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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

दशम लम्बक ४८१

दशम लम्बक ४८१ यह सुनकर दमनक बोला- ऐसा न करना चाहिए। जिसे राजा अपने समान बनाता है, उसे राजा के समान ही राजलक्ष्मी नहीं प्राप्त होती। जब वे दोनों ही राजमद से उच्छृङ्खल हो जाते हैं तब चंचल लक्ष्मी दोनों ओर पैर रखकर अधिक समय तक नहीं ठहरती। और, उनमें से एक को अवश्य ही छोड़ देती है ॥११७-११८॥ जो स्वामी हितैषियों से भी द्वेष करता है और अहितचिन्तकों को ही सदा चाहता है, वह बुद्धि- मानों के लिए उसी प्रकार छोड़ देने के योग्य हो जाता है, जिस प्रकार वैद्य के लिए कुष्ट-रोगी ॥११९॥ प्रारम्भ में कड़वी और अन्त (परिणाम) में मधुर बातों का कहने और सुननेवाला जहाँ होता है, वहाँ लक्ष्मी निवास करती है ॥१२०॥ जो राजा सज्जनों की बात नहीं सुनता और दुर्जनों की बातों पर ध्यान देता है, वह शीघ्र ही विपत्ति में पड़कर पश्चात्ताप और सन्ताप करता है ॥१२१॥ हे स्वामी, उस बैल पर आपका स्नेह व्यर्थ है। इस द्रोही के लिए अभय-दान क्या और इस शरणागत की रक्षा कैसी ! ॥१२२॥ और भी बात है। सदा आपके पास रहनेवाले इस बैल के गोबर और गोमूत्र में कीड़े उत्पन्न होते हैं। वे कीड़े हाथियों के दांतों से हुए आपके घावों में प्रविष्ट होकर आपके शरीर को हानि पहुँचाते हैं। अतः उपाय द्वारा ऐसे व्यक्ति का वध करना ही उचित है ॥१२३-१२४॥ विद्वान् व्यक्ति यदि स्वयं कोई अपराध नहीं करता तो भी दुष्ट के संसर्ग से उसमें भी दोष उत्पन्न हो ही जाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो¹ ॥१२५॥ मन्दविसर्पिणी जूँ और खटमल की कथा किसी राजा के पलंग में मन्दविसर्पिणी नाम की एक यूका (जूं) कहीं से जाकर छिपी रहती थी। एक बार सहसा वायु के वेग से उड़ाया गया टिट्टिभ नाम का एक खटमल उस पलंग में आकर घुस गया ॥१२६-१२७ ॥ उसे देखकर मन्दविसर्पिणी ने कहा-'तू मेरे रहने के स्थान में क्यों घुस आया ? कहीं दूसरे स्थान पर जा ॥१२८॥ १. इसी भाव का मुद्राराक्षस नाटक में आया हुआ श्लोक संस्कृत-टिप्पणी में द्रष्टव्य है।

७८४ कथासरित्सागर

७८४ कथासरित्सागर अपीतपूर्व पास्यामि राजासृक्¹ तत्प्रसीद मे। एहीह वस्तुमिति तामवादीत्सोऽपि टीटिभः ॥१२९॥ ततोऽनुरोधादाह स्म सा त यद्येवमास्स्व तत्। किं त्वस्य राज्ञो नाकाले दंशो देयस्त्वया सखि ॥१३०॥ दयोऽस्य दंशः सुप्तस्य त्रासक्तस्य वा लघु। तच्छ्रुत्वा टीटिभः सोऽत्र तथेत्युक्त्वा व्यतिष्ठत ॥ १३१॥ नक्तं शय्याश्रितं तं च नृपमाशु ददंश सः। उत्तस्थौ च ततो राजा 'हा दष्टो स्मीति' स ब्रुवन् ॥१३२॥ ततः पलायिते तस्मिंस्त्वरितं मत्कुणे शठे। विचित्य राजभृत्यैः सा लब्ध्वा यूका व्यपाद्यत ॥१३३॥ एवं टीटिभसम्पर्कद्विष्टा मन्दविसर्पिणी। तत्सञ्जीवकसङ्गस्ते न शिवाय भविष्यति ॥१३४॥ न मे प्रत्येषि चेत्तत्त्वं स्वयं द्रक्ष्यस्युपागतम्। शिरो धुनन् दर्पेण शृङ्गयोः क्षुण्णशातयोः ॥१३५॥ इत्युक्त्वा विकृतिं तन नीतो दमनकेन सः। सिंहः पिङ्गलकश्चक्रे वध्यं सञ्जीवकं हृदि ॥१३६॥ लब्ध्वा तस्याशयं स्वैरं क्षणाद्दमनकस्ततः। तस्य सञ्जीवकस्यागात् स विषण्ण इवान्तिकम् ॥१३७॥ किमीदृगसि किं मित्र शरीरं कुशलं सखे। इति पृष्टश्च तेनात्र कृपणं स जगाद तम् ॥१३८॥ किं सेवकस्य कुशलं कश्च राज्ञां सदा प्रियः। कोऽर्थी न लाघवं यात कः कालस्य न गोचरः ॥१३९॥ इत्युक्तवन्तं पप्रच्छ तं म सञ्जीवकः पुनः। विमुद्विग्न इव त्वं कथ्यतामोग्यतामिति ॥१४०॥ ततो दमनकोऽवादीच्छृणु प्रीत्या वदामि ते। मृगराजो विरुद्धोऽसौ जात पिङ्गलकोऽद्य ते ॥१४१॥ निरपगोऽस्थिरस्नेहो हत्वा त्वां भोक्तुमिच्छति। हृद्यं परिच्छिदं चास्य पश्यामि प्रतनं सदा ॥१४२॥ १ रक्तम्।

दशम लम्बक ७८५

दशम लम्बक ७८५ मैं पहले कभी नहीं पिया हुआ राजा का रक्त-पान करूँगा इसलिए कृपा कर, और मुझे यहाँ रहने दे। इस प्रकार, उस खटमल ने जूँ से कहा ॥१२९॥ तब खटमल के अनुरोध से वह जूँ कहने लगी—'यदि ऐसा है तो रहो। लेकिन मित्र राजा को अनवसर (बे-मौके) न काटना। जब वह सोया हो या आनन्द-विलास में तन्मय हो तो धीरे से काटना। यह सुनकर वह टिट्टिभ खटमल ऐसा ही करूँगा कहकर वहीं रहने लगा ॥१३०-१३१॥ एक बार टिट्टिभ ने रात में सोये हुए राजा को शीघ्रता में जोर से काट लिया। तब राजा 'हाय ! काट लिया ! इस प्रकार कहकर उठ गया। इतने में उस दुष्ट खटमल के भागने पर और राजा के सेवकों के ढूँढ़ने पर उसे तो नहीं पाया किन्तु उस जूँ को पा लिया और उसे मसल डाला ॥१३२-१३३॥ इस प्रकार, टिट्टिभ नामक खटमल के सम्पर्क से बेचारी मन्दविसर्पिणी नामक जूँ मारी गई। अतः इस संजीवक का साथ तुम्हारे लिए कल्याणकारी नहीं होगा ॥१३४॥ यदि आप मेरा विश्वास नहीं करते हैं तो उसे स्वयं आये हुए देखेंगे कि वह क्रुद्ध के समान तीखे सींगों को घुमाता हुआ तुम्हारे सामने आयेगा ॥१३५॥ इस प्रकार, दमनक द्वारा डराये गये सिंह ने मन ही-मन संजीवक को मारने की सोच ली ॥१३६॥ सिंह के मन के भाव को समझकर दमनक वहाँ से चुपचाप खिन्न-सा होकर संजीवक के पास गया ॥१३७॥ 'कहो मित्र कैसे हो ? तुम्हारा शरीर तो ठीक है? बैल संजीवक के इस प्रकार पूछने पर दमनक उससे बोला-॥१३८॥ 'सेवक का क्या कुशल ? राजा का सदा प्यारा कौन रहा ? कौन याचक (माँगनेवाला) लघुता को प्राप्त नहीं होता और कौन मौत का शिकार नहीं होता ? ॥१३९॥ इस प्रकार कहते हुए दमनक से संजीवक ने फिर पूछा-आज तुम इस प्रकार की विरक्ति की बातें क्यों कर रहे हो ? ॥१४०॥ तब दमनक ने कहा-'सुनो। प्रेम के कारण तुमसे कहता हूँ। आज वह मृगराज (सिंह) निपट तुम्हारे विरुद्ध हो गया है। वह निरपेक्ष चंचल प्रेमवाला तुम्हें मारकर खाना चाहता है और मैं उसके हिंसक वृत्तिवाले सेवक साथियों को सदा तुम्हारे विरुद्ध प्रेरणा देते हुए देखता हूँ ॥१४१-१४२॥ ९९

प्रभुर्वैरित्थमेवेति तथा चेमां कथां शृणु ॥१४४॥

वचो दमनकस्यैतत् स पूर्वप्रत्ययादृजु । सत्यं विचिन्त्य वृषभो विमना निजगाद तम् ॥१४३॥ धिक्सेवाप्रतिपन्नोऽपि क्षुद्रः क्षुद्रपरिग्रहः । प्रभुर्वैरित्थमेवेति तथा चेमां कथां शृणु ॥१४४॥

मदोत्कटसिंहकथा

आसीन्मदोत्कटो नाम सिंहः क्वापि वनान्तरे । त्रयस्तस्यानुगाश्चासन् द्वीपिवायसजम्बुकाः ॥१४५॥ स सिंहोऽत्र वनेऽद्राक्षीददृष्टचरमेकदा । करभं सार्थविभ्रष्टं प्रविष्टं हासनाकृतिम् ॥१४६॥ कोऽयं प्राणीति साश्चर्यं वदत्यस्मिन् मृगाधिपे । उष्ट्रोऽयमिति वक्ति स्म देशदृष्टात्र वायसः ॥१४७॥ ततो दत्ताभयस्तेन सिंहेनानाय्य कौतुकात् । उष्ट्रः सोऽनुचरीकृत्य स्वान्तिकं स्थापितोऽभवत् ॥१४८॥ एकदा व्रणितोऽस्वस्थः स सिंहो गजयुद्धतः । उपवासान् बहूश्चक्रे स्वैश्चैस्तैः सहितोऽनुगैः ॥१४९॥ ततः क्लान्तः स भक्ष्यार्थं भ्रमन् सिंहोऽनवाप्य तत् । किं कार्यमित्यपृच्छत्तानुष्ट्रं मुक्त्वाऽनुगान्रहः ॥१५०॥ ते तमूचुः प्रभो वाच्यमस्माभिर्युक्तमापदि । उष्ट्रेण साकं किं सख्यं किं नासावेव भक्ष्यते ॥१५१॥ तृणाशी चायमस्माकं भक्ष्य एकाभिषाशिनाम् । बहूनामामिषस्यार्थे किं चक्रस्त्यज्यते न किम् ॥१५२॥ दत्ताभयः कथं हन्मीत्युच्यते प्रभुणा यदि । दापयामः स्ववाचा तद्युक्त्या सनुममूं वयम् ॥१५३॥ इत्युक्ते तैरनुज्ञातस्तेन सिंहेन वायसः । वधाय संविदं कृत्वा चरन् तमभाषत ॥१५४॥ एष स्वामी क्षुधाक्रान्तोऽप्यस्मान् वक्ति न किञ्चन । तदस्यात्मप्रदानेनोक्त्या प्रियं कुर्मो यथा वयम् ॥१५५॥ तथा त्वमपि कुर्वीथा येनासौ प्रीयते त्वयि । इत्युक्तो वायसनोष्ट्रं मायुस्तत्प्रत्यपद्यत ॥१५६॥

दशम लम्बक ७८७

दशम लम्बक ७८७ पहले के विश्वास के कारण सरल और उदासीन संजीवक बैल दमनक की बात सुनकर और उसे सत्य मानकर बोला—॥१४३॥ 'खेद है कि नीच परिजनों से घिरा हुआ नीच स्वामी सदा शत्रु ही बनता है। इस सम्बन्ध में यह कथा सुनो' ॥१४४॥ मदोत्कट सिंह की कथा किसी वन में मदोत्कट नाम का सिंह था और उसके तीन अनुचर थे—बाघ, कौआ और सियार ॥१४५॥ उस सिंह ने एक बार वन में पहले कभी न देखे हुए, अपने झुंड से अलग हुए और हँसने योग्य स्वरूपवाले ऊबड़-खाबड़ ऊँट के एक बच्चे को देखा ॥१४६॥ 'यह कौन जीव है! मृगराज के आश्चर्य के साथ ऐसा पूछने पर, अनेक देशों में भ्रमण किया हुआ कौआ बोला 'यह ऊँट है' ॥ १४७॥ तब सिंह ने उस विचित्र प्राणी को अभयदान देकर अपने पास रख लिया ॥१४८॥ एक बार हाथी के साथ युद्ध करने में सिंह आहत होकर अस्वस्थ हो गया और उसने उन स्वस्थ अनुचरों के साथ अनेक उपवास किये ॥१४९॥ तब भूख से व्याकुल सिंह ने घूमते हुए, कुछ न पाया तब ऊँट को छोड़कर अन्य तीन अनुचरों से एकान्त में उसने पूछा कि अब क्या करना चाहिए ? ॥१५० ॥ वे सब बोले-'स्वामिन् ! हमलोगों को आपत्ति के समय उचित ही कहना चाहिए। ऊँट के साथ हमलोगों की क्या मित्रता ? तो क्या न उसे ही खाया जाय ॥१५१॥ यह घास खानेवाला हम मांस खानेवालों का भक्ष्य तो है ही। बहुतों को मास खाने के लिए एक का ही बलिदान क्या न किया जाय ॥१५२॥ यदि स्वामी यह कहें कि अभय दिये गये प्राणी को कैसे मारा जाय तो हम लोग उपाय करके उसकी ही वाणी द्वारा उसका शरीर आपको अर्पण करा दें। इस प्रकार कहने पर सिंह द्वारा स्वीकृति पाकर कौआ अपने साथियों से ऊँट के वध का विचार करके उस ऊँट के बच्चे से बोला—॥१५३ १५४॥ कि हमारा यह स्वामी भूख से व्याकुल होने पर भी हम लोगों से कुछ नहीं कह रहा है। अतः अपने को प्रदान करने की बात कहकर हमलोगों को उसका प्रिय करना चाहिए ॥१५५॥ हमलोग तो ऐसा करेंगे ही पर तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिए, जिससे स्वामी हम पर प्रसन्न हों। कौए के इस प्रकार कहने पर ऊँट के उस सरल बच्चे ने उसकी इस बात को स्वीकार कर लिया ॥१५६॥

७८८ कथासरित्सागर

७८८ कथासरित्सागर उपाययौ च तं सिंहं सह काकेन तं स । ततः काकोऽब्रवीद्देव स्वायत्तं भुङ्क्ष्व मामिमम् ॥१५७॥ किं त्वया स्वल्पकायेनेत्युक्ते सिंहेन जम्बुकः । मां भुङ्क्ष्वेत्यवदत् तं स तथैव निराकरोत् ॥१५८॥ द्वीपी तमब्रवीद्देव मां भुङ्क्ष्वेति तमप्यसौ । मामुङ्क्त हरिरुष्ट्रोऽथ बभाषे भुङ्क्ष्व मामिति ॥१५९॥ व्याक्छलेन स तेनैव हत्वा कृत्वा च खण्डशः । उष्ट्रस्तैर्भक्षितः सर्वैः ससिंहैर्व्यासादिभिः ॥१६०॥ एवं केनापि पिशुनेनैष पिङ्गलको मयि । परितोऽकारण राजा प्रमाणमधुना विधिः ॥१६१॥ गृध्रोऽपि हि वरं राजा सेव्यो हंसपरिच्छदः । न गृध्रपरिवारस्तु हंसोऽपि किमुतापरः ॥१६२॥ एतत् सञ्जीवकच्छ्रुत्वाऽब्रवीद् दमनकोऽनृजुः १। धर्मेण साध्यते सर्वं शृणु वक्ष्यत्र ते कथाम् ॥१६३॥

टिट्टिभदम्पतीकथा

कोऽप्यासीट्टिट्टिभः पक्षी भार्यया वारिधेस्तटे । धृतगर्भा सती भार्या टिट्टिभी निजगाद तम् ॥१६४॥ एहि क्वाप्यन्यतो यावः प्रसूताया ममेह हि । हरेदपत्यानम्भोधिः कदाचिदयमूर्म्मिभिः ॥१६५॥ एतद् भार्यावचः श्रुत्वा टिट्टिभः स जगाद ताम् । न शक्नोति मया साकं विरोधं कर्तुमम्बुधिः ॥१६६॥ तच्छ्रुत्वा टिट्टिभी प्राह गर्वं का ते तुलाम्बुना । हितोपदेशोऽनुष्ठेयो विनाशः प्राप्यतेऽन्यथा ॥१६७॥

कूर्महंसकथा

तथा च कम्बुग्रीवाख्यः कूर्मः क्वापि सरस्यभूत् । तस्यास्तां सुहृदौ हंसौ नाम्ना विकटसङ्कटौ ॥१६८॥ १ बुद्धिः।

द्वादश लम्बक ४८९

द्वादश लम्बक ४८९ और, वह कौए के साथ ही सिंह के पास आया । जब कौए ने सिंह से कहा-'स्वामी मैं आपके अधीन हूँ मुझे खाओ' ॥१५७॥ 'छोटे-से शरीरवाले तुझे मारकर ही क्या होगा ?' —सिंह के ऐसा कहने पर शियार बोला 'मैं भी आपके अधीन हूँ अतः मुझे मारकर खा लें। तब सिंह ने उसे भी छोटे शरीरवाला बता कर दूर कर दिया ॥१५८॥ तब बाघ ने कहा-'मुझे मारकर खाओ। किन्तु सिंह ने उसे भी नहीं मारा। तब ऊँट ने कहा—'मुझे खाओ' ॥१५९॥ इस प्रकार, साथी के कपट से बाघ ने ही उसे मारकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया और उन सिंह, बाघ सियार तथा कौओं ने मिलकर उसे खा डाला ॥१६०॥ इसी प्रकार किसी चुगलखोर ने बिना किसी कारण ही मेरे विरुद्ध राजा पिङ्गलक को उभारा है। अब जो भाग्य में होगा वह होगा ॥१६१॥ यदि हंसों के परिवारवाला कौवा भी राजा हो तो उसकी सेवा करनी चाहिए, किन्तु गीधों से सेवित हंसराज की भी सेवा नहीं करनी चाहिए। दूसरों की तो बात ही क्या है ॥१६२॥ संजीवक से यह सुनकर कुटिल दमनक बोला- धीरज से सब काम सिद्ध होते हैं। इस विषय में कथा कहता हूँ, सुनो —॥१६३॥ टिट्टिभ-दम्पती की कथा समुद्र के किनारे एक टिट्टिहरा अपनी टिट्टिहरी के साथ रहता था। टिट्टिहरी गर्भवती होने पर अपने टिट्टिहरे से बोली—॥१६४॥ 'चलो कहीं दूसरी जगह चलें क्योंकि यहाँ पर मेरे प्रसव होने पर कभी समुद्र अपनी लहरा में मेरे अंडा का हरण न कर लें ॥१६५॥ टिट्टिहरी की यह बात सुनकर टिट्टिहरा उससे बोला कि समुद्र मेरे साथ विरोध नहीं कर सकता ॥१६६॥ यह सुनकर टिट्टिहरी बोली, ऐसा न कहो। समुद्र के साथ तेरी क्या बराबरी ! इसलिए, हितकारी उपदेश को मानना चाहिए। नहीं तो विनाश होगा ॥१६७॥ कछुए और हंस की कथा किसी तालाब में कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ था। उसी तालाब में रहनेवाले विकट और संकट नाम के दो हंस उसके मित्र थे ॥१६८॥

एकदावग्रह१क्षीणजले सरसि तत्र तौ। हंसावन्यत् सरो गन्तुकामौ कूर्मो जगाद सः ॥१६९॥ युवां यत्रोद्यतौ गन्तुं नयतं तत्र मामपि। तच्छ्रुत्वा तावुभौ हंसौ कूर्मं तं मित्रमूचतुः ॥१७०॥ सरो दूराद्दवीयस्तद्यत्रावां गन्तुमुद्यतौ। तत्रागन्तुं तवेच्छा चेत्कार्यमस्मद्वचस्त्वया ॥१७१॥ अस्मद्धृतां गृहीत्वैव वक्त्रेर्यष्टिं दिवि व्रजन्। निरालापोज्झिततृषा भ्रष्टो व्यापत्स्यसेऽन्यथा ॥१७२॥ तथेति तेन दन्ताग्रयष्टिना सह तौ नभः। कूर्मेणोत्पपतुर्हंसौ प्रान्तयोरात्तयष्टिकौ ॥१७३॥ क्रमाच्च तत् सरोऽन्यन्नं प्राप्तौ तौ कूर्महारिणौ। ददृशुस्तदधोवर्तिनगराश्रयिणो जनाः ॥१७४॥ किमेतन्नीयते चित्रं हंसाभ्यामिति तर्जनैः। क्रियमाणं कलकलं स कूर्मश्चपलोऽशृणोत् ॥१७५॥ कुत कलकलोऽसाविति वक्त्राद्विहाय ताम्। यष्टिं स पृच्छन्हंसौ तौ भ्रष्टो लग्न जनैर्भुवि ॥१७६॥ एव बुद्धिच्युतो नश्येत्कूर्मो यष्टिच्युतो यथा। इत्य तयोस्तट्टिभा टिट्टिभः स जगाद ताम् ॥१७७॥

त्रयाणां मत्स्यानां कथा

सत्यमेतत्प्रिये किं तु त्वमप्येतां कथां शृणु। नद्यन्तस्थ ह्रदेऽभूवन्क्वापि मत्स्याः पुरा त्रयः ॥१७८॥ अनागतविधातश्च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा। तृतीयो यद्भविष्यश्च त्रयस्त सहचारिणः ॥१७९॥ ते दाशानां वचा जातु तन् मार्गेण गच्छताम्। अहोऽस्मिन् ह्रदे मत्स्याः सन्तीति किल शुश्रुवुः ॥१८०॥ तदाकर्ण्य वच दाशैर्नदीश्चात्र प्रविश्य नः। अनागतविधाताथ बुद्धिमानन्यतो ययौ ॥१८१॥

१ अनावृष्टिः। २ मत्स्यजीविनाम् धीवराणाम्।

दशम लम्बक ४२१

दशम लम्बक ४२१ एक बार सूखा पड़ने के कारण तालाब के सूख जाने पर वे दोनों हंस किसी दूसरे तालाब में जाने को तैयार हुए। तब कछुए ने उनसे कहा ॥१६६॥ तुम आप जहाँ जाने को तैयार हो वहाँ मुझे भी ले चलो। यह सुनकर वे दोनों हंस उस मित्र कछुए से बोले-॥१६७ ॥ 'वह तालाब दूर है, जहाँ हमलोग जाने को उद्यत हैं। यदि तुम्हारी इच्छा वहाँ चलने की है, तो हमारी बात मानो ॥१७१॥ हम दोनों से पकड़ी गई लकड़ी को तुम बीच में दाँतों से पकड़कर लटक जाओ। किन्तु, उड़ते समय आकाश में चुप रहना, नहीं तो गिरकर मर जाओगे' ॥१७२॥ उनकी इस बात को स्वीकार कर दाँतों से लकड़ी को दोनों ओर से पकड़े हुए दोनों हंस आकाश में उड़ चले ॥१७३॥ क्रमशः उस तालाब के पास पहुँचने पर, कछुए को ले जाने हुए हंसों को देखकर नगर निवासी लोगों ने शोर मचाना शुरू किया कि देखो 'यह कैसा आश्चर्य है! हंस यह क्या ले जा रहे हैं! इस प्रकार के कोलाहल को चंचल कछुए ने सुना ॥१७४-१७५॥ 'नीचे यह कोलाहल क्या हो रहा है?' चंचलता से दाँतों से लकड़ी को छोड़कर हंसों से पूछा और लकड़ी से छूटने पर नीचे आ गिरा और लोगों ने उसे मार डाला ॥१७६॥ बुद्धिहीन व्यक्ति इसी प्रकार नष्ट होते हैं जैसे लकड़ी से गिरा कछुआ मारा गया। टिट्टिहरी के ऐसा कहने पर टिट्टिहरा उससे बोला-॥१७७॥ तीन मछलियों की कथा प्रिये, यह तो सत्य है, किन्तु तुम भी इस कथा को सुनो। किसी स्थान पर एक नदी के गड्ढे में तीन मत्स्य रहते थे ॥१७८॥ एक का नाम अनागतविधाता, दूसरे का नाम प्रत्युत्पन्नमति और तीसरे का नाम यद्भविव्य था। वे तीनों परस्पर सहवासी और मत्सारी थे ॥१७ ९ ॥ उन तीनों ने उस जलाशय के मार्ग से जाते हुए कुछ धीवरों (मल्लाहों) को यह कहते सुना कि इस जलाशय में मत्स्य हैं ॥१८ ० ॥ मछलीमारों की यह बात सुनकर उनके द्वारा मारे जाने के भय से बुद्धिमान् अनागत विधाता नाम का मत्स्य नदी के प्रवाह से छुपकर दूसरे स्थान पर चला गया ॥१८१॥

७९२ कथासरित्सागर

७९२ कथासरित्सागर प्रत्युत्पन्नमतिस्त्वासीत्त तत्रैवाविकम्पित । अह प्रतिविधास्यामि भयं चवापतेदिति ॥१८२॥ य मे भविष्यतीत्यासीद्यद्भविष्यस्तु तत्र स । अथागत्याक्षिपञ्जालं तत्र ते धीवरा हृदे ॥१८३॥ जालोत्क्षिप्तस्तु तै सद्य प्रत्युत्पन्नमति सुधी । कृत्वा निस्पन्दमात्मानं तिष्ठति स्म मृतो यथा ॥१८४॥ स्वयं मृतोऽयमिति तेष्वस्यत्सु तिमिघातिषु । पतित्वा स नदी स्रोतस्यगच्छद्द्रुतमन्यतः ॥१८५॥ यद्भविष्यस्तु जालान्तर्वर्त्तनविवर्त्तनं । कुर्वन् गृहीत्वा निहतो मन्दबुद्धि स धीवरैः ॥१८६॥ तस्मात्प्रतिविधास्येऽहं न यास्याम्यम्बुधेर्भयात् । टिट्टिभदम्पतीकथा (पूर्वानुसृता) इत्युक्त्वा टिट्टिभो भार्यां तत्रैवासीत् स्वनीडक ॥१८७॥ सत्राणोपीद्वचस्तस्य साहङ्कार महोदधि । दिवसेष्वथ प्रसूता सा तद्भार्या तत्र टिट्टिभी ॥१८८॥ जहार स ततोऽण्डानि तस्य जलधिरूर्मिणा । पश्यामि टिट्टिभोऽयं मे किं कुर्यादिति कौतुकात् ॥१८९॥ प्राप्तं तदेतद्व्यसनं यन्मयोक्तमभूत्तव । इत्याह रुदती सा तं टिट्टिभी टिट्टिभं पतिम् ॥१९ ॥ ततः स टिट्टिभो धीरस्तां स्वभार्यामिमापत । पश्येह किं करोम्यस्य पापस्य जलधेरहम् ॥१९१॥ इत्युक्त्वा पक्षिणः सर्वान् सङ्घाटोद्योतपरावरान् । गत्वा तै सह शत्रन्द शरणं गरुडं प्रभुम् ॥१९२॥ अब्धिमाण्डापहारेण वयं नाथे सति त्वयि । अनाथवत्पराभूता इत्यूचुस्तं च ते खगाः ॥१९३॥ ततः क्रुद्धेन तार्क्ष्येण विज्ञप्तो हरिरम्बुधिम् । आग्नेयास्त्रेण संशोष्य टिट्टिभाण्डान्यदापयत् ॥१९४॥ तस्मादत्यक्तधैर्य्येण भाव्यमापदि धीमता । उपस्थितमिदानीं तु युद्धं विद्धस्वन ते ॥१९५॥

प्रथम स्तब्धक ७९१ प्रतिभासम्पन्न प्रत्युत्पन्नमति नाम का मच्छ निडर होकर वहीं रह गया। उसने सोचा कि जब भय सिर पर आ जायगा तब उसी समय उसका प्रतीकार किया जायगा ॥१८२॥ और, तीसरा यद्भविष्य यही सोचता रहा कि जैसा मेरा भविष्य होगा देखा जायगा। कुछ समय के पश्चात् धीवरों ने वहाँ आकर जाल लगाया ॥१८३॥ उन धीवरों ने जाल में फँसे हुए प्रत्युत्पन्नमति को मुर्दे के समान निश्चेष्ट देखकर मरा हुआ सा समझा और अपने-आप मरा जानकर उसे मारा नहीं बल्कि किनारे पर रख दिया किन्तु वह उछलकर फिर नदी के प्रवाह में गिरकर दूसरी ओर भाग गया ॥१८४-१८५॥ और, मन्दबुद्धि यद्भविष्य जाल में फँसकर इधर-उधर तड़फता हुआ धीवरों द्वारा मार डाला गया ॥१८६॥ इसलिए, मैं भी समय आने पर प्रतीकार करूँगा किन्तु समुद्र के भय से यहाँ से भागूँगा नहीं ॥१८७॥ टिट्टिभ-दम्पती की कथा (क्रमागत) ऐसा कहकर और पत्नी को धीरज बँधाकर टिट्टिहरा अपने घोंसले में ही डटा रहा ॥१८८॥ वहीं पर महासमुद्र उस टिट्टिहरे की अभिमानपूर्ण बातें सुनता रहा। कुछ दिनों में समय आने पर टिट्टिहरी ने अण्डे दिये ॥१८८॥ तब समुद्र ने टिट्टिहरे का तमाशा देखने की इच्छा से कि यह मेरा क्या बिगाड़ सकता है अपनी लहरों से उसके अण्डों को बहा लिया ॥१८९॥ तब टिट्टिहरी अपने पति से रोती हुई बोली कि मैं जो पहले से कह रही थी वही विपत्ति सिर पर आ गई ॥१९०॥ तब वह धैर्यशाली टिट्टिहरा अपनी टिट्टिहरी से बोला-देख मैं इस समुद्र का क्या करता हूँ ॥१९१॥ ऐसा कहकर उसने सभी पक्षियों को एकत्र करके अपनी दुर्दशा बताई और उनके साथ जाकर अपने राजा गरुड़ की शरण ली ॥१९२॥ उस गरुड़ से सब पक्षियों ने निवेदन किया कि 'महाराज आपके स्वामी रहते हुए हम लोग अनाथों के समान तिरस्कृत हो रहे हैं ॥१९३॥ तब वृद्ध गरुड़ के निवेदन करने पर भगवान् विष्णु ने आग्नेय अस्त्र से समुद्र को सुखाकर उसके अण्डे दिलवा दिये ॥१९४॥ इसलिए, बुद्धिमान् व्यक्ति को आपत्ति के समय धैर्य न छोड़कर, दृढ़ रहना चाहिए। अब तो इसी समय पिंगलक सिंह के साथ तेरा युद्ध होनेवाला है ॥१९५॥ १

७९४ कथासरित्सागर

७९४ कथासरित्सागर

यदवोक्षिप्तलाङ्गूलमुद्धतुंमिदंधरणीं क्षमम्। उत्थास्यति स ते विद्या प्रजिहीर्षुं तदैव तम् ॥१९६॥ सज्ज्यो नतशिरा भूत्वा शृङ्गाभ्यामुदरं च तम्। हत्वाभिपातितं कुर्यात् कीर्णान्त्रनिकरं रिपुम् ॥१९७॥ एवमुक्त्वा दमनकः सञ्जीवकवधे स तम्। गत्वा करटकायासीत्¹ सिद्धभेदौ शशंस तौ ॥१९८॥ ततः सञ्जीवकः प्रायाच्छनैः पिङ्गलकान्तिकम्। जिज्ञासुरिङ्गिताकारैश्चित्तं तस्य मृगप्रभोः ॥१९९॥ न्यञ्चोक्षिप्तनलाङ्गूलं युयुत्सुं तं समाद्दिधक्रम्। सिंह सिंहोऽप्यपश्यत्तं दृङ्गोद्भूतस्वमन्तकम् ॥२००॥ ततः प्राहरदुत्पत्य स सिंहोऽस्मिन् वृषे नखैः। वृषोऽपि तस्मिञ्छृङ्गाभ्यां प्रावर्तिष्टाहवस्तयोः ॥२०१॥ तच्च दृष्ट्वा दमनकं साधु करटकोऽब्रवीत्। किं स्वार्थसिद्धये व्यसनं प्रभोरुत्पादितं त्वया ॥२०२॥ सम्प्रत्यजानुतापेन भक्षी धाक्ष्यत कामिनी। पाष्याणावृता मित्रं न चिरस्थायिनी भवेत् ॥२०३॥ यस्य वा यो बहु ब्रूते हितवाक्यावमानिनः। स तस्माल्लभते दोषं कपेः सूचीमुखो यथा ॥२०४॥

कपेः सूचीमुखस्य च कथा

पूर्वमासन् वने क्वापि वानरा यूथचारिणः। ते शीते ऋतुं खद्योत दृष्ट्वाग्निरिति मेनिरे ॥२०५॥ तस्मिंश्च तृणपर्णानि विन्यस्याङ्गमतापयन्। एकस्तु तेषां खद्योतमधमत् मुखानिलैः ॥२०६॥ तद्दृष्ट्वा तत्र तं प्राह पक्षी सूचीमुखाभिधः। नैषोऽग्निरेष खद्योतो मा क्लेशमनुभूदिति ॥२०७॥ तच्छ्रुत्वाप्यधिकं तं पक्षी सोऽभ्येत्य भृशत। न्यवारयन्निर्बन्धात् कपिस्तेन चुकोप सः ॥२०८॥


१ सिद्ध = निश्चितं भेदो ययोस्तौ नृपतिवृषौ।

दशम लम्बक ७१५

दशम लम्बक ७१५ जबी वह पूंछ को ऊपर करके चारों पैरों को एक साथ ही उठायेगा तब तुम उसे अपने ऊपर प्रहार करनेवाला समझना ॥१९६॥ तुम भी तैयार रहकर नीचे सिर करके अपने दोनों सींगों से उसके पेट में आघात करके गिराये हुये शत्रु की अंतड़िया को निकाल लेना' ॥१९७॥ दमनक इस प्रकार संजीवक बैल से कहकर करटक के पास गया और दोनों का विरोध उसे सुनाया ॥१९८॥ तब संजीवक धीरे से पिंगलक की भाव-भंगियों से उसके चित्त को समझने के लिए उसके पास गया और उसे पूंछ उठाकर चारों पैरों को एक साथ उठाये हुए देखा। सिंह ने भी शंका से अपने सिर को हिलाते हुए उसे देखा ॥१९९-२००॥ तब सिंह ने उठकर बैल को नखों से मारा और बैल ने सींगों से उस पर प्रहार किया। इस प्रकार दोनों का युद्ध आरम्भ हुआ ॥२०१॥ यह देखकर साधु करटक दमनक से बोला-तूने अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए स्वामी पर नई विपत्ति खड़ी कर दी' ॥२०२॥ प्रजा को सताकर प्राप्त की गई सम्पत्ति धूर्तता से की गई मित्रता और कठोरता से हरण की गई कामिनी चिरकाल तक नहीं रहती ॥२०३॥ हितकारी बातों का अपमान करनेवाले से जो बहुत कहता है वह उससे बुराई ही पाता है। जैसे सूचीमुख ने बन्दर से बुराई प्राप्त की ॥२०४॥ सूचीमुख पक्षी और बन्दर की कथा पहले समय किसी वन में झुंड के साथ विचरनेवाले बन्दर रहते थे। उन्होंने कभी शीतकाल में चमकते हुए जुगनू को देखकर उसे आग की चिंगारी समझा और उस पर घास और सूखे पत्ते डालकर शरीर को सेकने लगे ॥२०५-६॥ उनमें से एक बन्दर ने मुख से फूंक लगाकर उस जुगनू को जलाने की चेष्टा की ॥२०७॥ यह देखकर सूचीमुख नाम का पक्षी उस बन्दर से बोला- यह आग नहीं, जुगनू है। इस फूंकने का व्यर्थ प्रयत्न न करो। यह सुनकर भी न माननेवाले और बार-बार फूँकते हुए बन्दर के पास पेड़ से नीचे आकर उस पक्षी ने आग्रहपूर्वक उसे रोका किन्तु उससे रुष्ट होकर उस ही गया ॥२०८-२०९॥

७९९ कथासरित्सागर

७९९ कथासरित्सागर क्षिप्तया शिलया तं च सूचीमुखमचूर्णयत्। तस्मान्न तस्य वक्तव्यं यः कुर्यान्न हितं वचः॥२०९॥ अतः किं वच्मि दोषाय भवेस्तावत् कृतस्त्वया। दुष्ट्या क्रियते यच्च बुद्ध्या तन्न शुभं भवेत्॥२१०॥ धर्मबुद्धिदुष्टबुद्धिवणिजोः कथा तथा चाभवतां पूर्वं भ्रातरौ द्वौ वणिक्सुतौ। धर्मबुद्धिस्तथा दुष्टबुद्धिः क्वचन पत्तने॥२११॥ तावथार्थं पितुर्गेहाद् गत्वा देशान्तरं सह। कथञ्चित् स्वर्णदीनारसहस्रद्वयमापतुः॥२१२॥ तद्गृहीत्वा स्वनगरं पुनराजग्मतुश्च तौ। वृक्षमूले च दीनारान् भूतले तान् न्यखनतुः॥२१३॥ शतमेकं गृहीत्वा च दीनाराणां विभज्य च। परस्परं समांशेन तस्थतुः पितृवेश्मनि॥२१४॥ एकदा दुष्टबुद्धिः स गत्वा स्रस्तराक्षसतः। एक एवाग्रहीत् सर्वान् दीनारांस्तानसद्धयधीः॥२१५॥ मासमात्रे गते स च धर्मबुद्धिमुवाच सः। एह्यार्य विभजावांस्तान् दीनारानस्ति मे व्ययः॥२१६॥ तच्छ्रुत्वा धर्मबुद्धिस्तां गत्वा भूमिं तथेति सः। चखान तेनैव समं दीनारा यत्र तान्न्यधात्॥२१७॥ सम्प्राप्ता न यदा स च दीनारा ज्ञातखाततः। तदा स दुष्टबुद्धिस्तं धर्मबुद्धिं शठोऽब्रवीत् ॥२१८॥ नीतास्तं भवता तन्मे स्वमर्धं दीयतामिति । न ते नीता मया नीतास्त्वयेत्याह स्म तं च सः॥२१९॥ एवं प्रवृत्ते कलहे साक्रन्दमा ताडयञ्छिरः। दुष्टबुद्धी राजकुलं धर्मबुद्धिं निनाय च॥२२० ॥ तत्रोक्तस्वस्वपक्षौ तावनासादितनिश्चयैः। स्थापितावा निश्छेदुभौ राजाधिकारिभिः॥२२१॥ यस्य मूले न्यधीयन्त दीनारास्तं वनस्पतेः। स साक्षी वक्ति यन्नीतास्त्वमुना धर्मबुद्धिना॥२२२॥

धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि वैश्यों की कथा

और, उसने पत्थर से मारकर, उस सूचीमुख के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। इसलिए, उससे हित की बात कभी न कहनी चाहिए, जो न माने ॥२१॥ 'अब मैं क्या कहूँ तूने इन दोनों में भेद कराकर अहित किया है। दुष्ट बुद्धि से जो भी किया जाता है, वह शुभ (अच्छा) नहीं होता' ॥२१ ॥ धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि वैश्यों की कथा प्राचीन समय में किसी नगर में धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि नाम के दो वणिकपुत्र थे। वे दोनों धन कमाने के लिए अपने पिता के घर से दूसरे देश में गये और दैवयोग से उन्होंने दो सहस्र दीनार कमाये ॥२११-२१२॥ उन्हें लेकर वे अपने घर लौट आये और उन्होंने एक वृक्ष के नीचे उन दीनारों को गाड़ दिया ॥२१३॥ और, एक सौ दीनार लेकर तथा पिता की सम्पत्ति का बराबर बँटवारा करके वे पिता के घर में रहने लगे ॥२१४॥ एक बार, व्यर्थ व्यय करनेवाला दुष्टबुद्धि वन में जाकर उस वृक्ष के नीचे गड़े सारे धन को अकेले ही निकाल लाया ॥२१५॥ एक महीना बीत जाने पर दुष्टबुद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा—'चलो उन दीनारों का भी बँटवारा कर लें। इस समय मुझे कुछ व्यय की आवश्यकता है' ॥२१६॥ यह सुनकर धर्मबुद्धि ने उसी दुष्टबुद्धि के साथ जाकर उस स्थान को खोदा जहाँ दीनार गड़े थे ॥२१७॥ जब उस गड्ढे से दीनार न मिले तब दुष्टबुद्धि धर्मबुद्धि से बोला—'तू ही सारे दीनार निकाल ले गया। उनमें से आधा मुझे दे। धर्मबुद्धि बोला—'उन्हें मैं नहीं ले गया तू ही ले गया है' ॥२१८-२१९॥ इस प्रकार, कलह होने पर दुष्टबुद्धि ने पत्थर से अपना सिर फोड़ लिया और धर्मबुद्धि को न्यायालय में ले जाकर उस पर अभियोग (मुकदमा) कर दिया ॥२२ ॥ न्यायालय में अपने-अपने पक्ष की बात कहते हुए उन दोनों को अधिकारियों ने दिन-भर वहीं बैठाये रखा ॥२२१॥ तब दुष्टबुद्धि ने कहा—'जिस वृक्ष के नीचे दीनार गड़े थे वह वृक्ष साक्षी है और वह कहता है कि दीनार धर्मबुद्धि ने लिये'॥२२२॥

४१८ कथासरित्सागर

४१८ कथासरित्सागर

इत्युवाचाथ तान् दुष्टबुद्धी राजाधिकारिणः । द्रक्ष्यामस्तर्हि तं प्रातरित्यूचुस्तेऽतिविस्मिताः ॥२२३॥ ततस्तं धर्मबुद्धिश्च दुष्टबुद्धिश्च तावुभौ । दत्तप्रतिभुवो मुक्तौ विमिश्रौ जग्मतुर्गृहम् ॥२२४॥ दुष्टबुद्धिस्तु गत्वाथ तत्त्वार्थं पितरं रहः । भव मे वृक्षगर्भान्तः स्थित्वा साक्षीत्ययाचत ॥२२५॥ बाढमित्युक्तवन्तं च नीत्वा महति कोटरे । निवेश्य च तरोस्तत्र रात्रौ स गृहमाययौ ॥२२६॥ प्रातश्च राजाधिकृतैः सह तौ भ्रातरौ तरुम् । गत्वा पप्रच्छतुः कस्तान् दीनारान् नीतवानिति ॥२२७॥ दीनारान् धर्मबुद्धिस्तान् नीतवानिति स स्फुटम् । तद्वृक्षकोटरान्तःस्थस्तत्साऽभाषत तत्पिता ॥२२८॥ तदसम्भाव्यमाकर्ण्य निश्चितं दुष्टबुद्धिना । अत्रान्तःस्थापितः कोऽपीत्युक्त्वाधिकृताश्च ते ॥२२९॥ तद्गर्भे दधुर्धूमं येनाध्मातः स निर्सरन् । निपत्याधोगतः क्ष्मायाँ दुष्टबुद्धिपिता मृतः ॥२३०॥ तद्दृष्ट्वा वस्तु बुद्ध्वा च राजाधिकृतकः स तैः । दापितो दुष्टबुद्धिस्तान् दीनारान् धर्मबुद्धये ॥२३१॥ निकृत्तहस्तजिह्वश्च तैः स निर्वासितस्ततः । दुष्टबुद्धिर्यथार्हस्यो धर्मबुद्धिश्च मानितः ॥२३२॥ एवमन्याय्यया बुद्ध्या कृतं कर्माशुभावहम् । तस्मान्न्याय्यया कुर्याद्बकेनाहेः कृतं यथा ॥२३३॥

बकसर्पयोः कथा

पूर्वं बकस्य कस्यापि जातं जातमभक्षयत् । भुजगोऽप्रत्यमागस्य स सन्तेपे ततो बकः ॥२३४॥ तदुपदेशात्तेनाथ बकेन नकुलालयात् । आहालाहिबिलं यावन्मत्स्यमांसं व्यकीर्यत ॥२३५॥ निर्गत्य नकुलस्तच्च खादंस्तदनुसारतः । दृष्ट्वा बिलं प्रविष्टस्तं सापत्यमवधीदहिम् ॥२३६॥

दशम लम्बक ७१९

दशम लम्बक ७१९ तब वे अत्यन्त चकित राजकर्मचारी बोले कि 'प्रात:काल ही चलकर उस वृक्ष का साक्ष्य (गवाही) लेंगे। तब उन्होंने दुष्टबुद्धि और धर्मबुद्धि दोनों को जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये ॥२२३-२२४॥ दुष्टबुद्धि ने घर जाकर अपने पिता से सब सच्चा-झूठा समाचार सुनाया और कहा कि 'तुम उस वृक्ष के अन्दर बैठकर मेरा साक्षी (गवाह) बनो ॥२२५॥ 'अच्छा' इस प्रकार कहे हुए अपने पिता को ले जाकर दुष्टबुद्धि ने उस वृक्ष के खोखले में रात को ही उसे बैठा दिया और अपने घर चला आया ॥२२६॥ प्रातःकाल न्यायाधीश के साथ वे दोनों भाई उस वृक्ष के पास पूछने लगे कि 'यहाँ से उन दीनारों को कौन ले गया?' ॥२२७॥ 'उन दीनारों को धर्मबुद्धि ले गया'—ऐसा उस वृक्ष के कोटर में बैठे हुए उसके पिता ने स्पष्ट कहा। न्यायाधिकारी इस बात को असम्भव जानकर समझ गये कि दुष्टबुद्धि ने अवश्य ही इसके भीतर किसी को छिपा रखा है ॥२८२२ ॥ ऐसा सोचकर उन्होंने उस वृक्ष के कोटर में धुआं किया जिससे तीव्र होने पर उससे निकलता हुआ दुष्टबुद्धि का पिता पृथ्वी पर गिरकर मर गया ॥२२९॥ यह देखकर न्यायाधिकारियों ने दुष्टबुद्धि से आधे दीनार धर्मबुद्धि को दिलाकर और उसका हाथ तथा जीभ काटकर नगर से निकाल दिया। साथ ही उस धर्मबुद्धि का उन्होंने सम्मान किया ॥ २३० ॥ इस प्रकार अन्याय की बुद्धि से किया हुआ काम अशुभ और अकल्याण देनेवाला होता है। इसलिए किसी भी काम को न्यायबुद्धि से करना चाहिए। जैसा कि समुद्र ने मन्दरे से दिया ॥ २३१॥ शौर और बच्चे की कथा यह सुनकर वे नदी पर गए और वहां से खोह के भीतर घुसकर देख रहे थे कि उनके आगे बाघ का एक बच्चा था। उस बालक को वह कुरीति वाला ॥२३२॥ उस बहली के कथनानुसार बाघ ने अपने दो दिलों में से एक मांस के टुकड़े तक अपनी का मुख छिपा दिया। २३३॥ ऐसा करके दिल से छिन्नकर बच्चे का मुख कलेजाने बदलकर बाघ के दिल तक चला गया और उसने जानकर अपने खोह के बच्चे के अन्य अंगों को भी खा डाला ॥२३४॥

७९८ कथासरित्सागर

७९८ कथासरित्सागर इत्युवाचाथ तान् दुष्टबुद्धी राजाधिकारिणः । पश्यामस्तर्हि श्वः प्रातरित्यूचुस्तेऽतिविस्मिताः ॥२२३॥ ततस्तैर्धर्मबुद्धिश्च दुष्टबुद्धिश्च तावुभौ । दत्तप्रतिभुवौ मुक्तौ विभिन्नौ जग्मतुर्गृहम् ॥२२४॥ दुष्टबुद्धिस्तु वस्तूक्त्वा दत्त्वार्थं पितरं रहः । भव मे वृक्षगर्भान्तः स्थित्वा साक्षीत्ययाचत ॥२२५॥ बाढमित्युक्तवन्तं च नीत्वा महति कोटरे । निवेश्य तं तरोस्तत्र रात्रौ स गृहमाययौ ॥२२६॥ प्रातश्च राजाधिकृतैः सह तौ भ्रातरौ तरुम् । गत्वा पप्रच्छतुः कस्मान् दीनारान् नीतवानिति ॥२२७॥ दीनारान् धर्मबुद्धिस्तान् नीतवानिति स स्फुटम् । तद्वृक्षकोटरान्तःस्थस्ततोऽभाषत तत्पिता ॥२२८॥ तदसम्भाव्यमाकर्ण्य निश्चित्य दुष्टबुद्धिना । अत्रान्तःस्थापितः कोऽपीत्युक्त्वाधिकृतैस्तरुः स च ॥२२९॥ तद्गर्भे दधुर्धूमं येनाध्मातः स निस्सरन् । निपत्याधोगतः क्ष्मायां दुष्टबुद्धिपिता मृतः ॥२३०॥ तद्दृष्ट्वा वस्तु बुद्ध्वा च राजाधिकृतकैः स तैः । दापितो दुष्टबुद्धिस्तान् दीनारान् धर्मबुद्धये ॥२३१॥ निकृत्तहस्तजिह्वश्च तैः स निर्वासितस्ततः । दुष्टबुद्धियथार्थोऽभूद् धर्मबुद्धिश्च मानितः ॥२३२॥ एवमन्याय्यया बुद्ध्या कृतं कर्माशुभावहम् । तस्मात्सन्याय्यया कुर्याद्वकबन्नाहेः कृतं यथा ॥२३३॥ बकसर्पयोः कथा पूर्वं बकस्य कस्यापि जातं जातमभक्षयत् । भुजगोऽपत्यमागत्य स सन्तप्ते ततो बकः ॥२३४॥ मन्त्रोपदेशात्तेनाथ बकेन नकुलालयात् । आरुह्याहिविलं यावन्मत्स्यमांसं व्यकीर्यत ॥२३५॥ निर्गत्य नकुलस्तच्च खादंस्तदनुसारतः । दृष्ट्वा बिलं प्रविष्टस्तं सापत्यमवधीदहिम् ॥२३६॥

द्वादश लम्बक ७९९

द्वादश लम्बक ७९९ तब वे अत्यन्त चकित राजकर्मचारी बोले कि 'प्रातःकाल ही चलकर उस वृक्ष का साक्ष्य (गवाही) लेंगे। तब उन्होंने दुष्टबुद्धि और धर्मबुद्धि दोनों को जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये ॥२२३-२२४॥ दुष्टबुद्धि ने घर जाकर अपने पिता से सब सच्चा-झूठा समाचार सुनाया और कहा कि 'तुम उस वृक्ष के अन्दर बैठकर मेरा साक्षी (गवाह) बनो'॥२२५॥ 'अच्छा' इस प्रकार कहे हुए अपने पिता को ले जाकर दुष्टबुद्धि ने उस वृक्ष के खोखले में रात को ही उसे बैठा दिया और अपने घर चला आया ॥२२६॥ प्रातःकाल न्यायाधीक्षों के साथ वे दोनों भाई उस वृक्ष से जाकर पूछने लगे कि 'यहाँ से उन दीनारों को कौन ले गया? ॥२२७॥ 'उन दीनारों को धर्मबुद्धि ले गया'-ऐसा उस वृक्ष के कोटर में बैठे हुए उसके पिता ने स्पष्ट कहा। न्यायाधिकारी इस बात को असम्भव जानकर समझ गये कि दुष्टबुद्धि ने अवश्य ही इसके भीतर किसी को छिपा रखा है ॥२८२९॥ ऐसा सोचकर उन्होंने उस वृक्ष के कोटर में धूँआँ किया जिसके तीव्र होने पर उसमें निकलता हुआ दुष्टबुद्धि का पिता पृथ्वी पर गिरकर मर गया ॥३० ॥ यह देखकर न्यायाधिकारियों ने दुष्टबुद्धि से आधे दीनार धर्मबुद्धि को दिलवाये और उसका हाथ तथा जीभ काटकर वहाँ से निकाल दिया। साथ ही उस धर्मबुद्धि का उन्होंने सम्मान किया ॥२३१-३२॥ इस प्रकार अन्याय की बुद्धि से किया हुआ काम अशुभ और अनर्थफल देनेवाला होता है। इसलिए किसी भी काम को न्याय-बुद्धि से करना चाहिए। जैसा कि बगुले ने न्योले से किया ॥२३३॥ साँप और बगुले की कथा बहुत समय से वहीं पर एक साँप बगुले के घोंसले में आकर उत्पन्न हुए नवागंतुक उसके बच्चों को खा जाता था। इस कारण बगुला बहुत दुःखी था ॥२३४॥ एक मछली के कथनानुसार बगुले ने न्योले के बिल से लेकर साँप के बिल तक मछली का माँस बिखेर दिया ॥२३५॥ नेवला अगले दिन से निकलकर मछली का माँस खाते-खाते अन्धकार साँप के बिल तक चला आया और उपाय समझकर उसने साँप के बच्चों के साथ साँप को भी मार डाला ॥२३६॥

८० कथासरित्सागर

८० कथासरित्सागर लौहतुलावैश्यपुत्रयोः कथा एव भवत्युपायेन कार्यमन्यच्च मे शृणु। आसीत्कोऽपि तुलालक्ष पित्र्यार्थान्त्राप्तुमिप्सुतः ॥२३७॥ अयःपद्महस्रेण घटितां तां तुलां च सः। कस्यापि वणिजो हस्ते न्यस्य देशान्तरं ययौ ॥२३८॥ आगतश्च ततो यावत्तामृगयते तुलाम्। आखुभिर्भक्षिता सेति तावत्त सोऽब्रवीद्वणिक ॥२३९॥ सत्यं सुस्वादु तत्स्नेह सेन जग्ध सवाखुभिः। इति सोऽपि तमाह स्म वणिक्पुत्रो हसन्हृदि ॥२४०॥ प्रार्थयामास च ततो वणिजोऽस्मात्स भोजनम्। सोऽपि सन्तुष्य तत्तस्मै प्रदातुं प्रत्यपद्यत ॥२४१॥ ततः स सह कृत्वान्यं वणिजः पुत्रमर्भकम्। स्नातुं वणिक्सुत प्रायात्तामलकमात्रकम् ॥२४२॥ स्नात्वार्भकं से निक्षिप्य गुप्तं क्वापि सुहृद्गृहे। एक एवाययौ तस्य स धीमान्वणिजो गृहम् ॥२४३॥ अर्भकः क्व स इत्येव पृच्छन्तं वणिजं च तम्। श्येनेन सोऽर्भको नीत साभिप्रयत्युवाच सः ॥२४४॥ प्लावितो मे त्वया पुत्र इति क्रुद्धेन तेन च। नीत स वणिजा राजकुलेऽप्याह स्म तत्त्तथा ॥२४५॥ असम्भाव्यमिदं श्येनो नयेत् कथमिवारर्भकम्। इति सभ्यैश्च तत्रोक्ते वणिक्पुत्रो जगाद सः ॥२४६॥ मूषकैर्भक्ष्यते लोही देशे यत्र महातुला। तत्र द्विपमपि श्येनो नयेत्किं पुनरर्भकम् ॥२४७॥ तच्छ्रुत्वा कौतुकात् पृष्टवृत्तान्तेस्तस्य वादिना। सभ्यैस्तुला सा तेनापि स आनीयार्पितोऽर्भकः ॥२४८॥ इत्युपायेन घटयन्त्यभीष्टं बुद्धिशालिनः। त्वया तु साहसेनेव सन्देहे प्रापितं प्रभुः ॥२४९॥ एतत्करटकाच्छ्रुत्वाऽवादीद्दमनको ह्यनू। नैवं किमक्षयुद्धेऽस्ति सिंहस्य जयसंशयः ॥२५०॥ मत्तेभवक्षनाघातघनव्रणविभूषणः। क्व केसरी क्व चान्तश्च प्रतोदक्षतविग्रहः ॥२५१॥