भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

अपने दांतोंसे पकड़ लिया और अपने स्वामीको अपने ऊपर रख घरको ले भागा बीचमें कहीं न ठहरा, पर्वत पर अपने खेममें जा पहुँचा। अपने मालिकको उसकी स्त्री तथा लड़कोंके पाँव पर धर दिया। अपने मालिकको कुशल मङ्गलके साथ उसके घर पर पहुँचा दिया। पथकी थकावटसे स्वयम् आप उसी समय गिरकर मर गया। उस घोड़ेके लिये उस जातिके सब मनुष्य दुःख करने लगे। अरबी सायरोंने उस कृतज्ञ वीर घोड़ेकी प्रशंसामें अनेक कविता बनाई है। अरबमें उस घोड़ेकी भलाईकी चर्चा अब तक चली आती है।

बाजीगरोंके घोड़े—फरीदकोट राज्यमें बजीरसिंहजीके पास फ्रांस देशके ऐसे बाजीगर आये थे, जिनके कि, पास ऐसे घोड़े सिखाये हुये थे जो कि, उन घोड़ोंके कौतुकके सामने मनुष्योंके कौतुककी क्या बात है ? उन्होंने अपने घोड़ोंको अनेक गुण सिखाये थे जिससे देखनेवाले सदा दंग रहा करते थे।

बैल, सांड, बछड़ा और गऊ

बैलसे आदमीकी बातें—गुलजार आदममें मुसलमानोंकी हदीसके अनुसार लिखा है कि, आदम जब बैकुण्ठसे निकाला गया तो जिबराईलने आदमको खेती करना तथा हल जोतना सिखला दिया। आदमने बैलको हल जोतनेमें लगाया, उसने बैलको डण्डा मारा, उस समय बैलने आदमसे कहा कि तूने मुझ निर्दोषको क्यों मारा ? आदमने उत्तर दिया कि, तू आज्ञा नहीं मानता जो आज्ञा नहीं मानता वह मारा जायेगा। बैलने कहा कि, ऐ आदम ! तू स्वयम् आज्ञा नहीं मानता, खुदाकी आज्ञा न माननेके कारण ही बैकुण्ठसे बाहर निकाला गया है, निर्दोष मुझको क्यों मारता है ? यह बात सुनकर आदम दुःखी हुआ। खुदासे दोहाई मचाकर कहने लगा कि, ऐ खुदा ! तू देख, मुझे बैल भी ताने दता है। खुदाकी आज्ञा हुई कि, ऐ जिबराईल ! तू पृथिवी पर जा सब पशुओंकी जिह्वा बन्द करदे, उसी समय जिबराईल पृथिवीपर आये सब पशुओंकी जिह्वा बन्द करदी। सब गँगे हुये, फिर किसीमें वार्तालापकी सामर्थ्य न रही। इससे पहले सभी पशु मनुष्योंके समान बातें चीतें किया करते थे।

पूर्वके साधु—पञ्जाब प्रदेशस्थ फीरोजपुरान्तर्गत मौजे कोयरीवाला जिसको भाईका कोयरीवालात्री भी कहते हैं, यह मोगह तहसीलमें है। सन् १८८६ ई० में यहाँ एक घटना संघटित हुई ऐसा हुआ कि, इस गामके नामके मुसलमान जुलाहेके घरमें एक गाय रहती थी। उस गायने एक साथ दो बच्चे जने थे। दोनों अत्यन्त सुन्दर और काले रङ्गके थे उनका शरीर चमकता था। लोगोंने समझा कि, जो जोड़ा बच्चा उत्पन्न हो उसको पुण्यार्थ देना उचित है।

बच्चेकी उत्पत्ति

उस जुलाहेने न माना । लोगोंने समझाया कि, हम हिंदू लोग तुझको इन बछड़ोंका मूल्य दे देते हैं, तू इनको हमें दे दे, जुलाहे ने न माना । वे लोग प्रत्येक बछड़ोंका मूल्य पचास पचास रुपया देने लगे । उन बछड़ोंकी सुन्दरता देख मनुष्य दङ्ग हो रहे । दोनों चमकते हुये श्याम रङ्गके थे उनके सींगे हिरणोंके समान पीछेको मुड़ी हुई थीं, उनके माथेपर ऐसे तिलक थे जैसे कि, रामानन्दकी सम्प्रदायके वैरागी बनाते हैं । वैसे ही उनकी छाती तथा दोनों मोड़ोंपर और पीठपर सब चिन्ह थे । उनको लोग वैरागी अथवा ब्राह्मण कहा करते थे । वे दोनों जब युवावस्थापर पहुँचे तो जुलाहेने चाहा कि, उनको हलमें लगावें । लोगोंने बहुत रोका कि, तू ऐसा मत कर, उनका मूल्य हमसे ले ले उनको तू सांड छोड़ दे । सोड़ी प्रतापसिंह ढाई सौ रुपया तथा एक हलकी भूमि दे रहे थे, पर जुलाहेने न माना हठमें आकर कहने लगा कि, इन ब्राह्मणोंको मैं अवश्यही हलमें जोतूंगा । लोग बहुत समझा चुके कि, ये बैल नहीं ये तो सन्त हैं, किसी दोष वश बैल बन गये हैं, तू उनके साथ ऐसा कुकर्म मत कर । जुलाहेने कहा कि, मैं इन ब्राह्मणोंको अवश्यही हलमें जोतूंगा । वे दोनों बैल साधुओंके समान अत्यन्त नरम तथा शान्त स्वभावके थे । छोटे २ लड़के उनसे खेला करते थे उनको जब लड़के पकड़ लेते तो वे अपना सिर झुका देते थे बड़े ही निर्दोष थे, कभी कसीकी कोई हानि न करते थे । प्रत्येक मनुष्य उनको प्यार करता था । जब बैल स्वरूप उन साधुओंको जुलाहे हलमें जोता तो एकबारगीही उसकी देह ढीली होकर ऐसी हो गई कि, जैसी झोला मार जाती है । उसी अवस्थामें जोलाहा मर गया । फिर उसके बेटेने बैलोंको हलमें जोतना चाहा तो लोगोंने मना किया उसने भी कहना न मानकर एक दिन उनको हलमें जोत दिया । उसी दिन उसके पांव में एक ऐसी मेख लगी कि, तलवेको छेदकर पार निकल गई । उस घावपर सेंकड़ों छाले पड़ गये, वह पांव बहुत सूज गया । इसी अवस्थामें तीसरे दिन मर गया । इसी प्रकार उस जुलाहेके घरके सब मनुष्य मर गये । केवल एक आदमी रह गया । तब लोगोंने उसको भी समझाया कि, देख, इन बैलोंको दुःख पहुँचानेसे तेरा घर नष्ट होगया, अब तू इनके साथ अपकार न कर । तब वह जुलाहा उन दोनों बैलोंको दीपमालामें अमृतसरकी मण्डीमें ले गया । सरकारने इन बैलके सौन्दर्यको देखकर सौ रुपये पारितोषिक दिये । एक महाजनने दो सौ रुपया देकर उन बैलोंको खरीद लिया अपने घर ले गया फिर न जाने उन साधुअवतारी बैलोंका क्या हुआ ।

ज्ञानी बैल—एक दूसरा बैल भी उसी गाँवमें एक जमींदारके घर उत्पन्न हो उसीके घर रहता था । उसकी ऐसी अच्छी आदत थी कि, जहाँ उसका स्वामी

समीक्षा

खड़ा करदे वहीं खड़ा रहता था। बड़ा सुन्दर पीले रङ्गका सुदृढ़ था। कभी किसी की कोई क्षति न करता था, खेतमें जाता परन्तु जो उसके चारों ओर हरियाली खड़ी होती उसमें कदापि मुँह न लगाता, मालिक जो घास दाना उसके सामने रख दिया करता वही खाता दूसरेको हराम जानता था। उसको जमींदार मण्डी में पांच बार लेगया प्रत्येक बार सौ सौ रुपया इनाम पाता रहा। इस बैलको जब हलमें लगाते तो कोई बैल उसकी समता नहीं कर सकता था। सबसे आगे जाता था यह बैल जब किसी गायके पीछे छोड़ा जावे तो वह उसी गायको अपनी स्त्री समझता था। उसके वीर्यसे जो दूसरी गाय उत्पन्न हो उनको अपनी पुत्रीके तुल्य समझता था। कोई कौसी ही युक्ति क्यों न करे पर अपनी पुत्रियोंके निकट न जाता था।

साधवी राम गऊ-पंजाब देशस्थ फीरोजपुरके डरौली मौजेमें कहींसे फिरती हुई बड़ी सुन्दर एक गाय आ गई थी, उसका रङ्ग श्याम श्वेत मिला हुआ था। बड़े डील डौलकी थी, उसके अङ्ग प्रत्यङ्ग ढङ्गले थे। परन्तु उसका मूत्रस्थान अतिलघु तथा नाम मात्रका था। वह केवल मूत्र त्यागनेकेही निमित्त बना था बच्चा जननेके लिये नहीं था। उसका ऐसा अच्छा स्वभाव था कि, रात दिन एक पीपलके तले बैठे रहा करती। एक तो सबेरे आठ बजेके समय, दूसरे सांझको लगभग चार बजे भोजनके लिये ही बस्तीमें जा अपने निश्चित समय पर गांवमें जाकर गृहस्थोंके द्वारपर खड़ी हो जाया करती। अनाज ही खाती भूसा इत्यादि कुछ नहीं खाती। जो कोई कभी उसके सामने कुछ दाना रख दे तो केवल एक बार मुँह डालती, दूसरी बार कदापि मुँह न लगाती थी फिर आगे चली जाती थी दोनों समय अपना काम करके पीपलके वृक्षके नीचे जा बैठती पुघराया करती। वह भी उस गौका नियम था कि, जिस द्वार पर प्रातःकाल जाती वहां फिर सांझ को न जाती। लोग इस गायकी आदत साधुओंकीसी देखकर उसकी सेवा करने लगे। जहां वह गाय बैठती उस स्थानको भलीप्रकार स्वच्छ कर देते तथा बालू इत्यादि बिछा देते थे। पर वह गाय उस गांवमें केवल एक मास तक ही रही फिर दूसरे फिर तीसरे फिर चौथे गांवमें गई। इसी प्रकार फिरती फिरती न जाने कहाँ चली गई। जिस मनुष्यने उस गायको देखा एवं उसकी सेवा की थी उसीने मुझसे यह कहानी कही थी जैसे यह गाय द्वार द्वार भोजनके लिये जाती थी उसी प्रकार मशकवालेके सामने पानीके लिये खड़ी होती अपना मुँह लगाती पानीवाला पानी पिला देता। लोग उसको राम गऊ कहा करते थे।

जंगमोंका बैल-जङ्गम एक प्रकारके फकीर होते हैं। वे लोग अपने बैल

जिनका सर्प होना लोह महफूजपर भाग्य

को ऐसा सिखाते हैं कि, जो कुछ वे आज्ञा करते हैं, वह वही करता है । बैल उनकी सब बातें समझता है । यदि वे लोग कहें कि, आशीर्वाद दे तो वह शिर उठाकर आशीर्वाद दे देता है । यदि कहें कि, दाहिना पांव उठा तो दाहिना पांव उठाता है । बांयाँ पांव उठा तो बांयाँ पांव उठाता है । अमुक चिन्ह पर अपने पांव रखता चला आ तो वह वैसा ही करता है । बैल चतुराईके अनेक काव्योंको किया करता है ।

ग्वालेकी रखवाली—काठियावार तथा नागौर देशमें गायोंके झुण्ड बनमें चरते फिरते हैं । उनका रक्षक उनके साथ रहता है । जब कभी शेर रक्षक पर आ पड़ता है तो सब गायें इकट्ठी हो जाती हैं । चारों ओरसे चक्र बांधकर अपने रक्षक को मध्यमें कर लेती हैं । जिसमें कि, शेर उसको क्षति न पहुंचा सके, उस समय गायोंका मुँह चारों ओर होता है । जिसमें शेर जिधरसे आवे उधरसे रक्षा कर सके । अपने सींगोंको लड़ाईके लिये तैयार रखती हैं । सब एक बारगीही शेरपर आक्रमण करके शेरको भगा देती हैं । कभी कभी आप भी आखेट बन जाती हैं ।

योग्य गऊ—एक गाय एक स्थानपर चरती फिरती थी, उसके ऊपर एक दुष्ट बालक पत्थर मारा करता था । गाय बहुत सहन करनेके पीछे उस बालक की ओर दौड़ी । उसके वस्त्रोंको सींगोंसे फाड़ डाला पर उसको कुछ कष्ट न पहुंचाया । उस लड़केको पकड़कर दूर धर आई फिर आकर चरने लगी । यह गऊकी पूरी योग्यता थी ।

चीता मारनेवाला सांड—एक सांड था जिसने अपने सींगोंसे कितनेही चौपायोंको मार डाला था । यहां तक कि, उसके सींगोंकी नोक जाती रही थी । एक दिन एक चीते एक गायको मारा उस गायकी सहायताके लिये यह सांड दौड़ा, चीता तथा सांडकी लड़ाई होने लगी । गाय तो मर गई पर सांड लड़ता रहा । जब दिन बीतकर रात हुई, वह चीता अपना भोजन लेने आया । वह सांड फिर लड़ने लगा चीतेको मारकर उसी गायके पास गिरा दिया आप भी बहुत घायल हुआ पर लोगोंने उसके घाव सिये । वो पूर्ण स्वस्थ हो गया ।

राक्षसकी गाय—सन् १८५५ ई० में जम्बू काश्मीरके पर्वतोंके बीच मुझको एक साधु मिला । वह मुझसे कहने लगा कि, आठ साधु भ्रमण करते करते पर्वत के भीतर घुस गये । कुछ दूर जानेपर उनको राह नहीं मिली वे भूलकर इधर उधर फिरने लगे, कुछ पता न लगे कि, किधर जावें जब वे भटकते फिरते थे तो उनको एक बड़ी जातिकी गाय मिली उन साधुओंको देखा तो घेर लिया, जिधर साधू जावें वह उधर ही घेर लेती थी । अन्तमें वो उनको घेर घारकर वहां ले चली जहां कि, आप रहती थी । साधु लोग उस गायके स्थानपर पहुँचे तो उन सबको

जीवोंका आनन्द, संन्यासीका उदाहरण

एक बार फिर घरके भीतर ले गई आप उस बाड़ेके द्वारपर बैठ गई, जिसमें वे सब भाग न जायें। सांझ होतेही भेड़ बकरियोंका झुण्ड लेकर मनुष्य रूपी राक्षस आया साधारण नहीं, किन्तु हूष्ट पुष्ट लम्बा चौड़ा राक्षस था। उसने मनुष्योंको देखकर एक विशेष स्थानमें बन्द कर दिया। सब बकरियोंका दूध दुहकर एक कड़ाह चढ़ा दिया उसमें दूध गर्म होनेके लिये डाल दिया। दूधके औट जानेपर उनमेंसे दो मनुष्योंको पकड़ शिर टकराकर मार डाला। उसी दूधकी कड़ाहीमें उनको पकाकर खा गया सब दूध पीकर अचेत होकर सो गया। शेषके सब साधुओं ने विचार किया कि, अब तो यह राक्षस हम सबको एक एक करके खा जायगा कदापि न छोड़ेगा। उन लोगोंने यह हिम्मत की कि, बड़े २ चिमटे जो उनके पास थे उनको आगमें लाल किया एक बारगी ही उस दैत्यकी दोनों आँखोंमें चलाकर उसको अन्धा कर दिया। वो दोनों आँखोंके फूट जानेपर घबरा कर उठा और चिल्लाकर इधर उधर पकड़ने दौड़ा। साधु जब उसके हाथ न आये तो वह भेड़ों को पकड़ पकड़कर बाहर फेंकता था। साधु उससे तथा उसकी गायसे किसी प्रकार बच कर निकल भागे।

भिस्तीका बैल—पंजाब देश फिरोजपुर जिलेके भाईकोट कसबामें एक भिस्तीने अपने बैलको ऐसा सिखलाया था कि, आपसे आप वह सब कार्य किया करता था। जल खींचनेके समय आपसे आप ठहर जाता था, जो कोई उसका बैल मोंगकर कार्यके लिये ले जाता और कह जाता कि, मेरा इतना कार्य है तो वह भिस्ती अपने बैलसे कह देता कि, इतने समय तक इसका कार्य करके चले आना। तो वह बैल उनके साथ उतने कालतक ही कार्य करके आ जाता अधिक न करता था, यदि वह मनुष्य अपनी प्रसन्नतासे बैलको भेज दे तो अच्छी बात है, नहीं तो वह आपही भागकर अपने घर चला आता था। वह बैल अपने काम तथा समयको भली भाँति पहचानता था। साधारण समय पर अपना कार्य करता था। सरकारी कारबारियोंकी तरह अपने मनकी घडीमें अपना समय देख लिया करता था।

न्यायकी प्रार्थना—शाहजहाँके रहनेके मकानके पास एक घन्टा बँधा रहता था इसका यह नियम था कि, जो कोई उस घन्टेको बजा देता था उसका उसी समय न्याय किया जाता था। एक बार एक भिस्तीके बैलने आकर घन्टा बजा दिया उसी समय बादशाहने उस बैलको अपने सामने बुलाया उसकी पखाल ढुलाई गई तो वह अधिक वजनदार निकली यह देखकर बादशाहने वजन मुकर्रर कर दिया कि, इससे अधिककी जो कोई बैलपर पखाल रखेगा उसे दण्ड दिया जायगा।

स्वप्नकी देह

विशेष बात—पूर्वीय भारतमें छोटी जातियोंमें यह नियम है। कहीं २ उच्च जातिके लोगोंमें भी सुना जाता है कि, जब उनका बैल निर्बल तथा दुबला हो जाता है तो उसको सूअरका तेल पिलाते हैं। पिलानेसे वह पुनः मोटा हो जाता है। पर इसके साथ यह भी नियम है कि, जब वे सूअरका तेल पिलाना चाहते हैं तो उस बैलसे पहले पूछते हैं कि, कल तुमको सूअरका तेल पिलावेंगे। सांझको तो बैलस कह देते हैं सबेरे उठकर बैलका मुँह देखते हैं। यदि वह बैल रोता हो आँसू आये हों तो उसको तेल नहीं पिलाते, यदि वह न रोया हो न उसका आकार बिगड़ा हो तो उसको तेल पिला देते हैं। यदि रोया अथवा दुःखी जान पड़ने पर भी तेल पिलावें तो वह बैल दुःखके मारे आपही मर जाता है, यह बैलके विषयमें विशेष बात है।

भैंसा, भैंस

धर्मात्मा भैंसा—एक भैंसा एक जमींदारके घर रहता था। उस घरमें भैंसे तो बहुत थीं पर भैंसा एक ही था। वह अन्यान्य भैंसियोंसे तो जोड़ खाता पर अपनी माके निकट न जाता। उस जमींदारने अनेक युक्तियां की किन्तु उस भैंसाने अपनी मातासे जोड़ नहीं खाया। उस जमींदारने यह युक्ति की कि, उस भैंसके शरीरमें कीचड़ लगा दी कि, पहचानी न जावे उस भैंसेके पास ले गया उसने उसका संग किया। संग करनेके पीछे वह भैंस उसी समय पानीमें जा पड़ी उसकी देहका कीचड़ छूट गया। भैंसने भैंसको भली प्रकार पहचान लिया कि, यह तो मेरी माता है और जान लिया कि, इस जमींदारने मेरे साथ धूर्तता करके मुझसे पाप करवाया है तो वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर जमींदारकी ओर दौड़ा उसको मार डाला तथा उसका पेट सींगोंसे फाड़ डाला। वहाँसे भागकर न जाने कहाँ चला गया।

भैंसकी कामात्मता—फिरोजपुर जिलाके भाटीकोट नामक गांवमें एक बनियेके पास एक भैंस थी, वहाँ कोई भैंसा न था, जब उस भैंसके मनमें काम कामना हुई तो वह भागकर चली। वह मनुष्य बहुत रोकता रहा यह भैंसने कुछ न मानी, वहाँसे पांच कोसपर एक भैंसा था उसके पास जा पहुँची। सब दिन तथारात वह भैंसके पास रही। दूसरे दिन बनिया अपनी भैंसको दूँढ़कर घर ले आया।

भैंसका प्रेम—पंजाब देशस्थ फिरोजपुरके समीप एक जमींदार रहता था। उसके पास सौ रुपयेकी एक भैंस थी, वह बहुत दूध देती थी। एक दिन उस भैंसको चोर लेगये इसका कहीं पता न लगा तब वह उस दुःखमें उसको चारों ओर दूँढ़ता फिरा। उसका नाम भोगमिलानी था। उस भैंसको रोता हुआ दूँढ़ता और फिरता और कहता जाता था कि—

मन्शूरका सम्स तबरेज और बुल्लेशाह होना अमीर खुशरू मोलवी रूप

रोहीमें घास छपरमें पानी । मोड़ाकर मेरी भाँग मिलानी ॥

उस भैंसके प्रेममें इसी प्रकारका शब्द करता फिरता था । उसका शब्द सुनकर एक पथिकने उससे पूछा कि, तेरी यह दशा क्यों है ? उसने अपनी भैंसका सब हाल कह सुनाया । पचास साठ कोसके ऊपर एक वैसीही भैंस दिखाई दी । पथिकने उस जर्मीदारका सब हाल लोगोंको कह सुनाया । जब वह पथिक कह रहा था—उसी समय उस भैंसने भी अपने स्वामी जर्मीदारका सब वृत्तान्त सुना, तब उसका मन अपने स्वामीकी ओर खिंच आया । जबसे वह भैंस इस जर्मीदार से पृथक् हुई थी तबसे उस समय तक तीन वर्षका समय बीत चुका था । उसने दो बच्चे दिये थे । अब उसने जान लिया कि, मेरा स्वामी मेरे लिये रोता फिरता है । तो उस भैंसके मनमें प्रेम आया अर्ध निशाके समय, अपनी रस्सीको खोल लिया दोनों बच्चों सहित कुशल पूर्वक मालिकके गाँव पहुँच गई । घास चरकर जल पीकर तृप्त होकर बैठी ही थी कि, जर्मीदारने आवाज दी कि—

रोहीमें घास छपरमें पानी । मोटाकर मेरी भाँग मिलानी ।

जब जर्मीदारने ऐसा कहा तो वह भैंस उठकर बोली उसको पहचानकर वह जर्मीदार उसके निकट गया देखा तो उसकी भाँग मिलानी दोनों बच्चों सहित आ पहुँची है । जर्मीदार उसको अपने घर लाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।

महात्मा भैंसा — जिला फिरोजपुर तहसील भोगा डरौली गाँवके समीप एक गाँव छोटे फेरीवालाके नामसे है, इसमें एक भैंसा है । इसका यह हाल है कि, वह जब अपनी माताके गर्भमें था तो नियमित आकारसे अधिक बढ़ गया । इस कारण जब वह उत्पन्न हुआ तो उसकी माताका मूत्रमार्ग फट गया तब वह बाहर निकला । उसकी माता मर गई । वह बिना माताका बच्चा जीवित रह गया भैंसोंके स्वामी ने दो बकरियों मोल लीं उस बच्चेको बकरियोंका दूध पिलाकर पालने लगा । यह बचन कहा कि, यदि यह बच्चा जीवित रहेगा तो मैं उसको छोड़ दूंगा और इससे कोई काम न लूंगा अन्तमें बच्चा पलकर बड़ा हुआ बहुत बलिष्ठ स्वरूपवान और अच्छा भैंसा हुआ । उसके ऊपर छोटे छोटे बच्चे चढ़कर खेला करते थे । वह क्रुद्ध न होता था । कभी किसीको कुछ कष्ट न देता था । प्रायः लोग दूर दूरसे अपनी अपनी भैंसियोंको लाते और उससे गर्भिणी कराके लौटाले जाते । यह भैंसा अन्तर्यामी था । क्योंकि, वह अपनी पुत्रीसे कदापि सम्भोग न करता था । कोई मनुष्य जो अपनी भैंस उससे गर्भिणी कराकर दूर लेकर जाता था उसके वीर्यसे जो भैंस उत्पन्न हुई हो चाहें उसको उस भैंसने कभी देखा भी न हो । यदि वह भैंस उसके सामने आजाय तो भी उसके साथ कदापि सम्भोग न करे । जर्मीदार कितना

ही बल लगावे तथा कितनी ही युक्ति क्यों न करे पर वह भैंसा अपनी पुत्रीको पहचान अपना मुँह उसके मुँहसे मिलाकर पृथक् हो जाता कदापि सम्भोग न करता था । उस पशुको भविष्यके हाल जाननेकी विद्याके बिना अपनी बेटीकी पहचान कैसे होती थी ? इससे पता चलता है उसे भविष्य जाननेकी विद्या थी वो पूर्वजन्मका कोई महात्मा था ।

एक बस्तीमें एक भैंसा रहता था उसको एक मुसलमानने बेबात बरछी मारी । वह जख्मी होकर भाग गया । वह अपना बदला लेनेपर उद्यत हुआ । मुसलमानने भी जान लिया कि, वह भैंसा मुझसे अपना बदला लेना चाहता है । वह सदैव चौकस रहता था । एक दिनकी घटना है कि, मुसलमान बाहर किसी अन्य-स्थानसे लौटता हुआ बस्तीसे दूर एक मैदानमें पहुँचा, भैंसने उसको उस स्थानपर देखा तो मारनेको दृढ़ा । वहाँसे वह मुसलमान भाग न सका । भैंसने शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर उस मुसलमानको दबा लिया अपने सींगोंसे उसका पेट फाड़ डाला । उसके सभी अङ्गोंको पृथक् २ कर दिया । वह इतना क्रुद्ध हुआ कि, उसके किसी अङ्गको एक स्थानपर न रहने दिया । उसके अङ्गः प्रत्यङ्गः तितर बितर करके इधर उधर रख दिये ।

गदहा

गानासुननेका शौकीन—गदहे अच्छे २ कार्य करनेके लिये उत्सुक रहते हैं । एक गदहा था वह प्रायः रागबाजा सुनने जाया करता था । एक स्त्री थी जो बहुत अच्छे सुरोंमें गाया करती थी, जब वह गाने लगती थी तो वह गदहा उसकी खिड़की के निकट आ जाया करता था । बड़े ध्यानसे राग सुना करता था । उस स्त्रीने एक दिन एक ऐसा राग निकाला जिसको कि, उसने पहले कभी नहीं सुना था । उस रागपर वह गदहा मोहित हो गया । उसके मकानके भीतर घुस आया बड़े जोरकी आवाज निकालकर चिल्लाता हुआ अपना राग प्रेम प्रगट करने लगा ।

कुछ कुम्हार अपने २ गदहों को लेकर फरीदकोटकी ओरसे फिरोजपुर को जाते थे । फरीदकोटके निकट एक बच्चा मर गया, जिस गदहीका वह बच्चा था, वह अपने मृत बच्चेके निकट खड़ी हो गई । कुम्हार मारकूट कर अपने साथ ले चले मुर्दा बच्चे को उसी जगह पर छोड़ गये । जब बारह कोशके अन्तपर पहुँचे उस गदहीके मनमें, बच्चेके प्रेमका ऐसा जोश आया कि, वह वहाँसे भागकर अपने मृत बच्चेके निकट खड़ी हो गयी ।

न्यायकी प्रार्थना—मैंने किसी पुस्तकमें पढ़ा था, नौशेर्वा बादशाहने महल के बाहर एक घण्टा बौध दिया था, जो कोई फिरियादी घण्टा बजादे तो उसी समय

पांच वृत्ति

उसको बुलाकर उसका न्याय कर दिया जावेगा। एक दिन ऐसी घटना हुई कि, एक गदहेने आकर वह घण्टा बजा दिया। उसी समय बादशाहने उसको अपने पास बुलाया बादशाहने जाँचकी तो गदहेके स्वामीकी ओरसे गदहे पर अत्याचार साबित हुआ। गदहेवालेको सचेत किया गया कि, भविष्यमें ऐसा कार्य न करना नहीं तो दण्ड पाओगे।

सूअर

सूअरोंको अक्षर सिखाते हैं वे अक्षरोंको बताते हैं वे अक्षरोंका शुद्धोच्चारण करते हैं। वे सब सूअरोंके उपदेशक कहलाते हैं। फ्रांस देशके दक्षिणी कोनेमें सूअरों को हल जोतना सिखाते हैं। जितनी वस्तुयें पृथिवीमें छिपी हुई हैं उनकी विद्या सूअरोंको ही होती है। पृथिवीके भीतरसे वे छिपी वस्तुओंको निकाल लेते हैं वे ताश इत्यादिके खेल भी खेलते हैं। आपसमें हारते जीतते हैं जब वे हारते हैं तो वे अपने कान तथा पूँछको लटका देते हैं जिससे लज्जित जान पड़ें।

रीछ

मारटन-फ्रांस देशकी राजधानी प्येरिसनगर है उसमें मारटन नामक रीछ रहता था। वह बड़े बड़े खेल कौतुक किया करता था। भीख मांगता था, लड़के उसके साथ खेला करते थे। प्रायः नवयुवक भी उसके साथ खेलने लग जाते थे। लोग उसका कौतुक किया देखते हुए दोनों पाँवोंसे चलाते थे। एक दिन वह चला जाता था तो चौकीदार कुत्तोंने भूँकते हुये उसे घेर लिया। रातका समय था लोग कोलाहल सुनकर जाग पड़े देखा तो मारटन कुत्तोंसे घिरा हुआ है। मुँहसे जीभ निकालकर विचित्र कौतुक कर रहा है।

रीछकी मंत्री-एक काला रीछ बचपनमें बारह सिंगेके साथ लाया गया था। जबसे वे वनसे आये तबसे दोनों एकही साथ रहते थे, रीछ तथा बारहसिंगेमें घनिष्ठ मंत्री हो गई थी। यहाँतक कि, दोनों एक रकाबीमें एक साथ भोजन किया करते थे। एक दिन एक कुत्ता उस बारहसिंगे को काटने फाड़ने दौड़ा। उसकी सहायताके लिये उसके मित्र रीछने उस कुत्ते पर ऐसी चोट लगाई कि, कुत्ता चिल्लाता हुआ भाग गया।

बोरनियोका रीछ-बड़ा कौतुकी होता है वँसा और कोई नहीं होता बड़े दुःख तथा नम्रता सहित भीख मांगता है। जब कोई अधिक पदार्थ उसको मिले यहाँतक कि मुँह तथा पञ्जोंमें रखनेसे अधिक हो जाय तो शेषका अपने पिछले पाँवपर इस प्रकार रखता है कि, मँला नहीं होने देता। यदि कोई उसको क्रोध

स्वाभाविक चेतना

करावे तो फिर शीघ्र ही प्रसन्न नहीं होता जबतक कि उसका बैरी उसके सामने रहे तब तक हर्षित नहीं होता है न मनानेसे मानता ही है ।

शाही शौक—पहले रीछका कौतुक विलायतमें हुआ करता था । जो कोई वाटिकामें कौतुक देखनेके लिये जाते थे उनसे आधा पैसा लिया जाता था । लोग रीछोंकी लड़ाई तथा उसके भाँति भाँतिके कौतुक देखनेको वहाँ जाया करते थे । इङ्गलिलस्तानके बादशाह प्रथम जेम्स और एडवर्ड डालेनके समय इस कौतुकके बडे २ चतुर बाजीगर थे पर सन् १६४२में इसके रोकनेकी आज्ञा दी गई । रीछों की अनेक जातियाँ होती हैं । उसके हाथ पांव मनुष्योंके सम्मान होते हैं ।

ग्रीसनका रीछ—बहुत बलिष्ठ होता है, उसमें ऐसा बल होता है कि, पक्के पांच सौ सेरका बोझ उठा ले जाता है । यह यदि किसी शवको विना भूखके समयमें पावे तो भूमि खोदके गाड़ देता है । पड़े हुये शवको गाड़ देना तो उसकी स्वाभाविक क्रिया है । यदि किसी शिकारीको यह ग्रीसन रीछ आकर दबा ले वह मनुष्य अपने हाथ पेर फँलाकर मुर्दोंके सम्मान लेट जावे, तो रीछ उसे मुर्दा समझ उसी समय एक गढ़हा खोद उसको उसमें डाल ऊपरसे मिट्टी भर देता है । कहते हैं कि, भेड़िया चाहे कँसाही भूखा क्यों न हो पर ग्रीसन रीछके ढोंके हुए शवको कभी नहीं छूता । इस पशुमें यह आदत और भी है कि, वह आखेटको बगलमें नहीं लेता उसके पञ्जे रखानी जैसे तीक्ष्ण होते हैं अपने आखेटको देख खड़ा हो सहसा उस पर टूट अपने अगले पञ्चोंसे उसे मारता है ।

रीछकी प्रतिष्ठा—किसी किसी देशमें रीछ बड़ा प्रतिष्ठित जीव माना जाता है । वहाँ जब कोई रीछ दिखाई दे तो लोग अत्यन्त नम्रतापूर्वक गीत गाते हैं कि, ऐ रीछ ! हमारे अपराधको जो कि, हम बरछी लेकर आये आप पर आक्रमण किया आपसे लड़ाई की इसे क्षमा कीजिये हमारे अपराधसे रुष्ट न होजिये । आप श्रेष्ठ हो । आप मुझपर आक्रमण न कीजिये, न हमको घायल कीजिये । उसकी प्रशंसाके गीत ये हैं कि, आप श्रेष्ठ तथा बूढ़े हो आप बालोंकी कुर्ती पहने हुये हो तो भी श्रेष्ठ हो तथा पूजने योग्य हो ।

स्तुतिसे खुशी—सर जान रिचर्डसन साहबका कथन है कि, एक वृद्ध तथा स्त्री नहरके किनारे पर बैठे थे । उन्होंने देखा कि, एक बलिष्ठ भयानक रीछ नहरके दूसरे किनारेसे उनकी ओर चला आता है । उस मनुष्यके पास किसी प्रकारका हथियार नहीं था । उसने बचनेकी कोई युक्ति न देखी तो उस रीछकी प्रशंसा करने लगा । उसके स्वच्छ स्वभाव तथा बड़प्पनकी बड़ाई करने लगा । नम्रता पूर्वक कहने लगा कि, मैंने आपकी तथा आपके घरानेवालोंकी

कभी कोई क्षति नहीं की है वरन् आपका तथा आपके समस्त सम्बन्धियोंकी प्रशंसा ही करता रहा हूँ। आपको बहुत श्रेष्ठ जानता था। ऐ महाशय ! आप चले जाइये। हमको किसी प्रकारका कष्ट न दीजिये। इतनी बात सुनते ही वह रीछ परम दयालु प्रतीत होने लगा। चुपके चुपके पीछे फिर गया।

यांत्रिक उपाय—सिङ्गाली लोग अपने गलेमें एक यन्त्र बाँध लेते हैं अथवा अपने बालोंमें रख लेते हैं जिससे रीछके सताये जानेसे बच जाते हैं।

मानुषी भोगी—एक मनुष्य द्वारा जाना गया कि, कुछ मनुष्य एक पर्वतके निकट रातको गये। वे अचेत होकर सो गये तो उससे एक रीछ आया। एक स्त्रीको उठा ले गया। कई दिनों तक वह रीछ उस स्त्रीको एक छिपी जगहमें छिपाये रहा। उसके साथ सम्भोग भी करता रहा। पर्वतसे लाकर भौंति भौंतिके फल खिलाता रहा। एक दिन उस स्त्रीका पति अपनी पत्नीको दृढ़ता हुआ उस स्थानपर पहुँचा। देखा कि, वह स्त्री बैठी है तथा उसकी जांघपर शिर धरकर वह रीछ सोया पड़ा है। उस मर्दने स्त्रीसे कहा कि, तू चली आ। स्त्रीने इशारा किया कि, मैं कैसे आऊँ? स्त्रीने जब अपनी देह हिलायी तो उस रीछने जागकर पुरुषपर हमला किया। उस मर्दने बन्दूकसे ऐसी गोली मारी कि, वह रीछ वहीं मर गया। वह अपनी स्त्रीको लेकर अपने घर चला आया।

भेड़िया।

भेड़िया भारतवर्षमें एक विख्यात हिंसक जन्तु है। वह बड़ी युक्तिसे आखेट किया करता है। बहुतेरे भेड़िये आपसमें मेल करके इकट्ठे हो बड़े बड़े शीघ्रगामी तथा तीक्ष्ण बुद्धिके पशुओंको मार लिया करते हैं। वे अर्द्ध चन्द्राकार व्यूह बाँधकर छिपके बैठते हैं। पर्वतके ऊपरसे आखेटको ढालकी ओर रगेदकर गिरा देते हैं जिससे वह किसी ओर भाग जानेका पथ न पा नीचेकी ओर गिरने लगता है। उस समय अर्द्धचन्द्राकारमें बैठे हुए भेड़िये झटपट निकलकर उसे खा जाते हैं। इसी प्रकार भेड़ियोंकी अनेक धूर्ततायें प्रसिद्ध हैं।

शाह एम्प्यूलस तथा एम्स—रूमके इतिहासमें लिखा है कि, इतालिया देशके बादशाहके मरनेपर राजधानीमें दूसरा बादशाह सिंहासनारूढ़ हुआ। उसने पहिले बादशाहकी एकलौती पुत्री वर्जिनाको फकीरनी बनाकर अपोलो देवताके मन्दिर में सेवाके लिये नियुक्त कर दिया। वर्जिना उस मूर्तिकी सेवा पूजा करने लगी। उसको देवताकी पूजाहीमें लगा दिया, विवाह न किया। बादशाहको भय था कि, लड़कीकी सन्तान राज्य लाभका उद्योग न कर बैठे पर कुछ दिवसोंके पीछे वर्जिनाने दो पुत्र जने। तब बादशाहने पूछा कि, यह किसका गर्भ था।

उसने उत्तर दिया कि, अपोलो देवताका है। यह बात सुनकर बादशाह बहुत क्रुद्ध हुआ। वर्जनाको जीवितही पृथ्वीतलमें गड़वा दोनों पुत्रोंको नदीमें फेंकवा दिया। दोनों बच्चे टेबर नदीमें पड़े हुए भी आंधी लहरोंसे किनारे जा लगे। उनके रोनका शब्द सुनकर एक मादा भेड़िया दौड़ आई। दोनोंको निज मांदमें उठा ले गई। अपने बच्चोंके समान उनको पाला। अपना दूध पिलाया। वे दोनों अपनी धर्मकी माता द्वारा पलकर बहुत बड़े हुये। उनकी धर्मकी माता पालनपोषनमें बहुत ध्यान देती थी। वे दोनों महावीर तथा बलिष्ठ हुये। उनमेंसे एकका नाम एम्यूलस और दूसरेका नाम एम्स था। वे दोनों वहाँके बादशाहको मार उस देशके प्रसिद्ध राजा हुये।

नरकन्या—ऐसी सुनी है कि, अवध पश्चिमोत्तर प्रान्त अथवा वर्तमान युक्तप्रदेशके किसी गांवमेंसे किसी मुसलमानकी लड़कीको एक भेड़िया उठा ले गया। उसने अपनी मांदमें रख दिया और नहीं खाया। उस लड़कीको भेड़ियेका दूध पिलाकर पाला। जब वह लड़की बड़ी हुई तो भेड़ियाके ही समान उसकी आदत हो गई। चौपायोंके समान चलने लगी। भेड़ियोंकी तरह भयानक होकर क्रमशः युवावस्थाके समीप पहुँची। एक दिन उसके घरके लोग उसको देखकर पकड़ लाये। एक वृक्षके नीचे बाँध दिया। वह घरके भीतर रहनेसे बहुत घबराने तथा भेड़ियोंके समान चिल्लाने लगी। वह कच्चा मांस खाती दूसरी कोई चीज न चाहती थी यदि उसको कपड़ा पहनाया जाता तो कपड़ेको चीर फाड़कर अलग कर देती। कितने दिनोंतक तो उसकी यही अवस्था रही। जिसने उस लड़कीको पाला और दूध पिलाया था वह मादा भेड़िया उसके चारों ओर फिर फिर कर चिल्लाती थी। वह लड़की भी अपनी दूध पिलाई माताको देखकर बहुत छटपटाती थी पर लोग बहुत सचेत रहते उस भेड़ियाको मारकर भगा देते थे। अन्तमें वह उसको छोड़ गई उस लड़कीको लोग शिक्षा देने लगे। पहले कच्चा मांस फिर पक्का फिर रोटी खानेकी आदत डलवाई। मनुष्यकी बोली बोलना सिखाया। कपड़ा पहनना सिखाया। मनुष्यके सब नियम सिखाये। पर वह मनुष्यके समान थोड़ा ही बोल सकती थी। मनुष्यके समान स्वच्छ बोली न हुई तथा चाल ढाल भी न्यारीही रही।

भेड़ियेका पाला मनुष्य—सुना था कि, एक मनुष्य लखनऊमें पकड़ आया था वह भेड़ियाकी मांदमें मिला था भेड़ियोंकीसीही उसमें आदत भी थी। वह बड़ा भयानक था यह मनुष्य जन्मकालसे ही भेड़ियोंमें रह गया था।

चरक

चरक एक पशु भेड़ियेके समान होता है। उसके विषयमें कितनीही विचित्र

पुण्य पापके फलका संक्षेप विचित्र आकार

कहानियों कही गई हैं। यह बहुत बलिष्ठ होता है बड़े बड़े पशुओंकी हड्डियों चबा जाता है। यह सड़ा गला मांस खाया करता है। लोग कहते हैं कि, यह वास्तवमें हिजड़ा होता है। प्रत्येक वर्ष यह अपना ढङ्ग बदलता है। एक वर्षमें यह स्त्री तथा दूसरे वर्ष में पुरुष हो जाता है इसी प्रकार यह सदैव स्त्री पुरुष हुआ करता है। यदि उसकी छाया कुत्ते पर पड़ जाय तो गूंगा हो जाता है। पर जब वह कुत्ता बोलता है तो मनुष्योंके समान बोलता है वंसीही बातें करने लगता है। यह कुत्ता प्रत्येक मनुष्यका नाम लेकर बुलाता है। यह पुराने लोगोंका ख्याल् ३। अंग्रेजी पुस्तकोंमें इसके विषयमें बहुत कुछ लिखा है। चरक पर डाइन स्त्रियाँ सवार हुआ करती हैं।

स्यार

स्यार गीदड़को कहते हैं। गीदड़की बुद्धिमानीकी अनेक कहानियाँ विख्यात हैं। सियारको शेरका मन्त्री कहते हैं। क्योंकि, जब कहीं आखेट नहीं दिखाई देती तब स्यार एक ऐसा शब्द करता है कि, जिससे शेर जान जाता है कि, आखेट कहीं समीपही है। तैयार होके उसको मार लेता है। गीदड़ उसके खानेके पीछे बचा मांस खाकर अपनी उदर पूर्ति करता है। शेरकी सहायतासे सदैव कृतकार्य होता रहता है। इसकी बुद्धिमानीकी अनेक कहानियाँ हैं। स्यारसे बहुतेरे मनुष्य शुभा-शुभका विचार किया करते हैं भले बुरे भाग्यको जाना करते हैं। इस कारण पूर्वीय भारतके मनुष्य इसको स्यार पांडे कहा करते हैं इसे पशुओंमें धूर्त जाति मानते हैं। इस विषय पर कबीर साहबका वचन है कि, जो मनुष्य पुराण पढ़ते पढ़ाते तथा सुनाते हैं पर सारको ग्रहण नहीं करते वे मरकर स्यार होते हैं पूर्वजन्म की बुद्धि तथा चैतन्यता इस जन्ममें भी काम देती है। यह बात भी प्रसिद्ध है कि, स्यार रविवारका व्रत रखा करते हैं जिस दिन रविवारका व्रत करते हैं उस दिन कुछ खाते पीते नहीं हैं। लोग कहा करते हैं कि -

पशु तनसे हुं बरत एतवारा । राखें शूकर श्वान सियारा ।

पूर्वजन्मके रंगे स्यार कथा पुराण सुनाके, लोगोंको पूजा पाठकी युक्ति बताते हुए भी स्वयम् कुछ न करते थे, इसी कारण स्यार हुये हैं। इसके शरीरसे बड़ी दुर्गन्धि आती रहती है इस कारण लोगोंको इससे बड़ी घृणा होती है। इस पशुको कोई भी पालना पसन्द नहीं करता। भूखमें सड़ा मांस तथा विष्ठा आदि खाया करता है। स्यार पांडेके पास यद्यपि अब कुछ भी ढोंगका सामान नहीं तथापि ज्योतिष विद्या अब भी कुछ उनके पास है। तिथि तथा दिन इत्यादि जान लिया

गजूवा

करते हैं । एतवारके दिनको भली प्रकार पहचानकर व्रत रखा करते हैं । पंजाब तथा हिन्दुस्थानके लोग यों कहा करते हैं ।—

एतवारकी रात कराड़ी । गीदड़ दौत न लावे बाड़ी ॥

कुत्ता

कुत्ता बड़ा कृतज्ञ, नमक हलाल, चौकस तथा स्वामीपर प्राण देनेवाला पशु है इसी कारण लोग उसको पालते हैं, पुस्तकों तथा मनुष्योंमें कुत्तोंके बडे २ गुण प्रगट हैं । कुत्ता मनुष्योंके घरोंकी बहुत चौकसी करता है । कृतज्ञताके साथ अपने स्वामीकी अधीनतामें रहता है । संसारमें कुत्तों के अनेक गुण और बुद्धिकी बातें प्रसिद्ध हैं ।

राम कालका श्वान—पुराणोंमें लिखा है कि, महाराज रामचन्द्रजीके समयमें एक संन्यासी अपना पेट भरकर बची रोटी सिरहाने रखकर सो गया, उसने सोच लिया था कि, बची रोटियोंको सौझको खावेंगे । जब वह अचेत होके सो गया तो उसी वृक्षके नीचे एक कुत्ता बैठ था, उसने संन्यासीके सिरहानेसे वो रोटी खींच एक स्थानपर भूमिमें दबा दिया, आप चुपचाप उसी जगह बैठ रहा । वह संन्यासी सोकर उठा, अपनी रोटी न पाकर इधर उधर देखने लगा कि, मेरी रोटी कौन ले गया ? जान लिया कि, और तो कोई नहीं, मेरे समीप केवल यह कुत्ता है, इसीने मेरी रोटी खा ली । क्रुद्ध होकर कुत्तेको एक डण्डा मारा, जिससे कुत्तेकी एक टाँग टूट गयी । कुत्ता श्रीरामचन्द्रजीके निकट जाकर चिल्लाने लगा । महाराजाने उस संन्यासीको बुलाया पूछा कि, तुमने उस कुत्ते को क्यों मारा ? संन्यासीने उत्तर दिया कि, यह कुत्ता मार खानेके ही योग्य था, पहले तो इस कुत्तेमें यह दोष है कि जब किसी साधुको देखता है तो भूंकता है—जब वे रोटी मांगने जाते हैं तो यह उनको काटने दौड़ता है, दूसरा इसमें यह दोष है कि, रातको चिल्लाता है सोने नहीं देता । तीसरा प्रातःकाल भजनके समय सो जाता है । चौथे यह मार्गके बीचों बीच बैठता है । पाँचवें जब कोई कहीं चलता है तो यह कान फटफटाता है, उसके कान फटफटानेसे काम नहीं होता छठे मने सौझके लिये रोटी रखी थी यह निकाल कर खा गया । इसी प्रकार इसमें अनेक अवगुण हैं, इस कारण मारनेके ही योग्य है । महाराजाने कुत्तेसे पूछा कि, तू अब इसका उत्तर दे । कुत्तेने कहा कि, मैं साधुओं को देखकर इस कारण भूंकता हूँ कि, तुम तो संसारसे विरक्त होकर साधु हो गये, अब द्वार द्वार पर भिक्षा क्यों मांगते हो । परमेश्वर पर क्यों नहीं निर्भर रहते, क्या वह तुम्हें तुम्हारा भोजन नहीं पहुँचावेगा ? जो अभी तक सांसारिक मनुष्यों के अधीन बने फिरते हो, यही साधूपना है अथवा धूर्तता है ? रातभर मैं इस कारण

मनुष्यके शिरका सर्प संग पुस्त जलमनुष्य मनकता शेष यहूदी अजीबुल खिलकत विचित्र पशु

चिल्लाता रहता हूँ कि, जिसका टुकड़ा मैं खाऊँ, हलाल करके खाऊँ चोरीसे बचाऊँ किसी भी बैरीको निकट न आने दूँ। प्रातःकाल सोता नहीं वरन् जागता रहता हूँ पर लोगोंके देखनेमें सोता दिखाई देता हूँ, पथमें मैं इस कारण बैठता हूँ कि, मैं अपने पापोंके कारण कुत्ता हो गया हूँ। यदि अब किसी साधु सन्त के चरणकी रज मुझपर पड़ जावे तो मैं मेरी कुत्तेकी देह छोड़ मनुष्यकी देह पाऊँ मैं भविष्यका वृत्तान्त जानता हूँ। जिसकेद्वारा मैं जान जाता हूँ कि, यह कार्य होगा अथवा नहीं, जो कार्य नहीं होनेवाला होता है उसी समय मैं कान फट-फटा देता हूँ कि, तू मत जा, तेरा कार्य सिद्ध न होगा। तेरा परिश्रम व्यर्थ जायगा। मैंने इस संन्यासीकी रोटी नहीं खाई, केवल उसके सिरहानेसे रोटी खींचकर एक स्थान पर गाड़ दी। क्योंकि, उस दिन मुझे एतवारका व्रत था, रोटी खाना स्वीकार नहीं था, केवल इसकी भलाईके लियेही मैंने रोटी लेली, क्योंकि, यह बासी रोटी खाता तो बीमार हो जाता। रोटी तो यह माँगकर खाता है औषध कहाँसे पाता?, जिस परमेश्वरने इसको इस समय रोटी दी है क्या सांझको न देगा? सांझके समय यह ताजी रोटी माँगकर खाले। जब श्रीरामचन्द्रने इस प्रकार समस्त बातें सुनीं तो राज्य कर्मचारियोंको आज्ञा दी कि, जाके देखो इस कुत्तेने कहाँ रोटी दबाई है? वह कुत्ता उनके साथ गया, जहाँ रोटी दबाई थी वो जगह बतला दी। उन लोगोंने रोटी खोदकर निकाल महाराजसे जाकर सारी बातें कह सुनाई। महाराजने कहा कि, अब तो यह कुत्ता निर्दोष सिद्ध हो गया संन्यासीका ही दोष है। महाराजा ने कुत्तेसे पूछा कि, तू क्या चाहता है, मैं इस संन्यासीको क्या दण्ड दूँ। उसने कहा कि, इसको शिवजीके मन्दिरका महन्त बना दीजिये। महाराजाने कहा कि, यह शिवजीके मन्दिरका महन्त हो जावेगा तो बड़े सुख चैनसे अपने जीवनके दिन बितावेगा। यह तो इसको कोई दण्ड न हुआ। कुत्तेने उत्तर दिया कि, हे महाराज! मुझको अपने पूर्व जन्मकी सुधि है, मैं शिव पूजा किया करता था, एक दिन मैंने मन्दिरमें घृतका दीप जलाया था जिससे शिवजीके चढानेका घृत मेरे नखोंमें समा गया। मैं रातको भोजन करने लगा तो गरम दालमें मेरे नाखूनका घी छुट पड़ा, मैं अचेतावस्थामें उसको खा गया। केवल उतने ही घी खानेके दोषपर मैं मनुष्यसे कुत्ता हो गया हूँ। मैं केवल उतना घी खानेके पापसे कुत्ता हो गया ऐसी अवस्थामें जब यह महन्त होकर शिवजीका प्रसाद खाया करेगा तो न जाने कितने जन्मतक कुत्ता होगा, किस कष्टमें फसेगा। इस कारण इससे बढ़कर इसको और क्या दण्ड है। कुत्ते के कथनके अनुसार वह संन्यासी शिवमन्दिरका महन्त बना दिया गया।

मनुष्यकीसी बातें—लेटेम्बर नामके एक मनुष्यने प्रांसककी विद्याशालामें इस प्रकार कहा है कि, एक कुत्तेको मनुष्यकीसी बोली सिखाई गई थी । वह स्पष्टरूपसे बोल सकता था आवश्यकताके अनुसार चाहता था कहवा मंगा लेता था ।

एक कुत्ता स्पष्टरूपसे एलिजिबेथका नाम लेता था । वह दूसरी बोली भी बोलता था पर साफ नहीं बोल सकता था ।

NATURAL-HISTORY.

डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहिबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखा हुआ है कि, एक बालकने एक कुत्तेको बिना सिखाये हुए मनुष्यकी बोली बोलते हुए देखा था ।

नानीकुतिया—पंजाब देशस्थ फीरोजपुर जिलेके भाई कोटकसबेमें एक कुतियाने चार बच्चे दिये । उसको एक जमींदारने ऐसा सोटा मारा कि वह मर गई । उसके बच्चे अनाथ होगये, भूखसे मरने लगे, मृत कुतियाकी माता अपने नातियोंसे स्नेह करने लगी । उनकी नानीको भी दो बच्चे हुए थे उसके दोनों बच्चे जीवित थे । अब उसने अपने दोनों बच्चोंको लाकर अपने नातियोंके साथ रखा उन छः बच्चोंका लालन पालन एक साथ उस नानी कुतियाने किया ।

डब्बू—फीरोजपुर जिलेके डरौली गाँवके पास कोपरीवाला नामक एक गाँव है । उसमें एक बहुत कृतज्ञ आज़ाकारी कुत्ता था । उसका स्वामी जो कुछ कहता वह वैसाही काम किया करता । जहाँ बिठा देता वहीं बैठ रहा । जब कहता कि, उठ अमुक स्थानको जा तो वह तुरन्तही चला जाता वह काय्य कर आता । भोजन बनता, घरके मनुष्य कहीं चले जाते तो वह चौकस बैठकर भोजनकी रखवाली किया करता । किसी मनुष्य तथा पशुकी सामर्थ्य नहीं थी कि, भोजनके निकट आ सके । उसका स्वामी आबे अथवा स्वामीकी स्त्री आबे तो आ सकती थी घरके लोग भोजन करती वार उसको भी दे दिया करते थे । स्वामीकी बिना आज़ा भोजनमें मुंह न लगाता था, उसके कितनेही गुण थे । एक दिन ऐसी घटना हुई कि, वह कार्तिक मासमें जब कि, कुत्तोंको काम सताता है कुत्ते कुतियोंके पीछे दौड़ते फिरते हैं, उस समय यह भी एक कुतियाके पीछे लगा । लोगोंने देखकर उस जमींदारसे कहा कि, तुम्हारा डब्बू कुत्ता कुतियोंके पीछे फिरता है । जब वह कुत्ता घर आया तो उसका स्वामी उस पर झिड़का । कहा कि, ऐं डब्बू ! तू भ्रष्ट हो गया, बूढ़ा होने पर भी तू कुतियोंके पीछे फिरा करता है ? क्या तुझे लज्जा नहीं आती । अब तू मेरे सामनेसे चला

उनका दोशिरके मनुष्य छातीमें शिर घुटनेके नीचे कान, श्वान मुख अश्वमुख मनुष्य, पचास गजका मनुष्य एक टांगके मनुष्य, तात्पर्य निर्गमसे निर्धारण

जा, फिर मत आइयो। इतनी बात सुनतेही वह कुत्ता पलटकर गौवके बाहर आया, एक तालाबके समीप जलके किनारे वृक्षकी जड़पर अपना शिर रखकर लम्बा पड़ गया। जब भोजनका समय आया तो जमींदारकी स्त्रीने कहा कि, आज डब्बू नहीं आया, न जाने कहाँ है लोगोंने समाचार दिया कि, डब्बू तो गौव के बाहर जलके किनारे पड़ा हुआ है। जमींदारने जान लिया कि, डब्बू मेरी झिड़कियोंसे असन्तुष्ट हो गया, रोटी तथा लस्सी लेजाकर उसके मुंहके निकट रख दी। उसने मुंहसे भी न लगाया। यद्यपि जमींदार तथा अन्यान्य मनुष्योंने उसको बहुत कुछ बढ़ावे दिये पर उसने रोटी नहीं खाई। जमींदारने कहा डब्बू ! तू घर चल, पर वह न आया। जमींदार फिर झिड़का। कहा कि, तू घर चल, तब घर आया। उस जमींदारकी स्त्री ने कहा कि, ऐ डब्बू ! क्या तुझे लज्जा नहीं आई कि, तू घर आया। इतनी बात सुनतेही फिर वह भाग कर उसी स्थान पर जा पड़ा। जमींदार लाख लाख बार उठाता, पर वह कुत्ता अपनी जगहसे हिलता नहीं था। उसी जगह पड़ा रहा, उसकी आंखोंसे आँसू निकलते थे। वह बिना खाये पीये उसी जगह पड़ा रोता रहा। अन्त चौथे दिवस उसी जलके किनारे मर गया। जमींदारने नवीन वस्त्रका कफन देकर पृथिवीमें उसे अपने हाथसे गाड़ दिया। ऋषि मुनि और सिद्ध साधु जो अपने कर्मोंके फलसे किसी पशुकी योनिमें जन्म लेते हैं तो भी उनके पूर्व जन्मके कार्य वैसेही उस जन्ममें भी रहते हैं।

दूसरा डब्बू—फीरोजपुर नगरके सोतियोंके महलामें एक डब्बू माकन कुत्ता था। वह एतवारका व्रत रखवा करता था, जो कोई उसके स्वामीसे लड़ता झगड़ता तो वह अवश्य ही काटता। बनाया हुआ भोजन रखकर घरके मनुष्य चले जाते वह उसकी रखवाली किया करता। किसी पशु अथवा मनुष्यको पास न आने देता, बहुत चौकसी रखता था। जो कार्य उससे कहा जाता वे वो सब ठीक ठीक किया करता था। जो मिहमान आते तथा बिदा होने लगते वो उनके वस्त्रका खूंट पकड़ लेता था। उस कुत्तेका यह तात्पर्य होता कि, वह रोटी खाकर जावे जब घरके मनुष्य कहते कि, डब्बू ! यह मिहमान भोजन कर चुका है इसको जाने दे तो वह उसको छोड़ देता घोड़ेकी बाग पकड़कर ले जाता उसको पानी पिलाया करता। वह कुत्ता मिट्टीके बरतनका हो अथवा गँदला जल हो कभी नहीं पीता था। मल त्यागके लिये बाहर दूर चला जाता था। स्वच्छ तथा पवित्र रहता था। चारपाई पर सोया करता था। चौकी पर बैठता था। मुसलमानका रोटी पानी व्यवहारमें कदापि नहीं लाता था। जब तक उसका स्वामी आज्ञा न देता तब तक कुछ नहीं खाता था।

अन्तर्यामिनी कुतिया—जौनपुर जिलेके बदलापुर मौजेमें एक कुतिया थी वह बच्चोंको जनते ही खा जाती एक भी जीवित न छोडती थी एक बार एक ब्राह्मणने उससे एक बच्चा छीन लिया उसको खाने न दिया । उसको पालता रहा । जब वह बच्चा बड़ा हुआ तो ऐसा विपैला हुआ कि, जिसको काटता वह भूंक भूंककर मर जाता । उसका काटा हुआ कहता कि, मेरी माता कुतिया अन्तर्यामिनी थी इस कारण वह अपने सारे बच्चोंको खा जाया करती थी । इसका कारण यह था कि जितने बच्चे उसके पेटसे उत्पन्न होते थे सबके सब विपैले होते थे । यह दशा देखकर ब्राह्मणने उस कुत्तेके पालनेका बहुत खेद प्रगट किया । लोगोंने उस कुत्तेको मारकर फिकवा दिया ।

मोतीराम—अवध पश्चिमोत्तर प्रान्तके कोटवानामके कसबेमें जगजीवनदास नामके एक श्रेष्ठ पुरुष, सत्य नामियोंके पंथके आचार्य हुये हैं । वे कबीर साहबके शिष्य थे । उनके पास एक मोतीराम कुत्ता था । वह उनका बड़ा आज्ञाकारी था । जगजीवनदासने उसके कृतज्ञतादि गुणको भली भाँति देखकर उस पर बड़ी दया की, महन्तों की तरह सेली टोपी पहना दी । वह कुत्ता भी सारे साधुओंके साथ भजन कीर्तन सुना करता था जैसे साधु सुनते हैं ।

एक दिन ऐसी घटना हुई कि, मोतीराम अन्यान्य कुत्तोंके साथ मिलकर चमारोंकी बस्तीमें गया । वहाँ पशुवोंकी हड्डियोंका ढेर लगा हुआ था । सारे कुत्तोंने एक एक हड्डी लेली । मोतीरामने भी सजातियोंके साथ हड्डी उठा ली । लोगोंने जगजीवनदासजीको समाचार दिया । देखो मोतीरामने मुंहसे हड्डी पकड़ी है । उन्होंने जाकर देखा तो पुकार कर कहा कि, ऐ बेईमान मोतिया ! अब तू मुझको अपना मुंह मत दिखा । यह बात सुनते ही मोतीराम नितान्त ही लज्जित होकर बैठ गया । उसने उसी समय प्राण त्याग दिये ।

जगजीवनदासजीने उसकी समाधि बनवा दी । सुना है कि, उसकी समाधि वहाँ अभीतक बनी हुई है । जिस किसीको पागल कुत्ता काटता है वह मोतीरामके नामसे यह कहता कि, मैं तुम्हारी समाधिपर कुछ चढ़ाऊँगा, मुझे कुत्तेका विष न चढ़े । जब वह चढ़ा हो जाता है तो वह मोतीरामकी समाधिपर जाकर अपनी मनौती पूरी करता है ।

पठानका कुत्ता—अवध पश्चिमोत्तर प्रान्तकी एक बात है कि, एक पठानने आवश्यकतावश एक महाजनसे दो सौ रुपया लिया, अपना कुत्ता उन रुपयोंके बदले उसको दे दिया प्रण किया कि, अमुक समयके पीछे मैं तुम्हारा रुपया चूकाकर अपना कुत्ता ले जाऊँगा । एक रातकी बात है कि, महाजनके

अकानसे चोर बहुतसा धन दौलत लूट ले गये। सबेरा होते ही चोरको ढूंढ़ा पर पता न लगा। लोग एकत्रित हुये हुल्लड मचा। उस समय वह कुत्ता महाजनका वस्त्र पकड़ कर खींचता था पर लोग कुछ ध्यान न देते थे, अन्तमें लोगोंने मालूम करना चाहा कि, कुत्तेके कपड़ा खींचनेका क्या कारण है कि, यह कुत्ता बारम्बार कपड़ा पकड़के खींचता है आगेको दौड़ता जाता है। कुछ लोग कुत्तेके साथ चले वह उनके आगे आगे चला। नगरके बाहरके एक तालाब पर जा पहुँचा, वहाँ वह तालाबके भीतर घुस गया, गोता मारकर फिर बाहर निकल आया। लोगोंको इशारा किया कि, इसमें सब माल असबाब है। क्योंकि, जब चोरोंने वहाँ माल रक्खा था तब यह कुत्ता देख रहा था। लोगोंने कुत्तेका अभिप्राय जान लिया। तालाबके भीतर घुसकर माल ढूंढ़ने लगे। चोरीका सारा माल तालाबसे निकल पड़ा, महाजन अपना माल पाकर अत्यन्त हर्षित हुआ। एक पत्र उस कुत्तेके गलेमें बाँध कर उससे कहा कि, अब तुम जाओ अपने स्वामीको मेरा यह पत्र दिखाओ। तब वह कुत्ता चला। उसी समय वह पठान महाजनका रुपया लेकर आता था। राहमें वह कुत्ता मिला उसको देखकर पठान अत्यन्त क्रुद्ध हुआ। कहा कि, ऐ कुत्ते ! तूने मुझको महाजनसे झूठा बनाया, मेरी आज्ञाके बिना चला आया। तलवार खींचकर मारी कुत्तेका शिर कट गया। वह पत्र गिर पड़ा जब उसको लेकर पढ़ा तो उसमें लिखा पाया कि, मैंने आपसे दो सौ रुपये भर पाये चोरीका सारा हाल तथा कुत्तेकी निम्नक हलालीकी सब बातें लिखी हुई थी उसको पढ़कर पठान नितान्त ही दुःखी हुआ उस उजाड़में कुत्तेकी पक्की छतरी बनवादी। सुतरां अभीतक वह क्रूर वहां बनी हुई है।

कुत्ताकी योनिमें कर्जी—मैंने सुना था कि, महाजन अपने मृत पिताके लिये तीर्थमें पिण्ड देने गया, सांझके समय एक अपने मित्र महाजनके घर उत्तरा। घरवालेने उस महाजनसे कह दिया कि, रातको सचेत रहना, हमारे घर एक ऐसा बलिष्ठ कुत्ता है जो कि, रातके समय किसी पराये मनुष्यको घरके समीप देखता है तो फाड़ खाता है। उसके कहनेसे मेहमान चौकस रहा। रातके समय उसको पायखाने जाना हुआ। उसने इधर उधर कुत्तेको देखा पर वह कहीं दिखाई नहीं दिया। वह लोटेमें जल भर कर पायखानेके लिये चला। यह देख चारपाईके नीचे बैठे हुआ कुत्ता बाहर निकलकर महाजनके पीछे लग गया। महाजनने पीछे फिरके देखा तो कुत्ता दिखाई दिया। यह देखकर वह बहुत डरा और ठहर गया। उसको भयभीत होते देखा तो कुत्ता बोला कि, भयभीत न हो, पायखाने जा यह बात सुनकर वह और भी चकित हुआ

पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे पशु भेदका कारण महावीर, वैज्ञानिक, हाथी गोपाल दास

कि, यह कुत्ता तो बातें करता है उसने पूछा कि, तुम कौन हो ? अपना हाल कहो, कुत्ता बोला कि पायखाने हो आ, तब मैं तुमसे कहूँगा । वह महाजन पायखानेसे शीघ्रही पलटकर हाथ पैर धोकर आ बैठा । उस कुत्तेसे पूछा कि, तुम कौन हो ? कुत्तेने कहा तुम कहाँ जाते हो ? महाजनने उत्तर दिया कि, अपने पिताकी गति कराने जाता हूँ । यह बात सुनकर कुत्ता बोला कि, तुम्हारी गया सुफल न होगी । क्योंकि, तुम्हारा पिता तो मैं हूँ । मैंने इस महाजनसे पचास रुपये उधार लिये थे पर ये भूलसे बहीपर न चढ़ा सके, न मैं उनको इसे लौटा सका । उन्हींके बदले मैं इस महाजनके घर कुत्ता हुआ हूँ । यदि तू उसको वे पचास रुपये दे देवे तो मैं इस कुत्तेकी योनिसे छूटूँ, तेरा गया करना सुफल हो । यह बात सुनकर वह मेहमान चुप हो रहा । सबेरा होतेही उसने घरवाले महाजनसे कहा कि, ऐ भाई ! हमारा तुम्हारा लेन देन सदैवसे चला आता है, हमारे पिताने तुमसे पचास रुपये लिये थे, वो अबतक नहीं दिये जासके, उन्हें ले लो । क्योंकि, हिन्दुओंका यह नियम है कि, जो गया करने जाता है वह प्रथम अपना सारा ऋण शोध लेता है तब ही गया सफल होती है, नहीं तो उसका गया करना सुफल नहीं होता । यह बात सुनकर घरवाले महाजनने अपनी बही निकाली । देखी तो कहीं लिखा न पाया । उसने कहा कि, मैं रुपया न लूँगा । उसने बहुत समझाया । कहा कि, यद्यपि तुम्हारी बही पर नहीं चढ़ा पर मुझे भली प्रकार विदित है कि, मेरा पिता तुम्हारे पचास रुपयोंका ऋणी था । पीछे बहुत कहनेसे उसने रुपया ले लिया । उसने अपने मित्रसे विदा होकर गयाकी राह ली । अभी वह दो तीन कोस भी न गया होगा कि, कुत्ता मर गया जिससे वह महाजन बड़ा दुःखी हुआ कि, हमने न जाने कैसा रुपया लिये, जिससे हमारा प्यारा कुत्ता अचानक मर गया ।

कुत्ता और संन्यासी—पञ्जाब देशकी कपूरथला नगरकी एक कहानी है । वहाँ एक राजा था । वहाँ एक तपस्वी संन्यासी भी रहता था । राजा उसकी सेवा किया करता था । उस संन्यासीके पास एक कुत्ता रहता था । एक दिन वह संन्यासी जीवित समाधि लेने लँगा । समाधि लेनेका समस्त प्रबन्ध कर चुकनेके बाद राजाने निवेदन किया कि, ऐ महाराज ? आप तो अब समाधि ले चले, मैंने अनेक कालतक आपकी सेवा की है, आपसे बहुत कुछ आशा रखता था । क्योंकि, मैं निश्चूत हूँ यदि आपकी दया हो तो मेरे कोई सन्तान हो जाय, मैं राज्य धन लेकर क्या करूँ, किसको दूँ ? संन्यासीने उत्तर दिया कि, ऐ राजन् ! तेरे सन्तान नहीं तो मैं स्वयम् तेरा पुत्र होकर उत्पन्न होऊँगा । तेरा पुत्र कहला-