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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

आरम्भ कर दिया। योरपसे भजन, तपस्या, ज्ञान, विचार तो एकदम जाता रहा। पण्डितोंके तर्कने योरपसे भजनको उठा दिया। सब लोग पुस्तकोंके पढ़नेमें लग गये। यह नहीं सोचा कि, यह सब जितनी पुस्तकोंका पढ़ना लिखना है सब साइफर है। यह (०) जिसकी व्याख्या मैंने पहले लिखी है वही अण्डा है जो पहले प्रगट हुआ। यह अण्डा टूटा दो भाग होकर सृष्टिके उत्पत्तिका कारण हुआ यह अण्डा विषय वासनासे भरा हुआ था। इसके क्रोध व अग्निसे उत्पत्ति हुई थी इस कारण यह आगका स्वरूप है। अग्निदेवता कहकर चारोंवेद इसकी स्तुति करते हैं। यही अग्नि देतवा समस्त संसारमें पूजा जाता है। जब यह अण्डा उत्पन्न हुआ तो इसके भीतरसे बड़े बेंगसे शारीरिक सुख की कामना प्रगट हुई वह अण्डमें बन्द न रह सकी, तब अण्ड फूटा, जिससे तीन गुण पांच तत्व चौदह इन्द्रियां आदि सब प्रपञ्च हुये। फिर शरीर बना, सांसारिक विषय स्वाद लेने लगा। आपही एक है, आपही अनेक है। भूलसे अपने आपको पहचान नहीं सकता, सृष्टिकर्ताने मनुष्यको अपने रूपमें बनाया सब रूपोंमें स्वयं प्रवेश किया, सत्य और झूठ दोनों एक होगये।

माया ही रामबनी—वर्तमानके तत्वज्ञानी वेदपाठी शास्त्रियों तथा पश्चिमी धर्म पुस्तकोंके जानकारोंसे मेरा यही विनय है कि, तनिक अपनी बुद्धि और समझसे विचार करो कि, जो ईश्वर अगोचर था वह अण्डमें किस प्रकार बन्द होगया। जो गोचर हुआ वह नाशवान् है, वह नाशी नहीं हो सकता। वेद और किताबोंका वर्णन यहां तक रहा। शब्द अथवा बाणी उस अण्डसे हुई, अण्ड माया है—माया पति नहीं। जब कि, वह माया है तो खेल सब उसीके हैं सो उससे किसी की मुक्ति किस प्रकार हो सकती है? जिसकी भक्ति खेल सब कार्य पानीके बुल-बुलेके समान क्षणिक हों, उसको सर्व शक्ति मान परमात्माका अनुमान करने और माननेसे क्या प्राप्त होगा इसी मायाने शुद्ध चैतन्य ब्रह्मको ढक दिया आपही हर्त्ता कर्त्ता बन बैठे इसीको संसार पूजने लगा इस प्रकार रामकी माया रामसे बड़ी बन कर पूजाने लगी।

कबीर परिचयका—

साखी—कबीर— माया रामकी, भई रामते शेष।

व्यापक सब कहे रामको, राम राम में दे ॥

कबीर— माया श्री रघुनाथकी, चढ़ी राम पर कूद।

हुकुम रामको मेटिके, भई रामते खूद ॥

कबीर—माया बैठी ब्रह्म हो, होई अद्वैत आवरण ।

जग मिथ्या दरशायके, बैठी अन्तःकरण ॥

यही माया समस्त संसारकी स्वामिनी है। इसीकी संसारमें भक्ति हो रही है, केवल एक बिन्दीसे सारा संसार प्रगट हुआ है फिर नाश होकर उसी बिन्दीमें समा जावेगा फिर, वह बिन्दी उसीमें लय हो जावेगी जहाँसे कि उत्पन्न हुई थी। प्रथम कुछ नहीं था, पीछे कुछ नहीं रहेगा। जो कुछ प्रगट होता है सब मायासे प्रगट होता है यही माया संसारकी रचयित्री है जगत्में, इसीकी भक्ति सेवा हो रही, है जो अद्वैत एक ब्रह्म है उसको कोई नहीं जानता जितने कहने सुननेवाले हैं सब झूठे हैं। इस अद्वैत ब्रह्मका समाचार कहनेवाला पारखगुरुके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है।

पहिले पुरुष ।

पूर्वकालमें करणीवाले बहुत थे, केवल विद्याभिमानी कम थे। जो विद्या पढ़के उसके अनुसार करते थे, सत्यमार्गपर चलते थे, उनका अन्तःकरण प्रकाशित होता था। वे लोग सब प्रकारके पुण्य करते थे। आधीनता और दीनताके साथ गुरुकी सेवामें तत्पर रहते थे। उनके मस्तिष्कमें अहङ्कार और घमण्डकी गन्धभी नहीं होती थी। सच्चे साधु और सत्यगुरुसे नम्र भाव वर्तते थे अथवा नम्रता सहित उनकी आज्ञा मानते थे। उनसे प्रेम करते थे। साधु सेवा गुरु सेवासे कभी नहीं चूकते थे। उदारताका हाथ उठा हुआ रखते थे। इस प्रकार सत्य गुरुकी कृपासे परम प्रकाशको प्राप्त कर लेते थे। अपनी तपस्या और भजनका फल पा जाते थे वे सन्तोंके मित्र रहते थे, सर्वदा सन्तोंकी स्तुति प्रशंसामें रहा करते थे सन्तोंकी कृपा और आशीर्वादसे उनका सब मनोरथ सफल होता था।

अबके लोग—कहनेवाले बहुत हैं पर करनेवाले कम हैं। आज कलके विद्वान् भक्ति और विचारसे शून्य, विषयी निन्दक और सन्तोंके द्वेषी हैं यही कारण है कि, उनका अन्तःकरण अन्धकारमय हो रहा है। जिससे महान् अभिमान अहङ्कार और तर्कोंमें भरे हुये मूर्ख सच्चे साधु और सन्तोंकी भी अवज्ञा कर डालते हैं, उनको तुच्छ समझते हैं। ऐसे लोगों को भक्ति और मुक्तिका मार्ग मिलना असम्भव है। ऐसे लोग सत्यसे विमुख हो निरर्थक वाद विवाद करते फिरते हैं। धर्मकी जड़ही कट गई, सच्चे सन्त और सत्यगुरुकी सङ्गति न रही, तो वहाँ ईश्वर कहाँ? मुक्तिका मार्ग कहाँ? प्रेम भक्तिका निवास कहाँ? गुरु और सन्तही मुक्तिके कारण हैं, येही सत्यधामको पहुँचाते हैं।

जब ये नहीं हैं तो फिर मोक्ष कहाँ। वर्तमान कालके विद्वान् पण्डित कृपणतासे भरे हुये हैं, अभिमान और अहङ्कारके पुतले बन रहे हैं वे उदारता और भक्ति से शून्य होकर संसारमें भटकता खाते फिरते हैं।

सदाचारी—वर्तमानके विद्वानोंमें कोईही ऐसा होगा, जो प्रेम और भक्तिके पथपर चलता होगा, स्वयं सदाचारी होकर दूसरोंको सदाचारमें लगाता होगा। नहीं तो सबके सब ऐसे हैं जिनकी कि, सङ्गति करने और वचन सुननेसे अनपढ़ मूर्ख लोगभी शैतानके भाई बन गये हैं, दान, पुण्य सब छोड़ दिया है। ऐसे पठित मूर्खोंने प्रायः मनुष्योंको बहकाकर ऐसे कुमार्गमें लगा दिया है कि, बहुत यत्न करनेपर भी सुमार्गकी ओर नहीं आते सच्चे साधुओंकी सेवा तो पृथ्वीसे उठ ही गई, ढोंगी, ठग और मिथ्या स्वांगधारियोंकी पूजा होने लगी, उनके अन्तःकरणसे शुद्ध ज्ञानका बीज नष्ट हो गया। इस कालके विद्वान् प्रायः विषयी और दूसरोंको भटकानेवाले एवं अपने कहे हुये को भी न करनेवाले वे अब फलके वृक्षके समान बने हुये हैं, जो काटकर भट्ठीमें जलानेकेही योग्य होता है। विद्वान् दुराचारीका घर आग गन्धकमें है, नरकी जीव है। सदाचारी विद्वान् भाग्यवान् है।

दुराचारी—विद्वान् रूप शैतानकी बातोंको सुनसुनकर सारे संसारमें कृपणता फैल गई है। भजन, तपस्या, भक्ति, भाव और सत्य, ज्ञान विचार कहीं शेष न रहा। परमात्मा सच्चे सन्तोंके विद्वेषियोंको कभी सुख न देगा। सन्त भक्तोंको सर्वदा अपनी कृपाकी छायामें रखेगा। जो लोग सन्तोंकी निन्दा और ठट्ठा करते हैं वे कैसेही भजन पूजा और तपस्या करें पर पापीही ठहरेंगे। सन्तोंकी निन्दा करना महान् पाप है। सन्तोंकी सहायतासे सच्चे साहब मिल सकते हैं। अजर अमर पद प्राप्त हो सकता है।

सच्चे ईश्वरकी ओरसे रक्तपातकी आज्ञा नहीं—वह बिन्दी अथवा अण्ड जो पहले प्रगट हुआ, कामनाओंसे भरकर फूटा। समस्त संसारमें फैल गया। वह बन्धन है उसीसे संसार आवागमनमें पड़ा हुआ है। यह उसी विषमय वृक्षका फल है सब फलोंमें वही विष प्रवेश कर रहा है। जिस बिन्दी अथवा अण्डसे समस्त वाणी और लेख निकले वह महा असत्य है। जिसने उस अण्डको पहचाना, उसके भेदको जाना, वो सांसारिक वासनाओंसे निवृत्त हुआ। सुलेमानसे बढ़कर कोई बुद्धिमान् नहीं हुआ, सब बुद्धिमानोंमें वह शिरोमणि है, उसकी दशा देखो—पुराना अहदनामा दूसरी तबारीखका सातवां बाब—जब वह खुदाके घर गया, जितने आदमी उसके साथ थे सभोंने मिलकर २२०००

बैल और १२०००० भेड़ें कुर्बानि की, खुदावन्दतालाने उसको दर्शन देकर बर्दान दिया । कहा कि, तेरे समान कोई बुद्धिमान् न हुआ न है और न होगा, वो सुलेमान ऐसा भोग विलासमें मग्न हुआ कि, उसका विश्वास ईश्वरसे भी फिर गया, अत्याचारमें लग गया ।

सब मायामें हैं—विचार करनेकी बात है, जिसने सुलेमानको बर्दान दिया था वह कौन था ? जो वरदान मिला वो क्या था ? यथार्थमें बर्दान देनेवाला और बर्दान, दोनोंही मिथ्या भ्रम और माया थे, इतने रक्तपातकी आज्ञा सच्चे ईश्वरकी ओरसे नहीं हो सकती क्योंकि, वह दयालू और करुणासागर हैं जिसने इतना भी विचार नहीं किया वो बुद्धिमान् नहीं हो सकता । यदि उन्होंने सहस्रों भाषायें की अनन्त पुस्तकोंको पढ़ लिया हो, तो क्या हुआ, सब मनाके बराबर हैं । कबीर साहिबने कहा है कि—

कागा पढ़ाया पीजरे, पढ़ गया चारों वेद ।

जब सुधि आई गूहकी, अन्त ढेहका ढेह ॥

श्रीकृष्णकी सम्मतिसे सबसे अन्तिम अश्वमेध यज्ञ महाराजा युधिष्ठिरने किया उस समय युधिष्ठिरका भाई सहदेव अपने समयका अद्वितीय विद्वान् था, वह श्रीकृष्णके सब भावोंको जानता था पर भाइयोंको युद्धसे न बचा सका ।

सब मायाका प्राकट्य है, उसीने सारे जगत्के मनको मोहित कर लिया है । सात करोड़ ७००००००० महा मन्त्र हैं वे सब उसी मायाके नाम हैं जो कुछ मायाके द्वारा प्राप्त होता है वो सब माया है ।

देखो देवीभागवतका ९ वां स्कन्ध सब सात करोड़ ७००००००० महामन्त्र और विराटरूप मायाकाही है ।

देखो देवीभागवतका ७ वां स्कन्ध ३२-३३-३४ अध्याय ।

जब देवीने अपना विराट रूप दिखलाया तो उसे देखतेही सब देवगण अचेत होकर गिर पड़े । फिर भगवतीने अपना वह रूप और प्रकाश गुप्त कर लिया । अपना मानवी रूप प्रगट किया सब देवते प्रसन्न होकर गद्गद कण्ठसे स्तुति करने लगे । देवीने कहा कि, हे देवताओ ! सर्व चराचर युक्त संसार मेरीही माया शक्ति द्वारा प्रगट होता है, वह माया मुझमें ही कल्पित है, वह सब नाशवान है । मैं अविनाशी हूँ ।

फिर इसी देवीभागवतके ९ वें स्कन्धके १३ वें अध्यायमें देखो । ब्रह्मा, विष्णु शिव, अनन्त, धर्म, इन्द्र, निशाकर, दिवाकर, मनु, मुनि, सिद्ध और तपस्वीगण, गङ्गाके लुप्त होनेसे निर्जलताके कारण प्याससे शुष्क कण्ठ तालूवाले

हो गोलोक धाममें आये तो वहाँ क्या देखते हैं कि, राधा कृष्ण दोनोंही विराजमान हैं, कभी राधा नहीं केवल कृष्ण सिंहासनारूढ़ हैं, कभी २ राधा कृष्णरूप धारण करती हैं, कभी दोनों एक रूप हो जाते हैं, कभी दो रूप हो जाते हैं। यह देख महान् आश्चर्यमें आ ब्रह्मा आदि देवता, स्त्रीरूप वा पुरुष रूपी कुछ भी स्थिर न कर सके, अन्तमें ध्यान द्वारा अपने हृदय स्थित कृष्णकी चिन्ता करके भक्ति, भावसे उनकी स्तुति करने लगे।

इसके लिखनेसे मेरा यह आशय है कि, ब्रह्मा माया दोनों एक हैं, मायाके अतिरिक्त कुछ नहीं है, सब महामायाहीके रूप हैं।

एक प्रमाण देता हूँ कि, पृथिवीपर जितने रामकृष्णके उपासक हैं, सब पहले राधाका नाम लेते हैं पीछे कृष्णको कहते हैं; जैसे—राधाकृष्ण, सीताराम, लक्ष्मी नारायण, गौरीशंकर। प्रथम स्त्रीका नाम है फिर पुरुषका है। इस मायाने जगत्की रचनाके लिये दोनों रूप बनाये हैं वे दोनोंही मायारूप हैं। इसी भागवतके, तीसरे स्कन्धके, तीसरे अध्यायमें उत्पत्तिके विषयमें कहा है कि, हे ब्रह्मन् ! जो कुछ दृष्टिगोचर होता है वह सब मेरा कौतुक है, मैं विष्णु हूँ विष्णु मेरा शरीर है।

इसी प्रकार सब जीवधारी मायाके प्रेममें फँसे हुये उत्पत्ति सागरमें डुबकी लगा रहे हैं। तन, मन, धन ये तीनों मायाकी ही जागीर हैं। जबतक इनसे निवृत्त न होगा तबतक अद्वैत ब्रह्मकी सुधि न पावेगा। मायाके प्रेमी मायामेंही बँधे रहेंगे। ऐसा बुद्धिमान् पण्डित विद्वान् कौन है जो इन बातोंपर विचार करे, शुद्ध अद्वैत ब्रह्मकी उपासना करे। पहली श्रेणी तो यही है कि, तन, मन, धनसे आसक्ति रहित होवे, जबतक इन तीनोंमें आसक्त रहेगा, तबतक अद्वैत परमात्माकी भक्तिके सम्मुख न होगा।

विद्वानों पण्डितोंमें जब तक अहङ्कार और अभिमान रहेगा तब तक उनको सत्यमार्ग मिलना असम्भव है। इसीका सार निम्न लिखित गजलमें रखा हुआ है।

गजल— सफा सूर मेकराज दरबजे है। गुनहू डूबनेमें कुछ ऐब है ॥

यह बातिन हैं तकवा तिहारत तेही। केदाना नेहा आलिमुल गँव है ॥

बजाहिर बशीरीनी बुरहान है यही राह दोजखकी लारेब है।

न फुकराकी खिदमत न सुहवत कहीं। किहरयकको शौतानका आसेब है ॥

है इन्सान जो खाकी सिफत। ऐ आजिज तुझे आजिजी जेब है।

स्त्री और पुरुष माया और ब्रह्मा दोनों मायाहीके रूप हैं यथार्थमें स्त्रीका

रूप है जो छल कपटसे भरी हुई है, समस्त संसारमें इसका छल, कपट प्रसिद्ध है। यह माया अपने हावभाव और कपटसे पुरुषको अपना दास बना लेती है, उसकी समस्त आयुको भ्रष्ट कर देती है। मायाके तीन रूप हैं— १ जड़, २ चैतन्य, ३ बाणी। इन्हीं तीनों रूपोंसे संसारको अपने वश कर रही है, सहस्रों कला कौशलें तथा १४ विद्याएँ मायाकी लीला हैं। इनसे जब तक विरक्त न होगा तब तक अपने मूलको न पावेगा इसी कारण सन्तको उचित है कि, इन तीनोंको त्याग दे। जो इनके त्यागे बिना दूसरोंको उपदेश करता है वह चोर और डाकूके समान है। ऐसे बिना करनीके कथनीवाले झूठेका विश्वास भूलकर भी न करना चाहिये। मायाने अपने पांच रूह बनाकर जगत्की रचना की उसीके सब रूप हैं जितने बूतपरिस्त हैं वे सब मनुष्यत्वसे रहित हैं जितने लोग तन, मन, धनसे बुरे विषयसे प्रीति करते हैं शरीरहीके पोषण पालनमें लगे रहते हैं, वे सब मायाके दास हैं।

यथा— जगतमें है जबतक यह तनपरवरी। यमस्सर कहां हो उसे सर्वरी ॥

यही तीन माया जहां जाल हैं। सो पांचों शिकारी वहां काल है ॥

सर्व ब्रह्मज्ञानी सर्वदासे इसी बातकी साक्षी देते हैं कि, जबतक जीवन मृतक न होवे तबतक भवसागर न तरेगा।

चक्रोंसे स्वर व्यञ्जनोंका प्राकट्य—जितने लोग वेद और किताबोंके पाठसेही मुक्ति प्राप्त करना समझते हैं, वे भूलमें हैं। इसी कारण मैं एक दृष्टान्त लिखता हूँ। ये स्वर और व्यञ्जनके अक्षर कहाँसे निकले ?

पहले कण्ठमें विशुद्ध चक्र है, वह सोलह पंखुरियोंका कमल है, वहाँसे सोलह स्वर निकलते हैं।

फिर अनाद चक्र हृदयमें है वहाँसे बारह अक्षर निकले। वे बारह अक्षर क-ख-ग-घ-ङ-च-छ-ज-झ-ञ-ट-ठ ये हैं, ये वर्ण हृदय स्थित कमलके बारहों दल हैं। इसके नीचे नाभस्थानमें स्थित कमलके दश दल हैं। उसको मणिपूरक चक्र कहते हैं, उनपर क्रमसे—ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ वर्ण हैं। इसके नीचे लिङ्ग मूल कमलके छः दल हैं, उसको स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं उसके पंखुरियोंपर छः अक्षर हैं— ब-भ-म-य-र-ल-गुदामूलमें चार पत्तोंका कमल है, उसे आधार चक्र कहते हैं उसके पंखुरियोंपर व-श-ष-स-चार वर्ण हैं। येही संस्कृत वर्णमालाके अक्षर हैं।

वर्णोंकी मा—इन्हीं स्वर और व्यञ्जनोंसे सब माकूलात मनकूलात यथार्थ रोचक और भयानक वाणियां लिखी गई हैं, सभी अक्षरोंके अर्थ और

आशय अलग अलग हैं, इनका गुण और प्रभाव भिन्न भिन्न है, सब मन्त्र इन्हीं अक्षरोंसे हैं। इन्हीं अक्षरों और मन्त्रों द्वारा सब दुःख सुख होते हैं। इन सब अक्षरोंकी माता एक अकार है। अ-इ-उ-स-व-म-ह-इन्हीं सात अक्षरोंसे लौकिक पारलौकिक सब व्यवहार ठहराये गये हैं। उत्पत्ति, स्थिति, नाश, कर्म, उपासना, योग, ज्ञान हरएक अक्षरके अर्थ प्रभाव और फल आदिक सब अलग अलग हैं। लोग प्रायः वेद और किताबोंको पढ़ते हैं पर अक्षरोंके अर्थ और आशयसे अचेत हैं। जिनको अक्षरोंका अर्थ और आशय न मालूम हो वे वेदोंको क्या जाने ? वह अचेत वेद भाष्य क्या करेगा ? दूसरोंको क्या समझावेगा। वह तो स्वयं अन्धा है दूसरोंको अन्धा करता है। जो अपने अन्धे गुरुसे भी थोड़ी बुद्धि रखते हैं, वे अन्धे कहते हैं कि, हमारे स्वामीजी वेदका अर्थ करते हैं, ऐसा दूसरा कौन कर सकता है। इस अन्धेके उपदेशको मान मान कर गुरु और चेले सब अन्धे कुएमें पड़े हैं। जब उनको भलीप्रकार सुधि हो और अपनी बुद्धि और समझके साथ विचार करें पक्षपातको छोड़ दें तो उनको सत्य असत्यका विवेक हो भ्रमसे छूटें। यह समस्त वेद और किताब जब मायासे ठहरें तो उनके द्वारा मायाके पार कौन जा सकता है, कौन गया ? यह सब विद्वानोंको भली प्रकार जानना पहचानना चाहिये कि, वेद किताब कहाँसे हुयीं ? सारी वाणी और वेद किताबकी माता यही है।

गजल—

उलमाको किये महो जो यह हूर परी है। सूरते सदहा उसने जमीपर जो धरी है ॥
कोई न सके सऊद कर कख ऊपरके। हर ख्वाँदाके पाय व जञ्जीर भरी है ॥
कोई हासिल कमाले अँग्रेजी किया है। कोई तुरकी व ताजी अरबी और दरी है ॥
सदहा हैं उलूम और फनून उनको फँसाये। लारैब गिरफ्तारीको उनके यह खड़ी है ॥
इसही में उलझ कर मरे उलमाय जमाना। आजिज किये दरकैद खुशकी और तरी है ॥

सबसेपहिलेकी वर्णमाला—पाठकगणको प्रगट हो कि, जितनी वर्णमाला हैं सबसे पहले संस्कृतकी वर्णमाला है। संस्कृतही सबका मूल है, शेष सब वर्णमाला उसीकी नक़ल हैं। संस्कृतकी वर्णमालाकी प्रणालीसे प्रगट है कि, किसी दूसरी भाषाकी वर्णमालाका ठीक प्रबन्ध नहीं है। महामाया कण्ठ स्थानमें रहती है, सब बोल और वाणीको ठीक करती है, सारे संसारकी पहुँच यहाँही तक है।

नलकीके तोतेका दृष्टान्त—विद्याभिमानी कहते और सुनते तो हैं पर उनकी समझ तोतेके समान है, उसीपर एक दृष्टान्त है कि:— एक साधुने

उदाहरण मदिराके बोवोंपर पारचात्य तत्त्वज्ञ

दया करके पांच सात तोतोंको उनकी रक्षाके लिये उनका पालन किया । उनको यह सिखलाया कि, तुम शिकारीको पहचान लिया करो । जो जालके ऊपर दाना बिखेरता है उसके नीचे जालको देख लेना । जो नलकी लगाता है, उसके नीचे पानी रख देता है, उसके ऊपर तुम न बैठना, सावधान रहना । यदि संयोग नलकीके ऊपर बैठ भी जाओ तो जब नीचे लटक जाओ तब अपना पञ्जा नलकीसे छोड़ देना । वह नलकी तुमको नहीं पकड़ सकती । वह पानी जो तुम्हारे नीचे देख पड़ता है वह तुमको डुबा नहीं सकेगा, उनको देखकर कुछ भय न करना, नलकीको छोड़कर उड़ जाना, तब तुम शिकारीके हाथसे बच जाओगे । यह सब बातें सिखलाकर साधूने उन तोतोंको छोड़ दिया । वे वृक्षोंपर बैठ गये, जो कुछ साधूने सिखलाया था वही पुकार २ बोलने लगे । उनका शब्द सुनकर जड़ली तोते सचेत थे सावधान होकर चिड़ी मारके जालसे बच गये वे न नलकी पर बैठे न जालहीमें फँसे, सावधान होकर सबके सब बच गये । जो तोते बे समझ और निर्बुद्धि थे, उन्होंने केवल पढ़ लिया था पर उनमें बुद्धिकी कुछ गन्ध नहीं थी नलकीमें फँसे शिकारीने पकड़ लिया ।

समन्वय—इसी प्रकार सभी विद्याभिमानी तोतोंके समान कालपुरुषके फन्देमें फँसे वासनामें बन्द हुये । उनके वचनोंको सुनकर अनपढ़ लोग बच गये पर वे न बचे । ऐसे विद्याभिमानी सँकड़ों उपाय करें सन्तोंकी सहायता और कृपाके बिना कभी भी न छूटेंगे । वह अधिकसे अधिकमहामायाके स्थानतक पहुँच सकते हैं, आगे उनको कदापि मालूम न होगा । वे क्या जाने कि, ईश्वर कौन है ? उनको परमात्माने यह विवेकही नहीं प्रदान किया, उनको कुछ भी सुधि नहीं कि, एक क्या है और अनन्त क्या है ? ईश्वरकी भक्ति क्या है ? जगत्की भक्ति क्या है ? किस प्रकार होती है ?

इसी महामायाके सब नाम रूप हैं, सब मिथ्या और भ्रममात्र हैं, विद्याभिमानी केवल पुस्तकोंही द्वारा शुद्ध चैतन्य ब्रह्मको जानना चाहते हैं, यह बात नितान्त असम्भव है ।

विद्याभिमानी जनोंको पता नहीं—मायाका नाम जड़ है जब तक इन लोगोंने जड़को अपना गुरु मान रखा है तब तक उनकी बुद्धि भी जड़ रहेगी वे कभी ईश्वरीय ज्ञानके पात्र न होंगे । जब उनको सन्त और गुरु मिलेंगे अधीनताके साथ उनकी शिक्षा स्वीकार करेंगे, तब उन्हें मनुष्यता आवेगी । आत्मज्ञान तथा ईश्वरीय ज्ञानके अधिकारी होंगे । सब विद्याभिमानी अन्धोंके समान टटोलते फिरते हैं, कुछ पता नहीं पाते कि, सच्ची बात क्या है ?

कलेजे पर इसका परिणाम, इसका फ़ेफ़ड़े पर असर, धड़कन, आँखोंपर मद्यका परिणाम, अंग्रेजी मद्यसे मृत्यु

साधुसे वाक्फल ।

अमृतके श्रोतपर सन्त लोग पहरा चौकी देते हैं जो सन्त गुरुकी सेवा करेगा वही उस श्रोतसे सफल काम होगा दूसरा न होगा । समस्त ईश्वरीय मायिक ज्ञान इसी वर्णमालामें समा रहे हैं । गुरु मिलें तो सचेत कर दें, नहीं तो अचेत होकर भूल अज्ञानमेंही मरेंगे जो लोग साधुसेवा न करेंगे वे मायासे न छूटेंगे, साधुओंकी सेवासे बन्धन छूटेगा, सन्तोंकी सेवा मायाके सेवक क्या जाने ? ।

शब्द-कबीर साहबका

मायाके गुलाम गेदी क्या जानेंगे बन्दगी । साधुनसे धूम धाम चोरनसे करे काम ॥

ढोंगिन संग धूपधापगरीबनसे रिन्दगी ॥

कपटकी माला पहने पाखण्डकी तिलक दिये ।

पापनकी पोथी वांचे डारवे को फन्दगी ॥ दाया नहीं धरम नहीं कैसे पावे चन्दगी ।

कहै कबीर धूग धूग तेरी जन्दगी ॥

सत्सङ्ग हुआ, सन्तकी कृपा हुई नामका पता मिला, तो मोलवी रुम, शाहू बूअली कलन्दर आदिकके समान किताबोंको दरयामें डालकर नाममें निमग्न होगये, पुस्तकावलोकनको तुच्छ समझा, मायामें अमूल्य आयुको नष्ट करना अच्छा न समझा । संस्कृतके स्वरोंको विचार कर देखो, वे ऊपरसे नीचेको आते हैं कण्ठसे गुदा स्थान तक समाप्त होते हैं । स्वरोंसे ऊपर कोई नहीं जाता, सब व्यंजन अक्षर नीचे हीको है इस कारण नीचेकी दशामें रखते हैं ।

प्राचीन कालमें और आजके महाराजोंके मन्त्री—राजा महाराजाओंकी यह रीती थी कि, वे सर्वदा ऋषि, मुनि और तत्ववेत्ताओं विद्वानोंको अपना प्रधान मन्त्री बनाते थे । सर्वदा यही सिखलाते थे कि, शुभकर्म करो, धर्म और दयाको न भूलो, सन्तोंकी सेवा करो । पर वर्तमान कालके राजाओं महाराजाओंकी यह रीती होगई है कि, तत्ववेत्ता हो अथवा न हो, केवल पढ़ा हुआ और काम करनेवाला हो, उसको अपना प्रधान मन्त्री बनाते हैं । वे शैतान सन्तोंकी निन्दा करते हैं उनको तुच्छ समझते हैं । सन्तोंसे द्वेष करनेसे उनका अन्तःकरण मलीन हो जाता है, स्वयं कुमार्गी बन जाते हैं दूसरोंको भी कुमार्गमें भटकाते हैं । इन लोगोंने तोतेके समान विद्या तो पढली, सांसारिक व्यवहारमें चतुर हो गये पर धर्मकी बातोंकी उन्हें सुध न रही ।

कोढ़की बीमारी, दृष्टान्त

भूलके लजाने ठनठनानाही है—कबीर साहबकी साखी ।

चारि अठारह नौ पढ़ि, छौपढ़ि खोये मूल ।

कबीर मूल जाने बिना, ज्यों पंछी चण्डूल ।

चारों वेद अठारह पुराण नौ व्याकरण छः शास्त्र आदि तूने पढ़े पर अपने मूलके न जाननेसे इसे खो दिया । अब तू चण्डूल पक्षीके समान टेंटें चच करता फिरता है । इतना पढ़कर भी अपने मूलको न जाना तो तेरा सब कहना सुनना झोंझके समान झन् झनाने एवं पीतलके समान ठन् ठनानेका है ।

गजल— झोंझके तौर झंझनाते हैं । मिसल पीतलके ठन् ठनाते हैं ।

नुक्तःबारीकसे खबर न रही । जैसे चण्डूल चह चहाते हैं ॥

बात इनकी है बा नमक और नाज्र । जालमें मुर्ग फँसाते हैं ।

बेखबर दाममें फँसे मुर्गी । मुफ्त जान अपनी सब गँवाते हैं ॥

ऐसे आलिमसे दे पनाह अल्लाः । आजिज आलममें ख्वारीलाते हैं ।

हजरत ईशाको साधुका आशीर्वाद — जो रीति भारतवर्षमें कहीं कहीं किञ्चित मात्र रह गई है । पूर्वकालमें योरपमें भी यही रीति प्रचलित थी कि, सांसारिक लोग (गृहस्थ) साधुओंकी सेवा करते थे, साधु वैराग्य विवेक संयुक्त भजन किया करते थे । उस समय संसारियोंको साधुओंपर किसी प्रकारका तर्क नहीं था । साधुओंकी सेवा बे अटक करते थे साधुलोग भली प्रकारसे विचारमें लगे रहते थे । जिससे उनका अन्तःकरण प्रकाशित होता था तब सत्य ज्ञान मिलता था । जिससे संसारियोंको उपदेश करके उनका कल्याण करते थे संसारकी मर्यादाको स्थित रखनेके लिये उत्तम २ नियम बनाते थे उस समय तप दान दोनों उचित था, दान और भजनसे दोनोंके अन्तःकरण शुद्ध होते थे, अतः जिस समय हजरत ईसा उत्पन्न हुए उस समय एक फकीरने उन्हें गोदमें लेकर कहा कि, यह लड़का बड़ा प्रतिष्ठित होगा ।

मुहम्मद साहिबको राहिबका आशिर्वाद—ऐसेही बालकपनमें मुहम्मद साहब चचाके साथ बसरा शहर गये । वहाँ राहिब नाम एक ईसाई साधू मिला, वो बड़ी प्रतिष्ठासे मुहम्मद साबसे मिला । उस समय मुहम्मद साहब लगभग बारह वर्षके थे । साधुने मुहम्मद साहबके मुखकी ओर देख करके कहा कि, यह अन्तिम पैगम्बर होगा, उसीने उनके पीठके ऊपर पैगम्बरी मोहर बतलाई सब भविष्य कहा, जिसके अनुसारही सब कुछ हुआ । मुहम्मदी साहिबका हाल

विशेष वक्तव्य

देखे तवारीखमें इस समय भी सहस्रों प्रकाशित हृदय, अन्तर्यामी, सन्त महात्मा हैं, पर समयके प्रभावको देखकर अपनेको गुप्त रखते हैं, वे प्रगट करना नहीं चाहते।

योरोपमें साधुओंका दान—दुनियादार और विरक्त दोनों अपने अपने धरम पर स्थित थे। जबसे छापाखाना शुरू हुआ तबसे पुस्तकें बहुत सस्ती हो गईं स्थान स्थानपर पाठशालें हो गईं, लोग पढ़ पढ़कर विद्याभिमानी होने लगे। साधुओंकी निन्दा करना आरम्भ कर दिया, प्राकृतिक जन सन्तोंकी सेवा छोड़ बैठे साधू लोगोंने भजन छोड़कर उद्यम करना आरम्भ कर दिया। योरोपमें हरमिट, फरायर। मङ्गल और कोल नामके साधू लोग रहते थे। गृहस्थोंकी यह रीति थी कि, उनसे कोई अपराध हो जाता था तो उसके प्रायश्चित्तके लिये कुछ रुपया लेकर साधुओंके पास जाते थे। कहते थे कि, हमसे यह अपराध हुआ है, आप यह द्रव्य लीजिये परमात्मासे मेरे अपराधको क्षमा कराइये। वे लोग द्रव्य आदि ले लेते थे एक एक स्वीकृति पत्र दे देते थे। जिसे अंग्रेजीमें पारडन बिल (PARDON BILL) कहते हैं, यह क्षमा करानेके पत्रका नाम है इस पार्डन बिलको अपने पास रखो तुम्हारे अपराधकी क्षमाके लिये मैं ईश्वरसे आशीर्वाद करूँगा। इस प्रकार वे पादड़ी उन रुपयोंको अपने काममें लगाते थे एवं अपराधियोंके लिये ईश्वरसे प्रार्थना करते थे। भारतवर्षमें इस प्रकारके दान और प्रायश्चित्तकी रीती अब भी प्रचलित है। यहाँके धर्मात्मा लोग दान पुण्यसे पाप कटना समझते हैं।

पादरीयोंकी हंसी—विद्वानोंने साधुओं और पादड़ियोंका ठट्ठा करना आरम्भ किया। तबसे यह सब रीतियाँ उठ गईं, अपने समयमें जान मिल्टन साहब अंग्रेजी भाषाके एक बड़े भारी कवि हुये हैं, अपनी किताब (PARADISE LOST) की तीसरी जिल्दमें पादड़ियोंका इस प्रकार ठट्ठा करते हैं, मैं भी उसे पद्यमें बनाकर लिखता हूँ।

जान मिल्टन साहबका बचन।

नञ्जम - हर्मिट व फरायर कौल। और मंक भी इस डौल ॥
करते जो मकरोफरेग। मिक्काज धर दर जेब ॥
जामः सफेदो स्याह। सरपर अजीब कुलाह ॥
गिल गिता पाक मकान। ईसू जहां कुर्बान ॥
चल इश्क से अनसूब। ईसा जहां मसलूब ॥
दिलमें भी है हौस। हम जावेंगे फिर दौस ॥

सर्व धर्म

नौरोज हमको ईद । पितरसके हाथ कलीद ॥
दर खोल जन्नत आय । दाखिल हुये मर्द खुदाय ॥
चलते हो दिलमें शाद । उठती मुखालिफ़ बाद ॥
उनको उड़ावे दूर । उस अंधकारमें चूर ॥
हो अकल उनकी गुल । उड़ जाय पारडन बिल ॥
और कौल करता टोप । इस अंधकारमें तोप ॥
बाला विहिश्ती काख । पहले वसीअ व फर्खाख ॥
वहां जान अब कोई भूल । दिल वहां रहे मलूल ॥
वह अहमकों के बिहिश्त । बाकी न अब कोई खिश्त ॥

साधु फकीरोंकी हंसी — इस प्रकार जान मिल्टनके समान प्रायः विद्वान् ठट्ठा मस्खरी उड़ाने लगे अब भी करते हैं । जिसने दस पुस्तक पढ़ली वह कहता है कि, मैं ही बुद्धिमान विद्वान् हूँ, दूसरा मेरे बराबर कौन है । इस कारण साधु फकीर भजन छोड़कर व्यवहारमें लग गये । सब भक्ति भाव नष्ट होगई, पार्टनबिल काफूर हो गया ।

गजल—कुतुहऔ किससे खाँ मचाये गुल । भागा योरोप को छोड़ पार्टनबिल ॥
फिर न योरपमें तू कभी जाना । बागदे अपनी मोड़ पार्टनबिल ॥
अब जो जावे जरूर खावे मार । कुछ न तेरी है लोड़ पार्टनबिल ॥
हरगिज वह सरजमें न देख कभी । उल्मा करते जो हाड़ पार्टनबिल ॥
अब तू सर खुद हो मस्त बहरिश्ता । अहल दुनियासे तोड़ पार्टनबिल ॥
दुनियावी रख न अपना रख करना । खेत अपना तू गोड़ पार्टनबिल ॥
आजिज औरों के गौहरों को फेंका । कूट अपना ही रोड़ पार्टनबिल ॥

गजल—नू जरा सोच आदमी बच्चे । जिससे तू फिर न घर बघर नच्चे ॥
पहली रस्मों को तूने दूर किया । अब कौन रस्म तेरे हैं सच्चे ॥
पढ़ लिया सब जबाँ लाहासिल । अब तलक तुम हो वैसेही कच्चे ॥
पहले जो था है अब नहीं कुछ और । वही तो है भी वही जच्चे ॥
किस लिये हकने की तुझे पैदा । क्या था करना वह काम किस पच्चे ॥
किस लिये खलक में तू अशरफ है । कौनसे कारको तुझे रच्चे ॥
तू अब अपने को जानता दाना । शोहरा तेरा जहानमें मच्चे ॥
नहीं मालूम बारगह वारी । फिर बैठालें तुझे वजा उच्चे ॥
वे समझ सारे ख्वाँदे ना ख्वादे । देख आजिज सब एकसे खच्चे ॥
सच्चे साधुओंके लुप्त होनेका कारण—हिन्दुओंके राज्यके समय साधु

धर्मका प्रयोजन, धर्मका स्वरूप नियमोंकी आवश्यकता और सत्ता नियमोंके भेद ईश्वरीय नियम, परीक्षा, धारण

सन्तोंकी बहुत सेवा शुश्रूषा होती थी, पर वर्त्तमानमें राजा प्रजा कोई भी साधु सन्तोंकी ओर दृष्टि नहीं करता, इस कारण भक्ति और साधु दोनोंही लुप्त हो गये।

संग्रह—साधुओंके विषयमें जो भी कुछ कहा गया है उसीका संग्रह इन नीचेके पद्योंमें दिखाये देते हैं—

गजल—कसरतने कुतुब ख्वानी इबादतको हटाई।
योरपसे चली बाद अब इस हिन्दमें आई ॥
गुम्म ज्ञान किया है न रहा इल्म इलाही।
दिल दिया हलाहल रहा सब दलमें समाई ॥
मैं आकिल व मैं दाना बहर सिम्त सदा है।
मैं आलिमों आजिल हमादाँ हेच गदाई ॥
फिरते हैं बहर नामें कुतुब किस्से ख्वाना।
मुशर्रव मूअ सच जो किसीके दिलमें रहाई ॥
मजहब न कोई साधु गुरु कौन हे आजिज।
दिल भूत सभीको रहे जुल्मात दिखई ॥

मुखम्मस तरजीअ बन्द।

अमबाजका बहरमें तला तम्। भक्तिका नहीं कहीं महातम्।
शैतान् नफस मतिअ नजातम्। क्यों कर हो किसीको लाभ आतम् ॥

भक्तिके लिये है नोहे मातम्।

तालिम मरअक्स प्रेम व भक्ति। सिखलाते हैं लोग जीव जगती ॥
दुनियावी को बात खूब लगती। क्यों कर कोई पावे राहमुक्त ॥ भक्ति० ॥
कसरत जो हुई है कुतुब ख्वानी। हर सिम्त हजार बैठे ज्ञानी ॥
बतलाते हयाते जाबदानी। दिखलाते नजात की निशानी ॥ भक्ति० ॥
कोई करता है दावा खुदाई। कोई कहता है दायेमूल जुदाई ॥
कोई कहता है कुछ न दर गदाई। पुर है बगुनः बअदाई ॥ भक्ति० ॥
सारे मुद्दमा बुजरुग भूले। गहवारये मौतमें सो झूले ॥
बे वजह यकीन करके भूले। कर चक्कर वर्ग ज्यो बगोले ॥ भक्ति० ॥
कोई मुद्ई वजझ जौशन। कहता मेरा दिमाश रौशन ॥
है हाथ मरे तफझ औ तौसन। मैं आकिल और जमाना कोदन् ॥ भक्ति० ॥
पुरसिस नहीं साधु और गुरुकी न फिके। हिसाब रूबरूकी ॥
अन्देशा न खुद खराब खोकी। परवाह नहीं साथके अदो की ॥ भक्ति० ॥

मतमतान्तरके प्रचारक ज़ाता

धोका दिये सबको कुतुब किरमाँ । इन्सान हरीस हैं बहिरमाँ ॥
दिलमें न किसीके इश्क अरमाँ । नाहकमें फँसे न हकका फरमाँ ॥ भक्ति० ॥
मुनतिको दलीलका जो घर है । मामूर इस अहद बशर है ॥
हर सिम्त बहुतसा करौंफर है । इन्सानको मौतकी न डर है ॥ भक्ति० ॥
होवे जो मलिक मौतका फेरा । भूलेंगे सब ही फकीर फन् तेरा ॥
जब आनेके अजरईल घेरा । दोजखमें करेगा जाके डेरा ॥ भक्ति० ॥
मुन्किरो नकीर जिस्मथाना । आजा जो कहेंगे शाहिदाना ॥
लिखते जो हिसाब हर जमाना । बाकी न रहे कोई बहाना ॥ भक्ति० ॥
कोई न चलेगी होशियारी । चलनेकी हुई अब तैयारी ॥
अब छोड़ दे ख्वाबकी खुमारी । रह कोई रहे न रस्तगारी ॥ भक्ति० ॥
खुद गुम्राह और को सिखाते । अन्धे अन्धे को राह बताते ॥
पीते हैं शराब गोश्त खाते । दोजख खोरिश आब जब चखाते ॥ भक्ति० ॥
लब फूल वह दुनियाँ को तोड़े । हाहाकर प्याला को न मोड़े ॥
एक शिद्धत पर फिर और जोड़े । क्रितयन कुल रहम को सो छोड़े ॥ भ० ॥
ले हाथ में आगकी कतरनी । कतरें लब व सर अजाब धरनी ॥
दस गुण दुख औरसे जो भरनी । छूटे न गुरुके शरनी ॥ भ० ॥
जब तक न साधु गुरु मेहर है । तब तक हर सिम्तमें कहर है ॥
सब ग्राफिल सौपकी लहर है । रोजो शबो शाम और सेहर है ॥ भ० ॥
भक्ती और मुक्तिका निशाना । बतलाये कबीर हर जमाना ॥
बिठलाया जमीपै अपना थाना । दी वख्श बखेश व यगाना ॥ भ० ॥
जो सद्गुरुका निशान पावे । कर उसका अमल हमल न आवे ॥
फर्माबरी उसकी दिल लगावे । हो हंस मुकाम उसका पावे ॥ भ० ॥
ऐ सद्गुरु सत्से मिलादे । मुर्दा हुई भक्तीको जिलादे ॥
बुतलान जमीसे हिलादे । पजामुर्दा अपना गुल खिलादे ॥ भ० ॥
आजिजके तरफ जो मेल करते । यह बात बहिल जो कान धरते ॥
सद्गुरु की शरण तो आन परते । दरिया अगम अपरा तरते ॥

**विश्वामित्र—**विद्याभिमानियोंकी क्या सामर्थ्य है जो कि, सन्तोंकी तुल्यता कर सकें । भक्तिके प्रकाशसे भक्त भगवन्त बन जाता है, सन्तको वह पद मिलता है जो विद्याभिमानियोंको (स्वप्नमें भी) ध्यानमें नहीं आता । इसपर मैं एक उदाहरण लिखता हूँ । जो देवीभागवतके सातवें स्कन्धके बार-हवें अध्यायमें लिखा है :-

धर्मकी जड़, गुरुभक्ति

एक समय अयोध्याजीके महाराजा हरिश्चन्द्रके पिता राजा त्रिशंकु वशिष्ठजीके शापसे राक्षस होगये, पीछे उनपर विश्वामित्रकी कृपा हुई, उनकी राक्षस अवस्था छूट गई मनुष्यत्व प्राप्त हुआ। विश्वामित्रजीने शरीर सहित स्वर्गको भेज दिया। राजाके स्वर्गमें पहुँचतेही स्वर्गवासियोंने राक्षस जान धक्का देकर गिरा दिया। महाराजा त्रिशंकु पृथिवीकी ओर गिरने लगे। विश्वामित्रजीने उनको नीचे गिरता जान कर अपने योगबलसे बीचमेंही खड़ा कर दिया। अपने तपोबलसे कहा कि, यहाँ ही स्थित रह नीचे न आना, विश्वामित्रकी आज्ञासे अधरमेंही रह गये। इधर विश्वामित्रजीने अपने तपके बलसे एक दूसरी इन्द्रपुरी बनाना आरम्भ किया, नवीन इन्द्रपुरीकी शोभा इन्द्रपुरीसे कहीं बढ़कर थी। इन्द्रने दूसरी इन्द्रपुरी बनते देखी तो बहुत लज्जित और भयभीत होकर महान् तपस्वी विश्वामित्रजीके निकट आ दण्डवत नमस्कार कर गिड़गिड़ाके कहने लगा कि, महाराज ! ऐसा काम मत करो, एक इन्द्रपुरी तो वर्तमान है दूसरेकी क्या आवश्यकता है। इसमें बड़ा बखेड़ा होगा, एकही ब्रह्माण्डमें दो इन्द्रोंका रहना कठिन और दुखदाई है। विश्वामित्रने कहा, यदि तू राजा त्रिशंकुको लेजाकर अपनी इन्द्रपुरीमें रखे तो मैं इन्द्रपुरी बनाना बन्द करूँ, नहीं तो अवश्य बनाऊँगा। राजा इन्द्रने विवश होकर महाराजा त्रिशंकुको ले जाकर स्वर्गमें स्थान दिया विश्वामित्रने दूसरी पुरीकी रचना बन्द कर दी।

यह विश्वामित्र सृष्टिकर्त्ताके पद पर स्थित हो चुके थे, सृष्टि उत्पन्न करनेकी शक्ति प्राप्त कर चुके थे, जीव जब कर्मोंको भोगते हुये मनुष्य शरीरको पाते हैं तो फिर तपस्या करके उस पदको प्राप्त कर लेते हैं, आजतक उनका आवागमन नहीं छुटा। न उनकी मुक्तिकी आशा होती है। क्योंकि, उनमें क्रोध कामना बहुत है। तपस्या तो बहुत करते हैं पर वासना दूर नहीं होती जब विश्वामित्र राजा प्रियव्रतके हेतु स्वर्ग रचने लगे तो राजा इन्द्रको यह भय हुआ था कि, अब मेरा शत्रु उत्पन्न होगा क्योंकि, जब नई इन्द्रपुरी बनती है तो नया इन्द्र भी अवश्य होगा। देवते भी होंगे इन्द्रका सभी ठाठ बाट होगा, मुझमें और नये इन्द्रमें शत्रुता बढ़ेगी। यह विचार कर इन्द्रने विश्वामित्रसे बिन्ती करके नई इन्द्रपुरीकी रचना बन्द कराई। विश्वामित्र दूसरे ऋषीश्वरोंके समान भिन्न ब्रह्माण्ड बनाकर उसमें इन्द्रपुरी बना सृष्टि उत्पन्न करते तो विष्णु अथवा अन्य दूसरे देवताओंको किसी प्रकार कुछ कहनेका अवसर न मिलता।

सम्बर—जो कोई ब्रह्माण्डमें रचना करना चाहता है, अवश्य उससे देवता लोग शत्रुता करते हैं। अतः योगवाशिष्ठमें लिखा है कि, दैत्योंके राजा

श्रद्धा, विश्वास, गुरुदर्शन, गुरुमुखका कृत्य

पातालवासी साम्बरने नवीन सृष्टि उत्पन्न करना आरम्भ किया वो अपनी सृष्टिके जीवधारियोंकी देहको मणि माणिकसे युक्त महासुन्दर शोभायमान बनाता था। देवता लोग उसको नष्ट कर जाते थे, इस कारण देवताओं और दैत्योंमें घोर युद्ध हुआ करता था। साम्बरने अन्तमें तीन पुरुष ऐसे उत्पन्न किये जिनमें वासनाका लेश भी न था। तीनों वासना रहित पुरुषोंने देवताओंको जीतकर भगा दिया, जिससे उनको ऐसा भय उत्पन्न हुआ कि, पहाड़की घाटियों गुफायें आदि गुप्त स्थानोंमें छिपने लगे। अन्तमें विचार कर उन तीनों साम्बर रचित निष्काम पुरुषोंमें वासना उत्पन्न कराई। इससे वे भय खाकर देहकी बचावट करने लगे। भय और चिन्ता हुई तो देवताओंने उनके ऊपर बड़ी प्रबलताके साथ आक्रमण किया वे लड़ाई छोड़कर पाताल भाग गये, जहाँ यमराजाका स्थान था वहाँ जाकर छिपे। पीछे दैत्यराजा साम्बरने ऐसे तीन पुरुष उत्पन्न किये जिनको कि, कभी वासना होवेही नहीं। तीनों आत्मज्ञानी थे उन्होंने देवताओंको मार भगाया। पीछे स्वयं विष्णु भगवान्ने जाकर उनसे महान् युद्ध करके उनका बध किया। यह देख दैत्यराज साम्बर स्वयं विष्णु भगवान्से युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें उपस्थित हुआ, अन्तमें असुरारि विष्णु भगवान्ने उसे भी मार गिराया। इस प्रकार स्वयं भगवान् विष्णु इस ब्रह्माण्डके अधिपति हैं, इसमें दूसरा हस्ताक्षेप नहीं कर सकता। सहस्रों ऋषि मुनि ईश्वरपदको प्राप्त हो नया ब्रह्माण्ड रच ईश्वरी करते हैं, पर वे भी इसमें कुछ हस्ताक्षेप नहीं करते।

पठित मूर्ख—विश्वामित्र मध्य श्रेणीके ऋषि थे, हजारों उनसे बढ़कर उच्चपदपर स्थित हैं जिनके ऐश्वर्य और प्रतिष्ठाका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। विद्याभिमानियोंको उनकी श्रेष्ठता और प्रभावकी क्या सुधि है, ऐसे २ ऋषि मुनि हैं जिनकी अपेक्षा ब्रह्मा, विष्णु आदि तुच्छ हैं। उन ऋषियोंको विद्याके अहङ्कारी पठित मूर्ख क्या जान सकते हैं।

विद्याभिमानी कूवेंके मंडकीके समान हैं, कूवेंकी मंडकीको अपने कूवेंकी सुधि होती है, उसे असीम सागरकी क्या सुधि है? कबीर साहबने ऋषियोंकी बड़ाईमें कहा है कि, सच्चे सन्त और साहब, एक हो जाते हैं। जिन्होंने सत्यपदको प्राप्त किया है, जो गुरुपदकी सुधि रखते हैं, निर्माण होकर रहने पर भी साहबके तुल्य हैं, जो ऐसी महिमा युक्त सन्तोंकी ठट्टा और निन्दा करते हैं, वे भक्ति मुक्तिके सत्यमार्गको नहीं प्राप्त होते, विषयवासनाके वश संसार सागरमेंही पड़े हुये बारम्बार आवागमन किया करते हैं।

मनमुख, दोनोंके कृत्य मनमुखके मुक्त न होनेका कारण, गुरु पूजाका माहात्म्य, मजहबियोंकी ओर दृष्टि

कबीर साहबकी साखी ।

कोठी तो है काठकी, ढिग ढिग दीन्हीं आग ।

पढ़ पण्डित झोली भये, साकट उधरे भाग ॥

हजरत ईसाकी वाणी ।

मतौफी इज्जोल ८ बाब, २० आयत—ऐ बाप ! तूने विद्याभिमानियोंसे ओट रखा अपने बच्चोंपर परदा खोल दिया ।

एक फकीहा (कर्मकाण्डी विद्वान्) ने हजरतसे कहा कि, आप जहाँ जावें मैं भी आपके साथ जाऊँगा । इस बातपर हजरतने जवाब दिया कि, लोमड़ियोंके वास्ते माँद और पक्षियोंके लिये घोंसले हैं, पर मनुष्योंके लिये शिर धरनेकी जगह नहीं, इतना कहकर उसको शिष्य नहीं बनाया ।

लोमड़ियोंसे आशय विद्याभिमानियोंसे है । क्योंकि, वह फकीहों विद्याभिमानी था, अतः विद्याभिमानियोंको लोमड़ी कहा क्योंकि, विद्याभिमानी लोमणियोंके समान चतुर और चालाक होते हैं, वे पृथिवीमें रहते हैं, पक्षीके घोंसले वृक्षपर होते हैं, विद्याभिमानी जनोंका आवागमन नहीं छूटता । वे मातृगर्भरूपी माँदोंसे कभी छुट्टी नहीं पाते । जब ऐसेही विद्याभिमानी लोग संसारके उपदेशक बने तो किस प्रकार जीवोंका कल्याण हो सकता है ।

तपस्वी और भजनीक भक्त ज्ञानी लोग जो अपने भजनके बलसे स्वर्गमें जाते हैं, यह पक्षियोंके कहनेका आशय है समय पाकर वे भी पतित हो जाते हैं ।

मनुष्योंके कहनेका आशय उन लोगोंसे है, जो कि, विषय वासनासे मुक्त होकर तीन लोकसे बाहर होगये उनको तीन लोकमें शिर धरनेकी जगह नहीं है क्योंकि, यह तीन लोक वासनिकोंके लिये है । ये तीन लोक सच्चे मनुष्योंके लिये नहीं है । ज्ञान तिलकमें लिखा हुआ है ।

स्वामी रामानन्द वचन ।

पढ़ पढ़ राते गुण गुण माते हृदया शुद्ध न होई ।

नानक वचन

पढ़ पढ़ गढ़ी लादिया, लिर लिख भरीं साख ।

नानक लेखे एक गुरु, हौं मैं श्रवकड़ झाख ॥

प्रह्लाद वचन ।

पढ़ूँ न विद्या सो लिख पाटी । विषेक राम भगतकी टाटी ॥

क्या पौड़े तूँ लिखे जँजाला । लिख कीरतन राम नाम गुपाला ॥

इज्जोलमें करीनतूनको पोलूस रसुलका पत्र कि—जो कोई पण्डित

स्वसंवेदका सार, बिन्दी

विद्वान् और बुद्धिमान् बनना चाहता है उसको चाहिये कि, मूर्ख बन जावे । जो सांसारिक बुद्धिमत्ता और विद्वत्ता है वह परमात्माके निकट मूर्खता और निर्बुद्धिता है, परमात्मा अभिमानी पण्डितोंको विद्याकेही जालमें डरझा रखता है ।

जबूरमें अयूबके विषयमें—परमात्मा बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता असत्य कर देगा, वे स्वयं अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर सकेंगे । विद्याभिमानियोंको विद्याके जालमें फँसाए रखता है, जो टेढ़े तिरछे लोग हैं उनकी बुद्धिमानोंको शिरके बल उलटा देता है, वे लोग दिनके प्रकाशमें भी अंधेरेके समान अन्धे हो दूढ़ते फिरते हैं ।

फिक्रियाका सिद्धान्त—मुहम्मद साहबके बहततर पंथोंमेंसे फिक्रिया नामक पन्थका वचन है कि पुस्तकावलोकन आदि विद्याकी विशेष वृद्धि होते ही भक्ति और भजन नष्ट हो जाता है ।

शिष्टका वचन—किसीने कहा भी है कि,—

श्लोक—जातिविद्या महत्त्वं च रूपं यौवनमेव च ।

यत्र नैव प्रजायन्ते पञ्चैत भक्तकण्टकाः ॥

जाति, विद्या, रूप, मान, युवावस्था ये पांचों भक्तिके परम शत्रु हैं, जबतक इनसे निवृत्त न होगा तबतक भक्ति न कर सकेगा । इसी प्रकार पृथिवीके सारे विरक्त महात्मा कहते चले आते हैं । यदि मनुष्य भक्तिका कुछ भी अनुराग रखता हो तो विद्वान् होता हुआ भी विद्याका अभिमान छोड़ दे ।

विद्याभिमानियोंका आधार—दो बातों पर है एक पुस्तक अर्थात् दृष्टि ज्ञान और दूसरा उनका ज्ञान । दोनोंही असत्य हैं । क्योंकि, दोनों परिवर्तनशील हैं । दोनोंका कुछ भी विश्वास नहीं । बालकपनसे मृत्यु तक इनमें परिवर्तन हुआ करता है, इनपर भरोसा करना गुरुको न दूढ़ना महामूर्खता है । मनुष्य धर्मद्वेष और पक्षपात छोड़कर देखे विचारकर उचित व्यवहार करे तो निस्सन्देह इष्टको प्राप्त कर सकता है । पहले गुरुकी पहचान अवश्य है, जबतक गुरुको न पहचानेगा तबतक कोई कार्य पूरा नहीं हो सकता । बुद्धिमानों वही है जो सद्गुरुको पहचानकर उसके चरणका रज हो जावे अपने विचारको गुरुकी आज्ञानुसार काममें लावे ।

यह एक सीढ़ी है जो पृथिवीसे ऊपर आकाशमें लगाई है उसके चार दण्डे हैं, शरीयत (कर्म काण्ड) तरीकत (योग और उपासना) हकीकत (ज्ञान) और मारफत (विज्ञान) आदिक ।

जितने विद्याभिमानी संसारमें हैं सब शरीयत (कर्मकाण्ड) के दण्ड

पर खड़े हैं, आगे पग नहीं बढ़ा सकते। जिसके दण्डे पर सब सांसारिक तथा विद्याभिमानी खड़े हैं, वह क्या है? वह तो केवल अज्ञानी अन्धोंके लिये है।

कबीर साहबने कहा है—‘अन्धेको दरपण वेद पुराण’।

वेद, पुराण, किताब कुरान आदि ऐसे हैं; जैसे अन्धोंके सामने दरपण। ऐसाही इञ्जीलमें, पोलूस रसूलका पहला तमताऊसको खत देखो ८ और ९ आयत—हम जानते हैं कि, शरीयत (कर्मकाण्ड) अच्छा है, यदि उसकी रीति पर भली प्रकार वर्तवि किया जावे।

यह शरीयत (कर्मकाण्ड) सत्यवादियोंके लिये नहीं है वरन् शास्त्र विमुख, दुराचारी, अधर्मी पापी, माता पिताको बद्ध करनेवालों, अन्यथाचारियों, विषयी, मनुष्य विक्री करनेवालों झूठे, झूठी शपथ खानेवालों आदि काफ़िरोंके लिये है। इनके अतिरिक्त और भी जो सत्यपथसे विरुद्ध हों उनके लिये है। क्यों कि, दण्डव्यवस्था इसीमें है।

सभी विद्याभिमानी सन्तोंकी कृपा बिना शरीयत—कर्मकाण्ड—में बँधकर मनमुख हो गये। सन्त राजा हैं। पठित अपठित मनुष्य उनकी प्रजा हैं। राजाको कर देना तथा उसकी आज्ञाकारिता करना उचित है, जो न करेगा वह अवश्य कैंद होगा। संसारके सन्त गुरु शिक्षक हैं। जो रीतिसे गुरुकी सेवा न करेगा वह पदसे भ्रष्ट हो जावेगा। गुरु और ईश्वरका धन्यवाद करना आवश्यक है। जिसका गुरु नहीं है उसका ईश्वर भी नहीं है। गुरु और सन्तसे ईश्वर की प्राप्ति होती है। जिसका गुरु न हो वह एक अथवा दो ईश्वरोंकी भक्तिका दावा करे तो झूठा है, उसको द्वैत अथवा अद्वैत किसी प्रकारसे ईश्वरकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार विद्याभिमानी अपने ऊपर आपत्ति उठाते हैं। इसके ऊपर एक दृष्टान्त है कि—

बुल्लेशाह और शरई—साई बुल्लेशाह साहब, विरक्त महात्मा, लाहोरके निकट कुसूर नामक कसबामें रहते थे। उनकी भजन भक्ति माहात्म्य समस्त पंजाबमें प्रसिद्ध है। उनके समयमें कुसूरमें एक बड़ा आलिम शरई रहता था। वह सर्वदा बुल्लेशाह साहबकी निन्दा किया करता था उनसे शत्रुता रखता था। उसने समस्त कुसूरके पठानोंको बहकाया कि, यह बुल्लेशाह बड़ा बेशरा है। उसकी बातोंको सुनकर सब पठान लोग शाह साहबके विरोधी हो गये। शाह साहब तो विरक्त थे, उनको मुसलमानी रोजा निमाजसे अथवा कर्मकाण्डसे क्या सरोकार था यह सब तो प्राकृतिक मनुष्योंके लिये हैं, विरक्त उसको क्यों मानने लगे? इस भेदसे प्राकृतिक जन अज्ञात हैं। वह मौलवी

तीरीतकी आज्ञाएं, एक खुदा (ईश्वर) की पूजा करे, समीक्षा

बुल्लेशाह साहबको मर्दद और शौतान कहा करता था । हजरत शाह साहब उसकी बातोंको सुनकर धैर्यसे सन्तोष करके चुप रहते थे । एक दिन मौलवी कहने लगा कि, ऐ बुल्लेशाह ! तू जब मरेंगा तब मैं तेरा मुंह काला करवा, टोंगोंमें रस्सी बँधवा, समस्त शहरमें घसीटवाऊँगा । मौलवी उसका बड़ा काजी था, मुसलमानी राज्यमें फतवा दिया करता था बहुत बल रखता था । उसकी बातें सुनकर बुल्लेशाह साहबने कहा कि, ऐ काजी ! जब मैं मरूँगा तब तू यहाँ न होगा, मेरे मरनेके पीछे तू मरेंगा बहुत दुःख दर्दसे पड़ेगा, वहाँ तेरा प्राण न छूटेगा तब तू कुसूरमें आवेगा तो मेरे पगके नीचे गाड़ा जावेगा तभी तेरेको शान्ति होगी । अन्तमें मौलवी काबुल गया । बुल्लेशाहका देहान्त हो गया । कुसूरमें उनकी अन्तिम क्रिया हुई । वह काजी काबुलमें बीमार पडा, उसके शरीरमें बहुत जलन उत्पन्न हुई, बहुत दुःखी हुआ पर प्राण नहीं निकला, उसने कहा कि, मुझको शीघ्रही कुसूरमें बुल्लेशाहके चरणोंमें ले चलो । मौलवी बुल्लेशाहकी कब्र निकट पहुँचा तो उसका प्राणान्त हो गया बुल्लेशाहके पगकी ओर उसकी कब्र बनी है । उसकी सभी शरयतें और विद्याभिमान भूल गया, कोई काम न आया । सच्चे सन्तोंके विद्वेषियोंको कभी सुख नहीं मिल सकता ।

मृतकाचार्योंके शिष्य—विद्याभिमानियोंके कोई गुरु नहीं । केवल वे पुस्तकोंहीको गुरु माने बैठे हैं । किसी एक धर्मके आचार्यका नाम लेकर उसकी ओटमें नानाप्रकारके शुभ अशुभ व्यवहार करते रहते हैं, यद्यपि आचार्यकी सूरत भी नहीं देखी कि, वह कैसा है ? केवल किसीका नाम सुनकर उसके चेला बन जाते हैं कहते हैं । कि, हम अमुक आचार्यके अनुयायी हैं, ऐसाही है—जैसा कोई कहे कि, आकाशमें बाग लगा है मैंने उससे खूब फल तोड़कर खूब खाए जिससे पेट भर गया । ऐसे झूठ सत्य मार्गपर कभी नहीं आ सकते । जिसको मरे हुये बहुत काल बीत गया, उस आचार्यका नाम लेकर चेला बन जाना तो ऐसाही है—जैसा कोई स्त्री कहे कि, अमुक पुरुष जिसको मरे हुये अब बहुत दिन बीत गये हैं मैंने अपना पति आज बना लिया । इस प्रकारके पति बनानेसे सन्तानकी उत्पत्ति न होगी, यह सब मूर्खताका विचार है बिना गुरु चेलाके मिले कदापि ज्ञान नहीं होता । स्त्री पुरुषके संयोग बिना सन्तान उत्पन्न भी नहीं हो सकती ।

इस मण्डलीके लोगोंको आँख, कान और बुद्धि भी है पर प्रकाश और