भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मनुष्योंने । इसके उपरान्त नूहने किया । फिर इबराहीमने मनुष्यका बलिदान किया अर्थात् अपने पुत्र इसहाकको बलि दे दिया ।

यरमयाह नबीकी पुस्तकका (१९) बाब (४) (५) आयत इन्होंने मुझको छोड़ दिया इस मकानको दूसरोंके निमित्त ठहराया इसमें अन्यान्य अल्लहों के निमित्त लोहबान जलाया । जिन्हें न बे न उनके पिता दादा । न यहूदाहके रहने वाले जानते थे उस गृहको निर्दोषोंके रक्तसे भर दिया, उन्होंने बअलके निमित्त ऊंचे २ मकान बनाए जिसमें अपने पुत्रोंको जलाकर बलिप्रदान करनेके निमित्त अग्निमें जलावे । जो मैंने न आज्ञा की न उसका विवरण किया न यह मेरेमें ही था ॥

अर्थात् परमेश्वर यह बात यरमयाह भविष्यवक्तासे कहता है ।

फिर काजियोंकी पुस्तकके (११) बाब (३०- आयतसे लेकर (४०) आयतपर्यन्त पढ़ो लिखा है कि, अफसनाहने परमेश्वरकी मनौती की कहा कि, यदि निश्चय ही तू नबी अमूँको मेरे हाथमें करदे तो ऐसा होगा कि, विजयोपरान्त गृह पर पहुँचूँ तो जो कोई प्रथम मेरे सामने आवेगा उसको मैं जलाकर बलिप्रदान करूँगा । जब वह गृहमें आया तब उसकी पुत्री पहले सामने आई उसने अपनी पुत्री को जलाकर बलिप्रदान किया । मुझको ऐसाही स्मरण है कि मैंने, किसी मुसलमानी पुस्तकमें पढ़ा था कि, अबदुलमुत्तलिब जो मुहम्मद साहबका दादा था उसने मनौती कि, यदि मेरे दश पुत्र हों तो उनमेंसे एकको मैं परमेश्वरके निमित्त बलिप्रदान करूँगा । अबदुलमुत्तलिबके जब दश पुत्र उत्पन्न हुए, तब वह अपनी प्रतिज्ञा पूरी करनेके लिये भवकहके पुजारियोंके पास गया और कहा कि, मैं दशमेंसे एक पुत्रका बलिप्रदान करूँगा । परमेश्वरकी मनौती पूरी करूँगा । इस बात पर भवकहके पुजारियोंने कहा कि, हम इस प्रकार करेंगे कि, पास डालेंगे । तुम्हारे दश पुत्रोंमेंसे जिसके नाम पास पड़ेगा उसको बलिप्रदानके निमित्त लेलेवेंगे तब उन्होंने पास फँका वह पास अबदुल्लाके नाम पर पड़ा । उन पुजारियोंने अबदुल्लाके बलिप्रदान करनेका बाँधन बाँधा । इस विषयपर अबदुलमुत्तलिब उसका पिता बहुत घबराया कहा कि, मेरा यह पुत्र बड़ा योग्य है । कारण यह कि, यह अबदुल्ला, बड़ा धार्मिक भला आदमी पुण्यात्मा और सुन्दर था । इस कारण न चाहता कि अबदुल्लाका बलिप्रदान करें । जब अबदुलमुत्तलिब इस सोचमें फिरता था तब उसको लोगोंने परामर्ष दिया कि, तू अमुक स्त्रीके समीप जा वह तुझको युक्ति बतलावेगी । वह स्त्री उस समय किसी देवकी पूजा करती थी । जब अबदुलमुत्तलिब उस स्त्रीके समीप गया तब उसने यह युक्ति बतलाई कि, एक तौल बनाकर

एक ओर अबदुल्लाको रख और दूसरी ओर दश ऊंट रख, जिसमें दश ऊंटोंको परमेश्वर अबदुल्लाके बदले स्वीकार करे । अबदुल्लाका बलिप्रदान क्षमा कर दे । फिर दश ऊँच जब अबदुल्लाके बराबर न हुए तब बीस ऊंट रखे । फिर तीस फिर चालीस यहाँलों कि, एक सौ ऊंट तक रखे गये जब सौ ऊंट रखे तब तराजूको दोनों ओरके पलडे बराबर होगा । सौ ऊंटोंका बलिप्रदान हुवा । इस प्रकार अबदुल्ला बच गया । पुत्रके बचजानेसे अबदुलमुत्तलिवको बड़ा हर्ष हुवा इसी अबदुल्लासे मुहम्मद साहब उत्पन्न हुए ॥

इसी प्रकार सनस्त पृवीपर बलिप्रदान होता चला आता है । इसके अतिरिक्त अनेक प्रकारके बलिप्रदानोंका उल्लेख किया गया है । इसकी तरह वही प्रथा चारों पुस्तकोंमें चला आता है और चारों पुस्तकोंके प्रचलित होनेके पूर्वसे भी यही प्रथा चली आती है । जब पुस्तकें नहीं थीं तब परमेश्वर प्रगट होकर आज्ञा दिया करता था । इसके अतिरिक्त अनेक मनुष्योंको परमेश्वरके दर्शन होते, बहुतेरे मनुष्योंसे वार्तालाप हुआ करता । पश्चिम देशमें जो पहिली पुस्तक पृथ्वी पर प्रगट हुई वह तौरीत है । यह तौरीत पश्चिमीय देशवासियोंमें पहले प्रचलित हुई जो उसकी आज्ञाएँ हैं वेही उनके माननेवालेके ईश्वरकी आज्ञाएँ हैं ।

अध्याय ११.

मूसाकी पुस्तकें ।

यह तौरीत हज़रत मूसाके निमित्त उपस्थित हुई । इसमें शारीरिक बातें हैं । आदमको परमेश्वरने साग पात फल इत्यादि खानेके निमित्त बताया परन्तु नूहको परमेश्वरने धोखा दिया । पशुओंका मांस जैसे साग पात इत्यादिके भोजन की आज्ञा दी । वही प्रथा चिरकालसे चली आती है । जैसे मैंने वेदमें कुछ बातें संक्षेपतः लिखीं, उसी प्रकार तौरीतमेंसे कुछ बातें प्रगट करता हूँ ।

प्रथम तौरीत ।

मूसाकी प्रथम पुस्तकमें तो उत्पत्ति इत्यादि कही है ।

खिरोज मूसाकी दूसरी पुस्तकका नाम है । इसमें सीना पर्वत पर परमेश्वर उपस्थित हुवा । मूसाको समस्त धर्म कर्मोंकी प्रथा बतलाई । यहाँ सब तरहके बलिप्रदानोंकी आज्ञाएँ देता है । बलिप्रदान—दोष का बलिप्रदान । ईदुज्जहा (१९) बाबसे (२४) बाबपर्यन्त सब नियम देखो (२४) बाब (१९) आयत में मूसा हारूँ इत्यादि को परमेश्वर दर्शन देता है । (१७) परमेश्वरका तेज बनी इसराईलकी दृष्टिके समक्ष, देखती अग्निके समान दिखाई देता है । खिरोज

मनु स्वायंभूकी कथा

के (२६) (२७) (२८) बाबमें डेरे परदे और छत इत्यादिकी युक्तियाँ और बलिप्रदानोंकी समस्त प्रथाएँ बतलाता है । बेल और भेड़ोंको जबहू करके बलिप्रदानस्थल और उसके चारों ओर रक्त छिड़कनेकी आज्ञा देता है । फिर परमेश्वर बालके स्तम्भमें उतरकर मूसाके समक्ष दण्डायमान हो मित्रोंके सद्गृह अलाप करने लगा ॥

मूसाकी तीसरी पुस्तक एखबारका — (१) बाब (१) आयतपरमेश्वरने मूसाको बुलाया । झुण्डके डेरेसे उससे कहने लगा कि, बनी इसराईलसे कह कि, यदि तुममेंसे कोई परमेश्वरके निमित्त बलिप्रदान लाया चाहे तो निर्दोष गाय, बेल, बकरी, भेड़ लाकर परमेश्वरके बलिप्रदान स्थलके सामने बलि देवे उनके रक्त छिड़के, उसको बलिप्रदन देवे । अर्थात् सुगंधि अग्निसे परमेश्वरके निमित्त हो यदि पक्षियोंमेंसे हो तो कुमरी कबूतरके बच्चोंमेंसे बलि लावे काहून उसको बलिस्थानमें लाकर उसका गला मिरौड डाले । उसको बलि देनेके स्थानपर जला देवे । उसके रक्तको दीवारपर निचोड़े । जलानेवाला बलि परमेश्वरके निमित्त हो जो जबहूकी हुई लाश जलनेसे बचजावे उसपर काहूनका स्वत्व है अत्यंत पवित्र है । यहाँ भाँति २ के बलिप्रदानका विवरण चला आता है । जिनके द्वारा मनुष्यों के पापोंका मोचन हो । (९) बाब (२२) आयत मूसा, हारूँ और उसके भाईने झुण्डकी ओर अपना हाथ उठाया । उनको आशीर्वाद दिया । दोषकी कुरबानी जलकी कुरबानी और रक्षाकी कुरबानी देकर नीचे उतरे । फिर मूसा और हारूँ झुण्डके डेरेमें प्रवेशित हुए । बाहर निकले झुण्डको आशीर्वाद दिया । तब समस्त झुण्डके समक्ष परमेश्वरका प्रताप प्रगट हुवा । परमेश्वरकी सेवामेंसे अग्नि बहिर्गत हुई, बलिप्रदानस्थली कुरबानी और चरबीको खागई ।

मूसाकी चौथी पुस्तक गन्तीमें विस्तारके साथ लिखा हुआ है । कि— परमेश्वर बादलके खंभोंमें आकाशसे उतरता मूसा के डेरेके सामने खड़ा होकर तथा वार्तालाप करके चला जाया करता था अब मूसाने अपने स्थानपर एशूहको स्थिरका युद्धकी आज्ञा दे लाखोंको मार डाला तथा बलआमको भी मारा । मेदियों के पाँच बादशाहों और उनकी सैन्यको मिटाकर महा रक्तपात कर कनआनके राज्यको करकवलित किया । परमेश्वरने उन दोनों पुस्तकोंमें समस्त धार्मिक प्रथाएँ बतलाई, मदिरा पान तथा मांसाहारकी आज्ञा दी ।

मूसाकी पाँचवी पुस्तक इस्तसना—नामकमें मूसाकी समस्त धार्मिक आज्ञाएँ पूरी हुई । तब मूसा मवाबके मैदानमें नीबू पर्वतपर चढ़ मर गया । यहूदी मूसाके दुःखमें तीन दिवसोंपर्यन्त रोते रहे मूसा एकसौ बीस वर्ष का वयस पाकर मरा ।

राजा इन्द्रकी कथा बृहस्पति और शुक्र नारद

दूसरी ज़बूर पुस्तक ।

अँग्रेजीमें ज़बूरको साँग्स आफ़ डेविड कहते हैं साँग नाम गीतका है दाऊद बादशाह खुदावन्दका बड़ा प्यारा था । खुदावन्दके सामने नाचता गाता बजाता रोता था, मूसाके समान दाऊदने भी बड़ा रक्तपात किया । परमेश्वर दाऊदकी सर्वे सहायता किया करता था । (६६) ज़बूर (१३) बाबमें जला हुवा बलि-प्रदान लेकर तेरे गृह जाऊँगा मैं तेरे निमित्त अपनी भेंट दूँगा । (१४) वे जो आपत्ति कालमें मैंने अपने रक्तसे नियुक्त की अपने मुँहसे मानी (१५) मैं पाले हुए पशु लेकर जली हुई बलि मेंढोंकी सुगंधियोंसहित तेरे निमित्त दूँगा । मैं बछड़े तथा बकरे चढ़ाऊँगा । (२९) जवरके परमेश्वरका शब्द जलपर है । तेजोमय परमेश्वर गरजता है । परमेश्वर बड़े जलपर है । परमेश्वर का शब्द आगकी लपटों को चीरता है । परमेश्वरका शब्द जङ्गलोंको कँपाता है । दाऊदका पुत्रसुलेमान बादशाह अपने पिताकी मसनदपर आसीन हुआ ।

देखो दूसरे इतिहास का (७) बाब, सुलेमान बादशाह हुवा । परमेश्वरके हैकलकी बनावट करचुका तब समस्त मनुष्यों और सुलेमान बादशाहने वार्ड्स सहस्त्र बैल और एक लाख बीस सहस्त्र भेंणोंकी बलि दी ।

नबियोंकी पुस्तक ।

यसायाह नबीकी पुस्तकका (२३) बाब (१७) आयत, सत्तर वर्षके उपरान्त ऐसा होगा कि, परमेश्वर सूबरपर दृष्टि करेगा । वह फिर खरचीके निमित्त जावेगी । पृथ्वीके समस्त देशोंसे व्यभिचार करेगी । परन्तु उसकी प्राप्ति खरची खुदावन्दके निमित्त पवित्र होगी । उसका धन एकत्रित न किया जावेगा । रोका न जावेगा । वरन् उनके निमित्त प्राप्त होगा जो परमेश्वरके निकट रहते हैं जिसमें भोजन करके परितृप्त होंवे अच्छे वस्त्र पहने ।

खरकैक नबीका (४) बाब (१२) आयत, तू जौके फुलके खाया करेगा । तू उनकी दृष्टियोंके समक्ष मनुष्योंकी विष्ठाद्वारा उनको पकायेगा । होसीय नबीका (१) बाब (३) आयत परमेश्वरके वचनका आरम्भ, जो होसीय नबीको आया खुदावन्दने होसीयको आज्ञादी कि, जा एक दुराचारिणी स्त्री और दुराचारिणी बाला अपने निमित्त ले । कारण यह कि, परमेश्वरको छोड़कर देशने अत्यंत व्यभिचार आरम्भ किया है । पुराने अहदनाममें तौरीत ज़बूर तथा नबियोंकी समस्त पुस्तकें हैं । उनको जो कोई पढ़कर ध्यान देगा तो स्पष्ट प्रगट हो जावेगा कि, यह सब शिक्षाएँ आत्माके निमित्त हैं अथवा नहीं ।

तीसरा नवीन अहदनामा अथवा अनाजील मत्तीकी इञ्जील— (३)

बाब-ईस् योहन्नासे बपतिस्मा पाकर बाहर निकला । देखो उसके निमित्त आकाश खुल गया । उसने परमेश्वरकी आत्माका कबूतरके समान उतरते हुए अपने ऊपर आते देखा । (४) ईसू उस समयसे हाँक लगाने लगा । जब ईसू जलील नदीके किनारेपर चला जाता था तब उसने दो भाई शमऊन पितरसने उसके भाई इन्दरयासको नदीमें जाल डालते देखा । कारण यह कि, मछुवे थे । उन्हें कहा कि, तुम मेरे पीछे आओ कि, मैं तुम्हें मनुष्योंका मछुवा बनाऊँगा । व उसी समय जालोंको छोड़कर उसके पीछे हुए । (५) बाब (१७) आयत, यह मत ससझो कि, मैं तौरीत या नबियोंकी पुस्तकोंका खण्डन करनेको आया हूँ । मैं उन्हें मिटानेको नहीं बरन् सम्पूर्ण करनेको आया हूँ । (१७) कारण यह कि, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि, जबलों आकाश पृथिवी टल न जाए तौरी-तका एक बिन्दु अथवा रेखा कदापि नहीं मिटेगी । जबलों सब कुछ पूरा न हो । (७) बाब (१३) आयात, सडकीर्णद्वारसे प्रवेशित हो । कारण यह कि, वह द्वार चौडा है और प्रशस्त है वह पथ जो कष्टपर्यन्त पहुँचता है बहुत हैं वे जो इससे प्रवेशित होते हैं । (१६) वह द्वार क्याही संकीर्ण और तङ्ग है वह पथ जो जीवनको पहुँचाता है अत्यल्प है जो उसे पाते हैं । (८) एक फकियाः ने आकर उससे कहा कि, ए गुरु ! जहाँ तू जावेगा मैं तेरे पीछे चलूंगा (२०) ईसूने उससे कहा कि, लोमड़ियोंके निमित्त माँदे और बायुके पक्षियोंके निमित्त घोसले हैं । पर मनुष्यके निमित्त स्थान नहीं जहाँ शिर धरे (२१) उसके शिष्योंमेंसे एकने उससे कहा कि, ए परमेश्वर ! मुझे बिदाकर कि, मैं अपने पिताको गाड़ूँ (२२) ईसूने कहा कि, तू मेरे पीछे आ । मुरदोंको मुझे गाड़नेदे । (१०) बाब (३४) आयत, यह मत मसझो कि, मैं संसारमें मेल कराने आया हूँ । मेल कराने अथवा शान्ति स्थापन करनेके निमित्त नहीं बरन् मैं असि चलवाने आया हूँ । (११) बाब (२५) आयत, ए पिता ! पृथ्वी तथा आकाशके, मैं तेरा गुणानुवाद करता हूँ कि, तूने उन वस्तुओंको बुद्धिमानोंसे छिपाया, बालकों पर खोल दिया । (१६) बाब (२४) आयत, ईसाने कहा कि यदि कोई चाहे कि, मेरे पीछे आवे तो अपना भाव अस्वीकार करे और अपना सलीब उठाकर मेरे पीछे आवे । (२२) बाब (३२) आयतमें इबराहीमका खुदा इसहाकका खुदा और याकूबका खुदा हूँ । मुर्दोंका खुदा नहीं बरन् जीवितों का खुदा हूँ ।

मरकसकी इञ्जीलका—१२- बाब (३८) आयत एक मनुष्यने मसीहसे आनकर कहा कि, ए भले गुरु ! मैं कौनसा उपाय करूँ कि, सर्वेक

निमित्त जीवित रहें। ईसूने उत्तर दिया कि, मुझे भला क्यों कहता है? कोई भला नहीं बरन् वही एक जगदीश्वर भला है, बाकी कुछ नहीं।

लूकाकी इज्जीलका—(१२) बाब (४९) आयत, मैं पृथ्वीपर अग्नि लगानेलगाने आया हूँ, मैं कियाही चाहता हूँ कि, लगचुकी होती (५०) पर एक बपतिस्मा पाना है, मैं कौसा तङ्ग हूँ जबलों कि, पूरा न हो (५१) क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वीपर मेल कराने आया हूँ, नहीं मैं कहता हूँ कि, पृथक् करने आया हूँ।

(५) बाब, ऐसा हुवा कि, जब परमेश्वरके वचन सुननेके निमित्त लोग गिरे पड़ते थे, ईसू शमऊनकी नावपर चढ़कर उपदेश दे रहा था। शमऊनसे कहा कि, आखेटके निमित्त अपना जाल डालो तब उसने उत्तर दिया कि, ए परमेश्वर! हमने समस्त दिवस परिश्रम किया पर कुछ न पकड़ा परन्तु तेरे आदेशसे जाल डालता हूँ। जब जाल डाला तब वह मछलियोंसे ऐसा भर गया कि, वह अकेला खींच न सका, दूसरोंकी सहायतासे खींचकर नाव मछलियोंसे भरली। शमऊनने ईसूपर विश्वास किया और उसके चरणोंपर गिरा। तब ईसूने कहा कि, तू भयभीत न हो इस घड़ीसे तू मनुष्योंका आखेटकारी होगा, सब कुछ छोड़कर शमऊन इसूक पीछे होलिया। (२२) ईसूने अपने शिष्योंको आज़ा दी कि, असि खरीदकर बाँधो।

योहूनकी इज्जील—(१४) बाब (८) आयत, फ़ीलबोसने कहा कि ए परमेश्वर पिताको हमें दिखला कि, हमें यथेष्ट हैं। (९) ईसूने उससे कहा कि, ए फ़ीलबोस! इतने समयसे मैं तेरे साथ रहता हूँ और तूने मुझे न जाना जिसने मुझे देखा उसने मेरे पिताको देखा, फिर तू कौसे कहता है कि, पिताको हमें दिखला, क्या तू निश्चय नहीं करता है कि, तेरा पिता मैं हूँ, पिता मुझमें है? यह बातें जो मैं तुझे कहता हूँ मैं आपसे नहीं कहता परन्तु मेरा पिता जो मुझमें रहता है, वह बातें करता है।

करनतियूनके लिये पोलूस रसूलका पत्र।

(१) बाब (९) आयतमें विद्वानोंकी विद्वत्ता एवम् समझवालोंकी समझको तुच्छ करूँगा। विद्वान् कहो फ़क्रियः कहो इस संसारका विवाद करने-वाला क्या, परमेश्वरने इस संसारके बुद्धिमानोंकी मूर्खता नहीं ठहराई। तथा (८) बाब (१६) आयत और जब इसने नवीन की, तब पहलेको मिथ्या ठहराया। वह जो प्राचीन तथा दिनी है मिटनेके समीप है, अर्थात् प्राचीनसे नवीन विशेष शुद्ध है।

वशिष्ठजी

अनागतवक्ता (रसूल अल्ला) के कृत्य ।

१० बाब ९ आयत पितरस दो पहरके समीप कोठेपर परमेश्वरकी बंदनाको गया वहाँ उसको भूख लग रही थी, चाहा कि, कुछ भोजन करें पर जब वे प्रस्तुत कर रहे थे, वह विह्वल हो पड़ा देखा कि, आकाश खुल गया वस्तु बड़ी चादरके सदृश जिसके चारों कोने बँधे थे, पृथ्वीकी ओर लटकाई हुई उसके समीप उत्तरी (१२) उसमें पृथ्वीके समस्त रूपके चौपाए, बनलें पशु, कीड़े, मकोड़े दूसरे वायुके पक्षी थे । (१६) उसे एक शब्द सुनाई दिया कि, ए पितरस ! उठ उनको हलाल करके खाजा । (१४) पितरसने कहा कि, ए प्रभु कदापि नहीं, कारण यह कि, मैंने कदापि कोई अशुद्ध वस्तु नहीं खाई है । (१५) दूसरी बार पुनः उसी प्रकार आवाज आई कि, जिसको परमेश्वरने शुद्ध किया उसको तू अशुद्ध मत कह । (१६) यह तीन बेर हुवा तब वह वस्तु आकाशकी ओर खींची गई (१७) जब पितरस चिंतित था कि, यह स्वप्न जो मैंने देखा वह क्या था, उस समय करनीलूस सूबःदारके भेजे हुए तीन मनुष्य आए पितरसको उसके गृहपर लेगए । उक्त सूबेदार अपने कुटुम्बसहित ईसाई हुआ ।

चौथी पुस्तक कुरान ।

ऐसेही तात्पर्य कुरानसे निकलते हैं जो कोई कुरानके वाक्य पढ़नेकी युक्ति जानता हो वाक्य पढ़कर अपना तात्पर्य जान सकता है । यह कुरान स्वयम् प्रगट करता है कि, मैं पूरबकी किसी पुस्तकसे पृथक् किया गया हूँ । सुतरां

सूरए यूंस (الر) यह पक्की आयतें हैं पुस्तककी ।

सुरए यूसुफ-ये आयतें हैं प्रगट पुस्तककी । सूरए हुज्र यह पुस्तककी तथा खुली कुरानकी आयतें हैं । सूरतशशोरा आयतें हैं खुली पुस्तककी । सूरत

लुकमान (١٠ ال) ये आयतें हैं पक्की पुस्तककी । इसी प्रकारके अनेकों स्थलोंमें यह बात पाई जाती है ।

अल्लोपनिषद् ।

कोई इसे अकबरके समयकी कल्पित बताते हैं इसके विषयमें अनेक तरहकी किंवदंतियाँ हैं । मनुष्य अपनी बुद्धिसे विचारले अथर्व वेदमें तो हमें

गीतम ऋषि, कपिलमुनि, दत्तात्रेय

इसके दर्शन नहीं हुए । पर इसके आधारपर इस्लामकोऔपनिषद कह डाला है इस कारण यहाँ उसे लिखते हैं ।

ॐ अस्मल्ल इल्ले मित्रा दरुणा दिव्याधते इल्लल्ले वरुणो राजा पुरुदुः
हया मित्रा इल्लां इल्लेले इल्लां वरुणो मित्रो तेजकाना ॥ १ ॥ होतारीमद्रो
होतारिमद्रो सुरेंद्राः अल्लो ज्येष्ठं परमं पूर्णं ब्रह्मणे अल्लम् ॥ २ ॥ अल्लो रसूल
महोमदरकं वस्प अल्लो अल्लां आरलांबुकमेकं ऋल्लावकनिस्वातकम् ॥ ३ ॥
अल्लो परानुहतत्त्वः अल्ला सूर्य्यं चंद्रमा सर्वं नक्षत्रा अल्ला अग्नि वायू अल्लां
॥ ४ ॥ अल्लो ऋषीणां सर्वदिव्याम् इंद्राय पूर्वं माया अन्तरिक्षाः अल्लो
पृथिव्यन्तरिक्षं विश्वरूपम् ॥ ५ ॥ दिव्यानि धत्ते इल्लल्ले वरुणोना पुर्दुदु
इल्लाङ्कुर इल्लाङ्कुर इल्लाम् इल्लल्लेतिल्लल्ला ॥ ६ ॥ अप्रल्लं इल्ल इल्ले।
अनादिरूपाय अर्थणीं शामाहम् अल्लां रस हिजनन्या श्रुन्सिद्धजलखुरान् प्रादृष्टं
कुरु करुषपा असुरसंहारणीं हं अल्लो रसूल महम्मद रक्कव रस्म अल्ल अल्लां
इल्ले इल्ले तिर इल्लल्लाः ॥ ७ ॥ सहस्रा वर्तनेनदेव जालो भवति शतावर्तेन
सर्ववश्यो भवति त्रिमधुहू वृत्तेन सर्पपेन वा अत्यस्तवर्तनें सर्वग्रहशान्तिर्भवति ॥
इति अथर्वण संहितायां एकविंशतिद्वारेसप्तविंशतिमुतिःॐ अल्लात्वाःइल्लल्ला
महम्मद रसूल अल्लाः ॐ इल्लाङ्कुरः वर इल्लाङ्कुर वर इल्लाम् इल्लल्लेति ॥
जैसा कि, यह अल्लाह और रसूलकी प्रशंसा करता है । इसीके अनुसार
आरम्भमें लेखनीने लौहपर लिखा । वही आजदिन पर्यन्त बराबर चला आता
है, घट बढ़ नहीं । यद्यपि पहले विस्तारके साथ था और अब संक्षेपतः हो गया
(लाइलाहइल्लल्लाह मुहम्मदुरसूलल्ला) कहा जाता है । जो पहले था वही
आज है । वह जो है उसे संस्कृतमें महामद कहते हैं वही अब मुहम्मद साहिब
हैं । यही मुहम्मद रसूल अल्लाह सृष्टिके उत्पत्तिकालसे लेकर आजपर्यन्त
लगातार मुसलमानोंके गुरुवाई करता चला आता है । इसीने संसारमें अघोर
धर्म वाम मार्ग जैसा इस्लाम पृथ्वीपर प्रचलित किया । मोलवी अमाहुद्दीनका
मुहम्मदी इतिहास और मुहम्मदी शिक्षाका मिलान करके देखो, प्रत्यक्षमें अघोर
धर्म प्रगट है इसी महामद तथा मुहम्मदके जिन परी भूत प्रेत इत्यादि अधीन
रहते हैं ।

इसोसे कुरान है । यह अल्लाह उपनिषद अथर्वण वेदका (२७) अध्या-
यका (२१) मंत्र है ऐसा कोई कहते हैं पर हमने इसे वेदमें नहीं देखा जो
है ऐसा कहते हैं उन वेचारोंको पता नहीं कि, उस वेदमें अध्याय है वा नहीं है ।

सनत्कुमार

मुझको भली भाँति स्मरण है कि, मैंने तौरीत ज़बूर और नबियोंकी पुस्तकें इज्जील इत्यादिमें तो अल्लाका नाम कहीं नहीं देखा केवल कुरानमें देखा है, कुरानके लिखे जाने तथा संसारमें प्रचलित होनेके पूर्वसे अल्लाके नामसे लोग भली प्रकार परिचित थे । अरबमें कितनोंहीका नाम अबदुल्ला था । जब पूर्वसे अल्लाहका नाम है और दृढ़नेसे प्रमाणित हो जावेगा कि, तौरीत ज़बूर इज्जील और कुरानके लिखे जानेसे पूर्व, प्राचीन कालसे लोक अल्लाका नाम जानते और याद करते थे इस कारण अल्लाका नाम वेदसे है । प्राचीनकाल और उत्पत्तिके समयसे अल्लाह है । तो उसके अनागत वक्ताभी उसीके सदाके दरवारी हैं । दावा तो यह है कि, संसारकी उचित बातें वेदसे प्रचलित हुई अनुचित उनके घरकी हैं ।

कुरानका सूक्ष्म सार ।

बिसमिल्लाह अर्रहमाने उर्रहीमो ।

(३) सिपारा (३) सूरत (अलहमरान) (५) रकूअ (५६) आयत उन काफ़िरों ें धोखा दिया अल्लाने धोखा दिया, अल्लाहका न्याय सर्वोत्तम है ( ९ ) रकूअ (८६) आयत, तू कहे कि, हम विश्वास लाए अल्लापर कुछ उत्तरा हमपर जो उत्तरा इबराहीम इसमार्ईल इसहाकपर याकूबपर उसकी संतानपर, जो मिला मूसाको, समस्त नबियोंपर, हम अपने परमेश्वरकी ओरसे उनमें किसीको पृथक् करते हैं । हम उसके आज्ञा पर हैं ।

(४) सिपारा (४) सूरतनसा (५) सिपारा (२०) रकूअ (१३६) आयत जो लोग मुसलमान पुनः उस धर्मसे विमुख हुए फिर मुसलमान पुनः विमुख हुए फिर मुसलमान हुए फिर बढ़ते गये इनकारमें परमेश्वर उनको कदापि क्षमा नहीं करेगा न उनको पथही देवेगा ।

(९) सिपारः (९) सूरत तोबः (३) रकूअ (२३) आयत हुए विश्वासवालों ! वे पकड़ो अपने पिता और जौर भ्राताओंको साथी यदि वे प्रिय रक्खे । कुफ़ विश्वाससे जो लोग साथ करें वही पापिष्ठ हैं ।

(९) सिपारः सूरत अनफाल (३) रकूअ (३०) फिर जब फरेब बनाने लगे काफ़िर कि, तुझको हरावें अथवा मारडालें अथवा निकाल देवें फरेब करते थे, अल्ला भी फरेब करता था । अल्लाका फरेब सबसे उत्तम है ।

(११) सिपारह (१०) सूरत (मुनुस) (१०) रकूअ (९९) यदि तेरा परमेश्वर चाहता तो विश्वास लाते जितने लोग पृथ्वीमें हैं । अब लोगोपर क्या तू बल करेगा कि, हो जावे विश्वासी (१००) किसीको नहीं मिलता

कि, विश्वास लावे। परन्तु अल्लाहकी आज्ञासे वह उनपर अष्टता, डालता है है जो नहीं समझते।

(१५) सिपारह (१८) सूरत कहफ़ (९) रकूअ (५९) (८१) आयतपर्यन्त ख्वाजः खिज्र और मूसाका बूत्तान्त लिखा है।

(१७) सिपारह (२२) सूरते हज्र (५) रकूअ (३६) हमने हर फिरके कुरबानी ठहराई है कि, अल्लाका नाम याद करें चौपाईयोंके हलाल होनेपर जो उनको देवो अल्ला तुम्हारा एक अल्ला है। उसीकी आज्ञापर रहो हर्ष सुना नम्रता करनेवालोंको (३९) अल्लाको नहीं पहुँचता न उनका मांस न रक्त' परन्तु उसको तरे हृदयका क्षोभ पहुँचता है।

(१९) सिपारह सूरत (नमल) चिउटीने सुलेमान बादशाहके साथ वार्तालाप किया था। हुद हुद पक्षी सुलेमानका पत्र अथवा समाचारबाहक था।

(२१) सिपारह सूरत (अख़राब) (९) रकूअ (७२) आयत हमने सौंपी हुई बस्तु पृथ्वी और आकाशको पर्वतोंको दिखाई। किसीने उसको स्वीकार नहीं किया कि, उसको उठावे तथा उससे भयभीत हों मनुष्यने उसको उठा लिया, यह बड़ा निर्दय मूर्ख है।

(२३) सिपारह (३७) सूरत (साफ़ात) (२) रकूअ (३९) परन्तु जो परमेश्वरके चुने हुए सेवक हैं। (४१) उनकी प्रतिष्ठा है, पदार्थोंकी वाटिकाओंके (४३) तख्तोंपर एक दूसरेके समक्ष (४४) लोग लिए फिरते हैं। उनके पास नतरेकी मदिराका प्याला (४५) श्वेत रङ्गका आनन्द पहुँचाता है। पानेवालोंका (४६) उससे न शिर फिरता है और न बहकते हैं। (४७) नीची दृष्टिवालियाँ स्त्रियाँ उनके समीप हैं बड़े नेत्रोंवालियाँ ऐसी मानों वे छिपे धर अण्डे हैं। (६०) भला यह अच्छी मेहमानी अथवा वृक्ष सेहुँडका।

(२६) सिफारह (५०) सूरत क़ाफ़ (१) रकूअ (अक) प्रकार है उस कुरान बड़ क्षोभवालेकी (२) रकूअ (१५) और हमने बनाया मनुष्यको हम जानते हैं कि, जो बातें आती हैं उसके मनमें और हम उसकी धड़कती नसक विशेष समीप हैं।

अल्लाका नाम मुहम्मदके पहलेसे हैं तो मुहम्मद भी मुहम्मदके पहलेसे है। अल्लाह और रसूल अल्लाह पूर्वकालसे ऐसेही चले आते हैं यद्यपि उनकी


१—इस आयतके भावको एक चित्रमें गीके खुरोंके नीचे लिख दिया या—'न पहुँचेगी उनके रक्त मांसकी कुर्बानी अल्लाहको किन्तु पहुँचेगी सिर्फ परहेंजगारी तुमसे, इस पर लोग बिगड़ खड़े हुए। नवाब हैदराबादने उसे जप्त कर लिया। इससे तो यही प्रतीत होता है, कि सच्चे मुसलमानों में जीवहत्या भी नहीं होती थी।

भक्तबालक ध्रुव भक्त प्रह्लाद

मूर्तिमें किसी प्रकारकी विभिन्नता हो जाती है परन्तु प्रकृति बदल नहीं सकती है। जो पहले महामद था, वही अब मुहम्मद है इस तरह पश्चिमके दर्शन पूर्वके दर्शनोंकी छायायें हैं।

पर बलिप्रदान करनेवाले यह समस्त संसारी कालपुरुषकी पूजा करते हैं एवं जितने मनुष्य कालपुरुषका पूजन करते हैं वे सब निश्चय बलिप्रदान करेंगे या करते आए हैं कारण यह कि, कालपुरुषका भोजन जीव हैं वह काल पुरुष तो जीवोंहीके भोजनसे प्रसन्न होता है ॥

जो कोई दरिद्री तथा धनविहीन होता है वह भिक्षा माँगता फिरता है। जिसके घरमें असीम सम्पत्ति भरी होगी वह किसीका भिक्षुक क्यों होगा कारण यह कि, मेरे पिताने मुझे एक बृहत् भण्डार प्रदान किया है। वह भण्डार सूक्ष्म वेद है। जिसमें समस्त विवरण है। मैं किसीके विवरण अथवा अर्थ बतानेका कदापि इच्छुक नहीं हूँ।

मैं तो उनकी बातोंपर तनिक भी विश्वास नहीं करता मैं तो कबीर साहबकी बातोंको सत्य जानता हूँ। जो लिखावट तथा बातें सत्यगुरुकी बातोंके अनुसार हों उसको भी मानता हूँ। जो लिखावट तथा विवरण कबीर साहबके विरुद्ध हो उसकी ओर मैं कदापि दृष्टि नहीं फेरूँगा क्योंकि, जो लिखावटें श्रेष्ठ वचनके विरुद्ध हैं वे यमजाल हैं।

यदि सहस्र अंधे एक हाथीका हूलिया (स्वरूप) बतावें उन सहस्र अंधोंसे एक दृष्टिवाले सचक्षुको मैं अच्छा जानता हूँ। सहस्र नेत्रवालोंसे एक विद्वान्के विवरणको ठीक जानता हूँ। सहस्रों विद्वानोंसे एक विद्वान् गुणीको अच्छा समझता हूँ। सहस्रों गुणी विद्वानोंसे एक ज्ञानीको अच्छा समझता हूँ। सहस्रों ज्ञानियोंसे एक भक्तको अच्छा समझता हूँ। सहस्रों भक्तोंमें एक ब्रह्मज्ञानी अर्थात् जो गुणी मनुष्य लुढ़नी विद्यासे सुशोभित हैं उसको सर्वोत्कृष्ट मानता हूँ, जितने तीन लोकके ब्रह्मज्ञानी हुए, अथवा होंगे सबके गुरु तथा पथदर्शक कबीर साहब हैं। कबीर साहबको मैं स्वयम् सत्यपुरुष मानता हूँ। मेरा यह विश्वास अटल है। मैं इन्हीं महाशयके वाक्यानुसार सब कुछ लिखता हूँ।

यह सत्यगुरु सदैवसे पुकारते और मनुष्योंसे कहते आए कि, ए मनुष्यो ! कालपुरुषसे बचो, वह तुमको फँसाकर मारनेवाला है। वह तुम्हारी मुक्ति कदापि होने न देगा। वह काल महाभयानक है।

बलिका निषेध।

कबीर साहब किसी भी प्रकारकी बलि या कुर्बानीको उचित नहीं मानते। कोई भी हत्या पापसे खाली नहीं है।

अम्बरीष, भगवान् शुक्रदेव

सन्तो राह दुनों हम डीठा ॥

हिन्दू तुरक हटा नहि मानें, स्वाद सबनको मीठा ॥ १ ॥

हिन्दू व्रत एकादशी साधें, दूध सिंघाड़ा सेती ।

अनको त्यागे मन नहि हटकें, पारनकरें सगोती ॥ २ ॥

तुरक रोजा नवाज गुजारें, विसमिल बाँग पुकारें ।

उनकी भिन्नत कहाँते, होइहै, साँझै मुर्गी मारें ॥ ३ ॥

हिन्दुकि दया मेहर तुरकनकी, दूनों घरसों त्यागी ।

वै हलाल वै झटका मारें, आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥

हिन्दू तुरक कि, एक राह है सद्गुरु है बताई ।

कहहि, कबीर सुनो रे सन्तो, राम न कहेउ खोदाई ॥ ५ ॥

ए महात्मा पुरुषो ! हमने हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकही रासता देखी है । मैं हिन्दू और मुसलमान दोनोंको समझाता हूँ पर दोनोंही जिदपर आये हुए हैं कहना नहीं मानते । दोनोंको इसकी चोट लगी हुई है । हिन्दू पहले दिन तो एकादशीका व्रत दूध सिंघाड़ेसे करते हैं अन्नका तो त्याग करते हैं पर मनके विकारोंको छोड़कर मनको नहीं रोकते । न कभी एकादशीको विषय चिन्तन ही छोड़ा है । इसी तरह तुरक जब रोजा करते हैं उस दिन उपवास करते हैं नंमाज पढ़ते हैं, बाँग लगाते हैं, पर साँझको रोजाके खुलतेही मुर्गी मार पुलाक बनाकर खा जाते हैं । हिन्दुओंने दया तथा तुरकोंने मिर्ह, अपने अपने दिलसे निकालदी, एक हलाल करता है तो एक झटका मारता है । अज्ञानरूपी आग दोनोंके लगी हुई है । सत्यगुरुने मुझे यही बताया है कि, हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकही राह है । राम न कहा खुदा कहलिया, एवं खुदा न कहा राम कह लिया । दोनों नाम उसीके हैं सिर्फ नामोंमें अन्तर है । कबीर साहिब कहते हैं कि, राम और खुदाने किसीसे नहीं कहा हैं कि, जीवहत्या करो ।

शब्द—सन्तो पांडे निपुण कसाई ॥

बकरा मारि भैंसाको धावै, दिलमें दर्द न आई ॥ १ ॥

करि स्नान तिलक करि बैठे, विधिसों देबि पुजई ।

आतमराम पलकमो विनशे, रुधिरकी नदी बहाई ॥ २ ॥

अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये, सभा माहि अधिकई ।

इनसों दीक्षा सब कोई मोंगे, हसि आवे मोहि भाई ॥ ३ ॥

पाप कटनको कथा सुनावै, कर्म करावै नौँचा ।

बूडत दोउ परस्पर देखे, गहे हाथ यमखौँचा ॥ ४ ॥

गाय बधे तँहि तुरका कहिये, उनते वेका छोटे ।
कहाँहि कबीर सुनो हो सन्तो, कलिके ब्राह्मण खोटे ॥ ५ ॥

कबीर दासजी वाममार्गी देवीकी पुजारीकी ओर लक्ष्य करके कहते हैं कि, ए महात्माओ ! यह पाण्डे कसाईसे भी चतुर मालूम होता है । बकरेकी तो सदाही बलि देता रहता है पर मोके झोके भेंसाके मारनेका भी इरादा करता है । स्नान करके लाल तिलक दे, सिद्ध बनके बैठ जाता है, देवीको बड़े ढोंगके साथ पुजाता है । जो अपने भीतर है वही उसकेभी भीतर है इस बातका ख्याल न करके सपाटसे जीव बध करके लोहूकी नदी बहा देता है । जब कभी सभामें बैठता है तो अपनेको अतिपुनीतकुलमें मानकर सभामें अपनेको कौल कहता हुआ बलिका माहात्म्य प्रकट करता है । जमाना इनका चेला होनेको चलता है, पर मुझे इसकी हँसी आती है, कथा तो सुनाते हैं पाप नाश करनेके लिये, पर काम करते हैं पापके पहाड़ोंका । ऐसे गुरु चले दोनों डबते देखे जाते हैं हाथ पकड़कर यमराजने दोनोंको जीव हत्याके फल भोगनेके लिये खींच लिया है । जो गाय मारते हैं वे तुर्क हैं भेंसा बकराके मारनेवाले क्या इनसे कम है । पहिले ऐसे ब्राह्मण नहीं थे कबीर कहते हैं कि, कलियुगके ऐसे ब्राह्मण जो ब्राह्मण शरीर पाकर जीवहत्या करें वे महा बुरे हैं । इस तरह कबीर साहिबने और भी अनेकों वचनोंमें बलि या कुर्बानीका निषेध किया है । वे हिन्दू मुसलमान दोनोंके लिये अनुचित समझते हैं ।

समस्त सूक्ष्मवेद इस विषयमें बराबर यह बात प्रगट करता चला आता है कि, रक्तपात कालपुरुषकी ओरसे है । तुम इस पापसे रूको परन्तु लोग नहीं हटते थे । कबीर साहबके साथ वँर करते, कहना न मानते, ऐसा विष और मंत्र कालपुरुषका समस्त जीवोंपर चढ़ रहा है । कि, कोई जीव सत्यपुरुषकी भक्तिको अच्छा नहीं समझता है । कालपुरुषकी ओर आपसे आप दौड़ता है । जैसे नीमके कीड़ेको नीमही पसंद है । वह मिसरी चीनी आदिको अच्छा नहीं समझता । सब जीव कामनाकी वासनामें फँसकर काम क्रोध लोभादिके प्रपञ्चोंमें फँस रहे हैं । समस्त जीवोंकी नस नसमें कालपुरुषका विष समा रहा है । बिना सत्यगुरुकी दयासे वह विष उनके भीतरसे न निकलेगा । कालपुरुषके पुत्र कालपुरुषके बनाये नियमोंपर समस्त मनुष्योंको आरूढ़ करते जाते हैं । हाँक मार मार कर समस्त मनुष्योंको फँसाते हैं, समस्त मनुष्य उनके धोखे और धूर्तताको देखते सुनते हैं तथापि उसी पथपर चले जाते हैं । फिर उनको क्या कहिये ? मनुष्यतासे बहिर्गत कहिये अथवा मनुष्य कहिये ? जो लोग जान-

भगवान् व्यास उनके अवतार

बूझकर कुएँमें फँद पड़ते हैं क्या उन्हें भयका कुछ ध्यान नहीं रहता ? झूठे काम हाँक मार मारकर समस्त संसारको बंधनमें फँसा रहे हैं, उनको जो कोई पहचाने वो ही कालके जालसे बचे । वे लोग समस्त संसारमें आग लगा रहे हैं और समस्त जीव जल रहे हैं । कालपुरुष सबको जला जलाकर हजम करता जाता है । इसके पेटमें सब समागये ; कबीर साहिबने इसी बातको बड़े सुन्दर शब्दोंमें कहा है —

गगनमें आग लगी बड़ी भारी ॥

धरती जल गई अम्बर जल गयो, जल गयो सकल पसारा ।

चन्दा जल गया सूरज जल गया, जल गया नौलाख तारा ॥

ब्रह्मा मरे विष्णु मर गए, शंकर नेजाधारी ।

रामों मर गए, लछिमन मर गए, मर गए कृष्णमुसारी ॥

कोटिन कोट कनैया मर गए, रैयत कौन बिचारी ।

कहै कबीर सुनहु भाई साधो, अलख पुरुष अविकारी ॥

आकाशमें कालपुरुषरूपी बड़ी भारी आग लग रही है इसी आगमें अपने समयपर धरती अंबर और सारा संसार जलगया । आसमानमें खिलनेवाले चाँद और सूरज तथा चाँदकी शोभाको चौगुने करनेवाले नौलाख तारे भी उसमें समा गये । ब्रह्मा विष्णु और महेश ये भी इसके चक्करसे न बचपाये सत्य पुरुषके अवतार राम लछिमन और कृष्ण भी अपने समयपर अपनी झलक दिखाकर जैसे झलके थे, वैसेही अदृश्य होगये । अनेकों राजाएं न जाने कहाँ छिप गये ? रैयतका तो पताही क्या है । सबको काल जहाँका तहाँ कर देता है । केवल एक अलख पुरुष विकार रहित है । वही सबका सब कुछ है वो भक्तोंको कालपुरुषसे बचानेके लिये आता है पर कालके राज्यमें अधिक दिन न रहकर अपने सत्यलोकको चले गये । क्या कालपुरुषकी धूर्ततासे लोग अनभिज्ञ हैं ? क्या हजरत ईसा पुकार कर नहीं कहते कि, मैं आग लगाने आया हूँ । मैं तलवार चलाने आया, मैं शान्ति स्थापनार्थ नहीं आया । देखो, समस्त संसारमें तलवार चल रही है, चोर नहीं आता, चुराने मारनेको मैं आया हूँ, मनुष्योंके फसानेके निमित्त यह सब कालपुत्र नियुक्त हैं । अंधा मनुष्य इन बातोंको नहीं समझ सकता, उनको शाफी और नाजी समझता है ।

कालके समस्त पुत्र हाँक मार मारकर मनुष्योंको फँसा फँसाकर मारते हैं । परन्तु उनके धोखेको बिना हंसकबीरके कोई नहीं पहचान सकता । वेही लोग इस संसारमें आग लगाने एवं बध करनेको आए हैं । वे कदापि शान्तिस्थापन करने नहीं आते, बरन् तलवार चलाने आते हैं । वे भयानक भेड़िया हैं कि, भेड़चर्म

जैनके तीर्थंकर, योगी गोरखनाथ

ओढ़कर भेड़ोंके झुण्डमें घुसकर उनको नष्ट करें, वे तलवार चलाने आये हैं। समस्त संसारमें तल्लवार चल रही है। वे आग लगाते हैं। समस्त संसारमें आग लग रही है।

सत्यकबीर वचन ।

तीन लोकमें लागी आग, । कहैं कबीर कहाँ जैहों भाग ॥

कौन ऐसा तीन लोकमें है कि, कालपुरुषके पञ्जेसे भाग निकले, कोई नहीं। एक भी नहीं। सबके सब कालपुरुषके भोजन हैं। बिना हंसकबीरके कोई कालके पुत्रोंकी बोलियाँ समझनेका सामर्थ्य नहीं रखता। न उसके धोखेको प्रगट कर सकता है। जिसने जैनियोंको दया बतलायी, उसीने दूसरेको यज्ञ तथा रक्तपात करनेको कहा क्या दो परमेश्वर तो नहीं जो एक कुछ कहे तथा दूसरा कुछ कहे वो सबके लिये एक है सबका वोही मालिक है। 'भाई रे दो जगदीश कहाँ' आएसे इस पूरे शब्दको २६८ के पेजमें युगलानन्दजी ऐसेही प्रकरणमें पूरेका अवतरण दे चुके हैं। इस कारण हम यहाँ पूरा नहीं दिखाते किन्तु इसका अर्थ किये देते हैं। ऐ भाइयों ! इस संसारके स्वामी तो एकही है दो नहीं हैं आपको किसने बहका दिया है अल्ला, केशव, करीम, केशव, हरि और हजरत उसीके तो नाम हैं ॥ १ ॥ सोना एकही है उसके अनेक तरहके गहने बन जाते हैं वैसे तो वे गहने आपसमें जुदे लगते हैं पर सब सोना है सिवा इसके दूसरा कुछ नहीं है। इसी तरह निवाज और पूजा देखनेमें दो लगती हैं पर वास्तवमें सिवा उस जगदीशकी आराधनाके दूसरा कुछ भी नहीं है ॥ २ ॥ वही महादेव है वही महम्मद ब्रह्मा और आदम। किसीको हिन्दू तथा किसीको तुर्क कह रहे हैं पर दोनों रहते एकही भूमिपर हैं ॥ ३ ॥ वेद पढिके पांडे तथा दूसरे किताब कुरान शरीफ पढकर मौलाना बन जाते हैं। बिगत-जुदे २ नाममात्र हैं, सब उसी मिट्टीके वर्तन ॥ ४ ॥ कबीर साहिब कहते हैं कि, वे दोनों भूल गये हैं। रामको किसीने नहीं पाया, वे बोकरा (बकरा) मार देते हैं, तो गाय कटा देते हैं। वो जगदीश एक है उसका उपदेश भी सबके लिये एक है। मनुष्य मात्र के कल्याणके लिये वो समय २ पर प्रकट होकर उपदेश दिया करता है।

चारों युगसे कबीर साहब बराबर पुकारते चले आते हैं कि, ए मनुष्य ! काल पुरुष की धूर्ततासे भागकर कबीर साहबकी शरण लो।

ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों इस भवसागरमें ईश्वरीय कार्य करते हैं जो कोई तपस्या करता है उसको ये तीनों वरदान देते हैं उसकी कामना पूरी। करते हैं। महिषासुरके समान सहस्रों ऐसे हुए कि, जिनको तीनोंने वरदान दिया।

भगवान् बुद्ध

उन्होंने बल पाकर समस्त देवताओं ब्रह्मा विष्णु शिव सहित मार भगाया कि, उनमें तनिक भी बल नहीं रहा कि, उनका सामना कर सके। उनको बल देकर फिर आपही निर्बल होकर क्यों भागजाते। फिर जान पड़ा कि, ये बातें उनके सामर्थ्यसे बाहर थीं, यदि उनके वशमें होतीं तो वे आपसे आप विवश क्यों होते? ये तपके वश हैं इसी तरह सत्यपुरुष भक्तिके वश है।

देखो यह जीव वासनासे बिगड़ता है, जो यज्ञ वेदमें नियत हुई तो, उनसे क्या तात्पर्य है कि, यदि सौ अश्वमेध करे तो इन्द्रकी श्रेणी पावे अर्थात् इन्द्र हो जावे। फिर इन्द्र होकर वह भी कष्ट पाता हुआ दुःख भोगता रहता है। जो पापी हैं जीवको बेदर्व होकर मारते हैं, उन निर्दयियोंके जीवित रहनेसे पृथ्वीपर बोझका बढ़ना संभव था; इस कारण उनकी मृत्युही उचित है। दूसरोंको मारकर अपने वयसकी बढ़ती चाहना मूर्खता है। भाँति २ की कामनाओंके निमित्त प्राणघात करते तथा जीवोंको कष्ट पहुँचाते हैं उनका भला कैसे हो सकता है? बलि देते हुए प्रसन्न होते हैं पाप पर पाप बढ़ाते जाते हैं।

जो लोग संसारविरक्त कहलाते हैं वे फिर वैकुण्ठ ब्रह्मलोक इत्यादिकी कामना करते हैं इस कारण झूठे संसारविरक्त हैं। कारण यह कि, ब्रह्मलोक कौलास और इन्द्रपुरी इत्यादिके रहनेवाले सबके सब शरीरके बंधन और काम क्रोध लोभ मोहादिके फँदेमें फँसे हैं। संसारको छोड़कर फिर अप्सराओंके संभोगकी लालसा करना क्या बुद्धिमानोंके अनुसार कार्य है? कदापि नहीं। भलाजी! यहाँ तो एक स्त्री मिली थी जिसको कष्टका कारण समझकर छोड़ भागे थे। फिर सत्तर अथवा अधिक स्त्रियोंका सहवास मिला तब मुसलमानोंने कठिन दुःख तथा आपत्तिमें फँसा दिया। पहले तो एक सेर आटामें उदरपूति होती थी। वहिकृतमें सत्तर दस्तर ख्याल होंगे फिर उनके निमित्त पेटभी बड़ा बनाया जावेगा। यदि खाते २ पर्वत खाजाओ तो भी भूख न जावेगी। यह स्वर्ग नहीं मनुष्योंके निमित्त महा आपत्ति स्थिर की गई है कि, सदैवसे सदैव पर्यन्त आपत्ति तथा दुःखमें फँसे रहे, कभी उसका छुटकारा न हो। यह तो केवल जसे मूर्ख बच्चोंको ठग लड़्डू पेड़े खानेको देते हैं फिर उजाड़में लेजाकर उसके समस्त आभूषण उतारलेते हैं। उस अनजान बच्चेको मारकर कुएँमें ढकेल देते हैं। वह अज्ञान यदि ठगकी ठगीसे सचेत होता तो व्यर्थ अपने प्राण क्यों नष्ट करता? इसी प्रकार इस संसारके लोग सत्य पुरुषकी भक्तिसे अनभिज्ञकाल पुरुषकी वंदना तथा मानताकी आज्ञाओंपर चल रहे हैं। प्रत्यक्षमें देखते हैं पर नहीं देखते।

शंकराचार्यजीका वृत्तान्त

सुन तो रहे हैं पर नहीं सुनते । उनके हृदय बुद्धिपर ताला लग रहा है, बिना सत्यगुरु कबीरकी शरणके ताला कदापि न टूटेगा ।

जो ठग है उसको अपना दयालु मित्र समझते हैं । अज्ञान बालक ठगको कैसे पहचान सकता है, हों जब कोई दयालु मित्र मिले हृदयसे सचेत तथा पथसे विज्ञ हो वह भी अपने पथदर्शकके विरुद्ध काम न करे । कारण यह कि, कृतज्ञतासे बढ़कर और कोई अच्छी भलाई नहीं है । जो कोई गुरुका आज्ञाकारी होगा वही छुटकारा पावेगा । समस्त धोखाओं और दगाबाजियोंको देखकर दूर भागे । जहाँ सत्यता हो उसको तुरंत स्वीकार करे, तनिक विलम्ब न करे । बुद्धि और ज्ञानके बससे सबकी यथार्थताको जाने । जहाँ धोखा हो वहाँसे दूर भागे । जब धोखे और धूर्तताको न पहचाना तो अवश्य मारा गया ।

समस्त संसारकी पुस्तकें कोई क्यों न पढ़ा करे उसके मनमें कदापि प्रकाश न दौड़ेगा । परन्तु जब सूक्ष्मवेद या अध्यात्मशास्त्रकी ओर मन फिरेगा तबही मनको संतोष आवेगा, स्थिरता होगी । जितने वेद और पुस्तकें हैं, कोई अंधकारसे पृथक् नहीं कर सकती । परन्तु केवल सूक्ष्मवेद अंधकारसे बहिर्गत होता है जो कोई सूक्ष्मवेद समझ, बूझकर अपने गुरुसे पढ़ेगा उनकी सूक्ष्मवातोंको पहचान लेगा सत्यगुरुको पहचानेगा अपने गुरुकी सेवा तथा सत्कारको अपने शिरधारण करेगा उसको अवश्य कबीर गुरु मिलेगा जो कोई अपने गुरुसे खिंचा रहेगा उसको अपने सत्यगुरुका दर्शन कदापि न होगा । गुरुकी सेवा तथा आज्ञा मानना सत्यगुरुकी दयापानेका मार्ग है, गुरुहीकी दयासे सत्यगुरुकी दया है । मुक्ति पानेका यही मार्ग है और गुरुका क्रोध दुर्भाग्यका चिह्न है ।

बुद्धिमानोंकी बुद्धिमानियाँ और वैद्योंकी युक्तियाँ चतुरोंकी चतुराई किधर गई ? किस पेचीले गड़हेमें डूबकी खाते फिरते हैं । और सावधानोंकी सावधानियाँ चालाकियों की चालाकियाँ किस कुएँमें जा पड़ीं कि, वे तनिक भी नहीं विचारते । तनिक भी नहीं जान सकते कि, परमेश्वर बड़ा स्वच्छ तथा दयालु है वह किस प्रयोजनसे ऐसा अशुद्ध कार्य करावे, यानी व्यर्थही निर्दोषी जीवोंका प्राणघात करावे । उनका रक्त बलिप्रदानस्थलीपर छिड़कावे । उनका माँस तथा चरबी खावे, गह परम दयालु परमेश्वरका कार्य तो कदापि नहीं हो सकता, यह तो किसी राक्षसोंके परमेश्वरका हो सकता है ऐसे भयानक परमेश्वरसे जो अपने मुक्तिकी आशा रखते हैं क्या उन लोगोंकी बुद्धि ठिकाने है ? कदापि नहीं । देखो वे लोग जिसको पूजते हैं वे कौन हैं ? निश्चरोंमें और उनमें क्या भेद है ? वैष्णव बलि आदिकी बुराईयोंसे कोसों दूर हैं, पर व्यवहारका

रामानुज स्वामीका वृत्तान्त रामानन्द स्वामी

फल उन्हें सत्यगुरु कबीरसाहबसे मिलेगा। कारण यह कि, समस्त वैष्णवोंके प्रधान अगुवा कबीर साहब हैं अन्तमें चारों सम्प्रादायोंके वैष्णव कबीर साहबसे जा मिलेंगे, तब सबके सब मुक्ति पावेंगे। सब पंथ तो इसी सत्यगुरुके हैं परन्तु वैष्णव धर्म कबीर पंथसे विशेष अंतर नहीं रखता है। दूसरे शब्दोंमें यह भी कहा जा सकता है कि, कबीरपंथ वैष्णव संप्रदायका ही एक भाग है।

कुरानमें तो स्पष्ट लिखा है कि, जो ईसा तथा मूसाका परमेश्वर है वही मुहम्मदका भी है। फिर मोहम्मदी ईसाइयों और मूसाइयोंसे क्यों वैर रखते हैं? अपने उत्पत्तिकालमें मुसलमानोंने ईसाइयोंको अत्यन्त कष्ट पहुँचाया था। लाखों निर्दोष हिन्दुओंको मार डाला, क्या परम दयालु परमेश्वरकी यही आज्ञा थी? मुहम्मद साहबकी त्रुटि तो तभीसे दूर होगई जबसे कबीर साहबने उनको सत्पुरुषका दर्शन करवाया था। कौन बुद्धिमान तथा दूरदर्शी है जो अपनी त्रुटिको जाने उससे दूर भागे? वही पुरुष प्रशंसनीय है जो ईर्षा छोड़कर न्यायदृष्टिसे देखे। उसीको दोनों जगह बढ़ाई मिलती है।

समस्त मनुष्योंका परमेश्वर एक है दो परमेश्वर नहीं यदि दो परमेश्वर होते तो विभिन्नता होना क्या आश्चर्य न था? जैसा कि, परमेश्वर कुरानमें आज्ञा करता है।

एक परमेश्वर पर कुरान।

رَبُّكَانِ فَبِشَكَرِهِمْ أَلَا اللَّهُ لَفَسْتَغْفِرُ

अनुवाद—यदि होते मध्य आकाश तथा पृथ्वीके अनेक परमेश्वर अल्लाके अतिरिक्त वास्तवमें टूट जाते दोनों अर्थात् पृथ्वी और आकाश।

कारण यह कि, जितने विद्वान् तथा बुद्धिमान् हैं सबके सबका निश्चय विद्यापर स्थिर है। उनको ऐतुलयकीन और हककुलयकीनकी श्रेणी प्राप्त नहीं हुई। इन तीनोंको तीन डंडेकी सीढ़ी मानलो। जबलों एक डण्डे परसे अपने पैरको न उठावे तबलों ऊपरके डण्डेपर पैर नहीं रख सकता। सहस्रोंके साथ ऐसी घटना हुई कि, जब इन लोगोंको बंदनाका आनन्द मिला तब पुस्तकोंको फेंक दिया। मौलवी रूम और शाहबूअली कलन्दर आदिके समान बंदनाका स्वाद पाकर पुस्तकपाठको तुच्छ तथा नितान्तही निस्सत्त्व माना। अतः समस्त बुद्धिमान् विद्वान् जो केवल पहले डण्डेपर खड़े हैं, परमेश्वरके तत्त्वको क्या समझ सकते हैं? ऐसाही विषयानन्द, भजनानन्द और ब्रह्मानन्द। जबलों

तीन संप्रदाय १ अ० पश्चिमके महापुरुष हजरत आदम तथा नूह महात्मा

कामक्रोधादिसे पूर्णतया पृथक् न हो जावे, तबलों भजनानन्द नहीं हो सकता; जबलों पूर्णतया डूब न जावेगा तबलों ब्रह्मानन्दके आनन्दको न पावेगा ॥

ऐसाही शरीर तत्तरीकृत हृकृत मारकृत है । समस्त विद्वानोंने अभीतक केवल शरीरअतकी श्रेणी पाई है उनको उरक्रानकी क्या सुध है ? इस कारण विद्वान लोग जो उरक्रानका दम भरते हैं यह उनकी भूल है । यह समस्त संसार काम क्रोध लोभादिके जालमें फँसा हुवा है और सहस्रों प्रकारकी कामनाओंसे भरा हुवा है । इस कारण काम क्रोधादिकके प्रपञ्चोंमें फँसे हुओं उनपर काल परमेश्वर राज्य करनेके निमित्त नियत किया गया है । जैसी प्रजा वँसाही राजा है । उसपर अधिकार करनेके निमित्त नियुक्त किया गया है । इसी प्रकार बनी इसराईल जब मिश्रदेशसे बाहर आए तब रोने लगे कि, हम अब भोजनके निमित्त माँस कहाँ पावेंगे ? लवण प्याज आदि कहाँ मिलेगा । वे मत्स जो परमेश्वर उनको प्रति दिवस देता था उसपर सन्तुष्ट न हो सके तब परमेश्वरने उनके भोजनके निमित्त उनको बटेरें दीं और आपसे आप गज गज भर ऊँचे उनके डेरोंके समीप बटेरोंके ढेर लग जाते और वे भली भाँति माँस खाते । यह तो मांसाहारियोंको माँस रुचिकर था न कि, परमेश्वरको । यह एक ऊर्दूकी कहावत है कि, 'जैसी रूह वैसेही फिर्श्ते' अर्थात् जैसी आत्मा वँसाही दूत । पापी आत्माके निमित्त यमदूत आते हैं । पुण्यात्माके निमित्त विष्णुदूत आते हैं । जैसे इस संसारके मनुष्य हैं वैसेही परमेश्वरके अधीन हैं । जैसा कि, कुरानमें लिखा है कि— 'धोखा दिया काफिरोंने और धोखा दिया परमेश्वरने' परन्तु परमेश्वरका धोखा उन सबोंसे बढ़कर और अच्छा है कि, वो पापियोंपर दया नहीं दिखाता ।

यदि मनुष्य प्रत्येक प्रकारकी पापकामना तथा दोषोंसे स्वच्छ हो जावेगा, तब उसको धोखा देनेवाला परमेश्वर छोड जावेगा । दयालु करुणामयकी प्रतिमा प्रत्यक्षमें दिखाई देगी । वह परमेश्वर नितान्तही निर्दोषी है । यह निरपवादी दोष है कि, हम धूर्त परमेश्वरके अधीन हो रहे हैं । निदान हमको परमेश्वरके साथ विनाश हो जाना काम क्रोधादिकको छोड देना आवश्यक है । जितनी काम क्रोधादिककी कामना सो समस्त वासनायुक्त और धूर्त काल परमेश्वरकी जागीरमें हैं । इस कारण काम क्रोध लोभ मोहादिक इत्यादिकको छोड देना आवश्यक है । जब इसकी जागीरमें किसी वस्तुसे संबंध न करेंगे तो वह भी हमसे सम्बन्ध न करेगा । जबलों हम उसके आयोजनके इच्छुक हैं, तबतक वह हमारे ऊपर आज्ञाकारी है और हम उसके अधीन हैं । वासनाओंमें फँसे हुओंको वह पकड़ता है और जो इनसे पृथक् हैं वे उसके बन्धनमें आ नहीं सकते ।

" इबराहीम और इसहाक आदि " दाऊद और सुलेमान " मूसा

भीतरके अन्धे ।

जितने विद्वान् हैं सब विषयानन्दी भीतरी प्रकाशसे अन्धे हैं । ये अन्धे यथार्थ तात्पर्य तो समझ नहीं सकते । अपढ़ों तथा अपनेसे कम पढ़ोंको भटकाते हैं, इस कारण अपढ़ तथा कम पढ़े हुवे साधुओंकी शिक्षा मान लेते हैं । जो कुछ अधिक पढ़े हैं वे अपनी धूर्तता तथा चालाकी किये बिना नहीं रहते । इस कारण साधु लोग उनको शिक्षा नहीं देते । कारण यह कि, वे साधु जो पहुँचे हुये हैं उनके सामने अरस्तू और अफलातून इत्यादि ऐसे हैं जैसे किसी विद्वान्के समक्ष एक हलवाहा हो । पहुँचे हुवोंकी शिक्षा पर विद्वानोंका खण्डन मण्डन ऐसीही बात है जैसे कि हलवाहा, लुकमान तथा सुकरात आदिको शिष्य बनाना चाहता है । पण्डितों तथा विद्वानोंकी क्या सामर्थ्य है पहुँचेहुवोंकी शिक्षाको काट सकें ? पहुँचेहुवोंसे बढ़कर ब्रह्मज्ञानी है ब्रह्मज्ञानीसे बढ़कर विज्ञानहंस है । जो पूर्ण विज्ञानहंस हो उसकी सबपर श्रेष्ठता है । जो जो ऋषि मुनि हुए तथा अब वर्तमान हैं और वे लोग जितना प्रकाश बन्दना पूजाका रखते हैं । ज्ञानकी जिस सीमापर अधिकृत हैं, विद्वानोंसे उनकी श्रेणी सम्यक् प्रकारसे बढ़कर है । साधनाके प्रकाश बिना, केवल पुस्तकपाठसे आत्मिक प्रकाश प्राप्त कर नहीं सकता । विद्वानोंके हृदय खण्डन मण्डन तथा घमण्डसे भरे होते हैं । इस कारण साधुलोग हलवाहेको लेखनीधारीसे अच्छा समझते हैं । कारण यह कि, हलवाहा तो सेवा स्वीकार करता है । पढ़े लिखोंसे यह बात नहीं होती ।

कालपुरुष किससे डरता है ?

ऐसेही मूसः तो नाममात्रको थे कालपुरुषने सबको परदेसे मारकर गर्दमें मिला दिया । काल तथा उसके समस्त पुत्र समस्त संसारके प्रबन्धक हैं । जैसी उनकी इच्छा होती है किया करते हैं । इस कालपुरुषके राज्यमें बिना कबीर साहबके दूसरेका वश नहीं है कि, बाधा दे सके कारण यह कि, कालपुरुषसे प्रबल अन्य कोई नहीं । केवल कबीर साहबसे वह भयभीत होता है, दूसरा कोई नहीं ; केवल कबीर साहबसे वह डरता है और दूसरा कोई उसका सामना कर नहीं सकता । न उसको अधीन कर सकता है । कौन है जो उसको दबा सके एकभी नहीं । सब इससे भागते तथा दबते हैं । यह बड़ा बलिष्ठ है ।

माया ।

यह समस्त संसार मायापूजक है । जैसे मदिरा पीकर जब मनुष्य अचेत होता है तब मदिराकोही जल समझता है उसको तनिक भी सुध नहीं रहती । इसी प्रकार यह समस्त संसार अज्ञान और विषयोंके आनन्दमें मग्न हो रहा है ।