हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
अ० १] भाषाटीकासमेता । ( १६१ ) और बनते हुए काथको लांघे नहीं और बीचमें चलावे किंतु यथायोग्य पकावे ॥ ५२ ॥ स्थापित किये काथको फिर शोषित करे नहीं और अशुद्ध जगहमें काथको बनावे नहीं और अंधेरेमें भी काथ न बनावे क्योंकि ऐसा काथ अच्छा नहीं होता किंतु रोगोंके मिलापका कारण होता है ॥ ५३ ॥ काथको फिर शोषित नहीं करे और पृथिवीमें प्राप्तहुए काथको फिरं नहीं ग्रहण करे क्योंकि रोगके नाशमें दोषको शांत करनेमें काथ श्रेष्ठ है इस लिये ओषधिके काममें काथ अच्छा है ॥ ५४ ॥ अथ क्वाथसंबन्धी अनिष्ट लक्षण। विदीर्य्यत पततेऽपि स्फुटते क्वाथतो जनः ॥ एतेऽनिष्टकराः क्वाथा न दोषशमनाय च ॥ ५५ ॥ बुरे काथसे रोगी विदीर्ण हो जाता है, गिरजाता है और फटजाता है । ये बुरे काथ दुःखको देते हैं और दोषको शांत नहीं करते ॥ ५५ ॥ अथ हीनक्वाथके लक्षण। एतैर्हिलक्षणैर्हीनंक्वाथं दृष्ट्वा परीक्षयेत् ॥ ५६ ॥ कृष्णं नीलं घनं रक्तं पिच्छिलं शिथिलञ्च यत् ॥ दग्धं कुणपगन्धञ्च विस्रग- न्धं विवर्जयेत् ॥५७॥ एतैर साध्यं जानीयाद्रोगिणं नात्र संशयः ॥ इन पूर्वोक्तलक्षणोंसे हीनहुए काथकी परीक्षा करनी ॥ ५६ ॥ काला, नीला, कठिन, लाल झागोंवाला, शिथिल, दग्ध हुआ, मुर्दाकेसी गन्धवाला, कच्ची गन्धवाला, ऐसे काथको वर्ज देवे ॥ ५७ ॥ इस तरहके काथसे रोगी असाध्य होजाता है इसमें संशय नहीं ॥ अथ उत्तम क्वाथका लक्षण । द्रव्यगुणानुवर्णेन द्रव्यगन्धं विनिर्दिशेत् ॥ ५८ ॥ तद्वद्विशुद्धं सच्छायं कषायममृतोपमम् ॥ द्रव्यके गुणके अनुबन्धसे द्रव्यके गन्धको कहे ॥ ५८ ॥ विशेषकरके शुद्ध और सुन्दर कांतिवाला काथ अमृतके समान होता है ॥ अथ वातज्वरमें पाचनका विधि । वातज्वरे लङ्घनान्ते दत्त्वा चान्नं तथोपरि ॥ निशासु पाचनं देयं ज्ञात्वा दोषबलाबलम् ॥ ५९ ॥ वातज्वरमें लंघनके अन्तमें अन्नको देकर रातको पाचन काथ देवे परन्तु दोषके बल और अबलको देखे ॥ ५९ ॥ अथ पित्तज्वर और कफज्वरमें पाचनका विधि। त्रिरात्रे पैत्तिके देयं श्लैष्मिके प्रथमेऽहनि ॥ पित्तके ज्वरमें तीसरे दिन और कफज्वरमें प्रथम दिन पाचन देना ॥
( १७० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ पाचनका निषेध । अविज्ञाते च दोषे च पाचनं न प्रदापयेत् ॥ ६० ॥ और बिना जाने दोषमें पाचन नहीं देना ॥ ६०॥ अथ ज्वरकी मर्यादा । सप्तरात्राद्धि मर्यादा ज्वरेणैवोपलक्ष्यत ॥ तस्मान्नवज्वरे पीतं दोषकृन्न च दोषहृत् ॥ ६१ ॥ ज्वरकी मर्यादा सातदिनकी प्रसिद्ध है इस वास्ते नवीन ज्वरमें पानकिया पाचनरूपी औषधः दोषको करता है किंतु दोषको हरता नहीं है ॥ ६१ ॥ अथ ज्वरमें पाचनादि देनेकी मर्यादा । तस्मादादौ प्रदेयन्तु पाचनञ्च दिनत्रयम् ॥ शमनीयं प्रदेयन्तु पञ्चरात्रं ततः परम् ॥ ६२ ॥ शोधनं दीपनीयन्तु एकरात्रं प्रदा- पयेत् ॥ ६३ ॥ इसलिये आदिमें तीनदिन पाचनको देवे उसके पीछे पांचरात शमनक्वाथको देवे ॥ ६२ ॥ शोधन और दीपनक्वाथको एकदिन देवे ॥ ६३ ॥ अथ क्वाथके विपत्तिका प्रकार । क्वाथपाने क्रमो मूर्च्छा वैक्लव्यञ्च प्रदृश्यते ॥ वमनञ्च तदा प्रोक्तं शमनं पथ्यकेऽपि वा ॥ ६४ ॥ जब क्वाथके पीनेमें ग्लानि, मूर्च्छा, विकलपना ये उपजें तब वमनसंज्ञक औषध देना और पथ्यमें शमनक्वाथ देना ॥ ६४ ॥ अथ पथ्यकी आवश्यकता । सदा पथ्यं प्रयोक्तव्यं नापथ्येन स सिध्यति ॥ औषधेन विना पथ्यैः सिद्धयते भिषगुत्तमैः ॥ ६५ ॥ विना पथ्यं न साध्यः स्यादौषधानां शतैरपि ॥ सब कालमें पथ्य देना चाहिये क्योंकि, अपथ्यसे कोई भी रोग सिद्ध नहीं होता किंतु ओष- धिके बिना भी पथ्योंकरके रोग शांत हो जाता है ॥ ६५ ॥ सैकड़ों औषधियोंको सेवतेहुए भी पथ्यके बिना रोग शांत नहीं होता ॥ अथ ज्वरितको पथ्यभोजनका उपदेश । ज्वरितो हितमश्नीयाद्यद्यप्यस्यारुचिर्भवेत् ॥६६॥ अन्नकाले- ष्वभुञ्जानो हीयत म्रियतेऽपि वा ॥ स क्षीणः कृच्छ्रतां याति
अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १७१ ) यात्यसाध्यत्वमेव च ॥ ६७॥ तस्माद्रक्षेद्बलं पुंसां बलशान्तिर्हि जीवितम् ॥ और ज्वरवाला रोगी पथ्यको सेवे चाहे रोगीको अरुचि भी हो तब भी ॥६६॥ अन्नकालमें नहीं भोजन करता हुआ ज्वररोगी क्षीण हो जाता है अथवा मर जाता है और क्षीण हुआ वह कष्टपनेको प्राप्त होके पीछे असाध्यपनेको प्राप्त होता है ॥६७॥ इसकारणसे मनुष्योंके बलकी रक्षा करनी । क्योंकि, बलकी शांति ही जीवन कहा है ॥ लंघिते चैव दोषे च यवागूपानमाचरेत् ॥ ६८ ॥ शालिषाष्टिकमुद्गं च यूषं शस्तं वदन्ति हि ॥ ६९ ॥ लंघनके करनेमें और दोषमें यवागूको पीता रहे ॥६८॥ सांठी चावल और मूंगका यूष ही लंघनमें श्रेष्ठ कहते हैं ॥ ६९ ॥ अथ मध्यलंघितको अन्नविधि । पञ्चकोलकसंसिद्धा यवागूर्मध्यलंघिते ॥ भवेत्प्रशस्ता सततं तस्य सन्तर्पणं हितम् ॥ ७० ॥ पीपल, पीपलामूल, चीता, चव्य और सोंठ इन पांचों मूलको कूटकर काथ बनावे इस काथमें तंदुलकी या मूंगकी यवागू बनावे और पकावे, फिर सिद्ध हुई यह यवागू मध्यलंघितको प्रशस्त है और रोगीको तृप्त रखती है ॥ ७० ॥ अथ क्लमशांतिकी विधि । आजं दुग्धं गुडोपेतं पानाय ज्वरशान्तये ॥ तेन क्लमविनाशः स्यात्सुखमाशु प्रपद्यते ॥ ७१ ॥ बकरीके दूधमें गुड मिला पीवे इसे ज्वरकी शांति होती है तब ग्लानिका नाश और तत्का- ल सुख उपजता है ॥ ७१ ॥ अथ काथपीनेकी विधि । उदीच्यां वा पूर्वस्यां वाऽभिमुखंचोपवेशयेत्॥ पाययेत्काथपानं च कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ७२ ॥ पानपात्रमधः कृत्वा शयीत ज्ञानमेव च ॥ पीत्वा चैव तृषार्त्तोऽपि न जलं पाययेत्क्षणम् ॥ ७३ ॥ गतक्लमं नरं दृष्ट्वा तदा संपद्यते सुखम् ॥७४॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने भेषजपरिज्ञानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १७२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- उत्तरको अथवा पूर्वको या अपनी और मुख कराकर रोगीको बैठावे पीछे ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवा- चन कराके काथका पान करावे ॥ ७२ ॥ पीछे पीनेके पात्रको अधोमुख स्थापित कर जागता हुआ शयन करे और काथका पान करक तृषावाला भी दो घडीतक पानीको नहीं पीवे ॥ ७३ ॥ जब रोगीकी ग्लानि दूर होजावे तब रोगी सुखको प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने औषधपरिज्ञानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः २. अथ ज्वरचिकित्सा । आत्रेय उवाच॥अनभिज्ञश्चिकित्सायां शास्त्राणां पठनेन किम् ॥ यथा पलाल बीजास्तु रहितं निष्प्रयोजकम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-जो वैद्य चिकित्साकर्ममें कुशल नहीं हो और वैद्यशास्त्रके पठनमें कुशल हो तिसको क्या फल होता है अर्थात् कुछ नहीं अन्नसे रहित निष्प्रयोजन तुषसे क्या तत्त्व निकलता है ? ॥ १ ॥ अथ कुवैद्यनिंदा । वरमाशीविषविषं क्वथितं ताम्रमेव च॥ पीतमत्यग्निसन्तप्ता भ- क्षिता वाप्ययोगुडाः ॥२॥ न तु श्रुतवतां वेशं बिभ्रतां शरणाग- तात् ॥ ग्रहीतुमन्नपानं वा वित्तं वा रोगपीडितात्॥ ३ ॥ सर्पादिकका विष, उबाला हुआ तांबा, अत्यंत अग्निमें तप्त किये लोहाके गोले इन सबोंको सेवना भी हित है ॥ २ ॥ परंतु वैद्योंके वेशको धारण करनेवाले और रोगियोंसे अन्न, पान, धन इनको हरनेवाले ऐसे वैद्योंकी औषधको नहीं खावे ॥ ३ ॥ अथ वैद्यका लक्षण । तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय जायते ॥ स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्योयो विमोक्षयेत् ॥ ४ ॥ जो आरोग्यको करता है वही योग्य औषध है और जो रोगोंसे छुडावे वह ही उत्तम वैद्य कहाता है ॥ ४ ॥ अथ वैद्यकशास्त्रपठनकी आवश्यकता । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रोगवारणहेतुना॥युक्ता निदानलक्षैस्तु संहि-
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७३ ) तोपायसंयुता ॥ ५ ॥ पठितव्या समासेन संहिताज्ञानहेतवे ॥ ज्ञात्वा रोगप्रतीकारं ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ६ ॥ इसलिये रोगके निवारण करनेवाले कारणसे संयुक्त सब उपाय करके निदानके लक्षण और रोगोंसे तथा रोगप्रतीकारकी चिकित्सासे अन्वित हुई वैद्यकसंहिता ॥ ५ ॥ विस्तार करके पठितकरनी योग्य है, संहिताके ज्ञानके लिये और रोगको दूर करनेके उपायको जानकर पीछे चिकित्साको करे ॥ ६ ॥ रोग नहीं जाननेसे हानि । अविज्ञाय रुजं सम्यङ्मोहादारभते क्रियाः ॥ विधानज्ञोऽथ शास्त्रज्ञो न तत्सिद्धिः प्रजायते ॥ ७ ॥ जो वैद्य रोगको नहीं जानके क्रियाका आरंभ करता है वह विधानको और शास्त्रको जानने- वाला भी सिद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥ ७ ॥ अथ वैद्यशास्त्रज्ञाताको फल । निदानं रोगविज्ञानं भेषजानां गुणागुणम् ॥ विज्ञाय कुरुते यस्तु तस्य सिद्धिर्न दूरतः ॥ ८ ॥ निदान और रोगको जानना, औषधियोंके गुण और दोष इनको जानके जो वैद्य क्रियाको दूर नहीं करता है उसको शीघ्र सिद्धि होती है ॥ ८ ॥ रोगादिक जाननेकी आवश्यकता । आदावेव रुजां ज्ञानं साध्यासाध्यं विचक्षणः ॥ याप्यं सर्वरुजाञ्चैव ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ९ ॥ आदिमें वैद्य रोगके ज्ञानको और साध्य और असाध्यरूपको तथा कष्टसाध्यपनेको जाने पीछे क्रियाको करे ॥ ९ ॥ अथ देशकालआदिक जाननेकी आवश्यकता । देशं कालं वयो वह्निसात्म्यं प्रकृतिभेषजम् ॥ एवं विज्ञाय सद्वैद्यस्ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ १० ॥ देश, काल, अवस्था, अग्नि, स्वभाव, प्रकृति इनको जानके कुशल वैद्य चिकित्साको करे ॥ १० ॥ अथ रोगहेतुवातादिदोष । नास्ति रोगो विना दोषैर्दोषा वातादयः स्मृताः॥ ज्वराद्यः स्मृता रोगास्तान्सम्यक्परिलक्षयेत् ॥ ११ ॥
( १७४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- दोषोंके बिना रोग नहीं होता और वे दोष वातआदि कहाते हैं और ज्वरआदि रोग हैं उन सबोंकी अच्छीतरह परीक्षा करे ॥ ११ ॥ अथ रोगपरीक्षाके प्रकार । आप्तानाञ्चोपदेशेन प्रत्यक्षीकरणेन च॥आतुराद्दिदृशः स्पर्शा- च्छीतादिप्रश्नतः परम्॥१२॥दर्शनस्पर्शनप्रश्नै रोगज्ञानं त्रिधा मतम्॥मुखाक्षिदर्शनात्स्पर्शाच्छीतादिप्रश्नतः परम् ॥ १३ ॥ वैद्योंके उपदेशसे और प्रत्यक्षीकरणसे और वैद्य आदिकी दृष्टिसे और स्पर्शसे और शीतआदिके पूछनेसे रोगका ज्ञान करे ॥ १२ ॥ दर्शन, स्पर्श और प्रश्न इन भेदोंसे रोगोंका तीन प्रकारका ज्ञान होता है, तहां मुख और नेत्र इन्होंके दर्शनसे, अंगके शीत उष्ण आदिक स्पर्शसे और कैसा है क्या क्या होता है इत्यादिक प्रश्नसे तीन प्रकारका रोग ज्ञान होता है ॥ १३ ॥ अथ साध्यासाध्यका लक्षण । कृच्छ्रयाप्यसुखोपायो द्विविधः साध्य उच्यते ॥ असाध्यो द्विविधो ज्ञेयः कृच्छ्रः कृच्छ्रतमोऽपरः ॥१४॥ कष्टसाध्य और सुखसाध्य इन भेदोंसे साध्य दो प्रकारका है और कष्टसाध्य और अतिकष्ट- साध्य इन भेदोंसे असाध्यभी दो प्रकारका है ॥ १४ ॥ अथ साध्यादिकहोनेका कारण । याप्याःकेचित्प्रकृत्यैव याप्याःसाध्या उपेक्षया॥स्वभावाद्रुचा- धयः साध्याः केचित्साध्या उपेक्षिताः॥१५॥ साध्या याप्य- त्वमायान्ति याप्याश्चासाध्यतां तथा॥घ्नन्ति प्राणांश्च साध्या- स्तुनराणामक्रियावताम् ॥ १६ ॥ कोई रोग स्वभावसे ही कष्टसाध्य होते हैं और कोई साध्यरोग चिकित्सासे अभावसे कष्टसाध्य होते हैं और कितनेक रोग स्वभावसे साध्य होते हैं और कितनेक नहीं चिकित्सित किये रोग साध्य होते हैं ॥ १५ ॥ साध्यरोग कष्टसाध्यपनेको प्राप्त होते हैं और कष्टसाध्यरोग असाध्यपनेको प्राप्त होते हैं, इससे क्रियाको नहीं करनेवाले मनुष्योंको साध्यरोगभी मार देते हैं ॥ १६ ॥ उपद्रवका लक्षण । व्याधेरुपरि यो व्याधिःसोपद्रव उदाहृतः॥सोपद्रवा न जीवन्ति १ 'प्रत्यक्षीकरणेन च'इत्यत्र प्रत्यक्षादनुमानतःइति वा पाठान्तरम् ।२ आतुरे आदियैषां तेषां भिषजीं दृशा विचारणार्थात् पूर्ववैद्यैः किमाचरितमित्यपि विचारणीयम्। अथवा तुरस्य रोगिण आदिदृशः प्रथमदृष्टेः दर्शना- दितिभावात्तत्र पाठान्तरम् आतुरादिदृशः ।
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७५ ) जीवन्ति निरुपद्रवाः ॥१७॥ ज्ञात्वाल्पकोऽपि भिषजा परि- चिन्तनीयो नोपेक्षणीय इति रोगगणो ह्यसाध्यः ॥ स्वल्पोऽप्य- रिर्गरलवह्निसमानरूप आप्तोबलो न शमतामुपयाति काले १८ शत्रुः स्थानबलं प्राप्य विक्रमं कुरुते बली॥तथा धात्वन्तरं प्राप्य विक्रमं कुरुते गदः ॥ १९ ॥ रोगके ऊपर जो रोग उपजे वह उपद्रवसहित रोग कहाता है उपद्रवसहित रोगवाले नहीं जीवते हैं और उपद्रवसे रहित रोगवाले जीवते हैं ॥ १७ ॥ अल्परोग भी वैद्योंको चिंतवन करना चाहिये किंतु असाध्य रोग छोड़ना नहीं चाहिये छोटासा भी वैरी विष और अग्निके समान है बलको पाकर फिर वह तत्काल ठंडा नहीं होता ॥ १८ ॥ जैसे बली शत्रु स्थान और बलको प्राप्तहोकर पराक्रमको करता है तैसे ही धातुओंके अंतरमें प्राप्तहुआ रोग पराक्रमको करता है १९ रोग निर्मूल करनेकी आज्ञा । बहुविधपरिकार्येणापि नीतं शमं यत्कृशमपि हि न धार्य्यं रोग- मूलं विधिज्ञ॥कथमपि बहुपथ्यैर्व्यावृतो वा बलिष्ठो न शमय- ति हि रोगं बाल्यमात्रेण सम्यक् ॥ २० ॥ हे विधिज्ञ ! बहुतसे भांतिके कर्मोंसे शान्त किया अलग भी रोग नहीं रहने देना चाहिये । क्योंकि,बहुतसे अपथ्योंकरके व्यावृत्त हुआ अत्यंत बलवान् रोग शांतिको प्राप्त नहीं होता॥२०॥ सूक्ष्म भी रोग शत्रुसमान है । यथा स्वल्पं विषं तीव्रं यथा स्वल्पो भुजङ्गमः ॥ यथा स्वल्पतरश्चाग्निस्तथा सूक्ष्मोऽपि रुग्रिपुः ॥ २१ ॥ जैसे स्वल्प विष तीक्ष्ण होता है,जैसे छोटासा सर्प बुरा होता है,जैसे अत्यंत स्वल्प भी अग्नि बढ़ती है तैसे सूक्ष्म रोग भी वैरी होता है ॥ २१ ॥ रोगके फैलनके प्रथम ही प्रतीकार करना । यावत्स्थानं समाश्रित्य विकारं कुरुते गदः ॥ तावत्तस्य प्रतीकारः स्थानत्यागाद्वलीयसः॥ २२ ॥ जबतक स्थानमें आश्रित होके रोग विकारको करता है,जबतक वह उस स्थानको नहीं त्यागे तबतक उस बलवाले रोगकी क्रिया करता रहे ॥ २२ ॥ व्याधियोंका प्रकार । कर्मजा व्याधयः केचिद्दोषाजाः सन्ति चापरे ॥ सहजाः कथिताश्चान्ये व्याधयस्त्रिविधा मताः॥ २३ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कितनेक रोग कर्मसे उपजते हैं और कितनेक रोग दोषसे उपजते हैं और कितनेक रोग शरीरके साथ उपजते हैं ऐसे तीन प्रकारके रोग कहे हैं ॥ २३ ॥ तीन प्रकारके व्याधियोंका लक्षण । बहुभिरुपचारैस्तु ये न यान्ति शमं ततः॥ते कर्मजाः समुद्दिष्टा व्याधयो दारुणाः पुनः ॥२४॥दोषजा वातपित्ताद्याः सहजाः क्षुत्तृषादयः ॥ २५ ॥ जो बहुतसी चिकित्साके करनेसे शांतिको प्राप्त नहीं होते उनको कर्मसे उपजे रोग जानना, ये दारुण हैं ॥ २४ ॥ वातपित्तादिसे उपजे रोग दोषज कहाते हैं, भूख और तृषाआदिके साथ उपजनेवाले सहज कहलाते हैं ॥ २५ ॥ ज्वरकी व्यापकता । तस्माद्वक्ष्यामि चादौ ज्वरमतुलगदं वाजिनां कुञ्जराणां मानुष्या- णां पशूनांमृगमहिषखरोष्ट्रादिवानस्पतीनाम् ॥ वल्लीनामोषधी- नां क्षितिधरफणिनां पत्रिणां मूषिकाणामेषः प्राणापहारी ज्वर इति गदितो दुर्निवारो हि लोके ॥ २६ ॥ इस लिये आदिमें घोड़ा, हस्ती, मनुष्य, गाय आदि,पशु मृग, भैंसा,ऊंट आदि, जीव, वन- स्पति, वेल, ओषधी, सर्प,पक्षी, मूषा इनके ज्वरको मैं कहता हूँ, यह ज्वर प्राणोंको हरता है और संसारमें दुःखसे दूर होता है ॥ २६ ॥ अथ जातिपरत्वमें ज्वरकी असाध्यता । असाध्योऽयं ज्वरो व्याधिर्गोमहिष्यश्वकुञ्जरे ॥ किञ्चित्कृच्छ्रतमो नृणामन्येषां जीवघातकः ॥ २७ ॥ गाय, भैंसा, हस्ती, इनमें ज्वर असाध्य कहा है और मनुष्योंका ज्वर कुछ कष्टसाध्य कहा है और शेष रहे जीवोंको ज्वर मारता है ॥ २७ ॥ अथ ज्वरकी बलिष्ठता । यथा मृगाणां मृगयुर्बलिष्ठस्तथा गदानां प्रबलो ज्वरोऽयम् ॥ नान्योऽपिशक्तो मनुजं विहाय सोढुं भुवि प्राणभृतं सुराद्यम्॥२८॥ जैसे मृगोंमें सिंह बलवान् है वैसे ही रोगोंमें यह ज्वर प्रवल है । कोई भी अन्यजीव संसारमें प्राणको धारण करनेवाले पृथिवीमें देव मनुष्यके बिना ज्वरको सह नहीं सकता है ॥ २८ ॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७७ ) अथ मनुष्य ज्वर सहसकता है इसका कारण । कर्मणालभते यस्माद्देवत्वं मानुषो दिवि॥ततश्चैवाच्युतःस्वर्गा- न्मानुष्यमपि वर्त्तते ॥२९॥ तस्मात्स देवभावाच्च सहते मानुषो ज्वरम् ॥ शेषाः सव विपद्यन्ते पशुवर्गा ज्वरार्दिताः ॥ ३० ॥ कर्मसे मनुष्य स्वर्गमें जाके देवताके शरीरको प्राप्त होता है, पीछे स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ मनुष्य शरीरको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥ इस कारणसे देवभावकरके मनुष्य ज्वरको सहते हैं शेष रहे पशुओंके समूह ज्वरसे मर जाते हैं ३० ॥ अथ सर्वरोगान ज्वरकी श्रेष्ठता । रोगाणां रोगराजोऽयं यथा मृगपतिर्मृगे ॥ दाहात्मसु यथा वह्नि- स्तथा रोगे ज्वरोऽधिकः॥रुद्रक्रोधाग्निसम्भूतःसर्वभूतप्रतापनः ३१ जैसे वनमें पशुओंका राजा सिंह है तसे शरीरमें रोगोंका राजा ज्वर है,जैसे दाह करनेवालोंमें अग्नि अधिक है तैसे ही ज्वर भी अधिक है, महादेवके क्रोधरूपी अग्निसे उपजनेवाला और सब जीवोंको तपानेवाला ऐसा ज्वर है ॥ ३१ ॥ अथ पृथक् प्राणिभेदसे ज्वरके नामांतर । पातकः स तु नागानामभितापस्तु वाजिनाम् ॥ गवामीश्वरसं- ज्ञस्तु मानवानां ज्वरो मतः ॥ ३२ ॥ दारिद्रो महिषीणां तु मृगरोगो मृगेषु च ॥ अजावीनां प्रलापाख्यः करभेष्वलसो भवेत् ॥३३॥ शुनोऽलर्कः समाख्यातो मत्स्येष्विन्द्रमतो मतः पक्षिणामधिघातस्तु व्यालेष्वैक्षितसंज्ञितः ॥ ३४ ॥ जलस्य नीलिका प्रायो भूमिषूषरनामतः ॥ वृक्षस्य कोटराक्षस्तु ज्वरः सर्वत्र दृश्यते ॥ ३५ ॥ हस्तियोंके पातकनामसे ज्वर होता है, घोड़ोंके अभितापनामसे ज्वर होता है, गायोंके ईश्वरनाम वाला ज्वर होता है, मनुष्योंके ज्वरनामसे ही प्रसिद्ध है॥३२॥भैंसोंके दारिद्र नामसे ज्वर होता है मृगोंमें ज्वर मृगरोगनामसे प्रसिद्ध है, बकरी और भेड़ोंके ज्वर प्रलापाख्यनामसे होता है, ऊंटोंमें ज्वर अलसनामसे होता है ॥३३॥ कुत्ताके ज्वर अलर्क नामसे और मछलियोंमें ज्वर इंद्रमतनामसे उपजता है, पक्षियोंके ज्वर अभिघातनामसे, सर्पोंमें केंचलीनामसे ज्वर उपजता है ॥३४॥और १२
( १७८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जलमें ज्वर सिवालनामसे उपजता है पृथिवीमें ऊषरनामसे ज्वर उपजता है, वृक्षमें कोटराक्ष- नामसे ज्वर उपजता है ऐसे सब जगह ज्वर दीखता है ॥ ३५ ॥ अथ ज्वरका स्वरूप । त्रिपाद्भस्मप्रहरणस्त्रिशिराः सुमहोदरः॥वैयाघ्रचर्मवसनः कपि- लोज्ज्वलविग्रहः ॥ ३६ ॥ पिङ्गेक्षणो ह्रस्वजङ्घो विमत्स्यो बल- वानयम्॥पुरुषो लोकनाशाय चासौ ज्वर इति स्मृतः ॥३७॥ दग्धेन्धनो यथावह्निर्धातून्हत्वा यथा विषम्॥कृतकृत्यो व्रजे- च्छांतिं देहं हत्वा तथा ज्वरः ॥ ३८ ॥ तीन पैरोंवाला,भस्मको धारण करनेवाला,तीन शिरोंवाला, सुंदर बड़ा पेटवाला,सिंहके चामके वस्त्रोंको पहननेवाला, पीलेवर्णवाला और प्रकाशित शरीरवाला॥ ३६ ॥ पीले नेत्रोंवाला, ढींगनी जांघोंवाला, विशेषकर पुरुषोंमें रहनेवाला, बलवान् और पुरुष संज्ञक लोकका नाश करनेवाला, वह ज्वर कहाता है ॥ ३७ ॥ जैसे इंधनको दग्ध करके अग्नि और धातुओंको दग्ध करके विष कृतकृत्य होके शांत हो जाता है तैसे देहका नाश कर ज्वर शांत हो जाता है ॥३८ ॥ अथ ज्वरकी उत्पत्ति । तस्मात्तस्य समुत्पत्तिं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ चतुर्विधो महा- घोरो जातो येन तु चाष्टधा ॥ दक्षाद्ध्वरप्रशमनः कुपितो हि महेश्वरः॥३९॥ श्वासं मुमोच दयिताविधुरश्च तीव्रं तेन ज्वरोऽष्ट- विधसम्भवतोऽष्टधा स्यात् ॥ ४० ॥ इस कारणसे हे पुत्र ! उसकी उत्पत्तिको कहता हूं सुनो । चारप्रकारका महाघोररूपी ज्वर है फिर उससे आठ प्रकारका हुआ है सो दक्षप्रजापतिसे कुपित हुए महेश्वर ॥ ३९ ॥ सतीजीके वास्ते आठ बार श्वासको छोडते भये उससे ज्वर आठ प्रकारका हुआ है ॥ ४० ॥ अथ ज्वरकी निदानसहित संप्राप्ति । वातादिपित्तकफशोणितसन्निधानात्स्वेच्छान्नपाननिरताहतुवैप- रीत्यात्॥दोषा मलाशयगता जठराग्निबाह्याः संप्रेरयन्ति रुधिरा- श्रितवह्निपातम् ॥तेषां ततो हि दधते ज्वरनाम सिद्धम्॥४१॥ वात, पित्त, कफ, रक्त, इनके सन्निधानसे और अपनी इच्छापूर्वक अन्न और पानके सेवनसे और ऋतुके विपरीतपनेसे मलाशयमें प्राप्त हुए पेटके अग्निको बाहर हुए दोष रक्तसे आश्रित हुए अग्निके पातको प्रेरते हैं उसको ज्वर कहते हैं ॥ ४१ ॥ १ "मत्स्यो मीनेऽथ पुंभूम्नि देशे" इतिमेदिनी । २ लोकानां जनानां नाशमूअयतेऽसौ लोकनाशायः ।
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १७९ ) अथ ज्वरके हेतु । व्यायामक्रोधभुक्त्यादिजनननाच्छीतसम्भवात्॥४२॥ विरुद्धा- न्नविशेषेण पाननिर्झरवारिणा॥ कूपोदकेन सन्तुष्टस्तिग्मतीव्रां- शुरश्मिभिः ॥४३॥गन्धवातेन दोषाणामभिघाताभिशापतः ॥ ज्वरोनाम महाघोरो जायते मनुजे भृशम् ॥ ४४ ॥ और कसरत, भोजनके ऊपर भोजन, क्रोध, इनके उपजनेसे और शीतके सम्भवसे भी ज्वर उपजता है ॥ ४२ ॥ विरुद्ध अन्नआदिके खानेसे, झरने अथवा कुवाके पानीसे और तेज सूर्यकी किरणोंकी गरमाईसे ॥ ४३ ॥ बुरे गन्धसे, वात आदि दोषोंसे, चोटके लगनेसे और ब्राह्मणके शापसे मनुष्यके देहमें महाघोररूपी ज्वरनाम उत्पन्न होता है ॥ ४४ ॥ अथ प्रकटहुए ज्वरका लक्षण । श्रमो जडत्वं नयनप्लवः स्याद्रोमोद्गमो घुर्घुरकश्च जृम्भा ॥ वैवर्णता द्वेषसशोषतास्ये ज्वरस्य च व्यक्तकलक्षणानि ॥४५॥ शरीरमें थकावट और जड़पना, नेत्रोंसे पानी गिरे, रोमावली खडी होवे, कंठमें घुर्घुरापना और जँभाई आवे, वर्ण बदलजावे, अन्नसे वैर होवे, मुखमें शोष उपजे ये प्रकट हुए ज्वरके लक्षण हैं ॥ ४५ ॥ अथ ज्वरकी विशेषता । समीरणेण वै जृम्भाकफाद्दैन्यं निषीदति ॥ पित्तान्नयनसन्तापः सर्वं वै सान्निपातिके ॥ तस्माद्वक्ष्ये प्रतीकारं येन सम्पद्यते सुखम् ॥ ४६ ॥ वातकी अधिकतासे जंभाई आवे, कफसे दीनपना उपजे और शिथिल हो जावे, पित्तसे नेत्रोंमें संताप हो, सन्निपातमें सब लक्षण मिले इस वास्ते जिस करिके सुख उत्पन्न हो, ऐसा उपाय करना सो कहूंगा ॥ ४६ ॥ अथ वातज्वरमें पाचन । वचा यवानी धनिका सविश्वा पिबेत्कषायं निशि सोष्णमेवम्॥ स वातिके वातरुजे ज्वराणां सम्पाचके स्यान्मनुजे सुखाय४७ बच, अजवायन, धनियां, सोंठ इनके गरम क्वाथको रात्रिमें पीवे यह पाचन वातज्वरमें और वातकी पीडामें मनुष्यको सुख देता है ॥ ४७ ॥ अथ पित्तज्वरका पाचन । निशा सनिम्बा मृतवल्लिका च धान्यं च विश्वा सगुडः कषायः॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- निशासु क्षीरेण सकोलमिश्रं पानं सपित्तज्वरपाचनाय ॥४८॥ हलदी, नीमकी छाल, गिलोय, धनियां, सोंठ इनका क्वाथ बनाकर उसमें गुड मिलाकर पीवे अथवा दूबमें गजपीपलके चूर्णको मिलाकर रातको पीवे यह पाचनः पित्तज्वरमें मनु- ष्यको सुख देता है ॥ ४८ ॥ अथ कफज्वरमें पाचन । वचायवानी त्रिफला सविश्वा क्वाथो निशायां कफजे ज्वरे वा॥ सपाचनं स्यान्मनुजस्य दोषे शूले प्रतिश्यायकपीनसेषु॥४९॥ वच, अजवायन, हरड़े, बहेड़ा, आंवला, सोंठ इनका क्वाथ कफसे उपजे ज्वरमें और शूल, जुकाम, पीनस, इनमें रातको देना ॥ ४९ ॥ अथ सन्निपातज्वरमें पाचन । शटीवचानागरकाफलानां वत्साडनीधन्वयवासकानाम् ॥ क्वाथो हितःसर्वभवे ज्वरे च सम्पाचनं स्यान्मनुजत्रिदोषे५०॥ कचूर, वच, सोंठ, हरडैं, बहेडा, आंवला, गिलोय, जवासा इनका क्वाथ सब प्रकारके ज्वरमें और मनुष्योंके त्रिदोषज ज्वरमें पाचन है ॥ ५० ॥ अथ ज्वरमें पथ्य । रात्रौ सुखोष्णतोयेन प्रचुरेण च धीमताम् ॥ अङ्गसंमर्दनं पथ्यं निद्राव्यायामवार्जितम् ॥ ५१ ॥ रात्रिमें सुखपूर्वक गरम पानी करके अतिशयसे मनुष्योंके अगोंका मर्दन पथ्य है परंतु नींद और कसरतको वर्जना ॥ ५१ ॥ अथ वातज्वरका निदान और चिकित्सा । वेपथुर्विषमवेगशोषणं कण्ठतालुवदने विरस्यता॥रूक्षता वपुषि बन्धकुक्षयोर्जृम्भणं शिरसि रुग्विद्रिता ॥ ५२ ॥ कृष्णता कररुहां प्रलापको गात्रभङ्गबलवान् बिभत्सयति ॥भीतवत्स्व- पिति जाग्रतो नरो लक्षणैर्भवति वातकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥ शरीर कांपे, ज्वरका विषमवेग हो, कंठ, तालु, मुख इनमें शोष उपजे, मुखमें विरस- पना हो, शरीरमें रूखापन हो, कुक्षिबन्ध हो जावे, जँभाई आवे और शिरमें शूल उपजे और नींद आवे नहीं ॥ ५२ ॥ नख काले हो जावें, बकवाद करे, शरीरका भंगहोवे और बल- १ "प्रलापो ऽनर्थकं वचः” इत्यमरः ।
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८१ ) धान रहे और भयकी इच्छा करे और भयभीतकी तरह सोवे परन्तु जागता ही रहे ये लक्षण वातज्वरके हैं ॥ ५३ ॥ अथ वातज्वरका पाचन । नागरं सुरतरुश्च धान्यकं कुण्डली बृहत्तिकायुग निशम् ॥ सप्तमे निशि प्रशस्यते ज्वरे चाष्टमांशगतको हि अष्टवान्॥५४॥ सोंठ, देवदारु, धनियां, गिलोय, दोनों कटेली, हल्दी, दारुहल्दी इन आठ औषधोंकी अष्टमावशेष पाचन संज्ञक काथ बना ज्वरमें सातवीं रात्रीको देना ॥ ५४॥ यह शुंठ्यादि पाचन सब प्रकारके ज्वरोंमें देना चाहिये ॥ अथ अन्नहीन औषधका गुण । वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तदामयमसंशयमाशु चैव ॥ तद्वालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतंग्लानिं परां नयति चाशु बलक्षयं च ॥ ५५ ॥ अन्नसे हीन हुआ औषध अधिक वीर्यवाला हो जाता है और रोगको निश्चय शीघ्र नाशता है ॥ परन्तु बालक, वृद्ध, युवतीस्त्री, कोमल, इनकरके पिया हुआ वह अन्नरहित औषध परम- ग्लानिको और बलक्षयको करता है ॥ ५५ ॥ अथ पाचन हुए औषधका लक्षण । इन्द्रियाणां लघुत्वञ्च नेत्रास्यस्य प्रसादता ॥ सोद्गारमुष्णता कोष्ठे जीर्णभेषजलक्षणम् ॥ ५६ ॥ इंद्रियोंका हलकापन हो नेत्र और मुखकी प्रसन्नता रहे , डकार आवे, कोष्ठमें गर्माई रहे ये पके हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५६ ॥ अथ अपक्व औषधका गुण । क्लमहृल्लाससदनं शिरोरुग्भ्रंशमेव च उत्क्लेदो जायते यस्य विद्यादुत्क्राममौषधम् ॥ ५७ ॥ ग्लानि और थुकथुकी हो, शरीर शिथिल हो जावे, शिरमें शूल और फूटन उपजे और वम नसा आनेकी तरह होवे ये नहीं जीर्ण हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५७ ॥ अथ पाचन होनेमें कुछ शेषरहे औषधका लक्षण । दाहाङ्गसदनं मूर्च्छा शिरोरुक्क्लसदीनता ॥ भ्रमोऽरतिविशेषेण सविशेषौषधाकृतिः ॥ ५८ ॥ तस्मादौषधशेषे तु न दोषशमनं क्वचित् ॥ कुप्यन्त्यनेकधा दोषा न देयं पाचनं विना ॥५९॥ १ सर्वज्वरेषु नागरादिपाचनं देयम् । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १८२ ) हारीतसंहिता ! [ तृतीयस्थाने- दाह हो, अंग शिथिल हो जावे, मूर्च्छा, शिरमें शूल, ग्लानि, दीनपना ये उपजे, भ्रम हो और विशेष करके अरति हो ये लक्षण कुछ कमपकी औषधके हैं ॥ ५८ ॥ इसकारणसे औष- धिके शेषमें कहीं भी दोषका शमन नहीं है क्योंकि पाचनके विना दोष अनेक प्रकारसे कुपित होते हैं ॥ ५९ ॥ अथ भोजनके उपरांत देनेके औषधके गुण । शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हन्यादन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरे- ति ॥ प्राग्भुक्तसेवितमहौषधमेतदेव दद्याच्च वृद्धशिशुभीरुवराङ्ग- नाभ्यः ॥ ६० ॥ अन्नसे आवृत हुआ औषध शीघ्र पकजाता है और बलको नाशता नहीं है और वारंवार मुखसे नहीं निकलता है इसलिये प्रभातके भोजनके साथ सेवित किया औषध-वृद्ध, बालक, डर- पोंक और स्त्री इनको सुख देता है ॥ ६० ॥ अथ वातज्वरमें पंचमूलका क्वाथ । बिल्वाग्निमन्थशुकनासकपाटलीनां कुम्भारिकाप्रयुतकं क्वथितं कषायम् ॥ दन्तान्विशोधयति वारयते समीरं नाशं करोति मरुतज्वरमाशु पुंसाम् ॥ ६१ ॥ मुस्ताकिरातसुरवल्लिकणास- वित्र्यो गोकण्टको बृहतियुग्ममुदीच्यतिक्ताः॥स्याच्छाखिपर्णि- कलशीक्वथितः समन्तात्क्वाथः समीरणभवं ज्वरमाशु हन्ति ॥ ६२ ॥ गुडूची शतपुष्पा च पृक्षी रास्ना पुनर्नवा ॥ त्राय- माणकक्वाथश्च गुडैर्वातज्वरापहः ॥ ६३ ॥ बेलगिरी, अरनी, सोनापाठा, पाडल, कोहला, कुंभेरन इनका क्वाथ बना पीवे यह दन्तोंको शोधता है और वातको दूर करता है मनुष्योंके वातज्वरको शीघ्र नाशता है ॥ ६१ ॥ चिरा- यता, नागरमोथा, गिलोय, पीपल, लालआक, गोखरू, दोनोंकटेली, नेत्रवाला, कुटकी, पिठ- वन, चौलाई, इन्होंका क्वाथ वातज्वरको अच्छीतरह नाशता है ॥ ६२ ॥ गिलोय, सौंफ, पिठवन, रायसन, सांठी, त्रायमाण इनके क्वाथमें गुड़मिलाकर पीवे यह वातज्वरको हरता है ॥ ६३ ॥ अथ पित्तज्वरके निदान और चिकित्सा । मूर्च्छादाहो भ्रममदतृषावेगतीक्ष्णोऽतिसारस्तन्द्रालस्यं प्रलपन- वमीपाकतापश्च वक्त्रे ॥ स्वेदः श्वासो भवति कटुकं विह्वलत्वं क्षुधा वा एतैर्लिङ्गैर्भवति मनुजे पैत्तिको वै ज्वरस्तु ॥ ६४ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० २] भाषाटीकासमेता । ( १८३ ) मूर्च्छा और दाह उपजे, भ्रम,मद, तृषा ये भी होवें और ज्वरका तीक्ष्ण वेग हो अतीसार हो तंद्रा और आलस्य हो और बकवाद करे और छर्दि आवे और मुखमें पाक और दाह हो,पसीना और श्वास उपजे मुख कडुआ हो जावे विह्वलपना और भूख भी होवे, ये सब लक्षण होवें तब पित्तज्वर जानना ॥ ६४ ॥ अथ रोध्रादि क्वाथ । रोध्रोत्पलामृतलताकमलं सिताढ्यं तत्सारिवासहितमेव हि पाच- नेषु॥निष्क्वाथ्य क्वाथमति चाशु निहन्ति पित्तं पित्तज्वरप्रश- मनं प्रकरोति पुंसाम् ॥ ६५ ॥ लोध, नीलाकमल, गिलोय, श्वेतकमल, सफेद भटकटैया, सारिवा इन्होंका पाचन क्वाथ बना तिसमें मिश्री डाल पीवे यह पित्तको शीघ्र शांत करता है और मनुष्योंके पित्तज्वरको भी नाशता है ॥ ६५ ॥ अथ शक्राह्वादि क्वाथ । क्वथितं तण्डुलपयसा शक्राह्वं कटुरोहिणीसहितम् ॥ क्वाथं यष्टीमधुना विनाशनं पित्तज्वराणाम्तु ॥ ६६ ॥ इन्द्रयव, कुटकी, मुलहटी इनका क्वाथ चावलोंके पानीमें बनाकर मधुके साथ पीवे यह पित्त- ज्वरको नाशता है ॥ ६६ ॥ दुरालभादि क्वाथ । दुरालभावासकपर्पटानां प्रियङ्गुनिम्बोत्कटुरोहिणीनाम्॥किरात- तिक्तं क्वथितं कषायं सशर्कराढ्यं क्वथितञ्च पाचनम् ॥ ६७ ॥ सदाहपित्तज्वरमाशु हन्ति तृष्णाभ्रमं शोषविकारयुक्तम् ॥६८॥ जवासा, वासा, पित्तपापडा, प्रियंगु, नींवकी छाल, कटुकी, चिरायता, इन्होंका क्वाथ बना खांडसे संयुक्तकर पीवे पाचन है ॥ ६७ ॥ यह दाह, पित्तज्वर, तृषा, भ्रम, शोषरोग, इनको नाशता है ॥ ६८ ॥ अथ पित्तपापडाका क्वाथ । एकोऽपि वै पर्पटको वरिष्ठः पित्तज्वराणां शमनाय योग्यः ॥ तस्मात्पुनर्नागरवालकान्यैः सिंहो यथा कङ्कटकप्रवृत्तः॥६९॥ १-प्रियंगु गोंदींके समान फल है जिसे मालवेमें गेहुला कहते हैं इसमें सुगंधी भी होती है, यह गंध प्रियंगु है और प्रियंगु गोंदी फल ही समझिये । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( १८४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अकेला पित्तपापडाका क्वाथ भी पित्तज्वरको शांत करनेके लिये योग्य और अति उत्तम है फिर सोंठ और नेत्रवालासे युक्तकिये पित्तपापडाका क्वाथ पित्तज्वरको ऐसे नाशता है जैसे हाँसके भिंडेमें प्राप्तहुआ सिंह वनके पशुको नाशता है ॥ ६९ ॥ अथ शुंठादि क्वाथ । नागरोशीरमुस्ता च चन्दनं कटुरोहिणी ॥ धान्यकानां तु क्वाथश्च पित्तज्वरविनाशनः ॥ ७० ॥ सोंठ, खस, नागरमोथा, रक्तचंदन, कुंटकी, धनियां इनका क्वाथ पित्तज्वरको ना- शता है ॥ ७० ॥ अथ गुडूच्यादि क्वाथ । अमृतं पर्पटो धात्री क्वाथः पित्तज्वरं हरेत् ॥७१ ॥ गिलोय, पित्तपापडा, आंवला, इनका क्वाथ पित्तज्वरको नाशता है ॥ ७१ ॥ अथ द्राक्षादि क्वाथ । द्राक्षापर्पटिकातिक्तापथ्यारग्वधमुस्तकैः ॥ क्वाथो भ्रमस्तृषादाहयुक्तपित्तज्वरापहः ॥ ७२ ॥ दाख, पित्तपापडा, कुटकी, हरड़, अमलतास, नागरमोथा, इनका क्वाथ तृषा, भ्रम, दाह इनसे युक्तहुए पित्तज्वरको नाशता है ॥ ७२ ॥ अथ दाहतृषामूर्च्छाके ऊपर विदार्यादिकोंका उपचार । विदारिकारोध्रकपित्थकानां स्यान्मातुलुङ्गस्य च दाडिमानाम्॥ यथानुलाभेन च तालुलेपो दाहं तृषामूर्च्छनमाशु हन्ति ॥७३॥ विदारीकंद, लोध, कैथ, बिजौरा, अनार, इनमेंसे जितने मिलें उनका लेप बनाकर तालुके ऊपर लगावे यह दाह, तृषा, मूर्च्छा, इनको नाशता है ॥ ७३ ॥ अथ दाहज्वरका उपाय । उत्तानस्य प्रसुप्तस्य कांस्ये वा ताम्रभाजने ॥ नाभौ निधाय धारां तु शीतां दाहं निवारयेत् ॥ ७४ ॥ रोगीको सीधा शयन कराके तिसकी नाभीपर कांसीके अथवा तांबाके पात्रमें पानीकी धारा देनी यह दाहको नाशती है ॥ ७४ ॥ रम्यरामाकुचभरनतालिङ्गनं चेष्टसङ्गाद्राक्षापानं निगदितमथो शीतलं सेवनं स्यात् ॥ शुभ्राम्भोजं मलयजजलासिक्तसंशीत-
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८५ ) वासो मुक्ताहारो विशदतुहिनं कौमुदी वा सुखाय ॥७५॥ एत घ्नन्ति द्रुततरनिभं मानुषाणां तु पित्तं दाहं शोषं क्लममपि तथा तृड्भ्रमं मूर्च्छनाञ्च॥एतद्योगं भवति नितरां पित्तदाहस्य शान्ति- योग्या चैवं भवति सततं तत्क्रिया श्रीमताञ्च ॥ ७६ ॥ सुंदर और रमणीक चूचियोंके भारसे नम्रहुई स्त्रीका आलिंगन करे परंतु मथुनको नहीं करे और दाखके रस सेवन करे, शीतलपदार्थको सेवता रहे सफेद कमल और मलयागिरि चदनके पानीसे भिगोयाहुआ शीतलवस्त्रको धारे और मोतियोंकी मालाको पहने और सुंदर शीतल हवा और चांदनी ये सब पित्तज्वरको सुख देते हैं ॥ ७५ ॥ यह सब मनुष्योंके पित्त, दाह, शोष, ग्लानि, तृषा, भ्रम और मूर्च्छाको शांत करते हैं और इन योगोंसे पित्तका दाह दूर होजाता है, धनवान् मनुष्योंके वास्ते यह क्रिया निरंतर योग्य है ॥ ७६ ॥ अथ ज्वरशोषका उपाय । यदि जिह्वागलतालुशोषश्चेन्मनुजस्य च ॥ केसरं मातुलुङ्गस्य मधुसैन्धवसंयुक्तम् ॥ पेष्यमाणं तालुलेपे सद्यः पित्तज्व- रापहम् ॥ ७७ ॥ और जो मनुष्यके जीभ, गल, तालु इनमें शोष उपजे तो बिजौराका केसर ले उसमें शहद और सैंधानमक मिला पीसकर तालुपे लेप करें यह शीघ्र पित्तज्वरको नाशता है ॥७७॥ अथ कफज्वरका निदान और चिकित्सा । स्तैमित्यं मधुरास्यता च जडता तन्द्रा भृशं स्यात्तथा गात्राणां गुरुतारुचिर्विरसता रोमोद्गमः शीतता ॥ प्रस्वेदाः श्रुतिरोधनञ्च भवते नेत्रे च पाण्डुच्छवी विष्टब्धं मलमूत्रिकासवमनं श्लेष्म- ज्वरे ज्ञायताम् ॥ ७८ ॥ शरीरका गीलापन हो, मुख मीठा रहे, जडपना,अत्यंत तंद्रा हो, शरीरका भारीपन, अरुचि, ग्लानि, रोमोंका खडा होना, शीतलपना ये उपजे और पसीना आवे और कानोंका छिद्र रुक जावे और आधा पीला और आधा सफेद ऐसे वर्णकी कांतिसे संयुक्त नेत्र होजावें मलकी प्रवृत्ति बँधी हो, खांसी और छर्दि आवे ये सब लक्षण हों तब कफज्वर जानना ॥ ७८ ॥ अथ कफज्वरका पाचन पिप्पल्यादिकल्क । पिप्पलादिककल्कं तु कफजे पाचनं हितम् ॥ ७९ ॥ १ “पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः । वचासातिविषाजाजीपाठावत्सकरेणुकैः १ किराततिक्तरुकंमूवा सर्षपा मरिचानि च । कटुकं पुष्करं भार्ङ्गी विडङ्गं कर्कटाह्वयम् २ अर्कमूलं बृहत्सिंही श्रेयसी सुदुरालभा।दीपक चाजमोदाच शुकनासाद्धिहङ्गुभिः ३ एतानि समभागानि गणोऽष्टाविंशको मतः। कषायमुपभुञ्जीत वातश्लेष्मज्व- रापहम् ४ हन्ति वातं तथा शीतं स्वेदजं प्रवलं कफम्।प्रलापंचातितन्द्रां च रोमहार्च्चितथा ५ महावातेऽपत- मन्त्रे च सर्वगात्रेच शून्यताम् । अयं सर्वज्वरान् हन्ति सन्निपातांस्त्रयोदशति ॥ ६ ॥” इति शार्ङ्गधरे ।
( १८६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पिप्पलादि गणके औषधोंका कल्क कफके ज्वरमें सुंदर पाचन है ॥ ७९ ॥ अथ व्याघ्यादिकल्क । तद्वद्याघ्री च सिंही च रोध्रं कुष्ठपटोलकम् ॥ ज्वरे कफात्मजे चैतत्पाचनं स्यात्तदुत्तमम् ॥ ८० ॥ छोटी कटेली, बड़ी भटकटैया, लोध, कूट, परवल, इनका पाचन कफज्वरमें हित है॥८०॥ अथ वासादिक्वाथ । वासा गुडूची त्रिफला पटोली शटी च तिक्ता मधुनीकषायम्॥ श्लेष्मप्रभूतेषु रुजेषु सम्यग् ज्वरं निहन्यात्कफजञ्च शीघ्रम्॥८१॥ वांसा, गिलोय, हरड़, बहेड़ा, आंवला, परवल, कचूर, कुटकी, इनके क्वाथमें शहद मिला- कर श्लेष्मासे उत्पन्न होनेवाले रोगोंमें पीवे यह कफके ज्वरको शीघ्र नाशता है ॥ ८१ ॥ अथ आमलक्यादिक्वाथ । आमलक्यभया कृष्णा षड्ग्रन्था त्रित्रिकन्तथा ॥ मलभेदी कफान्तको ज्वरनाशनदीपनः ॥ ८२ ॥ आमला, हरडै, पीपल, वच, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरडे, बहेडा, आंवला और दालचिनी, इलायची, तेजपात, इनका क्वाथ मलको पतला करता है कफको हरता है ज्वरको नाशता है और अग्निको जगाता है ॥ ८२ ॥ अथ पिप्पल्यादिक्वाथ । पिप्पली शृङ्गवेरञ्च षड्ग्रन्था वत्सकं फलम् ॥ क्वाथो मधुप्रगाढः स्याच्छ्लेष्मज्वरविनाशनः ॥ ८३ ॥ पीपल, अदरख, वच, इंद्रयव, इन्होंका क्वाथ बना तिसमें शहद मिला पीनेसे कफज्वरका नाश होता है ॥ ८३ ॥ अथ पिप्पलीका अवलेह । क्षौद्रेण पिप्पलीचूर्णं लिह्येच्छ्लेष्मज्वरापहम् ॥ प्लीहानाहविषं हन्ति कासश्वासाममर्द्दनम् ॥ ८४ ॥ पीपलके चूर्णको शहदमें मिला चाटनेसे कफज्वर, तिल्लीरोग, अफारा, विष, खांसी, श्वासरोग, आम, इनका नाश होता है ॥ ८४ ॥ अथ वातपित्तज्वरका निदान और चिकित्सा । तृष्णा मूर्च्छा वमन कटुता चानने रूक्षता स्यादन्तर्दाहो वपुषि Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
'अ० २] भाषाटीकासमेता । ( १८७ ) नयने रक्तता कण्ठशोषः॥निद्रानाशः श्वसनशिरसो रुकप्रभे- दोऽङ्गभङ्गो रोमोद्धर्षस्तमकमितिचेद्वातपित्तज्वरःस्यात् ॥८५॥ तृषा, मूर्च्छा, छर्दि, ये उपजें और मुखमें कडुआपन हो और शरीर रूखा होजावे, शरीर- के भीतर दाह हो और लालनेत्र होजावें और कंठमें शोष होवे और नींदका नाश हो, श्वास और शिरमें शूल और फूटनहो और अँगडाइ टूटे रोमावली खडी हो, और अँघेरी आवे ये सब लक्षण हों तब वातपित्तज्वर जानना ॥ ८५ ॥ अथ वातपित्तज्वरका पाचन त्रिफलाद क्वाथ। संसृष्टदोषैर्विहितञ्च सम्यग्विपाचनं पित्तमरुज्ज्वरे च ॥ फलत्रिकं शाल्मलिसंप्रयुक्तं रास्नाकिरातस्य पिवेत्कषायम्॥८६॥ मिलेहुए दोषोंसे युक्त ज्वरमें योग्य पाचनको वातपित्तज्वरमें देवे और हरडे, बहेडा, आंवला, शमलकी छाल, रायसन, चिरायता, इनके क्वाथको पीवे ॥ ८६ ॥ अथ शालिपर्ण्यादिकल्क । द्विपञ्चमूली सह नागरेण गुडूचिभूनिम्बनघनैः समेतः ॥ कल्कः प्रशस्तः सगुडो मरुत्सु स पित्तवातज्वरनाशहेतुः॥८७॥ दशमूल, सोंठ, गिलोय, चिरायता, नागरमोथा इनके कल्कमें गुड़ मिला खावे, यह वात- पित्तज्वरको नाशता है और वातसे उत्पन्न होनेवाले रोगोंमें हित है ॥ ८७ ॥ अथ किरातादि क्वाथ । किराततिक्तामलकीशटीनां द्राक्षोषणानागरकामृतानाम् ॥ क्वाथः सुशीतो गुडसंयुक्तः स्यात्स पित्तवातज्वरनाशहेतुः॥८८॥ चिरायता, कुटकी, आंवला, कचूर, मुनक्का, दाख, मिर्च, सोंठ, गिलोय, इनका क्वाथ गुड़ मिलाकर ठंडा पीवे यह वातपित्तज्वरको नाशता है ॥ ८८ ॥ अथ पंचभद्रक्वाथ । अमृतमुस्त कवासापर्पटविश्वाजलेन क्वाथः ॥ पानं पित्तमरुत्सु ज्वरं निहन्याच्च भद्रपुञ्जः ॥८९ ॥ गिलोय, नागरमोथा, वांसा, पित्तपापडा, सोंठ इनका पानीमें क्वाथ बनावे, यह पंचभद्र- क्वाथ वातपित्तज्वरको नाशता है ॥ ८९ ॥ अथ पित्तकफज्वरका निदान और चिकित्सा । निद्रागौरवकात्ससन्धिशिरोरुक्चार्तिस्तथा पर्वणां भेदो मध्य- मवेगमत्र नयनेवातान्विते श्लेष्मणि॥सन्तापः श्वसनं रुचिःश्रु-
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( १८८ ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- त्तिपथे कण्ठे च शुष्कावृत्तिस्तन्द्रामोहमरोचकभ्रममथ श्लेष्मज्वरे पित्तले ॥ ९० ॥ नींद बहुत आवे, शरीर गुरु रहे,संधि और शिरमें शूल और संधि टूटे और वेग मध्य होवे नेत्रोंमें संताप हो, श्वास हो, सुननेमें रुचिहो और कंठमें सूखापन हो और तंद्रा, मोह,अरोचक, भ्रम, ये भी उपजें, ये सब लक्षण होव तब पित्तकफज्वर जानना ॥ ९० ॥ अथ पित्तकफज्वरका पाचन शुंठचादि क्वाथ । नागरं भद्रमुस्तां वा गुडूच्यामलकाह्वयम् ॥ पाठामृणालोदी- च्याश्च क्वाथः पित्तज्वरे कफे ॥ ९१ ॥ पाचनो दीपनीयः स्याद्रक्तशोषनिवारणः ॥ ९२ ॥ सोंठ, नागरमोथा, गिलोय, आंवला, पाठा, कमलकी डंडी, नेत्रवाला, इनका क्वाथ पित्त- कफज्वरमें हित है ॥ ९१ ॥ और पाचन है, अग्निको जगाता है, रक्तको और शोषको दूर करता है ॥ ९२ ॥ अथ द्राक्षादि क्वाथ । द्राक्षामृतावासकरिष्टकाश्च भूनिम्बतिक्तेन्द्रयवाः पटोलम् ॥ मुस्तासभाग्रां क्वथितः कषायःसश्लेष्मपित्तज्वरनाशनाय ९३॥ मुनक्का, दाख, गिलोय , वांसा, नींबकी छाल, चिरायता, कुटकी, इंद्रयव, परवल, नागर- मोथा, भारंगी इनका क्वाथ पित्तकफज्वरको नाशता है ॥ ९३ ॥ गुडूच्यादि क्वाथ । गुडूचिका निम्बदलानि शुण्ठी मुस्तञ्च कुस्तुम्बुरुचन्दनानि ॥ क्वाथं विदध्यात्कफपित्तवातज्वरं निहन्याच्च गुडूचिकाद्यः॥९४ एष सर्वज्वरान्हन्ति हृल्लासाद्यानरोचकान् ॥ प्रतिश्यायपिपा- साघ्नः शोषदाहनिवारणः ॥ ९५ ॥ गिलोय, नींबके कोंपल, सोंठ, नागरमोथा, धनियां, रक्तचंदन, यह गुडूच्यादि क्वाथ पित्त- कफज्वरको हरता है ॥ ९४ ॥ और यही क्वाथ सब प्रकारके ज्वर, थुकथुकी, अरोचक, जुकाम, पिपासा, शोष, दाहको नाशता है ॥ ९५ ॥ अथ अन्यगुडूच्यादि क्वाथ । गुडूचिकानिम्बकचक्रवासकं शटी किरातं मगधाष्टहल्यौ ॥ दार्वापटोलं क्वथितं कषायं पिबेन्नरः पित्तकफे ज्वरे च ॥९६॥ गिलोय, नींबकी छाल, तगर, बांसा, कचूर, चिरायता, पीपल, अष्टहली, दारुहलदी, परवल, इनके क्वाथको पीवे यह पित्तकफज्वरमें हित है ॥९६ ॥