भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

रहे । अद्या निरञ्जन तथा तीनों देवताओंने सबको अंधा कर दिया और काल निरञ्जन सदैव सबको भून भूनकर खाने लगे, कोई पथ तथा कोई युक्ति मनुष्यको भागनेकी नहीं मिलती, मनुष्योंका यह कष्ट और दुःख देखकर और उनकी रोलार्डि सुनकर सत्यपुरुष दयालु हुए और ज्ञानीजीको बुलाकर कहा कि, ज्ञानीजी । मृत्युलोक जाओ, क्यों कि, कालपुरुष समस्त जीवों को नितान्त ही कष्ट पहुँचा रहा है कोई मनुष्य मेरे लोकको आने नहीं पाता है, कालपुरुषने सबको फँसा लिया है । तुम जाकर मनुष्योंको उनकी नींदसे जगाओ और सत्य भक्तिमें लगाकर मेरे लोकमें ले आओ । जो कोई आपकी आज्ञाको स्वीकार करे उसको कालपुरुषके पंजेसे छुड़ाओ । सत्यपुरुषने जब ऐसी आज्ञा दी तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषको प्रणाम करके सत्यलोकसे बिदा हुए और मृत्युलोककी ओर जीवोंकी रक्षाके लिये रवाना हुए ।

दूसरा प्रकरण

कबीर साहबका झाँझरी द्वीपमें आनेका वृत्तान्त ।

अद्या और निरञ्जन सत्यपुरुषका नाम छिपाकर तीनों लोकोंका राज्य करने लगे, सत्यपुरुषका पता अपने तीनों पुत्रोंको भी नहीं दिया, निरञ्जनने अपनी राजधानी झाँझरी द्वीपमें स्थिर की, जो सत्यलोकको चलनेपर भवसागरका पहला नाका है । ज्ञानीजी झाँझरी द्वीपमें आये और सत्यनामकी हँक लगायी, तब धर्मराय घमंडके साथ बोला कि, तुम कौन हो और कहाँसे आये और किस कारण आये हो, यहाँ तुम्हारा क्या काम है ? यह बात सुनकर ज्ञानीजीने उत्तर दिया कि, मेरा नाम ज्ञानी है, मैं सत्यपुरुषका अंश योगजीत हूँ और सत्यपुरुषकी आज्ञासे पृथ्वीपर जाकर मनुष्योंको मुबत कराऊँगा, कारण यह कि तुमने समस्त जीवोंको दुःख पहुँचाया और सत्यपुरुषके नामको छिपा दिया है, और मुक्तिमार्गके समस्त द्वार रोककर मनुष्योंको धोखा देकर धूर्ततासे मार लिया है । कोई मनुष्य नहीं जानता कि, मुक्तिमार्ग कौन है ? और किस-प्रकार हमारा बचाव हो ?

तीसरा प्रकरण ।

निरञ्जन और ज्ञानीजीका वार्तालाप ।

इतना सुनकर धर्मराज अत्यंत क्रुद्ध होकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी ! सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान कर दिया, इसमें तुम्हारे

सत्यपुरुषका योगजीतजीको निरंजनके पास उसे मान सरोबरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना भवसागरकी रचना

हस्तक्षेप करनेकी क्या आवश्यकता है ? मैंने उसकी सेवा की और उसने मुझको राज्य प्रदान किया । तुम जीवोंको मुक्ति देने क्यों जाते हो ? तुमको क्या पड़ी है कि, मेरे राज्यमें बाधा उपस्थित करो । मैं तुमको मारूँगा, तुम बड़े समय पर आगये हो, देखूँगा अब तुम मुझसे किस प्रकार बचकर जा सकते हो ? यह कहकर धर्मराजने अपने अनन्त रूप बनाये और अत्यंत क्रुद्ध हो झुंझलाकर ज्ञानीजीके सामने आकर लड़नेके निमित्त प्रस्तुत हुआ ।

चौथा प्रकरण ।

ज्ञानी और निरंजनका युद्ध ।

(काल पुरुष और ज्ञानीजीके युद्धका वृत्तान्त)

काल निरञ्जन बड़े मस्त हाथीका स्वरूप धारण करके योगजीतके सामने आया और अपना दाँत मारा, तब आपने उसका सूँड पकड़कर उसपर एक ऐसा झटका दिया कि, वह दूर जाकर गिर पड़ा और अचेत हो गया, इस आघातसे उसे बहुत चोट लगी और उसका मस्तक नीला हो गया । जब अपने प्राणका भय देखकर धर्मराय पातालको भाग चला, तब योगजीतजीने उसका पीछा किया, उधर निरञ्जन भागकर कूर्मजीके पास गया और कहा कि, हे कूर्मजी ! मुझको तो योगजीतजीने मारकर भगा दिया, आप मुझको अपनी शरणमें रखो, मुझको सत्यपुरुषने तीनों लोकों का राज्य प्रदान किया था, सो योगजीतजीने मुझको मारकर निकाल दिया और मनुष्यकी मुक्ति करके सत्य-लोकको लेजाना चाहते हैं ।

नञ्जम ( उर्दू कविता ) ।

जब वह पीलमस्तानः आया वज्रज्ञ । वह खरतूम फटकारता वेदरञ्ज्ज् ॥
जगदीश आली न पहुँचान है । कि बाहरवयां शौकतो शान है ॥
कि आदममलिक जिसकी गातेहै गीत । सोई आप साहबं सोई योगजीत ॥
कयासो गुमां ब्रह्म है पाय लुंग । पड़े गार लाइलम तारीको तंग ॥
सकें कौन पहुँचान बह पाकजात । बयां वेद बानीसे बाहर सिफ़ात ॥
जिसे महकुर कुदशनासी बता । उसीकी करमसे सो पावे पता ॥
चला सामने उसके वह दू बहू । जहाँमें कोई न जिसका अदू ॥
हुवा कैल आमादः पैकारको । न माना न जरना जहाँदार को ॥
लगाया तमाचा पकड़ सुण्डको । परीशां किया पीलके झुण्डको ॥

सिन्धु मंथन और चौदह रत्न उत्पत्ति

पड़ा दूर तब काल बेताब हो । कि जोंनीलफर खुशक बेआब हो ॥
रही ताबो ताकत न कत्तालको । चला भाग तब काल पत्तालको ॥
जवामर्दगें जब न ताकत रही । दिया छोड तब तख्त शाहंशही ॥
रही बाकी जब और कोई न राह । लिया जाके तब कूर्मजीकी पनाह ॥

जब काल पुरुषने भागकर कूर्मजीकी शरण ली, तब कबीरसाहब उसका पीछा करते हुए पाताल लोकको गये आपको देखकर कूर्मजी खड़े हो गये और निवेदन करने लगे कि, आप कौन हो और कहाँसे आये हो ? तब कबीरसाहबने कहा कि, मेरा नाम ज्ञानी है, और मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे मनुष्योंकी मुक्तिके लिये भवसागरमें जाता हूँ । यह बात सुनकर धर्मराजजी बोले कि, 'ज्ञानीजी महाराज ! मेरी बात सुनो और अपने मनमें विचार करो कि, मैंने सत्तर युग-तक एक चरणसे खड़ेहोकर बन्दना की, तब सत्यपुरुषने दयालु होकर मुझको तीन लोकका राज्य प्रदान किया और अब उसके विरुद्ध अज्ञा कब्रों दिया ? सत्यपुरुषकी समस्त सन्तान अपने अपने राज्यमें अधिकार भोग रही है । मेरेही ऊपर आप क्यों रुष्ट हुए ? आपकी जैसी आज्ञा हो मैं उसको करूँ ।

इस बातपर कुर्मजीभी हाथ बांधकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी महाराज ! मैं आपसे निवेदन करता हूँ यदि आप स्वीकार करें और हे निरञ्जन महाराज ! जो आप भी स्वीकार करें तो मैं कहूँ । तब दोनोंने अपनी स्वीकृति प्रकट की तब कूर्मजीने कहा कि, "जो कोई ज्ञानिजीका, पान पावे और उनका आज्ञाकारी हो उसको निरञ्जन किसी प्रकारका बाधा न देवे, इसके अतिरिक्त जितने जीव हैं वे सब कालपुरुषके फंदमें पड़ेंगे" इस बातपर ज्ञानी तथा कैल दोनों सहमत हुए, फिर निरञ्जनजी अपनी राजधानी झांझरी द्वीपको गये और कबीर साहब भी उनके साथ आये ।

पाँचवाँ प्रकरण ।

ज्ञानीजी (कबीर साहब) और धर्मराजका वार्तालाप ।

धर्मराजने कबीर साहबसे निवेदन किया कि, सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान किया है आपभी कृपाकर मुझको यह प्रदान करोगे तो बड़ी दया होगी और मेरा कार्य पूर्ण होगा, तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ धर्मराज ! मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे आया हूँ और मनुष्योंकी मुक्ति करूँगा, यदि तुम इस बेर मेरी आज्ञा न मानोगे तो मैं तुमको मारकर निकाल दूँगा । तब निरञ्जनजी अत्यंत नम्रतापूर्वक निवेदन करने लगे कि, मैं आपका सेवक हूँ

द्वितीय तृतीय बार सिन्धुमंथन

आप किसी अन्य ध्यानको मनमें आने न दीजिये और ऐसा न कीजिये कि, जिसमें मेरा काम बिगड़े; आप यह भी सुन लीजिये कि, यदि आप पृथ्वीपर जावेंगे तो कोई मनुष्य आपका कहना न मानेंगे, बरन् आपको तुच्छ बनानेका उद्योग करेंगे और मेरी ओर होकर आपसे वादविवाद तथा बँर करेंगे।

छठी प्रकरण ।

निरञ्जनके जालका वर्णन ।

मैंने समस्त मनुष्योंकी बुद्धि पर परदा डाल दिया है और सबको अचेत कर, दिया है, मैंने सब मनुष्योंके फँसानेके लिये ऐसे ऐसे जाल रच रखे हैं कि, 'इन्होंने' समस्त मनुष्य फँसे हुए हैं। वेद, शास्त्र, तीर्थ, व्रत मूर्तिपूजा, यंत्र, मंत्र हवन यज्ञ, आचार, बलिदान, मांसभक्षण, मदिरापान, परस्त्रीगमन आदि सहस्रों प्रकारके फँदे मैंने बनाये हैं, इनसे बचकर कोई मनुष्य निकल नहीं सकता है। और मेरे तीनों पुत्र भी बड़े शूरवीर हैं, वे तीनों लोकोंके सरदार हैं। यदि आप पृथ्वीपर जाओगे तो आपकी बातको कोई नहीं मानेगा, मैंने समस्त मनुष्य की बुद्धिको अंधेरे कुएँमें डालदी है, प्रत्येकके हृदयमें मेरा स्थान है, सदाकाल सब स्थानोंमें मैं उपस्थित रहता हूँ, किसीकी सामर्थ्य नहीं है कि मेरी सेवासे बाहर जासके, जब जैसा मैं चाहता हूँ तब तैसा मनुष्यकी बुद्धिको फेर देता हूँ, समस्त जीवोंकी बुद्धि मेरे अधीन है।

निरञ्जनकी बात सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया कि, हे काल बटमार। जिस जीवको मैं अपना शब्द सुनाऊँगा उसके ऊपर तुम्हारा कुछ बश नहीं चलेगा, मैं तुम्हारे समस्त फंदोंसे उसको स्वतंत्र कर दूँगा तुम्हारा बल तथा मंत्र उसपर व्यर्थ हो जायगा। फिर निरञ्जनने कहा कि, पृथ्वीपर आप एक पंथ प्रचलित करोगे तो मैं अनेक पंथ चलाऊँगा और वह समस्त धर्म आपके धर्मकी नकल करेंगे, कितने धर्म ऐसे होंगे कि, जो प्रत्यक्षमें तो आपके धर्म कहलावेंगे और यथार्थमें उस धर्मके माननेवाले सब मेरे दास होंगे।

यह बात सुनकर ज्ञानीजीने कहा कि, जो कोई मेरा नाम लेगा और मेरी भक्ति करेगा मैं उसको अपने निजके हँसोंके साथ अपने लोक को पहुँचाऊँगा, तेरी तदबीर और तेरी धूर्तता काम न देगी ॥

आद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी आज्ञा और पांच खानकी उत्पत्ति

सातवाँ प्रकरण ।

निरञ्जनका कबीर साहबसे वरदान माँगना ।

जब काल निरञ्जन जान लिया कि, ज्ञानीजीसे पार पाना टेढ़ी खीर है, तब वह बड़ी दीनतासे विनय करने लगा कि, एकवचन आप मुझको दीजिये, । तब ज्ञानीजीने कहा कि, माँगो ? तब निरंजनने कहा कि, तीन युग अर्थात् सत्य-युग, त्रेता और द्वापरमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, पर कलियुगमें विशेष जीव मुक्ति पावें । यह वचन आप मुझको दीजिये, तब पृथ्वीपर पधारिये । यह बात सुनकर कबीर साहबने कहा कि ऐ काल ठग ! तू मुझको ठगा चाहता है कि, तीनों युगोंमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, अस्तु ! जो कुछ तूने माँगा मैंने तुझको प्रदान कर दिया, पर जब चौथा कलियुग आवेगा, तब पृथ्वीपर मैं अपने अंगोंको भेजूंगा कि, वे बड़ी धूम धामसे मेरा पंथ प्रचलित करेंगे और इस तरह अरबों खरबों जीवोंको अपने लोकको पहुँचाऊँगा वे सब तेरे कपटजालसे छुटकारा पावेंगे । फिर निरंजनने निवेदन किया कि, जब कलियुगमें मेरा अवतार होगा और मेरा नाम जगन्नाथ होगा, उस समय समुद्र मेरा मन्दिर तोड़ दिया करेगा, तब आप कृपा करके मेरे मन्दिरकी स्थापना करा देवें और समुद्रको स्थिर कर देवें । ज्ञानीजीने यह बात भी उसकी मानली । फिर निरंजनने निवेदन किया, आप अपना शरीर भी मुझको प्रदान कीजिये, फिर ज्ञानीजीने धर्मराजको शिरवाली देह भी दिया । इसी कारण यह कालपुरुष जब चाहे तब शिरवाली और जब इच्छा हो बेशिरकी देह प्रगट कर सकता है नहीं तो यथार्थ में कालपुरुषका शरीर बिना मस्तकका है और कबीरसाहबका शरीर शिर सहित है ।

आठवाँ प्रकरण ।

छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तांत ।

इस विषयको साध लोग भली भाँति जानते हैं, जो विराट् पुरुषकी साधना किया करते हैं, वे स्पष्ट रूपसे विराट् पुरुषको आकाशमें देखते हैं । जो सदैव इस बातपर दृष्टि रखते हैं, उन्हें सदैव वह विराट् पुरुष आकाशमें दिखलाई देता है, जब छः मास उनकी मृत्युके रह जाते हैं उस समय विराट् पुरुष उनको बिना मस्तकके दिखाई देता है । तब साधु जान लेते हैं कि, उनकी मृत्युमें छः मास शेष बचे हैं । कारण यह कि, कालपुरुषने अपनी प्राकृतिक शरीरको अब दिखलाया है । उस समयसे साधु चैतन्य और चौकस हो जाते हैं और जब मृत्युका दिवस तथा समय ठीक आन पहुँचता है, तब प्राणायाम करके समाधि

लगा जाते हैं और अपने प्राणको खींचकर वशवें द्वार पर पहुँचा देते हैं, वहाँ पर कालकी पहुँच नहीं होती। वे जाने रहते हैं कि, कितने समय पर्यन्त मृत्युका आक्रमण है, उतनी देरतक प्राणको नीचे नहीं उतारते और जब मृत्युका समय जाता रहता है और काल निराश होकर पलट जाता है, तब फिर अपने प्राणको नीचे उतारते और फिर प्रसन्नतापूर्वक निर्भय होकर जीवन व्यतीत करते हैं। इसी प्रकार साधु लोग मृत्युसे बचते हैं और काया कल्प करके बुढ़ापे तथा निर्वलताको दूर करते हैं।

नवों प्रकरण ।

निरञ्जनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार करना ।

इसी प्रकार निरञ्जनने बहुत कुछ माँगा और कबीरसाहबने उसको दिया तब धर्मराजने उठकर कबीरसाहबको दंडवत् प्रणाम करके कहा कि, जो जो मनुष्य आपका आज्ञाकारी होगा और आपकी भक्ति और स्तुति करेगा तथा आपका पान पावेगा उसके समीप मैं कदापि नहीं जाऊँगा, शेष लोक तथा वेदके सब जीव मेरे अधीन रहेंगे, इसके अतिरिक्त कितनी बातें हुईं सो यहाँ थोड़ासा लिखा है। धर्मराजने अपने लोकमें रहे और कबीर साहब पृथ्वीको चले, जब आप पहले पृथ्वीपर आये उस समय सत्ययुगका समय था।

यहाँ पाठकोंकी आसानीके लिये निरञ्जनगोष्ठी दे दिया जाता है—

निरंजन गोष्ठी ।

अर्थात् सत्य लोकसे जीवोंको बचानेके लिये ज्ञानीजी (कबीर साहब) का पृथ्वीपर आते समय निरंजनसे बातलाप ।

ज्ञानी वचन ।

काल निरंजन निरगुनराई । तीन लोक जिहि फिरी दुहार्ई ॥
सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मण्डा ॥
सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥
ब्रह्मा विस्तु और सिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥
चित्रगुप्त धरम बरियारा । लिखनी लिखें सकल संसारा ॥
चौरासी लाख अरु चारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥
पसु पंछी जल थल विस्तारा । वन परवत जल जीव विचारा ॥
काल निरंजन सबपर छाया । पुरुष नामको चिह्न मिटाया ॥
सत्तर युग ऐसेही चल गयेऊ । पुरुष शब्द एक चितमें ठयेऊ ॥

ब्रह्माका पिताकी खोजको जाना

पुरुष वचन ।

तबहीं पुरुष ज्ञानीसों कहेऊ । धर्मराय अतिप्रबल जो भयेऊ ॥
यह तो अंश भया बरियांरा । तीनलोक जिव कीन्ह अहारा ॥
ताहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेव छुड़ाई ॥

ज्ञानी वचन ।

साखी—करि परनाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज ।

जोपै काल न मानि है, तुम्ही पुरुषका लाज ॥

मान सरोवर ज्ञानी आये । काल कठिन तब छेका धाये ॥
काल कठिन गरजे बहु बारा । मस्तक साठ सँड बरियांरा ॥
सत्तर योजन गजके दंता । परलय कीन्हो काट अनंता ॥
काग एक आँखे चौरासी । औसुख आठ हाथ लिये फांसी ॥
छत्तीस नाम ताहि पुनि जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥
तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीनलोक किये जेरी ॥
एक दंत पाताल चलावा । तहां जाय वासुकको खावा ॥
दूजो दंत पृथ्वी चलि आये । देव रिषि जग दैत्यन खाये ॥
तीजो दन्त गयो आकासा । चंद्र सूर खायो कैलासा ॥
ब्रह्मा वेद पढत तहां आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥
लीन्हें खाय विस्तुको धाई । सकल खाय पुनि धूर उड़ाई ॥
गरजे दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥

ज्ञानीवचन ।

ज्ञानी देखे द्विस्टि पसारा । यातें नाहिं बचे संसारा ॥

ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूँही काल खाइ दुनियाई ॥

निरञ्जनवचन ।

सा०—जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार ।

तीन लीक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥

ज्ञानीवचन ।

मुहि जो पठयो पुरुषको, करन हंसके काज ।

कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥

बोले ज्ञानी सब्द अपारा । मोकहैं दीन्ह पुरुष टकनसारा ॥

मारों काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करै पसारा ॥

विष्णुका पिताकी खोजका वृत्तान्त आद्यासे कहना पिताके खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा

निरञ्जनवचन ।

तबै निरंजन बोले बानी । कैसे हंस छुडावो ज्ञानी ॥
जगके माहँ कीन्ह हम बासा । पसु पंछी जल थलमें आसा ॥
तिनसौ साठ पैठ हम लाये । तामें सकल जीव उरझाये ॥
जे दिनते हम पैठ लगाहीं । दिन दिन उरझे सुरक्षत नाहीं ॥
तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहँ मारी ॥
इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥
तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुन्य थापे हम राजा ॥
सुभ अरु असुभ दोई दल साजा । ऐसे अलख निरंजन राजा ॥

ज्ञानीवचन ।

सत् शब्द हम बोले बामी । वचन हमारे छूटे प्रानी ॥
गहै शब्द जब मन चितलाई । भजिहै काल जिव लेव छुडाई ॥

काल-निरंजन वचन

तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥
तिनसौ साठ पैठ उरझेरा । कैंसै हंसन लेव उबेरा ॥
गंगा जमुना सरसती ज्ञानी । पुष्कर गोदावरी कुतका मानो ॥
बद्री केदार हमका ठाऊँ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लगाऊँ ॥
मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगन्नाथ जस बैठे ध्यानी ॥
सेतबन्ध पुन कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय हम थाना ॥
हिंगलाज जिव जैहै सोई । कालका नगरकोट मह होई ॥
गढ गिरनार दत्तको थाना । ताहि घेर हम बैठ निहाना ॥
कमरू माह कमच्छा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥
नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बांध सब साजा ॥
याही पैठ जग जीव भुलाई । किहि विधि हंस लेव मुक्तार्ई ॥

ज्ञानीवचन ।

तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमतें जीव छुडावहूँ आनी ॥
पुरुष नामको कहूँ समझार्ई । जम राजा तब छोड परार्ई ॥
घाट बाट बैठे उरझेरा । हमरे शब्दतें होय निबेरा ॥
सुनु रे काल दुष्ट अनयार्ई । शब्द संग हंसा घर जार्ई ॥

निरंजन वचन ।

का ज्ञानी देहो अधिकारा । हमरो नहि छूटे जम जारा ॥

ब्रह्माके लिये आद्याकी चिन्ता, गायत्रीकी उत्पत्ति ब्रह्माका गायत्रीकी खोजमें जाना ब्रह्माको जगानेके लिये आद्याका गायत्रीको युक्ति बताना

पांच पच्चीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ॥
तामैं पाप पुन्यका वासा । मन बैठे ले हमरी फांसा ॥
जहां तहां सब जग रमावै । ज्ञान संधि कछु रहन न पावै ॥
एक शब्दकी केतक आसा । हमरे है चौरासी फांसा ॥

ज्ञानी वचन

बोले ज्ञानी शब्द बिचारी । छूटे चौरासी की धारी ॥
छूटै पांच पच्चीस गुन तीनो । ऐसो शब्द पुरुष मुहि दीन्हो ॥

निरञ्जन वचन ।

हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाहि छूट जिव जाई ॥
इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥
का तुम करो का सब्द तुम्हारा । तीन लोक परलय तर डारा ॥
साधु सन्त हम देखी रीती । परलय परे सकल सब जीती ॥
करम रेख बांधै सब साधा । सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा ॥

ज्ञानी वचन ।

ज्ञानी कहै काल अन्यायी । सब्द बिना तू खाय चबाई ॥
अब तुम कस खैहो बटसारा । पुरुष सब्द दीन्हो टकसारा ॥
जगके जीवन लेऊँ उभारा । करम लेख तोरो घर न्यारा ।
पांच पच्चीस और गुन तीनो । इतने मोर हंस लेऊँ छीनों ॥
पांच जनेकी मेटौ आसा । पुरुष सब्द भाषौ विस्वासा ॥
सुभ अरु असुभ का करे निबेरा । मेटों काल सकल उरझेरा ॥

निरञ्जन वचन ।

तिरगुन काल तब बोले बानी । उरझे जीव सकल जमखानी ॥
कैसे के तुम शब्द पसारो । कौने विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचैं पुरुषके सरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचैं पुरुषके द्वारा ॥
क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरिहैं जन्म नरककी खानी ॥
लोभी होय सरप विकरारा । माटी भखे जीव अा कारा ॥
लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोच्छ को द्वारा ॥
विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहिदानी ॥

ज्ञानी वचन ।

ज्ञानी कहै कंरहु वरियारा । हमतो कीन्ह सकल निरवारा ॥

ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना सावित्री उत्पत्तिकी कथा

जोई ज्ञानी होय हमारा । काम क्रोध तें होय निनारा ॥
तूस्ना लोभहि देइ बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥
उनको ध्वान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा देत अस करों बडाई ॥
उनपे जम का परै न छाहीं । तास हंसा लोकहि जाई ॥

निरञ्जन वचन ।

कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हा जान तुम्हारी बानी ॥
जुरत महात्म सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥
तुम तौ एक पन्थ परकासा । हम बारह पन्थ काल जग फांसा ॥
जग के जीव सबै भरमाऊँ । ज्ञानवंत को करम दिढाऊँ ॥
मार जीव को करे अहारा । कथै ज्ञान तुम्हरी टकसारा ॥
करे काम बिस सब भाई । चार वरन ले एक मिलाई ॥
कुलको त्याग होय सो न्यारा । चार वरनको एक विचारा ॥
ज्ञान हमार रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥
वे तो तुमरी करिहैं हांसी । ते जीवनपर हमारी फांसी ॥
फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥
कैसे पहुँचै पुरुषकी सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥

ज्ञानी वचन

कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥
निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥
हंस हमार सब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ॥
नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं काई ॥
शब्द मानि होय सब्द सख्या । निश्चे हंसा होय अनूपा ॥
उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चलैं विस्वासा ॥

निरञ्जन वचन ।

ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम माना ॥
इनको माने सब संसारा । कलि में गंगा मुकती द्वारा ॥
देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृति कहैं विचारा ॥
यहि विधि जग जीव भुलाहीं । जरा मरन सब बंध बंधाहीं ।
सूतक पातक वेद विचारा । पूछ वेदसे करहि सँहारा ॥
एकादशी मुक्तिकी भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥

ज्ञानी बचन ।

सुनहु काल ज्ञानकी संधी । छोरों जीव सकलकी फंदी ॥
जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बरत तप सबै नसावै ॥
वेद किताबका छोड आसा । हंसा करे सब्द विस्वासा ॥
ताके निकट काल नहि आवे । निज बीरा जो सुरत लगावें ॥
बीरा पाय होय जमपारा । शब्द सन्धि परखै टकसारा ॥
जोग बरत तपहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखबारा ॥
जेत हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥

निरंजन बचन ।

अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझो सुरझौ नहि जाई ॥
जो जीवनको भगति दिठैही । शब्द भेद तुमताहि लखैहो ॥
पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै प्रानी ॥
सब्द पाय नहि करै विचारा । कैसे पहुँचे लोक तुम्हारा ॥
सब्द पाय कर करम जगावै । कैसे ज्ञानी निज घर पावै ॥
सब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्तिकी थाहा ॥

ज्ञानी बचन ।

तब ज्ञानी बाल मुख बानी । सुनियो काल निरंजन आनी ॥
हंसा भगति जो करे हमारी । राखो सदा सब्द निज धारी ॥
काम क्रोध अहंकार बिकारा । इनका तजिहैं हंस हमारा ॥
सब्द हमारा छोडे फंदा । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥
बीरा नाम पुरुष का सारा । निरमल हंस होय उजियारा ॥
आवागवन बहुरि नहि होई । काल फांस तज न्यारा सोई ॥
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । अरें काल तोको तज डारा ॥

निरंजन बचत ।

निरंजन बोले गरब सो भाई । मोरे फंद तोर को जाई ॥
करम जंजीर बधा संसारा । जोई हम जग जाल पसारा ॥
तीन लोक जोइन औतारा । आवागवनमें फिर फिर पारा ॥
उपजै विनसै रहै भुलाई । देव रिषी मुनि सकलो खाई ॥
सिद्ध साधु अरु बडे जु ज्ञानी । बाँध बाँध कर तोपि समानी ॥
करम रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पमारा ॥

ब्रह्माका सावित्री और गायत्रीके साथ माताके पास पहुँचना और सबका शापपाना आद्याका ब्रह्माको शाप देना

ज्ञानी बचन ।

कहै ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहँ टूक जंजीर तुम्हारा ॥
हंसन लैहँ तुरत उवारी । पुरुष शब्द दीन्हों मोहि भारी ॥
ताहि हुकमसों मारों तोही । सब संसार तु खाया द्रोही ॥
खंड खंड कर तोरों बाना । मारों काल करों पिसमाना ॥
हंसनकी मैं करों मुकताई । बहुरिन जन्महिं भौजल आई ॥
पुरुष अंस नोतम है अंशा । ते जग परगट बचन है वंशा ॥
तिनको सरन हंस जो आवें । कोट करम सब देई बहावें ॥
हंस संधि लाखि होवें न्यारा । चलते पावे नहिं बटपारा ॥

निरंजन बचन ।

मानों ज्ञानी बचन तुम्हारा । हंस ले जाऊ पुरुष दर्बारा ॥
चौदह काल जगत हमारे । घाट बाट बैठे रखवारे ॥
सुर नर मुनि आवें वहि घाटा । दशहिं और वह रोकें बाटा ॥
दुर्ग जगाती बडा सरदारा । बिना जगात कोई उतर नपारा ॥
भौजल नदी घाट नहिं थाहूँ । उतरन काज कहैं सब काहूँ ॥

ज्ञानी बचन ।

कहैं ज्ञानी सुन काल सुभाऊ । हमरे हंस की बात सुनाऊ ॥
बखतर ज्ञान शब्द हथियारा । मार दूत को चले अगारा ॥
कोट सिद्ध तेज होय हंसा । जब परवाना आवै वंसा ॥
वंश छाप जब पार्वहिं प्रानी । ताहि न रोकै दुर्ग दानी ॥
कहा काल तुम करो बिचारा । हंस हमार उत्तरिहै पारा ॥
सार शब्द है हंस बहोरी । ता चढ़िजाय काल मुख तोरी ॥
संधि न पावे ते बटपारा । हंसा पहुँचे लोक दुआरा ॥
तुमको काल निरंजन राई । हे ज्ञानी का करो बडाई ॥
पाँव पताल सीस अकाशा । सोरह जोजन अग्नि प्रकासा ॥
गरजे काल महा बिकरारा । सत्रह लाख लो पाँव पसारा ॥
लपकै जीभ जिमि टूटे तारा । जिमि बिजली चमकै अँधियारा ॥
सुंड बढाय दंत अति बाढा । मध्य घेर ज्ञानी कहैं ठाढा ॥
हमरे पौरुष हम बरियारा । तुम ज्ञानी का करो हमारा ॥

ज्ञानीबचन ।

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा । पकड़ सुंड दांत गहि मोरा ॥

आद्याका गायत्री सावित्रीको शाप देना शाप देने पर आद्याका निरंजनके डरसे डरकर पछिताना

मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सूँढ समुद्र गहि मेली ॥
पुरुषरूप तबहीं पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥

निरंजन बचन ।

भया अधीन दोई कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥
तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोर उद्धार ॥
बालक कोट भाँति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥
तुमहीं पुरुष दीन्ह मोहि राजू । औ पुन दीन्ह सकल मोहि साजू ॥
तिहि पर हमने गाऊँ बसावा । लीन्ह सुन्न ठिकान बनावा ॥
तहँ हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहि कराई ॥
अबलग साहेब मैं नहि चीन्हा । सत्तपुरुष तुम दरसन दीन्हा ॥
दोइ कर जोरि चरण चित लावा । धन्य भाग हम दरसन पावा ॥
अब मोहि साहेब भेद बतावो । पाओं चिन्ह हंस पहुँचाओं ॥

ज्ञानी बचन ।

सुन रे काल निरंजन राई । पुरुष नाम है बीरा भाई ॥
जो हंसा चित भगति समोई । ताको खूंट गहै मत कोई ॥
साखी—जो निज बीरा पाइ हँ, आवै लोग हमार ।
ताको खूंट गहो मत, सुनो काल बटमार ॥

निरंजन बचन ।

सुनो गुसाई बिनती मोरी । बीरा पाय करै कछु औरी ॥
ज्ञान कथै अनत चित वासा । आवागवन की राखों आसा ॥

ज्ञानी बचन ।

सुनो निरंजन बचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥
साखी—जा घरते जिव आइया, ताह सुधि गइ खोय ।
पुकारि कहों मैं जीवसों, शब्द पारखी होय ॥

निरंजन बचन ।

कही बात तुम भली विचारी । संत देख हम काँध उतारी ॥
उन निकट दूत नहि आई । साहब हंस देहुँ पहुँचाई ॥
सा०—साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ।
लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥

ज्ञानी बचन ।

सा०—जाहु काल घर आपने, शब्द कहैं चितलाहु ।
जो फिर सीस उठायहो, बांध रसातल जाहु ॥

निरंजनका आद्याको शाप देना आद्याका निडर होना विष्णुका गौरसे श्याम होनेका कारण आद्याका विष्णुको ज्योतिर्कादर्शन कराना

जो पुनि गहो हंसकी बांही । बांध रसातल पठाऊँ तांही ॥

निरंजनवचन ।

जब तुम रूप दिखावा मोही । तब हम पुरुष न चीन्हा तोही ॥

परथम ज्ञानी हम नहि जाना । बन्धु जान कीन्हा अभिमाना ॥

ज्ञानी वचन ।

धरमदास तब सों हम आये । गढ रैदास मो धारा पाये ॥

परथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द भये तहां राई ॥

तहाँ जाय शब्द गूहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥

सतयुग सत्तनाम मोर नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥

धरमदास वचन ।

धरमदास सुनि टेके पाई । तुम प्रताप सकल सुधि आई ॥

काल चरित्र सकल हंम जाना । पुरुष लीला सबही पहिचाना ॥

जब आपुन आये भौ माहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥

श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त ।

प्रमाण अनुरागसागरका ।

धर्मदास वचन ।

हे प्रभु मोहि कृतारथ कीन्हा । पूरणभाग्य दरश मुहि दीन्हा ॥

तुव गुण मोसन वरणि न जाई । मो अचेत कहैं लीन्ह जगाई ॥

सुधा वचन तुव मोहि प्रियलागे । सुनतहि वचन मोहमद भागे ॥

अब वह कथा कहो समझायी । जिहि बिधि जगमें प्रथमें आई ॥

कबीरसाहबका सत्यरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके

लिये चलना निरञ्जनसे भेंट होना और उससे

बात चीत करके आगे बढ़ना ।

कबीर वचन ।

धरमदास जो पूछयो मोही । जुग जुग कथा कहों मैं तोही ॥

जबहीं पुरुष आज्ञा कीन्हा । जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥

करि परनाम तबहीं पगु धारा । पहुँचे आय धरम दरबारा ॥

परथम चलेउ जीवके काजा । पुरुष प्रताप सीसपर छाजा ॥

तेहि जुग नाम अचिन्त कहाये । आज्ञा पुरुष जीव पहुँ आये ॥

आवत मिल्यो धरम अन्याई । तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥

मो कहैं देखि धरम ढिग आवा । महा क्रोध बोले अतुरावा ॥
जोगजीत इहैंवा कस आबो । सो तुम हमसों वचन सुनावो ॥
कै तुम हमको मारन आओ । पुरुष वचन सो मोहि सुनाओ ॥

जोगजीत वचन ।

तासों कह्यो सुनो धर्म राई । जीव काज संसार सिध्दाई ॥
बहुरि कह्यो सुनु अन्याई । तुम बहु कीन्ह कपट चतुराई ॥
जीवन कहैं तुम बहुत भुलावा । बार बार जीवन संतावा ॥
पुरुष भेद तुम गोपित राखा । आपन महिमा परगट भाखा ॥
तप्त शिलापर जीव जराबहु । जारि बारि निज स्वाद कराबहु ॥
तुम अस कष्ट जीव कहैं दीन्हा । तर्बहिं पुरुषमोहि आज्ञा कीन्हा ॥
जीव चिताय लोक लै जाऊँ । तोरे कष्टतें जीव बचाऊँ ॥
ताते हम संसारहिं जायब । दे परवाना लोक पठायब ॥

धर्मराय वचन ।

यह सुनि काल भयंकर भयऊ । हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ ॥
सत्तर जुग हम सेवा कीन्ही । राज बडाइ पुरुष मुहिं दीन्ही ॥
फिर चौंसठ जुग सेवा ठयऊ । अष्ट खंड पुरुष मुहिं दयऊ ॥
तब तुम मारि निकारे मोही । योगजीत नहिं छांडों तोही ॥
अब हम जान भली विधि पावा । मारों तोहि लेउँ अब दावा ॥

योगजीत वचन ।

तब हम कहा सुनो धरमराया । हम तुम्हरे डर नाहिं डराया ॥
हम कहैं तेज पुरुष बल आही । अरे काल तुव डर मोहि नाहीं ॥
पुरुष प्रताप सुमिरि तिहिं बारा । शब्द अंगते कालहिं मारा ॥
ततछण प्रिष्टि ताहि पर हेरा । स्याम ललाट भयो तिहिं केरा ॥
पंख घात जस होय पंखेरू । ऐसे काल भोहिं पहुँ हेरू ॥
करे क्रोध कछु नाहिं बसाई । तब पुनि परेउ चरण तर आई ॥

धर्मराय वचन ।

छंद—कह निरंजन सुनो ज्ञानी, करो विनती तोहि सों ।
जान बंधु विरोध कीन्हों, घाट भयी अब मोहि सों ॥
पुरुष सम अब तोहि जानों नाहिं दूजी भावना ।
तुम बडे सर्वज्ञ साहिब, छमा छत्र तनावना ॥

सोरठा—तुमहु करो बखसीस, पुरुष दीन्ह जस राज मुहिं ॥
षोडश महैं तुम ईश, ज्ञानी पुरुष सु एक सम ॥

मायाका विष्णुको सर्व प्रधान बनाना

ज्ञानी वचन ।

कह ज्ञानी सुनु राय निरंजन । तुम तो भय वंशमें अंजन ॥
जीवन कहैं मैं आनव जाई । सत्य शब्दसत नाम दिढाई ॥
पुरुष आज्ञाते हम चलि आये । भौसागरते जीव मुकताये ॥
पुरुष आवाज ठारु यहि वारा । छन महैं तो कहैं देउँ निकारा ॥

धर्मराय वचन ।

धरमराय अस विनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहि जानी ॥
ज्ञानी विनती एक हमारा । सो न करहु जिहि मोर बिगारा ॥
पुरुष दीन्ह जस मो कहैं राजू । तुमहैं देहु तो होवे काजू ॥
अब हम वचन तुम्हारो मानी । लीजो हँसा हम सो ज्ञानी ॥
विनती एक करों तुहि ताता । दूढ कर मानो हमरी बाता ॥
कहा तुम्हार जीव नहि मानिहि । हमरी दिशि ह्वै वाद बख निहि ॥
दिढ फन्द माँ रचा बनायी । जामें जीव रहें उरझायी ॥
वेद सासतर सुमिरिति गुण नाना । पुत्र तीन देवन परधाना ॥
तिनहैं बहु बाजी रचि राखा । हमरी डोरि ज्ञान मुखि भाखा ॥
देवल देव सखान पुजाई । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥
पूजा विश्ववलि देव अराधी । यहि मति जीवन राख्यो बाँधी ॥
जग्य होम अरु नेम अचारा । और अनेक फन्द मैं डारा ॥
जो ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुम्हारा ॥

ज्ञानी वचन ।

ज्ञानी कहे सुनो अन्याई । काटों फन्द जीव लै जाई ॥
जोतिक फन्द तुम रचे विचारी । सत्य शब्दते सबै बिडारी ॥
जौन जीव हम शब्द दिढावें । फंद तुम्हार सकल मुकतावे ॥
जब जिव चिन्हिहैं शब्द हमारा । तजहि मरम सब तोर पसारा ॥
सत्य नाम जीवन समझायब । हंस उवार लोक लै जायब ॥

छंद—दैहो सत्य शब्द दिढाय हंसहि दया सील छमा घनी ।

सहज सील सन्तोष सारा, अतमपूजा गुन धनी ॥

पुरुष सुमिरन सार वीरा नाम अविचल गाइहैं ।

सीस तुम्हरे पाव देके, हंसहि लोक पठाइहैं ॥

सोरठा—अमी नाम विस्तार, हंसहि देउ चिताइहैं ।

मरदाहि मान तुम्हार, धरमराय सुनु चित दे ॥

आद्याका महेशको वरदान देना काल प्रपंच

चौका करि परवाना पाई । पुरुष नाम तिहि देउँ चिन्हाई ॥
ताके निकट काल नहि आवे । संधि देख ताकहं सिर नावे ॥

धर्मराय बचन ।

इतना सुनतै काल सकाना । हाथ जोरिके विनती ठाना ॥
दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता ॥
पुरुष शाप मो कहै अस दीन्हा । लच्छ जीव नित ग्रासन कीन्हा ॥
जो जिव सकल लोक तुव जावे । कैसे छुधा सो मोरि बुतावे ॥
पुनि पुरुष मोपर दया कीन्हा । भौसागर कहैं राज मुहि दीन्हा ॥
तुमहू कृपा मोपर करहू । मांगो सो बर मुहि उच्चरहू ॥
सतजुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनहु जुग जिव थोरे जाहीं ॥
चौथा जुग जब कलिजुग आवे । तब तुव सरण जीव बहु जावे ॥
ऐसा बचन हार मुहि दीजे । तब संसार गमनं तुम कीजे ॥

ज्ञानी बचन ।

हर काल परपंच पसारा । तीनों जुग जीवन दुख डारा ॥
बिनती तोरि लीन्ह मैं जानी । मो कहैं ठगहि काल अभिमानी ॥
जस विनती तू मोसन कीन्ही । सो अब बकसि तोहिकहैं दीन्ही ॥
चौथा जुग जब कलिजुग आवे । तब हम आपन अंश पठावे ॥
छंद—सुरति आठों अंशसुकृत, प्रगटिहैं जग जासके ।
ता पीछे पुनि सुरत नौतम, जाय ग्रह धर्मदासके ॥
अंस व्यालिस पुरुषके वे, जीव कारण आवई ।
कलि पंथ प्रगट पसारिके, वह जीव लोक पठावई ॥
सोरठा—सत्य शब्द दे हाथ, जिहि परवाना देइहै ।
सदा ताहि हम साथ, सो जिव जम नहि पायहैं ॥

धर्मराय बचन ।

हे साहिब तुम पंथ चलाऊ । जीव उबार लोक लै जाऊ ॥
वंश छाप देखो जेहि हाथा । ताहि हंस हम नाउब माथा ॥
पुरुष अवाज लीन्ह मैं मानी । विनती एक करों तुहि जानी ॥

कालका अपने बारह पन्थकी बात कबीरसाहेबसे कहना ।

पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीवन लै सत लोक पठाऊ ॥
बारह पंथ करों मैं साजा । नाम तुम्हार लै करों आवाजा ॥
द्वादश जम संसार पठैहों । नाम तुम्हारा पंथ चलैहों ॥

अथ आदि मंगल

मृतुअंधा इक दूत हमारा । सुकित ग्रह लैहै अवतारा ॥
प्रथम दूत मम प्रगटे जायी । पीछे अंस तुम्हारा आयी ॥
यहि विधि जीवनको भरमाऊँ । पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥
द्वादश पथ जीव जो ऐहैं । सो हमरे मुख आन समैहैं ॥
एतिक विनती करों बनाई । कीजे कृपा देउ बनसाई ॥
कालका कबीरसाहबसे जगन्नाथस्थापनाका बरदान माँगना ।
कलियुग प्रथमचरण जब आयब । तब हम बौद्ध शरीर बनायब ॥
राजा इन्द्रदवन पहुँ जायब । जगन्नाथ हम नाम धरायब ॥
राजा मंडप मोर बनैहै । सागर नीर खसावत जैहै ॥
पुत्र हमार विस्तु जो आही । सागर ओइल सात तेंहि पाही ॥
ताते मंडप बचन न पाई । उमँगे सागर लेइ डुबाई ॥
ज्ञानी एक मता निरमाऊ । प्रथमै सागर तीर सिधाऊ ॥
तुम कहैं सागर लौधि न जाई । देखत उदधि रहे भुरझाई ॥
यहि विधि मो कहैं थापिहु जायी । पीछे आपन अंश पठायी ॥
भवसागर तुम पंथ चलाओ । पुरुष नामते जीव बचाओ ॥
संधि छाप मोहि देहु बतायी । पुरुषनाम मोहि देहु सुझायी ॥
विना सन्धि जो उत्तरै घाटा । सो हंसा नहिं पावे बाटा ॥

ज्ञानी बचन ।

छन्द-- धरम जस तुम मांगहुँ सो, चरित हम भल चीन्हिया ।
पंथ द्वादश तुम कहेउ सो, अमी घोर विष दीन्हिया ॥
जो मेटि डारों तोहिको अबहिं, पलटि कला दिखावऊँ ।
लै जीव बंध छुडाय जम सो, अमर लोक सिधावऊँ ।

सोरठा--पुरुष बचन अस नाहिं, यहै सोच चित कीन्हेऊ ।
लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्य शब्द जो दिढ़ गहे ॥
द्वादश पंथ कहेउ अन्याई । सो हम तोहि दीन्ह बगसाई ॥
पहिले प्रगटै दूत तुम्हारा । पीछे लेहि अंश औतारा ॥
उदधि तीर कहैं मैं चलि जायब । जगन्नाथको माड मडायब ॥
ता पाछे हप पंथ चलायब । जीवन कहैं सत लोक पठायब ॥
धर्मराय का कबीर साहब को धोखा देकर उनसे गुप्त भेद का पूछना ।

धर्मराय बचन ।

संधि छाप मोहि दीजे ज्ञानी । जैसे देही हंसहि सहिदानीई ॥
जो जीव मो कहैं संधि बतावे । ताके निकट काल नहि आवे ॥
नाम निसानो भी कह दीजे । हे साहिब यह दायो कीजे ॥

ज्ञानी बचन ।

जो तोहि देहैं संधि लखाई । जीवन काज होइहो दुखदाई ॥
तुम परंपंच जान हम पावा । काल चलै नहि तुम्हरो दावा ॥
धरमराय तोहि परगट भाखों । गुप्त अंक बीरा हम राखों ॥
जो कोई लेइ नाम हमारा । ताहि छोड़ितुम होहु नियारा ॥
जो तुम हंसहि रोको जायी । तो तुम काल रहन नहि पायी ॥

धर्मराय बचन ।

कहैं धर्म जाओ संसारा । आनहु जीव नाम आधारा ॥
जो हंसा तुम्हरो गुन गावैं । ताहि निकट तो हम नहि जावैं ॥
जो कोइ जैहैं सरन तुम्हारी । हम सिर पग दै होवैं पारी ॥
हम तो तुम सन कीन्ह ढिठाई । पिता जान कीन्ही लरिकाई ॥
कोटिन औगुन बालक करई । पिता एक हिरदय नहि धरई ॥
जो पितु बालक देइ निकारी । तब को रच्छा करे हमारी ॥
धरमराय उठ सीस नवायो । तब ज्ञानी संसार सिधायो ॥

इति प्रमाण अनुरागसागरका ।

दशवाँ प्रकरण

सत्य सुकृतका ब्रह्मादिकोंको उपदेश देना ।

( सत्ययुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना और सत्य सुकृतजीके नामसे प्रख्यात होना और मनुष्यों को मुक्ति प्रदान करनेका वृत्तान्त ।

जब पहले ज्ञानीजी (कबीर साहब) ने पृथ्वीपर पदार्पण किया वह सत्ययुगका समय था, सत्ययुगमें आपका नाम सदैव सत्यसुकृत प्रख्यात होता है, आप सत्यगुरु पहले ब्रह्मा विष्णु और शिवके पास गये और उनको मुक्तिका मार्ग समझाया । किन्तु, ये तीनों अपने राज्य और प्रभुत्वके घमंडमें थे आपकी बातोंपर ध्यान नहीं दिया, यहाँ तक कि, अहंकार स्वार्थ तथा इर्षासे हाथ तक नहीं उठाया । तब कबीर साहबन राजा धोंधल और राजा हारीत इत्यादिको अपनी दीक्षा देकर, उनको समस्त परिवार सहित परमधामको पहुँचा दिया—

शवास गुंजारका प्रमाण

खँमसरी ग्वालिन थी उसको उसके समस्त साथियोंसहित चालीस मनुष्योंको लोकको ले गये ।

यहाँ श्रीमुनीन्द्रजीके सतयुगमें पृथ्वीपर आकर जीवोंको उपदेश देनेका प्रमाण देदिया जाता है—

प्रमाण अनुराग सागरका ।

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

जब हम देखा धर्म सकाना । तब तहँवाते कीन्ह पायाना ॥
कह कबीर सुनु धर्मनि नागर । तब मैं चलि आयऊँ भौसागर ॥

ज्ञानीजीका ब्रह्माके पास जाना ।

आया चतुराननके पास । तासों कीन्ह सब्द परकासा ॥
ब्रह्मा चित दे सुनवे लीन्हा । पूछयो बहुत पुरुषको चीन्हा ॥
तबहि निरञ्जन कीन्ह उपाई । जेष्ट पुत्र ब्रह्मा मोर जाई ॥
निरञ्जन मन घंट विराजै । ब्रह्मा बुद्धि फेरि उपराजै ॥

ब्रह्मा बचन ।

निरंकार निर्गुण अविनासी । जोगि सरूप सून्यके वासी ॥
ताहि पुरुष कह वेद बखानें । आज्ञा वेद ताहि हम जानें ॥

कबीरसाहबका विष्णुकेपास पहुँचना ।

जब देखा तेहि काल दिढायो । तहँते उठ विस्नुपहँ आयो ॥
विस्नुहि कह्यो पुरुष उपदेशा । काल वशि नहि गहे संदेशा ॥

विष्णु बचन ।

कहे विस्नु मो सम को आही । चार पदार्थ हमरे पाही ॥
काम मोच्छ धरमारथ चारी । चाहे जौन देउँ मैं सारी ॥

ज्ञानी बचन ।

सुनुहु सोविस्नु मोच्छकस तोही । मोच्छ अच्छर परले तरहोही ॥
तुम नाहीं थिर थिर करा करहूँ । मिथ्या साखिकवन गुन भरहूँ ॥

कबीरसाहबका शेषनागके पास जाना ।

कबीरवचन धरमदास प्रति ।

रहे सकुच सुनि निर्भय बानी । निज हिय विस्नु आपडरमानी ॥
तब पुनिनाग लोक चलिगयऊँ । तासे कछु कछु कहिबे लयऊँ ॥