भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

जिस भी जगह ध्यान लगाएँ, वहाँ का आकर्षण खींचता है। चुंबकीय ताकतों से वो खिंचता है; पर साधक की गुरू से बात नहीं होती है। जबकि विहंगम चाल में गुरु साथ होता है, उससे पूरी-पूरी बात होती है, सब स्थानों को बताते चलते हैं । इच्छा की तीव्र गति से चलना है तो गति तेज़ हो जाती है । इच्छा से ही बल मिलता है । जैसी इच्छा की, वैसे ही होता है । यदि रुकना चाहो तो वो भी हो जायेगा। जितनी गति चाहो, हो जायेगी । यह स्पीड लाजबाव होती है। इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। दसों मुकामों की यात्रा करता हुआ साधक चलता है । ब्रह्माण्ड के अंत में पहुँचता है तो उससे आगे अपनी ताक़त से किसी कीमत पर नहीं जा सकता है । यहाँ तक भी अपने योग से, परिश्रम से जाया जा सकता है। इसी से कहा- ररंकार खेचरी मुद्रा, दसवां ठिकाना । द्वार

ब्रह्मा विष्णु महेशादि ले, ररंकार को जाना॥

ररंकार तक अपनी ताक़त से जाया जा सकता है, आगे नहीं । जो विवरण मैंने दिये हैं, कोई भी नहीं दे सकता है । आप जब भी चाहें, शरीर से निकल सकते हैं। पर—

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

.....तो विहंगम में साधक बड़ी तीव्र गति से चलता है। जब निरंजन स्थान पर पहुँचता है तो वहाँ 4 करोड़ सूर्य का प्रकाश है, जिससे वो अपनी सुधि भूल जाता है। जैसे स्वप्न में मन अवस्था बदल देता है, ऐसे ही अवस्था बदल देता है । तब भूल जाता है। तभी सबने कहा- बेअंत .... बेअंत ..... बेअंत । वहाँ इतना आनन्द है कि सुधि नहीं रह जाती है । इतने गहन प्रकाश का स्रोत है, इसलिए ज्योति-स्वरूप कहा। इसी का वर्णन सब जगह है। यहाँ पर साधक की आत्मा को सद्गुरु अपने में समाविष्ट कर ले चलता है। वो पारदर्शी शरीर है; साधक सब देखता चलता है । जब शून्य पार हो जाता है तो फिर सद्गुरु उसे अपने वजूद से अलग करते हैं । वहाँ आत्मा प्रश्न पूछती है कि एक बात बताओ कि इतनी देर हम साथ-साथ चले, फिर आपने मुझे अपने में क्यों समाया था ? तो सद्गुरु कहते हैं कि वहाँ निरंजन का ज़ोर इतना है कि मेरे साथ होते तो भी वो खींच लेता। वो प्रभावित कर लेता, इसलिए मैं अपने में समाकर ले चलता हूँ। .....तो कोई, जो यह यात्रा किया हो और कोई कहे कि अपनी कमाई से गया तो उसे थोथा झूठ नहीं लगेगा क्या ? साहिब कह रहे हैं—

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गृह छोड़ भये सन्यासी, कोऊ न पावत पारा॥

यानी उन्हें अमर-लोक का कोई भेद नहीं है, जो कह रहे हैं कि अपनी कमाई से जाया जा सकता है । वहाँ तो कोई कृत ही नहीं है । साहिब I कह रहे हैं-

अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को.....॥

न कुछ किया न कर सका, न करने योग शरीर ।

जो कुछ किया सो साहिब किया, भया कबीर कबीर ॥

....तो आगे सुरति का सागर आता है । जो ध्यान आपके शरीर में काम कर रहा है, उसी का सागर है वहाँ । आप सोचें कि पूरी दुनिया का काम ध्यान से हो रहा है और वहाँ इसका सागर है । इस आत्मा को वहाँ स्नान करवाया जाता है। वहीं मन छूटता है । कोई पानी में डुबकी नहीं लगानी है । अत्यन्त प्रकाश का स्रोत है और पल में अरबों बार घूमकर बाहर आए तो कैसा है ! ऐसी क्रिया से मन छूट जाता है और जब वो आत्मा परम-पुरुष के सम्मुख होती है तो उसमें 16 सूर्यों का प्रकाश आ जाता है । फिर वो परम चेतन हो जाती है। ..... तो बाद जब कभी भी वहाँ जाना होता है तो इस तरह से नहीं जाता है। बीच के रास्ते लोप हो जाते हैं। गुरु की ऐसी कृपा ! सोचो, यह अपनी कमाई से हो सकता है ! कभी नहीं । इसलिए साहिब की वाणी बार-बार चेताती हुई कह रही है- -

हरि कृपा जो होय तो, नहीं होय तो नाहिं ।

कहैं कबीर गुरु कृपा बिन, सकल बुद्धि बह जाहिं ।।

अनहद शब्द या 52 अक्षर से परे निःशब्द ( सार नाम )

की बात कर रहे हैं

इस नाम के बिना हृदय शुद्ध नहीं हो सकता है।

नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥

पर यह नाम वो नहीं है, जो संसार के लोगों ने समझ लिया। धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं-

धर्मदास कहै सुनो गोसाई । पुरुष नाम कहऊ समुझाई ॥

सहस्रनाम जो वेद बखाना । नेति नेति कह बहुरि निदाना ॥

कौन नाम को सुमिरन करई । कैसे सदा पुरुष चित धरई ॥

कैसे आवागमन मिटाई । क्षर निरअक्षर कह समुझाई ॥

कहा कि वेदों में जो हज़ारों नाम हैं, यह नाम उनमें से कोई है या फिर कोई और! आप जिस नाम के सुमिरन के लिए कह रहे हैं, वो कौन सा नाम है, मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरा आवागमन मिटे । आगे साहिब ने कहा—

सुनु धर्मनि तुम हंस पियारे । तुम्हरो काज सकल हम सारे ॥

सुमिरन आदि मैं तुम्हें सुनावों । सकल कामना तोर मिटावों ॥

नाम एक जो पुरुष को आही । अगम अपार पार नहिं जाही ॥

वेद पुराण पार नहिं पावै । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धावै ॥

आदि कहौं तो को पतिआई । अंत कहौं तो परलै जाई ॥

आदि अंत में वासा होई । निरअक्षर पावै जन सोई ॥

अक्षर कह सब जक्त बखानै । निरअक्षर को मर्म न जानै ॥

वेद, पुराण भी इस नाम का भेद नहीं जानते हैं । दुनिया तो 52 अक्षर की सीमा वाले नामों को ही जानती है । आज के महात्मा लोग भी यही नाम दे रहे हैं। ये सब नाम तो वेदों में दिये गये हज़ारों नामों में से हैं, पर साहिब कह रहे हैं-

नाम पार वेदन नहिं पावा । नेति नेति कह सब गुहरावा ॥

ऐसे तो सभी को 15-20 नाम पता होते हैं । यदि इन नामों में से कोई होता तो फिर संतों को सद्गुरु की महिमा गाने की ज़रूरत नहीं थी । फिर तो किसी बच्चे से भी नाम लिया जा सकता था । कैसा है यह नाम ? फिर वाणी से समझा रहे हैं-

कहा न जाई लिखा न जाई। बिन सतगुरु कोउ नाहीं पाई ॥

सतगुरु मिलै तो अगम लखावै । हंस अमी पीवत घर आवै॥

अंकुरी जीव कहे निर्बाना । पावत हंस लोक पहिचाना ॥

सुरतिवंत पावै निज वीरा । संग रहौं मैं दास कबीरा ॥

जो कोई हंस प्रवाना लेई । अग्र नाम सतगुरु कहि देई ॥

बिन सतगुरु कोई नाम न पावै । पूरा गुरु अकह समझावै॥

अकह नाम वह कहा न जाई। अकह कहि कहि गुरु समझाई॥

समुझत लोक परै पुनि चीन्हा । जाते लोक होइ लवलीना ॥

हरदम सुमिरै चित्त लगाई । लोक दीप में जाइ समाई ॥

अजर अमर होइ लोक सिधावै । चौरासी बंधन मुक्तावै॥

आवागमन ताहि नहिं भाई । जरा मरण का बीज नसाई ॥

वो नाम कहने में नहीं आता है; वाणी का विषय नहीं है। वो लिखने में भी नहीं आता है। वो अकह है। बिना सद्गुरु के उसे कोई नहीं पा सकता है। पूरा गुरु होगा, वही समझा सकता है । उसी नाम को पाकर जीव चौरासी के बंधन से छूटकर अमर-लोक में जा सकता है। यह नाम और सद्गुरु का इतना गहरा संबंध क्यों है ? क्योंकि यह नाम अलौकिक है और इसे केवल सच्चे संत-सद्गुरु से ही प्राप्त किया जा सकता है। यदि यह नाम सांसारिक नामों में से कोई होता तो फिर संतों ने सद्गुरु की इतनी महिमा नहीं गानी थी । यह नाम पोथियों में नहीं मिलेगा। क्योंकि यह नाम 52 अक्षर से परे एक सजीव वस्तु है।

गुरु सजीवन नाम बताए। जाके बल हंसा घर जाए ।।

आजकल के झूठे संत जो नाम दे रहे हैं, उनसे हमारी आत्मा अमर लोक में नहीं जा सकती है, क्योंकि ये नाम तो वाणी का विषय हैं, 52 अक्षर की सीमा में आ जाते हैं, इन्हें हम भी जानते हैं । इस तरह ये नाम तो सबके पास हैं। तभी तो साहिब सतर्क कर रहे हैं- -

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय ।

मूल नाम जो गुप्त हैं, जाने बिरला कोय।।

संसार में करोड़ों नाम प्रचलित हैं, पर उनसे आप मुक्त नहीं हो सकते हैं । जो

सच्चा नाम है, वो गुप्त है; उसे कोई बिरला संत ही जानता है।

संतों के बिना इस मूल नाम (सजीव नाम) को नहीं पाया जा सकता है। चंदन अपनी महक स्वयं दूसरों तक पहुँचाने में समर्थ नहीं होता। सागर अपना जल स्वयं किसी को नहीं दे पाता। हवा ही चंदन की महक को अपने में समेटकर दूर-दूर तक ले जाती है और सारे वातावरण को सुवासित कर देती है । बादल जब सागर के जल को ऊपर ले जाकर बरसाते हैं तो पत्ता - पत्ता हरा हो जाता है, पपीहे प्रसन्न हो जाते हैं, मोर नाचने लगते हैं। इसी तरह संतों के बिना वो परमात्मा (परमपुरुष ) भी पंगु है।

साहिब के दरबार में, कर्ता केवल संत ।

कर्ता केवल संत, हुकुम में उनके साहिब ।।

संत-सद्गुरु ही परमात्म-तत्व को लाकर शिष्य के भीतर छोड़ते हैं । यही नाम कहलाता है । इस नाम के बिना कोई भी जीव संसार - सागर से पार नहीं हो सकता है । यही नाम अर्थात स्वयं परमात्मा जीव को इस संसार सागर से परे अमर-देश में ले जाता है । आगे फिर कह रहे हैं-

काल तिहकाल का भेद सुनाऊँ । धर्मदास मैं तोहि लखाऊँ ॥

हि अज्ञर का भेद निज पावै । निह अक्षर माहिं जाय समावै ॥

जो नहिं जान निअक्षर भेदा । ता महँ काल करत है छेदा ॥

निह अक्षर बिन काल न जीतै । यज्ञ दान के ता कर बीते ॥

योग यज्ञ तप काल पसारा । यज्ञ दान सब काल व्योहारा ॥

काल गति संसार है भाई । बिरला जन कोई लख पाई ॥

कह रहे हैं कि योग, यज्ञ, तप, दान आदि सब काल का व्यवहार है । जो निःअक्षर का भेद नहीं जानता, काल उसमें छेद कर सकता है। यानी वो अपूर्ण है, उसमें कमी है; काल कभी भी उसे अपना ग्रास बना सकता है। निः अक्षर के बिना काल को नहीं जीता जा सकता है, चाहे कोई कितने भी दान-पुण्य कर ले। 10वें द्वार से परे 11वें द्वार की बात कर रहे हैं कबीर साहिब से पहले संसार में 10वें द्वार तक की बात होती थी। साहिब ने संसार को आकर 11वें द्वार का अनुपम रहस्य दिया । वेदों में 10वें द्वार तक की बात है । इसलिए योगी लोक 10वें द्वार तक जाते थे जबकि योगेश्वर 10वें द्वार से निकलकर अनन्त ब्रह्माण्डों में घूम लेते थे; पर 11वें द्वार की ख़बर किसी को न थी । यदि आज के संतों को देखा जाए तो ना उन्हें सच्चे नाम का ज्ञान है और न ही 10वें द्वार का । फिर 11वें द्वार का ज्ञान होना तो बड़ी दूर की बात है । शरीर में नौ द्वार हैं। दो कानों के, दो आँखों के, दो नासिका के, एक मुख का तथा दो मल-मूत्र के । इस तरह शरीर में नौ द्वार हैं, जिनका ज्ञान सबको है। पर 10वें द्वार का भेद सभी को नहीं है। यह क्या है, समझते हैं । हमारे शरीर में इंगला और पिंगला नाड़ियों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी है । यही सुषुम्ना 10वें द्वार की ओर जाती है । हमारी नासिका में जो बायां

स्वर है, वो इंगला नाड़ी तथा जो दायां स्वर है, वो पिंगला नाड़ी कहलाती है । इनके मध्य में सुषुम्ना नाड़ी है, जो बंद पड़ी है । यह कफ से बंद है। हमने कभी इसका प्रयोग नहीं किया, इसलिए यह बंद है। यह शीश से सवा हाथ ऊपर तक जाती है। वहीं 10वां द्वार है । लेकिन सुषुम्ना 10वां द्वार नहीं है। वो तो 10वें द्वार तक जाने का एक माध्यम है। कुछ महात्मा लोग, जिन्हें 10वें द्वार का पूरा ज्ञान नहीं होता, उसे शीश के किसी एक विशिष्ट स्थान पर अंकित बताते हैं; लेकिन ऐसा नहीं है। बिलकुल नहीं । यदि यह किसी एक स्थान पर अंकित होता तो डॉ० या वैज्ञानिक लोग कभी का बता चुके होते। बिल्कुल बता चुके होते। इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि उनके पास बड़े आला यंत्र तथा माइक्रोस्कोप हैं और डॉ० लोग आप्रेश्न के मामले में भी बड़ी तरक्की पर हैं । वे ज़रूर शीश वाले 10वें द्वार को अपने छोटे-छोटे यंत्रों से खोल चुके होते और मानव को पूरा ब्रह्माण्ड दिखा चुके होते। लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ, क्योंकि यह 10वां द्वार किसी एक स्थान-विशेष पर अंकित नहीं है । इसका तो सृजन करना पड़ता है। खैर, छोड़ो, हम पहले 10वें द्वार का रहस्य देखते हैं। इसमें साधक प्रवेश कैसे करे ? यह कैसे खुले ?

इड़ा के घर पिंगला जाई, सुषुम्न नीर रहे ठहराई ॥

सुषुम्ना नाड़ी को खोलने के लिए वाणियों में बोला । सुरति के दण्ड से घेर मन पवन को । साहिब ने तो अत्यंत जनसाधारण की वाणी में कहा है। सुरति के सहारे पवन को ऊपर की ओर फेरो । पर जब मैं अन्य पंथों के लोगों से पूछता हूँ कि सुषुम्ना कैसे खुले तो कहते हैं कि यह नहीं बताना है । मैं कहता हूँ कि छुपाने वाली बात ही नहीं है । वो कहते हैं कि आगे का भेद नहीं देना है, गुरु जी ने मना किया है। यह तो वही बात हुई, जैसे किसी से पूछो कि पठानकोट जाने का रास्ता मालूम है ? कहे—हाँ । पूछो तो कहे कि सतवारी तक मेटाडोर से जाओ, आगे का देख लेना। तो इस तरह वो भी आगे चुप हो जाते हैं। बड़ी अटपटी बात लग रही है। तो यह कैसे खुले ? यह बंद पड़ी है। किससे पड़ी है बंद ? देखते हैं । शरीर के अन्दर बड़ी विविधता है । यहाँ रक्त भी है, मूत्र भी है, वीर्य भी है, मल का कोश भी है, पित्त का कोश भी है। इस तरह सुषुम्ना कफ़ से बंद पड़ी है। वहाँ

कफ़ ज़मा हुआ है। यह क्या है कफ ? कभी दमा हो जाता है तो कफ़ अधिक हो जाती है। कभी सर्दी-गर्मी से भी कफ़ हो जाती है । कफ़ का ठिकाना कहाँ है ? जहाँ इड़ा-पिंगला का बिंदू है, वहीं पर यह कफ़ बन रही है। इसलिए वो बंद है। निरंजन ने कफ़ से वो घाट बंद करके रखा है। यह कैसे खुले ? इंसान की एक समय में एक नाड़ी खुलती है । कभी इड़ा तो कभी पिंगला । दो स्वर उस दशा में चलते हैं जब शून्य से कफ़ हट जाता है। इस कफ़ ने सुषुम्ना को बंद करके रखा हुआ है । अब यह खोलें कैसे ?

मुर्शिदे कामिल से मिल, सिदक औ सबूरी से तकी ।

वो तुझे देगा फहम, दिलबर पे जाने के लिए॥

हमारी आत्मा प्राणों में रमी है। इन प्राणों में प्रमुख चार प्राण हैं । हरेक के चार उपप्राण हैं । प्राण यानी वायु । ये प्राण शरीर की नौ नाड़ियों और उनसे 72 कोठों में रमे हैं। जो चल रहे हैं, वायु का खेल है; जो बोल रहे हैं, वो भी वायु का खेल है; जो सुन रहे हैं, वो भी वायु का खेल है; जो भी काम कर रहे हैं, वायु है। ये 10 वायुएँ शरीर के विभिन्न हिस्सों में रहकर अलग-अलग काम कर रही हैं । अपान, समान, उदान आदि 10 वायुएँ हैं । जिस तरह बिजली तार पर चलती है, इसी तरह यह आत्मा प्राणों में समाई है | ये 10 प्राण हैं। ये कहाँ हैं? अपान वायु गुदा स्थान पर है। पेट से ख़ारिज करता है। यह भोजन को पकाती है। बड़ी ज़रूरी है । कुछ भी शरीर में फ़िज़ूल नहीं है । मलद्वार से निकलती है। यह है - ही है । जैसे गाड़ी चलती है तो फ्यूल-निकास के लिए पाइप लगी है। तो यह वायु जहाँ पहुँचेगी, नुक़सान करेगी। अगर हृदय में पहुँची तो हार्ट-अटैक हो सकता है, अगर सिर में पहुँची तो डिस्टर्ब कर सकती है। फिर उदान वायु कलेजे में रहती है। तीसरी प्राण-वायु हृदय में रहती है। चौथी सर्वतनव्याम वायु जोड़ों में रहती है । धनंजय वायु भुजाओं में और छाती में रहती है। लकबा भी वायु - विकार है । और समान वायु शरीर को मोटा होने से बचाती है। नाग वायु कंठ में रहती है। यह नींद लाती है। उबासी लेते हैं तो कंठ सिकुड़ता है। यही हवा नींद लाती है। यह बिगड़ गयी तो नींद नहीं आयेगी। किरकिल वायु नाक के अग्रभाग में रहती है। यह ट्रैफिक पुलिस की तरह काम करती है, बाकी वायुओं को मिलने नहीं देती है । इस प्रकार से 10 वायुएँ शरीर में अलग-अलग काम कर रही हैं । आत्मा इनमें रमी है । यह स्वांस कहाँ से चल रही है ?

शून्य से स्वांसा उठत है, नाभि दल में आय॥

यह शून्य से उठती है । मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय | जब भी चाहो, शरीर को खाली करके बाहर निकल सकते हैं। यह नहीं कि कोठरी खाली करवाई जायेगी, तभी निकलेंगे। खुद भी निकल सकते हैं। राजा जनक जानते थे यह विद्या । तभी विदेही कहे जाते थे । पर इस क्रिया से ब्रह्माण्ड के आगे नहीं जा सकते हैं। तो स्वांसा नाभि में जाती है तो नहीं जाने देते हैं । आजकल बिजली की कटौती है। पहले किसी मौहल्ले में देते हैं, फिर वहीं से बदलकर दूसरी जगह कर देते हैं । इसी प्रकार- पवन को पलट कर शून्य में घर किया । जब साहिब और गोरख की गोष्ठी हुई तो गोरखनाथ ने साहिब से पूछा- कबीर काया मध्ये सार क्या ?

साहिब ने कहा— काया मध्ये स्वांसा सार ॥

गोरखनाथ– कहाँ से स्वांसा उठत है, कहाँ को है जाय ॥

साहिब - शून्य से स्वांसा उठत है, नाभि दल में आय॥

गोरख - हाथ पाँव इसके नहीं, कैसे पकड़ी जाय ॥

साहिब— हाथ पाँव इसके नहीं, यह सुरति से पकड़ी जाय ॥

इसे मोड़ा जा सकता है । टॉयर में भी तो हवा भरी जाती है। यह सिस्टम है, जिससे हवा को इकट्ठा किया । इस तरह कह रहे हैं

सुरति से पकड़ी जाय ॥

आगे साहिब कह रहे हैं- सुरति के दण्ड से, घेर मन पवन को । फेर उलटा

चले ॥

सुरति रूपी डण्डे से मन और पवन को घेर कर इसका फेर उलट दो । ... फेर उलटा चले । धर औ अधर विच ध्यान लावै ।

कहैं कबीर सो संत निर्भय हुआ, जन्म औ मरण का भ्रम भानै ॥

इसी को गोस्वामी जी ने रामायण में कहा-

उलटा जाप जपा जब जाना । बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ॥

लोग सोचते हैं कि 'मरा' ' मरा' जपा था । नहीं, यह तो उलटा जाप था। पलटू साहिब कह रहे हैं-

अरे हाँ रे पलटू, ज्ञान भूमि के बीच में चलत हैं उलटी स्वांसा ॥

साहिब कह रहे हैं—

पवन को पलट कर, शून्य में घर किया ।

धर में अधर भरपूर देखा ॥

कहैं कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्ये दीदार देखा ॥

सुषुमना कैसे खुले ? यह बंद है कफ़ से । शरीर में कफ, पित्त और वायु हैं। साहिब कह रहे हैं-

गगन की गुफा को पवन से साफ कर ॥

, यह गुफा कौन सी है ? दम ही दम में ले अजूबा 11 कैसे साफ़ करें ? पंखा लगाना है क्या ? यह गगन की गुफा पवन से कैसे साफ़ करें ? वाणियों में लिखा है, पर पूरा गुरु न समझाए तो समझ नहीं आयेगी। यह स्वाँस, नाम एक करना है। स्वाँस में गर्मी है। आप दौड़ते हैं तो शरीर गर्म हो जाता है। गर्मी से कफ़ पिघलता है । इस तरह स्वाँस - नाम एक करने से स्वाँसा की गर्मी से कफ़ पिघलने लगता है । जब भी बंकनाल से कफ़ पिघलेगा तो एक आवाज़ आयेगी, जैसे नाखून बजाते हैं। ऐसी बारीक आवाज़ आयेगी। कफ़ को भेदती हुई वायु ऊपर जायेगी। यदि साधक यह क्रिया कर रहा है तो गुरु का सान्निध्य चाहिए। जैसे- जैसे स्वाँसा उर्द्धमुख होती जायेगी, साधक को गुरु के सान्निध्य की ज़रूरत पड़ेगी। साधक को लगेगा कि कोई ताक़त ऊपर की ओर खींच रही है । स्वाँसा की गर्मी से कफ़ पिघल जाता है । पर मन कभी नहीं चाहता है कि आप वहाँ पहुँच पाएँ। क्योंकि जानता है कि यदि पहुँच गया तो वो समझ में आ जायेगा और जगत ख़त्म हो जायेगा । इसलिए मन ने भ्रमित किया है।

सुषुम्न मध्ये बसे निरंजन, मूँधा दसवाँ द्वारा ।

उसके ऊपर मकरतार है, चढ़ो सम्हार सम्हारा ॥

मन इतने स्टॉइल से आपको ले जायेगा कि पता भी नहीं चलेगा। ऐसे में साधक क्या कर सकता है ? कभी भयभीत हो जाता है। फौरन मन ध्यान को कहीं ले जाता है। किसी चीज़ का दुख है तो वहाँ ले जायेगा। इतने में जो पवन

ऊपर चढ़ी थी, नाभि में आ जाती है । कोई साढ़ियाँ चढ़ता जा रहा हो, चढ़ता जा रहा हो और ऊपर जाकर गिर पड़े तो क्या हाल होगा ! इस तरह साधक नीचे गिर पड़ता है। इसलिए सावधान रहना है। धीरे-धीरे आनन्द भी आने लगता है। ध्यान हट गया तो कुछ भी नहीं है । मन - माया की तरंगें हैं । लहरें उठती हैं। मन तरंगें उठाकर अन्य - अन्य चीज़ों में ले जाता है । फिर बंदा सोचता है कि गुरु की मेहर नहीं है। मन की कोशिश है कि उस बिंदू तक आने नहीं देता है । उसका प्रयास रहता है कि संसार - सागर में ही भटकता रहे। वो अनेक तरह के भाव अन्दर में लाता है और भटका देता है । पर यदि साधक एकाग्र रहे तो स्वाँसा सिमटती जाती है। मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय |

ऐसी मरनी न मुआ, बहुरि न मरना होय ॥

साहिब कह रहे हैं—

जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द ।

कब मरहूँ कब पाउहूँ, पूरन परमानन्द॥

कभी-कभी लगता है कि मौत वाली हालत हो गयी है। मुट्ठी बंद करने लगो तो बंद नहीं होती है। कुछ आकर कहते भी हैं कि डर लग गया। सुषुमना में सभी वायुएँ समाती हैं, तभी जाकर वो खुलती है। कफ़ हट जाता है । कुछ कहते हैं कि बड़ी मौज थी, पर फिर गुम हो गयी । वहाँ कुछ नहीं सोचना है ।

मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मरतबा चाहे ।

कि दाना खाक में मिलकर, गुले गुलज़ार होता है ॥

पलटू साहिब कह रहे हैं-

पलटू पहले मर रहा, पाछे मुआ जगत ॥

यह है - जीते-जी मरना । तो धीरे-धीरे स्वाँसा सिमटती जाती है। मुश्किल मन को लगता है । कोई दौड़ना भी नहीं है, तैरना भी नहीं है, केवल बैठना ही है- एकाग्रता से । साधक को धीरे-धीरे लगता है कि शरीर ही नहीं है। फौरन कल्पना करने लगता है कि भटक तो नहीं गये ! मन ऐसा चिंतन भी करवाता है। सोचता है कि मरने लगा हूँ । ये शंकाएँ उत्पन्न होती हैं। मन की कशिश होती है कि ध्यान को हटा दे। धीरे-धीरे एकाग्र होता जायेगा । शरीर पथरा जायेगा। साधक फौरन शरीर को ढूँढ़ने लगता है।

मृतक होय के पावे संता ॥

ऐसा लगेगा कि कुछ भी नहीं रहे हैं । जीवन की इच्छाएँ मण्डराने लगती हैं। कुछ तो वापिस आने के लिए मचलने लगते हैं। अगर रुकता है तो धीरे-धीरे स्वाँसा सिमटती जाती है । लगेगा कि

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

पाँव भी नहीं हिल सकता है । मन कहता है कि स्वाँसा कहाँ जा रही है। वो

बड़ी भ्रांतियाँ उत्पन्न करता है । इच्छा, कल्पना आदि में भटका देता है । इसी ने

10वाँ द्वार रोका है ताकि निकल न पाए।

गफलत नहीं तहाँ होशियार देखना ॥

यहाँ लग्न की ज़रूरत है ।

जहँ खोजा तहँ पाइया, गहरे पानी पैठ ॥

धीरे-धीरे पता चलने लगता है कि मैं तो शरीर नहीं हूँ। कुछ आश्चर्य भी लगने लगता है। यह सब चेतन अवस्था में हो रहा होता है; लगता है कि कोई चेतन चीज़ सिमट रही है। दिखती नहीं है, पर लगता है कि हूँ । मन बहुत भटकायेगा, कहेगा कि टाँगें सीज़ हो गयी हैं । कहेगा कि

गहरे अँधकार में जा रहे हो । सहज जन जानो साईं की प्रीत ॥

मन की कोशिश होती है कि पलट । कई बार तो पूरा जीवन भी लग

जाता है। तहाँ सिलहली गैल ॥

स्वाँसा में भी अटके हैं । यह लेना भी भ्रम है। धीरे-धीरे स्वाँस शरीर से सवा हाथ ऊपर अष्टम-चक्र तक पहुँच जाती है। वहीं जीवन - शक्ति है।

वहाँ तक खिंचती है। सुरति कमल सतगुरु को वासा ॥

धीरे-धीरे एकाग्र हो जाता है । मन कहता है कि पक्के मर चुके हैं । कहता है कि स्वाँसा भी नहीं है | बहुत शातिर है मन । इसी ने भ्रमित किया है।

जीव के संग मन काल रहाई । अज्ञानी नर जानत नाहीं ॥

एक शून्य बन जाता है। फील होता है कि कुछ हूँ ।

पवन को पलट कर, शून्य में घर किया, धर में अधर भरपूर देखा ॥

कहैं कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्ये दीदार देखा ॥

यहाँ एक नुकते में गल मुकती है। इस पर साहिब कह रहे हैं- खसखस के दाने के अन्दर, शहर खुदा का बसता है । कस्त करे ऐनों के तिल में, वहीं से उसका रस्ता है ।

रूह रहकाने में ठहराए, सोइ मुकुर में दस्ता है ।

पर बिन मेहर मुर्शिद के, तू नाहक में ही पचता है ॥

इसी के लिए कह रहे हैं-

शून्य महल की फेरी देही, सो वैरागी पक्का होई ॥

जब जीरो पलट जाती है तो प्रज्ञावस्था में चला जाता है। बाकी कोई खिड़की नहीं खुलती है । ऐसा होता तो वैज्ञानिकों ने कभी का बता देना था। यह हुआ 10वाँ द्वार खुलना । कल्पनाओं से परे यह सत्य है। तो अब साधक को पता चल गया कि कैसे जाना है । पर कभी एक बार जाकर भी दुबारा नहीं पहुँच पाता है। जैसे कभी कहीं जाकर भी तो आप भूल जाते हैं । जब रोज़ आना जाना रहता है तो बीच के पड़ाव भी याद रहते हैं । इस तरह महापुरुष तो आते-जाते रहते हैं । तो यहाँ से निकलने पर एक शरीर मिलता है। एक रूहानी सफ़र शुरू हो जाता है । कभी लेटे-लेटे भी हो जाता है। महापुरुषों ने सफ़र किया। साहिब कह रहे हैं- खेल ब्रह्माण्ड का, पिण्ड में देखिया, जगत की भ्रमना दूर भागी ।

बाहरा भीतरा एक आकाशवत, सुषुम्ना डोर तहाँ पलट लागी ॥

इस प्रकार साधक आंतरिक लोकों का भ्रमण करने के बाद पुनः अपने शरीर में वापिस आ जाता है, क्योंकि 10वें द्वार से चले जाने पर भी एक अंश हमारे शरीर में रहता है, इसलिए साधक वापिस आ जाता है । आओ, अब चलते हैं 11वें द्वार की ओर । कहाँ है यह? कैसे प्रवेश करें इसमें? नौ द्वारे संसार सब, दसवें योगी साध ।

एकादश खिड़की बनी, जानत संत सुजान।।

कबीर साहिब से पहले 11वें द्वार की ख़बर किसी को नहीं थी । इसी 11वें द्वार का संबंध सत्य - भक्ति से है, क्योंकि इसमें से निकल जाने पर आत्मा अपने सही मुकाम पर पहुँच जाती है । उसके बाद उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है कि पुनः शरीर में वापिस आए या नहीं । यह 11वां द्वार हमारी सुरति के अन्दर है । अब सवाल यह है कि यह खुले कैसे ? यह गुरु- कृपा से खुलता है । मात्र गुरु- कृपा से । करोड़ों साल तपस्या करते रहने पर भी यह नहीं खुल सकता । यही कारण है कि बड़े - बड़े योगी भी 10वें द्वार तक ही रह गये । यह अपने ज़ोर से नहीं खुलता। जैसे डॉ० अपना ऑप्रेशन स्वयं नहीं कर सकता, इसी तरह बिना सद्गुरु के यह काम नहीं हो सकता। जब गुरु और शिष्य में एकरसता आ जाती है, तब यह काम पूरा हो जाता है। तभी तो साहिब कह रहे हैं-

तीनों त्रिधारा बनीं, आगे गंगा गुरु शिष्य और ईश्वर, मिल कीना भक्ति विवेक । एक ।।

9. पंथ के नियम

पंथ के नियम

जो भी हमारे पंथ में आता है, उसे निम्नलिखित सात नियमों का पालन करना पड़ता है। 1. हमेशा सत्य बोलना 2. माँस नहीं खाना 3. नशा नहीं करना 4. चोरी नहीं करना 5. चरित्रवान् रहना 6. जुआ नहीं खेलना 7. हक की कमाई खाना सत्य बोलना साँच बराबर तप जाके हृदय साँच है, नहीं, झूठ बराबर हृदय आप ॥ पाप । सच से बड़ा तप ही नहीं है। झूठ से बड़ा पाप नहीं है। जिस हृदय में सच्चाई नहीं, वहाँ प्रभु नहीं आता, इसलिए सच कितना ज़रूरी है ! मजाक में भी झूठी बात नहीं कहना । किसी को वायदा भी मत करना कि कल या परसों आपके पास आऊँगा या आऊँगी। यदि शरीर छूट गया तो ! फिर अमर-लोक नहीं जा पाओगे, पुनर्जन्म लेना पड़ जायेगा वादा निभाने के लिए। इसलिए कहना कि यदि साहिब की मौज हुई तो आऊँगा । सत्य का पालन बड़ी मजबूती से करना । सत्य के आठ अंग हैं। असत्य से बहुत बड़ा नुक़सान है। शराब पीने से भी अधिक है। झूठे की बुद्धि अच्छी नहीं हो सकती। कितना भी बुद्धिमान शराबी होगा, उससे उम्मीद नहीं रखना कि ठीक काम करेगा। नहीं कर सकता है । हमारे मस्तिष्क की कोशिकाओं

पर असर पड़ता है । कभी अक्लमंद नहीं हो सकता है। नशे का असर सीधा दिमाग़ के सोचने की ताक़त पर पड़ता है । इससे कहीं ज़्यादा झूठ बोलने से पड़ता है। झूठ बोलना हमारी आत्मा, हमारे अंत: करण के लिए हानिकारक है । स्वाभाविक हमारा मस्तिष्क, हमारा हृदय सत्य बोलने वाला है । बच्चे सत्य बोलते हैं। झूठ इंसान दो कारणों से बोलता है - पहला तो अपने दोषों को छिपाने के लिए और दूसरा स्वार्थवश यानी अपने भले के लिए दूसरों का नुक़सान कर बैठते हैं । कभी देखते हैं कि माँ से कोई चीज़ घर की टूट गयी, तो बच्चे को कहती है कि पापा को नहीं बताना । वो बच्चा भी झूठ सीख जाता है, सोचता है कि इससे बचा जा सकता है, झूठ हमारी रक्षा कर सकता है। वो बचपन में ऐसा सीखता है । यानी झूठ उसे सिखाया जाता है । स्वभाव से वो झूठ बोलने वाला नहीं था । झूठ से कोशिकाएँ कमज़ोर होती जाती हैं, इसलिए उससे उम्मीद नहीं रखना। सत्य पर चलना बहुत बड़ा तप है । साहिब ने तो कहा-

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।

जाक हृदय साँच हैं, ताक हृदय आप।।

'सत्य समान धर्म नहीं आना ।' हमारे शास्त्र सत्य समान मान ही नहीं रहे हैं और कोई धर्म । कहीं भी रहने वाला हो, जो इस संस्कृति का पालन करने वाला है, वो हिंदू है । देखते हैं, सत्य के आठ अंग हैं- - - सत्य बोलना, सत्य चलना, सत्य सोचना आदि । कभी किसी माता - बहन को देख कुछ ग़लत सोचते हैं। अपनी के विषय में नहीं सोचने देते हैं दिमाग़ को । इसका मतलब, , आपकी सोच कहीं काबू में है, कहीं आप ढीले हो जाते हैं । इसलिए चिंतन सत्य हो । फिर दाना भी झूठा न हो। यह भी सत्य खाना । एक राजा और एक महात्मा बचपन के दोस्त थे । महात्मा का भी एक बेटा था और राजा का भी एक बेटा था । राजा मर गया । महात्मा का शरीर भी छूट गया। राजा का बेटा गद्दी पर बैठा। वो राजा बना। उधर महात्मा के बेटे ने भी शादी नहीं की; वो महात्मा बना । दोनों की दोस्ती थी । महात्मा को राजमहल में आने-जाने की पूरी छूट थी । एक दिन राजा का हीरा गुम हो गया। वो दुखी हो गया। बड़ा ढूँढ़ा । जब नहीं मिला तो रानी ने कहा कि महात्मा ने लिया होगा। वो बड़ा नाराज़ हुआ, कहा कि ऐसा नहीं कहना । वो

चुप हो गयी। वो फिर-फिर ढूँढ़ता था । कीमती चीज़ गुम हो जाए तो परेशानी होती है । रानी ने कहा कि देखो, हमारा महल है, यहाँ तीसरा वो ही आता है, और कोई नहीं। मैंने चुराया नहीं । जो आपका है, मेरा है। कमरे में हीरा है नहीं तो महात्मा ने ही लिया होगा। वो अपनी बात पर ही अड़ रही थी । राजा कह रहा था कि उसने कभी चोरी नहीं की। इतने में महात्मा आ गया, कहा कि यह लो हीरा, कल मैं चुराकर ले गया था; अब मैं आपके महल में नहीं आऊँगा, क्योंकि मैं चोर हो गया । राजा भी ज्ञानी था, कहा कि नहीं, दोस्ती का इम्तिहान मत लो । महात्मा ने कहा कि मैं सच कह रहा हूँ । राजा ने कहा कि कल आपने रोटी कहाँ खाई थी? कहा कि सुनारे के यहाँ । राजा ने कहा कि वो ग़लत भोजन आपने खाया, इसलिए आपके दिल में ग़लत सोच आ गयी । आपने हीरा चुरा लिया। फिर जब सुबह खाना मलद्वार से बाहर हुआ तो आपका हृदय दुबारा शुद्ध हो गया और आप हीरा वापिस करने आ गये। यह दाने का खेल था; आप चोर नहीं हैं । तो इस तरह फिर सत्य संकल्प हो, सत्य व्यवहार हो, सत्य कर्म हो, सत्य संभाषण हो, सत्य सुनना हो । आहार आपका शुद्ध होगा तो बुद्धि शुद्ध होगी, बुद्धि शुद्ध होगी तो ज्ञान शुद्ध होगा, ज्ञान शुद्ध होगा तो ध्यान शुद्ध लगेगा और ध्यान शुद्ध लगेगा तो मोक्ष की प्राप्ति होगी । माँस नहीं खाना हिंदू धर्म सत्य और अहिंसा पर चल रहा है। यह धर्म कह रहा है हिंसा मत करो, किसी को मारो नहीं। इसलिए जो माँस खा रहा है, वो धर्म से नीचे आ गया। उसने धर्म तोड़ दिया। वो धार्मिक कैसे रहा ! नहीं रहा । साहिब कह रहे हैं-

माँसाहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जान ।

ताकी संगत न करो, होय भक्ति में हानि ।।

लोग कह रहे हैं कि हम हिंदू हैं। पता है, मैं क्या कह रहा हूँ ! हम ही हिंदू हैं; क्योंकि सत्य और अहिंसा इसके दो सिद्धांत हैं और हम पूरे चल रहे हैं इसके सिद्धांतों पर। माँस खाने वाला तो मेरे विचार से हिंसक हो गया। वो हिंदू नहीं रहा।

मुम्बई में प्रोग्राम हुआ तो मैंने पूछा कि जो माँस खाता है, हाथ खड़ा करे। एक ने खड़ा किया। मैंने पूछा कि क्यों खा रहे हो ? कहा कि खाने की चीज़ है; सभी खा रहे हैं। मैंने कहा कि यह खाने की चीज़ तो नहीं है। उसका तर्क था कि 90 प्रतिशत लोग माँस खा रहे हैं; केवल 10 प्रतिशत लोग नहीं खा रहे हैं। मैंने तर्क दिया, कहा- सुनो ! सच में यह खाने की चीज़ नहीं है । माँस खाना ईश्वरीय अपराध है; माँस खाना I वैज्ञानिक अपराध भी है । माँस खाना बहुत बड़ा अपराध है । ईश्वरीय अपराध इसलिए हुआ कि धर्म कह रहा है कि सभी प्राणियों में एक आत्मा है। तो सोचो कि आपको कोई टुकड़े-2 करके खाए तो कैसा लगेगा! वैज्ञानिक अपराध इसलिए है कि संसार में शाकाहारी और माँसाहारी जीवों की अपनी - 2 पहचान है । माँसाहारी जीवों की आँखों में ऐसा सिस्टम है कि रात को रोशनी बहुत बढ़ जाती है, अपना शिकार देख लेते हैं। दिन में उनकी आँखें जलती हैं; फिर वो पानी जीभ से उठाकर पीते हैं; उनके नाख़ून गोल होते हैं, ताकि शिकार पर अपने नाख़ून गाड़ सकें; उनके दाँत भी गोल और नुकीले होते हैं; उनमें ज़हर होता है। लेकिन दूसरी ओर शाकाहारी जीवों की आँखें दिन में जलती नहीं हैं; पानी भी निगल पर पीते हैं, नाख़ून भी गोल न होकर चौड़े होते हैं; दाँत भी चौड़े होते हैं, ज़हरीले नहीं होते । जैसे चीता, बिल्ली, शेर, सियार, नेवला आदि माँसाहारी जीव हैं । ये सब अपने नियम पर चल रहे हैं । कोई शेर किसी की गोभी लेकर भाग गया हो.... मैंने नहीं देखा । कोई कुत्ता किसी के आलू खा रहा हो.... मैंने नहीं देखा। ये नियम पर हैं। वनस्पति जगत इनका विषय नहीं है । मैंने 60 साल में नहीं देखा कि कोई बंदर किसी पक्षी को खा रहा हो । कभी नहीं देखा है कि कोई भैंस किसी मुर्गी को खा रही हो । आपने भी नहीं देखा होगा। वो शिष्ट हैं। फिर इंसान अपने नियमों से बाहर क्यों जा रहा है ! इसके नाख़ून भी चौड़े हैं, ज़हर भी नहीं है इसमें । क्यों अपने नियम पर नहीं चल रहा है!

माँसाहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जान ॥

ठीक ही तो कहा। अब वैज्ञानिक अपराध इसलिए कहा कि इंसान का पाचन-तंत्र ऐसा

है कि यदि माँस खायेगा तो रोग आयेंगे।

जब मैंने उस लड़के को समझाया तो उसने कहा कि आज के बाद नहीं खाऊँगा; मुझे इसका पता नहीं था । मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ। मैं फौज में भी अपने हिसाब से रहा। जब माँ बनता था तो अपना अलग से बना लेता था। प्लेन में भी मैं कुछ नहीं खाता हूँ । कभी वो पूछते भी हैं कि आप कुछ नहीं खा रहे । तो मैं समझाता हूँ कि आप उन्हीं हाथों से माँस की प्लेट भी उठा रहे हैं, उन्हीं हाथों से जूठन भी उठा रहे हैं, पानी भी उसी हाथों से उठा रहे हैं ।

जैसा खाओ अन्न, वैसा होय मन ।

जैसा पीओ पानी, तैसी होय वाणी॥

एक जगह संतमत वाले की दुकान थी। मुझे कुछ सामान लेना था। उसने अपने गुरु का फोटो भी लगाया हुआ था । इतने में मेरी नज़र वहाँ अण्डों की ट्रे पर पड़ी। मैंने कहा कि रुको, यह क्या है ! आप तो फ़लाने महात्मा के भक्त हैं । वो कहा कि ग्राहक आता है, सामान लेता है, फिर कहता है कि एक दर्जन अण्डे डाल दो। अब यदि अण्डे नहीं हैं तो वो कहता है कि मैं जब सामान लेकर दूसरी दुकान पर अण्डे लेने जाता हूँ तो वो कहता है कि वहीं से ले, जहाँ से सामान लिया । इसलिए यदि अण्डे नहीं होंगे तो मैं आपसे सामान नहीं लूँगा। तो रखने पड़ते हैं महाराज । देखा न, उसने समझौता कर लिया। 8 आदमी माँसाहार में दोषी हैं । पहला तो पालने वाला । इसलिए कहता हूँ कि नहीं पालना । आपको मुर्गी, बकरी भी नहीं पालनी है । किसी पक्षी को कैद करके नहीं रखना है और माँस का व्यापार भी नहीं करना है, अण्डे भी दुकान पर नहीं रखने हैं । यदि ' 'आत्मवतन सर्वभूतेशू' की बात की तो यह काम नहीं करना है । फौज में भर्ती से पहले अण्डरवीयर में खड़ा किया जाता है, देखा जाता है कि घुटने तो नहीं मिल रहे। हाथ ऊपर करवाए जाते हैं, देखा जाता है कि कितना फिट है, कहीं पेट तो बाहर नहीं है । अब वहाँ दौड़ना है; फिटनेस चाहिए। घुटने मिल रहे हैं तो भागेगा क्या! गिर पड़ेगा । इस तरह भक्ति में माँसाहार की जगह नहीं है । आज आदमी बेरोकटोक भक्ति करना चाहता है । जिस भक्ति में सिद्धांत नहीं है, वो भक्ति, भक्ति है ही नहीं ।

खेलना हो तो खेलिये, पक्का होकर खेल ।

कच्ची सरसों पेर के, खड़ी भया न तेल ॥

नशा न करना सबसे ख़तरनाक नशा शराब का मानता हूँ। यह आदमी को जानवर से भी नीचे पहुँचा देती है। शराबी से कभी भी अच्छे काम की उम्मीद नहीं रखना। कभी-न-कभी उसका दिमाग़ ख़राब होगा ही । शराब का नशा लगता है कि सुबह उतर गया; पर वास्तव में वो नहीं उतरता है इतनी जल्दी। एक आदमी रोज़ दारू पीता हो तो तीन दिन न पिए तो उसे चक्कर आने लगेंगे । यदि वो 21 दिन तक शराब न पिए तो समझो क उसका 50 प्रतिशत नशा उतर गया। यानी 50 प्रतिशत अभी भी रहा । यदि 6 महीने तक नहीं पिया तो समझो कि 25 प्रतिशत रह गया । नशा है लेकिन । ढाई साल तक नहीं पी शराब तो समझना कि 12.50 प्रतिशत रह गया है अब । 7 साल बाद गौण हो जाता है । पर 14 साल तक नशे का अंश रहता है। ऐसे ही नहीं जाता है शराब का नशा । एक दिन मैं अंबाला से आ रहा था तो रोड़ किनारे गोबर का ढेर लगाया था किसी ने। बहुत बड़ा ढेर था। नेश्नल हाईवे तक टच कर रहा था वो। एक बंदा उसपर उलटा सोया था। शराब पीने वालों की हालत ऐसी होती है कि स्टाइल भी बड़ा अजीब हो जाता है । मैंने गाड़ी रोकी, सोचा कि किसी का बेटा होगा, किसी का भाई होगा । वो बिलकुल रोड़ पर ही था। मैंने कहा- उठो ! ग़लत सोए हो। वो कहा कि नहीं, आप जाओ, मैं ठीक हूँ। वो नशे में था। मैंने ड्राइवर के साथ उसे उठाया और कुछ दूर लिटा दिया। मानुष से पशुआ करे, द्रव्य गाँठ का देही॥ अवगुण कहूँ शराब का ज्ञानवंत सुन लेहिं । शराब के विषय में एक रूसी कहावत है कि एक किसान था । वह बड़े शांत स्वभाव का था । उसे कभी किसी पर गुस्सा नहीं आता था। एक राजा ने सोचा कि इसे गुस्सा दिलवाते हैं। उसने एक शैतान को यह काम सौंप दिया।

एक दिन किसान अपने खेत में हल चला रहा था । शैतान ने आकर उसकी रोटी कुत्तों को दे दी । लेकिन यह क्या! किसान को तो गुस्सा नहीं आया । वह शांत ही रहा । शैतान ने वापिस आकर राजा को सारी बात बता दी। राजा ने उसे पुनः वापिस किया। अबकी बार शैतान नौकर बनकर आया; उसके यहाँ नौकर हो गया; जान-बूझकर आड़े- टेढ़े काम करने लगा, जिससे किसान गुस्सा हो जाए, पर किसान तो जैसे शांति का देवता ही था; उसने गुस्सा नहीं किया। ....... जमींदार के बेटे की शादी तय हुई। शैतान ने एक शराब तैयार की; उसमें चार जानवरों का खून मिलाया । फिर उसने जमींदार साहब को सब मेहमानों को शराब पिलाने की सलाह दी । भोज हुआ; सबने शराब पी। किसान ने भी पी। दो-चार व्यक्ति नशे में आकर एक-दूसरे को गालियाँ देने लगे; मारपीट शुरू हो गयी। किसान बेचारा सबको समझाता रहा, पर वे नहीं माने। अब किसान पर शराब का असर शुरू हो गया; उसे गुस्सा आ गया; लाठी उठाकर सब पर बरसाने लगा । इतने में शैतान गायब हो गया । सब हैरान रह गये। अब शैतान राजा के पास आया; अपनी सफलता का समाचार दिया । राजा ने उसे शाबाशी देते हुए उसकी सफलता का रहस्य पूछा। शैतान ने बताया कि उसने एक शराब बनायी; उसमें लोमड़ी, कुत्ते, शेर और सुअर का खून मिलाया । इसी शराब के कमाल से शांति के देवता - समान किसान को भी गुस्सा आ गया। यह थी - शराब की कहानी । प्रत्येक शराब पीने वाला व्यक्ति ऐसा बन ही जाता है। पहले तो लोमड़ी की तरह स्यानी - स्यानी बातें करता हैं, क्योंकि तब उसमें लोमड़ी का खून असर कर रहा होता है । फिर थोड़ी देर में कुत्ते का खून असर करना शुरू हो जाता है; इसलिए ज़ोर-ज़ोर से भौंकना - चिल्लाना शुरू कर देता है । फिर शेर की तरह बनकर मारपीट शुरू कर देता है और अंत में सुअर की तरह बेहोश होकर किसी गंदी नाली में गिर पड़ता है। प्रत्येक शराब में अल्कोहल पाया जाता है, जो हल्का ज़हर है । यही नशा पैदा करता है। जिसमें विष अधिक होता है, वही शराब अच्छी मानी जाती है। अच्छा, लोग शराब क्यों पी रहे हैं ? क्योंकि शुरू-शुरू में इसे पीने से

दिमाग़ में कँपकँपी, एक गुदगुदी - सी होती है, तो शराबी सोचता है कि मज़ा आ रहा है। पर उसे नहीं पता है कि यह मज़ा धीरे-धीरे उसे विनाश की ओर ले जा रहा है। शराब दिमाग़ ख़राब कर देती है । जो भी शराब पीने वाला है, उससे हमें कभी अच्छे काम की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि उसका दिमाग़ कभी भी ख़राब हो सकता है; वो मूर्ख के समान ही होता है। उसका दिमाग़ कभी भी एक नेक इंसान का दिमाग़ नहीं रह सकता है। अधिकतर रोग भी शराब पीने वालों को सताते हैं । आर्थिक हालत भी ख़राब हो जाती है। एक तो इतना मँहगी शराब और फिर जब दिमाग़ ख़राब होगा तो कहीं पत्नी की बाजू मरोड़ेगा, कहीं बच्चे का हाथ तोड़ेगा । उनके ईलाज के लिए जो पैसा लगेगा, वो अलग। साहिब ने कितना सुन्दर कहा है- अवगुण कहूँ शराब का ज्ञानवंत सुन लेहिं ।

मानुष से पशुआ करे, द्रव्य गाँठ का देहि ॥

तो फिर कुछ चीज़ों की तोड़-फोड़ करेगा, वो नुक़सान अलग। भाइयो, आपकी शराब छुड़ाकर अपको अमीर बनाना है । नाम की दौलत तो मिलेगी ही, पर सांसारिक दृष्टि से भी आप अमीर हो जायेंगे । किसी भी प्रकार का नशा ठीक नहीं। यह शैतानी काम है। कुरान शरीफ में लिखा है कि आदमी को नशे में रखकर उससे बुरे काम करवाकर शैतान उसे जहन्नुम में ले जाना चाहता है।

भाँग तमाकू, धूतरा, जन कबीर जे खाहिं ।

जोग यज्ञ जप तप किये, सबै रसातल जाहिं ।।

तो इस तरह सिगरेट भी ठीक नहीं है । पर मैंने यह मना नहीं किया । है तो यह भी ख़तरनाक, पर इतना नहीं, इसलिए थोड़ी छूट दी । यदि हो सके तो इससे भी बचना। नशा आपको अमली बना देगा और फिर आप ध्यान -भजन में भी ठीक से नहीं बैठ पायेंगे । चोरी न करना एक आदमी चोर था। वो मुझे बड़ा प्यार करता था । था भी बड़ा धर्मात्मा और परमार्थी। वो चोर ग़रीबों की मदद भी करता था। किसी दुखी को देख दुखी हो जाता था। 20 साल पहले की बात है; उसने मुझे 100 रूपये का