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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

इससे पाठकोंको अच्छी तरह मालूम हो गया होगा कि, सत्य पुरुष ही कबीर हैं । सद्गुरुके मुखसे निकले हुए वाक्योंको अच्छी तरह समझो उसके बिना दूसरा कोई भी उसे परास्त नहीं कर सकता ।

यहाँपर इस विषयके लिखनेसे मेरा यही अभिप्राय है कि, पाठकगणोंको विदित हो कि, यह वही कबीर साहब हैं जिनके सम्मुख निरञ्जन तथा आद्याका गर्व चूर्ण हो गया । फिर दूसरा कौन है एवं उसमें क्या सामर्थ्य तथा बल है जो इनकी समता कर सकता है, इस कबीरके सम्मुख किसका गर्व रह सकता है, ये दोनों बड़े बलिष्ठ तथा प्रभावशाली थे परन्तु कबीर साहबके चरणोंपर गिरकर आधीन हुए । ऐसे कबीर साहबको जो "मनुष्य" जाने यह उसकी भूल है क्योंकि वे मनुष्य नहीं हैं । सत्यपुरुष हैं स्वयम् मालिक धनी हैं । यह अन्धा जीव उनको पहचानता नहीं, इसी कारण भवसागरमें पड़कर गोते खाया करता है । जो मनुष्य होगा वह अवश्यही विचार करेगा कि, आद्या तथा निरञ्जन जैसे सर्वशक्तिमान् संसारके सिर्जनहार जिसके चरणोंपर गिरकर नम्रता करें वह "मनुष्य" कैसे ठहर सकता है ? वह तो निस्संदेह स्वयम् सत्यपुरुषका प्यारा भक्त है जिसे सत्य-पुरुषने अपनी समता दे रखी है; दूसरा कोई नहीं है ।

वेही कबीर साहब पृथिवीपर आकर मनुष्योंको उपदेश करते हैं । फिर जो कोई उससे विमुख हुआ उसका कहाँ ठिकाना रहा ? वह निश्चयही आद्या तथा निरञ्जनके आधीन होगा । जो स्वयम् विमुख होगा उसका तो यह दण्ड है । जो स्वयम् विमुख नहीं है पीछेसे उसके अनुयायीही विमुख हुए हैं तो वे आचार्य्य निपराध ठहरेंगे, केवल उनके अनुयायीही दण्ड पावेंगे । इस लिये उन्हें भी भिन्न पन्थमें रहकर भी सच्चे गुरुकी भवितसे विमुख न होना चाहिये । नाम मालामें भी यही विषय आया है उसको भी यहीं उद्धृत करते हैं —

नाममालाका संक्षेप

कबीर-कथा रसाल' कहीं कछु वाणी । जो बूझे सोई ब्रह्मज्ञानी ॥
यह गुरु गम' सन्त कोई लेखे । प्रकट ज्ञान तब तत्त्व परेखे' ॥
अनुभवादि कछु कहूं वखानी* । सुनिये सद्गुरु गमकी' वाणी ॥
अनन्त कोटि युग एक चलि गयेऊ । अचल अमान' तत्त्वमें रहेऊ ॥
साठ कोटि युग और जो बीता । सृष्टि करन तब इच्छा कीता* ॥
वह तो पुरुष अचल बेअन्ता । बिन गुरु दया न भज भगवन्ता ॥
कोटि कथै कछु कथन न पावै । जब लगि नहिं गुरु गम वतलावै ॥

साखी पद कोटिन बहु वाणी । पुरुष एकको सुमिरौ प्राणी ॥
ज्ञान सुरति औ शब्द अपारा । यह सब दिया तब किया पसारा ।
अचल पुरुष सुमिरे जो कोई । जीवितमुक्ति^१^ तासुकी होई ॥
साखी पद बोले बहु वाणी । आदिनाम कोई विरला जानी ॥

साखी—कहैं कबीर निज नाम विनु, मिथ्या जन्म गवौंय ।

निर्भय मुक्ति निःअक्षर^२^, गुरु विनु कबहुँ न पाय ॥

चौ०—अगम अगोचर अति व्यवहारा । कहन सुननसे होवैं पारा ।

यह धन राखि जीवकी नौई । करो बणिज टोटा कछु नाहीं ॥

यह पूँजी है अगम अपारा । खरचै खाय बडे विस्तारा ॥

यह धन मिले जब भाग बडेरा । धन सञ्चित गाँहक भितेरा ॥

साखी—पूँजी मेरा नाम है, जाते सदा निहाल ।

कहैं कबीर जो पुरुष बल, चोरी करै न काल ॥

चौ०—जो जो जिव निज नामहि जाना । भये मुक्त सो पुरुष समाना ॥

सोई जीव हंसका लेखा । अक्षर में निःअक्षर देखा ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मदास दास के दासा । सद्गुरु मेटो मेरी आसा ॥

नाम निःअक्षर केहि उत्पाना^४^ । अकथ कथा तब कैसै जाना ॥

सत्यगुरु वचन

कह कबीर सुन धर्मनि बानी । अकथ कथा तोहि कहूँ बखानी ॥

तब नहि लोक वेद वस्तारा । तब नहि कूरम नहि संसारा ॥

नहि तब धरणी अमर सुमेरु । नहि तब हते जो इन्द्र कुबेरु ॥

तब नहि सृष्टी सकल पसारा । आप आप थे अकह निनारा ॥

सकल सृष्टि उत्पति कछु नाहीं । तब सब रहे अकहके माहीं ॥

होते आप तब शब्द न सवाला । इच्छा भई तब कीन्ह उँजाला^५^ ॥

इच्छाते अनहद^६^ धुनि बानी । सुरति सम्हार सृष्टि उत्पानी ॥

इच्छा अनुभव शब्द उपाना । सुरति^७^ निरति ता मांहि समाना ॥

तबते अच्छर भेद बिचारा । साखी शब्द कीन संसारा ॥

अकह अचल पुरुष तेहि आपू । नहीं तहां दुःख सन्तापू ॥

सबका मूल वाहि सो लागा । उलटसमाय होई बड़ भागा ॥

निर्भय हो सो करे गुरवाई । गुप्त मता में कहूँ समझाई ॥

१ जीवनमुक्ति, २ रामनाम, ३ अक्षर रहित, ४ उत्पन्न किया, ५ प्रकाश, ६ पराध्वनि या दशमध्वनि, ७ अजपा जापभी ।

साखी-सुरति निरति ले खेलई, रहि सूरति लवलीन ।
कहैं कबीर ते सुरतिसे, निश्चय पुरुषहि चीन्ह ॥
सुरति सँभारे काज है, राखो सुरति सँभार ।
सुरति सँभारे मुक्ति है, जाय पुरुष दरबार ॥
जाके दिल अनुराग' है, पावेगा जन सोय ॥
बिन अनुराग न पावई, कोटि करे जो कोय ॥
बल मेरे यक नामके, सात द्वीप नौखण्ड ॥
यम डरपै भय मानै, गाजि रहा ब्रह्मण्ड ॥

चौ०- सार शब्द जब आवे हाथा । सकल काल तब नावै माथा ॥
नाम अमर मलयागिरि भाई । पीयत विष अमृत होइ जाई ॥
निसि दिन रह मलयागिरिसंगा । विष नहिं लागे तिनके अङ्गा ॥
साखी-काल फिरै सर साधिकै, करमें गहे कमान ॥
कहैं कबीर निज नाम गहि, छोड मान अपमान ॥

चौ०- कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । शब्द बाण है हमरे पास ॥
काहि डरो डर देहैं छुड़ाई । काल डरे सुनि नाम दुहाई ॥
जब हम रहे अकहके माहीं । केहि बोधौ दूसर कोई नाहीं ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । होहु निशङ्क मेटि यम आसा ॥
भयो परकाश गुरु भेद बतावा । जीव बोधिके लोक पठावा ॥
जबते अमर पुरुषको चीन्हा । तबते काल भयो आधीना ॥
साखी-राह पाय जनि, छाडहू, काल रहा शर सांधि ॥

सुरति सँभारे चेतहू, परे न यमका बाध ॥
आदि नाम निज पु रुषको, सुनत तजै अभिमान ॥
कहैं कबीर सुन सन्तहो, तजो नरककी खान ॥

चौ०- कासे कहूँ कहा नहिं जाहीं । मेरी गति' कोई चीन्हत नाहीं ॥
यहां वहां पावैं दोउ ठाऊँ । सत्य कबीर कलिमें मोर नाऊँ ॥
जो था तब कलिमें हम सोई । नाम धरैं भूलै नर लोई ॥

साखी-कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय ।
आदि नाम जपि गुप्तही, बूझै बिरला कोय ॥

चौ०- मुक्ति न होवै नाचे गाये । मुक्ति न होवै मूदङ्ग बजाये ॥
मुक्ति न होवे साखि पद बोले । मुक्ति न होये तीरथ डोले ॥

गुप्त जाप जानें जब कोई । कहैं कबीर मुक्ति भल होई ॥
कथा कीरतन गदगद वाणी । मुक्ति न होय बिना सहिदानी ॥
केता कहूँ कहा नहि जाई । नाम गहे सो पुरुष मिलाई ॥
सार शब्द परवाना दइहैं । जीव छोडाय कालते लइहैं ॥

साखी—जैसे फण पति मंत्र लखि, फणको रहे सकोरि ।

तैसे नाम कबीर लखि, काल रहे मुख मोरि ॥

जो जन होइहैं जौहरी, सो धन लेई बिलगाय ॥

सोहं सोहं जपि मुये, मिथ्या जन्म गँवाय ॥

साखी पद संसारमें कहन सुननको दीन ।

जाको चीठी मूलकी, सोले साधन कीन ॥

चौ०—कोटि यतन कर जिव समझावे । भाग बिना सो नाम न पावे ॥

गुरुकी सन्धि सन्त तेहि पासा । सो नहि परे कालके फाँसा ॥

आदि पुरुष अपना कर जाना । सोई भक्ति अन्तरगत ठाना ॥

तुमको दीनी भगति अपारा । नाम अजर तुम जपो हमारा ॥

जो नहि बूझे कहा न करई । मुक्ति न होय नरकमें परई ॥

श्रवणनमें कह दीन्हा नाऊँ । ताहि बोलहू अपने ठाऊँ ॥

नाम सुनै औ मोंको जाने । यमराजा तेहि देखि डेराने ॥

मेरो नाम अमर है भारी । ताहि नामको राखु सँभारी ॥

तजि अभिमान मिलै जो आई । ताको दीजै नाम दूढाई ॥

सब तजि रहनि रहे ठहराई । और तजे सब लोक बढाई ॥

ताको दीजे वस्तु अपारा । कह कबीर सुनु शब्द हमारा ॥

गलित गरीबी रहन सम्हारे । तन धन मन सन्तनपर वारे ॥

लोक लाज कुल तेज बढाई । तब पग परस भरम मिटि जाई ॥

बिन विश्वासन भगति प्रकासा । प्रीति बिना नहि दुबिया नासा ॥

गुरुते शिष्य करे चतुराई । सेवाहीन नरकमें जाई ॥

वारै तन मन औ धन धाना । सोई सन्त मेरे मन माना ॥

कहैं लगि कहूँ वार नहि पारा । नाम गहे सो सन्त हमारा ॥

आदि नाम है शरकी गौसी । लागै बान पडा रह जासी ॥

जब लगि भक्ति अङ्ग नहि आवै । सार शब्दसो कैसे पावै ॥

सत्यनाम श्रवन धुनि होखे । जो मतवाला ताको पोखे ॥

साखी—सुरति समावे नाममें, जगते रहे उद्दास ॥

कहैं कबीर गुरुचरण (में), दूढ राखै विश्वास ॥

चौ०—जगमें जेते हैं विश्वासी । माया आहि ताहिकी दासी ॥

जाके दिल विश्वास न आवे । भक्ति अङ्ग सो कैसे पावे ॥

जो जिव मायासे मन लावे । गहे काल मुख बात न आवे ॥

साखी—गुरुकी, शब्द साधुकी पूंजी, वनिज करे जो कोय ॥

कहैं कबीर सवाई बढे, हानि कबहुँ ना होय ॥

चौ०—जाको है गुरुको विश्वासा । निश्चय जाय पुरुषके पास ॥

कहैं कबीर मिलै विश्वासी । बिन विश्वास है यमकी फांसी ॥

सोहं कोहं आये संदेशा । सो गुरु दीन्हो मोहिं उपदेशा ॥

ताको मर्म जान जो पावे । सो तो नहिं भवसागर आवे ॥

गुरुको शब्द जीव दूढ धरई । सोई सन्त भवसागर तरई ॥

होई न दास धरै अभिमाना । ताहि न दीजै अनुभव ज्ञान ॥

नाम मालमें परिचय आने । सकल सन्तमें सद्गुरु जाने ॥

साखी—पुरुष सबनते न्यार है, और सबनके माहिं ।

ज्ञान दृष्टि करि देखहूँ, साखी पदमें नाहि ॥

साखी पदमें सो पढें, पुरुष बसे तेहि पार ॥

पोथी वाणी भेष बहु, सो सबहिन ते न्यार ॥

गुरु पूरा सुख शूरा, बाग मोडि रण पैठ ।

सत्य सुकृतको चीन्हके, एक तख्त चढ़ि बैठ ॥

सुकृतआदिभेदसे ग्रन्थ ।

चौ०—चले ज्ञानी समरथ शिर नाये । मकर तार होय तिरबेनी आये ॥

जहाँ काल बैठा अन्याई । ज्ञानी बेगि तहाँ चलि आई ॥

देखि काल बहुतै दुख पावा । उठि ज्ञानीके सन्मुख धावा ॥

कौन अंश तुमहो बटपारा । हमरे झांझरिमें पग धारा ॥

ज्ञानी वचन

कहैं ज्ञानी जनि जाव भुलाई । सोहं पुरुष सन्धि हम लाई ॥

समरथ हुकुम मान तुम भाई । नहिं तो बांध तोहिं ले जाई ॥

अब जनि भूलो मूर्ख गँवारा । छिनमें करूँ तोर संहारा ॥

यह सुनि काल उठा रिसियाई । विकल रूप होइ सन्मुखधार्ई ॥

बारह बाण काल ले आई । ज्ञानी शब्दसे लीन्ह बचाई ॥

रहन-सहन

ज्ञानी विषहर वान सँभारा । तबहीं मौझ झँझरी मारा ॥

झँझरी फूट चूर हो जाई । तबहिँ काल उठि चला पराई ॥

कबीर साहब झँझरी द्वीपको गये और कालपुरुषको तीन लोककी सेवा प्रदान की । पर जब वह अभिमानी होकर आज्ञा न मानने लगा तो सत्यगुरुने उसको मारकर पातालको भगा दिया । इसके पीछे उसकी नम्रता विनयकी ओर देखा तो फिर उसको राज्य प्रदान कर दिया ।

अब यहां सोचने और समझनेकी बात है कि, जिसके आज्ञाकारी सेवक आज्ञा तथा निरंजन ठहरे वह कैसे “मनुष्य” हो सकता है ? बही कबीर सर्व शक्तिमान् सबका शासक है । अनन्त ब्रह्माण्ड उसके शासनमें हैं । यह स्वसंवेदका वचन है और स्वसंवेदके जाननेवाले सब ऋषीश्वर इस बातमें सहमत होते चले आये हैं । जिन पर सत्यगुरुकी पूरी कृपा हुई है उन सबका एकही कथन है जब तक यह विश्वास भलीभाँति मनमें स्थान न पाजाय तबतक मनुष्यकी मुक्तिमें सन्देह रहेगा, कबीर साहिब बराबर कहते चले आ रहे हैं कि, मैं प्रकृति तथा अखिल ब्रह्माण्डोंके अभिमानियोंका विजेता हूँ, मेरा उपदेश मानकर अपना कल्याण करलौ ।

शरण

यह शब्द संस्कृतका है । इसका हिन्दी और संस्कृत दोनोंमें समभावसे प्रयोग होता है । कहीं २ इसका ‘सरन’ अपभ्रंश करके भी प्रयोग करते हैं । संस्कृत के व्याकरणके अनुसार ‘शू’ से ल्युट् प्रत्यय करनेसे उक्त शब्द बनता है जिसका रक्षक अर्थ होता है । वह भी ऐसा कि जिसकी रक्षाकी जानेवाली है वो सिवा उसके अपना दूसरा कुछ उपाय ही नहीं समझता । इसे सभी संप्रदायोंने स्वीकार किया है । श्रीसंप्रदायके पल्लव इस कबीरपन्थने भी इसे मुख्य माना है । सिवा शरणा गतिके जीवके पास दूसरा कोई उपाय नहीं जिससे वो भवसागरसे त्राण पासके, इसी कारण कबीर साहिब सदासे यही कहते चले आरहे हैं कि, बिना शरण हुए कोई भी जीव, कालसे नहीं बच सकता पर कालने सबकी बुद्धि पर ताला लगा दिया है जिससे सत्यपुरुष की सच्ची सुरत नहीं लगा सकते, किसी कविने कहा है कि—

(नीम कीट जस नीमहि प्यारा । विषको अमृत कहे गमारा ॥

विशका कीड़ा विषमें ही राजी रहता है उसका वही जीवन है वो बिना विषके जिन्दा नहीं रहता । यही हिसाब जीवोंका भी है ।

साखी—कालको जीव माने नहीं, कोटि न कहूँ बुझाय ।

मैं खींची सत लोकको, बाँधा यमपुर जाय ॥

कबीर साहब हांक् मार मार कर कहते हैं कि, ऐ मनुष्यो ! तुम मेरी शरण में आओ और कहीं विश्वास नहीं है । सत्य कबीर वचन शरण अंगकी साखियों :-

साखी-धरमराय दरबारमें, देई कबीर तिलाक ।

भूले चूके हंसकी, मत कोई रोको चाक ॥

कबीर शरणमें आयके, कहा मुक्तिको रोय ।

प्रेम पिछोरे ओढ़के, सुख मन्दिरमें सोय ॥

बोले पुरुष कबीरसे, धरमराय कर जोर ।

तुम्हरे हंस न चम्पिहौं, दोहाई लाख कडोरा ॥

कबीर-जो जाकी शरणें गहे, ताको ताकी लाज ॥

उलट मीन जल चढ़त है, बह्यो जात गजराज ॥

इस प्रकार कबीर साहब बहुत कहते चले गये हैं और शरणागतका गुण बराबर प्रगट करते गये हैं धर्मरायसे प्रतिज्ञा हो चुकी है कि, जो मेरा नाम ले तुम उसको कदापि न रोकना । यदि रोकोगे तो दण्ड पाओगे । सुतरां ग्रन्थ अम्बुसागरमें लिखा है कि, कबीर पन्थियोंमेंसे कितनेही मनुष्योंने भूलसे पाप किया । उन पापोंके कारण उन्हें यमराजने पकड़ लिया परन्तु कबीर साहबने दूतोंको दण्ड दिया अपने हंसोंको छुड़ा लिया ।

शरणागतके धर्म

शरणागतका यही धर्म है कि, जो कोई जिसकी शरणमें हो उसके शरणके नियमोंपर पूर्ण रीतिसे चले । शरणके नियमोंमें तो पूर्णतया प्रेम आवश्यक है । जैसे मछली पानीसे इतना प्रेम करती है कि, पानीसे न्यारी होतेही मर जाती है । अपने प्यारके शरणको ऐसीही दृढ़तासे पकड़े कि, छूटने न पावे । केवल शरणका ही भरोसा रखे, दूसरी ओर तनिकभी ध्यान न दे । यदि कोई दूसरे प्रकार करे तो शरणागति छूट जायगी किसी देवी देवताकी ओर ध्यानही न दे, जबसे जीव सत्य गुरुकी शरणमें आवे तबसे कदापि दूसरी ओर न झुके । केवल सत्यगुरुकीही शरण द्वारा जीवकी मुक्ति होती है । धर्मदासजीने कबीर साहबसे पूछा कि, हे सत्य-गुरु ! मैं किसको जप कर पार उतरूँ ? तब कबीर साहब ने जोरसे पुकार कर कहा कि -

शरण मोर गहि उतरो पारा । बार बार मैं यही पुकारा ॥

मुखसे कहो कबीर कबीरू । तबही मिटै कालकी पीरू ॥

जो कोई सत्यगुरुके शरणमें है । वह उस प्रकार बिनती करे जैसा कि,

गुरुकी कृपा

साखियोंमें लिखा है । यह धर्मदासजी और कबीर साहिबका संवाद भेद सारमें लिखा हुआ है जिसमें कि, अपने शरण होनेका उपदेश दिया है ।

शरणागतके नियम

१—प्रत्येक विधि और निषेध अपने गुरु और शास्त्रके अनुसार करे ।

२—तन मन धनसे ईश्वर गुरु तथा साधुओंकी सेवा करे ।

३—इस बातका पूर्ण निश्चय रखे कि, मेरा साहब मेरे पापों तथा अपराधोंको क्षमा करके मुझे मुक्तिप्रदान करेगा ।

४—सच्चे परमेश्वरके अतिरिक्त और किसीसे सहायता न मांगे । यहाँ तक कि, कौसीभी आपत्ति क्यों न आवे तो भी दूसरे किसीसे सहायता न मांगे ।

५—अपने सत्यगुरुकी मूर्त्तिका ध्यान करे ।

६—अपने आपको परमेश्वरके अर्पण कर दे । इस प्रकार सत्य हृदयसे कहें, “प्रभु ! जो तू चाहे कर, मेरा इसमें कुछ नहीं है ।”

मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर ।

तेरा तुझको सौंपता, क्या लागत है मोर ।

७—भजन न छोड़े, सर्वथाही साहबकी आज्ञाको निरखत रहे ।

अपनेको अर्कचन मानता हुआ भगवान्के दर्शनकी अभिलाषाओंको बढ़ाता जाय । गुरु और सत्यपुरुषमें कोई भेद न माने, सदा उसी प्रकार सम्मान करता रहे । अपना अधिक समय भगवान्की विनतीमेंही लगावे, यहाँ हम सत्यपुरुषके विनय करनेकी साखियोंको उद्धृत करते हैं —

विनती अंगकी साखी

कबीर—अव गुण मेरे बापजी, बछशो गरीब निवाज ।

जों हौं पूत कपूत हौं, तऊ पिताको लाज ॥

कबीर—अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार ।

भावेबन्दा खशिये, भावे गरदन मार ॥

कबीर भूल बिगाड़िया, नाकर मैला चित्त ।

साहब गुरुवा चाहिये, नफर बिगाड़े नित्त ॥

कबीर भूल बिगाड़िया, कर कर मैला चित्त ।

नफर भी ऐसा चाहिये, साहबसे राखे हित्त ॥

कबीर—साईं तेरे बहुत, गुड़ अवगुण कोई नाहिं ।

जो दिल खोजौं आपना, सब अवगुण मोहि माहिं ॥

कबीर—साहब तुम जनि बीसरो, लाख लोग मिलि जाहिं ।

हमसे तुमरे बहुत हैं, तुम सम हमरे नाहिं ॥

कबीर—तेरे बिन जोर जुल्म है, मेरा होय अकाज ।

बिरद तुम्हारे लाजसे, शरण पडेकी लाज ॥

कबीर—या मुखले बिनती करूँ, लाज आवत है मोहिं ।

तुम देखत अवगुण, किये, कैसे भाऊँ तोहिं ॥

कबीर—बनजारी बिनती करै, नरियल लीने हाथ ।

टांडा था सो लद गया, नायक नाहीं साथ ॥

कबीर तुम्हें विसारिके, किसकी शरणे जाय ।

शिव विरञ्जिच्च मुनि नारदा, हिरदय नाहिं समय ॥

कबीर—मूझमें गुण एकौ नहीं, जानू राय सिर मौर ।

तेरे नाम प्रतापते,, पाऊँ आदर ठौर ॥

कबीर—मैं अपराधी जनमका, नख सिख भरा विकार ।

तुम दाता दुखभञ्जना, मेरी करो उबार ॥

कबीर—सुरत करो मेरे साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं ।

आपहिं हम बह जायँगे, जो नहिं पकडो वाहिं ॥

कबीर—और पुरुष सब कूप हैं, तू है सिन्धु समान ।

मोहिं टेके तव नामकी, सुनिये कृपानिधान ॥

कबीर—अवसर बीता अल्पतन, पीव रहा परदेश ।

कलङ्क उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥

कबीर—साईं मेरा सावधान है, मैं ही भया अचेत ।

मनवच कर्म न हरि भजा, ताते निर्फल खेत ॥

कबीर—मन परतीत न प्रेम रस, ना कोई तन में ढङ्ग ।

ना जानू उस पीवसे, क्योंकर रहसी रङ्ग ॥

कबीर तुमतो शैल हौ, हलकी अपनी चाल ।

रङ्ग कुरङ्गी रङ्गया, और किया लगवार ॥

कबीर—जिनको साईं रंगदिया, कवहुँ न होय कुरङ्ग ।

दिन दिन बाणी आगरी, चढ सवाया रङ्ग ॥

कबीर—मेरा मन जो तुझसे, तेरा मन कहि और ।

कहैं कबीर कैसे बनै, एक चित्त दुई ठौर ॥

कबीर—ज्यों मेरा मन तोहि से, या तेरा जो होय ।

अहिरन ताती लोहि ज्यों, सन्धि लखे नहिं कोय ॥

कबीर—अबकी जो साईं मिले, सब दुख आंसू रोय ।

चरणो ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥

कबीर—साईं तो मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात ।

आदि अन्तकी सब कहूँ, उर अन्तरकी बात ॥

कबीर—सिद्धक सबूरी वाहरा, कहा हज्ज को जाय ।

जिनका दिल सावित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥

कबीर—अन्तरयामी एक तू, आत्मको आधार ।

जो तुम छोड़ो हाथको, कौन उतारे पार ॥

कबीर—भवसागर भारा भया, गहरा अगम अगाह ।

तुम दयाल दया करो, तब पाऊँ कछु थाह ।

कबीर—साहब तुमहि दयाल हो, तुम लग मेरी दौर ।

जैसे काग जहाजको, सूझत और न ठौर ॥

कबीर—स्वास सुरतके मध्यही, न्यारा कभी न होय ।

ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरतितसे जोय ॥

कबीर—सद्गुरु बडे दयालू हैं, सन्तनके आधार ।

भवसागर आथाहमें, खेई उतारें पार ॥

कबीर—लेनेको हरिनाम है, देनेको अनदान ।

तरनेको आधीनता, बूडन को अभिमान ॥

अज्ञ सर्व जो मैं कहूँ, परम पुरुष उपदेश ।

कहै कबीर अब हरि मिलै, मानूँ साखि सँदेश ॥

शरणका तो यही अर्थ है कि, दूसरी ओर ध्यानहीं न हो । जब दूसरी ओर ध्यान होगा तो शरणागति अवश्यही मिथ्या ठहर जावेगी । इस संसारमें जितनी शरणागति तथा भक्ति हैं वो सभी व्यर्थ हैं । सबके ऊपर केवल एक सत्यपुरुषकी शरणमें मनुष्यको सुख मिलता है । इसके अतिरिक्त समस्त शरणागतियाँ झूठी हैं । उनमें अणुमात्रभी वास्तविकता नहीं है । इसी बातको कवितामें भी कहते हैं—

मुखम्मस तरजीअबन्द

अँधेरा छा गया वक्ते अशामें । हुआ खौफो खतर बस दश दिशामें ॥

पनः ले जा पनःकी खास जामें । नहीं आराम है अरजो समामें ॥

मुसाफिर जल्द चल सुल्तां सरामें

हैं फिरते चोर ठग रहजन लुटेरे । नहीं कोई बदरकः है सज्ज तेरे ॥

पडा जङ्गलमें सबदुःख दन्द घेरे । तु हो आनन्द सुन यह पन्थ मेरे ॥ मु० ॥

शरण कब्बीरके आराम पावे नहीं । कोइ और जो तुझको बचावे ॥
वही सत पन्थ मारगको बतावे । वही सत्पुर्षके घर लेके जावे ॥ मु० ॥
हिरण यक घेरले सदाह शिकारी । मुसीबत आपडी उस पर जो भारी ॥
बचावे कौन बिन खल्लाक बारी । हुई तदबीरसे जब जान आरी ॥ मु० ॥
पडीं सब गाय दर हस्ते कसाई । किसी जानिब नहीं खूये रहाई ॥
फिरी हर सिम्तमें यमकी दोहाई । जिधर जावे उधर धर भूनखाई ॥ मु० ॥
है तीनोंलोक में यमराज था । न पावे कोई सत्य नाम निशाना ॥
यह धोखेका बना कुल कारखाना । फँसे सब आनकर मुरगों व दाना ॥ मु० ॥
नहीं कहीं धर्म सब धोखा बनाया । सो हरजानिबमें जाल अपना लगाया ॥
जो लोक और वेदकी तालिम पाया । सो सब धर्मरायके फन्देमें आया ॥ मु० ॥
लगे सब लोग धोखेके धन्धे । न सूझे आँख अन्दर बाहर अन्धे ॥
करम और भरमके हैं बीच बन्धे । रिहाई होवे सद्गुरु शब्द सन्धे ॥ मु० ॥
सदा भूखे व नङ्गेको जो देता । कहूँ एहसान उसका सबपै केता ॥
तू अबभी जल्द तरकर चेत चेता । इस आजिजकी खबर हरदम् जो लेगा ॥

मुसाफिर जल्दचल सुल्तां सरामें

जो सब साखियों मने लिखी हैं मनुष्योंके लिये सत्यगुरुका उपदेश है ।
कबीर साहब उपदेश करते हैं कि, हे लोकों ! जब तुम सत्यगुरुके शरणमें आओ
तब यह ढङ्ग ग्रहण करो, इससे तुम सत्यगुरुके कृपापात्र बनकर सत्यलोक
पहुँचो । सत्यलोकमें पहुँचनेके वृत्तान्तको निम्नके दो झूलने और एक शब्दमें
निरूपण किया है ।

हंसोंका चलाना

कबीर साहबका झूलना दश मुकामी

चला जब लोकको शोक सब छोड़िके हंसका रूप सद्गुरु बनाई ।
शृङ्ग ज्यो कीटको पलटि शृङ्गी किया आपसम रङ्ग दै ले उड़ाई ॥
छोड़ नासूत मलकूतको पहुँचिया विष्णुकी ठाकुरी देख जाई ।
इन्द्र कुब्बेर जहाँ रम्भा निरत है देव तेतीस कोटिक रहाई ॥
छोड़ि वैकुण्ठको हंसा आगे चला शून्यमें ज्योति जहाँ जगमगाई ।
ज्योति परकाशमें निरख निःतत्वको आप निर्भय हो भय मिटाई ॥
अलख निर्गुण जेहि वेद स्तुति करें तीनहुँ देवको है पिताई ।
भगवान तिनके परे श्वेत मूरती धरे भगको आन तंगवा रहाई ॥

चार मुक्काम पर खण्ड सोलह कहें अण्डको छोड़ि वहाँ ते रहाई ।
सहस्र और द्वादशे रूह है संगमें करत किलोल अनहद बजाई ॥
तासुके वदनकी कौन महिमा कहूं भासती देह अति नूर छाई ।
महल कञ्चन बने माणिक तामें जड़ बैठि तहाँ कलस अखण्ड छोजे ॥
अचिन्तके परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहाँ विराजे ।
नूरका महल और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द भाजे ॥
करत किलोल बहु भांतिसे सङ्ग येक हंस सोहं की जो समाजे ।
हंस जब जात षट्चक्रको भेदिके सात मुकाममें नजर फेरा ॥
सोहंके परे जो सूति इच्छा कही सहस्र बावन जहाँ हंस हेरा ।
रूपके राशिते रूप उनको बना नहीं उपमा दूजे बनेरा ॥
सुरतिसे मेटिके शब्दके टेक चढ़ि देखि मुक्काम अंकूरकेरा ।
सुन्नके बीचमें विमल बैठक तहाँ सहज स्थान है गैबकेरा ॥
नवें मुक्काम यह हंस जब पहुँचि या पलक विलम्ब वहाँ किया डेरा ।
तहाँ से डोर मकरतार जो लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दे दूरेरा ॥
भये आनन्दसे फन्द सब छोडिके पहुँचा जहाँ सत्यलोक मेरा ।

दूसरा झूलना

जुलमत नासूत, मलकूत में फिरिश्ते, नूर जल्लालजबरूतमें जी ।
लाहूतमें नूर जम्माल पहचानिये, हक मकान हाहूतमें जी ॥
बका याहूत, साहूत, मुरशिद रहे, जोय अंकूरराहूतमें जी ।
कहत कबीर अविगत आहूतमें, खुद है खाविन्द जाहूतमें जी ॥

शब्द-सा'ई तेरा अर्शतख्त' है दूर ।

बिन मुरशिद' कोई भेद न पावे भटक भुये सम क्रूर ॥
चौदह तबक' खाबकी रचना आतिशकासा फूल ।
लाज छोड़ि जिन काज किया है भये चरणके धूल ॥
नासूतमें' माया खड़ी मलकूत गुण अस्थूल ।
जो कोई निजको समझि बूझे तामें नाहीं भूल ॥
जिबरूतमें जम जाल है लाहूत अच्छर मूर ।
हाहूतमें अचिन्त पुरुष है बजत अनहद तूर ॥
वेद पुराण कुरान गीता यहां लग खबर जहूर ।
सोहं इच्छा यहांसे आये सब घट व्यापक नूर ॥

सब जीवनको त्रास देखिके समरथ वचन कबूल ।

कहे कबीर हम खुदके अह्दी लाये हुकम हुजूर ॥

निम्न लिखित शब्दमें योग और वेदान्तका रहस्य अत्यन्त गंभीरताके साथ भरा हुआ है बड़ी ही उच्च कोटिका है...

  • यथा—यह जग पारख बिना भूलाना ।
    निर्गुण सर्गुण दोकर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥
    निर्गुण वंश सरगुण गुण रहितम गुण विन कहा समाना ।
    द्वैत ब्रह्म सकल घट व्यापै त्रिगुणमें लपटाना ॥
    आवै जाय उपजे फिर विनसै जरि मरि कहाँ समाना ।
    सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना ॥
    जलके सूखे कमल कुम्हलाना तब कहु कहाँ ठिकाना ।
    छओ चक्रवर्ति चार चतुर्दश वेद मती अरु ज्ञाना ॥
    बद्ध नालकी डोरी खींचें योगिन युगति वखाना ॥
    घरमें कर्ता लोग बोलत हैं पांचो तत्त्व नशाना ॥
    करे विचार सकल मिलि ऐसा भेष विविधि विधि बाना ।
    कहै कबीर कोई गुरुगम पावे पहुँचे ठौर ठिकाना ॥

अब यहां मैं कुछ बातें कबीर साहब तथा निरंजनकी वार्तालापकी लिखता हूँ । जिसमें पाठकगणोंको कालपुरुष तथा सत्यगुरुका विवेक हो जाय. क्योंकि, जब

  • यह संसार सच्चे गुरुके बिना भटकता फिरता है । अजपा गायत्रीका भजन ध्यान करने मात्रहीसे ब्रह्मवेत्ता बनकर निर्गुण सगुण दो भेद एकही ब्रह्मके कर डाले पर यह तो बता कि जब निर्गुणका पसारही सगुण है तो वो निर्गुण बिना गुणका होकर सगुण कैसे हो गया उसका निर्गुणपना कहाँ चला गया ? त्रिगुण प्रधानसे लिप्ट जानेके कारण ही ब्रह्मा द्वैत हुआ है वही जीव बन कर घट २ में रम रहा है वो शरीरके साथ जन्म मरण और आवागमन कर रहा है लिङ्गशरीरके भेद हो जाने पर तो कहाँ जाकर समावेगा यदि लय मानोगे तो । समाधिकालमें मनन करनेवाला जीव मूर्धके सहस्रदल कमल पर भारिकी तरह लिप्टता है अथवा अनेकों कणिकाओंवाले हृदय कमलमें ध्यान अवस्थामें मन स्थिर होकर भगवान्के स्वरूपका ध्यान करता है पर जब पानीके सूख जानेपर वो कमल कुम्हिला जायगा तब इस मनका कौनसा ठिकाना होगा । इतना पदार्थ काकूके अनुपममें कहकर अब स्पष्टरूपसे कहते हैं कि योगियोंने जो योगकी युक्ति बताई है उसके अनुसार वंकनाल (सुषुम्नाका सिरा) की डोरी (अपान) खींचकर छओ चक्रोंको भेदकर तथा चौदहवें स्थानमें पहुँच वहाँकी अलौकिक वेद मती और ज्ञान प्राप्त करके वहाँ पहुँच जाता है । यहाँ पांचों तत्त्व नष्ट हो जाते हैं जीव आत्मरूप हो अपनेको सब कुछ कहने लगता है तथा कर्ता भी अपनेको समझता है । इस लोकमें पहुँचनेकी तो सभी भेष तयारी करते हैं पर जिसे पारख गुरु मिलेंगे वही उस स्थानको पहुँचैगा दूसरा नहीं पहुँच सकता ।

उनका शास्त्र

तक उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता तबतक कालपुरुषसे छूटना कठिन है दूसरे 'संग्रह त्याग न विनू पहिचाने, यानी त्याग और ग्रहण भी तो बिना जाने नहीं होता।

स्वसंबेदके फूटकर उपदेश

साखी-तीरथ गयेते एक फल, सन्त मिलै फल चारि।

सद्गुरु मिले अनेक फल, कहै कबीर विचारि ॥

तीर्थके जानेसे तो केवल एकही फल अर्थात् पापका नाश होता है। सन्तके मिलनेसे चारों फल अर्थात् अर्थ आदिक अनेक फल मिलते हैं। भलाजी ! यदि कोई कहे कि, मोक्षसे बढ़कर क्या है, जो सत्यगुरुके मिलनेसे मिलता है ? सो जानना चाहिये कि, चारों फल तो केवल चारों स्थानोंतक हैं और स्थानोंकी सुधि तो केवल सत्यगुरुही द्वारा होती है, वे वे बातें तथा पदार्थ मिलते हैं जो कहने सुननेमें भी नहीं आते। सब बातें सत्सङ्ग द्वारा प्राप्त होती हैं। सत्सङ्गहीसे सार शब्दका चिन्ह तथा पता लगता है।

सत्यकबीर बचन

सारं निरक्षरं शाब्दं कथ्यते सुजनैर्जनैः।

तद्ज्ञाता यदि लभ्येत शीघ्रं पुण्यफलानि च ॥

निःअक्षर जो सारशब्द है जिसकी प्रशंसा श्रेष्ठगण करते आये हैं उसके ज्ञाताओंको सब शुभकर्मोंका फल मिलता है ॥

गया गङ्गा प्रयागं च व्रतं दानं तथैव च।

सारशब्दसमा एते न भवन्ति कदाचन ॥

गया, गङ्गा, प्रयाग आदि तीर्थ व्रत दान इत्यादि कोई भी सार शब्दकी तुल्यता नहीं कर सकते यानी सहस्रों प्रकारोंके तीर्थ, व्रत, दान, यज्ञ और तपस्या साधन किया करे पर सारशब्दकी समता नहीं कर सकता ॥

कल्पकोटिसहस्राणि काशीवासे च यत्फलम्।

क्षणार्द्धं चित्तिं शब्दे भवेत्स्य ततोऽधिकम् ॥

करोड़ों कल्प काशीमें रहकर जो फल प्राप्त होता है वही फल यदि केवल आधे क्षणतक सारशब्दका ध्यान करनेवाला अनायास पाजाता है ॥

अब विचारना चाहिये कि, सहस्र चौकड़ी युगका एक कल्प होता है। ऐसे करोड़ों कल्प काशीमें जो कोई रहे उससे भी बढ़कर फल सारशब्दके आधे क्षणके ध्यानमें है। जिस सार शब्द तथा जिसके आधेक्षणके ध्यानके सामने करोड़ों कल्प तुच्छ हैं, पर सारशब्द बिना सत्यगुरु सत्य कबीरकी दयाके किसीको नहीं मिल सकता। इसी कारण सत्सङ्गकी श्रेष्ठता वेद तथा सभी सत् करतें चले आये

हैं । जिससे सत्यपदार्थका विवेक हो उसीका नाम सत्सङ्ग है, वह सत्यपुरुष निर्गुण तथा सर्गुणसे परे है । जिसके द्वारा वह सत्यपुरुष सर्गुण निर्गुण सबसे परे जाना जावे उसे सत्सङ्ग कहते हैं । उसीसे मनुष्यकी मुक्ति होती है, अपना शुद्ध स्वरूप पहचान सकता है ।

सत्य—अब जानना चाहिये कि, सत्य किसको कहते हैं ? जो तीनों कालोंमें समान स्वरूपमें रहे उसमें विभिन्नता कदापि न हो एवं निर्गुण सर्गुणसे अलग चारों वेदोंसे न्यारा हो उसे सत्य कहते हैं । इससे सभी बेसुध हैं, इसी सत्यको सत्यनाम कहते हैं यही सत्यनाम निःअक्षर पुरुष है । क्षर, अक्षर, निःअक्षर, क्षर मायाको कहते हैं । अक्षर आत्मा अर्थात् जीवको बोलते हैं जो कूटस्थ कहलाता है । जो इन दोनोंसे पृथक् है उसीको निःअक्षर या पुरुषोत्तम कहते हैं । जब यह जीव पांचोंको छोड़कर सत्यपदमें समाता है, उसमें भली प्रकार निमग्न हो जाता है तब उसका नाम हंस कबीर कहलाता है । वह सत्यपदार्थ जिस द्वारा सत्यपुरुष की प्राप्ति होती है वह सत्सङ्ग है । ऐसे सन्त प्रायः नहीं मिलते । जब तक ऐसे सन्तोंकी सङ्गति नहीं होती तब तक मनुष्य हंसका स्वरूप नहीं पा सकता । हंसको ब्रह्मा, विष्णु, शिव दण्डवत् प्रणाम करते हैं, यह बात नहीं वरन् स्वयम् निरञ्जन उनको नमस्कार करता है । जब हंस उस देशको चलतें हैं तब उनका प्रभाव अनुपम होजाता है ।

सत्यकबीर वचन

श्लोक— चन्द्रोभानुर्नभो वायुः पृथिव्यग्निर्जलं तथा ।

नहि पञ्चभ्योस्ति तथा लोके रूपं विलक्षणम् ॥

चन्द्र, सूर्य, आकाश, वायु, पृथिवी, अग्नि, जल यहां नहीं, वह लोक पांचों तत्त्वोंसे भिन्न है, उसका रङ्ग ढङ्ग न्यारा है, वह क्या कहा जावे जहां न पांचतत्व हैं, न तीन गुण हैं, न किसी प्रकारकी सांसारिक वासनाएँही हैं, वो न स्त्री पुरुष, न छोटा बड़ा और न राजा प्रजा ही है ।

साखी—समझेकी गति और है, जिनसमझा सब ठौर ।

कहैं कबीर इस बीचका, बलकहि औरै और ॥

दौड धूप छोड़ो सखिया, छोड़ो कथा पुराण ।

उलटि वेदको भेद गहो, सार शब्द गुरु ज्ञान ॥

सुरति फँसी संसारमें, ताते परिगा दूर ।

सुरति बांध स्थिर करो, आठो पहर हजूर ॥

नाम सत्य गुरु सत्य है, आप सत्य जब होय ।

मिश्रपन्योंके संस्थापक शिष्य

तीन सत्य जब परगटें, विषका अमृत होय ॥
कहैं कान्ति छबि बरणौं, बरणत बरणि न जाय ।
कबीर-चिकुरनके' उंजियारते' विधु' कोटिक' शरमाय' ॥
जहां पुरुष सतभाव है, तहां हंसनको वास ।
नहीं यमनको नाम है, नहि तृष्णा नहि आस ॥
हर्ष शोक वहि घर नहीं, नहीं लाभ नहि हान ।
हंसा परमानन्दमें, धरें, पुरुष को ध्यान ॥
नहि देवी नहि देव है, नहीं वेद उच्चार ।
नहीं तीरथ नहि वरत है, नहि षट्कर्म' अचार ॥
उत्पत्ति प्रलय वहां नहीं, नहीं पुण्य नहि पाप ।
हंसा परमानन्दमें, सुमिरैं सद्गुरु आप ॥
नहि सागर संसार है, नहीं पवन नहीं पानि ।
नहि धरती आकाश है, नहीं ब्रह्मा नहीं निशानि ॥
चन्द सूर वा घर नहीं, नहीं करम नहि काल ।
मगन होय नामहिं गल्हो, छुटि गयो जञ्जाल ॥
सुरति सनेही होय तासु, यम निकट नहि आवे ।
परम तत्व पहिचान, सत्य साहब मन भावे ॥
अजर अमर विलसे नहीं, परम पुरुष परकाश ।
केवल नाम कबीरका, गाय कहें धर्मदास ॥

गोरखजीका प्रश्न

कवित्त-कर्त्ताको स्वरूप कौन, अण्डका स्वरूप कौन, अण्डपार कौन नाद
बिंद योग कौन है । जीव ईश्वर भोग कौन, भूमि औतार कौन, निराकार कौन
पाप पुण्य करे कौन है ॥ वेद औ वेदान्त कौन, वाच और अवाच कौन, चन्द्र सूर्य
भास कौन, ओहं सोहं कौन है । पञ्चमं प्रपञ्च कौन, स्वर्ग नर्क बसे कौन । पिण्ड
ब्रह्माण्ड कौन जरा मृत्यु कौन है ? आत्म, परमात्म, काल, गुरु सिख बोध कौन,
क्षर अबर अक्षर निरक्षर कौन है ? ॥

गोरखके प्रति कबीरजीका उत्तर

कवित्त-जाते भयो अण्ड स्वप्नरूप बसें अण्डमार्हिं, कर्त्ताको स्वरूप नार्हिं
अण्डको स्वरूप हैं । नादबिन्द योग स्वप्नजीव ईश भोगस्वप्न, भूमिआव तार
निराकार स्वप्नरूप है ॥ पाप पुण्य करे स्वप्न वेद औ वेदान्त स्वप्न वाचा औ

अवाचा स्वप्नरूपसो अनूप हैं । चन्द्रसूर्यभासस्वप्न पञ्चमँ प्रपञ्चस्वप्न स्वर्ग नकँ
बीच बसै सोऊ स्वप्नरूप है ॥ १ ॥ ओहँ और सोहँ स्वप्न पिण्ड और ब्रह्माण्ड
स्वप्न आत्मा परमात्मा स्वप्न रूपसो अरूप हैं । जरामृत्युकालस्वप्न गुरु शिष्य
बौध स्वप्नअक्षर निअक्षरआत्मा स्वप्नरूप है ॥ कहत कबीर सुन गोरख वचन
मम, स्वप्नते परे सत्य सत्यरूप भूप है । सोई सत्यनाम सत्यलोक बीचवास करँ,
नहीं कहँ आवे नहीं जावैं सत्यरूप है ॥ २ ॥

इस कलियुगमें गोरखनाथ जैसा प्रतापी योगी कोई नहीं हुआ, उन्होंने
कबीर साहबसे बहुत वादविवाद किया था पर अन्तको जब सद्गुरुने भली भाँति
समझाया और दिखलाया कि, तेरी सब योगशक्ति मिथ्या है, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड
दोनों स्वप्नवत् मिथ्या है । जो कुछ कहा सुना जाता है वो स्वप्नके तुल्य संकल्प-
मात्र है । जब गोरखनाथजीने सद्गुरुकी बातें समझीं तब चरणोंपर गिरकर शिष्य
होगये । ऐसेही दत्त दिगम्बर जो संन्यासियोंके गुरु पूर्ण विरक्त अवधूत और
यती पुरुष थे, सत्यगुरुका ज्ञान सुनकर साहबके चरणोंपर गिरकर सांसारिक
वासनाओंसे मुक्त हुए । इसी प्रकार बड़ेही प्रसिद्ध तपस्वी दुर्वासा ऋषि सत्यगुरु
की कृपादृष्टिसे वांछित स्थानपर पहुँचे, अनगिनती ऋषि, मुनि उसी साहबकी
दयासे उच्च श्रेणीको प्राप्त हुए हैं । जितने सत्यगुरुके सांसारिक शिष्य हुए वे
सब भी उसी श्रेणीपर अधिकृत हुए हैं जहाँकि, ऋषि मुनि पहुँचते हैं। सब सांसारिक
लोग जिन पर कि, सद्गुरुकी पूर्ण कृपा होगी अपने बालबच्चे सहित उसी लोकको
पहुँचेंगे ।

साखी—कबीर साहब सबका बाप' है, बेटा किसीका नाहिं ।

बेटा होकर ऊतरा, सोतो साहब नाहिं ॥

कबीर—जन्म मरनसे रहित है, मेरा साहब सोय ।

बलीहारी उस पीवकी', जिन सिरजा सब कोय ॥

कबीर—पिण्ड प्राण नहिं तासुके, ढम देही नहिं सीन ।

नादविन्द आवे नहीं, पांच' पचीस' न तीन' ॥

कबीर—मुहँ माथा जाके नहीं, नाही रूप कुरुप ।

पुष्प वासते पातला, ऐसा तत्व अनूप ॥

कबीर—देही माहिं विदेह' है, साहब सुरति स्वरूप ।

अनन्त लोकमें रम रहा, जाको रङ्ग न रूप ॥

कबीर—चारभुजाके भजनमें, भूल रहे सब सन्त ।

कबीर सुमिरो तासुको, जाकी भुजा अनन्त ॥

कबीर—रूप रेख जाके नहीं, अधर धरे नहि देह ।

गगन मंडलके मध्यमें, रहता पुरुष विदेह ॥

कबीर—बूझो कर्ता आपना, मानो बचन हमार ।

पांच तत्त्वके भीतर, जिसका यह संसार ॥

कबीर—पानी हू ते पातला, धूवाँ हूँ ते छीन ॥

पवन वेग उतावला, दोस्त कबीरा कीन्ह ॥

पुष्प वासते पातला धूवे हूँ ते छीन ।

कबीर तासों मिल रहा, ज्यों पानी ते मीन ॥

प्रासंगिक

इस संसारमें कबीर साहब और हंस कबीरोंका तो यही वृत्तान्त है कि इधर मनुष्योंकी बुद्धिको कालपुरुषने ऐसी अन्धो कर दिया है कि, कोई भी सत्य पुरुषकी भक्तिमें नहीं लगता । जो कोई सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश करता है उसके उत्तम बर्ताव होते हैं कि, मनुष्य कैसे मुक्ति पावे ? सबको अंधकार मय पथ पसन्द है, उसी ओर आग्रह पूर्वक दौड़ते हैं, इन्द्रियनिग्रह तथा देवीप्यमान, ज्ञानके मार्गसे भागते हैं । जो कोई उनको अंधकारसे निकालना चाहता है उसके साथ प्रेम करनेके वनस्पति बैरी होजाते हैं ।

जो कुछ कबीर साहबने पांच वर्षकी अवस्थामें गुरु रामानन्दजीसे कहा था । वही बात अन्तिम समयतक सब लोगोंसे कहते चले आये हैं कि, मैं स्वयम् सत्य-पुरुष एवं सर्व शक्तिमान हूँ, मेरे ऊपर दूसरा कोई नहीं है । जिस किसीको कुछ सन्देह हुआ उसका सन्देह उसी समय मिटा दिया, उसके साथ साथ अनेकानेक कौतुक दिखाते आये वे मनुष्यके कार्यों कभी नहीं होसकते । कबीर साहबका देह केवल उनकी शक्तिका प्रकाश था । वास्तवमें वह देह नहीं था । वह तो केवल देखने मात्रको शरीर था । वास्तवमें तो वह तेजका पुंजही था, उस शरीरकी कोई प्रशंसा नहीं कर सकता कि, वह क्या था । यदि तेजःपुंज कहूँ, तो मनुष्य तो उसको देख नहीं सकता, परन्तु वह देह देखी जा सकती थी, वह ऐसा प्रकृतिका कौतुक था जो कि मनुष्यके ध्यानमें किसी प्रकारसेभी न आसके, प्रत्यक्षमें देह दिखाई देती थी पर वास्तवमें वह देह नहीं थी । ये भगवान् रामके सच्चे भक्त थे, इन्हें रामको भरोसा था, ये रामके थे, राम इनका था । किसी भी समय राम इन्हें और ये रामको नहीं

भूले थे, ये बिलकुल रामरूपही हो चुके थे, रामने इन्हें इतना अपनाया था कि, रामकी अनन्तबातें इनमें आगई थीं। वे क्या थे किस भूमिका पर पहुँचे थे इसका भेद तो वे ही सन्त जान सकते हैं। जिन्हें कबीर साहिबकी तरह रामने अपना रखा हो अथवा रामके भक्तोंके भक्तोंने जिन्हें अपनी सच्ची दासकोटी दे रखी हो, संसारी झूठे पुरुषोंमें ऐसी बुद्धि कहाँ है जो उस सच्चेका पता पासकें। जो अन्धे हैं अविद्यामेंही रहेगा। यदि अविद्या न होती तो यह संसारही न होता, जब अविद्या दूर हुई तो फिर संसार कहाँ है। यह सच्ची भक्तिसेही दूर हो सकती है। कबीर सर्वज्ञ तथा सारे संसारकी मुक्तिका कारण है। वह गुप्त है उसका पता संतोंद्वाराही प्राप्त होता है, वह कबीर अद्वितीय तथा अमर है। वह कबीर सबसे परे है, वह कबीर समस्त वासनाओंसे न्यारा है, वह कबीर किसीसे मैत्री अथवा द्रोह नहीं रखता वह पवित्र है, पालनकर्ता है। पाप तथा कुत्सिततासे पृथक् रहता है, वह कबीर वही है जिसने धर्मदासका गुरु बनकर संसारमें बयालीस वंश स्थापित किये उस कबीरको जो कोई पहचानेगा उसका बेड़ा पार होजायगा। जिसको उस कबीरका ज्ञान होगा वही दोनों लोकोंमें परमपद पाकर उच्च स्थितिपर आरूढ होजायगा।

यह कबीर पहचाना नहीं जाता, कारण यह कि—स्वास्थ्योंने उस सत्य कबीर को छिपा रखा है। जैसे पहले वैसेही अबके लोग भी कबीरके नामको छिपाते हैं, जहांतक होसके इस कबीरकी श्रेष्ठतापर और उसके नाम पर परदा डालते हैं। कितने तक तो ऐसे हैं जो साहबका नाम सुनकर जल भरते हैं। क्योंकि, वैसे सब मनुष्य झूठ तथा काम क्रोधादिकी वासनाको हृदयसे चाहते हैं। इसी कारण सत्यपुरुषकी भक्तिसे भागते हैं एवं कालपुरुषकी भक्तिको पसन्द करते हैं। असत्य पन्थ, भयानक, संकीर्ण, एवं सत्यपूर्ण प्रकाशमय तथा मुक्तिप्रद है।

उल्लू, छुलूँ दर और चमगीदड़ इत्यादि जितने इस प्रकारके जीव हैं उनको प्रकाशसे बड़ीही घृणा है, वे अन्धकारको ही चाहते हैं। अन्धकारमेंही उनका समस्त कार्य होता है। जबतक प्रकाश रहता है तबतक वे किसी अन्धकारमय गड्ढेमें छिपे रहते हैं। जब अन्धकार होता है तब हर्ष सहित बाहर निकलते हुए अपना कार्य करते हैं। इसी प्रकार सब पामर पुरुष स्वसंवेदकी शिक्षासे भागते हैं। इन जीवोंकी आंखे प्रकाश देखना स्वीकार नहीं करती, उनके हृदयमें वह सत्य बल नहीं है। सांसारिक वासनाओंने उनको नितान्तही अयोग्य कर दिया है, इस कारण वे विवश हो रहे हैं।

कबीर साहबने पहलेसे कहा है कि, मैं समस्त संसारका उद्धार कर सकता हूँ। मेरे ही द्वारा मनुष्य मुक्ति पाता है। कोई दूसरी युक्ति नहीं है। वही बात नीरू जुलाहे और नीमा जुलाहीसे कही। जब कि, कबीर साहब केवल एक

दिवसके बालकके समान थे। जब कबीर साहब पाँच वर्षके बालकके स्वरूपमें रामानन्द स्वामीके समीप थे वही बात कहते रहे, वही बात धर्मदास तथा राजा वीरसिंह इत्यादिसे भी कही। वही बात नब्बे वर्षकी अवस्थामें शाह सिकन्दर लोदोसे कही है। वही बात मुहम्मद साहबसे मोरआजके समय कहीं, उनको कोई सन्देह नहीं रह गया। मुहम्मद साहबसे प्रतिज्ञा हो गयी कि, जब आप मुझको फिर मिलोगे तब मैं आपके साथ लोकको चलूंगा। मुहम्मदसाहबको मुक्तिपानका बीड़ा दिया और कहा कि, अब तो तुम यह बीड़ा लो फिर तुम्हारे अनुयायियोंको मिलेगा और सब मुक्ति पावेंगे, तुम अब इसलाम धर्मको प्रचलित करो, तुम्हारे ऊपर जगदीश्वरी कृपा है, मैं अब भारतवर्षमें जा, रामानन्दको अपना गुरु बनाकर अपना धर्म प्रचलित करूँगा। यही बात सुलतान इबराहीम अहम इत्यादिसे कहते चले आये हैं कि, मैं समस्त संसारका मुक्तिदाता हूँ, इसी प्रकार अधिकारियोंको भी अपना तेज दिखाते आये हैं। यह बात सदैवसे होती चली आई है कि, जिन लोगोंने कबीर साहबका पूरा पता पाया वे तो समस्त काम क्रोधादिपर अधिकृत हुये पर जिन्हें पूरा चिन्ह न मिला योग्यता में कुछ न्यूनता रह गई उनको भी भविष्यके लिये आशा दिलायी गयी। इस सत्यगुरुका प्रताप तीनों कालमें समान रूपसे छा रहा है। यदि अन्धा सूर्यको न देखे तो इसमें सूर्यका क्या दोष है।

जिन्हें अपने पुण्यका घमण्ड हुआ है तथा सद्गुरुके शरणमें न आये वे सभी फँसे रहे एवं जो लोग अपनी योग युक्ति और समाधि आदिका गर्व रखते हैं वे ध्यानपूर्वक देखलें कि, गोरखनाथसे बढ़कर इस संसारमें कोई नहीं हुआ उन्होंने भी बाहर भीतरकी चारों ओरोंसे देखकर इस साहबकी शरण ली और पूर्वकालमें बढ़कर जो योगी हुये थे उन्होंने भी कबीर साहबकी शरण लेकर मुक्ति पथ पाया है। दूसरी युक्तिसे किसीको राह नहीं मिली। संन्यासियोंमें दत्तदिगम्बरसे बढ़कर भी जो कोई संन्यासी हुआ वे भी सद्गुरुकी ही शरण ली। वैष्णवोंमें रामानन्द सबसे श्रेष्ठ हैं। उन्होंने भी साहबको शिष्यके रूपमें स्वीकार किया, जैनियोंमें ऋषभनाथसे बढ़कर कोई नहीं हुआ वे भी सत्यगुरुको पहचानकरही भ्रमसे अलग हुये। षट्दर्शन तथा छचानवे पाखंडमें जिन लोगोंने सद्गुरुको पहचानकर शरणली, उनको सुख मिल गया। इसी प्रकार विदेशीय मनुष्योंमेंसे भी जिनने उसे पहचाना वे आनन्दको प्राप्त हो गये मुहम्मदसे बढ़ कर कोई मुसलमान नहीं हुआ उनको भी उसीने श्रेष्ठ पद दिया। जितने पीर पैगम्बर इस पृथिवीपर प्रगट हुए, जिसको उसने उबारा तथा प्रतिष्ठा