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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
१४६कंब रामायण

दीखते थे, उन सखियों ने नूपुर पहनाये। वे नूपुर बार-बार बोल उठते थे। वे यह कह रहे थे कि ये (चरण) बहुत कोमल हैं, बहुत कोमल हैं।

जैसे बीच में विष रखकर उसके चारों ओर अमृत रखा हो, वैसे (सीताजी के) वे नयन, सीधे तथा लम्बे होकर कान तक फैल गये थे और उसके परे स्थान न मिलने से लौट पड़े थे। उनमें कुछ लाल-लाल रेखाएँ भी दिखाई देती थीं, उनमें छल या छिपाव न होने से वे मेघ के जैसे शीतल थे। उनमें जो रेखाएँ थीं, वे अंजन की ही रेखाएँ थीं या उस कुमार (राम) के शरीर का ही वर्ण था, कुछ निश्चय-पूर्वक नहीं कहा जा सकता।

(उन सखियों ने) मर्त्य-लोक की स्त्रियों, नाग-कन्याओं तथा स्वर्ग की सुन्दरियों के लिए तिलक जैसी (उन सीता) के ललाट पर तिलक अंकित किया। दो पुष्ट नीलोत्पलों के साथ विकसित कोई रक्तकमल हो और उसमें शुक्लपक्ष तृतीया का वर्धमान चन्द्र आ उपस्थित हुआ हो, और उस चन्द्र के मध्य एक नक्षत्र उदित हुआ हो, यदि ऐसा कोई दृश्य उत्पन्न हो जाय, तो उससे सीताजी के तिलकांकित वदन की तुलना हो सकती है।

भ्रमर, मधुमक्खी आदि को आकृष्ट करनेवाले खिले हुए पुष्प, केशों में खोंसने योग्य मृदुल पुष्प, जूड़े में धारण करने योग्य गजरे, कपोलों पर धारण करने योग्य वृन्तरहित अति मृदुल पुष्प—यथास्थान पहनाया तथा कल्पवृक्ष के पल्लव-जैसे चमकते हुए 'पुन्ना' (पुष्प) के स्वर्ण-धूलि-तुल्य पराग को सीता के केशों पर लगाया।

(इस प्रकार, अलंकार करने के उपरांत, दृष्टि-दोष-परिहार करने के लिए उन सखियों ने) घृत-दीप की आरती उतारी, जल सहित पुष्पों को (उनके सम्मुख) बिखेरा, इष्ट-देवों से प्रार्थनाएँ कीं, वेद-पारग विप्रों को स्वर्ण का दान किया। छोटी पीली सरसों को माथे पर लगाया। सावधानी के साथ बनाये गये (चूना और हल्दी को मिलाकर) रक्तवर्ण नीर की आरती उतारी। उन देवी की, जिन्हें अपने हाथों में ही रखकर मयूर के समान ही उन सखियों ने अबतक पाला था, परिक्रमा की, इस प्रकार उन सखियों ने उनका, 'दृष्टि-परिहार किया।

जो सीता शुकों को मीठे बोल सिखाया करती थी, उनकी उस सुषमा को वे सखियाँ कमल-पुष्प से मधु का पान करनेवाले भ्रमरों के समान देखती रहीं। उन (सखियों) की वाणी गद्गद हो उठी। वे अपने सहज स्वभाव को भूल गईं। चाहे पुरुष हों या स्त्रियाँ, सबका मन एक (जैसा) ही होता है न?

मेघ-तुल्य केशवाली वे सखियाँ, आभरणालंकृत वक्षवाली उन सीता को देखकर आनन्दमत्त हो खड़ी रहीं, जैसे पूर्णिमा के चन्द्र को देख रही हों। हरिणनयना स्त्रियों में भी कोई-कोई अवयव ही सुन्दर होता है (अर्थात्, किसी के सभी अवयवों का सुन्दर होना सम्भव नहीं है), जब सभी प्रकार का सौन्दर्य एक ही स्थान में एकत्र हो जाय, तो उसे देखकर कौन मुग्ध नहीं होगा?

अपने सुन्दर कर में शंख (शंख-वलय) धारण करने से, कमल (योगियों का हृदय-कमल तथा कमल-पुष्प) को आवास बनाकर रहने से, सर्वत्र व्यापक होकर, प्रत्येक के

बालकाण्ड १४७

हृदय मे पृथक्-पृथक् अकित होकर रहने से अरुंधती के सदृश माध्वी सीता भी पुरुषोत्तम ( श्रीराम ) के समान ही थी । अब हम और क्या कहे ?

देवेन्द्र के शामन में रहनेवाली रंभा आदि अप्सराएँ जा रही हों, इम प्रकार असंख्य सखियाँ सीताजी को चारो ओर से घेरकर चली । उस समय विशाल मेखलाएँ, पादजाल ( नामक पाद-आभरण ), सर्प के आकार के नूपुर और कर-वलय बज उठे ।

बौने, ठिंगने, कुबड़े, दासियाँ सभी बड़ी भीड़ लगाकर आये और सीता के चरणो की वन्दना करके खड़े रहे । अद्यीण दीप के समान वह देवी रत्न-वितान की छाया में चलने लगी, मानो बाल-चन्द्र नक्षत्रो के साथ जा रहा हो ।

अपने आभरणो में लगे रत्नो की काति को आगे-आगे फेकती हुई सीता इस प्रकार चली, मानो उन्हें जन्म देनेवाली भूदेवी ने यह सोचकर कि इसके चरण अति कोमल हैं. उनके मार्ग में पल्लव ओर पुष्प बिखेर रही हो ।

उनके दोनो पाश्र्वों में डुलनेवाले कातिपूर्ण चामर इम प्रकार थे. मानो मीताजी के समान ही चलने की इच्छा से आये हुए हंस उनके वदनीय मृदु चरणों की गति से परास्त हो गये हो ओर बार-बार नीचे गिर-गिरकर उठ रहे हो । मीता यो चली, मानो अपने कलाप की काति को सर्वत्र बिखेरता हुआ कोई मयूर चल रहा हो ।

सीता भूलोक आदि सब लोको की युवतियो के लिए आँख के तारे के ममान प्रिय थी, ऐसी कन्या ( अविवाहित मीता ) के रूप को देखने के लिए मानो पुरुषोत्तम ( गम ) के कुलपुरुष सूर्य नभ से उतर आया हो—इस प्रकार का था वह रत्नमय वितान. जिसकी छाया में सीता चल रही थी ।

पुंजीभूत घनी स्वर्ण-कान्ति से युक्त कलाप, (सोलह लड़ियोंवाली) मेखला; तथा अन्य रत्नखचित आभरणो मे किरणे छिटक रही थी ; देह की काति अत्यन्त उज्ज्वल हो रही थी, कटि लचक रही थी इस प्रकार अपने प्रकाशमान छोटे पदो को उठाकर रखती हुई सीता आगे बढ़ी ।

उन देवी की शरीर-काति, उनके स्वर्ण-आभरणो की काति, उनके पुष्पो की सुगन्ध तथा चन्दन की शीतलता, चारो ओर बिजली की चमक-जैमी ही फैल रही थी, जिन्हें देखकर अप्सराएँ और अमृत भी लज्जित हो रहे थे। इस प्रकार मीता उस रत्नमय मण्डप में जा पहुँची, जहाँ राजमभा एकत्र थी ।

भारी स्तनो से युक्त उनके उस पवित्र रूप को, जो जन्मदाता के अभाव के कारण (स्वयम्भूत्) वेदी के ममान ही था, देखकर बाँम-जैसी भुजावाली रमणियाँ तथा पुरुष, सब लोग चित्र के समान निर्निमेप. जीवन के लक्षणों से रहित (निर्जीव)-से खड़े रहे ।

समुद्र वर्णवाले ( राम ). जो अबतक इसी सदेह में पड़े थे कि जनक की कन्या वही रमणी है, जिसे उन्होने पहले ( राजप्रासाद पर ) देखा था; या वह कोई दूसरी स्त्री है, अब अमृत-मय उन ( सीता ), को देखकर इस प्रकार आनन्द से भर गये, जिस प्रकार देवेन्द्र. क्षीर-सागर के मंथन के समय. इतना अधिक परिश्रम करके कि जिसमे उनके प्राण भी शरीर

१८८

कंब रामायण

को छोड़ जाने के लिए सन्नद्ध हो गये थे, हठात् ही अमृत को उत्पन्न होते हुए देखकर आनन्द से भर गया हो।

अत्यन्त मधुर अमृत को ( साँचे में ) ढालकर, पूर्वकृत सुकृतों के फल के समान निर्मित, अरुण अधर तथा कोकिल-स्वर से युक्त यह कन्या, जो कन्या-प्रासाद से राजमंडप में उतर आई है, मेरे अन्तर में ही नहीं, बाहर भी स्थित है क्या ? इस प्रकार राम ने मन-ही-मन सोचा। ( सीता राम के हृदय में तो पहले से स्थित थी ही, अब वह बाहर भी है क्या, इसका संदेह राम को हुआ। )

वसिष्ठ यह सोचकर अत्यन्त मुदित हुए कि हमारे कृत तप के फलस्वरूप राम के रूप में आया हुआ व्यक्ति, शंख-चक्रधारी पुण्डरीकाक्ष जगदीश्वर (विष्णु) ही है, और यह कन्या भी अरुण कमल पर आसीन (लक्ष्मी) देवी ही है।

समस्त धरती पर समान रूप में चलनेवाले शासन-चक्र से विशिष्ट चक्रवर्ती (दशरथ), घने कुंतलोंवाली सीता को देखकर सोचने लगे—यद्यपि सत्यलोकों में मेरा शासन चलता है, फिर भी मैं वैभव और समृद्धि की देवी (लक्ष्मी) को आज ही अपने वश में कर सका हूँ।

‘नैवल’ नामक वाद्य-सदृश स्वरवाली (सीता) के समीप में आते ही भूमि के विजयी शासक दशरथ तथा तपस्वियों के कर (प्रणाम की मुद्रा में) उनके शिरों पर मुकुलित हो उठे क्योंकि सब के मन तथा इन्द्रियों ने उन (सीता) को देवी के रूप में पहचाना। यह शरीर मन के अधीन ही रहता है न ?

(अपने आवास-भूत) कमल-पुष्प का त्याग कर, (जनक) राजा के स्वर्ण-प्रासाद में अवतरित हुई उस देवी ने पहले महान् तपस्वियों को नमस्कार किया, फिर सब राजाओं में श्रेष्ठ (दशरथ) के चरणकमलों की वन्दना की और आँखों से आनन्दाश्रु बहाने-वाले अपने पिता के समीपस्थ आसन पर विराजमान हुईं।

‘विष को अन्तर में रखनेवाले आम के टिकोरे के सदृश नयनवाली यह कन्या यदि कमलासना (लक्ष्मी) ही है, तो हरे पर्वत के समान बलवान् राम, मेरु-सदृश एक धनुष क्या, सात पहाड़ों को भी तोड़ सकते हैं।’ इस प्रकार रथ की कील (अर्थात्, सब धर्म-कार्यों के प्रधान कारक) जैसे ब्राह्मणोत्तम (वसिष्ठ अथवा विश्वामित्र) ने सोचा।

(सीता ने) यह सुना तो था कि (राम ने) शिव-धनुष को चढ़ाकर उसे तोड़ डाला है, किन्तु उनके रूप के संबंध में उनके मन में संशय अभी शेष था—(अर्थात्, यह वही राजकुमार है, जिसे स्वयं उन्होंने राजप्रासाद से देखा था या कोई और है, यह संदेह था)—उस पुराने संशय को दूर करने के हेतु सीता ने उस प्रभु (राम) को अपने अन्तर में ही नहीं, अब अपने कंकणों को संवारने के व्याज से आँख की कनखियों से भी देख लिया।

(सीता की) काली तथा दीर्घ कनखियों से जो दृष्टि-नदी श्रीराम-रूपी भरे हुए समुद्र में निमग्न हुई, उससे उनके चंचल प्राण (जो यह वही राजकुमार है, या अन्य कोई है—इस संदेह से विकल हो रहे थे) अब स्थिरीभूत हो गये। राम के रूप को देखकर आभरण-भूषित तथा स्त्री-रत्न वह सीता निःश्वास भरने लगी और इस प्रकार आनन्द से फूल गई,

बालकाण्ड १४६

मानो कोई व्यक्ति अलभ्य अमृत को पाकर एकदम सबको स्वयं ही पी जाये और आनन्द से फूल उठे।

घने कुंतलोंवाली सीता ने यह जानकर कि धनुष को तोड़नेवाला कुमार उनके हृदय में स्थित वह 'चोर' ही है, चिन्ता-मुक्त हो गई वह उनकी ममता करने लगी, जिन्होंने जन्म-कारण अविद्या को दूर करनेवाली विद्या को ( तत्त्वज्ञान को ) प्राप्तकर परमात्म-स्वरूप को जान लिया हो और उस ज्ञान के परिणामस्वरूप ब्रह्मानन्द-रूपी फल को प्राप्त कर लिया हो ।

( शत्रुओं के ) विनाश में चतुर हाथियों की सेना से युक्त उस सभा में आसीन चक्रवर्ती ( दशरथ ) ने ज्ञान-सागर के पारंगत मुनि कौशिक को देखकर प्रश्न किया— हे उत्तम ! पुष्पलता-समान सूक्ष्म कटिवाली इस कन्या ( सीता ) के विवाह का अपार शुभप्रद दिन कौन-सा है ? कृपया बतावें ।

'वालै' नामक बड़े मीन तथा 'कयल' नामक छोटे मीनों के उछलने से जहाँ भैंसों के क्रमशः शिर तथा पीठ चिर जाती हैं; जहाँ के, 'वराल' नामक बलिष्ठ मीन ( समीप के नारियल, पूगी आदि पेड़ों के ) विशाल पत्रों को फैलाते हुए उनपर उछल पड़ते हैं, ऐसे खेतों से समृद्ध ( कोशल ) देश के राजन्, विवाह के लिए शुभ दिन कल ही है ।—यों श्रेष्ठतपस्वी ( विश्वामित्र ) ने उत्तर दिया ।

यह वचन सुनने के पश्चात्, दशरथ, तपस्वियों की आज्ञा लेकर वहाँ से चलने लगे । तब अन्य राजे हाथ जोड़कर खड़े हो गये । उनका विलक्षण, रत्न-खचित, घुमावदार विजय-शंख बज उठा, उनके स्वर्ण-किरीट की कांति बालातप के समान छिटक उठी, यों चलकर वे अपने आवास में जा पहुँचे ।

वह हंसिनी ( सीता ) बड़ी कठिनाइयों से वहाँ से चली, तो रामचन्द्र भी वहाँ से चलकर स्वर्ण-प्रासाद रूपी पर्वत के भीतर जा पहुँचे, रत्नाभरण-भूषित राजे भी चले गये, महातपस्वी मुनिगण भी चले गये, उधर उज्ज्वल कांतिमान् सूर्य भी मेरु-पर्वत के तट में अदृश्य हो गया । ( १-४३ )

अध्याय २१

शुभ विवाह पटल

प्रख्यातकीर्त्ति जनक महाराज के आतिथ्य के कारण, मदस्रावी गज-सेना से युक्त नरपतियों से ऊँचे कंधोंवाले कनिष्ठ कुमारों तक, सभी ऐसा समझ रहे थे, मानो वे सदेह ही स्वर्ग-लोक की नगरी ( अमरावती ) में आ पहुँचे हों ।

दुर्लभ स्वच्छ जल की प्यास से पीड़ित कोई पिपासु समीप में ही एक विशाल

१५० | कंब रामायण

सरोवर को पा लिया हो, किन्तु उसमें उतरकर जल पीने का मार्ग न पाकर अत्यन्त व्याकुल हो उठा हो—स्वर्ण-कंकणधारिणी, कोकिलवाणी (सीता) की भी वही दशा हो गई।

(सीता रात्रि का सम्बोधन कर कहती हैं—) हे निष्ठुर रजनी ! क्या ऐसे भी लोग होते हैं, जो निर्बल व्यक्तियों के प्राण हरने का वीरवाद (डींग मारना) करते रहते हैं ? (अर्थात्, तू ऐसा ही व्यक्ति है) सूर्य का उदय होते ही मेरे प्रभु आ जायेंगे, अतः तू शीघ्र ही बीत जा, जिससे प्रभात होने मे विलम्ब न हो।

हे मेरे मन ! नीलसूर्य-सदृश (उन राम के) चरणों के संग ही तू चला गया और उनके आने के समय ही तू उनके साथ आनेवाला है। दीर्घ समय से मेरे संग रहनेवाले मेरे मन ! एक दिन के विलम्ब को भी न सहकर इस प्रकार छोड़ जानेवाले (व्यक्ति) भी क्या संसार मे होते हैं ?

तालवृक्ष पर रहनेवाले हे (चकवा) पक्षी ! यह रात्रि, जो गर्जन करते हुए सप्त समुद्रों के सदृश अपार (जान पड़ती) है, मुझ, प्रयत्नशीला (अर्थात्, राम की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करती हुई) के पाप के कारण यदि (रात्रि) व्यतीत न हो और प्रभात न होने पाये, तो क्या तू किंचित् भी न्यायान्याय का विचार न करके, एकाकी उड़ता हुआ (मेरी हत्या से उत्पन्न) अपयश का भार ढोता फिरेगा ?

तीक्ष्ण शूल और अग्नि की कठोरता तथा उष्णता को प्रकट करनेवाले आतप के सदृश ही छायी हुई हे चाँदनी ! तू ही कह, क्या इस संसार मे ऐसे भी लोग होते हैं, जो निरपराध अबलाओ के प्राण हरते रहते हैं।

सुरभि और शीतलता के आगार उष्णता को फैलानेवाले मुँह और प्रकाश-पुञ्ज-भूत चन्द्रिका नामक दंत-समूह से युक्त होकर, मलय-पर्वत की ऊँची तथा बड़ी कंदरा मे निवास करनेवाले हे दक्षिण अनिल नामक व्याघ्र ! क्या तू आहार की खोज में मेरे निकट आया है ?

वीथी मे संचरण करनेवाला, कालमेघ-सदृश एक वीर है, जो दिन-रात मुझे छोड़ता नही है, यह कैसा न्याय है ? उच्च कुल के राजकुमारो मे क्या ऐसे भी होते हैं, जो कन्याओ के निकट आ पहुँचते हैं ?

वह कठोर पुरुष (राम) विश्वास न करने योग्य कार्य करता रहता है, करुणा-हीन है और मुझे अपने संग नही लेता है। उस छलिया की भुजाओ से प्रेम करना भी क्या उचित है ? (अन्धकार-रूपी) इस कालिमा-पूर्ण समुद्र की सीमा भी नहीं दीख पड़ती है रात्रि का समय न जाने कितने युगो का होता है।

संगीत-नाद थमता नहीं है (आनन्द मनानेवाले लोग संगीत गा रहे हैं, जिससे विरहिणी सीता की वेदना बढ़ रही है उनकी ओर संकेत है)। दिन भी नहीं आता है, मेरी चिन्ता दूर नहीं होती है। यह रात्रि व्यतीत नहीं होती है, मन की व्यथाएँ मिटती नहीं हैं, आंख लगती नहीं है, क्या इस प्रकार दुःखित होना भी मेरे भाग्य मे है ?

हे समुद्र ! अपने शंख (रूपी कंकणों को) गिराता हुआ तू, उठ-उठकर गिरता है। तू अत्यन्त शिथिल हो जाने पर भी कभी नहीं सोता है। अतः, क्या तू भी कोई कन्या (अविवाहिता) है जो मन्मथ के प्राणहारी बाणों से व्याकुल है।

बालकाण्ड १५१

इस प्रकार विलाप करती हुई, पर्यंक पर लेटने में भी असमर्थ हो व्याकुलता के साथ सीता दुःख भोग रही थीं और उनके ( लज्जा आदि ) सहज गुणों के कारण उनकी विकलता अधिक होती जा रही थी। ऐसी रात्रि के समय, उधर अनघ ( रामचन्द्र ) अपने प्रासाद में, भरे हुए अन्धकार में, क्या सोच रहे थे और क्या बोल रहे थे--यह अब कहेंगे ।

पहले ( कन्या-प्रासाद पर ) देखा, तब अनिवार्य प्रेम की प्रेरणा से, नेत्रों ( की लेखनी ) को लेकर मन पर उसे अंकित कर लिया, फिर ( आज ) सम्मुख ही मैंने उसे देखा, तो भी उस अप्रमान सुन्दरी कन्या ( के सौंदर्य ) का पार नहीं पा रहा हूँ । जो बिजली को देख रहे हों, वे अन्य व्यापारों पर कैसे दृष्टि रख सकते हैं ?

हे लक्ष्मी-तुल्य सीता के मुख-मण्डल ( चन्द्र ) । सोचने पर ज्ञात होता है कि शाक और फल के उत्पादक काम-रूपी बीज के बढ़ने के लिए सहायक खाद तू ही है (अर्थात्, चन्द्रमा काम को बढ़ाता है, जिससे विरहावस्था में शाक का और संयोगावस्था में फल का रस मिलता है ।) हे चन्द्र ! तूने यह क्या किया ? मुझ, एक व्यक्ति के साथ क्या तू मित्रता नहीं कर सकता था ?

यह सर्वत्र व्याप्त अन्धकार ऐसा बढ़ गया है, मानो मेरे प्राणों को बाहर निकालने के लिए उस रमणी ( सीता ) के नयन ही इस प्रकार बढ़ गये हों । यह कभी क्षीण होनेवाला नहीं दीखता। यह अधिकाधिक इस प्रकार बढ़ रहा है, जिस प्रकार युद्ध में अपने प्रभु के मारे जाने पर भय के कारण युद्ध-रंग से भाग खड़े होनेवाले सैनिक का अपयश बढ़ता जाता है ।

वन्य हरिण के से नयनवाली उस सुन्दरी के संग गये हुए मेरे मन ! तूने मेरी चिन्ता कभी नहीं की ! कदाचित् तेरा मार्ग अधिक लम्बा है ( इसीसे अबतक नहीं लौटा है ) या उन्होंने ( सीता ने ) तेरी बात नहीं पूछी है, जिससे तू अभी तक वहीं अटका हुआ है, या तू भी मुझे भूल गया है ।

कठोर विष आँखों से आग उगलनेवाले, करवाल-जैसे तीक्ष्ण सर्प के दाँतों को अपना आवास बनाकर रहता है—यह कथन अतीत काल में सत्य था , किन्तु अब तो मेरे नयनों तथा मेरे मन में सदा अवस्थित ( सीता की ) कोमल दृष्टि में ही वह ( विष ) बसा हुआ है ।

पर्वत-प्रदेश, पुष्पों से भरे हुए सरोवरों के परिसर, विशाल उद्यान इत्यादि अनेक स्थान (खेलने योग्य) हैं, फिर भी अलभ्य अमृत से भी अधिक मीठे बोलवाली, और चमकते कुंतलोंवाली ( सीता ) के लिए क्रीडा का स्थान क्या मेरा हृदय ही है ?

देवों के प्रभु ( विष्णु के अवतार राम ) इस प्रकार के मनोभावों से समय व्यतीत कर रहे थे, उधर ( जनक ने ) हाथियों पर से यह ढिंढोरा पिटवाया कि भ्रमरों को मत्त करनेवाले कुंतलोंवाली ( सीता ) का विवाह कल होनेवाला है अतः पुष्पों, रत्नों तथा वस्त्रों से मिथिला नगरी सजाई जाय ।

ढिंढोरे के साथ ऐसी घोषणा होते ही, वृद्ध, युवक, सुवासित केशोंवाली स्त्रियाँ, सब एकत्र हुए । ( नगर को सजाने के लिए ) सब उतावले होने लगे तथा अपने वधु-मित्रों के साथ आनन्द-संलाप करते हुए उस दुर्लंघ्य रात्रि-रूपी समुद्र को पार कर लिया ।

१५२कम्ब रामायण

अञ्जनवर्ण ( राम ) तथा कमल पर आसीन ( सीता ) देवी, कल परिपूर्ण मगल-युक्त विवाह के द्वारा परस्पर मिलेंगे—यह घोषणा होते ही दिनकर अपने अरुण करों से अधकार को चीरते हुए ऐसे उदित हुआ, मानो अपने वंशज के विवाह के दर्शनार्थ ही आ गया हो ।

कुछ लोग वटनवार बाँधने लगे । कुछ लोग खंभों पर रंग-बिरंगे कपडे लपेट कर सजाने लगे । कुछ पूर्ण कुभी पर वस्त्र लपेटने लगे , मेघस्पर्शी अट्टालिकाओ पर कुछ उज्ज्वल रत्न-खचित कवच डालने लगे । वेदो के तत्त्वज्ञ ब्राह्मणो को भोज देने के लिए कोई अमृतरसोपेत भोजन बनाने लगे ।

हसिनी की गतिवाली नारियाँ तथा वृषभ की गतिवाले पुरुष उस नित्य नवीन नगरी मे केले और पुगीवृक्षो को स्थान-स्थान पर गाड़ने लगे । कोई अति उत्तम मोतियो में से चुन-चुनकर भारी मुक्ताओं को पहनने लगे । कोई स्वर्णाभरण और कोई रत्नाभरण पहनने लगे ।

कोई सुगन्धित चन्दन तथा अगरु के अजन को वीथियो मे छिड़कने लगे । कोई पुष्पो को ( वीथियो मे ) बिखेरने लगे । कोई इन्द्रधनुष को लजानेवाले विविध कान्ति-पूर्ण रत्नो से खचित प्रासादो पर अमूल्य मुक्ताओ की झालर लटकाने लगे ।

( कुछ लोगो ने ) किरण-पुञ्जो को बिखेरनेवाले भारी रत्नदीपो को और शीतल अंकुरो से पूर्ण 'पालिका' नामक (मिट्टी के) पात्रो ¹ को उन स्फटिक वेदिकाओं पर सजाया, जो (वेदिकाएँ) किनारो पर के सुनहले वर्ण और अपनी श्वेतता के कारण एक साथ धूप और चाँदनी को फैला रही थी ।

( कुछ लोगो ने ) मंदर पर्वत-सदृश ऊँचे सौधो के ऑगनो में, इन्द्रलोक में जिस प्रकार नक्षत्रो की काति फैली रहती है, उसी प्रकार अनन्त काति फैलानेवाले भारी मोतियो की लड़ियो को लटकाकर 'सुतु पेडल' ( चंदोवे )² लगाये, जिससे धूप रुक गई ।

कही कुछ दासियो ने हीरको से खचित मरकत की वेदी पर स्वच्छ प्रकाशवाले दीप मजाये । चन्द्र को छूनेवाले उन्नत प्रासादो पर सूर्य-समान कातिवाली तथा सुनहले डडोवाली पताकाएं लगाईं और कोई अगरु लकड़ी को जलाकर सुगंध फैलाने लगी ।

कोई सुगध-पुष्पो को गाड़ियो पर लादकर ला रहे थे । कुछ लोग उपवनो से पत्तों और फलो को लादकर ला रहे थे , कुछ लोग 'कुरवै'³ नामक नृत्य करते हुए अपने कुडलो की काति को चारो ओर बिखेर रहे थे , कुछ लोग अन्न-पिंडो को खाकर तृप्त हुए मत्तगजो के माथो पर मुखपट्ट बाँध रहे थे ।

( कुछ नारियाँ ) चन्दन का लेप ( अपने शरीर पर ) लगा रही थी, कोई श्रेष्ठ वस्त्र पहन रही थी, कोई पुष्पो को अपने केशों मे सजा रही थी, निर्मल मुकुर के सामने खड़ी


१. विवाह आदि के अवसर पर मिट्टी के पात्रो मे नव-धान्य के अंकुर उगाये जाते हैं और शुभकार्य हो जाने के पश्चात् नदियो मे बहा दिये जाते हैं ।
२. दक्षिण मे विवाह के समय 'मुतु-पटल' लगाते है ।
३. 'कुरवै' नृत्य मे बहुत-से नर-नारी एक दूसरे का हाथ पकड़ वृत्ताकार मे नाचते ह ।

बालकाण्ड १५.३

होकर कुछ स्त्रियों अपने चन्द्र-समान मुखो पर तिलक लगा रही थी. कोई अपने जूड़े में गजरे सजा रही थी; कुछ सेमल की रूई जैसे अपने कोमल अधरों पर रक्तरंग लगा रही थी।

मयूर-सदृश कुछ नारियाँ, जब श्रृंगार कर लेती या अपने पतियों मे मान करती हुई अपने आभरण उतार फेंकती, तब जो मोती, ग्ल. शंख (वलय). प्रवाल-सदृश लाल और कोमल सुगन्ध-लेप, छूटे हुए पुष्प आदि गिर पड़ते थे. कुछ दासियाँ उन सब वस्तुओ को इकट्ठा करके महली के बाहर फेंक देती थीं।

(कही) आगन्तुक राजा लोग जम थे. तो कहीं विप्र लोग इकट्ठे थे; कही मधुरस्वरवाली वीणा का संगीत आस्वाद करनेवाले (जम थे). तो कहीं सञ्चरण करनेवाले 'वाण' (जाति के गायक) एकत्र थे; कहीं झुण्ड बाँधकर चलनेवाली दासियाँ थी; तो कहीं घटिका-यन्त्र में विवाह लग्न के समय की गणना करनेवाले गणक लोग थे।

कहीं गणिकाएँ इकट्ठी थी; कहीं पर कुछ लोग विविध कलाएँ (इन्द्रजाल आदि) दिखा रहे थे। कुछ लोग राजप्रासाद के द्वार पर एकत्र हो रहे थे, जहाँ विविध देश के गजाधो के आभरणो से गिरे हुए भारी मोती तथा दीर्घ किरीटों के रगड़ खाने से गिरे हुए रत्न और स्वर्ण-चूर्ण के अबार पड़े हुए थे।

कुछ ऐसे पुरुष घूम रहे थे. जिनकी ढालो से धूप और पैने शूलों से चाँदनी छिटक रही थी। वे युद्ध के लिए जानेवाले ऊँचे दाँतोंवाले मत्तगज के जैसे थे। कुछ सुन्दरियाँ; आनन्द-नृत्य कर रही थी और अपने हास्य से पुरुषों के प्राण हर रही थी।

उज्ज्वल रत्नों की चमक के कारण सर्वत्र ऐसा प्रकाश फैला था कि न्यन-गोचर पदार्थ भी दृष्टि मे नही आते थे। देवता और पुष्पोलंकृत केशवाली देवांगनाएँ यह पहचान नही पाती थी कि स्वर्गपुरी वहाँ (स्वर्ग मे) है. अथवा यह (मिथिला) ही स्वर्गपुरी है और व्याकुल हो भटक रही थी।

कुछ लोग रथो पर आते थे; कुछ शिविकाओं मे आते थे, कुछ अन्य प्रकार के वाहनों पर आते थे. कुछ रत्नमय मुखपट्ठो से अलंकृत नेत्र-जैसे हाथियों पर आते थे; कुछ हथिनियो पर आते थे; कुछ पैदल आते थे और कुछ गाड़ियों पर आने थे।

कुछ मुक्ताभरणों से भूषित थे, कुछ पुराने पहने हुए रत्नाभरणों को निकालक नवीन श्रेष्ठ स्वर्णमय विविध आभरण पहने हुए थे. कुछ (नारियाँ) पुष्पमालाओं को घुँदराले केशो मे पहने हुए थी; कुछ विचित्र अलंकारयुक्त रेशमी वस्त्र धारण किये हुए थीं।

(कुछ सुन्दरियों) विष-समान नयनोंवाली थीं; कुछ अमृतसमान बोलीवाली थी. कुछ रक्त अधरवाली थी. कुछ उज्ज्वल मंद हासवाली थी; कुछ विशाल स्तन-भार से युक्त थी, कुछ सूक्ष्म कटिवाली थी; कुछ हंसगामिनी थी; और कुछ हथिनियो के सदृश चलने-वाली थी।

उस मिथिला-नगर की समृद्धि को एक ही स्थान पर; एक ही समय में एकत्र देखना असम्भव है। उसके बारे में सोचना भी दुष्कर है। आह! वह विवाह-दिन उतना वैभवपूर्ण था; जितना प्रकाशमान स्वर्गलोक मे देवेन्द्र के मुकुट-धारण (राज्याभिषेक) का उत्सव-दिन था।

१५४कम्ब रामायण

जिसकी सीमा को पहचानना कठिन है, जिस पर स्वर्णपत्र छपे हैं, जो पर्वत के जैसे ऊँचा उठा है, जिसमे विविध रत्न खचित हैं, वैसे मनोहर कंकणधारिणी सीता के विवाह-योग्य सामग्री से परिपूर्ण उस मण्डप मे राजाओ के अधिराज (दशरथ) आ पहुंचे।

श्वेतच्छत्र चाँदनी छिटका रहा था, आभरण-समूह, आँखो को चोधियाने-वाले सूर्य के जैसे प्रकाश को छिटका रहा था। भ्रमर-समुदाय संगीत गा रहे थे। विजय-प्रद अश्वो की टाप से उठी हुई धूल गगन को ढक रही थी। इस प्रकार (दशरथ) आ पहुँचे।

मंगल-भेरियाँ मेघ के समान गर्जन कर उठी। शंख-वाद्य भी बज उठे। तुरहियाँ युद्ध मे जिस प्रकार घोष करती हैं, वैसे ही बज उठी। ब्राह्मणो के द्वारा उच्चरित चतुर्वेद, रात्रि के समय समुद्र के घोष के समान ही शब्दित हो रहे थे।

रथ, हाथी और घोडे, झुण्ड-के-झुण्ड, पृथक्-पृथक् पक्तियो मे चल रहे थे। विशाल सेना-युक्त दशरथ की सेवा मे निरन्तर लगे रहनेवाले राजा भी इन्द्र के समीपस्थ देवताओ के समान शोभित हो रहे थे।

चक्रवर्त्ती इस प्रकार विवाह-मण्डप मे आ पहुँचे और स्वच्छ स्वर्ण के रत्नखचित आसन पर विराजमान हुए। मुनि और राजा यथाक्रम आसीन हुए, जनक भी अपने बन्धुवर्ग-सहित आसन पर आ विराजे।

राजा, मुनि, स्वर्गवासी हस-समान मृदुगतिवाली लक्ष्मी-सदृश रमणियाँ, सब एकत्र थे, वह विलक्षण विवाह-मण्डप उस मेरु पर्वत के तुल्य था, जिसके चारो ओर प्रकाश-पिण्ड घूमते रहते हैं।

'मय' के द्वारा प्राचीन काल मे निर्मित उस मण्डप मे मेघ थे (दाता लोग थे), बिजलियाँ थी (सुन्दर स्त्रियाँ थी), अनुपम नक्षत्र थे (राजा थे), अन्य तारिकाओ के सघ (राजाओ के परिवार) भी थे, दो प्रधान ज्योति-मडप, अर्थात् सूर्य-चन्द्र भी थे (दशरथ और जनक थे), अतः वह मण्डप मानो सृष्टि के आदि मे अज (ब्रह्मा) के द्वारा निर्मित अण्डगोल ही था।

आदरणीय तपस्यावाले मुनिवर, सभी राजा, देवता तथा अन्य जन उस मण्डप मे एकत्र हुए थे, अतः वह पृथ्वी स्वर्ग प्रभृति समस्त अण्डगोल को निगले हुए. विष्णु के नीलरत्न-तुल्य उदर के सदृश था।

भूलोक आदि सब लोको के जन (विवाह देखने की इच्छा से) प्रेरित होकर उस मडप मे इकट्ठे हुए। अब ओर क्या कहना है। अब हम सर्प-पर्यक अण्डगोल को छोडकर (अयोध्या मे) अवतीर्ण हुए राघव के कार्यों का वर्णन करेगे।

रामचन्द्र यथाविधि, उन सप्त समुद्रो के जल मे, जिनमे शख-समूह सञ्चरण करते हे तथा शाश्वत वेदो में प्रशसित गगा प्रभृति नदियो के जल मे स्नान किया।

फिर ब्रह्मा से तृण-पर्यन्त, समस्त प्राणिवर्ग को. उनके अनादि गाढ (अज्ञान के) अधकार को मिटाकर दीर्घ अपुनरावृत्ति के मार्ग मे (अपवर्ग मे) पहुँचानेवाला अपने (अर्थात् विष्णु के) चिह्न-भूत ऊर्ध्व-पुण्ड्र ¹ को धारण किया।


१. इस पद्य में ऊर्ध्व-पुण्ड्र का माहात्म्य कहा गया है।

बालकाण्ड १५५

मीन के जैसे नेत्रवाली कन्याओ का, वेदज्ञ ब्राह्मणो को वेद-विहित रीति से दान किया। निष्कलंक तपस्यावाले अपने पूर्वज, जिनकी उपासना (कुलदेव के रूप में) करते रहे हैं, उन आदि ज्योतिस्वरूप (रंगनाथ)¹ के चरणो को प्रणाम किया।

(राक्षसो के द्वारा) नष्ट की जानेवाली तपस्या तथा धर्म के उद्धार के लिए निरन्तर वर्त्तमान रहनेवाली (भगवान् की) करुणा ही इस आकार में आई हो, इस प्रकार भासित होनेवाले, चित्रित करने के लिए भी दुष्कर (अर्थात्, उतने सुन्दर राम) ने अपने शरीर पर चन्दन-रस का लेप किया। वह दृश्य ऐसा था, मानो काले मेघ पर ज्योत्स्ना छा गई हो।

उमड़नेवाले अपार सागर ने मंगलप्रद तथा सर्व कलाओ से पूर्ण चन्द्रमा को अपने मध्य विकसित पाया हो, इस प्रकार का दृश्य उपस्थित करते हुए राम ने 'किडै' (नामक लाल जटामासी), लाल स्वर्ण के हार और पुष्पमालाओ को ऐंठकर अपने केशो में धारण किया।

(राम के दोनो कानो में) दो कुण्डल इस प्रकार शोभित हुए, मानो रात्रि और दिन में (सीता की) विरह-पीडा को देखकर, सूर्य और चन्द्रमा दूत बनकर (राम के पास) आये हो और सीता के मनोभावो को राम के कानो मे कह रहे हो।

नील विष को कठ में धारण करनेवाले, परशु-आयुधधारी (शिव) ने अपनी दीर्घ जटा पर चन्द्र की एक कला धारण की थी, अब (मानो उनकी शोभा को मंद करने के लिए ही राम ने) सब ज्योतिर्मय देवताओ (सूर्य, अग्नि, नक्षत्र आदि) को अपने सिर पर धारण कर लिया हो, इस प्रकार (राम ने) 'वीरपट्ट' (नामक आभरण) तथा, 'तिलक', (नामक आभरण) धारण किये।

(विष्णु के) चक्रायुध के निकटस्थ शंख की समता करनेवाले, अति सुन्दर (राम के वदन के निकटस्थ) कठ में लता-सदृश उज्ज्वल मुक्ताहार शोभायमान था, वह ऐसा लगता था, मानो घने कोमल कुन्तलोवाली (सीता) के मदहास (राम के) मन में भर गये हो ओर अब शरीर के बाहर भी उमड़ रहे हो।

(राम ने) अगद धारण किये, जिसमे पंक्तियो मे जड़े हीरे विदियो के समान चमकत थे और लाल माणिक्य अग्नि के जैसे लगते थे, अतः (उनकी) सुन्दर भुजाओ पर के अगद, प्राचीन काल में (क्षीरसागर के मथन के समय) मन्दर को लपेटे रहनेवाले वासुकि सर्प के समान दिखाई देते थे।

मुक्ताओ की बड़ी-बड़ी मनोहर लड़ियाँ (राम की) रक्षा करनेवाली दीर्घ-बाहुओ में बाँधी गईं, वे अतिविलक्षण आभरण मानो इस बात के चिह्न हों कि तीनो भुवनो के अनादि प्रभु यही हैं।

उनके, देखने योग्य (अति सुन्दर) करों में 'कटक' आभूषण चमक उठे, मानो


१. वाल्मीकि रामायण से विदित है कि रंगनाथ ही इक्ष्वाकु-वंश के राजाओ के कुलदेव थे श्रीरंगम (जिला तिरुचिरापल्ली) के क्षेत्र-पुराण से भी यही बात मालूम होती है।—अनु०

१५६ कंब रामायण

कल्पक वृक्ष, अपने याचको को दान देने के लिए, भव्य रत्न और स्वर्ण-वलयो को अपनी पुष्ट शाखाओ मे लिये खड़ा हो ।

मधुपूर्ण कमलपुष्प की देवी ( लक्ष्मी ) जिस वक्ष पर निरंतर क्रीडा करती हैं, उसके मध्य सुन्दर हार ऐसे चमक रहे थे, जैसे बिजली से शोभायमान मेघो के मध्य इन्द्र-धनुष चमक रहा हो ।

उनका उत्तरीय उन ज्ञानियो के निर्मल ज्ञान के समान उज्ज्वल था, जो किसी वस्तु को अपनाने या त्यागनेवाली स्वाधीन इच्छा रखते हे, मानो राम की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई असीम करुणा ही, उनके मुक्ताहार की कांति के सदृश ही, उस उत्तरीय के रूप मे पडी हो ।

जिनके समीप मे जाना भी दुष्कर है, ऐसे प्रकाश से पूर्ण तीन ज्योतियो ( अर्थात् सूर्य, चन्द्र और अग्नि ) के जैसा चमकता हुआ उनका यज्ञोपवीत, मानो ससार के सब लोगो को यह बताने के लिए ही तीन सूत्रो को एक रूप में बाँधकर बनाया गया हो कि त्रिभूतियां का स्वरूप स्वयं यह राम ही है ।

( राम की कटि में 'उदर-बंधन' नामक आभरण बाँधा गया । ) चारो दिशाओं में अत्यधिक स्वर्णिम आभा को फेंकता हुआ, मध्य मे एक बडे रत्न से जाज्वल्यमान 'उदर-बंधन' ऐसा लगता था, मानो एक दूसरे अडगोल के स्रष्टा ब्रह्मा को उत्पन्न करनेवाला एक बडा स्वर्ण-कमल विष्णु की नाभि से विकसित हुआ हो ।

उन्होने श्वेतवर्ण का कौशेय धारण किया, मानो उज्ज्वल रत्नो के आगार, महिमापूर्ण नील समुद्र को, (तरंग-रूपी) दीर्घकरो के युक्त, शीतल श्वेतवर्ण के क्षीर सागर ने आलिंगन-बद्ध कर लिया हो ।

समुद्र के जल मे उत्पन्न मुक्ताएँ और उज्ज्वल-नील रत्न, जिस करवाल मे चमक रहे थे, वह ( करवाल ) उनके कमनीय स्वर्णपट्ट मे बाँधा गया, जैसे ऊँचे स्वर्ण पर्वत ( मेरु ) की परिक्रमा करनेवाला सूर्य एक ही स्थान पर स्थिर खड़ा रह गया हो ।

उनकी कटि के पट्ट मे श्रेणियों मे जो मुक्ताएँ जड़ी थी, उनकी धवल कांति का पुज, उत्तरोत्तर विकसित होता हुआ, चारो ओर बिखर रहा था । कटि से एक रत्न-माला लटकाई गई, जो कमनीय खड्ग रूपी सूर्य के बालातप के सदृश चमक रही थी ।

( उनकी जघाओ पर 'किंपुरी' नामक आभरण पहनाया गया, जिसका आकार खुले मुखवाले मकर के समान था । )

किंपुरी नामक आभरण मे जो मकर के आकार का था, उसके नेत्रो के स्थान मे खचित रत्नो की कांति फैल रही थी तथा दाँतो ( के स्थान में खचित मुक्ताओ ) की कांति चाँदनी के समान छिटक रही थी । नकाशीदार उस आभरण ने चमकती विजली के समान सभी दिशाओ को प्रकाश से भर दिया ।

अव देखेगे कि ( ये चरण ) विशाल होकर कैसे लोको को नापतं हैं—यो सोचकर मानो पृथक्-पृथक् रूप में उनको रोकने के लिए ही, अति सूक्ष्म शिल्प-युक्त नूपुर और वीर वलय उनके शीतल, पुष्ट, रक्तकमल-सदृश चरणो को घेरकर पड़े रहे ।

बालकाण्ड १५७

माणिक्य-दीपों से प्रज्वलित पन्नग-पर्यंक पर योगनिद्रा छोड़कर जो (विष्णु) अवतरित हुए हैं, वे इस प्रकार दैवकार्य के निमित्त विलक्षण अलंकार से सुशोभित हो गये।

(त्रिमूर्त्ति-रूपी) तीन परम तत्त्वों में जो प्रधान हैं, जो सृष्टि का आदि कारण हैं; जो संसार के संबंध को त्यागनेवालों के द्वारा प्राप्यमान ब्रह्मानन्द-स्वरूप हैं; तथा जो सर्व-पिता हैं, उस क्षीर-सागर से उत्पन्न अमृत-तुल्य (विष्णु के अंशभूत) श्रीराम ने जो अलंकार किया था; उसका वर्णन करना क्या संभव है ?

अनेक सहस्र गायें, पीत स्वर्ण, असीम भूमि, नव रत्न आदि का सत्पुरुषों को दान दिया; प्रशंसनीय चतुर्वेद ही जिनके धन हैं, वैसे (ब्राह्मणों) के द्वारा अभिनन्दित होते हुए (राम) रथ पर आरूढ हुए।

स्वर्ण की धुरीवाला; रजतमय योग्य चक्रों से अलंकृत, हीरकों से खचित पीठिका-युक्त तथा चारों ओर से जड़ित नवरत्नों की कांति से जाज्वल्यमान वह रथ, सूर्य के एक-चक्र रथ की तुलना करता था।

शास्त्रोक्त (उत्तम) लक्षणवाले, ध्यान के द्वारा जानने योग्य, शक्ति से पूर्ण, प्रभूत सौंदर्यवाले, धर्म आदि चार पुरुषार्थों के जैसे चार अश्व, संसार की प्रकृति को जाननेवाले (राम) के रथ में जोते गये।

इस प्रकार के रथ पर, अरुण के समान ही, आनन्दाश्रु से पूर्ण नेत्रवाले भरत, छत्र धारण करके (सारथि बनकर) आसीन हुए। वक्र धनुष-धारी लक्ष्मण तथा उनके अनुज शत्रुघ्न सुन्दर सोने की मूठवाले चामर डुलाने लगे।

अन्यों के लिए दुर्लभ, अति रमणीय आकारवाले (राम) के अत्यधिक सौंदर्य के कारण वैसा हुआ, या शांत मन से (राम के सौंदर्य का) चिंतन करते रहने के कारण वैसी दशा हुई—हम कुछ निश्चित रूप से नहीं जानते। चाहे जो भी कारण हो, (इस दृश्य को देखकर) इस पृथ्वी के लोग अनिमेष (अर्थात्, पलक न मारनेवाले देवता) हो गये।

(मिथिला के लोगों ने) पुष्प बरसाये सुगंध-चूर्ण बिखेरा कांतिवाले रत्न, स्वर्ण, वस्त्र आदि (दान में) दिये। उस मंगल-पूर्ण नगर के लोगों के ऐसे कार्यों का क्या कारण हैं, नहीं जानते। कदाचित्, उन्होंने (राम के) सौंदर्य (रूपी मद्य) को छककर पी लिया हो। (जिससे उन्मत्त होकर इस प्रकार के कार्य कर रहे हों।)

राम को देखनेवाली सब नारियाँ स्तब्ध हो खड़ी रहीं और उनके सब आभरण खिसककर गिर गये वह दृश्य ऐसा था; मानो सारी संपत्ति का दान करने के पश्चात् वे अपने पहने हुए आभरण भी लुटा रही हों।

समस्त संसार के सब आयुधधारी राजा लोग, हाथियों के झुंड के जैसे, (राम को) घेरकर आ रहे थे और निष्ठुर क्रोधवाले धनुर्धारी (राम) विजयी चक्रवर्ती (दशरथ) से अधिष्ठित मण्डप के निकट रथ से जा पहुँचे; जैसे अरुण-किरण सूर्य ऊँचे महामेरु पर जा पहुँचा हो।

ताजे फूलों के हार से शोभित वह वरद (राम) उस मण्डप के निकट रथ से उतरे; उनके दोनों पार्श्वों में भरत तथा लक्ष्मण उनके दोनों बाहुओं को आदर के साथ

१५८ | कंब रामायण

सहारा देते हुए जा रहे थे, मण्डप मे पहुँचते ही उन्होने (राम ने) महान् तपस्वी मुनिवरो को प्रणाम किया; फिर नीति-व्रतधारी अपने पिता के चरणो को नमस्कार करके (उनके) पार्श्व के आसन पर आसीन हो गये। तब—

मानो कोई अरुण स्वर्ण की लता, एक धनुष और दो मछलियो से शोभायमान चन्द्र को उठाये हुए, कलियो के साथ, रथ पर पूर्वदिशा में उदित हो रही हो, ऐसा दृश्य उपस्थित करती हुई जानकी उस मण्डप के मध्य आ पहुँची, जैसे (लक्ष्मी) पहले तरंगायित क्षीर सागर में उत्पन्न होकर, फिर भूमि पर अवतरित हो गई हो और अब किसी पर्वत के मध्य आविर्भूत हो।

विभूतियो से समृद्ध सब देवता लोग (उस मण्डपो में) आसीन कुमार (राम) को देखकर कहने लगे—भरे हुए वडे सागर को मंथन करने से उत्पन्न, सुवासित कुंतलोवाली (लक्ष्मी) ने जिस दिन (विष्णु को विवाह के चिह्नभूत) माला पहनाई थी, उस दिन से भी यह दिन अधिक मनोहर है।

जब, गर्जन करनेवाले समुद्र से घिरी हुई धरती की नारियो, देवांगनाओ तथा नाग-कन्याओं से भी (सीता) का लावण्य अत्यधिक है, तो उनके विवाह के समय (उनके) बढे हुए सौंदर्य का, अल्प बुद्धिवाला मै किस मुँह से वर्णन कर सकता हूँ ?

(विवाह की वह) शोभा देखने के लिए अन्तरिक्ष मे इन्द्र, शची के साथ आ पहुँचा। चन्द्रशेखर (अपनी) उमा के साथ आ पहुँचे, कमलासन भी वाणी देवी के साथ आ पहुँचे।

यज्ञोपवीत से शोभित वक्षवाले अपार समुद्र के सदृश वेदज्ञो के सघ से घिरे हुए वसिष्ठ, परिपाटी के अनुसार उस समारोह-पूर्ण विवाह को संपन्न कराने के लिए निर्दोष उपकरण (आदि) लेकर आनन्द के साथ आ पहुँचे।

(उन्होने) तंडुल¹ फैलाकर उसपर दर्भों को बिछाया। वेदोक्त विधान से (अग्नि-स्थापना के लिए उचित) स्थानो को निर्मित किया। कोमल पुष्पो को उन स्थानो के चारो ओर बिखेरा। होमाग्नि प्रज्वलित की और अनादि वेदमंत्रो का यथाविधि उच्चारण किया।

विवाह की वेदी पर आकर, विजयी वीर, महानुभाव (राम) और प्रेमभरी (उनकी) सगिनी, हस-तुल्य गतिवाली (सीता) विवाहोचित आसन पर आसीन हो गये। एक साथ आसीन वे दोनो क्रमशः ब्रह्मानन्द और (उसके उपायभूत) योग की समता करते थे।

चक्रवर्ती के कुमार के सम्मुख (स्थित होकर) जनक ने कहा--'परतत्त्व (विष्णु) तथा लक्ष्मी देवी के सदृश तुम मेरी रूपवती पुत्री के सग चिरजीवी रहो। और, यह कहकर स्वच्छ शीतल जल-धारा को (राम के) रक्तकमल सदृश विशाल हाथ में दिया। (अर्थात्, जनक ने अपनी कन्या को राम के प्रति प्रदान किया।)


१. कुछ विद्वानों ने मूल में, तडुल, के स्थान पर, 'तडिला' पाठ को माना है, जो सस्कृत, स्थण्डिल, का रूपान्तर माना गया है, जिसका अर्थ होता है 'मिट्टी का आस्तरण'। यह अर्थ भी उपयुक्त मालूम होता है।—अनु०

बालकाण्ड १५६

ब्राह्मणों के आशीर्वाद-घोष, आभरणों के सदृश सौंदर्य को बढ़ानेवाली नारी-मणियो के अभिनन्दन-गानो के घोष, पुष्पाहंकृत शिखावाले राजाओं तथा वंदनीय देवों के आशीर्वाद-घोष—इनके समान ही उत्तम शंख-वाद्य भी निनादित उठे ।

देवों के बरसाये कल्पक-पुष्प, राजाओ के बरसाये सोने के पुष्प, अन्य लोगो के बरसाये उज्ज्वल मोती और स्वयं विकसित पुष्प—इनसे यह पृथ्वी नक्षत्रों-से प्रकाशमान आकाश की तरह शोभित हो उठी ।

वीर ( रामचन्द्र ) ने, उस समय, सभी पवित्र मंत्रों का उच्चारण करके, प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुतियाँ दीं और सुन्दरी ( जानकी ) के पल्लव-कोमल पाणि का अपने विशाल शुभ हस्त से ग्रहण किया ।

उचित होम करनेवाले, विशाल भुजाओ से शोभायमान ( राम ) के संग जब ( सीता ) प्रज्वलित अग्नि की परिक्रमा ( भाँवरी ) करने लगी, तब सहज सुघड़ता से युक्त वह देवी ऐसी लगी, जैसे परिवर्तनशील जन्म-चक्र मे कहीं देह, आत्मा का अनुसरण करती जा रही हो । ( आत्मा शरीर की खोज मे जाती है, किन्तु शरीर आत्मा का अनुगमन नही करता । यहाँ पर इस 'अभूतोपमा' मे कवि की एक विलक्षण, किन्तु अतिसुन्दर उद्भावना है । )

सुन्दर तीन धागो के कंकण से युक्त उन दोनो ने होमाग्नि की प्रदक्षिणा करके नमस्कार किया । अन्य कर्त्तव्य कर्म सम्पन्न किये । कांतिपूर्ण सिल पर पद रखा । १ फिर, सम्मुख-स्थित, अचंचल पातिव्रत्यवाली अरुंधती ( नक्षत्र ) को देखा ।

( राम ने ) अन्य कर्त्तव्य पूरा करके, आनन्द-भरे, महातपस्वियो के चरणो से सिर लगाया । फिर, चक्रवर्ती ( दशरथ ) के चरणो की वंदना की और स्वर्ण-कंकणधारिणी सीता का कर अपने हाथ में लेकर अपने मनोहर भवन में जा पहुँचे ।

भेरियाँ गर्जन कर उठी, शंख बज उठे, चतुर्वेदों के घोष हो उठे, देवता आनन्द-घोष कर उठे, विविध शास्त्र तथा अभिनन्दन-गीत प्रतिध्वनित हुए, भ्रमर-समुदाय भी गुंजार कर उठे और समुद्र भी गर्जन कर उठे ।

— ( राम ने ) केकय-पुत्री के प्रकाशमान चरणों को, अपनी जननी के प्रति प्रेम से भी अधिक प्रेम के साथ नमस्कार किया । अपनी माता के चरणयुग को सिर पर धारण किया और फिर निष्कलुष मन से सुमित्रा के चरणों को प्रणाम किया ।

हंसिनी ( सीता ) ने भी उन तीनो देवियो के मनोहर स्वर्ण-सदृश चरण-कमलो को अपने सिर का भूषण बनाया । उन देवियो ने उमंग भरे मन से कहा—यह ( हमारे ) कुनार का भव्य आभरण बनी रहेगी और अविचल पातिव्रत्यवती अरुंधती भी इसे ( आदर्श के रूप मे ) देखेंगी ।

फिर उन देवियो ने शंख-वलयो से भूषित, कोकिल-स्वरवाली जानकी को अंक


१. दक्षिण में विवाह के समय अग्नि-प्रदक्षिणा करने के पश्चात् वधू सिल पर अपना दाहिना पैर रखती है और वर उसके अंगूठे का स्पर्श कर एक मन्त्र का उच्चारण करता है ।—अनु०

१६०कंब रामायण

में भरकर कहा--रमणीय नयनवाले (राम) की पत्नी बनने योग्य इसके अतिरिक्त कोई दूसरी नारी कहाँ है ? सीता को देख-देखकर उनकी आँखें आनन्द से भर गईं और उनके मन उमग से भर गये।

उन्होंने अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और कहा कि स्त्री-समुदाय के भूषण-जैसी तुमको असीम स्वर्ग, असंख्य अपूर्व आभरण, (दासियो के रूप मे) असंख्य सुन्दरियाँ, विशाल भूमप्रदेश और अमूल्य रेशमी वस्त्र आदि स्त्री-समुदाय के भूषण प्राप्त हों। यह कहकर उन्होने कई आभरण आदि उन्हे दिये।

पवन से तरंगायित समुद्र-जैसे नील वर्णवाले करुणासमुद्र (राम), शास्त्र-समुद्र स्वरूप मुनियो का आदेश पाकर, आनन्द-समुद्र बने हुए मनवाली (सीता) के साथ अपने पुरातन पर्यंक क्षीर-समुद्र जैसे पर्यंक पर जा पहुँचे।

[ इस पद्य मे 'समावेशन' नामक विधान की ओर संकेत है, जिसमे दंपती ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक साथ रहकर चार रात्रि व्यतीत करते हैं।]

मीन मास (फाल्गुन) के उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र-युक्त दिन मे सहस्र नामवाले सिंह-सदृश (राम) का विवाह सम्पन्न हुआ, और उसके योग्य मंगलप्रद होमाग्नि को वसिष्ठ मुनि ने समृद्ध किया।

अकलंक जयशाली (जनक) ने (दशरथ आदि) बन्धु-जनो से परामर्श करके निश्चय किया कि अपनी दूसरी पुत्री (ऊर्मिला) तथा अपने अनुज की दो पुत्रियों (मांडवी और श्रुतकीर्ति) इन तीनो लक्ष्मी-सदृश कन्याओ का विवाह राम के तीनो भाइयो के साथ कर दिया जाय।

पुष्पमालाधारी जनक और घृतसिक्त शूलधारी कुशध्वज नामक उनके अनुज, दोनों की तीन पुत्रियों के साथ, जो सभी योग्य गुणो से शोभित थी, काजल लगी आँखोंवाली थी, और सुन्दरियों के सदृश रमणीय थी, और प्राप्तवय थी, तीनो (लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न) ने विवाह कर लिया।

उन सब (भाइयो) का विवाह सम्पन्न होने के पश्चात् चक्रवर्ती (दशरथ) अनेक वर्षों से अर्जित अपने यशमात्र को छोड़कर, उसके अतिरिक्त अन्य सब प्रकार की सम्पत्ति का दान कर दिया और जिसने जो-जो और जितना भी माँगा, उसको वह सब दे दिया।

(उस प्रकार) दान करके चक्रवर्ती दशरथ विलक्षण तथा असीम आनन्द को प्राप्त हुए, फिर वेद-शास्त्रो के मर्मज्ञ तथा महातपस्वी मुनियो के साथ, उस (मिथिला) नगर में विश्राम करते रहे। इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए। उसके पश्चात् क्या घटित हुआ, वह (आगे) कहेंगे। (१-१०४)

अध्याय २२

परशुराम पटल

जनक-पुत्री के संग श्रीराम नानाविध भोगों का उचित प्रकार से अनुभव कर रहे थे। उस समय महातपस्वी कौशिक, वेद-विहित रीति से आशीर्वाद देकर, उत्तर दिशा में अत्युन्नत हिमालय की ओर चले।

एक दिन बलशाली चक्रवर्ती (दशरथ) ने आदेश दिया कि हमारी सेना अब हमारे साथ सुन्दर (अयोध्या) नगर के लिए प्रस्थान करे। हाथियों के जैसे नरेशों से वंदित होते हुए, वे एक अनुपम रथ पर आरूढ हुए।

सर्व प्रकार के बलों से युक्त दशरथ (अयोध्या के) मार्ग पर आ पहुँचे, उस समय, उनके पुत्र तथा पुत्रवधुएँ उनके चरण की वंदना करके उनके संग हो लिये। राजकुमार तथा अन्य लोग उनके पार्श्वों में चलने लगे। मिथिला नगर की प्राचीन जनता भी उनके वियोग से ऐसा दुःख अनुभव करने लगी, जैसा प्राणों के वियोग से शरीर को होता है।

दीर्घ किरीटधारी (दशरथ) यथाविधि आगे-आगे जा रहे थे और उस मनोहर महानगर मिथिला के निवासियों के मन उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके मध्य में, अपने ही सदृश (अपने) भाइयों के द्वारा अनुगत होते हुए, वीर (राम) मेघस्थ बिजली-सदृश कटिवाली (सीता) के साथ सुन्दर ढंग से चलने लगे।

वे जब इस प्रकार जा रहे थे, तब मयूर उनके दक्षिण की ओर आये (जो शुभ-शकुन था) और कौए आदि पक्षी बाईं ओर जाकर उनके मार्ग में बाधा उपस्थित करने लगे (जो अपशकुन था)। यह देखकर गजतुल्य (दशरथ) यह सोचकर कि 'मार्ग में कुछ बाधा उपस्थित होनेवाली है', अपने आकाशस्पर्शी रथ के साथ आगे न बढ़कर मार्ग के मध्य में ही रुक गये।

इस प्रकार रुककर उन्होंने एक शकुन-शास्त्रज्ञ को बुलाकर पूछा कि ये (शकुन) अच्छे हैं या कुछ विपदा आनेवाली है ? तुम निष्पक्ष होकर सच-सच बताओ। तब पर्वत-तुल्य भुजावाले उन चक्रवर्ती के सम्मुख पक्षियों के संकेत को पहचाननेवाले उस व्यक्ति ने कहा—अब कुछ बाधा उपस्थित होनेवाली है, किन्तु फिर वह दूर हो जायगी।

शकुनज्ञ यह कह ही रहा था, इतने में (परशुराम), जिनकी जटाओं से आकाश के अन्धकार को दूर करनेवाली कांति चारों ओर बिखर रही थी, जिनके हाथ में फरसा था, जो चलनेवाले स्वर्ण-पर्वत के सदृश थे, जो अग्नि उगलते थे, जो अग्नि के समान भयंकर नेत्रवाले थे और जो वज्र-सदृश कठोर वचन-युक्त थे, वहाँ आ पहुँचे।

(उनको देखकर) उद्वेलित समुद्र में फँसी हुई नौका के जैसे लोग डगमगा उठे; महान् दिग्गज, जो स्तंभ के जैसे धरती को धारे खड़े थे, डिग उठे; समुद्र बौखलाकर उमड़ गये और स्थानांतरित होने लगे, स्वर्ग के निवासी भयभीत हो अपना-अपना स्थान छोड़ भागने लगे; रक्तस्वर्ण का एक धनुष झुकाकर, उसकी डोरी को चढ़ाकर टंकारित करते हुए तथा उसपर तीक्ष्ण बाण चुन-चुनकर रखते हुए (परशुराम) आये।

१६२ कंब रामायण

निकटस्थ लोग सोचने लगे—खुले हुए व्रण से प्रवाहित रक्त के जैसे (लाल) नेत्रों से अग्नि-ज्वाला प्रसारित करनेवाले (इन परशुराम) का यह कोप किसलिए उत्पन्न हुआ? क्या स्वर्ग को धरती पर गिराने के लिए? भूलोक को आकाश में उठाने के लिए? या असख्य प्राणियों को यम के मुख में डालने के लिए? (किसलिए ये कोप कर रहे हैं?)

युद्ध के मध्य तीव्र हो उठनेवाले परशु के अग्र भाग से अग्नि-शिखा प्रज्वलित हो उठी। जिससे रथारूढ होकर (मेरु) पर्वत की परिक्रमा करनेवाला सूर्य भी दिग्भ्रान्त हो भटकने लगा। (उनके शरीर से) ऐसा प्रज्वलित तेज निकल पड़ा, मानों समुद्र में रहने-वाली वडवाग्नि ही आकाश तक उठकर प्रज्वलित होती हुई धरती पर चली आ रही हो।

उनकी बलिष्ठ भुजाएँ दिगन्तों में जा फैलीं। चारो ओर बिखरी हुई उनकी जटामय शिखा नभ को छू रही थी। श्वेत चन्द्र भी उनके अतिनिकट दिखाई देता था। वे समुद्र, जल, अग्नि, वायु, भूमि, आकाश सबके विनाशकारी, कल्पांत के समय में तांडव करनेवाले उमापति (रुद्र) की समता कर रहे थे।

(ऐसे वे परशुराम आ पहुँचे) जिनके पास अति तीक्ष्ण धारवाला ऐसा फरसा था, जिसका प्रयोग करके उन्होंने सैकत वेला-युक्त समुद्र से घिरे हुए समस्त भूलोक पर छा जानेवाली बलशाली सेना से विशिष्ट तथा पराक्रमी नरेशों से तिलकायमान (कार्तवीर्यार्जुन) रूपी सजीव महावृक्ष की एक सहस्त्र उन्नत भुजा-रूपी वज्रमय शाखाओं को काट दिया था।

क्षत्रिय-कुल पर एक कलंक (जमदग्नि की हत्या के कारण) लग गया था, जिससे परशुराम ने भूलोक के राजसमूह का समूल नाश करते हुए अपने परशु से इक्कीस पीढ़ियों तक उनके प्राण हरे थे, भूमि के पापों का उन्मूलन किया था और उमड़ते समुद्र-जैसे तरगायित उनके रक्त-प्रवाह में डूबकर अकेले ही गोता लगाया था।

क्षमास्वरूप महान् तपस्या तथा जलानेवाली अग्नि-स्वरूप महान् कोप—ये जिसमें अत्यधिक मात्रा में थे, अस्त्र-प्रयोग की स्पर्धा में जिनके सम्मुख शिथिल पड़कर कार्त्तिकेय बीच में ही (स्पर्धा छोड़कर) चले गये थे और जिन्होंने क्रोध के साथ विलक्षण तीक्ष्ण बाणों का प्रयोग करके उच्च शिखरवाले (क्रौंच) पर्वत में ऐसा छेद कर दिया था, जो ऊँचे उडनेवाले पक्षियों के लिए (आने-जाने का) एक सुन्दर मार्ग बन गया था।१

जो अनायास ही पर्वतों को (भूमि में) धँसा सकते थे, समुद्रों को बहा देने में समर्थ थे और जिन्होंने मेघस्पर्शी पर्वत को भेद दिया था, वे परशुधारी वहाँ आ


१. यह कथा प्रसिद्ध है कि सुब्रह्मण्य और परशुराम ने शिवजी से अस्त्र-विद्या प्राप्त की। अस्त्र-विद्या की परीक्षा के समय सुब्रह्मण्य बाणों से क्रौंच पर्वत को भेद नहीं सके; किन्तु परशुराम ने अपने बाणों का प्रयोग कर उसमें छेद कर दिया। उसके पश्चात सुब्रह्मण्य ने अपना भाला फेंककर उस पर्वत को तोड दिया। उस पर्वत के शिखर के गिरने से दक्षिण दिशा में सरोवर ध्वस्त हो गये। तब वहाँ के हंस परशुराम-कृत छेद के मार्ग से क्रौंच पर्वत के उत्तर में पहुँच गये और हिमालय के मानस में निवास करने लगे।—अनु०

बालकाण्ड १६३

पहुँचे। प्रभु (रामचन्द्र) के जन्म के कारण-भूत दशरथ चक्रवर्त्ती ने उन्हें देखा और उस कठोर व्यक्ति के आगमन से आशंकित होकर भारी वेदना से ग्रस्त हो गये।

उमंग से चलनेवाली सेना भयग्रस्त हो इधर-उधर भागने लगी; उज्ज्वल भृकुटियो को परस्पर सम्मिलित कर (भौंहें सिकोड़कर), आँखों से चिनगारियाँ उगलते हुए, वज्र के सदृश, अत्यन्त क्रोध के साथ, वे (परशुराम) रथ पर आनेवाले सिंह के समान कुमार के सम्मुख आये; मनोहर नयनवाले नृप-कुमार (राम) भी यह सोचने लगे कि यह महात्मा कौन हैं १ इतने मे-

चक्रवर्त्ती (दशरथ) बीच में आ पहुँचे और अति सुन्दर सत्कार करके अपने सुवासित सिर को धरती पर लगाकर उनके चरणों को प्रणाम किया; किन्तु (उनकी परवाह न करके) वे अपने कोप का पार न पाकर कल्पात की अग्नि-ज्वाला फैलाते हुए वीर (राम) के सम्मुख आकर बोले-

जो धनुष टूट गया, उसकी शक्ति को मैं जानता हूँ। अब तुम्हारी स्वर्ण-भूषित भुजा के बल की परीक्षा करने की मेरी इच्छा है। युद्ध करके पुष्ट हुई मेरी भुजाओ में कुछ खुजलाहट भी हो रही है यहाँ मेरे आगमन का कारण यही है; दूसरा कुछ नहीं।

जब वे (राम से) ये वचन कह रहे थे, तब चक्रवर्त्ती ने घबराकर उनसे निवेदन किया-आपने सारी भूमि को जीतकर एक मुनि (कश्यप) को दान कर दिया था। आप जैसे कृपालु के लिए शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी कोई वस्तु नहीं हैं, (तो) ये क्षुद्र मनुष्य किस वित्ते के हैं १ अब यह (मेरा पुत्र) और मेरे प्राण आपकी शरणागत हैं।

(दशरथ ने आगे कहा-) आग उगलनेवाले परशु को धारण करनेवाले ! महान् पापो को इच्छा-पूर्वक करनेवाले ही तो मरण के पात्र होकर (आपके द्वारा) मृत्यु प्राप्त करते हैं १ क्या इस (राम) ने अहंकार के मद मे बुद्धि-भ्रष्ट होकर कोई अपराध किया है १ युद्ध करने योग्य बलवानो के निकट न जाकर निर्बल व्यक्तियों के पास जाने से बलवानो के बल की क्या शोभा हो सकती है १

हे अपार तपस्या-सपन्न ! आपने सप्तद्वीपमय पृथ्वी पर एकाधिकार प्राप्त करने के पश्चात् उसे (पृथ्वी को) 'लो, तुम इसे अपनाओ', कहकर (कश्यप को) दे दिया था। अब फिर ऐसा काम न कीजिए। विशाल शीतल समुद्र से आवृत भूमि पर स्थित नरपतियो पर कृपा कीजिए और अपना कोप शात कीजिए। क्या आपका यह कोप उचित है १-यों विविध प्रकार की बाते कही।

(दशरथ ने आगे कहा-) उस पराक्रम से भी क्या होता है, जो निष्पक्ष न हो, केवल बढ़ा हुआ हो और सब लोग जिसकी निन्दा करते हो। क्या उस पराक्रम से कोई धर्म-कर्म पूर्ण हो सकता है १ बल या पराक्रम वही तो (सार्थक) होता है, जो धर्म-मार्ग पर स्थित हो और श्रेष्ठ यश से संयुक्त हो। हे पराक्रमी! (आप जो अब करने को उद्यत हो रहे हैं) क्या यह पराक्रम कहलाने योग्य है १'

'मेरा पुत्र (आप से) वैर करनेवाला नहीं है। हे उपलस्तंभ-सदृश भुजावाले ! यदि यह (पुत्र) प्राणहीन हो आये, तो मै अपने बंधु-जन तथा प्रजा के साथ प्राण-त्याग

१६४कंब रामायण

करूँगा और स्वर्ग प्राप्त करूँगा। हे महात्मन् ! मै आपका चरण-दाम हूँ। मेरे कुल सहित मुझे न मिटा दें। आप से मेरी यही विनती है।

यों प्रार्थना करनेवाले अपने पैरो पर पडे हुए (चक्रवर्त्ती) को (परशुराम ने) कुछ वस्तु ही नही समझा, किन्तु प्रज्वलित दृष्टि से देखकर वे स्वर्ण रंग के वस्त्रधारी (राम) के सम्मुख आ पहुँचे उनकी यह निष्ठुरता देखकर तथा अपना कोई उपाय फलीभूत होते न देखकर (दशरथ) विकल-प्राण हुए और बिजली को देखे हुए साँप के समान मूर्च्छित हो गये।

मानधन मुकुटधारी (चक्रवर्त्ती) की मूर्च्छा की कुछ परवाह न करनेवाले तथा स्वयं उनको (परशुराम को) भी वैसी ही दशा मे पहुँचानेवाला जो कर्म-परिपाक उन्हें घेर रहा था, उसे दूर करने का उपाय न जाननेवाले उन्होने (परशुराम ने) कहा- 'डमरूधारी उमापति वह पुराना का धनुष शक्तिहीन हो गया था। उसका पुराना वृत्तान्त तुम सुनो-

भूलोकवासियो के लिए अप्राप्य शिल्प-निपुणता से युक्त विश्वकर्मा ने पुरातन काल में एक चक्रवाले रथ पर आरूढ (सूर्य) की भ्राति उत्पन्न करनेवाले, अति प्रकाशमान, तोड़ने में दुष्कर तथा सञ्चरणशील मेघो से आवृत उत्तर मेरु के बल से युक्त, दो अनुपम धनुष निर्मित किये।

उनमें से एक को उमापति ने ग्रहण किया, दूसरे धनुष को, विराट् रूप धारण कर सारे विश्व को नापनेवाले त्रिविक्रम (विष्णु) ने अपने सुन्दर कर में धारण किया। यह विषय जानकर देवताओ ने ब्रह्मा से पूछा कि उन दोनो धनुषो मे अधिक बलवान् कौन है ?

सुरभित कमल पर आसीन (ब्रह्मा) ने सोचा कि देवता लोग (दोनो धनुषो की परीक्षा लेने का) जो विचार कर रहे हैं, वह उचित ही है, और एक सफल उपाय के द्वारा उन शक्तिशाली धनुषो के व्याज से परब्रह्म के रूप मे एक बनकर रहनेवाले उन दोनो देवो के मध्य घोर युद्ध उत्पन्न कर दिया।

दोनो (शिव और विष्णु) दोनों धनुषो पर डोरी चढ़ाकर युद्ध करने लगे, तो सातो लोक भय-कम्पित हो गये। दिशाएँ डगमगाने लगी। दोनो कोपाग्नि उगलने लगे। तब त्रिपुर का दाह करनेवाले (शिव) का धनुष कुछ टूट गया- इस पर वे (शिव) अधिक क्रोध से भर गये।

(शिव) फिर युद्ध के लिए उद्यत हुए, तो देवो ने उन्हें युद्ध से हटा दिया। ललाटनेत्र (शिव) ने अपना धनुष देवाधिदेव (इन्द्र) के हाथ मे दे दिया उधर विजयशील नीलवर्णदेव (विष्णु) भी अपना धनुष महान् तपस्वी ऋचीक मुनि को देकर चले गये।

ऋचीक ने वह धनुष मेरे पिता को दिया और अपने पिता से मैने यह धनुष प्राप्त किया। हे वत्स ! यदि तुम इस मेरे धनुष को चढ़ा दोगे, तो तुम्हारी ममता करनेवाला नृप अन्य कोई नही होगा। मैं तुम्हारे साथ युद्ध करने को जो विचार कर रहा हूँ, वह भी छोड़ दूँगा और सुनो-

सड़े हुए धनुष को तोड़नेवाला जो बल है, उस पर फूल उठना अच्छा नहीं है। हे मनुवशज ! और भी सुनो। (मेरा) तुम क्षत्रियो के साथ पुराना वैर है प्राचीन काल में

बालकाण्ड १६५

एक दानव-समान राजा ने मेरे निर्दोष पिता को क्रोध-हीन (तपस्वी) जानकर भी मारा था, तो मैंने क्रुद्ध होकर—

इक्कीस बार, धरती के किरीटधारी राजाओं को उग्र परशु की धार से समूल उखाड़ फेंका। उनके शरीर से प्रवाहित रक्त-धारा में यथाविधि, अपने पिता के प्रति करणीय तर्पण-कृत्य पूरा किया। (इसके उपरान्त) अपने कोप को दबा दिया।

समस्त पृथ्वी को मुनिवर (काश्यप) को दान कर दिया; अपने बड़े-बड़े वैरियाँ को दबा दिया। बड़े तप में निरत होकर (महेन्द्र) नामक पर्वत पर निवास करता रहा। तुम्हारे शिवधनुष को तोड़ने की ध्वनि वहाँ पर सुनाई दी, तो कोप उत्पन्न हुआ और यहाँ आया हूँ। यदि तुम बलवान् हो, तो तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा। पहले इस धनुष को चढ़ाओ—

(परशुराम के) इस प्रकार कहते ही, राम ने मुस्कराकर, प्रकाशमान वदन से कहा—नारायण ने अपने बल से जिस धनुष का अभ्यास किया था, वह मुझे दीजिए। परशुराम ने वह धनुष दिया। वीर (राम) ने उसे लिया और अपने भुजबल से उसे झुकाया, जिसे देख भारी घनी जटावाले (परशुराम) भी भयभीत हो गये। फिर (राम ने) कहा—

यद्यपि तुमने भूलोक के राजकुल का विनाश किया है, तो भी वेदज्ञ ऋषिवर के पुत्र हो, और तपस्वी का वेष धारण किया है, अतः तुम (मेरे लिए) अवध्य हो; किन्तु मेरा बाण भी व्यर्थ न होनेवाला है, अतः इसका लक्ष्य क्या हो—शीघ्र बताओ।

(राम के वचन सुनकर परशुराम ने कहा—) हे नीतिज्ञ ! कोप न करो; तुम सबके (सारे विश्व के) आदि (कारण) हो, मैंने तुम्हे पहचान लिया। हे तुलसीमालाधारी चक्रधारिन् ! श्वेत चन्द्र-कलाधारी (शिव) का धनुष टुकड़े-टुकड़े क्या हुआ, वह तो तुम्हारे पकड़ने के भी योग्य नहीं था।

स्वर्णमय वीर-कंकण तथा रमणीयता से युक्त चरणवाले ! तुम चक्रधारी (विष्णु) ही हो, यह सत्य है। अतः, अब (तुम्हारे रहते हुए) संसार पर क्या विपदा आ सकती है ? मैंने जो धनुष तुमको दिया है, वह भी तुम्हारे बल के लिए पर्याप्त नहीं है।

तुम्हारे द्वारा चढ़ाया हुआ यह बाण व्यर्थ न हो, इसलिए वह मेरे किये गये सब तप को मिटा दे। परशुराम के यह कहते ही, (श्रीराम का) हाथ किंचित् ढीला पड़ गया। वह बाण भी जाकर उनकी सारी तपस्या को सँजोकर लौट आया।

तब, स्वच्छ नीलरत्न-वर्णवाले ! मनोहर तुलसीमाला धारण करनेवाले ! सब के प्राणभूत पुण्यस्वरूप ! तुम्हारे संकल्पित सब कार्य अनायास ही पूर्ण हो जायेंगे। अब मुझे आज्ञा दो।—यह कहकर परशुराम प्रणाम करके चले गये।

पुनः प्राप्त प्रजावाले, विपदा से विमुक्त हो उल्लसित होनेवाले, मत्तगज की सेना-वाले (दशरथ) जो दुर्लंघ्य विपत्-सागर को पार कर चुके थे, अब आनन्द नामक वेलाहीन समुद्र में डूब गये।