कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पकड़ रखा है । जीव अपने भ्रमसे आपही बन्ध रहा है यदि वहम छोड़ दे तो उद्धार पा जाय पर अन्धेर नगरीमें अपनेको भूलकर बैठता है इस कारण दुख पा रहा है यदि भगवान् कृपा करें तो उद्धार हो जायगा ।
हंस कबीरकी स्थिति ।
जब मैं काशीके पागलखानेमें गया तो वहाँ थोड़ी देर तक ठहरा । वहाँका रङ्गदङ्ग देखकर वहाँ अधिक कालपर्यन्त ठहरनेका उचित नहीं समझा । शीघ्रही वहाँसे फिर नगरको ही चला आया । इसी प्रकार हंस कबीर इस ब्रह्माण्डके भीतर कागभुशुण्ड तथा लोमश ऋषि इत्यादिकी तरह रहते हैं । परन्तु सांसारिक कामनाएँ उनको लुभा नहीं सकती वे सदैव अलग रहते हैं । जैसे कमल जलमें रहता तो है पर जलसे पृथक् रहता है । इसी प्रकार हंसकबीर पर सांसारिक कामनाएँ असर नहीं करतीं और जो लोग कामनाकी तरङ्गोंमें फँसे हुए हैं । वही लोग बिगड़ते हैं उन्हींको कालपुरुष भूनभूनकर खाता रहता है ।
उनपर दया करके कबीरसाहब पुकारते फिरते हैं कि, ए विक्षिप्त मूर्ख मनुष्यो ! मेरा कहा मानो, कालपुरुषका भोजन मत बनो । कोई भाग्यवान कबीरसाहब तथा हंसकबीरका कहना मानता है और पागलखानेसे घृणा करके भागता है । कोई महाशय इस बातसे रुष्ट न हों कि, मैंने सबको पागल लिखा है । यह बात कदापि नहीं । मैंने केवल उन्हीं लोगोंके निमित्त लिखा है जो संसारिक कामनाओंमें पड़े रहकर मुक्तिके इच्छुक रहते हैं । जो साधु सन्त और पीर पैगम्बर इत्यादि कामनाको तुच्छ तथा सांसारिक कामनाओंको घृणा दृष्टिसे देखते हैं, वे बंधनसे निश्चय छूट जावेंगे । केवल काम-क्रोधादिकके बंधनमें पड़े हुए पुरुषही इस ब्रह्माण्डमें पड़े रहेंगे । इन्हींके निमित्त पाप पुण्य नरक वैकुण्ठ आदि सब कुछ बनाया गया है, वेही कुत्सितताके कोड़े हैं । जबलों दुनियाँका जाल है, तबतक जादूगरका गुलाम है । यदि उन मनुष्योंमें तनिक भी बुद्धि होती तो अपने मनमें सोचते समझते कि, वे लोग जिससे अपनी मुक्तिके इच्छुक हैं मुक्तिका एकमात्र भाग समझते हैं । वे सब उन्हींके समान दुःखदायी तथा कम्मेंके बंधनमें बँधे मारे मारे फिरते हैं, कोई छुटकारा नहीं पाता । इस कारण उन मनुष्योंमेंसे किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं है कि, उनमें यह सूझ बूझ उत्पन्न हो । जो लोग कुत्तेकी पूँछ पकड़कर महानदके पार हो जाते हैं वो उनको मूर्खता मात्र है ।
जिसने इस ब्रह्माण्डकी रचना की उसने चारों वेदकी आज्ञाएँ ठहराई और चार वर्ण और चार आश्रम बनाए । मनुष्य बंधना ध्यान करना है मुक्ति
नबियोंके पुस्तक करनतियुनके लिये पोलूस रसूलका पत्र
चाहता है। जबलों उसमें जातीयताका ध्यान रहेगा तबलों न तो उसको ज्ञात होगा, न मुक्ति ही होगी। यही सब सन्तों और सत्यगुरुकी आज्ञा है। अब रहे चार आश्रम। सो इन चार आश्रमोंमें प्रथम श्रेणी ब्रह्मचर्यकी है। इस ब्रह्मचर्यकी अवस्थामें वेदपाठ इत्यादि मनुष्योंको आवश्यक है। कारण यह कि, मनुष्यको छोटेपनमें और दूसरा कर्म इससे अच्छा है ही नहीं।
ब्रह्मचर्योपरान्त संसार करनेकी आज्ञा है। जिसको गृहस्थाश्रम कहते हैं। जब मनुष्य वेदपाठसे निस्तार पावे तब संसार करने कहा है। इस कारण कि, वेदपाठद्वारा सांसारिक काम धाम भलीभाँति हो सकता है। सांसारिक काम धाम यज्ञ हवन दान इत्यादिके ठीक ठीककरनेका ढङ्ग उसको मालूम हो जाता है। जब वेदपाठी होकर पुनः संसारके बखेड़में पड़ा तो वेदपाठ मुक्तिमार्ग न ठहरा जिसने कि, सांसारिक कार्योंमें लिप्त किया। गृहस्थोपरान्त वानप्रस्थकी श्रेणी है। जब गृहस्थ एकसमयपर्यन्त कर चुका तब वानप्रस्थकी अवस्थाको स्वीकार करता है। ऐसी अवस्थामें उसको वनमें रहने, अग्निकी सेवा और आत्मातत्त्वके विचारनेकी आज्ञा है। जब मनुष्य वानप्रस्थ हो जाता है, तब पहलेकी दोनों अवस्थाएँ झूठी ठहर जाती हैं। वानप्रस्थके उपरान्त चौथी श्रेणी संन्यासकी है उस आश्रमकी यह प्रशंसा है कि, जब मनुष्य तीन ईषणाको छोड़ दे तब संन्यासको स्वीकार कर सकता है। वह तीनों ईषणा ये हैं—स्त्री, पुत्र, धन जबलों इन तीनोंसे स्नेह रहेगा तबलों कोई संन्यासी नहीं हो सकता है जब मनुष्य संन्यासी ठहर गया तब पहलेकी वह तीनों अवस्थाएँ मिथ्या तथा बेजड़की ठहर जाती हैं। जब यह संन्यासी हो गया तब उसको निश्चय अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करना पड़ता है। जब यह शुद्ध चेतन अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करता है। जिस अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करता है वह अद्वैत ब्रह्म ध्यानमें नहीं आता और जो ध्यानमें आता है सो सब द्वैत है। अद्वैत ब्रह्मपर्यन्त मन बुद्धि वाणी इन्द्रिय आदिकी तनिक भी पहुँच नहीं हैं। उसका रूप वही कृपाकरके दिखा दे तो दिखा दे नहीं तो दर्शन होना कठिन है। यदि वो गृहस्थमें दर्शन दे तो उसी अवस्थामें भी वो सब कुछ बना सकता है।
जब इन चारों वर्ण तथा आश्रमको यह छोड़ दे तब मुक्तिमार्गको ढूँढ़ सकता है। इस कारण इस बातको भली भाँति जानलेना चाहिये कि, संसारियोंको पुस्तकपाठ तथा वेदपाठ सांसारिक कार्योंके निमित्त है। मतलब कामना मुक्ति मार्गमें बिलकुलही व्यर्थ हैं। पर निष्कामोंको यही मोक्षके साधन है। वहाँ केवल सत्यगुरुके पथ दिखानेकी आवश्यकता है। भक्तिके दीवाने तो भक्तिके सिवा
अनागत वक्ताके कृत्य
सबको निकम्मा समझते हैं । इसी विषयपर कबीर साहिबने एक शब्द लिखा है —
पण्डित कौन कोबधि तोहि लागे । तू राम न जपै अभागे ॥
वेद पुराण पढ़े क्या होए क्या खच्चर सिरमारा ।
रामनामकी सुद्ध न जानी बूडचो सब परिवारा ॥
वेद पुराण सुनैका यह मत सब घट चीन्हों रामा ।
सब घट ब्रह्म एककर जाना सुफल होय तेरो कामा ॥
नारद कहै व्यास मुख भाषै शुकदेव पूछो जाई ।
कहैं कबीर एक राम जाने बिन बूडी सब ब्रह्मणाई ॥
ए पण्डित ! यह तुझे क्या कुबुद्धि लग गई कि, जिससे ए अभागे ! तू राम राम नहीं कहता । तूने इतने वेदशास्त्र पढ़े हैं, क्या उनसे तुमने कुछ भी सार ग्रहण नहीं किया ? यौही रट रट कर शिर खालीकर डाला । तूने राम नामका रहस्य न समझा । सारा कुटुम्ब पंडित होकर पढ़ पढकर ही संसार सागरमें डूब गया वेदपुराण सुननेमें क्या है जिस रामकी रामायण सुनते हो उसको सबमें व्यापक देखो, सबमें एकही राम देखो, भेद भाव मत मानो, सब काम सफल हो जायेंगे । यदि मेरी बातमें सन्देह हो तो नारद और व्याससे पूछलो । वे भी यही बतायेंगे भलेही शुकदेवसे पूछलो । कबीर तो यही कहते हैं कि, बिनारामके जाने सब पंडिताई डूब गई क्योंकि, सब ब्राह्मणपना उसीमें है ।
अध्याय १२ ।
विश्वास ।
चित्त जिधरको फिरता है उसको बुद्धि मान लेती है । वह बात मिथ्या हो, अथवा सत्य हो सत्यके रूपसे दिखाई देती है । बुद्धि और विश्वास दोनों मिथ्या हैं विश्वास, मिथ्या और निष्कारणको कारणवाला बना लेता है । सारे विश्वास अविद्यामें सत्य हो रहे हैं । पर लुढ़नी विद्यामेंही सबकी यथार्थ अवस्था जानी जाती है । जिस बात अथवा जिस भस्मपर विश्वास होगया हो वही सच्चा तथा ठीक माना जाता है । यदि विचार करके देखा जाय तो यही स्वर्ग नरक दोनोंका कारण तथा बन्ध मोक्षका पिता है ॥
विश्वासकी झलक ।
वैरागी लोग विष्णु तथा रामकृष्णका पूजन करते और आठ प्रकारकी मूर्तिपूजाको सत्य जानते हैं और इस मूर्तिपूजासे अपनी कामना पूर्ण करते
हैं। मूर्तिको पूजकर उस मूर्तिवालेसे मिलकर कृतकार्य होते हैं। कोई रामकृष्णको अपना ईश्वर कोई अपना पुत्र करके पूजता है कारण यह कि, पुत्रसे विशेष प्रेम होता है। प्रेम बढ़ानेके निमित्त कोई छोटा पुत्र अथवा युवक करके मान लेता है। जैसा मानता है वैसाही देखता है। एक गोकुली गोसाईं जो सांसारिक था पति पत्नी दोनों कृष्णचन्द्रको अपना पुत्र करके पूजते थे उस साधुके छः पुत्र और छः बहूवें थीं। एक चुड़हारी आई उसकी छः बहूओंने चूड़ी पहनी। सब बहूवें चूड़ी पहन चुकीं तब उनकी सास चूड़ीका मूल्य देने लगी। जब उनकी सास छः स्त्रियोंके चुड़ियोंका मूल्य देने लगी तब चुड़िहारीने कहा कि, मैंने सात स्त्रियोंको चुड़ियाँ पहनाई हैं। तब सासने कहा कि, मेरी तो छः बहूवें हैं तूने सातवीं किस स्त्रीको चुड़ियाँ पहनाईं? दोनोंमें झगड़ा हुआ। उस चुड़िहारीने दाम नहीं लिया कहा कि, मैं सातका मूल्य लूँगी। वह चुड़िहारी खाली हाथ अपने घर चली गई। जब रातको वह महा अधिकारी गोसाईं सोया तब राधिकाजी स्वप्नमें आकर उनके सामने खड़ी हुई कहने लगी कि, बाबा ! तुम चुड़िहारीको दाम क्यों नहीं चुका देते क्या मैं तुम्हारी बहू नहीं हूँ ? तुम्हारी छः बहूओंके साथ सातवीं मैंने भी चूड़ी पहनी थी। मैं भी तुम्हारी बहू हूँ। तुम चुड़िहारीको मूल्य देदो। जब राधाजीने ऐसा कहा तो प्रातः काल होतेही इस साधुने उस चुड़िहारीको बुलाकर सातों बहूओंकी चुड़ियोंका मूल्य दे दिया। कारण यह कि, वह गोसाईं कृष्णको अपना पुत्र मानकर अपनेको पतिपत्नी नन्द यशोदा जानते थे।
एक नवाब वृन्दावनमें गए। वहाँ जो उन्होंने कृष्णके गुण तथा उनका विवरण सुना तो वे उनपर आसक्त हो गए। अपने राज्यको छोड़कर योगी हो गए। उसकी सैन्य तथा नौकर चाकर रोते पीटते घरको पलट गए। वह नवाब एक साधुका शिष्य होकर वृन्दावनमें रहने लगा। गुरुने इस नवाबका नाम मीरमाधव रक्खा। वह मीरमाधव जो भोजन दे खाले इधर उधर पड़ा रहे। एक दिवस मीरमाधव भूखे ही ठाकुर मन्दिरके पिछवाड़े पड़े थे। जब अर्धनिशा हुई तब कृष्णचन्द्र थालीमें भोजन और लोटेमें जल लेकर मीरमाधवके सामने गए। भोजन तथा जल रखकर कहा कि, खाओ। तब कृष्णचन्द्र तो चले गए। मीरमाधवने भोजन किया तथा जल पिया। जब प्रातःकाल हुआ तब ठाकुरका पूजारी उठा, बर्तन भाँडे सभाँलने लगा। पर थाली और लोटा न पाया, उसे ढूंढने लगा। जब ठाकुरके मन्दिरके पीछे गया तब मीरमाधवके सामने सउ
चौथी पुस्तक कुरान अल्लोपनिषद् कुरानका सूक्ष्मसार
थाली लोटाको जूँठा पाकर बडाही क्रुद्ध हुआ । मीरमाधवको मार कूटकर थाली लोठा ले आया । जब स्नान करके ठाकुर पूजने गया मन्दिर द्वार खोला तो देखा कि, ठाकुरोंकी बुरी दशा है । मूर्तिपर धूल पडी है कपडे फटे हैं । बडे दुःखमय आकारमें दिखाई दी । यह अवस्था देखकर पुजारी बडा चिन्तित हुआ । इसी सोचमें पुजारी जब रातको सो गया तब ठाकुरने स्वप्नमें कहा कि, मीरमाधवको जो तुमने मारा सो समस्त मार मुझपर पडी । मीरमाधवसे मुझमें तनिक भेद न समझो । प्रातःकाल होतेही वह पुजारी मीरमाधवके चरणोंपर गिरकर अपने अपराधको क्षमा कराया ।
मिरजा खुशदिलका भी ऐसाही वृत्तान्त है भक्तमालमें देखो ।
नरसीभक्त मग्न होकर ठाकुरके सामने नाच रहे थे । उनकी स्त्री भी नाचने लगी । पुत्री भी नाचने लगी । इन तीनोंको प्रेममें नाचते देखकर मूर्तिमेंसे कृष्णजी भी निकलकर उनके साथ नाचने लगे । नरसीकी कामना पूर्ण हुई ।
पीपाजी द्वारकाको गए । उनकी स्त्री साथ थी, लोगोंसे पूछा, पहली द्वारका कहाँ है ? तब डोंगोपर चढ़ाकर मल्लाह ले गया । जहाँ पहली द्वारका समुद्रमें डूब गई थी वह स्थान दिखलाया । देखतेही पीपाने समुद्रमें बुडकी मारी । पीपाके कूदतेही पीपाकी स्त्री भी समुद्रमें कूद पडी । जब वे दोनों जलके गर्भमें चले गए तब उनको वहाँ असली द्वारका दिखाई दी । कृष्णचन्द्रने अपने एक हाथपर पीपा और दूसरे हाथपर सीताको लेकर कुछ दिवसोंपर्यन्त अपने पास रक्खा । फिर कहा कि, अब तुम पृथ्वीपर जाओ । यद्यपि पीपाने बहुत कहा कि, अब मैं जाना नहीं चाहता पर कृष्णजीने कहा कि, तुम निश्चय जाओ । पीछे छाप देकर कृष्णजीने पीपाको बिदा किया । पीपा भक्तकी छाप आज भी द्वारिकामें प्रसिद्ध है ।
एक वेश्या वैरागियोंके उपदेशसे ठाकुरसेवामें लगी । उसने बडे प्रेम सहित कई सहस्र रुपया लगाकर एक मुकुट बनवाया । वह मुकुट लेकर ठाकुरके शीशपर धरना चाहा, पर ठाकुरकी मूर्ति बहुत ऊँची थी । उसका हाथ वहाँलों नहीं पहुँचा । तब ठाकुरकी मूर्तिने अपना शिर झुका दिया । उस कुँजडीने ठाकुरके शीशपर मुकुट रख दिया । सुनते हैं कि उस मूर्तिके शिर अभीतक झुका हुआ है ।
नामदेव और धन्ना भक्तको मूर्तिमेंसे ठाकुर प्रगट हो गए और बिटठल देवको कुत्तेमेंसे प्रकट हो दर्शन दिये ।
तुलसीदासजी वृन्दावन गए तब राधेकृष्णको दण्डवत् प्रणाम नहीं किया ।
कहा कि, यदि यह सीतारामकी मूर्ति हो तो मैं दंडवत् करूँ । तुलसीदासके देखतेही देखते वह राधेकृष्णकी मूर्ति सीता रामकी हो गई । तुलसीदासजीका—
दोहा—कह वारणो छवि आज का, भले वने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तव नवे, धरो धनुष शर हाथ ॥
कित मुरली कित चंद्रिका, कित गोपिनको साथ ।
तुलसी जिनके कारणें, नाथ भये रघुनाथ ॥
सैन भक्तके निमित्त ठाकुरने नाऊ बनकर राजाकी सेवा की । ऐसे सहस्रों उदाहरण हैं ।
संन्यासी विष्णु और शिव दोनोंको एक स्वरूप जानते हैं । विष्णुकाञ्ची और शिवकाञ्चीका विवरण है कि, विष्णुकाञ्ची जो आचारी हैं वे शिवका दर्शन नहीं करते । एक दिवस एक संन्यासी विष्णुकाञ्चीमें जाकर विष्णुकी मूर्तिके सामने शिवस्तुति करने लगा । तब उस विष्णुमूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकल पड़ा । जब वह संन्यासी मन्दिरके बाहर निकल गया तब लोगोंने देखा कि, ठाकुरकी मूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकला हुआ है । तब आचारियोंने कोलाहल मचाया कि, यह क्या हुआ ठाकुरके शिरमेंसे शिवलिङ्ग निकल पड़ा । इस संन्यासीको दृढ़कर ले आये और बहुत कुछ प्रार्थना की कि, इस बुराईको विलोपित करो । तब उस संन्यासीने विष्णुके सामने दंडायमान होकर विष्णुकी बड़ी स्तुति की तो शिवलिङ्ग विलोपित हो गया । केवल विष्णुमूर्ति रह गई ।
एक प्रामाणिक पुरुष द्वारा प्रगट हुआ है कि, अम्बाला प्रांतके शाहाबादमें कितने मन्दिर और कितने समाधालय दिखाई दिये—वहाँपर किसी श्रेष्ठ पुरुषकी क़ब्र थी । उस क़ब्रपर शिवलिङ्ग था । मुसलमानलोग उस लिङ्गको भङ्ग करने लगे । तब उस शिवलिङ्गसे ऐसी रक्तधारा प्रवाहित हुई कि, समस्त मनुष्य भयभीत हुए । उन लोगोंकी इच्छा हुई कि, उस लिङ्गको खोदकर फेंक दें । तब उन लोगोंने सौ गजपर्यंत खोदा, पर उस लिङ्गकी हद नहीं मिली । तब विवश होकर उसको छोड दिया । अब हिन्दूलोग उसको पूजते हैं ।
सन् १८५५ ई० की यह बात है और यह आश्चर्यमय व्यापार देखकर सबलोग चकित रह गए ।
सन् १८१० ई० में सहारनपुर जिलेके अन्तर्गत पठानपुरामें एक आलयसे शिवलिङ्ग निकला । वह आलय मुसलमानका था । मुसलमानलोग वैसे उसपर भ्रष्ट जल डालते । उन लोगोंने सौ हाथपर्यन्त खोदा । उसको मकानसे
बलिका निषेध
निकालना चाहा, पर उस लिङ्गका अन्त उनको नहीं मिला। तब विवश होकर उसको उन्होंने छोड़ दिया और हिन्दू उसको पूजते हैं।
नानकशाह महाशयकी जन्मसाखीमें लिखा है कि, जब आप भवकेमें गए तब मरदानाने पूछा कि, गुरुजी ! इस भवकेके भीतर क्या है ? तब नानकसाहबने उत्तर दिया कि, तुम जाकर देखो। तब मरदानाने कहा कि, मुझको यहाँके झाड़ू देनेवाले भीतर जाने न देंगे। तब नानकसाहबने कहा कि, तू जा, तू सबको देखेगा पर तुझको कोई न देखेगा। मरदाना भीतर जाकर देख आया। फिर नानकसाहबने पूछा, क्या देखा ? तब मरदानेने कहा कि, वहाँ देखनेको क्या है ? भवानके भीतर एक नग्न मूर्तिमात्र पड़ी है, दूसर, कुछ नहीं। तब नानकशाहने कहा कि, वह शिवजीकी मूर्ति है। मुहम्मदसाहब और अलीने समस्त मूर्तियोंको तोड़ा तथा पृथक् किया, पर उस मूर्तिको हटा नहीं सके। मुहम्मद साहबके पीछे खूबवार हुसेनी नामक एक बादशाह हुवा। उसने उस मूर्तिको अलग करना चाहा। तब उसके सारे शरीर तथा उसके समस्त सैन्यमें आग लग गई। सब मरने लगे तब उस बादशाहने अपने दोषके निमित्त क्षमा-प्रार्थना की। इस कार्यसे हाथ रोका। तब उसको और उसकी फौजको सुख मिला।
भवतवर पीपा कबीर साहिबके गुरु भाई थे। आपका बाहा विश्वास था जो कि कबीर साहिबका है। आप भी उसी तत्त्वके उसी पथसे उपासक थे जिसकी तत्त्वसे तथा जिस पथसे कबीर साहिब थे। पीपाके विश्वासकाही प्रभाव था कि सच्ची द्वारिकामें पहुँच गया कबीर साहिबके राम मंत्रके विश्वासकी करामात थी कि सिद्ध पदवी पाई। यद्यपि असत्में सत्का विश्वास उतना लाभदायक नहीं होता जितना कि सद्दस्तुका होता है संवादी भ्रम तो साक्षात् कल्याणकारी दीखताही है। पर झूठे विश्वासमें सुख नहीं है भक्तोंके श्रद्धा विश्वास निराले हुआ करते हैं उनकी दीवानगी अनन्य भक्तिको लिये हुए होती है। जो कुछ वो चाहते हैं सत्य पुरुषको वही बनना पड़ता है। इसका रहस्य साधारण व्यक्ति नहीं समझ सकते। इसे वे ही समझ सकते हैं जिनके दिलमें कुछ प्रकाश हो।
जीवकी हालत ।
पहिलेमें कुछ और था पर जब मेरी यथार्थ अवस्था बदल गई और मैं दूसरी अवस्थामें आया तब मैं भ्रमका पुतला हो गया और मैं सहस्रों प्रकारके धर्म कर्म स्थिर करने लगा। एक धर्मको मैं सच्चा ठहराता हूँ तथा दूसरेको झूठा समझता हूँ अनगिनती धर्म मैंने स्थिर किए और कर रहा हूँ और भविष्यमें
करूँगा। सो सब मेरे भ्रमकी अवस्थामें ठहराए गये हैं। एक स्थिर करता हूँ तथा दूसरे को काटता हूँ न मेरी बुद्धि ठिकाने है और न मेरे विश्वास स्थिर हैं। मैं अपने पागलपनमें सब कुछ कर रहा हूँ। इसी पालगपनेकी अवस्थाको मैं अपनी बुद्धि अवस्था मानी तथा दूरदर्शिता समझता हूँ। यद्यपि यह सब बातें मैं अपने अज्ञानावस्थामें करता हूँ। जबसे मैं भ्रममें पड़ा तबसे मैंने अपने निमित्त दो मकान बनाएँ। इन्हीं दोनों मकानोंमें रहा करता हूँ। एकका नाम पिण्ड तथा दूसरेका नाम ब्रह्माण्ड है। ये दोनों पागलखाने हैं मैंने अपने मकानमें नौ महल बनाए वे ये हैं—दानमयीकोश शब्दमयी कोश बाणमयीकोश आनन्दमयी-कोश मनुमयीकोश प्रकाशमयीकोश ज्ञानमयीकोश आकाशमयीकोश प्रज्ञानमयीकोश।
इस नौ महला मकानमें मैं रहने लगा। जब जिस महलमें जाकर बैठता हूँ तब मेरा ढङ्ग वैसाही हो जाता है। सब बल धन इत्यादि उसीके अनुसार प्राप्त होता है। मेरी स्थिति सदैव इसी नौमहला मकानमें रहती है। बाहर जानेका बल नहीं। कभी मैं नदी कभी बूंद बन जाता हूँ। नदी बूंद दोनोंमें एकही कौतुक है। मैं अपने असलको भूल गया। मैंने अपने गलेमें मालाको पहनकर इधर उधर ढूँढ़ता फिरता हूँ। मैं अपने कानपर लेखनी रखकर भूल गया ढूँढ़ता फिरता हूँ। जब किसीने कहा कि, कलम तो तुम्हारे कानपर है तब मैंने अपनी कलम पायी। मैं जान बूझकर भटकता रहा, दूसरेके बतलानेका ओहताज हो गया। इस प्रकार मैं अपनी पूर्वावस्थामें पृथक् होकर दूसरोंके बतानेका ओहताज हो गया। पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों हमारे बनाए हैं पर मैं भूल गया। नहीं जानता कि, किसने बनाया। आपको और तथा बनानेवालेको और जानता हूँ। मैंही दास तथा मैंही परमेश्वर बन बैठा, असली परमेश्वरको मैं नहीं जानता, नहीं पहचान सकता, असल परमेश्वर मेरे कहने सुननेसे परे हैं। उसको न पहचाननेसे मैं पागल बन रहा हूँ। मेरे जप तप पूजा वंदना आदिक सब भ्रम हैं, इनके, द्वारा जो कुछ प्राप्त होता है वह सब अस्थायी तथा जल परकी लकीरके समान है। कबीर साहबका वचन है कि, ये सब मनुष्योंके कर्म हैं सो सब भ्रम हैं यही बात देवी भागवतके नवें स्कन्ध और १९ अध्यायमें देखा—महामायाका वचन है कि, सात करोड़ महामंत्र जो हैं सो सब मेरे नाम हैं। अतः जो वेद शास्त्र हैं और जो कहने सुननेमें आता है सो सब माया है जो कुछ माया है, सो सब भ्रम और धोखा है। मायाको माया खाजाती है। जो मायासे पृथक् है वो ही बचा है। दूसरे सब नष्ट हो जावेंगे मैं जब सर्जन कर्ता बन बैठता हूँ तब जानता हूँ कि,
यह सब सृष्टि मेरी है । जब मैं स्वयं सृष्टि बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह रचयिता मेरा है । इसी प्रकार जब बादशाह बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह सब प्रजा मेरी हैं । जब मैं धनहीन तथा दरिद्र हो जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह मेरा सच्चाट है और मैं इसकी प्रजा हूँ । मैं ही तो बादशाह हूँ मैं ही प्रजा हूँ । न बादशाह कुछ है न प्रजा कुछ है । केवल एक जीव है, उसका कुछ नाम रखलो । न यह मनुष्य है, मनुष्यका जन्माया हुआ है । पशु पक्षी जड़ चैतन्य सभी कुछ यह है पर सबसे पृथक् यह है । मैं नहीं जानता कि, पहले मैं क्या था । अब मैं क्या हूँ । मैं पाँच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्रियोंसे पृथक् हूँ । तथा संयुक्त भी हूँ । मैं अब भ्रमरूप हूँ । मैं पहले एक भ्रम था फिर अनेक हो गया । मैं ढोल बजाता हुआ जाता हूँ एक दूसरा भ्रम व्याहकर लाता हूँ । एक भ्रम दूसरे भ्रमके साथ मिलावट करते हैं तब दूसरा तीसरा फिर चौथा भ्रमरूप लड़का लड़की उत्पन्न होते हैं फिर उनके प्रेममें फँसकर मर जाता हूँ । जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब अनगिनती भ्रम एकसे अनेक हो जाते हैं । जैसे बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है वो समस्त बनको भस्म कर देती है इसी प्रकार जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब उसके समस्त सुकार्य तथा भले कामोंको भस्म करके राखमें मिला देते हैं । यह अज्ञानवश कहता है कि मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी पुत्री मैं अपने बाल बच्चोंके निमित्त कमाई करूँ । कमाकर उनका पालन करूँ । यह मूर्ख इतना नहीं सोचता कि, जिसने मुँह पेट बनाया है वही पालन भी करेगा मैं बाल बच्चोंके सोचमें जोमरता हूँ सो मेरा क्या किया होता है । जिसने मुँह और पेट बनाया उसीने आटा दाल नमक आदिक सब कुछ बनाया । जीवन-भर कमाईके ध्यानमें फँसकर खराब होता है । अपने परमेश्वरकी वंदनाकी ओर तनिकभी ध्यान नहीं देता है न सोच तथा विचारही करता है कि, मैं किस-कारण मनुष्य कहलाता हूँ । मनुष्यता क्या है । यदि मैं मनुष्य हूँ तो मुझको अवश्यही मनुष्यताकी ढुंढाई करनी चाहिये ? जब मैं मनुष्यता पर अधिकृत होता हूँ तब मेरा समस्त कार्य पूरा होगा । जबलों केवल मेरी सूरत मनुष्योंकी है कार्य पशुओंका है बुद्धि पशुओंकी है, तबलों मैं कदापि मनुष्य नहीं हूँ । इस कारण मुझको अवश्यही उद्योग करना चाहिए, । जिसमें मनुष्यताकी बातोंको प्राप्त करूँ । जबतक मुझमें मनुष्यता न हो तबतक मैं कदापि मनुष्य नहीं समझा जा सकता हूँ ।
चार-पशु
क. ११ पृ. ११७—नरपशु गुरुपशु, वेद पशु, तिरयापशु संसार ।
कहैं कबीर सो पशु नहीं, जाके विमल विचार ॥
कबीर साहब कहते हैं कि, इस संसारमें चार पशु हैं। ये पूरे तथा पक्के पशु भीतरी आँखोंसे अंधे हैं। यद्यपि वे बाहरी आँखोंसे देखते हैं तथापि अंधोंके समान समझे जाते हैं। ये चारो पशु, मूर्खता तथा नासमझीके खूंटोंके साथ बंधे पड़े रहते हैं।
नरपशु ।
नरपशु, पशुरूपी वह मनुष्य है जो बिनाजाँचे किसीके कहनेसे विश्वास करके उसका पीछा करे। जैसे किसीने कहा कि, कौवा तेरा कान लिये जाता है तो वे नहीं टटोले पर कौवेके पीछे दौड़े। यह नरपशु अपने मनमें नहीं सोचता कि, मैं उसके कहनेका विश्वास क्यों करूँ मेरे कान तो मेरी देहमें है। पर वह कहता है कि, अमुक मनुष्य जो कहता है उसकी बात मिथ्या कैसे ठहर सकती है? इसी प्रकार यह एक उदाहरण है :—
दृष्टान्त ।
एक राजा था उसके पास एक बड़ा श्रेष्ठ बुद्धिमान मंत्री था। वो राजा तो मूर्ख तथा नरपशु था। उसके मंत्रीका नाम मूच्छु था। इस मंत्रीसे समस्त दरबारी महान् शत्रुता रखते थे। सब चाहते थे कि, मूच्छु किसी प्रकार हट जावे तो हम राजाको भलीभाँति लूटें। पर मूच्छु बड़ा चैतन्य रहता था। बड़ी नमकहलालीके साथ काम किया करता था। राज्यमें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित नहीं होने देता था। एक बार इस राजाको चढ़ाईकी आवश्यकता हुई।
वैरी राजाका दुर्ग बड़ा दृढ़ था कि, उसका टूटना दुष्कर था तब समस्त अन्यान्य कर्मचारियोंने सलाह की कि, इस अवसरपर मूच्छुको भेजना उचित है। जिसमें यह जब वहाँ जावेगा तो निश्चय मारा जावेगा। सबोंने मिलकर राजासे कहा कि, ऐ महाराजा ! आप इस युद्धमें मूच्छु मंत्रीको भेजो तो वह दुर्ग हस्तगत होगा। राजाने कहा मान लिया मूच्छुको भेजा, वह गया। लड़ भिड़कर उस दुर्गको करकवलितकर लिया। समस्त वैरी अधीन हो गए। तब मूच्छुके वैरियोंने आपसमें परामर्श किया कि, अब तो मूच्छु विजयी हुआ। इस राजाके सामने उसकी बड़ी मान मर्यादा होगी। हम लोगोंका निरादर होगा। इस कारण अब कुछ धोखा करना चाहिए। तब इन सबोंने आकर कहा कि, महाराजा ! मूच्छु तो मारा गया। हम लोगोंने दुर्गको विजय कर लिया। मूच्छु भूत हो गया। इस राजाको विश्वास हो गया उसने मूच्छुके स्थान दूसरा मंत्री रख लिया। जब मूच्छुने सुना कि राजाने दूसरा मंत्री रख लिया, तब उसको संसारसे बड़ी घृणा होगई। भगवद्भजनमें लग गया। मूच्छुके वैरियोंने राजाको
सिखला रक्खा था कि, अब मूच्छु भूत बनकर फिरा करता है । यदि वह आपके समीप आवे तो उसको कदापि आने न देना एकदं उसको देखकर भागना । कारण यह कि, जो कोई उसके समीप जाता है उससे वह चिपट जाता है । यह बात राजाके मनमें भली प्रकार बैठ गई । एक दिवस राजा आखेट करनेके निमिख बनको गये । मूच्छु एक पेड़के नीचे बैठकर भगवद्भजनमें लीन था । जब राजा बनमें गया तब मूच्छु मंत्रीको बूझके नीचे देख जान लिया कि, यह वही मेरा मंत्री है जो प्रेत हुआ है । ऐसा न हो कि, यह भूत मुझसे चिपट जावे । राजा तुरंतही अपना घोड़ा दौड़ाकर भाग गया । उस नरपशुको तनिक भी सुध नहीं हुई कि, इस चकमेको तो जान जाय ।
दूसरा दृष्टान्त ।
एक राजाने अपने नौकरोंको घाटपर भेजा कि, धोबीसे वस्त्र धोनेको सहेजदें । भूत्य जब घाटपर धोबीके पास गया तो देखा कि, धोबी सूढर सूढर कर रो रहा है । इस धोबीको रोता देखकर राजाके भूत्यने पूछा कि, तू क्यों रोता है ? उसने उत्तर दिया कि, सूढर मर गया । यह बात सुनकर राजाका भूत्य भी सूढर सूढर कहकर रोता हुआ राजाके पास लौट गया । राजाने पूछा तू क्यों रोता है ? उसने उत्तर दिया कि, सूढर मर गए । उसे रोता देखकर राजा भी सूढर सूढरकर रोने लगा । राजाके रोते हुए, राजाके महलकी समस्त रानियाँ और समस्त नगर सूढर सूढर कहकर रोने और पछाड़ खाने लगे । कुछ कालोंके पीछे राजाका मंत्री आया । राजाको रोते तथा समस्त नगरको शोकाकुल देखकर उसने पूछा कि, ए महाराज ! आपके विलापका क्या कारण है और समस्त नगरमें ऐसा शोक क्यों फैला हुआ है ? तब राजाने कहा कि, सूढर मर गए । तब मंत्रीने पूछा कि, सूढर कौन था ? तब राजाने कहा कि, मैं तो नहीं जानता । अपने भूत्यको रोता देखकर मैं भी क्रंदन करने लगा था । मंत्रीने उस भूत्यको बुलाकर पूछा कि, सूढर कौन था जिसके निमित्त तू रोता था । भूत्यने उत्तर दिया कि, मैं कुछ नहीं जानता पर धोबी सूढर सूढर करके रोता था । उसको देखकर मैं भी रोने लगा तब मंत्रीने उस धोबीको बुलाया और पूछा कि, तू बतला कि, सूढर कौन था जिसके निमित्त तू रोता था ? तब धोबीने उत्तर दिया कि, मेरे पास एक गदहेका बच्चा था उसका नाम मैंने सूढर रख दिया था उसको मैं बहुत चाहता था वह आज घाटपर मर गया उसके दुःखसे मैं रो रहा हूँ ।
गुरुपशु ।
गुरुपशु वह है कि, जो बिना ज्ञांचे शिष्य किया करता है । जो शिष्य
समझदार होता है पहले भलीभाँति समझबूझ लेता है तब गुरु करता है। चार बातोंकी जाँच करलेना चाहिए। अर्थात् गुरु, शास्त्र, आचार्य, ईश्वर, ये चारों बातें जब भली भाँति जानी, जाय तब गुरु करना उचित है। प्रथम गुरु, सर्वतोभावसे योग्य हो। द्वितीय शास्त्र निर्दोष तथा निष्कलङ्की हो। तीसरे धर्मका अग्रगण्य सब प्रकारसे योग्य तथा निर्दोष हो। चौथे यह जानना चाहिये कि, वह गुरु किस ईश्वरकी भक्तिमें लगाता है। जिस ईश्वर अथवा देवताकी प्रार्थना बतलाता है वह देवता कैसे गुण तथा क्या बल रखता है ? हमें वह छुटकारा देसकता है वा नहीं ? यदि वह सर्वतोभावसे योग्य तथा सामर्थ्यवान् है तो उसका पूजन उचित है क्योंकि मनुष्य अंधे गुरुसे मुक्ति नहीं पा सकता है।
साखी - कबीर - जाको गुरु है अंधरा, चेला खरा निरंध ।
अंध अंधको ठेलिया, परे कालके फंद ॥
चौपाई - गुरु गुरु कहत सकल संसारा । गुरु सोई जिन तत्त्व विचारा ॥
प्रथम गुरु हैं पिता व माता । रज वीरजके सोई दाता ॥
दूसर गुरु है मनकी दाई । ग्रीहवासकी वंद छोड़ाई ॥
तीसर गुरु जो धरियानामा । लै लै नाम पुकारै गाभा ॥
चौथे गुरु जिन दीक्षा दीना । जगव्यवहार रहत सब चीना ॥
पँचवें गुरु जन वैष्णव कीना । रामनामको सुमिरन दीना ॥
छठवें गुरु जिन भ्रमगढ़ तोड़ा । दुविधा मेट एकसे जोड़ा ॥
सातवा गुरु सत शब्द लिखाया । जहाँका ततले तहां समाया ॥
साखी - कबीर - सात गुरु संसारमें, सेवक सब संसार ।
सतगुरु सोई जानिए, भवजल उतारे पार ॥
कबीर कान-फूँका गुरु, हृदका बेहृदका गुरु और ।
बेहृदका गुरु जब मिले, तो लहे ठिकाना ठौर ॥
अर्थ-कबीर साहिब कहते हैं कि, जिसका गुरु अन्धा है उसका चेला उससे भी अधिक आंधरा होगा, अन्धागुरु चेलाको अन्धकारकी ओर ही ठेलता है इस तरह दोनों ही नरकके फन्देमें फस गये। कालने उन्हें कवलित कर लिया सारा संसार गुरुगुरु कहता है, पर वही गुरु है जो तत्त्वका बिचार रखता है। सबसे पहिले तो मा और बाप गुरु हैं क्योंकि, वे ही अपने रज वीर्यसे शरीरको उत्पन्न करते हैं। दूसरी गुरु सुखपूर्वक जतन करानेवाली दाई है जिसने गर्भवासकी कैंद छुटादी। नाम करण करने वाले तीसरे गुरु हैं क्योंकि, सब लोग उन्हींके रखे नाम से बोलते हैं। यज्ञोपवीत कराने वाले तथा पढ़ाने लिखाने और व्यव-
हार सिखानेवाले चौथे गुरु हैं । पाँचवे गुरु वे हैं जिन्होंने वैष्णव बना राम नामका मंत्रका सुमिरन देकर भगवान्की ओर लगाया । भ्रमदुर्गके तोड़ने वाले छठे गुरु हैं । जिन्होंने दुविधा मिटाकर एकसे नेह लगवा दिया । सातवे वे गुरु हैं जो शब्द लिखा दिया जिससे यथार्थ तत्त्व जान उस तत्त्वमें निमग्न हो गया अथवा संसारका तत्त्व लेकर इसे जैसेका जैसा दिखा दिया । मैं जहाँसे आया था वहीं जा दाखिल हुआ । कबीर साहिबका कथन है कि, दुनियाँमें सात गुरु हैं सारा संसार इन्हींका सेवक है । सतगुरु या सातवों उसीको समझिये जो भवसागरसे पार लगादे । कानफूका तो हृदका गुरु है । बेहद (ब्रह्म) का नहीं । जब बेहदका गुरु मिल जाता है उस समय वो औरका और ही हो जाता है । संसारीका असंसारी एवं अल्पज्ञका सर्वज्ञ बन जाता है ।
जो शिष्य होना चाहे वह पहले भली भाँति जाँच करे । जो कोई बिना जाँचे गुरु करता है वो बिगड़ता है । अँधेरे कुएमें गिरता है ।
अंधोंका पन्थ ।
एक अंधा पुकार पुकारकर कह रहा था कि, मुझको सातों आकाश और वैकुण्ठ सब कुछ दिखाई दे रहा है । उसके पास एक मनुष्य खड़ा था । वह अंधेसे कहने लगा कि, ए भाई ! मुझे भी वह आकाशका मार्ग बता ? अंधेने कहा कि, तूभी आँख फोड़वावे तो तुझको भी दिखाई देने लगे । उसके कहनेसे अपनी आँखें फोड़वाई । उसकी आँखें फुट गईं तब उसने कहा कि, मुझे तो कुछ भी दिखाई नहीं देता । तब पहलेके अंधेने उसे सिखाया कि, तू भी मेरी तरह कह । वह भी उसी प्रकार कहने लगा कि, मुझे समस्त स्वर्ग दिखाई देते हैं । मेरी भीतरकी आँखें खुल गईं । तब इन दोनोंकी बातें सुनकर एक तीसरेने भी अपनी आँखें फोड़दी । फिर चौथे पाँचवने आँखें फोड़वाईं । जो कोई आँखें फोड़वाता उसको पहलेका अंधा सिखा देता कि, जैसे मैं कहता हूँ इसी प्रकार तू भी कह । वह भी वैसाही कहने लगता था । तात्पर्य यह कि, बीस तीस मनुष्योंने मिलकर अपनी आँखें फोड़वालीं । तब एक और मनुष्य आया उसने भी अपनी आँखें फोड़वाईं और जब उसको कुछ दिखाई नहीं दिया तो उसने कहा कि, मुझको तो कुछ दिखाई नहीं दिया ? तब पहलेका अंधा उसको सिखलाने लगा कि, तूभी इसी प्रकार कह जैसे कि, हमलोग कह रहे हैं । उसने कहा कि, मैं ऐसा कभी भी न करूँगा । दूसरे अंधोंसे पूछा कि, तुमको क्या दिखाई देता है ? सबोंने कहा कि, हम सबने इस पहलेके अंधेके कहनेसे अपनी आँखें
एक परमेश्वरपर कुरान
फोड़वाई थी। सब पुकारने लगे कि, इस पहलेके अंधेने हमारी आँख फोड़वाई है। उस पहलेके अंधेका पाजीपना पूरा प्रगट हो गया।
नकटोंका पन्थ।
मैंने सुना था कि, एक राजाके पास एक मोडा जार रहता था। राजा उसकी बहुत कुछ मान मर्यादा किया करता था, वह बड़ा पाजी तथा दुष्ट था, बहुत पाजीपना किया करता था, पर राजा दयापूर्वक उसको टाल देता, उसको दण्ड न देता था। उसकी विद्याके कारण उसकी बुराई ढाँपता। एक बार वह महादोषके कारण पकड़ा गया। कि, जिसके निमित्त दण्ड न देना राजाको नितान्तही अनुचित मालूम हुआ तो भी राजाने इतना पक्ष किया कि केवल उसकी नाक कटवाकर देशसे बाहर निकाल दिया। उस पाजीने देशसे बाहर निकलकर कुछ यंत्र मंत्र इत्यादिकी साधनाकी। कितनीक जादूगरी इत्यादिसे अपनेको बड़ा चढ़ा लिया जब अपना कार्य सम्पूर्ण करचुका तब अनेक मनुष्योंको धोखा देने लगा। मुक्तिकी आशा दिलाने लगा। आप गुरु बन लोगोंको उपदेश देदेकर शिष्य बनाने लगा। कितनेही लोग उसके भृत्य बनगए। जो कोई उसका चेला बनता उससे वह यही कहता कि, यदि अपनी मुक्ति चाहते हो, तो तुम अपनी नाक कटाओ नकटे बन जाओ। उसके सब शिष्योंने नाकें कटवाई। जैसे कि, मुसलमानों तथा इब्रानियोंका खुतना होता है। इसी प्रकार उनकी नाककी खुतना होने लगा। नकटोंका एक बड़ा झुण्ड उसके साथ हुआ। वह मोडा साधुकी सूरतमें भस्म इत्यादि रमाकर अवधूत बन गया। नकटे पंथका अगुवा हुआ। अपने शिष्योंसहित उसी देशमें पहुँचा बहुत दिवस बीत चुके थे। इस पाजी मोडेकी बात लोग भूल चुके थे इस कारण उसको किसीने नहीं पहचाना। भुज नगरमें रहने तथा उपदेश देने लगा। कितने मनुष्य उस नगरमेंभी उसके शिष्य होगए। उसकी बड़ी प्रशंसा होने लगी। लोगोंको उसने बडे कौतुक दिखाए। यहाँतक कि, स्वयम् राजा उनके दर्शनके निमित्त आए, राजाको भी उसने भौति भौतिके खेल दिखाए जिससे राजाके मनमें उसका विश्वास जम गया। तब राजाको वह समझाने लगा कि, ए राजा ! यह देह तुच्छ तथा घृणित है। यदि परमेश्वरके अर्थ लगाई जावे तो मनुष्यकी मुक्ति हो जावे इस कारण हे राजा ! तू अपनी नाक कटवा कर मुक्ति ले। राजाने अपनी नाक कटवाई उसका शिष्य बन गया। जब राजा शिष्य हो चुका, तब वह पिशाच रानीके पास जाकर समझाने लगा कि, ए रानी ! यह शरीर तो चार दिवसोंमें मिट्टीमें मिल जावेगा तू अपनी नाक कटवा कर
मुक्ति लेले । रानीने कहा कि, मैं न अपनी मुक्ति चाहती हूँ न नाक कटवाती हूँ यद्यपि उसने समझाया पर रानीने न माना । कुछही दिवसोंके बाद वह दुष्ट किसी महापापमें फँसा । किसी महादोषमें पकडा जाकर राजाके समक्ष लाया गया जाँच होने लगी । लोगोंने पहचान लिया कि, यह वही मोडा है जो नाक कटवाकर देश बाहर किया गया था । जाँचके पीछे राजाने जाना कि, उसने मुझसे उस धोखेबाजीसे अपना प्रति शोधलिया । मैंने उसकी नाक कटवाई थी । उसनेभी मेरी नाक कटवाली । तब राजाने उस मोडेको जीवितही पृथ्वीमें गड़वा दिया । फिर नकटापंथके लोग तितिर-बितिर हो गए । यदि वह कुछ दिवसोंपर्यन्त और जीवित रहता तो कदाचित नाककटाईका कार्य भी प्रचलित रहता ।
वेदपशु ।
इस संसारमें चार वेद हैं । वे पूर्वदेशको दिये थे उनके अभाव पश्चिम देशवासियोंको प्रदान किए गए । इस आठोंकी आज्ञापर समस्त मनुष्य चल रहे हैं । वेदपशु वे हैं जो वेद तथा पुस्तकोंको पढ़ते हैं, वेदोंके यथार्थ तात्पर्यसे पूर्णतया अनभिज्ञ हैं । वेदका तात्पर्य तो अन्य है । मनुष्योंको अन्य उपदेश देकर वहका देते हैं । वेदपशु एक अर्थ निकालता है । जिसपर सहस्रों नर पशु विश्वास करके सत्य मानते हुए प्रशंसा करते कहते हैं कि, वाह वाह स्वामीजी ! आपने जो अर्थ किया वोही सत्य है । दूसरोंने जो अर्थ किया वह कदापि सत्य नहीं है । लोग प्रसन्न होकर कहते हैं कि, धन्य स्वामीजी ! आपके समान अर्थ और कौन कर सकता है ? आपके समान पहले न कोई हुआ और न होगा । समस्त नर पशु मिलकर प्रशंसा करते हैं । वेदपशु सुन सुनकर घमंड करता हुआ कहता कि, वास्तवमें मैं ऐसाही जानी हूँ । इस एक वेदपशुके पीछे सहस्रों तथा लाखों नरपशु लगे हुए प्रशंसा किया करते हैं । इस वेदपशुको भलीभाँति फुलाकर घमण्डी करदेते हैं । वह वेदपशु ऐसा फूल जाता है कि, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनता, समझता है कि, मैं वेदपाठियोंमें प्रथम श्रेणीका पण्डित हूँ । यद्यपि उसको वर्णमालाकी सुध भी नहीं है । वेदके वास्तविक तात्पर्यको वह क्या समझे ? वेदकोशमें एक शब्दके अनेक अर्थ कहे हैं । एक अर्थ नहीं वरन् अनेक अर्थ हैं । शब्दोंके समस्त अर्थोंमेंसे एक अर्थको अपनी इच्छानुसार चुनके वेदमंत्रका अर्थ करके लोगोंको समझाता हुआ समस्त नर पशुओंको अपनी ओर खींचता है । इसी प्रकार वेदपशु लोगोंको अपने जालमें फँसाता है । जितने वेदपशुके शिष्य हैं सब वेदपशु हैं । इन सब वेदपशुओंके भाँति-भाँतिके ध्यान
भीतरके अन्धे
हैं। पर जो वेदके सच्चे ज्ञाता होते हैं, वे बड़े भावुक हैं। उन्हें किसीसे द्वेष नहीं होता, न वो लुछचोंकी तरह मूर्तिकी निन्दा ही किया करते हैं।
साखी कबीर — वेद हमारा भेद है, हम वेदोंके माहिं।
जौन भेदमें मैं वसूँ, सो वेदौ जानत नाहिं ॥
कबीरजी कहते हैं कि, मेरा पता वेदसे मिल सकता है कि, मैं कौन हूँ। क्योंकि, हम वेदोंमें हैं, पर अपने आप पता नहीं लग सकता। कहना यह कि, पारखी गुरुकी आवश्यकता है। जिस भेदमें मैं रहता हूँ उसको वेद भी नहीं जानते। केवल नेति नेति कहकर इसकी ओर इशारा ही करते हैं।
यह वेदपशु अज्ञानावस्थामें सब कुछ करता है। मिथ्या तथा सत्यकी उसको तनिक भी सुध नहीं। यह वेदपशु वेद पाठकर घमण्डी होता है। कहता है कि, वेदमें यह बात लिखी है वेदमें वह बात लिखी है। यद्यपि वह पूर्णतया अनभिज्ञ है कि, वेद क्या है तथा किस निमित्त है? उसका वेद और वेद पाठपर इतना घमंड करना और इतराना पाशविक अवस्थामें है। समस्त वेदोंकी आत्मा केवल एक शब्द 'ओम्' है। जो कोई वेदकी आत्माको न पहचान, वेदपाठी होनेका प्रण करे वो कदापि वेदका विद्वान् न होगा। अतः अर्थानुसंधानके साथ वेद पाठ हो। उससे आत्माके जाननेकी चेष्टा करे।
त्रियापशु।
त्रियापशु उसको कहना चाहिये जो स्त्रीका पशु हो। वैसे वो स्त्रीका पशु यह सारा संसार है। स्त्री समस्त जीवोंको नचाया करती है। इस स्त्रीने अपनी गुलामीका फंदा सबके गलेमें डाला है। कामबाण सबके हृदयोंको भेद गया। इस कारणही समस्त मनुष्य मर गए। सांसारिक मनुष्योंकी तो गणनाही क्या है। यह बड़े बड़े सिद्ध साधुओंके हृदयको भी टुकड़े टुकड़े कर देती है। सन्तोष तथा धैर्य मनसे पृथक् हो जाता है। इस स्त्रीका नाम वासना तथा इच्छा है। उसने सबको बांध रक्खा है। इसीके कारण सबका आवागमन हो रहा है इसीके कारण भवसागरकी स्थिति है। यह मनुष्य तथा देवता किसीको भी नहीं छोड़ती। जबसे स्त्री पुरुषके साथ होती है उसी दिनसे तपस्या तथा व्रतसे मनुष्य वञ्चित रहता है। केवल स्त्रीकेही कारण बंधनमें रहता है। उसको उसी स्त्रीने अंधा कर दिया है। समस्त झगड़ों तथा बखेड़ोंकी जड़ स्त्री है। अनगिनती लोगोंके इसने मस्तक कटवाये, कटवाएगी और कटवा रही है। समस्त विद्या तथा कार्यकी वैरिन है, समस्त सांसारिक मनुष्य इसके ही प्रेममें फँसकर अपने सर्जन कर्तासे दूर हो गए हैं। जो कोई इससे प्रेम करेगा उसमें सर्जन कर्ताका
प्रेम तथा उसकी भक्ति न हो सकेगी । इस त्रियापशुमें तनिक भी मानुषिक बुद्धि नहीं होती । पर जब उसको मानुषिक शिक्षा मिले तो वास्तवमें वह मनुष्य बनजावे, नहीं तो सदैव इसी प्रकार फँसा रहेगा । इसको तनिक भी पहुँच, समझ तथा बुद्धि नहीं है कि, अपनी मुक्ति तथा छुटकारेकी युक्ति कर सके । उसके पास तनिक भी औषध नहीं कि बच सके ।
उद्धारकी दवा ।
उसके निमित्त केवल यही एक युक्ति है कि, यह साधु तथा गुरुकी सेवा करे । यदि यह साधु तथा गुरुकी सेवा न करेगा तो इसका बेड़ा कदापि पार न होगा । अवश्यही वह कालका भोजन बनेगा । इस संसारमें दो प्रकारके गुरु हैं—एक पाशविक तथा दूसरा मानुषिक । यदि इस सांसारिकको पाशविक शिक्षा मिलेगी तो उसके हृदयपर बुद्धिका कदापि विकास न होगा । इस संसारमें दोनों प्रकारोंके शिक्षक फिरते हैं । जो कोई उन दोनों गुरुओंमें पहचान करे, उन्हें पृथक् करके पहचाने, एकको छोड़कर दूसरेको ग्रहण करे वो सांसारिक बड़ा ही भाग्यवान् होगा । एक तो कपटी भेष बनाए कूट पुस्तकें लेकर हाथमें खप्पर लिए फिरते हैं । यह तो कालपुरुषका समाचार देते हुए उसकी सूचना चारों ओर फैलाते फिरते हैं । दूसरे श्वेत वस्त्र पहने हाथमें सूक्ष्म वेद तथा कमण्डलु लिये सत्यपुरुषके नामका प्रचार करते घूम रहे हैं । अतः जो कोई सत्यपुरुषके समाचारदाताओंके समाचारको स्वीकृत करेगा वह निश्चयही उत्पत्ति नदीके पार चला जावेगा । जिसने इस गुरुको पहचाना वह उनका चरणरज बन गया ।
मुहम्मद साहिबकी भाँग ।
मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक बार मुहम्मद साहबको जिब-राईल महाशय एक उद्यानमें ले गए । उसमें चालीस साधु बिलकुल नगन बैठे हुए थे । तब संध्याका समय निकट आया वे साधु सब भाँग घोटने लगे । जब भङ्ग घोंट चुके तब भङ्ग छाननेके निमित्त कोई वस्त्र नहीं था । उस समय मुहम्मदसाहबने अपने शिरसे साफा उतारकर दिया कि, इससे भंग छानो । तब उन साधुओंने मुहम्मदसाहबके साफेमें भाँग छानकर पीली । मुहम्मदसाहब पर प्रसन्न होकर नौ घूंट भङ्ग मुहम्मदसाहबको दीं उस नौ घूंट भङ्गके पीने से मुहम्मदसाहबको देवलोककी सुध मालूम हो गई । जो पदार्थ तथा आश्चर्यमय शक्तियाँ आपको मिलीं वह केवल उन्हीं नौ घूंट भङ्गसे थीं । तभीसे इस भङ्गके रङ्गसे मुहम्मदसाहबका साफा हरा हो गया । तबसे हातिमी जातिके श्रेष्ठोंने
कालपुरष किससे डरता है, माया (जगत और देह) चक्र निरूपण
हरे वस्त्रोंको पहनना उचित समझा । मुहम्मदसाहबके श्रेष्ठका नाम हातिम था इस कारणही यह हातिमी वस्त्र कहलाता है ।
ग्रन्थल
ऐ आदम तेरे लिए जञ्जीर यह आई ।
तिफ्ली व जवानी व बुढापामें फँसाई ॥
लारेव सरासर यह हलाहल है हलाकू ।
तेरे लिए तो जान शकर शीर यह आई ॥
अब तेरा कहाँ साहब और सदगुरु साचा ।
सिखलाने सबक सिलसिला गुरु पीर यह आई ॥
शाही जिसे कहते वही बरबादी है अजिज ।
दिनकी नहीं उमीद शबे तीरह यह आई ॥
भावार्थ—ए मनुष्य ! तेरे लिये यह जँजीर आई है यही तुझे बाल्य जवानी और बुढापेमें फँसा रही है । यह सरासर पीते ही प्राण लेनेवाला, लव-लवाता भयंकर विष है, जिसे कि, तू अपनी अत्यन्त प्यारी वस्तु समझ रहा है । अब तेरे साचे सदगुरु कहाँ है यही तुझे नरकका सबक सिखलानेके लिये गुरु पीर चली आ रही है । जिसे तू शाही समझे बैठे है यही बरबादीकी जड़ है इसमें दिनकी उम्मेद नहीं है यही स्त्री रूपी रात है ।
ये चारों पशु इस भवसागरमें रहते हैं । एक दूसरे से बँर मंत्रो रखते हैं । इनकी बुद्धि तथा इनका विश्वास शुद्ध नहीं । ये इस भवसागरके कोड़े हैं । इनका इस नदीके पार जाना असम्भव है । पर सत्यगुरुकी दया सन्तसेवा और चाकरीसे छुटकारेका पथ मिल सकता है । चारों पशु इस और तो पिताके सिंहासन और राज्य तथा श्रेणीको चाहते हैं । उस ओर सांसारिक वासनाओंके आनन्दका उपभोग भी किया करते हैं । इन चारों पशुओंकी बुद्धि तथा विश्वास बड़ाही विचित्र है । उनकी बुद्धि तथा विश्वासमें तनिकभी स्थिरता नहीं है, उनकी बुद्धि तथा उनको विश्वास सदैवही डामाडोल रहा करते हैं ।
ये लोग सहस्रों प्रकारका पहनाव पहनते और भौंति भौंतिके भोजनोंसे अपने चित्तको प्रसन्न करते हुए आपको बहुत बड़ा तथा प्रतिष्ठित समझते एवं घमंडमें मस्त फिरा करते हैं । कोई वस्त्र पहने कोई नङ्गे कोई हरा पीला नीला नानाप्रकारके वस्त्र पहने रहते हैं । कोई अनाज छोड़कर दूध पीता है कोई फलाहार करता है । कोई मांस खाता है मदिरा पीता है कोई स्नान किया करता है कोई शीशपर जटा रखते हैं । कोई भभूत लगाकर बना फिरता है । कोई वस्त्र छोड़कर
चक्रादिकोंका मान चित्र
हिरन तथा बाघकी खाल पहनता है । कोई विष्ठा खाता है एवं मूत्र पीता है । कोई अपनी जूजी छेदकर कड़ा पहन लेता है कोई उसको काटकर फँक देता है । कोई कोई ऐसे कार्य करते हैं कि, जो ऐसे घृणित हैं कि, जिनके लिखनेमें मुझको लज्जा आती है केवल इतना इज्जित कर देनाही यथेष्ट है कि, कोई परस्त्रीगमन करनाही अपना परम धर्म जानते हैं कोई सहस्र स्त्रियोंके साथ संभोग करने तथा उनके भगको देखनेहीसे अपनी मुक्ति समझते हैं, कोई उलटी खानेको बड़ी बात समझते हैं । कोई धूनी लगाकर बैठता है, कोई मौनी बन गया है ॥ कोई तीर्थमें नहाता फिरता है, कोई उलटा लटकता है, कोई धूँवा पीता है । कोई सदा सुहागिन बनकर स्त्रियोंका वस्त्र तथा उनके आभूषण पहनता है कोई घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह कुण्ड खोदकर दाल भात रोटी तथा माँस और भौंति भौंतिके भोजनोंसे भर देता है । चेले और सांसारिक तथा साधु और ब्राह्मण शूद्र चमार सब एक साथ बैठकर इसी कुण्डमें से सब भोजन करते हैं । एक प्याले से मदिरा पान किया करते हैं इससे अपनी मुक्ति समझते हैं । कोई कहते हैं हम अमुक गुरु अथवा धर्मके अगुवा पर भरोसा रखते हैं उसके द्वारा हमारी मुक्ति निश्चय है यहाँतक कि, इस अगुवाको परमेश्वर समझते हैं । यद्यपि वह गुरु नितान्तही विवश तथा पराधीन हैं । कोई कहता है हमारे धर्मके अगुवामें मनुष्यता तथा परमेश्वरी दोनोंही हैं । उन्हें तनिक भी सुध भी नहीं कि, मनुष्य कहाँ ? तथा परमेश्वर एक साथ कहाँ, कहाँ अंधा, कहाँ आखोंवाला, कहाँ साधु कहाँ और चोर कहाँ झूठा कहाँ और सच्चा एकही समयमें कहाँ दिन और कहाँ रात । कोई योग समाधि लगाकर बैठता हुआ अपनेको अमर समझता है । कोई कहता है कि, मैं ब्रह्मा हूँ । अनगिनती ध्यान तथा अनगिनती रङ्ग ढङ्ग इन चारों पशुओंके हैं कि, जिनके विवरणका बल मुझमें नहीं है; जब मैं उनकी यह दशा यानी अवस्था देखता हूँ तो मुझको वह काशीका पागलखाना याद आ जाता है कि, इस आकाश छतके नीचे जो ये सब पशु रहते हैं वे कैसे कैसे कौतुक दिखाते हैं । हर एक अपनेको योग्य तथा श्रेष्ठ समझते हैं । कोई उनमें अपनेको परमेश्वर तथा कोई अपनेको शिष्य समझते हैं । समस्त सांसारिक मनुष्य साधुओंका अनुसरण करके मुक्तिपथसे वञ्चित रहे । उनको सच्चा सत्यगुरु नहीं मिलता । इन चारों प्रकारके लोगोंमें कोई गुरुमुख नहीं है, सब मनमुख हैं । यदि दैवात् इनमेंसे कोई गुरुमुख हो तो उसको अवश्यही आकाशी सहायता मिलेगी । उसको सत्य-
गुरुका दर्शन प्राप्त होगा वह इस गुरुमुखको अपनी ओर खींच लेगा। सत्यगुरु संसारमें आकर समझाते फिरते हैं कि, ए मनुष्यो ! तुम मेरी बात मानों, मैं तुमको वही रङ्ग रूप प्रदान करूँगा जो कठिनसे कठिन तपस्या करनेपर भी ऋषि मुनिगण नहीं पाते हैं। जैसे कीड़ेको भूङ्गी अपने रूपका बनाता है, इस प्रकार तुम मेरे स्वरूपके समान होगे। अनुरागसागर पृ ८ में मृतकभावके वर्णनमें भूङ्गीका दृष्टान्त आया है स्वामी परमानन्दजीने उसीको अति सुन्दर कविताके साथ कयहूँ रख दिया है।
भूंगी कीटका दृष्टान्तकी कविता ।
भूङ्गी जो आन कीटको खुद रङ्ग लगावे ।
आवाज अपनी आनसिक्ख कान सिखावे ॥
वह रूप पहला रहा एक न बाकी ।
गुरु शब्दसे फिलफौर रङ्ग पटल सो जावे ॥
कोई और क्रिस्म कर्मको जिनदार न देखे ।
भूङ्गी जो अपने ढङ्ग कीट टूँढके लावे ॥
वह टूँढ काम अपनेही हम रङ्ग हमेशा ।
दिलदेके उसको तवही अपने रूप बनावे ॥
दिल उसको दिया चाहिए दिलदार कोई हो ।
हिन्दू या मुसलमान खरीदार कोई हो ॥
भावार्थ—भौरा स्वयं ही आकर कीड़ेको रंग लगाता है बारबार अपनी आवाजको कीड़ेके कानमें डालता है। इसका नतीजा यह होता है कि, कीड़ेका पहिला रूप रंग बाकी नहीं रह जाता। गुरुके शब्दसे उसका रूपरंग शीघ्रही बदल जाता है। वो कीड़ा भौरोंके ध्यानके या उसके शब्दके दूसरी बात नहीं देखता, भूंग भी उसे आप ही टूँढकर अपने पास लाता है, अपनी ही इच्छासे सदा अपने रंगका बनानेकी चेष्टा करता है वो अपना दिल देकर अपने रूपका बना लेता है। उसे दिलदे जो दिलदार हो। वो चाहें हिन्दू हो या मुसलमान हो, पर उसका खरीदनेवाला हो ॥
हैं कोट लाख सदमें कोई एकही मेरा ।
जहाँ जाके बारबार भूङ्ग करता है फेरा ॥
वही कीट जेहल अपनेसे गुरुबात न माने ।
तब जाके पास उसके भूङ्ग करता है डेरा ॥
कहता है कीट तुझको लगी आन खराबी ।