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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

देखकर अगस्तीनने पूछा कि, तू क्या करता है ? बालकने उत्तर दिया मेरी इच्छा है मैं समुद्रको सुखा दूँ । अगस्तीनने कहा कि इस छोटेसे छिद्रमें तू समुद्रको कैसे भर सकता है ? यह बात सुनकर बालकने उत्तर दिया कि, यदि मैं समुद्रको इस छिद्रमें नहीं भर सकता हूँ तो तू ईश्वरके भेदको अपने छोटेसे मस्तिष्कमें किस प्रकार भर सकता है ? जिस प्रकार तू शैतान विषयक तर्क वितर्क अपने मनमें कर रहा है उसी प्रकार मैं समुद्र सुखा रहा हूँ । तू अपनी सीमाबद्ध बुद्धिसे असीम परमात्माके भेदको किस प्रकार जान सकता है ? यह कहकर वह बालक अंतर्धान हो गया । यह देख अगस्तीन मनही मन बहुत लज्जित होकर सत्यका विश्वासी हुआ ।

२९ प्रश्न—अवस्था साम्य, उस ब्राह्मणको जो सरयूके तटपर मायाको देखनेके लिये तपस्या करता था उसके तथा शाहुरूपके दृष्टान्तसे जाना जाता है कि, जाग्रत और स्वप्न एक बराबर ही है ?

उत्तर—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तुरिया और तुरियातीत ये सब अवस्था और उनके मध्यमकी दशा सब जीवकी अविद्यासे उपन्न होती हैं, इनको प्राप्त हुआ जीव नानाप्रकारके कौतुक देखा करता है । जो कुछ देखता है वो वाजीगरके खेलके समान मिथ्या लीलाकोही देखाता है । पर शुद्ध ज्ञान न होनेके कारण उसी असत्यमेंसे जिसपर विश्वास जम जाता है सत्य मान बैठता है । माया बड़ी प्रबल है । उसमें यह शक्ति है कि, क्षणमात्रमें ब्रह्माण्डको बनावे और बिगाड़े । यह मायाकाही आवरण है कि, सब लोगोंका यह संकल्प दृढ़ है कि, मैं अमुक नगर और स्थानका वासी हूँ, अनेक पीढ़ियोंका इस भूमिपर मेरा अधिकार है, यद्यपि कोई नहीं जानता कि, कौन नगर कब बसा और यह देश कबसे है तथापि अपने को उसका मालिक माने बैठे हैं । जो छोटे गामोंकी उत्पत्ति स्थितिको नहीं जान सकता वह संसारकी उत्पत्ति स्थितिको क्या जाने ? अपने २ अनुमानसे सब जाति और धर्मके लोगोंने जैसा २ निश्चय किया है वैसा २ अपने ग्रन्थ और पोथियोंमें लिख दिया है, उनके अनुयायियोंके लिये वही सत्य और स्थिर सिद्धान्त हो गया है । राजा विदग्धज्ञान क्षणमात्रमें सहस्रों वर्ष व्यतीत होगये थे । समस्त संसार गन्धर्वनगरके समान है । वस्तीका उजाड़ और उजाड़का वस्ती करना मायाकी लीला मात्र है । मायामें क्या नहीं हो सकता ? मायाकी इसी विचित्र शक्तिमें पड़े सर्वजीवधारी वारंवार गते खा रहे हैं । जबतक मायाके पार नहीं होते तबतकही बंधन है ।

३० प्रश्न—जीवकी ईश्वर प्राप्ति, मनुष्य ईश्वरको प्राप्त होता है क्या ?

उत्तर—यह ईश्वरको पहचानता है अपने आपमें ईश्वरको देखता है ईश्वर आत्मासे भिन्न नहीं है, जबतक ईश्वर और जीवका भेद है तबहीतक बन्धन है । ईश्वर जीवका भेद मिटे बिना मुक्ति नहीं हो सकती । ईश्वरको अपनी आत्मामेही जाननेसे मुक्त होगा ।

३१ प्रश्न—पुरुषार्थ और प्रारब्ध, मनुष्य पुरुषार्थसे जो चाहे वोकर सकता है प्रारब्धके माननेकी आवश्यकता ही क्या है ?

उत्तर—यदि प्रारब्ध न होता तो मनुष्य अपने पुरुषार्थसे जो चाहता कर लेता, कभी अपनी इच्छा नष्ट न होने देता पर इसके विरुद्ध यह देखनेमें आता है कि, कभी २ नाना प्रकारके पुरुषार्थ करने परभी मनुष्यको निराशही होना पड़ता है । अपनी कामनाकी अग्निमें जलते हुये अनन्त मनुष्योंने पुरुषार्थ करते २ अपना जीवन बिता दिया पर सफलताका दर्शन नहीं प्राप्त हुआ । इससे यह कहना कि, पुरुषार्थ ही सब कुछ है प्रारब्ध नहीं, यह केवल हठ और दुराग्रह है । पर इसके साथ ऐसा भी न समझना कि, सब कुछ प्रारब्धही है, बरन् पुरुषार्थ और प्रारब्ध दोनोंके संयोगसे कार्य सिद्ध होता है । जिस प्रकार पक्षीके एकही पर हों तो वो कदापि नहीं उड़ सकेगा, उड़ना दो पक्षोंसे ही होता है । इसके साथ २ एक बात और भी है कि, यदि दोनों पक्ष भी हों शारीरिकबल न हो तो उड़ना महान् कठिन ही नहीं बरन् असम्भव हो जाता है । उसी प्रकार प्रारब्ध और पुरुषार्थभी हो पर कार्य करनेका सम्यक् ज्ञान न हो तो कार्य सिद्ध नहीं हो सकता । इस कारण पुरुषार्थ, प्रारब्ध और गुरुकी दया इन तीनोंसे व्यवहार सिद्ध होता है । यदि मनुष्य स्वतंत्र होता तो संसारके सब दरिद्र मनुष्य भी राजा बन जाते । सभी वेषधारी सिद्ध बन जाते, सब कायर शूरवीर हो जाते, सब बन्दर हनुमान हो जाते । इससे यह सिद्ध हुआ कि, प्रारब्धके बिना पुरुषार्थ तुच्छ और पुरुषार्थके बिना प्रारब्ध तुच्छ है ।

३२ प्रश्न—सिद्धान्तोंकी भिन्नता, ईश्वर विषयक सिद्धान्त लोगोंके नाना प्रकारके हैं, कोई कुछ बतलाता है, और कोई कुछ कहता है इनमें यथार्थ क्या है?

उत्तर—यथार्थका ज्ञान किसीको नहीं है । जिसको जैसा विचार है जिसको जैसा संकल्प दृढ़ होगया है उसको वैसाही ईश्वर भान होता है । जैसा मैं पहले लिख आया हूँ कि, एक ब्राह्मणको भैंसाके रूपमें ही ईश्वरका दर्शन हुआ था । परमियाह नबीकी नोहमें लिखा है कि, रीछके रूपका परमात्मा था ।

“जैसी रूह वैसे फिरिश्तः” के अनुसार जैसा अपना कर्म होता है वैंसाही फल मिलता है ।

३३ प्रश्न—कियेका बदला, संसारमें किये हुये कम्मोंका बदला मिलेगा अथवा नहीं ?

उत्तर—किये हुये कम्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ेगा । जो कोई किसी जीवधारीको किसी प्रकार दुःख पहुँचावेगा उसे भी दुःख पहुँचेगा ।

३४ प्रश्न—अगम्यकी गति, जो किसी युक्ति और तर्कसे न जान पड़े उसे किस प्रकार जानना चाहिये ?

उत्तर—गुरुकी सैन और मौनसे ।

३५ प्रश्न—कबीर पन्थकी विशेषता, मौन तो प्रत्येक धर्मवाले बतलाते हैं फिर आपमें क्या विशेषता हुई ?

उत्तर—हममें और अन्य धर्मियोंमें यह भेद है कि, उनके गुरु त्रय देव हैं जो मुक्त नहीं हैं हमारा गुरु नित्यमुक्त कबीर है । वही नित्य मुक्त कबीर समस्त जीवोंको क्षण मात्रमें मुक्त कर सकता है । वही सब शक्तिमान है ।

३६ प्रश्न—पूजाका निर्णय, किसकी पूजा, किसके अनुसार करना उचित है ।

उत्तर—सत्यपुरुषकी पूजा, स्वसंवेदके अनुसार करे ।

३७ प्रश्न—पापके कारण, संसारमें पापकी वृद्धि क्यों हुई ?

उत्तर—मनुष्यका हृदय विषयवासनासे पूर्ण है, पापकी अधिकताका यही कारण है । जब मनुष्यके हृदयसे विषयवासनाकी इच्छा नाश हो तब पाप भी नष्ट हो जावेंगे ।

३८ प्रश्न—मोक्ष मार्ग, ज्ञान और शरणागति इनमेंसे किससे मुक्ति होती है ।

उत्तर—भक्ति और ज्ञानसे भी मुक्ति होती है परन्तु शरणागतिका यह तो सर्वोच्च पद है यदि शरणागतिके नियमकी पूर्णता होसके ।

३९ प्रश्न—कर्मकी स्थिति, जब शरीर न रहेगा तो कर्म कहाँ रहेगा ?

उत्तर—जब स्थूल शरीर नहीं रहेगा तो कर्म सूक्ष्म शरीरके संग रहेगा ।

४० प्रश्न—नियामक, शुभ अशुभ, पाप पुण्य किसने बनाये ?

उत्तर—पाप पुण्यका नियामक काल पुरुष है ।

४१ प्रश्न—सृष्टि स्वाभाविक है, ईश्वरको सृष्टि उत्पन्न करनेकी क्या आवश्यकता थी ?

उत्तर—मनुष्यको भूख प्यास लगनेकी क्या आवश्यकता है ? जब भूख प्यास लगती है तो भोजन और जलके ग्रहणमें परवश प्रवृत्ति होती ही है । उसी प्रकार ब्रह्ममें माया फुरती है तो सृष्टि स्वाभाविकही प्रगट होती है ।

४२ प्रश्न—कार्य सिद्ध न होने का कारण, नानाप्रकार परिश्रम करने पर भी कार्य सिद्ध नहीं होता. इसका क्या कारण है ?

उत्तर—ईश्वरच्छा विरुद्ध अथवा प्रारब्धिही इसका कारण है ।

४३ प्रश्न—शुद्धधर्म, वह कौन धर्म है जो सब प्रकार शुद्ध है ?

उत्तर—वह धर्म कबीर साहबका है ।

४४ प्रश्न—भक्तिका निर्वचन, भक्ति किसको कहते हैं ?

उत्तर—भगसे पार होजाने का नाम भक्ति है । जबतक यह भगमें आया जाया करता है तबतक भक्ति पद नहीं मिलता । तबतक कोई भक्त नहीं हो सकता जबतक भगसे छुटकारा नहीं पा जावे । यह सारासंसार और तीनों लोक भगमेंही वर्तमान है । जो तीनों लोकसे पार होजावे उसका नाम भक्त है, भक्त न भगका साथ करता है न भगमें आता है कितनी स्त्रियोंके साथ जो कोई सम्भोग करेगा अवश्य उसको उसके गर्भमें आकर जन्म लेना पड़ेगा ।

४५—प्रश्न—सत्य परमात्माका धर्म, यदि ईश्वर एक है तो सब मनुष्योंका धर्म भी एकही होना चाहिये ?

उत्तर—ईश्वर तो एक है पर मनुष्योंकी कामना भिन्न भिन्न है । जैसी जिसकी कामना होती है वैसेही धर्मोंमें उसकी प्रवृत्ति होती है उसीमें उसको प्रसन्नता होती है । जिसको जो धर्म अच्छा लगता है, वह उसके अतिरिक्त दूसरेको स्वीकार नहीं करता. क्यों कि, अपनी इच्छानुसार उसको वह धर्म मिला है । जो धर्म सब दूषणोंसे शुद्ध हो वह सत्य परमात्माका धर्म है ।

४६ प्रश्न—भक्ति बिना मुक्तिका दाता, ऐसा भी कोई गुरु है जो बिना भक्तिके मुक्ति देशके ?

उत्तर—यह सामर्थ्य केवल कबीर साहबमें है कि, बिना भक्तिकेभी अनन्त जीवोंको परम धामको पहुँचा दिया और अनेक भक्तोंको सपरिवार सत्य लोकको पहुँचा दिया ।

४७—प्रश्न—कबीर पंथसे मुक्ति, हिन्दू मुसलमान आदि सर्व धर्मवालोंको क्या एकही प्रकारकी मुक्ति मिलेगी ?

उत्तर—अपने २ कर्मानुसार सदा योग्य स्थान सब कोई पावेंगे पर मुक्ति तो तब होगी जब कबीरपंथमें सम्मिलित होंगे ।

४८ प्रश्न—वेदान्ती और कबीर पन्थियोंमें भेद, आपने वेदान्तियोंको असत्यवादी कहा है पर आप भी तो उन्हीके समान वचन कहते हैं भेद क्या हुआ?

उत्तर—वेदान्तियोंका वचन तत्त्वमसिके अन्तर्गत है इसी कारण मिथ्या है, हमारा कहना तत्त्वमसिसे बाहर है जिसका ज्ञान उनको नहीं है।

४९ प्रश्न—चर्मचक्षुसे देख, लाभ न पाया, आपने कहा था कि, ईश्वर शारीरिक आँखोंसे देखा नहीं जाता, जो बाहरकी आँखोंसे देखा जाता है वह मिथ्या होता है, तो कबीर साहबको भी तो लोग आँखों से ही देखते थे ?

उत्तर—हो, जिन लोगोंने कबीर साहबको बहिर दृष्टिसे देखा, अन्तर दृष्टि रखते नहीं थे उनको कुछ लाभ नहीं हुआ।

५०—प्रश्न—शत्रु, मित्र, सर्वका कर्ता ईश्वरही है, मनुष्यको भी कुछ अधिकार है ?

उत्तर—आपमें ईश्वर है, ईश्वरमें आप हैं। जिसने सबमें ईश्वरको देखा उसने कर्तापिनेका अहंकार छोड़ दिया। मूर्ख लोग कहते हैं—ईश्वरने मेरे ऊपर आपत्ति डाली। यदि ऐसे मूर्खोंसे पूछो कि, ईश्वरको तेरे साथ क्यों शत्रुता हुई तो कहेंगे कि, “मैंने अमुक पाप कर्म किया था” इससे प्रमाणित होता है कि, कर्मही मित्र और शत्रु है।

५१ प्रश्न—नाम रूपसे छूटनेका मार्ग, नाम रूप सब मिथ्या और भ्रम है फिर किसका भजन ध्यान करना चाहिये ?

उत्तर—नाम और रूप दोनों निःसन्देह अनित्य हैं। इसके आगे गुरुकी कृपासे जाना जाता है। जब नाम रूप दोनोंही मिथ्या हैं तो फिर हम तुम कैसे सत्य हो सकते हैं ? इस कारण असत्यको असत्यके साथ मैत्री होनी ठीकही है। इससे यह प्रमाणित होता है कि, नाम और रूपका भजन करना चाहिये। जब नाम रूपके परेका विचार होगा तब ये आपही छूट जावेंगे।

५२ प्रश्न—ब्रह्माण्ड दर्शन, कबीर साहबने केवल महम्मद साहेबकोही ब्रह्माण्डोंका भ्रमण कराया कि, किसी औरको भी ?

उत्तर—करोड़ों अगिनित मनुष्योंको लोक दिखलाया जिसका कि, हाल कबीरपंथकी पुस्तकोंको पढ़नेसे जान पड़ेगा।

५३ प्रश्न—न्याय और दया एक साथ, ईश्वरको न्यायी और दयालुभी कहते हैं, दोनों गुण एक साथ कैसे रह सकते हैं ?

उत्तर—दो बात एक साथ इस प्रकार रह सकते हैं कि, जैसे न्यायने जो अबल पक्षादि पक्षियोंको दुखमें डाल दिया, प्रभुकी दयाने उस दशामें भी उसके

पोषण पालन करके रक्षा की । यह उसकी दयाही है कि, सहस्रशः जीवधारी वर्षा भूखे प्यासे रहनेपर भी जीवित रहते हैं ।

५४—प्रश्न—कोई पार न होगा, मेरे जाननेमें सब आचार्य ठीक मार्ग बतलाते हैं । सब अपने २ अनुयायियोंको भवसागर पार करावेंगे ?

उत्तर—मूर्खमल्लाह और टूटी नाव पर चढ़कर कोई पार नहीं जा सकेगा.

५५ प्रश्न—कबीर साहबकी भविष्यत वाणी, किन २ ग्रन्थोंमें है ?

उत्तर—कबीर साहबके ग्रन्थ और भविष्यत वाणीकी कुछ सीमा नहीं है अगनित और अपार है ।

५६ प्रश्न—भेष बनानेसे लाभ क्या ? यदि कोई भेषके बिना भजन करे तो नहीं हो सकता ?

उत्तर—यद्यपि सच्चे भावसे किया हुआ भक्ति और भजन बिना भेषके भी ईश्वर स्वीकार करता है पर भेष बनानेमें बहुत बड़ा लाभ है जैसे और काग भेषसेही जाने जाते हैं; वैसेही गुरु और धर्मका पता भेषसेही जाना जाता है, भेषके देखतेही जाना जाता है कि, यह अमुक भेष का साधु है । उनका ऐसा कर्तव्य है । जैसे भगवाँ वस्त्रवालेको देख करही अनुमान होता है कि, यह शैव है. क्योंकि, शिवके सेवकों तथा योगियोंकोही यह भेष, दिया गया है. भगवाँ-वस्त्र भवसागरका चिन्ह है । जो कोई यह भेष बनावेगा उसका आवागमन न छुटेगा क्योंकि, जो जैसा वेष बनाता है उसका स्वभावभी वैंसाही हो जाता है । अतः जो भगवाँ वस्त्र पहनता उसका मन वेदांत शास्त्र पढ़नेको चाहता है । वेदांतका आशय समझे अथवा न समझे, साधन सम्पन्न हुआ हो अथवा न हो पर “अहं ब्रह्म” बोलना सीख जाता है । फिर क्या है । अहं ब्रह्म बननेके साथही पूर्ण अभिमानी बनता है । जब अपनेको सबसे बड़ा समझता तो किसीको नमस्कार क्यों, करेगा, उसमें दीनता क्यों होगी ? दीनता तथा सरलता बिना सत्संग होना असम्भव है, सत्संग न होनेसे मन आदिका विकार निकलना कठिन है, इसके नष्ट हुये बिना सत्य पदका पाना दुर्लभ है, सत्यपद पाये बिना मुक्ति पाना असम्भव है जैसे कोई सिपाही शस्त्रास्त्रसे सज्ज हो तो उस समय उसका मन अवश्य युद्ध करना चाहेगा । आशय यह है जो जैसा वेष बनावेगा वह वैंसाही कर्म करेगा ।

भगवाँ (गेरुआ) वस्त्रके बिना नीला आदि नाना रंगोंके वस्त्रसे भेष बनानेवालेका प्रचार होगया । पर सब भेषोंमें वैष्णव भेष सर्वोत्कृष्ट सर्व श्रेष्ठ है । इसकी प्रशंसा कबीर साहब तथा स्वयम्, विष्णु महाराजने की है ।

यह वैष्णव भेष भक्ति मुक्तिका चिन्ह है। कंठी तिलक और माला तथा उज्वल वस्त्रादि जो कि, वैष्णव रखते हैं यह मुक्तिका चिन्ह है। जलका रंग श्वेत है, सब रंगोंका मूल यही रंग है। यही सत्गुणका चिह्न एवं दयाका रूप है। जहां यह भेष होता है वहां दया तो आगे पताका लेकर चलती है। यह वैष्णव भेष दयाका भण्डार इसी भेषमें दयाका निवास है।

इस भेषके विषयक एक कथा।

एक मछुआ मछली मारनेके लिये नदीमें जाल डाले हुये बैठा था इतनेमें एक राजाकी सवारी सह सैन्य उधर आ निकली। सैन्यको देख मछुआ डर गया कि, राजा मुझे अवश्य दण्ड देगा। क्योंकि वह वैष्णव था। मछुयेका नाम कालू था, उसने अपने जालमें लगे हुये मुद्रियोंका तो मनिका बनाया और जालसे धागा ले एक माला बनायी, मिट्टीका तिलक लगाकर जालको पानीमें छिपा माला फेरने लगा। इतनेमें राजाकी सवारी आगई। राजाने देखा कि, कोई साधु बैठे भगवत्नाम जप रहा है। भक्ति पूर्वक उसके निकट जाकर राजा नमस्कार कर कुछ भेंट रखकर चल दिया, राजाकी देखादेखी सब सेना भरके लोगोंने पूजा भेंट चढ़ाई। नदी पार उतर चले जानेपर कालूने आँख खोलकर देखा। अपने आगे नाना प्रकारके वस्त्र और द्रव्यादि पदार्थोंका ढेर देख मनमें विचार करने लगा कि, जब मैंने केवल ढोंग करके भयसे वैष्णवका स्वाँग बनाया था तो मेरी इतनी प्रतिष्ठा हुई। यदि मैं सच्चा वैष्णव बन जाऊँ तो न मालूम मुझे क्या फल मिलेगा? ऐसा विचार कर कालू उसी समय हृदयसे मछुएका काम छोड़ दिया वैष्णव हो यह दोहा कहा—

दोहा— बाना बड़ा दयालका, छाप तिलक उर माल।

यम डरपे कालू कहे, भय माने भूपाल ॥

उसी दिनसे कालू सब औगुणोंको त्यागकर सच्ची वैष्णवताको प्राप्त कर, परमानन्दमें मग्गन हो गया।

इसी पर कबीर साहबकी—पुस्तकोंमें भेषकी महिमा बहुत लिखी है,

चौ०— माला तिलक मनोहर बाना। जाकी महिमा सकल बखाना ॥

राजस यज्ञ करे जब राजा। माला तिलक बिनु घण्ट न बाजा ॥

माला तिलक जब आन बिराजा। शंख पञ्चायन तबही बाजा ॥

तब यह महिमा प्रगटहि जानी। अपने मुख कहि शारंग पानी ॥

जाकी महिमा अगम अभेवा। निगुरा कहैं जाने गुरु सेवा ॥

निगुरा निज मुख निन्दा करई। ढोल बजाय नरकमें परई ॥

बाकी निन्दा सुने जो कोई । जाको रुचे सो जाय विगोई ॥

माला तिलक साहबको बाना । जाहि देखि यम काल डराना ॥

साखी— माला तिलक निन्दा करें, ते प्रगट यमदूत ।

कहैं कबीर विचारिके, तेई राक्षस भूत ॥

द्वादश तिलक बनावई, अगँ अगँ अस्थान ।

कहै कबीर विराजही, उज्वल हंस अमान ॥

५७ प्रश्न—पारख गुरु प्राप्त होनेकी युक्ति बताइये ।

उत्तर—गुरुकी सेवा तन मन धनसे करना, उसकी आज्ञासे कभी बाहर न जाना । गुरुके समान साधुकी सेवा भक्ति करनी और साधुमें किसी प्रकार भेद दृष्टि न करनाही पारख गुरुके मिलनेका सहज मार्ग है । इसी प्रकार साधु गुरुके सेवा करते २ गुरुमेंसे ही पारख गुरु प्रगट हो जावेगा । जैसे फूलमेंसे सुगन्धि निकल पड़ती है ।

५८ प्रश्न—स्वसंवेदसे वेदका प्राकट्य, आपने कहा कि, उत्पत्तिसे प्रथम चार वेद प्रगट हुये, स्वसंवेद कबीर साहबने पीछेसे कहा, फिर स्वसंवेदसे वेदका प्रागट्य कैसे माना जाय ?

उत्तर—माया सृष्टिसे प्रथमही स्वसंवेद था उसीसे निकालकर चार वेद व्यक्त हुए मायासृष्टिके पहले जीवसृष्टि और ब्रह्मसृष्टि दो सृष्टि थीं उसमें स्वसंवेद था स्वसंवेद स्वयम् सत्पुरुषका वचन है । उसके प्रथम कोई नहीं है । वेदके आदिमें स्वसंवेद था, अंतमें भी वही रहेगा, वही सर्वदा रहता है ।

५९ प्रश्न—भजनकी विधि, भजन किस प्रकार किया जाता है ? उसकी कितनी रीतियाँ हैं ?

उत्तर—साधारण नियम यह है कि, अपने गुरुकी आज्ञानुसार भजन कर-गुरु भक्ति, साधु सेवा तथा तपस्यामें स्वयम् मग्न हो जाना ॥


? सत्य पुरुषके लोकमें पहुँचानेवाली विद्याको परा विद्या या स्वसंवेद कहते हैं वो भी वेदोंमेंही है ज्ञान चिन्तामें वही प्रधान है इस कारण प्रधान पहिला एवं अप्रधान पीछे कहा जा सकता है । क्योंकि, जो जिसके कार्योंमें न आवे वो उसके जाने पीछाही है इसी प्रकार जो कबीर दर्शनमें परा विद्या विषयक साहित्य है वो तो उसी समयका कहा जा सकता है उसका वर्ण विन्यास भी उसी समयका होगा यह शब्द आदिमें उर्दू आदि आज कालकी भाषाओंके शब्दोंको देखनेसे जाना जाता है पर उसका जो परा विद्या विषयक तात्पर्य है वो ही स्वसंवेद कहला सकता है उसेही ज्ञान चिन्तावाले मुख्य कह सकते हैं एवं तात्पर्य मुख्य है वही स्वसंवेद है अन्य नहीं ।

६० प्रश्न—एकदेशी और सर्वदेशीका निर्णय, ब्रह्मको सर्वदेशी सम कहते हैं इस कारण सब धर्मोंमें समान है ही। कबीर साहब और पारख गुरुको बिना दूसरे स्थानमें न मिलेगा तो सर्वव्यापी और सम नहीं हुआ ?

उत्तर—निःसन्देह वह सब धर्मों, सब स्थानों और सभी पदार्थोंमें समान भावसे व्यापक है। आत्मा चारों खानिमें एक समानही व्यापक है उसमें न्यूनता अधिकता नहीं पर जहाँ जिस रंगमें होता है वही उसका रूप हो जाता है जैसे सब जीवधारियोंमें एकही आत्मा है तो भी मनुष्य शरीरबिना पूर्णता किसीको प्राप्त नहीं होती ; इसी प्रकार सर्वव्यापक होनेपर भी पारखगुरु बिना ब्रह्मका जानना असम्भव है। जैसे स्फटिकमणिके निकट जैसा फल पड़ा हो जैसाही प्रतिबिम्ब उसमें पड़ेगा, जैसा रङ्ग उसके सन्मुख होगा वह उसी रङ्गका बन जावेगा। इसी प्रकार शुद्ध आत्मामें नाना कर्मोंका नाना रङ्ग चढ़ रहा है। एक रङ्ग हटा दूसरा आ उपस्थित हुआ जब तक सद्गुरु इन कर्मोंका धोका न अलग करे तब तक शुद्ध नहीं हो सकता।

६१ प्रश्न—भक्ति करनेयोग्य और बन्धमुक्त—किसकी भक्ति करनी चाहिये।

उत्तर—जो कर्मोंके जालसे निकला हो जिसके ऊपर कर्मका बल न हो उसकी भक्ति करनी चाहिये।

६२—प्रश्न—आप समझाकर कहिये कि, कौन बद्ध और कौन मुक्त है ?

उत्तर—वेद जिसकी प्रशंसा करता है जिसको किताब वर्णन करते हैं वही बद्ध है। स्वसंवेद जिसको कहते हैं वही मुक्त है उसीकी भक्ति करनी चाहिये।

६३ प्रश्न—किस प्रकार सत्पुरुषकी भक्ति करनी चाहिये ?

उत्तर— सत्पुरुषकी भक्ति कामना रहित होकर करनेसे फलदायक होती है।

इसीपर एक कथा—एक गाँवमें एक साधु रहा करता था। उसके पास एक वृक्ष था जिसके नीचे मूर्तिपूजा हुआ करती थी देखते देखते उस साधुको बहुत क्रोध चढ़ा, कुल्हाड़ी लेकर वृक्षको काटने चला। मार्गमें एक मनुष्य मिला, उसने पूछा कि, कहाँ जाते हो महाराज ? साधुने कहा कि, मैं उस वृक्षको काटने जाता हूँ। उसने मना किया पर साधुने नहीं माना। दोनों में मल्ल युद्ध होने लगा ; साधुकी जय हुई। साधुने मनुष्यको पछाड़ा। फिर उस आदमीने कहा कि, यदि तू उस वृक्षको न काटे तो तुझे मैं नित्य पांच सुवर्ण मुद्रा (अशरफी) दिया करूँगा। वह साधु इस बात पर सहमत हुआ, वृक्षको काटना छोड़के अपने घर

को चला । दो चार दिनतक अशरफी देकर उस आदमीने अशरफी देना बन्दकर दिया, साधु फिर वृक्ष काटने चला । मार्गमें वही मनुष्यमिला । पूछा कहाँ जाता है ? साधुने कहा वृक्ष काटने । इस पर उसने कहा सावधान ! यदि अब वृक्ष काटनेका विचार रखेगा तो तुझे मार डालूंगा । साधुने उसका कहना न माना तब फिर दोनोंमें मल्लयुद्ध आरम्भ हुआ अबकी साधु हारा, उक्त मनुष्य उसे पछाड़ कर छाती पर बैठकर कहने लगा कि, अब मैं तेरा शिर काटता हूँ । पश्चात् साधूके बहुत गिड़गिड़ाने पर उसे छोड़ दिया । छूटनेपर साधूने पूछा कि कृपा कर यह बतलाओ कि तुम कौन हो ? इसका क्या कारण है कि प्रथम मैंने तुमको पछाड़ा था पर अब मैं हार गया । उसने उत्तर दिया मैं शैतान हूँ ; तुमने प्रथम मेरे ऊपर जय प्राप्त की वह तुम्हारी निष्कामताका फल था ; उस समय तुम्हारी दृष्टि परमार्थपर थी इसी कारण तुममें ईश्वरी बलका आवेश हुआ था पर अब तुमने अशरफी न मिलनेके कारण क्रोधित हो स्वार्थवश वृक्ष काटने का संकल्प किया इसी कारण मैंने तुमको जीत लिया ।

इससे यह प्रसिद्ध हुआ कि, जो निष्काम होकर सच्चे मनसे ईश्वरकी भक्ति करता है वह ईश्वरको प्यारा होजाता है पर जो कामना सहित भजन करता है उसका फल भी वैसा ही पाता है ।

६४ प्रश्न— धर्मके चार चरण, कौन कौनसे हैं ?

उत्तर—सत्य, शौच दान और दया, यही धर्मके चार चरण हैं । तिनमें प्रथम सत्य उसे कहते हैं जो कि, बाहिर और अंतर किसी प्रकारसे असत्यका लेश न हो । महाराजा युधिष्ठिरको कृष्ण भगवान्ने अश्वत्थामाके मरनेकी संदिग्ध द्व्यर्थक बात कहलाकर सत्यके रूपमें झूठ बोलवा दिया । जिससे अश्वत्थामाके जीवित रहनेपर भी द्रोणाचार्यने उसे मरा जान प्राण त्याग कर दिया । इस प्रकार संशय युक्त दो अर्थसूचक वाक्यको कहना भी असत्य ही होता है, उसे सत्य नहीं कह सकते । जैसे देखा, सुना, पढ़ा, अनुभव किया हो वैसाही कहना सत्य है ; सन्देह भरी बात कहना असत्यमें परिगणित होता है । सत्यके छः स्थान हैं जो इन छः स्थानोंको प्राप्त होगा वह अवश्य सत्यताको प्राप्त कर लेगा ॥

प्रथम—ईमानकी सच्चाई अर्थात् कभी किसीसे झूठ न बोले ।

दूसरी—ईश्वर से सत्य और निष्कपट हृदयसे प्रार्थना करे । यदि मन कहीं दूसरे स्थानमें हो तो कहे कि, हे प्रभु ! मैं तेरी प्रार्थना करता हूँ तब उस समय ईश्वरसे झूठ बोला । यदि मन संसारके पदार्थोंमें मोहित हो अपनेको

विविध उपदेश संग्रह

ईश्वरका भक्त अथवा सेवक कहे तो उसने झूठा संसारको ठगनेका मार्ग निकाला जब तक समस्त संसारकी वासनासे रहित न हो तब तक परमात्माका भक्त नहीं हो सकता तबही संसारसे रहित हो सकता है जब अपना आपा न रहे। ईश्वरके अतिरिक्त अन्य कुछ उसकी दृष्टिमें शेष न रहे। ईश्वरच्छामें ही संतुष्ट रहे। भक्तिमें पूर्ण सत्यता यही है जिसको वह पद प्राप्त नहीं है, वह सत्यधारी भी नहीं है।

तीसरी—सत्यता भावनामें है जिसकी भावना शुद्ध है वह ईश्वरको प्राप्त कर सकता जिसको ईश्वर प्राप्त करनेकी दृढ़ इच्छा हो उसकी भावना शुद्ध होनी चाहिये। यदि भावना शुद्ध न हो तो सब भाव भक्ति व्यर्थ हो जावेगी।

चौथी सत्यता—प्रतिज्ञामें होती है; जैसे कोई पुरुष ऐसी प्रतिज्ञा करे कि, जब मैं राज्य पाऊँगा न्यायसे वर्तूंगा। ऐसी प्रतिज्ञा कभी तो दृढ़ और कभी निर्बल होती है। दृढ़ प्रतिज्ञाको ही सत्य कहते हैं।

पाँचवीं—प्रतिज्ञा पालनमें सत्यता होती है। जैसे कोई पुरुष युद्धके समय प्रतिज्ञा करे कि, मैं रणभूमिमें जाकर सच्ची शूरता दिखलाऊँगा। जिन्हे २ लड़ाई करूँगा, यदि वह समय पर अपने वचनका पालन करे तो सच्चा नहीं तो झूठाही है।

छठी—सत्यता यह है कि, जैसा—अपने अंतरमें हो वैसाही बाहर भी जाहिर करे। यह बात अंतःकरणकी शुद्धता और सरलतासे होती है। जिसका भीतर बाहर समान है वही सत्यधारी है। जो अपने हृदयगत भावको छिपा कर दूसरा प्रगट करता है; वह कपटी झूठा; दाम्भिक होता है ऐसे नर पशुओंको सत्यका मार्ग नहीं प्राप्त होता। ऐसे दाम्भिक मखोंने जगत्को भ्रष्ट कर रक्खा है। दान और दयाकी दुर्दशा ऐसे ही धूर्तोंने की है।

सातवीं सत्यता—वहाँ होती है जहाँ कि धार्मिक नियमों अत्मिक विचारोंमें केवल दूसरोंके वचन अथवा शास्त्रोंके वाक्यों परही भरोसा न रखकर अपने अन्तःकरणमें भी विचार और तर्कद्वारा उसकी सत्यताको ज्ञान बूझकर उसे स्वीकार करे। अपने आत्माके विरुद्ध किसीभी कर्ममें प्रवृत्त न हो। जिसमें संयम, संतोष, आशा, भय अनुराग, प्रोति, भक्ति आदि गुण शुद्धता और अंतरीय भावपूर्वक हो उसे सत्यधारी कहते हैं। जिसका विश्वास निर्बलता रहित दृढ़ धर्म परायण हो उसेही सत्यधारीकी पदवी शोभती है। जैसे यदि किसीको किसी प्रकारका भय हो तो उसका मुख सूख जाता है, मुखका रंग पीला हो जाता है, खान पान अच्छा नहीं लगता, चित्तमें व्यग्रता रहती है। यदि इसी

प्रकार कोई परमात्मासे भय करे तो उसका भय सच्चा कहा जा सकता है । यदि कोई कहे कि, मैं पापसे डरता हूँ और पाप भी करता जावे तो वह झूठा है ।

ऊपर कही हुई रीतियोंसे सत्यताकी अवस्थाओंमें भेद है । इन सातों अवस्थाओंमें जो दृढ़ताको धारण कर सत्य परायण हो वही पूरा सत्यधारी हो सकता है । अन्य सत्यताके सब भेद इन्हीं सातोंके अन्तर्गत हैं । जितनी जिसमें सत्यता बढ़ती जायगी उतनीही उसकी उच्चता बढ़ेगी ।

सब सांसारिक, तपस्वी, विद्याभिमानी आदि नष्ट और दुःखी हैं यदि उनमें शुद्धता और निष्कामता न हो । सत्यता और शुद्धता कांक्षा (नियत) में होती है । जो कोई ऋण लेकर पीछे देनेकी कांक्षा न रखे तो वह चोर है । यदि शुभकर्म करनेका बल न हो तो शुभ कांक्षा रखे । शुभ इच्छाका फल बहुत है जब कांक्षामें ही भेद आया तो सब नष्ट हुआ ।

शौच या शुद्धि ।

शौच नाम शुद्धिका है; दो प्रकारकी होती है । एक बहिरङ्ग तथा दूसरी अन्तरंग है । बहिरङ्गशुद्धि जल मिट्टी आदिसे होती है । अन्तरंग विवेक और विचारसे । ईर्षा, कपट, छल शत्रुता आदि आसुरी गुणोंको विवेक विचारके बलसे त्याग कर अन्तरंग शुद्धता प्राप्त करनाही सब धर्मोंवाले सामान्य भावसे मानते हैं । शुद्धतासे रहना ईश्वर सेवा और अर्थ धर्म है ईश्वर शुद्ध और स्वच्छ लोगोंको स्वीकार करता है इससे यह न समझना चाहिये कि, शरीरकी शुद्धि और स्वच्छतासे आशय है वरण शुद्धताकी चार श्रेणी हैं ।

प्रथम—ईश्वरके अतिरिक्त हृदयमें दूसरेको स्थान न दे यानी परमात्माके सिवा सब लौकिक और पारलौकिक पदार्थोंसे असक्ति उठा दे.

द्वितीय श्रेणी—यह है कि, अन्तःकरणको ईर्षा, कपट, अभिमान, दम्भ आदिसे शुद्ध रखे नम्रता, धैर्य, सन्तोष, पश्चात्ताप, ईश्वरी भय, प्रेम आदि शुभ गुणोंको धारण करे । देवी सम्पत्तिसे पूर्णता प्राप्त करे । यही संयमियोंका कर्तव्य है ।

तृतीय—चुगली करना, अधर्मका खाना, विश्वासघात करना, पराई स्त्रीको कुट्टितसे देखना आदि घृणित पापोंसे अपनी इन्द्रियोंको शुद्ध रखे । यह तपस्वियोंका पद है । भोजनादि शुभ और स्वच्छ रखना अत्यन्त आवश्यक है । भूलसे भी अखाद्य अथवा निषिद्ध वस्तुको ग्रहण न करे । क्योंकि, जैसा भोजन होता है वैसेही बुद्धि होती है ।

चतुर्थ श्रेणी—शौचकी वस्त्र और स्थानादिकी स्वच्छता है यद्यपि वर्हि-
ग शौच अन्तरङ्गकी अपेक्षा तुच्छ कहा जाता है तो भी इसकी बहुत श्रेष्ठता
है, पर बहिर शौचमें नीचे लिखी बातोंका अवश्य ध्यान रखना चाहिये ।

प्रथम^१^ बहिरंग शौच स्नानादिमें इतनी अधिकता न करे कि, उससे
किसी आवश्यक काममें हानि हो। प्रायः पाखण्डी लोग बारंबार स्नान करके भी
अपनेको अशुद्धही मानते हैं, दिनभर विक्षिप्त चित्तोंके समान सन्देहमेंही पड़े
रहते हैं । ऐसे लोगोंसे लोक परलोकका कुछभी उत्तम साधन नहीं होसक्ता ।
जैसे विद्यार्थी अथवा परिश्रमी जिनको [ स्वयम् परिश्रम करके रोटी उपार्जन
करनी पड़ती है ] “पुरुषों” को शौच स्थानमें अधिकता करना हानिकारक है ।

द्वितीय—दम्भ और पाखण्डसे बचता रहे, स्नादिकी अधिकतासे दम्भी
मनुष्य अपनेको संसारमें बड़ा माहात्मा एवं शुद्ध प्रगट करते हैं अज्ञानी लोग
उनको प्रशंसा और बड़ाई करते हैं जिससे वे बारंबार उसीमें अधिक प्रवृत्त होते
हैं । जैसा कि कुछ लोग करते हैं ।

तृतीय—अवकाश और सामर्थ्य रहते हुये आलसादि कारणोंसे स्नानादि
शौचकी क्रियाका कभी त्याग न करे ।

चतुर्थ^२^—जिस शौचादि क्रियासे किसी जीवधारीको दुःख होता हो उसे
त्याग देना चाहिये क्योंकि, वह शुचि हिंसाजनक होनेसे अधर्म है । कोई पुरुष


१—कोई कोई पुरुष संशय युक्त चित्तबाले होते हैं उनके मनमें सन्देहही बना रहता है कि,
न जाने यथार्थ शुद्ध हुई कि, नहीं ? ऐसे सन्देह में पड़ा हुआ मनुष्य शुचिके यथार्थ साधनों को
छोड़कर पाखण्डमें फँस जाता है । जैसा कि, प्रथम तो भोग और कामको अशुचि — जान
उसके संयममें लगता है फिर उसमेंभी सन्देह उठाकर भोग और कामकी प्रवृत्तिकोही शुचिका
हेतु समझकर उसकी प्रवृत्तिमें लग जाता है । फिर क्या या धृष्टताके साथ खुल ख़ेलता है
अपने उत्तम पदसे पतित हो जाता है । ऐसे पुरुषोंको कोई योग्य महात्मा पुरुष यथार्थ शुचिताका
उपदेश करे तो उसमें संशययुक्त हो बारम्बार संकल्प विकल्प करता हुआ मनही मन विचार
करता है कि, न जाने यह यथार्थ स्नान है कि, नहीं ? इस स्नानसे मैं शुद्ध होऊँगा कि नहीं ?
जो मुझे उपदेश करता है वह स्वयम् पवित्र महात्मा है कि नहीं ? ऐसे २ संशय करके उसके
उपदेशको छोड़ दूसरेकी शिक्षा सुननेमें लग जाता है । इसी प्रकार होते होते किसीकी बाहिरी
चटक मटक और गपोड़में फँसकर उसके दोषोंको न विचारता हुआ अनाचार्यमें प्रवृत्त हो पापका
भागी बनता है । दुःख पड़नेपर उससे विरक्त हो अन्यके पास जाता है वहाँसे भी दूसरेकी
शरण लेता है । ऐसे संशयात्मक पुरुषोंको कभी भी पवित्रता नहीं दीखती कभी न सुखकीही
प्राप्ति होती है वरन् सर्वदा शोकित रहता है ।

२ आजकल प्रायः दाम्भिक लोग ऐसा करते हैं कि, उनकी मण्डलीमें कोई किसी रोगके
कारण नहा न सके तो उसे छूनेमेंभी पाप समझते हैं । जबतक वह स्नान न करले तबतक
चाहे वह प्याससे मर भी जाय पर जल देना नहीं चाहते वरन् उसे भ्रष्ट, अशुद्ध आदि कठोर
शब्दोंसे दुखी करते हैं ।

किसीसे मिलना चाहता हो पर वह अपने शुद्धिके अभिमानमें उससे घृणा करे तो यह कुकर्म हैं इसे त्यागना उचित है ।

पंचम—भोजनमें संयम आवश्यक है । शुद्ध भोजन ग्रहण करे अशुद्ध न करे ।

षष्ठम—संयममें इतनी अधिकता न करे जिससे दूसरोंको हानि पहुँचे । कोई तो किसीके आवश्यक कामको छोड़ करभी खड़ा रहे पर यह स्नान करनेमेंही दो चार घण्टा लगा दे ।

स्नानके भेद—स्नान दो प्रकारका है १ अन्तरङ्ग, २ बहिरङ्ग । अन्तरङ्ग । स्नान तीन प्रकारसे होता ॥ १—अन्तरङ्ग स्नान यह कि, सब अंगोंको पापसे शुद्ध रखे ।

दूसरा—बुरी आदतोंसे अन्तःकरणको शुद्ध रखे ।

३—ईश्वरके सिवा दूसरेको न देखे ।

बहिरङ्ग शुद्धि—भी तीन प्रकारकी है ?

१—देह गेहूको मृत्तिका जलादिसे शुद्ध रखे ।

२—बिना माँगे किसीके पदार्थमें स्वत्व न रखे ।

३—शारीरके बाल, नख आदि पदार्थोंसे शुद्ध रखे, आँख, कान, नाक आदिको शुद्ध करता रहे । बहिरङ्ग शुद्धि जल और मिट्टीसे होती है । अन्तरङ्ग शुद्धि विचार और विवेकसे होती है ।

सूर्य, चन्द्र तथा देवस्थान अथवा किसी प्रतिष्ठित स्थानकी ओर पीठ करके मुत्र पुरीष करने न बैठे । अग्नि, जल, राख, पृथ्वीका छिद्र, कठिन और तपी हुई पृथ्वी, गौली पृथ्वी आदिमें भूलसे भी मल मूत्र न त्यागे ।

धर्मका तीसरा चरण—दान है । दान बहुत तरहके हैं । यदि दान सुपात्रको


१—काममें तीन दोष प्रधान हैं वे चोरी, व्यभिचार और हिंसा ये हैं ।

वाणीमें तीन दोष हैं—निन्दा, गाली और मिथ्या लाप ।

मनके—क्रोध, ईर्षा, मान, छल ये चार दोष हैं ।

२ दीन पुरुषोंपर दया करके अन्न, वस्त्र, धन आदिसे सहाय करनेको “दान” कहते हैं यद्यपि इसमें देशकाल पात्रका भी विचार आवश्यक है तो भी यथार्थ दाता इस विलम्बको योग्य नहीं समझता क्योंकि, मनका स्वभाव है कि, क्षणमात्रमेंही अनेक संकल्प विकल्प कर लेता है, क्या जाने कुछ क्षण पीछे देनेका संकल्पही जाता रहे । इसी कारण उदार पुरुषको जिस समय दानकी बुद्धि होती है उसी समय दान करता है विलम्ब नहीं करता ।

दो प्रकारका दान है ।

एक उत्तम और दूसरा अनुत्तम । वह उत्तम दान है जो कि, दीनको देखकर द्रवित-

दिया जाये तो अति उत्तम हो, बहुत पदार्थोंका दान दिया जाता है, वे चीजें—हाथी, घोड़ा, गाय, बैल, सोना, चांदी, वस्त्र, अनाज और कन्या पुस्तक आदि हैं। यदि दान गुप्त दिया जाये तो अति उत्तम हो। अपनी शक्ति और योग्यके अनुसार दान देना चाहिये। दानका पद बड़ा पुण्यमय है। दान पात्रको दान दिया हुआ उत्तम फल दायक है। जैसे सुपच सुदर्शनजीके पाँच कौल खानेहीसे महाराजा युधिष्ठिरका यज्ञ पूरा हो गया। यदि कोई ऐसा विचार करता रहे कि, सुपच सुदर्शनजी जैसा कोई साधु मिलेगा, तो दान देंगे, यह उसकी भूल है। इस प्रकार उदारता न करके तर्क वितर्क उठानेसे मनुष्य कृपण होकर दान जैसे उत्तम कर्मसे वंचित रहकर पापका भागी होता है। जो कृपणताके वश हुआ वह महानीच पापी होता है।

उससे उचित है कि, शूरवीर, धर्मबन्धु, सुकृत, विरक्त, दीन दास, दासी, विद्यार्थी, ऋणी आदि सब प्रकारके मनुष्य अथवा कोई भी जिसको जिस पदार्थकी आवश्यकता हो उसे दान दे। क्योंकि वही दानका अधिकारी है। मनुष्यको उचित है कि—

जो काहूके होय उपकारी । मन वच कर्म करि लेई विचारी ॥

पशुआ होयसो आँख छिपावे । मानुष बुद्धि सपने नहीं पावे ॥

दरिद्रतामें पड़े हुये किसी प्रतिष्ठित आदमीको, अपने धर्ममें आने वालेको चाहिये कि, अपने बालबच्चों, परिवार और सम्बन्धी, पड़ोसी और अतिथि आदि सब प्रकारके पुरुषोंकी सहायता कामना बिना करे। दुःखी पथिक अर्थात् अपने देशसे दूर देशमें किसी प्रकारसे दुःखी पड़े हुये मनुष्योंकी सहायता सब प्रकारसे करे। इसी प्रकार आवश्यकतानुसार बहुत प्रकारके दान हैं देशकालको विचारकर अवश्य इस अमूल्य पुण्यका संचय करे।

दान देनेकी रीति ।

१ दान देनेमें जहाँतक हो शीघ्रता करना चाहिये।

२ किसी पुण्य तिथिपर अथवा जब दान देना हो गुप्तदान दे। क्योंकिक गुप्तदानका फल अनन्त है।


—होकर दिया जाता है। अनुत्तम दान वह है जो कि, मान अथवा व्याप्तिके लिये अथवा किसी दूसरे दाताको जीतनेको बदलेकी आशा रखकर दिया जाय। दान केवल धन मात्रसेही नहीं होता वरन् विद्या दान, निर्भयता दान, मान दान आदि अनेक प्रकारके दान हैं जिन्हें निर्धन भी कर सकते हैं। यदि दानके विशेष विवरण देखने हों तो स्मृति ग्रन्थोंको देखो तथा उच्च कोटिके साहित्य देखो।

३ दान देनेमें दम्भ और पाखण्ड न करे ।

४ किसीको दान देतीवार अपनी कृतज्ञता प्रकट न करे ।

५ दान लेनेवालेको तुच्छ न समझे बरन् श्रेष्ठ समझकर निरभिमान हो अपना हाथ नीचे रखकर दे ।

६ अपनेको दाता जान अभिमान न करे बरन् ऐसा समझे कि, "लेनेवालेकी अत्यन्त कृपा है कि, जो मेरे दानको स्वीकार कर रहा है ।"

७ अपने धनमें जो उत्तम पदार्थ हो वही दानमें दे ।

जिसके घरसे भिक्षुक निराश फिरकर जाता है वो अपना सब पाप वहाँही छोड़कर जाता उस घरमें देवता सात दिनतक दृष्टि नहीं देते घरवालेका सब पुण्य फिरे हुये भिक्षुकको प्राप्त होता है ।

दान लेनेवालेका कर्तव्य ।

दान लेनेवालेको दान लेनेके प्रथमही विचार करलेना चाहिये कि, दान किस प्रकारका है। दाता किस लिये दान देता है जहाँतक हो सके सकाम दानको न ले । जो श्रद्धाहीन पुरुष केवल अपनी बड़ाई और ख्यातीके लिये अथवा लोक निन्दाके भयसे दान देता हो उसको न ले । जो कठोर वचन कहकर दान दे अथवा भोजन करावे उसका भी न ग्रहण करे । ऐसी ही बहुतसी बातोंका विचार करना चाहिये ।

गुरुकी आज्ञानुसार दान पुण्य करना चाहिये सब कर्तव्योंसे यदि गुरुकी सेवा और आज्ञाकारिता हो । उदार पुरुषोंका पद अत्यन्त श्रेष्ठ है । जो लोग अपनी आवश्यक वस्तुको भी देकर दूसरोंकी आवश्यकता पूर्ण करते हैं वे श्रेष्ठ उदार पुरुष ईश्वरके पूरे कृपापात्र होते हैं । उदार दानी पुरुष ईश्वरके मित्र हैं ऐसे पुरुषके सब अपराध क्षमा किये जाते हैं । दानीको जब किसी प्रकारका कष्ट उपस्थित होता है तो उसकी सहायता स्वयम् परमात्मा करता है । जिस पदार्थको देनेकी सामर्थ्य रखनेपर भी जो न दे उसे कृपण कहते हैं, जो संग्रह करनेके पदार्थको अवसर बिना व्यय करे उसे फजूल खर्ची कहते हैं ।

ईश्वरके मार्गमें अपने तन मन धनका मोह न करनाही सर्वोच्च उदारता है । जो निष्काम होकर उदारताका अवलम्बन करता है वह धन्य है । धन्य है वह पुरुष जो मृत्युको नहीं भूलता क्योंकि, ऐसा पुरुष कृपण नहीं हो सकता ।

दया ।

सब धर्मोंमें दया सबसे शिरोमणि है । किसी भी प्रकारकी तपस्या एवं भजन क्यों न करे यदि दयामें कुछ भी न्यूनता हुई, तो सब निष्फल हो जावेंगे ।

विद्याभिमानियों को उपदेश ईश्वर प्रेमियोंको उपदेश

जो संसारके जीवोंके साथ दया न करेगा उसपर ईश्वरकी भी दया न होगी। सृष्टिमें ईश्वर है, सृष्टि ईश्वरमें है। जो संसारमें किसीको दुख देता है वह ईश्वरको दुख देता है। दयाहीन कभी भी ईश्वरका पात्र नहीं हो सकता। पशु मनुष्य सब दुख दर्दमें एक बराबरही हैं। भेद इतनाही है कि, एक प्रबल एवं दूसरा निबल है। जो प्रबल निबलको दुख पहुँचावेगा वह यमराजके कोपानलका ईंधन बनेगा। जो किसीको सुख पहुँचावेगा वह दया सिन्धुकी कृपाका अवश्यही अधिकारी होगा।

तूने जो कुछ बोया है सो दरौ। गेहूँसे गेहूँ उगे जौ से जौ ॥

शब्द ॥ १० ॥ संतो राह दुनो हम दीठा ॥

हिन्दू तुरुक हटा नहि माने स्वाद सबनको मीठा ॥

हिन्दू वरत एकादशी साधें दूध सिंधारा सेती ॥

अन्नको त्यागें मन नहि हटके पारन करै सगौती ॥

तुरुक रोजा निमाज गुजारें बिस्मिल बाँग पुकारे।

उनकी विहिस्त कहाँसे होइहें सांझे मुर्गी मारे ॥

हिन्दूकी दया मिहर तुरुकनकी दोनो घटसे त्यागी।

वे हलाल वे झटका मारे आग दुनो घर लागी ॥

हिन्दू तुरुककी एक राह है सतगुरु यही बताई।

कहै कबीर सुनो हो संतो राम न कहूँ खुदाई ॥ १० ॥

बहुत प्रकार दया होती है। जिसके हृदयमें दया आई उसका बेंडा पार हुआ।

जैन साहित्यका मेष कुमार।

एक समय हाथियोंने ऐसा विचार किया कि, बनमें आग लगनेपर बहुत जीव भरते हैं, यदि कोई मैदान घास फूस और वृक्ष रहित हो तो आग लगनेके समय वहाँ जाकर सब बचसकें, निश्चय करके बहुतसे हाथियोंने मिलकर जङ्गलके एक भागसे वृक्ष आदि उखाड़ कर फेंक दिये जिससे एक स्वच्छ मैदान बन गया।

एक समय अग्नि लगनेपर हाथियोंसहित सब बनके जीवधारी उसी मैदानमें जा ठहरे। समस्त मैदान पशुओंसे भर गया कि, पौंव रखनेकी भी जगह नहीं रही।

हाथियोंका राजा विशालदन्त विशाल शरीरवाला भी सबके मध्यमें खड़ा था बहुत देर खड़े रहनेके कारन पैर सीधा करनेके लिये गजराजने अपना पग ऊपरको उठाया इतनेहीमें एक शशा खाली स्थान पाकर उसी स्थानपर आ

भारतवर्षकी धार्मिकावस्था

बैठा । गजराजने दयासे द्रवित हो शसाके दब जानेके विचारसे पग नीचे नहीं रखा । तीन पगपर खड़ा रहा । तीन दिनके पीछे जब अग्नि शांत हुई तो सब जीवोंके साथ शसाके चले जानेपर गजराजने पग सीधा करना चाहा पर अत्यन्त कष्ट सहित तीन पग परही खड़ा रहनेके कारण शारीरिक परिश्रम व रगोंके चढ़ जानेसे सीधा पग नहीं हो सका बरण मुंहके बल गिरकर मर गया । उस दयाके प्रतापसे गजराज मरकर मगध देशका चक्रवर्ती राजा हुआ । जिसदिन महाराजा श्रेणकके घर उसका जन्म हुआ उसी दिन इतनी वर्षा हुई कि, वर्षोंसे अवर्षणके कष्टको सहती हुई प्रजाको महान् सुख प्राप्त हुआ इसी कारण कुमार का नाम मेघकुमार रखा गया ।

पश्चात् बहुत कालतक सुख भोगकर संसार विरक्त हो मोक्षका भागी हुआ इसी प्रकार दयाके बहुत दृष्टान्त हैं । धन्य हैं, वे जीव, जो दयाको अपना धर्म जानते हैं । उनके ऊपर धिक्कार है जो शक्ति रहते हुये भी दया नहीं करते ; परोपकारसे भागते हैं । धिक्कार उनकी अवस्थापर शोक और बारम्बार है जो कि, सहस्रों प्रकारकी हिंसा करते हुये भी स्वर्गकी आशा रखते हैं ।

मनुष्यको चाहिये कि, किसी प्रकारका दुःखी रोगी और दुर्बल, बुद्धि आदि जीवकी रक्षा करे अपनी शक्तिके अनुसार कभी पीछे पग न टारे ।

धर्मके चार वैरी ।

जिस प्रकार धर्मके चार मूल बतलाये हैं, उसी तरह धर्मके चार शत्रु भी हैं । उनका नाम-१ काम, २ क्रोध, ३ लोभ और ४ मोह है ।

काम-ऐसा प्रबल शत्रु है कि, मनुष्यको अंधा बना देनेमें इससे बढ़कर दूसरा कोई भी नहीं है । आठ प्रकारके मैथुनसे बचना अत्यन्त कठिन काम है । बड़े २ सिद्ध साधु तपस्वी महात्मा किसी न किसी प्रकार कामके वश हो जाते हैं । सहस्रों ऋषि मुनि और तपस्वियोंको इसने वारंवार नीचा दिखलाया है ।

मुसद्दस ।

मलिक व जिन्न व इन्स और इशरात । सारा आलम है तेरेही बरकात ॥
तुझसे कायम तनासुल आलात । रूह सारे फँसे व मज खूर फ़ात ॥

१ यह कथा जैन धर्मग्रन्थोंमें आई है मेघकुमारके श्रान्त होनेपर महावीर स्वामीने उसे इसके पूर्वजन्मकी कथा सुनाई थी वह थकनका मारा महावीर, स्वामीसे कह उठा था कि, महाराज ! अब मुझसे इस घाममें नहीं चला जाता, अब निर्गन्थियोंकी तपस्याके कष्ट नहीं उठाये जा सकते । उस समय चौबीसवें तीर्थंकरने उसके पूर्व जन्मकी कथा तथा उसी पुण्यसे राजकुमार होनेका वर्णन किया था । जैन साहित्य ऐसीही दिव्य कथाओंसे भरा पड़ा है । सच पूछिये तो वास्तविक जैन मत तो दया है ।

परधर्म और पर विद्यामें श्रद्धा

छोड़ हरगिज नता दम सुकराद । तुफ्फ तुझ पर ऐ शहवात वह जात ॥
मायाने मार सबको काम छुरा । करदिया पहले काल हाल बुरा ॥
रही ब्रह्माको भी न शर्म जरा । विष्णु तन, घरके बघरको फिरा ॥
शिव ऊपर लाई मोहिनी आकात । तुफ्फ तुझ पर ऐ शहवात बद जात ॥
शृंगी ऋषिसे बुजुरगें शाहिदथे । जो उवादतमें अहद वाहिद थे ॥
हवस नफ़सानीके न शाहिदथे । गैवके मूजिदव मनाहिद थे ॥
उनके सर परभी धर दिया तू लात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बद जात ॥
भडकी शहवतकी आग जब अन्दर । इन्दर विल्ली हुये नारद वन्दर ॥
सग बनाया तुही विश्वामितर । चन्द्रमाँ मूर्ग कोई हरिण तीतर ॥
आरिफोंको दिया तू यह दरजात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
जाहिदोआविदो धर्म मूरत । दिल मनौवर हो देख जो सूरत ॥
कौड़ीकां कर दिया है यह औरत । अन्ध गलताँ हो गलवये शहवत ॥
रह बदकारीकी बताया घात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
रहते जो खुशक बर्गको खाकर । निकली उस-तनसे शहवत अखगर ॥
रोज रोशनको कर दिया था रात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
लंक रावणका कर दिया बरबाद । महाभारत भी द्रौपदी फिरियाद ॥
जंग तिरौचन भये उसे कीजे याद । मर गये बेशुमार हो नाशाद ॥
जिनकी कोई कभी न पूछे बात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
बाद शाहतको तू मिला दे गर्द । गाज़ी और पहलवान करे दिल सर्द ॥
आजिज इस सा न कोई बेदर्द । ओलिया अम्बिया करे बेपर्द ॥
यह बड़ा एक खवीस है हैहात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥

प्रारब्ध और पुरुषार्थ ।

६५ प्रश्न—शूर वीरतासे प्रारब्ध मिट जाता है ?

उत्तर—उदारता, दीनता, न्याय और शील ये चारों पुण्यके मूल हैं । जो कोई इनको भलीप्रकार धारण करेगा, जिसमें ये चारों गुण अखण्ड रहेंगे, वह प्रारब्धको भी मिटा सकता है । ये गुण जिसमें होते हैं उसको ईश्वरी सहायता मिलती है । पर कोई २ प्रारब्धही ऐसी होती है जिसको भोगे बिना छुटकारा नहीं होता ।

योग वासिष्ठकी कथा—एक समय भृगुमुनि अखण्ड ध्यानमें निमग्न हो तपस्या कर रहे थे । उनके पुत्र शुक्रजी सेवा करते हुए योग्यतानुसार भजन भी किया करते थे । एक समय एक अप्सरा उधरसे आ निकली । शुक्रको देख-

उचित कर्तव्य कैसा धर्मस्वीकार करना चाहिये

कर मोहित होगई । शुक्र बड़े सुन्दर और कान्तिमान् थे । शुक्रकी दृष्टि भी उस अप्सरापर पड़ी । यह भी उसपर मोहित होगये । वह स्वर्गको चली गई । इधर उसीकी चिन्तामें शुक्रजीका शरीर छूट गया । अब दिव्य शरीर पाकर शुक्र स्वर्ग लोक पहुँचे राजा इन्द्रने शुक्रको आते देखकर सिंहासनसे उठ बहुत आदर मानसे बैठकर कहा कि, आपने बड़ा अनुग्रह किया, आप कुछ काल तक यहीं निवास कीजिये । शुक्र वहीं रहने लगे । एक दिन नन्दनवनमें भ्रमण करते २ वही अप्सरा दृष्टि पड़ी अप्सराने भी उन्हें देखा । अब क्या था दोनों ओरसे प्रेमसे ऐसी उमङ्ग मारी कि, दोनों एक क्षणभी अलग न रह सकें । लज्जावश हो शुक्रजीने तपोबलसे कुहेरा उत्पन्न किया चारों दिशामें अंधेरा छागया शुक्र और अप्सरा दोनोंने कामविलास करना आरम्भ किया, स्वर्गीय आयु क्षीण होनेपर दोनोंने स्वर्गसे गिरकर पृथ्वीपर जन्म धारण किया । शुक्रने तो एक ब्राह्मणके घर और अप्सराने एक राजाके घर जन्म लिया । समय पाकर राजकन्याने पूर्वके पतिके लिये शिवका आराधन आरम्भ किया । कुछ काल बीते पीछे राजकुमारीका स्वयंवर रचा गया। अनेक देशोंके राजकुमार आये उसके साथ २ ब्राह्मण भी अपने पुत्रसहित वहाँ आया । राजकुमारीने ब्राह्मण कुमारको माला पहिनायी । वो राजमहलमेंही रहने लगा । राजाको इस पुत्रीके सिवा दूसरी संतान न होनेके कारण वही ब्राह्मणकुमार राज्याधिकारी हो, बहुत कालतक राज्यकर मृत्युको प्राप्त हो, क्रमशः मछुआ और हिरण हो अंतमें फिर एक ब्राह्मणके घरमें जन्मा । अबकी बार पहिले पुण्यके प्रतापसे उसे संसारसे वैराग्य हुआ सबसे विरक्त हो गंगातटपर बैठे ध्यानमें निमग्न हुआ । इधर समय पाकर जब भृगुमुनिका ध्यान खुला तबतक शुक्रके पाँच जन्म हो चुके थे,

आंख खोलकर पुत्रका चारों ओर अन्वेषण करनेपर पुत्रको नहीं पाया वरन् उसकी सूखी हुयी मृतक देह मिली । यह देखतेही कालपुरुष पर अत्यन्त क्रोधित हो भृगुजीने कालपुरुषको शाप देना चाहा तो वो उनके सम्मुख आकर कहने लगा ।

उस समय कालपुरुषकी मूर्ति महाभयानक दीख पड़ती थी उसकी तीनों आंखें तीन सूर्योंके समान प्रकाशित और प्रदीप्त हो रहीं थीं । हाथमें त्रिशूल लिये हुये था । त्रिशूलमेंसे आगकी ज्वालाएँ निकलती थीं कालपुरुषने कहा कि तुम्हारे भस्म करनेसे मैं भस्मभी नहीं हो सकता । जो जैसा कर्म करता है मैं उसको वैसाही फल देता हूँ । तुम्हारे पुत्रने स्वयम् अपने कर्मानुसार फल पाया है । इतना कहकर कालपुरुषने शुक्रका सब हाल कह सुनाया ।