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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

१२६ | कंब रामायण

विख्यात क्षीरसमुद्र से लगते थे, सब पर्वत अनंत भगवान् ( शिव ) के पर्वत ( कैलास ) के समान दीखते थे, उस चाँदनी के प्रसार के बारे में हम और क्या कहें ?

सभी निर्मल दिशाएँ तथा उनमें रहनेवाले सब चेतन-अचेतन पदार्थ उस चंद्रिका की बाढ में श्वेत हो गये थे, मानो समुद्र से घिरी यह धरती, वज्र-सदृश करवाल-युक्त मकर-केतन (मन्मथ) के (जन्मदिवस के सूचक) श्वेतवस्त्र को धारण किये हुए शोभित हो रही हो ।

सब रमणियाँ, उज्ज्वल तारकों के सदृश मुक्ताओं (के बने चँदोवे ) की छाया में, संचरमाण मेघों के विश्रामस्थान बने हुए उद्यान-रूपी जवनिकांतर में, सरोवरों के समान चमकते हुए स्फटिकों से प्रकाशमान काननों में और शोभायमान पुष्प-कुंजों में जा पहुँचीं ।

पुष्पों से सुरभित कुंतलवाली ( रमणियाँ ) पुष्पों की शय्याओं के ( रति ) समर में आनन्द पाने का विचार करती हुई मनोहर स्वर्ण-चषकों में ढाले गये अमृत-सदृश मद्य का पान करने लगीं ।

नक्षत्रों से शोभित गगन पर विहार करनेवाली (अप्सराएँ) तथा विद्याधर सुंदरियाँ भी जिनकी सुन्दरता की समता नहीं कर सकती, वैसी (सुन्दर) शरीरवाली तथा हरिणों को परास्त करनेवाले नयनों से युक्त वे ( रमणियाँ ) अपने मुख से मद्य को इस प्रकार पीने लगीं, मानो भ्रमरों से घिरे पुष्प में मधु डाला जा रहा हो ।

वह चषक, जो बिखरे हुए दूध के जैसे चन्द्र-किरणों से अंकित था, (किसी रमणी के ) कर की मनोहर अरुण कांति के पड़ने से लाल दिखाई पड़ने लगा है । उस अनुपम सुंदरी के मुख में गिरा हुआ मद्य अमृत बनकर चमक उठा ( अर्थात्, उसके श्वेत दाँतों की छाया से मद्य भी श्वेत हो उठा ), तब उसकी अंजन-लगी आँखें भी लाल हो गईं ।

पुष्पमाला, 'पुनहु' ( एक सुगन्धित द्रव्य ), शीतल अगरु का धूम, इनसे सुवासित कुंतलवाली (रमणियाँ), जिस श्वेत मद्य का पान करती थीं, वह ( मद्य ) अग्निकुण्ड में डाले गये होमघृत के समान अंतर में स्थित कामाग्नि को भड़काकर बाहर प्रकट कर देता था ।

क्रांतिपूर्ण ललाटवाली एक ( सुन्दरी ) स्वर्ण के बने शीतल सुगंधित मद्य-भरे चषक में अपने भव्य प्रतिबिंब को देखकर ( यह समझकर कि कोई अन्य नारी मद्यपान कर रही है ) कह उठी—'हे सखी, मेरे साथ तुम भी आनन्द से मद्यपान करो ।' विष समान दीर्घ नयन तथा सुधा-समान मधुरवाणी युक्त ( तरुणियों ) के अज्ञान-सदृश अज्ञान भी क्या कहीं हो सकता है ?

( यह टूट न जाये ) ऐसा डर उत्पन्न करनेवाली सूक्ष्मकटि-युक्त अप्सरा-समान कोई ( सुन्दरी ) अलकभार, विषाक्त शूल-सदृश काले नयन, रक्त मुख—इनसे सुशोभित हँसता हुआ अपना वदन मद्य में ( प्रतिबिंबित ) देखकर ( यह समझकर कि यह कोई अन्य नारी है ) कह उठी कि 'हे पगली, तू ने यह क्या काम किया ? यहाँ ( सुराही में ) अधिक मात्रा में मद्य के रहते हुए भी तू व्यर्थ ही जूठन का पान करती है' और अपने दंत-रूपी कुंद-कलियों को प्रकट करती हुई हँस पड़ी ।

अनुपम रूपवती, अन्यादृश ( विचित्र ) कठोरता रखनेवाले तथा हत्यारे शूल की समानता करनेवाले नयनों से युक्त ( एक रमणी ) रत्नमय मधुपात्र में श्वेत ज्योत्स्ना पड़ने

बालकाण्ड १२७

से उसे मधु से भरा हुआ समझकर उठाकर पीने लगी, तो आसपास के सब लोग उसका उपहास करते हुए हँस पडे, वह (वेचारी) अपने मन में बहुत लज्जित हुई।

किंशुक पुष्प-समान मुखवाली एक (तरुणी), जिसका मृदु वचन ऐसा था कि उसे सुनकर लोग कहते थे कि ‘वीणा तथा वेणु को नाद-माधुरी देनेवाली इसकी ही बोली है,’ नालसहित नीलकुवलय १ को भीतर रखनेवाले सुगन्धित मद्य-भरे पात्र में, अपने करवाल-तुल्य नयनों का प्रतिबिंब देखा और भ्रमर की भ्रान्ति से उस (प्रतिबिंब) को उड़ाने लगी।

वहाँ सोने का कर्णभूषण पहनी हुई, एक (तरुणी) ने मद्य मे दिखाई देनेवाले सुन्दर चन्द्र-प्रतिबिंब को अपने नयनों को सतुष्टि देती हुई देखा और उसे समझकर मधुर बच्चन कहने लगी—‘(हे चन्द्र !) तू आकाश के राहु नामक सर्प से डरकर यहाँ (इस मद्य पात्र मे) आ छिपा है, मैंने तुझे अभय प्रदान किया, तू डर मत।’

नदी-धारा की भौंरी एक ही स्थान पर स्थिर खड़ी रह गई है, ऐसा अनुमान उत्पन्न करनेवाली नाभि से शोभित एक (तरुणी) ने रक्त-मधु की वर्षा करनेवाले पुष्पों के चँदोवे को चीरकर नीचे झरनेवाली घनी ज्योत्स्ना को देखा और (मद्यपान से) ज्ञानभ्रष्ट हो जाने के कारण अथवा स्त्री-सहज अबोधता के कारण उसे मद्य समझकर पात्र मे भरने का प्रयत्न करने लगी।

बिजली के समान लचकती हुई कटिवाली एक (सुन्दरी) की उज्ज्वल अमृत-तुल्य मधुर वाणी बीच मे ही (पूर्ण हुए बिना ही) स्खलित हो जाती थी। वह (नारी) अपने जघन पर की मेखला को हटाकर उसके स्थान में पुष्पहारों को पहनने लगी और स्वर्ण-हार को केशों में धारण करने लगी। (ये सब मद्यपान से मत्त व्यक्ति के कार्य हैं।)

एक (रमणी) ने मद्य-भरे रत्नखचित चषक मे हास्ययुक्त अपने वदन (के प्रति-बिंब) को देखकर यह सोचा कि गगन पर का चन्द्र मधु की कामना से (उस पात्र मे) उतर आया है वह उस (प्रतिबिंब) से कहने लगी—‘हृदय को आनन्द देनेवाले अपने पति के साथ जब मैं मान करूँगी, तब तुम यदि मुझे जलाओगे नहीं, किंतु शीतल ही बने रहोगे, तो मैं यह मद्य तुमको पीने के लिए दूँगी।’

तिल-पुष्प सदृश सुन्दर नासिकावाली, आभूषण पहनी हुई एक रमणी नशे के कारण यह भी न जान सकी कि हाथ के काँप उठने से मद्य आसन पर गिर गया है और यह सोच कर कि अभी पात्र मे मद्य है उसे हाथ से उठाकर अपने पद्मराग तुल्य अधर से लगा लिया।

झुण्डो मे मँडराते हुए भ्रमर आकाश मे ऐसे फैले हुए थे, जैसे किसी बड़े लोभी की सम्पत्ति की कामना करते हुए याचक आ जुटे हो। एक सुन्दरी, मधुस्त्रावी कमल-समान अपने अरुण मुँह को खोलकर मद्य पीने से डरती थी (इसलिए कि कही भ्रमर मुँह मे न घुस जाये), अतः चपक मे कमल के खोखले नाल को रखकर उसके द्वारा मद्य (चूसकर) पीने लगी।

एक (रमणी), जिसकी आँखें चर्मकोष से तत्क्षण निकाले गये खड्ग के समान चमक उठती थी और जिनको देखकर जलपक्षियों से भरे कमल तड़ाग मे रहनेवाले मीन


१ कहा जाता है कि मद्य में सुगन्ध उत्पन्न करने के लिए कुवलय, कमल आदि पुष्पों को डाला जाता था।

१२८ कंब रामायण

भी व्याकुल हो भाग खडे होते थे, जो मधु से पूर्ण पुष्पो से अलंकृत कोमल कुंतलवाली और मयूर-तुल्य थी, इसलिए मद्यपान नही करती थी कि उसके हृदय में निवास करनेवाला प्रेमी मद्यसेवी नही था।

एक नारी क्रोध का अभिनय दिखानेवाले व्यक्ति के सामान ही यम-समान नेत्रो को लाल किये, ललाट पर टेढ़ी भौहो को चढ़ाये, चमकते दाँतो को कटकटाती हुई मनोहर पल्लवों को परास्त करनेवाले अपने करतलो से ताली बजाती थी।

एक रमणी, काँपते हुए अतिरक्त अधर-बिंब को श्वेत ज्योत्स्ना पर क्रोध करनेवाले अपने दाँतो से दबाये हुए, बहुत पैने और खून से लथपथ शूल-जैसी आँखो से घूर रही थी। उसकी देह से जो स्वेद बह चला, वह (शरीर से) बाहर उमड़ते हुए मद्य के समान ही दीखता था।

किसी नारी के बिंबफल-सदृश उभडे अधर से प्रकट होनेवाली लाली आँखो में जा चढ़ी। वह सोचती कुछ थी और कहती कुछ। उसके अनुपम कमल-तुल्य वदन पर भ्रू-रूपी धनुष झुक गये। ललाट-रूपी चन्द्र भी ओस बरसाने लगा।

(किसी के) सेमल के फूल-जैसे अधर की लाली छूट रही थी, दाँतो से मधुर-रस (लार) बह रहा था, स्तन-कुचुक का बंधन और नीवी-बंधन ढीले पड़ रहे थे, लहराते हुए केशपाश छूटकर लटक रहे थे। उसके वदन से हास उत्पन्न हो रहा था। पति-समागम और मद्यपान—दोनों एक ही जैसे (लक्षणवाले) होते हैं।

‘मुखर नूपुरवाले मन्मथ से मै जो पीड़ित हूँ, इस उस (मेरे प्रियतम) को बताओ,’ यो कहकर अपनी सखी को प्रियतम के पास भेजती हुई रत्न-खचित मेखलावाली एक (रमणी) ने फिर प्रश्न किया—‘हे सखी, क्या तुम भी मेरे मन के जैसे ही (प्रियतम के पास) रह जाओगी या (शीघ्र समाचार लेकर) लौट आओगी?’

हरिण को भी मुग्ध करनेवाले नयनोंवाली एक (रमणी) ने, किसी एक बलशाली नरेश के निकट, अपने अनुकूल रहनेवाली सभी सखियो को, एक के पीछे एक को भेज दिया। फिर स्वय ही अकेली उस (प्रियतम) के पास चल पड़ी।

सुगन्धित पुष्प-शय्या की परतों पर, सीमा-रहित प्रेम-समुद्र में डूबी हुई, मधु-भाषिणी एक (रमणी) ने अपने पति के मब नाम बतानेवाले तोते को बहुत आनंदित होकर अंक मे भर लिया।

उज्ज्वल ललाटवाली एक (रमणी) सुगंधित स्थान में रहती हुई, अपने सगी तोते को अंक मे लिये कह रही थी कि मेरे प्राण-सम (पति) को तू आज नहीं ला सका, फिर तू मेरी क्या सहायता कर सकता है? मेरे लिए तू क्रौंच पक्षी के समान (दुःख को बढ़ाने-वाला) हो गया है, और वह क्रुद्ध होकर रो पड़ी।

प्रियतम ने उसकी सौत का नाम लेकर उसका संबोधन किया, तो स्वर्ण-कंकण-धारिणी मयूर-सदृश एक (रमणी), अंकुर-सम दाँतो को प्रकट करती हुई हँस पड़ी और ‘कयल’ मीन-जैसे उसके नयनो से अश्रुधारा बह चली।

एक पुरुष ने अपने पूर्व अपराध के कारण मान किये बैठी हुई अपनी प्रेयसी का

बालकाण्ड १२६

मान दूर करने की इच्छा से उस (रमणी) की, नितंबों पर फैली हुई मेखला को पकड़ा, तब स्वर्णवलय-भूषित उस (स्त्री) के नयनों में न समाकर मोती (जैसे आँसू) झर पड़े और टूट-कर बिखरे हुए मेखला के रत्नों के पास धरती पर जा गिरे।

पुष्प-भार से विकसित कुन्तलवाली (एक रमणी) अपने मन में विविध प्रकार विचार करती हुई बैठी रही कि प्रियतम से साक्षात् होते ही उससे मान करूँ या प्राणों को गलानेवाली विरह-पीडा को दूर करती हुई उससे मिलन का आनन्द उठाऊँ अथवा उसके गुणों का वीणा पर गान करूँ।

एक (रमणी) जो अपनी सखियों पर अपने (पति के साथ हुए) मान को वचनों के द्वारा नहीं प्रकट कर सकी, (किन्तु उन्हें मान की बात जताकर प्रियतम के साथ संधि करा लेना चाहती थी) मकरवीणा पर, विकसित कमल-समान अपने कर को लाल बनाती हुई फेरने लगी और अपने मन की बातें संगीत के द्वारा प्रकट करने लगी।

पुष्पित शाखा समान एक सुन्दरी (अपने पति के न आने से) मिलनसूचक रेखाएँ खींचने लगी, किन्तु उन रेखाओं के अपने अनुकूल फल न दिखाने से निःश्वास भरने लगी।¹ अनंग के अमोघ बाण से आहत होकर वह इस प्रकार पीडित हुई कि देखनेवाले 'इसके प्राण हैं या नहीं'—यह संदेह प्रकट करने लगे।

कुडुक को शोभा देनेवाली अँगुलियों से युक्त एक (रमणी) ने विरह से उद्विग्न होकर अपने सुन्दर (प्रियतम) के पास दूत भेजा। जब वह (प्रियतम) आ पहुँचा, तब उस सुन्दरी के नेत्र लाल हो गये और उसने कपाट बन्द करके मार्ग रोक दिया। न जाने उस सुन्दरी के मन में क्या विचार था?

एक तरुणी, जो पुष्प-शय्या पर (मान किये हुए सोई-सी पड़ी थी) यह चाहने लगी कि अब मान छोड़ दे, किंतु उसकी इच्छा को, उसका पति (जो उसके मान से व्याकुल हो मौन पड़ा था) नहीं समझ सका। तब उस सुन्दरी ने एक झूठी अँगड़ाई लेकर अपने हाथ-पैर फैलाती हुई यह प्रश्न किया कि कितनी घटिकाएँ बीत गई हैं?

एक (सुन्दरी) उतावली हो उठी और महावर लगे पाँव से (अपने पति पर) आघात किया, तो उस (पति) के रोमांच हो आया, मानो (आनन्द के) नीर से सिक्त शरीर-रूपी उद्यान में रोपे गये प्रेम-बीज अंकुरित हुए हों।

शत्रु-नरेशों को सतानेवाले करवाल का धनी एक वीर, रमणी (अपनी पत्नी) के स्तनों को अपनी प्रकृति के विरुद्ध कृश² हुए देखकर मन में उमंग से भर गया और आनन्द के कारण आपे से बाहर हो गया। उसका मुख चमक उठा और उसकी भुजाएँ फूल उठीं।

एक अतिसुन्दर पुरुष ने देखा कि उसकी प्रेयसी पुष्प-शय्या पर पड़ी है, जो मन्मथ


१. विरहिणी नायिका आँख बन्द करके बालू पर वर्तुल रेखा खींचती है, यदि उस रेखा के दोनो सिरे मिल जायें, तो वह मानती कि प्रियतम का मिलन होगा; नहीं मिलें, तो उसे अपशकुन मान लेती है।
२. यह ध्वनित होता है कि उसके वियोग के कारण ही उसकी प्रेयसी के स्तन कृश हो गये थे। अपने प्रति गाढ प्रेम की यह सूचना पाकर वह वीर अति हर्षित हुआ। —अनु०

१३० कंब रामायण

के बाणो से सर्वत्र आवृत्त-सी है और शय्या पर बिछाये गये पल्लव झुलस गये हैं।¹ यह देख-कर उसका चित्त विश्रांत हो गया।

एक युवती के स्तन, जो पोते हुए चंदन-लेप को भी तपाकर सुखा देनेवाली उष्णता से भरे थे, ऐसे लगते थे, मानो करवाल का व्यवसाय (युद्ध) करनेवाले किसी कुमार को लक्ष्य करके, 'तुम देश की रक्षा करो' कहकर बडो ने उसके अभिषेकार्थ (स्वर्ण के) जल-कलश रख दिये हों।

एक सुन्दरी ने, जो अपने प्राण-समान नायक के पास स्वयं अभिसार करना चाहती थी, मुखरित मंजीर, विस्तृत मेखला तथा हीरे के बने हुए श्रेष्ठ आभरणो को उतार दिया और अपराधी चन्द्र की ओर झुलसानेवाली दृष्टि से देखा।²

उद्यान की कोयल-जैसी एक सुन्दरी ने कोल्हू मे पडे हुए मृदु गन्ने के समान (काम-व्याधि से पीडित) एक पुरुष को पुष्प के हार से बाँध दिया था, उस पुरुष की वज्र-सदृश भुजाएँ उस बंधन को तोड़ नही सकी। इस पुष्पहार की भी शक्ति कैसी थी ?

घने कुतलोंवाली एक (सुन्दरी) ने अपनी विरह-पीडा को जताने के लिए (चित्र मे स्थित) मन्मथ को देखकर फिर एक (सखी) नारी की ओर देखा। उस (सखी) ने भी उस सुन्दरी का मनोभाव समझकर, मधुस्रावी पुष्पहार धारण करनेवाले (पुरुष) के घर की ओर देखा।³

एक शूलधारी (तथा शत्रुओ के प्रति) क्रोधी राजा के पास, स्वर्ण का कर्णभूषण पहने हुई मयूर-सदृश एक नारी त्वरित गति से जाने लगी। उसे (इस प्रकार आने के लिए) निमन्त्रण देनेवाला दूत कौन था ? मन को द्रवित करनेवाला मद्य था ? रात्रि-काल था ? अथवा मन्मथ ही था ? विदित नही है।

पूर्ण प्रेम के सामने परास्त हो मान करनेवाली अर्धचन्द्र-सदृश ललाटवाली एक (सुन्दरी) ज्योही मेघ-सदृश अपने नयनो से अश्रु बहाने लगी, त्योही प्रियतम ने आकर पूछा कि तुम्हे क्या हुआ है ? तुरत ही वह हँस उठी और मान को छोड़ बैठी।

झुठलानेवाली कटि-युक्त (अति सूक्ष्म कटिवाली) एक सुन्दरी ने मन से अपने प्रियतम को न हटाती हुई भी आलिंगन-बद्ध हाथो को हटा दिया। यह विचित्र कार्य पुरुष को हृदय में लगे शर के समान दुःखदायक था।

एक कोमलांगी अपने प्रेमपात्र सखी का हाथ अपने हाथ मे लिये हुए यह कहना चाहती थी कि तुम (मेरे प्रियतम के पास) दूत बनकर (सन्देश ले) जाओ, किन्तु लज्जा की अधिकता के कारण दीर्घ समय तक मौन रहकर सिसकियाँ भरती खड़ी रही।


१. उसके विरह मे तपती हुई नायिका के शीतोपचार के लिए बिछाये गये पल्लवों की यह दशा थी। इससे नायिका का प्रेमाधिक्य व्यंजित है।
२. यह ध्वनित है कि ओरों से छिपकर अभिसार करने की इच्छा से शब्द करनेवाले आभरणो को दूर कर दिया ओर प्रकाश करनेवाले चन्द्रमा को भी कांतिहीन कर देना चाहा, जिससे सर्वत्र अधकार हो जाय।
३. नायिका का यह संकेत है कि वह मन्मथ के बाणों से पीडित है और सखी उसको बचाये। सखी का सकेत है कि वह उसके प्रियतम को ले आयेगी।

बालकाण्ड १३१

उत्तरोत्तर उमड़ते हुए प्रेमवाली एक (सुन्दरी) अपने प्राण-समान प्रियतम के व्यापारों के बारे में, सुरभित पुष्पहार धारण करनेवाली एक अन्य स्त्री से कहना चाहती थी, किन्तु लज्जा के कारण वैसा न करके कुछ असंबद्ध वचन कहकर रह गई।

प्रेमी और प्रेयसी परस्पर इस प्रकार गाढ आलिंगन में बँध गये। (यह दृश्य) ऐसा लगता था कि इनके मन एक ही प्रकृति के हैं, प्राण भी एक ही हैं, परस्पर का प्रेम भी एक समान है; अब इनके शरीर भी एक होकर रह गये।

बाँस के जैसे कंधोंवाली एक (रमणी) का मन, उसके प्रभु के सामने आकर उपस्थित होते ही आगे बढकर उसके पास पहुँच गया, किन्तु वह अपने चन्द्र-वदन को झुकाये खड़ी रही। उसका वैसा मुँह झुका लेना, उस पुरुष के लिए नया था, अतः उसके मन में कुछ आशंका उत्पन्न हुई।¹

बंकिम ललाटवाली एक (तरुणी) मान करने का आनन्द उठाना चाहती थी, (किन्तु पहले अपने पति से रूठकर उसके चले जाने के पश्चात्) वियोग से व्याकुल हो उठी। (प्रियतम को लाने जाकर भी) उस प्रियतम को लिये बिना ही अकेली लौटी हुई सखी, मधुर मंदानिल तथा रजनी-वेला के जैसे ही उसकी माता की समानता करने लगी। (अर्थात् वह सखी, नायिका को मंदानिल, रात्रि तथा माता के समान धिक्कारने लगी।)

(अपने प्रियतम पर) दृढ प्रेमवाली एक (बाला) ने अपने पति के निकट भेजी गई दूती के साथ ही अपनी प्रज्ञा को भी भेज दिया और टकटकी लगाये देखती खड़ी रही और (दूसरों की) कही बात को भी समझ नहीं सकी। वह इस प्रकार थी, मानो मध्या के समय किसी देवता का उसपर आवेश हो गया हो।

(एक रमणी) अपने प्रियतम को भूल नहीं पाती थी। उसके आगमन की प्रतीक्षा करती हुई, पुष्पित शाखा-सदृश उस बाला के मन की यह दशा हुई, मानो जन्म के साथ-साथ मृत्यु भी आ गई हो। (अर्थात्, उसके मन में आनन्द और दुःख दोनों के भाव आते-जाते रहते थे।) एक क्षण के लिए वह अपने घर से बाहर निकल आती और दूसरे ही क्षण घर के भीतर चली जाती, जैसे बादल के बीच में बिजली चमक-चमककर छिप जाती हो।

(एक तरुणी) वर्णन के लिए दुष्कर स्तनों पर मन्मथ के शरों के लगने से उत्पन्न तीक्ष्ण व्रणों पर वलय-भूषित हस्त रखकर दबाती, रोती, हँसती और अपने दुःख बताती हुई किसी नारी के पास जाकर उससे दूती बनने की प्रार्थना करने लगती।

एक नारी, यह सोचकर कि जो लोग हृदय में उत्पन्न हुई पीड़ा (विरह दुःख) की तथा उसके अभावों को पहले से जानते हैं और उन्हें शब्दों में बताना आवश्यक नहीं है, शरीर से स्वेद बहाने लगी, मन में उद्विग्न हो उठी, म्लान हुई और (शय्या पर) लुढ़क गई, फिर अपनी सखी की ओर निहारने लगी।

स्तनवती तरुणियों की अपेक्षा तीनगुणा अधिक आनन्दित हो, मन्मथ उन स्थानों


¹ इसका तात्पर्य यह है—नायिका के मन में मान उत्पन्न हुआ है, इस विचार से नायक आशंकित हुआ है।

१३२ कंब रामायण

में विचरण करने लगा। कदाचित् उसने भी, चोर के जैसे उन नर-नारियों के मन में घुसकर उनके पिये हुए मद्य का पान किया होगा।

मधु-गंध से भरे विस्फारित पुष्प-हारों से अलंकृत शिखावाले युवकों ने रति-कला-चतुर तरुणियों के वस्त्रों को उतारकर फेंक दिया। फिर, भरे हुए विशाल जघन की मेखला को भी अनादर के साथ दूर उठाकर फेंक दिया। जब अप्रकटनीय रहस्य-कृत्य होते हैं, तब पटहवाद्य १ के जैसे वाचाल लोगों को साथ रखना उचित नहीं।

स्वर्ण की मनोहर मेखला तथा वस्त्र इन दोनों बाह्य वस्तुओं को (किसी स्त्री ने) हटा दिया, इसमे आश्चर्य की क्या बात है ? क्योकि सुन्दर ललाटवाली उस (तरुणी) ने अपने अन्तरंग में स्थित लज्जा को भी दूर कर दिया था। अनिर्वचनीय वैराग्य से युक्त दृढचित्त (सन्यासी) के समान ही अपने (अहं) को दूर करने की प्रवृत्ति काम में भी होती है न ?

अनुपम मन्मथ-समान एक पुरुष तथा पुष्प पर आसीन लक्ष्मी के उपमान बनने योग्य एक तरुणी—दोनों अनंग-समर में किसी से कोई हारनेवाले नहीं थे। जब उन दोनों के प्राण एक हैं और भाव (प्रज्ञा) भी एक है, तब कौन किसको जीते ?

(प्राण) हरण करनेवाले, युद्ध में प्रयुक्त होनेवाले खड्ग-समान नयनोंवाली एक प्रगल्भा ने, कार्त्तिकेय के समान अपने सुन्दर पति को, घने पुष्पहारों से भूषित वक्ष को, अपने कर-कमलों से ढकते हुए देखा और क्रुद्ध होकर कह उठी—तुम अपने मन में स्थित प्राण-समान अपनी (एक दूसरी) प्रियतमा पर पदाघात होने की आशंका से कपट करते हुए अपनी छाती को ढक रहे हो।

दूध के स्वाद और प्रवाल के रंग से युक्त अधर, उभरे हुए उरोज, परस्पर समवृत्त कंधे, शूल-सदृश नेत्र—इनसे शोभायमान एक मृदंगी ने, समुद्र के जैसे प्रेम से भरे चित्त तथा मेघ-सदृश दीर्घ बाहुवाले एक युवक को ऐसा प्रेम-सुख दिया, मानो वह कोई अप्सरा ही हो।

किसी पर्वतोद्यान के मयूर की समानता करनेवाली एक (रमणी) अपने प्रियतम के (पहले कभी कहे हुए) झूठे वचनों को स्मरण कर मान करने लगी, किन्तु उसके उस मान के साथ प्रेम का जो युद्ध हुआ, उसमें प्रेम ही विजयी हुआ।

एक प्रमदा ने, जिसके नेत्र हत्या के ही स्वरूप थे और जिसका नितंब मेखला के घेरे को भी भेदकर निकल पड़ता था, अपने प्रियतम का गाढ आलिंगन करके उसकी पीठ की ओर यह सोचती हुई देखा कि कदाचित् उसके स्तन, पर्वत को परास्त करनेवाले पति के दृढ वक्ष को भी चीरकर बाहर न निकल आये हों।

युवतियों के नव आनन्द को युवकजन अनुभव करने लगे, कुंकुम-लेप झर पडे, कुंतल-बंध खिसक पडे, शंख-वलय बज उठे, मेखलाएँ (या नीवी-बंधन) ढीले पड गये, नूपुर बहुत अधिक कोलाहल मचाने लगे।


१ पटहवाद्य = एक प्रकार का ढोल ।

बालकाण्ड १३३

प्रेम ने दुःखदायक मान को इस प्रकार हटा दिया, जिस प्रकार किरण-युक्त सूर्य ओस को हटा देता है। तब आभरण-भूषित मयूर की छटावाली एक (तरुणी) ने उतावलेपन के साथ निद्रा का बहाना करती हुई स्वप्न के व्याज से अपने पति का आलिंगन कर लिया।

वर्तुल, कान्तिपूर्ण मुखवाली एक मयूर (-समान स्त्री) तथा उसके पुरुष—दोनो ने, परस्पर समीप आने पर एक दूसरे को आलिंगन पास में बाँध लिया। फिर एकीभूत शरीरो को अलग न जानने के कारण उन्होने एक दूसरे को छोड़ा नहीं। उधर रजनी-वेला जो बीत गई, उसे भी पहचाना नहीं।

अपूर्व उमंग से भरे मत्तगज-सदृश पुरुषो तथा काले कुंतलोवाली रमणियो के उस समर मे वह रात उसी प्रकार कट गई, जिस प्रकार परस्पर संघट्टमान पीन स्तन-युग का भार न सहन कर कटि कट जाति है (क्षीण हो जाती है)।

पुण्य-कर्म पूरा न करनेवाले व्यक्तियो की मध्यकाल में प्राप्त संपत्ति के समान ही चन्द्र अस्त हुआ। विशाल वीचियो से पूर्ण नील समुद्र में सूर्य उसी प्रकार प्रज्वलित हो उदित हुआ, जिस प्रकार परम पुरुष (नारायण) के वक्ष पर प्रकाशमान (कौस्तुभ) रत्न हो।

(१-६७)


अध्याय १८

अग्रयान (अगवानी) पटल

महाराज दशरथ—जो अनुचित मार्गों का कभी अवलम्बन न करनेवाले, अपूर्व वेदो मे प्रतिपादित नीति का कभी त्याग न करनेवाले, सच्चरित्र, उत्कृष्ट ज्ञानी, उत्तम शासक, श्वेत छत्र से युक्त तथा राजाओ के अधिराज थे—अपनी उम (सेना) वाहिनी के साथ गंगा नदी के किनारे जा पहुँचे, जिसमें मुखपट्ट-सहित हाथी के समान पर्वतो से निकलनेवाली, तथा वर्षाकालीन प्रवाह की जैसी बहनेवाली मद-जल की नदियाँ जाकर गिरती रहती हैं।

जब बाण आदि आयुधो-सहित उस सेना-वाहिनी ने अधिक मात्रा मे जल का पान किया, तब उस गंगा नदी का—जिसकी रेत इतनी स्वच्छ थी कि फटी हुई जीभवाले नागो का लोक (पाताल) भी दृष्टिगत होता था—जल बहुत कम हो गया। उस समय लवण-समुद्र भी उस (गंगा के) स्वच्छ जल की प्यास से व्याकुल हो उठा। (अर्थात्, सेना के पीने पर गंगा इतनी कृश हो गई कि समुद्र तक उसकी धारा न पहुँच सकी। इसलिए समुद्र उसकी प्यास से व्याकुल हो गया।)

विस्तृत पृथ्वी के शासक (दशरथ) उस स्थान से चलकर विशाल खेतो से घिरी हुई और अत्यन्त जल की समृद्धि से युक्त मिथिला नामक नगरी के निकट जा पहुँचे। उस समय खुर फाँदनेवाले घोड़ो की सेना तथा शीतल करुणा से युक्त, स्तम्भ-समान अतिदृढ भुजावाले (राजा) ने जो किया, उसका वर्णन आगे करेंगे।

१३४ | कंब रामायण

'(दशरथ) महाराज आ पहुँचे हे'— यह समाचार पाकर मन मे उमडती उमंग के साथ, आलान-स्तम्भो को तोड़ देनेवाले मत्तगज, रथ, लगाम-लगे घोडे—इनके समुद्र से घिरे हुए ( जनक ) महाराज, देवेन्द्र के वैभववाले दशरथ की अगवानी करने के लिए उठ आये, जैसे चन्द्रमा सूर्य के निकट आ रहा हो ।

गंगाजल से सिक्त ( कोशल ) देश के अधिप ( दशरथ ) की सेनाएँ ( मिथिला नगरी के पास ) इस प्रकार आ पहुँची, जिस प्रकार अन्य सब समुद्र, अपने-अपने शंखो के घोष करते हुए ( क्षीर सागर के पास ) आ पहुँचे हो । उस समय, उत्तम कन्या ( सीता ) को ( अपनी पुत्री के रूप में ) पाये हुए ( जनक ) महाराज की समृद्ध नगरी ( की प्रजा ) इस प्रकार स्वागत के लिए आई, मानो पकज पर आसीन लक्ष्मी को जन्म देनेवाला क्षीर-समुद्र ( अन्य समुद्रो का स्वागत करने के लिए ) आया हो ।

मकर-मीनो से भरे हुए सात सख्यावाले विशाल महासमुद्र ( सातो समुद्र ) यदि अनन्त महागजों, रथो, घोड़ो तथा पदातियो का रूप लेकर ससार-भर मे उमड़ते हुए फैले, तो वे ( आम के ) पत्ते-जैसे शूल को धारण करनेवाले ( दशरथ ) की सेना का उपमान हो सकते हैं ।

झालरो से अलंकृत श्वेत छत्रो तथा मयूर-पखो के घने गुच्छो से आकाश ढक गया , उससे सूर्य का प्रकाश छिप गया और अधेरा छा गया । वह सेना कमल-पुष्पो के अरुण वर्ण तथा श्वेत वर्ण से युक्त सरोवर के ही समान दीखती थी ।

कमलवासिनी लक्ष्मी, प्रख्यात तथा तद्राह्रीन शासक ( दशरथ ) की ध्वजा मे स्थित है या उनके अनुपम श्वेत छत्र मे , उनके परम्परा में स्थित है या समुद्र के जैसे विस्तृत उस सेना के मध्य मे , उनके वक्ष पर स्थित है या उनके ऊँचे किरीट मे—वह कहाँ स्थित है, हम यह पहचान नही पा रहे हैं ।

(उस सेना मे होनेवाले) सप्तस्वरो का नाद, कचुकाबद्ध उभरे स्तनोवाली नारियो के केशो मे स्थित भ्रमरी के नाद के सदृश था । रथो का शब्द, श्वेत तरंगो से भरे समुद्रो के गर्जन के समान था । भयकर हाथियो का गर्जन, वर्षाकालिक मेघो के गर्जन के समान था ।

( उस सेना के चलने से उठी हुई ) धूल इस प्रकार फैली कि चारो ओर फैले हुए समुद्र को पाटकर टीले बनाती हुई, ऊपर के सात लोको मे भी भर गई । इसमे आश्चर्य की क्या बात है ? लोको को नापते समय चक्रधारी के चरण से अन्तरिक्ष में जो छेद हो गया था, उसी छेद के द्वारा धूल ऊपर के सात लोको में ही क्या, ब्रह्माण्ड के परे भी तो पहुँच गई ।

( उस सेना के ) दीर्घ छत्रो के सटे रहने से आकाश ढक गया और उनकी छाया से अँधेरा फैल गया , किन्तु उसे दूर करना भी सुलभ ही था । ( क्योकि ) उन पृथ्वी-वासियो के सुन्दर रत्नखचित स्वर्णाभरण बिजली की कान्ति विखेरते थे, इन्द्र-धनुष की कान्ति बिखेरते थे, सूर्यातप की कान्ति विखेरते थे ओर चन्द्रिका की कान्ति भी बिखेरते थे ।

निष्कलंक राजाधिराज ( दशरथ ) के आगमन पर उनका स्वागत करने के लिए बलशाली तथा चतुर धनुर्धर जनक महाराज आगे बढे । उनके मार्ग मे जो धूल उठी,

बालकाण्ड १३५

वह लोगो से बिखेरे जानेवाले सुगन्ध-चूर्ण, ( आभरणो से गिरी हुई ) स्वर्ण-रज तथा पुष्पो के मकरंद की ही धूल थी ।

( राजा जनक के ) मार्ग मे स्थान-स्थान पर जो कीचड़ फैला था, वह वास्तव मे सुगन्धित मधु ( जो नर-नारियो के धारण किये पुष्पो से वहा था ), कस्तूरी ( जो रमणियो के केशो से गिरी थी ), सुवासित केसर-पुष्प तथा अगरु-काष्ठ को मिलाकर बनाया गया लेप, कस्तूरी तथा अन्य सुगन्ध-द्रव्यो से सयुक्त चन्दन आदि के मिलने से ही उत्पन्न हुआ था ।

(राजा जनक के) उस मार्ग मे जो छाया पड़ रही थी, वह जयसूचक ध्वजाओ तथा ऊँचे वितानो से संयुक्त श्वेत छत्रो की ही छाया थी, जिसपर सुवासित मनोहर कुतलवती नारियो के रत्नखचित स्वर्णाभरणो की उज्ज्वल कान्ति भी छिटककर अपूर्व रमणीयता उत्पन्न कर रही थी ।

सामने से आती हुई अनुपम बलशाली ( दशरथ ) की बड़ी सेना के साथ, अधिकाधिक बढ़ते हुए आनन्द से युक्त ( जनक ) की सेना जा मिली । उस समय ऐसा बड़ा ( आनन्द ) घोष उठा, जैसा अनन्त गर्जन से भरे तरंगित समुद्र में नदी के गिरने से उत्पन्न होता है ।

आलान-स्तम्भो को भी तोड़ देनेवाले हाथियो की सेनायुक्त जनक, उमग से प्रेरित होकर अवर्णनीय सद्गुणशाली तथा प्रजा के लिए पिता समान उस चक्रवर्त्ती ( दशरथ ) के सम्मुख अपने उदार मन की समता करनेवाले बड़े रथ मे आ पहुँचे ।

( दशरथ ) के निकट पहुँचते ही, जनक महराज अपने बड़े रथ से उतर पड़े और अपने विशाल तथा सुन्दर सेना को पीछे ही छोड़कर, आगे बढ़े । ( दशरथ ने ) उन्हे रथ पर चढ़ने का संकेत किया । उस सकेत को पाकर वे सत्वर उनके रथ पर आरूढ हो गये, तब उस चक्रवर्त्ती ने मन मे प्रमोद तथा मुख पर प्रफुल्लता के साथ ( जनक का ) आलिंगन कर लिया ।

व्याघ्र से स्वागत पाये हुए सिंह के सदृश, सर्वोच्च महाराज दशरथ ने ( जनक का ) आलिंगन करके, उनके विशाल बन्धु-वर्ग और उनके अन्य परिवार के लोगो का कुशल निष्कलंक चित्त से यथाक्रम पूछा । फिर (जनक से) यह कहकर कि आप आगे बढ़े , उनके साथ ही ( मिथिला मे ) आ पहुँचे ।

इस प्रकार, उन दोनो ने बड़े मनोहर ढंग से ( मिथिला नगर मे ) प्रवेश किया . तब उस विशाल मिथिला नगर से उनके सम्मुख ( स्वागतार्थ ) स्वय अपने ही उपमान बने हुए, ( रामचन्द्र ) आये, जिन्होने अपनी भुजाओ को फुलाकर अग्नि-तुल्य ( रुद्र ) के स्वर्ण धनुष को तोड़ डाला था ।

देवो, मर्त्यो तथा नागो से वंदित होते हुए, घनी बलिष्ठ अश्व-सेना और अन्य योद्धाओ से घिरे हुए, पुरुषोत्तम ( रामचन्द्र ), अपने भाई को साथ लिये, उस असंख्य सेनावाले (जनक) की नगरी से, हरे रत्नखचित स्वर्ण-रथ पर आरूढ होकर सम्मुख आ पहुँचे ।

जब दोनो योद्धा ( राम और लक्ष्मण ) अपने उत्तम पिता के सम्मुख आये, तब उनके साथ, श्रेष्ठ सेनानी जनक की आज्ञा से जो सेना आई थी, उसमे कितने हाथी,

६३६कंब रामायण

कितने रथ, कितने अश्व और कितनी हथिनियाँ थीं, इनकी गणना कौन कर सकता था ? वास्तव में उनकी गणना करनेवाले तथा उस गणना के उपयुक्त अंक जाननेवाले कौन हैं ?

नीलोत्पल, कुवलय तथा सुगन्धित अतसी पुष्प की सदृशता करनेवाले, चित्र की प्रतिमा को भी लजानेवाले अनुपम रूप-विशिष्ट तथा देवों के द्वारा वंदित चरणवाले वे कुमार (राम) चक्रवर्त्ती के निकट यों आ पहुँचे, जैसे शरीर से पूर्व निकला हुआ प्राण फिर उसमें आ मिले।

सेनाओं के द्वारा अपनी चरण-वन्दना के उपरांत, (श्रीराम ने) त्वरित गति से जाकर चक्रवर्त्ती (दशरथ) के मनोहर, स्वर्ण-वलय-भूषित चरणों की वन्दना की। उनके (वन्दना करके) उठते ही, चक्रवर्त्ती ने उन्हें आलिंगन में बाँध लिया। उस समय मनु की-सी गरिमा भरे (चक्रवर्त्ती) की छाती के बीच, पर्वत-सदृश विलक्षण (शिव) धनुष को तोड़नेवाले दो बड़े पर्वत (अर्थात् राम की भुजाएँ) छिप गये।

दुर्निवार (शंबर आदि असुरों के द्वारा उत्पन्न) विपदाओं को भी दूर करने के कारण गगन तथा अष्ट दिशाओं में व्याप्त यशवाले सबसे श्रेष्ठ उस चक्रवर्त्ती ने फिर कनक वर्णवाले कनिष्ठ कुमार (लक्ष्मण) के अपनी चरण-वंदना करते ही उसे उठाकर पुष्पमालाओं से अलंकृत अपनी छाती से लगा लिया।

घनी तथा दीर्घ जटावाले (शिव) के हाथ के धनुष को जिनकी विजयप्रद दीर्घ भुजाओं ने तोड़ा था, वे उत्तम कुमार (राम) फिर अपनी जननी तथा अन्य माताओं को उसी प्रकार (अर्थात्, जिस प्रकार दशरथ को किया था) प्रणाम कर खड़े हुए। उस समय उन माताओं के हृदय में जो उमंगें उमड़ पड़ीं, उनका वर्णन कौन कर सकता है ?

ध्यान-युक्त अपनी चरण-वन्दना करके खड़े हुए उस भरत को, जिसके उज्ज्वल नेत्रों से (आनन्द) अश्रु की धारा इस प्रकार बह रही थी, मानो उसके हृदय में स्थित (राम के प्रति) सतत ध्यानयुक्त अपार प्रेम ही उमड़ रहा हो, (श्रीराम ने) प्राणों में प्राण मिलाते हुए स्वर्णाभरणों से भूषित अपने वक्ष से लगा लिया, जिस प्रकार पहले दशरथ चक्रवर्त्ती ने उन्हें आलिंगन में बाँध लिया था।

श्यामल (राम) का अनुसरण करते हुए चलनेवाले (लक्ष्मण) तथा अपूर्व प्रेम में उत्कृष्ट (भरत) के अनुज (शत्रुघ्न) अपने सुन्दर सुवासित केशवाले शिर से दोनों के वीर-वलय-भूषित चरणों का (अर्थात्, क्रमशः भरत और राम के चरणों का) स्पर्श किया।

उत्तम राजनीति तथा शासन में करुण-दृष्टि—ये दोनों ही जिनकी संपत्ति हैं, ऐसे महाराज दशरथ के सदृश ही उत्तम शील-गुणसंपन्न वे चारों कुमार, वेद-प्रतिपादित धर्मों का अनुसरण करते हुए चार वेदों के जैसे ही थे।

उन चक्रवर्ती ने जिनका वेत्रदंड सबका साक्षी कहलाने योग्य था (अर्थात्, पक्षपातहीन शासन करते थे) तथा जिनको सभी लोग अपनी-अपनी जननी ही मानते थे, (अर्थात्, प्रजा पर मातृतुल्य करुणा करनेवाले थे) अपने कुमार (राम) को आदेश दिया कि इस सारे (छत्र, चामर आदि) वैभव को साथ लेकर तुम आगे बढ़ो।

हाथी-जैसे वीर सैनिकों का (उन चारों कुमारों के प्रति) जो प्रेम था, उसको

बालकाण्ड १२७

हम ठीक-ठीक आँक नहीं सकते। उस समय उन योद्धाओं का जो स्वच्छ आनन्द था, वह कम था या उससे बढ़कर और कोई आनन्द हो भी सकता है, यह भी हम नहीं जानते। (हम इतना ही जानते हैं कि) पुष्पालंकृत केशवाले उन चारों कुमारों के अपने निकट आते ही, उस सेना की दशा उनके पिता (दशरथ) की जैसी ही हो गई।

राम के दोनों पार्श्वों में उनके प्यारे भाई, सेवा में निरन्तर निरत होकर, कभी कम न होनेवाले आनन्द के साथ, विजयशील अश्वों पर आरूढ हो आ रहे थे। उनके चलते समय शंखध्वनि के साथ बड़े-बड़े नगाड़े भी बज रहे थे. इस प्रकार (श्रीरामचन्द्र) अति उन्नत रथ पर आरूढ हो चले।

(रामचन्द्र) प्राचीरों से आवृत मिथिला नगर की विशाल वीथियों में जा पहुँचे, जहाँ महावर-लगे मृदु पदवाली, प्रतिमा-समान सुन्दरियों का समूह चारों ओर मेघावृत ऊँची अट्टालिकाओं पर निरंतर पंक्तियों में एकत्र था तथा अपने विष-भरे नयनों से (राम पर) पुष्प-वर्षा कर रहा था।

वे सुन्दर प्रासाद, जहाँ (नारियों के) करों के कंकण बज रहे थे, केशपाश शिथिल हो खिसक रहे थे, रक्तकमल से कोमल पदों के 'पाटक' नामक आभरण भरत (भरत-नाट्य-शास्त्र में प्रतिपादित ताल) को निरूपित कर रहे थे। कहीं नृत्यशालाएँ तो नहीं थीं, जिनमें ऐसी सुन्दरियाँ नृत्य करती हों, जिनके स्तन मदोष्ण कुंभोंवाले गजों के (ऊपर उठे हुए) दाँतों को परास्त करनेवाले थे।

उस आदिदेव (अर्थात्, विष्णु के अवतारभूत राम) के निकट आने पर मन्मथ के वाणों से प्रेरित होकर, वहाँ आई हुई मनोहर कुंतलोंवाली नारियों—बालाओं से वृद्धाओं तक—की क्या दशा हुई, उसका वर्णन करेंगे। (१-३४)


अध्याय १६

वीथी-विहार पटल

पुष्प (मधु) से आर्द्र केशोंवाली अनेक स्त्रियाँ सर्वत्र त्वरित गति से आ एकत्र हुईं। उस समय उनके पुष्पों में स्थित भ्रमर गुंजार कर रहे थे, नूपुर आदि पादाभरण शब्द कर रहे थे, उनका आना वैसा ही था, जैसे हरिणियाँ आ रही हों, मयूर-गण संचरण कर रहे हों, नक्षत्र-गण चमक रहे हों या बिजलियाँ एकत्र हो गई हों।

दुर्लभ आभरणों से अलंकृत नारियाँ, बंधन से छूटकर गिरनेवाले अपने केशों की ओर ध्यान नहीं देती थीं; मेखलाओं का टूट-टूटकर गिरना भी नहीं देखती थीं; खिसकनेवाले पुष्प-समान अपने झीने वस्त्रों को भी नहीं सँभालती थीं, उनकी कटि लड़खड़ाती थी, इस प्रकार एक दूसरे से 'हटो, हटो' कहती हुई मधुपान करनेवाले भ्रमरों के समान वे स्त्रियाँ घिर आईं।

१३८ कम्ब रामायण

नयनों से प्रेम नामक पदार्थ को ही (अर्थात् साकार प्रेम को ही) (राम के रूप में) हम देख रही हैं। इस स्त्री-जन्म के फल को आज ही प्राप्त कर रही हैं यह सोचती हुई वे नारियाँ इस प्रकार आई जिस प्रकार हरिणों के झुंड, सारी पृथ्वी का पानी सूख जाने तथा आकाश से वर्षा के भी न होने पर, किसी स्थान पर पीने योग्य जल देखकर प्रेम से आ जुटे हों।

निम्न स्थल की ओर बह जानेवाली जलधारा के समान नील कुवलय-तुल्य तथा समुद्र से भी विशाल नेत्रवाली वे स्त्रियाँ वहाँ आईं। उस समय उनके मञ्जुल नूपुर शब्द कर रहे थे, मृदुल पुष्पहार हिल रहे थे, उनकी सूक्ष्म कटि दुख रही थी। वे इस प्रकार दौड़ीं मानों वे अपने मन को जो राम के पास चला गया था, पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ी आ रही हों।

'रत्नवर्ण को इसने निगल लिया है'—(दर्शकों में) ऐसा भाव उत्पन्न करनेवाले तथा अहल्या को आनन्द देनेवाले पद-द्वय और सुवासित केशोंवाली सीता को प्राप्त करने के लिए शिवधनुष को तोड़नेवाली फूली हुई भुजाएँ—उन्हें देखने के लिए उस राज-वीथी में जो नारियाँ एकत्र हुईं, वे ऐसी लगती थीं कि मधुमक्खियाँ शोर मचाती हुई अमृत पर घिर आई हों।

वे (रामचन्द्र) प्रकट रूप में तो वीथी में जा रहे थे; पर वस्तुतः वे ऐसे घोडे जुते हुए रथ में जा रहे थे, जो निर्निमेष खड़ी रहनेवाली उन नारियों के नेत्रों से फाँद जाते थे। अब उन्होंने सब लोगों को यह भली भाँति जता दिया कि महान् लोग उन्हें 'कण्णन्'¹ क्यों कहते हैं।

वे नारियाँ यह सोचकर (प्रेम की) वेदना से भी पीडित होती थीं कि हाय! इन (राम) का रथ अब मन से भी अधिक वेग से दौड़ता चला जा रहा है। (कवि कहता है कि) पृथ्वी से भी परे जाकर स्वर्ग को पार करनेवाले (अर्थात्, त्रिविक्रमावतार में त्रिभुवन को नापनेवाले उस राम) को जिस सुन्दरी ने अपने दृष्टि-पथ में ही बिठा लिया है, वही धन्य है।

एक सुन्दरी सिहरन, संकोच, शरीर का बल, शंख-वलय आदि को तथा अपना मन, प्रज्ञा, तेज, लज्जा, मुग्धता, संयम आदि अच्छे गुणों को—अपने प्राणों के अतिरिक्त अन्य सभी महिलोचित गुणों का त्याग कर खड़ी रही।

(किसी नारी के) कर्णाभरण पर संचरण करनेवाले मीन-सदृश नयनों से वर्षा के सदृश अश्रु-धारा बह रही थी। वह ऐसे जुड़े हुए स्तनों से सुशोभित थी, जिनके मध्य में एक धागा भी नहीं जा सकता था और जो मन्मथ के इक्षुधनुष के बाणों से विद्धत थे।


१ 'कण्णन' यह तमिल शब्द संस्कृत शब्द 'कृष्ण' का ही रूपान्तर है। किन्तु, इस तमिल शब्द के तमिल भाषा की प्रकृति के अनुकूल अन्य भी कई प्रकार के अर्थ हो सकते हैं। उस शब्द का अर्थ तमिल में नेत्र होता है। इसलिए कण्णन का एक अर्थ है 'कृपादृष्टिवाला', दूसरा अर्थ है 'सब की आँखों का तारा'।

इस प्रसंग में 'कण्णन' शब्द के एक तीसरे अर्थ की ओर संकेत है, वह है—'नेत्र-मार्ग से (हृदय में) पहुंचनेवाला'। इस प्रसंग में इस ग्रंथ में भी यह शब्द व्यवहृत हुआ है।

बालकाण्ड १३६

वह (नारी) शिथिल हो इस प्रकार कुम्हलाई हुई काँपती खड़ी रही, जिस प्रकार उसकी बिजली समान कटि काँप रही थी ।

रूई जैसी मृदु उँगलियोंवाली उन (रमणियो) के भाले जैसे दीर्घ नयनो ने अपने प्रभु (राम) के शरीर की कालिमा को प्राप्त किया था, या मेघ-समान शरीरवाले उस (राम) का वर्ण उन नारियो के अंजनाञ्चित नयनों के द्वारा देखे जाने के कारण ही उस प्रकार (काला) हो गया था ? हमको कुछ निश्चित रूप से विदित नही हुआ ।

आम के पल्लव-समान (अरुण) शरीरवाली तथा उज्ज्वल ललाटवाली एक सुन्दरी मन्मथ को सर्वत्र पुष्प-बाणो की वर्षा करते हुए देखकर कह उठी—यह कौन है, जो चक्रवर्त्ती (दशरथ) की आज्ञा का तथा इस वीर (राम) के धनुश्चातुर्य का भी निरादर करता हुआ, आभरण-भूषित अवलाओ पर बाणो का प्रहार कर रहा है ?

लक्ष्मी की समता करनेवाली एक नारी, जिसके आभरण खिसककर गिर गये थे, और जो अपने शरीर को भी सँभाल नही पा रही थी, एक वस्त्र को ही पकडे हुए इस प्रकार (राम के प्रेम में मग्न हो) खड़ी थी, मानो अपूर्व सौंदर्य को भली भाँति पहचाननेवाले किसी चित्रकार ने, शब्दों से अतीत तथा सभी प्रकार के ऐन्द्रिय अनुभवो से श्रेष्ठ कामानुभव को एक स्त्री के रूप मे चित्रित कर दिया हो ।

प्राणहर शूल-सदृश तथा यम की समता करनेवाले नेत्रोवाली मयूर-तुल्य एक (सुन्दरी) इस प्रकार खड़ी थी कि उसकी धनुष जैसी भौंहो और ललाट से स्वेद बह रहा था, सारे शरीर में पीलापन छा गया था, मन शिथिल हो गया था, वह राम के अतिरिक्त अन्य किसी को नही देख पाती थी, इसलिए बोल उठी—‘क्या मेरे प्रभु अकेले ही जा रहे हैं?’

अञ्जन-जैसे काले कुंतलोवाली, अरुण अधरवाली तथा उज्ज्वल ललाटवाली एक रमणी ने (राम के प्रति प्रेमाधिक्य से) मन में द्रवित होती हुई, अपनी सखी से कहा—‘हे सखी ! वह वंचक (राम) मेरें मन के भीतर आ पहुँचा है और मैने नेत्र नामक उसके आगमन के द्वार को दृढ़ता से बद कर दिया है, जिससे अब वह बाहर निकलकर नही जा सकता है, अब मै पर्यंक पर जाऊँगी।’

गढ़ी हुई प्रतिमा के समान एक सुन्दरी, मोहिनी-सदृश अपने शरीर मे चुभने-वाले मन्मथ-बाणो का भी ध्यान नहीं करती थी, उसने यह भी नही जाना कि उसके आभरण और वस्त्र कैसे खिसक-खिसककर पृथक्-पृथक् हो गिर रहे हैं। वह उस अमल (राम) के रूप को (प्रेम के साथ) देखनेवाली (नारियो को) अपनी आँखो से चिनगारियाँ उगलती हुई (ईर्ष्या और क्रोध के साथ) देख रही थी।

एक सुन्दरी जिसके नयन (सहज) आमोद से भरे थे, खूब बढ़े हुए थे, दीर्घ होकर कपोलों को नापते थे, (दूसरो के मन को) चुराने की कला को अपने मे छिपाये हुए थे, बार-बार बाहर निकलकर उड़ जाना चाहते-से थे। वे अरुणाई को भीतर रखे हुए श्वेत एवं काले वर्णवाले थे तथा भाले के जैसे थे; शीतल मन के साथ (श्रीराम को) देखने के लिए आई और (देखने पर प्रेम की वेदना से पीडित होकर) उष्ण मन के साथ घर मे लौट गई ।

एक तरुणी जो (राम के) अपार सौंदर्य को देखने की अभिलाषा से प्रेरित हो

१४० | कंब रामायण

रही थी, पर (वहाँ एकत्र स्त्रियो के) काले केशपाश, कंचुकावद्ध भारी स्तन, मेखलावृत नितम्ब, आदि के घने रूप मे छाये रहने से राम के रूप को नही देख पाती थी, तब वह अतिविशाल नेत्रवती (उन रमणियो की सूक्ष्म) कटियो के मध्य से राम को देखने लगी।

उन (मिथिला की) वीथियो मे, कसे हुए खड्गवाले अनंग के द्वारा फेके गये पुष्प-बाण (नारियो के) मन को पार करके बाहर बिखरे पडे थे। उन (नारियो) के (विरह-ज्वाला से) झुलसकर गिरे हुए आभरण, स्तनो पर स्वेद आने से गिरे हुए कुंकुम-लेप, खिसककर गिरी हुई मेखलाएँ, मुक्ताहार, शंख-वलय, दीर्घ केशों से ग्रस्त हुए पुष्प—इनसे रिक्त स्थान वहाँ कही भी नही था।

(उन नारियो मे से) जो (राम की) भुजाएँ देखने लगी, वे उन भुजाओं को ही देखती रह गईं, जो वीर-कंकण भूषित कमल-सदृश उनके चरणों को देखने लगी, वे उन चरणों को ही देखती रह गईं, (जो उनके) विशाल हाथो को देखने लगी, वे वैसी ही (उन हाथो को देखती हुई) अड़ी रह गईं। उन शूल-तुल्य नेत्रवतियों में कौन ऐसी थी जिसने (राम के) रूप को पूर्ण रूप से देखा हो ? (अर्थात्, भगवान् के अवतारभूत राम को पूर्ण रूप से किसी ने नही देखा है।) वे नारियाँ, विभिन्न धर्मों के उन अनुयायियो के समान थी, जो अपने-अपने सिद्धान्तो के अनुसार भगवान् के किसी एक अंश का ही ध्यान करते रहते हैं।

सूक्ष्म कटि तथा दीर्घ कुंतलोवाली एक सुन्दरी को जीवन-दान देते हुए उसका उद्धार करते हुए, उसके मन में (श्रीराम) अन्तर्भूत हो रहे। समस्त भुवनों को अपने उदर में अन्तर्भूत करनेवाले (हमारे) प्रभु से बढ़कर, कहो, अब और कौन बड़ा हो सकता है ?

हिलनेवाले दीर्घ केश-भार तथा उत्तम आभरणो से सुशोभित एक तरुणी, अपनी पायल तथा नूपुरो को ध्वनित करती हुई, अति सुन्दर पुष्पित शाखा के समान पग रखती हुई आई और (राम को देखते ही प्रेम-पीडित) हो रोती हुई सखियो के हाथो पर (आरूढ होकर) चली गई। (अर्थात्, प्रेम-व्याधि से पीडित उस नायिका को उसकी मखियाँ अपने हाथों पर उठाकर रोती हुई चली गईं।)

उस स्थान मे 'कुड्मल' जैसे स्तनोवाली, आभरणालंकृत एक युवती ने (राम का सम्बोधन करके) कहा—तुम्हारा हृदय लोहे के समान कठोर है, फिर भी तुमने एक मुग्धा (को प्राप्त करने) के लिए मेरु-सदृश धनुष को तोड़ा है। हे पुण्यस्वरूप ! (मन्मथ) के इक्षु-धनुष को तोड़कर मुझे भी अपनाओ न।

काजल से अजित नयनोवाली तथा उज्ज्वल ललाटवती एक तरुणी ने कहा—फलीभूत तपस्यावान् यह (राम) अपने रथ का त्याग कर मेरे नेत्रों के अत्यन्त निकट आ खड़ा है, यह कोई इन्द्र-जाल है या स्वप्न ?

एक नारी ने, जिसके पास अपने मन के अतिरिक्त और कोई दूत नही था और जिसके प्राण द्रवित हो उठे थे, कहा—'कमलपुष्प के समान लाल रेखाओं से अंकित

बालकाण्ड १४१

नेत्रोंवाली उस सीता ने न जाने कैसी तपस्या की थी (जिसमे इस सुन्दर पुरुष को प्राप्त किया है) ?'

त्रुटि-रहित प्रतिमा-समान एक सुन्दरी (राम के प्रति प्रेमाधिक्य के कारण) तड़पकर रो उठी, उष्ण निःश्वास भरने लगी. शिथिल हो व्याकुलता के साथ, अपनी प्राण-सखी के प्रति हाथ जोड़कर कहने लगी—'इस कुमार को क्या मन्मथ के द्वारा चित्र में अंकित कराया जा सकता है ?

अरुण अधरवाली तथा उज्ज्वल ललाटवती एक नारी ने (अपने पास खड़े व्यक्तियो को देखकर) कहा—'क्या, किसी मानव-मात्र में इस प्रकार के लक्षण हो सकते हैं? (नही, अतः) यह विष्णु ही हैं, मैं तुम लोगो को यह समझा रही हूँ, इस कथन की सच्चाई को तुम लोग भविष्य मे प्रत्यक्ष देखोगे।

उज्ज्वल ललाटवाली एक सुन्दरी ने जिसके स्वर्ण नूपुर और हाथ के कंकण खनक रहे थे, जिसका मन द्रवित हो रहा था, बहुत म्लान होकर कहा—'यह अनघ इस नगर में आया है, यह जनक महाराज की तपस्या का ही फल है।'

अश्रपूर्ण आँखो और स्वर्ण-भूषित कटिवाली एक रमणी ने, जो इतनी व्याकुल हो उठी थी कि उसका समस्त सौन्दर्य उसके शरीर को छोड़कर चला गया था, कहा—'क्या यह सम्भव हो सकता है कि मुनियो तथा श्रेष्ठ राजाओ से घिरा हुआ यह कुमार (राम) अकेले ही, स्वप्न मे, मेरे निकट आ जाये ?'

वन में निवास करनेवाले वर्षाकाल के मयूर की समता करनेवाली एक स्वर्णलता ने अपने मन के (राम के प्रति उत्पन्न) प्रेम को छिपाना चाहा. किन्तु मन्मथ ने उस बात को जान लिया। गुप्त बातो को मन जिस प्रकार छिपा लेता है, क्या उसी प्रकार मुख भी छिपा सकता है ? (अर्थात्, मन मे छिपे हुए भाव को मुख की कान्ति प्रकट कर देती है।)

दो दीर्घ नयनोवाली एक इन्दुमुखी (विरह-व्यथा से उद्विग्न हो) पुष्प-पर्यंक पर जा लेटी। वह वज्रनाद सुनकर डरे हुए साँप के जैसे विभ्रान्त होकर निःश्वास भरने लगी, और उसके परस्पर घर्षणमाण स्तन-द्वय पर स्वेद छा गया।

लाल अतसी-पुष्प के सदृश, अमृत-पूर्ण अधरवाली वे सुन्दरीयाँ (राम के प्रेम के कारण) पृथक्-पृथक् उद्विग्न होती हुई विकल-प्राण हो गई, दुखती हुई सूक्ष्म कटिवाली सीता के समान, आनन्द के कारण (राम को) जिन्होने नही पाया है, वे कैसे जीयेंगी ?

(एक नारी कहने लगी) स्वेद-भरे शरीर, व्याकुल प्राण तथा अत्यन्त वेदना के साथ पीडित होनेवाली इन नारियो मे से किसी को इस परिशुद्ध पुरुष ने अपने आरक्त नेत्रो से प्रेम के साथ देखा तक नही। कदाचित् यह प्रेमहीन (कठोर) चित्तवाला है।

उस नगर मे नारियाँ असंख्य थी। इधर राम के सौन्दर्य की भी कोई सीमा नही थी, अतः सुन्दर धनुर्धारी मन्मथ भी क्या कर सकता था ? उसके हाथ के सब बाण चुक गये, तो उसने अपने खड्ग पर हाथ रखा (अर्थात्, खड्ग का प्रयोग करने लगा)।

हम यह तो जानते हैं कि कस्तूरी से सुवासित दीर्घ कुन्तलोवाली उस नगर

१४२कंब रामायण

की नारियों पर मन्मथ ने कैसे अस्त्र प्रयुक्त किये, पर यह नहीं जानते कि वसन्तकालीन मन्मथ ने स्वर्गवासिनियों के साथ कैसा युद्ध किया। उसके बाण तो स्वर्ग की निवासिनी अप्सराओं के हृदयों से भी जा लगे होंगे।

(किसी नारी ने कहा) अपने पर मोहित होनेवाली किसी नारी से कुछ भी न चाहता हुआ, यह (राम) चला जा रहा है, क्या यह उचित है ? करुणा क्या होती है, यह जानता भी नहीं। क्या यह परिणत चित्तवाला (संयम में सफलता प्राप्त किया हुआ) कोई तत्त्वज्ञ है (जो किसी नारी की ओर दृष्टि नहीं उठाता है)? (नहीं, नहीं) यह तो बड़ा हत्यारा है (जो इतनी नारियों को प्राण-पीडा दे रहा है)।

चन्दन रस से लिप्त, उष्ण स्तनों तथा डमरू-समान मृदु कटि से शोभित एक उत्तम युवती अपने व्यापार तथा शरीर की सुधि खोकर शिथिलता से चूर होकर गिर पड़ी, जिसे देखकर लोग सन्देह करने लगे कि वह बचेगी या नहीं।

चाशनी-जैसी मीठी बोलीवाली एक नारी उस वीर (राम) के रथ के पीछे-पीछे दौड़ने लगी, जिससे पैरों में वैसे ही छाले पड़ गये जैसे क्रमुक-वृक्ष पर लगाये गये झूले को झुलानेवाली किसी नारी के पेंगों में पड़े हों। (वह कुछ दूर जाकर) फिर लौट पड़ी, इससे उसने क्या प्राप्त कर लिया ?

अपार प्रेम से मत्त होकर उन नारियों में से एक ने दूसरी से पूछा—क्या तुमने उस राम के मार्ग से मेरे मन को भी जाते हुए देखा था ?' जब कामना अत्यन्त तीव्र हो जाती है, तब लज्जा भी शेष नहीं रहती।

वहाँ पर लक्ष्मी-सदृश एक रमणी ने कहा—'इस (राम) के पूर्वजों ने अपने शरणागत याचकों की रक्षा के लिए अपने प्यारे प्राणों का भी दान किया था। न जाने, उस वंश में उत्पन्न इस (राम) में ऐसी कठोरता कहाँ से आ गई है कि यह हमारे प्यारे प्राणों को हमें नहीं छोड़ता ?'

(काम-पीडा से उत्पन्न) भय से विकल होती हुई, एक सुन्दर ललाटवाली कहने लगी—(इसने) आयुधागार में स्थित शिव-धनुष को जो तोड़ा, वह अगुरु से सुवासित कुंतलोंवाली, पवित्र वाणी-युक्त मयूर-सदृश सीता के प्रति प्रेम के कारण नहीं था, किन्तु अपना धनु-कौशल दिखाने के लिए ही था।'

ढीले केशोंवाली एक रमणी ने, जिसके हार, वस्त्र तथा अन्य आभरण खिसके जा रहे थे, तथा जिसके प्यारे प्राण भी शिथिल हो रहे थे, कहा—मन्मथ के समान बलशाली इस विश्व में दूसरा कौन है, जो इस भयंकर धनुर्धारी राम के सामने ही मेरे प्राण हर रहा है ?

इस प्रकार, सभी दिशाओं में नारियाँ घिर आई थीं। उधर श्रीराम उस सभा-मण्डप में अन्य राजकुमारों के साथ जा पहुँचे, जहाँ निष्कलुषचित्त वशिष्ठ तथा वेदपारग कौशिक विराजमान थे।

लक्ष्मीनायक (राम) ने उन दोनों (महर्षियों) के चरणों का इस प्रकार साष्टांग प्रणाम किया कि उनके रत्नहार इस प्रकार हिलने लगे, जैसे बादलों में बिजलियाँ चमक रही हों और वर्षाकालिक मेघ धरती पर आ लगा हो।

बालकाण्ड १४३

धर्म की रक्षा के लिए अयोध्या में अवतीर्ण उस पुरुष के प्रणाम करने पर उन (महर्षियों) ने आसन ग्रहण करने की आज्ञा दी। उनकी आज्ञा पाकर वे पुष्पाकार चित्रों से उत्कीर्ण एक आसन पर आसीन हुए और छाया के समान अपना अनुगमन करने-वाले तीनो भाइयो के मध्य प्रकाशमान होने लगे।

उसके पश्चात्, मानो चन्द्रमा सब नक्षत्रों के साथ गगन को प्रकाशित करता हुआ आया हो, यों दशरथ चक्रवर्ती अपने बन्धु-मित्रसहित, उस रत्नमय मण्डप में आये।

(चक्रवर्ती ने) आकर महातपस्वियों (वसिष्ठ और कौशिक) के चरणों की वन्दना की और अपने बरसाये जानेवाले मधुपूर्ण पुष्पो से भी अधिक (मात्रा) में, ब्राह्मणो के आशीर्वाद पाकर, आसन पर इस प्रकार विराजे कि देवेन्द्र भी उन्हें देखकर लज्जित हो गया।

गंग, कोंगु, कलिंग, कुंलिंग, सिंहल, चेर, दक्षिण राज्य (पाण्ड्य), अंग, चीन, कुलिन्द, अवन्ती, वंग, मालव, चोल, महाराष्ट्र—इन देशों के राजा

वैभवयुक्त मगध, मत्स्य, म्लेच्छदेश, लाट, विदर्भ, महाचीन, तेंगनदेश (ढकण या दक्षिण ?), मगदेश (म्लेच्छ देशों में से एक), मोमक, मोनक तुरुष्क, कुरुदेश—इन देशों के नरेश .

आयुधहस्त माधव राजा, सप्तधा विभाजित कोंकण, चेदी, तेलंग (आन्ध्र). कर्नाटक इत्यादि नभ से आवृत पृथ्वी-भर के उज्ज्वल तथा दीर्घकिरीटधारी राजा लोग उस मण्डप में आ पहुँचे।

मधुर इक्षु से भी अधिक मीठे वचनवाली रमणियाँ, (दशरथ के) पार्श्वों में चामर डुला रही थीं। वह दृश्य ऐसा था, मानो उनकी कीर्त्ति-रूपी वृक्ष के, जो ऊपर के (स्वर्ग आदि) लोकों में भी व्याप्त था, कोमल पल्लव हिल रहे हों।

मँडरानेवाले भ्रमर तथा मधुमक्खियों को आकृष्ट करनेवाली सुगन्ध से युक्त मधु-पूर्ण पुष्पो से अलंकृत केशवाली स्त्रियाँ, बाँसुरी की ध्वनि के साथ स्वर मिलाकर जय-गान कर रही थीं। वे गान उनकी वाणी-सदृश वीणा को भी मात कर रहे थे।

कठोर तथा भयंकर नेत्रवाले हाथियों की सेना से युक्त (चक्रवर्ती) का अनुपम श्वेतच्छत्र, ऐसा शोभित हो रहा था, मानो चन्द्रमा अपनी वंशजा सीता के शुभ विवाह उत्सव को देखने के लिए आ पहुँचा हो और करुणा से पूर्ण हो, फूला हुआ, ऊँचाई पर खड़ा हो।

(चक्रवर्ती की) सेनाएँ अपार समुद्र के समान व्याप्त होकर सर्वत्र ऐसी फैली पड़ी थीं कि किसी के उठकर जाने या हिलने-डुलने के लिए भी रिक्त स्थान नहीं था। विजयप्रद मत्तगज सेना से युक्त उस (जनक) नरेश का साग देश उस जनसमुदाय के कारण एक नगर-जैसा दीखने लगा।

कांत ललाटवाली सीता के पिता ने असीम आदर तथा प्रेम के साथ आनन्दित हो अपनी समस्त संपत्ति को लुटाकर उनका आतिथ्य-सत्कार किया। उनका वह आतिथ्य रामचन्द्र और अन्य साधारण जनता, सभी के प्रति समान ही रहा। इससे बढ़कर उनके आतिथ्य की महत्ता के सम्बन्ध में और क्या कहा जाय ? (१-५४)

अध्याय २०

प्रसाधन पटल

चक्रवर्ती (दशरथ) अपनी सजीव प्रतिमा-समान सुन्दर देवियो सहित आनन्द भरित हो, इस प्रकार आसीन थे, मानो अपनी देवियो के साथ देवेन्द्र ही विराजमान हो। उस समय वसिष्ठ ने श्वेतच्छत्र तथा नीतिपूर्ण शासन दंडयुक्त जनक को मधुर दृष्टि से देखकर कहा—'आम के टिकोरे-जैसे नयनोवाली (सीता) को ले आइए।'

(वसिष्ठ के) यह कहते ही, (जनक ने) मुनि को प्रणाम किया और मुदित होकर आभूषणो से भूषित कुछ दासियो को आदेश दिया कि वे नारियो की रानी (सीता) को ले आयें। मधु-समान वचनवाली वे स्त्रियाँ, अपार प्रेम से प्रेरित हो, त्वरित गति से गईं और सीता की सखियो को वह समाचार दिया।

(सीता की सखियों ने) यह नहीं सोचा कि आभामय आभरण, सुन्दरी (सीता) के रूप को छिपा देनेवाले ही हैं, जैसे नेत्रों के ऊपर और नीचे उसको छिपाने-वाली दो पलकें सौन्दर्य के लिए रखी गई हैं। उन सखियो ने सौन्दर्य का श्रृंगार किया, मानो अमृत को मधुर बना रही हो। आह। शब्दायमान वीचि-भरे समुद्र से घिरी इस पृथ्वी के लोग भी कैसी अज्ञता से भरे हैं।

शोभा को बढानेवाले (सीता के) कुंतल ऐसे थे, मानो विष्णु (के अवतारभूत राम) का नीलवर्ण, जो उन (सीता) के हृदय मे भरा था, वही उमड़कर ऊपर उठ आया हो और चारो ओर अपनी छवि को फैला रहा हो। मेघ-मध्य विराजमान चन्द्र-कला के समान उस कुंतल-भार के मध्य कोमल फूलो का गजरा रखा।

जैसे विधि के वश हो गगन के नक्षत्र चन्द्र-कला को घेरे रहते ह, वैसे ही चमकते हुए माँग-फूल को (सीता के) ललाट पर बाँधा, चन्द्र को जन्म देनेवाली 'मेघ' नामक माता ने (अपने बछडे को चाटने के लिए) अपनी टेढी जीभ को बाहर निकाला हो—वैसे ही घने अंधकार समान अलको पर वर्त्तुल आभरण (जो माथे पर केशो के किनारे-किनारे पहना जाता है) पहनाया।

गंगा-प्रवाह को जटा मे धारण करनेवाले (शिव) के भयकर धनुष को जिसने तोड़ा, वह वीर क्या वही युवक है, जो मेरे स्त्रीत्व-रूपी अनुपम श्रेष्ठ गुण को चुराकर ले गया है और मुझे विकल छोड़ गया अथवा वह वीर दूसरा कोई है ?—यो सोचती हुई (सीता का) मन जिस प्रकार झूल रहा था, उसी प्रकार झूलनेवाले कान के 'कुलै' नामक आभरण भी उन (सखियो) ने पहनाये।

सीताजी हरिण नयनोवाली सभी नारियो के मगलमय कण्ठो के आभरण-सदृश थी, तो उन (सीता) के कठ का हार कौन हो सकता है ? उस कठ मे, जो ऐसा था मानो विष्णु के द्वारा धारण किया गया शख ही उस रूप मे आ स्थित हुआ हो, (उन सखियों ने) अनेक दोष-रहित आभरण पहनाये।

(सीता के) आभरणो की शोभा को भी बढानेवाले स्तनो पर (पहनाये गये)

बालकाण्ड १४५

हार के बारे में क्या कहे ? क्या यह कहे कि गगन के नक्षत्रो में से योग्य नक्षत्रो को चुनकर (उनका) हार बनाकर पहनाया गया है ? या कहे कि अति उज्ज्वल किरणवाले चन्द्र को काटकर हार बनाकर पहनाया गया है ? या यह कहे कि (सीता की) लज्जायुक्त हँसी की चन्द्रिका-जैसी कांति ही इस प्रकार छिटकी पड़ी है ? मै क्या कहें ?

जिन (सीता) के रक्त चरणो ने, सौन्दर्य की स्पर्धा में परास्त होकर शरण में आये हुए रक्त कमलो को अरुणाई की भिक्षा दी थी, उनके अमृत-समान शरीर की कांति पड़ने से मनोहर आभरण-युक्त स्तनो पर के श्वेत मोती भी लाल दिखाई पड़ते थे । जो अच्छे लोगो की सगति में रहते हैं, वे भी अच्छे हो जाते हैं न ?१

उन (सीता) की कटि अतिपुष्ट तथा अधिकाधिक उभरते रहनेवाले इंगूर (धातु) के बने हुए कलश-समान स्तनो का भार बढ़ जाने से लचक उठती थी; यदि (अपने प्रकाश से) चौंधियाकर दर्शको की आँखो को बंद करानेवाली लाल कांति से युक्त पद्मराग-पुंजो तथा मोतियो से खचित कोई बाँस हो, तो वह उन (सीता) की आभरण-भूषित भुजाओ की समता कर सकता है ।

विकसित पुष्पो से भूषित कुतलोवाली जानकी के पल्लव-कोमल कर नामक कमलो ने ऐसी तपस्या की है कि वे रामचन्द्र के अरुण हस्तो के द्वारा यथाविधि गृहीत होने-वाले हैं। ये कर सभी के प्रेम के पात्र हैं, रात्रि के समय भी मुकुलित नही होनेवाले हैं, यही सोचकर उनकी सखियो ने बालातप-सदृश कांतिवाले पद्म-परागों से खचित 'कटक' (नामक आभरण) उनके हाथो मे पहनाया, मानो उन्होने उनके करो की रक्षा के लिए उनमे रक्षा-बंधन बाँधा हो ।

(पाटो मे) विभाजित केशोवाली (जानकी) के स्तन नामक दो औंधाये (गये) स्वर्णकलशो पर, जिनमे एक-एक इन्द्रनील रत्न भी जड़ा था, उन सखियो ने कस्तूरी-लेप से पुष्पलता और अनंग-धनुष को चित्रित किया और विविध धर्म-मतो के द्वारा विचार्यमाण भगवान् के समान ही 'अस्ति' या 'नास्ति' की विचिकित्सा के कारण-भूत उनकी कटि के लिए विपदा उत्पन्न कर दी ।

छवि को छिटकानेवाले अत्यन्त सूक्ष्म कौशेय (रेशमी) वस्त्र की परतो मे न आनेवाली (अतिसूक्ष्म) कटि पर मेखला तथा उसके नीचे, (मोतियो की लड़ी से बने) 'तारकपुज' (नामक आभरण) पहनाया। उन आभरणो के विविध रत्नो से जो कान्ति फूट पड़ती थी, वह उन (सीता) के शरीर की कांति से विलक्षण रहकर चारो ओर घूम जाती थी, जिससे वे सखियाँ भी अपनी आँखो की ज्योति खोकर स्तब्ध रह जाती थी।

नाचनेवाले फणी के तुल्य जघन-तटवाली (सीता) के उन कमल-सदृश चरणो मे, जो अतिकोमल, शिरीष पुष्प से भी अधिक कोमल थे और महावर के बिना भी लाल


१. मूल में अंतिम वाक्य मे, 'शेय्यर' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसके श्लेष से दो अर्थ होते हैं—(१) लाल रंगवाले और (२) अच्छे। दोनों अर्थों को लेने से अंतिम वाक्य का चमत्कार बढ़ता है। —अनु०