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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

५५४ कथासरित्सागर

५५४ कथासरित्सागर सदा च वर्षति घने घोरा धाराधरावली । न स वीरवरः सिंहद्वारास्तम्भ इवाचलत् ॥१०२॥ राजा विक्रमतुङ्गश्च प्रासादाद्वीक्ष्य तं सदा । आरुरोह स जिज्ञासुः प्रासादं तं पुनर्निशि ॥१०३॥ सिंहद्वारे स्थितः कोऽत्रेत्युपरिष्टाज्जगाद सः । सरक्षाङ्गः स्थितोऽत्रेति सोऽपि वीरवरोऽभ्यधात् ॥१०४॥ अहो अयं महासत्त्वः सुमहत्पदमर्हति । सिंहद्वारं न यो मुञ्चत्यम्बुदे वर्षतीदृशे ॥१०५॥ इति यावच्च स श्रुत्वा विचिन्तयति भूमिभृत् । तावद्दूरात् सकरुणं रुदतीमशृणोत् स्त्रियम् ॥१०६॥ दुःखितो मे न राष्ट्रेऽस्ति तदेषा का नु रोदिति । इत्यालोच्याब्रवीद्राजा स तं वीरवरं तदा ॥१०७॥ भो वीरवर कापि स्त्री दूरे रोदित्यसौ शृणु । कपा किं दुःखमस्याश्चेत्यत्र गत्वा निरूपय ॥१०८॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा गन्तुं प्रववृते द्रुतः । धुन्वन्करतले वीरवरो बद्धासिधेनुकः१ ॥१०९॥ दृष्ट्वा तं प्रस्थितं मध्ये ज्वलद्विद्युति सादृशे । धारानिपातसंरुद्धरोदोरन्ध्रे सकौतुकः ॥११०॥ सकृपाञ्चावतीर्यैव प्रासादात्तस्य पृष्ठतः । अलक्षितः खड्गपाणिः प्रतस्थे सोऽपि भूमिपः ॥१११॥ स चानुससर्प यदितः पृष्ठान्वागतभूपतिः२ । गत्वा बहिः पुरादेकं प्राप वीरवरः सरः ॥११२॥ हा नाथ हा कृपालो हा शूर त्यक्ता त्वया कथम् । वत्स्यामीति च तन्मध्ये रुदतीं स्त्रीं ददर्श ताम् ॥११३॥ का त्वं शोचसि कं नाथमिति पृष्टा च तेन सा । उवाच पुत्र मामेतां विद्धि वीरवर क्षितिम् ॥११४॥ तस्या विक्रमतुङ्गो मे राजा मान्योऽथ धार्मिकः । मृत्युश्च भविता तस्य तृतीयेऽहनि निश्चितम् ॥११५॥ एतादृशश्च भूयोऽपि पतिः स्यात्पुत्र न ध्रुवं । तेनैतमनुशोचामि स्वात्मानं च सुदुःखिता ॥११६॥ १ कटिबद्धक्षुरिकः । २ पृष्ठं अभ्यागतः पश्चादागतः भूपतिर्यस्येति समासः ।

नवम लम्बक ५५५

नवम लम्बक ५५५ तब जब कि मेघ भीषण धारा-रूपी बाण-वर्षा कर रहा था वह बीरबर राजा के सिंह द्वार पर खम्भे के समान अविचल भाव से खड़ा रहा ॥१२॥ राजा विक्रमतुंग अपने महल की खिड़की से उसे प्रतिदिन पहरा देते हुए देखकर शयन- गृह में चढ़ता था ॥१३॥ एक बार, राजा ने घोर वर्षा के समय ऊपर से कहा— 'यहाँ कौन है ? यह सुनकर बीरबर ने उत्तर दिया—'मैं बीरबर उपस्थित हूँ।' ॥१४॥ आश्चर्य है कि यह महान् बलशाली व्यक्ति है जो ऐसी घोर वृष्टि में भी सिंहद्वार को नहीं छोड़ता ॥१५॥ उसका उत्तर सुनकर राजा जब यह सोच ही रहा था कि इतने में ही उसने दूर से किसी स्त्री को करुण स्वर में रोते हुए सुना ॥१६॥ 'मेरे राज्य में कोई भी दुःखी नहीं है फिर यह कौन रो रही है ? —ऐसा सोचकर राजा ने उसी समय बीरबर से कहा-'बीरबर, दूसरे स्थान पर कोई स्त्री रो रही है सुनो। यह कौन है और इसे क्या दुःख है यह वहाँ जाकर पता लगाओ' ॥१७-१८॥ यह सुनकर और 'जो आज्ञा'— कहकर वह वहाँ जाने के लिए तैयार हुआ। उसकी कमर में खंजर बँधा हुआ था और तलवार को हाथ से सम्भाले रहा था ॥१ ९॥ चमकती हुई बिजलीवाले भीषण मेघ के मूसलाधार वृष्टि के कारण उस समय आकाश और पृथ्वी के एक होने पर भी बीरबर को उधर जाते हुए देखकर दयालु राजा भी महल से उतर कर और तलवार हाथ में लेकर छिपे-छिपे उसके पीछे-पीछे चला ॥११०-१११॥ छिपकर राजा जिसका पीछा कर रहा था रोने के शब्द को लक्ष्य करके जाते हुए उस बीरबर ने नगर के बाहर एक तालाब देखा ॥११२॥ उस सरोवर में उस स्त्री को उसने देखा जो यह कहती हुई रो रही थी- हाय नाथ ! हे दयालो ! हे शूर ! तुमसे परित्यक्ता होकर मैं कैसे जिऊँगी ॥११३॥ 'तू कौन है और किस पति को छोड़कर विलाप कर रही है ? इस प्रकार बीरबर के पूछने पर वह स्त्री कहने लगी— "बेटा बीरबर, मैं पृथ्वी हूँ। मेरा पति धार्मिक राजा विक्रमतुंग है। आज से तीसरे दिन उसकी अवश्य मृत्यु होगी। इसलिए, सोच कर रही हूँ कि ऐसा पति फिर मुझे कहाँ मिलेगा ? इस प्रकार, मैं अत्यन्त दुःखी होकर अपने को ही सोच रही हूँ। ॥११४-११६॥

५५६ कथासरित्सागर

५५६ कथासरित्सागर देवपुत्रस्य सुप्रभस्य कथा अहं हि भावि पश्यामि दिव्यदृष्ट्या शुभाशुभम् । त्रिदिवस्थो यथाद्राक्षीत्सुप्रभो देवपुत्रकः ॥११७॥ स हि पुण्यक्षयात्स्वर्गात्पतनं भावि दिव्यदृक् । सप्ताहात्सूकरीगर्भे सम्भवं श्वशतात्मनः ॥११८॥ ततः स सूकरीगर्भवासक्लेशं विभावयन् । देवपुत्रोऽत्यजोद्भ्रान्तिर्दिव्यान्भोगान्सहारमनाः ॥११९॥ हा स्वर्गं हा ह्यप्सरसो हा नन्दनलतागृहाः । हा वत्स्यामि कथं क्रोडीगर्भे तदनु कर्दमे ॥१२०॥ इत्यादि विलपन्तं तं श्रुत्वाभ्येत्य सुराधिपः । पप्रच्छ सोऽपि स्वं तस्मै दुःखहेतुमवर्णयत् ॥१२१॥ ततः शक्रो जगादैनमस्त्युपायोऽत्र ते शृणु । व्रजौ नमः शिवायेति जपञ्छरणमीश्वरम् ॥१२२॥ तं गत्वा शरणं हित्वा पापं पुण्यमवाप्स्यसि । येन प्राप्स्यसि न क्रोडयोनिं स्वर्गाच्च च्युतिम् ॥१२३॥ इत्युक्तो देवराजेन सुप्रभोऽथ तथेति सः । उक्त्वा नमःशिवायति शम्भुं शरणमग्रहीत् ॥१२४॥ तमयं स दिनं षड्भिस्तत्प्रसादान्न केवलम् । निक्षिप्तं सूकरीगर्भे यावत्स्वर्गादुपर्यगात् ॥१२५॥ सप्तमेऽह्नि च तं स्वर्गे तत्रापश्यत् शतक्रतुः । वीक्षते यावदधिकं लोकान्तरमसौ गतः ॥१२६॥ इत्थं शुशोष स यथा दृष्ट्वाघं भावि सुप्रभः । तथैव भाविनं मृत्युं दृष्ट्वा शोचामि भूभृतः ॥१२७॥ एवमुक्तवतीं भूमिं तां स वीरवरोऽब्रवीत् । यथाम्ब सुप्रभस्याभूदुपायः शक्रवाक्यतः ॥१२८॥ तथा यद्यस्ति राज्ञोऽस्य रक्षोपायस्तदुच्यताम् । इति वीरवरोक्ते पृथिवी तमुवाच सा ॥१२९॥ १ अदृष्ट्वेत्यर्थः । अपश्येति प्रयोगश्चिन्त्योऽमीषां पाणिनीयानाम्।

नवम लम्बक ५५७

नवम लम्बक ५५७ देवपुत्र सुप्रभ की कथा मैं दिव्यदृष्टि से भावी होनेवाले शुभ और अशुभ को जानती हूँ। जैसे स्वर्ग में स्थित देवपुत्र सुप्रभ जानता था ॥११७॥ उस दिव्य दृष्टिवाले सुप्रभ ने पुण्य-क्षय के कारण स्वर्ग से अपना पतन और एक सप्ताह तक शूकरी के पेट में रहना जान लिया था ॥११८॥ तब शूकरी के गर्भ में रहने के कष्ट की कल्पना करते हुए देवपुत्र अपने सातों स्वर्गीय सुखों के लिए चिन्ता करने लगा-'हाय स्वर्ग हाय अप्सराओ और हाय नन्दन-वन के लतागृहो हाय मैं अब तुम्हें छोड़कर शूकरी के गर्भ में कैसे रहूँगा और उसके पश्चात् कीचड़ में कैसे जीवन व्यतीत करूँगा' ॥११९-१२०॥ इस प्रकार, रोते हुए देवपुत्र को सुनकर, देवराज इन्द्र ने आकर उससे विलाप का कारण पूछा और उसने भी अपना दुःख उसे बता दिया ॥१२१॥ तब इन्द्र ने कहा कि 'तेरे लिए एक उपाय है सुन'। 'ओं नमः शिवाय' इस मन्त्र का जप करता हुआ भगवान् शिव की शरण में जा ॥१२२॥ तू उनकी शरण में जाकर पापों से छूटकर पुण्य प्राप्त करेगा और उस पुण्य के प्रभाव से सूकर की योनि तुझे न मिलेगी और न तू स्वर्ग से ही पतित होगा ॥१२३॥ देवराज के इस प्रकार कहने पर सुप्रभ ने उसे स्वीकार किया और 'ओंनमः शिवाय' कह कर शम्भु की शरण ली ॥१२४॥ छः दिनों तक तन्मय होकर शिवजी का जप करके वह सूकर-योनि से ही नहीं बच गया प्रत्युत स्वर्ग से भी ऊपर चला गया ॥१२५॥ सातवें दिन उसे स्वर्ग में न देखकर इन्द्र ने विशेष दृष्टि डाली तो देखा कि वह स्वर्ग से ऊपर दूसरे लोक में चला गया है ॥१२६॥ इस प्रकार, जैसे सुप्रभ ने भावी अशुभ के लिए शोक किया था उसी प्रकार मैं भी राजा की होनेवाली मृत्यु के लिए शोक कर रही हूँ ॥१२७॥ इस प्रकार, कहती हुई पृथ्वी से उस वीरवर ने कहा-'माता ! जैसे इन्द्र द्वारा मुक्ति बताने पर सुप्रभ पापमुक्त हो गया उसी प्रकार राजा के भी जीवित रहने का कोई उपाय हो तो बताओ।' वीरवर के ऐसा कहने पर पृथ्वी बोली- ॥१२८-१२९॥

५५८ कथासरित्सागर

५५८ कथासरित्सागर एक एवास्त्युपायोऽत्र स्वाधीनः स तवैव च। तच्छ्रुत्वैव च सोऽवादीत्तुष्टो वीरवरो द्विजः ॥१३०॥ तर्हि ब्रूहि द्रुतं देवि यदि श्रेयो भवत्प्रभोः। प्राणैर्मे पुत्रदारैर्वा राज्यं सफलं मम ॥१३१॥ इत्युक्तवन्तमब्रूत् सा स वीरवर क्षितिः। अस्त्यत्र चण्डिकादेवी सैषा राजकुलान्तिके ॥१३२॥ तस्यै सत्त्ववरं पुत्रमुपहारीकरोषि चेत्। ततो जीवति राजासौ नास्त्युपायोऽपरः पुनः ॥१३३॥ श्रुत्वैतद्वसुधावाक्यं धीरो वीरवरस्तदा। यामि देवि करोम्येतदधुनैवेत्युवाच सः ॥१३४॥ कोऽन्यः स्वामिहितस्त्वाङ्गभद्रं तेऽस्तु व्रजेति भूः ॥ उक्त्वा तिरोऽभूत्सर्वं च राजा सोऽन्वागतोऽशृणोत् ॥१३५॥ ततो विक्रमतुङ्गोऽस्मिन् राज्ञि च्छन्नोऽनुगच्छति। द्रुतं वीरवरस्तस्यां रात्रौ स स्वगृहं ययौ ॥१३६॥ तत्र प्रबोध्य भार्यायै धर्मवत्यै शशंस सः। स्वपुत्रमुपहर्तव्यं राजार्थे वचनाद् भुवः ॥१३७॥ सा तच्छ्रुत्वाब्रवीत्कार्यमवश्यं स्वामिनो हितम्। तत्पुत्रश्चाथ भवता प्रतिबोध्योच्यतामिति ॥१३८॥ ततः प्रबोध्य बालाय तस्मै वीरवरेण तत्। ऊचे तदुपहारान्तं राजार्थे यद् भुवोदितम् ॥१३९॥ तच्छ्रुत्वा स यथार्थाख्यो बालः सत्त्ववरोऽभ्यधात्। प्रभुकार्योपयुक्तासुः पुण्यवांस्तात नास्ति किम् ॥१४०॥ भुक्तं मया तदन्नं यच्छोधनीयं ममापि तत्। तन्नीत्वा तत्कृते देव्या उपहारीकुरुष्व माम् ॥१४१॥ इत्यूचिवांसं तं सत्त्ववरं वीरवरः शिशुम्। 'सत्यं भवसि मज्जातः' इत्यवोचदविक्लवम् ॥१४२॥ एतद्विक्रमतुङ्गः स राजा श्रुत्वा बहिः स्थितः। अचिन्तयदहो सर्वे समसत्त्वा अमी इति ॥१४३॥ ततो वीरवरः स्कन्धे सुतं सत्त्ववरं स तम्। भार्या धर्मवती चान्ये पृष्ठे वीरवतीं सुताम् ॥१४४॥ गृहीत्वा जग्मतुस्तौ द्वौ रात्रौ तच्चण्डिकागृहम्। राजा विक्रमतुङ्गश्च पश्चाच्छन्नो ययौ तयोः ॥१४५॥

नवम लम्बक ५५९

नवम लम्बक ५५९ इसका एक ही उपाय है और वह तुम्हारे अधीन है। यह सुनकर बीरबर प्रसन्न होकर बोला—॥१३१ ॥ यदि ऐसा है तो उसे शीघ्र बताओ। जिससे मरे प्रभु का कल्याण हो। मेरे और मेरी स्त्री तथा पुत्र के प्राणों से भी यदि कोई उपाय हो तो मेरा जन्म सफल हो' ॥१३२॥ ऐसा कहते हुए बीरबर से पृथ्वी ने कहा—'राजभवन के पास जो चंडिका देवी का मन्दिर है वहाँ जाकर यदि तुम अपने पुत्र सत्ववर की भेंट (बलि) चढ़ा दो तो यह राजा जीवित रह सकता है और कोई दूसरा उपाय नहीं है॥१३३-१३४॥ पृथ्वी के वचन को सुनकर वीर बीरबर ने कहा—'देवि जाता हूँ और अभी इस उपाय को करता हूँ' ॥१३५॥ 'तुम्हारे सिवा स्वामी का हित और दूसरा कौन कर सकता है। अच्छा जाओ तुम्हारा कल्याण हो —ऐसा कहकर पृथ्वी अन्तर्हित हो गई और छिपकर पीछे-पीछे आए हुये राजा ने यह सब सुना ॥१३६॥ तदनन्तर, राजा विक्रमत्तुंग के छिप-छिप पीछा करते रहने पर वह बीरबर उसी रात्रि में अपने घर गया ॥१३६॥ तब स्त्री को जगाकर बीरबर न राजा के जीवन के लिए पुत्र के बलिदान तक का सारा वृत्तान्त जो पृथ्वी न कहा था स्त्री को सुनाया ॥१३७॥ यह सुनकर उसकी पत्नी बोली—'स्वामी का हित अवश्य करना चाहिए। इसलिए, पुत्र को जगाकर आप उससे कहिए' ॥१३८॥ तब बीरबर ने बालक को जगाकर उसे वह सब समाचार सुनाया जो राजा के लिए पृथ्वी ने कहा था ॥१३९॥ यह सुनकर वह यथाथर्नाम वाला बालक सत्ववर बोला—'पिता ! स्वामी के हित में प्राणों का उपयोग करनेवाला बड़ा मैं धन्य नहीं हूँ ? ॥१४० ॥ मैने जो उसका अन्न खाया है उसका प्रत्युपकार मुझे करना ही चाहिए। इसलिए, मुझे ले जाकर देवी को भेंट करो ॥१४१॥ ऐसा कहते हुए पुत्र से बीरबर ने धीरज के साथ कहा—'तू सचमुच मुझसे उत्पन्न हुआ मेरा पुत्र है' ॥१४२॥ बाहर खड़े हुए राजा विक्रमत्तुंग ने आश्चर्य के साथ सोचा कि ये सभी समान आत्मबल- वाले प्राणी हैं ॥१४३॥ तदनन्तर, बीरबर अपने पुत्र को कन्धे पर रखकर और उसकी पत्नी धर्मवती अपने पीछे कन्या बीरवती को लेकर उसी रात्रि में चंडिका के मंदिर में गये और छिपा हुआ राजा विक्रमत्तुंग भी उन लोगों के पीछे गया ॥१४४-१४५॥

५२ कथासरित्सागर

५२ कथासरित्सागर

तत्रावतारितः स्कन्धात्पित्रा सत्त्ववरोऽथ सः। बालोऽपि धैर्यराशिस्तौ नत्वा देवीं व्यजिज्ञपत् ॥१४६॥ देवि मूर्धोपहारेण मम जीवतु नः प्रभुः। नृपो विक्रमतुङ्गोऽत्र शास्तु च क्ष्मामकण्टकाम् ॥१४७॥ एवमुक्तवतस्तस्य साधु पुत्रेत्युदीर्य च। कृष्ट्वा कररुहां सूनोश्छित्वा वीरवरः शिरः ॥१४८॥ प्रवृत्तौ चण्डिकावेश्मे 'राज्ञः श्रेयोऽस्त्विति' ब्रुवन्। नास्त्यहो स्वामिभक्तानां पुत्रे वाऽऽत्मनि वा स्पृहा ॥१४९॥ 'साधु वीरवर दत्तं स्वामिनो जीवितं त्वया। अपि प्राणैः सुतस्येति' शुश्रुवे वाक्तदा दिवः ॥१५०॥ तच्चातिविस्मिते राज्ञि सर्वं पश्यति शृण्वति। बाला वीरवती तस्य भ्रातुर्वीरवरात्मजा ॥१५१॥ हतस्योपेत्य मूर्धानमाश्लिष्य परिचुम्ब्य च। हा भ्रातरिति चाक्रन्द्य हृत्स्फोटेन व्यपादि सा ॥१५२॥ दृष्ट्वा सुतामपि मृतां सा तं वीरवरं तदा। भार्या धर्मवती दैन्यादब्रवीत्कृताञ्जलिः ॥१५३॥ राज्ञः शिवं कृतं तावदनुज्ञां प्रयच्छ मे। यावदासन्मृताऽपत्यद्वयार्तिं प्रविशाम्यहम् ॥१५४॥ बाला मत्रेयमज्ञानाप्येष भ्रातृस्नुषा मृता। का शोभा जीवितेनात्र नष्टेऽपत्यद्वयेऽपि मे ॥१५५॥ निश्चयेमेति जल्पन्तीं तां स वीरवरोऽब्रवीत्। एवं कुरुष्व किं वच्मि नहीदानीमनिन्दिते ॥१५६॥ अपत्यशोकैकमये संसारेऽस्ति सुखं तव। तत्प्रतीक्षस्व यावत्ते रचयामि चितागृहम् ॥१५७॥ इत्युक्त्वात्र स्थितैर्वेदीक्षेत्रनिर्माणदारुभिः। न्यस्तापत्यद्वयां चक्रे दीप्ताग्निज्वलितां चिताम् ॥१५८॥ ततो धर्मवती भार्या पादौ तस्य प्रणम्य सा। 'जन्मान्तरेऽपि मे भूयादार्यपुत्र पतिर्भवान् ॥१५९॥

नवम लम्बक ५६१

नवम लम्बक ५६१ वहाँ जाकर कन्धे से उतारे हुए धैर्यराशि सत्त्ववर ने बालक होते हुए भी देवी को प्रणाम करके निवेदन किया- 'हे देवि ! मेरे सिर की बलि से हमारा स्वामी विक्रमतुङ्ग जीवित रहे और पृथ्वी का पालन करता रहे' ॥१४६-१४७॥ ऐसा कहते हुए सत्त्ववर को वीरवर ने 'वाह बेटा ठीक है' इस प्रकार कहा और म्यान से तलवार निकालकर उसका सिर काट दिया ॥१४८॥ और, 'राजा का कल्याण हो'- ऐसा कहते हुए वह सिर देवी को भेंट कर दिया। यह सत्य है कि सच्चे स्वामिभक्त सेवकों को पुत्र की या अपने प्राणों की चाह नहीं होती ॥१४९॥ इतने में ही उसने आकाशवाणी सुनी-'हे वीरवर बहुत अच्छा। तूने अपने पुत्र के प्राणों से भी स्वामी को जीवन प्रदान किया' ॥१५०॥ तब अत्यन्त चकित राजा के यह सब दृश्य देखते-सुनते सत्त्ववर की बहन वीरवर की कन्या वीरवती मृत भाई के समीप जाकर और उसके मस्तक को गोद में लेकर, चूमकर और 'हाय भाई'-इस प्रकार चिल्लाने लगी और हृदय फट जाने से मर गई ॥१५१-१५२॥ कन्या को भी मृत देखकर वीरवर की धर्मपत्नी धर्मवती पति को हाथ जोड़कर अत्यन्त दीनता के साथ बोली-॥१५३॥ 'राजा का कल्याण तो किया। अब मुझे भी आज्ञा दो। इन दोनों मृत बच्चों को लेकर मैं अग्नि में प्रवेश करूँ ॥१५४॥ जब कि यह अनजान बालिका भी भाई के शोक में मर गई, तब दोनों बच्चों के मरने पर मेरे जीवन की क्या शोभा है' ॥१५५॥ इस प्रकार, दृढ़तापूर्वक कहती हुई पत्नी से वीरवर ने कहा- 'हे सदाचारिणी ऐसा ही करो। मैं इस समय क्या कहूँ। पुत्रों के शोक से तुझे अब संसार में सुख नहीं है। प्रतीक्षा करो मैं तुम्हारे लिए चिता बनाता हूँ ॥१५६-१५७॥ ऐसा कहकर उसने वहाँ देवी के मन्दिर-निर्माण से बची हुई लकड़ी से चिता बनाई और दोनों बच्चों को उस पर रखकर आग लगा दी ॥१५८॥ तब वीरवर की भार्या पतिव्रता धर्मवती पति के चरणों में प्रणाम करके और हे आर्यपुत्र अगले जन्म में भी तुम्हीं मेरे पति होना ॥१५९॥ ७१

१६२ कथासरित्सागर

१६२ कथासरित्सागर शिवं राज्ञोऽस्तु' चेत्युक्त्वा साध्वी तस्मिंश्चितानले। ज्वालाजटाले ऽपत्तच्छीतह्रदवलीलया ॥१६०॥ तत्स विक्रमत्तुङ्गश्च दृष्ट्वा गुप्तस्थितो नृपः। केनषामनृणोऽहं स्यामित्यासीद्विस्मयानमोहितः ॥१६१॥ ततो वीरवर सोऽपि धीरचेता व्यचिन्तयत्। सम्पन्नं स्वामिकार्यं मे साक्षाद्दिव्या हि वाक्श्रुता ॥१६२॥ मुक्तान्नपिण्डः संशुद्धः प्रभोस्तदधुना मया। सर्वमिष्टं व्ययीकृत्य भरणीयं कुटुम्बकम् ॥१६३॥ एकस्यात्मम्भरित्वेन न चकास्त्यथ जीवितम्। तस्मिं नारमोपहारणाप्यर्चयाम्यम्बिकामिमाम् ॥१६४॥ इति वीरवरः सत्त्वनिष्ठः सङ्कल्प्य चण्डिकाम्। देवीं तां वरदां पूर्वे स स्तोत्रेणोपतस्थिवान् ॥१६५॥ 'महेश्वरि नमस्तुभ्यं प्रणताभयदायिनि। संसारपङ्कमग्नं मां शरणागतमुद्धर ॥१६६॥ त्वं प्राणशक्तिर्भूतानां त्वयैव चेष्टत जगत्। सृष्टेरादौ स्वसम्भूता स्वयं दृष्टासि शम्भुना ॥१६७॥ ज्वलन्ती विश्वमुद्भास्य दुर्निरीक्ष्येण तेजसा। उच्चण्डदाण्डवालार्ककोटिपङ्क्तिरवोत्थिता ॥१६८॥ भुजानां चक्रवालेन सञ्छादितदिगन्तरा। खड्गखेटककोदण्डशरशूलादिधारिणा ॥१६९॥ संस्तुतासि च तेनैव देवेनेजं त्रिशूलिना। नमस्ते चण्डि चामुण्डे मङ्गले त्रिपुरे जय॥१७०॥ एकानंशे शिवे दुर्गे नारायणि सरस्वति। भद्रकालि महालक्ष्मि सिद्धे रुरुविनाशिनि ॥१७१॥ त्वं गायत्री महाराज्ञी रेवती विन्ध्यवासिनी। उमा कात्यायनी च त्वं सर्वपर्वतवासिनी ॥१७२॥ इत्यादिभिर्नामभिरम्बो दिवि स्तुतिपरं हरम्। श्रुत्वा स्वन्ते वणिष्ठश्च ब्रह्माद्याश्चापि तुष्टुवुः ॥१७३॥ स्तुवन्तरत्वां च भगवत्यमरा ऋषयो नराः। ईप्सितान्यपिकांश्चामाञ्छ्राज्याद्य प्राप्तुवन्ति च ॥१७४॥

नवम लम्बक ५६३

नवम लम्बक ५६३ तथा हमारे राजा का कल्याण हो! इस प्रकार कहकर उठती हुई वह ज्वालामालावाली चिता में ठंढे ह्रद में जैसे प्रविष्ट हुई ॥१६०॥ छिपे-छिपे राजा विक्रमत्तुंग यह सब दृश्य देखकर, 'मैं इससे कैसे उऋण होऊँगा' इसी चिन्ता में मग्न होगया ॥१६१॥ तब धीरचित्त वीरवर ने भी सोचा-'मेरे स्वामी का कार्य साधा गया। दिव्य वाणी भी सुन ली। राजा के अन्न का बदला अपने पालनीय और प्यारे कुटुंब के बलिदान से चुका दिया॥१६२-१६३॥ अब केवल अपना पेट भरने के लिए जीवन का रखना अच्छा नहीं। तो क्यों न मैं भी अपने को भगवती चण्डिका को उपहार बनाकर पूजन करूँ ॥१६४॥ सात्त्विक वीरवर ने इस प्रकार निश्चय करके करणाविनी देवी की इस प्रकार स्तुति प्रारम्भ की-॥१६५॥ 'हे प्रणत जनों को आश्रय देनेवाली माहेश्वरी! तुझे प्रणाम है। संसार के पंक में फँसे हुए मुझ शरणागत का उद्धार करो ॥१६६॥ तू समस्त प्राणियों की प्राणशक्ति है। तेरे ही कारण यह सारा संसार जीवित है। सृष्टि के प्रारम्भ में तू ही पहले उत्पन्न हुई थी। तुझे शिव ने हृदय में रखा। तू विश्व को उत्पन्न करके अपने प्रवर तेज से ऊर्ध्व और अधोमय में उत्पन्ननवीन परमाणु मूर्ती की पंक्ति के समान प्रादुर्भूत हुई ॥१६७-१६८॥ तू ने सह्य गन्ध धनुष और शृंग आदि पार्वत्य कन्दराओं भुवनतल से आकाश को उठा लिया ॥१६९॥ इस प्रकार नानाविध नाना स्तुति की है। 'पाहि' 'हे चामरे' 'हे शंभवे' 'हे त्रिपुरे! हे जय! तुझे प्रणाम करता हूँ। तू एक भवरहित शिखा दुर्गा नारायणी सरस्वती भद्रकाली महालक्ष्मी विद्या और इड़ा न का नाश करनेवाली' ॥१७०-१७१॥ तू ही लक्ष्मी महासती रेवती चित्रशालिनी उषा कात्यायनी और उत्तरकुरु की विहंगिनी है १७२। हे देवि, इन नामों वाली स्मरण करने पर स्त्रियों का गन्दर्भ समान बलिष्ठ और षष्ठादि दोष से नेहरी हुई १७३-१७४॥ मैं इसलिए तुझे दण्डवत् बलि और पूजन अर्चन करता हूँ सो अधिक फल प्राप्त कर चुके और करके ॥१७५॥

५१४ कथासरित्सागर

५१४ कथासरित्सागर तन्मे प्रसीद वरद गृहाण स्वमिमामपि। मच्छरीरोपहारार्थाच्छ्रेयो राज्ञोऽस्तु मत्प्रभोः ॥१७५॥ इत्युदीर्य शिरश्छेत्तुं यावदिच्छति स स्वकम्। उदभूद् भारती तावदशरीरा नभस्तलात् ॥१७६॥ मा कार्षीः साहसं पुत्र सत्त्वेनैवामुना ह्यहम्। सुप्रीता तव सम्प्राप्तं प्रार्थय स्वेप्सितं वरम् ॥१७७॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्वीरवरस्तुष्टासि देवि चेत्। राजा विक्रमतुङ्गस्तज्जीवत्वन्यत्समाशतम् ॥१७८॥ भार्यापत्यानि जीवन्तु मम चेति वरेऽर्थिते। तेन भूयः समुद्भूषेवमस्त्विति वाग्दिवः ॥१७९॥ तत्क्षणं ते च जीवन्तस्त्रयोऽप्युत्तस्थुरक्षतैः। दहैर्धर्मवती सत्त्ववरो वीरवती च सा ॥१८०॥ ततो वीरवरो दृष्टो बोधितान् देव्यनुग्रहात्। नीत्वा तान्स्वगृहं सर्वान् राज्ञो द्वारमगात्पुनः ॥१८१॥ नृपो विक्रमतुङ्गश्च तद्दृष्ट्वा हृष्टविस्मितः। गत्वा पुनस्तं प्रासादमरोहत् स्वमलक्षितः ॥१८२॥ सिंहद्वारे स्थितः कोऽत्रत्युपरिष्टादुवाच च। तच्छ्रुत्वाधःस्थितो वीरवरस्तं प्रत्युवाच सः ॥१८३॥ अह स्थितोऽत्र तां च स्त्रीं वीक्षितुं गतवानहम्। वेपतेव च सा क्वापि दृष्टनष्टेव मे गता ॥१८४॥ श्रुत्वैतत्कृतसंवृत्तान्तं दृष्ट्वा सोऽत्यन्तमद्भुतम्। भूभूद् विक्रमतुङ्गोऽत्र रात्रावेको व्यचिन्तयत् ॥१८५॥ अहो अपूर्वः कोऽप्येष पुम्पातिशयो यतः। यः करोतीदृशं श्लाघ्यमुक्तञ्च न च शंसति ॥१८६॥ गम्भीरोऽपि विशाखोऽपि महासत्त्वोऽपि नाम्बुधिः। चपलेन महावातोत्स्पर्शेऽपि स्पृष्टस्त्वमुना ॥१८७॥ परोक्षं निशि येनैव पुत्रदारव्ययेन मे। प्राणा प्रदत्तास्तस्यास्य कुर्यां कां प्रत्युपक्रियाम् ॥१८८॥ इत्याद्याकलयन् राजा प्रासादादवतीर्य सः। प्रविश्याभ्यन्तरं रात्रिं स्मयमानो निनाय ताम् ॥१८९॥

नवम लम्बक ५६५

नवम लम्बक ५६५ उठ हे वरदायिनी मुझ पर कृपा करो और मेरे शरीर से अपनी पूजा स्वीकार करो। मेरे स्वामी राजा विक्रमतुंग का कल्याण हो ॥१७५॥ ऐसा कहकर वह अपना गला काटने के लिए जैसे ही तैयार हुआ वैसे ही आकाशवाणी हुई—॥१७६॥ 'बेटा ऐसा साहस न करो। तेरी इस वीरता से मैं बहुत प्रसन्न हूँ इसलिए तुम अपना मनमाना वर माँगो' ॥१७७॥ यह सुनकर वह वीरवर बोला—'हे देवि ! यदि तू सन्तुष्ट है तो राजा विक्रमतुंग सौ वर्ष और जिये और मेरी पत्नी तथा बच्चे फिर से जीवित हो जायें ॥१७८॥ ऐसा वर माँगने पर 'ऐसा ही होगा'—इस प्रकार की दिव्यवाणी फिर हुई ॥१७९॥ और, उसी क्षण सम्पूर्ण शरीर के साथ धर्मवती सत्त्ववर और वीरवती तीनों जी उठे ॥१८ ॥ तब प्रसन्नचित्त वीरवर उन सब को घर पहुँचाकर फिर राजद्वार पर उपस्थित हो गया ॥१८१॥ इन सब दृश्यों को देखकर हर्षित और चकित राजा विक्रमतुंग फिर अपने महल में छिपे छिपे ही आ चढ़ा ॥१८२॥ और, 'सिंहद्वार पर कौन है' इस प्रकार ऊपर से ही बोला। यह सुनकर नीचे खड़े वीरवर ने उससे कहा—॥१८३॥ 'मैं यहाँ हूँ उस स्त्री को देखने के लिए मैं गया था। किन्तु, वह देखते-ही-देखते अन्तर्धान होकर कहीं चली गई ॥१८४॥ इस सारे आश्चर्यकारी वृत्तान्त को सुनकर राजा विक्रमतुंग एकान्त रात्रि में सोचने लगा—॥१८५॥ 'ओह ! यह वीरवर कोई असाधारण और अपूर्व पुरुष है। ऐसा प्रशंसनीय काम करके भी उसकी चर्चा तक नहीं करता ॥१८६॥ गम्भीर, विशाल और महासत्त्वशाली समुद्र भी प्रलयकालीन तूफान से क्षुब्ध हो उठता है किन्तु इससे समुद्र की बराबरी नहीं कर सकता क्योंकि यह उससे भी अधिक गम्भीर है ॥१८७॥ मेरे अनजाने रात्रि में मेरे लिए इसने पुत्र पुत्री स्त्री और अपने भी प्राण दे दिये अब मैं इसका बदला कैसे दे सकता हूँ ॥१८८॥ इस प्रकार की अनेक बातों को सोचता हुआ राजा राज भवन में उतरा और अपने शयनागार में आश्चर्यचकित होकर रात्रि व्यतीत की ॥१८९॥

५६६ कथासरित्सागर

५६६ कथासरित्सागर प्रातश्च स महास्थान तस्मिन्वीरवरे स्थिते। तदीयं कथयामास तद्रात्रिचरितामृतम्॥१९०॥ ततः संस्तूयमानस्य सर्वैर्वीरवरस्य सः। बबन्ध तस्य संसुतस्यापि पट्टं नराधिपः॥१९१॥ प्रादाद् बहूश्च नियमानश्वान् रत्नानि वारणान्। दश काञ्चनकोटीश्च वृत्तिं षष्टिगुणामपि॥१९२॥ तत्क्षणाद्राजतुल्यश्च सोऽभूद्वीरवरो द्विजः। उच्छ्रितेनातपत्रेण कृतार्थः सकुदुम्बकः॥१९३॥ इति स कथां कथयित्वा विदधानः प्रस्तुतोपसंहारम्। नरवाहनदत्तं तं पुनरवदद् गोमुखो मन्त्री॥१९४॥ एवं देव क्षमामृतामेकवीरा भृत्याः केचित् पुण्ययोगामिलन्ति। ये स्वाम्यर्थं त्यक्तदेहाद्यपक्षाः सम्यग्लोकौ द्वौ सुखस्थौ जयन्ति॥१९५॥ तच्चैष शाङ्गिण्व एव दृश्यते द्विजप्रवीरस्तव देव सेवकः। भवागतः सत्त्वगुणाधिकाधिकः प्रलम्बबाहुः स्थिरसीठवाकृतिः॥१९६॥ इति निजसचिवावुदारसत्त्वो विपुलमतेरवधार्य गोमुखात्सः। नरवाहनदत्तराजापुत्रो हृदि परितोषमनुत्तमं बभार॥१९७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीकम्बरे तृतीयस्तरङ्गः। चतुर्थस्तरङ्गः नरवाहनदत्तस्य मृगयावर्णनम् एवं स निवसंस्तत्र वत्सेशस्य पितुर्गृहे। गोमुखाद्यैः स्वसचिवैः सेव्यमानोऽनुरागिभिः॥१॥ विहरञ्जाप्यलङ्कारवत्या दम्यानुरक्तया। मानविम्नासहोट्याद्रात्तत्प्रेममुषितर्ध्यया॥२॥ नरवाहनदत्तोऽथ कदाचिन्मृगकाननम्। जगाम रथमारुह्य पश्चादारूढगोमुखः॥३॥ प्रलम्बबाहौ तस्मिंश्च विप्रवीरे प्रयायिनि। पवागगटरवत्रीदां स तत्र सहितोऽनुगे॥४॥

प्रातःकाल सार्वजनिक सभा (आम दरबार) में वीरवर के उपस्थित होने पर, राजा ने रात्रि में हुआ वीरवर का सारा आश्चर्यमय वृत्तान्त सभ्या में कह सुनाया ॥१९०॥ तब राजा ने सभी सभ्या द्वारा प्रशंसा किए जाते हुए वीरवर को पुत्र के साथ बैठाकर, उसे अपने हाथ से पट्ट बाँधकर बहुत-से देश उसे दान में दिये और दस करोड़ सोने की मुहरें तथा साठगुनी मासिक वृत्ति उसे प्रदान की ॥१९१ १९२॥ वह वीरवर ब्राह्मण उसी समय राजा के समान होगया। उस पर श्वेत छत्र लग गया। इस प्रकार अपने कुटुम्ब के साथ वह सफल हुआ ॥१ ९३॥ मन्त्री गोमुख इस प्रकार नरवाहनदत्त का कथा सुनाकर उसका उपसंहार करते हुए कहने लगा- 'स्वामी इस प्रकार राजाओ क पुण्य के योग से ही कोई अनुपम वीर सेवक उन्हें मिलते हैं जो स्वामी के लिए अपने शरीर और प्राणों का मोह त्यागकर दातां लोकों को सिद्ध और सफल बनाते हैं ॥१९४ १९५॥ हे महाराज यह उत्तम ब्राह्मणवीर तुम्हारा उसी प्रकार का सेवक प्रतीत होता है क्योंकि यह नवीन वीर अचिन्त्य अधिक सत्त्व गुणवाला लम्बी भुजाओवाला और स्थिर एवं सुन्दर आकृतिवाला है ॥१९६॥ उदारहृदय नरवाहनदत्त अपने मुख्य मन्त्री गोमुख से इस प्रकार की उत्तम कथा सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥१९७॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का तीसरा तरङ्ग समाप्त

चतुर्थ तरङ्ग नरवाहनदत्त का मृगया-वर्णन तदनन्तर परम स्नेही गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ पिता वत्सराज के घर में रहता हुआ और प्राप्त के विघ्न को सहन न कर सकने के कारण प्रेम से सन्तुष्ट ईर्ष्यावाली अनुरागिणी अलंकारवती के साथ विहार करता हुआ नरवाहनदत्त पीछे बैठे हुए सामन्त के साथ रथपर बैठकर मृगया-वन (शिकारगाह) को गया ॥१-३॥ आगे-आगे चलते हुए नवीन ब्राह्मण सेवक प्रलम्बबाहु के तथा अनन्त सैनिकों के साथ वह आखेट करने लगा ॥४॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर सर्वप्राणेन धावत्सु रथाश्वेष्वपि तस्य स । प्रलम्बबाहुस्तद्वेगं विजित्य पुरतो ययौ ॥५॥ सोऽप्यधोत्सायक सिंहव्याघ्रादीन् स्यन्दने स्थितः । प्रलम्बबाहुम्त्वसिना पादचारी जघान तान् ॥६॥ अहो शौर्यमहो जङ्घाजबोऽस्येति विसिस्मिये । नरवाहनदत्तश्च दृष्ट्वा दृष्ट्वा स स द्विजम् ॥७॥ कृतावट परिक्षान्त स ससारथिगोमुखः । प्रलम्बबाहौ सुभटे तस्मिन्नप्रसरे ततः ॥८॥ रथान्डेऽनुपतान्ते सलितान्वेषणभ्रमात् । बत्सवेश्वरात्मजो दूरं विविशात्यन्महावनम् ॥९॥ तत्रोत्फुल्लहिरण्याब्जं ददर्श प्राप महत्तरः । द्वितीयमिव बहुबधिम्बं भूमिगतं नमः ॥१०॥ तत्र स स्नापपीताम्भा भृशन्मानाङ्गिनानुगः । तदवन्ता धनुरा दूरादगन पूरुषान् ॥११॥ दिव्याकृतीन्दिव्यवस्त्रान्दिव्याभरणभूषितान् । हेमाम्बुजानि गन्धाम्भर्मानुन्विथय गृह्नतः ॥१२॥ उपागात् कौतुकात्तांश्च पृष्ट्वा श्रोत्रेति तद्रथिः । अन्यत्र नाम युष्मान् निज तस्य यदागताः ॥१३॥ चतुर्णां दिव्यपुरुषाणां कथा ततस्त्वेनं दृढप्रीत्या पूजयन्तः तमब्रुवन् । अस्ति मध्य महाभाग श्रीमद्गोवरं महत् ॥१४॥ यन्नास्त्विन्तीराख्यं स्थानं प्रणति गन्तृम् । तत्र सन्ति च चत्वारः पञ्चता दिव्यमानुषाः ॥१५॥ मनारथो वृषमस्तथा फलदत्त इति स्मृताः । चतुर्थो बन्धु बन्ध्वाख्यो निर्वगाम इव स्वयम् ॥१६॥ एतेऽप्यासं नगर्विद्मांवना विविधोपधूपुः । प्रथमस्तांऽडगात्ततो वरदन्तमदमाद्यपुः ॥१७॥ अन्यत्तोऽनूदनसंवित्तस्तथैवैकस्य भक्तवित् । देवोऽवतीर्णस्तदुपास्ते तत्सङ्गेनानपद्वयम् ॥१८॥

नवम लम्बक ५६९

नवम लम्बक ५६९

रथ के घोड़ों के पूरे प्राण लगाकर भागे जाने पर भी प्रलम्बबाहु उनके वेग को जीतकर सदा उनके आगे ही रहता था ॥५॥ नरवाहनदत्त रथ में बैठकर सिंह, व्याघ्र आदि पशुओं को मारता था किन्तु प्रलम्ब- बाहु पैदल ही चलता हुआ तलवार से ही उन्हें मार डालता था ॥६॥ नरवाहनदत्त प्रलम्बबाहु के कौतुक को देख-देखकर आश्चर्यचकित होता था और कहता था— अहो क्या इसकी धीरता है और कितना इसकी जांघों में बल है ॥७॥ अन्त में प्रलम्बबाहु के आगे रहते-रहते ही नरवाहनदत्त गोमुख और सारथी के साथ आखेट करके थक गया और रथ पर चढ़ा हुआ ही प्यास से व्याकुल होकर पानी ढूंढते-ढूंढते जंगल में चला गया ॥८-९॥ उस वन में उसने खिले हुए सोने के कमलों से शोभित एक सुन्दर सरोवर देखा जो मानो अनेक सूर्यों से युक्त पृथ्वी पर उतरे आकाश के समान प्रतीत होता था। उस सरोवर में स्नान करके और पानी पीकर बैठे हुए नरवाहनदत्त ने उस वन के एक ओर, चार पुरुषों को देखा ॥१०-११॥ दिव्य रूपवाले दिव्य वस्त्रों और अलंकारों से आभूषित चारों व्यक्ति उस सरोवर से सोने के कमलों को चुन-चुनकर ला रहे थे ॥१२॥ कौतुकवश नरवाहनदत्त उनके समीप गया और उनके यह पूछने पर कि तू कौन है, उसने अपने नाम, वंश आदि का पूरा परिचय दे दिया ॥१३॥

चार दिव्य पुरुषों की कथा

उनके दैवत में प्रथम उन चारों ने परिचय पूछने पर कहा—महासमुद्र के मध्य में बहुत समग्र और विशाल सुन्दर द्वीप है, जो संसार में नारिकेल द्वीप के नाम से विख्यात है। उसमें चार पर्वत मैनाक, वृषभ, चक्र और बलाहक हैं, जो दिव्य भूमिवाले हैं। उन चारों पर्वतों पर हम चारों निवास करते हैं ॥१४-१६॥ हमलोगों में एक का नाम रूपसिद्धि है, जो विविध प्रकार के रूप धारण करता है। दूसरा प्रमाणसिद्धि है, जो दूर ही सूक्ष्म प्रमाणों को देखता है ॥१७॥ तीसरा ज्ञानसिद्धि है, जिसे भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीनों का ज्ञान है और चौथा देवसिद्धि है, जिसे सभी देवताओं की सिद्धि प्राप्त है ॥१८॥

७२

५७ कथासरित्सागर

५७ कथासरित्सागर ते वयं हेमकमलान्येतान्यादाय साम्प्रतम्। वय पूजयितु याम श्वेतद्वीपे श्रिय पतिम् ॥१९॥ तद्भक्ता हि वयं सर्वे सत्प्रसादेन चारिपु। तेषु स्वेष्वाधिपत्य न सिद्धियुक्ताश्च सम्पद ॥२०॥ तदेहि दर्शयामस्ते श्वेतद्वीपे हरि प्रभुम्। नयामस्त्वन्तरिक्षेण यदि ते रोचते सखे ॥२१॥ इत्युक्तवद्भिस्तै साक देवपुत्रैस्तथेति स। नरवाहनदत्ताङ्ग स्वाभीनाम्बुफलादिके ॥२२॥ गोमुखादीनवस्थाप्य श्वेतद्वीप विहायसा। ययौ गृहीत स्वोत्सङ्गे तमध्यादेवसिद्धिनः ॥२३॥ नरवाहनदत्तस्य श्वेतद्वीपगमनं विष्णुसेवाप्राप्तिश्च तत्रावतीर्य गगनाद्ू रादेवोपसृत्य च। पार्श्वस्थिताङ्गितनय पादान्तस्थवसुन्धरम् ॥२४॥ शङ्खचक्रगदापद्मै सेव्यमान सविग्रहै। भक्त्योपगीयमानं च गन्धर्वैर्नारदादिभि ॥२५॥ प्रणम्यमानं देवेश्च सिद्धैर्विद्याधरैस्तथा। अग्रोपविष्टगरुड खपश्याभ्यागत हरिम् ॥२६॥ स ददर्श द्युतिर्मास्तं प्रापितो देवपुत्रकै । कस्य नाभ्युदये हेतुर्भवेत्साधुसमागम ॥२७॥ ततोऽजित देवपुत्रै कश्यपाद्यैश्च संस्तुतम्। नरवाहनदत्तस्तमस्तोषीत् प्राञ्जलि प्रभुम् ॥२८॥ नमोऽस्तु तुभ्य भगवन् भक्तकल्पमहीरुह। लक्ष्मीकरस्पर्शताश्लिष्टवपुषेऽभीष्टदायिने ॥२९॥ नमस्ते दिव्यहंसाय सन्मानसनिवासिने। सततोदितनादाय पराकाशविहारिणे ॥३०॥ तुभ्य नमोऽतिसर्वाय सर्वाभ्यन्तरवर्तिने। गुणातिवृन्तरूपाय पूर्णषाड्गुण्यमूर्तये ॥३१॥ ब्रह्मा ते नाभिकमले स्वाध्यायोद्यन्मृदुध्वनि। तद्भूतानेकचरणोऽप्येष पद्चरणायते ॥३२॥ भूमिपादो द्युमूर्धा त्वं दिक्श्रोत्रोऽर्केन्दुलोचन। ब्रह्माण्डजठर सोऽपि पुरुषो गीयसे बुधै ॥३३॥

नवम लम्बक ५७१

नवम लम्बक ५७१ हम चारों इन सोने के कमलों को लेकर श्वेतद्वीप में भगवान् कमलापति (विष्णु) की पूजा के लिए जा रहे हैं॥१९॥ हमलोग उन्हीं के भक्त हैं और उन्हीं की कृपा से उन पर्वतों पर हमारा राज्य है और सिद्धियों के साथ सम्पत्तियाँ भी प्राप्त हैं॥२०॥ तो चलो श्वेतद्वीप में तुम्हें हरि का दर्शन करावें। मित्र यदि तुम्हें अच्छा लगे तो हमलोग तुम्हें आकाश-मार्ग से ले चलें ॥२१॥ इस प्रकार कहते हुए देवपुत्रों को स्वीकृति देकर, फल और जल से स्वाधीन उस स्थान पर गोमुख आदि सचिवों को ठहराकर वह उनके साथ जाने को तैयार होगया ॥२२॥ उन चारों में देवसिद्धि ने उसे अपनी गोद में बैठाकर आकाश-मार्ग से श्वेतद्वीप की यात्रा की ॥२३॥ नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति श्वेतद्वीप में पास बैठी हुई लक्ष्मी और चरणों के पास बैठी हुई धरित्री से शोभित शरीरधारी शंख चक्र गदा और पद्म इन शस्त्रों से सेवित गन्धर्वों और नारद आदि से गाकर स्तुति किये जाते हुए, सामने बैठे हुए गरुड़ से सेवित और शेषनाग की शय्या पर सोये हुए हरि का उन चारों देवपुत्रों द्वारा पहुँचाये गये नरवाहनदत्त ने देखा। सच है सज्जनों का समागम किसके कल्याण के लिए नहीं होता॥२४-२७॥ तब उन देवपुत्रों और कश्यप आदि द्वारा स्तुति किये गये भगवान् की नरवाहनदत्त ने हाथ जोड़कर स्तुति की—॥२८॥ 'हे भक्तों के कल्पवृक्ष ! हे सरसी-रूपी कान्ता से लिपटे हुए शरीरवाले ! हे अभीष्ट फल देनेवाले तुम्हें प्रणाम है॥२९॥ सज्जनों के मानस-सरोवर में विहार करनेवाले निरन्तर नाद करते हुए और अनन्त आकाश में विहार करनेवाले तुम दिव्य हंस के लिए नमस्कार है ॥३०॥ सबसे अतिरिक्त रहनेवाले सबके अन्दर में विराजमान गुणों से परे रहनेवाले और पूरे षड् गुणों की मूर्तिमान् तुम्हारे लिए प्रणाम है ॥३१॥ वेदाध्ययन के कारण मन्द ध्वनि करते हुए और उससे उत्पन्न अनेक चरणोंवाले ब्रह्मा भी आपके समीप भ्रमर के समान लगते हैं॥३२॥ आकाश तुम्हारा सिर है दिशाएँ तुम्हारे कान हैं सूर्य और चन्द्रमा तुम्हारे नेत्र हैं और सारा ब्रह्माण्ड तुम्हारा उदर है। अतः तुम परमपुरुष कहे जाते हो ॥३३॥

त्वत्तो धामनिघृष्टासी भूतग्रामो विजृम्भते। नाष स्फुलिङ्गसङ्घात इव प्रज्वलतोऽनलात् ॥३४॥ पुनश्च प्रविशत्येष त्वामेव प्रलयागमे। दिनान्ते विहगव्रात इव वासमहाद्रुमम् ॥३५॥ सृजस्युल्लसित स्वांशांस्त्वमतान् भुवनेश्वरान्। अनन्तवेलाक्षुभितस्तरङ्गानिब वारिधिः ॥३६॥ विश्वरूपोऽप्यरूपस्त्वं विश्वकर्मापि चाक्रियः। विश्वाधारोऽप्यनाधारः कः स सत्त्वमवैति ते ॥३७॥ तां सामुद्रि सुराः प्राप्तास्त्वत्प्रसङ्गेक्षवेक्षिताः। तत्प्रसीद प्रपन्नं मां पश्य पश्यार्द्रया दृशा ॥३८॥ एव कृतस्तुतिं दृष्ट्वा सप्रसादेन चक्षुषा। नरवाहनदत्तं च हरिनारदमभ्यधात् ॥३९॥ गच्छ क्षीरोदसम्भूता या वराप्सरसः पुरा। न्यासीकृत्य मया हस्ते शक्रस्य स्थापिताः स्वकाः ॥४०॥ तास्तस्मान्मम वाक्येन मृगयित्वा महामुने। आरोप्य तद्रथे सर्वाः सत्वरं स्वमिहानय ॥४१॥ इत्युक्तो हरिणा गत्वा नारदः स उपेत्य ताः। आनिन्येऽप्सरसः शक्रात्तद्रथेन समातरि ॥४२॥ तेन तासूर्पनीतासु प्रणतेनाप्सरःस्वथ। वत्सराजतनुजं च भगवानादिदेश सः ॥४३॥ नरवाहनदत्तैतास्तुभ्यमप्सरसो मया। दत्ता विद्याधरेन्द्राणां भविष्यच्चक्रवर्त्तिने ॥४४॥ त्वमासामुचितो भर्त्ता मार्यादिद्यैतास्तवापिताः। : कामदेवावतारो हि निमित्तस्य पुरारिणा ॥४५॥ तच्छ्रुत्वा पादपतिते तस्मिन् वत्सेश्वरात्मजे। लब्धप्रसात्समुदिते हरिर्मातलिमादिशत् ॥४६॥ नरवाहनदत्तोऽसावप्सरःसहितस्त्वया । प्राप्यतां स्वगृहं यावत्पद्या येनायमिच्छति ॥४७॥ एवं भगवतादिष्टः साप््सरस्कं प्रणम्य तम्। नरवाहनदत्तं स रथे मातलिगारथिम् ॥४८॥

मत्स्य सम्भव ५७१ हे प्रभो यह समस्त प्राणियों का समूह और तेज का पुञ्ज तुममें वैसे ही उत्पन्न होता है जैसे जलती हुई अग्नि से चिनगारियां ॥३४॥ यह सारा भूत-संघात (प्राणि समूह) प्रलयकाल में तुम्हारे ही अन्दर उसी प्रकार समा जाता है जैसे सायंकाल के समय पक्षियों का समूह महावृक्ष में समा जाता है ॥३५॥ अखण्ड बेला से क्षुब्ध होकर समुद्र जैसे तरंग उत्पन्न करता है वैसे तुम भी अपने अंग से इन्द्र आदि लोकपालों को उत्पन्न करते हो ॥३६॥ तुम विरञ्चर होकर भी अ-रजा (रजहीन) हो। विश्वकर्मा होकर भी अ-क्रिय (कर्म रहित) हो। विश्व के आधार होकर भी स्वयं निराधार (आधार रहित) हो। वह कौन है जो तुम्हारी अलक्षितता का ज्ञान रखता है ॥३७॥ तुम्हारी कृपा दृष्टि से ही देव गण देवता उस महान् ऐश्वर्यों को प्राप्त करते हैं। अतः मुझ पर कृपा करो। शरण में आये हुए मुझे सदय दृष्टि से देखो ॥३८॥ इस प्रकार, स्तुति किये गये मत्स्यावतार को प्रसन्न दृष्टि से देखकर हरि ने नारद से कहा-जाओ क्षीरसमुद्र में उत्पन्न हुई अप्सराओं को मैंने इन्द्र के पास अपनी धरोहर के रूप में रखा था उन सबको रथ में बैठाकर शुभ शीघ्र मेरे कहने से यहाँ ले आओ ॥३९-४१॥ विष्णु के इस प्रकार कहने पर नारद मुनि ने 'जो आज्ञा' कहकर तुरन्त ही मातलि के साथ रथ में बैठी अप्सराओं को लाकर उपस्थित किया ॥४२॥ नारद द्वारा अप्सराओं के लाने पर उन अप्सराओं के रूप को भगवान् ने आदेश दिया-हे मत्स्यावतार ! दिव्यवर राजाओं व हरदेव व चक्रवर्ती ! त्वा मैंने ये अप्सराएँ दे दीं। तू इनका योग्य पति है और ये तेरी योग्य पत्नियां। क्योंकि शिव ने पहले ही इस वरदान का अवतार बताया है ॥४३-४५॥ यह सुनकर मत्स्यरूपधारी प्रसन्न होकर व रूप-लावण्य गुण से युक्त वे भगवान् के चरणों में गिरने पर हरि ने मातलि को आज्ञा दी कि इन सब रत्नरूप व अप्सराओं सहित जिस कार्य में यह आये थे, वहाँ को चले जाओ ॥४६-४७॥ भगवान् के ऐसा आदेश देने पर मत्स्यरूपधारी अप्सराओं के साथ हँसते-हँसते जलचरों द्वारा रक्षक हुए ॥४८॥