भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

नोट दिया। मैं बाहर जा रहा था। कहा कि इस पैसे से फल और रोटी खाना । मैं चुप रहा। फिर उसने हामी भराने का प्रयास किया, कहा कि खाओगे न ! मैंने झूठ तो बोलना नहीं था, कहा कि नहीं। पूछा- क्यों? मैंने कहा कि तुम्हारा पैसा हक का नहीं है। वो दुखी हो गया, कहा कि आपने तो आज दिल ही तोड़ दिया। मेरा पैसा तो फौजी से भी मेहनत का है। रात को किसी के घर में घुसकर पैसे निकालना आसान काम नहीं है । कभी पकड़े भी जा सकते हैं; धुनाई होती है। कभी पुलिस से डरकर भागना पड़ता है, कभी छत से छलांग भी लगानी पड़ती है। बड़ा कठिन काम है। पराए घर में जाकर चॉबी ढूँढ़ना, न मिले तो ताला तोड़ना, फिर भागना, यह बड़ा ही कठिन काम है। मैंने कहा कि सुन, आदमी धन कमाता है, बेटी या बेटे की शादी के लिए जोड़ता है। तुम उसे चोरी कर लेते हो । उसका दिल कितना दुखता होगा! कहा कि सही बात है । वो बोला कि मैं आपके बिना रह नहीं पाता हूँ; यदि आप कह रहे हैं तो मैं यह काम छोड़ देता हूँ, पर मुझे कोई और काम नहीं आता है और मेरा खर्चा भी बड़ा है। वो किराए के मकान में रहता था। उसके कपड़े भी धोबी धोता था। फिर उसने लकड़ी फाड़ने का काम शुरू किया। 10-20 रूपये कुण्टल मिल जाते थे । फिर एक दिन कहा कि किराया भी नहीं दे पा रहा हूँ, बच्चों की फीस भी नहीं दे पा रहा हूँ, बड़ा उधार हो गया है, एक दाँव लगाने दो। मैंने कहा कि तू घबरा नहीं। मैंने उसे मकान बनाकर दिया। मैंने कहा कि तू आश्रम में रह जा, मैं तेरी जिम्मेवारी लेता हूँ। तेरी बीबी को राशन बगैरह मैं भिजवा दूँगा। मैंने उसे मकान बनाकर दिया। सारा सामान भिजवाता था, खर्चा भी देता था । मैंने सोचा कि इस बंदे को स्लिप नहीं खाने देना है। कभी-कभी उदास हो जाता था । कभी बाहर जाने को कहता था । मैं नहीं जाने देता था । उसने 5-6 साल आश्रम में सेवा की। आश्रम से एक सूई भी चोरी नहीं होने दी। वो रात को जागता था। चोर रात को ही जागते हैं । उसकी बीबी को कैंसर हो गया। मैंने कहा कि घबरा नहीं । जहाँ-जहाँ ज़रूरत हुई, उसे संभालता आया । उसका शरीर छूट गया तो मैंने उसके बेटे को पढ़ाया। बी. एस. सी. करवाई । उसे मोटरसाइकिल भी लेकर दी । कभी वो कहता है कि अब मुझे आजाद करो, कमाने का मौका दो। मैं कहता हूँ कि तेरे बाप की इच्छा थी कि तू पढ़े। तू घबरा नहीं, यदि फैक्टरी लगवाकर देनी पड़ी तो वो भी लगवा दूँगा ।

....तो चोरी भी बहुत बड़ा पाप है। पाप कर्मों से है रहता जिसका मन मलीन,

उसको सपने में भी परमात्म नजर आता नहीं ।।

इसलिए आपसे पाप छुड़वाए। यदि एक समय की रोटी मिले तो उसी में संतुष्ट रहना, पर धर्म न छोड़ना । साहिब खुद देख लेगा। आपके साथ दिव्य शक्तियाँ काम कर रही हैं ।

खेलना हो तो खेलिये, पक्का होके खेल।।

चरित्रवान् रहना मुझे चरित्रवान् बड़े प्रिय हैं। महाराजा दिलीप सिंह राम जी की पीढ़ी के थे। एक दिन वे कहीं जा रहे थे। बड़ी तेज धूप थी.... परेशान हुए । उनके सारथी ने प्रकृति से कहा कि ये रघुवंश के प्रतापी राजा हैं, हवा चलाओ, इन्हें गर्मी लग रही है। हवा नहीं चली। फिर उसने कहा कि ये बड़े ज्ञानवान हैं, छाया करो। पर नहीं हुई छाया । फिर सारथी ने कहा कि इन्होंने बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी हैं, छाया करो। पर नहीं हुई। फिर कहा कि इनके पुरखे बड़े प्रतापी हैं, छाया करो। पर नहीं हुई छाया । फिर कहा कि ये बड़े चरित्रवान् हैं। बस, ऐसा कहा तो बादल भी आ गये और हवा भी चलने लगी। आप अपनी स्त्री से जितना चाहे प्रेम करना, पर दूसरी स्त्री को माँ, बहन, बेटी समान मानना । बालब्रह्मचारी होना तो और भी अच्छी बात है, पर आपके लिए यह नियम नहीं बनाया है । केवल दूसरी स्त्री की तरफ नहीं जाना है आपको। जिसमें चरित्र नहीं है, सत्य भी नहीं होगा । सत्य नहीं है तो चरित्र भी नहीं होगा। जैसे तपश और रोशनी एक-दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते, इसी तरह सत्यता और चरित्रता भी एक-दूसरे के पूर्वक हैं । जुआ न खेलना जुए के कारण देखो पाण्डवों का क्या हाल हो गया ! इसलिए जुआ भी मना किया।

जुआ आज न मुआ कल मुआ ।।

जुआ एक-न-एक दिन आपका सर्वनाश कर देता है, इसलिए जुए से भी बचना । हक की कमाई खाना घूस नहीं लेना, दो नम्बर का काम नहीं करना और न ही भीख माँगकर खाना। अपनी मेहनत से ही खानी है । चाहे एक समय की मिले, संतुष्ट रहना। पर भूल कर भी घूस नहीं लेना । ग़लत धन खाओगे तो बुद्धि पर असर पड़ेगा। वही धन आपके बच्चे खायेंगे तो उनकी बुद्धि भी वैसी ही हो जायेगी। .. तो फिर इनके साथ कहा कि भक्ति एक परम-पुरुष की करना ।

देवी देवल जगत में, कोटिक पूजे कोय ।

सतगुरु की पूजा किये, सबकी पूजा होय ।।

एक सद्गुरु की भक्ति से सारे ब्रह्माण्ड की भक्ति हो जाती है। इसलिए केवल सद्गुरु की ही भक्ति करना । सद्गुरु में ही वो परम - पुरुष विद्यमान है, इसलिए वही परम पुरुष की भक्ति है । नियमों के पालन से क्या होगा मैंने नाम दान के समय ही कहा था कि यह - यह काम नहीं करना । कोई बाद में नहीं कहा है। नाम के बाद आपको अब अच्छा-बुरा सब समझ आ रहा है। इस तरह हमने आपको पाप कर्मों से दूर किया। आदमी में आज टैंशन और भय दिख रहा है । क्यों! क्योंकि छल, कपट, ग़लत काम कर रहा है । इसलिए भय है । टैंशन कहाँ से आयी ? ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहा है तो ठगी करता है । बचो इससे । सात्विक जीवन जिओ । पाप है तो आप दुखी हैं । पाप कर्मों से रहता है जिसका मन मलीन, उसको सपने में भी परमात्म नज़र आता नहीं ....... । जितने पाप करोगे, अंत:करण पर असर होता है । जब ऐसे नहीं होंगे तो आपको कोई कष्ट नहीं दे पायेगा । 'जग में बैरी कोई नहीं, जो मन

शीतल होय।' आपका कोई बैरी नहीं है । सिर्फ अहंकार को ठीक कर लो।

नियमों पर चलने से वैसे ही आत्म-शक्ति बढ़ जायेगी, चेतन हो जायेगी आत्मा । आत्मा में बड़ी शक्तियाँ हैं, पर पाप कर्मों के कारण मनुष्य में ये शक्तियाँ कम हो गयीं। पहले मनुष्य इच्छा करता था तो वर्षा हो जाती थी; इच्छा करता था तो सूर्य निकल आता था । लोग सत्य बोलते थे, पाप नहीं करते थे, इसलिए ये आत्म-शक्तियाँ जाग्रत थीं । भक्ति करने से पहले आपको एक अच्छा इंसान बनना है । जो भक्ति भी कर रहा है और गंदे काम भी कर रहा है, वो कोई भक्त नहीं है । जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं, ऐसे ही पाप-कर्मों के आवरण से आत्मा ढक गयी है । उसका बोध नहीं हो पा रहा है । पाप आत्मा परमात्मा के बीच में आवरण है । यह आवरण हट जाए तो वो दूर नहीं है । 'जहँ जाना तहँ निकट है ..........।।' अगर आदमी किसी को कष्ट नहीं दे तो समाज कैसा हो जायेगा ! कष्ट तीन तरह से दिया जाता है - कर्म से, बचन से, मन से । किसी को मारा तो कष्ट दिया। हमारी संस्कृति कह रही है कि यह आत्मा सब जीवों में एक है; किसी को कष्ट मत दो। यह अपराध है । कुछ लोग किसी को कष्ट नहीं देना चाहते हैं । ध्यान रहे कि आपसे किसी को कष्ट न मिले। जैसा व्यवहार आप अपने प्रति नहीं चाहते हैं, वैसा दूसरों के प्रति भी मत करो। आप नहीं चाहते हैं कि कोई आपको गाली दे, तो किसी को गाली दो भी नहीं। किसी पर गुस्सा करते हो तो उसे पीड़ा देने के लिए गाली देने लग जाते हो । एक आदमी था; उसने क्रोध में कुत्ते को लाठी मारी। वो लंगड़ाकर चलता था। उसने क्रोध को नहीं किया। यह था क्रोध । अब वो जीवन - भर परेशान रहा। किसी को कष्ट मत दो। सबमें एक आत्मा ही है। एक मूल अवस्था है हमारी, एक मूल सुरति है । यह, चाहो नींद में जाओ, तो भी रहती है, चाहो सुषुप्ति में जाओ, तो भी रहती है, चाहे सत्लोक में जाओ, तो भी रहती है। अगर यह मूल अवस्था नहीं होती, मूल सुरति नहीं होती तो हम सत्लोक से आकर कैसे बताते कि एक सत्लोक भी है, परम- पुरुष भी है। इसका मतलब है कि कुछ बाकी रहता है। जैसे दूध का मूल रूप रहता है, ख़त्म नहीं होता । चाहे उसका दही बना दो, चाहे पनीर, पर उनमें भी

दूध का मूल रूप नष्ट नहीं होता; एक स्वाद रहता है । वो कभी समाप्त नहीं होता । आप किसी भी शरीर में जाओ, मूल सुरति ख़त्म नहीं होती है । चाहे कुछ भी हो जाए, नहीं होती है । यह मूल सुरति, यह बेसिक कॉन्शियस ही आत्मा है। हालांकि इसमें मन मिल गया । चाहे पानी में खटाई डाली । खट्टा हुआ, पर मूल स्वाद ख़त्म नहीं हुआ । एक महात्मा सबमें मूल सुरति को देखता है । यह मूल सुरति सभी जीवों में भी है। यही परम-पुरुष का कण है; यही उसका अंश है। सबके अंदर छः शरीर भी हैं । वे निराले हैं। सभी शरीरों का स्वभाव है, तासीर है। जैसे आपके पास बड़े सूट हैं। एक सूट है, जो आप गर्मी में पहनते हैं, एक है जो आप सर्दी में पहनते हैं, एक है, जिसे आप बहुत सर्दी होने पर निकालते हैं। इस तरह सात सुरति हैं, जिनमें मूल सुरति प्रमुख है। यह रानी सुरत है। यह मूल सुरति सबमें है। चाहे चींटी है, उसमें भी मूल सुरति है । उसके नन्हें रूप को देखकर भ्रमित नहीं होना । धरती पर ऐसे भी जीव हैं, जिनकी उम्र मात्र 3 घण्टे है । वे भी जवान होते हैं, शादी करते हैं, बच्चे होते हैं, बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं। उनके पास भी मूल सुरति है । मैं एक बगीचे में लड्डू खा रहा था। बचपन से ही मैं एकांतप्रिय रहा हूँ; कभी मिट्टी भी नहीं खाई। बच्चों से बड़ा डरता था, उनसे दूर ही रहता था; उनकी हरकतें बेवक़ूफ़ों वाली लगती थीं। बड़ा गंभीर था । एक पहाड़ था; मैं वहाँ चला जाता था एकांत में। तो मैं बगीचे में लड्डू खा रहा था; एक टुकड़ा उसका नीचे गिर पड़ा। एक चींटी आई; उसने देखा, हिलाना चाहा, पर नहीं हिला। वो चली गयी। मैं जानता था कि चींटी बड़ी हिम्मती होती है । मैं भी उसके पीछे-पीछे गया, सोचा, देखता हूँ कि कहाँ जाती है, क्या करती है। वो कुछ दूर तक गयी; उसे 1-2 मिनट लग गये वहाँ तक जाने में। वहाँ एक बिल था; वो उसमें चली गयी। 20-25 सैकेंड बाद वो बाहर आई तो बड़ी स्पीड में पीछे-पीछे कई चींटियाँ उसके साथ आ गयीं। वो स्पीड में उन्हें लेकर वहाँ पहुँची। सबने मिलकर उसे उठाया। उनका कॉन्शियस कैसा था ! उठाने की उनकी टाइमिंग भी बड़ी प्यारी थी । उनके लिए वो पहाड़ से कम नहीं था। कुछ की टाँगें सिकुड़ गयीं तो फिर पोजीशन चेंज की और घसीटते - घसीटते

उसे वहाँ तक लाईं । आधा घण्टा लगा । अब खड्डे के अंदर वो नहीं जा पा रहा था। फिर उन्होंने उसके टुकड़े किये और अंदर बिल में ले गयीं । इसका मतलब है कि पहले चींटी ने वहाँ जाकर सब चींटियों को आवाज़ लगाई होगी, कहा होगा कि चलो जल्दी, बहुत कुछ है खाने को । फिर कमाण्डर ने तगड़ी-तगड़ी चींटियों को चुना होगा । जैसे कुछ भारी काम होता है तो मैं भी सेवा के लिए चुनता हूँ, जो कर सकते हैं। तो उन्होंने भी छाँटा होगा। वो वहाँ पहुँचीं। फिर अक्ल कितनी थी ! सुराख कम था तो टुकड़े किये। यानी मूल सुरति थी उनके पास । यही सबमें है । आपको बताऊँ, सतयुग में सभी जानवर की भाषा जानते थे। सच मानना। मूल सुरति सबमें एक है। बच्चे रोते हैं । यह रोना क्या है ? यह एक भाषा है । पर इसको जो समझे वो जान सकता है । जो समझता है, उसे भी नहीं पता है कि वो जानता है यह भाषा | माँ समझती है, पर वो तय नहीं है कि उसे पता है। बच्चे को बोलना नहीं आता है, पर अपनी बात कह देता है । यह मूल सुरति है । वो रोता है तो पुकारता है - आओ । मूल रूप से हम सबकी एक ही भाषा है। धरती पर अनेक भाषा बोलने वाले हैं, विभिन्न भाषाएँ बोलते हैं, पर विचारों को बाहर रखना ही मूल लक्ष्य है । वो रोता क्यो है ? माँ को बुला रहा है। ज़ोर से क्यों रोता है ? ज़्यादा दिक्कत में है तो बुलाता है । रो क्यों रहा है ? क्योंकि अलफाज निकालना नहीं आते। वो रोने की आवाज़ में अपनी बात कह रहा है कि यह दिक्कत है । वो जान चुका है कि रोने के बाद मेरी माँ आती है । उसके पास ज्ञान है। वो जानता है कि मेरी माँ समझती है। यह काम पशु भी करते हैं। अरनिया में मैं सत्संग कर रहा था तो एक भैंस ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाए जा रही थी । किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसे तो धूप में बाँध रखा था; वो परेशान थी। वो कह रही थी कि मैं छाया में नहीं जा पा रही हूँ, मुझे बाँध रखा है, खोलो । जहाँ उसका मालिक था, वहीं मुँह करके चिल्ला रही थी। मैंने सुना, पर और कोई नहीं सुना कि क्या कह रही है । मैंने एक सत्संगी को धूप में खड़ा किया। एक मिनट बाद पूछा कि कैसा लग रहा है ? उसने कहा कि बहुत कष्ट है। मैंने उसी को वहाँ भेजा, कहा कि उस भैंस को खोलकर छाया में बाँधो, चाहे जिसकी भी भैंस हो । फिर मैंने देखा कि उसे प्यास भी लगी थी। तो एक को कहा कि बाल्टी

लेकर जाओ और उसे पानी पिलाओ। तो मैंने उसकी पुकार सुनी। मैंने उसकी भाषा समझी। चोराचौकी में सत्संग कर रहा था तो कौवे आकर पेड़ पर बैठे । वे चिल्लाए जा रहे थे। कोई नहीं उड़ाया उनको । मैंने सुना, वो बाकियों को बुला रहे थे कि आओ, यहाँ बहुत कुछ बना है खाने को । मैंने हारकर एक को कहा कि उड़ाओ; पर पहले इसलिए नहीं कह रहा था कि सोचा यह खुद उड़ाए तो ठीक है, सत्संग में बाधा न पड़े। हमारी एक गाय है; बड़ी चालाक है । उसके साथ में दो और गाएँ बँधी होती हैं। जब तीनों को चारा डालता हूँ तो वो क्या करती है कि अपने सामने पड़ा हुआ नहीं उठाती है। पहले आजू-बाजू का खाती है, जो दूसरी गायों को हिस्सा है, क्योंकि उसे पता है कि यह सामने वाला तो मेरा ही है । वो खाती भी बड़ी स्पीड में है । एक दिन एक गाय छूट गयी और जहाँ सुबह का चारा पड़ा था, वहाँ पहुँचकर खाने लगी। दूसरी गाय ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी। वो बुला रही थी । जो देखभाल करने वाला था, वो गया तो देखा कि एक गाय खुली है। यानी वो सोच रही थी कि मेरा हिस्सा भी है इसमें और यह सब खा रही है। इसलिए किसी से नाइंसाफी नहीं करना । गोस्वामी जी कह रहे हैं—

हित अनहित पशु पक्षिन जाना ॥

मुझे भैंसे बुलाती हैं । कभी गर्मी लगती है तो कहती हैं कि पंखा चलाओ, कभी कहती हैं कि आज बड़ी देर कर दी खिलाने में, जल्दी आओ, भूख लगी है। यानी एक मूल सुरति सबमें है। तभी तो शास्त्रों में कहा गया— 'आत्मवतन सर्वभूतेशू । ' एक नन्हा-सा मच्छर भी तो देखो न ! जब आप हमला करने जाते हैं तो झट से उड़ जाता है। वो जान जाता है कि हमला हुआ है। यानी सुरक्षा की भावना भी तो सबमें एक जैसी है । इसलिए यह धर्म कह रहा है कि किसी भी जीव को परेशान नहीं करना है । क्योंकि वो कर्म का फल भोग रहा है । आत्मा जिस भी शरीर में जा रही है, वहीं अपने बाल-बच्चे भी बना रही है, सुख - दुख का अनुभव भी कर रही है। इसकी आह बड़ी जबरदस्त होती है। इसलिए—

मत सता किसी को जालिम, मत किसी की आह ले ।।

जब भी आप कहीं भी जाते हैं, यह मूल सुरति होती है। यह कहाँ से आई? यही किरणें परम-पुरुष ने अपने से अलग कीं । इसी की मुक्ति चाहिए । इसने अपने को शरीर मान लिया है। यह दुखी है । इसे मत दुखाना । यह प्रभु का रूप है। इसे दुखाया तो समझो कि प्रभु को दुखाया। आप विश्वास करना। आत्मा में हरेक भाषा बोलने की ताक़त भी है । सच बताता हूँ, मैंने संसार के समस्त प्राणियों से बात की है । मैं मकान बना रहा था । एक कमरे का फर्श नहीं डाला। पैसे का जुगाड़ नहीं हुआ। दो साल हो गये । माँ ने कहा कि वहाँ भी फर्श डालो, उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं । एक दिन मैं जब पत्थर डालने लगा तो बहुत से चींटे बाहर निकल कर आए । लाल-लाल रंग के अजीब चींटे थे। उन्होंने कहा कि क्यों छेड़ रहे हो ? उन्होंने हमला किया, कहा कि हम यहाँ रहते हैं, हमारे बच्चे भी हैं। मैंने कहा कि बाहर आ जाओ। वो नहीं आए। मैंने अगले दिन फिर कहा कि एक दिन की मौहलत और देता हूँ। वो अगले दिन भी नहीं गये। मैंने पत्थर डालने शुरू किये। एक मिस्त्री आया, कहा कि डालता हूँ। मैंने कहा कि यह मेरा निजी काम है, आश्रम का नहीं है, मैं खुद करूँगा । मैंने बड़ी स्पीड में पत्थर बिखेर दिये। 50-60 चींटे आए, हमला किया, कहा हम सब अंदर हैं। मैंने चींटों को कहा कि तुम्हें समय दिया था, पर तुम नहीं निकले, अब मुझे फर्श तो डालना है। मैंने डाल दिया। 48 घण्डे बाद मैंने फर्श डाल दिया। 12 बजे रात को सभी चींटे मेरे सामने आए, कहा कि हमारे बच्चे हैं; वहाँ फर्श तोड़ो। सच मानना, वो इंसान की भाषा में बोल रहे थे। मैंने कहा कि अब नहीं तोडूंगा; बड़ी मेहनत से डाला है; तुम जमीन खोदकर कहीं ओर से अपना रास्ता बना लो । जब मैं कहूँगा तो आपको आश्चर्य होगा। किसी देवस्थान पर जाता हूँ तो बात करता हूँ । गंगा जी के पास गया तो गंगा जी से बात की है, शिवजी के स्थान पर गया तो शिवजी से बात की है । जहाँ स्थान है, वे हैं । पर आप ऐसे ही आ जाते हैं। मैं जे. सी. ओ बना तो पार्टी देनी थी। मुझे कहा कि पार्टी दो । उनकी पार्टी क्या होती है— शराब, मुर्गे । मैंने कहा कि कितने पैसे लगेंगे ? कहा—5 हज़ार। मैंने कहा कि मैं 7 हज़ार दूँगा, पर मुर्गे नहीं खिलाऊँगा । काजू-बादाम,

जो भी खाना हो, खिला दूँगा । वहाँ एक बात होती है कि पार्टी करवानी पड़ती है । आपपर मुसीबत आए तो आप कमज़ोर पड़ जाते हैं। पक्के रहें । तो वो खाते भी राक्षस की तरह हैं। मैं मीट, शराब की पार्टी नहीं दे रहा था। कुछ शांति में अशांति का सृजन कर देते हैं और कुछ अशांति में भी शांति ढूँढ़ लाते हैं। मैंने बड़ा कहा कि कुछ भी खाओ, खिला दूँगा, पर यह नहीं । वो नहीं माने। मैंने भी नहीं खिलाया। वैसे 10-15 दिन के अंदर ही करवानी होती है। वे बड़े लोगों के हवाले देने लगे कि वो भी नहीं खाता था, उसने भी करवाई..... उसने भी करवाई। पर मैं अड़ गया कि नहीं दूँगा यह सब । कुछ उत्तेजित करने के लिए कहने लगे कि कंजूस है। मैंने कहा कि 7 हज़ार की पार्टी करवा रहा हूँ। वो नहीं माने। समय निकलता गया । 6 महीने निकल गये; मैंने नहीं करवाई पार्टी । बाद में कहा कि दो । मैंने कहा कि अच्छा, जिस दिन मुर्गे वाला दिन होगा, उस दिन चबा लेना हड्डी। वो नहीं माने। कहा कि किसी दूसरे दिन । मैंने आख़िर कहा कि अच्छा, दारू पी लो; सोचा कि पीकर नाली में ही गिरेंगे, पाप तो नहीं होगा, जीव हत्या तो नहीं होगी। अंत में तय हुआ कि पैसे दे दिये जाएँ, वो जो करना है, कर लें। शाम को छः बजे एक लड़का 5-7 मुर्गे लाया। टाँगें पकड़ा हुआ, धड़ नीचे की ओर । वो चिल्ला रहे थे, कां - कां कर रहे थे । मैं रात को लेटा तो 12 बजे सभी मुर्गे मेरे सामने आए, इंसान की भाषा में कहा कि इंसाफ करो। मैं जो कह रहा हूँ, सच्चाई है। कहा कि आप जिम्मेदार हैं। वो दो डिमाण्ड रखे, कहा—या तो हमें मानव-तन दो या फिर मुक्ति। मुझे उनमें से एक बात माननी पड़ी उनकी । मैं साँप मारना भी मना करता हूँ । राँजड़ी से 100-150 साँप निकाले हैं। कंडी एरिया है; बड़े साँप निकल आते हैं। एक दिन शाम के समय नाली में साँप लेटा हुआ था । आधा नाली में था, आधा बाहर । जैसे गर्मी - सर्दी आपको लगती है, उसे भी लगती है। गर्मी लगे तो आप पंखे के नीचे आ जाते हैं । वो नाली में बैठ गया था। किसी ने कहा कि वहाँ साँप है । मैंने सबको वहाँ से भगा दिया। एक लड़के को कहा कि लंबा बाँस लाओ । 5-6 उछाल दी ; तब जाकर वो ढीला पड़ा। मारा नहीं; चोट भी नहीं पहुँचाई; कहा कि बोरे में डालकर दूर फेंक आओ। ऐसे 100-150 अकेले राँजड़ी से निकाले हैं। जो भी शरीरधारी है, अपने शरीर से प्रेम कर रहा है। किसी भी जीव को न मारो। जीभ के स्वाद

के कारण इंसान निरीह जीवों की जान लेता है । जिस मृत्यु-लोक में आप बैठे हैं, केवल यहीं कर्म है, और कहीं नहीं है । इसलिए किसी का दिल मत दुखाओ। जब भी लगे कि दिल दुखा तो साँत्वना दो। यह मत सोचना कि क्या बिगाड़ेगा ।

बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, और भी गिरजाघर हैं ।

लेकिन किसी का दिल मत तोड़ो, खास खुदा का घर है ॥

आपको पेड़ों की बात बताता हूँ; उनमें भी मूल सुरति है । वे भी बात करते हैं। राँजड़ी में एक पेड़ है । एक दिन उसकी एक डाल बड़ी ज़ोर से हिली। मैंने सोचा कि कोई बड़ा पक्षी आकर बैठा है । ऊपर देखा तो इंसान की गर्दन आई, कहा—नमस्कार। हिंदू धर्म में जो पेड़-पौधों की पूजा की जाती है, इसमें गहराई है । तो कहा कि आपकी बड़ी फसल है, कोई कमी नहीं है, पर मैं और मेरा छोटा भाई है, हम दोनों बीमार पड़ गये हैं। सभी आपकी सेवा करते हैं; हम भी करना चाहते हैं । मैंने कहा - करो। कहा कि आप दो बार दवा छिड़क देना— - एक दिसंबर में और एक मार्च में। मैंने सुबह माली को बुलाया और कहा कि इसपर दवा छिड़क देना । उसे नहीं बताया कि पेड़ ने कहा है । बहुत बूर लगे । फल लगे; वो गिरने लगे। मैंने पूछा कि भाई हमने दवा छिड़की तो भी फल नहीं लगे ! उसने कहा कि दवा एक बार छिड़की है। वो माली एक बार छिड़ककर भूल गया था। वो चेतन पेड़ है। उसने पहला फल गिराया, जब मैं ब्रश कर रहा था। गजब का फल था; कहा- खाना । मैंने फल तुरना को दिया, कहा कि इसे रखो, भोजन के साथ देना । जब मैंने फल खाया तो वैसे ही उसने कहा कि आज मैं धन्य हो गया; मैं यही चाहता था । जो जीव महापुरुषों के चरणों के नीचे मर जाते हैं, वो मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं। जिस पेड़ का फल खाया, वो मुक्त हो जायेगा । जिसके घर में भोजन किया, समझो उसने पूरे ब्रह्माण्ड को भोजन खिला दिया । 100 योगी को भोजन खिलाना एक साधु को भोजन खिलाने के बराबर है । साधु वो, जो काम, क्रोध को छोड़ा है, वो नहीं जो साधु का चोला पहना है । और पूरे ब्रह्माण्ड को भोजन खिलाना और एक संत को भोजन खिलाना एक समान है । तो पेड़ कितना चेतन था ! वो फल तब गिराता है, जब मैं हूँ या वो लड़की तुरना, क्योंकि वो जानता है कि यह लड़की नहीं खाती है। बाकी खा

लेते हैं। वो फल भी छिपाकर रखता है । ढूँढ़ते रहो, नहीं मिलेगा। इसलिए भाई, सबमें एक आत्मा को देखो; किसी को मत मारो ।

जीव न मारो बापुरा, सबके एकै प्राण ।

हत्या कबहुँ न छूटती कोटि सुनो पुराण ॥

हम कहते भी हैं— ' धर्मराय जब लेखा माँगे, क्या मुख लेकर जायेगा॥' वो इसी मूल सुरति से लेखा लेता है । हरेक जीव का हिसाब होगा । वो कभी भी अन्याय नहीं करता है । उसकी सभा में चित्रगुप्त है; वो सज़ा सुनाता है कि इस पाप के लिए क्या सजा होनी चाहिए। जब उससे मामला नहीं सुलझता, कोई पेचीदा मामला आ जाता है तो स्वर्ग से विद्वानों की टीम को बुलाता है । वेदव्यास और अन्य मिलकर विचार करते हैं और सज़ा सुनाते हैं। मूल सुरति है । जब भी ब्रह्माण्ड में जाते हैं तो मूल सुरति होती है। ये बातें कहने में नहीं आती हैं। मान लो कि किसी ने गुप्ता जी को कुछ कहा । गुप्ता जी उसे चार चाँटे मारें तो कोई कहे कि ठीक ही किया, पर अंदर से कॉन्शियस कहेगा कि ग़लत किया । हम सबके अंदर एक चीज़ बैठी है । कुछ भी ग़लत नहीं करो। यदि आपके पास आध्यात्मिक शक्तियाँ हैं तो उनका भी ग़लत इस्तेमाल मत करो । कुछ के पास त्राटक विद्या होती है तो दूसरे को कष्ट देते हैं। उससे आपको बाँध दिया जाएगा तो हिल भी नहीं पायेंगे। सुरति से त्राटक होता है । स्वाँस रोककर किसी का ध्यान किया तो उधर उसका दम भी घुटने लगेगा। आप रोकर किसी का ध्यान करें तो उधर वो भी रोएगा। किसी को भगाना चाहें तो वो भी हो जायेगा, किसी को बुलाना चाहें तो वो भी हो जायेगा । कभी कहते हैं कि किसी ने कुछ कर दिया है। बिलकुल ठीक बात है । यह काला इल्म कहलाता है। इससे किसी को कष्ट ही दिया जाता है । फिर सिद्धियाँ भी हैं। उनसे किसी का कल्याण भी किया जा सकता है । महापुरुष परोक्ष और अपरोक्ष रूप से किसी को भी कष्ट नहीं देते हैं । एक बड़ा आदमी मेरे पास आया, कहा कि मैं एक डॉ० लड़की से प्यार करता था। पहले वो भी मेरे साथ करती थी, पर अब नहीं करती है । मैं उससे शादी करना चाहता हूँ । आप कुछ मदद करिए। मैंने सोचा कि किसी को

भेजकर बात करने के लिए कह रहा है। मैंने पूछा कि कैसी मदद? कहा कि सम्मोहन करो। मैंने कहा कि यह काम नहीं करूँगा मैं । मारण, वशीकरण आदि से किसी को भी तंग किया जा सकता है । किसी को भी उचाट किया जा सकता है । तब उसका दिल ही नहीं लगेगा । वशीकरण कर देंगे तो दौड़ा चला आयेगा। किसी गाँव में एक उचाट विद्या जानने वाला महात्मा था। वो किसी को भी रात को अपने आश्रम में नहीं टिकने देता था । वो कहता नहीं था कि चले जाओ, बस, उचाटन कर देता था। सूर्य डूबने के साथ ही बंदा चल पड़ता था; रुक ही नहीं पाता था। एक बार मेरे गुरुदेव भी उसके आश्रम में गये । उसने भोजन खिलाया; उचाट किया। पर मेरे गुरुदेव ने पकड़ लिया, कहा कि मुझे यहाँ रात को रुकना है, आप चाहे जितना मरजी उचाटन कर लो, क्योंकि मैं सन्यासी हूँ; मुझे गृहस्थ के घर में तो रुकना नहीं है; आज तो यहाँ रुकना ही है; सुबह मैं चला जाऊँगा; तब तू रोकेगा तो भी नहीं टिकूँगा । जब गुरुदेव सुबह होने पर आश्रम से बाहर निकले तो आगे पूरा गाँव हार लिये खड़ा था, कहने लगे कि आप 40 साल में पहले हैं जो यहाँ रुके। तो यह बड़ा ख़तरनाक भी होता है उच्चाटन । प्रभु अपनी शक्तियाँ बड़ी सोच-विचारकर देता है। बंदूक उसे मिलती है, जिसका रिकार्ड अच्छा है, जो अपराधी न हो । प्रभु भी रिकार्ड देखता है। कहीं शक्तियाँ मिलने के बाद इसका गलत इस्तेमाल तो नहीं कर लेगा; कहीं विनाश तो नहीं करेगा। देखता है कि सहनशील है तो फिर देता है । जब वो देना शुरू होता है तो देता जाता है। वो साहिब जानता है कि निर्मल हो गये तो देता जाता है । 'भली बुरी सबकी सुन लीजे, कर गुजरान गरीबी में ॥' तो हरेक के पास मूल सुरति है । आध्यात्मिक शक्तियों का ग़लत प्रयोग भी अपराध है । मन, वचन, कर्म से किसी को पीड़ा न देना। दयावान बनना। आपमें ताक़तें आती जायेंगी । बस, आप नियमों का पालन दृढ़ता से करना ।

नियमों के उल्लंघन से क्या होगा कुछ कहते हैं कि आपके सिद्धान्त कड़े हैं। मुझे पता चलता है कि मेरे आदमी ने ग़लत किया है तो फटकारता हूँ। हमारा पंथ समाज को चीज़ क्या दे रहा है ! हम सात नियम बता रहे हैं। शराब नहीं पीना, घूस नहीं लेना, पाप कर्म नहीं करना आदि नियम बाद में नहीं बताते हैं, पहले ही बताते हैं । ये हम एकाग्रता से बोल रहे हैं। जब आप देखेंगे तो अन्य लोग बाकी सब काम करते मिलेंगे। यहाँ कोई करे तो फौरन टिकट कटा देता हूँ । यदि हम कह रहे हैं कि सत्य बोलना तो हम सच्चे आदमी बनाना चाहते हैं । आपका हृदय शुद्ध करना ही हमारा लक्ष्य है। जब हृदय शुद्ध होगा तभी आत्मा समझ आयेगी। भक्ति करनी है तो ठीक से करनी है, नहीं तो कोई लाभ नहीं है । भाइयो, नाम के बाद अब आपको कोई भी ग़लत कार्य नहीं करना है । नाम के समय आपको कहा था कि पिछले कर्म काट दिये, जाओ, माफ़ी । पर अब आगे कोई ग़लती नहीं करना, क्योंकि अब माफ़ी नहीं है । स्पीड ब्रेकर | वालो ने ब्रेकर से पहले बोर्ड लगाया है - कोई 100 गज पहले। ऐसा क्यों ? ताकि अभी से अपनी स्पीड को कम कर लो। अगर अनदेखी की तो भयानक ऐक्सीडेंट भी हो सकता है। इस तरह जब भी ग़लती करने जाओगे तो खींच पड़ेगी; अन्दर से आवाज़ भी आयेगी कि मत कर । नाम की ताक़त बतायेगी, सतर्क करेगी। पर फिर भी यदि अनदेखी करके ग़लत किया तो माफ़ी नहीं है । बस, फिर सज़ा के लिए तैयार हो जाओ । हमने आपको पाप कर्मों का लाइसेंस नहीं दे रखा है। एक माई आई, कहा- मेरे बंदे को माफ़ी दे दो; उसने शराब पी ली है। मैंने कहा—क्यों दूँ माफी ? तेरा बंदा कोई काकू तो है नहीं कि किसी ने भूँस कर पिला दी। अगर माफी दे दूँगा तो संगत सोचेगी कि कुछ भी कर लो, बाद में माफी माँग लो। फिर तो कोई आकर कहेगा कि साले का व्याह था, दो घूँट लगा लिये, कोई कहेगा कि मामे का व्याह था, पीनी पड़ी। मैंने कहा— - थोड़े दिन फराटी देखना। देखने वालों के भी रोंगटे खड़े हो जायेंगे । वे अपने आप सुधर जायेंगे। आप सुधरे नहीं हैं, सुधारा गया है। मैं कोई तानाशाह नहीं हूँ, साफ-साफ बताता हूँ । साहिब ने साफ-साफ इशारा किया है- कबीर का घर दूर है, जैसे लंबी खजूर |

चढ़े तो अमृत पावसी, गिरे तो चकनाचूर ।।

जो भी चीज़ें मना की, वो भूलकर भी नहीं करना । जिंदगी-भर के लिए मुसीबत हो जायेगी। बचना । साहिब ने कहा—

गुरु बचना तोपे, ता ऊपर यमराजा कोपे ॥

कुछ पागल बनकर घूम रहे हैं । वो ऐसे ही नहीं हैं। वो शब्द तोड़ने वाले हैं। साहिब कह रहे हैं कि उसपर तो निरंजन भी गुस्सा करता है । कहता है कि आ बच्चे, तेरी खिचड़ी निकालता हूँ । इसलिए गुरु - आज्ञा में रहना । मेरे ख्याल से आपकी ग़लती माफ नहीं होनी चाहिए। आपको इशारे अन्दर से मिल रहे हैं। फिर ग़लती क्यों ? दुनिया के लोग तो अज्ञान में हैं। उनकी ग़लती फिर भी माफ की जा सकती है। जैसे किसी अंधे का पाँव कीचड़ में पड़े तो बुरा नहीं मानते हैं, पर किसी आँख वाले का पड़े तो माफ़ करोगे क्या ? कहोगे न कि देखा क्यों नहीं! ऐसे ही नाम के बाद ग़लती करोगे तो सज़ा मिलनी ही चाहिए। हाँ, इतना ज़रूर हो सकता है कि यदि किसी को 50 चाँटे पड़ने हों तो एक साथ नहीं पड़ेंगे। ऐसा होगा कि कभी एक, कभी अचानक दो पड़ जायेंगे। इतनी कंसेशन, इतनी छूट हो जायेगी। पर गिनकर 50 पड़ेंगे ही। यह तय है । यह सज़ा भी कल्याण के लिए है। अब सज़ा मिलेगी तो कैसी फराटी होगी, बताता हूँ । आपने एक झूला देखा होगा। जब वो ऊपर जाता है तो बंदा भी उलटा हो जाता है यानी सिर नीचे और पाँव ऊपर। उसमें बंदे का पेशाब भी बाहर निकल आता है | बड़ा ख़तरनाक है वो झूला । कोई कितना भी चिल्लाए कि बंद करो, बंद करो, पर झूले वालों को वो चक्कर पूरे करने ही हैं, चाहे किसी का पेशाब क्यों न निकल जाए। जब फराटी होती है तो ऐसा ही होता है । साहिब तब तक बंद नहीं करता है। जितनी फराटी देनी है, देकर रहेगा । फिर तौबा करोगे आगे से । मैंने जीवन में दो को बहुत बड़ी सज़ा दी है। उनमें भी एक को तो पक्का। मैंने अपने से उसकी सुरति की तार काट दी यानी वो कभी मेरा ध्यान नहीं कर सकता है, आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त नहीं कर सकता है । यही सज़ा साहिब ने, परम-पुरुष ने निरंजन को दी थी, जब उसने अनेक कुकर्म किये थे। कहा—जा, अब तू मेरा ध्यान नहीं कर पायेगा । यदि वो ध्यान कर सकता होता तो उसने आपकी खिचड़ी निकाल देनी थी, क्योंकि ध्यान से बड़ी ताक़त

मिलती है। इसलिए परम - पुरुष ने उसे अपने से डिस्कनेक्ट कर दिया । तो जिस आदमी को मैंने यह सज़ा दी, उसने बहुत बड़ी ग़लती की थी। मैंने कहा- जाओ, अब तुम मेरे पास कभी भी नहीं आना । उसने पूछा- कभी रास्ते में मिल जाओ तो दर्शन कर सकता हूँ? मैंने कहा- नहीं । उसने जाते समय बड़ी प्यारी बात कही, बोला—मैं जानता हूँ कि इस ग़लती के लिए आप मुझे क्षमा नहीं करेंगे। यदि आपने मुझे क्षमा कर दिया तो संगत मचलेगी । मत करो माफ़ । पर एक बात याद रखना, यदि मेरी आत्मा नरक में भी डुबकियाँ लगा रही होगी तो भी यह आत्मा आप ही को पुकारेगी। मैं अब किसी और की भक्ति नहीं कर पाऊँगा। मेरे हृदय में उस समय भी उसके लिए करुणा थी, पर मैंने उसे यह सजा दे दी। गलती करनी ही क्यों ? प्रेम को बनाए रखो न ! रहिमन दागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय ।

टूटे ते फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय ।।

आपके पास चेतन करने के लिए इतनी बड़ी शक्ति दी है, फिर गलती क्यों? बड़े बड़े विद्वानों को भी पाप पुण्य का इतना ज्ञान नहीं होगा, जितना आपको है। इसलिए भाइयो, आपकी भूल की माफ़ी नहीं है। " 'सत्य वचन' " 66 'हो नशा विहीना, ' " " शाकाहारी " " चरित्र न हीना " । " 'हक कमाई' " "चोरी नहिं जाना,' "

"जुआ" समझत पाप समाना ॥

ध्यान किसका करें

कभी-कभी कुछ लोग कहते हैं कि भक्ति करेंगे तो उससे आत्मा को शक्ति मिलेगी। नहीं ! नहीं! ऐसी बात नहीं है । यदि आत्मा को किसी चीज़ की जरूरत है तो फिर वो चीज़ आत्मा से बड़ी हो जायेगी । यदि भक्ति से आत्मा को ताक़त मिलेगी तो भक्ति आत्मा से बड़ी हो जायेगी। पर नहीं, आत्मा से बड़ी कोई चीज़ नहीं है । यह तो ईश्वर की अंश है । इसे किसी बाहरी पदार्थ की ज़रूरत नहीं है । फिर यदि ऐसा है तो भक्ति क्यों करनी है ? ध्यान क्यों करना है? आओ, इस ओर चलते हैं । भक्ति से, ध्यान से आत्मा को शक्ति नहीं मिलेगी, पर आत्मा के ऊपर जो मन-माया का कीचड़ लगा हुआ है, वो धुलता जायेगा और आत्मा अपने को अनुभव करने लग जायेगी । हमें विचार करना होगा कि हम ध्यान किसका करें। ध्यान एक विशिष्ट चीज़ है। हम जिसका भी ध्यान करते हैं, उसकी वृत्तियाँ, उसके गुण हमारे भीतर आ जाते हैं । जैसे बीज में प्रस्फुटनशीलता का गुण है, उसका प्रस्फुटन होता है; पर उसे विकसित करने के लिए पलावन और सींचने की ज़रूरत होती है। लेकिन यदि किसी बंद कमरे में बीज बो दिया जाए तो वो प्रस्फुटित नहीं हो पाता, चाहे कितनी भी सिंचाई कर लो, क्योंकि उसे सूर्य का प्रकाश नहीं मिल पाता है । इस सुरति में सब कुछ है । बस, इसे अंकुरित करने की ज़रूरत है । इस पर मन-माया का आवरण पड़ा हुआ है, जिससे यह सुरति कुंद हो गयी है। यह अंकुरित होती है गुरु की सुरति से। इसी कारण शास्त्रों में भी गुरु का ही ध्यान करने को कहा गया है । कहीं पर भी परमात्मा का ध्यान करने को नहीं कहा गया । हम उसी का ध्यान कर सकते हैं, जिसे हमने कभी देखा हो । जिसे हमने देखा नहीं, उसका ध्यान नहीं कर पायेंगे । इसलिए परमात्मा का ध्यान

संभव नहीं, क्योंकि हमने उसे नहीं देखा । अत: हमें सब संशय छोड़कर गुरु

ही भक्ति, गुरु का ही ध्यान करना चाहिए।

देवी देवल जगत में, कोटिन पूजत कोय।

सतगुरु की पूजा किये, सबकी पूजा होय।।

सद्गुरु की पूजा करने से पूरे ब्रह्माण्ड की पूजा हो जाती है। वास्त गुरु परमात्मा का प्रतिनिध है । धर्म - शास्त्रों में बड़ा सुन्दर कहा है-

ध्यान मूलम् गुरु रूपम्, पूजा मूलम् गुरु पादकम् ।

मंत्र मूलम् गुरु वाक्यम्, मोक्ष मूलम् गुरु कृपा।।

परमात्मा का ध्यान करने को नहीं कह रहे हैं। गुरु क ध्यान करने को कह रहे हैं । कह रहे हैं कि गुरु के ध्यान से बढ़कर कोई ध्यान नहीं है, गुरु की पूजा से बढ़कर कोई पूजा नहीं है, गुरु वाक्य से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है और फिर गुरु की कृपा से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है । कितनी बड़ी बात हमारे धर्म-शास्त्र कह रहे हैं ! परमात्मा की कृपा की बात नहीं कर रहे, गुरु की कृपा को महत्व दे रहे हैं। संतों की तो बात ही निराली है । हरि कृपा जो होय तो, नहीं होय तो नाहिं |

कहैं कबीर गुरु कृपा बिन, सकल बुद्धि बह जाहिं ।।

गुरु की कृपा बड़ी ज़रूरी है । ऐसा क्यों ? जैसे समुद्र है। उसका पानी खारा है । उसका जल पीने के लायक नहीं। पर जब वही जल बाष्पीकृत होकर बादलों द्वारा नीचे आता है तो सबके लिए हितकारी बन जाता है । वही जल मीठा हो जाता है । वही जल खेतों के लिए उपयोगी है । जल तो उसी समुद्र का है, पर अन्तर केवल इतना है कि जब बादलों द्वारा नीचे आता है तो बड़ा हितकारी बन जाता है। समुद्र का जल वैसे एक तो हितकारी नहीं, पर दूसरों तक अपना जल पहुँचाने में भी समुद्र सक्षम नहीं। इस तरह एक चंदन का पेड़ है । उसकी बड़ी महक है, पर वो स्वयं अपनी महक को दूसरों तक पहुँचाने में सक्षम नहीं है। समीर (वायु) उसकी महक को अपने में समेटती है और दूर-दूर तक ले जाती है । ठीक इसी तरह गुरु और परमात्मा का अन्तर है । जैसे बादल द्वारा जो जल आया, वो समुद्र के जल का संशोधित रूप था, इसी तरह गुरु परमात्मा का

संशोधित रूप है । यदि साधारण शब्दों में कहा जाए तो परम सत्ता स्वयं जीवों को छुड़ाने में संभव नहीं है, इसलिए वो चंदन के पेड़ की तरह है, जबकि गुरु उस समीर की तरह है, जो परम सत्ता की महक, परम सत्ता का प्रकाश घट- घट में प्रकट कर देते हैं। इसलिए संतों ने गुरु को परमात्मा की बराबरी में भी खड़ा नहीं किया, बल्कि बड़ा कहा । इसलिए यह तो तय है कि गुरु का ध्यान ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि-

ताते सर्वा रंभ में, गुरु के सुमिरन मात्र से, विनशत विघ्न अनन्त । ध्यावत हैं सब संत।।

संत-सद्गुरु का ध्यान करने से ही हमें आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति होती है। याद रहे, किसी तप से, किसी योग से ये शक्तियाँ हमें नहीं मिल सकती हैं। योग से केवल दिव्य शक्तियों की प्राप्ति हो सकती है, आध्यात्मिक शक्तियों की नहीं । वास्तव में जब भी हम महापुरुषों के पास जाते हैं, संत- सद्गुरुओं के पास जाते हैं तो तीन तरह से परम सत्ता की किरणें, या दूसरे शब्दों में परमात्म-शक्तियाँ हमें मिलती हैं। पहले वाणी द्वारा । जब भी हम महापुरुषों सत्संग में जाते हैं तो सबसे पहले जब हम उनकी वाणी को ध्यान लगाकर सुनते हैं तो ये शक्तियाँ हमें मिलती हैं । जैसे तार पर चलती हुई बिजली हमारे कमरे तक आ जाती है, इसी तरह संत-महात्माओं की वाणी पर ये शक्तियाँ चलती हुई हम तक पहुँच जाती हैं। दूसरे दृष्टि द्वारा भी ये आध्यात्मिक शक्तियाँ हमारे पास पहुँचती हैं। संत-महापुरुषों की बंदगी के समय उनके साथ दृष्टि मिलाने से भी यही तात्पर्य है कि वे अपनी दृष्टि द्वारा हमें आध्यात्मिक शक्तियाँ प्रदान करें। जब भी हम महापुरुषों के दर्शन को जाते हैं तो सर्वप्रथम उनसे दृष्टि मिलाने का प्रयास करते हैं और चाहते हैं कि उनकी दृष्टि हम पर पड़े। इसलिए यदि दृष्टि न मिले तो समझो कि दर्शन नहीं हुए। फिर तीसरे स्पर्श से भी ये शक्तियाँ हमें मिलती हैं । कहीं भी स्पर्श करके ये शक्तियाँ ली जा सकती हैं, पर अदब के लिए केवल पाँव छूना ही नियम बना दिया गया। महापुरुषों के पास जाने मात्र से हमें इतनी शक्तियाँ मिल जाती हैं । इसी तरह ध्यान से भी ये शक्तियाँ हमें मिलती हैं। जिन स्थितियों में हम गुरु का दर्शन नहीं कर पाते हैं, उन स्थितियों में हमें गुरु का ध्यान करना चाहिए। संभव हो सके तो गुरु का दर्शन करके सीधे ये आध्यात्मिक शक्तियाँ लेनी चाहिए, पर

यदि ऐसा संभव नहीं हो सके तो उसका विकल्प है - ध्यान ।

यह ध्यान बड़ी ही लाजवाब चीज़ है । हमारा ध्यान जितनी देर जिसमें मा हुआ है, हम भी उतनी देर वैसे ही हो जाते हैं । यदि हमारा ध्यान थोड़ी देर के लिए क्रोध की ओर हो जायेगा तो हम भी उतनी देर के लिए क्रोधमय हो जायेंगे। यदि यह ध्यान आनन्द की तरफ हो जायेगा तो हम भी आनन्दमय हो जायेंगे। इसी तरह सद्गुरु का लगातार ध्यान करने से हम भी उनकी तरह हो जायेंगे। जब हम सद्गुरु का ध्यान करते हैं तो भी हमें परमात्मा की अद्भुत ताक़त मिलती है, इसलिए हमें सब संशय छोड़कर केवल गुरु का ही ध्यान करना चाहिए। धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि परम-तत्व की प्राप्ति कैसे करें ? साहिब ने एक ही शब्द में सारा रहस्य कह दिया, कहा- गुरु में सुरति लगा देना, बाकी काम वो खुद कर लेगा । सकल पसारा मेट कर, गुरु में देय समाय ।

कहैं कबीर धर्मदास से, अगम पंथ लखाय ।।

मैं सिरजौं मैं मारऊँ, मैं जारौं मैं खाऊँ ।

जल थल नभ में रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ।।

मैं ही अमरधाम परमपुरुष का पंचम शब्द पुत्र हूँ । मैं ही विमूढ़ वरदान लेकर, परमपुरुष से शापित हूँ । मैं ही आद्यशक्ति-सह-हँसों को ले कालपुरुष कहाता हूँ ।

मैं ही निरंजन अमरधाम के मानसरोवर से निष्कासित हूँ।

मैं 'मन' ही आत्मरूप तीन लोक में वासित हूँ ।।

ध्यान करते समय.......

आत्मा के पास एक वांछक ज्ञान है, एक परा ज्ञान है। एक तो क्रियाओं को देखकर, मानव समाज को देखकर सीख लेते हैं, वो बुद्धि से समझा जाता है । पर एक, जो स्वतः ही हमारे अंदर ज्ञान है, वो सही ज्ञान है । कभी-कभी आपके अंदर ज्ञान के भावों का उद्गम होता है। यह क्या है ? यह ज्ञान आपमें है। आत्मा ज्ञान का स्रोत है, क्योंकि परमात्मा का अंश होने के कारण यह ज्ञानमयी है । कभी आप देखते हैं कि आप किसी के विचारों को सुनना चाहते हैं । कोई आत्मा के नज़दीक पहुँच जाता है । उसे चाहे कोई नहीं बताया, पर ऐसे विचार उठने लगते हैं । 'सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल।' यह ज्ञान स्वतः ही उठने वाला है । यह कहीं प्रगट है तो कहीं गुप्त । यह शिक्षित, अनपढ़, अमीर, ग़रीब सबमें परिपूर्ण है, इसलिए केवल जगाने की ज़रूरत है। गुरु उर्जा हृदय को प्रकाशित करती है । गुरु नाम दान के समय अपनी सुरति देता है । पर शिष्य का भी सहयोग चाहिए । रहनी बोल रहे हैं— 'नाम सत्य गुरु सत्य, आप सत्य जो होय ।' आपको भी सत्य होना होगा । ‘वाणपति जागसी, काह करे तसकरा ।' यदि घर का मालिक जाग रहा हो तो चोर क्या कर सकता है ! 'उसको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार ।' हमेशा सुरति में रहना, चेतन रहना; चुपचाप बैठकर देखना कि मन क्या कर रहा है । मन अचेतन अवस्था पसंद करता है । यह परेशान करेगा । यह थकान अनुभव करायेगा । मन को ऊब होती है। जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो पाँच बातों को ध्यान में रखें। ध्यान के सूत्र बोलता हूँ । 1. कमर को सीधा करके बैठना । कमर का दिमाग़ से संबंध है। इसी के सीधे रहने से ही सुषुम्ना खुलेगी। इसी के सीधे रहने से 10वाँ द्वार खुल सकता है। 2. स्वाँसा में भजन चलता रहे। जैसे बैल को रस्सी से बाँधकर खूंटे से बाँध देते हैं तो इधर-उधर नहीं जा सकता है । इस तरह मन को बाँधने के लिए