भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

उपासनाकी सात शाखाएँ, योगकी सात शाखाएँ, ज्ञानकी सात शाखाएँ, उत्प- त्तिकी सात शाखाएँ

पाती लोग अपना अभीष्ट सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाणों के आग्रहसे अपनी सत्यता प्रगट करते हैं ।

यह साधारण नियम है कि, जो जिसका पक्षपाती होता है वह अपनी आशक्तिके कारण उसके अवगुणोंको भी गुण करकेही जानता है । जैसे अपना मुंह आपसे नहीं देखा जाता वरन् दृश्यसेही देखा जाता है । अथवा जैसे कोई ऊँचे स्थानपर चढ़े बिना नीचेके सब पदार्थोंको भली प्रकार नहीं देख सकता । उसी प्रकार जबतक निरपेक्ष होकर किसी मतको नहीं देखेगा, तबतक उसके गुण अवगुणोंको नहीं जान सकेगा ।

योगियोंका मत ।

वेदहीसे योग समाधि तथा षट् दर्शन निकले माने जाते हैं । योगियोंको योग पमाधिका बड़ा अभिमान है । योगसे वे अपनेको अमर समझते हैं ।

भोगी योगीकी समता ।

भ्रममें पड़कर वे अपनेको कृतार्थ समझते हैं पर यह नहीं समझते कि, जैसा भोग बैसाही योग भी है । दोनों निर्मूल और तुच्छ हैं । योगी नादकेद्वारा ऊपरको चढ़ता है, भोगी बिन्दुके द्वारा नीचे आता है । अतः—

आधारचक्रो भेद—योगी अपान वायुके द्वारा गणेश क्रिया करता है । आधार चक्रको साधता है अर्थात्—गुदा द्वारसे जल खींचकर ऊपर चढ़ाता है फिर गिरा देता है, फिर चढ़ाता और गिराता है । ऐसेही बारंबार करनेसे आधार चक्र टूट जाता है और उससे योगी ऊपरको चलता है तब आधार चक्र सिद्ध कहलाता है ।
छः चक्रोंमें यह प्रथम चक्र है ।

स्वाधिष्ठान चक्र भेद—आधार चक्रके ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । जब आधार चक्र सिद्ध होजाता है तब स्वाधिष्ठान चक्र भेदनेकी चिंता बढ़ती है इसके लिये युक्ति करता है । बारह अंगुलकी सलाका बनाकर लिङ्ग द्वारमें उसे बार बार चलाता है, जिससे उपस्थेन्द्रियका छिद्र शुद्ध और साफ हो जाता है । फिर उपस्थ इन्द्रियसे जल खींचकर चढ़ाता है । जल अच्छी तरह चढ़ाने और उतारनेका अभ्यास पड़ जाता है । तब क्रमशः दूध और मधुको चढ़ाता है । जब मधुके चढ़ाने उतारनेका अभ्यास पूरा हो जाता है तो स्वाधिष्ठान चक्र सिद्ध होता है । फिर योगी आगेको बढ़ता है ।

यह क्रिया, प्रायः वाममागी और अघोरी तथा गुसाई ब्रह्मचारी नामके भेषधारी अन्य विषयी लोग साधते हैं ।

मणिपूरक चक्र भेद—फिर योग अपान और समान वायुका सम्मिलन

स्थितिकी सात शाखाएँ

करके धातु क्रिया करनेका समय आता है। नौ गज लम्बा (कहीं कहीं पन्द्रह हाथ लिखा है) चार अंगुल चौड़ा बारीक और नम्र वस्त्र लेता है। उसको मुखके राहसे निगलकर बाहर निकालता है। पानी पीकर भीतर आंतोंको साफ करता है। फिर कपड़ेमें लगे हुये कफ आदिको साफ करके फिर निगलता है। ऐसेही वारम्बार करनेसे अभ्यास पड़ जाता है, तो गज २ भर चौड़ा और नौगज लम्बा भी निगलता और निकाल देता है। इस प्रकार जब यह क्रिया पूरी होती है तो योगी नाभीसे वायुको उठाकर मणिपूरक चक्रमें भरता है।

अनाहत चक्र — तब योगी अपान और प्राणको एक करता है। सवा हाथ की एक दातून बनाकर कण्ठके मार्गसे पेटमें चलाता है। पेटभर पानी पीकर बाहर निकालता है, जिससे अन्दर पेट, कलेजे और फेफड़ोंके, कफ आदि निकल जाते हैं इस क्रियाको कुंजर क्रिया कहते हैं। इस क्रियासे बड़ी आनन्दता और प्रकाश मिलता है। इसी क्रियासे योगी अनाहत शब्द सुनने लग जाता है। यद्यपि अनाहत शब्दमें बहुत प्रकारके शब्द सुनाई देते हैं पर सभोंमें दशप्रकारके शब्द प्रधान हैं।

१ घण्टका शब्द; २ शंखका शब्द; ३ छोटी २ घण्टियोंका शब्द; ४ भंवरेकी गुंजारका शब्द; ५ पहाड़से पानी नीचे गिरनेके समय जैसा शब्द होता है वैसा शब्द; ६ बांसुरीका शब्द; ७ शहनाईका शब्द; ८ छोटे २ पक्षियोंका शब्द; ९ वेणुका शब्द; १० चंग (सीटीका) शब्द; यही दश प्रकारके प्रधान अनाहत शब्द हैं। इनके अतिरिक्त नाना प्रकारके बाजे आदिके शब्द भी सुनाई देते हैं, जिससे मनको बड़ा आनन्द होता है। फिर इसको भी वेधके आगेको बढ़ता है।

विशुद्ध चक्र भेद — प्राण, अपान और समान तीनों वायुको कण्ठस्थानमें योगी एकत्रित (समान) करता है। इस साधनको लम्बिका योग कहते हैं। इसके साधनेके समय केवल दूधही पीकर रहना होता है, नाज नहीं खाना पड़ता। मक्खन और सँधे नमकसे जिह्वा को नित्य रगड़के पतला करना और जिह्वाकी जड़की रगोंको शनैः शनैः काटके (जिह्वाको) इतना बढ़ाना पड़ता है कि, दशवें द्वार तक पहुँच सके। जिह्वाको उलट कर ब्रह्मरंध्रके मार्गको रोककर ऊपरसे टपकते हुये अमृतको पीता है। इसके पीनेमें शरीरकी कांति तेजोमय हो जाती है। इस प्रकार अमृत पीनेका आनन्द प्राप्त हो जाता है तो योगीको लम्बिकायोग का साधन पूरा हो जाता है।

अग्नि चक्र—इस विशुद्ध चक्रके आगे अग्नि चक्र है । इसे सिद्ध करनेके लिये योगीको नेति क्रिया करनेकी आवश्यकता होती है । सूतकी एक वितेभरकी बत्ती बनाकर नाकमें चला, ब्रह्माण्डको भली प्रकार साफ करके अपने कण्ठकी वायुको अग्नि चक्रमें स्थापित करना होता है । योगी अग्निचक्रमें वायुकोस्थापित करके बड़ा आनन्द प्राप्त करता है । वायुको ऊपर चढ़ा कर जिह्वासे मार्गको रोकके कुम्भक कर समाधिको प्राप्त करता है, शरीर शक्तिहीन मृतक समान हो जाता है । दशवें द्वारमें पहुँचकर योगी निर्विकल्प समाधिको प्राप्त हो जाता है । इस स्थानपर पहुँचकर योगी अष्टसिद्धि और नव निधिको प्राप्त करता है ।

अष्टसिद्धि ।

१ अणिमा; २-महिमा; ३-गरिमा; ५-लघिमा; ५ - प्राप्ति; ६-प्रकाशिका । (काम); ७-ईशता; ८-वशीकरण ।

१ अणिमा - उसको कहते हैं कि, योगी जिस सिद्धिसे अपने शरीरको जितना छोटा चाहे बना लेता है । २ महिमाके द्वारा योगी अपनी देहको जितना चाहे बड़ा कर सकता हैं । ३ गरिमाके द्वारा जितना चाहे भारी हो जाता है । ४ लघिमाके बलसे अपने शरीरको हलकेसे हलका बना सकता है । ५ प्राप्तिसे ही योगी जहाँ चाहता है चला जाता है । ६ प्रकाशितासे मनवाञ्छित प्राप्त हो जाता है । ७ ईशतासे अपनेको सबसे श्रेष्ठ प्रमाणित करा सकता है । ८ वशीकरणके द्वारा विश्वको अपने वशमें कर सकता है ।

नवनिधि ।

१-महापद्म; २-पद्म; ३-कच्छप; ४-मकर; ५-मुकुन्द; ६-खर्व; ७-शंख; ८-नील; ९-कुन्द ॥ इन ९ के भिन्न २ गुण हैं । प्रत्येक निधि पर देवताओंकी चौकी रहती है जब इन ९ निधियोंके अभिमानी देवते वशमें हो जाते हैं तो योगी इनको प्राप्त कर लेता है वह अपनी शक्तिसे जिसको चाहे राजा बना सकता है अथवा दरिद्र करदे उसमें सब ऐश्वर्य आजाते हैं । इसी स्थानको सहस्रदल कमल कहते हैं । यहाँ ही निरञ्जनका वास है । इस स्थानपर पहुँच कर योगी, निरञ्जनसे एकता कर परमानन्दका अनुभव करता है । इसी अवस्थामें आपको अजर, अमर, सर्व शक्तिमान् समझता है । इसकी सब सिद्धियाँ दासी हो जाती हैं ।

१ नेती धोता वस्ती आदि क्रियाएं शरीरकी शुद्धि के लिये हैं, चक्र भेद तो प्राण वायुसे होता है, पाठक स्वामीजीके चक्र भेदनको इससे सुधार कर पढ़लें ।

श्लोक— महापद्मश्च, पद्मश्च, शंखो, मकर, कच्छपो ।

मुकुन्द, कुन्द, नीलाश्च. खर्वश्च, निधयो नव ॥

अपनी विद्याके बलसे त्रिकालज्ञ हो जाता है। ईश्वरके समान ऐश्वर्यको प्राप्त हो जीवसे ईश्वर हो जाता है, संसारमें ईश्वरके समान पूज्य हो जाता है। पर जब तक ब्रह्माण्ड स्थित है; तबही तक योगी भी स्थित है। जब तक योगीका ज्ञान है तबही तक उसको सब कुछ प्राप्त है। उपरोक्त सब साधना गुरुके द्वारा प्राप्त होती हैं। गुरुकोही शरण प्राप्त कर सफल काम होता है।

उपरोक्त योग क्रिया बाजीगरका कौतुक है। योगियोंको अपनी योग क्रियाका बड़ा अभिमान होता है। सब भूलमें पड़कर बन्धनमें पड़े। जिस वायुके द्वारा योगी अपना सब कुछ प्राप्त करते हैं वह स्वयं नाशमान है, गोरखनाथने योगको भली प्रकार जाँच बूझकर देख लिया तब कबीर साहब की शरण गही। योग भोग दोनोंही भ्रम और अनित्य हैं। योग भोग दोनोंकी क्रिया समानही हैं जिस प्रकार योगी छः चक्र वेधता है उसी प्रकार भोगी भी छः चक्र तोड़कर ही आनन्दको प्राप्त करता है, केवल उतनाही भेद है कि, योगी नीचेसे ऊपरको चढ़ता है। भोगी ऊपरसे नीचेको आता है। पर दोनोंही परमानन्दको प्राप्त करते हैं।

भोगियोंका चक्र भेद।

भोगका वर्णन लिखता हूँ, जिसके विचारनेसे जान पड़ेगा कि, योगी और भोगीमें कुछ भेद नहीं है जिस प्रकार योगी षट् चक्रको वेध कर योग सिद्ध हो अमर मानता है उसी प्रकार भोगी भी षट् चक्र वेधकर योग सिद्ध और अमर होता है। भोगी स्त्री पुरुष मिलकर सिद्धि प्राप्त करता है यानी भोग करनेके समय—जब मत्थासे मत्था मिलता है तो पहिला चक्र टूटता है।

जब आंखसे आंख मिलतेही द्वितीय चक्र विद्ध होता है। मुहसे मुह मिलते ही तृतीय चक्र टूटता है छातीसे छाती मिलाते ही चतुर्थ चक्र टूटता है। नाभीसे नाभी मिलते ही पञ्चम चक्र विद्ध होता है भग और लिंगका संयोग होनेसे छठा चक्र वेधा जाता है।

जब भोगी उपरोक्त रीतिसे छः चक्रोंको भेद चुकता है तब वायु और अग्निके बलसे नीचेको वीर्य उत्तरता है। वह छः चक्रोंको वेधता हुआ सातवें स्थान गर्भाशयमें जा स्थित होता है। भोगी आपको अमर जानता है क्योंकि, जबतक भोगीकी संतान पृथ्वीपर वर्त्तमान है तबतक वह अमरही है।

समन्वय—जैसे योगीको ज्ञान और सिद्धि उत्पन्न होती हैं, वैसेही भोगीको संन्तान मिलती है। जो माता पिता थे वेही पुत्री और पुत्रके रूपमें वर्त्तमान रहते हैं। दोनों (योगी और भोगी) सातवें चक्रमें आपको अमर अनुमान करते हैं। (योग भोग दोनोंही मिथ्या भ्रम हैं)।

नाशकी सात शाखाएँ, जीवका अम्र. जगतको असत् प्रतिपादन

न्याय, सांख्य, सीमांसा, वैशेषिक, योग और वेदान्त आदिके अभिमानो भ्रमके धोखेमें सारे गये किसीको भी स्थिति न मिली । इनमें पड़े हुये सब अंधोंके समान टटोलते फिरते हैं । कहीं कुछ स्थिति नहीं पाते वेदान्ती एक ब्रह्म अद्वैतका अभिमान करते हैं वो तो कहने सुननेमें नहीं आता सब वाणी बचन द्वैतमेंही होते हैं । संन्यासी दशनामी वेदान्ती होनेका अभिमान करते हैं । संन्यासी और योगी, दोनों शिवलिङ्ग पूजते हैं । शिवलिङ्ग और जीवलिङ्ग समानही है, इन दोनोंमें कोई विशेषता नहीं । शिवलिङ्ग और जीवलिङ्ग दोनों बन्धनके कारण हैं । इस कारण इसके पूजनेवाले भ्रम और धोखेमें पड़े हैं, कोई अपनी भूलपर ध्यान नहीं देता दो अन्धोंके समान परस्पर विरोध करते हैं । एक दूसरे अपने अपनेको एक दूसरेसे श्रेष्ठ समझते हैं । सबके सब अपने भ्रामिक विचारमें मग्न हो जीवन नष्ट कर रहे हैं ।

कबीर पन्थका जैनमत निरूपण ।

पाठकगण ! जैनधर्मवाले लोग अब वेदको नहीं मानते । जैनी पंच परमेष्ठीकी पूजा करते हैं । त्रयशठ शलाका और अनेक देवी देवताओंकी भी पूजा करते और मानते हैं ईश्वरको जगतका कर्ता नहीं मानते वरन् कर्मकोही सृष्टिका कर्ता मानते हैं । जीवोंपर दया करना परम धर्म मानते हैं ।

जैनियोंके कई फिरके दान पुण्य विशेष नहीं करते । हिन्दू लोग ऐसे फिरकोंको नास्तिक कहते हैं, इनके पांचों परमेष्ठियोंको बन्धनमें बतलाते हैं । जैनी नानाप्रकारकी पूजा पाठमें प्रवृत्ति करके यथार्थसे वंचित रहे सत्यमार्गको छोड़कर नानाप्रकारके पाखण्डकोही अपना धर्म समझ बैठे ।

कबीर परिचयका शब्द ।

सन्तो जैनीको भ्रम भारी ।

जैन नाम जाको जय नाहीं, क्षयकी राह पसारी ॥

जीव द्रव्य पुदगल कहि बरणै, धर्म अधर्म सो चारी ।

पँचये काल द्रव्य कह छठयें, पात्र अकाश बिचारी ॥

आपन आपन गुण कर्मणिको, यह षट् करता मानै ।

कियो न कहै अनादि निधान है, जिन्ह कियो ताहि न जानै ॥

जो पुदगलके त्याग निमित्त, साधन अमित कमावै ।

सो पुदगल पाहन मूर्ति कारे, गुरु कहि शीश नवावै ॥

वीतराग सर्व पुदगल ते, लिखि सो बानी बाँचै ॥

पुदगल शिखर इष्ट कहि आगे, नारी पुरुष मिली नाचै ॥

प्रथम दृष्टान्त

जेहि चौबीसको मुक्त बतावै, जगते कहैं निरासा ।
तेहि रथ चढ़ाई राग करि फेरै, ज्यों नट करत तमाशा ॥
क्षुधा पिपासा आदि अष्टदश, दोष कहैं यह त्यागे ।
जा कारण सों सने दोषमें, ताहिमें निशि दिन पागे ॥
दर्शन ज्ञान वीर्य सुख चारी, जीव गुण कहैं विचारी ।
जीव पुदगल संबंध नहीं तव, कहु काको गुण चारी ॥
सती देह दुःख पलमें त्यागे, भूत लगा तेहि वृक्षे ।
जो साधन दुःख करि तन त्यागे, सो भुतवा नहि सूक्ष्ने ॥
रिषभ आदि चौबिस तीर्थकर, तिन्हें कहै मोक्षगामी ।
यह छौ कृतम क्षय कीयो सबके, अरुक्षे सेवक स्वामी ॥
जग उत्पत्ति कियो न काहू, पढ़ि गुणि कहे अनादी ।
कर्म करे कर्ता नहि मानै, भया अनीश्वर वादी ॥
आठ कर्ममें चारि बंध कहै, चारि कहे मोक्ष दीठा ।
जो जग कर्म किये ते नाहि, तो कृत करै करावे झूठा ॥
ये षट द्रव्य काहिको भासै, केंहि उपदेशि फसावै ।
सो कर्ता कृत्रिम चिन्हें बिनु, फिरि फिरि योनिहि आवै ॥
मोक्षको धावत बंधन पावत, ठग सुखलेत चोराई ।
गले फांस डारि डोरिआवै, मोक्षमें चोर लुकाई ॥
जो ठग पूर्वाचार्यहिंको दुःख, दियो न चीन्हें बैना ।
कहै कबीर सो ठग चीन्है बिनु, दुःखी भये सब जेना ॥ १ ॥

साखी - षट द्रव्य जैनी मता, ताको यह निरधार ।
जीव पुदगल अधरम धर्म, काल अकाश विचार ॥ २ ॥
षट द्रव्य यह मानिके, जैनिहि चित्त हुलास ।
कहहि कबीर उपदेश केंहि, पूरव केंहि भई भास ॥ ३ ॥
जैनी साधन बहु किया, मुक्ति न आई हाथ ।
जेहि दुःख चाहे मुक्तिको, सो दुख उनके माथ ॥ ४ ॥
जैनी साधन मोक्ष हित, करै कष्ट बहु भांति ।
जेहि सुख नित साधन करे, होइ सो आत्म घात ॥ ५ ॥
जैनी जैन ३ कमाइया, करता ईस विसारि ।
चाहत है जय कृतमकी, करि करि कर्म फुसारि ॥ ६ ॥
कबीर जैनी लोभिया, ठगके हाथ बिकाय ।
मुक्ति आकासके उपरे, सुनि सुनिके ललचाय ॥ ७ ॥

कबीर तीर्थकर जैनके, चौबीसो भये मोख ।
मुक्ति कहै पुदगल छुटे, ग्रंथ कियो किमि चोख ॥ ८ ॥
मुक्ति भई तेहि जैनकी, चौबीस आदिक और ।
पुदगल उनकी छुट गई, बचन कहा केहि ठौर ॥ ९ ॥
रिषभ आदि जेहि बन रहै, तेहि बन लागी आगि ।
घेरेमें जब जरि मुये, दोष अठारह त्यागि ॥ १० ॥
जीभि कमान वचन शर, पनच श्रवण लगि तान ।
रिषभदेवसे धनुषधर, मान्यो यह षट बान ॥ ११ ॥
याहे छौ बानके लागते, जैनी भया अचेत ।
लागी मूच्छर्छा कर्मकी, दुःख भोगे सुख हेत ॥ १२ ॥
काली कुत्ती रिषभकी, साधन जुत्ती खाय ।
दोष अठारह चोरपर, षट मुख भूकै धाय ॥ १३ ॥
काली बिल्ली रिषभकी, खट पकवान बनाइ ।
आय यति होई जैन घर, भोजन कछुवो न खाइ ॥ १४ ॥
कबीर जैनीके हिये, बिल्लीकी इतवार ।
साधन व्यंजन मोक्षहित, सौपेउ तेहि भण्डार ॥ १५ ॥
काली कुत्ती रिषभकी, अनादि दन्त षट चोख ।
साधन बर्नहि खदेडिकै, मारै सावज मोख ॥ १६ ॥
कबीर वाणी रिषभकी, राणी भइ सरदार ।
जैनिके शिर मारिया, साधन दुःख पैजार ॥ १७ ॥
कबीर चोरवा जैन घर, मान्यो साधन सेंधि ।
सुख धन मूस्यो तिनहिको, रहा सकल दुःख बेधि ॥ १८ ॥
रिषभ आदि जेते जिन, अव्याकृत गुण मूल ।
जिन षट द्रव्य बुझाइया, है सोइ कारण मूल ॥ १९ ॥
कबीर जो पै मुक्ति होई, छुधा पिपासा छोड़ि ।
तौ काहैं अहार देइ, जैनिक मइया भोड़ि ॥ २० ॥
कबीर जैनिक माइया, जैने धर्म कमाय ।
साधन गुण जानत रही, तो काहे दूध पिलाय ॥ २१ ॥
वेश्या औ जैन यति, दो पथ एके आहि ।
मोल खरीद वेश्या सती, यति सों मोल विसाहि ॥ २२ ॥
मोल खरीद मुड़िया करे, मुये मुक्ति मोकाम ।

द्वितीय दृष्टान्त बाजीगरकी समाधि राजाके परिवारका बालक, समन्वय पथिकका दृष्टान्त

कहें कबीर यहि जगतमें, जैनिक यति गुलाम ॥ २३ ॥
कबीर तिर्थकर जैनके, कियो अमोक्षी बाच ।
मुक्ति कहें पुदगल छुटै, ग्रंथ भये सब काँच ॥ २४ ॥
मोक्ष मुख चूंमन लगे, छौ घुनि घुनि बजाय ।
मारि तमाचा साधना, पटके जब खिसियाय ॥ २५ ॥
साधन सब लावा लखै, सिद्धि लखै सो बाज ।
शब्द विवेकी पारखी, सिद्धन्हके सिरताज ॥ २६ ॥

तात्पर्य—ऋषभनाथजीसे लेकर महावीर स्वामीतक चौबीस तीर्थकर हुये, उनका वृत्तान्त जानने पढ़नेसे विशेष जाना जावेगा । जैसे वेदधर्मके सिद्ध साधुओंका वर्णन है, वैसेही जैनधर्मके सिद्ध साधुका भी हाल है । सब जैनी अरहंतका नाम जपते और उसीसे मुक्ति चाहते हैं ।

बौद्ध—जैसे जैन धर्मी वैसेही बुद्ध धर्मके लोग भी वेद धर्मको नहीं मानते । वेद धर्म छोड़ ये लोग अलग तो हुये पर नानाप्रकारकी प्रतिमाओंकी पूजा अर्चा तो वैदिकोंकीसी करते ही रहे । विष्णुने इनको वेद धर्मसे तो छुड़ाया पर व्यर्थकी रीति व्यवहार तथा पाखण्डमें कंद कर दिया । यदि जैनियोंको यथार्थ प्रकाश मिलता तो सत्यको जानकर भी पाखण्डमें नहीं फँसते ।

गजल — टुक देखिये क्या खूब है जैनीका तमाशा ।

गाहे दिल मरगूब है जैनीका तमाशा ॥

बुत पेश जहाँ मर्द न जनों रक्स कुना हैं । कोई खासको मतलूब है जैनीका तमाशा ॥
जिसको वह खुदा कहते सो बाजार फिरावें । यह देखिये मायूब है जैनीका तमाशा ॥
कसरतसे मरौवज था यह अय्याम सलफ्रमें । इस असिरमें महजुब है जैनीका तमाशा ॥
जादू सेहर जन्तर मन्तरसे लगे हैं । मरहटसे मनसूब है जैनीका तमाशा ॥
अकसर मुतनाफिर है व लेकिन कोई कोई । अशखासको महबूब है जैनीका तमाशा ॥
सब दूत व भरम भूत जैनीको आजिज । यह नाकिस मकलूब है जैनीका तमाशा ॥ १ ॥

मूसा धर्म ।

हज़रत मूसाके द्वारा, इब्रानियोंको खुदाने शरीअत (शास्त्र— प्रदान किया । उनकी किताबमें दश आज्ञाही सर्वोत्कृष्ट हैं । जिसका वर्णन पहले लिख चुका हूँ । प्राचीन कालमें चाहे जैसा रहा हो पर वर्तमान कालमें तो मूसाके लोग बलिप्रदान आदिक कुछ रीतियोंकोही धर्म समझते हैं । अपने मन्दिरोंमें जाकर निमाज और बज़ीफा पढ़ा करते हैं इसीसे अपनी मुपित मानते हैं । सच्चे मोक्षदाताको ये क्या पहचानेंगे, जिस खुदाने मूसाकी अहकाम शरपी बतलाई,

कोलम्बसका अमेरिका प्रगट करनेका वृत्तान्त

उसको भी नहीं जान सकते । उनके अन्तःकरण रूपी आँखोंमें अज्ञानताका पर्दा-
पड़ गया जिससे सत्यका विवेक नहीं कर सके । भ्रम और अज्ञान तो तब जाता है
जब ज्ञानका सच्चा प्रकाश हो । विवेकही नहीं तो सच्चा झूठा कौन जाने ?
सब मनुष्य इसी प्रकार पक्षपात और अज्ञानरूपी अन्धकारमें पड़कर ठोकरे
खाते हैं ।

नजम — भेड़िया भेड़का किया रखवाल । कौन दम मारे तेरी ऐसी चाल ॥
तेरी हिकमत्का तुही दाना है । आदम अन्धेरमें भूलाना है ॥
जिस तफक्कुरमें अल्ल हैरान है । बहर कुदरतमें तेरी तैरान है ॥
डूबती और उछलती है सद बार । गोता खाय है न पाये करार ॥
मौत मैदान मौत गोशह है । है सफर और कमर न तोशह है ॥
जङ्गल और दङ्गल दरिन्दः है । कौन जा पार ? जो परिन्द है ॥
दस्त गीरी करे तू रहमतसे । खुद बचावे ज़माने जहमतसे ॥
है करम फ़ज़ल तेरा बे पायान हमद बेहद है तेरेही शायान ॥

ईसाई धर्म ।

हज़रत ईसा तो मूसाई धर्मवालोंमेंही उत्पन्न हुये थे पर पुरानी शरीअतसे
अपना नयाही ढङ्ग निकाला । पुराने अहदनामेसे इनके अहदनामेमें भेद है ।
इस धर्मके लोगोंमें मांस आहारकी विशेषता होनेके कारण परमात्माकी भजन
भक्तिकी और विशेष प्रवृत्ति नहीं होती । सांसारिक व्यवहारमें ही विशेष निमग्न
रहते हैं । अन्य धर्मवालोंको बहुत उपदेश करते फिरते हैं पर अपने औगुणोंकी
और बहुत कम दृष्टि देते हैं ।

क्रिता—जरा अपने ऐबोंके ऊपर गौर कर । बअकल और दानिश नज़र कीजिये ॥
तू ग़ैरोंकी बदबीनीसे दर गुज़र । नफ़ा हो न उसमें नज़र कीजिये ॥

साखी — औरनको समझावते, मुखमें पड़ गइ रेत ।

राशि बिरानी राखते, खायो वरका खेत ॥

गज़ल — खुद पन्थ चला खैर खरीदार मसीहा ।

है यक बड़ा विष्णुका औतार मसीहा ॥

मैं लाविदमें वालिद मुझ सूरतमें देख ।

यों सबसे कहा बरसरे बाज़ार मसीहा ॥

खतरमें दिया डाल सो खुद आपको वे खौ ।

सर्दारी की खातिरसे चढ़े दार मसीहा ॥

मुसलिब जो होवे सो चले संग हमारे

यों साफ किया सबसेही इजहार मसीहा ॥

नारदजीकी कथा

हैं एकही दोनों न कं उनमें आजिज । कोई विष्णुको पूजे कोई दिलदार मसीहा ॥

यह धर्म सारी पृथ्वीपर प्रचलित है । पादरी लोग सब देशों, शहरों, गावोंमें फिर २ कर उपदेश दिया करते हैं । इसमें किसी प्रकारका कोई ऐसा धार्मिक नियम नहीं है जिसके कि, करनेमें इस धर्मवालोंको कुछ कठिनता जान पड़े । रोज़ा नमाज़, पूजा, पाठ, कोई भी ऐसा नियम नहीं, जो अवश्य करना पड़ता हो । हाँ ! पादरियोंको तो कुछ नियम मानने पड़ते हैं, क्योंकि, उनको वही काम है । पादरियोंके भी भजनका कोई विशेष नियम नहीं, वरन् रविवारको गिर्जाघरमें जाकर उपस्थित होना और आये हुये लोगोंको बाइबल आदि किसी-धार्मिक पुस्तकका कुछ भाग पढ़कर सुनानाही उनका नियम है ।

पहले इस धर्मके फकीर (पादरी) लोग भजन और संयम किया करते थे, गुफाओंमें बैठकर ईश्वरके नामका अभ्यास किया करते थे, जिससे उनका अन्तःकरण शुद्ध और प्रकाशमय होता था । अब पादरियोंमें यह बात कहीं नहीं पाई जाती । ईश्वरके नाम स्मरण, बिना अन्तःकरणकी शुद्धि और ज्ञानका प्रकाश प्राप्त होना कठिनही नहीं वरन् असम्भव है ।

इतिहासोंसे जाना जाता है कि, वे पादरी, जिनसे कि, ईश्वरके नामका स्मरण और ईश्वरकी भक्तिका प्रकाश ईसाई धर्ममें फैलता था वे अब नहीं हैं । न उनका उपदेश किया हुआ नामही इन धर्मवालोंमें शेष रहा । वह नाम जिससे ईसाई साधु लोग ईश्वरी ज्ञान प्राप्त करते थे अब उसका कहीं पता नहीं । वर्तमानके ईसाईलोग नाम तो क्या लेंगे, वरन् अन्य धर्मवालोंको ईश्वरका नाम लेते देखकर हँसी, ठट्ठा उड़ाते हैं । यहाँ तक कि, उनके खण्डनमें सैकड़ों पुस्तकें छापकर प्रकाशित भी कर चुके हैं ।

जो भोजन भक्ति ईसाइयोंमें प्रथम भी थी अब उसका लेश भी नहीं रहा वरन् सबके सब सांसारिक विषय वासनाओंमें पड़कर ईश्वर भूल बैठे हैं, जो धर्मके उपदेशक पादरी लोग हैं, भारी २ वेतन पाते हैं, बगी और घोड़े दौड़ाते हैं, विषय वसानामें खूब मस्त रहते हैं; वे ईश्वरका नाम क्या जान सकते हैं ।

यह वर्तमानके विद्याभिमानी, पक्षपाती, धर्मद्वेषी और ढोंगियोंका कर्तव्य है कि, अब संसारसे ईश्वरके नामका जप स्मरण सब उठ गया । कुत्ब मुकद्दस (पवित्र पुस्तक) बाइबिलमें अपनी सम्मति मिलाकर बहुत भेद डाल दिया । उसमें जो गुण पहले था वह अब नहीं रहा । धर्मद्वेषी और विद्याभिमानियोंकी समझमें सूक्ष्म भेदकी बातें नहीं आती, बाहरी साधारण बातोंको कुछ २ समझ कर अपने विचारोंके ढंगकी बना लिया है । वास्तवमें उनका कुछ

अपराध नहीं, जैसी उनकी बुद्धि है वैसेही बनाते और करते हैं । विद्याभिमानियोंको अंतरीय प्रकाश कभी नहीं होती, फकीरोंको अंतर प्रकाश मिलता है, उससे वे लोग जो कुछ जानते हैं उसे दूसरेसे नहीं प्रगट कर सकते ।

अंतरीय प्रकाश, बिना सच्चे संत और सच्चे गुरुको कदापि नहीं मिल सकता । यही कारण है कि, सच्चे संत और विद्याभिमानी तथा संसारको चाहनेवाले ढोंगियोंमें सदासे भेद चला आता है । सच्चे संत और सच्चे साधु, ढोंगियों और मिथ्या विद्याभिमानियोंको ढोंग पाखण्ड और मिथ्या अभिमान छोड़नेको कहते हैं। तब वे कहते हैं कि, मुझे प्रत्यक्ष कुछ लाभ दिखलाओ। वो बात होनेवाली नहीं क्योंकि, सत्य विचार और निर्णयके बिना अंतरीय प्रकाश, नहीं मिल सकता । जो सर्वदा सांसारिक व्यवहार और विषयवासनामें फँसा रहेगा उसको प्रकाश कहाँसे मिले ? जो सच्चा ईसाई हो इनजीलके अनुसार कर्म करे तनिक भी विभिन्नता न होने दे तबही ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर सकता है ।

ईसाइयोंने साधुओंकी निन्दा करनी आरम्भ करदी। संत लोग इनसे अलग हो गये । संतोंके अलग होनेसे गुरु कहाँ रह सकते हैं ? गुरुही नहीं रहे तो पथ कौन बतावे ? इस समयमें इस धर्मके लोग साधुओंके स्थानमें पादरियोंको मानते हैं । सर्व प्रकारके शुभ कर्म करते हैं पर वह बात नहीं कि, जो सन्तोंके उपदेशसे मिलता है। क्योंकि, जब संसारीका गुरु संसारी हुआ तो; जैसे कीचसे कीचके धोनेसे शुद्धता नहीं होती उसी तरह गृहस्थी गुरुसे किसी प्रकार कल्याण नहीं हो सकता जबतक अवधूत, विरक्त, गुरु और आचार्य न मिलेगा तब तक कल्याण होना असम्भव है, जब गुरु विरक्त होगा तब भी सत्यके प्रकाश का मार्ग बतावेगा । इस धर्ममें रोजा निमाजकी कुछ भी ताकीद नहीं है यही कारण है कि, इस धर्मके लोग इन्द्रिय दमन नहीं कर सकते । इसमें बड़े २ विद्वान्, बुद्धिमान और शूरवीर लोग हैं इनके पास द्रव्य उपार्जनकी जैसी युक्ति है वैसे संसारकी किसी भी जातिमें न होगी । पर धार्मिक विचारमें ऐसे कच्चे हैं कि, उनके बराबर धर्ममें, पीछे संसारकी छोटीसे छोटी जाति भी नहीं है ।

सुना गया है कि, थोड़े दिनोंसे मेजर टकर साहब नामक किसी अंगरेजने मुक्ति फौज नामक एक मण्डली बनाई है, जिसमें सबके सब साधुओंके भेषमें रहते हैं, मन और इन्द्रिय दमन भी करते हैं । शायद वे लोग इनजील से उस वचनका कुछ आशय समझते होंगे कि:—

हजरत ईसाने किस लिये कहा कि, जो कोई अपना सलीब उठावे अपनेको भूल जावे, वह मेरे पीछे आवे प्रतिदिन सलीब उठावे । जिसने बाइबुलकी इस बातका आशय समझ लिया वही सच्चा ईसाई हुआ ।

माया नगर

वर्तमानमें हमारे देशके राजा ईसाई हैं। अङ्ग्रेजी सरकारका न्याय प्रशंसनीय है। प्रजा बहुत कृतज्ञ है। इनके राज्यमें किसी प्रकारका अत्याचार नहीं है सब शुभचिंतक हैं, अङ्ग्रेजी सरकारके शासनका ऐसा प्रभाव है कि, इनके भयसे इनके दोषको भी कोई प्रगट कर नहीं सकता विरक्तोंको उचित नहीं है कि, राजाके औगुणों पर और अत्याचारोंको उनसे प्रगट न करें, बरन उनकी भूल और भावी भयसे उन्हें सूचित करना ही सन्तोंका धर्म है जिससे जैसे शारीरिक अत्याचारसे जीवोंको छुड़ाते हैं वैसेही आत्मिक दुःखसे बचा सकें, सच्चे विरक्त सन्तोंका न होना आत्मिक अत्याचार है। जब सच्चे संतही न रहेंगे एवं विरक्त निष्काम उपदेशकही न रहेंगे तो आत्मिक उपदेश कौन करेगा ? सच्चा निष्कामी विरक्त, लोक एवं परलोककी कामनासे रहित परमार्थी सन्तोंके बिना सत्य उपदेश कौन दे सकता है ? सत्य उपदेश नहीं तो ईश्वर कहाँ ? ईश्वर नहीं तो मनुष्यत्व कहाँ ? इस कारण शासकोंको उचित है कि, सच्चे निष्कामी सन्तोंकी ओर ध्यान दें। राजा और शासकोंको बेपरवाहीसे पठित मुखोंकी बन आई हैं वे साहसी बनकर सन्तोंकी निन्दा किया करते हैं।

विशेष कथन।

समस्त स्वसम्बदका यही सार है कि, संसारी मनुष्य सच्चे सन्तोंकी सेवा सच्चे मनसे करें जिससे सन्त अपनी शारीरिक चिन्ताओंसे निश्चित होकर भजनमें लगे रहें; जिससे दोनोंका परलोक सुधरे। सच्चे निष्कामी सन्तोंकी शरण गये बिना सांसारिक जीवोंका उद्धार होना कठिन है। संसारसे तरनेका एकमात्र उपाय सच्चे सन्तोंकी सङ्गतिही है।

सच्चे सन्तोंकी सेवा शुश्रूषा बिना देशका बड़ा अपकार हुआ है। लोग अंगरेजी फारसी पढ़कर अहंकारी हो गये हैं, सन्तोंकी सेवा छोड़ बैठे हैं, जिससे सत्य पथके दिखानेवाले सन्तोंका मिलना कठिन हो गया है। सत्योपदेशका मिलना कठिन हुआ तो लौकिक पारलौकिक मार्गोंको कौन बतावेगा, देश और धर्मकी रक्षा और उन्नति कैसे हो ?

जिनका विशेष धर्म, साधु सेवा था, वे अपने धर्मको छोड़ बैठे। धम छोड़ने से उदारता और भक्ति छूट गई, कृपणता अभक्ति फैल गई। विषय वासनामें प्रवृत्ति हुई, विरक्तों एवं सच्चे इन्द्रियजित, निष्काम उपदेशकोंसे घृणा हो गई, सत्य उपदेशका मार्ग बन्द हो गया, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध अन्धकारमय हो गया, धम्मार्धम्मका विवेक जाता रहा, पर पूर्व संस्कारोंसे धर्मका नाम सुनकर धर्मकी खोज करने लगे। सच्चे सन्तों, विरक्तोंसे पहलेहीसे घृणा हो रही थी।

सिकन्दर बादशाह और फकीर

इससे इधर उधर पूछते फिरने लगे पर सत्य धर्मका पता न लगा. क्योंकि, सच्चे उपदेशक तो सच्चे निष्कामी, देहाभिमान गलित पुरुष ही हुआ करते हैं। इधर उधर भटकनेमें जब कुछ प्राप्त न हुआ तो कोई २ (हिन्दू) ईसाई, मुसलमान, नास्तिक, नेचरियो, विधर्मी (ला सहजब) आदि होने लगे।

यह सब परिणाम हिन्दू साधुओंके धर्मकी ओर ध्यान न देनेकाही है। ईसाई पादरी लोग बेतन पाते हैं, जिससे दिनरात अपने धर्मकी उन्नतिमें लगे रहते हैं। उनके उलटा हिन्दू साधुओंको रोटी कपड़ा तथा अन्य आवश्यक पदार्थ बड़ी कठिनातासे मिलते हैं। जिसमें कुछ प्राप्त न हो वरन् दुःखही दुःख हो तो, स्वभाविकही बात है कि, उसमें कठिनातासे प्रवृत्ति होती है। हिन्दू साधु अपने शरीरयात्राके ही चिन्तामें दिनरात लगे रहते हैं तो धर्म अथवा देशकी उन्नति कैसे कर सकेंगे? ठीक इनके उलटा, पादरियोंको बेतन मिलता है जिससे वे अपनी आवश्यकतासे निश्चिन्न हो दिनरात धर्मकी उन्नतिमें ही अपना समय बिताते हैं।

धन्य है अंगरेजी सरकारको कि, जिनकी कृपासे व्यतीत मुसलमानी शासनकी अपेक्षा वर्तमानमें लोगोंको लिखने और कहनेकी स्वतन्त्रता है जो कोई कुछ लिखना और कहना चाहता है, लिख और कह सकता है। किसी प्रकार की रुकावट अथवा अत्याचार नहीं है।

अन्य २ राज्योंमें सच्चे धर्मज्ञों और सच्चे सन्तों पर जो जो अत्याचार और अन्याय हुआ करते थे वे अब नहीं हैं। अन्य राजाओंके शासन कालमें उनके धर्म और मजहबके विरुद्ध कोई अपने धर्मकी बात प्रगट नहीं कर सकता था।

साखी - कबीर-सांच कहूँ तो मारि हैं, तुरकानी का जोर।

बात कहूँ सत लोककी, कहिके पकड़े चोर ॥

जिस राज्यमें सन्तोंको गाजर मूलीके समान काट डालते थे उस समय संत सत्य भेद कैसे प्रगट कर सकते थे? अथवा क्या लिख सकते थे? उस समय कहते तो किससे? और लिखते तो किसके लिये? उस समय तो धर्मद्वेषकी अग्नि भड़क रही थी कि, कोई मुखसे खोल नहीं सकता था। कलमका तो कुछ बल ही नहीं था। बादशाह स्वयम् स्वतंत्र और धर्म द्वेषी थे, दूसरे पठित मूर्ख धर्मद्वेषियोंका भी इतना बल था कि, धर्मके नाम पर जिस प्रकार चाहते थे शासकोंके मनको फेर देते थे।

मुसलमानीधर्म।

कबीरपन्थीग्रन्थोंमें लिखा है कि, मुहम्मद महादेवका औतार है। महा-

इन्द्रकी कथा तपस्वीकी कथा

देवने ही मुहम्मदका औतार धारण कर मुसलमानी धर्म चला कर वाममार्गका प्रचार किया है। तंत्र शास्त्र और अघोर धर्ममें संसार प्रचलित किया है। महा-देव तमोगुणके रूप हैं तमोगुणी हैं। यही संसारका मूल है; तमोगुणसेही संसारका सब व्यवहार चल रहा है। इस मुसलमानी धर्मका आचार्य तमोगुण है।

मुसलमान कहते हैं कि,

كُلُّكَ لَأَنْفَعَنَّكَ

अर्थात्—कहता है कि, यदि न होता ऐ मुहम्मद तू, तो न उत्पन्न करता मैं पृथ्वी और आकाशको। प्रायः मुसलमान इस आयतसेही मुहम्मद पर बहुत अभिमान करते हैं। पर सन्तोंकी दृष्टिमें यह कुछ सार नहीं रखता वरन् अति तुच्छ और नीच है। क्योंकि, यह संसार यथार्थमें कुछ भी नहीं, मिथ्या भ्रममात्र है अविद्यासे इसकी उत्पत्ति है, असत्यही सत्य होकर दीख पड़ता है। अज्ञान कहो अथवा तमोगुण अथवा अविद्या सब एकही बात है। अज्ञानसे ही सृष्टि हुई है, अज्ञानकी कुछ श्रेष्ठता नहीं वरन् ज्ञानकी ही श्रेष्ठता है। निर्दयता और अत्याचार अज्ञानका चिन्ह है, तमोगुण बिना निर्दयता अत्याचार आदि आसुरी संपत्ति कुछ भी नहीं। इस (मुसलमानी) धर्मके लोग निमाज रोजा भी पढ़ते करते हैं नियत समय पर निमाज पढ़ना अपना धर्म जानते हैं, पर सब ऐसे निर्दई और कठोर हृदयके होते हैं कि हिंसा करना अपना मुख्य कर्तव्य समझ रखा है। फ़कीरोंमें भी बहुधा ऐसेही हिंसक हैं पर कोई कोई ऐसे भी होते हैं जो हिंसाको अधर्म समझते हैं। काजी और—मुल्ला बहका बहका कर, इस धर्मवालोंसे सब अधर्म करवाते हैं। उन्हींके कहनेसे इस धर्मके लोग ऐसी निर्दयता धारण किये हुये हैं कि, दया लाना अथवा दयाका संकल्प करना भी पाप समझते हैं।

जिस प्रकार हिंदुओंमें उसी प्रकार मुसलमानोंमें भी भजन, भक्ति, जप, तप आदि साधनोंकी बहुतसी युक्तियाँ हैं पर मुसलमान लोग सब धर्म कर्मको केवल जीवहिंसाके कारण मिट्टीमें मिला देते हैं, जीव हिंसा नहीं छोड़ते। यद्यपि इस धर्ममें भी बड़े २ प्रसिद्ध महात्मा तपस्वी, ईश्वर भक्त होगये हैं अब भी कोई कोई ऐसे हैं, जो दिनरात ईश्वरके भजनमेंही लगे रहते हैं, संसारसे कुछ भी सरो-

१ मैंने मुसलमानी पुस्तकोंमें देखा है और शरयी मुसलमान भी कहते हैं कि, जबह किये हुये पशुकी छटपटाहट और उसकी दुःखमय अवस्था को देखकर यदि किसी मुसलमानके मनमें दया आजावे तो वह उसी समय धर्मसे पतित होकर खुदाका गुनहगार बन जाता है। धन्य है ! ऐसे धर्म और खुदा तथा उसके प्रवर्तकों को।

कार नहीं रखते तो भी साधारणतः इस धर्मके लोग दया और नम्रतासे बहुत प्रयत्न करते हैं । इन लोगोंमें क्रोध और निर्दयता सब जातियोंसे अधिक है । यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि, इनका मुख्य धर्म कुरबानी आदि है जो तमोगुण और अविवेक अज्ञानता, निर्दयता बिना हो ही नहीं सकता ।

जबतक मुसलमान लोग तमोगुणका आसरा छोड़ सतोगुणका आसरा न लेंगे उसको अपना आधार न बनावेंगे, तबतक इनके अंतः—करण की शुद्धता न होगी, न इनको मोक्ष मार्गही मिलेगा वरन् ईश्वरके कोपमें पड़े रहकर नाना-प्रकारकी गर्भ आदिकी नर्क यन्त्रणा सहते हुये भौसारगमें गोता खाते रहेंगे ।

नम्रम् ।

यह इनसान है दर्द दिलके लिये । कि बेरहम रजवाँ न राजी किये ॥
न पावे कोई वह विहिस्ती दरखत । कि दिल जिसका होवे मखलूकसे सख्त ॥
यहाँ और वहाँ हूर गिलमाँ वही । वही मर्दी जन और मुसलमाँ वही ॥
वही नेमत और खवान अलवान है । वही नोश वखुद शौकतो शान है ॥
न पहचान पैगम्बरके पाक जो । यहाँ और वहाँ है गिफ्तार सो ॥
तुर्ब और तरागः बहानः । किया हम्बमें जमीन और जमाना किया ॥
गिरफ्तार लज्जात नफ़सानियाँ । यहाँ और वहाँ एक सेहो मियाँ ॥
भला ! यह भला है ? गला काटना । मिहर या क्रहर खूनका चाटना ॥
किसी जिस्म और सूरतमें जानदार हो । जहाँ दार उसका अमाँदार हो ॥
किसीकी वह ईजा से राजी नहीं । कि बेइल्म मुल्ला व काजी नहीं ॥
वह रहमान है सबका मिहरवाँ पिदर । वह हाजिरो नाज़िर है देखो जिधर ॥
वह बेचून सब जहाँ का ले हिसाब । खड़े होवें जब रक्बके आली जनाब ॥
न बदला छुटे कोई हो पीरो अमीर । कि है कौल यह सत्त साहब कबीर ॥
खुदावन्दकी बारगाह बेरया । जो हरकसके इनसाफ़ में दिल दिया ॥
रहीम जो रहमान् मशहूर है । हमेशः सो बेरहमीसे दूर है ॥
गला घोटना उसको भाता नहीं । छूरो वह गलेपर चलाता नहीं ॥
न छिड़कावता खून मुजविह ऊपर । नहीं गोश्त खाता न खाता ज़िगर ॥
न खूँखार ग्रफ़्फ़ार सितार है । क्या सो गुमाँ बेगुमाँ पार है ॥
जले गोश्त और पोस्त बदबूई हो । जो खुशबूय कहे खिला फ़ेअकल सो ॥
वह कौसा खुदा अक्षल से ऊँघता । जो बदबूको खुशबूय कर सृंघता ॥
जला करके कुरबान हो जाने जो । जो सृंघे वो खावे खुदा कौसा हो ? ॥
यह मूसाके मजहबकी बातें लिखा । जो मूसा धरम ईसा सोई कहा ॥

तपस्वी गाधको माया दर्शन फकीर और अघोरी

जो मूसा व ईसा के मतका खुदा । मुहम्मद के मजहब की सोई सदा ॥
बुजुर्ग व अफ़ज़ल हैं तीनां नबी । लिखा है कुरआं जो कलामे रबी ॥
वही खुदा है किया तीन ढंग । जहां जैसा वाजिब लगाया सो रंग ॥
हो जैसा खुदा वैसा बन्दः हुआ । जो हमरंग होवे आनन्दा हुआ ॥
जबह कत्ल जो खूरेजी करे । वह रहमान खुदाबन्द इससे परे ॥
ज़रा फ़िक्र को दिलमें रह दीजिये । ख्यालए बातिलको तह कीजिये ॥
अज़ल और अबद वा करम व फ़ज़ल । मदाम उसकी आईन है बेखलल ॥
शक्ति धर्म ।

आदि भवानी सब धर्मोंकी प्रवर्त्तक है; उसीकी इच्छासे सब धर्म प्रचलित होते हैं । ऐसा होनेपर भी विशेष धर्म मायाके नामसे “शक्ति धर्म” करके प्रसिद्ध है । शक्ति धर्मके सम्बन्धी जितने धर्म हैं सब ऐसे घृणित, नीच और अशुद्ध व्यवहारोंसे संयुक्त हैं कि, किसी मनुष्यकी कदापि प्रवृत्ति नहीं हो सकती । केवल राक्षस लोगही इसको धारण कर, उसके घृणित और नीच अशुद्ध नियमों को स्महार सकते हैं । यद्यपि देखनेमें मनुष्यही इस धर्मके भी ग्रहण करनेवाले हैं पर उनको मनुष्य कहना भूलका काम है । क्योंकि, आसुरी गुणोंको धारण करनेवालोंकोही उपसुर कहते हैं असुरों और राक्षसोंके सांग नहीं हुआ करते ।

इस धर्मवाले ऐसे २ नीच घृणित कार्यमें प्रवृत्त होते हैं कि, पिशाच भी उनकी क्रियासे घृणा करते हैं । उनके व्यवहारोंके स्मरण मात्रसे रोवें खड़े हो जाते हैं । उनके ऐसे घृणित और ग्लानि उपजानेवाले व्यवहार होते हैं कि, उनके लिखनेकी मेरी क्लम और वाणीमें सहन शक्ति नहीं कि, उनको लिख सकें । यह धर्म विशेष कर शिव और शक्तिका है । योगी, विषयी और मांसाहारी लोग इसके प्रवर्त्तक हैं । इस धर्मके द्वारा लाखों क्या अनन्त जीवोंकी नित्य हिंसा होती है, लाखों जीवधारियों के गलेपर छुरी चलती है । इसके अनुयायियोंके अन्तःकरणमें तनिक भी दयाका संचार नहीं होता, यदि राजभय न हो तो ये मनुष्योंको भी मारकर खाया करें । अबभी दाव घात पाते हैं मनुष्योंको मारे बिना नहीं रहते । ये मुर्दा जिन्दा सब खा जाते हैं । इस धर्ममें विशेष करके मूर्ख अपढ़ और नीच जातिके लोग बहुतसे होते हैं । जो लोग इस धर्मको स्वीकार करते हैं वे अपनेको छिपाये रहते हैं, क्योंकि, लोग उनके धर्मसे घृणाकी दृष्टिसे देखते हैं ।

इस धर्ममें मुक्तिके मूल पंच मकार मानते हैं—मुद्रा, मीन, मांस, मद, मंथुन यही पांच मकार हैं ।

राजा लवण

मंत्र जप करनेकी विशेष रीतिको मुद्रा कहते हैं। मीन मछली खाना, मांस, सबप्रकारका मांस खाना, सबप्रकारकी सराबपीकर मस्त होना, विवाहिता अविवाहिता सब प्रकारकी स्त्रियोंके साथ भोग करना। यदि सहृदय भग एक समय पूजन करनेको मिल जावे तो ये लोग साक्षात् मोक्ष मानते हैं। इस धर्मके बारह भेद हैं। सब एकसे एक बड़े चढ़े हैं। इसके लोग बड़े आनन्द और उत्साह पूर्वक अपने घृणित और नीच कर्मोंको करते हुये मोक्ष मानते हैं। इस धर्ममें जाति पौत्रिका बिलकुल विचार नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्री, भंगी, चमार, मोची आदि नीच ऊँच जाति सब एक साथही खाते हैं। अनन्त जीवधारियोंकी हत्या करते हैं।

दैवी और आसुरी सम्प्रदाय।

इस संसारमें दो देवताओंके धर्म प्रचलित हैं। संसारके सब धर्म इन्हींके अन्तर्गत हैं। एकका नाम दैवी धर्म है। इसके अधिष्ठाता विष्णु देव हैं। दूसरी सम्प्रदाय है जिसके प्रवर्तक शिव हैं। दैवी सम्प्रदायकोही श्रीसम्प्रदाय अथवा विष्णु सम्प्रदाय कहते हैं। आसुरी सम्प्रदायको शैवी वा शांकरी सम्प्रदाय बोलते हैं।

विष्णु सम्प्रदाय सत्गुणी धर्म और मुक्तिका मार्ग है। शिव सम्प्रदाय तमोगुणी धर्म और नरकका कारण है। येही दो देवते और इनके दोनों मार्ग, जीवोंके मुक्ति और बन्धनके कारण और द्वार हैं। विष्णुभक्त मुक्ति और स्वर्गके अधिकारी होते हैं; जैसे कि, ढरुव और प्रह्लाद अपने परिवार सहित स्वर्गको गये। विष्णु सम्प्रदायमें एकसे कितनोंका भला होता है, पर शिव सम्प्रदायसे सिवाय अशुभ और दुःखके दूसरा कुछ नहीं।

मुहम्मदी कहते हैं कि, मुहम्मद साबहके कलमा पढ़नेसे मुक्ति मिलती है, जो मुहम्मदी कलमा नहीं पढ़ता उसकी मुक्ति नहीं होती। जैसा कि, मुहम्मद साहबके माता पिता नरकको गये। क्योंकि, कलमा नहीं पढ़ते थे। जो कोई कलमा पढ़े तो उसपर किसीका अहसान ही क्या हो सकता है? क्योंकि, जब कलमा स्वयम् मुक्तिदायक है, जिससे कि, कलमा उत्पन्न हुआ स्वयम् उसके माता पिताको कलमाकी क्या आवश्यकता है? इससे प्रमाणित है कि, जब मुम्मद साहब अपने माता पिताको मुक्ति नहीं दे सके, तो दूसरोंको किस तरह दे सकेंगे।

कलियुगमें शंकर और मुहम्मद दोनों शिवके औतार हैं। एकने भारत-वर्षमें संन्यास धर्म चलाया, दूसरेने पश्चिमी देशोंमें इस्लाम धर्म प्रकट किया।

महादेव आसुरी सम्प्रदायके आचार्य हैं, उनके द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती। हाँ यदि कोई शंख भी पाप कर्मोंसे रहित हो, पुण्यमें प्रवेश कर, दैवी सम्प्रदायको धारण करे तो समय पाकर अवश्य मुक्तिका अधिकारी हो सकता है। नहीं तो, जबतक शिवका आसरा करेगा आवागमनमें रहेगा, प्रकाशका मार्ग नहीं प्राप्त कर सकेगा।

सिंहावलोकन।

संसारमें जितने धर्म (मजहब) हैं सबके प्रवर्तक शिव और विष्णु हैं। ये दोनों देवते निरञ्जनकी ओरसे संसारमें वेद और किताबको प्रचलित करने के लिये नियत किये गये हैं। येही दोनों ब्रह्माण्डोंका प्रबन्ध करते हैं, इनके साथ सहायतामें ब्रह्मा भी रहते हैं, पर ब्रह्माकी पूजा कहीं नहीं होती। क्योंकि, इनको आद्याका शाप हो चुका है। इन देवोंमें विष्णु महाराज श्रेष्ठ हैं, येही सब संसारके कर्ताके नामसे पूजे जाते हैं। यह बात मैं प्रथम सिद्धकर आया हूँ कि, भारतवासी प्रगटहो विष्णुको पूजते हैं। अन्य योरप आदि देशवालेभी जिसका पूजन करते हैं जिसको ईश्वर मानते हैं वह भी विष्णुकाही रूपान्तर है। अरबके लोगोंके आँखोंपर पक्षपातका पर्दा पड़ा है पर मैंने पर्दा उघाड़कर कह दिया है जिसको मानना हो माने, न मानना हो तो उसकी इच्छा। इन्हीं विष्णु भगवान्की संसारमें पूजा हो रही है, दूसरा कोई नहीं है।

जो आदमका खुदा था वही इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा था। इब्राहीमकी संतानमें चालीस सहस्र पँगम्बर हुए,। सब उसी एक खुदाकी भक्ति करते आये। मुहम्मदतक जो अन्तिम पँगम्बर हुये सब उसीकी साक्षी भरते आये।

कुरान्सूरे उमरान ८३ आ० ३ सि० ९ रु.

قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ وَأَنزَلَ عَلَيَّ الْكِتَابَ

इसका अर्थ—तू कह—हम ईमान लाये अल्लाहपर जो कुछ उत्तरा हम पर इब्राहीम इस्माईल, इसहाक, याकूब, तथा उसकी सन्तान पर जो कुछ मिला मूसा, ईसा और सब नबियोंको खुदाकी ओरसे, हम भिन्न नहीं करते उनमेंसे किसीको हम भी उसीकी आज्ञामें हैं।

इसी प्रकारसे सब मनुष्य उसी खुदाकी भक्ति करते हैं। कोई किसी प्रकारकी बुद्धि विद्या और युक्ति क्यों न खर्च करे पर इन तीनों देवतोंकी

अधीनतासे नहीं निकल सकता । इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि, सारे संसारके लिये एकही ईश्वर है । ईश्वर और शास्त्र होनेपर भी भिन्न भिन्न मजहब व रीति क्यों हुई ? इसका कारण यही है कि, मनुष्य अपने यथार्थ मनुष्यत्वसे रहित हो रहे हैं, देखनेकोही मनुष्य हैं पर यथार्थमें मनुष्य नहीं हैं । यदि इनको अपने धर्मकी सुधि होती तो एक धर्मको छोड़ दूसरे धर्मको ग्रहण न करते । जब कि, सब धर्मोंका प्रवर्त्तक एकही आचार्य है तो दूसरे धर्मको धारण करने एवं एकको छोड़नेसे क्या लाभ ? लोगोंकी बुद्धिपर अन्धकार छा रहा है, जिससे अपने धर्मके आशयको न समझकर, एक दूसरेके साथ, लड़ते झगड़ते, वाद-विवाद करते और भला बुरा कहते हुए मरते मारते हैं ।

विशेषतः वे हिन्दू लोग जो किसी कारणसे मुसलमान हो जाते हैं, यदि उनसे पूछो कि, तुम मुसलमान क्यों हुये ? तो प्रगटमें तो वे बहुत बातें बताते और अपने अवगुणोंको छिपानेका यत्न करते हैं पर भीतर ही भीतर हृदयमें पछताते हैं । कोई कोई स्पष्टही कह देते हैं कि, अपने धर्मकी अनभिज्ञता के कारण हमने अपना धर्म छोड़ दिया, अब हिन्दू लोग मुझे अपने धर्ममें नहीं लेते ।

भवतारण ग्रन्थमें लिखा है कि, कबीर साहबका वचन है कि, पूर्व जन्मके बड़े पुण्य और शुभ कर्मोंके प्रतापसे उच्चकुलमें जन्म होता है सांसारिक वैभव सम्पन्न होता है । पूर्वजन्मके ही पुण्य प्रतापसे रूप यौवन और उत्तम कुल मिलते हैं, जितने धनी और राजा महाराजा अथवा उच्चपद पर स्थित हैं, सब उत्तम और श्रेष्ठ कुलकेही होते हैं । अतः ब्राह्मण, क्षत्रियादि जो उत्तम श्रेष्ठ जातिके हैं वे कैसे प्रतिष्ठाके पात्र हैं ? यहाँतक कि, यदि इन जातियोंमें कोई विशेष गुण भी न हो तो भी अपनी उत्तम जातिके कारण प्रतिष्ठाको प्राप्त कर लेते हैं । यह उत्तम कुलकी विशेषता और गुण हैं । इसी प्रकार मुसलमानोंमें भी कुलवान् सैयदोंकी सब सेवा और भक्ति करते हैं वरन् ईश्वर भी श्रेष्ठ कुलवानोंपर विशेष दया करता है । देखो तौरेतमें—इब्रानी उत्तम कुलके थे उनपर ईश्वरकी विशेष दया थी । जो हिन्दू मुसलमान हो जाते हैं, अथवा ईसाई धर्मको स्वीकार कर लेते हैं वे क्या प्राप्त करते हैं ? उच्चकुल और श्रेष्ठ स्थानसे भ्रष्ट हो नीचकुल और अधम स्थानको ग्रहण करते हैं, अन्तमें जब वे समझते हैं तब शोककर पश्चात्ताप करते हैं । जैसे कि, बादशाह दरिद्र हो जानेपर करता है वैसेही हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर दूसरे धर्मरूपी दरिद्रताको स्वीकार करते हैं । कोई हिन्दू उच्च और श्रेष्ठ कुलका ईसाई अथवा मुसलमान नहीं होता वरन् आठ कारणोंसे कोई कोई अपने धर्मको छोड़ता है ।

मुहम्मद साहिबके मआराज

हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण ।

१-अपने धर्मको न जानना । २-दरिद्रता अथवा लोभ । ३-विषयसे वासना की प्रबल कामना—उसमें खूब खुल खेलनेकी प्रबल इच्छा । ४-किसी स्त्रीकी आशक्ति । ५-उच्च पद अथवा मान बड़ाईकी इच्छा अथवा खुशामद । ६-विधर्मियोंकी विशेष संगति और उनका सहवास । ७-किसीके बहकाने और धोखा देनेसे जैसा कि, प्रायः ईसाई मिशनरी करते हैं । ८-संयोगन किसी हिन्दूका भूलसे ईसाई अथवा मुसलमानका पानी पी लेना हिन्दुओंका फिर अपनी जातिमें न मिलाना ।

यही आठ कारण हैं कि, हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर ईसाई अथवा मुसलमान हो जाते हैं नहीं तो हिन्दू भी कभी अपने धर्मको नहीं छोड़ते ।

धर्म रक्षक ।

कबीर साहबने धर्मकी रक्षाके लिये तीन रक्षक नियत किये हैं । १ गुरु २ सन्त और ३ ग्रन्थ । जहां ये तीनों रक्षक वर्त्तमान होते हैं, वहां किसी प्रकारकी त्रुटि नहीं होती । जो इन तीनों रक्षकोंको छोड़ देगा, उनकी शरण न रहेगा, वह अवश्य धर्मसे पतित हो नीचगतिको प्राप्त होगा । उसको धर्म लाभ न होगा । इस कारण इन गुरु, सन्त और ग्रन्थ तीनोंकी प्रतिष्ठा करनी उचित है ।

प्रथम गुरुकी सेवा पूजासे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है दूसरे सन्त भी गुरुकीही मूर्ति हैं । तीसरे सबका मूल ग्रन्थ भ्रमकी टट्टी तोड़ने और सत्यपथको बतलानेवाला है । तीनों (गुरु, सन्त, ग्रन्थ) को एकरूप जानकर, तीनोंकी समभावसे सेवा और पूजा करना उचित है । क्योंकि, गुरु और संत बिना ग्रन्थका आशय मिलना कठिन है । ग्रन्थ बिना संत और गुरुका उपदेश करनेका दूसरा द्वारही नहीं है । ग्रंथोंकेही अर्थको विचारकर संत गुरुके पदको पहुँचते हैं, फिर उन्हीं ग्रन्थोंका उपदेश दूसरोंको सुनाते हैं । जो इन तीनोंमेंसे किसी एककाभी अनादर करेगा वह धर्मसे पतित हो नरकका अधिकारी होगा । इस समय भारतवासी इन तीनों धर्म रक्षकोंसे श्रद्धाहीन हो रहे हैं, नहीं तो अन्य धर्मियोंके आखेट क्यों बनें ? हिन्दू लोग धर्म ग्रंथों और धर्मपुस्तकों तथा संत और गुरुजनोंको छोड़ अन्य धर्मियोंके धर्म ग्रंथ तथा अन्य भाषाको बड़ी श्रद्धा और भक्तिसे पढ़ते हैं उन्हींके धर्म गुरुओंसे उपदेश लेते हैं तो हिन्दू धर्म क्यों न अवनति हो ईश्वर और मृत्यु दोनोंके भयको मुलाकर लोग अधर्ममें फँस गये धर्म छो बैठे ।