणना नहीं हो सकती [और गणना करनी भी नहीं चाहिये]; क्योंकि दूसरेके पापोंकी गणना करनेवाला भी उसमें विशेष रूपसे भागीदार हो जाता है ॥ १०१/२॥ हे कामन्द ! तदनन्तर बहुत समय बीतनेपर तुम्हारी वृद्धावस्था आ गयी। तुम्हें कफ, अवसाद, पसीना हिचकी और कँपकँपी होने लगी। तुम्हें बैठनेपर तो नींद आ जाती, परंतु लेटनेपर वह नहीं आती ॥ ११-१२ ॥ तुम्हारे पुत्र, सेवक-सेविकाएँ, मित्रगण, पुत्रियाँ और दौहित्र—सभी तुम्हारा अनादर करते थे ॥ १३ ॥ वहाँ तुम्हारे पास एक विश्वसनीय ब्राह्मण था, जो गोपनीय ढंगसे तुम्हारे कार्य करता था, वह तुम्हारा देखा-समझा था तथा घरमें बेरोकटोक आने-जानेमें समर्थ था, उसे तुमने सभी वनवासी मुनियोंको बुला लानेके लिये भेजा, तब तुम्हारे भयसे और उस ब्राह्मणके वचनका आदर करते हुए वे सब तुम्हारे पास आये ॥ १४-१५ ॥ तब तुमने उन [मुनियों]-को प्रणाम करके कहा— '[आप लोग] मुझसे दान ग्रहण करें।' तब उन लोगोंने कहा—'हम तुझ पतितसे दान नहीं ग्रहण करेंगे' ॥ १६ ॥ पापी व्यक्तिका यज्ञ कराने, उसे वेदाध्ययन कराने,


[दायाँ स्तम्भ]

उससे विवाहादि सम्बन्ध रखने, बातचीत करने, उसके साथ एक वाहनपर बैठने और साथ भोजन करनेसे उसका पाप दूसरेमें भी संचरित हो जाता है—ऐसा तुमसे कहकर वे लोग अपने-अपने आश्रमोंको चले गये और वहाँ जाकर उन सबने पावमानी ऋचाका जप करते हुए सचैल (वस्त्रसहित)-स्नान किया ॥ १७-१८॥ हे कामन्द (राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका नाम) ! तब रोग-पीड़ित होने, स्वजनोंद्वारा त्याग दिये जाने और ब्राह्मणोंद्वारा भी बहिष्कृत कर दिये जानेसे तुम्हारे मनमें अत्यधिक अनुताप (पापकर्मके बाद पछतावा) उत्पन्न हुआ ॥ १९ ॥ स्वर्ण-रजत एवं रत्नादिसे समन्वित अपनी विपुल सम्पत्ति देखकर तुम्हारी बुद्धिमें किसी देवालयके जीर्णोद्धारसम्बन्धी विचार प्रस्फुटित हुआ ॥ २० ॥ तब ब्राह्मणोंने तुमसे कहा कि वनमें एक छोटा- सा टूटा-फूटा देवमन्दिर है, उसमें गणेशजीकी श्रेष्ठ, अनादि और मंगलमयी मूर्ति स्थित है ॥ २१ ॥ तदनन्तर तुमने अत्यधिक विस्तार और ऊँचाईवाले, चार तोरणोंसे युक्त चार द्वारवाले, अत्यन्त सुन्दर चार शिखरोंसे शोभायमान, अनेक स्तम्भों और अनेक वेदियोंसे समन्वित, मोती-मूँगा-रत्नों आदिसे जड़ित सुन्दर आँगनवाले, अनेक प्रकारके पुष्पोंके वृक्षों और अनेक प्रकारके फलोंके वृक्षोंसे समन्वित, चारों दिशाओंमें निर्मल जलसे पूर्ण वापियोंसे सुशोभित मन्दिरका निर्माण करवाया; जिसमें तुम्हारा [अधिकांश] धन व्यय हो गया और कुछ धन स्त्री, पुत्रों, मित्रों और बान्धवोंद्वारा हरण कर लिया गया ॥ २२-२५ ॥ तदनन्तर थोड़े ही समय बाद तुम पंचतत्त्वोंमें विलीन हो गये। यमराजके दूतोंने तुम्हें बाँधकर कोड़ोंका प्रहार करते हुए बहुत ताड़ित किया ॥ २६ ॥ तुम्हारा सारा शरीर काँटोंसे बिंध गया, तुम्हें पत्थरपर पटका गया और मवाद तथा रक्तके कीचड़वाले भयंकर नरकमें तुम्हें डुबोया गया ॥ २७ ॥ इस प्रकार तुम उन दूतोंद्वारा चित्रगुप्त और यमराजके पास ले जाये गये। तब यमराजने पूछा—पुण्य और पापमें

उ०ख०-अ०९] * भृगुमुनिका राजा सोमकान्तको गणेशपुराणके श्रवणका उपदेश देना * ५९ तुम पहले किसका भोग करोगे ? ॥ २८ ॥ तब तुमने कहा- 'हे सूर्यपुत्र ! मैं पहले पुण्योंका भोग करूँगा।' तब तुम्हें सौराष्ट्रदेशमें राजा बनाया गया ॥ २९ ॥ इस प्रकार शरणागतके प्रति करुणाभावसे तपोबलका आश्रय लेकर मैंने पापोंके खानरूप तुम्हारे पूर्वजन्मका वर्णन कर दिया ॥ ३० ॥ [जीर्ण] मन्दिरको कान्तिमान् बना देनेके कारण तुम सोमकान्त (चन्द्रतुल्य कान्तिवाले और) राजा हुए तथा अपनी अतीव कान्तिमती पत्नीके साथ चन्द्रिकासे समन्वित चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हुए ॥ ३१ ॥ सूतजी बोले - भृगुजीद्वारा [पूर्वजन्मका] वर्णन सुनकर वह अधम राजा सोमकान्त उनके वचनोंपर सन्देह करता हुआ पत्थरकी भाँति निष्क्रिय अर्थात् मौन हो गया ॥ ३२ ॥ जब उसे वेद-शास्त्रके तात्त्विक विद्वान्, भूत- भविष्य और वर्तमानको जाननेवाले तपस्वी भृगुके वाक्योंमें सन्देह हुआ तो उसके शरीरसे अनेक प्रकारके रंगों और आकृतियोंवाले बहुत-से पक्षी क्षणमात्रमें निकलने लगे और वे सब उस राजाको खाने लगे ॥ ३३-३४॥ [वे पक्षी] उड़-उड़कर अपनी दृढ़ चोंचोंके अग्रभागसे उस राजाको डँसने अर्थात् चोंचोंके प्रहारसे पीड़ित करने लगे और मुनिके ही समक्ष उसके मांसको काट-काटकर खाने लगे ॥ ३५ ॥ तब अत्यन्त दुःखित होकर वह पुनः उनकी शरणमें गया और ज्ञान एवं तपस्याके निधिरूप भृगुजीसे दीन वाणीमें बोला- ॥ ३६ ॥ राजाने कहा - समस्त प्राणियोंको अभय प्रदान करनेवाले हे मुने! आपके वन (आश्रम)-में जन्मजात वैरियाँको भी परस्पर भय नहीं है, फिर आपके समक्ष ये [पक्षी] मुझ मरे हुएको क्यों मार रहे हैं? मैं दीन हूँ, कुष्ठरोगसे ग्रस्त हूँ, शरणागत हूँ और आपके चरणोंमें पड़ा हूँ, आप इस समय मुझे इनसे बचाइये ॥ ३७-३८॥ सूतजी बोले- राजाके द्वारा ऐसा कहे जानेपर दीनवत्सल भृगुने उससे कहा- ॥ ३८१/२ ॥ भृगुजी बोले - हे राजन् ! मेरे वाक्योंपर संशय करनेके कारण तुम्हें ऐसा अनुभव हुआ है। मैं इसका प्रतिकार बताता हूँ, तुम क्षणभरमें स्वस्थ हो जाओगे। मेरे हुंकारमात्रसे ये पक्षी चले जायँगे ॥ ३९-४०॥ सूतजी बोले - तब द्विज [श्रेष्ठ] भृगुके हुंकारको सुनकर सभी पक्षी अन्तर्हित (लुप्त) हो गये तथा पत्नी और मन्त्रियोंसहित राजा भी प्रसन्न हो गये ॥ ४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नानापक्षिनिवारण' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८॥ नौवाँ अध्याय भृगुमुनिका राजा सोमकान्तको गणेशपुराणके श्रवणका उपदेश देना सूतजी बोले- तदनन्तर भृगुमुनिने क्षणभर ध्यान करके उस [राजा सोमकान्त]-के पूर्वकर्मजनित दुःखोंको देखकर अत्यन्त विह्वल होकर उस राजासे कहा- ॥ १ ॥ कहाँ तुम्हारे पापोंका समूह और कहाँ मेरे द्वारा कहा गया उपाय ! तथापि मैं तुमसे एक उपाय कहता हूँ, जो पापोंका नाश करनेवाला है ॥ २ ॥ यदि तुम शीघ्र ही 'गणेशपुराण' का श्रवण करोगे तो दुःखरूपी समुद्रसे मुक्त हो जाओगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ तब उस राजासे इस प्रकार कहकर [मुनिने] गणेशजीके एक सौ आठ श्रेष्ठ नामोंका जपकर [उससे] जलको अभिमन्त्रित करके राजाको अभिषिक्त किया ॥ ४ ॥ उस जलके सिंचनमात्रसे [राजाके] नासारन्ध्र (नाकके छिद्र)-से छोटा-सा एक काले रंगवाला पुरुष निकलकर भूमिपर गिर पड़ा और उसी क्षण वह सात ताड़ वृक्षोंके बराबर ऊँचा हो गया। वह अपना भयंकर मुख फैलाये हुए था, उसकी जिह्वा अत्यन्त भयंकर थी। उसकी आँखें रक्तवर्णकी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं।

६०          * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *          [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

उसने जटा धारण कर रखी थी। उसके मुखसे [कभी] अग्निकी लपटें निकलती थीं, तो कभी क्षणमात्रमें वह रक्त और मवादका वमन करने लगता था। वह दूसरे [मूर्तिमान्] अन्धकारकी भाँति नेत्रोंको अन्धता प्रदान कर रहा था॥ ५-७॥

उसे देखकर उस आश्रममें निवास करनेवाले सभी लोग भाग खड़े हुए। उसने अपने दाँतोंके कटकटानेकी ध्वनिसे दसों दिशाओंको भर दिया था। तब द्विजश्रेष्ठ [भृगुमुनिने] उस अद्भुत पुरुषसे जानते हुए भी उस [राजा सोमकान्त]-के समक्ष पूछा—तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है?—मुझे बताओ ॥ ८-९ ॥

तब उन द्विजके पूछनेपर उसने मुनिको प्रत्युत्तर देते हुए कहा—मैं प्राणियोंके शरीरमें स्थित रहता हूँ, मेरा नाम 'पापपुरुष' है॥ १० ॥

तुम्हारे द्वारा अभिमन्त्रित जल छिड़कनेसे मैं राजाके शरीरसे बाहर निकला हूँ, मैं भूखसे पीड़ित हूँ और भोजन करना चाहता हूँ; मुझे भोजन दीजिये, नहीं तो मैं सारे लोगोंको और इस सोमकान्तको भी तुम्हारे आगे ही खा जाऊँगा। हे मुने! तुमने ही मुझे इसके शरीरसे बाहर निकाला है, अब कोई रमणीय स्थान मुझे निवासके लिये दो ॥ ११-१२॥

तब समीप जाकर मुनिने पुनः उससे कहा—मेरी आज्ञासे इस सीधे और सूखे आमके वृक्षके कोटरमें तुम निवास करो और गिरे हुए पत्तोंको खाओ; नहीं तो मैं तुझे भस्म कर दूँगा। रे अधम ! मेरी यह बात झूठी नहीं हो सकती ॥ १३-१४॥

**सूतजी बोले—**हे द्विजगण ! मुनिकी बात समाप्त होनेपर उस [पापपुरुष]-ने उस सूखे वृक्षका स्पर्श किया और उसके स्पर्शमात्रसे वह वृक्ष भस्मीभूत हो गया ॥ १५ ॥

तब मुनिको देखकर डरा हुआ वह (पापपुरुष) उसी भस्ममें विलीन हो गया। उसके छिप जानेपर [भृगु] मुनिने पुनः उस [राजा] सोमकान्तसे कहा— ॥ १६॥

**भृगुजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ ! पुराणके श्रवणसे जो तुम्हें पुण्य होगा, उसे तुम तबतक प्रतिदिन इस भस्ममें


[दायाँ स्तम्भ]

ही डालते रहना, जबतक कि यह आम्रवृक्ष [पूर्वकी भाँति] खड़ा न हो जाय। हे राजन् ! इस वृक्षके वृद्धिको प्राप्त होनेपर तुम निष्पाप हो जाओगे ॥ १७-१८॥

**राजाने कहा—**हे ब्रह्मन् ! गणेशजीके पुराणको, जिसे न देखा गया है और न ही सुना गया है, हे मुने! वह अथवा उसका व्याख्याता कहाँ प्राप्त होगा ? ॥ १९ ॥

**मुनि बोले—**पूर्वकालमें [वह पुराण] ब्रह्माजीद्वारा बुद्धिमान् वेदव्याससे कहा गया। व्यासजीसे यह पापनाशक पुराण मुझे विदित हुआ और मैं तुमसे कहूँगा। तुम तीर्थमें सम्यक् रूपसे स्नान करो और हे सुव्रत ! 'मैं पुराणका श्रवण करूँगा'—इस प्रकारका संकल्प करो ॥ २०-२१॥

**सूतजी बोले—**तदनन्तर भृगुजीद्वारा प्रेरित होकर राजा सोमकान्तने प्रसन्न चित्तसे अत्यन्त विख्यात भृगुतीर्थमें स्नानकर संकल्प किया कि 'जो गणेशजीका पुराण है, उसे मैं आजसे प्रारम्भकर प्रतिदिन सुनूँगा।' तब मात्र संकल्प करनेसे ही राजा रोगरहित हो गया ॥ २२-२३ ॥

भृगुजीकी कृपासे वह रक्तस्राव, कृमियों एवं घावोंसे रहित हो गया था। तब उस विस्मित और हर्षित राजाको भृगुजी लिवाकर ले गये और स्वयं अपने आसनपर बैठकर उसे भी आसन प्रदान किया। तब उस दिव्य कान्तिवाले नृपश्रेष्ठ [सोमकान्त]-ने उस आसनपर बैठनेके बाद कहा— ॥ २४-२५ ॥

**राजाने कहा—**आपकी कृपासे और [इस पुराणके श्रवण]-के संकल्पमात्रसे मेरी सारी बलीयसी व्यथा चली गयी। [अब आप] मुझसे गजानन (गणेशजी)-के इस आश्चर्यमय सम्पूर्ण पुराणको कहिये ॥ २६ ॥

**भृगुजी बोले—**मैं उस पुराण (गणेशपुराण)-को कहता हूँ, सावधान होकर सुनो ! जिसका अनन्त पुण्योंका समूह होता है, उसी पुरुषकी बुद्धिमें इसे श्रवण करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है, अन्यथा पापियोंकी नहीं होती। जिसके कानमें पड़नेमात्रसे सात जन्मोंमें किये गये लघु, शुष्क, आर्द्र और स्थूल पाप तथा महापाप भी अविनाशी, अप्रमेय, निर्गुण, निराकार, मन और वाणीसे परे, केवल आनन्दरूप गणेशजीकी कृपासे उसी क्षणसे विलीन होने लगते हैं ॥ २७-३० ॥

उ०ख०-अ०१०] * गणेशपूजन न करनेसे व्यासजीका विघ्नोंसे अभिभूत होना * ६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जिसके स्वरूपको ब्रह्मा, ईशान (शिव) आदि | तो विघ्न-समूह सुखपूर्वक कहाँ विचरण कर पाते! और देवता भी नहीं जानते। जिसकी महिमाका वर्णन करनेमें | अनेक प्रकारके विरहजनित दुःखोंका अनुभव कौन विशिष्ट विद्वान् होते हुए भी सहस्र मुखवाले शेषजी भी | करता ? ॥ ३५१/२ ॥ सक्षम नहीं हैं; हे राजश्रेष्ठ ! उनके सुन्दर पुण्यप्रद पुराण | पूर्वकालमें भूत-भविष्य और वर्तमानको जाननेवाले (गणेशपुराण)-को अतीन्द्रिय ज्ञानसम्पन्न और अमित | व्यासजीने वेदोंके अर्थज्ञानसे रहित, वेदाध्ययनसे वर्जित, तेजस्वी वेदव्यासजीसे मैंने पूर्वकालमें जैसा सुना था, | वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचरणोंसे शून्य, जातियोंका [वैसा ही तुम्हें सुनाऊँगा।] यज्ञ-विध्वंससे दुखी दक्षको | संकर करनेवाले, कुटिल और पापपूर्ण आचरण करनेवाले मुद्गलजीने इसे सुनाया था ॥ ३१-३३॥ | लोग कलियुगमें होंगे-ऐसा विचारकर इस पुराणकी हे राजन्! सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाले गणेशजीमें | रचना की। धर्मकी रक्षाके लिये उन्होंने ही अठारह जिसकी दृढ़ भक्ति हो, उसे ही इस पुराणको नित्य सुनाना | पुराणोंकी भी रचना की ॥ ३६-३८ ॥ चाहिये, उससे इतर व्यक्तिको अर्थात् भक्तिहीनको इसे | उन्होंने उतने ही उपपुराणोंकी भी रचना की, नहीं सुनाना चाहिये ॥ ३४॥ | जिससे लोगोंको वेदार्थका बोध हुआ। उससे ही उन यदि सभी लोग विघ्नराज गणेशजीकी सेवा करते, | लोगोंको गणेशजीके तात्त्विक स्वरूपका बोध हुआ ॥ ३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'राजोपदेशकथन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥ दसवाँ अध्याय गणेशपूजन न करनेसे व्यासजीका विघ्नोंसे अभिभूत होना और ब्रह्माजीका उन्हें गणेशाराधनका उपदेश देना भृगुजी बोले-[भगवान्] नारायणके अंशसे | वास्तविक अर्थका स्मरण नहीं होता था ॥ ३-५ ॥ उत्पन्न, पराशरके पुत्र महामुनि वेदव्यासजी भूत और | जैसे औषधियों और मन्त्रोंके प्रयोगसे किसी श्रेष्ठ भविष्यके ज्ञाता तथा वेद एवं शास्त्रके अर्थको तत्त्वपूर्वक | नागको सामर्थ्यहीन कर दिया गया हो, वैसे ही वे जाननेवाले थे। उन्होंने चार भागोंमें वेदका विभाजन | स्वयंको स्तम्भित-सा अनुभव कर रहे थे और वे इसके करके उसके ज्ञान एवं प्रयोजनकी सिद्धिके लिये विद्याके | हेतूतक भी नहीं पहुँच पा रहे थे अर्थात् इस बुद्धि- मदसे गर्वयुक्त होकर पुराणोंकी रचना करना आरम्भ | स्तम्भनका कारण भी नहीं समझ पा रहे थे ॥ ६ ॥ किया ॥ १-२ ॥ | तब आश्चर्याभिभूत और लज्जित अन्तःकरणवाले परंतु ग्रन्थरम्भके पूर्व उन्होंने उसकी निर्विघ्न | वे पराशरपुत्र व्यासमुनि ब्रह्माजीसे इसका कारण पूछनेके समाप्तिके लिये साधनरूपमें न तो मंगलाचरण किया, न | लिये आदरपूर्वक सत्यलोकको गये ॥ ७ ॥ गणेशजीको नमस्कार किया और न ही उनकी कहीं | वहाँ देवगणों, देवर्षियों और कमलके आसनपर स्तुति ही की। तब तो नित्य, नैमित्तिक, काम्य, श्रौत और | विराजमान ब्रह्माजीको नमस्कारकर वे ब्रह्माजीद्वारा सत्कृत स्मार्त कर्मोंके व्याख्याता; वेद-शास्त्रोंके सर्वज्ञ विद्वान् | होकर उनके द्वारा दिये गये मंगलमय आसनपर आसीन होते हुए भी उन वेदव्यासजीको लौकिक तथा अलौकिक- | हुए ॥ ८ ॥ दोनों प्रकारके विषयोंमें भ्रान्ति ही बनी रहने लगी। | [तत्पश्चात्] पराशरपुत्र महामुनि वेदव्यासजीने विघ्नोंसे अभिभूत होनेके कारण उन्हें उन विषयोंके | आदरपूर्वक झुककर अपने हाथोंसे उनके युगल चरणोंका

६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- स्पर्श किया और ब्रह्माजीसे पूछना प्रारम्भ किया - ॥ ९ ॥ व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! दैववश मेरे साथ यह कैसी अद्भुत बाधा उपस्थित हो रही है, कलियुगमें सभी लोग ज्ञान एवं आचारसे रहित, कर्मजड़, स्तब्ध, नास्तिक और वेदनिन्दक होनेवाले हैं - ऐसा देखकर 'मेरे वाक्योंसे लोग विधि और निषेधका ज्ञान प्राप्त करेंगे'; यह सोचकर मैंने वेदोंके अर्थभूत पुराणोंकी रचना करनेमें अपनी बुद्धिको नियोजित किया, परंतु मेरा ही ज्ञान चला गया और मैं मदोन्मत्तकी भाँति भ्रान्त हो गया। मैं इसका कोई कारण नहीं देखता हूँ, मुझमें कोई स्फूर्ति भी नहीं हो रही है। उस कारणको जानने और पुनः स्फूर्तिप्राप्तिका उपाय पूछनेके लिये मैं आपके पास आया हूँ। हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! मैं आपके अतिरिक्त किसकी शरणमें जाऊँ ? आप सर्वज्ञ हैं, सर्वकर्ता हैं; मेरी भ्रान्तिका निवारण करें। हे ब्रह्मन् ! मैं नित्य आचारपरायण, सर्वज्ञ और नारायणस्वरूप होते हुए भी भ्रान्त हूँ; मेरी इस भ्रान्तिका कारण बताइये ॥ १०-१५ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार उनके वचनको सुनकर और विचारकर कमलासन ब्रह्माजी कुछ विस्मित-से हो गये और विनम्रतापूर्वक झुके हुए उन मुनिसे हँसते हुए बोले- ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोले-आश्चर्यकी बात है! फिर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि कर्मोंकी गति बड़ी ही सूक्ष्म होती है, अतः सत्कर्म या दुष्कर्मको भलीभाँति विचारकर करना चाहिये ॥ १७ ॥ यदि इसके विपरीत कोई व्यक्ति कार्य करता है, तो उसका फल भी विपरीत ही होगा। कार्य चाहे बड़े हों या छोटे; बुद्धिमान् मनुष्यको उन्हें बुद्धिद्वारा, युक्तिपूर्वक और विनम्रतासे सम्पन्न करना चाहिये न कि गर्व और मत्सर (ईर्ष्या)-पूर्वक। पक्षिराज गरुड़को गर्वके कारण ही [भगवान् विष्णुका] वाहनत्व प्राप्त हुआ ॥ १८-१९ ॥ ईर्ष्याके कारण ही अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधनने सम्पूर्ण कुलको नष्ट कर दिया। पूर्वकालमें परशुरामने भी ईर्ष्याके ही कारण क्षत्रियोंका संहार किया था ॥ २० ॥ जो आदि-अन्तसे रहित, जगत्कर्ता, जगन्मय, जगत्‌को धारण करनेवाले, जगत्‌का संहार करनेवाले, सत्-असत्रूप, अव्यक्त और अविनाशी देव हैं। जो सदा कर्तुं, अकर्तुं तथा अन्यथाकर्तुंमें समर्थ हैं; इन्द्रादि प्रमुख देवतागण, मैं, विष्णु और रुद्र, सूर्य, अग्नि, वरुण आदि जिनकी आज्ञाके वशवर्ती हैं; जो भक्तोंके विघ्नोंका हरण करनेवाले और उनसे अतिरिक्त (अभक्तों)-के कार्योंमें विघ्न करनेवाले हैं; उन गणेशजीके प्रति तुमने अपने विद्याबलका आश्रय लेकर गर्व किया, सर्वज्ञताके अभिमानसे तुमने उनका पूजन नहीं किया। हे निष्पाप व्यासजी ! तुमने [पुराणप्रणयनके] आरम्भमें गणेशजीका स्मरण अथवा न्यास नहीं किया, इसीलिये तुम्हें भ्रान्ति हो रही है ॥ २१-२५ ॥ श्रौत, स्मार्त, लौकिक आदि सभी कार्योंके आरम्भमें, गृह आदिमें प्रवेश करते समय या यात्रादिके लिये निर्गमन करते समय स्मरण न करनेपर जो विघ्न करते हैं; वेद-शास्त्रके तत्त्वदर्शी विद्वान् जिन्हें परमानन्द कहते हैं, परम गति कहते हैं, परम ब्रह्म कहते हैं; हे वत्स! उन गजानन गणेशजीकी शरणमें आदरपूर्वक जाओ ॥ २६-२७॥ वे भगवान् प्रसन्न होकर तुम्हारी इच्छाको पूरा करेंगे, नहीं तो हजारों वर्षोंमें भी तुम अपनी इच्छाको पूरा नहीं कर पाओगे ॥ २८ ॥ व्यासजी बोले- हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! ये गणेश कौन हैं? इनका रूप कैसा है? उन्हें कैसे जाना जाता है? पूर्वकालमें ये किसपर प्रसन्न हुए थे? ॥ २९ ॥ इनके कितने अवतार हुए हैं और उन्होंने क्या-क्या कार्य किये हैं ? पूर्वकालमें किसने इनका पूजन किया था और किस कालमें इनका स्मरण किया गया था ? ॥ ३० ॥ हे करुणानिधि प्रपितामह ! मुझ विक्षिप्त चित्तवाले प्रश्नकर्ताको यह सब सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ३१ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'व्यासप्रश्नवर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥

ग्यारहवाँ अध्याय

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उ०ख०-अ०११ ] * ब्रह्माजीका व्यासजीको गणेशजीके मन्त्रके अनुष्ठानकी विधि बताना * ६३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ग्यारहवाँ अध्याय ब्रह्माजीका व्यासजीको गणेशजीके मन्त्रके अनुष्ठानकी विधि बताना भृगुजी बोले— [हे राजन्!] चतुर्मुख ब्रह्माजी इसके अनन्तर [व्यासजीद्वारा] किये गये प्रश्नका समाधान करनेकी इच्छासे बोले— [हे व्यासजी!] मैं गणेशजीके मन्त्रोंका अनेक प्रकारसे विचारकर तुमसे सब कुछ क्रमसे बता रहा हूँ॥ १॥ ब्रह्माजी बोले— हे मुने! शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाले महात्मा गणेशजीके अनन्त मन्त्र हैं, मैं उनकी उपासना-विधि तुमसे कहता हूँ॥ २॥ हे मुने! आगमशास्त्रमें गणेशजीके सात करोड़ महामन्त्र विद्यमान हैं, उनका रहस्य तो शिवजी ही जानते हैं और कुछ-कुछ मैं जानता हूँ॥ ३ ॥ उनमें-से षडक्षर¹ और एकाक्षर²—ये दोनों मन्त्र श्रेष्ठ हैं, जिनके स्मरणमात्रसे सभी सिद्धियाँ करगत हो जाती हैं॥४॥ हे मुने! जिन [गणेशजी]-की उपासनासे [मनुष्य] जीवन्मुक्त, धन्य, पूज्य और देवताओंसे भी नमस्कार करनेयोग्य हो जाते हैं। जिन [गणेशजी]-की उपासनासे सिद्धियाँ उन [उपासकों]-का दास्य करती हैं, जो [मनुष्य] गणेशजीकी श्रद्धाभावसे समन्वित हो भक्ति करते हैं, वे लोग सर्वज्ञ, अनेक प्रकारके रूप धारण कर सकनेवाले और इच्छानुसार विहार करनेवाले हो जाते हैं। जिन लोगोंमें लेशमात्र भी [गणेशजीकी] भक्ति नहीं है, उनका तो जन्म ही निरर्थक है॥ ५-७॥ जो लोग गणेशजीकी भक्तिसे विमुख हैं, उनका तो मुख भी नहीं देखना चाहिये। उनके दर्शनमात्रसे पग- पगपर विघ्न उपस्थित होते हैं॥ ८ ॥ उनके उपासकके दर्शनसे विघ्न शान्त हो जाते हैं, स्थावर-जंगम-सभी प्राणी उसे नमस्कार करते हैं॥ ९॥ जिनपर गजाननदेव सन्तुष्ट होते हैं, वे अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करते हैं और जिनपर वे गजवदन रुष्ट होते हैं, वे केवल दुःखोंके ही भागी होते हैं॥ १०॥ अतः मैं तुम्हें [गणेशजीका] शुभ एकाक्षर मन्त्र बताता हूँ, उसके अनुष्ठानमात्रसे अपना वांछित सम्यक् रूपसे प्राप्त करोगे ॥ ११ ॥ भगवान् शंकरने जिस प्रकार मुझसे कहा था, उस अनुष्ठानको मैं [वैसे ही] तुमसे कहता हूँ। [सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता] मनुष्य स्नान करके पवित्र होकर धुले हुए वस्त्र धारण करे ॥ १२ ॥ [तदनन्तर] बुद्धिमान् साधक अपने कुशके आसनपर मृगचर्म बिछाकर और उसपर वस्त्र बिछाकर, उसके ऊपर स्थित हो भूतशुद्धि और प्राणप्रतिष्ठा करे ॥ १३॥ उसके बाद सावधानीपूर्वक अन्तर्मातृकान्यास और बहिर्मातृकान्यास करके हृदयमें मूलमन्त्रका जप करते हुए प्राणायाम करे, तदुपरान्त आगममें कहे गये मन्त्रोंसे यथाविधि सन्ध्या-उपासना करे और स्थिर मनसे आपाद- मस्तक देवता [गणेशजी]-का ध्यान करके समाहित चित्तसे मानसिक उपचारोंसे उनका पूजन करे। तदनन्तर पुरश्चरण पद्धतिसे यथाशक्ति उनके मन्त्रका जप करे॥ १४-१६॥ जबतक गजानन गणेशजी वर देनेके लिये अनुकूल नहीं हो जाते और अपने स्वरूपका दर्शन नहीं कराते, तबतक जप-परायण ही रहे ॥ १७ ॥ भृगुजी बोले— मुनि व्याससे ऐसा कहकर ब्रह्माजीने शुभ दिन देखकर भ्रमितचित्त मुनिश्रेष्ठ (व्यास)-को गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया॥ १८१/२॥ ब्रह्माजी बोले— जब तुम करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान उन भगवान् गणेशजीको वर देनेके लिये आया हुआ देखो तो अपने चित्तको स्थिर करके कहना—हे गजानन (गणेशजी) ! आप मेरे हृदयमें स्थिर होकर नित्य निवास करें ॥ १९-२० ॥ तब वे तुमसे 'वर माँगो'—ऐसा कहेंगे और तुमको वरदान देंगे, इसमें सन्देह नहीं है। उन देव गणेशके हृदयमें स्थित हो जानेपर तुम दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति १. वक्रतुण्डाय हुं। २. गं।

६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करोगे ॥ २१ ॥ | इन जैसोंको इस मन्त्रराजका उपदेश नहीं करना; परंतु हे वत्स ! तब तुम भूत, भविष्य और वर्तमानका | शरणागत, दृढ़ भक्तिवाले, श्रद्धावान्, विनयशील, वेदवादी, अशेष (सम्पूर्ण) ज्ञान प्राप्त कर लोगे और इस दृढ़ | [मन्त्रप्राप्तिकी] आकांक्षावाले, दयालु और शास्त्रज्ञके भ्रान्तिको दूरकर अनेक ग्रन्थोंकी रचना करोगे ॥ २२ ॥ | समक्ष इसे प्रकट करना। मन्त्रराजका वक्ता यदि इसे व्यासजी बोले—हे पिता ! आपके द्वारा किये गये | अनधिकारीके सम्मुख प्रकाशित करता है तो वह [अपने उपदेशसे मेरी भ्रान्ति चली गयी। हे पितामह ! [अब] | साथ-साथ] अपनी दस पहलेकी और दस बादकी मैं आपकी आज्ञाके अनुसार अनुष्ठान करूँगा ॥ २३ ॥ | पीढ़ियोंको भी नरककी प्राप्ति कराता हैं ॥ २५-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे विभो ! अब तुम गजानन | जो इसका भक्तिपूर्वक जप करता है, वह इच्छित गणेशजीका स्मरण करके व्यग्रताके कारणोंसे रहित, | फलकी प्राप्ति करता है और पुत्र-पौत्र तथा धन-धान्यसे एकान्त निर्जन देशमें अनुष्ठान करो ॥ २४ ॥ | सम्पन्न हो जाता है। वह एकदन्त (गणेशजी)-के प्रभावसे नास्तिक (अनीश्वरवादी), [ईश्वर और वेदकी] | निर्मल ज्ञानकी प्राप्ति करके इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंको निन्दा करनेवाले, निर्दयी, अनाचारी, दुष्ट और मूर्ख— | भोगकर अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति करता है ॥ २८-२९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रकथन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥ ❧ बारहवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भगवान् गणेशके दर्शन सूतजी बोले—[हे शौनकजी !] ब्रह्माजीके मुखसे | इस उपासनामार्गका मैं तुम्हें भलीभाँति बोध कराता निकले हुए इन वचनोंको सुनकर महान् हर्षसे युक्त मुनि | हूँ; क्योंकि स्नेहपात्र और अत्यन्त प्रज्ञावान् शिष्यसे कुछ व्यासजीने उनसे पुनः पूछा ॥ १ ॥ | भी गोप्य नहीं रखना चाहिये ॥ ६ ॥ व्यासजीने कहा—[हे ब्रह्मन् !] आपकी अमृतमयी | मैंने तुमसे कहा था कि ये गणनायक गणेशजी वाणीका पान करके मैंने बोध प्राप्त कर लिया है अर्थात् | ओंकारस्वरूप हैं, इसीलिये इन विनायककी सम्पूर्ण मेरा भ्रम दूर हो गया है। हे पिता! अब मैं इस | कार्योंमें [प्रथम] पूजा होती है ॥ ७ ॥ मन्त्रराजको सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥ | निर्विघ्नताकी कामना करनेवालोंको इनका पूजन इस मन्त्रका किसने जप किया था और उसे | अवश्य करना चाहिये, अन्यथा वे कार्यमें विघ्न कर देते गजानन गणेशजीसे कैसे सिद्धि प्राप्त हुई थी? मेरे इस | हैं। समस्त आगम-ग्रन्थोंमें इनके ओंकारबीजसे युक्त संशयका उन्मूलन कीजिये, आपके अतिरिक्त मेरा कोई | और ओंकार-पल्लवसे समन्वित मन्त्र कहे गये हैं। इनसे गुरु नहीं है ॥ ३ ॥ | (ओंकारबीजसे) अतिरिक्त जो मन्त्र हैं, वे निष्फल होते भृगुजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! मुनिके द्वारा इस | हैं। इस प्रकार सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्तके रूपमें सब प्रकार पूछे जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने कृपापूर्वक | कुछ गणनायक गणेशजी ही हैं ॥ ८-९ ॥ उन विनीत व्यासजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥ | इस प्रकार सभी देवता, सिद्ध, मुनि, राक्षस, किन्नर, ब्रह्माजी बोले—हे ब्रह्मन्! तुम्हें साधुवाद है, | गन्धर्व, चारण, नाग, यक्ष, गुह्यक (यक्ष-जैसी अर्धदेवोंकी साधुवाद है, जो कि तुमने इस समय यह प्रश्न पूछा है। | श्रेणी) और मनुष्य तथा सम्पूर्ण जड़-चेतन प्राणी तुम पुण्यवान् हो; क्योंकि पुण्यहीन मनुष्योंमें कथा- | गणेशजीके उपासक हैं; अतएव गणेशजीसे श्रेष्ठ कोई श्रवणके प्रति प्रेम ही नहीं होता ॥ ५ ॥ | नहीं है ॥ १० १/२ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं एक प्राचीन कथा कहूँगा,

उ०ख०-अ०१२] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भगवान् गणेशके दर्शन * ६५ हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं एक प्राचीन कथा कहूँगा, जिसमें बताया गया है कि कैसे इस मन्त्रराजके जपसे गजानन गणेशजी प्रसन्न हुए॥ १९१/२ ॥ किसी समय दैवयोगसे प्रलयकाल उपस्थित हो गया। उस समय वायुवेगसे पर्वत छिन्न-भिन्न होकर चारों दिशाओंमें गिर पड़े। बारहों सूर्य महान् जलराशिका शोषण करके तपने लगे। ज्वालामालाओंसे युक्त महान् अग्नि सम्पूर्ण सृष्टिको जलाने लगी। [तत्पश्चात्] महामेघ संवर्तक चारों ओर वर्षा करने लगे। उनकी वह वर्षा हाथीकी सूँडसे गिरती हुई जलधाराके समान थी। समुद्र और नदियाँ भी अपनी सीमाका उल्लंघन कर रहे थे। इस प्रकार ब्रह्मासे लेकर स्थावर आदि सभी [पदार्थ] विनष्ट हो गये ॥ १२-१५१/२ ॥ इस प्रकार प्रकृतिकी विकाररूपा मायामय सृष्टिके नष्ट हो जानेपर भगवान् गजानन गणेशजी अणुसे भी अणुतर (सूक्ष्म) रूप धारण करके कहीं स्थित हो गये। तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर [सब ओर] व्याप्त गहन अन्धकारमेंसे उस नादयुक्त एकाक्षर ब्रह्म (गं)- का आविर्भाव हुआ। अपने आनन्दमय स्वरूपमें स्थित वही वैकारिक ब्रह्म अर्थात् नादविशिष्ट अक्षरब्रह्म पुनः मायाशक्तिको स्वीकार करके गजानन स्वरूपमें प्रकट हो गया। तदनन्तर उन (गजानन)-से ही सत्त्व, रज और तमोगुण उत्पन्न हुए ॥ १६-१९॥ तत्पश्चात् उनसे ही विष्णु, ब्रह्मा और शिव—ये तीनों भी उत्पन्न हुए और उन (गणेश)-की मायासे ही स्थावर-जंगमात्मक त्रैलोक्यकी रचना हुई ॥ २० ॥ तदुपरान्त उनकी मायासे भ्रान्त वे तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) अपने उस जन्म देनेवाले (जनक)-को देखने और उससे यह पूछनेके लिये कि हमें 'कौन-सा कार्य करना चाहिये', उत्सुकतापूर्वक भटकने लगे। हे मुने! इस जिज्ञासासे उन्होंने पहले ऊपरकी ओर जाकर इक्कीस स्वर्ग (आदि)-लोकोंको देखा और तत्पश्चात् अन्तरिक्षमें तिरछे जाकर फिर पातालमें गये। तब भी परमात्मा (गणेशजी)-का दर्शन न होनेपर उन्होंने अत्यन्त घोर तपस्या की ॥ २१-२३ ॥ वे निराहार रहते हुए दिव्य सहस्र वर्षोंतक जप- परायण रहे। [उस श्रमसे] थककर और उदास होकर वे पुनः पृथ्वीपर आ गये ॥ २४ ॥ पृथ्वीपर [उन परमात्माकी] खोज करते हुए वे [परमात्माके] दर्शनार्थ वनों, उपवनों, सरिताओं, सागरों, पर्वतों, शिखरों और गृहोंमें गये ॥ २५ ॥ तदनन्तर उन्होंने अपने समक्ष एक महान् जलाशयको देखा, जो अनेक प्रकारके जलचर प्राणियों, वृक्षों और अनेक प्रकारके पक्षियोंसे समन्वित था ॥ २६ ॥ [वह सरोवर] कमलोंसे आच्छादित तथा कमलनाल खाते हुए बगुलों, चक्रवाकों, हंसों और बत्तखोंके कलरवसे निनादित था ॥ २७ ॥ हे मुने! अनेक प्रकारकी तरंगोंसे युक्त, मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुस्तर, मछलियों और मगरमच्छोंसे भरे हुए उस महान् जलाशयमें स्नान करके और उसके किनारे विश्राम करके जब वे सरोवरको पारकर आगे बढ़े तो उन्होंने प्रलयकालीन अग्निके सदृश, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, अत्यन्त कठिनाईसे देखे जा सकनेवाले तेजःपुंजको अपने समक्ष देखा। उस तेजके प्रभावसे उन्हें दिखायी देना बन्द हो गया और वे अत्यधिक चिन्तामें पड़ गये ॥ २८-३० ॥ तब वे आकाशमार्गसे चलकर उस तेजःपुंजके मध्यसे बाहर निकल गये। उस समय वे भूख-प्यास और परिश्रमसे थके होनेके कारण बार-बार [गहरी] साँस ले रहे थे। [उस समय] वे अपनी ही निन्दा कर रहे थे और अपनेको ही कोस रहे थे तथा भयके कारण व्याकुल थे। तब अत्यन्त करुणामय, लोकाध्यक्ष, अखिलार्थविद् गणेशजीने उन्हें मन और नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले अपने रूपका दर्शन कराया। उनके पैरकी अँगुलियोंके नखोंकी शोभाने लाल कमलके केसरकी शोभाको जीत लिया था। उनके रक्तवर्णके वस्त्रोंकी प्रभाने सन्ध्याकालीन सूर्यमण्डलकी आभाको जीत लिया था। उनके कटिप्रदेशमें बँधी करधनीकी प्रभाने सुमेरुपर्वतके शिखरोंकी प्रभाको फीका कर दिया था ॥ ३१-३४ ॥ उनके चारों सुन्दर हाथोंमें खड्ग, खेट, धनुष और शक्ति सुशोभित हो रहे थे। उनकी नासिका अत्यन्त

६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सुन्दर थी और उनके मुखकमलकी कान्तिने पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिको जीत लिया था। कमलसदृश उनके सुन्दर नेत्र दिन-रात प्रभासे युक्त रहते थे। अनेक सूर्योंकी शोभाको जीत लेनेवाले मुकुटसे उनका मस्तक देदीप्यमान था॥ ३५-३६ ॥ प्रकार] उनके एक दन्तकी शोभा भगवान् वराहकी दंष्ट्राकी शोभाको जीत रही थी॥ ३७॥ हे मुने ! उनकी सुन्दर सूँड़ ऐरावतादि दिग्गजोंको भी भयभीत कर रही थी। उन देव गणेशको सहसा देखते ही उन [ब्रह्मादि] देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर उनके कमलवत् चरणोंका स्पर्श करके उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥ उनके उत्तरीयकी कान्ति अनेक नक्षत्रोंसे समन्वित गगनमण्डलकी शोभाको भी जीत ले रही थी। [इसी ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'गजाननदर्शन' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

तेरहवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भगवान् गणेशकी स्तुति करना तथा गणेशजीका अपने उदरमें स्थित असंख्य ब्रह्माण्डोंका उन्हें दर्शन कराना

व्यासजीने कहा- [हे ब्रह्मन्!] पाँच मुखोंवाले शिव, चार मुखोंवाले ब्रह्मा और सहस्र मस्तकोंवाले विष्णु*ने उन वरदायक देव गजानन गणेशजीका स्तवन कैसे किया था?॥ १॥ ब्रह्माजी बोले- कृपा करनेके लिये उन्मुख विघ्नराज गणेशजीकी कृपादृष्टि पड़नेसे बुद्धिकी निर्मलताको प्राप्तकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवने उनकी स्तुति की ॥ २ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर बोले- जो अजन्मा, विकल्परहित, निराकार, अद्वितीय, निरालम्ब, अद्वैत, आनन्दसे पूर्ण, सर्वोत्कृष्ट, निर्गुण, निर्विशेष, निरीह एवं परब्रह्मस्वरूप हैं; उन गणेशका हम भजन करें ॥ ३ ॥ जो तीनों गुणोंसे परे हैं, आदि (सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाले) हैं, जो चिदानन्दस्वरूप, चिदाभासक, सर्वव्यापी, ज्ञानगम्य, मुनियोंके ध्येय, आकाशस्वरूप एवं परमेश्वर हैं; उन परब्रह्मरूप गणेशका हम भजन करें ॥ ४ ॥ जो जगत्के कारण हैं, जिनका स्वरूप कारणज्ञानसे परे है, जो देवताओं, सुखों और युगोंके आदिकारण हैं, जो गणोंके स्वामी, विश्वव्यापी, जगद्वन्द्य तथा देवेश्वर हैं; उन परब्रह्मस्वरूप गणेशका हम भजन करें ॥ ५ ॥ जो रजोगुणके योगसे ब्रह्माका रूप धारण करते हैं, वेदोंके ज्ञाता हैं और सदा सृष्टिकार्यमें संलग्न रहते हैं, जिनका पारमार्थिक रूप मनसे अचिन्त्य है, जो जगत्की उत्पत्तिके हेतुभूत तथा समस्त विद्याओंके निधान हैं, उन 'ब्रह्मरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ६ ॥ जो सदा सत्त्वगुणसे युक्त हैं, आनन्दसे क्रीडा करते रहते हैं, देवशत्रुओंका नाश करते हैं और जगत्के रक्षण- कार्यमें संलग्न रहते हैं, जो अनेक अवतार लेते रहते हैं तथा अपने भक्तोंके अज्ञानका हरण करनेवाले हैं; उन 'विष्णुरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ७ ॥ जो तमोगुणके सम्पर्कसे रुद्ररूप धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो जगत्के हर्ता, तारक और ज्ञानके हेतु हैं तथा अनेक आगमोक्त वचनोंद्वारा अपने भक्तजनोंको सदा तत्त्वज्ञानोपदेश देते रहते हैं, उन 'शिवरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ८ ॥ जो अन्धकारराशिके नाशक, भक्तजनोंके अज्ञानके निवारक, तीनों वेदोंके सारस्वरूप, साक्षात् परब्रह्म, मुनियोंको ज्ञान देनेवाले, विकारोंसे सदा दूर रहनेवाले हैं; उन 'सूर्यरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ९ ॥ जो अपने किरण-समूहसे औषधियोंको तृप्त एवं पुष्ट करते हैं, अमृतवर्षिणी कलाओंद्वारा देवसमुदायको तृप्त किया करते हैं, सूर्य-किरणोंसे उत्पन्न संतापको हर लेते हैं और द्विजों (ब्राह्मणों एवं नक्षत्रों)-के राजा हैं;

  • सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। (यजु० ३१।१)

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

उ०ख०-अ०१३ ] * ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भगवान् गणेशकी स्तुति करना * ६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] उन 'चन्द्रस्वरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ १० ॥ जो प्रकाशस्वरूप, आकाश एवं वायुरूप, विकारों आदिके हेतुभूत, कला और कालरूप हैं, अनेक क्रियाओंकी अनेकानेक शक्तियाँ जिनकी स्वरूपभूता हैं; उन 'शक्तिरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ११ ॥ प्रधान, महत्तत्त्व, पृथ्वी, जल और दिशा-दिक्पाल आदि जिनके स्वरूप हैं; जो सत्-असत्रूप एवं जगत्के कारणरूप हैं; उन 'विश्वरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ १२ ॥ [हे गणनाथ!] जो आपके युगल चरणोंमें मन लगायेगा, वह विघ्नसमुहजनित पीड़ा नहीं प्राप्त कर सकता। शोभाशाली, विशाल सूर्यमण्डलके प्रकाशमें खड़ा हुआ मानव भला अन्धकारजनित क्लेश कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥ १३ ॥ हे विश्वम्भर ! हम अज्ञानके वशवर्ती होकर बहुत वर्षोंतक आपके चरणकमलोंको न प्राप्त कर सकनेके कारण सर्वथा भटकते रहे हैं। अब आपकी ही कृपासे आपके चरणोंकी शरणमें आ गये हैं। अतः हे आदिदेव! आप सदा हमारी रक्षा करें* ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे महामुने ! [त्रिदेवोंके द्वारा] इस प्रकार स्तुति किये जानेपर गणेशजी सन्तुष्ट हो गये और परम कृपायुक्त होकर उन्होंने उन (देवताओं)- से कहना प्रारम्भ किया— ॥ १५ ॥

[दायाँ स्तम्भ] भगवान् श्रीगणेशजीने कहा— [हे देवताओ!] जिसके लिये आप लोगोंने इतना क्लेश सहा है और जिसके लिये आप लोग यहाँ आये हैं, आप लोग उस वरको मुझसे माँगें; आप लोगोंकी इस स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ ॥ १६ ॥ आप सब उदार आत्मावालोंके द्वारा जो मेरी इस स्तोत्रद्वारा यह स्तुति की गयी, मेरी आज्ञासे यह स्तोत्र 'स्तोत्रराज' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ १७ ॥ जो बुद्धिमान् मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर भक्तियुक्त हो विशुद्ध भावसे सदा तीनों सन्ध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है; वह उत्तम पुत्र, लक्ष्मी तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है और अन्तकालमें परब्रह्मरूप हो जाता है ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले— उन गणेशजीके ऐसे वचनोंको सुनकर उन्हींकी इच्छासे रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणसे उत्पन्न वे [तीनों देवता— ब्रह्मा, विष्णु और शिव] प्रसन्नतापूर्वक उनसे बोले— ॥ १९ ॥ तीनों [त्रिदेवों]-ने कहा— सृष्टि और संहार करनेवाले हे देवाधिदेव ! यदि आप प्रसन्न हैं तो आपके चरणकमलोंमें हमारी अनन्य भक्ति हो ॥ २० ॥ [इसके अतिरिक्त] हमें क्या करना चाहिये, इस विषयमें भी आप हमें आज्ञा करें। हे गजानन! हमें यही वर अभीष्ट है ॥ २१ ॥ उनके ऐसे वचन सुनकर भगवान् गजाननने पुनः


[पाद-टिप्पणी / मूल संस्कृत श्लोक]

  • अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं निरालम्बमद्वैतमानन्दपूर्णम् । परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ गुणातीतमाद्यं चिदानन्दरूपं चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम् । मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ जगत्कारणं कारणज्ञानहीनं सुरादिं सुखादिं युगादिं गणेशम् । जगद्व्यापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ रजोगुणतो ब्रह्मरूपं श्रुतिज्ञं सदा कार्यसक्तं हृदाचिन्त्यरूपम् । जगत्कारकं सर्वविद्यानिधानं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ सदा सत्त्वयोगं मुदा क्रीडमानं सुरारीन् हरन्तं जगत्पालयन्तम् । अनेकावतारं निजाज्ञानहारं सदा विष्णुरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ तमोगयोगिनं रुद्ररूपं त्रिनेत्रं जगद्धारकं तारकं ज्ञानहेतुम् । अनेकागमैः स्वं जनं बोधयन्तं सदा शर्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ तमस्तोमहादं जनाज्ञानहारं त्रयीवेदसारं परब्रह्मसारम् । मुनिज्ञानकारं विदूरे विकारं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ निजैरोषधीस्तर्पयन्तं करौधैः सुरौघान् कलाभिः सुधास्राविणीभिः । दिनेशांशुसन्तापहारं द्विजेशं शशाङ्कस्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ प्रकाशस्वरूपं नभोवायुरूपं विकारादिहेतुं कलाकालभूतम् । अनेकक्रियानेकशक्तिस्वरूपं सदा शक्तिरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ प्रधानस्वरूपं महत्तत्त्वरूपं धरावारिरूपं दिगीशादिरूपम् । असत्सत्स्वरूपं जगद्धेतुभूतं सदा विश्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ त्वदीये मनः स्थापयेदङ्घ्रियुग्मे जनो विघ्नसंधान्न पीडां लभेत । लसत्सूर्यबिम्बे विशाले स्थितोऽयं जनो ध्वान्तबाधां कथं वा लभेत ॥ वयं भ्रामिताः सर्वथाज्ञानयोगादलब्ध्वा तवाङ्घ्रीं बहून् वर्षपूगान् । इदानीमवाप्तास्तवैव प्रसादात् प्रपन्नान् सदा पाहि विश्वम्भराद्य ॥ (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १३। ३-१४)

६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कहा, 'हे महाभाग्यवान् [देवताओ]! आप लोगोंकी मुझमें दृढ़ भक्ति होगी, जिससे आप लोग महान् संकटोंको भी पार कर लेंगे। आप लोगोंकी प्रसिद्धिके लिये मैं आप लोगोंको पृथक्-पृथक् कार्य बतलाता हूँ॥ २२-२३ ॥ [गणेशजीने कहा-] हे ब्रह्मन्! आप रजोगुणसे समुद्भूत हुए हैं, अतः आप सृष्टिकर्ता होवें। हे विष्णो! आप सत्त्वगुणके आश्रय और व्यापक हैं, अतः आप [सृष्टिका] पालन करें। हे हर! आप तमोगुणसे समुद्भूत हैं, अतः आप संहारकार्य करें॥ २४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर गणेशजीने मुझ ब्रह्माको आदरपूर्वक वेद, शास्त्र, पुराण, सृष्टि करनेकी सामर्थ्य तथा अन्य विद्याएँ प्रदान कीं। उन भगवान् गणेशने विष्णुको योगबलसे स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेकी सामर्थ्य प्रदान की॥ २५-२६ ॥ [इसी प्रकार] भगवान् गणेशने शिवको एकाक्षर मन्त्र, षडक्षर मन्त्र तथा सभी आगम* और संहार करनेकी शक्ति प्रदान की॥ २७॥ तब मैंने उन त्रैलोक्यके स्वामी, जगद्गुरु, वरदाता भगवान् गजानन (गणेशजी)-से दीन भावसे हाथ जोड़कर कहा- ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे प्रभो!] जिसने शब्दशक्तिको ग्रहण न किया हो अर्थात् जिसे शब्दशक्तिका ज्ञान न हो, वह कथनीय-अकथनीय-कुछ भी नहीं कह सकता; उसी प्रकार नानाविध (अनेक प्रकारकी) सृष्टिको कभी- कहीं देखा न हो, ऐसा मैं आप विभुकी आज्ञाका पालन करनेमें कैसे उत्साहित हो सकता हूँ अथवा आपकी आज्ञाका उल्लंघन भी कैसे कर सकता हूँ? [इस प्रकार हे प्रभो!] मेरे लिये एक ओर कूप और दूसरी ओर बावलीकी स्थिति कैसे हो गयी है? ॥ २९-३० ॥ तब भगवान् गजाननने उस प्रकारसे व्याकुल वेद- शास्त्रज्ञ ब्रह्माजीको दिव्य नेत्र प्रदान करके कहा- ॥ ३१ ॥ गजानन (गणेशजी)-ने कहा-हे कमलोद्भव ब्रह्माजी! मेरे शरीरके बाहर और अन्दर असंख्य ब्रह्माण्डोंको भ्रमण करते हुए तुम आज देखो ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर भगवान् गजाननके द्वारा अपनी श्वासवायुके द्वारा अपने उदरमें ले जाये गये मुझ विधाताने भी अनेक ब्रह्माण्डोंको वैसे ही देखा, जैसे गूलरके वृक्षमें लगे फलोंमें मशकसदृश कीट हों। तब मैंने अपने परम तेजसे उनमेंसे एकका भेदन किया और उसमें अन्तःस्थित सम्पूर्ण सृष्टिका [आश्चर्यपूर्वक] पुनः-पुनः अवलोकन किया। वहाँ मैंने दूसरे ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति, शिव, सूर्य, वायुदेव, वनों, सरिताओं, जलके स्वामी वरुण, समुद्रों, यक्षों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सर्पों, ऋषियों, गुह्यकों, साध्यों, मनुष्यों, पर्वतों, वृक्षों, उद्भिज्ज (अंकुरके रूपमें निकलनेवाले पौधे)-जरायुज (गर्भशयकी झिल्लीमें लिपटकर जन्म लेनेवाले)-स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले)-अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले) प्राणियों, पृथ्वी, सप्त पातालों, अन्य इक्कीस अव्यय लोकों, भावाभाव और स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्वको देखा ॥ ३३-३८ ॥ [इसी प्रकार] जिस-जिस ब्रह्माण्डका मैंने भेदन किया, उस-उसमें मैंने सब कुछ उसी प्रकार देखा। यह देखकर मैं पहलेकी ही भाँति भ्रमित हो गया; क्योंकि उन ब्रह्माण्डोंका अन्त मुझे कहीं नहीं मिल पाया ॥ ३९ ॥ हे ब्रह्मन्! [उस समय आश्चर्यचकित होनेके कारण] मैं न स्थिर रहनेमें सक्षम था, न ही कहीं जानेमें; तब मैंने पद्मासनमें स्थित होकर भगवान् गजाननका स्तवन किया ॥ ४० ॥ ब्रह्माजी बोले- जिनके श्रीविग्रहमें स्थित ब्रह्माण्डोंकी गणना करना सम्भव नहीं है, ऐसे देवाधिदेव भगवान् गणेशकी मैं वन्दना करता हूँ; भला, आकाशस्थित नक्षत्रों, सागरस्थित जलचरों और उसके किनारेके बालुका- कणोंकी गणना करनेवाला कौन हो सकता है! ॥ ४१ ॥ हे देवराजवन्दित [गणेशजी]! आपके चरणकमलोंका दर्शनकर जो मैं भ्रममें पड़ गया था, उसके लिये मुझे लज्जा नहीं है; क्योंकि आप-जैसे ज्ञाननिधिके प्रसन्न हो जानेपर मोक्ष भी तुच्छ प्रतीत होता है, फिर अन्यकी तो

  • आगतं शिववक्त्रेभ्यो गतं च गिरजाश्रुतौ। मतं श्रीवासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते ॥