कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
२१४ कथासरित्सागर
२१४ कथासरित्सागर जातिस्मरोऽहं भूयासं राजपुत्रोऽन्यजन्मनि । एषा च तत्र मे भार्या भूयाज्जातिस्मरा सती ॥१८५॥ इति सङ्कल्प्य तं देहं तदा सस्मृत्य शङ्करम्। विरहानलसन्तप्तं समुद्राम्भस्यपातयत् ॥१८६॥ ततोऽयं वत्सराजस्य कौशाम्ब्यां तनयोऽधुना। नरवाहनदत्ताख्यो जातो जातिस्मरः शुभे ॥१८७॥ असौ विद्याधरेन्द्राणां चक्रवर्ती भविष्यति । इति वागुदभूद्दिव्या जातस्यास्य स्फुटं तदा ॥१८८॥ क्रमण यौवराज्यस्थः पित्राथ परिणायितः । दिव्यां कामरसम्भूतां देवीं मदनमञ्चुकाम् ॥१८९॥ ततो हेमप्रभाख्यस्य विद्याधरपतेः सुता। एत्य स्वयं वृतवती कन्या रत्नप्रभेत्यमुम् ॥१९०॥ तथापि तां स्मरन्नृत्सीं नायं भजति निर्वृतिम्। एतच्च बालभृत्याय मह्यमेतेन वर्णितम् ॥१९१॥ अथास्य मृगयायातस्यासीत्सन्दर्शनं वने । कयापि सिद्धतापस्या मद्वितीयस्य दैवतः ॥१९२॥ कथाप्रसङ्गात्सा चैतमेव सानुग्रहाब्रवीत्। कर्मयोगात्पुरा पुत्र कामो हंसत्वमागतः ॥१९३॥ तस्य चाम्बुनिधीरतस्थचन्दनद्रुमवासिनः । प्रिया भार्याभवद्बत्सी दिव्यस्त्री शापतश्च्युता ॥१९४॥ वेलाजलहुतापरयशोकस्तस्यां च वारिधौ। क्षिप्तात्मनि स हंसोऽपि तत्रेवात्मानमक्षिपत् ॥१९५॥ सोऽद्य शम्भोः प्रसादात्त्वं जातो वत्सेश्वरात्मजः । पूर्वजातिं च तां वत्स वेत्सि जातिस्मरो ह्यसि ॥१९६॥ सा ह्यस्त्येवमेवाम्भोः पारे कर्पूरसम्भवे। पुरे कर्पूरिका नाम जाता राजसुताधुना ॥१९७॥ तद्गच्छ तत्र पुत्र त्वं प्रियां भार्यामवाप्स्यसि । इत्युक्त्वा सा समुत्पत्य तिरोभूत्सिद्धतापसी ॥१९८॥ अयं चास्मत्प्रभुर्जातप्रभृतिस्तत्क्षणं ततः। इतोऽभिमुखमागन्तुं प्रावर्त्तत मया सह ॥१९९॥
सप्तम लम्बक २१५
सप्तम लम्बक २१५ कि 'मैं अगले जन्म में पूर्व जन्म का स्मरण करनेवाला राजपुत्र बनूँ और यह मेरी सती पत्नी भी पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली राजकुमारी बने'। ऐसा संकल्प करके और मन में शंकर का ध्यान कर इसने भी समुद्र में कूदकर प्राण दे दिये। तदनन्तर वह हंस इस जन्म में कौशाम्बी नगरी में वत्सराज उदयन के यहाँ नरवाहनदत्त नामक पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ और यह पूर्व जन्म का स्मरण करता है॥१८५-१८७॥ 'यह विद्याधर-राजाओं का चक्रवर्ती सम्राट् होगा'—ऐसी दिव्य वाणी उसके उत्पन्न होने पर स्पष्ट रूप से हुई थी॥१८८॥ क्रमशः युवराज-पद पर अभिषिक्त इसका विवाह पिता ने किसी कारण-वश मनुष्य जाति में उत्पन्न दिव्य कन्या मदनमञ्चुका के साथ करा दिया॥१८९॥ तदनन्तर हेमप्रभ नामक विद्याधर-राज की कन्या रत्नप्रभा ने स्वयं आकर इसका वरण किया है॥१९०॥ तो भी यह अपने पूर्वजन्म की प्राणप्यारी पत्नी हंसिनी को याद करके क्षण भर भी सुख या शान्ति नहीं प्राप्त करता है। यह बात इसने अपने बालमित्र मुझसे पहले कही थी॥१९१॥ तदनंतर, एक बार मेरे साथ जंगल में शिकार खेलते हुए उसे किसी सिद्ध तपस्विनी के दर्शन हुए। वार्तालाप के सिलसिले में तपस्विनी ने कहा कि 'पुत्र ! तुम कामदेव किसी कर्मवश पूर्वजन्म में हंस के रूप में अवतीर्ण हुए थे और वह तुम्हारी हंसी भी शाप से च्युत कोई दिव्य रमणी थी जो चन्दन-वृक्ष में घोंसला बनाकर तुम्हारे साथ रहती थी॥१९२-१९४॥ समुद्र की लहरों द्वारा बच्चों के बहा ले जाने पर उनके शोक से हंसिनी ने समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली और उसके शोक से तुमने भी ऐसा ही किया ॥१९५॥ अतः शिवजी की कृपा से तुम वत्सराज उदयन के पुत्र हुए और हे पुत्र ! तुम अपने पूर्वजन्म को जाननेवाले जातिस्मर हो॥१९६॥ वह हंसिनी भी समुद्र के पार कर्पूरसंभव द्वीप में कर्पूरिका नाम से राजकुमारी के रूप में अवतीर्ण हुई है॥१९७॥ तो हे पुत्र ! तुम जाना। वहाँ तुम अपनी प्यारी पूर्वपत्नी को प्राप्त करोगे।—ऐसा कहकर वह सिद्ध तपस्विनी अन्तर्धान हो गई ॥१९८-१९९॥
२१६ कथासरित्सागर
२१६ कथासरित्सागर त्वत्स्नेहाकृष्यमाणश्च पणीकृत्य स्वजीवितम्। उत्तीर्य कान्तारशतं प्राप दग्धोऽम्बुधस्तटम् ॥२००॥ तत्र हेमपुरस्थोऽस्म वेश्या राज्यधराभिध। मद्द्वितीयाय मिश्रितं प्रादाच्चक्रविमानकम् ॥२०१॥ तस्मिन्नारुह्य भयदं हा मूर्त्तं इव साहसे। अब्धिकान्तरमुल्लङ्घ्य प्राप्तावावामिदं पुरम् ॥२०२॥ एतदर्थमसावद्य हा हंसीति वदन्निह। भ्रान्तो देवि मम स्वामी यावत्प्राप्तस्त्वदन्तिके ॥२०३॥ इदानीं स्वमुखाकाररागारमणदर्शनात्। असंस्यदुःखसन्धिप्यन्तमताप्यातिमदनुते ॥२०४॥ तदृदृष्टिनीरुजनलिनखआजय महाविधिम् ॥२५॥ एव वचो विरचितं गोमुखस्य निशम्य सा। संवादप्रत्ययात् सत्यं मेने कर्पूरिका तदा ॥२०६॥ अहो मय्यार्यपुत्रस्य स्नेहोऽमुष्य मुधैव मे। विरक्तताभूदित्यन्तः प्रेमार्द्रा विममर्श सा ॥२०७॥ उवाच नाहं सत्यं सा हंसी यन्मां च यत्कृते। एवं जन्मद्वये क्लेदामार्यपुत्रोऽनुभूतवान् ॥२०८॥ तदहं वोऽधुना दासी प्रेमप्रीतेति वादिनी। नरवाहनदत्तं च स्नानाद्यैः समभागयत् ॥२०९॥ ततः परीवारमुखेनेदत् सर्वमबोधयत्। पितरं स्वं स चोपागात्तद् बुद्ध्वैव स्वदन्तिकम् ॥२१०॥ तत्रोत्पन्नविवाहेच्छां सुतां सो तद्वरं यथा। नरवाहनदत्तं च सम्प्राप्तमुचितं चिरात् ॥२११॥ विद्याधरमहाचक्रवर्त्तिलक्षणलाञ्छितम् । दृष्ट्वा कृतार्थमात्मानं यसोऽमन्स्यत तथा नृपः ॥२१२॥ प्रहृष्टो चात्मजामन्तां तस्मै कर्पूरिकां ततः। नरवाहनदत्ताय यथाविधि स सादरम् ॥२१३॥ प्रादात्तस्मै च जामात्रे प्रतिपत्तिप्रदक्षिणम्। कोटीस्तिस्रः सुवर्णस्य कर्पूरस्य च तावतीः ॥२१४॥
सप्तम लम्बक २१७
सप्तम लम्बक २१७ उसी समय से यह समाचार जानकर हमारा स्वामी यह राजकुमार तुम्हारे स्नेह से खिचकर अपने जीवन की बाजी लगाकर और सैकड़ों देशों को पार कर समुद्र के किनारे पहुँचा ॥२ ॥ वहाँ पर हेमपुर के राजा चित्रकार राज्यधर ने यन्त्र से चलनेवाला विमान दिया ॥२ १॥ मूर्त्तिमान् साहस के समान उस भयंकर विमान पर चढ़कर समुद्र के दुर्गम भाग को पार कर हम दोनों यहाँ पहुँचे हैं ॥२ २॥ इसीलिए, यह मेरा मालिक तुम्हारे लिए 'हा हंसिनी ! हा हंसिनी !'—इस प्रकार बकता-बकता व्याकुल हो गया है और तुम्हारे पास तक यहाँ आया है ॥२ ३॥ अब यह तुम्हारे आनन्द-दायक मुख चन्द्र के दर्शन से असंख्य दुःख-रूपी अन्धकार से इसका छुटकारा हो रहा है। इसलिए अत्यन्त कष्ट और उत्कण्ठा से आये हुए इस अतिथि को दृष्टिरूपी नील कुमुदों की माला से सत्कृत करो' ॥२ ४२ ५॥ राजकुमारी कर्पूरिका ने भी गोमुख की बनावटी बातों को अपने पूर्वजन्म के वृत्तान्त-क्रम से मिलाकर सत्य समझा ॥२ ६॥ और सोचने लगी कि ओह ! मेरे पति का मुझ पर इतना स्नेह है। इस पर मेरा क्रोध व्यर्थ ही था। मुझे इससे विरक्तता भी भ्रम के कारण हुई—ऐसा सोचकर वह स्नेह से पिघल गई और बोली—॥२ ७॥ 'वह हंसिनी मैं ही हूँ। और धन्य हूँ कि मेरे लिए आर्यपुत्र को जो यम तक कष्ट उठाना पड़ा । सो अब मैं प्रेम से खरीदी गई आप लोगों की दासी हूँ। ऐसा कहकर उसने नरवाहनदत्त को स्नान भोजन आदि से सम्मानित किया ॥२ ८२ ९॥ तब अपने दास-दासियों के द्वारा यह बात उसने अपने पिता को कहला दिया और स्वयं भी पिता के पास गई ॥२९ ॥ विवाह की इच्छा प्रकट करती हुई कन्या और उसके योग्य वर नरवाहनदत्त को आया हुआ जानकर तथा उसे विद्याधर चक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त जानकर राजा ने अपने को धन्य-धन्य माना ॥२११ २१२॥ और, उसने कन्या कर्पूरिका को बड़े आदर के साथ विधिपूर्वक नरवाहनदत्त को दे दिया ॥२१३॥ राजा कर्पूरक ने जामाता को प्रत्येक अग्नि-प्रदक्षिणा के अवसर पर तीन-तीन करोड़ सोना और उतना ही कपूर प्रदान किया ॥२१४॥ २८
२१८ कथासरित्सागर
२१८ कथासरित्सागर यन्नाशयो बभुस्तत्र शोभां द्रष्टुमिवागताः। गिरिजोद्वाहदृश्या नो मेरु कैलाससानवः ॥२१५॥ पुनस्तद्वस्त्रकोटीश्च दश दासीशतत्रयम्। स्वलङ्कृतं ददौ सोऽस्मै कृती कर्पूरको नृपः ॥२१६॥ ततस्तस्यो कृतोद्वाहः स कर्पूरिकया सह। नरवाहनदत्तोऽत्र समं प्रीत्येव मूर्त्तया ॥२१७॥ कस्य नाभून्मनःप्रीत्यै स वधूवरयोस्तयोः। सङ्गमो माधवीवल्लीवसन्तोत्सवयोरिव ॥२१८॥ एहि व्रजाव कौशाम्बीमित्यन्येद्युश्च सोऽब्रवीत्। नरवाहनदत्तस्तां कृती कर्पूरिकां प्रियाम् ॥२१९॥ ततः प्रत्यब्रवीत् सा तं यद्येषा तरङ्गगामिना। तेनैव त्वद्विमानेन व्रजामस्त्वरितं न किम् ॥२२०॥ तच्चेत् स्वल्पं तदपरं विस्तीर्णं नौक्याम्यहम्। इह प्राणधराख्यो हि तक्षा यन्त्रविमानकृत् ॥२२१॥ आस्ते देशान्तरायातस्तच्छीघ्रं कारयाम्यवः। इत्युक्त्वा सा प्रतीहारमानाय्य क्षत्तुरादिशत् ॥२२२॥ गत्वा तं यन्त्रतक्षाणं ब्रूहि प्राणधरं महत्। व्योमगामि विमानं नः प्रस्थानायोपकल्पय ॥२२३॥ एवं विसृज्य क्षत्तारं राजे कर्पूरिकाथ सा। चेटीमुखेन पित्रे तां प्रस्थानेच्छां न्यवेदयत् ॥२२४॥ स च मुदंवैव तथाबदायास्यन्नैव भूपतिः। नरवाहनदत्तोऽन्तस्तावदेवमचिन्तयत् ॥२२५॥ तक्षा राज्यधरभ्राता सोऽस्य प्राणधरो ध्रुवम्। राजभीत्या स्वदेशाद्यो विद्रुतस्तेन वर्णितः ॥२२६॥ इत्यस्मिंश्चिन्तयत्येव राज्ञि च क्षिप्रमागते। आगात् प्रतीहारयुतस्तक्षा प्राणधरोऽत्र सः ॥२२७॥ व्यजिज्ञपच्च सुमहद् विमानं कृतमस्ति मे। यन्मानुषसहस्राणि वहत्यद्यावहेलया ॥२२८॥ इत्युक्तवन्तं तक्षाणं साध्वित्युक्त्वाभिपूज्य च। नरवाहनदत्तोऽथ तं पप्रच्छ स सादरम् ॥२२९॥
सप्तम लम्बक २१९
सप्तम लम्बक २१९ राजा द्वारा दिये गये सोने आदि दहेज के ढेर, ऐसे मालूम होते थे मानो पार्वती का विवाह देखने के लिए सुमेरु और कैलास शिखर आकर बैठे हों ॥२१५॥ इस पर करोड़ों वस्त्र और आभूषणों से सजी हुई तीन सौ दासियाँ राजा कर्पूरक ने दहेज में दीं। तदनन्तर शरीरधारिणी प्रीति के समान कर्पूरिका से विवाहित नरवाहनदत्त उस नगर में रहने लगा ॥२१६-२१७॥ मालतीलता और वसंत के सुयोग के समान उन दोनों का समागम किसके आनन्द के लिए नहीं हुआ? ॥२१८॥ किसी एक दिन सफलमनोरथ नरवाहनदत्त ने कर्पूरिका से कहा कि 'चलो कौशाम्बी नगरी को चलें। तब वह बोली कि यदि चलना है, तो उसी आकाशगामी यान से क्यों न चलें? ॥२१९-२२ ॥ यदि वह छोटा हो तो उससे मैं दूसरा बड़ा विमान मँगाती हूँ। यहाँ पर (कर्पूरसंभव द्वीप में) प्राणधर नामका शिल्पी (बढ़ई) यन्त्रवाले विमानों का बनानेवाला रहता है ॥२२१॥ वह किसी दूसरे देश से आया है। तो मैं उससे दूसरा विमान बनवाती हूँ। ऐसा कहकर द्वारपाल को बुलाकर उसने प्राणधर को विमान बनवाने की आज्ञा प्रदान की—॥२२२॥ कि जाकर प्राणधर नामक शिल्पी से कहो कि हम लोगों के जाने के लिए आकाश में उड़नेवाला विमान बना दो ॥२२३॥ इस प्रकार सत्था¹ को आज्ञा देकर कर्पूरिका ने दासी के मुंह से अपने जाने की बात राजा के लिए कहलवाई ॥२२४॥ यह समाचार जानकर जैसे ही राजा वहाँ आता है नरवाहनदत्त अपने मन में सोचता है ॥२२५॥ यह प्राणधर नामक शिल्पी वही है, जो राज्यधर का भाई है। जो कांची-नरेश के भय से भागा था ॥२२६॥ ऐसा सोचते ही द्वारपाल से निवेदित राजा वहाँ आया और उसी समय वह प्राणधर शिल्पी भी वहाँ उपस्थित हुआ ॥२२७॥ और बोला— मैंने एक बड़ा वायुयान बनाकर रखा है जो अभी एक हजार व्यक्तियों को सहज ही ले जा सकता है ॥२२८॥ ऐसा कहते हुए शिल्पी प्राणधर का अभिनन्दन करते हुए नरवाहनदत्त ने आदर के साथ उससे पूछा—२२९॥ १ पार्श्ववर्ती सेवक।
२२० कथासरित्सागर
२२० कथासरित्सागर कञ्चिद्राज्यधरस्य त्वं भ्राता प्राणधरोऽग्रजः । नानायन्त्रप्रयोगाणां कर्ता सुमहतामपि ॥२३०॥ स एव तस्य भ्राताऽहं देवो वसितु मां कृतः । इति प्राणधरः सोऽपि प्रणतः प्रत्युवाच तम् ॥२३१॥ ततो यथा राज्यधरेणोक्तं दृष्टो यथा च सः । नरवाहनदत्तस्तत्तथा तस्मै शशंस सः ॥२३२॥ अथ तेन मुदा प्राणधरेण समुपाहुते । महाविमानेऽनुमतः श्वशुरेणाथ भूभुजा ॥२३३॥ तमामन्त्र्य समारोप्य दासीकर्पूरकाञ्चनम् । तेन राज्ञाविसृष्टेन सह प्राणभरेण सः ॥२३४॥ तेन च शत्रुमुख्येन स्वश्वशुरचितमङ्गलः । कर्पूरिकां राजपुत्रीं नवामादाय तां वधूम् ॥२३५॥ दत्तदानो द्विजातिभ्यः सहस्रनिचयैश्च तैः । नरवाहनदत्तोऽसावारुरोह सगोमुखः ॥२३६॥ पूर्वं गच्छेस्तटं तावद्धामो राज्यधरान्तिकम् । ततो गृहमिति प्राणधरं तं निजगाद सः ॥२३७॥ ततस्तनाहृतनाशु विमाने मोत्पपात सः । नभो मनोरथेनेव पूर्णेन सपरिग्रहः ॥२३८॥ क्षणादुत्तीर्य जलधिं पुनस्तत्सीरवर्ति च । प्राप हेमपुरं धाम तस्य राज्यधरस्य यत् ॥२३९॥ तत्र राज्यधरः प्रह्वं प्रहृष्टः भ्रातृदर्शनात् । दासीभिस्तमदासीक संविभेजे च सोत्सवम् ॥२४०॥ आपृच्छ्य च तमुदार्यं कथमप्युज्झिताग्रजम् । ययौ तेनैव कौशाम्बीं विमानेन सर्वैव सः ॥२४१॥ तत्राम्बरादशङ्कितमवतीर्णं वरविमानबृहन् घम् । सानुचरं नववध्वा युक्तं दृष्ट्वा विसिस्मये जनता ॥२४२॥ पौरोत्साहे प्रवृत्तं पुत्रं बुद्ध्वा पितास्य वत्सेशः । प्रीतो निरगादग्रे देवीसचिवस्तनुपादिभिः सहितः ॥२४३॥ दृष्ट्वा विमानवाहनमूचितभवितव्यसचरसाभाग्यम् । स सोऽभिमन्दत सुतं राजा धरण्यानतं वधूसहितम् ॥२४४॥
सप्तम लम्बक २२१
सप्तम लम्बक २२१ 'क्या तुम राज्यधर के बड़े भाई हो जो भिन्न-भिन्न प्रकार के महान् यन्त्रों का जानकार है? ॥२३१॥ 'हाँ मैं वही उसका भाई प्राणधर हूँ। आप हम दोनों को कैसे जानते हैं स्वामी! — प्राणधर ने नम्र होकर यह कहा ॥२३२॥ तब नरवाहनदत्त ने उसे जिस प्रकार देखा था और राज्यधर ने जैसा कहा था वह सब प्राणधर को सुना दिया ॥२३३॥ तदनन्तर, प्राणधर द्वारा लाये गये महाविमान पर अपने श्वशुर राजा कर्पूरक से आज्ञा प्राप्त करके नरवाहनदत्त दहेज में प्राप्त दासियाँ सोना कपूर के ढेर राजा से प्राप्त प्रतीहार¹ और विमानचालक (प्राणधर) के साथ बैठा ॥२३४-२३५॥ उसकी सास ने प्रस्थानिक मंगलाचार किया और नरवाहनदत्त ने नववधू कर्पूरिका का हाथ बिठा दिया। इस प्रकार, अपने मित्र गोमुख के साथ नरवाहनदत्त ने ब्राह्मणों को वस्त्र आदि दान देकर प्रस्थान किया ॥२३५-२३६॥ और, प्राणधर से कहा कि चलो समुद्र के पूर्वतट पर राज्यधर के समीप तक चलें। तब अपने घर की ओर चलेंगे ॥२३७॥ तदनन्तर चालक द्वारा चलाये गये उस विमान से वह अपने साथियों और सामान के साथ आकाश में उड़ा और कुछ ही क्षणों में समुद्र के पार बंधे हुए राज्यधर के हेमपुर नगर में पहुँचा ॥२३८-२३९॥ नरवाहनदत्त ने वहाँ पर नमस्कार करते हुए और भाई को देखने से प्रसन्न तथा दासी-हीन उस राज्यधर का दासियों द्वारा सत्कार किया और आँसू बहाते हुए तथा किसी प्रकार छोटे भाई (राज्यधर) से बिदा लिये हुए प्राणधर के साथ उसी विमान द्वारा नरवाहनदत्त कौशाम्बी पहुँचा ॥२४०-२४१॥ बिना किसी शंका के निर्भय होकर आकाश से उतरते हुए और पत्नी एवं दासियां आदि के साथ आये हुए नरवाहनदत्त को देखकर कौशाम्बी की जनता आश्चर्यचकित हो गई ॥२४२॥ नागरिकों के उत्साह को देखकर और अपने पुत्र को आता हुआ समझकर उसका पिता वत्सराज अपनी महारानियों मन्त्रियों और बहुओं के साथ प्रसन्न होकर उसे लेने के लिये आगे आया ॥२४३॥ विमान पर चढ़ने के कारण विद्याधर-चक्रवर्ती होने की सूचना देते हुए राजा उदयन ने चरणों में झुके वधू-सहित पुत्र नरवाहनदत्त का अभिनन्दन किया ॥२४४॥
१. द्वारपाल
२३२ कथासरित्सागर
२३२ कथासरित्सागर
माता वासवदत्ता पद्मावत्या समं तमाश्लिष्य। विगलितमिव तद्दर्शनदुःखग्रन्थिं जहौ बाष्पम्॥२४५॥ रत्नप्रभा च भार्या सानन्दा मदनमञ्जुका च तया। तस्य प्रेमहतेर्यै धरणी हृदयं च जगृहतुस्तुल्यम्॥२४६॥ यौगन्धरायणादीन् पितृसखियान् स्वांश्च सोऽथ नृपसूनुः। मरुभूतिमुख्यान् प्रगताननन्दयत् कृतयथार्हसत्कारः॥२४७॥ सर्वे च ते विभूषितसुदशार्हकुलेन जलधिमाक्रम्य। समुपाभृतां स्वपतिना व्यक्तं सोदर्यसूर्त्तिममृतस्य॥२४८॥ अजराजनाशतयुतामायातीं श्रियमिवाभ्यनन्दंस्ताम्। कर्पूरिकां नववधू वत्सेशाद्या यथोचितावनताम्॥२४९॥ तस्याश्च पैतृकं तं वत्सेश्वरोऽपूजयत् प्रतीहारम्। अर्पितविमानवाहितकाञ्चनकर्पूरवस्त्रकोटिद्वयम् ॥२५०॥ आख्यातं नरवाहनदत्तेन ततो विमानकर्त्तारम्। उपकारिणं स राजा प्राणधरं तमपि मानयामास॥२५१॥ कथमेषा राजसुता सम्प्राप्ता कथमितश्च यातौ स्वः। इति पप्रच्छ सहर्ष संम्नाय स गोमुखं नृपतिः॥२५२॥ अथ मृगयावनगमनात् प्रभृति यथा दर्शनं तपस्विन्याः। राज्यधरसमासादितविमानयुक्त्या यथा च तीर्णोऽब्धिः॥२५३॥ कर्पूरिका विवाहे विमुखापि च सम्मुखी यथा विहिता। प्राणधरसामलब्धेनागमनं भ्राम्यया विमानेन॥२५४॥ युक्त्यैकान्ते स तथा तदशेषं गोमुखो यथावृत्तम्। कथयाञ्चकार तस्मै सदारसचिवाय वत्सराजाय॥२५५॥ क्वासौट क्व च तापसी क्व च तमोदन्वत्तटे यन्त्रवि- च्छक्षा राज्यधरस्मदीयवहननोल्लङ्घनं क्वाम्बुधेः। तत्पारे च विमानकर्तुरपरस्यास्य क्व पूर्वं गति- र्भव्यानां शुभसिद्धयुपायरचनाचिन्तां विधत्ते विधिः॥२५६॥ इति तैरखिलैः सविस्मयप्रमदाकम्पितमस्तकैस्ततः। जगदे विन्ष्टे च गोमुख प्रभुभक्तिस्तुतिरत्न सादरेः॥२५७॥ रत्नप्रभा च राज्ञीं पतिव्रताधर्मजनितपरितोषाम्। प्रशशंसुस्ते भर्तुर्निजविद्याविहितपररक्षाम्॥२५८॥
सप्तम लम्बक २२१
सप्तम लम्बक २२१ पद्मावती के साथ उसकी माता वासवदत्ता ने पुत्र को लिपटाकर आँसू बहाये। चिरकाल से उसे न देखने के कारण हृदय में बनी हुई दुख की गाँठ मानों बह निकली ॥२४५॥ आनन्द से भरी हुई उसकी दोनों पत्नियों—मदनमञ्जुका और रत्नप्रभा—ने उसके प्रेम से ईर्ष्या को छोड़कर उसके चरणों और हृदयों को साथ ही ग्रहण किया ॥२४६॥ तदनन्तर यौगन्धरायण आदि पिता के मन्त्रियों तथा मरुभूति आदि अपने मन्त्रियों को नरवाहनदत्त ने यथायोग्य प्रणाम नमस्कार आदि से सत्कार-सम्मान किया ॥२४७॥ अपने उच्च कुल को अपनी परिस्थिति से अलंकृत करनेवाले पति के साथ समुद्र को पार करके आई हुई अमृत की सहोदरा भगिनी के समान और सैकड़ों युवती स्त्रियों से लक्ष्मी के समान घिरी हुई और नम्र भाव से स्थित उस नववधू कर्पूरिका का वत्सराज आदि ने समुचित अभिनन्दन आदि किया। और, वत्सराज ने उसके साथ आये हुए उसके पिता के प्रतीहार को पुरस्कार आदि से सम्मानित किया। उस प्रतीहार ने भी विमान पर लदे हुए सोना वस्त्र कर्पूर आदि दहेज की सामग्री सम्बन्धी उदयन को समर्पित की ॥२४८-२४९॥ उदयन ने नरवाहनदत्त द्वारा परिचित कराये गये विमान-निर्माता शिल्पी प्राणधर का भी समुचित सत्कार किया ॥२५०॥ तदनन्तर राजा उदयन ने गोमुख का अभिनन्दन करके पूछा कि यह राजकुमारी कैसे प्राप्त हुई और तुम लोग यहाँ से वहाँ कैसे पहुँचे? ॥२५२॥ तदनन्तर गोमुख ने महारानियों और मन्त्रियों के साथ बैठे हुए महाराज उदयन को शिकारवाले वन से भटक जाने और तपस्विनी का दर्शन होने से लेकर राज्यधर के विमान द्वारा द्वीप में पहुँचन विवाह से विमुख कर्पूरिका को अपनी ओर लाने तथा प्राणधर द्वारा निर्मित विमान से पुनः लौट आने आदि का सारा वृत्तान्त सबको क्रमशः सुना दिया ॥२५३-२५५॥ कहाँ शिकार ! कहाँ वह बूढ़ी तपस्विनी ! कहाँ समुद्र के किनारे वह शिल्पी कारीगर राज्यधर ! कहाँ समुद्र पार करना ! समुद्र के पार भी दूसरे विमान-निर्माता का मिलना और फिर उसका पहले स्थान पर आना—यह सब असम्भव और अघटित घटनाएँ हैं। यह सत्य है कि भाग्यवान् व्यक्ति के कल्याण-कार्यों को सफल करने के उपाय दैव स्वयं ही घटित कर देता है ॥२५६॥ इस प्रकार, इस घटना को सुनकर अत्यन्त आनन्द से सिर हिलाते हुए उन सभी ने गोमुख की स्वामी-भक्ति की अत्यन्त प्रशंसा की ॥२५७॥ अपनी विद्या के प्रभाव से अपने पति की नाव में रक्षा करनेवाली पतिपरायणा रत्नप्रभा की भी सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥२५८॥
२२४ कथासरित्सागर
२२४ कथासरित्सागर अथ नरवाहनदत्तो विनीतगगनाङ्गनागमनखदः । स विवेश राजधानीं पितृभिर्भार्यादिभिश्च समम् ॥२५९॥ तत्रोपागतमानितबन्धुसुहृत्स्वर्णकूटभूतकोषः । वसुभिस्तौ पूरितवान् प्राणधरश्वाशुरप्रतीहारौ ॥२६०॥ मुक्तोत्तरं च सपदि प्राणधरस्तं व्यजिज्ञपत् प्रणतः । देवावयोश्चिरेणं कर्पूरकभूभृता समादिष्टम् ॥२६१॥ आगन्तव्यं त्वरितं मद्दुहितरि भर्त्तृभवनमाप्तायाम् । येनाहं जानीयां सम्प्राप्तामत्र शीघ्रमिति ॥२६२॥ तद्गन्तव्यं निश्चितमावाभ्यां देव चतुरमधुनेव । दापय कर्पूरिकया राज्ञो लेखं स्वहस्तलिखितं नो ॥२६३॥ नहि तस्य सुतास्निग्धं हृदय राज्ञोऽन्यथा समाश्वसिति । स ह्यारूढविमानो न जातुचिच्छङ्कते प्रपातमतः ॥२६४॥ तल्लेखदानपूर्व्वं सम्प्रति सहितं मया प्रधानमिमम् । अनुजानीहि विमानप्रस्थानप्रोन्मुखं प्रतीहारम् ॥२६५॥ अहमादाय कुटुम्बकमेष्यामि पुनस्त्विहैव युवराज । शक्ष्यामि नामृतमयं चरणाम्भोजद्वयं तव त्यक्तुम् ॥२६६॥ इति तेन सुदृढमुक्ते प्राणधरेणैव वत्सराजसुतः । लेखस्य लेखने तां प्रयुङ्क्त कर्पूरिकां तदैव वधूम् ॥२६७॥ तात न चिन्ता मयि ते कार्या सर्वभर्तृसौख्यसवनभुवि । किं हि महाब्धेः कम्र्ला चिन्तास्पदमाधितोत्तप्तं पुश्खम् ॥२६८॥ इति च स्वहस्तलिखिते कर्पूरिकया तयार्पिते लेखे । कञ्चुकिप्राणधरौ तौ वत्सेशसुतार्धितौ स विससर्ज ॥२६९॥ तौ चारुह्य विमानं गगनगतौ जातविस्मयैः सर्वैः । दृष्टौ तीर्त्वा जलधिं ययतुः कर्पूरसम्भवं नगरम् ॥२७० ॥ तत्र सुतां पतिसदनप्राप्तां सम्भाव्य दत्तलेखौ तौ । आनन्दयाम्बभूवतुरथ तं कर्पूरकं नराधिपतिम् ॥२७१॥ अन्येद्युरनुज्ञाप्य प्राणधरस्तं नृपं स सकुटुम्बः । सम्भावितराज्यधरो नरवाहनदत्तपार्श्वमेवागात् ॥२७२॥ सोऽत्रागताय सद्यः कृतकार्य्यायारभमन्दिरसमीपे । नरवाहनदत्तोऽस्मै प्रददौ वसतिं च जीवनं च महत् ॥२७३॥
सप्तम लम्बक ५५५
सप्तम लम्बक ५५५ तदनन्तर आकाश-यान की थकावट दूर करके नरवाहनदत्त माता-पिता एवं पत्नियों के साथ अपने नगर के भवन में आया ॥२५९॥ घर पर आकर उसने अपने आश्रितों (सेवकों) बन्धुओं तथा मित्रों को भी खोलकर पुरस्कार प्रदान किया और श्वशुर के द्वारपाल तथा विमान-चालक प्राणधर को धन रत्न आदि से भर दिया ॥२६०॥ भोजन करने के बाद प्रणाम करते हुए प्राणधर ने नरवाहनदत्त से निवेदन किया कि महाराज ! राजा कर्पूरक ने हम दोनों (मुझे और प्रतीहार) को ऐसी आज्ञा दी है कि मेरी कन्या के उसके पति के घर पहुँच जाने पर तुरन्त लौट आना जिससे मैं शीघ्र उसे सकुशल वहाँ पहुँची हुई जान सकूँ॥२६१-२६२॥ इसलिए, हम दोनों को निश्चय ही वहाँ अभी जाना चाहिए। आप हम दोनों को कर्पूरिका से अपने हाथ का लिखा हुआ पत्र दिलाइए ॥२६३॥ बिना हस्तलिखित पत्र के कन्या के प्रति स्नेही राजा का हृदय आश्वस्त न होगा। उसे विमान पर चढ़ने के कारण कर्पूरिका के डर से गिर जाने की शंका बनी होगी ॥२६४॥ इसलिए, आप पत्र-प्रदानपूर्वक मेरे साथ ही विमान चलाने की प्रतीक्षा करते हुए उस प्रधान प्रतीहार को प्रस्थान करने की आज्ञा प्रदान करें ॥२६५॥ हे युवराज ! मैं तो अपने कुटुम्ब को साथ लेकर फिर यहीं आऊँगा। मैं आपके इन अमृतमय चरण-कमलों को नहीं छोड़ूँगा' ॥२६६॥ इस प्रकार, प्राणधर के कहने पर नरवाहनदत्त ने कर्पूरिका को पत्र लिखने को निर्देश किया ॥२६७॥ 'पिताजी ! अच्छे पति के सुख को पानेवाली मेरे लिए आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें। क्या उत्तमपुरुष (विष्णु) को प्रदान की गई लक्ष्मी के लिए चिन्ता करना योग्य है? ॥२६८॥ इस प्रकार कर्पूरिका के हस्तलिखित पत्र के देने पर धन-मान आदि से सत्कृत प्राणधर और प्रतीहार को वत्सराजपुत्र नरवाहनदत्त ने विदा किया ॥२६९॥ आश्चर्य-चकित जनता द्वारा देखे गये वे दोनों विमान पर चढ़कर आकाश-मार्ग से समुद्र को पार कर कर्पूरसम्भव द्वीप को पहुँचे। वहाँ पर उन्होंने कन्या की पति-गृह में पहुँचने का समाचार सुनाकर और कर्पूरिका का पत्र देकर राजा कर्पूरक को आनन्दित किया ॥२७०-२७१॥ दूसरे दिन प्राणधर कर्पूरक राजा से आज्ञा लेकर अपने कुटुम्ब के साथ छोटे भाई राज्यधर का सम्मान करता हुआ पुनः नरवाहनदत्त के पास ही आ गया ॥२७२॥ नरवाहनदत्त ने भी आये हुए परम उपकारी प्राणधर को, अपने भवन के समीप ही निवास-स्थान और बड़ी वृत्ति (जीविका) प्रदान की ॥२७३॥ २९
२२६ कथासरित्सागर
२२६ कथासरित्सागर चित्रैश्च तद्विहितैरवरोधसक्तो विमानकैर्विचरन्। अभ्यस्यन्निव भविष्यद्विद्याधरचक्रवर्तिगगनगतिम् ॥२७४॥ इत्यत्र लम्भितसुहृत्स्वजनावरोधो वत्सेश्वरस्य तनयोऽथ स तान्यहानि। रत्नप्रभामदनमञ्चुकयोस्तृतीयां कर्पूरिकां समधिगम्य सुखं निनाय ॥२७५॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके नवमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं रत्नप्रभालम्बकः सप्तमः।
सप्तम लम्बक २२७
सप्तम लम्बक २२७ और, अपनी रानियों के साथ उसके बनाये हुए विमानों के द्वारा व्योम-विहार करता हुआ मानो विद्याधर चक्रवर्ती होने की शिक्षा प्राप्त करने लगा॥२७४॥ इस प्रकार, अपने बन्धु-बान्धवों एवं मित्रों को आनन्दित करता हुआ नरवाहनदत्त मदनमंचुका और रत्नप्रभा में तीसरी कर्पूरिका के साथ सुख से दिन बिताने लगा॥२७५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभा लम्बक का नवम तरंग समाप्त रत्नप्रभा नामक सप्तम लम्बक समाप्त
सूर्यप्रभो नामाष्टमो लम्बक
सूर्यप्रभो नामाष्टमो लम्बक अव गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रचयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्ग मङ्गलाचरणम् चलत्कर्णानिलोद्भूतसिन्दूरारुणिताम्बरः । जयत्यकालेऽपि सृजन् सन्ध्यामिव गजाननः॥१॥ नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं वत्सेश्वरसुतः कौशाम्ब्यां स पितुर्गृहे। नरवाहनदत्तस्ता भार्या प्राप्यावत्सत्सुखम् ॥२॥ एकदा पितुरास्थाने स्थितस्य पुण्ये दिने । अवतीर्यागतं तत्र दिव्यरूपं ददर्श सः ॥३॥ प्रणतं तं च सत्कृत्य पित्रा साकं क्षणान्तर। कस्त्वं किमागतोऽसीति पृष्टवान्सोऽप्यथाब्रवीत् ॥४॥ वज्रप्रभार्पिता आत्मकथा अस्तीह वज्रकूटाख्यं पृष्ठे हिमवतः पुरम्। वज्रसारमयप्राकारख्यातमन्वर्थनामकम् ॥५॥
सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक
सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक मृगेन्द्र-गामिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-सम्भ्रमावलोक के मन्थान द्वारा शिवजी के मुख-रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और श्रद्धा-पूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर दिव्य पद लाभ करते हैं। प्रथम तरंग मंगलाचरण हिलते हुए कानों की वायु द्वारा उड़े हुए सिन्दूर से आकाश को लाल करते हुए, अतएव मानो असमय में ही सन्ध्या की सृष्टि करते हुए गजानन की जय हो ॥१॥ नरवाहनदत्त की कथा (कथामुख) तदनन्तर, वत्सेश्वर (उदयन) का पुत्र नरवाहनदत्त कौशाम्बी नगरी में पिता के घर पर उन पत्नियों को पाकर आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥२॥ एक बार पिता के दरबार में बैठे हुए उसने (नरवाहनदत्त ने) आकाश से उतरे हुए किसी दिव्य पुरुष को देखा ॥३॥ प्रणाम करते हुए उस पुरुष को पिता के साथ सत्कार करके 'आप कौन हैं? कैसे आये हैं? नरवाहनदत्त के ऐसा प्रश्न करने पर उसने कहा—॥४॥ वज्रप्रभ से वर्णित आत्मवृत्तान्त इस धरातल में हिमालय के शिखर पर वज्रकूट नाम का नगर है, जो वज्र के सार से निर्मित होने के कारण नाम के समान ही गुणवाला भी है॥५॥
२१० कथासरित्सागर
२१० कथासरित्सागर तत्र वज्रप्रभाख्योऽहमास विद्याधराधिपः। वज्रनिर्मितदेहत्वात्नामान्वर्थं तदेव मे ॥६॥ 'मन्निमित्ते यथाकालं भक्तः सद्यश्चक्रवर्त्तिनि । अजेयस्त्वं विपक्षाणां मत्प्रसादाद् भविष्यसि' ॥७॥ इति चाह तपस्तुष्टेनादिष्टः शम्भुना यदा। तदा प्रभो प्रणामार्थमागतोऽस्मीह साम्प्रतम् ॥८॥ वत्सराजसुतो दिव्य कल्प कामोद्यसम्भवः। नरवाहनदत्तो नः शशिशेखरनिर्मितः ॥९॥ मर्त्योऽप्युभयवेद्यर्धचक्रवर्त्ती भविष्यति । इति विद्याप्रभावेन विज्ञातं शृणुमो मया ॥१०॥ आसीच्च दिव्य कल्प न पुरा मर्त्योऽप्यनुग्रहात्। सावत्त्सूर्यप्रभो नाम चक्रवर्तीह यद्यपि ॥११॥ तथाप्यभूत् स एकस्मिन्वेद्यर्धे दक्षिणे प्रभुः। उत्तरे श्रुतशर्माख्यश्चक्रवर्ती त्वभूत्तदा ॥१२॥ उभयोस्तु तयोरेक कल्पस्थायी शुभाशिषाम्। चक्रवर्त्यत्र भविता देव एवातिपुण्यवान् ॥१३॥ इत्युक्तवन्तं मन्त्येधसहितस्तं कुतूहलात्। नरवाहनदत्तः स प्राह विद्याधरं पुनः ॥१४॥ कथं विद्याधरैश्वर्यं मानुषेण सता पुरा। प्राप्तं सूर्यप्रभेणेति त्वया मः कथ्यतामिति ॥१५॥ ततो विविक्ते देबीनां मन्त्रिणां सन्निधौ च सः। राजा वज्रप्रभो वक्तुं कथां तामुपाचक्रमे ॥१६॥ सूर्यप्रभचरितम् शाकलः नाम मद्रेषु बभूव नगरं पुरा। चन्द्रप्रभाख्यस्तत्रासीद्राजाङ्गारप्रभात्मजः ॥१७॥ १ उत्तरमुख-दक्षिणमुखौ देवस्थानत्वेन वर्ण्येते दक्षिणमुखदेवस्थानं पितृयान-मार्गत्वेन, उत्तरमुखदेवस्थानं च देवयानमार्गत्वेन कथ्यते। अत्र द्वयोरपि स्थानयोर्विद्याधराणां राज्यमासीत्। २ साम्प्रतं 'स्यालकोट' इति प्रसिद्धं नगरं पाकिस्ताने सम्मिलितम्।
अष्टम लम्बक २३१
अष्टम लम्बक २३१ मैं उस नगर में वयप्रभ नाम का विद्याधरों का राजा था और मेरा शरीर वय-निर्मित होने के कारण मेरा नाम पावक था ॥६॥ 'यथासमय मेरे बनाये हुए विद्याधर-चक्रवर्ती का तू भक्त बनकर मेरी कृपा से शत्रुओं के लिए अजेय होया' मेरी तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के इस आदेशानुसार, हे स्वामिन् ! इस समय मैं आपको प्रणाम करने आया हूँ ॥७-८॥ कामदेव के अंश से उत्पन्न वत्सराज का पुत्र नरवाहनदत्त ही मनुष्य होने पर भी विद्याधरों की दोनों वेदियों¹ का एक दिव्य कल्प तक शिवजी के द्वारा भावी चक्रवर्ती बनाया गया है। मैंने अपनी विद्या के प्रभाव से यह जाना और इसीलिए अभी आपके समीप आया हूँ ॥९-१०॥ शिवजी की कृपा से पहले भी मनुष्य होकर एक दिव्य कल्प तक दक्षिण ओर की आधी वेदी का स्वामी सूर्यप्रभ हुआ था और उत्तर में श्रुतशर्मा नामका चक्रवर्ती हुआ था किन्तु दोनों वेदियों के आकाशचारियों के एक चक्रवर्ती होनेवाले आप अत्यन्त पुण्यवान् हैं ॥११-१३॥ वयप्रभ के इस प्रकार कहने पर वत्सराज और नरवाहनदत्त दोनों ने अत्यन्त कौतूहल के साथ उस विद्याधर से फिर कहा-॥१४॥ 'मनुष्य होकर भी सूर्यप्रभ ने विद्याधरा में चक्रवर्ती का पद पहले समय में कैसे प्राप्त किया यह तुम हमें बताओ' ॥१५॥ तब एकान्त में महारानियों और मन्त्रियों की उपस्थिति में राजा वयप्रभ ने उनसे कहना प्रारम्भ किया-॥१६॥ सूर्यप्रभ का चरित 'प्राचीन समय में मद्र देश में शाकल² नाम का एक नगर था। वहाँ अग्नि के समान तेजस्वी अंगारप्रभ का पुत्र चन्द्रप्रभ नाम का राजा था ॥१७॥ १ उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के दो देश-स्थान। आर्य कर्मशास्त्रों में दक्षिणी ध्रुव के देश-स्थान को पितृयान-मार्ग और उत्तरी ध्रुव के देश-स्थान को देवयान-मार्ग कहा गया है। इन दोनों स्थानों पर विद्याधरों का निवास और राज्य था। दोनों वेदियों का शासक चक्रवर्ती कहा जाता था।—अनु २ शाकल: वर्तमान समय का स्यालकोट नगर, जो अब पाकिस्तान में है। -अनु
२३२ कथासरित्सागर
२३२ कथासरित्सागर आह्लादकारी विश्वस्य नाम्नान्वर्थोऽपि यो भवन्। सन्तापकारी शत्रूणां बभूव ज्वलनप्रभः ॥११८॥ कीर्तिमत्यभिधानायां तस्य देव्यामजायत। पुत्रो नृपस्यातिशुभैर्लक्षणैः सूचितोदयः ॥११९॥ एष सूर्यप्रभो नाम राजा जातः पुरारिणा। भावी विद्याधराधीशश्चक्रवर्ती विनिर्मितः ॥१२०॥ इत्युच्चचार गगनात्तस्मिञ्जाते स्फुटं वचः। सुधावर्षं श्रवणयोश्चन्द्रप्रभमहीभृतः ॥१२१॥ ततस्तस्य पुरारातिप्रसादोत्सवशालिनः। सूर्यप्रभः स बवृधे राजपुत्रः पितुर्गृहे ॥१२२॥ बाल एव च विद्यानां कलानां च क्रमेण सः। धर्त्ता सुमतिः पारमुपासितगुरुर्ययौ ॥१२३॥ पूर्णषोडशवर्षं च गुणैरावर्जितप्रजम्। यौवराज्येऽभ्यषिञ्चत्तं पिता चन्द्रप्रभोऽथ सः ॥१२४॥ स एव मन्त्रिपुत्रांश्च निजांस्तस्मै समर्पयत्। भासप्रभाससिद्धार्थप्रहस्तप्रभृतीन्बहून् ॥१२५॥ तैः समं युवराजत्वधुरं तस्मिंश्च बिभ्रति। आजगामैकदा तत्र मयो नाम महासुरः ॥१२६॥ आस्थाने च स तं चन्द्रप्रभं सूर्यप्रभे स्थिते। उपेत्य रचितातिथ्य जगादैवं मयो नृपम् ॥१२७॥ राजन् विद्याधरेशानां चक्रवर्ती त्रिशूलिना। अयं विनिर्मितो भावी पुत्रः सूर्यप्रभस्तव ॥१२८॥ तत्किं न साधयत्येष विद्यास्तत्प्राप्तिधायिनीः। एतदर्थं विसृष्टोऽहमिह देवेन शम्भुना ॥१२९॥ अनुजानीहि तद्यावत्तीरथेनं शिक्षयाम्यहम्। विद्याधरेन्द्रताहेतुं विद्यासाधनसत्क्रियाम् ॥१३०॥ एतस्य परिपन्थी¹ हि कार्येऽस्मिन्खेचरेन्द्रकः। विद्यत श्रुतशर्माख्यः सोऽपि शक्रेण निर्मितः ॥१३१॥ १ परिपन्थी - विरोधी, शत्रुः।
अष्टम लम्बक २३१
अष्टम लम्बक २३१ चन्द्रप्रभ नाम का वह राजा विश्व को आह्लाद देनेवाला अतएव समुचित नामवाला होने पर भी शत्रुओं के लिए अग्नि के समान सन्तापदायक था ॥१८॥ उस राजा की कीर्तिमती नाम की महारानी से अत्यन्त शुभ लक्षणों से भूषित उत्कर्षवाला प्रभावशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१९॥ ‘यह सूर्यप्रभ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जिसे शंकर भगवान् ने पहले से ही विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है' ॥२०॥ उसके उत्पन्न होने पर राजा चन्द्रप्रभ के कानों के लिए अमृत-वर्षा के समान इस प्रकार स्पष्ट आकाशवाणी हुई ॥२१॥ तदनन्तर, शिवजी की कृपा से अत्यन्त उत्सव-युक्त चन्द्रप्रभ के राजगृह में वह सूर्यप्रभ क्रमशः बड़ा होने लगा ॥२२॥ तीव्रबुद्धि वह सूर्यप्रभ बालकपन में ही क्रमशः गुरुओं की उपासना से सभी विद्याओं और कलाओं में पारंगत होगया ॥२३॥ अपने गुणों से प्रजा को आकृष्ट करनेवाले सोलह वर्ष के उस कुमार सूर्यप्रभ को पिता चन्द्रप्रभ ने युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया ॥२४॥ और, अपने मन्त्रियों के पुत्र भास प्रभास सिद्धार्थ प्रहस्त आदिको कुमार के लिए मन्त्री नियुक्त कर दिया ॥२५॥ जब सूर्यप्रभ उन मन्त्रिपुत्रों के साथ युवराज का कार्य कर रहा था इसी बीच एक बार मय नामक असुर वहाँ आया ॥२६॥ आतिथ्य-सत्कार कर लेने के उपरान्त महासुर ने सूर्यप्रभ के साथ दरबार में बैठे हुए चन्द्रप्रभ से कहा—॥२७॥ ‘राजन्, शिवजी ने तुम्हारे इस पुत्र सूर्यप्रभ को विद्याधर-राजाओं का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है ॥२८॥ तो यह सूर्यप्रभ उस विद्याधर-चक्रवर्ती के पद को प्राप्त करानेवाली विद्याओं को क्यों नहीं सिद्ध करता' इसीलिए शिवजी ने मुझे भेजा है॥२९॥ आप आज्ञा दीजिए कि मैं उसे ले जाकर विद्याधर चक्रवर्ती के पद की साधक विद्याओं को सिद्ध करने की क्रिया उसे सिखा देता हूँ ॥३०॥ इस सूर्यप्रभ का विरोधी विद्याधरों का सम्राट् श्रुतशर्मा है जिसे इन्द्र ने बनाया है ॥३१॥ १