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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कर्मपर कबीर वचन

सच्चे झूठेका न्याय

१६-वायजकी किताब (२) बाब (१७) से २१ आयत तक यह लिखा हुआ है कि खुदा सच्चों तथा धूर्तोंका न्याय करेगा। क्योंकि, प्रत्येक अभिप्राय तथा प्रत्येक कार्यके लिये एक समय है। मैंने अपने मनमें कहा बनीआदमकी अवस्थाकी बात खुदा उनपर प्रगट करदे वे आपको पशुके सदृश जानने लगे, जो मनुष्य पर बीतता है वही पशुपर भी बीतता है, दोनों पर समान घटना संघटित होती है। जिस प्रकार यह मरता है वैसेही वह भी मरता है सबमें एकही स्वाँस है। मनुष्यमें पशुसे अधिकता नहीं है, क्योंकि, सब अनित्य हैं, सबके सब एकही स्थान पर जाते हैं सबके सब मिट्टीसे हैं, सबके सब मिट्टीमें मिलजाते हैं। मनुष्योंकी आत्माका ऊपर चढ़ना तथा पशुओंकी आत्माओंका नीचे उतरना कौन जानता है।

इसका तात्पर्य-खुदा सच्चोंका सुख तथा धूर्तोंका नियत समय पर दण्ड देगा। मनुष्यको जानना चाहिये कि, वे पशुके समान हैं। दोनोंमें एकही आत्मा और स्वाँस है। मनुष्यको पशुपर बड़ाई नहीं है। सब मरकर एकही जगह जाते हैं। इस कारण मिट्टी ही न समझना चाहिये। क्योंकि, मिट्टी ही केवल मिट्टीमें जाती है। आत्मा तथा स्वाँसादिक मिट्टीमें नहीं जाते। यहां मिट्टीसे तात्पर्य चौरासी लाख योनिसे है। क्योंकि, सर्वयोनि तथा सर्व शरीर मिट्टीसे बने हैं मिट्टी हैं, यहां मिट्टी नाम सर्व शरीरोंका है। अतः जीवके लिये एक शरीरसे दूसरेमें जाना आवश्यक है सब जीवोंके लिये यही नियुक्त गृह है कि, एक घर छोड़कर दूसरेमें जाया करे। सुकर्मों मनुष्य है, दुष्कर्मों पशु हैं। अच्छोंकी आत्मा स्वर्ग तथा बुरोंकी नरक में जाया करती है।

१७-दाऊदका पुनर्जन्म-पहले सलातनिके दूसरे बाब की पहली और दूसरे आयतमें लिखा है कि, दाऊद बादशाहके जब मृत्युके दिन निकट आये तब उसने अपने पुत्र सुलेमानको शिक्षा देकर कहा कि, मैं समस्त संसारका पथ जानता हूँ इस कारण तू दृढ़ हो अपने को मर्द दिखला।

फिर देखो इज्जीलमें आमालके दूसरे बाबकी २४ आयतमें लिखा है कि, दाऊद आकाशपर न गया और मौलवी अमादुद्दीन तालीम मुहम्मदी लिखितके (१३९) पृष्ठमें लिखा है कि, दाऊद पैगम्बरकी कब्रको अप्रतिष्ठापूर्वक खुदवा डाला।

हिरोदेश बादशाहने सुना था कि, पैगम्बरीकी लाश सड़ती नहीं। इसी परीक्षाके निमित्त उसने दाऊदकी लाश को ठीक नहीं पाया। उसने उसे सड़ती

हुई देखा था । इससे प्रमाणित हुआ कि, दाऊद न आकाश पर गया न पृथ्वीपर जीवित रहा और न कन्नमें रहा वह अवश्यही समस्त संसारके पथमें गया, उसका आवागमन हुआ ।

१८-मतीकी इञ्जीलमें आवागमन-मतीकी इञ्जीलका (१२) बाब (४६) से (४५) आयत तक उसमें लिखा है कि, जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीर से निकल जाती है । तब सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है, जब जगह नहीं पाती तब कहती है कि, मैं अपने घरमें जहाँ से निकली हूँ पुनः जाती हूँ । जाती है जब उसको देखती है कि, वह खाली और साफ है । तब वह सात आत्माओंको जो उससे अधम हैं अपने साथ ले आती है वे भीतर जाकर स्थिर हो जाती हैं । इस समय मनुष्यकी पिछली दशा अगली दशासे बुरी हो जाती है ।

अब इन आयतोंका तात्पर्य मैं अक्षर अक्षर लिखता हूँ । जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीरसे निकल जाती है तथा सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है । इसका तात्पर्य यह है कि, मृत्युके मूच्छाके पीछे इसलिये कि, आत्मा पवित्र होनेके कारण है । उसका स्थान तथा श्रेणी ऊँची है इस कारण यह ऊपरको चलती है, सूखे स्थानसे यह तात्पर्य है कि, जहाँ तरी तथा गीलापन कुछ न हो । आकाश इत्यादि की उँचाईमें जाकर अपने लिये विश्रामका स्थान दूँदती है । परन्तु वह तो विश्राम का स्थान नहीं । वह तो शून्य है । आत्माके निमित्त तो कोई अवश्यही शरीर चाहिये । शरीरके लिये कोई भूमि और भूमिके लिये बस्ती होनी चाहिये । बस्तीके लिये कुछ जल जिसमें जीवोंका भरणपोषण हो । बिना भोजनके किसी जीवकी स्थिति नहीं । ये एक दूसरेका भोजन होते हैं । समस्त स्वर्गों तथा वैकुण्ठोंमें बस्ती हैं । इस अपवित्र आत्माको तो वहाँ स्थान नहीं मिलता । न यह वहाँ जाही सकती है । इस कारण यह अपवित्र आत्मा सूखी जगहोंमें अपनी स्थिति दूँदती है । क्योंकि, अपवित्र आत्मा तो वैकुण्ठमें जा न सकेगी, सूखी जगहोंमें आनन्द नहीं मिलता ; जब शून्यमें स्थान नहीं मिलता तब कहती है कि, जहाँसे मैं निकली हूँ फिर वहाँ जाऊँगी । जब आती और उसको देखती है तब उस स्थानको स्वच्छ तथा साफ पाती है इससे यह तात्पर्य है कि, वह आत्मा जब अपने मृतदेहके निकट आती है तब देखती है कि, मेरा शरीर अब मेरे रहने योग्य नहीं, वह स्वच्छ तथा झाड़ा और खाली है, क्योंकि शरीरकी सहायक चौदह इन्द्रियाँ और उनके चौदह देवतें पाँच तत्व और तीन गुण कुछ न रहे, इन साथियों बिना इस शरीरमें मेरी स्थिति कैसे हो सकती है ? वह जो कल बनी थी वो बिगड़ गयी । वह घर उजड़ गया । केवल मिट्टीका एक स्थूल भाग रह गया है । उसको कोई गाड़ दे अथवा जलादे उसके

अधीन है। पाँच तत्व और तीन गुणके मेलसे यह शरीर प्रस्तुत होजाता है। विरुद्धता से मिट जाता है, मृत्युके पीछे अपवित्र आत्मा कई बार अपने शरीरके समीप आती है, उसमें बसनेकी इच्छा करती है, पर इस शरीरमें वासका कोई उपाय न देखकर निराश हो जाती है, पलटकर सात आत्मायें जो उससे भी बुरी होती हैं अपने साथ लाती है वे भीतर जाकर रहती हैं। तब मनुष्यकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी हो जाती है। वह सात आत्मायें जो इससे बुरी हैं वे ये हैं १—वायु। २—अग्नि। ३—जल। ४—पृथ्वी। ५—गुण। ६—सत्तोगुण। ७—तमोगुण। यह सात आत्मायें अपवित्र आत्माओं से भी बुरी हैं। क्योंकि, सातों आत्मायें वासनाकी कामनासे सिरसे पाँवतक भरी हैं। ये वासनाओंसे ऐसी भरी होती हैं, कि कभी कम नहीं होतीं। दिन प्रति दिन भरती ही रहती हैं। इन्हीं सातोंकी संगति और संयोगसे इस आत्माकी बुरी दशा है। ये ही सातों इस जीवको घेर घारकर आवागमनमें डालती हैं। इन्हीं सात निकृष्ट आत्माओंके सम्बन्धने सारे जीवोंको आवागमनके बन्धनमें डाल रखा है। जैसे कि, चोरके साथ साधु भी फँस जाता है इन्हीं सातके सम्बन्धसे आत्माकी निकृष्ट अवस्था हो रही है। इनकी कभी मुक्ति नहीं होती। इन्हीं सातों द्वारा समस्त रचनाएँ खड़ी हैं। जब तक इनका सङ्ग है तबतक जीवका यही ढङ्ग रहेगा। उनका उससे इसका कदापि छूटकारा नहीं हो सकता।

यह आत्मा अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार इन्हीं सातोंको साथ लाती है। इन्हींके साथ मातृगर्भमें स्थिर होती है। वीर्यके साथ यह जीव अपनी प्रारब्ध सहित स्थिर होकर फिर गर्भका नियत समय सम्पूर्ण कर शरीरके साथ बहिर्गत होता है। तब जीवकी पिछली अवस्थासे अगली अवस्था बुरी होती है। क्योंकि, आत्मा जो पहिले कुत्सित तथा अपवित्र थी इस कारण उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होती है। पहले वह मनुष्यके शरीरमें थी। मनुष्यका शरीर पाकर उसने जो कुकर्म किया तो अवश्य ही उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होगी मानुषिक शरीरसे पृथक् गई और पशु आदिके शरीरमें उसका गमन हुआ। यह अपवित्र आत्मायें पशु तथा जड़ पदार्थ अथवा नरकमें जाती हैं। सहस्रों बार उनके आवागमनका सिलसिला चला जाता है। जिसने मनुष्यदेह पाकर अपनी मुक्तिका उपाय न किया वह बड़ा अभाग है।

१९—मती की इञ्जीलका २५ बाब १४ से ३० आयत पर्यन्त लिखा है और वहाँ कयामतका वृत्तान्त और तोड़ेका उदाहरण दिया है उसे यहाँ लिखते हैं—एक मालिकने यात्रा करनेके समय अपने एक भृत्यको पाँच तोड़े दिये, दूसरे को दो तोड़े तथा तीसरेको एक तोड़ा देकर चला गया। कुछ कालके पीछे उन नौक-

रोंका म लिक आया, उनसे हिसाब लेने लगा । जिसने पाँच तोड़े पाये थे वह उन तोड़ों सहित उपस्थित हुआ कहा कि, ऐ स्वामिन् ! मुझे आपने पाँच तोड़े दिये थे उससे मैंने पाँच और कमाये हैं । मालिकने कहा भले सेवक ! चिरजीवी हो, तू थोड़ेमें भला निकला, मैं तुझे बहुत बड़ा अधिकार दूंगा । वैसाही वह दो तोड़ेवाला भी चार तोड़े लेकर उपस्थित हुआ, मालिकने वही बात उससे भी कही तीसरा जिसको स्वामीने केवल एक तोड़ा दिया था वह वही एक तोड़ा लेकर उपस्थित हुआ कहा कि, हे स्वामिन् ! मैं आपको कठिन स्वभावका जानता था इस कारण यह तोड़ा पृथ्वीमें दबाकर रखवा था । मालिकने उस नौकरसे कहा कि, अये अयोग्य आलसी नौकर ! तूने कुछ नहीं कमाया । यदि तू मेरा तोड़ा सर्फीकों पास भी रखता तो मुझको उसका सूद मिलता, फिर उसका तोड़ा छीनकर जिसके पास दश तोड़े थे उसी को दे दिया, क्योंकि, जिसके पास कुछ है उसको और भी दिया जायगा उसकी बढ़ती होगी । जिसके पास कुछ नहीं उसके पास जो कुछ है वह भी ले लिया जायगा । उस निकम्मे नौकरको बाहर अँधेरेमें ड.ल दिया । वहाँ वह रोता और दाँत पीसता रहा ।

तात्पर्य—परमेश्वरका मनुष्यसे गुप्त रहना मानों यात्रा करना है । जिस समय मनुष्य गर्भमें उलटा लटका रहता है उससे प्रतिज्ञा करता है कि, हे परमेश्वर ! इस नरक यंत्रणासे मुझको बाहर निकाल, मैं तेरी भक्ति करूँगा । परमेश्वर दयालु होता है वह गर्भसे बाहर आता है । उस समय परमेश्वर उसकी दृष्टिसे अन्तर्धान हो जाता है । प्रत्येक मनुष्यको उसने पृथक् पृथक् बुद्धिका तोड़ा बाँट दिया है, किसीको पाँच भाग और किसीको एक भाग । इस प्रकार बुद्धिका तोड़ा अपने प्रत्येक भूत्योंको देकर यात्रा करने गया अर्थात् अन्तर्धान हो गया । जब यह मनुष्य गर्भसे बाहर निकल ज्ञानमान होकर भक्ति बन्दनामें संलग्न होता है, वह पाँच तोड़ेवाला अपने सुकार्य तथा भक्तिद्वारा परमेश्वरको प्रसन्न करता है । दो तोड़ेवाला भी अपने मालिकको राजी करता है पर एक तोड़ेवाला मूर्ख उसे रुष्ट करता है ।

जब मनुष्य मर जाता है पिण्ड प्रलय होता है तब सब मनुष्य परमेश्वरके सामने अपनी भलाई बुराईका हिसाब करानेको उपस्थित होते हैं, सबकी भलाई बुराईका हिसाब होता है । तब परमेश्वर सबका हिसाब लेकर सबको दण्ड पारितोषिकादि देता है । वह तोड़ा मानुसिक चोलाकी बुद्धि है । जिसने शुभ काम किया अपना कर्तव्य पालन किया वह भला भूत्य है, उसकी बुद्धि होगी, जिस किसीने मानुषिक शरीर पाकर मनुष्यत्वके धर्मका प्रतिपालन न किया

नौ कोष

उससे मनुष्यका शरीर छुड़ा लिया जावेगा। उस एक तोड़ेवालेका फल उस दश तोड़ेवालेको दिया जायगा और उसकी बढ़ती होगी। भले भूत्यको वह कमाईका बल अधिक दिया जायगा, जो सीमाबद्ध मानुषिक बलके बाहर है। सर्पिकाको तोड़ा देनेका तात्पर्य यह है कि, सर्पिका साधु तथा गुरु हैं। यदि वह गुरुओंके शरण जाता तो भी कुकर्मोंसे बचता। क्योंकि, शरणागति भी बहुत उच्चपद है व यथार्थ शरणागति होनेपर उससे अधिक परिश्रम न कराया जाता। वह निकम्मा नौकर जिसके पास कुछ नहीं है जो कुछ उसके पास होगा वह भी ले लिया जावेगा। इसका यह तात्पर्य है कि, उससे मनुष्यका शरीर ले लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास मानुषिक शरीर ही है जो विद्या तथा गुणका भण्डार है वह है वह भी छीन ली जावेगी।

जागृत अवस्था स्वप्नावस्था और सुषुप्ति यह तीनों अवस्था जीवके लिये हैं, तुरिया ईश्वरके निमित्त है, जो ये चारों अवस्था नियत हुई हैं, उनमेंसे प्रथम जागृतावस्था तो मनुष्यके लिये है। क्योंकि, यह मनुष्य जाग्रितावस्थामें स्थित है। यह जाग्रितावस्था बुद्धिकी अवस्था है, इसीमें भलाई तथा बुराईका हिसाब है। जाग्रितकी अवस्थासेही मनुष्य तुरियावस्थाको प्राप्त करके ईश्वर पदको प्राप्त कर सकता है स्वप्नकी अवस्था पशुओंके लिये है। क्योंकि, सब पशु अनजान तथा निर्बुद्धिताकी अवस्थामें हैं यदि कोई दोष करें तो उनके पापकी कोई गणनाही नहीं की जासकती। इसी प्रकार सभी पशु अचेत निद्राकी अवस्थामें हैं, उनके पापोंका कोई हिसाब नहीं किया जाता। जड़ पदार्थ तो सुषुप्तिकी ही अवस्थामें हैं। जो कोई जाग्रत्वस्थामें आकर सुकार्थ न करे तो वह निश्चय स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थामें डाल दिया जावेगा। जो कोई नङ्गाही मनुष्य शरीरके अतिरिक्त और कुछ न रखता हो उससे क्या लिया जावेगा। निस्संदेह उससे मनुष्यका चोला ही छीन लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास केवल मनुष्यकी देह मात्रही रह गई है, दूसरा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त उससे कुछ लिया नहीं जासकता न कोई अन्य वस्तु उसके पासही है।

वह बाहर अन्धकारमें डाला जायगा। बाहरके अन्धकारसे यह तात्पर्य है कि, जो देह बुद्धि तथा ज्ञानके बाहर है, वो देह अज्ञानी पशु तथा जड़ पदार्थोंकी है, जब जीव मनुष्यकी देहसे अलग होता है तब अन्धकारमें पड़ता है। जप, तप, ज्ञान, करने अथवा सीखने योग्य नहीं रहता। क्योंकि इस निकम्मे नौकरने मनुष्यका चोला पाकर कुछ कमाई न की न तोड़ा सर्पियों (गुरु) को दिया।

इससे मानुषिक शरीरको छोड़कर पशुओंमें परिभ्रमण किया करता है । वहाँ रोना तथा दांत पीसना होता है । क्योंकि, पशुकी देहसे किसीकी मुक्ति नहीं हो सकती । अन्तमें नरकमें प्रवेश करता है जहाँ रोना तथा दांत पीसनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह जाता ।

२०—योहन्नाकी इंजीलमें आवागमन—योहन्ना की इञ्जीलका (१०) बाब (८) आयत देखो । सब जितने मुझसे आगे आये वे सब चोर और बटमार हैं । पर भेड़ोंने उनकी नहीं सुनी । द्वार मैं हूँ यदि कोई मनुष्य मुझसे प्रवेश करे तो मुक्ति पावेगा । भीतर बाहर आवे जावेगा और चरनेकी जगह पावेगा । अर्थात् हजरत मसीह फरमाते हैं कि, जितने मुझसे आगे आये हैं वे सब चोर तथा बटमार थे, मनुष्योंको भटकानेवाले थे । मैं द्वार हूँ यदि कोई मुझसे प्रवेश करेगा तो वह मुक्ति पावेगा भीतर बाहर आवे जावेगा । द्वार मैं हूँ इससे यह तात्पर्य है कि, मुझे बिना किसीको मार्ग न मिलेगा । क्योंकि, समस्त कार्योंका उत्तर दाता मैं ही हूँ । इसी कारण मसीह सारे नबियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं । यहाँ मुक्तिके अर्थ एक शरीरके कर्मोंसे छूट जानेका है, एक देहके कर्मोंसे छूटा और दूसरा देहके कर्मोंमें लबक रहा । भीतर बाहर जानेसे तात्पर्य तना सुखसे है । अर्थ यह कि, जीव पिता होकर भीतर जाता है और पुत्र होकर बाहर निकलता है । जब एक शरीरको छोड़ता है तब दूसरा शरीर अपने लिये बनाता है और सदैव आवागमन किया करता है । चरनेकी जगह पानेसे यह तात्पर्य है कि, चरनेका स्थान चौपायोंके निमित्त है । मनुष्यके निमित्त नहीं । जिसके आवागमनका सम्बन्ध टूट गया वही मनुष्य है । शेषके समस्त पूर्ण पशु हैं, यद्यपि मनुष्यके स्वरूपमें दिखाई देते हैं । जितने लोग मुक्तिके निमित्त उद्योग नहीं करते न मुक्तिकी सुधि रखते हैं वो सब पूरे पशु हैं ।

२१—कयामतसे भी पहिले आवागमन—लूकाकी इञ्जीलका (१६) बाब (१९ से ३१) आयत पर्यन्त यह है कि, लाजर नामक एक दरिद्री था । उसके समस्त शरीरमें घाव थे वह बिचारा विवश होकर एक धनाढ्यके द्वारपर पड़ा रहता था, कुत्ते उसके घावोंको चाटा करते थे । अमीरके नौकर उस अमीरके रसोईसे जो जूठा चूर चार गिरता था उन सबको इकठठा करके उस लाजरके सामने रखते । लाजर वही जूठा तथा चूरचार खाकर जीता था, अन्तमें लाजर मर गया, जब वयस समाप्त हुआ तब वह अमीर भी मर गया । लाजर तो मरकर बँकुण्ठको एवं वह अमीर नरकको गया । उसने जो नरकमेंसे दृष्टि उठाकर देखा तो लाजरको बँकुण्ठमें इबराहीमके गोदमें बैठे पाया । उसको देखकर

नौ कोषोंका विवरण

ईर्षा हो आई नरकसे उस अमीरने पुकारकर कहा कि, ऐ मेरे पिता! ऐ मेरे पिता !! ऐ इबराहीम !!! तू कृपा करके लाजरको मेरे समीप भेज दे । क्योंकि, मैं नरककी अग्निसे जल रहा हूँ, यदि लाजर मेरे समीप आवे मेरे मुंहमें उंगली दे तो मेरे शरीरकी जलन कम हो जाय । यह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, ऐ पुत्र ! तूने संसारमें बड़े बड़े सुख भोगे हैं, लाजरने केवल दुःखही दुःख उठाया है । अब इसकी पारी सुखभोगने तथा तेरी दुःख उठाने की है उस नरकके अमीरने कहा कि, ऐ पिता ! लाजरको संसारमें भेज दे कि, वह जाकर मेरे भाइयोंको समाचार दे कि मैं तो नरकमें आ पड़ा, अब वे लोग किसी तरहका पाप न करें, पुण्यमें चित्त लगावें, ऐसा न हो कि, उनको भी नरकमें आना पड़े । वह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, मूसा वहाँ उपस्थित है, यदि लोग उसकी बातें मानेंगे तो वे नरकमें न पड़ेंगे । उस नरकमेंके रईसने कहा कि, यदि मुरदोंमें से कोई जीवित होकर जावे संसारमें समाचार दे तो वे लोग कदापि दुष्कर्म न करेंगे, पर मूसाकी बातका उनको विश्वास न होगा । इस कारण लाजरको भेजना आवश्यक है । तब इबराहीमने उत्तर दिया कि, यदि उनको मूसाकी बातोंका विश्वास न होगा तो वे लाजरकी बातें भी नहीं मानेंगे ।

अब इस लाजरकी कहानीसे नरक तथा वैकुण्ठका जाना क्यामतके पहिलेसे प्रचलित होना प्रमाणित हो चुका । फिर महाप्रलयमें भलों और बुरोंके हिंसाबकी क्या आवश्यकता । केवल भ्रम तथा धोखा है । जिस समय कोई मरता है उसके लिये वैकुण्ठ, नरक तथा अन्यलोक उसी समय मिलते हैं, दूसरी क्यामत और हशरगाहके समयकी कोई आवश्यकता नहीं जब भलाई बुराईका हिंसाब हुआ तब आवागमन स्वतः ही सिद्ध होगया ।

२२-आवागमनपर कुरान-कुरानमें सुरतआराफ (८) सिपारा (४) रकूअ (२९) आयतमें लिखा है कि, तू कह मेरे रबने फरमाई दीनदारी और सीधे करो अपना मुंह हर एक नामजके समय केवल उसीके आज्ञाकारी होकर उसको पुकारो । जैसा तुमको पहली बेर बनाया फेर बनोगे ।

२३-कुरान सूरत नखल (१४) सिपारा (८) रकूअ (६५) आयतमें लिखा है कि, और अल्लाःने उतारा आकाशसे जल, फिर उससे जिलाया पृथ्वीको इससे मरने पीछे उसमें देते हैं उन लोगोंका जो मुनते हैं ।

अब इस आयतसे पृथ्वीका दूसरी बार पुनः जलसे प्रगट होना स्पष्ट होता है । उसमें पते हैं उनको जो मुनते हैं इससे तात्पर्य उन मनुष्योंसे है जिनका हृदय प्रकाशित है कि, पृथ्वीके पूर्व तथा वर्तमान अवस्थाओंसे विज्ञ हैं ।

आयु

२४—कुरानमें सूरै रुम (२१) सिपारा (२) रकूअ (११) आयतमें लिखा है कि, अलबत्तः बनता है प्रथम बार फिर उसको दोहरावेगा फिर उसके ओर फिर जाओगे ।

२५—कुरानमें देखो सुरै रूप (२१) सिपारा (२) रकूअ (११) आयत में लिखा हुआ है कि, निकलता है जीता मुरदेसे, निकलता है मुरदा जीतेसे, जिलाता है पृथ्वीको उसके मरे पीछे । इसी प्रकार तुम निकाले जाओगे ।

२६—कुरान सूरै रुम (२१) सिपारा (३) रकूअ (२७) आयतमें लिखा है कि, वही है जो प्रथम बार बनाता है । फिर उसको दोहरावेगा, आसान है उस पर उसकी कहावत, सबसे ऊपर आकाशमें और पृथ्वीमें वही है जबर-दस्त हिकमत वाला ।

२७—रोजतुलअहबाबमें लिखा है कि—

أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ نُوْرُ مُحَمَّدٍ

प्रथम खुदाने नूरमुहम्बदको पैदा किया दूसरी हदीसमें है कि—

أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ الْقَلَمَ

अर्थात् पहले खुदाने कलमको बनाया जिसमें लोगोंके भाग्यको लिखा तीसरे हदीसमें है कि—

أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ النَّقْلَ

अर्थात् सबसे पहले खुदाने बुद्धिको उत्पन्न किया जिसमें सोच समझ भाग्यको ठहरावें ।

इन तीनों हदीसोंसे तीन बातें प्रमाणित हुई हैं । इनमें से यदि एक सत्य मानोगे तो दूसरी मिथ्या ठहर जाती है । यदि तीनोंको सत्य मानोगे तो तीन बार उत्पत्तिका होना प्रमाणित होता है । जिससे अनगिनती बेर भी कहा जा सकता है क्योंकि, किसी सृष्टिमें मुहम्मदी तेज पहले उत्पन्न हुआ, किसीमें बुद्धि और किसीमें लेखनी पहिले उत्पन्न हुई ।

२८—आत्माका मोर और फल होनेके बाद बीबी एमनाके गर्भमें जाना—मुहम्मद साहबके नूरनामः में लिखा है कि, खुदाने मुहम्मद साहबकी आत्माको मयूरके स्वरूपमें बनाकर विश्वासके वृक्षपर बैठे दिया । पहले तो मुहम्मदके

तेजने मोरके देहमें प्रवेश किया, फिर उस आत्माने एक फलमें गमन किया, वह फल जिबराईल द्वारा अब्दुल्लाके समीप पहुँचा। वह फल अब्दुल्लाके वीर्यके मार्गसे बीबी एमनाके गर्भमें पहुँचा बीबी एमनाके गर्भसे आहजरत (मुहम्मद) पैदा हुये।

गुलजार मुहम्मद तथा हदीसोंमें यह कहानी लिखी है कि, एकबार खुदाने जिबराईलसे कहा कि, एक फल ला, तब जिबराईलने पूछा कि, ऐ खुदा! कौनसा फल लाऊँ। कुछ उत्तर नहीं मिला। फिर तीसरी बार आवाज आई कि, ऐ जिबराईल! एक फलला, फिर जिबराईलने कहा कौन फल लाऊँ। इतनेमें एक ऐसी आँधी आई कि, जिबराईल उड़ गया। न जाने वह किस देशमें जा पहुँचा। एक बगीचेके द्वार पर जा खड़ा हुआ। जब जिबराईलने अपनेको इस बगीचेके द्वारपर खड़ा पाया तब बगीचेके द्वारपालसे प्रार्थना की कि, मुझे बगीचेके भीतर जाने दे। बगीचेके द्वारपालने पूछा कि, तू कौन है? उसने उत्तर दिया मैं जिबराईल हूँ। द्वारपालने कहा कि, सहस्रों जिबराईल हैं उनमेंतू कौन है। जिबर ईलने अपना पता बताया कि, मैं वह जिबराईल हूँ जो खुदाके समीप खड़ा रहता है। उस द्वारपालने बगीचेके भीतर जाने दिया। जब जिबराईल बगीचेके भीतर गया तब क्या देखता है कि, सहस्रों प्रकारके फल लटक रहे हैं वह बगीचा भली-भाँति हरा भरा हो रहा है। सब फल तथा मेवे जो वहाँ हैं सो सब खुदाकी वन्द-नामें संलग्न हैं, खुदाका नाम ले रहे हैं। सब फलोंमें एक फल सबका सरदार तथा गुरु जान पड़ता था। उसी श्रेष्ठ फलके आदेशसे सब फल खुदाका नाम लेते हुए वन्दनामें संलग्न थे। जब जिबराईलने यह कौतुक देखा तब अपने मनमें ऐसा विचार किया कि, यह फल जो सब फलोंमें बड़ा है उसीको तोड़कर ले चलूँ। उस फलको तोड़कर ले आकाशपर उड़ गया उड़ते हुये राहमें वह फल उसके हाथसे गिर गया अरबके मक्का नामक नगरमें जा पड़ा बड़े तड़के अब्दुल्ला नामक एक मनुष्य सड़क परसे चला जाता था, उसने उस फलको देखा, उठाकर अपनी जेबमें रख लिया जेबमेंसे वह फल अब्दुल्लाके शरीरमें समा गया अथवा उसने खा लिया। उस समय उसका शरीर तथा चेहरा कान्तिसे दमकने लगा अब्दुल्लाके वीर्य द्वारा बीबी एमनाके गर्भमें मुहम्मदी तेज आया, बीबी एमनाका शरीर तेजमय होगया, कान्तिसे जगमगाने लगा। नियत समयपर मुहम्मद साहिबने जन्म लेलिया।

अब उधरका वृत्तान्त सुनो कि, जिस समय वह फल जिबराईलके हाथसे छूटकर गिरा खाली हाथ जिबराईल खुदाके निकट गया निवेदन करने लगा कि,

१८ अध्याय । पुनर्जन्म

ऐ खुदा ! मैं अमुक स्वरूपका एक फल लाता था । वो फल मेरे हाथसे छूटकर गिर पड़ा । तब खुदाकी ओरसे आवाज आई कि, ऐ जिबराईल ! मत घबरा, क्योंकि, वह फल जहाँ पहुँचने को था पहुँच गया, तेरा काम हो चुका । वे सब फल जो उस बागमें थे वे तो मुहम्मदके पीछा करनेवाले हैं सबसे श्रेष्ठ फल स्वयम् मुहम्मद साहब रसूल अल्लाह हैं ।

पहले मुहम्मदसाहबकी आत्मा मयूर पक्षीके शरीरमें गयी, फिर उस फलमें, इसके उपरान्त बीबी एमनाके गर्भमें । यह तीनों बेरका आवागमन प्रत्यक्ष हदीसोंमें लिखा है इनके अतिरिक्त जो अनगिनती बेर उनकी आत्माने किन किनके बीचके समय समयपर आवागमन किया है उसका हाल परमात्मा जाने ।

२९—शैतानका आवागमन—तफसीर अजीजी इत्यादिसे प्रगट है कि, जिस समय खुदाने आदमको अदनकी वाटिकामें रखा था उस समय जिबराईलको ऐसी आज्ञा दी थी कि, आदमका पेट फाड़ डाले आधा रक्त तथा शैतानी हृदय पृथक करे । जिबराईलने ऐसाही किया । आधा शैतानी रक्त और आधा हृदय आदमके पेटसे पृथक किया, आधा उसके भीतर रहने दिया । जब वह आधा रक्त तथा कलेजा आदमके पेटसे निकालकर अदनकी वाटिकाके एक कोनेमें गाड़ दिया । उसी शैतानी रक्त तथा हृदयसे गेहूँका वृक्ष उत्पन्न हुआ । उसीके फल खानेके लिये खुदाने वर्ज्य था । वह आधा शैतानी रक्त तथा हृदय आदमके भीतर रह गया था । जिससे शैतानी धूर्त और अत्याचारिणी सृष्टि उत्पन्न हुई । वह दूसरा आधा जो स्वच्छ हुआ था उससे अच्छे लोग उत्पन्न हुये । इससे प्रमाणित हुआ कि पहले शैतान आदमके भीतर था, इसके उपरान्त रक्त तथा हृदयके साथ गेहूँमें प्रवेश कर गया । जब आदमने उस गेहूँके दानेको खाया—तब शैतानने आदमकी बुद्धि विलुप्त कर दी, विजयी हुआ आज़ोल्ले—घनके पहले शैतान बाहरी स्वरूप धरकर धोका देता था फिर भीतर तथा बाहर ये आदम तथा आदमजादको धोका देने लगा वे सब शैतानके वशीभूत हुये ।

३०—समीक्षा—पूर्व लिखित प्रमाणके अनुसार खुदाने सबसे पहले मुहम्मदके तेजको उत्पन्न किया, एक विश्वासका वृक्ष भी उत्पन्न किया । उसके ऊपर मुहम्मदकी आत्माको मयूरके स्वरूपका बनाकर बैठा दिया, वह उस वृक्षपर बैठकर सत्तर सहस्र वर्ष पर्यन्त तपस्या करता रहा, पहले तो यही असम्भव है कि, पवित्रात्मा खुदाकी वन्दना करे क्योंकि, उसे प्रार्थना की आवश्यकताही नहीं होती, खुदावन्दना तथा आशिक और माशूक, केवल अपवित्र आत्माओंमें हैं । जब आत्मा अपने पूर्वकम्मासे अपवित्र होती है तब उसे प्रार्थनाकी

हजरत आदम

आवश्यकता होती है। जब कर्मका पाश होती है तब देहके साथ सब काम और बन्दना किया करती है। बिना देहके आत्मा कुछ कर नहीं सकती। दूसरे यह लिखा हुआ है कि, मुहम्मदकी आत्माको फानूसमें रक्खा। यह बात भी असम्भव है कि, पवित्रात्मा फानूसमें कैंद रहे, आत्मा कदापि कैंद नहीं हो सकती। यह कदापि सम्भव नहीं कि, पवित्रात्मा एक नियमित समय तक अधीन और बन्धनमें पड़ी रहकर बन्दना किया करे। आत्मा सदैव स्वतंत्र और स्वाधीन है इसको केवल इसके कर्मोंकी अपवित्रताही बन्धनमें डालती है। तीसरे यह लिखा है कि, मुहम्मदके चारों ओर सब आत्मायें फेरा दिया करती थीं। तीसरी यह कि, सब रूहें रसूल खुदाकीरूहके चारों ओर सत्तर सहस्र वर्ष पर्यन्त फिरा करती थीं। कोई आवश्यक नहीं कि, अन्यान्य आत्मायें मुहम्मदकी आत्माके चारों ओर घूमें। क्योंकि, उत्पत्तिके आरम्भमें किसी आत्मामें उँचाई निचाई नहीं होती। सब समान रूपकी पवित्र तथा स्वच्छ होती हैं। चौथे यह लिखा है कि, उत्पत्तिके पहले समस्त आत्माओंने मुहम्मदकी ओर देखा। मुहम्मदकी आत्माके अङ्गकी ओर सभीोंने जब देखा तब जिसकी दृष्टि जिस अङ्गपर पड़ी उसका स्वरूप तथा स्वभाव वैसा ही हो गया। देखो ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें मैं पहले लिख चुका हूँ।

यह बातभी बेजड़ जान पड़ती है। क्योंकि, आत्माके तो कोई अङ्ग नहीं। फिर आत्मायें देखेंगे क्या? पाँचवें लिखा है कि, उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सब आत्माओंका भाग्य स्थिर हुआ। मुहम्मद साहबकी आत्माकी ओर देखनेसे वे कैसे भले बुरे हो सकते हैं? उनका भाग्य तो पहले ही स्थिर हो चुका है, मुहम्मदकी आत्माकी ओर देखनेसे कोई लाभ तथा हानि नहीं है। छठवेंमें लिखा है कि, मुहम्मदकी आत्मा दश भागोंपर विभक्त हुई। जिससे पृथ्वी तथा आकाशादि सब कुछ बनाया गया। यह बात भी बुद्धिमें नहीं बैठती कि, पवित्र आत्माके भाग हो सके। पवित्रात्मा बांटी नहीं जाती, उसको कोई विभक्त नहीं कर सकता। खुदा अथवा बन्दा किसीमें सामर्थ्य नहीं कि, उसको बाँटे। इस आत्मामें लम्बाई चौड़ाई गहाराई इत्यादि कुछ नहीं यह भेदी भी नहीं जा सकती। इस कारण इन प्रमाणों द्वारा यह बात भलीप्रकार सिद्ध हो चुकी कि जिसे मुसलमान मुहम्मदी तेज कहते हैं वह कर्मोंसे शुद्ध नहीं था। पूर्वजन्मके कर्म तथा भलाई बुराईसे भरा हुआ था। वह मुहम्मदी तेज सूक्ष्म शरीर था। क्योंकि, दो प्रकारके शरीर हैं। एक स्थूलशरीर तथा दूसरा सूक्ष्म शरीर है। इसीको आधिभौतिक और अन्तर्वाहक देह भी कहते हैं। यह स्थूल और लिंगदेह

दोनों कर्मोंके बन्धन हैं, उनका सदैव आवागमन हुआ करता है। आधिभौतिकसे अन्तर्वाहक और अन्तर्वाहकसे अधिभौतिक हुआ करता है। इसी प्रकार इसका सदैव आवागमन हुआ करता है। इसस अब स्पष्ट प्रमाणित हो चुका कि जिसको मुहम्मदी पवित्रात्मा समझते हैं वह अपने पूर्वजन्मोंके कर्मोंसे अशुद्ध लिंग देही थी, अनगिनती जन्मोंके कर्मोंमें बराबर बँधी चली आती थी। कर्मका बन्धन देहके बिना नहीं हो सकता। कितने जन्म पूर्वसे मुहम्मदकी आत्मा आवागमन करती चली आती है एवं भविष्यको भी करेगी इसको भ्रम तथा भूलसे मनुष्य पवित्रात्मा समझते हैं।

३१-भाग्यानुसारी वस्तु-मुहम्मद साहबने अपनी उम्मतको यह सिखलाया कि, खुदाने सबके भाग्यको पृथ्वी और आकाशकी उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्वसे ही स्थापित किया है। यह वृत्तान्त मशकात बाबुलतकदीर अबदुल्लाह, इब्र मुसल्लमकी हदीस और उनके विश्वासमें यों लिखा है :—

وَالْقَدَرُ بِأَخْلَدٍ حَتَّى مِنْ اللَّهِ تَقَالِي

अर्थात् भलाई तथा बुराई भाग्यमें खुदाकी ओरसे होती है। इसी बातम मुसल्लमसे यह हदीस है।

قَالَ كُتِبَ عَلَى الْإِنْسِ أَدَمُ نَصِيبُهُ مِنَ الزَّانِ مَدَّةُ الْأَحَالَةِ

अर्थात् लिखा गया है खुदाकी ओरसे मनुष्यका भाग। व्यभिचारमें सो वह अवश्यही करेगा। फिर इसी बाबमें अबीदरबाका कथन है :—

اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ دَرَجَةٌ إِلَى كُلِّ عَبْدٍ مِنْ خَلْقِهِ مِنْ حُسْنِهِ مِنْ الْجَلِيلِ وَعِلْمِهِ وَمَجْدِهِ وَآثَارِهِ وَرِزْقِهِ

अर्थात् वन्दाके विषयमें पाँच बातोंमें खुदा निश्चित हो चुका है। मृत्यु, कर्म, स्थिति, फिरनेका स्थान, रोजी। इस विश्वासको हृदयस्थ करनेके निमित्त इतना आग्रह है कि, तकदीरसे विमुखता करनेवालोंसे मुसलमानका व्यवहार रखना भी अनुचित है। इसी विषयमें इब्रउम्रका कथन है। फरमाया हजरतने कि, तकदीरको न माननेवाले लोग मेरी उमतके मजूसी (एक फिरका) लोग हैं यदि वे रोगी हों तो उनका हाल भी न पूछो यदि वे मर जाय तो उनके शवके साथ भी मत जाओ।

हजरत नूह

तफसीर काबानीमें आया है कि, खुदा प्रतिदिवस तीन सौ साठ बार लौह महफूज पर दृष्टि करता है। जो चाहता है वह मिटा डालता है जो चाहता है बना देता है।

तफसीर हुसेनीमें लिखा है कि, जिस समय कुछ रात शेष रह जाती है तब खुदा लौह महफूज पर दृष्टि डालकर जो चाहता है वही बना देता है।

अबदुल्ला बिन अब्बास भी कहता है कि, खुदाने जो मुकद्दर किया है उसमें कदापि बदल बदल नहीं हो सकती। परन्तु रिजक, भौनस, सआदत और शकावतमें।

फखरुद्दीनने तफसीर कबीरमें लिखा है कि, आयत महो और असबातमें दो कौल हैं। प्रथम तो यह कि, महो और असबात दो वस्तुओंमें संयुक्त हैं। जैसे खुदाताला महो करता है रोजी और ज्यादा करता है। रोजी अजल, सआदत, शकावत, कुफ्र और ईमानकी भी यही दशा है। दूसरी यह कि, खुदा बन्दोंका हिसाब लिखता है। अतः जिस समय बन्दाने तोबा की तो वह तुरन्त ही उसका दोष मिटा देता है। जब वह दान देता है तुरन्त ही उसका कष्ट निवारण कर देता है।

समीक्षा—अब यहाँ विचार करना चाहिये कि, ऊपर लिखी पाँच बातोंपर समस्त व्यवहार परमार्थका आधार है। इन पाँच बातोंसे खुदाका कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर किन बातोंसे उसका सम्बन्ध रखना समझा जावे, पाँचों बातें हमारे मायानुसार हैं फिर खुदा कौन है और हमसे क्या सम्बन्ध रखता है। किस बातमें हमारी सहायता कर सकता है? यह नहीं मालूम कि, मुहम्मदी भाग्यको क्या समझते हैं। आपहीतो खुदाको हमारे कार्योंसे अलग और बेत-अलुक बताते हैं आपही कहते हैं कि, खुदाने उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सबका भाग्य ठहरा दिया है। यह कैसे भ्रम तथा भूलकी बात है। फिर ऐसे अन्यायी खुदाकी बन्दना कौन करे। जब खुदाने पूर्वसे मनुष्यका भाग्य लिख रक्खा तो फिर अलग अलग कैसे ठहरा। किसीको भला तथा किसीको बुरा किस कारण बनाया यह अन्याय, क्यों किया। मुसलमान बेसमझीके धोखेमें पड़े हैं। यदि वे पूर्व देहसे उस देहमें आवागमन भी स्वीकार करें तो वस्तुतः उनकी बातें ठीक ठहरतीं।

३२—कयामतके दिनकी तीनबातें—कयामतके दिनके विषयके बाबमें तीन बातें लिखी हैं। प्रथम कहा है कि, कयामत (महाप्रलय) का एक दिन

पचास सहस्र वर्षके समान होगा । दूसरे स्थानमें लिखा है कि, एक सहस्र वर्षका होगा । फिर तीसरे स्थानमें लिखा है कि, पल झपकते कयामत (महाप्रलय) बीत जावेगी । यह तीनों बातें स्वीकार की नहीं जा सकतीं । जबतक तीन बार उत्पत्तिका होना स्वीकार किया न जावे । इसका तात्पर्य तो यह है कि, कयामत (महाप्रलय) का दिवस तो अवश्य ही पलके पलमें बीत जावेगा । कभी तो कयामत (महाप्रलय) के पीछे पचास सहस्र वर्षके उपरान्त संसारकी उत्पत्ति होती है और कभी सहस्र वर्ष पीछे । कभी कयामत (महाप्रलय) के उपरान्त उसी समय तनिक भी विलम्ब नहीं लगता । नवीन सृष्टि प्रगट होती है । अनेक कालतक शून्य रह जाता है । यही बात स्वीकार किये जाने योग्य है । इसी प्रकार बारम्बार उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश हुआ करता है । सब जीवोंका आवागमन लगातार चलता रहता है ।

३३—सालिग्राम पूजनेकी प्रतिज्ञा—तफसील मदारकमें लिखा है कि, मीसाकका अर्थ प्रतिज्ञा है । खुदाने आदमको उत्पन्न करके बैकुण्ठमें प्रविष्ट होनेको पहिले बैकुण्ठके द्वारके सामने यह प्रतिज्ञा कराई थी । पर मुबारजुलन-बौवतमें लिखा है कि, भिहिश्तसे निकालनेके समय यह प्रतिज्ञा कराई गई थी । मदारकके अनुसार कदाचित् यह प्रतिज्ञा नाअमानमें ली गयी थी जो उरफातके निकट मक्कामें है, अथवा स्थान नेहारमें लीगई थी जो भारतवर्षमें कोई स्थान है । मआलमबकौलकलबी मक्का और तायफमें यह प्रतिज्ञा ली गई थी । उस प्रतिज्ञाका स्वरूप यह है कि, जब आदम मक्कामें हूज्ज करने गया तब उरफान पर्वतके पीछे मानमें सो गया । खुदाने अपनी कुदरतका हाथ उसकी पीठपर लगाया । आदमके समयसे महाप्रलय तक जो मनुष्य उत्पन्न हुये होते और होंगे चिउंटीके स्वरूपमें सृष्टि कर्मानुसार सब तुरंत बाहर निकल पड़े । उसी समय वे सब युवक बुद्धिमान हो गये । जब वे सब तरुणावस्थाकी पहुँचे उस समय खुदाने पूछा कि, क्या मैं तुम्हारा पालक नहीं हूँ ? वे बोले, कि, तू हमारा पालक है । अतः प्रतिज्ञा यही थी कि, तू हमारा खुदा और हम तेरे सेवक हैं । सभीोंने यह बात स्वीकार करली । खुदाने यह प्रतिज्ञा आदमजादसे ली । उस काले पत्थरको जो काबा घरमें है उनके हाथमें दिया । उस पत्थरको उनके हाथमें सौंपके फिर सभीसे कहा कि, अब तुम मुझको दण्डवत् करो । काले पत्थरको हाथ लगाओ । पर बहुतोंने दण्डवत् किया, बहुतोंने नहीं किया, यह पहली दण्डवत् हुई । दूसरी दण्डवत्में कितनोंने जो नहीं किया था पछताकर दूसरी दण्डवत् की, उनमेंसे कितनोंने : १ पहले किया दूसरोंने नहीं किया । इस कारण चार

समीक्षा, हजरत इब्राहीम हजरत इसहाक

प्रकारके लोग हो गये। जिन्होंने पहले दोनों दण्डवतों की थीं, वे इमानदार होकर जीते एवं ईमानसेही मरते हैं। दूसरे वे जिन्होंने न पहली दण्डवत की और न दूसरी वे काफिर होकर जीते और काफिर होकरही मरते हैं। तीसरे वे लोग हैं जिन्होंने पहली दण्डवत कीनी दूसरी नहीं की वे ईमानदार होकर जीते तथा काफिर होकर मरते हैं। चौथे वे लोग हैं कि, जिन्होंने पहली दण्डवत न की दूसरीकी, वे काफिर होकर जीते और ईमानदार होकर मरते हैं। इसके पीछे संसारके सब उद्यम दिखलाये गये। जिसने जो चुन लिया वही उसका उद्यम होगा। फिर सब आत्मायें गुप्त परदेमें विलुप्त होगईं। एक बार उत्पन्न हो चुकीं दूसरी बार उसीके अनुसार उत्पन्न होकर मरती जाती हैं।

समीक्षा—अब यहाँ विचारना उचित है कि, पूर्व जन्मके कर्मही खुदा तथा बन्दः को पृथक् २ करते हैं। सब मनुष्योंने इस कारण न्यारी न्यारी रीति-योंपर दण्डवतें कीं। क्यों कि, उनकी आत्मा पूर्वकर्मोंसे दूषित थीं। पूर्वकर्मके बिना भिन्न भिन्न प्रकारके विचार नहीं हो सकते कर्म बिना देह भी नहीं हो सकती। अतः वे सब आत्मा पूर्वकर्मोंसे निर्दोष कही नहीं जा सकती। यदि उनमें पूर्वजन्मका दोष न होता तो वे निश्चय एकही रूपसे दण्डवत करते।

सभी जीवोंकी यही दशा है कि, महाप्रलयके समय सब ब्रह्मसे जा मिलते हैं। इसी प्रकार फिर उत्पत्तिके समय ब्रह्म सत्तासे सबकी उत्पत्ति होती है। आदमकी पीठ ही गुप्त संसार है। इसी प्रकार उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश हो जाया करता है। सदैव आवागमनका सिलसिला चला जाता है, अब यह बात प्रमाणित हुई कि, खुदाने उनको पत्थर पूजना बताया वह काला पत्थर उनके हाथमें दिया कि वह महाप्रलयके दिवस उनकी भलाई बुराईके हिसाबकी साक्षी देगा। इसी पत्थरकी पूजा आजतक हिन्दू तथा मुसलमानोंमें प्रचलित है, सब पूजते चले आते हैं। मुसलमान उसे सङ्ग आसूदके नामसे पूजते हैं। यद्यपि पूजनेकी रीति न्यारी है। पर दोनोंकी एकही बात है। जो आत्मायें उत्पत्तिके आरम्भसेही मूर्तिपूजक हुईं वे कर्मोंसे पृथक् कैसे मानी जा सकती हैं? सङ्ग आसूदको ही सालिग्राम कहते हैं।

३-४यथार्थ तालपर्य—पहले लिखा है कि, उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सर्व आत्माओंका भाग्य ठहराया गया। फिर कहा है कि, महाप्रलयका दिवस पचास सहस्र वर्षका होगा। इन दोनोंका एकही तात्पर्य है कि, महाप्रलयसे पचास सहस्र वर्ष पीछे फिर उत्पत्ति होती है सर्व आत्मायें निजकर्मनुसार जुदी २ योनियोंमें आवागमन किया करती हैं भिन्न भिन्न स्वरूपोंमें वेही सब अत्मायें पुनः दिखाई देती हैं। उसका यथार्थ तात्पर्य यही है।

हजरत याकूब या इसराईल याकूबका ब्याह

३५ वैकुण्ठका पक्षी होना—बीबी आयशा सद्दीकासे कहावत है । आयशा कहती हैं कि, एकबार किसी मित्रकी ताबूतके साथ हजरत रसूलल्लाहको नमाज पढ़नेके लिये बुलाया । उस समय आयशाने कहा कि, ऐ रसूलल्लाह ! हर्षित हो कि, वह बालक वैकुण्ठके पक्षियोंमें से एक है । इस कारण कि, उसने कुछ बुरा काम न किया था तब नबीने उत्तर दिया कदाच ऐसा न हो । क्योंकि, खुदाने उनको पिताके वीर्यके साथ ठहराया है । नरकी तथा वैकुण्ठी वीर्यके साथही ठहरें हैं और उसी भाग्यके अनुसार नरक तथा वैकुण्ठको जावेंगे ।

अब इन कथनोंसे प्रगट हुआ कि, मुहम्मद साहबको मालूम नहीं था कि, वह लड़का वैकुण्ठका पक्षी होगा अथवा नहीं । वह बालक जो अनजान था उसके विषयमें मुहम्मद साहबने अपनेको अनभिज्ञ बताया । फिर कहा है, भोले बच्चे वैकुण्ठको जाते हैं । यह बात भी कुछ ठीक मालूम नहीं होती । दूसरी यह बात भी प्रगट हुई कि, अच्छे मुहम्मदी मर मरकर पक्षी तथा पशु होते हैं । चाहे वे वैकुण्ठके ही क्यों न हों । भलाजी, जब कोई मनुष्यसे पक्षी हो जावेगा तब उसकी दशा अच्छी कैसे समझी जावेगी ? क्योंकि, मनुष्यकी देहमें तो ज्ञान होता है पशु पक्षीकी देह तो पूर्णतया अन्धकारमें रहती हैं । जो वैकुण्ठका पक्षी हुआ तो क्या लाभ हुआ ।

३६ पूर्वके प्रेम आदि—मुहम्मद साहबने प्रेमके विषयमें इस प्रकारसे कहा है । सुन्नरों मशकानुल, बाबुलहब्ब फौअल्लाह, आवशासे मुसल्लसका कहना है कि, संसारमें आने उत्पन्न होनेसे पूर्व सब मनुष्योंके रुहकी एक एकत्रित सैन्य थी । जिन आत्माओंमें वहाँ सम्बन्ध और मैत्री थी । अब यहाँ भी उनमें प्रेम है जिनमें वहाँ वैमनस्यता थी उनमें यहाँ भी मिलाप नहीं होता है ।

यह सोचनेकी बात है कि, रुहमें मैत्री विरोध तथा प्रेमादिका होना सम्भव नहीं हो सकता । क्योंकि, ये सर्व शरीरके धर्म हैं, रुहके नहीं हो सकते, सब कामनायें शरीरमें ही होती हैं, रुहमें नहीं होतीं । पवित्रात्माको कौन वशी-भूत कर सकता है ? इससे प्रमाणित होता है कि, मुसलमान लोग सूक्ष्म शरीर-की ही रुह कहते हैं—जो कि अपने पूर्वकर्मोंसे सदा परिपूर्ण रहता है ।

३७ भाग्य—मुसल्लम बिनयसारका कथन है कि, हजरत रसूलल्लाहने फरमाया कि, वास्तवमें खुदाने आदमको उत्पन्न किया, अपने हाथसे उसकी पीठको छुवा, उससे एक कौम (जाति) निकली । आदमसे कहा कि, मने यह जाति वैकुण्ठके लिये निकाली है । उनके सर्व कार्य वैकुण्ठके जानेवालोंकेसे होंगे, फिर खुदाने आदमकी पीठको दूसरी बेर बांये हाथसे छुआ, उससे दूसरी

हजरत मूसा

जाति निकली, तब खुदाने आदमसे कहा कि, इस जातिको मैंने नरकमें रहनेके लिये निकाली है। इनके सर्वे कार्य नरकमें जानेवालोंके समान होंगे। फिर अबदुल्लाऽइब्र उम्रका कथन है कि, एकबार रसूलल्लाह दो पुस्तकें दोनों हाथोंमें लेकर निकले मुझसे पूछा तुम जानते हो कि, यह कौसी पुस्तकें हैं ? मैंने कहा, नहीं आप मुझको बताइये। आपने कहा कि, जो मेरे दहिने हाथमें किताब है उसमें वैकुण्ठमें रहनेवालोंके नाम हैं। यह खुदाकी ओरसे है, इसमें वैकुण्ठके जानेवाले सर्वे मनुष्योंके नाम, उनके बाप दादोंके नाम और उनकी जातिके लोगोंके नाम इसमें लिखे हैं, साथही संख्या भी लिख दी है, इसमें न्यून तथा अधिक न होंगे। दूसरी पुस्तक जो मेरे बाँये हाथमें है इसमें उनके बाप दादों तथा जातिके नाम सहित नरकमें जानेवालोंके नाम लिखे हैं। नीचे संख्या भी दी है कि, इससे अधिक अथवा न्यून न होंगे, यह पुस्तक भी खुदाकी ओरसे है।

इससे यह तो प्रमाणित हो चुका कि, भाग्य निश्चित है। इसमें बाल बराबर भी विभिन्नता न हो सकेगी। सब मनुष्य स्वस्वभाग्यानुसार बुरे-भले हैं अब किसीको कुछ करना कराना रह नहीं गया। दूसरा सन्देह यह उत्पन्न हुआ कि, जब वैकुण्ठवासी रूहोंके सम्बन्धी और मित्र उनकी सिफारशसे वैकुण्ठ पावें, तो हजरत रसूल अल्लाहके स्वजन बाप दादे माता इत्यादि नरकके योग्य कैसे होंवें ? उनको भी रसूल अल्लाहसे लाभ उठाना उचित है।

वस्तुतः हमारे पूर्वकर्मोंने हमारा भाग्य ठहराया है कर्म करनेके लिये हम पूर्वकालमें शरीर धारण किये हुये थे, पूर्वकर्मानुसारही अब देह हुई है। यदि हमने अपने भाग्यके अनुसार सब कार्य अपने देहके पूरे कर लिये तबतो हमारे ऊपर कोई दोष रह नहीं गया, न हमको महाप्रलयके दिवस किसी प्रकार हिसाब किताब देनेकी आवश्यकता है न हम भले बुरे हैं वरन् हमारे बदले हमारा खुदा भला बुरा ठहरेगा दोष उसी पर थोपे जावेंगे हम बाल बाल बच जावेंगे यदि हम निर्दोषोंको खुदा दोषी ठहरावेगा तो आपही दोषी होगा। न्यायी नहीं कहला सकता। इस कारण यह सब बातें भ्रम और धोखेकी हैं। खुदा कदापि पापी नहीं है। हमारे कर्मही हमें भला बुरा बनाते हैं, खुदाका क्या दोष है ? हम आवागमन करते आये हैं और सदा करते जावेंगे जब तक कि, मोक्ष न होगा।

३८-हजरत शेख सादीका कौल

सगे असहाबे कहफ़ रोज़े चन्द ।
पथेनेकां गिरफ़्त मरदुम शुद ।

हजरत मूसा और ख़ाजा खिज़्र

रोजतुस्सफाके प्रथम भागमें लिखा है कि, जो पहले अलियास था बही फिर अदरीस होगया ।

३९-शेख फरीदुद्दीन अत्तार

हज़ार बार खमों कूजः करदः अन्द मरा ।

हनोज तलख निज़ाजम मर्ग शीरो जे कार ॥

अर्थात् सहस्त्र बार मुझको सुराही तथा प्याला बनाया है तो भी अभी तक मेरा स्वभाव कड़वा है मृत्युके मीठे कार्य्यसे तात्पर्य आवागमन है ।

४०-मीसाक अर्थात् प्रतिमाके विषयमें जो पहले मैं लिख आया हूँ कि, खुदाने जब हजरत आदमको उत्पन्न किया उस समय जादमाकी सब सन्तानोंको उसकी पीठसे निकालकर प्रतिज्ञा ली उनके हाथमें एक काला पत्थर दिया । इससे प्रमाणित हो चुका है कि, हजरत आदमको उत्पत्तिके समय वह काला पत्थर था ।

इब्र अम्बास—कहता था कि, फरमाया रसूलल्लाहने कि, जब उत्तरा हजतुल-आसूद भिहिश्तसे, तब उस समय वह दूधसे भी अधिक श्वेत था । पर मनुष्योंके पापने उसको काला बना दिया ।

संग आसूदका काला होना—रसूलल्लाहने फरमाया कि, वह पत्थर श्वेत था दूधसे भी अधिक । यह बात नहीं जान पड़ती कि, वह पत्थर कब श्वेत था । क्योंकि वह तो हजरत आदमके उत्पत्ति कालसे काला था, कालाही पत्थर खुदाने मनुष्योंको दिया । इससे प्रमाणित हुआ कि, वह पत्थर किसी काल और किसी दूसरी सृष्टिमें जिससे रसूलल्लाह अनभिज्ञ थे दूधसे अधिक श्वेत रहा होगा । परन्तु इस सृष्टि इसके पिता आदमके समयसे तो वह पत्थर कालाही चला आता है । उसके श्वेत होनेका कोई कारण नहीं है । हजरतके इस कथनसे उत्पत्तिके अनेक ढङ्ग और आवागमन प्रमाणित हैं ।

सिद्धिका नाश—बलअम बाऊर जिसका हूदीसमें विवरण है बरन तौरी-तमें भी निम्नलिखित रूपसे वृत्तान्त लिखा है कि, मूसाके पीछे आपका स्थानापन्न ईशू हुआ । वह बनीइसराईलका आचार्य था, खुदाने उसको बरकत देकर कहा था कि, मैं तुझको कनओं देशका राज्य दूंगा । ईशू खुदाके सहायतासे अपने सर्व वैरियोंपर विजय पाता चला आता था । जब बालक शाहसे उसका सामना हुआ तब पूर्वोक्त बालकने बलआम जिसको बलअमबाऊर भी कहते हैं उससे कहा कि, तू मेरे लिये प्रार्थना कर, जिसमें ईशूकी पराजय हो । यद्यपि बलआमने बालकशाहको समझाया कि, इस जातिको खुदाने बरदान दिया है, मैं कैसे उसे

मूसा और मौत

शाप दूँ ? तब बालकशाहने बलआमको बहुतसा द्रव्य तथा उत्तमोत्तम भेंट भेजे । बलआमके मनको अपने वशमें कर लिया । बलआमने ईशको शाप दिया तीन बार ईश परास्त हुआ । उसने खुदासे निवेदन किया कि, ऐ खुदा ! तूने इस जातिको वरदान दिया । अब परास्त क्यों किया ? तब आवाज आई कि, ऐ ईश तेरे लिये बलआम शाप देता है इस कारण तू पराजित हुआ है । ईशने प्रार्थना की, कि ऐ खुदा ! बलआमकी तपस्याका सब बल नष्ट करदे । तब बलआमकी सब सिद्धाई जाती रही ।

पूर्वजन्मका कुत्ता—यह बलआम पूर्वजन्ममें असहाक कहफका कुत्ता था । अपने पूर्वकालके शुभकर्मोंसे बलआमकी देहमें आतेही इसने बड़ी भक्ति की पर्वतोंकी गुफाओंमें जाकर बन्दना करता था तीनसौ बरसका सिद्ध था । ईशके विरुद्ध होनेसे उसकी सिद्धाई तो विलुप्त होगई पर खुदाने उसपर दया की वह वैकुण्ठको गया । मुसलमानी पुस्तकोंमें मैंने पढ़ा था कि, यह मनुष्य बड़ा विद्वान था । इसी प्रकार मनुष्यके शरीरमें पशु आवागमन करते हैं । मनुष्यके शरीरमें आकर सुकर्म करते हैं तो वैकुण्ठको जाते हैं, कुकर्मोंसे चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं नरकको भी चले जाते हैं । आवागमनके सम्बन्ध कभी भी नहीं टूटता, तुदफये असनाय अशरामें लिखा है यही हदीदमें भी आया है कि, असहाक कहफके कुत्तेकी रूह बल अमबाऊर (जिसमें मूसाके विरुद्ध बनी इसराईलको शाप दिया था) के चोलामें प्रवेश करके विहिश्त गये ।

४१ इस्लामी फिरके—करावत, कामला, मनसूरिया, मुफसिसला आदि सब फिरके तनासुखको मानते हैं उसको सभी स्वीकार किये बैठे हैं मुसलमानोंका मुतना सिखिया फिर्का कहता है कि, आत्माका बराबर आवागमन होता है ।

४२—मुहम्मदियोंका ग्यारहवां फिरका जो राजियाके नामसे प्रसिद्ध है । इस राजीअ जातिके लोग कहते हैं कि, हजरतअली पुनः संसारमें आवेंगे अभी वे बादलमें हैं ।

४३—मुसलमानोंके अठत्तरवें फिर्काका नाम तयारिया है । उनका विश्वास यह है कि, हजरत आदममें खुदाकी आत्मा थी । जब मनुष्यकी आत्मा देहसे निकल जाती है फिर दूसरे शरीरमें होकर संसारमें आया जाया करती है ।

४४—मुहम्मदियोंका छियासीवां फिर्का इसमाईलियाके नामसे प्रख्यात है । तारीखनिगारिस्तान और तारीख गिरिन्दा और विशेषतः जीन तुलतारीखमें लिखा है कि, इस जातिका विश्वास है कि, कुरान मनुष्यकी बनावट है किसी पक्के जालसाजद्वारा बनी है । क्योंकि, इसमें मिथ्याको सत्यके साथ

ऐसा मिलाया है कि, बिना भली प्रकार ध्यान दिये प्रत्येक मनुष्य उसको समझ नहीं सकता, मनुष्यहीकी आत्मा जब एक शरीर छोड़ती है तब दूसरी और तीसरी ओर अनगिनती देह धर धरके पुनः संसारमें आया जाया करती है।

४५ मुहम्मद बोध—कबीर साहबके ग्रन्थ मोहम्मद बोधमें लिखा है कि, मोहम्मद साहब पुनः उत्पन्न होंगे, उनको सत्यगुरुका उपदेश मिलेगा वे मुक्ति पावेंगे। इस बातपर नानक साहबकी साखी है। देखो नानकशाहकी जन्मसाखीमें लिखा है। जब नानकशाह भक्का गये थे उस समय मरदाना मीरासीसे कहा कि, मुहम्मद साहब पन्द्रह सौ वर्ष तक बैकुण्ठ में रहकर फिर पृथ्वीपर आकर एक शूद्रके गृहमें जन्म लेंगे। उनको परलोकी सत्यगुरु मिलेगा। उस गुरुकी दयासे वे परमधाम सिधारेंगे। यहाँ दोनों प्रतिष्ठित महापुरुषोंके कथनानुसार मुहम्मद साहबका आवागमन प्रमाणित होता है।

४६ प्रकृति नहीं बदलती—मनका विचार बदलनेके विषयमें मशकात किताब बाबुल ईमान अजाबुलक़ब्र अहमदसे रवायत अबीदरवासे इस प्रकार लिखा है कि, यदि तुम सुनो कि, एक पर्वत अपने स्थानसे टल गया तब तुम उसका विश्वास कर लेना। यदि सुनो कि, एक मनुष्यकी प्रकृति बदल गई तो कदापि विश्वास न करना। क्योंकि, मनुष्य अपनी प्रकृतिकी ओर झुका करता है। यह बात ठीक है कि, भाग्यने जो बनाया सो बन गया। मनुष्योंकी शिक्षा भी पशु-वोंको मनुष्योंके ढङ्गका बनाती है। कुरानमेंभी आया है कि, खुदा जिसको चाहे ईमान प्रदान करे, जिसको चाहे भटका दे। पूर्वजन्मके कर्मोंने स्वरूप बनाया। वर्तमान कृत्य उनको बदल सकते हैं। तीनों कालके कर्म आवागमनके बन्धनमें फँसे हुए हैं।

४७ अपनी आत्माका डालना—तौरीत तथा कुरान दोनोंसे यह बात प्रमाणित होती है कि, खुदाने आदमको अपने स्वरूपका बनाया। उसमें अपनी आत्मा डालदी। अतः खुदाने मनुष्यमें गमन किया। आदम सब मनुष्योंके भीतर गमन करते गये इस कारण एकसे अनगिनती हो गये। सर्व मनुष्यों का शरीर और आत्मा आदमका शरीर और आत्मा है आदमका शरीर और आत्मा खुदाका शरीर और आत्मा है। इस कारण सब मनुष्योंमें आदम आवागमन कर रहा है। आदममें खुदाने गमन किया। आदम खुदाकी आत्मा तथा शरीर है। देखो कुरानका (१४) सिपारा सूरत हजर (२) रकूअ (२९) आयतमें लिखा है :—