कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
श्री
समस्त वाणी वेद और किताबोंकी माताका चित्र.
<!-- image: A circular emblem with a lotus border. Inside the circle, a female figure (Saraswati) is seated on a patterned cushion, wearing a crown and jewelry, with one hand raised in a blessing gesture. The lot -->२० वी अध्यायका सर्व धर्म प्रकरण
इसी चित्रके वर्णनमें लिखा है.
कवीर मन्थुर
<!-- image: A circular emblem at the top of the diagram. It features a central figure of a deity seated on a lotus, surrounded by a radiant halo of rays. The words 'अमर' (Amara) and 'लोक' (Loka) are written on ei -->ज्ञानीपुरुष
<!-- image: A figure of a sage or knower (ज्ञानीपुरुष) standing and pointing upwards towards the central emblem. He has a long beard, wears a crown, and is adorned with a garland. He holds a staff in his right ha -->निरञ्जन
( भवसागर )
पुष्पाञ्जलि
जिस महापुरुषने भूमण्डल पर आकर धर्मद्वेषसे दग्ध हुए जीवोंको सामान्य धर्मरूप अमृत पिलाकर सजीव किया इस ग्रन्थकी पहिली भेंट उसी श्री कबीर साहिब के चरणोंमें की जाती है।
दूसरी भेंट—कबीर पन्थके संस्थापक श्रीधर्मदासजी तथा उनके व्यालीस वंशको है जिन्होंने आजतक साहिबके सिद्धान्तोंकी रक्षा करते हुए उन्हें कार्य रूपमें परिणत किया।
तीसरी भेंट—उनको है जो इस खींचातानीके समयमें भी अपने पन्थको कबीर साहिबकाही एक पन्थ समझते हैं।
चौथी भेंट—इस पन्थके उन सन्त महन्तोंको है जो इस कराल कलिकालकी चपल तरंगोंके झोंकों को बारंबार सहकर भी साहिबके बताये हुए पंथ पर दृढ़ हैं जो कि कबीर साहिबकी वाणीका सच्चा तात्पर्य समझते हैं।
मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागे है मोर ॥
माधवाचार्य।
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सत्यमेव जयते नानृतम्
<!-- image: A small five-pointed star symbol. -->प्रथम ब्रह्मसूत्र
हंसोंके प्यारे भक्तों के जीवन सर्वस्व सत्य साकेत लोकवासी परब्रह्म परमात्मा पुरुषोत्तम, श्रीसत्यपुरुषकी अहेतुकी दया, अबिल ब्रह्माण्डोंके सभी जीवोंपर सदा बनी रहती है।
यद्यपि जीव क्षण २ में और का और होनेवाले असार भवसागरके चंचल तरंगोंके प्रबल वेगसे इतस्ततः बहता हुआ, मायाके गहरे भँवरमें फंसकर, पुत्र दार गृह्णादिके झूठे अभिनिवेशसे तेरा मेरा करता हुआ सच्चे स्वामीको भुला, झूठे मोहोंमें मुग्ध हो जाता है पर वो सच्चा प्रेमी अपने अनुकम्पोंका कभी विस्मरण नहीं करता प्रतिक्षण इन्हीं चिन्तामें रहता है फिर उन भक्तोंकी तो बात ही दूसरी है जो सारे विश्वको उसीकी चरण रेणुके एक कण पर न कुछकी तरह निछावर किये बैठे हैं।
स्वर्ग, नरक, उच्च, नीच, पौर्यात्य, पाश्चात्य, हिन्दू, अहिन्दू सर्वत्र उसका सहज प्रकाश सदा पहुचा करता है। यादृश कर्मफलोंको भोगनेके लिये जैसे साधनोंकी आवश्यकता होती है वो बिना किसी प्रार्थनाके अपने ही आप वैसे ही साधन दे देता है जिनसे कि, प्रारब्ध भोगोंको भोगनेमें समर्थ होसके। जो जिस देशका रहनेवाला है उसे उसी देशके अकटक निर्वाह करनेके सब उपकरण प्रदान कर दिये हैं। शीत देशके जन्मे हुओंको वहाँके अनुकूल तथा गर्म देशोंके रहनेवालोंको गरम सह सकेके योग्य बनाया है।
यह ईश्वर की सहज दयाका ही फल है। उसीकी दी हुई शक्तिसे सब शक्तिवान् बन रहे हैं। जिसमें जो स्वाभाविकता दीखती है सब उसीकी दी हुई है; इसीसे यह अनुमान, सहज ही में लगाया जा सकता है कि, सब पर उसकी अहेतुकी दया है सबका वो सच्चा प्यारा है उसका किसीसे द्वेष नहीं है। वो कितने भूलें तथा द्वेष भी किससे करे उसीके लोकका प्रकाश जो चैतन्याकाश पर पड़ा वही तो समष्टि जीव है उससे इतर योड़ाही है यही साहिवसे विमुख होकर संसारी बना है पर साहिव इससे कभी भी विमुख नहीं होता जो कि इसे भूल जाय।
इसीने देव देवी बनकर देव लोक, नाग नागिन होकर पाताललोक, किन्नर किन्नरी बन कर किन्नर लोक, यक्ष यक्षिणी बनकर यक्षलोक वम् मानुष एमानुषी बनकर मनुष्य लोक भर दिया है। मनुष्यों में भी कोई राजा कोई प्रजा कोई धनी, निर्धन, कोई निर्बल सबल, कोई पूज्य, अपूज्य एवं कोई ज्ञानी तथा कोई अज्ञानके घोर तममें पड़ा ठोकरें खा रहा है।
जो जो जीवोंका स्वभाव बन्धनोंमें बँधनेका होता जाता है त्यों २ वो अपनी तरह खींचनेके लिये हाथ बढ़ाता जाता है। जीव मार्गभूल कर गड़बोंकी ओर भगे जा रहे हैं तो वो उन्हें मार्गपर लानेका प्रयत्न कर रहा है।
संसारी व्यवहारोंको अच्छी तरह जतानेके लिये, इसके व्यवहारोंका सुखपूर्वक पालन करनेके लिये एवम् बिना किसीके सताये आनन्द पूर्वक रहते हुए आगे बढ़नेके लिये, अपरा विद्याका
उपदेश दिया जिसे कि कोई २ पुरुष वेद कह कर भी बोलते हैं। जो भवके परितापोसे छूटना चाहते हैं जिन्हें कि, इन्द्रकी वो सुधर्मा सभा जहाँ कि सदा उर्वशी जैसी लोकोत्तर सुन्दरियोंके नाच रंग हुआ करते हैं, कोई अनुराग न पैदा करे किंतु दुःखका ही साधन प्रतीत हो ऐसे पुरुषोंके लिये परा विद्याका उपदेश दिया जिसे कि, स्वसंवेद भी करते हैं। निरंजनके राज्यके अनन्त ब्रह्माण्ड है एक एकमें अनन्त अनन्त लोक हैं प्रत्येक लोकमें अनन्तोंही हैं एक ही यह भूमण्डल सात महा-द्वीपोंमें विभक्त हो रहा है एक ही जम्बूद्वीपमें भीतर एशिया आदि कई महाद्वीप संभाले जा रहे हैं। सृष्टिके पुरुषोंको ज्ञानोपदेश करनेका मार्ग एशियाका भारत वर्ष ही रहा है, सत्य पुरुषके दिव्य सन्देश इसी पुण्यभूमिमें आये एवं यहीसे विश्वके मानव समाजको हितोपदेश मिला है। सृष्टिके आदिमें ऋषि महर्षियोंके द्वारा वेदके दिव्य प्रकाशसे संसार भरको सन्मार्ग दिखाया गया जो कि, महाभारतके समयसे पूर्वतक अक्षुण्ण बना रहा। द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण द्वापायनने उसे पुनः परिष्कृत कर दिया।
यद्यपि धर्मराज युधिष्ठिरजीके वंशधर उनके सत्यधाम पधारनेपर बीस पीढ़ी तक एक छत्र शासन करते रहे हैं किंतु जनमेजयके शासनके बाद उनका शासन सूत्र ढीला होने लग गया था इस बातकी साक्षी भारतका इतिहास दे रहा है। ऋषि मुनियोंको प्यारी तपोभूमि इस भारत वर्षमें अनेक तरहके मनमाने मत फैल गये थे। मनमाने देवता कल्पित करके उनके नाम पर मनमाने कार्य किये जा रहे थे, मद्यपलोग मद्यके सैकड़ों समुद्रोंको सोख डालनेवाले रौख मद्यप देवताओंकी कल्पना करके गूलरकेसे रंगकी मद्यको बोटलोंपर बोटलें उड़ा रहे थे। निष्कुरुण मांसप्रिय मनुष्योंने मांसका बाजार गरम कर रखा था। परस्त्रीगामियोंने अपनी विचित्र आराधनाके नामपर रजकियों और चाण्डालिनीतकोंको अपनी सिद्धिका साधन प्रसिद्ध किया था।
ऐसे अत्याचारियोंके नम्र अत्याचारोंसे सत्य पुरुषके सच्चे भक्त सताये जा रहे थे, उसकी दिव्य सन्देशमयी परा अपरा दोनों वाणियोंका मूलोच्छेद हो रहा था, उनके प्रेमी पुराने लकीरके फकीर कहकर घृणाके गड़देके नीचे दबाये जा रहे थे, इनकी दर्द भरी आवाज सत्यपुरुषके कान पड़ी उसका हृदय स्वाभाविकी दयासे एकदम द्रवीभूत हुआ। क्योंकि वो सत्यपुरुष असावधान नहीं था सत्य मार्गके खोजनेवालोंको उस समय भी वो अपना मार्ग बता देना चाहता था उसके भेजे हुए पथ प्रवर्तक भी उसका पूरा आचरण करके दिखा देना चाहते थे कि, इस प्रकार चलने पर अब भी सत्यलोक दूर नहीं है। ये सत्य पुरुषके सत्यलोकके आये हुए पक्के तत्त्वके देहवाले उसीके हंस थे, यदि ये केवल उपदेशकाही कार्य रखते तो कलियुगकी कलुषित भावनाओंको अपने ओजस्वी वचनोंसे निःशेष कर डालते। पर पर्वतोंकी कन्दराओंमें प्राचीन वृक्षोंकी खोदरोंमें पवित्र वनों एवम् एकात्मके पुण्य स्थलोंमें सत्यलोकोंके हंसोंके कृत्य कर २ कर दिखा रहे थे।
जिन्होंने इनके लोकोत्तर चरित्रको जान पाया, जिन्होंने उनके जीवन चरित्रोंपर दृष्टि डाल कर उन्हें अपना आदर्श बनाया वे अधिकारी मुक्तिपथको अधिकृत करके इस असारसे बन्धनोंको तिनकेकी तरह तोड़कर साकेत लोक चले गये पर जिन्होंने उन्हें नहीं समझ पाया ऐसे पुरुषोंको उनसे कोई लाभ नहीं पहुँचा। जिन्हें उनसे लाभ पहुँचा ऐसे जीवोंकी संख्या उंगलियोंपर गिनी जा सकती थी।
उस समय उनका इतना अधिक प्रचार नहीं हुआ कि, सर्व साधारण उनसे लाभ उठासकें। यह देख जगदीशने अधिकारी बना २ कर उसीके अनुसार उपदेश देना प्रारंभ किया।
भगवान् बुद्ध देवने महावीर स्वामीको साथ लेकर अहिंसाके उच्च सिद्धान्तके जय घोषसे भूमण्डलको व्याप्त कर दिया। विक्रमार्केन वैदिक विकासको निष्कांटक बना दिया, श्रीशङ्करस्वामीने
पूर्वमीमांसाआदिकी प्रतिद्वन्द्वितामें उत्तर मीमांसा स्थापित की, श्रीरामानुजाचार्य, निम्बादित्य आदि दिव्य आचार्य पुरुषोंने जीव, ब्रह्म और माया विषयके विज्ञानोंको सर्वसाधारणोंके सामने रखा।
किन्तु महाराजा अशोकके वंशधरोंको निर्बल हो जानेके पीछे भारतका वैदेशिक प्रचार शिथिलप्राय हो गया क्रमशः दूसरे देश भारतके दावेसे निकल गये।
इतिहास एवम् पुरातत्त्वकी खोज तो हमें यह बताती है कि, महाराजा अशोकका इतना बड़ा साम्राज्य था जितना कि अशोकके बादकी कोई भी शक्ति आजतक नहीं बनासकी है न बनानेकी आशाही है। आजकी बौद्धोंकी ६३ करोड़ोंकी संख्या भगवान् बुद्ध देवके सार्वजनीन हितोपदेशके बदलेकीही है इसका निर्माण सच्चे उपदेशके आधार परही हुआ है यह कहीं भी लिखा हुआ नहीं मिलता कि बौद्धोंने कभी भारतसे बाहर विदेशोंमें तलवारके बलपर बौद्ध धर्मका प्रचार किया था जैसा कि इसलामके प्रवर्तकोंने धर्मप्रचारके नामपर असहाय जीवोंका रक्त पानीसे भी सस्ता बहाया है। बौद्ध धर्मका सच्चा सिद्धान्त अहिंसा था जिसका कि प्रचार केवल विश्वके निरीह प्राणियोंको शान्ति देनेके लिये किया गया था। यही भारतके वीरोंकी विशेषता है कि, यहाँके धर्म प्रचार भी सुख शान्ति पूर्वक एवं सुख शान्तिके लिये हुए। उनका यह सिद्धान्त कभी भी नहीं हुआ कि, परमात्माने हम राजाओंको इसलिये पैदा किया है कि, हमारे मजहबके न माननेवालों काफिरोंको कत्ल कर दिया करे एवम् धर्माचार्योंको धर्मप्रचारके लिये भेजा है।
किन्तु उनका तो यही विचार रहा है कि, हमे परमात्माने प्रजाका रंजन करनेके लिये भेजा है कि, उसे किसी तरह भी दुखी न होने दें तथा भारतके धर्माचार्य दिव्य सन्देश सुनानेके लिये आते हैं सत्यपुरुषका सामयिक अनुशासन जनताके सामने रख देनेका उनका कार्य है यह लोगोंकी इच्छापर निर्भर रहा है कि माने वा न माने, न तो इस विषयमें उन्होंने कभी बल-प्रयोगको उत्तम समझा है न कभी ऐसी आज्ञाही दी है।
जब मैं सांप्रदायिकताके संकीर्ण दायरेकी ओर जाता हूँ तो मुझे यह कहनेके लिये अवश्य बाध्य होना पड़ता है कि, संकीर्णता तो किसीकी भी सर्वाशतः सच्ची नहीं कही जा सकती चाहे वो अपने संप्रदायकी हो चाहे दूसरोंकी हो पर पश्चिमके धर्माचार्योंके हृदयमें चाहे कुछ भी हो कुछ एकको छोड़कर अपने सिद्धान्तों के प्रचारमें हिंसाका आश्रय सबने लिया है यही पूर्व और पश्चिमकी विभिन्नता है।
उनका तलवारके बलका धर्म प्रचार उन्हींके देशोंमें नियमित रहा हो यह बात नहीं है किन्तु उनके अनुयायियोंने मानव सत्यताको सिखानेवाले सब धर्मोंके गुरु एवम् आपसकी फूटसे स्वतः विदीर्ण हुए शिथिलेन्द्रिय इस वृद्ध भारतवर्षको भी धर्मके नामपर रक्त रंजित किये बिना नहीं छोड़ा। भारतवर्षकी सीमाके देशोंके बलपूर्वक इसलाममें दीक्षितकर लेनेके पीछे भारतवर्षकी बारी आई, सम्राट पृथ्वीराजके बाद भारतवर्ष मुसलमानोंके ताबे आया।
मुसलमान शासकोंने धर्म के नामपर बड़े २ अत्याचार किये प्रतिदिन बेगुनाहोंका रक्त पानीकी तरह बहाया जाता था हिन्दू धर्म ग्रन्थोंसे पानी गरम हुआ करते थे, हजारों कुलललनाएँ बेश्याओंसे भी बुरी बना २ कर बिठा दी जाती थी विशेष क्या कहा जाय यदि उस कालमें रौरव नरक भी मूर्तिमान् होकर भारतकी दुर्दशा देख लेता तो वह भी इसकी दशापर दो चार आसूँ बहाये बिना न रहता। देशभरमें त्राहि २ मची हुई थी जिनके हाथमें शासन सूत्र था वे अपना विशुद्ध कर्तव्य भुलाकर धर्म देशमें फँसकर पैशाचिक अत्याचार कर रहे थे। अन्तमें निर्दोषोंका खून रंग लाया, सत्य-
पुरुषका हृदय असहाय दुःखी भारतवासियोंकी कर्षणा से पूर्ण हो गया जले हृदयोंकी उन्हाँने निरंजनके शरीरसे भी अगाडी निकलकर सत्यलोकका द्वार जा खट खटाया।
कबीर साहिबको आज्ञा :—हुई कि, आप पुण्य भूमि भारतमें जाकर दुःखी जीवोंको दुःखसे मुक्त करो सच्चे सामान्य धर्मका उपदेश करो जो सबका एकसा है। हिन्दू मुसलमान दोनोंको उसके प्रकाशसे प्रकाशित कर दो जो कि, वे आपसके कलहको छोड़कर सच्ची शांतिको ग्रहण करलें। सभी कबीर साहेबके विषयमें मुक्त कण्ठसे स्वीकार करते हैं कि, कबीर साहिबका सामान्य धर्मका उपदेश था जो कि, सभी धर्मवालोंको एकसाही हितकारी हैं, उनकी युक्तियाँ भी सर्व धर्म विषयिणी थीं।
कबीर साहिबका प्रागट्य
संवत् १४५५ ज्येष्ठ शु० पूर्णिमा सोमवारके दिन काशीके लहर तालाबमें कबीर साहिबका प्राकट्य हुआ था, महापुरुषोंके जन्मोपर जो २ प्राकृतिक सुषुमाएँ दीखा करती हैं वे इनके जन्मपर भी कम नहीं थीं सभी प्राकृतिक दृश्य सन्त पुरुषोंको विशेषताएँ बताते हुए दीख रहे थे। उस समय जुलाहे नीमा नीरू नामक मुसलमान दम्पती आपको उस तालाबसे उठा लाए एवं पुत्रकी भावनासे ओत प्रोत होकर आपका लालन पालन करने लगे, आपने बाल्यकालमें वे लोकोत्तर चरित्र दिखाये जो कि, महापुरुषोंकी बाल लीलासे स्वाभावसेही चमका करते हैं। बड़े होनेपर तात्कालिक देहलीके बादशाह सिकन्दर लोधीको दिव्य सिद्धियाँ दिखाने एवम् अपने नामसे कमाल कमालीको जिन्दा कर देनेके बाद आप खूब चमके। आपकी सर्व धर्म विषयक युक्तियोंने अच्छा उच्च स्थान पाया जैसे मध्यस्थकी आवश्यकता थी वैसेही हुआ आपने यावत्स्थिति सांप्रदायिक द्वेष मिटानेकी सदा चेष्टा की। आपके सर्व श्रेष्ठ शिष्यश्री धर्मदासजी थे जिनके कि, वंशधर आजकी उनके पन्थकी गुरुआई कर रहे हैं तथा कमाल कमाली आदिके वंशधर भी आपके उपदेशोंका प्रचार कर रहे हैं। आज कबीर साहिबके पन्थके अनेकोंही ग्रन्थ हैं, जिनमेंसे अनेकोंको उच्च कोटिके हिन्दी दार्शनिक साहित्यमें संमाला जा सकता है पर ऐसा कोई भी ग्रन्थ नहीं था जिससे कि, दूसरे संप्रदायोंके आक्षेपसे कबीर पन्थकी रक्षा हो सके।
कबीर पन्थकी इस कमीको इस कबीर मन्शूरने पूरा कर दिया इसके लेखक महात्मा परमानन्दजीने इसे इस प्रोक्तासे लिखा है कि, इससे कबीर दर्शनके सिद्धान्त साङ्गोपाङ्ग पुष्ट बहो जाते हैं।
कबीर मन्शूरके विषय
भी अति उत्तमतासे क्रमपूर्वक समाविष्ट किये गये हैं उनकी क्रमपंक्ति पूर्वके साथ सम्बन्ध रखती हुईही चली है। जिस तरह अन्य सांप्रदायिक ग्रन्थ अपने अपने सिद्धान्तोंके अनुसार सृष्टि रचनासे प्रारम्भ होते हैं उसी तरह इस ग्रन्थमें भी सबसे पहिले अपने ढंगका सृष्टि रचनाका निरूपण किया है, सतयुग त्रेता और द्वापरमें संसारकी आवश्यकताके अनुसार सत्य पुरुषके दिव्य सन्देश देश देशान्तरोंमें सुनाकर कबीर साहिबने सबको सुखी किया यह बात दूसरी अध्यायमें गंनकी गई है। तीसरी अध्यायमें कबीर साहिबके कलियुगके प्रादुर्भाव हैं सबसे पिछले सिकन्दर लोधीके समयके प्राकट्यकी कथा है। व्यक्तिभावसे लेकर श्रीरामानन्दाचार्यजीके शिष्य होने आदिके वृत्तान्त विस्तारपूर्वक लिखे गये हैं। अध्यायों चारसे लेकर १२ तक उनकी दिव्य सिद्धियोंके दिखानेका विशद वर्णन किया है कि, किस प्रकार अपने नामसे मुरदे कमाल कमालीतकोंको पुनः जीवित करके अश्वद्वालुजनोंपर भी अपना पूरा प्रभाव प्रगट कर दिया था। इसके साथही साथ-कबीर पन्थके संस्थापक धर्मदासजीके व्यालीस वंश एवम् कमाल कमाली आदि बारह पन्थोंका
सामान्य परिचय, कबीर पन्थके धार्मिक नियम उनके भक्त एवम् पीर्वात्य और पाश्चात्य उपास्य देव ऋषि मुनि धर्माचार्य, यज्ञ पुस्तक एवम् उपासना आदिका साथही साथ विशद वर्णन किया है। अध्याय तेरहमें कबीर शब्दके अर्थ उनके विषयमें ऋषीयवरोंके वचन तथा अन्य प्रमाण दिये गये हैं। चौदह और पन्द्रह अध्यायमें कबीर साहबके लोमश आदि प्राचीनतम शिष्य, सत्ययुग त्रेता और द्वापरके हंस एवम् कलियुगके हंसोंका वर्णन विस्तारके साथ करते हुए कबीर पन्थसे भिन्न उन पन्थोंके प्रवर्तक शिष्योंका वर्णन किया है जिनके कि शिष्य आज कबीरसाहबको अपना आद्य आचार्य नहीं मानते। १६ वें अध्यायमें प्रकृतिजय और शरणागतके धर्म आदि अनेक उप-युक्त विषय वर्णित हैं। सत्रहवें अध्यायमें बन्धनके कारण मन कर्म आदिका विचार किया है। अठारहवें अध्यायमें पुनर्जन्मका वर्णन है जो पाश्चात्य अथवा चार किताबोंवाले पुनर्जन्मको आज हिन्दुओंकी तरह नहीं मानते उन्हें उन्हींके ही, धर्म ग्रन्थोंसे समझाया गया है कि, अपने श्रद्धेय ग्रन्थोंको विचार पूर्वक देखो। ये कारण पुनर्जन्म माननेके हैं। उन्नीसवीं अध्यायका जीव वैचित्र्य भी इसीका पोषक है उसमें अनेक तरहके संस्कारी जीवोंको केवल इसी लिये दिखाया है कि, पशु आदि योनियोंमेंसे भी पूर्व जन्मकी कर्त्तृकी फलसे कितना दिव्य ज्ञान दीख रहा है। बीसवें अध्यायमें कबीर साहबके दार्शनिक सिद्धान्तको सूक्ष्म रूपसे प्रतिपादन करनेवाले आदि मंगलको कह कर सार्वधार्मिक युक्तियों और धर्म ग्रन्थोंके प्रमाणोंसे जीवहत्या और मदिरा मांसका निषेध किया गया है तथा सब धर्मोंको बताया है। इक्कीसवीं अध्याय जीवके वर्णनमें ही पूरा हुआ है इसमें जीवके अच्छे बुरे स्वाभाविक उपकरण तथा औचित्य लानेके साधनोंके साथ सत्य-लोककी हंसा देहका भी वर्णन किया है इसके साथ मुक्ति होनेके अनेकों उपाय भी लिखे हैं। बाईसवीं अध्यायमें संसार भरके मजहबोंका विचार है। तेईसवीं अध्यायमें विविधोपदेशके गजल तथा चौबीसवीं अध्यायमें अनेकों विषयोंका प्रश्नोत्तरके रूपमें निर्णय किया है। इस तरह कबीर मन्शुरका यह परिष्कृत अनुवाद चौबीस अध्यायोंमें पूरा होता है। इसमें किसी भी मजहबका उपकारी कोई भी विषय बाकी नहीं रह जाता सभी आजाते हैं। उनके समन्वय करनेके बाद यह कबीर दर्शनको सोपपत्तिक पूरा करता है।
सृष्टि रचना — भी इस दर्शनकी अन्य दर्शनों की तरह भिन्न प्रकारकी ही है, कबीर साहबके हंस सत्य साकेत लोकवासी महाराजा विश्वनाथ सिंहजीदेव रीवां नरेशने आदि मंगलपर टीका की है, उसमें सृष्टि प्रकरण अत्यन्त सावधानीके साथ समझाया है कि, पहिले सत्यलोकवासी सत्यपुरुष भगवान् अकेलेही थे, वहाँके सब निवासी साहबके ही रूपके थे। उनके लोकका प्रकाश चैतन्याकाशमें पड़ रहा था यही समष्टि जीव है। इसपर साहबने दया की इसे शब्दसे चैतन्य करके अपनी ओर खींचनेकी इच्छा की। समष्टिजीवमें सुरति होगई इसके पीछे उसे अनेक होनेकी इच्छा हुई, क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और मैं ब्रह्म हूँ यह अनुभव हुआ। उसीसे जीव भी हो गया। जो इसे सारशब्दका उपदेश दिया गया था उसका इसने परा आद्या शक्ति, अक्षर, नारायण, संकर्षण और महाविष्णु अर्थ समझा—समष्टिजीवमें जो कारण रूपा इच्छा थी जिसने कि, इसे जगतमुख किया है। दूसरी इच्छा परा आद्या शक्ति है इसीको योगमाया भी कहते हैं इन दोनोंने ही अक्षर ब्रह्म किया है पर ये दोनों इच्छाएँ गुप्त हैं इन्हे कोई देख नहीं पाता। अनुभवगम्य ब्रह्म मैं हूँ यह बात समष्टि जीवके श्वाससे ही उत्पन्न होती है। आठों सिद्धियाँ भी उसीसे उत्पन्न हुई हैं।
आद्या शक्तिने संसारको बनाकर खड़ा कर दिया वही इसकी चोटी पर बैठकर इसे प्रकाशित कर रही है, अचिन्त्य रामके प्रेमसे ओम् का प्रादुर्भाव हुआ उसीसे चारों वेद उत्पन्न हो गये योगमायाने अक्षरको नींद दी। उस समय एक अण्ड पानीपर तैरने लगा। नींद बुलने के बाद आप
उसमें प्रविष्ट हो गया इसी भगवान् के नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ उसने ब्रह्माण्डकी जड़ बूट डालनेका प्रयत्न किया, नारायणने इसे ओम्का उपदेश दिया उसीसे वेद हुए इनका जगत्मुख अर्थ देखनेपर संसार बन गया। महाविष्णु या निरंजनसे ब्रह्मा विष्णु और महेश हुए। ब्रह्माण्डके प्राणी सुखके लिये प्रयत्न कर रहे हैं। पर सुखके साधनोंको बिना जाने सुख नहीं पा सकते। कबीर साहिब कहते हैं कि, फिर हमें जीवोंके उद्धारके लिये भेजा कि अपने उपदेशसे जीवोंको सुखी करो। यह आदिमंगल बीजकमें दिया हुआ है। हमने इसी ग्रन्थमें इसका अर्थ किया। इसकी तरह और भी इसी पन्थके ग्रन्थ कहते हैं।
दूसरे ग्रन्थों की—सृष्टि भी इससे ही मिलती जुलती हैं वे सत्य पुरुष से सहज, अंकुर, इच्छा, सोहम् अचिन्त्य और अक्षर पुत्र को प्रकट हुआ कहते हैं तथा आद्या भी इसी से हुई। सत्यपुरुष का छठा पुत्र अक्षर जब जलीय स्थलमें बैठता था उस समय योगमाया से उसे नींद आ गई। उस समय अक्षरके ध्यान एवम् सत्य पुरुष के शब्द से एक अण्ड बनकर पानी पर तैरने लगा। उसी से निरंजन की उत्पत्ति हुई।
अण्डसे निरंजन हुआ इस विषयमें तो श्रीविश्वनाथजीका मत भेद नहीं है किन्तु वे अक्षर को ही अण्डमें प्रविष्ट हुआ मानते हैं, इसने सत्य पुरुषके पुत्र कूर्मजीसे सृष्टि रचनाका सामान लिया। आद्या और इसकी जोट होगई इससे ही त्रिगुण ब्रह्मा विष्णु और महेश उत्पन्न हुए। आद्याने अपने अंशसे सुकुमारियां उत्पन्न कीं, जो कि, इन तीनोंकी पत्नियां बनी हैं। अक्षर पुरुषने वेद दिये निरंजनने पाये उससे ब्रह्माको दिये इसने इनका यथेष्ट प्रचार किया, वाकी सब रचना अन्य दर्शनों जैसीही है। इसी अध्यायके पन्चीसवें प्रकरणमें वेदके प्राकट्यको अन्य दार्शनिकोंके साथ मिलाया है तथा निरंजनको अग्निरूप सिद्ध किया है। दूसरे लोग तो सिकन्दर लोधीके समयमेंही कबीर साहिबका प्रादुर्भाव मानते हैं पर कबीर पन्थका ऐसा मन्तव्य नहीं है। वे कबीर साहिब तथा साहिबमें अभेद देखते हुए युग २ में कबीर साहिबका विभिन्न नामोंसे होना स्वीकार करते हैं एवम् सिकन्दर लोधी के समय के प्राकट्य को सबसे बाद का स्वीकार करते हैं।
जन्मके—विषयमें भक्तमालने तो कुछ लिखाही नहीं है। दूसरे २ उनके पन्थके ग्रन्थोंमें बहुत कुछ लिखा हुआ है उसमें बीजककी विश्वनाथी टीकाका मत भेद है। वे रामानन्दजी महाराजके दिव्य आशीर्वादसे एक सुपात्र विधवा ब्राह्मणीके गर्भसे प्रगट हुए बताते हैं पर काशीके लहर तालाबके किनारे नीमा नीरूको मिले। इस बातमें किसीका मतभेद नहीं है।
शेखतकीके कहनेसे सिकन्दरने आपके मारनेके अनेकों प्रयत्न किये पर किसी तरह भी उनके प्राण न लेसका वरन उनके अलौकिक चमत्कार देखकर धर्मन्धतासे निवृत्त होगया। इनके सामान्य धर्मके उपदेश तथा दोनोंकी समताके दिखानेसे सहृदयताका बीज बोया गया। इस बातमें किसीका भी मतभेद नहीं है। इस कबीर मन्थूरने इस बातको और भी आगे बढ़ाया है इसने वेदोंकी तरह हा मूसाको तोरत, दाऊदको जबूर, ईसाको इजील तथा मुहम्मद साहिबको कुरानका देना कहा है एवम् इनके ढंगकी सृष्टिकी उत्पत्ति भी दिखाई है। इतना ही नहीं किन्तु यह भी सिद्ध किया है कि, नाम भेद भले हों पर गुण कर्मके मिलापसे इस बातका पूरा निश्चय हो जाता है कि पौर्वात्य और पाश्चात्य दोनोंही एक विष्णुकीही उपासना करते हैं।
बलि दान में भी — सबका एक मत दिखाया है वेद और तोरत आदिमें उनके धर्मका आधार दिखाकर सर्व देशी सिद्धान्तसे इनका निःशेषही दिखाया है साथही कबीरजीका भी मत दिखा दिया है। सबके मत मतान्तरोंसे यह सिद्ध करके दिखा दिया है कि बलि और कूर्मानीकी आज्ञा असली परमात्माकी तरफसे नहीं है किन्तु भावनाके बनाये हुए ईश्वरकी ओरसे हैं यह अच्छी तरहसे समझा दिया है।
मुख्य उद्देश— तो यह था कि, हिन्दू मुसलमान आदि आपसके भेद भावोंको छोड़कर एक होजाय, एक दूसरेके धार्मिक भावोंका आदर करे व्यर्थ के पाषण्डसे निवृत्त होकर सच्चे धर्म ग्रहण करें एक दूसरेके वास्तविक तत्त्वको देखें मुख्यतः वे जीवहत्यासे बड़े दुखी थे यही कारण है उनके मुहसे ऐसे शब्द निकल जाते थे कि—“उनकी बहिष्कृत कहाँसे होइहै सांझहि मुरगी मारे” कि, जो दिन भर रोजा आदि रखकर रातको मुरगी मारते हैं उनकी बहिष्कृत कहाँसे हो सकेगी, इसी तरह देवी आदिके नामपर बलि करनेवाले हिन्दुओंसे कहा है कि—“सन्तो पांडे निपुण कसाई” है महात्माओं ! यह पांडे तो चतुर कसाई दीख रहा है। इस एकताको इस ग्रन्थने और भी आगे बढ़ाया है जो बातें आजतक विशेष समन्वयके साथ नहीं कही गई थी इसने वे भी दिखायी हैं।
आजतक किसी भी कबीर पन्थी ग्रन्थने इतनी सत्यता नहीं दिखाई थी, जो कि इसने दिखाई है। कलमेंका अर्थ करती बार बताया है कि, जब उस परमात्माको कृपालु और दयालु कहा जाता है तो फिर जीवहत्याकी उसकी आज्ञा नहीं हो सकती। इसी बातका हिन्दुओंकी ओर भी इशारा किया है कि जीववध मनोवृत्ति या वृणित स्वार्थोंसे है ईश्वरार्थ नहीं। इसी विषय पर पश्चिमकी चारों पुस्तकोंके मत दिखाये हैं तथा कुरानमें गौहत्याकी आज्ञाका अभाव दिखाते हुए गऊके शापसे याकूबकी दुर्दशाका वर्णन किया है।
मूर्तिपूजा— भी श्रद्धा विश्वासकी महत्ता समझाते हुए दिखाई है कि, भक्त मीराबाई भगवान् कृष्णको भोग लगाकर विषभी पीगई थी पर उसका उसपर कुछ असर न हुआ। इस विषयमें और भी कई प्रभावोत्पादक उदाहरण दिये हैं। इसी तरह अरबकी भी १ लात, २ मनात और गुरी नामक तीन कुर्शजातिकी प्रतिष्ठित देवियोंका उदाहरण दिया है कि, मुहम्मद साहिबने जब इनको तोड़ा तो मन्दिरमेंसे काली २ मूर्तियाँ स्त्रियोंका रूप धारण कर रोती हुई बाहिर निकलीं, इससे सिद्ध होता है कि, मुहम्मद साहिबके पूर्वज भी मूर्तिपूजा किया करते थे, मूर्तियाँ देखनेको ही जड़ती दीखती हैं वास्तवमें नहीं हैं, नहीं तो अरबकी देवीकी मूर्तियाँ स्त्री होकर रोती हुई क्यों निकलतीं। यही नहीं किन्तु इस ग्रन्थने उन आयतोंका उल्लेख भी कर डाला है जिनसे कि मूर्तिपूजा सिद्ध होती है इस प्रकार इसने इस विषयमें भी पूर्वात्य और पाश्चात्यों तथा हिन्दू और मुसलमानोंका एकसा मन्तव्य दिखाया है इस तरह यह पुस्तक कबीर पन्थी हिन्दू तथा मुसलमान सबके लिये समानही हितकारी है।
**जड़ोंकी बातचीत—**के पौराणिक प्रकरणोंको देखकर लोग उनकी सत्यताके सन्देहमें डूबा करते थे ऐसेही लोगोंके लिये कबीर मन्शूरने पश्चिमकी चारों किताबोंमें भी ऐसी ही बातें दिखाई है कि, आदमके पुतला बनानेके लिये मिट्टीलेती बार भूमि रोई कि मनुष्य बनकर बड़े पाप करेंगे तथा मुझपर बड़े पाप होंगे। वह जड़ भूमिका रोना पुरानोंकी तरह इसलामी पुस्तकोंमें भी देखा जाता है इसी तरह प्यालोंका आशीर्वाद भी है।
कबीर साहिबने अपने समयमें यह आवाज उठाई थी कि सबका परमात्मा एक है उनके बीजकमें एक शब्द है कि, “दो जगदीश कहाँसे आयें” दो ईश्वर कहाँसे आगये ? वो सबके लिये एक है। कबीर मन्शूरने कितनी ही जगह विस्तारके साथ सिद्ध किया है कि परमात्माको मानने वालोंका परमात्मा एक है उसके यहाँ हिन्दू मुसलमान आदिका भेद भाव नहीं है सभी उसके पुत्र हैं उसकी दृष्टिमें उसकी किसी भी सन्तानको सतानेवाला अच्छा नहीं है।
हिंसा और मछमांसके निषेध— पर चार वेद और बड़े २ सकल ऋषि महर्षि आचार्य और कबीर साहिबका मत उद्भूत किया है कि ये सब इन कर्मोंको कुकर्म तथा नरक देनेवाले मानते हैं ये सर्वतः हेय नारकीय कर्म किसी भी मतमें ग्राह्य नहीं है यहाँ तक कि ४० दिनके
बाद इनका सेवन करनेवाला मुसलमान भी काफिर होजाता है। यह कुरान आदिसे सिद्ध कर दिया है एवम् हत्याका बराबर बदला देना पड़ेगा यह मजहबी ग्रन्थोंसे सिद्धकर दिया है।
पुनर्जन्म और जीवोंके प्रकरणोंमें अनेकोंही आश्चर्य भरी बात आई हैं कि, जौनपुरके ताखा ग्राममें एक कायस्थके घर साँप बाबा घासीरामका जन्म हुआ एवम् आजीवन वे घरमें मनुष्योंकी तरह सर्प होकर ही रहे तथा उनके भाई तथा भाईके बेटोंने उन्हें अपना बड़ा माना और उनके अन्त्यष्टि संस्कार मनुष्योंकेसे हुए। पूर्वके संस्कारी अनेक पशुओंमें भी मानुषी भाषा तथा विचित्र ज्ञान होता है इस बातको अनेकों उदाहरणोंसे पुष्ट किया है।
यही क्यों? प्रत्येक विषयमें मनुष्य और ज्ञानवान् संस्कारी पशुओंकी भी समतासी ही दर्शा दी है जिनके ध्यान पूर्वक देखनेसे हृदयमें यह बात अच्छी तरह आजाती है कि, मनुष्य मनुष्यही एक जैसे नहीं पशु और मनुष्य भी एक जैसे हैं केवल अज्ञानके आवरणनेही उन्हें पशु बना रखा है वास्तवमें आत्मा एक है। उसने कहीं पशुका एवम् कहीं नरका चोला पहिन रखा है सबमें सत्य पुरुषका भजन हो सकता है जिन्हें बोध हैं वे सब अपनी २ भाषामें उसी मालिकका नाम जपा करते हैं।
प्रत्येक विषयके भावोंके आधार पर जगह २ ललित गजल आदि दे रखे हैं जिनसे वो विषय शीघ्रही हृदयगम हो जाता है इसके साथही साथ किसी शास्त्र वेद या पश्चिमकी पुस्तकको नहीं छोड़ा है जिनका कि कबीर पन्थी ग्रन्थोंके विषयोंके साथ मुकाबिला न किया हो। स्थल २ पर योग-सांख्य न्याय वैशेषिक और वेदान्त, कुरान बाइबिल जवूर और तोरैत आदिके प्रमाण दिये हैं जिनसे सबका समन्वय सहजही में हो जाता है। मार्मिक विषयोंका विवेचन कठिन होता हुआ भी लेखन शैलीसे इतना सरल बन गया है कि कोई भी समझ ले इतने पर भी विषयानुकूल किस्सों कहानियोंकी रोचकताने सोनेमें सुगन्धि करदी है।
पन्थ — अनेक हैं उनमें नारायणदासजी, यागीदासजी, सूरतगोपालजी, टकसारी, भगवान् दासजी, सत्यनामी, कमाली, राम कबीर, प्रेम धाम जीवा और गरीबदास इन बारहोंके बारहों पन्थ कबीर पन्थके अब भी अन्तर्गतही हैं आपसकी कसम कसीमें कहीं इनकी प्रशंसा तथा कहीं कुछ और ही लिखा है। नानक साहजी, दादुरामजी, शिवनारायणजी, पापदासजी, राधास्वामी तथा घीसाजीके पन्थोंको कबीर पन्थसे निकला हुआ माना है एवम् सिक्ख ग्रन्थके संस्थापक श्रीनानक देवजीको कबीर साहिबका शिष्य सिद्ध करनेके लिये अनेकोंही प्रमाण दिये हैं। राधास्वामी मतको भी कबीर साहिबके ग्रन्थोंपर अवलंबितही सिद्ध किया है तथा यह भी इसके साथ कहा है कि इन पंथोंके शिष्य आज साहिबको महापुरुष मानते हुए भी अपने पंथके आचार्योंको उनका शिष्य नहीं मानते।
स्वामी रामानन्दीजी साहिबके उन्हीं हंसोंमें थे जो कि युगारंभसे सत्य चर्या चलकर दिखा रहे थे अपने अनेकोंही व्यक्तियोंको सत्य पुरुषकी भक्तिका उपदेश दिया उन सबमें कबीर साहिबके मतका सबसे अधिक प्रचार हुआ। इसका एक यही कारण था कि ये स्वयम् उसी चर्यापर चलते हुए समान धर्मोंका उपदेश देते थे।
स्वामीजी अनन्य वैष्णव थे। साहिब स्वयम् वैष्णवोंके वानेमें रहा करते थे। कबीर मन्थूरमें स्वामीपरमानन्दीजीने इसे सतोषुणी एवम् मोक्षका दाता कहा है।
जन्म स्थान—का कहीं भी खुला उल्लेख नहीं किया है फिर भी स्वाभीजीके जन्म स्थान तथा रहन सहनपर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है स्वामी परमानन्दीजीने बाबा घासीरामजीके विवरणमें लिखा है कि, जौनपुरसे बारह कोश तथा मेरी जन्मभूमिसे पाँच कोश ताखा नामका गाम
है एवम् बाजीगरके विवरणमें लिखा है कि, मैं मेरे जन्म स्थान आजमगढ़में था वह मेरे विद्यो-पार्जनका समय था। जौनपुर और आजमगढ़ ये दो अवधके भिन्न २ जिले हैं जौनपुरसे १२ तथा अपनेसे पाँच कोश कहनेसे इनका जन्म स्थान इन दोनोंके बीच ताखा ग्रामसे पाँचकोशकी दूरीपर सिद्ध होता है। अवधवाला अवधको भी अपनी जन्म भूमि कह सकता है। इनकी शिक्षा आजमगढ़में हुई थी। सहपाठीके तहसीलदार होनेसे इनकी भी अंग्रेजीकी उच्च कोटिकी शिक्षा प्रतीत होती है। मोरके प्रकरणको देखकर इनकी एकात्म प्रियता तथा अनेक जगहोंके हाल लिखनेसे विदित होता है कि, इन्होंने खूब पर्यटन किया था तथा सेवके गायब होनेकी बातसे पता चलता है कि, धोखेसे उन्हें कबीर साहिबने दर्शन और फल भी दिया था। फीरोजपुरमें साधु होनेके पीछे आ विराजे इतनी बातका उनके ग्रन्थसे पता चल जाता है।
इनके दिलमें पन्थका सन्धा प्रेम था यही कारण है कि, इनका संग्रह संप्रदायके समर्थनसे सब तरह पुष्ट था। इन्होंने किसी भी धर्माचारोकी स्वतः विवेचना नहीं की है किन्तु दोनों तरहकी आलोचनाओंका संग्रहकर दिया है। इन्होंने सब धर्मोंके तत्त्वोंमें शरणागतिकोही मुख्य बताया है तथा अखिल धर्मोंके व्यक्तियोंको इसीको अपना लेनेका उपदेश दिया है। यद्यपि इन्हें खण्डनकी ओर विशेष प्रेम नहीं था पर विचार स्वातंत्र्यमें इन्हें किसी बातके कहनेमें कोई भयभी प्रतीत नहीं हुआ है, यदि सिद्धान्तकी दृष्टिसे देखा जाय तो।
खण्डन—भी उसी तरह प्रयोजनीय है जैसे कि, मण्डन है। सत् सिद्धान्तका प्रतिपादन बिना असत्यके खण्डन किये नहीं हो सकता। इसकी दो युक्तियाँ हैं। एक तो यह है कि, सबके ऐसे सत् सिद्धान्तोंको संमेलन पूर्वक सबके सामने रखना जिससे उसके प्रतिहन्दी असत् सिद्धान्त आपही खण्डित हो जायें। दूसरी रीति स्वयम् मुखसे कह कर करनेकी है जैसा की, आज कलके व्यक्ति प्रयोगमें लाते हैं। इस ग्रन्थमें दोनोंही शैलियोंका प्रयोग किया है। पूर्वीय और पश्चिमीय माने हुए सिद्धान्तोंको उन्हींके धर्म ग्रन्थों से खण्डित किया गया है तथा सत् सिद्धान्तोंके कबीर साहिबके वचनोंके साथ सबके सामने रखा है।
इस कार्यमें कहीं २ ग्रन्थ लेखकने जहाँ दूसरेके किये खण्डन जैसेके जैसे उद्भूत किये हैं वे उस लेखकोंके विमर्शीविमर्शोंको लेकरही आये हैं अतः उनके अविमर्शके कार्यों इस ग्रन्थमें भी वैसेही रह गये थे जो कि इसकी सार्वजनीकतामें कुछ दूसराही रूप करते थे। अनुवादकी दृष्टिमें जहाँ ऐसी बातें आई हैं उनसे ग्रन्थको जितना भी हो सका है निर्मुक्त करनेकी चेष्टा की है तथा विषम विषयोंपर टिप्पणी देकर जितनाभी हो सका है इसे सरल बनानेका भी प्रयत्न है।
प्रमाण तो—इस ग्रन्थमें प्रायः सभी सम्प्रदायोंके धर्म ग्रन्थोंके आये हैं जिनके कि नाम हम यहीं दिखाते हैं—चारों वेद छःओं दर्शन, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक, भारत, गीता, मनुआदिक स्मृतियाँ, श्रीमद्भागवत, देवी भागवत, कालिका पुराण, वसिष्ठ पुराण, शिवतंत्र और योग साधनाके ग्रन्थ इत्यादिकोंके तो हिन्दू धर्मशास्त्रोंके प्रमाण आये हैं। ईसाकी इजील, मूसाकी तोरैत, दाऊदकी जबूर तथा मुहम्मद साबहकी कुरानके भी अनेकों प्रमाण आये हैं इसके सिवा नबियोंकी पुस्तक तथा और भी कई इस्लामकी पुस्तकोंका उद्धरण दिया है। इसके सिवा सेखशादी आदि और भी अनेकों महत्त्वपूर्णोंके वचन उद्भूत किये हैं।
कबीर पन्थके ग्रन्थ—बीजक कबीर कसोटी, अनुराग सागर, अम्बुसागर, ज्ञान सागर, कमाल बोध, कबीर चरित्र बोध, श्वास गुंजार, कबीरवानी, कर्मबोध, जैनधर्म बोध, जीवधर्मबोध, अमर-सिंह बोध, वीरसिंहबोध, जगजीवन बोध, गरुडबोध, -हनुमान बोध, मुहम्मद बोध, सुलतानबोध
निरंजनबोध, आगम निगम बोध, ज्ञानप्रकाश, सन्तोष बोध, ज्ञानबोध आदि सभी कबीर पन्थके ग्रन्थोंके प्रमाण आये हैं तथा इनके सारासारकी विवेचना भी की गई है। इन्हीं ग्रन्थोंके आधार-पर वीरसिंह बबेले आदि अनन्य शिष्योंके भी जीवन लिखे हैं। तारीख आईनानुमा, इंडियन इम्पायर, नानक साहिबकी जन्म साखी, सारवचन, सैर आलम् फिजा, एवम् और भी कई एक इतिहास और जीवों संबंधी पाश्चात्य विद्वानोंकी पुस्तकोंका संग्रह है। इसके अनुवाद तथा संशोधन एवम् परिष्कारके समय और भी बहुतसे ग्रन्थोंकी अवश्यकता पड़ी थी। यह ग्रन्थ पौने दो साल पहले छपना शुरू हुआ था। कितनेही दिनोंतक अनवरत परिश्रम करनेपर प्रकाशित हुआ है। इसका सारा श्रेय विश्व विख्यात श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके सत्त्वाधिकारी एवम् खेमराज श्रीकृष्णदास नामके प्रसिद्ध फर्मके मालिक सनातन धर्म भूषण राय साहेब श्रीरंगनाथजी श्रीनिवासजी को ही है जिनकी प्रेरणासे इसका प्रकाशन हुआ। यही क्यों? आपने बहुतसा धन व्यय करके कबीर पन्थके बड़े २ ग्रन्थोंका संग्रह कर संशुद्ध कराकर प्रकाशित किया है।
इस ग्रन्थमें जिन कबीर पन्थी ग्रन्थोंका प्रमाण दिया गया है वे सब श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें प्रकाशित हैं। उनके सिवा और भी अनेकों ग्रंथ इस प्रेससे प्रकाशित हैं। यदि थोड़े शब्दोंमें कहें तो यह कह सकते कि, सनातन धर्मके ग्रन्थोंकी तरह कबीर पन्थके सांप्रदायिक सभी ग्रन्थोंके सौभाग्य प्राप्त करनेका श्रेय भी कबीर साहिबने आपको ही सौंपा है। इस पन्थका कोई भी ऐसा प्राचीन प्रतिष्ठित ग्रन्थ नहीं है जिसको कि खोज करके आपने प्रकाशित न किया हो। प्रायः सभी आपकी प्रेरणासे श्रीवेंकटेश्वर प्रेससे प्रकाशित हुए हैं। इस ग्रन्थ पर कबीर पन्थका अविचल अनुराग देखकर आपने “कबीराश्रमाचार्य परमार्थी वैद्य भारत पथिक स्वामी श्री युगलानन्द विहारीजी” से परिष्कृत हिन्दी अनुवाद कराकर प्रकाशित करना चाह्ता पर स्वामी पन्थकी अन्य सेवाओंमें व्यग्र रहनेके कारण दोसी बहत्तर पूछ तकही संपादन कर सके। इसके बाद मुझे प्रेरणा हुई। यह उक्त श्रीमानोंकी प्रेरणाकाही फल है जो इस ग्रन्थको इस रूपमें जनताके सामने रख रहा हूँ।
जब मैं सन्त महात्मा सत्य पुरुष पुरुषोत्तमके सच्चे प्यारे महाभागवतोंकी दिव्य तात्पर्य-मयी भव्यवाणियोंकी ओर ध्यान देता हूँ तो अपने अन्दर उनके जाननेकी कोई भी विशेषता नहीं पाता। यह उन्हींका दिया उत्साह एवम् उन्हींसे प्राप्त हुई धारणाका फल है जो उनके वचनोंपर विशेष विचार करता हुआ उनकेही अनुसार यह कर सका हूँ इसमें मेरी स्वयम् अपने आपकी कोई भी विशेषता नहीं है।
मानव जन्म गलतियोंके कारण है मनुष्यका हृदय गलतियोंसे भरा पड़ा है। जीवके सब साधन दोषसे ग्रसे हुए हैं। फिर इसके कामही निर्दोष हों यह आशा कभी नहीं की जा सकती पर एक निःपक्षपातिनी शुद्ध सनातनी, कबीर साहिब पर हुई श्रद्धाकी कृति समझ दोषोंको क्षमा करते हुए इसके सार पदार्थका ग्रहण करेंगे यही कबीर पन्थी भारतके सभी सांप्रदायी लोगोंसे सतत अभिलाषा करता हूँ।
आपका विनीत;
सर्वतन्त्र स्वतंत्र रिचर्स स्कालर,
पं. माधवाचार्य.