कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बो वेंकुण्ठ नहीं जा सकता । चाहें लोग उसपर विश्वास करें कि, यह महात्मा हो गया इससे क्या है ? वो राम क्या अनजान है जिससे वो छिपजाय । एक रामकी पूजा तथा रामनाम एवं रामके लिये नमन करना ही सच्चा है । सिवा इसके कोई दूसरा देव नहीं है । इससे कल्याण हैं । यदि केवल स्नानसे ही कल्याण होजाय तो मँढक तो रातदिन पानीमें पड़ा रहता है क्यों न मुक्त हो जाय तो फिर २ मँढकही बना करता है । इसी तरह वो मनुष्य भी फिर २ कर योनियोंमें फिरता रहता है । मन तो कठोर पाप करनेमें लगा है फिर नरक क्या पांचमां (या ढाँटा) जायगा । भगवानके गुणानुवाद गानेसे तो वित्त अकुलाता है पर इसकके गन्धे गानाके सुनने में सारी रात बिता देता है । जहाँ सत्यपुरुष विराजते हैं वहाँ रात और दिन दोनों ही नहीं हैं, यानी वहाँ कालकी गति नहीं है, न वहाँ विधि-निषेधके शास्त्र ही हैं । कबीर साहिब कहते हैं कि, मैं तो उसीका ध्यान करता हूँ । यह संसार तो बाहिरिया बेकाम हैं मुझे इससे क्या लेना है ?
मैं किसको कहूँ, कोई न सुनता न मानता, सबकी बुद्धिपर परदा पड़ गया है । एक न भूला दो न भूला सारा संसार भूला पड़ा है, सब अचेत होगये, किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं रही । सब अंधेरीराजाके वशमें आगए इस राजाके मंत्रियोंकी जो दुष्ट बुद्धि है वह सर्व बुद्धिकोंका उपदेश दिया करती है । दोनों साधु जो विचार तथा विवेक हैं उनको मटियामेट किया चाहती है, वे दोनों अपनी बुद्धि-मानोसे बच निकले । कोई मनुष्य हो उसके हृदयके किसी कोनेमें छिपकर दोनों रह गये हों तो वह सोचे तथा समझे कि, जहाँ टका सेर घास मिठाई बिकती हो वहाँ कुशल नहीं है, यहाँके मनुष्य अंधे हैं इनमें तनिक भी सोच विचार नहीं । वे गुरु साधु तथा परमेश्वरको क्या पहचानें ? उनके निमित्त वासनाओंकी फाँसी खड़ी है सब उसके ऊपर लटककर मरते हैं, मर गए और निश्चय मरेंगे ।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह सब फँसनेवालोंके लिये फाँस बनाये गये हैं । सब दौड़ दौड़ कर आपसे आप इस जालमें फँसते हैं । जिसने तन मन धनसे प्रेम किया, मिटनेवाली वस्तुसे मंत्री जोड़ी वह मरेगा । जिस किसीको परमेश्वरने मंत्री प्रदान की वही समझे कि, उत्पत्तिके आरम्भमें केवल एक अण्डा वासनासे भरा हुआ उत्पन्न हुआ था । इसी कारण वह फूटा, आनन्द लेनेके निमित्त उसने सूक्ष्म शरीर धारण किया । यह शरीर कामक्रोधादिकके बंधनमें जबतक पड़ा है और जबलों सांसारिक आनन्दोंका ध्यान है, शरीरकी रक्षा चाहता है तबलों बंधनमें पड़ा रहेगा । मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम जब अवनकी
वाटिकामें था तब आयुषके वृक्षके फलको खाता था । जब उसने गेहूँका दाना खाया तब उसको शौचकी आवश्यकता हुई । तब परमेश्वरने उसको वैकुण्ठसे बाहर निकालकर कहा कि, यह वैकुण्ठ शौच तथा लघुशंकादिककी जगह नहीं है । अब तू पृथ्वीपर जा ; इस प्रकार यह पृथ्वी मुक्तिकी कामना रखनेवालोंके निमित्त नहीं है ॥
पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड ।
ब्रह्माण्ड और पिण्डका एकही स्वरूप है तनिक भी विभिन्नता नहीं हैं । दोनों की एकसी अवस्था है तनिक भी घट बढ़ नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें जल है इस जलके बीच विचित्र कौतुक बना है । यह ब्रह्माण्ड भवसागर कहलाता है । इसमें ऐसे कौतुक हैं जो मनुष्योंके अनुमानमें भी आ नहीं सकते । उत्पन्नके पूर्व जल था, इस जलमें एक बुल्ला उठा । अण्डेके स्वरूपमें वह जलपर उतराता फिरता था । सो जलही जल था । वह बुलबुलाभी जल था । जो कुछ जल तथा बुलबुलेमें था सो भी सब जलही था । जल और बुलबुले सब स्थानोंमें परमेश्वरकी आत्मा थी । वह बुलाबुला अर्थात् अण्डा फूट गया । यह ब्रह्माण्ड एक बड़ी नदी है । पिण्ड बूंद हैं, जो कुछ नदीमें है उसीके सामान बूँदमें हैं । नदी बूँद है, तथा बूँद नदी है । लोक तथा वेद इस नदीके दो किनारे हैं । भौति भौतिकी इच्छाएँ हैं, यहाँ श्वासमें जल भरा हुवा है । जब दोनों एक ठहरे तब उचित है कि, प्रथम अपने पिण्डकी अस्थिके जाननेका उद्योग करें । जब पिण्डकी सुध होजायगी तब समस्त ब्रह्माण्ड का समाचार जानलिया । जायगा । जिसने अपने पिण्डका वृत्तान्त नहीं जाना वह ब्रह्माण्डका तनिक भी वृत्तान्त नहीं जान सकता । जो अपनेको न जाने वह परमेश्वर को क्या जान सकता है ? दोनों का समाचार पारख गुरुके अतिरिक्त और कोई दूसरा बतला नहीं सकता । पाँव पाताल सो सातवीं पृथ्वी है । पाँवकी पीठ सो छठी पृथ्वी है । पाँवकी उँगलियाँ सोई असुर हैं । पैरके नाखून सो असुरोंकी सवारी हैं । अष्टालिङ्ग सो पाँचवाँ महातल है । एड़ी चौथा तलातल है । ठिगुनी सो तीसरा सुतल है । जाँघ, सोई तल है । जो पग हैं सोई पहला अतल है, यही भूमि है । लिङ्ग प्रजापति है । स्त्री तथा पुरुष जब दोनोंका वीर्य स्थलित होता है, तब पृथ्वी और आकाश मिलते हैं, तभी वीर्यवृष्टि होती है । चूतङ्गका सिरा सोई प्रभातकी उज्ज्वलताका आरम्भ है । जो पहले दिखाई देता है श्वेतरेङ्ग है । जो मोटी मांस है सो माया है । वह दयालु हैं । जो नाभिकी गम्भीरता है वो समुद्रका घेर है । उधर तो झड़ा अग्नि है । इधर बडवा अग्नि है । समस्त नसें नदियाँ हैं और जो पेट है बही
अकाल पुरुषके धार्मिक नियम
भवदर लोक है । बालभोग छोटी महाप्रलय है । प्यास बड़ी महाप्रलय है । हृदय पृथ्वीके ऊपरका स्वर्ग है । इधर वैजयन्ती माला है । उधर नक्षत्रगण वैजयन्ती माला हैं और दाहिना कुच वह है जो भोगनेके पूर्व दान देवे और बाँया कुच वह है जो भोगनेके उपरान्त दान देवे । जहाँ तीनों गुण मिलते हैं वह हृदयकी इच्छा है । वही ब्रह्मा है । पालन करना ही विष्णु है ।
इसमें जो क्रोध है वो रुद्र है । हँसना तथा प्रसन्न होनाही माया है । इसमें ज्ञान है वही दुःखका दूर करनेवाला है । प्राणही हवा है और पीठ बुरी करनी है । जो पीठका हाड़ है सोई पहाड़ है । जो बाएँ दाएँकी पसुलियाँ हैं वेही हिमालयके इधर उधरके पर्वत हैं । दाहिना हाथ उदारता और वृष्टि है । बाँया हाथ कञ्जूसी तथा सूखा है । हाथकी रेखा अर्थात् चिह्न अप्सरागण हैं । हाथके नाखून दूतगण हैं और हाथका जोड़ा आरञ्जपर्व्यन्त सोई अग्निलोकपाल हैं । बाँया जोड़ा इंक देवता पूर्व तथा उत्तरका है । आरञ्जसोई कल्पवृक्ष है । दाहिना मोड़ा सो दाहिना ओर है । बाँया मोड़ा सो बाँया ओर है । ग्रीवाका मोड़ा वरुण देवता है । गला सो महर्लोक ऊपरका स्वर्ग है । अच्छी बुद्धि अनहद शब्द सो महर्लोकके ऊपर है सोई ब्रह्म लोक है । सासारिक कामना सोई कष्ट दुःख है । नीचे का होंठ लालच है । ऊपर का होंठ लालच लज्जा है । तालुवाणी है । जिह्वा अग्नि है । वार्तालाप सरस्वती है अर्थात् जिह्वा है और दाँत सो मोर हैं, समस्त लोग जो खाते हैं वही भोजन है । इधर वाणी है और उधर चारों वेद हैं । इधर हँसी और उधर माया तथा मायाकी रचना है इधर दोनों कान हैं और उधर दिशाएँ हैं । इधर नाकके दो छिद्र हैं और उधर अश्वनीकुमार हैं । जो शरीरकी बू है वह पृथ्वी है । दाहिनी आधी देह सो पाँचवाँ यमलोक है । आधी देह जो उत्तरकी है वो छठवाँ तपलोक है । मस्तक बल अर्थात् मस्तकपरके जो चिह्न हैं सो प्राकृतिक तेज है । जो आरम्भ की उत्पत्ति उसका वह सूर्य है । आँखोंका खुला रहना वो सृष्टिकी रचना है । पलकका जो मारना है वही दिनरात है । जो दाहिनी ओरकी भौँ है सो प्रीत देवता वो महतर है, जो बाईँ ओरकी भौँ हैं वह क्रोध देवता है । जो माथा है सो तपलोक है । वह जन लोकके ऊपर है, सोई लोका लोक है । वह समस्त लोकोंके ऊपर है । जो शिरके बाल हैं वही काले बादल हैं । इधर शरीरके बाल हैं । इधर वृक्ष तथा हरियाली है । जो सौन्दर्य है वही लक्ष्मी है, जो शरीरकी चमक है वोही सूर्यका प्रकाश है । संसारमें जो देह है वो समस्त देह महापुरुषके घर है, आत्मा सोई चिदा-
बलिप्रदान
नन्द है । ज्ञानी पुरुषका देह महलमें रहता है । जब नीचेको दम जाता है तब समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । जब दम रोकता है तब समस्त संसार हरा भरा होता है । जब श्वास ऊपरको छोड़ता है, तब महाप्रलय होजाता है ।
नाकशाह और जन्दाका सम्बाद ।
नान० — तीन लोककी कहो गोसाईं । कैसे जान परै तनमाहीं ॥
जन्दा० — पीठ चरन हैं शीश अकाशा । तीनलोक देही परकाशा ।
शब्दखण्ड ब्रह्मण्डमें सोई । माया ब्रह्म फैल घट दूई ॥
हमरे पदको लखै न कोई । भली बूझ तुम पारख होई ।
नान० — चार दिशा कहु मोहिं गोसाईं । सात द्वीप मोहिं कहु बुझाईं ॥
जन्दा० — आगा पीछा दक्षिण वामा । चार दिशा देही परमाना ।
साढ़ेतौन हाथकी देही । उनचास कोट विष खाई एही ॥
नवों खण्ड नौ सन्धी जानो । पिण्ड अण्डको लेखा मानो ॥
पर्वत यामें हाड़ लगाया । ढर पानसो ब्रह्मण्ड रचाया ॥
चन्द्र सूर्य दुइ नेत्र जगावा । देखे पीठ सुमेरु बतावा ॥
तिम नदिया तन भीतर जानो । पेट गँडा पिण्डमें मानो ॥
नान० — तत्त्वप्रकार कहे तुम बानी । ताकी सांध शब्द पहचानी ॥
सात समुन्दर कहो बखानी । तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥
जन्दा० — जीभ नासिका नेत्र बखानो । श्रवण नाभि गुद इन्द्री मानो ॥
क्षार मीठ जल सब पहचानो । नौ सौ नदी पिण्डमें मानो ॥
श्वासानदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रसखासा ॥
ये समुद्रमें जाय समानो । है गण्डार नहीं तृप्तानो ॥
नान० — सात समुद्रकी लहर परवानो । उनकी लहर कौन विधि मानो ॥
जन्दा० — काम क्रोध अरु लोभ हँकारा । मनउ मायाकी लहर अपारा ।
अग्नि पवन पानी परचण्डा । पाँच तत्त्व करते नौखण्डा ॥
नान० — वाहि लहर हीरा औ मोती । यामें कहा निकस है सोती ॥
सबहि भेद मोहिं कहु गुरु देवा । नहिं छोड़ूँ अब तुमरी सेवा ॥
जब गुरु मिले बहुरैंग समरङ्गा । ब्रह्म ज्ञान ऊँचे सत्संगा ॥
सुमिरन भजन होय परकासा । अनहद ध्यान पुरुषकी आसा ॥
अर्श गैवमें ध्यान लगावे । तब वा सिध बाह कोई पावे ॥
जाय हंस तहैं डुबकी मारा । तबले निकसी वस्तु अपारा ॥
हीरालाल नाम परकासा । शब्द सुरत हंसाको वासा ॥
यज्ञ शब्दार्थ, नरमेघ अश्वमेघ, गोमेघ
कहता समाज निकसे है जानो । सो हीरा मनि माणिक जानो ॥
यथा — क्षार मीठ जल यहाँ अपरा । वहाँ कहाँ गुरुकर निर्धारा ॥
जन्दा० — नैन नाक इन्द्री जल खारी । गुदा श्रवण जानो जलधारी ॥
क्षार मीठ जल सबहीं भराही । जो ब्रह्माण्ड सो पिण्ड कहाही ॥
नान० — यहाँ तो काठ लोहकी नौका । कहो स्वामि व्यौहार वहाँका ॥
जन्दा० — पुरुष नाम नौका यहँ भाई । खेवट सद्गुरु संत मिलाई ॥
पुरुष शब्द सुमिरौ लौ लाई । पुरुष प्रताप उत्तर चल भाई ॥
नान० — वाह गुरु समरथ' वाह गुरु जन्दा । काट देव तुम भवजल फन्दा ॥
धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । अमर भेद भाखी निजवानी ॥
समर्थन ।
केवल भारत वर्षीय ज्ञानी गणही इस बातको मानते नहीं हैं कि, जो कुछ पिण्ड है वही ब्रह्माण्ड है । बरन् अरब यूनान मिश्र और अलीमानके सब ज्ञानियों का ऐक्य है कि पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों समान हैं, तनिक भी विभिन्नता नहीं । वे लोग भी कहते हैं कि, हाड़ पर्वत हैं, पसीना निकलना बृष्टिका होना है । समस्त पशु और देवतागण दोनोंमें एकही ढङ्गसे भरे हैं । समस्त चरनेवाले उड़नेवाले और फाड़नेवाले दोनोंमें एक समान बसे हुए हैं । ऐसाही सेवक परिश्रमी भजद्वर इत्यादि दोनोंमें एक समान हैं जो पाचक शक्ति है उसको बबरची बोलते हैं । जो बल अंतडियोंमें भोजन रखता है उसका नाम गन्धि है, जो बल रक्तको श्वेत करता है, स्त्रीके स्तनमें दुग्ध और मर्दके फोतामें वीर्यको श्वेत करता है उसको धोबी कहते हैं । जो बल शरीरके अङ्गमें भोजन बाँटता है उसका नाम बंधानी है । जो बल जलको श्वेत बनाकर बाहर निकालता है वह भिश्ती है । जो बलविशेष को बाहर निकाल डालता है वह हलालखोर है । जो बल वायु तथा पित्तको भीतर रखता है सो न्यायी है । जो क्रोध है वह भेड़िया है । ऐसाही समस्त बनाव पिण्ड तथा ब्रह्माण्डका है सब एक है उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं ।
प्राचीन कालके लोगोंका तो यही सिद्धान्त है । अब हालके लोगोंको बातें सुनो कि, अंग्रेजीकी पुस्तकें जो मैंने देखीं तो उससे प्रगट है, नेचुरल डिक्शनरी और नेचुरल हिस्ट्री इत्यादिको भलीभाँति ढूँढ़कर देखो तो समस्त विद्वान इस
१ पहिले जो विषय कहा गया है, कि पिण्ड और ब्रह्माण्ड ये दोनों एक हैं इसी विषयकी पुष्टिमें कबीर नानक शाहका संवाद लिख दिया है जो कि, नानक बोधमें लिखा हुआ है । पहिले जो कुछ पदार्थ कह दिया है वो इसका विस्तृत अर्थ है इस कारण इसका अर्थ नहीं करते ।
उष्ट्रमेघ, मेघमेघ, मृगमेघ
बातको मानते हैं, यही बात प्रमाणित करते हैं और दोनोंहीकी एकही सूरत और एकही वास्तविक ढङ्ग है ।
प्रलयकी समानता ।
इस बातपर तनिक भी विचार न करके यहूदी, ईसाई और मुसलमान तीनों भ्रममें पड़े हुए हैं जो कहते हैं कि, मनुष्यकी बुराई भलाईका निर्णय महा-प्रलयके समय होगा । इसका यह कारण कि, आज मनुष्य परमगतिको प्राप्त हो, उसका हिसाब आजसे कोट्यानुकोट वर्षके उपरान्त हो दोनोंका प्रलय तथा महाप्रलय पृथक् पृथक् तथा एकही स्वरूपके हैं । ब्रह्माण्डका प्रलय तब है जब समस्त मनुष्य पापसे भर जाते हैं । जब पापिष्ठी हुए तब मृतक समझे जाते हैं । पापोंके कारण भयानक चिह्न भी परिलक्षित होते हैं । सबके सब मटियामेट भी होजाते हैं । यह ब्रह्माण्डका प्रलय तथा महाप्रलय है । पिण्डका प्रलय तथा महा-प्रलय उसके साथ है । पिण्डका प्रलय तो तब है जब मनुष्य मृत्युशय्यापर पड़ता है, जब वह न जीवित रहता न मरही जाता है, उसके भीतर बाहरी समस्त बल स्थिर होजाते हैं । आँख तो रहती हैं, पर सूक्ष्मता नहीं । कान खुले रहते हैं, पर सुनता नहीं, जिह्वा रहती है, पर बोलता नहीं । श्वास चलता रहता है, पर मुरदा समझा जाता है । केवल देखनेके निमित्त वह जीवित समझा जाता है नहीं तो मुरदा हो चुका । न मुर्दोंमें एवं न जीतोंमें ही गिना जाता है । यह पिण्डका प्रलय है । जब शरीरसे प्राण पृथक् होगा तभी महाप्रलय होती है ।
पाप पुण्यका हिसाब ।
जब कोई मरता है उसी समय उसका हिसाब होता है । पिण्डका प्रलय जब होता है उसीको मुसलमान लोग कब्रका कण्ट कहते हैं । प्राण निकलनेके समय यह नरक वेंकुण्ठ कण्ट सुख सबका अनुभव कर लेता है । जबलों जीवका हिसाब नहीं होता इस मध्यवर्ती समयमें यह सब कौतुक देखता है उसको ऐसा जान पड़ता है कि, मेरे भोजनके निमित्त उत्तमोत्तम पदार्थ और आनन्द सम्भोग के सामान हैं भले ये आदमियोंको दिखलाई देते हैं । जो पापिष्ठी होता है, उसको भयानक नरककी समस्त यंत्रणाएँ दिखाई देने लगती हैं । नरक तथा वेंकुण्ठका समस्त कौतुक दिखलाई देता है । हिन्दू धर्मावलम्बी तथा मुसलमान लोग इस कब्रके कण्टको सविस्तार रूपसे कहा करते हैं । जब जो कोई मरता है उसी समय उनकी भलाई बुराईका हिसाब होता है । ऐसा नहीं कि, आज मरे और हिसाबके निमित्त ब्रह्माण्डके महाप्रलयमें पाप पुण्यके लेखोंकी आशा रखे । यह केवल भ्रम मात्र है । हाँ ब्रह्माण्डके प्रलयके साथ जितने जीव मिटेंगे उनके लेखाका
अजमेघ, बलि प्रदानकी रीति
हिंसाबका ध्यान मूसलमान लोग किया करते हैं। इस बातपर मैं एक उदाहरण देता हूँ :—
उदाहरण :—एक नगरमें कोई बड़ा बादशाह अथवा साहूकार हो, इस बादशाहकी समस्त प्रजा जो नगरमें बसती हो सब ऋषि हो, उन नगरवासियोंमेंसे कुछ एक नगरको छोड़कर किसी दूसरे स्थानको जावे अथवा भाग जाना चाहे तो उस नगरका राजा उन भगोड़ोंका हिंसाब उसी समय लेगा या जब समस्त नगर भाग जावेगा तब लेखा लेगा। निस्संदेह वह राजा उनको कदापि न जाने देगा, जबलों उनका पूरा हिंसाब न कर ले. अतः प्रत्येक दिवस तथा प्रत्येक क्षण प्रलय और महाप्रलय होता रहता है। जो लोग इस बातको नहीं मानते और सदैव आवागमनका सिलसिला नहीं समझते तो जो कुछ उनका विश्वास और ध्यान है, उसीके अनुसार उनका हिंसाब होगा। जैसा कुछ उनका ध्यान है इसीके अनुसार उनको दिखाई देगा। पर सत्य किसीके बशका नहीं है।
यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या झूठ एवं व्यर्थके बाँधनू हैं पिण्ड ब्रह्माण्डके समस्त पदार्थ झूठे हैं जो साम न पिण्ड और ब्रह्माण्डमें हैं वे सब बाँधनूमात्र हैं। बेजड़के तथा अस्थायी हैं, जिसने गुरु तथा पीर पिण्ड ब्रह्माण्डके भीतर खेल रहे हैं वे दूसरोंको खेला रहे हैं। समस्त कौतुक जलका बताशा है उसकी कोई जड़ तथा स्थिरता नहीं। समस्त खेल कौतुक जादूगरीका है। निरञ्जनकी जादूगरीमें समस्त ऋषि मुनि पड़े डुबुकियों लगा रहे हैं। जबतक अपने प्राकृतिक स्वरूपका ज्ञान न होगा तबतक समस्त जीवोंकी यही दशा रहेगी। ज्ञान केवल पारख गुरुद्वारा प्राप्त होवेगा दूसरेसे नहीं।
ब्रह्माण्ड पागलखाना है।
इस ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंहीका एक स्वरूप है। कुछ विभिन्नता नहीं। एक घेराव अण्डाकार है दूसरा घेराव उससे छोटा अण्डाकार है। कभी तो पिण्ड ब्रह्माण्ड बन जाता है। कभी ब्रह्माण्ड पिण्ड बन जाता है। जब इस पिण्डमें वह विद्या होती है तो यह ब्रह्माण्ड बन जाता है। जब इसकी विद्या जाती रहती है तब फिर यह पिण्ड हो जाता है। जब इसका ज्ञान न्यून हो जाता है तब इस ब्रह्माण्ड अर्थात् समष्टि जीवको अपना सर्जनकर्ता मानने लगता है। इस जीवको इस ब्रह्माण्डके भीतर सैकड़ों प्रकारके सैर और कौतुक दिखाई देते हैं जितने जीव इस ब्रह्माण्डके भीतर बंद हैं वे सबके सब बँधे हुए तथा पूरे पशु हैं। इनमें तनिक भी मनुष्यता नहीं है। जिनको मनुष्यताका ज्ञान हुआ वे ब्रह्माण्डके पार चले जाते
हैं, फिर वे बंधुवे नहीं रह सकते । जितने गुरु तथा चले इस ब्रह्माण्डके भीतर रहनेवाले हैं वे सब अपने असलसे अनभिज्ञ हैं, वे अनजान अनजानोंसे सूचना देते हैं । जो अंधे अंधोंको पथ दिखलाते हैं वे दोनों कुएँमें गिर पड़ते हैं । गुरु और चले दोनोंमें से एकको भी सुध नहीं कि, वास्तवमें बात क्या है ? यह ब्रह्माण्ड पागलों का घर है । पागलोंका काम पागलोंसे पड़ रहा है । भौति भौति के कौतुक हो रहे हैं । पागलपनकी अवस्थामें सहस्रों प्रकारके कौतुक तथा पाप पुण्य सभी कुछ कर रहा है । इनसे नितान्तही अनभिज्ञ है कि, भलाई बुराई तथा नरक वैकुण्ठ क्या वस्तु है ? जो कुछ मैं मान रहा हूँ सो क्या है ? यह अपनी अवस्थाको बिलकुल जान नहीं सकता । न चिन्ता तथा सोच करता है । न समझता है न सच्चे गुरुका उपदेश स्वीकार करता है अपने अज्ञानमें अपनेको ज्ञानी जानता है । अपनी दुर्बुद्धितापर तनिक भी ध्यान नहीं देता । जैसे मनुष्य अपना मुंह अपनी आँखोंसे देख नहीं सकता है । इस कारण दर्पण जब सामने रखता है तब अपना मुंह देखता है । वह मूर्ख है जो बिना दर्पणके अपना मुंह देखना चाहता है । इसी प्रकार यह मनुष्य अपने यथार्थ स्वरूपको देखने जाननेके निमित्त सदैव सत्य-गुरुके अधीन है । कारण यह कि, ब्रह्माण्ड पागलखानेके सदृश है । समस्त जीव इसमें जन्म भरके लिये बंधनमें पड़े हैं । जबलों उनको ज्ञान न हो जावेगा तब लों वे उसीमें पड़े रहेंगे । जब उसका ज्ञान ठिकाने आवे यह आपको तथा अपने मित्रोंको भली भाँति पहचाने सच्चे वैद्यकी कसौटीमें पक्का उतरे तब यह इस पागलखानेसे बहिर्गत किया जावे उसका एक उदाहरण मैं देता हूँ—
उदाहरणः—सन् १८४४ ईस्वीमें मैं काशी नगरीमें था काशीका पागल-खाना नगरसे बाहर बहुत दूर बना हुआ था । एक दिवस मैं उस पागलखानेके देखनेको गया जब उसके घिरावके भीतर गया तो बहुतसे पागल दिखलाई दिए । वे सब भौति भौतिके कौतुक कर रहे थे । कोई गाता, कोई नाचता, कोई हँसता, कोई रोता, कोई भूमिपर लिखता, कोई मुहँपर कालिखमल कर हँसता तो हँसताही जाता । रोता तो रोताही जाता । अनेक प्रकारके कौतुक हो रहे थे, मैं कहौतक लिखूँ ! कोई बकता है तो बकताही जाता है । कोई आनकर मुझसे बुद्धिमानीकी बातें करता है किसीमें थोड़ा पागलपना है किसीमें अधिक । अनेक प्रकारके पागलपनोंके ढङ्ग दिखाई दिए कैसे रङ्ग मैं देखता फिरा । वहाँपर एक राजाका पुत्र मुझको दिखाई दिया जो पूर्वकालमें मेरा परिचयी था । वह एक बड़े सुधर मकानमें था । उसके चारोंओर नौकर चाकर फिरते थे । जब मैं उसके पास गया तो वह बुद्धिमानी बातें करने लगा । मेरे
११ अध्याय । पश्चिमकी पुस्तकें । मूसाकी पुस्तकें
सामने प्रत्यक्षमें उसका पागलपना तनिक भी जान नहीं पड़ा। पर जब उस-पर पागलपना सवार होता था, तब बड़े उपद्रव मचाया करता था। उन पागलोंमेंसे कोई आकर मेरे साथ भली भली बातें करता। प्रत्यक्षमें तनिक भी पागल मालूम नहीं होता था पर यथार्थमें वह पागल था। उन पागलोंकी सूरत देखकर उनकी अवस्थापर मुझे खेद हुआ। डॉक्टर साहब उनकी औषध करते थे। कुछ लाभ न होता था। क्योंकि, जिसपर उस बड़े वैद्यकी दया हो वही आरोग्य होकर उस घरसे बाहर निकाला जावे।
पागलोंके काम।
एक दिवस ऐसा हुआ कि, गरमियोंका दिन था। उस पागलखानेका जो जमादार था, वह अचेत सो रहा था। दिनके समय वह अकेला पड़ा था। उसका मुहँ खुला था। उसके दाँत दिखाई देते थे। उसी समय एक पागल उसी स्थानपर आ पहुँचा एवं कहने लगा कि, तू मेरे ऊपर हँसता तथा ठट्ठा करता है ! मैं तुझको मारूँगा यह कह एक कक्कड़ उस जमादारके मुहँ पर इस जोरसे मारा कि, उसी समय वह मर गया। उस पागलको तनिक भी सुध नहीं कि, मैंने बुरा काम किया अथवा भला। यदि उसको भले बुरेका ज्ञान होता तो वह ऐसा कार्य कदापि न करता। लोगोंकी जानमें तो उसने बुरा किया पर अपनी समझमें भला किया। कारण यह कि, उसने अपने बैरीको मारा जो उसपर हँसी ठट्ठा कर रहा था।
यहाँ इस उदाहरणसे मेरा तात्पर्य है कि, इस ब्रह्माण्डमें जितने जीव रहते हैं वे सब उन पागलोंके सदृश हैं जो जमादार और सिपाही हैं वे सब गुरु और पथप्रदर्शक हैं और राजकुमार वह है जो योगीसे जगदीश्वर हो गया है। वह भी उसी पागलखानेमें बंद है उस पागलपनेमें एक दूसरेको मारते मरते हैं। एक मनुष्य तो अचेत सो रहा है। दूसरा उसका दाँत निकला देखकर जानता है कि, वह उसके ऊपर ठट्ठा करता है। उसको अपना बैरी समझकर मारता तथा हत्या करता है। इसी प्रकार इस संसारके समस्त मनुष्य एक दूसरेके बैरी बन रहे हैं। एक धर्मका मनुष्य दूसरे धर्मवालोंको दुःख पहुँचाता है अपनेको भला तथा सच्चा जानता है। इस पागलखानेसे जिसको सत्ययुग बाहर निकले वे सुख पाते हैं। कबीर साहबने मुहम्मद साबको पाँच कलमे पढ़ाये। वे केवल चार कलमें संसारके निमित्त कहे बाकी एक उनके लिये कहा।
काम क्रोध लोभ मोह अहंकारादिकी कामनाओंसे यह पागलखाना भरा है। चारों अवस्था जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति तुरीया इनसे तुरीयातीत भिन्न हैं।
यह समस्त अवस्था जीवके बंधनके निमित्त ठहराई हैं । जबतक इन अवस्थाओंमें रहेगा तबतक बराबर फँसा रहेगा । कर्म, उपासना, योग और ज्ञान इत्यादि सब आज्ञानावस्थामें कर रहा है । जितने उसके कर्म धर्म हैं सब अचेतनावस्थाके कृत्य हैं । यह मनुष्य अपनी मुक्तिकी सहस्रों युक्तियाँ करता है । पर कोई सूरत छुटकारेकी दिखाई नहीं देती । मिथ्याको सत्य और सत्यको मिथ्या जान रहा है । अपने व्यर्थके विचारोंको सत्य तथा ठीक मान रहा है । कितने पीर पैगम्बर सिद्ध साधु ऐसे हुए कि, जिनको चौथे घरका समाचार तो मिला पर उसकी विद्या नहीं मिली इस कारण उन्होंने ब्रह्माण्डके भीतर रहना स्थिर किया । सांसारिक कामना पृथक् नहीं हुई । उनको विद्या प्राप्ति भी नहीं हुई । पर तीनों लोकोंके भीतरकी प्राप्ति हुई । उनको सृष्टिके उत्पन्न करनेका बल भी हो गया वे अपनेको सृष्टिका उत्पन्न करता मानने लगे और अपनी अल्पबुद्धिवश अपनेको उन्होंने परमेश्वर मान लिया पर यथार्थ भेदसे अनभिज्ञ रहे । 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते रहे वे सब इसी जमादारकी तरह मारे गए । कारण यह कि, उनको इसका अण्डाकार घरेके भीतरही ज्ञान था उन्होंने न जाना कि, ईश्वर क्या वस्तु है और मैं क्या हूँ और जिन लोगोंने न पूर्ण विद्या पाई और ब्रह्माण्डसे पार होकर सत्यलोकको पहुँचे पूर्ण विद्यासे परिपूर्ण होगा । उनको कोई मार नहीं सकता । सहस्रों युक्तियाँ कीं पर फिर भी उनका बाल बाँका नहीं हुवा । वे न किसीके मारनेसे मरते हैं और न उत्पन्न होते हैं उनका जन्म मरण फिर कभी नहीं होता । उनका आवागमन एकबारगीही बंद हो जाता है । सिद्ध, साधु जिनमें वह विद्या नहीं वे अण्डाकार घरेके भीतर बंद हैं । वह राजकुमार जो पागलखानेमें बंद था, वह राजयोगीके समान है । वह राजकुमार जो नजरबंद था वह पागलखानेका बादशाह तो नहीं था । जैसे अन्यान्य पागल बंद थे वैसे ही वह बंद था । पर उसके मस्तकमें यह ध्यान था कि, मैं राजकुमार हूँ । भ्रान्त करके यह जीव ब्रह्मा जगत् इत्यादिका कौतुक देख रहा है । ज्ञानकी अवस्थामें न कुछ ब्रह्मा है न जगत्ही है । यह ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनों कुछ नहीं । उसके समस्त खेल और कौतुक और तमासे तथा जादूगरी हैं ।
अकालपुरुष एक महाप्रबल जादूगर है । जब वह भानमतीका पिटारा खोल देता है तब समस्त कौतुक प्रगट होने लगते हैं । जब वह अपना कौतुक समेट लेता है तब कुछ दिखाई नहीं देता सब शून्य हो जाता है ।
प्रथम तोरीत दूसरी जबूर पुस्तक
सत्य कबीर बचन ।
बाजीगरने डंक वजाया । सब लोग तमाशे आया ॥
बाजीगरने डंक सकैला । तब रह गया आप अकैला ॥
जो लोग बाजीगरका कौतुक देखनेवाले हैं वे डंका बजतेही तमासेको आजाते हैं उनमें किसीको इतनी विद्या नहीं है कि, इस कौतुकीके कौतुकको जान सकें । वे सब कडपुतलीके समान हैं । बाजीगरके तमाशेके साथ नाचते फिरते हैं जब वो समेटता है तो जो पुतलियाँ जाबूगरके कौतुकके साथ नाच रही हैं वे न जाने कहाँ चली जाती हैं इस कारण वे सब पागलपनेकी अवस्थामें हैं उनमें किसीको सुध नहीं कि, बाजीगर कौन है सबके ऊपर इस मानिकका मंत्र फल दिखला रहा है, वे सब विक्षिप्त हैं । नहीं जान सकते इनमें तनिक भी बुद्धि नहीं है कि, भले बुरेको जान सकें पागलोंको ज्ञान क्या होता है । भगवन् ! अपने पागलोंपर कृपाकर उन्हें चेतना देकर पागल खानेसे निकाल ।
कबीर साहिबने इस बातपर भी विचार किया है कि, संसारके सब जीव क्यों पागल हो रहें तथा पागलपनेका कारण भी बताया है कि, ये आपही अपनेको भूलकर पागल बने हैं ।
शब्द कबीर बीजक ।
अपनपो आपनही विसरो ।
(जैसे श्वान काच मन्दिरमें भरमत भूखिमरो ।
जों केहरि वपु निरखि कूपजल तामें जाय परो ॥
ऐसेहि गज लखि फटिक शिलाको प्रतिमा देखि अरो ।
मरकट मूठी स्वाद न छोडे घरघर नटत फिरो ।
कहैं कबीर नलनीके सोना कोने तोहि पकरो ॥
यह जीव इस संसाररूपी पागलखानेमें आकर अपने प्यारे रामको अपने आत्मस्वरूप सच्चिदानन्दको अपने आपही भूल गया । इसके बाद यह अपने आप अपने स्वरूपमें भ्रममें फँसकर ऐसे मर रहा है, जैसे कांचके मंदिरमें कूकर अपनी परछाई देखकर दुख पाता फिरता है और भूक २ कर अन्तमें मर ही जाता है शेर अपनी परछाई पानीमें देख उसे शेर समझकर पानीमें गिर पड़ता है । इसी तरह हाथी स्फटिक शिलामें अपने प्रतिबिम्बको, कुत्ते और सिंहकी तरह मुकाबिलेका लड़नेवाला समझकर, उसमें दातोंकी टक्कर भारने लग जाता है । बन्दर बाजीगरकी दी हुई मुट्ठीका स्वाद नहीं भूलता घर २ नाचता फिरता है । कबीरजी कहते हैं कि, ए ललनी (लटकनी) के तोते ! तुझे किसने
पकड़ रखा है । जीव अपने भ्रमसे आपही बन्ध रहा है यदि वहम छोड़ दे तो उद्धार पा जाय पर अन्धेर नगरीमें अपनेको भूलकर बैठता है इस कारण दुख पा रहा है यदि भगवान् कृपा करें तो उद्धार हो जायगा ।
हंस कबीरकी स्थिति ।
जब मैं काशीके पागलखानेमें गया तो वहाँ थोड़ी देर तक ठहरा । वहाँका रङ्गदङ्ग देखकर वहाँ अधिक कालपर्यन्त ठहरनेका उचित नहीं समझा । शीघ्रही वहाँसे फिर नगरको ही चला आया । इसी प्रकार हंस कबीर इस ब्रह्माण्डके भीतर कागभुशुण्ड तथा लोमश ऋषि इत्यादिकी तरह रहते हैं । परन्तु सांसारिक कामनाएँ उनको लुभा नहीं सकती वे सदैव अलग रहते हैं । जैसे कमल जलमें रहता तो है पर जलसे पृथक् रहता है । इसी प्रकार हंसकबीर पर सांसारिक कामनाएँ असर नहीं करतीं और जो लोग कामनाकी तरङ्गोंमें फँसे हुए हैं । वही लोग बिगड़ते हैं उन्हींको कालपुरुष भूनभूनकर खाता रहता है ।
उनपर दया करके कबीरसाहब पुकारते फिरते हैं कि, ए विक्षिप्त मूर्ख मनुष्यो ! मेरा कहा मानो, कालपुरुषका भोजन मत बनो । कोई भाग्यवान कबीरसाहब तथा हंसकबीरका कहना मानता है और पागलखानेसे घृणा करके भागता है । कोई महाशय इस बातसे रुष्ट न हों कि, मैंने सबको पागल लिखा है । यह बात कदापि नहीं । मैंने केवल उन्हीं लोगोंके निमित्त लिखा है जो संसारिक कामनाओंमें पड़े रहकर मुक्तिके इच्छुक रहते हैं । जो साधु सन्त और पीर पैगम्बर इत्यादि कामनाको तुच्छ तथा सांसारिक कामनाओंको घृणा दृष्टिसे देखते हैं, वे बंधनसे निश्चय छूट जावेंगे । केवल काम-क्रोधादिकके बंधनमें पड़े हुए पुरुषही इस ब्रह्माण्डमें पड़े रहेंगे । इन्हींके निमित्त पाप पुण्य नरक वैकुण्ठ आदि सब कुछ बनाया गया है, वेही कुत्सितताके कोड़े हैं । जबलों दुनियाँका जाल है, तबतक जादूगरका गुलाम है । यदि उन मनुष्योंमें तनिक भी बुद्धि होती तो अपने मनमें सोचते समझते कि, वे लोग जिससे अपनी मुक्तिके इच्छुक हैं मुक्तिका एकमात्र भाग समझते हैं । वे सब उन्हींके समान दुःखदायी तथा कम्मेंके बंधनमें बँधे मारे मारे फिरते हैं, कोई छुटकारा नहीं पाता । इस कारण उन मनुष्योंमेंसे किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं है कि, उनमें यह सूझ बूझ उत्पन्न हो । जो लोग कुत्तेकी पूँछ पकड़कर महानदके पार हो जाते हैं वो उनको मूर्खता मात्र है ।
जिसने इस ब्रह्माण्डकी रचना की उसने चारों वेदकी आज्ञाएँ ठहराई और चार वर्ण और चार आश्रम बनाए । मनुष्य बंधना ध्यान करना है मुक्ति
नबियोंके पुस्तक करनतियुनके लिये पोलूस रसूलका पत्र
चाहता है। जबलों उसमें जातीयताका ध्यान रहेगा तबलों न तो उसको ज्ञात होगा, न मुक्ति ही होगी। यही सब सन्तों और सत्यगुरुकी आज्ञा है। अब रहे चार आश्रम। सो इन चार आश्रमोंमें प्रथम श्रेणी ब्रह्मचर्यकी है। इस ब्रह्मचर्यकी अवस्थामें वेदपाठ इत्यादि मनुष्योंको आवश्यक है। कारण यह कि, मनुष्यको छोटेपनमें और दूसरा कर्म इससे अच्छा है ही नहीं।
ब्रह्मचर्योपरान्त संसार करनेकी आज्ञा है। जिसको गृहस्थाश्रम कहते हैं। जब मनुष्य वेदपाठसे निस्तार पावे तब संसार करने कहा है। इस कारण कि, वेदपाठद्वारा सांसारिक काम धाम भलीभाँति हो सकता है। सांसारिक काम धाम यज्ञ हवन दान इत्यादिके ठीक ठीककरनेका ढङ्ग उसको मालूम हो जाता है। जब वेदपाठी होकर पुनः संसारके बखेड़में पड़ा तो वेदपाठ मुक्तिमार्ग न ठहरा जिसने कि, सांसारिक कार्योंमें लिप्त किया। गृहस्थोपरान्त वानप्रस्थकी श्रेणी है। जब गृहस्थ एकसमयपर्यन्त कर चुका तब वानप्रस्थकी अवस्थाको स्वीकार करता है। ऐसी अवस्थामें उसको वनमें रहने, अग्निकी सेवा और आत्मातत्त्वके विचारनेकी आज्ञा है। जब मनुष्य वानप्रस्थ हो जाता है, तब पहलेकी दोनों अवस्थाएँ झूठी ठहर जाती हैं। वानप्रस्थके उपरान्त चौथी श्रेणी संन्यासकी है उस आश्रमकी यह प्रशंसा है कि, जब मनुष्य तीन ईषणाको छोड़ दे तब संन्यासको स्वीकार कर सकता है। वह तीनों ईषणा ये हैं—स्त्री, पुत्र, धन जबलों इन तीनोंसे स्नेह रहेगा तबलों कोई संन्यासी नहीं हो सकता है जब मनुष्य संन्यासी ठहर गया तब पहलेकी वह तीनों अवस्थाएँ मिथ्या तथा बेजड़की ठहर जाती हैं। जब यह संन्यासी हो गया तब उसको निश्चय अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करना पड़ता है। जब यह शुद्ध चेतन अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करता है। जिस अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करता है वह अद्वैत ब्रह्म ध्यानमें नहीं आता और जो ध्यानमें आता है सो सब द्वैत है। अद्वैत ब्रह्मपर्यन्त मन बुद्धि वाणी इन्द्रिय आदिकी तनिक भी पहुँच नहीं हैं। उसका रूप वही कृपाकरके दिखा दे तो दिखा दे नहीं तो दर्शन होना कठिन है। यदि वो गृहस्थमें दर्शन दे तो उसी अवस्थामें भी वो सब कुछ बना सकता है।
जब इन चारों वर्ण तथा आश्रमको यह छोड़ दे तब मुक्तिमार्गको ढूँढ़ सकता है। इस कारण इस बातको भली भाँति जानलेना चाहिये कि, संसारियोंको पुस्तकपाठ तथा वेदपाठ सांसारिक कार्योंके निमित्त है। मतलब कामना मुक्ति मार्गमें बिलकुलही व्यर्थ हैं। पर निष्कामोंको यही मोक्षके साधन है। वहाँ केवल सत्यगुरुके पथ दिखानेकी आवश्यकता है। भक्तिके दीवाने तो भक्तिके सिवा
अनागत वक्ताके कृत्य
सबको निकम्मा समझते हैं । इसी विषयपर कबीर साहिबने एक शब्द लिखा है —
पण्डित कौन कोबधि तोहि लागे । तू राम न जपै अभागे ॥
वेद पुराण पढ़े क्या होए क्या खच्चर सिरमारा ।
रामनामकी सुद्ध न जानी बूडचो सब परिवारा ॥
वेद पुराण सुनैका यह मत सब घट चीन्हों रामा ।
सब घट ब्रह्म एककर जाना सुफल होय तेरो कामा ॥
नारद कहै व्यास मुख भाषै शुकदेव पूछो जाई ।
कहैं कबीर एक राम जाने बिन बूडी सब ब्रह्मणाई ॥
ए पण्डित ! यह तुझे क्या कुबुद्धि लग गई कि, जिससे ए अभागे ! तू राम राम नहीं कहता । तूने इतने वेदशास्त्र पढ़े हैं, क्या उनसे तुमने कुछ भी सार ग्रहण नहीं किया ? यौही रट रट कर शिर खालीकर डाला । तूने राम नामका रहस्य न समझा । सारा कुटुम्ब पंडित होकर पढ़ पढकर ही संसार सागरमें डूब गया वेदपुराण सुननेमें क्या है जिस रामकी रामायण सुनते हो उसको सबमें व्यापक देखो, सबमें एकही राम देखो, भेद भाव मत मानो, सब काम सफल हो जायेंगे । यदि मेरी बातमें सन्देह हो तो नारद और व्याससे पूछलो । वे भी यही बतायेंगे भलेही शुकदेवसे पूछलो । कबीर तो यही कहते हैं कि, बिनारामके जाने सब पंडिताई डूब गई क्योंकि, सब ब्राह्मणपना उसीमें है ।
अध्याय १२ ।
विश्वास ।
चित्त जिधरको फिरता है उसको बुद्धि मान लेती है । वह बात मिथ्या हो, अथवा सत्य हो सत्यके रूपसे दिखाई देती है । बुद्धि और विश्वास दोनों मिथ्या हैं विश्वास, मिथ्या और निष्कारणको कारणवाला बना लेता है । सारे विश्वास अविद्यामें सत्य हो रहे हैं । पर लुढ़नी विद्यामेंही सबकी यथार्थ अवस्था जानी जाती है । जिस बात अथवा जिस भस्मपर विश्वास होगया हो वही सच्चा तथा ठीक माना जाता है । यदि विचार करके देखा जाय तो यही स्वर्ग नरक दोनोंका कारण तथा बन्ध मोक्षका पिता है ॥
विश्वासकी झलक ।
वैरागी लोग विष्णु तथा रामकृष्णका पूजन करते और आठ प्रकारकी मूर्तिपूजाको सत्य जानते हैं और इस मूर्तिपूजासे अपनी कामना पूर्ण करते
हैं। मूर्तिको पूजकर उस मूर्तिवालेसे मिलकर कृतकार्य होते हैं। कोई रामकृष्णको अपना ईश्वर कोई अपना पुत्र करके पूजता है कारण यह कि, पुत्रसे विशेष प्रेम होता है। प्रेम बढ़ानेके निमित्त कोई छोटा पुत्र अथवा युवक करके मान लेता है। जैसा मानता है वैसाही देखता है। एक गोकुली गोसाईं जो सांसारिक था पति पत्नी दोनों कृष्णचन्द्रको अपना पुत्र करके पूजते थे उस साधुके छः पुत्र और छः बहूवें थीं। एक चुड़हारी आई उसकी छः बहूओंने चूड़ी पहनी। सब बहूवें चूड़ी पहन चुकीं तब उनकी सास चूड़ीका मूल्य देने लगी। जब उनकी सास छः स्त्रियोंके चुड़ियोंका मूल्य देने लगी तब चुड़िहारीने कहा कि, मैंने सात स्त्रियोंको चुड़ियाँ पहनाई हैं। तब सासने कहा कि, मेरी तो छः बहूवें हैं तूने सातवीं किस स्त्रीको चुड़ियाँ पहनाईं? दोनोंमें झगड़ा हुआ। उस चुड़िहारीने दाम नहीं लिया कहा कि, मैं सातका मूल्य लूँगी। वह चुड़िहारी खाली हाथ अपने घर चली गई। जब रातको वह महा अधिकारी गोसाईं सोया तब राधिकाजी स्वप्नमें आकर उनके सामने खड़ी हुई कहने लगी कि, बाबा ! तुम चुड़िहारीको दाम क्यों नहीं चुका देते क्या मैं तुम्हारी बहू नहीं हूँ ? तुम्हारी छः बहूओंके साथ सातवीं मैंने भी चूड़ी पहनी थी। मैं भी तुम्हारी बहू हूँ। तुम चुड़िहारीको मूल्य देदो। जब राधाजीने ऐसा कहा तो प्रातः काल होतेही इस साधुने उस चुड़िहारीको बुलाकर सातों बहूओंकी चुड़ियोंका मूल्य दे दिया। कारण यह कि, वह गोसाईं कृष्णको अपना पुत्र मानकर अपनेको पतिपत्नी नन्द यशोदा जानते थे।
एक नवाब वृन्दावनमें गए। वहाँ जो उन्होंने कृष्णके गुण तथा उनका विवरण सुना तो वे उनपर आसक्त हो गए। अपने राज्यको छोड़कर योगी हो गए। उसकी सैन्य तथा नौकर चाकर रोते पीटते घरको पलट गए। वह नवाब एक साधुका शिष्य होकर वृन्दावनमें रहने लगा। गुरुने इस नवाबका नाम मीरमाधव रक्खा। वह मीरमाधव जो भोजन दे खाले इधर उधर पड़ा रहे। एक दिवस मीरमाधव भूखे ही ठाकुर मन्दिरके पिछवाड़े पड़े थे। जब अर्धनिशा हुई तब कृष्णचन्द्र थालीमें भोजन और लोटेमें जल लेकर मीरमाधवके सामने गए। भोजन तथा जल रखकर कहा कि, खाओ। तब कृष्णचन्द्र तो चले गए। मीरमाधवने भोजन किया तथा जल पिया। जब प्रातःकाल हुआ तब ठाकुरका पूजारी उठा, बर्तन भाँडे सभाँलने लगा। पर थाली और लोटा न पाया, उसे ढूंढने लगा। जब ठाकुरके मन्दिरके पीछे गया तब मीरमाधवके सामने सउ
चौथी पुस्तक कुरान अल्लोपनिषद् कुरानका सूक्ष्मसार
थाली लोटाको जूँठा पाकर बडाही क्रुद्ध हुआ । मीरमाधवको मार कूटकर थाली लोठा ले आया । जब स्नान करके ठाकुर पूजने गया मन्दिर द्वार खोला तो देखा कि, ठाकुरोंकी बुरी दशा है । मूर्तिपर धूल पडी है कपडे फटे हैं । बडे दुःखमय आकारमें दिखाई दी । यह अवस्था देखकर पुजारी बडा चिन्तित हुआ । इसी सोचमें पुजारी जब रातको सो गया तब ठाकुरने स्वप्नमें कहा कि, मीरमाधवको जो तुमने मारा सो समस्त मार मुझपर पडी । मीरमाधवसे मुझमें तनिक भेद न समझो । प्रातःकाल होतेही वह पुजारी मीरमाधवके चरणोंपर गिरकर अपने अपराधको क्षमा कराया ।
मिरजा खुशदिलका भी ऐसाही वृत्तान्त है भक्तमालमें देखो ।
नरसीभक्त मग्न होकर ठाकुरके सामने नाच रहे थे । उनकी स्त्री भी नाचने लगी । पुत्री भी नाचने लगी । इन तीनोंको प्रेममें नाचते देखकर मूर्तिमेंसे कृष्णजी भी निकलकर उनके साथ नाचने लगे । नरसीकी कामना पूर्ण हुई ।
पीपाजी द्वारकाको गए । उनकी स्त्री साथ थी, लोगोंसे पूछा, पहली द्वारका कहाँ है ? तब डोंगोपर चढ़ाकर मल्लाह ले गया । जहाँ पहली द्वारका समुद्रमें डूब गई थी वह स्थान दिखलाया । देखतेही पीपाने समुद्रमें बुडकी मारी । पीपाके कूदतेही पीपाकी स्त्री भी समुद्रमें कूद पडी । जब वे दोनों जलके गर्भमें चले गए तब उनको वहाँ असली द्वारका दिखाई दी । कृष्णचन्द्रने अपने एक हाथपर पीपा और दूसरे हाथपर सीताको लेकर कुछ दिवसोंपर्यन्त अपने पास रक्खा । फिर कहा कि, अब तुम पृथ्वीपर जाओ । यद्यपि पीपाने बहुत कहा कि, अब मैं जाना नहीं चाहता पर कृष्णजीने कहा कि, तुम निश्चय जाओ । पीछे छाप देकर कृष्णजीने पीपाको बिदा किया । पीपा भक्तकी छाप आज भी द्वारिकामें प्रसिद्ध है ।
एक वेश्या वैरागियोंके उपदेशसे ठाकुरसेवामें लगी । उसने बडे प्रेम सहित कई सहस्र रुपया लगाकर एक मुकुट बनवाया । वह मुकुट लेकर ठाकुरके शीशपर धरना चाहा, पर ठाकुरकी मूर्ति बहुत ऊँची थी । उसका हाथ वहाँलों नहीं पहुँचा । तब ठाकुरकी मूर्तिने अपना शिर झुका दिया । उस कुँजडीने ठाकुरके शीशपर मुकुट रख दिया । सुनते हैं कि उस मूर्तिके शिर अभीतक झुका हुआ है ।
नामदेव और धन्ना भक्तको मूर्तिमेंसे ठाकुर प्रगट हो गए और बिटठल देवको कुत्तेमेंसे प्रकट हो दर्शन दिये ।
तुलसीदासजी वृन्दावन गए तब राधेकृष्णको दण्डवत् प्रणाम नहीं किया ।
कहा कि, यदि यह सीतारामकी मूर्ति हो तो मैं दंडवत् करूँ । तुलसीदासके देखतेही देखते वह राधेकृष्णकी मूर्ति सीता रामकी हो गई । तुलसीदासजीका—
दोहा—कह वारणो छवि आज का, भले वने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तव नवे, धरो धनुष शर हाथ ॥
कित मुरली कित चंद्रिका, कित गोपिनको साथ ।
तुलसी जिनके कारणें, नाथ भये रघुनाथ ॥
सैन भक्तके निमित्त ठाकुरने नाऊ बनकर राजाकी सेवा की । ऐसे सहस्रों उदाहरण हैं ।
संन्यासी विष्णु और शिव दोनोंको एक स्वरूप जानते हैं । विष्णुकाञ्ची और शिवकाञ्चीका विवरण है कि, विष्णुकाञ्ची जो आचारी हैं वे शिवका दर्शन नहीं करते । एक दिवस एक संन्यासी विष्णुकाञ्चीमें जाकर विष्णुकी मूर्तिके सामने शिवस्तुति करने लगा । तब उस विष्णुमूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकल पड़ा । जब वह संन्यासी मन्दिरके बाहर निकल गया तब लोगोंने देखा कि, ठाकुरकी मूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकला हुआ है । तब आचारियोंने कोलाहल मचाया कि, यह क्या हुआ ठाकुरके शिरमेंसे शिवलिङ्ग निकल पड़ा । इस संन्यासीको दृढ़कर ले आये और बहुत कुछ प्रार्थना की कि, इस बुराईको विलोपित करो । तब उस संन्यासीने विष्णुके सामने दंडायमान होकर विष्णुकी बड़ी स्तुति की तो शिवलिङ्ग विलोपित हो गया । केवल विष्णुमूर्ति रह गई ।
एक प्रामाणिक पुरुष द्वारा प्रगट हुआ है कि, अम्बाला प्रांतके शाहाबादमें कितने मन्दिर और कितने समाधालय दिखाई दिये—वहाँपर किसी श्रेष्ठ पुरुषकी क़ब्र थी । उस क़ब्रपर शिवलिङ्ग था । मुसलमानलोग उस लिङ्गको भङ्ग करने लगे । तब उस शिवलिङ्गसे ऐसी रक्तधारा प्रवाहित हुई कि, समस्त मनुष्य भयभीत हुए । उन लोगोंकी इच्छा हुई कि, उस लिङ्गको खोदकर फेंक दें । तब उन लोगोंने सौ गजपर्यंत खोदा, पर उस लिङ्गकी हद नहीं मिली । तब विवश होकर उसको छोड दिया । अब हिन्दूलोग उसको पूजते हैं ।
सन् १८५५ ई० की यह बात है और यह आश्चर्यमय व्यापार देखकर सबलोग चकित रह गए ।
सन् १८१० ई० में सहारनपुर जिलेके अन्तर्गत पठानपुरामें एक आलयसे शिवलिङ्ग निकला । वह आलय मुसलमानका था । मुसलमानलोग वैसे उसपर भ्रष्ट जल डालते । उन लोगोंने सौ हाथपर्यन्त खोदा । उसको मकानसे
बलिका निषेध
निकालना चाहा, पर उस लिङ्गका अन्त उनको नहीं मिला। तब विवश होकर उसको उन्होंने छोड़ दिया और हिन्दू उसको पूजते हैं।
नानकशाह महाशयकी जन्मसाखीमें लिखा है कि, जब आप भवकेमें गए तब मरदानाने पूछा कि, गुरुजी ! इस भवकेके भीतर क्या है ? तब नानकसाहबने उत्तर दिया कि, तुम जाकर देखो। तब मरदानाने कहा कि, मुझको यहाँके झाड़ू देनेवाले भीतर जाने न देंगे। तब नानकसाहबने कहा कि, तू जा, तू सबको देखेगा पर तुझको कोई न देखेगा। मरदाना भीतर जाकर देख आया। फिर नानकसाहबने पूछा, क्या देखा ? तब मरदानेने कहा कि, वहाँ देखनेको क्या है ? भवानके भीतर एक नग्न मूर्तिमात्र पड़ी है, दूसर, कुछ नहीं। तब नानकशाहने कहा कि, वह शिवजीकी मूर्ति है। मुहम्मदसाहब और अलीने समस्त मूर्तियोंको तोड़ा तथा पृथक् किया, पर उस मूर्तिको हटा नहीं सके। मुहम्मद साहबके पीछे खूबवार हुसेनी नामक एक बादशाह हुवा। उसने उस मूर्तिको अलग करना चाहा। तब उसके सारे शरीर तथा उसके समस्त सैन्यमें आग लग गई। सब मरने लगे तब उस बादशाहने अपने दोषके निमित्त क्षमा-प्रार्थना की। इस कार्यसे हाथ रोका। तब उसको और उसकी फौजको सुख मिला।
भवतवर पीपा कबीर साहिबके गुरु भाई थे। आपका बाहा विश्वास था जो कि कबीर साहिबका है। आप भी उसी तत्त्वके उसी पथसे उपासक थे जिसकी तत्त्वसे तथा जिस पथसे कबीर साहिब थे। पीपाके विश्वासकाही प्रभाव था कि सच्ची द्वारिकामें पहुँच गया कबीर साहिबके राम मंत्रके विश्वासकी करामात थी कि सिद्ध पदवी पाई। यद्यपि असत्में सत्का विश्वास उतना लाभदायक नहीं होता जितना कि सद्दस्तुका होता है संवादी भ्रम तो साक्षात् कल्याणकारी दीखताही है। पर झूठे विश्वासमें सुख नहीं है भक्तोंके श्रद्धा विश्वास निराले हुआ करते हैं उनकी दीवानगी अनन्य भक्तिको लिये हुए होती है। जो कुछ वो चाहते हैं सत्य पुरुषको वही बनना पड़ता है। इसका रहस्य साधारण व्यक्ति नहीं समझ सकते। इसे वे ही समझ सकते हैं जिनके दिलमें कुछ प्रकाश हो।
जीवकी हालत ।
पहिलेमें कुछ और था पर जब मेरी यथार्थ अवस्था बदल गई और मैं दूसरी अवस्थामें आया तब मैं भ्रमका पुतला हो गया और मैं सहस्रों प्रकारके धर्म कर्म स्थिर करने लगा। एक धर्मको मैं सच्चा ठहराता हूँ तथा दूसरेको झूठा समझता हूँ अनगिनती धर्म मैंने स्थिर किए और कर रहा हूँ और भविष्यमें
करूँगा। सो सब मेरे भ्रमकी अवस्थामें ठहराए गये हैं। एक स्थिर करता हूँ तथा दूसरे को काटता हूँ न मेरी बुद्धि ठिकाने है और न मेरे विश्वास स्थिर हैं। मैं अपने पागलपनमें सब कुछ कर रहा हूँ। इसी पालगपनेकी अवस्थाको मैं अपनी बुद्धि अवस्था मानी तथा दूरदर्शिता समझता हूँ। यद्यपि यह सब बातें मैं अपने अज्ञानावस्थामें करता हूँ। जबसे मैं भ्रममें पड़ा तबसे मैंने अपने निमित्त दो मकान बनाएँ। इन्हीं दोनों मकानोंमें रहा करता हूँ। एकका नाम पिण्ड तथा दूसरेका नाम ब्रह्माण्ड है। ये दोनों पागलखाने हैं मैंने अपने मकानमें नौ महल बनाए वे ये हैं—दानमयीकोश शब्दमयी कोश बाणमयीकोश आनन्दमयी-कोश मनुमयीकोश प्रकाशमयीकोश ज्ञानमयीकोश आकाशमयीकोश प्रज्ञानमयीकोश।
इस नौ महला मकानमें मैं रहने लगा। जब जिस महलमें जाकर बैठता हूँ तब मेरा ढङ्ग वैसाही हो जाता है। सब बल धन इत्यादि उसीके अनुसार प्राप्त होता है। मेरी स्थिति सदैव इसी नौमहला मकानमें रहती है। बाहर जानेका बल नहीं। कभी मैं नदी कभी बूंद बन जाता हूँ। नदी बूंद दोनोंमें एकही कौतुक है। मैं अपने असलको भूल गया। मैंने अपने गलेमें मालाको पहनकर इधर उधर ढूँढ़ता फिरता हूँ। मैं अपने कानपर लेखनी रखकर भूल गया ढूँढ़ता फिरता हूँ। जब किसीने कहा कि, कलम तो तुम्हारे कानपर है तब मैंने अपनी कलम पायी। मैं जान बूझकर भटकता रहा, दूसरेके बतलानेका ओहताज हो गया। इस प्रकार मैं अपनी पूर्वावस्थामें पृथक् होकर दूसरोंके बतानेका ओहताज हो गया। पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों हमारे बनाए हैं पर मैं भूल गया। नहीं जानता कि, किसने बनाया। आपको और तथा बनानेवालेको और जानता हूँ। मैंही दास तथा मैंही परमेश्वर बन बैठा, असली परमेश्वरको मैं नहीं जानता, नहीं पहचान सकता, असल परमेश्वर मेरे कहने सुननेसे परे हैं। उसको न पहचाननेसे मैं पागल बन रहा हूँ। मेरे जप तप पूजा वंदना आदिक सब भ्रम हैं, इनके, द्वारा जो कुछ प्राप्त होता है वह सब अस्थायी तथा जल परकी लकीरके समान है। कबीर साहबका वचन है कि, ये सब मनुष्योंके कर्म हैं सो सब भ्रम हैं यही बात देवी भागवतके नवें स्कन्ध और १९ अध्यायमें देखा—महामायाका वचन है कि, सात करोड़ महामंत्र जो हैं सो सब मेरे नाम हैं। अतः जो वेद शास्त्र हैं और जो कहने सुननेमें आता है सो सब माया है जो कुछ माया है, सो सब भ्रम और धोखा है। मायाको माया खाजाती है। जो मायासे पृथक् है वो ही बचा है। दूसरे सब नष्ट हो जावेंगे मैं जब सर्जन कर्ता बन बैठता हूँ तब जानता हूँ कि,
यह सब सृष्टि मेरी है । जब मैं स्वयं सृष्टि बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह रचयिता मेरा है । इसी प्रकार जब बादशाह बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह सब प्रजा मेरी हैं । जब मैं धनहीन तथा दरिद्र हो जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह मेरा सच्चाट है और मैं इसकी प्रजा हूँ । मैं ही तो बादशाह हूँ मैं ही प्रजा हूँ । न बादशाह कुछ है न प्रजा कुछ है । केवल एक जीव है, उसका कुछ नाम रखलो । न यह मनुष्य है, मनुष्यका जन्माया हुआ है । पशु पक्षी जड़ चैतन्य सभी कुछ यह है पर सबसे पृथक् यह है । मैं नहीं जानता कि, पहले मैं क्या था । अब मैं क्या हूँ । मैं पाँच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्रियोंसे पृथक् हूँ । तथा संयुक्त भी हूँ । मैं अब भ्रमरूप हूँ । मैं पहले एक भ्रम था फिर अनेक हो गया । मैं ढोल बजाता हुआ जाता हूँ एक दूसरा भ्रम व्याहकर लाता हूँ । एक भ्रम दूसरे भ्रमके साथ मिलावट करते हैं तब दूसरा तीसरा फिर चौथा भ्रमरूप लड़का लड़की उत्पन्न होते हैं फिर उनके प्रेममें फँसकर मर जाता हूँ । जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब अनगिनती भ्रम एकसे अनेक हो जाते हैं । जैसे बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है वो समस्त बनको भस्म कर देती है इसी प्रकार जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब उसके समस्त सुकार्य तथा भले कामोंको भस्म करके राखमें मिला देते हैं । यह अज्ञानवश कहता है कि मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी पुत्री मैं अपने बाल बच्चोंके निमित्त कमाई करूँ । कमाकर उनका पालन करूँ । यह मूर्ख इतना नहीं सोचता कि, जिसने मुँह पेट बनाया है वही पालन भी करेगा मैं बाल बच्चोंके सोचमें जोमरता हूँ सो मेरा क्या किया होता है । जिसने मुँह और पेट बनाया उसीने आटा दाल नमक आदिक सब कुछ बनाया । जीवन-भर कमाईके ध्यानमें फँसकर खराब होता है । अपने परमेश्वरकी वंदनाकी ओर तनिकभी ध्यान नहीं देता है न सोच तथा विचारही करता है कि, मैं किस-कारण मनुष्य कहलाता हूँ । मनुष्यता क्या है । यदि मैं मनुष्य हूँ तो मुझको अवश्यही मनुष्यताकी ढुंढाई करनी चाहिये ? जब मैं मनुष्यता पर अधिकृत होता हूँ तब मेरा समस्त कार्य पूरा होगा । जबलों केवल मेरी सूरत मनुष्योंकी है कार्य पशुओंका है बुद्धि पशुओंकी है, तबलों मैं कदापि मनुष्य नहीं हूँ । इस कारण मुझको अवश्यही उद्योग करना चाहिए, । जिसमें मनुष्यताकी बातोंको प्राप्त करूँ । जबतक मुझमें मनुष्यता न हो तबतक मैं कदापि मनुष्य नहीं समझा जा सकता हूँ ।
चार-पशु
क. ११ पृ. ११७—नरपशु गुरुपशु, वेद पशु, तिरयापशु संसार ।
कहैं कबीर सो पशु नहीं, जाके विमल विचार ॥